राजपथ - जनपथ

08-Nov-2020 5:53 PM 227

चैम्बर का चुनाव या जात का?

चेम्बर चुनाव जातिगत रंग ले रहा है। एकता पैनल से योगेश अग्रवाल का नाम अध्यक्ष के लिए तय होने के बाद लड़ाई मारवाड़ी वर्सेस सिंधी बन सकती है। योगेश का सीधा मुकाबला पूर्व चेम्बर अध्यक्ष अमर पारवानी से होने के आसार हैं। चेम्बर में कुछ साल पहले तक मारवाड़ी व्यापारियों का दबदबा रहा है। पहले महावीर प्रसाद अग्रवाल और फिर पूरनलाल अग्रवाल की चेम्बर में तूती बोलती थी, दोनों चेम्बर अध्यक्ष रहे। चेम्बर की राजनीति इन दोनों नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बाद में श्रीचंद सुंदरानी ने मारवाडिय़ों के दबदबे को खत्म किया, और पूरनलाल को हराकर अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

बाद में श्रीचंद व्यापारियों के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे। इसी बूते पर विधायक भी बने। अमर पारवानी को चेम्बर अध्यक्ष बनवाने में श्रीचंद की भूमिका रही है। उन्होंने  यूएन अग्रवाल को हराया था। तब  मारवाड़ी समाज के ज्यादातर व्यापारी यूएन के समर्थन में थे। मगर अमर को नहीं रोक पाए। इस बार श्रीचंद ने योगेश अग्रवाल पर दांव लगाया है। ऐसे में निगाहें सिंधी समाज के वोटरों पर हैं, जो कि सबसे ज्यादा संख्या में हैं। अमर की सक्रियता किसी से छिपी नहीं है।

उन्होंने दीगर समाज के वोटरों को अपने पाले में करने की भरसक कोशिश की है। इस बार जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी तय किए जा रहे हैं। एकता पैनल ने योगेश को अध्यक्ष का उम्मीदवार बनाया है, तो महामंत्री उम्मीदवार सिंधी समाज से हो सकते हैं। कुछ इसी तरह की रणनीति अमर की भी है, वे जैन अथवा अग्रवाल को अपने पैनल से उतारने की कोशिश में हैं। दोनों ही पैनल बड़े समाज के व्यापारियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन का चुनाव में भी जात-पात देखा जाने लगा है। मगर मतदाता क्या सोचते हैं, यह तो चुनाव परिणाम  आने के बाद ही पता चलेगा।

हाथियों को दूसरी तरफ धकेलना...

हाथियों से होने वाले नुकसान से बचाव के कई तरीके अब तक आजमाये गए हैं, पर अब एक नया प्रयास हो रहा है। एक खास तरह का केमिकल उन्हें पसंद नहीं है। ये केमिकल खेतों में छिडक़ा जाए तो वे उससे दूर भागते है। ये नीम, करेला और पांच गव्य का मिश्रण है। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ में इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया गया है। रायगढ़ जिला हाथियों से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। प्रदेश के अलग-अलग  स्थानों से आये दिन हाथियों की मौत की खबर आती रहती है। वे कई बार बिजली की बिछाई गई नंगी तारों की चपेट में आकर जान गवां चुके हैं। यदि इस तरीके का प्रयोग छत्तीसगढ़ के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

अब सवाल यह भी उठता है कि यह जो कोई भी मिश्रण है, यह कुछ दाम पर ही आएगा, और जो अपने खेत या गांव में इसे छिडक़ सकेंगे, वे हाथियों को दूसरी तरफ धकेल सकेंगे। लेकिन सवाल यह है कि हाथी जाएंगे कहां? जिस तरह खेतों से फसल के कीड़ों को भगाने के लिए दवा का छिडक़ाव होता है, और जब चारों तरफ के अधिक संपन्न या बेहतर-सक्षम किसान अपने खेतों पर छिडक़ाव कर देते हैं, तो कीड़े उन खेतों पर धावा बोल देते हैं जहां दवा छिडक़ी नहीं गई है। क्या हाथी को दवा से भगा-भगाकर उन्हें दूसरे गांवों पर थोपा जाएगा? हाथी इतनी बड़ी हकीकत हैं कि उन्हें अनदेखा करना ठीक नहीं। इसलिए बिजली के तार हों, या ऐसी दवा का छिडक़ाव हो, इनसे हाथियों को एक जगह ही टाला जा सकता है, वे किसी दूसरी जगह पहुंचकर वहां खतरा बन जाएंगे।


07-Nov-2020 3:19 PM 186

सरकारी सप्लाई में पिछले ही काबिज !

सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस के लोगों के काम नहीं हो रहे हैं। यह शिकायत हर स्तर पर हो रही है। सरकारी विभागों में सप्लाई हो या फिर टेंडर, पिछली सरकार के करीबी लोगों का दबदबा कायम है। इसका नमूना फर्नीचर सप्लाई के काम में भी देखने मिला। सप्लाई ऑर्डर पाने से वंचित लोगों ने विभागीय मंत्री को अपना दुखड़ा सुनाया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हुआ यूं कि स्कूल शिक्षा विभाग के स्कूलों में विद्यार्थियों के बैठने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए नए सप्लायर उम्मीद से थे, लेकिन तीन-चौथाई से अधिक काम सूरजपुर के एक बड़े सप्लायर ने हथिया लिए।

चर्चा है कि करीब 20 करोड़ का फर्नीचर सप्लाई होना है, इसमें से 18 करोड़ के ऑर्डर सूरजपुर के अग्रवाल उपनाम के इस सप्लायर और उससे जुड़े लोगों को मिल गए। ये सभी बरसों से यही काम करते रहे हैं, और पिछली सरकार के मंत्रियों से तो उनका घरोबा था। सरकार बदलने के बाद इन सप्लायरों की हैसियत नहीं घटी है। विभाग से जुड़े लोग इन सप्लायरों पर इतनी मेहरबानी दिखाई कि सारे ऑर्डर 31 अक्टूबर के पहले जारी कर दिए गए, क्योंकि इन सप्लायरों का रेट कॉन्ट्रेक्ट उक्त अवधि को खत्म होने वाला था। चर्चा तो यह भी है कि एक औद्योगिक जिले में प्रशासनिक मुखिया अपने करीबी सप्लायरों को भी ऑर्डर नहीं दिलवा पाए, क्योंकि जिला शिक्षा अधिकारी ने उन्हें बता दिया कि ऑर्डर जारी किया जा चुका है।

एक अफसर ने बताया कि कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोगों को काम इसलिए भी देने से सत्तारूढ़ लोग कतरा रहे हैं कि उनसे कमीशन उतनी आसानी से नहीं माँगा जा सकेगा।

गौठान पर ऐसे फूंका जा रहा बजट

कोई भी सरकारी योजना लागू होती है तो अफसरों की निगाह उसके बजट पर सबसे पहले होती है। ठेकेदारों को कैसे मुनाफा पहुंचाया जाए और उनका अपना कमीशन कैसे बने, इस पर निगाह हो रही है। गौठान योजना में यही बात सामने आ रही है। सरगुजा संभाग के सूरजपुर जिले में एक करोड़ रुपये खर्च कर 10 पंचायतों में गोबर गैस प्लांट लगाए गए। ठेका कम्पनी ने मशीन लगा दी, घरों में कनेक्शन जोड़ दिया। पर अब ये प्लांट बंद पड़े हैं। प्लांट लगाने से पहले आकलन ही नहीं किया गया कि कितना गोबर निकलेगा और कितने घरों तक गोबर गैस पहुंचाई जा सकेगी।

प्लांट के रख-रखाव के लिए भी कर्मचारियों की नियमित रूप से जरूरत है जो कि नहीं हैं । सूरजपुर की सुंदरपुर पंचायत में प्लांट लगा तो उद्घाटन के लिए खाद्य मंत्री और शिक्षा मंत्री भी वहां पहुंचे थे। उन्होंने गोबर गैस से बनाई गई चाय पी। पर उसके बाद प्लांट किस दशा में है न मंत्रियों ने देखना जरूरी समझा न अधिकारियों ने। हालत यह है कि एक करोड़ रुपये खर्च करने के बाद बमुश्किल दस घरों में गोबर गैस पहुंच रही है। प्रदेश में कई गौठान ठीक चल रहे हैं जिनमें वर्मी कम्पोस्ट बनाया जा रहा है, साग सब्जियां उगाई जा रही है पर अधिकांश की हालत खराब है। यही रवैया रहा तो सरकार की करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई महत्वाकांक्षी योजना का विफल होना तया है।

ऐसे बदल रहा युवाओं का रुझान

राज्य में 38 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनमें से ज्यादातर प्राइवेट कॉलेज हैं। सीट नहीं भरने के कारण 5 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं। इसके चलते सीटों की संख्या 15 हजार 626 से घटकर 12 हजार 21 रह गई है। इनमें भी 7 हजार यानि आधे से अधिक खाली चल रहे हैं। इन सीटों के लिये तीसरी बार कोशिश की गई तो सिर्फ 789 छात्रों ने आवेदन भरे। अब आवेदन करने वाले सभी को प्रवेश दिया जाता है तब भी 6 हजार से अधिक सीटें खाली रह जायेंगी। प्रवेश इस माह के अंत तक लिया जा सकता है। हो सकता है चौथी बार भी आवेदन मंगाये जायें लेकिन यह साफ है कि युवाओं की रुचि लगातार इंजीनियरिंग की पढ़ाई में घट रही है। दूसरी तरफ रायपुर के दुग्ध प्रौद्योगिकी महाविद्यालय का आंकड़ा है। यहां पहली ही बार के आवेदन में बी टेक की सारी सीटें भर गई हैं। एम टेक की कुछ सीटें जरूर खाली हैं पर उनके भी अगले चरण में भर जाने के आसार हैं। एक समय था जब इंजीनियरिंग का क्रेज एमबीबीएस की पढ़ाई के बराबर हुआ करता था पर अब रोजगार के अवसर वहां नहीं रह गये हैं। कुछ समय पहले एक आंकड़ा आया था कि 75 फीसदी युवा इंजीनियरिंग डिग्री लेकर भी रोजगार हासिल नहीं कर पाये। डेयरी, पशु, कृषि आदि की पढ़ाई को पहले कमतर आंका जाता था, पर अब युवाओं को रोजगार की संभावना इन्हीं विषयों में ज्यादा दिख रही है।

मेडिकल छात्र के परिवार को न्याय मिलेगा?

मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग ने नेताजी सुभाषचंद्र मेडिकल कॉलेज जबलपुर के छात्र भागवत देवांगन की आत्महत्या के मामले में मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, डीन, अधीक्षक आदि को नोटिस जारी कर दिया गया है। मूलत: राहौद जिला जांजगीर-चाम्पा के छात्र भागवत ने 1 अक्टूबर को हॉस्टल के अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। रैगिंग के नाम पर उसे लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा। इसके पीछे पांच सीनियर छात्रों का हाथ होने की बात सामने आई। तंग आकर भागवत अपने घर राहौद लौट गया था, पर एक माह बाद 25 सितम्बर को वापस जबलपुर लौटा था। राहौद में भी उसके घर पर होने के दौरान उसे अपमानित करने वाले मेसैज मोबाइल पर भेजे जा रहे थे। लौटने के बाद फिर उसे प्रताडि़त किया जाने लगा। मौत के बाद बिलासपुर और जांजगीर-चाम्पा में दोषियों पर कार्रवाई की मांग उठी। अब आयोग ने अपनी नोटिस में जिम्मेदार अधिकारियों से पूछा है कि क्या मृतक छात्र के परिवार को कोई आर्थिक सहायता मुहैया कराई गई? क्या दोषियों के खिलाफ आत्महत्या के लिये उकसाने का अपराध दर्ज किया गया? वैसे आयोग की नोटिस को प्रशासनिक अधिकारी प्राय: अधिक गंभीरता से लेते नहीं हैं फिर भी जिस मामले में अब तक कुछ नहीं हो रहा था, पीडि़त परिवार को न्याय मिलने की दिशा में कुछ तो होगा।


06-Nov-2020 5:21 PM 175

पिछली सरकार से अब तक...

कांकेर जिले के एक विधायक पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली से खफा हैं। विधायक के इलाके में पिछली सरकार ने 12 करोड़ खर्च कर एक सडक़ बनवाई थी। विधायक का कहना है कि सडक़ बनी ही नहीं, और अफसर-ठेकेदार और प्रभावशाली लोगों ने राशि हजम कर ली। विधायक महोदय पूरे दस्तावेज लेकर यहां-वहां घूम रहे हैं, लेकिन  इसकी जांच नहीं हो पा रही है।

वे खुलकर इस विषय पर कुछ नहीं कह पा रहे हैं क्योंकि सरकार अपनी है। विधायक एक-दो बार इस सरकार के विभागीय मंत्री से बात भी कर चुके हैं, मगर कुछ नहीं हुआ। उन्होंने विधानसभा में सवाल भी लगाया था, लेकिन तकनीकी कारणों से नहीं लग पाया। वे सीएम को भी इससे अवगत करा चुके हैं, परन्तु जांच शुरू नहीं हो पाई। चर्चा है कि अज्ञात शक्तियां विधायक की मंशा पूरी नहीं होने दे रही है। विधायक ने भी हार नहीं मानी है, वे इस पर विधानसभा में दस्तावेज समेत भ्रष्टाचार को उजागर करने की योजना बना रहे हैं। देखते हैं कि विधायक महोदय की मंशा पूरी होती है, अथवा नहीं।

बर्दाश्त घटा, भाषण में किफायत

सरकार जाने के बाद अब भाजपा के कई नेता अपने ही नेताओं के लंबे-चौड़े भाषण से परहेज करने लगे हैं। वजह भी साफ है कि पार्टी नेताओं के भाषणों को अर्से से सुनते रहे हैं, और इससे कोफ्त होना स्वाभाविक है। कुछ ऐसा ही नजारा अजा मोर्चे के नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष नवीन मारकण्डेय के पदभार ग्रहण कार्यक्रम के दौरान देखने को मिला। मारकण्डेय लंबा-चौड़ा भाषण देने के मूड में आए थे, लेकिन उन्हें जल्दी भाषण खत्म करने कहा गया।

कुछ इसी तरह डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी को भी अपनी बात संक्षिप्त में रखने के लिए कहा गया। पूर्व मंत्री चंद्रशेखर साहू लंबे समय से मंच से वंचित रहे हैं। उनकी भी इच्छा काफी कुछ कहने की थी, लेकिन बृजमोहन अग्रवाल ने उन्हें टोक दिया, और जल्दी भाषण खत्म करने के लिए कह दिया। इसके बाद गौरीशंकर अग्रवाल को भाषण देने बुलाया जा रहा था कि बृजमोहन अग्रवाल ने फिर हस्तक्षेप किया और कहा कि सीधे प्रदेश अध्यक्ष को ही बुलाया जाए। गौरीशंकर भाषण नहीं दे सके, और फिर विष्णुदेव साय के भाषण के बाद कार्यक्रम खत्म कर दिया गया।

मरवाही में स्थानीय कांग्रेसियों की बेइज्जती

कांग्रेस ने मरवाही चुनाव प्रचार के लिये बाहर के कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में तैनात किया था। इनमें से कुछ लोगों का बर्ताव स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बेहद खराब रहा। पेन्ड्रा में कांग्रेस की समीक्षा बैठक में यह बात सामने आई। एक महिला कार्यकर्ता तो बैठक में ही फफक-फफक कर रो पड़ी। उन्होंने कहा कि एक प्रदेश पदाधिकारी हमें ईमानदारी और निष्ठा का पाठ पढ़ाने लगे। हम पर आरोप लगाने लगे कि हम लापरवाही से काम कर रहे हैं। बैठक में उक्त महिला कार्यकर्ता ने जब बात रखी तो बाकी लोगों की भड़ास भी निकल पड़ी। जिला अध्यक्ष मनोज गुप्ता ने जैसे तैसे सबको शांत किया।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तीन दिन तक मरवाही में तूफानी प्रचार किया था। उनकी जनसभा जोगीसार में भी हुई। इसे जोगी परिवार का गांव कहा जाता है और कई लोग उन्हें अपना रिश्तेदार भी बताते हैं। सभा में अच्छी भीड़ उमड़ी लेकिन वहां के सरपंच को ही मंच पर नहीं बुलाया गया। इसके अलावा जनपद के कई पदाधिकारी, महिला कांग्रेस की स्थानीय कार्यकर्ता स्वागत करने के लिये तरस गये। सभा खत्म होने के बाद वे इसका दर्द लोगों से साझा करते हुए दिखे। कांग्रेस के बाहर से आये नेताओं ने मरवाही में अपने बर्ताव से कितने वोट जुटाये, कितने बिगड़े, यह नतीजा आने पर ही मालूम होगा।


05-Nov-2020 6:41 PM 288

विधायक प्रतिनिधि होने का दर्द

प्रदेश भाजपा के बड़े नेता लीलाराम भोजवानी पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के विधायक प्रतिनिधि क्या नियुक्त हुए, उनकी सियासी ताकत बढऩे के बजाए कम हो गई। ऐसा उनके करीबी लोग महसूस कर रहे हैं। खुद भोजवानी भी नई जिम्मेदारी से नाखुश बताए जा रहे हैं।

वे निजी चर्चाओं में इसका इजहार भी कर रहे हैं। भोजवानी को पहले तो विष्णुदेव साय की टीम में जगह नहीं मिली, उसके बाद मंडलों की कार्यकारिणी में उन्हें स्थाई आमंत्रित सदस्य के लायक नहीं समझा गया। इससे खफा भोजवानी ने भाजपा के प्रदेश स्तरीय प्रशिक्षण में भी यह कहकर जाने से इंकार कर दिया कि प्रदेश संगठन में किसी ओहदे पर नहीं होने से वह प्रशिक्षण के लिए पात्र नहीं हंै।

 उनका दर्द यह भी है कि नांदगांव भाजपा में उनके बराबर के नेता खूबचंद पारख प्रदेश में उपाध्यक्ष बन गए और उनसे सालों जूनियर नीलू शर्मा प्रवक्ता नियुक्त हो गए। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि यदि भोजवानी विधायक प्रतिनिधि नहीं होते, तो उन्हें अहम जिम्मेदारी दी जा सकती थी। अब रमन सिंह सीएम तो है नहीं, ऐसे में उनका प्रतिनिधि होना उनके जैसे सीनियर नेता के लिए कोई सम्मान की बात नहीं है। फिलहाल तो नांदगांव में रमन विरोधी नेता, भोजवानी की नाराजगी पर चुटकी ले रहे हैं।

इस बार धान की कीमत क्या मिलेगी?

एक दिसम्बर से होने वाली धान खरीदी को लेकर जारी आदेश साफ नहीं होने की वजह से किसानों की सांस अटक गई है। राज्य में केन्द्र की ओर से निर्धारित किये गये समर्थन मूल्य पर धान खरीदने की घोषणा तो की गई है पर हर साल 2500 रुपये प्रति क्विंटल खरीदने के वादे को पूरा कैसे किया जायेगा, स्पष्ट नहीं किया गया है। पिछली बार भी केन्द्र के सख्त रुख के चलते 2500 रुपये में खरीदी का फैसला टालना पड़ा था पर समर्थन मूल्य के बाद की अतिरिक्त राशि का भुगतान राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत बांटने का निर्णय लिया गया। इसकी तीन किश्तें मिल चुकी हैं। तीसरी किश्त 1 नवंबर को मिली। एक किश्त बाकी है, जो कब दी जायेगी इस पर भी अभी तक कोई घोषणा नहीं की गई है। बीते साल कर्ज माफी पर सरकार को करीब 11 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ा था लेकिन इस बार ऐसी समस्या नहीं है। किसान बेसब्री से बची हुई चौथी किश्त और धान की कीमत पर स्थिति साफ होने की प्रतीक्षा में हैं।

कृषि विधेयक का क्या होगा?

छत्तीसगढ़ विधानसभा के 27 अक्टूबर के विशेष सत्र में कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पारित कर दिया है। विधेयक के प्रावधान केन्द्र द्वारा लागू किये गये तीन कृषि बिलों को एक हद तक बेअसर कर देंगे। इस पर अब राज्यपाल का हस्ताक्षर होना है। दूसरी ओर पंजाब का मामला हमारे सामने है। वहां राज्यपाल ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। संकट पैदा हो गया है। मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने इस मामले में राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा, नहीं मिला। पंजाब में किसानों का रुख ज्यादा आक्रामक है। रेल पटरियों पर बैठकर आंदोलन किया जा रहा है। इसके चलते यात्री ट्रेनें तो प्रभावित हैं, माल परिवहन भी बाधित है। बाद में किसानों ने मालगाडिय़ों को नहीं रोकने की घोषणा भी कर दी पर रेलवे ने सभी तरह की ट्रेनों को आंदोलन से प्रभावित क्षेत्रों में रोक रखा है। इसके चलते वहां के बिजलीघरों में कोयले की आपूर्ति नहीं हो पा रही है अब बिजली उत्पादन पर असर पडऩे की आशंका है। छत्तीसगढ़ में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव की बात बीच-बीच में आई हैं और दोनों तरफ से इसका खंडन भी किया गया। पंजाब के परिप्रेक्ष्य में यह देखना होगा कि छत्तीसगढ़ में विधेयक का आने वाले दिनों में क्या हश्र होने वाला है।

टाइगर के बिना टाइगर रिजर्व

उंदती सीतानदी इलाके में लोगों ने इसके टाइगर रिजर्व एरिया के दर्जे को खत्म करने की मांग पर आंदोलन शुरू किया है। इनका कहना है कि बीते कई सालों से यहां किसी ने टाइगर नहीं देखा। जंगल में 200 ट्रैप कैमरे लगाये गये हैं। उनमें भी अब तक कोई बाघ कैद नहीं हुआ। फिर भी हर साल 30-40 करोड़ रुपये खर्च कर दिये जाते हैं। इस इलाके में निर्माण कार्य और सुविधाओं पर रोक लगी हुई है। 40 गांवों में रहने वाले करीब 30 हजार लोग सडक़, पुल-पुलिया, स्कूल भवन से वंचित हो गये हैं। इन्हें विस्थापित किये जाने का खतरा भी बना हुआ है। लगभग यही स्थिति अचानकमार टाइगर रिजर्व की है। यहां कभी 19 बाघ तो कभी 40 बाघ होने का दावा किया जाता है पर ये न तो पर्यटकों को दिखाई देता न ही भीतर के गांवों में बसे लोगों को। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत यहां 600 मकान स्वीकृत किये गये थे लेकिन उस पर रोक लगा दी गई। बिलासपुर से पेन्ड्रारोड और अमरकंटक को जोडऩे वाली सडक़ की मरम्मत वर्षों से नहीं हुई है। पहले यहां से गुजरना भी रोक दिया गया था पर अब विरोध के कारण दिन में आने-जाने की छूट दी गई है। एक निश्चित समय में जंगल को पार करना भी जरूरी है। यह बात जरूर है कि दूसरे जंगली जानवर इस क्षेत्र में है पर टाइगर होने न होने पर हमेशा संदेह जताया जाता रहा है। टाइगर रिजर्व न बतायें तो वन विभाग को बजट किस बात पर मिलेगा?  वन विभाग की सहूलियत आम लोगों की परेशानी का सबब है।


04-Nov-2020 5:37 PM 385

कौन बनेगा आईएएस ?

अन्य सेवा संवर्ग से आईएएस अवार्ड को लेकर प्रशासनिक हल्कों में उत्सुकता है। सीएस की कमेटी ने आठ अफसरों के इंटरव्यू लिए। इनमें से एक-दो दिन में पांच नाम छांटकर डीओपीटी को भेजा जाएगा। जिन अफसरों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था, उनमें से तो कुछ नाम तो चौंकाने वाले थे। मसलन राजेश सिंघी, जो कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के विशेष सहायक हैं। इससे पहले वे पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत के विशेष सहायक थे। मंत्री स्थापना में पदस्थ अफसरों पर किसी सीनियर अफसर की नजर, तो रहती नहीं है। उनके काम का मूल्यांकन मंत्री ही करते हैं। ऐसे अफसर को इंटरव्यू में बुलाने पर कानाफूसी हो रही है। वैसे यह सब औपचारिकता है। आम तौर पर यह माना जाता है कि सीएम जिसे चाहते हैं, उनके नाम पर मुहर लग जाती है। 

पिछली सरकार में एक रिक्त पद के लिए जिन पांच अफसरों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था, उन सभी का परफार्मेंस बेहतर था। उस समय भरी मीटिंग में यूपीएससी चेयरमैन दीपक गुप्ता ने राज्य सरकार के अफसरों से कहा था कि आपके पांचों अफसर आईएएस अवॉर्ड के लायक हैं।  जिन अफसरों का इंटरव्यू हुआ था उनमें अनुराग पाण्डेय, राजीव जायसवाल, उमेश मिश्रा, अनुराग दीवान और डॉ. अनिल चौधरी थे। चयन समिति ने अनुराग पाण्डेय के नाम पर मुहर लगार्ई। दरअसल, उस समय उत्तर भारत के एक राज्य में सीएम और सीएस के दबाव में ऐसे अफसर को आईएएस अवॉर्ड के लिए अनुशंसा करनी पड़ी थी, जिसके परफार्मेंस से यूपीएससी और डीओपीटी के अफसर बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे। इस बार  उमेश मिश्रा दोबारा इंटरव्यू हुआ है। संभव है कि पांच नामों में उनका भी नाम शामिल होगा, मगर जीएसटी के एडिशनल कमिश्नर गोपाल वर्मा को आईएएस अवार्ड के लिए सबसे मजबूत माना जा रहा है। गोपाल के पक्ष में सारे राजनीतिक और सामाजिक समीकरण दिख रहे हैं। देखना है कि आगे होता है क्या।

और आईएएस बनने का एक किस्सा!

अभी जब छत्तीसगढ़ में डिप्टी कलेक्टरों से परे अन्य सेवाओं के लोगों में से किसी को आईएएस बनाने की मशक्कत चल रही है, तो एक दिलचस्प वाकया याद पड़ता है जो कि अजीत जोगी ने इस अखबारनवीस को खुलासे से सुनाया था। 

जोगी रायपुर में कलेक्टर थे और यहां औद्योगिक विकास केन्द्र में एम.ए.खान जनरल मैनेजर थे। अविभाजित मध्यप्रदेश में जब अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे तब ऐसी ही मशक्कत चल रही थी, और राज्य प्रशासनिक सेवा से परे के किसी अफसर के आईएएस बनने की बारी थी। जोगी की तगड़ी सिफारिश पर अर्जुन सिंह ने खान का नाम लिस्ट में रखवा दिया था। 

इसके बाद जब दिल्ली से कमेटी भोपाल पहुंची, और एक-एक करके सभी उम्मीदवारों का इंटरव्यू करने लगी तो एम.ए. खान की जुबान को मानो लकवा मार गया। उनका मुंह ही नहीं खुल पाया। वे एक भी बात का जवाब नहीं दे पाए, और कमेटी दिल्ली लौट गई। इसके बाद जोगी फिर अर्जुन सिंह के पीछे लगे कि किसी तरह से खान का नाम जुड़वाया जाए। उस वक्त दिल्ली और भोपाल दोनों में कांग्रेस की सरकार थी, और अर्जुन सिंह का वजन बहुत था। उन्होंने किसी तरह कमेटी की एक और बैठक रखवाई। इस बार खान को तैयार किया गया कि कमेटी के पूछे हुए कम से कम एक सवाल का तो जवाब दे ही दें। किसी तरह खींचतान कर अजीत जोगी ने एम.ए. खान को आईएएस बनवा दिया। 

इसके बाद का किस्सा और दिलचस्प है, और उसी वजह से जोगीजी यह किस्सा सुनाते भी थे। 

जब अविभाजित मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा की सरकार बनी, तो भोपाल में अवैध कब्जे-अवैध निर्माण की झोपडिय़ों को तोडऩे के लिए कार्रवाई हो रही थी, एम.ए.खान उस वक्त भोपाल के कलेक्टर थे, और जाहिर है कि वे पटवाजी के करीबी भी थे। अर्जुन सिंह विपक्ष के होने के नाते इस अभियान का विरोध करने मौके पर पहुंचे थे, और उनके साथ राज्यसभा सदस्य अजीत जोगी भी थे। इस वक्त झोपडिय़ों पर चलते हुए बुलडोजर पर बैनर लगा हुआ था कि मेरे आंख-कान नहीं हैं मुझे दिखता नहीं है, और जो मेरे सामने रहेगा वह कुचला जाएगा। अर्जुन सिंह और जोगी मौके पर तोडफ़ोड़ रोकने की कोशिश कर रहे थे तो लाउडस्पीकर पर एम.ए. खान ने उनसे वहां से हट जाने की घोषणा की। इस पर अर्जुन सिंह ने तिरछी नजरों जोगी को देखते हुए, अपने कुछ तिरछे होठों से धीरे से कहा- ये वही खान हैं जिन्हें आपने आईएएस बनवाया था? 

अब जोगीजी क्या कहते! लेकिन वे यह किस्सा बहुत मजा लेकर सुनाते थे। 

कमिश्नरी फिजूल की हो गयी?

अमृत खलको के राज्यपाल का सचिव बनने के बाद से बस्तर कमिश्नर का पद खाली है। खलको डिप्टी कमिश्नर को चार्ज देकर यहां आ गए थे, तब से नई पदस्थापना नहीं हो पाई है। अविभाजित मध्यप्रदेश में बस्तर कमिश्नर का पद काफी अहम माना जाता रहा है, और काबिल अफसरों की यहां पोस्टिंग होती रही है। सुदीप बैनर्जी, एलके जोशी, विवेक ढांड जैसे अफसर बस्तर कमिश्नर रहे हैं। बस्तर कमिश्नर को वित्तीय अधिकार भी रहा है। 

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पहले कमिश्नरी खत्म कर दिया गया, बाद में रमन सरकार में दोबारा कमिश्नरी व्यवस्था बहाल हुई, तो सचिव अथवा विशेष सचिव स्तर के जूनियर अफसरों को भेजा जाने लगा। अब जब कलेक्टर सीधे सीएम हाउस को रिपोर्ट करते हैं, कमिश्नरी की रौनक अब पहले जैसी नहीं रह गई। फिर भी बस्तर में समस्याएं काफी हैं, और यहां  कमिश्नर की जरूरत महसूस की जाती रही है। भूपेश सरकार ने बोधघाट जैसी परियोजना को प्राथमिकता देने का फैसला लिया है। ऐसे में बस्तर कमिश्नर की पदस्थापना न होना समझ से परे है। 

मरवाही में कड़ी टक्कर बरसों बाद...

मरवाही में मतदान हो चुका, अब दावों-प्रतिदावों, कयासों का सिलसिला चल रहा है जो 10 नवंबर को नतीजा आने के बाद ही थमेगा। कोरोना संकट और फसल कटने की व्यस्तता के बीच हुए इस उप-चुनाव में अनुमानों के विपरीत मतदाता बड़ी तादात में वोट देने निकले। शुरुआती आकलन के मुताबिक 77.25 फीसदी वोट डाले गये। सभी बूथों की ईवीएम मशीनों के पहुंचने के बाद आंकड़ा कुछ घट-बढ़ सकता है। मुख्य मुकाबले में रही कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के नेता और समर्थक इस भारी मतदान को अपनी सहूलियत के अनुसार परिभाषित कर रहे हैं। कांग्रेस के लिये वोटर जिले के गठन और सरकार के विकास कार्यों पर मुहर लगाने के लिये निकले तो भाजपा की निगाह में भीड़ सरकार को सबक सिखाने के लिये बूथों में पहुंची थी। समान बात यह है कि जीत के उस आंकड़े की बात कोई नहीं कर रहा है जिसे जोगी हासिल कर लिया करते थे। दावा, बस अच्छे बहुमत से जीत का किया जा रहा है। मतलब साफ है कि मुकाबला तगड़ा हुआ है। मरवाही के मन में क्या है इस पर नतीजा आने तक चर्चा और लगे हाथ सट्टेबाजी का दौर भी चलता रहेगा।

मरवाही के कुछ दिलचस्प आंकड़े

कोरोना, फसल कटाई और उप-चुनाव के बीच मतदान का जो बढ़ा प्रतिशत लोगों को चौका गया, वह विधानसभा चुनावों की तालिका पर तुलनात्मक नजर डालने से बहुत बड़ा भी दिखाई नहीं देता। तथ्य यह है कि विधानसभा चुनावों में हर बार मरवाही में अच्छी वोटिंग होती रही। 2008 में 75.21 प्रतिशत, 2013 में 84.06 तथा सन् 2018 में जब स्व. अजीत जोगी कांग्रेस से अलग होकर मैदान में थे 80.88 प्रतिशत मतदान हुआ। यानि इस उप-चुनाव का मतदान पिछले चुनाव से करीब 3.6 प्रतिशत कम है। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में भी 75.11 प्रतिशत तथा 2019 के चुनाव में 74.19 प्रतिशत वोट डाले गये, जो बाकी विधानसभा क्षेत्रों से अधिक थे। हालांकि सन् 2009 के चुनाव में मतदान का प्रतिशत सिर्फ 60.19 प्रतिशत रहा।

मरवाही सीट से जुड़ी एक खास बात और है कि यहां महिला मतदाता पुरुषों से अधिक हैं और वे मतदान में भी आगे रही। पुरुषों का मतदान प्रतिशत 77.13 रहा तो महिलाओं का 77.36 तक पहुंचा। मरवाही में 93 हजार 735 पुरुष तथा 97 हजार 265 महिलायें हैं। थोड़ी सी हैरानी इस बात पर भी हो सकती है कि जोगीसार, जिसे जोगी का गांव समझा जाता है वहां 72.89 प्रतिशत वोट पड़े जो औसत से कम है। इसे मरवाही क्षेत्र में सबसे कम मतदान वाले बूथों में जगह मिली है।

मार्शल के लिये चि_ी रवाना होने से पहले रुकी

संसद में कई बार इतनी अप्रिय स्थिति बन जाती है कि कार्यवाही में व्यवधान रोकने के लिये आंसदी को मार्शल का प्रयोग करना पड़ता है। लोकसभा-विधानसभा में ऐसी व्यवस्था आम है पर अब नगर निगम की सामान्य सभाओं में भी वाद-विवाद बढऩे लगे हैं। कई बार लगता है कि हंगामे को रोकने लिये बल का इस्तेमाल जरूरी है। दुर्ग नगर निगम की सामान्य सभा 9 नवंबर को रखी गई है। आयुक्त ने एक चि_ी तैयार की, पुलिस अधीक्षक को भेजने के लिये। इसमें पुलिस जवान मांगे गये ताकि विवाद न संभले तो उनका इस्तेमाल कर निपटा जा सके। चि_ी की जानकारी महापौर, सभापति को हुई। उन्होंने आयुक्त से मिलकर उनको आश्वस्त किया कि  सभा में कोई बाधा नहीं डालेगा, सब अपने ही लोग हैं। पुलिस को चि_ी लिखने या बुलाने की जरूरत नहीं है। खबर है, आयुक्त मान गये हैं अब वह चि_ी नहीं जायेगी। उम्मीद कर सकते हैं कि सामान्य सभा की साख बनी रहेगी।

 


03-Nov-2020 5:59 PM 196

नतीजे भाजपा के खिलाफ आते हैं तो?

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने उपचुनाव को लेकर भविष्यवाणी की, कि मरवाही की जनता ने दिवंगत अजीत जोगी के अपमान का बदला लेने का निर्णय ले लिया है। अब चुनाव नतीजे भाजपा के खिलाफ आते हैं, तो माना जाएगा कि जनता ने अपमान का बदला नहीं लिया। बृजमोहन मरवाही में आखिरी के तीन दिनों में पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार के लिए गए थे। वे अजय चंद्राकर के साथ मरवाही से करीब 30 किलोमीटर दूर एक रिसोर्ट में ठहरे थे। दोपहर प्रचार के लिए निकल जाते थे, दो-तीन सभा लेने के बाद वापस रिसोर्ट आ जाते थे। वहां कुछ कांग्रेस के लोग भी ठहरे थे, जिनसे खुशनुमा माहौल में अच्छी चर्चा भी हो जाती थी। कोरोना संक्रमण के कारण बृजमोहन और अन्य नेता घर से बाहर नहीं निकल पाए थे, लेकिन उपचुनाव में प्रचार के बहाने अच्छीखासी आउटिंग भी हो गई।

बड़ा घोटाला रुका

पीएचई के जल मिशन के टेंडर निरस्त होने से एक बड़ा घोटाला रूक गया। सुनते हैं कि प्रभावशाली लोगों ने अफसरों के जरिए अपनी पसंदीदा कंपनियों को करोड़ों का काम दिला दिया था। कांग्रेस संगठन के एक बड़े नेता ने तो अपने मुंहबोले नाती को भी 10 करोड़ का काम दिलाया था। ठेका निरस्त हो गया तो मुंहबोले नाती की भारी भरकम कमाई करने की इच्छा धरी की धरी रह गई। चर्चा है कि कुछ लोगों ने एडवांस भी अफसरों को दे दिया था, जिसे लौटाने के लिए अफसरों पर काफी दबाव है।

उम्मीद जीएसटी बकाया मिलने की

जीएसटी कलेक्शन का नवीनतम आंकड़ा आया है जिसमें छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश पहले नम्बर पर हैं। अक्टूबर माह में पिछले साल के इसी माह के मुकाबले 26 प्रतिशत अधिक कलेक्शन हुआ है। सितम्बर माह में भी अच्छी स्थिति रही तब कलेक्शन 31 प्रतिशत अधिक रहा। केन्द्र के लिये आंकड़ा इसलिये महत्वपूर्ण है कि पहली बार किसी महीने में जीएसटी संग्रहण एक लाख करोड़ रुपये से अधिक (1.05155 लाख) पहुंच गया। छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों का केन्द्र पर बकाया चढ़ा हुआ है। जीएसटी कानून के मुताबिक राज्यों के कर संग्रह में कमी आने पर केन्द्र को आने वाले कई वर्षों तक भरपाई करनी है। अगस्त माह में यह बकाया 2800 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। अब और बढ़ गया होगा। बीते 5 अक्टूबर को जीएसटी कौंसिल की बैठक में यह मुद्दा उठाया गया तो केन्द्रीय वित्त मंत्री ने राज्यों को कर्ज लेने की सलाह दी थी। यह भी कहा था कि कम ब्याज दर पर कर्ज लेने में केन्द्र सरकार मदद करेगी। छत्तीससगढ़ सहित अनेक राज्यों ने ऐसा करने से मना कर दिया। छत्तीसगढ़ सरकार तो अनेक लोक लुभावन वायदों को पूरा करने के लिये बार-बार कर्ज ले तो रही है लेकिन इस मामले में हड़बड़ी नहीं दिखाकर ठीक ही किया। कोरोना का भय जितना कम होता जा रहा है, व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती जा रही है। इसलिये उम्मीद की जा सकती है कि कलेक्शन की रफ्तार बनी रहेगी। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य उम्मीद भी कर सकते हैं कि उन्हें केन्द्र से बकाया राशि जल्द मिल सकेगी।

अब तो शुरू करें सरकारी कॉलेज

कोरोना के चलते निजी और सरकारी सभी तरह के कॉलेजों में पढ़ाई लम्बे समय तक बंद रही। पर, निजी विश्वविद्यालयों ने मौके की नजाकत देखकर ऑनलाइन कक्षायें शुरू कर दीं। करीब-करीब सभी निजी विश्वविद्यालय अगस्त महीने से ही ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं। इसके पहले स्टाफ को क्लास लेने के लिये ऑनलाइन प्रशिक्षण भी दिया गया। वे यह उम्मीद भी कर रहे हैं कि फरवरी मार्च आते-आते कोरोना संक्रमण की स्थिति सुधर जाये कि प्रायोगिक परीक्षाएं भी फिजिकल उपस्थिति के साथ शुरू हो। दूसरी ओर सरकारी कॉलेजों की चाल बिल्कुल सरकारी है। एक माह पहले से ही तय हो चुका है कि ऑनलाइन कक्षाओं के लिये तैयारी की जायेगी जो नहीं हुआ। उच्च शिक्षा विभाग अब तक नया सिलेबस जारी नहीं कर पाया है। कोरोना काल में कक्षाओं को हुए नुकसान को देखते हुए पाठ्यक्रम में कुछ कटौती करनी थी लेकिन यह भी नहीं हो पाया। सत्र का आधे से ज्यादा हिस्सा बिना अध्यापन के ही गुजर चुका है। कोरोना के चलते महाविद्यालयों में प्रवेश की स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिये बार-बार एडमिशन की आखिरी तारीख बढ़ाई जाती रही। निजी विश्वविद्यालयों में एडमिशन को लेकर काफी उदारता बरती जाती है। बीच सत्र में भी प्रवेश मिल सकता है। पर इसके कारण उन्होंने ऑनलाइन क्लासेस रोककर नहीं रखा। सरकारी कॉलेजों में इसी बहाने से क्लासेस रोककर रखे गये। अब बचे हुए दो तीन माह में कैसे सालभर की पढ़ाई पूरी की जायेगी, रिजल्ट कैसा होगा, क्या यह साल बेकार चला जायेगा? सवाल बना हुआ है। हालांकि सोमवार से कुछ कॉलेजों ने उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशों का इंतजार किये बिना पढ़ाई शुरू कर दी है, पर अधिकांश तो अब तक क्लास नहीं ले रहे हैं।

बगावत के बाद भी निष्कासन नहीं...

जिन दो विधायकों देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा ने कांग्रेस को खुला समर्थन दिया है छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने उन्हें इस्तीफा देकर फिर चुनाव लडऩे की सलाह दी है। जवाब में इन विधायकों ने कहा है कि अमित ने भी कांग्रेस से निकाले जाने के बाद इस्तीफा नहीं दिया और पूरे कार्यकाल तक पार्टी में बने रहे। अब जब पार्टी के फैसले के खिलाफ जाकर दोनों विधायकों ने खुली बगावत कर दी है तो निष्कासन जैसी कार्रवाई तो बनती है। पर, इससे तो उनकी विधायकी बची रह जायेगी, उल्टे पार्टी को मिले कुछ वोटों का प्रतिशत गिर जायेगा। जानकार बताते हैं कि इससे पार्टी को मिले क्षेत्रीय पार्टी के दर्जे पर भी असर भी पड़ेगा। बहरहाल, चुनाव परिणाम के बाद तो कई उलटफेर देखने को मिलेंगे। आज मरवाही में मतदान है, फैसला भी 10 को आ जायेगा, प्रतीक्षा करनी होगी।

खुदकुशी से बचने के बाद की लड़ाई

फिंगेश्वर के पास तरीघाट के एक किसान ने कुछ माह पहले आत्महत्या की कोशिश की, पर समय रहते उसे बचा लिया गया। इसके बावजूद उसकी वह समस्या हल नहीं हुई, जिसकी वजह से उसने जान देने की कोशिश की थी। दरअसल गांव में गौठान बनाने लिये पंचायत ने तहसीलदार की मौजूदगी में उसकी खड़ी फसल मवेशियों के हवाले कर दी। जान खतरे में डालने के बाद भी न तो अधिकारियों ने उसकी सुनी न प्रशासन ने। दूसरी बार पीडि़त किसान घासीराम नागर्ची ने आत्महत्या का रास्ता नहीं चुना, बल्कि साहस जुटाकर अपनी लड़ाई हाईकोर्ट ले गया। अब ख़बर है कि हाईकोर्ट ने उसके हक में फैसला दिया है। गौठान कहीं और बनेगा और किसान जमीन पर काबिज रहकर खेती-बाड़ी करता रहेगा। यह घटना इस मायने में खास है कि जब भी किसी महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने का दबाव नीचे के अधिकारियों पर पड़ता है वे नियम कायदों को ताक में धर देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि आम लोगों की सहूलियत बनी रहे। शासन का आदेश है, कहकर कई गलतियां करते हैं, पसीजते नहीं। हो सकता है कोर्ट के इस आदेश का उन पर कुछ असर पड़े। दूसरा, सिस्टम प्रताडि़त करे, शासन की सुविधायें न मिलें, भूखों मरने की नौबत भी आये, तब भी इंसाफ के और दरवाजे तो खुले रहते ही हैं। हर किसी को हाईकोर्ट जाना ही पड़े यह भी जरूरी नहीं। किसान घासीराम अब महसूस कर रहा होगा कि आत्महत्या की कोशिश गलत थी।

कोरोना टीका लगवाने के लिये...

कोरोना की वैक्सीन फरवरी 2021 तक आने की उम्मीद है। इसके लिये प्रदेशभर में कोल्ड स्टोरेज भी तैयार किये जा रहे हैं। केन्द्र सरकार का निर्देश है कि पहले डॉक्टरों, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और निजी अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों और स्टाफ को यह टीका लगाया जाये। जाहिर है टीके का सभी को बेसब्री से इंतजार है। हर कोई चाहता है कि वैक्सीन आते ही लगवा लें और कोरोना के खतरे से निश्चिन्त हो जायें। ऐसी स्थिति में फर्जीवाड़े की आशंका तो बनी हुई है। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों, कार्यकर्ताओं की तो पूरी सूची अपडेट है पर निजी अस्पतालों की सूची देखकर स्वास्थ्य विभाग का माथा ठनका है। अकेले बिलासपुर जिले में निजी अस्पतालों की ओर से 22 हजार कर्मचारियों की सूची स्वास्थ्य विभाग को सौंपी गई है। यह एक बड़ी संख्या है, जिस पर अधिकारियों को यकीन नहीं हो रहा। ऐसा लगता है कि कई अस्पतालों ने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर बता दी है, ताकि इन्हें ज्यादा मात्रा में वैक्सीन मिल सके। स्वास्थ्य विभाग सूची की क्रास चेंकिंग करने जा रहा है। वैसे, वैक्सीन जिन्हें दी जायेगी उन पर निगरानी भी रखी जानी है। उनका नाम, पता परिचय पत्र सब दर्ज किया जायेगा। ऐसी स्थिति में गड़बड़ी किस रास्ते से होगी, देखना पड़ेगा।


02-Nov-2020 5:19 PM 350

साफगोई के शिकार सिंहदेव

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव एक बार फिर क्वॉरंटीन हैं। यह चौथी-पांचवीं बार है जब कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आने के कारण एहतियातन सिंहदेव को क्वॉरंटीन होना पड़ा। उन्हें राज्य स्थापना दिवस कार्यक्रम में शिरकत करने सीएम हाऊस जाना था, लेकिन वे नहीं जा पाए। वैसे तो वे कार्यक्रम में वर्चुअल शरीक हो सकते थे, लेकिन वे इससे दूर रहे। जबकि राहुल गांधी दिल्ली से, और तो और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक मरवाही से कार्यक्रम में वर्चुअल मौजूद थे। ऐसे में सिंहदेव की गैरमौजूदगी में चर्चा में रही।

हालांकि राहुल गांधी ने अपने उद्बोधन में सीएम भूपेश बघेल के बाद, गैर मौजूदगी के बावजूद टीएस सिंहदेव का ही नाम लिया। इससे यह संदेश गया कि सिंहदेव की दिल्ली दरबार में हैसियत कम नहीं हुई है। कई बार सरल स्वभाव के टीएस सिंहदेव के बयानों से पार्टी और सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाती है। मरवाही चुनाव में कांग्रेस के छोटे बड़े नेता जीत के बढ़ चढक़र दावे कर रहे थे, तो सिंहदेव का बयान आया कि जोगी पार्टी के वोट जिधर पड़ेंगे, जीत उसी को मिलेगी।

ये अलग बात है कि सिंहदेव ने मरवाही में भरपूर प्रचार किया है। मगर सिंहदेव की साफगोई से पार्टी-सरकार को थोड़ी दिक्कतें हो रही है। मरवाही के चुनाव नतीजे पार्टी के खिलाफ गए, तो सिंहदेव और मुखर हो सकते हैं। सिंहदेव के तेवर देखकर लग रहा है कि ‘सच’ बोलना जारी रखेंगे। भले ही इससे सरकार को परेशानी उठानी पड़े।

अगला सीएस कौन ?

राजस्थान के सीएस राजीव स्वरूप शनिवार को रिटायर हो गए। उन्हें एक्सटेंशन मिलने की काफी चर्चा थी, और जब केन्द्र से कोई पत्र नहीं आया तो ढाई बजे रात 89 बैच के एसीएस निरंजन आर्य को सीएस बनाया गया। आप सोच रहे होंगे कि राजस्थान के सीएस का जिक्र यहां क्यों किया जा रहा है? छत्तीसगढ़ की परिस्थिति भी राजस्थान की तरह बन गई है। यहां सीएस आरपी मंडल 30 नवम्बर को रिटायर होने वाले हैं। सीएम भूपेश बघेल ने उन्हें एक्सटेंशन देने के लिए पत्र लिखा है। मगर आज तारीख तक डीओपीटी में उन्हें एक्सटेंशन देने के लिए किसी तरह की फाइल नहीं चल रही है।

वैसे तो एक महीने का समय काफी होता है, और अंतिम दिन तक ऑर्डर निकलता है। गुजरात और आंध्रप्रदेश के सीएस को कुछ महीने पहले ही छह माह का एक्सटेंशन मिला है। इससे मंडल को भी एक्सटेंशन मिलने की संभावना जताई जा रही थी। मगर राजस्थान के घटनाक्रम के बाद एक्सटेंशन मिलने की संभावना कम हो गई है। जानकार बताते हैं कि गुजरात में भाजपा सरकार है, और आंध्रप्रदेश की वायएसआर सरकार केन्द्र में एनडीए को समर्थन दे रही है। ऐसे में दोनों जगह राज्य सरकार की बात मान ली गई थी। खैर, अगला सीएस कौन होगा, इसको लेकर चर्चा चल रही है।

सुनते हैं कि मंडल के ही बैचमेट और जम्मू-कश्मीर के सीएस बीवीआर सुब्रमण्यम का नाम भी चर्चा में है। सुब्रमण्यम तीन महीने पहले छत्तीसगढ़ आए भी थे। उनकी सीएम से अकेले में चर्चा भी हुई थी। मगर वे छत्तीसगढ़ आएंगे, इसकी संभावना कम दिख रही है। वजह यह है कि जम्मू कश्मीर की प्रशासनिक व्यवस्था उन्होंने बेहतर की है, और केन्द्र सरकार को भी उन पर भरोसा है। अब बच जाते हैं-सीके खेतान और अमिताभ जैन। खेतान भी मंडल के बैचमेट हैं, और वरिष्ठताक्रम में सबसे आगे हैं।  खेतान का भारत सरकार का लम्बा तजुर्बा उन्हें इस पद का दावेदार बनाता है, लेकिन मंडल के बाद खेतान को भी अधिक वक्त नहीं मिल पायेगा। मंडल को पहले बनाने के पीछे सामाजिक समीकरण ने भी काम किया था। भूपेश और मंडल एक ही जिले के, आमने-सामने के कॉलेज में पढ़े हुए भी थे।

ऐसी स्थिति में अभी अमिताभ जैन के लिए मैदान तकरीबन खाली दिख रखा है। ये भी संयोग है कि राजस्थान में उन्हीं के बैचमेट और वित्त विभाग के प्रमुख निरंजन आर्य सीएस बन गए हैं। वैसे भी राजस्थान की परिस्थिति छत्तीसगढ़ के अनुकूल ही है।

 

 

 

 


31-Oct-2020 8:04 PM 459

बैंक खाता खुला नहीं, ठगी शुरू

जिस रफ्तार से लोगों के पास फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट बढ़ रहे हैं इससे अधिक रफ्तार से साइबर ठगी और जालसाजी बढ़ रही है। अभी हफ्ते भर पहले एक नंबर से कुछ बहुत आकर्षक मोबाइल नंबरों की बिक्री का मैसेज आया। उसमें से एक नंबर खरीदने के लिए छत्तीसगढ़ से एक व्यक्ति ने फोन लगाया तो बेचने वाले ने तुरंत ही अपना बैंक खाता नंबर दे दिया कि इसमें 18 हजार रूपए जमा करा दें। उससे पूछा गया कि वह किस शहर में है, तो उसने जयपुर बतलाया। जब कहा गया कि जयपुर में ही किसी को नगद रकम देकर भेज देते हैं जो सिम ले लेगा, तो उसने अनमने ढंग से एक अधूरा पता दिया। उसके नंबर पर जब जयपुर से किसी ने फोन किया कि पता समझा दो, नगद रकम लेकर आ रहे हैं, सिम लेने के लिए, तो उसकी दिलचस्पी बिक्री में खत्म हो गई। दिक्कत यह है कि देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में खाता खोलकर ऐसी जालसाजी आसानी से की जा रही है, और बैंकों के ग्राहक शिनाख्ती के सारे इंतजाम मानो शरीफों को परेशान करने के लिए हैं, और जालसाजों को लिए दोस्ताना हैं।

रायपुर में आज सुबह इस अखबारनवीस ने एक बैंक में खाता खोला। अभी टेलीफोन पर उसकी एक औपचारिकता होना बाकी थी। खाता खोलते वक्त एक फिंगरप्रिंट डिवाइस पर अंगूठे का निशान लिया गया था, उसका ईमेल आधार कार्ड की तरफ से आ भी गया। अभी बैंक से फोन नहीं आया, लेकिन एक किसी का भेजा एसएमएस जरूर आ गया कि खाते में 92 हजार रूपए जमा है। अब 15 हजार रूपए देकर जो खाता खोला गया है, अभी तो वह रकम भी दूसरे बैंक से निकली नहीं है, नए बैंक पहुंची नहीं है, और जालसाज को खबर लग गई, उसने 92 हजार रूपए उपलब्ध होने का मैसेज भी भेज दिया। इसके नीचे कोई एक लिंक है जिसे क्लिक करने के लिए कहा गया है। अब कितने लोग होंगे जो ऐसे लिंक को क्लिक करने से अपने को रोक पाएंगे? और क्लिक करते ही जालसाजी का सिलसिला आगे बढ़ निकलेगा।

इस तरह की साइबर जालसाजी और ठगी बढ़ते ही चल रही है। और सरकार है कि लोगों के सुलभ शौचालय जाने पर भी आधार कार्ड अनिवार्य करने पर आमादा है। अंगूठे का निशान देते ही आधार का ईमेल आया, और कुछ मिनटों के भीतर जालसाज का एसएमएस भी आया। इन दोनों का कोई रिश्ता हो तो भी हैरानी नहीं होगी क्योंकि सरकार के अधिकतर कम्प्यूटरों तक हैकरों की घुसपैठ आम बात है।

इनसे दाल-सब्जी में संशोधन करवाएं...

रात-दिन सरकार के समाचार भेजने वाले लोग भी जब आए दिन अपनी भेजी खबरों में संशोधन भेजते हैं, तो उन लोगों को भारी परेशानी होती है जिन्होंने उनकी पहले की खबर पर मेहनत करके उसे सुधारकर तैयार किया है। अब यह संशोधन कायदे से तो सिर्फ इतना आना चाहिए कि कौन सा हिस्सा बदला जा रहा है। लेकिन उसे फिल्मी सस्पेंस की तरह रखकर पूरे का पूरा प्रेस नोट दुबारा भेज दिया जाता है, जिसका मतलब यह होता है कि पूरे प्रेस नोट को दुबारा सुधारा जाए।

ऐसे लोगों को घर पर दो-दो बार नमक पड़ी हुई दाल और सब्जी मिलनी चाहिए, और पहला कौर खाते वक्त जुबानी संशोधन बताया जाए कि नमक दो बार पड़ गया है, संशोधित करके एक बार का नमक हटा दें। जब ऐसे लोग इस तरह से नमक हटाने की मेहनत करेंगे, तब उन्हें समझ आएगा कि सुधारकर, संपादन करके तैयार किए गए प्रेस नोट में संशोधन कितना आसान होता है!


30-Oct-2020 7:04 PM 379

भाजपा में बदलाव की बयार

विधानसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं, और भाजपा हाईकमान ने आरएसएस के साथ मिलकर नए लोगों को आगे करने की रणनीति बना रही है। चर्चा है कि सांसदों को अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। राजनांदगांव के सांसद संतोष पाण्डेय को भारतीय खाद्य निगम की छत्तीसगढ़ इकाई के परामर्श दात्री समिति का अध्यक्ष बनाया जा चुका है। जशपुर के नेता संकेत साय को सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है।

आरएसएस से जुड़े एक नेता का कहना है कि पिछले 15 साल में नई पीढ़ी उभरकर सामने नहीं आ पाई है। बस्तर और सरगुजा में तो सत्ता  हो या संगठन, चुनिंदा लोगों को ही महत्व मिलता रहा है। इसका प्रतिफल यह रहा कि दोनों आदिवासी संभाग में भाजपा की दुर्गति हो गई। आरएसएस का आंकलन है कि सिर्फ तीन ही विधायक अपने दम पर जीते हैं। बाकियों की नैय्या जोगी पार्टी अथवा निर्दलियों के सहारे ही पार हुई है।

 कई विधानसभा ऐसे हैं जहां बड़े नेताओं ने दूसरी पंक्ति के नेताओं को उभरने नहीं दिया। मगर अब हर विधानसभा सीट में नए और साफ छवि के लोगों को आगे लाने की कोशिश की जाएगी। बस्तर में तो धर्मांतरण के खिलाफ मुहिम के बहाने युवाओं की नई पौध तैयार करने की कोशिश भी हो रही है। संकेत है कि नवम्बर के महीने से प्रदेश भाजपा में थोड़ा बहुत बदलाव देखने को मिल भी सकता है। यह बदलाव कब और किस तरह होगा, यह देखना है।

इन बच्चों के लिए क्या करें?

स्कूलें बंद हैं, और स्कूली-उम्र के बहुत से बच्चे सुबह से कॉलोनियों की नालियों में झांकते घूमते रहते हैं, नाली के पानी-कीचड़ में जहां उन्हें मछली मिलने की उम्मीद दिखती है, सडक़ पर लेटकर वे नाली में हाथ डाल देते हैं। ऐसी टोलियों में कोई भी मास्क लगाए नहीं दिखते, और जो नाली से जरा-जरा सी मछलियां पकडऩे उसमें हाथ घुसाए हुए हैं, उनसे सेनेटाइजर की भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। अब सवाल यह उठता है कि इन बच्चों की कोई मदद कैसे की जाए? क्या कॉलोनियों के संपन्न लोग इन्हें कोई फुटबॉल दे सकते हैं कि वे उससे खेलकर अपना वक्त गुजारें? या कार साफ करने, घर के बाहर की घास छीलने जैसा कोई काम दे सकते हैं? समाज के भीतर इस पर भी चर्चा होनी चाहिए कि इन्हें गंदगी और बीमारी के खतरे से कैसे बचाएं, और इनके समय का बेहतर इस्तेमाल कैसे करवाएं?


29-Oct-2020 6:49 PM 344

अफसर की बैटिंग, चौके-छक्के

रिटायरमेंट के ठीक पहले पड़ोस के जिले के प्रशासनिक मुखिया जिस अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं, उससे जानकार लोग हतप्रभ हैं। कुछ इसी तरह बैटिंग पूर्व एसीएस टी राधाकृष्णन भी करते थे। इसका नतीजा यह रहा कि उन्हें अब तक पूरी पेंशन नहीं मिल पा रही है। उनके खिलाफ अभी भी एक-दो जांच चल ही रही है। मगर पड़ोसी प्रशासनिक मुखिया इतनी जल्दबाजी में हैं, कि उन्होंने सारी सीमाएं लांघ रखी हैं ।  सुनते हैं कि रिश्वत की रकम लेने से कुछ दिन पहले तो मुख्यालय छोडक़र रायपुर तक आ गए। जिस ठेकेदार से उन्हें रकम लेनी थी वह तेलीबांधा मरीन ड्राइव में उनका इंतजार कर रहा था।

अफसरने कुछ दूर अपनी गाड़ी रूकवाई और फिर स्कूटर से मरीन ड्राइव पहुुंचे। वैसे तो सैर-सपाटे के लिए मरीन ड्राइव को सबसे उपयुक्त जगह माना जाता है, लेकिन बड़े लोग यहां काम की बात करने भी आते हैं। खैर अफसर पहुंचे, तो काम के एवज में लेनदेन की चर्चा भी हुई। ठेकेदार ने उन्हें रकम तो दी, लेकिन अफसर इससे ज्यादा की उम्मीद कर रहे थे। चूंकि अफसर ने रकम ले ली, तो ठेकेदार काम को लेकर निश्चिन्त थे। मगर बाद में अफसर ने ठेकेदार की गाडिय़ां भी पकड़वा दीं। हाल यह है कि अफसर की कारगुजारियों की चर्चा न सिर्फ मंत्रालय तक पहुंची है बल्कि सेंट्रल एजेंसियों तक इसकी जानकारी भेजी गई है। देखना है कि अफसर जांच के घेरे में आ पाते हैं या नहीं।

इलाज की सहूलियत, लेकिन अनुदान

छत्तीसगढ़ सरकार में एक अफसर अपनी कड़ाई के लिए मशहूर थे। किसी का सौ रूपए का भी गलत बिल अगर सामने चले जाए तो जुबानी उसकी खाल खींच लेते थे। गालियां देने में दूसरे के परिवार के कई लोगों से रिश्ता बना लेते थे। साख ऐसी थी कि न गलत करते हैं, न गलत होने देते हैं। ठीक वैसी ही जैसी कि देश के बड़े नेता के बारे में बनी थी, न खाऊंगा, न खाने दूंगा। खाऊंगा तो पता नहीं लेकिन देश के लोगों का खाना तो बंद हो ही गया है।

अब जिस अफसर की चर्चा हो रही है उनको रिटायर होने के बाद भी अपने और परिवार के इलाज के लिए खूब सारा सरकारी इंतजाम हासिल है। इसके बावजूद पिछली सरकार के रहते उन्होंने मुख्यमंत्री से इलाज के लिए 5 लाख रूपए मंजूर करवा लिए थे। यह जानकारी सुनने वाले लोग हैरान हैं, लेकिन जानने वाले लोग सरकारी फाइलों की फोटोकॉपी लेकर चल रहे हैं।

फाईल सम्हालकर रखी है...

इलाज की बात निकली तो पिछली सरकार में एक अफसर ने अपने इलाज के लिए इतनी बड़ी रकम मंजूर करवा ली थी कि वह सरकारी नियमों से दुगुनी या उससे भी ज्यादा थी। बाद में कुछ लोगों ने समझाकर रकम आधे से कम करवाई, लेकिन जिन्होंने अपनी कलम बचाने के लिए यह रकम कम करवाई, उन्होंने बीमार अफसर को फंसाने के लिए उसकी लगाई हुई अर्जी की कॉपी भी सम्हालकर रख ली। सरकारी नौकरी और राजनीति के हिसाब चुकता करने के लिए रिटायर होने के बाद भी खासा समय बचता है। प्रदेश के एक भूतपूर्व प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी.एस. राघवन ने अभी हाल में ही एक बुकलेटनुमा किताब लिखी है जिसमें उन्होंने कई लोगों से हिसाब चुकता किया है। अब तो सोशल मीडिया और ब्लॉग पर भी हिसाब चुकता करने और भड़ास निकालने की गुंजाइश असीमित है। देखना है कि इलाज के कागजों का कब इस्तेमाल होता है। 

चप्पल वालों के पसीने छूट रहे हवाई यात्रा से...

रायपुर से जगदलपुर के बीच हवाई सेवा शुरू हुए अभी मुश्किल से एक माह ही हुए हैं कि किराया बढ़ गया है। 21 सितम्बर को जब एलायंस एयर की सुविधा शुरू हुई तो रायपुर-जगदलपुर के बीच किराया करीब 1400 रुपये था। अब इसे बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया गया  है। जगदलपुर से आगे हैदराबाद तक इसी फ्लाइट पर जाना हो तो अब 2700 रुपये अतिरिक्त देने होंगे, जबकि हवाई सेवा शुरू हुई तो किराया 1900 रुपये था। जगदलपुर राजधानी से काफी दूर है। कई राज्यों की सीमायें इसके मुकाबले पास है। बस और ट्रेन का सफर पूरा दिन या पूरी रात ले लेता है। कोरोना के चलते इन दिनों ट्रेन बस यातायात सामान्य भी नहीं हुआ है। इसके चलते फ्लाइट्स में पैसेंजर ठीक-ठाक संख्या में मिल रहे हैं। किराये में एकाएक बढ़ोतरी के बावजूद मजबूरी है कि जो खर्च कर सकते हैं, वे हवाई सुविधा का ही इस्तेमाल करें। मगर किराया इसी तरह, इतनी जल्दी आगे भी बढ़ता रहा तो?  उड्डयन मंत्रालय ने उड़ान सेवा ‘उड़े देश का आम नागरिक’ स्लोगन को लेकर ही तय किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि यह स्कीम हवाई चप्पल पहनने वाले लोग भी हवाई सफर करायेगी, पर महंगा होता किराया तो सिर्फ सूट-बूट वाले ही बर्दाश्त कर पायेंगे।

महानगर दर्जे के अपराध..

पता नहीं क्यों, अब छत्तीसगढ़ से जिस तरह से ख़बरें आ रही हैं उनके चलते महानगरों वाली फीलिंग होने लगी है। राजधानी के एक क्लब में लॉकडाउन के दौरान मयखाना खुलना, धनी लोगों का जमावड़ा और फिर गोलियों का चलना। इसके बाद लगातार एक के बाद ड्रग्स, चरस, कोकीन, अफीम के रैकेट में राजधानी के अमीर लडक़ों और कुछ युवतियों का भी नाम आना और मुम्बई, दिल्ली से उनका तार जुड़ा होना। इस समय आईपीएल क्रिकेट का मौसम है। हर रोज दो चार केस हाईटेक सट्टे का पकड़ लिया जा रहा है। दस बीस हजार का खेल नहीं इनमें लाखों रुपयों के दांव लग रहे हैं। खाईवाल, कारों में, होटलों में और देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठकर गेम खेल रहे हैं, खिला रहे हैं। इनके भी तार देश के बड़े शहरों से जुड़े हुए हैं।

अब रोड रेज़ का मामला रह गया था। गरियाबंद में कांग्रेस नेता के बेटे ने जिस तरह ग्रामीणों को एसयूवी से रौंदा और उसमें चार साल के बालक की मौत हुई, कई लोग घायल हुए- उससे यह कसर भी पूरी हो गई। देश-विदेश में रहने वालों को शिकायत है कि लोगों को जब बताते हैं वे छत्तीसगढ़ में रहते हैं, तो पूछा जाता है ये जगह कहां है? मुमकिन है आगे ऐसे सवालों का पूछा जाना बंद हो जायेगा।

मजदूरों के बचाव के विधेयक में देर

विशेष सत्र में केंद्र सरकार के नए कृषि और श्रम कानून के प्रभाव को सीमित करने के लिए सरकार 4 संशोधन विधेयक लाने वाली थी, लेकिन लंबी चर्चा के बाद सिर्फ एक मंडी संशोधन विधेयक को लाने पर सहमति बनी। सीएम भूपेश बघेल ने कहा था कि श्रम कानून में संशोधन के चलते सरकार श्रमिकों-कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए अपना कानून बनाएगी। केंद्र के नए कानून के मुताबिक सौ कर्मचारी संख्या वाले कारखानेदार छंटनी कर सकेंगे। पहले तीन सौ कर्मचारी वाले कारखानों में ही छंटनी की अनुमति थी। सरकार ने कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखकर संशोधन विधेयक लाने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन बाद में पता चला कि नए श्रम कानून का अभी नोटिफिकेशन भी नहीं हुआ है। इसके बाद अब बाकी विधेयकों को लाने का विचार त्याग दिया गया। बाकी तीन विधेयक अब शीतकालीन सत्र में पेश किए जाएंगे।


28-Oct-2020 6:45 PM 475

सरोज पांडेय की बारी आएगी?

चर्चा है कि बिहार चुनाव के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। इसमें छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य सरोज पाण्डेय का नंबर लग सकता है। वैसे अभी छत्तीसगढ़ से रेणुका सिंह अकेली मंत्री हैं । वे भी यहां कोई प्रभाव छोडऩे में सफल नहीं रही हैं। ऐसे में सरोज को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सरोज, अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय महामंत्री के पद पर थीं। मगर टीम नड्डा में उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य तक नहीं बनाया गया।

ऐसे में पार्टी के भीतर रमन सिंह की ताकत बढऩे और सरोज की हैसियत कम होने के भी कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि सरोज को करीब से जानने वाले लोग इससे इंकार कर रहे हैं। हल्ला है कि पिछले दिनों सरोज के लिए तगड़ी लॉबिंग भी हुई है। इसके बाद से उन्हें मंत्री बनाने की अटकलें लगाई जा रही है। वैसे भी कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी हाईकमान रमन सिंह को अकेले फ्री हैंड देने के पक्ष में नहीं है। इसलिए सरोज को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। देखना है कि आगे-आगे होता है क्या।

भाजपा बूथ प्रबंधन अमित देख रहे हैं ?

जोगी परिवार मरवाही के चुनाव मैदान से भले ही बाहर है, लेकिन अमित जोगी, परिवार का दबदबा बरकरार रखने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। रेणु जोगी और अमित मरवाही में ही डटे हैं। रेणु जोगी न्याय यात्रा निकालने की अनुमति मांगी थी, मगर आयोग ने अनुमति देने से मना कर दिया। अमित जोगी खुले तौर पर कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं, इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलने की उम्मीद है।

कांग्रेस के खेमे से खबर छनकर आई है, उसके मुताबिक अमित जोगी भाजपा प्रत्याशी का चुनाव संचालन कर रहे हैं। भाजपा का बूथ प्रबंधन खुद अमित देख रहे हैं। चुनाव प्रबंधन और खर्च भी कुछ हद तक अमित की राय के अनुसार हो रहा है। अमित के चुनाव प्रबंधन की कुशलता किसी से छिपी नहीं है। पिछले चुनाव में अजीत जोगी को 70 हजार वोट मिले थे।

अगर अमित अपनी पार्टी के आधे वोटों को भी भाजपा के पक्ष में मोडऩे में कामयाब होते हैं, तो चुनाव नतीजे बदल सकते हैं। हालांकि कांग्रेस के लोगों का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि लोगों ने अजीत जोगी को देखकर ही वोट दिया था। अमित के कहने पर वोट ट्रांसफर नहीं होंगे। मगर अमित की सक्रियता ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है।

आपदा में अवसर...

कोरोना के खतरे के चलते आपदा में एक अवसर भी है। छोटे बच्चों को अभी से सावधानी सिखाने का एक बड़ा मौका आया है। उन्हें लेकर कहीं बाहर जाना हो, तो उन्हें मास्क पहनाकर ले जाएं, घर पर बार-बार हाथ धोना हो तो उनके सामने हाथ धोएं, और उसकी चर्चा भी करें। खुद ऑक्सीमीटर से अपनी जांच कर रहे हों तो बच्चों को भी सिखाएं क्योंकि इसमें कोई खतरा नहीं है। ऐसे ही एक बच्चे ने बाहर जाते हुए जब उसे मास्क पहनाया गया, तो उसने अपने खिलौने के भालू को भी मास्क पहना दिया।

आज की जवान, अधेड़, और बूढ़ी पीढ़ी को अगर अपने-अपने बचपन से ऐसी सावधानियां सिखाई गई होतीं, तो आज भारत में संक्रमण इतना नहीं फैला होता। हिन्दुस्तानी मिजाज से लापरवाह हैं, गंदगीपसंद हैं, और इस वजह से कोरोना अधिक फैला, यह एक अलग बात है कि लोग कोरोना से जल्दी उबर भी गए क्योंकि हिन्दुस्तानियों को बीसीजी जैसे टीके लगते आए हैं, और यहां के लोगों की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है।

मोहल्लों में गूंजतीं नई-नई आवाजें!

लॉकडाऊन के बाद कारोबार बंद हुआ, तो सबसे छोटे लोग सबसे बुरी तरह बेरोजगार हुए। उनका काम तो वैसे भी रोज की मजदूरी या रोज की कमाई का रहता था, और वे बड़े दुकानदारों की तरह कुछ महीने जिंदा रहने की ताकत नहीं रखते थे। नतीजा यह हुआ कि फल-सब्जी से लेकर झाड़ू और वाइपर जैसे सामान लेकर लोग कॉलोनियों में सुबह 7 बजे के भी पहले से निकल पड़ते हैं। उनमें से अधिकतर ऐसे हैं जिनकी आवाज पहले कभी इन सडक़ों पर गूंजी नहीं थी। लेकिन पापी पेट का सवाल है तो हर मुंह जोर-जोर से आवाज लगाने लगा है। बहुत से ऐसे छोकरे ठेलों पर सामान लिए घूमते हैं जिस उम्र के लडक़े पहले कभी काम करते नहीं दिखते थे। कुछ छोटे बच्चे भी हैं जो अपने मां-बाप के साथ, या किसी और के साथ ठेले या ऑटोरिक्शा पर सामान लिए चलते हैं, और जाहिर है कि घूम-घूमकर बेचने के काम में कुछ पैसा उनको भी बचता होगा, या उनके घर के काम में कुछ मदद मिलती होगी।

कुछ बहुत बुजुर्ग आदमी-औरत भी सामानों की फेरी लिए भटकते हैं, और सोशल मीडिया पर कई लोग यह लिखने लगे हैं कि बड़े सब्जीवालों के मुकाबले इन लोगों से खरीदना चाहिए, और मोलभाव भी नहीं करना चाहिए।


27-Oct-2020 8:40 PM 191

कॉलेज तो खुलेंगे, आयेंगे बच्चे ?

कोरोना के नये मामलों में आई गिरावट स्थायी है या नहीं, यह साफ तौर पर कोई नहीं बता पा  रहा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि इसकी दूसरी लहर ठंड के मौसम में आ सकती है। दूसरी तरफ धीरे-धीरे स्थिति सामान्य करने की कोशिश भी चल रही है। शिक्षा को कोरोना महामारी के कारण बड़ा नुकसान हुआ। अब हाईस्कूल से लेकर कॉलेजों में भी कक्षायें शुरू करने की कोशिश की जा रही है। एक नवंबर से स्कूल कॉलेज खोलने का आदेश सरकार की तरफ से जारी किया गया है लेकिन पालकों, छात्र-छात्राओं की ओर से उत्साह नहीं दिखाया जा रहा है। कॉलेजों में तो प्रवेश की अंतिम तिथि तीसरी, चौथी बार बढ़ाई गई लेकिन सीटें पूरी नहीं भर पा रही हैं। प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे निजी कॉलेज भी हैं जिन्हें यूजीसी से किसी तरह का अनुदान नहीं मिलता और वे विद्यार्थियों की फीस पर ही निर्भर हैं। कोरबा, अम्बिकापुर, बिलासपुर में कई निजी कॉलेज हैं जिनमें एडमिशन 25 फीसदी भी नहीं हो पाई। खर्च नहीं निकल पाने के कारण वहां काम करने वाले स्टाफ को वेतन का संकट बना हुआ है। कक्षायें शुरू होने की घोषणा के बाद भी एडमिशन लेने की कोई हड़बड़ी छात्रों ने नहीं दिखाई। इसके चलते कई में तालाबंदी की स्थिति भी बन रही है। सामान्य दिनों में जनवरी माह तक कोर्स पूरा होने के बाद परीक्षा की तैयारियों का अवकाश शुरू हो जाता है। मौजूदा परिस्थिति यही बताती है कि छात्र-छात्राओं का एक साल यानि दो सेमेस्टर कोरोना की भेंट चढ़ रहा है।

मेरा साया साथ होगा

मरवाही में जोगी परिवार से कोई चुनाव नहीं लड़ पाया। जोगी की चुनाव में प्रासंगिकता बनाये रखने के लिये छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस द्वारा न्याय यात्रा निकाली जा रही थी। कोटा विधायक ने जन समस्या निवारण और कोरोना पर जागरूकता लाने के नाम पर जीपीएम प्रशासन व रिटर्निंग ऑफिसर से अनुमति मांगी थी जो नहीं मिली। अब अमित जोगी और डॉ. रेणु जोगी की मरवाही में सभायें नहीं हो सकेगी। इसके बावजूद चुनाव में जोगी की अप्रत्यक्ष मौजूदगी कायम है। चुनावी सभाओं में जोगी का प्रसंग उठाना न तो भाजपा के नेता भूल रहे न ही कांग्रेस के। भाजपा के कई बड़े आदिवासी नेता अमित जोगी के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने का स्वागत कर चुके हैं, पर भाजपा के प्रचार में जुटे अनेक भाजपा नेता जोगी कांग्रेस और उनके समर्थकों के प्रति हमदर्दी दिखा रहे हैं। वे भाषणों में कह रहे हैं, अमित के साथ अन्याय हुआ ऐसा नहीं होना चाहिये था। यह अलग बात है कि जब तक अजीत जोगी थे उन पर सवाल उठाकर ही लगातार कई चुनावों में भाजपा ने बढ़त हासिल की। इधर कांग्रेस नेता अपने भाषणों में जोगी को नकली बता रहे हैं। इसे लेकर डॉ. रेणु जोगी ने आपत्ति की और चुनाव आयोग के पास शिकायत भी दर्ज कराई है। मतलब, अमित, डॉ. रेणु जोगी को न्याय यात्रा निकालने, जन सम्पर्क करने का मौका मिले न मिले जोगी मरवाही चुनाव के केन्द्र में बने हुए हैं।


26-Oct-2020 5:18 PM 330

सत्ता के दिन गए तो...

चेंबर चुनाव की तिथि अभी घोषित नहीं हुई है, लेकिन इसकी हलचल शुरू हो गई है। बड़े व्यापारी नेता अपने एसोसिएशन में पकड़ बनाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, ताकि चुनाव में अहम भूमिका निभा सके। ऐसे ही राईस मिल एसोसिएशन में अपना दबदबा कायम रखने की कोशिश पर योगेश अग्रवाल को काफी कुछ सुनना पड़ गया।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा सर्कार रहते हुए योगेश की राईस मिल एसोसिएशन में तूती बोलती थी। भाई के मंत्री पद का रूतबा भी था। मगर जैसे ही भाजपा सरकार बदली, राईस मिल एसोसिएशन में रामगोपाल अग्रवाल समर्थक हावी हो गए। इस पर योगेश ने राईस मिल एसोसिएशन के समानांतर अरवा चावल मिल एसोसिएशन का गठन कर दिया और वे खुद अध्यक्ष बन बैठे।

राइस मिल का कारोबार एफसीआई और नागरिक आपूर्ति निगम से जुड़ा हुआ है। रामगोपाल अग्रवाल, निगम के चेयरमैन हैं। ऐसे में अलग एसोसिएशन भले बना लें, लेकिन कारोबार की अच्छी सेहत के लिए रामगोपाल का आशीर्वाद जरूरी है। सुनते हैं कि पिछले दिनों योगेश उनका आशीर्वाद लेने भी गए, लेकिन रामगोपाल ने आशीर्वाद देना तो दूर, योगेश को बुरी तरह फटकार लगा दी। रामगोपाल ने योगेश को इतनी जोर से डांटा कि इसकी गूंज बाहर तक सुनाई दी, और बात धीरे-धीरे एसोसिएशन के बाकी सदस्यों तक पहुंच गई। रामगोपाल नाराज हैं, तो एसोसिएशन के सदस्य योगेश के साथ जुड़े रहेंगे, यह सोचना भी गलत हैं। कुल मिलाकर राईस मिल एसोसिएशन में वर्चस्व बनाने की कोशिश करना योगेश के लिए भारी पड़ गया। इसीलिये बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि अपने अच्छे दिनों में ताकत का इस्तेमाल सम्हलकर करना चाहिए, लेकिन पंद्रह बरसों की लगातार सत्ता अच्छे-अच्छे लोगों को बददिमाग कर देती है। 

हाथियों से अलर्ट करते वाट्सएप ग्रुप

गजराज मीडिया, हाथी मित्र दल, वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट, हाथी मेरे साथी, हाथी विचरण। ये कुछ वाट्सअप ग्रुप हैं जो सरगुजा संभाग के सूरजपुर, बलरामपुर जिलों में चल रहे हैं। इन वाट्सअप समूहों को युवाओं ने खुद की प्रेरणा से बनाया है। इनसे सैकड़ों लोग आपस में जुड़ गये हैं। वे ग्रुप में सूचना डालते रहते हैं कि हाथी उनके इलाके में कहां भ्रमण कर रहा है, किस ओर से आया और किस तरफ आगे बढ़ गया है। अब लोगों को किसी रास्ते पर निकलने से पहले पता चल जाता है कि उनका हाथी से सामना तो नहीं होने वाला।

ये ग्रुप वन विभाग के लिये भी काफी मददगार साबित हो रहे हैं। फील्ड पर काम कर रहे अनेक गार्ड्स, अधिकारी, कर्मचारी आदि इससे जुड़ गये हैं जिन्हें हाथियों की मूवमेंट पर वाट्सएप ग्रुपों से मिली सूचना से मदद लेकर ग्रामीणों और फसल की समय पर सुरक्षा करने में मदद मिल रही है। अब तक कुछ हाथियों में रेडियो कॉलर लगाकर, रेडियो के जरिये सूचना देकर लोगों को सतर्क करने का तरीका अपनाया जाता है पर यह नया प्रयोग ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।

कुछ दिन पहले कोरबा से खबर आई थी कि युवाओं ने वाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं जिससे वे कोरोना के कारण स्कूल नहीं जा पाने वाले, अपने आसपास रहने वालों बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ऐसे प्रयोग और भी हो रहे होंगे, छत्तीसगढ़ ही नहीं दूसरे राज्यों में भी हो रहे होंगे। स्मार्टफोन का ऐसा स्मार्ट इस्तेमाल कई समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकता है।

दशहरे में नीलकंठ दिखा क्या?

वाट्स अप का सबसे ज्यादा इस्तेमाल गुड मार्निंग, गुडनाइट और पर्वों पर शुभकामना संदेश भेजने में होता है। नवरात्रि के पहले दिन से चला आ रहा यह दौर आज दशहरे पर खत्म हुआ है, कुछ दिन रुककर फिर शुरू हो जायेगा क्योंकि दीपावली भी आगे है। दशहरे के कई शुभकामना संदेशों में खूबसूरत नीलकंठ की तस्वीरें भी हैं।

हम जिन पक्षियों को तेजी से विलुप्त होते देख रहे हैं उनमें गिद्ध और कौवों की तरह नीलकंठ को भी शामिल कर लेना चाहिये। कुछ वर्षों तक रावण दहन देखने के लिये निकलने से पहले नीलकंठ के दर्शन हो जाते थे। इसके बिना दशहरा अधूरा भी माना जाता था। हम इसे स्थानीय बोली में टेहर्रा चिरई कहते हैं। छत्तीसगढ़ धान की फसल लेने वाला इलाका है पर यहां भी नीलकंठ के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। धान की बालियां चुगना और फसलों में मौजूद कीड़ों को खाना नीलकंठ को प्रिय है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नीलकंठ का यही प्रिय आहार उनके विलुप्त होने की वजह बनता जा रहा है। वे भोजन के साथ फसलों में डाले गये कीटनाशक और उससे मरने वाले कीड़ों को निगल रहे हैं जिससे उनकी संख्या घट रही है। 40 फीसदी वनों से आच्छादित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणियों, पक्षियों को विलुप्त होने से बचाना हमारी प्राथमिकता में नहीं है। बेमेतरा के गिधवा बांध में पक्षी विहार बनाने की योजना आज से सात-आठ साल पहले बनाई गई थी, पर आज उसे सब भूल चुके हैं। 

छत्तीसगढ़ में स्थानीय पक्षी तो हैं पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं कि लगभग 140 तरह के प्रवासी पक्षी भी आते हैं। इसके कई पहचाने हुए डेरे हैं पर वहां पर्यटकों से ज्यादा शिकारी पहुंचते हैं। शिकारियों के डर से कई ठिकानों पर प्रवासी पक्षियों ने डेरा डालना बंद भी कर दिया है। राम गमन मार्ग पर तेजी से काम कर रही सरकार को उस काल के प्रिय पात्र नीलकंठ और विलप्त होते दूसरे पक्षियों को बचाने के लिये कुछ करना चाहिये।

मरवाही में माहौल भक्तिभाव का...

चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी और प्रचार में जुटे नेता कार्यकर्ता विनम्र हो जाते हैं। स्वर में कोमलता आ जाती है, हाथ जुड़े हुए रहते हैं। बुजुर्गों का चरण स्पर्श करते हैं। सब माताएं, बहनें और चाचा, काका, मामा दिखाई देते हैं। अद्भुत दृश्य होता है। मतदाताओं में ईश्वर दिखाई पड़ता है। आम वोटर सोचता है कि काश ऐसा पूरे पांच साल होता। लोकतंत्र में दरअसल नेता सेवक होता है और जनता उसकी मालिक। पर चुनाव खत्म होते ही ऊंट करवट बदल लेता है। इन दिनों मरवाही में चल रहे उप-चुनाव के दौरान मतदाताओं के प्रति तो भक्तिभाव दिख ही रहा है मंदिरों और धार्मिक समारोहों में नेताओं की उपस्थिति दर्ज हो रही है। प्रभारी मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने दुर्गोत्सव के दौरान दुर्गा पूजा पंडाल में ही माइक संभाल ली और कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में वोट मांगे।

मरवाही इलाके के कुछ इलाकों में दो बार गणेश उत्सव मनाया जाता है। इस समय भी कुछ स्थानों पर गणेश प्रतिमायें स्थापित की गई हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय वहां पहुंच गये। गणेश जी के पंडाल पर उन्होंने चुनावी सभा ले ली। गुंडरदेही के विधायक कुंवर सिंह निषाद ने एक जवारा यात्रा के दौरान खप्पर लेकर नृत्य किया। वैसे निषाद नृत्य करना पसंद करते हैं। उनकी पहले भी इस पर वीडियो वायरल हो चुकी है।

आम तौर पर मतदाता धार्मिक स्वभाव का होता है। नेता जब उनके आराध्य की पूजा करते  हैं तो एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ जाते हैं। इससे उनके वोट हासिल करने में मदद मिलती है। यह बात अलग है कि चुनाव अभियान के दौरान प्रचार के लिये धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल करना विधि के विरुद्ध है पर शिकायत कौन करे, सब इस गंगा में नहा रहे हैं।  


24-Oct-2020 6:21 PM 248

नेक काम की शुरुआत पुलिस खुद से करे..

इन दिनों पुलिस महकमा ही नहीं विभिन्न जिलों के कलेक्टर, विधि विभाग, सब मिलकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं। यौन प्रताडऩा, शारीरिक हिंसा, एसिड अटैक आदि की शिकार महिलाओं को मुआवजा देने की  दो साल से रुकी फाइलें आगे बढ़ रही हैं। अब हर जिले में सूची बन रही है, कुछ जिलों में तैयार भी हो गई है और जल्द मुआवजा बांटने का सिलसिला भी शुरू हो जायेगा। चीफ सेक्रेटरी ने बीते दिनों कलेक्टरों की बैठक लेकर ऐसे मामलों में फुर्ती लाने कहा था, अब डीजीपी ने भी जिले के कप्तानों को सचेत किया है।

शुक्रवार को हुई इस बैठक में पहली बार दंड और ईनाम के नियम बनाये गये हैं। अब गूगल स्प्रेड शीट पर हर दिन जानकारी अपडेट करनी होगी। पुलिस मुख्यालय में मॉनिटरिंग के लिये महिला सेल का गठन होगा। एफआईआर दर्ज होने के 15 दिन में गिरफ्तारी नहीं हुई तो जिले को यलो अलर्ट में, गिरफ्तारी के 15 दिन में चालान पेश नहीं होगा तो रेड अलर्ट में, गिरफ्तारी के 60 दिन में चालान पेश नहीं होने पर उस जिले की पुलिस को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जायेगा।

जाहिर है, ब्लैक लिस्ट में आने पर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। दूसरी तरफ तेजी से परिणाम देने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत भी किया जायेगा।

छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के बहुत मामले आते हैं, पेंडिंग की सूची बड़ी लम्बी है। एक पर राज्य ने, दूसरे पर केन्द्र ने कानून बना रखा है, जो प्रदेश में लागू है। एक महिला हेल्प डेस्क हर थाने में बनाने और वहां महिलाओं को प्रभार देने की बात निर्भया कांड के बाद हुई थी। अधिकांश डेस्क काम नहीं कर रहे। हेल्पलाइन नंबर वैसे तो 1091 और 1090 पूरे देश के लिये है, 181 में भी फोन किया जा सकता है पर ज्यादातर महिलाओं, विशेषकर घरेलू महिलाओं को इसके बारे में पता नहीं होता।

प्रदेश के कई जिलों में पुलिस विभाग के ही कई अधिकारी, कर्मचारियों पर ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध के अनेक मामलों की जांच और कार्रवाई रुकी हुई है। क्या ही अच्छा हो कि पुलिस विभाग लगे हाथों ऐसे मामलों की भी समीक्षा कर ले। किसी भी नेक काम की शुरूआत खुद से करना ठीक रहेगा, पुलिस पर भरोसा बढ़ेगा।

बोधघाट के विरोध पर नक्सल दृष्टि

राज्य सरकार के बड़े फैसलों में 40 साल से रुकी बोधघाट परियोजना को मंजूरी देना भी एक है। अरविन्द नेताम सहित बस्तर के अनेक नेता इस परियोजना के विरोध में हैं। परियोजना का विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे बस्तर को लाभ नहीं, परिवार जरूर उजड़ जायेंगे। जब परियोजना की कल्पना की गई तो बिजली उत्पादन ही उद्देश्य था, जिसकी अब जरूरत नहीं रह गई हैं। अभी भी चित्रकोट, बीजापुर, बारसूर में अनेक स्थानीय नेता इस परियोजना के विरोध में एकजुट हो रहे हैं। बताया जाता है कि इसमें कांग्रेस-भाजपा दोनों ही दलों के लोग शामिल हैं।

पिछले दिनों मारडूम थाना में भाजपा नेता व पूर्व विधायक लच्छूराम कश्यप और राजाराम तोड़ेम के खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इन पर आरोप है कि उन्होंने कोविड-19 महामारी पर लगाई गई पाबंदी के खिलाफ जाते हुए बैठक रखी। यहां तक तो ठीक है पर कुछ ऐसी रिपोर्ट्स भी आ रही हैं कि ग्रामीणों में इस परियोजना के लेकर मौजूद शक को भुनाने के लिये नक्सली भी उनके करीब आ रहे हैं और ग्रामीणों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मौका उन्हें क्यों मिल रहा है? किसी योजना का गुण-दोष के आधार पर समर्थन या विरोध तो किया जा सकता है।

अभी दो ही दिन हुए हैं जब मुख्यमंत्री ने बस्तर के पंचायत प्रतिनिधियों की मांग पर नई औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देने की घोषणा की है। हर परियोजना के साथ समर्थन और विरोध की आवाजें लाजिमी है, उठेंगीं। ऐसी स्थिति में यह जरूरी प्रतीत होता है कि बस्तर के सरकारी नुमाइंदे, स्थानीय प्रशासन, जल संसाधन विभाग और सम्बन्धित विभागों के अधिकारी इन योजनाओं से जुड़ी शंकाओं का वे ग्रामीणों के बीच खुद जाकर निराकरण करें। सरकारी मशीनरी के कामकाम में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। विरोध को नजरअंदाज करना, प्रशासन की दांडिक शक्ति पर भरोसा रखना गलत नजरिया हो सकता है। इससे बस्तर में शांति स्थापित करने की कोशिशों को धक्का लगता रहेगा।  


23-Oct-2020 7:24 PM 132

कोरोना की दहशत का दोहन

कोरोना महामारी के प्रकोप से जो बचे हुए हैं उनके मन में दहशत बनी हुई है कि कभी उन पर भी वायरस का हमला हो गया तो क्या होगा?  कोरोना आने के साथ-साथ बाजार में इस डर को भुनाने का खेल शुरू हो गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि नियमित व्यायाम के साथ शरीर का इम्यून सिस्टम दुरुस्त होना चाहिये, कुछ ही दिनों के भीतर इम्युनिटी बढ़ाने का दावा करने वाली दर्जनों दवाईयां बाजार में आ गई। अख़बारों, टीवी चैनलों पर इनके विज्ञापन पटे रहते हैं। जब बाबा रामदेव के इस दावे को आईसीएमआर से खारिज किया कि कोरोनिल दवा कोरोना को ठीक करती है तब बाकी कम्पनियां सावधान हो गईं और वे कोरोना ठीक करने का दावा सीधे-सीधे नहीं करते पर लेना जरूरी बताती हैं। कोरोनिल का कोरोना की दवा के रूप में बेचना मना है, मालूम है लोगों को कि यह कोरोना की दवा नहीं है पर डर ऐसा कि बाजार में इसकी जबरदस्त मांग है। ये सब मार्केटिंग रणनीति है जिसे अब चुनाव में भी अपनाया जा रहा है। वैसे भी पिछले कुछ चुनावों में मार्केटिंग गुरुओं की भूमिका बढ़ी है। बिहार में कोरोना की वैक्सीन मुफ्त देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र में हुआ। उसके बाद मध्यप्रदेश में भी हुआ। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने भी मुफ्त वैक्सीन की घोषणा कर दी। अब तक होता यही रहा है कि महामारी व संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण के लिये दवायें या तो मुफ्त मिलती रही हैं या मामूली शुल्क पर। ऐसे में कोरोना वैक्सीन का मुफ्त देना किसी भी सरकार के लिये बोझ नहीं हो सकता। इसे चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर एक डर से बचाने का सौदा किया जा रहा है। अब आयें मरवाही पर, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की दशा बेहद दयनीय है। गंभीर मरीजों को बिलासपुर रेफर करना पड़ता है। कई बिलासपुर नहीं ला पाते। जो रवाना होते हैं वे सब के सब जिंदा नहीं पहुंचते। पर इस बार वहां दो सफल डॉक्टरों के बीच मुकाबला है। कोरोना वैक्सीन न सही, क्षेत्र के मतदाताओं को दोनों डॉक्टरों से इतना आश्वासन जरूर ले लेना चाहिये कि उन्हें मरवाही और अपने जिले में एक बेहतरीन अस्पताल, विशेषज्ञों की टीम के साथ मिलेगा। जीते कोई भी, इस आदिवासी बाहुल्य इलाके का भला हो।  

ट्रंप के भक्त

राष्ट्रपति का चुनाव अमरीका में हो रहा है, लेकिन बहुत से हिन्दुस्तानी ट्रंप समर्थक दिखाई पड़ रहे हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले बरसों में कई हिन्दूवादी संगठनों ने ट्रंप की फोटो लगाकर हवन और यज्ञ किए थे। ट्रंप के कल्याण के लिए पूजा की थी। अभी पिछले पखवाड़े ही एक खबर आई कि ट्रंप के एक प्रशंसक ने भारत में उनका एक मंदिर बना रखा था, जहां वह रोज पूजा करता था। उसकी तस्वीर भी आई थी जिसमें वह ट्रंप की प्रतिमा का गाल चूम रहा है। ट्रंप को जब कोरोना की वजह से अस्पताल में भर्ती किया गया तो इस आदमी ने ट्रंप के ठीक होने की मनौती मानकर उपवास शुरू कर दिया। और उपवास में वह मर गया।

ट्रंप के कुछ समर्थक तो इस किस्म के हैं, और कुछ दूसरे समर्थक वे हैं जो मास्क से ट्रंप के परहेज को धार्मिक भावना के मानते हैं। चूंकि ट्रंप भगवान मास्क नहीं लगाते, इसलिए हिन्दुस्तान में भी करोड़ों लोग बिना मास्क घूमते हैं। लोगों ने कोरोना से डरना छोड़ दिया है। हिन्दुस्तान में मरीजों की गिनती थोड़ी सी घटी है, तो लोग बेफिक्र हो गए हैं। यह बेफिक्री उन्हें ट्रंप का मंदिर बनवाने वाले के पास ले जा सकती है। फिलहाल उनकी जिंदगी में इस खतरे के अलावा एक नुकसान यह भी है कि ट्रंप का भक्त होने के बावजूद उनके पास ट्रंप को वोट देने का अधिकार नहीं है।

चुनाव और प्याज के भाव

लोगों ने एक लोकसभा चुनाव वह भी देखा है जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ‘शाइनिंग इंडिया’ के नाम पर अनेक उपलब्धियां गिनाती रह गई और प्याज की कीमतों ने उनकी सरकार दुबारा नहीं बनने दी। इस समय चुनाव भी हो रहे हैं और प्याज की कीमतें भी हर दिन बढ़ती जा रही हैं। पर है ये विधानसभा का चुनाव जबकि कीमतों का बढऩा, रोकना केन्द्र सरकार के बूते की बात है। नये कृषि कानून ने स्टॉक लिमिट पर रोक हटा दी है। अब व्यापारी जितना चाहे माल रोककर रख लें। माल जितना जाम रख पायेंगे कीमत उतनी ही वसूल सकेंगे। छत्तीसगढ़ में इस समय प्याज 70 रुपये किलो बिक रहा है। बाजार के जानकार कहते हैं कि महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश के कारण प्याज की फसल बर्बाद हुई है जिसके चलते इसके दाम 100 रुपये तक पहुंच सकते हैं। आलू भी कमजोर नहीं, 50 रुपये किलो बिक रहा है। बताया जा रहा है त्यौहारों के कारण आलू की खपत ज्यादा है, आवक कम है। वैसे हर बार महंगाई बढऩे पर इसी तरह की ख़बरें आती हैं कि फसल कमजोर है, सप्लाई कम हो रही है। छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों को निर्देश तो है कि मांग और खपत पर निगरानी रखें। व्यापारियों को अपना स्टाक प्रदर्शित करने के लिये भी कहा गया है लेकिन अब नये कानून के कारण वह जब्ती-सख्ती नहीं रह गई। महंगे आलू और प्याज को आने वाले कई-कई दिनों तक बर्दाश्त करने के लिये तैयार रहिये। कोई लोकसभा चुनाव निकट भविष्य में नहीं है। 

 


22-Oct-2020 7:10 PM 268

भाजयुमो से आगे बढऩे का रास्ता

भाजयुमो के अध्यक्ष अमित साहू ने खूब तामझाम के साथ पदभार ग्रहण किया। वे पगड़ी पहनकर आए थे। एकात्म परिसर में पदभार ग्रहण कार्यक्रम के दौरान बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यकर्ताओं को संघर्ष करने की सीख दी। उन्हें बताया कि वे युवा मोर्चा के दिनों में किस तरह संघर्ष करते हुए आगे बढ़े हैं।

पुरानी घटनाओं को याद करते हुए बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि अर्जुन सिंह के सीएम रहते जनहित के मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हुए उन पर काला झंडा फेंक दिया था। इस पर पुलिस और कांग्रेस के नेताओं ने उनकी जमकर पिटाई की थी। फिर भी वे पीछे नहीं हटे। इसका प्रतिफल यह रहा कि वे विधायक और मंत्री बने।

बृजमोहन की तरह मोहम्मद अकबर को वीपी सिंह की रैली का विरोध करने पर जनता दल के कार्यकर्ताओं की मार झेलनी पड़ी थी। उस समय कांग्रेस के खिलाफ माहौल था। अकबर को अविभाजित मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के महासचिव का पद दिया गया। वे फिर विधायक बने और वर्तमान में मंत्री हैं। ये तो पुराने छात्र नेताओं की बात है। नए नवेले नेता तो पद पाते ही साधन-संसाधन के जुगाड़ में लग जाते हैं, और जल्द बदनाम भी होते हैं।

पिछली सरकार में भाजयुमो के एक नेता तो पद मिलने के बाद ट्रांसफर पोस्टिंग के जुगाड़ में लग गए थे। एक सिंचाई अफसर की पदस्थापना के एवज में काफी कुछ बटोर भी लिया था। इसकी काफी दिनों तक चर्चा होती रही। अब सरकार तो है नहीं, अमित साहू कैसा काम करते हैं यह देखना है।

पर्यावरण बचाने ऐसे पटाखे जिन्हें फोडऩा नहीं, बोना है!

पटाखों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए उसी शक्ल में एक नया अभियान शुरू किया गया है। पर्यावरण के अनुकूल सामानों की एक दुकान में बीज-पटाखों की बिक्री शुरू की है जो अलग-अलग परंपरागत पटाखों के रूप-रंग में तो हैं, लेकिन जिन्हें जलाना नहीं है, बल्कि बोना है। ऐसे कुछ पटाखों का एक पैकेज नारियल के रेशों से बने हुए दो गमलों के साथ एक पैकेज में करीब 7 सौ रूपए में बेचा जा रहा है। इसमें अनार से लेकर बम तक हर किस्म के पटाखों के भीतर अलग-अलग बीज हैं, और उन्हें स्थानीय लोगों से छिंदवाड़ा जिले की सौंसर तहसील के पारडसिंगा में एक संस्था ने बनवाया है, और इसकी ऑनलाईन बिक्री की जा रही है।

सीजन में भी चूक कर रहे फूड वाले...।

अमूमन लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि होटलों में साफ-सफाई बरती जा रही है या नहीं। कभी गंदगी या लापरवाही दिखी भी तो नाक भौं सिकोडक़र आगे बढ़ लेते हैं। यह है, बड़ा मुद्दा। होटलों का खान-पान कैसा है इसका हमारी सेहत पर खासा असर पड़ता है और यदि वहां स्वच्छता नहीं हो, तो कार्रवाई के लिये कानून बने हैं। बस नागरिक को जागरूक होना चाहिये। दुर्ग कलेक्टर को एक नागरिक ने फोन कर खबर की कि अमुक होटल में जिस पानी का इस्तेमाल हो उसकी है कि उसकी टंकी सफाई अरसे से नहीं की गई है। इससे बीमारी फैलने का खतरा है। होटल ने पार्किंग के लिये तय जगह पर ताला लगा रखा है, यातायाता में बाधा पहुंचती है। कलेक्टर ने एक्शन लिया। उनके निर्देश पर मातहत गये और जांच के बाद पांच हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया गया। आम तौर पर ग्राहक सजग नहीं होते और इस तरह के लफड़े में नहीं पड़ते। अधिकारियों की तरफ से रिस्पांस मिलेगा या नहीं इसे लेकर भी सशंकित रहते हैं। वैसे यह सीजन तो है ही होटलों में छापा मारने का। दशहरा-दीपावली पर फूड और नगर निगम वालों की कमाई का मौसम। पता नहीं दुर्ग में चूक कैसे हो रही है।

सख्ती हो तो ग्वालियर हाईकोर्ट जैसी...

चुनावी रैली करने से पहले, सभा में पहुंचने वाले अनुमानित लोगों के लिये मास्क और सैनेटाइजर खरीदने पर जितनी राशि खर्च होगी उससे दुगना कलेक्टर के पास नेताओं को जमा करना होगा। मास्क और सैनेटाइजर देना भी प्रत्याशी की जिम्मेदारी होगी। उनको बताना होगा कि यहां वे वर्चुअल सभा क्यों नहीं कर सकते?  चुनाव आयोग इस व्यवस्था से संतुष्ट होंगे, इसी के बाद कलेक्टर की अनुमति प्रभावी मानी जायेगी। यह आदेश मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ  का है। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्रत्याशी को प्रचार करने का हक है उसी तरह लोगों को जीने का। दतिया और ग्वालियर के मामलों में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ कोर्ट ने एफआईआर का निर्देश दिया है। इन नेताओं की 5 अक्टूबर को रैलियां हुई थीं, जिसमें लोगों ने न मास्क पहने, न सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा था। छत्तीसगढ़ के मरवाही विधानसभा चुनाव की तस्वीर इससे कुछ अलग नहीं है पर यहां सभा, रैलियों की अनुमति आसानी से मिल रही है और सभी दलों के नेता मुक्त प्रचार में लगे हैं। वे कोरोना से बचाव के दिशा-निर्देशों को मानने की बजाय एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मरवाही गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के अंतर्गत आता है जहां बीते कुछ दिनों से कोरोना संक्रमण के केस बढ़ रहे हैं। ग्वालियर पीठ ने जो आदेश कलेक्टरों को दिया है, वह यहां लागू क्यों नहीं होना चाहिये?

मरवाही में ठिकाना ढूंढते वीआईपी..

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बीते दिनों गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही के दौरे पर नामांकन के दौरान रखी गई सभा में कह गये कि यह इलाका जिला नहीं बनने के कारण 20 साल पीछे चला गया। उनकी बात कितनी खरी थी, यह कांग्रेस ही नहीं भाजपा के नेता भी इन दिनों महसूस कर रहे हैं। वे यहां ठहरने और भोजन का ठिकाना ढूंढकर परेशान हुए जा रहे हैं। पूरे जिले में गौरेला स्टेशन के आसपास का हिस्सा ही कस्बाई है बाकी सब गांव देहात। यहां कुछ जमा पांच होटल लॉज हैं और इतने ही ठीक-ठाक भोजनालय। सब जगह भीड़। मरवाही में तो यह सुविधा भी नहीं है। चुनाव आचार संहिता के कारण सरकारी रेस्ट हाउस नेताओं को मिलने से रहे। अब वे स्थानीय लोगों से मनुहार कर रहे हैं। कुछ को तो जगह मिल गई है पर ज्यादातर लोगों को, जिनमें महिला नेत्रियां भी शामिल हैं, खासी परेशानी है। कुछ नेता तो अगले एक पखवाड़े के लिये मकानों का मुंहमांगा किराया देने के लिये भी तैयार हैं पर ग्रामीण इसके लिये भी हां नहीं कह रहे हैं। उन्हें बाहर से आये लोगों से कोरोना फैलने का डर है। कांग्रेस से तो कम से 50 वीआईपी हैं, पर भाजपा से भी कम नहीं। करीब इतने ही भूतपूर्व वीआईपी उनकी तरफ भी हैं। कई नेता अमरकंटक, बिलासपुर के रास्ते में इक्के-दुक्के बने रिसॉर्ट में ठहर रहे हैं। कुछ ने कहीं-कहीं से रिश्तेदारी, परिचय निकालकर ठिकाना ढूंढा है बाकी भटक रहे हैं। मना रहे हैं टास्क पूरा हो और यहां से निकल भागें।


21-Oct-2020 6:38 PM 311

समर्थक बेचैन हैं...

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कट्टर समर्थक बेचैन हैं। उन्हें संगठन में पद नहीं मिल रहा है। जबकि राजेश मूणत अपने कई करीबियों को प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दिला चुके हैं। पार्टी के कई नेता मानने लगे हैं कि संगठन में पद पाने के लिए रमन सिंह का आशीर्वाद जरूरी है। हाल यह है कि रमन सिंह के धुर विरोधी माने जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक अब रमन सिंह के दरवाजे जाने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

बृजमोहन के एक करीबी युवा नेता ने तो उज्जैन महाकाल मंदिर के सामने से बकायदा वीडियो जारी कर रमन सिंह को जन्मदिन की बधाई दी। वे यह बताने से नहीं चूके कि रमन सिंह के दीर्घायु होने के लिए भगवान महाकाल से प्रार्थना की है। इतना सबकुछ करने के बावजूद प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति में उनका नाम नहीं जुड़ पाया।

ऐसे ही बृजमोहन के एक करीबी पूर्व विधायक पिछले कुछ महीनों से रमन सिंह के निवास मौलश्री विहार के चक्कर काट रहे हैं। पूर्व विधायक की इच्छा जिला अध्यक्ष बनने की है, और वे इसके लिए रमन सिंह का समर्थन पाने की उम्मीद से हैं। सुनते हैं कि पूर्व विधायक के पद के लिए जोगी पार्टी के एक नेता ने भी पैरवी की है। जोगी पार्टी के इस नेता के रमन सिंह से काफी अच्छे संबंध हैं। मगर पूर्व विधायक की इच्छा पूरी हो पाती है या नहीं, देखना है।

उम्मीद से हैं..

जोगी की जाति प्रकरण पर संतकुमार नेताम ने लंबी लड़ाई लड़ी है।  पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर संतकुमार नेताम भाजपा के आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री रहे हैं, और वे नंदकुमार साय के करीबी माने जाते हैं। नेताम को प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो उन्हें पद मिलने की उम्मीद थी। मगर उन्हें कुछ नहीं मिला। थक हारकर विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले कांग्रेस में शामिल हो गए।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद नेताम जोगी परिवार के खिलाफ जाति प्रमाण पत्र प्रकरण को लेकर और भी ज्यादा मुखर हो गए। अमित जोगी और ऋचा जोगी का नामांकन निरस्त होने के बाद वे सुर्खियों में हैं। नेताम ने मरवाही सीट से टिकट भी मांगी थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, मगर वे निराश नहीं हैं। वजह यह है कि सरकार के निगम-आयोग में उन्हें जगह मिल सकती है। पिछले दिनों आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने उन्हें साफ तौर पर बता दिया कि चुनाव के बाद सरकार उन्हें आयोग में पद देगी। ऐसे में नेताम का खुश होना लाजमी है।

कृषि कानून, अब बढ़ेगी धान की तस्करी?

नये कृषि बिल के रुझान आने लगे हैं। किसी भी जगह से कोई ऐसी ख़बर नहीं है कि किसानों को समर्थन मूल्य से ज्यादा देकर उपज खरीदने के लिये कोई व्यापारी तैयार हो, अलबत्ता पंजाब में यूपी और बिहार के धान की तस्करी होने लगी है। राइस मिलर्स 900 रुपये से 1100 रुपये क्विंटल पर धान खरीदकर ला रहे हैं। पंजाब में एमएसपी 1880 रुपये है। क्विंटल पीछे भाड़ा भी 100-150 रुपये जोड़ देने पर वे 500 रुपये प्रति क्विंटल मुनाफे में हैं। पंजाब पुलिस और मंडी के अधिकारी इस तस्करी को रोकने के लिये सीमाओं पर तैनात हैं। हाल ही में करीब 1.5 करोड़ रुपये का धान पकड़ा भी गया। छत्तीसगढ़ भी धान के बड़े उत्पादक राज्यों में है। यहां तो धान का समर्थन मूल्य पंजाब से भी 620 रुपये ज्यादा है। सीमाओं पर वैसे भी निगरानी बढ़ानी पड़ती है क्योंकि एमपी और दूसरे लगे हुए राज्यों का धान स्थानीय किसानों की ऋ ण पुस्तिका का इस्तेमाल कर बेच दिया जाता है। पंजाब की तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केन्द्र का कानून लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। विधानसभा के विशेष सत्र में जो राज्यपाल द्वारा फाइल लौटाने की वजह से चर्चा में आ गया है, इसी पर चर्चा होगी। यानि अब राज्य के उडऩ दस्तों को एम पी की शराब के साथ चावल की गाडिय़ों पर भी नजर रखना जरूरी हो जायेगा।

जब जिंदा होने का सबूत देना पड़े...

कहते हैं गांवों में कलेक्टर से ज्यादा ताकतवर पटवारी होता है। पर यह मुहावरा सरपंचों पर भी सही बैठता है। मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक के चेचानडीह गांव की चार वृद्ध महिलायें दूर गांव से चलकर लाठियां टेकते वहां कलेक्टोरेट पहुंचीं। उन्होंने बताया कि वे यहां अपने जिंदा माने जाने की फरियाद लेकर आई हैं। सरपंच ने आवास मंजूरी के लिये ग्राम सभा बुलाई और हमारा नाम मृत लोगों की सूची में डाल दिया। आवास तो चलो मिले न मिले, लेकिन पेंशन और राशन भी इसकी वजह से बंद हो गई है। एक बार नाम कटने के बाद दुबारा जुडऩा मुश्किल है। इनके पास कोई सिफारिश भी नहीं है। सरपंच बताते हैं कि पूर्व सरपंच ने किसी बात का बदला लेने के लिये यह किया है। शायद आवास योजना का कोटा अपने लोगों के लिये तय करना होगा। इन वृद्धाओं को उम्मीद है कि अब उन्हें जीते जी, जिंदा होने का कागज मिल जायेगा और राशन पेंशन भी।


20-Oct-2020 6:26 PM 267

दो नंबर की दारू, मालिक का क्या?

हरियाणा पुलिस ने दिल्ली जाकर वहां एक शराब कारखाना के मालिक को गिरफ्तार किया है कि उसके कारखाने में बनी शराब हरियाणा में स्मगलिंग से पहुंच रही थी। इस डिस्टिलरी में बनी शराब हरियाणा में पकड़ाई थी, और वहां पुलिस की जांच में इसका मालिक अशोक जैन पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहा था। अब एक अदालत के आदेश से पुलिस उसे गिरफ्तार कर ले गई।

इधर छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरे प्रदेशों के लिए बनी हुई शराब स्मगलिंग से आकर गांव-गांव में बिक रही है। मध्यप्रदेश में बनी गोवा का बड़ा स्टॉक अभी यहां जब्त हुआ, तो आबकारी विभाग के जानकार लोगों ने बताया छत्तीसगढ़ में केडिया डिस्टिलरी यह ब्रांड बनाती है, और केडिया का ही दूसरा बेटा मध्यप्रदेश में यह ब्रांड बनाता है। नियमों के हिसाब से कोई ब्रांड एक ही प्रदेश में बनाया जा सकता है, और उस नाम से दूसरे प्रदेश में दारू नहीं बनाई जा सकती।

लेकिन इस नियम से परे बड़ी बात यह है कि दो नंबर की दारू का बड़ा-बड़ा स्टॉक पकड़ाने के बाद भी, महंगी गाडिय़ों में जब्ती होने के बाद भी जहां से दारू बनकर आई है उस कंपनी या कारखाने के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? अगर चार बड़े कारखानेदार जेल चले जाएं, तो सारी तस्करी थम जाएगी। लेकिन शराब कारखानेदार सत्तारूढ़ राजनीति में इतना वजन रखते हैं कि उनकी गिरफ्तारी आसान नहीं रहती है। अभी हरियाणा में जिस जैन की गिरफ्तारी हुई है उसके बारे में भी लोगों का यही कहना है कि हरियाणा सरकार से पटी नहीं होगी, इसलिए उसे पटरी से उतार दिया। क्योंकि लोगों ने यह देखा कि जिस वक्त की शराब तस्करी के लिए इस डिस्टिलरी मालिक को गिरफ्तार किया गया उसी दौर में आधा दर्जन दूसरे डिस्टिलरी की भी टैक्स चोरी की शराब जब्त हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। दो नंबर की दारू जनता के हक में आने वाले टैक्स की बहुत बड़ी चोरी होती है, और जिस देश में जनता एक-एक पैसे के लिए तरस रही है, वहां पर अरबों की टैक्स चोरी छोटी बात तो है नहीं।

मरवाही में नोटा पर भी नजर...

मरवाही में जोगी दम्पत्ति का नामांकन रद्द होने के बाद भी यहां के एक-एक घटनाक्रम पर लोगों की जबरदस्त दिलचस्पी बनी हुई है। अमित जोगी किसी का समर्थन या विरोध नहीं करेंगे यह अपने बयान में कह चुके हैं लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि वे गांव-गांव जायेंगे और न्याय मांगेंगे। अब, मरवाही के मतदाताओं ने उनके साथ कोई अन्याय तो किया नहीं। उन्होंने तो हर चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जिताया। जो संकट सामने है उसका फैसला तो आखिरकार कोर्ट में होना है। अमित जोगी के इस रुख का किसे कितना फायदा होगा, या नुकसान आने वाले कुछ दिनों में साफ होगा। वे पक्ष-विपक्ष किसी का साथ नहीं देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में उनके दौरे चुनाव आयोग के घेरे में भी नहीं होंगे। बस, एक बात ध्यान में रखनी होगी कि इस बार कांग्रेस या भाजपा किसी के लिये भी यह चुनाव एकतरफा नहीं है, जैसा जोगी के मैदान में रहते होता था। अब नोटा भी उलटफेर कर सकती है। दंतेवाड़ा का सन् 2018 का चुनाव याद होगा जब भीमा मंडावी जीते थे। उनके और कांग्रेस उम्मीदवार के बीच हार-जीत का फासला करीब दो हजार मतों का था और नोटा में चले गये थे जागरूक तथा नेताओं से खिन्न मतदाताओं के 9929 वोट। कांग्रेस भाजपा के बाद नोटा से अधिक वोट पाने वाले एक ही उम्मीदवार थे सीपीआई के नंदराम सोरी। मरवाही में 2018 के चुनाव में अगर कड़ी टक्कर होती तो नोटा पर ध्यान जाता। यहां भी नोटा को 4500 से ज्यादा वोट मिले। कुल दस प्रत्याशियों में पांच ऐसे थे जिन्हें नोटा से कम मत मिले। मरवाही में फैसला दो डॉक्टरों पर होना है। देखें नोटा की यहां क्या भूमिका होगी? नोट और नोटा ?!

धान का एथेनॉल और हंगर इन्डेक्स

धान खरीदी पर प्रोत्साहन दिये जाने के कारण इसका उत्पादन प्रदेश में लगातार बढ़ता ही जा रहा है लेकिन उगाये धान को खपाये कहां? पिछले सीजन में करीब 83 लाख टन मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई, जिससे 56.50 लाख टन चावल मिला। विभिन्न योजनाओं में खपाने के बावजूद करीब 10.50 लाख टन मीट्रिक धान या कहें 7.10 लाख चावल बच गया। केन्द्र सरकार अतिरिक्त चावल खरीदने को तैयार नहीं होता। इसे लेकर पिछले सत्र में विवाद था आगे भी इसकी संभावना बनी हुई है। इसे देखते हुए बचे हुए धान का एथेनॉल बनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने केन्द्र को दिया था और इसके लिये मंजूरी तथा मदद मांगी थी। केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस प्रस्ताव को मान लिया है। भाजपा की बैठक में उन्होंने इस निर्णय की घोषणा की। धान खरीदी के कारण राजस्व पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार इससे कुछ कम होगा। दूसरी ओर दो दिन पहले ही आई एक और रिपोर्ट सामने है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 107 देशों में भारत का स्थान 94वां है। एक तरफ लोगों की जरूरत से ज्यादा अनाज है दूसरी तरफ भुखमरी भी। एक ही देश में। कल्याणकारी योजनाओं  और वितरण व्यवस्था की विफलता, नीति बनाने वालों की गड़बड़ी, आखिर ये है क्या?


19-Oct-2020 6:49 PM 308

कल तक नकली, आज हमदर्दी !

पूर्व सीएम रमन सिंह ने अमित और ऋचा जोगी के जाति प्रमाण पत्र और नामांकन निरस्त करने के फैसले की आलोचना कर पार्टी के आदिवासी नेताओं की नाराजगी मोल ले ली है। रमन सिंह का जोगी परिवार के समर्थन में खड़े होना विशेषकर दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर और रामविचार नेताम को बिल्कुल नहीं भा रहा है। तीनों ने जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने के छानबीन समिति के फैसले का स्वागत किया है।

सुनते हैं कि पार्टी के भीतर आदिवासी एक्सप्रेस चलने की सुगबुगाहट है। रमन सिंह के पहले कार्यकाल में भी आदिवासी एक्सप्रेस दिल्ली रूट पर चली थी। तब आदिवासी-गैर आदिवासी, करीब डेढ़ दर्जन विधायकों ने रमन सिंह के खिलाफ मोर्चाबंदी की थी। तब हाईकमान और रमन सिंह की शालीनता-सज्जनता के आगे ये विधायक नतमस्तक  होकर रह गए थे और फिर कभी खुले तौर पर नाराजगी सामने नहीं आई। इसके बाद तो पार्टी के भीतर रमन का कद बढ़ता गया और 15 साल सीएम रहने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। वे प्रदेश से अकेले राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।

अब जब रमन सिंह, जाति प्रमाण मसले पर जोगी परिवार के साथ खड़े दिख रहे हैं, तो ये आदिवासी नेता बुरी तरह उखड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि भाजपा पहली बार जोगी को नकली आदिवासी प्रचारित कर सत्ता में आई थी। तब जोगी के खिलाफ मुहिम के अगुवा नंदकुमार साय थे। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें अजीत जोगी के हाथों बुरी हार का सामना करना पड़ा और वे सीएम पद की दौड़ से बाहर हो गए। साय इस बात को नहीं भूल पाए हैं।

चर्चा है कि साय और बाकी आदिवासी नेता पार्टी के भीतर रमन सिंह के दबदबे को खत्म करने के लिए मुहिम चला सकते हैं। इन नेताओं के बीच आपस में चर्चा चल भी रही है, और कुछ लोगों का अंदाजा है कि रमन सिंह विरोधी गैरआदिवासी नेताओं का भी उन्हें साथ मिल सकता है। पार्टी के असंतुष्ट नेता आने वाले दिनों में कैसा रूख अपनाते हैं, यह देखना है।

12 साल बाद वही, पर हालात अलग

नवंबर 2006 की घटना है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के निधन के बाद कोटा विधानसभा चुनाव के प्रबल दावेदार उनके परिवार के ही किसी सदस्य को माना जा रहा था। सब मानते थे कि स्व। शुक्ल की कोटा क्षेत्र में इतनी पकड़ थी कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य चुनाव लड़े जीत पक्की थी। स्व। शुक्ला के परिवार के प्राय: सभी लोग अच्छे शासकीय सेवा में थे और हैं। सिर्फ एक बेटे जिनकी राजनीति में दिलचस्पी थी, वे सुनील शुक्ला हैं। कांग्रेस ने उनके लिये टिकट पक्की कर दी। इधर कोटा के कार्यकर्ताओं का एक धड़ा शुक्ल विरोधी भी था जो स्व। अजीत जोगी के करीबी थे। उन्होंने सुनील शुक्ला को टिकट देने के खिलाफ आवाज उठाई। नामांकन दाखिले के अंतिम दिन तक ऊहापोह की स्थिति थी। सुनील शुक्ला पर भारी दबाव था, उन्हें अपनी मिली हुई ऐसी टिकट जिसमें जीत पक्की थी, वापस करनी पड़ी। डॉ। रेणु जोगी को इस चुनाव में टिकट मिली, तब से वे लगातार जीतते आ रही हैं। पिछली बार उन्होंने कोटा से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की टिकट पर चुनाव जीता तो पहली बार कांग्रेस यहां से बुरी तरह हारी। लोगों ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के डमी प्रत्याशी थे। पहली बार हुआ कि हमेशा जीतने वाली कांग्रेस इस सीट में तीसरे स्थान पर रही। सन् 2018 के चुनाव में जब हवा चलने लगी कि डॉ। जोगी को कांग्रेस की टिकट नहीं मिलेगी, तब फिर सुनील शुक्ला ने बयान दिया कि अब वे अपने पिता की विरासत को संभालना चाहते हैं। पर इन 12 सालों में बहुत कुछ घट गया था। टिकट लौटाने के बाद वे कांग्रेस के कार्यक्रमों में भी नहीं दिखते थे। एकाएक टिकट की मांग की तो पार्टी में उनके नाम पर किसी ने गंभीरता से विचार ही नहीं किया। इस क्षेत्र में कोटा के बाद मरवाही दूसरी सीट है जहां किसी कद्दावर नेता की मौत के बाद उनके परिवार को उनकी विरासत संभालने का मौका नहीं मिल पाया। इतिहास की पुनरावृत्ति हुई है पर परिस्थितियां भिन्न हैं। टिकट तो अमित जोगी के हाथ में था पर नामांकन वैध कराना नहीं। 

तब तक ढील नहीं...

कोरोना संक्रमण के मामले में देश के अलग-अलग राज्यों से मिले-जुले आंकड़े आ रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने शायद अति उत्साह में कह दिया हो कि कोरोना का पीक दौर चला गया है। पीडि़तों की संख्या में कभी उछाल तो कभी गिरावट आती ही रही है। वैसे अपने ही बयान में उन्होंने यह भी कह दिया है कि ठंड के दिनों में एक आंधी और आ सकती है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। पूरे प्रदेश में कल काफी दिनों के बाद ऐसा हुआ कि संक्रमितों की संख्या दो हजार से कम मिली लेकिन मौतों की संख्या कम नहीं हो रही है। बीते 24 घंटे में 10 लोगों की मौत दर्ज की गई। इनमें से 7 केस ऐसे बताये गये हैं जो किसी अन्य गंभीर बीमारी से भी पीडि़त थे। जब मंत्री कहें कि कोरोना से मुक्त हो रहे हैं तो उनका बयान एमपी, बिहार, मरवाही के कार्यकर्ताओं का हौसला या कहें, लापरवाही बढ़ाने के लिये काफी है। बीते सात-आठ महीने का बहुत खराब दौर गुजर जरूर चुका है पर मौजूदा हालात को नजरअंदाज करना घातक होगा। कोरोना से बचकर बाहर आये अमिताभ बच्चन कह रहे हों तब तो मान ही लेना चाहिये- जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।

कल ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान भी देखें कि केरल में त्यौहार के बाद जिस तरह कोरोना बढ़ा उसे याद रखना चाहिए। अभी तो अगला एक महीना छत्तीसगढ़ में त्यौहार ही त्यौहार हैं। 


18-Oct-2020 6:23 PM 159

मौत एक और आदिवासी लडक़ी की...

छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर संभाग की कई गंभीर ख़बरें राजधानी तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है। सुर्खियों में महिला सुरक्षा, दलित अत्याचार पर सेमिनार, सरकारी बैठकें और सख्त निर्देश होती हैं। कहा जा रहा है कि फरसगांव में एक आदिवासी बालिका का एक पुलिस कर्मी शारीरिक शोषण करता रहा। गर्भवती हुई तो उसे दुत्कार दिया। सामाजिक उलाहना के डर से बालिका घर छोडक़र शिशु के साथ निकल गई और संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की बात सामने आई। मौत के बाद उस कथित  पुलिस वाले के खिलाफ शिकायत हुई। कार्रवाई क्या हुई? उसे बस निलम्बित कर दिया गया है। दुष्कर्म के आरोप में न एफआईआर न कोई गिरफ्तारी। सरगुजा संभाग और बस्तर की कुछ घटनायें सामने आने पर राज्यपाल ने भी पुलिस के रवैये पर तेवर तीखे किये थे। पर दिखता यही है कि जब तक प्रशासन का दबाव न हो, पुलिस अपने विभाग के लोगों को बचाने की कोशिश करती है। केसकाल के पूर्व विधायक कृष्ण कुमार ध्रुव ने इस सवाल को बाल संरक्षण आयोग और उच्चाधिकारियों के सामने रखा है, देखें उनकी शिकायत को गंभीरता से लिया जाता है या नहीं।

मुख्यमंत्री ने पुलिस को महिला प्रताडऩा पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश तो दे दिए हैं, लेकिन वे पहले पुलिस विभाग के भीतर सेक्स शोषण के मामलों को तो देख लें जो बरसों से पड़े हैं !

मां तो बस मां होती है....

मरवाही विधानसभा उप-चुनाव के लिये नामांकन दाखिले के दिन जिला मुख्यालय के सामने भारी गहमागहमी थी। काफी उलझन और तनाव भरे माहौल में जोगी परिवार भी इसी परिसर में मौजूद था। अमित जोगी और ऋ चा जोगी साथ खड़े थे, एक खबरनवीस ने ऋ चा जोगी से कहा, पिछला चुनाव (अकलतरा) बस दो हजार से हार गईं लेकिन इस बार तो आपको विधानसभा में पहुंचने का पूरा मौका है। खबरनवीस को लगा कि अपनी तारीफ सुनकर ऋ चा जोगी खुश होंगी, लेकिन उन्होंने कहा- नहीं, मैं तो सोच रही हूं कि अगर किसी कारण से मुझे चुनाव में निकलना  पड़ेगा तो सब कैसे मैनेज होगा। अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है, मैं तो चाहती हूं पूरे समय उसे अपनी आंखों के सामने रखूं। मुझे तो परिस्थितियों के चलते सामने आना पड़ा है, अभी तो ऐसी कोई इच्छा थी नहीं।

कोरोना का रोल मॉडल अस्पताल

एम्स, मेडिकल और सरकारी कोविड अस्पतालों में कोई शक नहीं डॉक्टर और स्टाफ अपनी पूरी क्षमता से कोरोना संक्रमितों का बेहतर इलाज की कोशिश कर रहे हैं। इन सबके बीच अलग तरह का काम कर रहा  रहा है केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भरनी के अस्पताल में तैनात युवा डॉक्टर। तीन डॉक्टरों डॉ. रमेश यादव, डॉ. एस के जैन और डॉ. सुरेन्द्र सानगोड़े  की टीम ने अब तक 150 कोरोना मरीजों का इलाज किया। यहां किसी की मौत नहीं हुई। मरीजों में न केवल सुरक्षा बल व पुलिस के जवान हैं बल्कि आम लोगों के बीच से हैं। ये मरीज सिर्फ सीआरपीएफ कैंप के नहीं बल्कि बस्तर, रायपुर से भी आये हैं। जब बिस्तर खाली हो तो बाहरी मरीजों को भी भर्ती किया जाता है। इन डॉक्टरों का दावा है कि कोरोना संक्रमण का असर चेस्ट पर कैसा है इसी से बीमारी की गंभीरता को वे भांप लेते हैं। मरीज के छाती का प्रतिदिन तय समय पर एक्स रे लिया जाता है फिर उसकी स्टडी कर उनके लिये उपचार तय किया जाता है। इन डॉक्टरों का यह भी कहना है कि कोरोना का इलाज महंगा नहीं है बस सावधानी और ऑब्जर्वेशन जरूरी है।  यह संयोग ही है कि इसी भरनी से थोड़ा आगे जाने पर गनियारी गांव मिलता है जहां स्थापित जन सहयोग केन्द्र के डॉक्टरों का किफायती इलाज पूरे देश में चर्चित है।