राजपथ - जनपथ

14-Feb-2020

पर्यवेक्षक पहुंचे भी नहीं

जनपद पंचायतों में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली है। ऐसा इसीलिए संभव हो पाया कि भाजपा ने जनपद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई। ज्यादातर जगहों पर भाजपा ने चुनाव लडऩे की औपचारिकता ही निभाई। चुनाव के लिए भाजपा ने जिलेवार पर्यवेक्षक तो नियुक्त किए थे, लेकिन एक-दो जगहों पर तो पर्यवेक्षक ही नहीं पहुंचे। 

सुनते हैं कि बस्तर संभाग के एक जिले के जनपदों में चुनाव के लिए नियुक्त किए गए पर्यवेक्षक ने जिलाध्यक्ष को फोन लगाया और अपने आने की सूचना दी। जिला अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि यदि चुनाव में खर्च करने के लिए कुछ लेकर आ रहे हैं, तभी आना ठीक होगा, वरना खाली हाथ आने का कोई मतलब नहीं है। फिर क्या था, पर्यवेक्षक गए ही नहीं। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल को सरगुजा में चुनाव का जिम्मा दिया गया था। पूरा चुनाव निपट गया, अमर अग्रवाल झांकने तक सरगुजा नहीं गए। कई भाजपा कार्यकर्ता मानते हैं कि बड़े नेताओं की बेरूखी की वजह से चुनाव में हार हुई है, तो एकदम गलत भी नहीं है। 


झारखंड और रामविचार
झारखण्ड चुनाव में भाजपा की बुरी हार के बाद सुनते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को भाजपा में शामिल करने की तैयारी चल रही है। 17 तारीख को बड़ी रैली में मरांडी को भाजपा में प्रवेश दिलाया जाएगा। मरांडी की पार्टी का भाजपा में विलय होगा। झारखण्ड की राजनीति में होने वाले इस बदलाव के विमर्श की प्रक्रिया में सौदान सिंह कहीं नहीं है। अलबत्ता, रामविचार नेताम की पूछपरख जरूर हो रही है। वे आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और इस नाते उन्हें झारखण्ड में भाजपा संगठन को मजबूत करने के लिए जो भी निर्णय लिए जा रहे हैं, उसमें नेताम की भी अहम भूमिका है। 
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13-Feb-2020

हार और सन्नाटा

हमेशा से भाजपा का चुनाव-कार्यक्रम प्रबंधन बाकी दलों से काफी बेहतर रही है। मगर छत्तीसगढ़ में सत्ता से बेदखल होने के बाद हर मामले में कमी दिखाई दे रही है। लोकसभा चुनाव में तो खराब चुनाव प्रबंधन के बाद भी मोदी के नाम पर जीत हासिल हो गई, लेकिन म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव में तो बुरा हाल रहा है। म्युनिसिपल चुनाव में बुरी हार से भाजपा ने कोई सबक नहीं सीखा। पंचायत चुनाव में स्थिति और बुरी होने जा रही है। जो भाजपा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील और सक्रिय रही है, वहां पर्यवेक्षकों की सूची जनपद चुनाव के दो दिन पहले जारी की गई। 

सुनते हैं कि पर्यवेक्षक अपने प्रभार वाले जिले की बैठक ले पाते, इससे पहले ही कांग्रेस के लोगों ने ज्यादातर जिलों के जनपदों में नवनिर्वाचित सदस्यों को अपने पाले में कर लिया था। ऐसे में पर्यवेक्षकों के लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं रह गया है। यही हाल जिला पंचायतों का भी हो गया है। बस्तर-जशपुर और कवर्धा को छोड़ दें, तो ज्यादातर जिलों में कांग्रेस का कब्जा होना तय है। भाजपा का एक बड़ा खेमा इसके लिए हाईकमान को जिम्मेदार ठहरा रहा है। 

नाराज भाजपा नेताओं का तर्क है कि हाईकमान प्रदेश अध्यक्ष को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं कर पाया है। हाल यह है कि संगठन की गतिविधियां सिमटकर रह गई हैं। मौजूदा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी सिर्फ अपने गृह जिले कांकेर तक ही सीमित रह गए हैं। वहां भी कई स्थानीय नेता उसेंडी के खिलाफ खड़े हो गए हैं। ऐसे में चुनाव पर ध्यान दे पाना मुश्किल हैं। फिलहाल पार्टी कार्यकर्ता खामोश हैं और नए अध्यक्ष की नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। फिर भी कार्यकर्ताओं की खामोशी का असर चुनाव में तो पड़ता ही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


12-Feb-2020

वन अफसरों की अब मंत्रालय पोस्टिंग नहीं

प्रदेश में आईएएस अफसरों की कमी है। अभी आधा दर्जन से अधिक सीनियर आईएएस अफसर केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर हैं। एक-दो और जाने की तैयारी में हैं। मगर भूपेश सरकार का रूख साफ है कि आईएएस के विकल्प के रूप में आईएफएस अफसरों की मंत्रालय में पदस्थापना नहीं की जाएगी। जबकि पिछली सरकार में मंत्रालय और निगम-मंडलों को मिलाकर दर्जनभर आईएफएस पदस्थ थे। लेकिन सरकार बदलते ही एक-दो को छोड़कर बाकियों को वापस वन विभाग में भेज दिया गया। 

सुनते हैं कि पिछले दिनों अफसरों की कमी को देखते हुए दो-तीन आईएफएस अफसरों की मंत्रालय में पोस्टिंग का प्रस्ताव रखा गया। मगर सीएम ने साफ कर दिया कि वन अफसरों की मंत्रालय में पोस्टिंग नहीं की जाएगी। उनका मत था कि प्रदेश में 44 फीसदी वन क्षेत्र हैं और इसको बचाना जरूरी है। वन संपदा से रोजगार की अपार संभावना है। ऐसे में वन अफसरों को अपने विभाग में काबिलियत दिखाने की ज्यादा जरूरत है। 

 


भाजपा सरकार में धर्मांतरण...
खबर है कि पिछले दिनों आरएसएस की भोपाल बैठक में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर चिंता जताई गई है। आरएसएस के बड़े पदाधिकारी यह कहते सुने गए कि छत्तीसगढ़ में 15 साल भाजपा की सरकार रही है, फिर भी ऐसी स्थिति क्यों बनी? इस बैठक में पूर्व सीएम रमन सिंह के साथ-साथ सौदान सिंह और चुनिंदा भाजपा नेता मौजूद थे। 

आरएसएस की चिंता बस्तर संभाग को लेकर ज्यादा है। संघ से जुड़े नेताओं का कहना है कि बस्तर में पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है, लेकिन राज्य की भाजपा सरकार इसको लेकर उदासीन रही। ऐसे में कथित धर्मांतरण को लेकर वे किसी और को दोष नहीं दे पा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि पहले सरस्वती शिशु मंदिर से जुड़े लोग काफी रूचि लेते थे और वे गांव-गांव में हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार करते थे। मगर उन्होंने पिछली सरकार में अपनी उपेक्षा की वजह से गतिविधियों को सीमित कर दिया है। संघ ने अब फिर बस्तर में विशेष सक्रियता की जरूरत पर बल दिया है और पार्टी के साथ-साथ आरएसएस भी जनजागरण के लिए अभियान चलाएगा। 

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11-Feb-2020

कॉम्पलेक्स विवाद में कूदे विधायक 

शहर के मध्य में स्थित एक व्यावसायिक कॉम्पलेक्स के मालिकाना हक को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सुनते हैं कि एक पुराने कारोबारी ने दशकों पहले नजूल जमीन लीज पर लेकर कॉम्पलेक्स खड़ा किया था। दूकानें किराए पर दी थी। जमीन के लीज की अवधि खत्म होने से पहले कॉम्पलेक्स की दूकानों को बेचना शुरू कर दिया। खास बात यह है कि सारी दूकानें एक ही व्यक्ति ने खरीदी है। चर्चा है कि कॉम्पलेक्स के खरीददार  की पिछली सरकार में गहरी पैठ रही है। और पिछली सरकार के रहते खरीदी बिक्री से जुड़े काफी काम निपट गए थे। मगर कुछ काम बाकी रह गए थे। 

सरकार बदलते ही खरीदी-बिक्री को लेकर कुछ लोगों ने अलग-अलग स्तरों पर शिकायत कर दी। इसमें बड़ा पेंच यह भी था कि कॉम्पलेक्स के पिछले हिस्से में सरकारी दफ्तर चल रहा था। संबंधित विभाग ने कॉम्पलेक्स के मालिक से भवन किराए पर लिया था। अब बदली परिस्थितियों में सरकारी भवन को खाली कराना आसान नहीं था। तब खरीददार ने सत्तारूढ़ दल के एक विधायक से मदद मांगी। 

विधायक महोदय एक दिन सरकारी दफ्तर में जा धमके और अफसरों से खुद को भवन का मालिक बताकर भवन खाली करने के लिए कह दिया। आधा अरब से अधिक की इस संपत्ति की खरीदी-बिक्री और इससे जुड़े विवादों को लेकर शिकायतकर्ता जांच के लिए दबाव बनाए हुए हैं। शिकायतकर्ता और विधायक, दोनों ही सत्तारूढ़ दल के हैं। इसके चलते प्रशासन भी पशोपेश में हैं। फिर भी मामले को सुलझाने की कोशिश हो रही है। मगर अब तक सुलझ नहीं पाया है। देर-सवेर इसको लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। 

दिल्ली चुनाव में सुनील सोनी की सक्रियता
दिल्ली चुनाव में भाजपा ने करीब 80 सांसदों को विधानसभावार प्रचार की जिम्मेदारी दी थी। इनमें रायपुर के सांसद सुनील सोनी भी थे। सुनील सोनी को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के चुनाव क्षेत्र नई दिल्ली की कमान सौंपी गई थी। सोनी पहली बार सांसद बने हैं। दिल्ली की गतिविधियों से ज्यादा परिचित नहीं रहे। फिर भी उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के प्रचार में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। 

सुनील सोनी का हाल यह था कि वे अकेले ही भाजपा के लिए वोट मांगने निकल जाते थे। स्थानीय कार्यकर्ता बड़े नेताओं के साथ रहते थे।  चुनाव परिणाम का भी सबको अंदाजा था इसलिए कार्यकर्ता सुनील सोनी के साथ प्रचार में जाने से परहेज करते थे। सुनील सोनी ने इसकी परवाह नहीं की और वे अंत तक डटे रहे। सुनील सोनी के लिए यह काफी था कि पार्टी ने उन्हें दिग्गज नेता के खिलाफ प्रचार का जिम्मा सौंपा। जबकि छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और अन्य नेताओं को प्रचार के लिए बुलाया ही नहीं गया था। इससे सुनील सोनी के समर्थकों को भविष्य में पार्टी संगठन में महत्व मिलने की उम्मीद  है। 


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10-Feb-2020

सेवा सत्कार का फायदा

पूर्व मंत्री राजेश मूणत सहित कई पूर्व भाजपा विधायकों की सुरक्षा वापस ले ली गई है। मगर पूर्व विधायक लाभचंद बाफना की न सिर्फ सुरक्षा बरकरार है बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराया गया है। बाफना के प्रति सरकार की दरियादिली की भाजपा के अंदरखाने में जमकर चर्चा हो रही है। पिछली सरकार में विशेषकर दुर्ग जिले में रेत खनन में बाफना परिवार का एकाधिकार रहा है। बाफना विधायक बनने से पहले पार्टी और सरकार के प्रभावशाली लोगों की खूब सेवा करते थे। दुर्ग जिले के अपने फार्महाऊस से ताजी सब्जियां लेकर आते थे और उनके घर पहुंचाते थे। 

विधायक बनने के बाद भी उनका यह क्रम जारी रहा। मगर इसी के आड़ में उनका अपना कारोबार काफी फैल गया। उनके भाई और परिवार के लोगों के खिलाफ कई गंभीर शिकायतें भी हुई, लेकिन बाफना की सेवा से प्रभावित भाजपा और सरकार के लोगों ने ध्यान नहीं दिया। इसी के चलते विधानसभा चुनाव में न सिर्फ बाफना की बुरी हार हुई, बल्कि पूरे जिले में भाजपा का सफाया हो गया। 

अब सरकार जाने के बाद भी बाफना की हैसियत में ज्यादा कोई कमी नहीं आई है। सुनते हैं कि बाफना ने दुर्ग जिले के कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेताओं को साध लिया है। कांग्रेस नेताओं ने उनकी सुरक्षा बहाल रखने में मदद की है। जिन भाजपा नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई है, उनमें से कुछ अब बाफना का अनुशरण करने की कोशिश कर रहे हैं। 

निशक्तजन संस्थान में गदर

निशक्तजन संस्थान में गड़बड़ी की सीबीआई जांच से शासन-प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। वैसे तो संस्थान में गड़बड़ी की अलग-अलग स्तरों पर शिकायत हुई थी तब मामूली जांच-पड़ताल के बाद ज्यादा कुछ नहीं हुआ। समाज कल्याण विभाग के आला अफसरों ने इसको गंभीरता से नहीं लिया। इसकी वजह भी थी कि शिकायतकर्ता को कदाचरण के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। ऐसे में शिकायतकर्ता की शिकायतों को नौकरी से निकालने की सामान्य प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया। 

कोर्ट में भी ज्यादा कुछ मजबूती से पक्ष नहीं रखा गया। अब जब सीबीआई जांच हो रही है, तो प्रकरण से जुड़े कई तथ्य सामने आ रहे हैं। सुनते हैं कि शिकायतकर्ता के ससुरजी समाज कल्याण विभाग के ही कर्मचारी थे। दामाद को नौकरी से निकाला गया, तो ससुर का गुस्सा स्वाभाविक था। विभाग के अफसर भी दो खेमे में बंटे हुए थे। 

विभाग की अंदरूनी जानकारी छनकर बाहर निकलने लगी और मामला कोर्ट कचहरी तक पहुंच गया। शिकायतकर्ता की ज्यादा कोई चाह तो थी नहीं, नौकरी में वापसी की चाहत थी। मगर दूसरा खेमा इसके लिए तैयार नहीं था। अब प्रकरण हाईकोर्ट पहुंचा, तो भी विभाग गंभीर नहीं था। फिर सरकार बदलने के बाद कुछ अदृश्य शक्तियों का भी साथ मिल गया। फिर जो हो रहा है, वह धीरे-धीरे अब सबके सामने आ रहा है। कई बार किसी प्रकरण को हल्के में लेने का नतीजा अच्छा नहीं रहता है। 

नान घोटाला प्रकरण में भी कुछ इसी तरह का हुआ था। मैडम सीएम-सीएम सर लिखे, डायरी के पन्ने योजनाबद्ध तरीके से लीक किए गए। शुरूआत में तो पिछली सरकार और प्रकरण की जांच कर रही एजेंसी ईओडब्ल्यू-एसीबी ने इसको हल्के में लिया। बाद में यह मामला राजनीतिक रंग ले लिया, तो ईओडब्ल्यू-एसीबी से जुड़े लोगों को सफाई देने के लिए आगे आना पड़ गया। हाल यह है कि पांच साल बाद भी जांच एजेंसी डायरी में लिखे नामों को लेकर माथापच्ची कर रही है। यह प्रकरण अब तक सुलझा नहीं है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


09-Feb-2020

नि:शक्तजन घोटाला और सीबीआई जांच 

नान घोटाले की तरह नि:शक्तजन घोटाला प्रकरण भी अब राजनीतिक  रंग ले रहा है। प्रकरण की सीबीआई जांच के खिलाफ हाईकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करने से भाजपा के लोगों को भूपेश सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया और पार्टी नेताओं ने सवाल उछाल दिया कि आखिर भूपेश सरकार किसको बचाने की कोशिश कर रही है? इस सवाल पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया आना बाकी है। मगर देर सबेर इस घोटाले पर नान की तरह भाजपा के लोगों को बचाव में आना पड़ सकता है। 

सीबीआई की एक टीम भोपाल से जांच के लिए रायपुर आई हुई है, जिसमें दिल्ली के अफसर भी हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि घोटाला पिछली भाजपा सरकार के समय का है। मगर इसमें कौन-कौन शामिल हैं, इसको लेकर कयास ही लगाए जा रहे हैं। सुनते हैं कि नि:शक्तजन संस्थान के जरिए सोसायटी का गठन किया गया था, उस पर तत्कालीन विभागीय मंत्री रेणुका सिंह से लेकर तत्कालीन वित्त मंत्री अमर अग्रवाल  और तत्कालीन सीएम रमन सिंह की सहमति रही है। 

फाइलों पर तत्कालीन सीएम रमन सिंह के अनुमोदन से सोसायटी की प्रबंध कार्यकारिणी में सच्चिदानंद जोशी, प्रफुल्ल विश्वकर्मा, सुधीर देव और दामोदर गणेश को अशासकीय सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया था। अब जब इस संस्थान और सोसायटी को कथित तौर पर फर्जी करार दिया जा रहा है, तो ऐसे में इन तमाम दिग्गजों पर आंच आना स्वाभाविक है। 

यह बात भी छनकर आ रही है कि संस्थान के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक सोसायटी की तीन-चार मीटिंग हुई थी, जिसमें पहली बार रेणुका सिंह, फिर लता उसेंडी और आखिरी बार मीटिंग की अध्यक्षता रमशीला साहू के समाज कल्याण मंत्री रहते हुई थी। जांच आगे बढ़ेगी, तो इन सभी से पूछताछ संभव है। यही नहीं, जिस संस्थान में करीब एक हजार करोड़ का घोटाला बताया जा रहा है, उसमें पिछले 15 सालों में सिर्फ 23 करोड़ ही खर्च हुए हैं। 

ऐसे में बाकी की राशि कहां से आई, और कहां गईं, इसका जवाब भी सीबीआई को ढूंढना है। नान घोटाले की जांच के चलते वहां के छोटे-बड़े कर्मचारी पिछले कई साल से टेंशन में हैं, लेकिन सोसायटी में काम कर रहे लोग सीबीआई जांच से बेफिक्र और बेखौफ दिख रहे हैं। उनका अंदाज कुछ मशहूर शायर राहत इंदौरी के उस शेर की तरह नजर आ रहा है कि 'लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी हैÓ।


बंसल भी प्रतिनियुक्ति की राह पर
कृषि विभाग के विशेष सचिव मुकेश बंसल भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। सुनते हैं कि बंसल, केन्द्रीय इस्पात मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के सचिव बन सकते हैं। बंसल भाप्रसे के वर्ष-2005 बैच के अफसर हैं। वे सीएम रमन सिंह के संयुक्त सचिव भी थे। वे राजनांदगांव कलेक्टर भी रह चुके हैं। बंसल से पहले सुबोध सिंह केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा चुके हैं। हालांकि आईएएस अफसरों की कमी है। ऐसे में मुकेश बंसल को केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का मौका मिलेगा या नहीं, देखना है।
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07-Feb-2020

एक ट्वीट से खलबली
कल दिल्ली की एक प्रमुख पत्रकार रोहिणी सिंह ने एक ट्वीट किया, जिस पर बड़ी बहस छिड़ गई। उन्होंने ट्वीट में कोई नाम तो नहीं लिखे, लेकिन इशारों में उन्होंने जिस बड़ी राजनीति की चर्चा की उससे छत्तीसगढ़ में भी सनसनी फैली, और हो सकता है कि कुछ दूसरे कांग्रेसी राज्यों में भी खलबली मची होगी। रोहिणी सिंह ने लिखा- एक कांग्रेस नेता ने एक बड़ी कार्पोरेट घराने, और राहुल (गांधी) की टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य की मदद से एक पब्लिक रिलेशन्स फर्म की सेवाएं लेकर एक कांग्रेस मुख्यमंत्री को अस्थिर करने का काम शुरू किया है। इस कार्पोरेट घराने के व्यवसायिक हित, और इस कांग्रेस नेता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ यह गठजोड़ बनाया है। 

अब इस पर गंभीर, और मजाकिया सभी किस्म की टिप्पणियां आने लगीं। लोगों ने नामों पर अटकल लगाना शुरू किया लेकिन बात किसी नतीजे तक पहुंची नहीं। कल शाम से लेकर रात तक दिल्ली के कुछ पत्रकार छत्तीसगढ़ के कुछ संपादकों से फोन पर इस राजनीति को समझने की कोशिश करते रहे। कुछ लोगों ने इस बारे में खुलकर भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव का नाम भी लिखा। कुछ लोगों ने लिखा कि राहुल गांधी यह सब जानते-समझते हैं, फिर भी चुप हैं। बहुत से लोगों ने रोहिणी सिंह के मोदी-विरोधी रूख को लेकर भी उन पर हमले बोले। कुछ लोगों ने लिखा कि यह छत्तीसगढ़ का मामला है और यह अडानी से जुड़ा हुआ है। कुछ ने रोहिणी को चुनौती दी कि वे केजरीवाल की तरह झूठों की रानी न बनें, और नाम बताएं। कुछ ने पूछा कि क्या यह अंबानी से जुड़ा मामला है? एक ने कहा कि इनकी पहचान का थोड़ा सा इशारा तो दिया जाए, बताया जाए कि ये तीन लोग किन जानवरों से मिलते-जुलते दिखते हैं, या ऐसा बता दिया जाए कि गणित के किसी फार्मूले में उनकी उम्र डालकर दुगुनी करें, और बच्चों की संख्या से गुणा करने तो कितना नंबर आएगा, या यह बताएं कि उद्योगपति कितने करोड़ का आसामी हैं। एक ने लिखा कि छत्तीसगढ़ के इस मामले में जिंदल भी शामिल है। एक-दो लोगों ने हेमंत सोरेन और गहलोत का नाम भी लिखा। एक ने लिखा कि भूपेश बघेल को छुआ भी जाएगा तो राहुल गांधी के हाथ से छत्तीसगढ़ चला जाएगा। बहुत से लोगों ने रोहिणी से यह भी पूछा कि यह पोस्ट करने के लिए उन्हें कितनी रकम मिली है, या कितना बड़ा मकान मिला है। एक ने कमलनाथ के न होने की संभावना लिखी कि वे गांधी परिवार के सबसे बड़े चमचे हैं, इसलिए तो वे हो ही नहीं सकते। कुछ लोगों ने राजस्थान के सचिन पायलट और मध्यप्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम की भी अटकल लगाई, कि वे अपने राज्यों के मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा कर सकते हैं। एक व्यक्ति ने अधिक सावधानी बरतते हुए इन तीनों राज्यों की तीनों जोडिय़ों के नाम लिख दिए, ताकि कोई न कोई अंदाज तो सही साबित हो। कुल मिलाकर शाम से आज दोपहर तक सैकड़ों लोगों ने इस पर लिखा और अपना अंदाज भी बताया। रोहिणी सिंह को ट्विटर पर दो लाख साठ हजार लोग फॉलो करते हैं, और वे संघ परिवार, भाजपा, मोदी, अमित शाह की आलोचना से भरी अपनी ट्वीट के लिए लगातार हमलों का शिकार भी रहती हैं।

तैराक से हमदर्दी नहीं...
चार साल पहले सुकमा के अपने सरकारी बंगले में स्वीमिंग पूल बनवाकर चर्चा में आए आईएफएस अफसर राजेश चंदेला एक बार फिर जांच के घेरे में आ गए हैं। वैसे तो स्वीमिंग पूल प्रकरण की पिछली सरकार ने जांच कराई थी तब उन्हें क्लीनचिट मिल गई थी। अब फिर से प्रकरण की जांच शुरू हो रही है। विभाग जल्द ही जांच कमेटी गठित करने वाला है। 

सुनते हैं कि स्वीमिंग पूल प्रकरण पर चंदेला को अकेले आरोपी बनाना आसान नहीं है। जांच ज्यादा बारीकी से हुई, तो चंदेला का तो ज्यादा कुछ नहीं होगा लेकिन उनके चक्कर में कुछ और अफसर लपेटे में आ सकते हैं। बताते हैं कि चंदेला के बंगले के स्वीमिंग पूल के निर्माण पर करीब 70 लाख खर्च हुआ था। जिसमें से तत्कालीन कलेक्टर ने डीएमएफ फंड से 5 लाख दिए थे। बाकी की राशि का जुगाड़ स्थानीय बड़े ठेकेदारों के सहयोग से किया गया। 

स्वीमिंग पूल का उपयोग भी चंदेला से ज्यादा कलेक्टर, एसपी ही करते थे। चूंकि उस समय कांग्रेस नेताओं ने इसके निर्माण को लेकर काफी हल्ला मचाया था। अब सरकार में आने के बाद सबकुछ सच सामने लाने के लिए जांच कमेटी पर काफी दबाव होगा। अब देखना है कि कमेटी किस हद तक जांच करती है। 

वैसे इस भ्रष्टाचार से परे सैकड़ों और भ्रष्टाचार इस राज्य के बनने के बाद से हुए हैं, लेकिन यह भ्रष्टाचार जितना दर्शनीय है, उतना शायद ही कोई और भ्रष्टाचार हो। एक सरकारी बंगले में सरकारी या भ्रष्टाचारी पैसों से स्वीमिंग पूल बनवा दिया जाए, ऐसी बड़ी और दर्शनीय कोई दूसरी मिसाल सामने आई नहीं है। इसलिए सरकार के बड़े अफसरों में भी ऐसे तैराक के लिए कोई हमदर्दी नहीं है।
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06-Feb-2020

म्युनिसिपल से बेहतर
पंचायत चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन म्युनिसिपल चुनाव से बेहतर रहा है। म्युनिसिपल में तो पार्टी एक भी जगह अपना मेयर-सभापति नहीं बना पाई। मगर जिला पंचायतों में ऐसा नहीं होगा। कम से कम 4 जिला पंचायतों में भाजपा समर्थित अध्यक्ष बनना तय है। इनमें जशपुर, बलरामपुर, कवर्धा और बस्तर है। बाकी कुछ जगहों पर बढ़त के बावजूद अपना अध्यक्ष बनाने के लिए निर्दलियों का समर्थन हासिल करना जरूरी होगा। सुनते हैं कि पंचायत चुनाव के प्रभारी अजय चंद्राकर ने ज्यादा से ज्यादा जिलों में अपना अध्यक्ष बनाने के लिए रणनीति तैयार की है। 

कहा जा रहा है कि जिन जिलों में कांग्रेस-भाजपा, दोनों को बहुमत नहीं है, पार्टी वहां निर्दलियों को समर्थन देकर कांग्रेस को रोकने की कोशिश करेगी। यानी हर हाल में कांग्रेस समर्थित अध्यक्ष न बन पाए, इसके लिए भाजपा नेता एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। और अभी से निर्दलियों से चर्चा भी शुरू हो गई है। अजय की रणनीति सफल रही, तो पांच और जिलों में भाजपा समर्थित अध्यक्ष बन सकते हैं। अजय की रणनीति पूरी तरह सफल भले न हो, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के खेमे में हलचल मचा दी है। उन्होंने यह भी दिखाया कि वे अमर अग्रवाल जैसे बेदम नहीं हैं, जो कि खुद प्रभारी थे और अपने ही बिलासपुर म्युनिसिपल के मेयर चुनाव में मैदान छोड़ दिया था। 

इंदिरा का पुनर्जन्म !
राजस्थान शादी का एक दिलचस्प कार्ड अभी सामने आया है जिसमें कुछ बातों का मतलब निकालना भी मुश्किल है। वहां के करौली जिले के वैद्य हरिप्रसाद शर्मा (रमल ज्योतिषी) का भेजा कार्ड बताता है कि उन्हें गृहमंत्री अमित शाह से धन्यवाद प्राप्त हुआ है, महामहिम राष्ट्रपति कलाम, अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से धन्यवाद प्राप्त हुआ है। यह भी लिखा है कि रायबरेली संसदीय सीट से वे 1977 में चुनाव लड़े थे, और उन्हें 2703 वोट मिले थे। यह भी लिखा है कि वे भारत के राष्ट्रपति चुनाव में 2012-2017 में उम्मीदवार थे। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह लिखी हुई है कि इंदिरा गांधीजी पुनर्जन्म स्वरूप पुत्री यमुना के भ्राता का विवाह!

अब इन बातों का जो मतलब निकल सके, निकाल लें।

एक निजीकरण तो हो ही चुका है
केन्द्र सरकार बड़ी-बड़ी सरकारी कंपनियों के निजीकरण में लगी है। एयर इंडिया पूरी ही बिकने जा रही है, और एलआईसी का कुछ हिस्सा बिकने वाला है। ऐसे में रायपुर एयरपोर्ट पर पार्किंग ठेकेदारी के अंधाधुंध भ्रष्टाचार को एयरपोर्ट मैनेजमेंट जिस खूबी से बचा रहा है, उसके चलते लोगों का मानना है कि एयरपोर्ट का निजीकरण जब होना है, तब हो, फिलहाल तो एयरपोर्ट के मुखिया को सरकारी काम से आजाद करके पार्किंग ठेकेदारी में लगाना चाहिए। हैरानी इस बात की है कि रायपुर के भाजपा सांसद सुनील सोनी की अध्यक्षता में इस एयरपोर्ट के लिए बनी कमेटी के सामने भी इस भ्रष्टाचार के बारे में दर्जनों लोगों ने बताया है, लेकिन एयरपोर्ट मैनेजर की ताकत के सामने सांसद पानी भरते नजर आते हैं। यह भी संभव है कि अगले चार साल पार्किंग ठेकेदारी करने के बाद मैनेजर रायपुर से चुनाव लड़कर भी जीत जाए। 
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05-Feb-2020

निपटाने के चक्कर विधायक निपटे

वैसे तो पंचायत चुनाव में भी कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली है। लेकिन कुछ जिले जहां विधानसभा और म्युनिसिपल चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है, वहां हार का सामना करना पड़ा। मसलन, कोरिया, बस्तर, बलरामपुर और जशपुर में कांग्रेस समर्थित जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशियों को हार का मुख देखना पड़ा। 

पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि स्थानीय विधायक और जिला संगठन के बीच टकराव के कारण कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। बैकुंठपुर विधायक अंबिका सिंहदेव ने अपनी पसंद से प्रत्याशी तय करवाए थे। यहां से विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी वेदांती तिवारी चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन अंबिका ने किसी और को अधिकृत करवा दिया। हाल यह रहा है कि वेदांती अच्छे मतों से चुनाव जीत गए और कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे।

दरअसल, विधायकों को डर था कि आने वाले समय में जिला पंचायत के सदस्य विधानसभा टिकट के दावेदार हो सकते हैं। इसलिए उन्हें चुनाव मैदान से बाहर रखने की भरपूर कोशिश की और इन्हीं वजहों से अपनी फजीहत करा बैठे। बलरामपुर में तो स्थानीय विधायक  बृहस्पत सिंह और जिला अध्यक्ष के बीच मतभेद पहले से ही चल रहे थे। चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया। इससे पूरे जिले में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। बस्तर और जशपुर में भी कांग्रेस के विधायक पंचायतों में अपने करीबियों को बिठाने के चक्कर में पार्टी का नुकसान करा बैठे। 

एक पद, और एक ही नाम
कवर्धा जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर भाजपा का कब्जा तय हो गया है। खास बात यह है कि अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति महिला वर्ग के लिए आरक्षित है। जिला पंचायत के चुनाव में एक मात्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सदस्य पद में भाजपा समर्थित उम्मीदवार सुशीला रामकुमार भट्ट चुनाव जीती हैं। ऐसे में कांग्रेस चाहकर भी किसी दूसरे को अध्यक्ष नहीं बना सकती। सुशीला रामकुमार भट्ट का जिला पंचायत अध्यक्ष बनना तय है। हालांकि यहां भाजपा समर्थित प्रत्याशी ज्यादा संख्या में जीतकर आए हैं, लेकिन दोनों दलों से अलग हटकर चुनाव जीतने वालों को मिलाकर कांग्रेस अपना अध्यक्ष बनाने की कोशिश में थी। मगर पार्टी के रणनीतिकारों को झटका लगा है। अध्यक्ष पद खोने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष पद पर अपनी ताकत झोंकेगी। गौर करने लायक बात यह है कि कुछ इसी तरह की स्थिति 10 साल पहले के जिला पंचायत चुनाव में भी बनी थी। जब अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट पर कांग्रेस का कब्जा हो गया था। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सदस्य पद पर कांग्रेस की सीमा अनंत चुनाव जीती थीं और भाजपा के रणनीतिकारों ने उन्हें अपने दल में शामिल करने की कोशिश भी की थी, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल पाई थी। 

बजट को ऐसे समझें...
सोशल मीडिया भी बजट के बड़े मजे ले रहा है। एक पोस्ट-
मेरी कामवाली बाई ने कहा कि..वित्तमंत्री ने आपको टैक्स में बहुत बड़ी राहत दी है मेरी भी सैलरी बढ़ा दो। 
मैंने कहा ठीक है। तुम्हारे 500 रूपए बढ़ा देता हूं। लेकिन साल भर होली-दीपावली की गिफ्ट नहीं मिलेगी। 
अब तुम्हारे पास दो विकल्प हैं। गिफ्ट चाहिए तो पुराने वेतन पर काम करो या तो बढ़ा हुआ वेतन ले लो। 
कामवाली ने अभी तक जवाब नहीं दिया है। शायद सी.ए. से विचार-विमर्श करेगी?

(rajpathjanpath@gmail.com)


04-Feb-2020

विष्णुदेव साय की दूसरी पारी

वैसे तो आधा दर्जन नेता प्रदेश भाजपा संगठन के मुखिया बनने की होड़ में हैं, लेकिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय का नाम तकरीबन तय होने का हल्ला है। साय से परे, लोकसभा चुनाव में प्रदेश से सर्वाधिक वोटों से जीतकर आए दुर्ग सांसद विजय बघेल का नाम प्रमुखता से उभरा है। तेज तर्रार और साफ छवि के विजय को अग्रिम बधाई भी मिल रही है। मगर पार्टी के अंदरूनी सूत्र बता रहे हैं कि विजय बघेल को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा सिर्फ मीडिया तक ही सीमित है। यह बात सर्वविदित है कि विजय ने पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय से संगठन चुनाव के दौरान सीधी टकराहट मोल ले ली थी। सरोज का दिल्ली में असर बरकरार है। ऐसे में अब कहा जा रहा है कि विजय का प्रदेश अध्यक्ष बनना तो दूर, वे अपनी पसंद से भिलाई-दुर्ग में जिलाध्यक्ष ही बना पाते हैं, तो काफी होगा। 

सुनते हैं कि विष्णुदेव साय के नाम पर बड़े नेताओं में सहमति बन गई है। उनका नाम आगे करने में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, सौदान सिंह की अहम भूमिका रही है। विष्णुदेव साय एक बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। केन्द्रीय मंत्री रहनेे के बावजूद उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं दी गई। हालांकि अभी भी पार्टी के कई नेताओं को उम्मीद है कि पार्टी किसी तेज-तर्रार नेता को आगे बढ़ाएगी। कुछ इसी तरह की उम्मीद नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान भी रही है। ऐन वक्त में प्रदेश अध्यक्ष रहते धरमलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष का भी दायित्व सौंपा गया था। ऐसे में अब सीधे-साधे विष्णुदेव साय को मुखिया बनाया जाता है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुल मिलाकर माहौल यह दिख रहा है कि रमन सिंह से परे के कोई नेता छत्तीसगढ़ भाजपा में अभी महत्व पाते नहीं दिख रहे हैं। 

जात में क्या रक्खा है, या सब रक्खा है?
शराब के खिलाफ आंदोलन करने वाले रायपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता निश्चय वाजपेयी ने फेसबुक पर लिखा है-आज अश्वनी साहू भाई के साहू भोजनालय कुम्हारी मे खाना खाया। भाई ने ब्राह्मण को भोजन कराया है यह बोलकर पैसा नहीं लिया। भुगतान करने के मेरे सारे प्रयास असफल हुए। रामजी भाई के व्यापार मे दिन दूनी-रात चौगनी बढ़ोत्तरी दें। भाई का बहुत आभार एवं धन्यवाद।

अब इस पर यह चर्चा चल रही है कि एक संपन्न ब्राम्हण को खिलाने से भी पुण्य मिल सकता है, या इसके लिए ब्राम्हण का विपन्न होना जरूरी है? या फिर जाति देखे बिना सिर्फ विपन्न को खिलाना बेहतर है? 

दरअसल हिन्दुस्तानी समाज में जाति इतने गहरे बैठी हुई है कि उससे परे कुछ सोच पाना मुश्किल रहता है। किसी ट्रेन या बस में सफर करते हुए बगल के मुसाफिर से बात करने के पहले लोग उसके धर्म, और उसकी जाति का अंदाज बिना किसी कोशिश के लगाने लगते हैं। पहरावे से, धार्मिक प्रतीकों से तो धर्म और जाति का अंदाज लगता ही है, नाम सुनने पर नाम के साथ उपनाम से भी जाति का अंदाज लग जाता है। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ में एक अनुसूचित जाति और ब्राम्हणों के बीच बहुत से उपनाम एक सरीखे हो गए हैं, तो उससे धोखा भी हो सकता है। फिर हिन्दुस्तान में जाति के संदर्भ में अगर कोई अपमानजनक बात कही जाती है तो भी उसमें कुछ मामलों में एक कानून लागू होता है, और अपमान खतरनाक हो सकता है। 

दिक्कत वहां पर अधिक होती है जहां लोग जातिसूचक उपनाम नहीं लिखते हैं, और केवल नाम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अगल-बगल के मुसाफिरों को यह शक होता है कि यह किसी नीची समझी जाने वाली जाति का ही होगा, तभी जाति को छिपा रहा है। 

दिलचस्प बात यह है कि एक जाति के होने की वजह से एक-दूसरे को बचाने की उम्मीद ऊंची समझी जाने वाली जातियों में कुछ अधिक होती है। कोई एक कानूनी दिक्कत में है, तो उसकी दूसरों से उम्मीद रहती है कि वे अगर उसकी जाति के हैं, तो उसकी मदद करेंगे ही करेंगे, या करें ही करें। 

खैर, आधे मजाक और आधी गंभीरता से शुरू यह बात बहुत लंबी चल सकती है, बाकी अगली बार कभी।  (rajpathjanpath@gmail.com)


03-Feb-2020

रेणुका सिंह का क्या होगा?

निशक्तजन संस्थान में घपले की सीबीआई जांच के आदेश से प्रदेश के राजनीतिक-प्रशासनिक गलियारों में खलबली मची हुई है। जांच के घेरे में रमन सरकार के पहले कार्यकाल में समाज कल्याण मंत्री रहीं रेणुका सिंह भी आ गई हैं। वे मात्र 18 महीने मंत्री रहीं। तब संस्थान का सिर्फ गठन हुआ था और थोड़ा बहुत खर्च हुआ था। उनसे अब इस पूरे मामले पर जवाब मांगा जा रहा है। हल्ला तो यह भी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। 

सुनते हैं कि सीबीआई जांच के आदेश से रेणुका सिंह काफी परेशान है। वे सफाई दे रहीं हंै कि उनका इस घपले से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। चर्चा तो यह भी यह है कि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को फोन कर अपनी तरफ से सफाई दी है। मगर नड्डा की तरफ से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। दूसरी तरफ, पार्टी के भीतर चर्चा है कि  रेणुका सिंह को ज्यादा कोई समस्या नहीं है, लेकिन उनके बाद समाज कल्याण विभाग का दायित्व संभालने वाली लता उसेंडी और रमशीला साहू को दिक्कत हो सकती है, क्योंकि संस्थान में अनियमितता इन्हीं दोनों के कार्यकाल में ज्यादा हुई हैं। 


मुस्लिमों के बीच भाजपा धराशायी
एनआरसी और सीएए कानून का चौतरफा विरोध हो रहा है। इस कानून के खिलाफ विशेषकर मुस्लिम समाज के लोग सड़कों पर उतर आए हंै। पहले भाजपा को मुस्लिम विरोध के चलते वोटों का ध्रुवीकरण की उम्मीद पाले थी और राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर वर्ष-2024 के लोकसभा चुनाव में फायदे की उम्मीद थी। अब धीरे-धीरे उम्मीदों को झटका लगता दिख रहा है। भाजपा सांसद मोदी सरकार के खिलाफ बनते माहौल को लेकर चिंतित दिख रहे हैं। पार्टी के अंदरखाने में इसको लेकर बहस चल रही है।

एक विवाह कार्यक्रम में शिरकत करने आए पड़ोसी राज्य के एक भाजपा सांसद ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि शुरू में लग रहा था कि एनआरसी-सीएए कानून से भाजपा को बड़ा फायदा होगा। मगर पहले धारा-370, फिर राम मंदिर पर फैसला और अब एनआरसी-सीएए के चलते मुस्लिम समाज तकरीबन पूरी तरह भाजपा के खिलाफ हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पार्टी फोरम में इस बात को लेकर चर्चा हुई थी और सभी सांसदों को मुस्लिम समाज के बीच में जाकर कानून को लेकर गलतफहमी दूर करने के लिए कहा गया था। 

इस सांसद ने आगे कहा कि जब वे अपने लोकसभा क्षेत्र के मुस्लिम बस्तियों में गए, तो पाया कि निचले तबके के लोगों को कानून को लेकर कोई जानकारी नहीं है, फिर भी वे इसको अपने खिलाफ मान रहे हैं। भाजपा विरोधी लगातार इसको हवा दे रहे हैं। हाल यह है कि मुस्लिम समाज के अन्य वर्ग जैसे कि शिया, बोहरा, अहमदिया और खोजा तबके के लोग भाजपा समर्थक रहे हैं, वे भी अब दूर होते दिख रहे हैं। इस कानून के चलते तकरीबन पूरा मुस्लिम समाज भाजपा के खिलाफ हो गया है। वे मानते हैं कि मोदी सरकार और पार्टी को जल्द ही कानून से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए तत्काल कोई कदम उठाना होगा। 

रायपुर के एक नेता ने कहा कि एनआरसी-सीएए कानून के चलते म्युनिसिपल चुनाव तक में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। रायपुर के एक वार्ड में तो मुस्लिम समाज के भाजपा प्रत्याशी को अपने ही समाज के वोट भी नहीं मिल पाए। समाज के लोगों ने बैठक कर भाजपा प्रत्याशी को साफ तौर पर बता दिया था कि उन्हें समाज के लोगों का वोट नहीं मिलेगा। मुस्लिम समाज के लोगों ने एकमुश्त गैर मुस्लिम कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया। 

ऐसा नहीं है कि पार्टी स्तर पर कानून को लेकर मुस्लिम समाज के लोगों के बीच गलतफहमियां दूर करने की कोशिश नहीं की गई है। एक भाजपा नेता ने बताया कि पूर्व सीएम रमन सिंह का एनआरसी-सीएए को लेकर भ्रांतियां  दूर करने मुस्लिम बाहुल्य इलाके बैजनाथ पारा में कार्यक्रम प्रस्तावित था। मगर समाज के लोगों ने शर्त जोड़ दी कि पूर्व सीएम को हमारी बातें पूरी सुननी पड़ेगी। हड़बड़ाए भाजपा नेताओं ने पुलिस अफसरों की समझाइश के बाद कार्यक्रम निरस्त करना उचित समझा। 

जब तक हॉर्न प्लीज लिखा रहेगा...
मुम्बई पुलिस ने अभी एक नया इंतजाम किया है कि चौराहों के रेड लाईट पर रूकने वाली गाडिय़ां अगर हर बत्ती जल्दी बुलाने की हसरत में हॉर्न अधिक बजाएंगी, तो उनके शोर को भांपकर उनके सामने की लालबत्ती को कुछ और लंबा कर दिया जाएगा। 

हिन्दुस्तानी सड़कों पर शोर का ऐसा बुरा हाल है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट लगातार कई किस्म के फैसले दे चुके हैं, यह एक अलग बात है कि उन पर कोई अमल करने में शासन-प्रशासन की दिलचस्पी नहीं है। दरअसल ट्रकों और बसों के पीछे, छोटे-छोटे कारोबारी वाहनों के पीछे जिस तरह हॉर्न प्लीज लिखा रहता है उससे लोगों की सोच ऐसी हो जाती है कि हॉर्न बजाना ही है। और सामने चूंकि गाड़ी यह अनुरोध कर ही रही है कि कृपया हॉर्न बजाएं, तो पीछे के लोग उसकी फरमाईश पूरी करते चलते हैं। गाडिय़ों के पीछे यह लिखने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए, और यह लिखवाना चाहिए कि हॉर्न न बजाएं। इसमें एक दिक्कत जरूर आ सकती है कि हिन्दुस्तानी ट्रैफिक सड़क के नियमों के बजाय हॉर्न की आवाज सुनकर ही ठीक हो पाता है, और बिना हॉर्न इसमें कुछ गड़बड़ हो सकती है, शायद शुरू के कुछ वक्त। 

लेकिन पुलिस और आरटीओ विभागों का हाल देखें, तो जिन बड़ी बसों और ट्रकों से इन्हें सबसे अधिक संगठित रिश्वत मिलती है, उन गाडिय़ों में जो बड़े-बड़े प्रेशर हॉर्न लगाकर रखते हैं, और जो उनकी अंधाधुंध रफ्तार के लिए जरूरी रहते हैं, उन पर रोक न तो सुप्रीम कोर्ट लागू कर पाया, न किसी प्रदेश का हाईकोर्ट। (rajpathjanpath@gmail.com)


02-Feb-2020

नाम में राम, पर मारा था मोहन को...
नाम में क्या रखा है। दिल्ली में अभी रामभक्त गोपाल ने बेकसूरों पर पिस्तौल लहराई, धमकियां दीं, लोगों को गद्दार कहा, और गोली चलाकर एक को घायल भी कर दिया। नाम में गोपाल भी था, और अपने आपको वह फेसबुक पर रामभक्त भी लिखता था। इसी तरह दुनिया के कई देशों में आतंकी हमले करने वाले लोगों के नाम के साथ कहीं मोहम्मद लिखा होता है, तो कहीं किसी और धर्म का नाम। नामों का ही अगर असर हुआ होता तो फिर नाथूराम ने गांधी को क्यों मारा होता? उसके नाम राम था, और गांधी के नाम में मोहन था। इन दो युगों के बीच ऐसी हिंसा की गुंजाइश क्यों निकलनी थी? 

अब इधर छत्तीसगढ़ में रेलवे के लोहे की इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ाई है तो चोरी का माल खरीदने वाले जिन दो कारखानों से जब्ती हो रही है, उनमें से एक का नाम हिन्दुस्तान क्वाइल लिमिटेड है, और दूसरे का नाम इस्पात इंडिया फैक्ट्री। नाम में हिन्दुस्तान भी है, और इंडिया भी, और ये दोनों हिन्दुस्तानी या इंडियन रेलवे से चोरी की गई पटरियों को गलाकर लोहा बनाते पकड़ाए हैं, और कारखानों में खूब सा लोहा भी बरामद हुआ है। इसलिए नामों के फेर में नहीं पडऩा चाहिए कि नाम भला होगा तो इंसान या कारोबार भी भले होंगे। 

निरर्थक स्वागतद्वारों पर फिजूलखर्च
छत्तीसगढ़ के पहले विश्वविद्यालय, पंडित रविशंकर शुक्ल विवि का इलाका नए और बाद में बने विश्वविद्यालयों की वजह से कटते-कटते अब केवल पुराने रायपुर जिले जितना बच गया है। आज से बीस बरस पहले जो रायपुर जिला महासमुंद, धमतरी, गरियाबंद, बलौदाबाजार को मिलाकर बना था, उसमें अब ये सब जिले बनकर हट गए और सिर्फ आज का रायपुर जिला छोटा सा रह गया है। रविशंकर विश्वविद्यालय फिलहाल अविभाजित रायपुर जिले जितना बड़ा है। अब इस विश्वविद्यालय में एक दूसरी दिशा में एक सड़क निकाली जा रही है जहां पर एक नया गेट बनाने की घोषणा रजिस्ट्रार गिरीशकांत पांडेय ने आज सुबह फेसबुक पर की है। 

हिन्दुस्तान में छोटी सी छोटी पंचायत, या गांव-कस्बे में भी गेट बनाना एक बड़ा ही लोकप्रिय काम है। जिस कस्बे में एक भी सार्वजनिक शौचालय न हो, वहां भी पांच-दस लाख रूपए लागत का एक स्वागतद्वार या गेट बना दिया जाता है। आज भी रविशंकर विश्वविद्यालय में जो अकेला प्रवेशद्वार है, वह इतना बड़ा और महंगा ढांचा है कि वह तस्वीरों में कई बार गिरौदपुरी में बनाए गए विशाल जैतखंभ जैसा दिखता है। इस गेट से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में कोई इजाफा नहीं होता। इतनी रकम की किताबें अगर लाइब्रेरी में ले ली जातीं, लाइब्रेरी को रात-दिन चौबीसों घंटे खुलने लायक बनाया जाता तो शायद यूनिवर्सिटी की इज्जत बढ़ती। लेकिन किसी गांव-देहात की तरह विश्वविद्यालय को भी स्वागतद्वार और गेट बनाने का शौक है। 

इंटरनेट पर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की तस्वीरों को सर्च करें, तो उनकी सैकड़ों तस्वीरों में भी कोई स्वागतद्वार नहीं दिखता है।

लोगों को याद रहना चाहिए कि पिछली सरकार में जब अजय चंद्राकर कुछ समय पर्यटन मंत्री भी थे, उन्होंने रायपुर-धमतरी सड़क से चंद्राकर के कस्बे कुरूद जाने वाली सड़क पर डेढ़-पौने दो करोड़ रूपए की लागत से स्वागतद्वार बनवाया था। उसकी वजह से एक पर्यटक भी कुरूद की ओर मुड़ा हो ऐसा नहीं लगता, लेकिन कोई शहर-कस्बा अपनी बाकी खूबियों से लोगों का स्वागत करे, उसके बजाय स्वागतद्वार का महंगा निर्माण करना सत्ता की एक रहस्यमय चाह रहती है। इसी तरह पूरी प्रदेश में पिछले बरसों में जगह-जगह ताकतवर मंत्रियों और विधायकों ने अपने इलाकों में पर्यटन-रिसॉर्ट बनवा दिए जो कि अब खंडहर हो रहे हैं। उन्हें ऐसी जगह बनाया गया जहां किसी पर्यटक के पहुंचने की संभावना नहीं थी, और अब आसपास निर्माण का ठेका लेने वाले ठेकेदार ऐसे रिसॉर्ट को अपने गोदाम की तरह इस्तेमाल करते हैं।
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01-Feb-2020

भाजपा में गुटबाजी-असंतोष
खबर है कि प्रदेश भाजपा में गुटबाजी से हाईकमान चिंतित है। कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के बड़े नेताओं के बीच खाई और बढ़ गई है। इस वजह से पहले विधानसभा उपचुनावों और फिर म्युनिसिपल चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। पंचायत चुनाव में भी कोई अच्छे आसार नहीं दिख रहे हैं। खुद अमित शाह के कार्यक्रम में गुटबाजी का नजारा साफ देखने को मिला। 

वैसे तो शाह करीब 2 घंटे कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में रहे। मगर मंच संचालन से लेकर स्वागत और मेल-मुलाकात संगठन में हावी नेताओं तक ही सीमित रहा। दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर और प्रेम प्रकाश पांडेय, नारायण चंदेल जैसे दिग्गज नेताओं को मंच पर बिठाना तो दूर, स्वागत सत्कार के लिए भी नहीं बुलाया गया। स्वागत भाषण से लेकर सत्कार और मेल-मुलाकात का पूरा कार्यक्रम संगठन पर हावी मंचस्थ 4-5 नेताओं तक ही सीमित रहा। जबकि कुछ नेता प्रदेश संगठन की स्थिति को लेकर अपनी बात अमित शाह तक पहुंचाना चाहते थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला।

सुनते हैं कि पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर दिल्ली में कई बड़े नेताओं से मिलकर कार्यकर्ताओं में बढ़ते असंतोष की तरफ ध्यान दिला चुके हैं। यह भी कहा गया है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी का अब तक का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में दोनों में से कम से कम एक को बदलने पर जोर दिया जा रहा है। मगर कंवर जैसे नेताओं की शिकायतों को कितना महत्व मिलता है, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा, फिलहाल तो पिछले बरसों का इतिहास बताता है कि ननकीराम कंवर के पिछले दस बरस महज पार्टी के भीतर के असंतुष्ट की हैसियत से गुजरे हैं। वे जब गृहमंत्री थे, तब भी सरकार के भीतर कुछ जायज, या नाजायज वजहों से वे असंतुष्ट ही बने रहते थे।

पैसे वाला होना, और ईमानदार होना...
कुछ लोगों को यह लगता है कि जिनके पास बहुत पैसा है, वे लोग गलत तरीके से पैसा क्यों कमाएंगे? एक वक्त था जब चुनाव में किसी उम्मीदवार को वोट देते समय लोग यह चर्चा करते थे कि उसके पास पहले से इतना पैसा है, तो कम से कम लूटपाट तो नहीं करेगा। लेकिन ऐसे लोग भी जीतने के बाद करोड़पति से अरबपति, और अरबपति से खरबपति बनने के लिए मुंह पर गमछा बांधे बिना ही सरकारी लूटपाट में लग जाते थे, और धीरे-धीरे यह तर्क बेअसर हो गया। अब कुछ लोग गरीब को वोट देने की बात जरूर करते हैं कि उसे गरीबी में जीने की आदत है, और हो सकता है कि वह ईमानदारी से राजनीति और सरकार चला ले। 

लेकिन छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े रईसों के ऐसे-ऐसे भ्रष्टाचार, और आर्थिक अपराध सामने आए हैं कि लोगों को लगता है कि इनको जरूरत क्या थी? छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सेठ कहलाने वाले परिवार के अरबपति माने जाने वाले वारिस कुछ करोड़ की धोखाधड़ी में पूरे कुनबे सहित जेल और कटघरे में हैं। 

अभी बंगाल के कोलकाता में दो बड़े कारोबारियों के नौजवान लड़कों ने दर्जनों महिलाओं और लड़कियों के साथ अपने सेक्स-वीडियो बनाए, और उनको ब्लैकमेल करके उनसे पांच-दस लाख रूपए जैसी रकम वसूल करना शुरू किया। पुलिस को इनके जब्त किए गए लैपटॉप से ऐसे दर्जनों वीडियो मिले हैं, और इन दोनों रईस नौजवानों को गिरफ्तार किया गया है। इसलिए लोगों को किसी की संपन्नता की वजह से उसके मुजरिम न होने जैसी बात नहीं सोचना चाहिए। घर का रईस होना, करोड़पति या अरबपति होना किसी को जुर्म से परे रख पाए ऐसा जरूरी नहीं है। 


(rajpathjanpath@gmail.com)


31-Jan-2020

प्रकाश बजाज पर सनसनी

भाजपा नेता प्रकाश बजाज एक बार फिर सुर्खियों में है। बजाज चर्चित सेक्स-सीडी कांड के शिकायतकर्ता रहे हैं। उनके खिलाफ छेड़छाड़ और धोखाधड़ी के कई गंभीर आरोप हैं। बजाज को नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक का करीबी माना जाता है। सुनते हैं कि प्रकाश बजाज ने पिछले दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। बजाज के साथ एक प्रतिनिधिमंडल भी था। 

बजाज की अमित शाह से मुलाकात ऐसे समय में हुई जब पार्टी के बड़े नेता उनसे मुलाकात के लिए मशक्कत कर रहे थे, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला। सिर्फ चार प्रतिनिधिमंडलों को मुलाकात के लिए समय दिया गया था। इन्हीं में से एक के साथ प्रकाश बजाज भी अमित शाह से मिलकर आ गए। पार्टी के अंदरखाने में प्रकाश बजाज को अमित शाह से मुलाकात के लिए समय दिलाने की तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। हालांकि कुछ लोग बजाज की अमित शाह से मुलाकात का खंडन भी कर रहे हैं। 

पार्टी के कई नेताओं ने मुलाकातियों की सूची निकलवाई भी है, जिसमें आखिरी में प्रकाशजी लिखा है। दावा किया जा रहा है कि उनके सरनेम को जानबूझकर छोड़ दिया गया, ताकि कोई विवाद न हो। प्रकाश बजाज की अमित शाह से क्या चर्चा हुई है, इसको लेकर उत्सुकता भी है। इस संवाददाता ने प्रकाश से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका मोबाइल बंद मिला। मगर जिस व्यक्ति के खिलाफ कई गंभीर आरोप हैं और कुछ दिन पहले तक जेल में रहा है उसे केन्द्रीय गृहमंत्री से मुलाकात कराने की शिकायत पार्टी हाईकमान से भी की जा रही है। इस मामले में कुछ बड़े नेता निशाने पर भी हैं। 

हाईकोर्ट का फैसला, और अटकलें...
सरकार और सियासत से जुड़े हुए लोगों की अटकल लगाने की क्षमता अपार होती है। कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक बड़ा कड़ा फैसला आया जिसमें पिछली सरकार के कार्यकाल में नि:शक्तजनों के लिए सरकार से अपार पैसा लिया गया, और उसे इधर-उधर कर दिया गया। अदालत ने इस मामले की जांच सीबीआई को दे दी, और जांच के घेरे में राज्य के कुछ सबसे बड़े अफसर रहे लोगों के नाम आ रहे हैं। ये नाम हक्का-बक्का कर रहे हैं। अब चूंकि इस मामले में अदालत ने राज्य सरकार से भी जवाब मांगा था, इसलिए यह अटकल भी लग रही है कि क्या सरकार इन अफसरों में से कुछ, या कई, या सभी को जांच में फंसने देना चाहती है? फैसला अदालत का है, लेकिन अदालत में सरकार का पक्ष तो सरकार ही रखती है, और उसी बात को लेकर कल रात राज्य में जगह-जगह यह अटकलबाजी चल रही थी। 

ठीक इसी तरह की अटकलबाजी इस बात को लेकर भी चल रही थी कि सीबीआई इस मामले में क्या रूख दिखाएगी। देश की यह सबसे बड़ी जांच एजेंसी लंबे वक्त बाद छत्तीसगढ़ में अदालती आदेश से किसी जांच में आने का एक मौका पा रही है, और इस बात को लेकर भी राज्य के कुछ लोगों में बेचैनी है, हालांकि सीबीआई यहां किसी और केस की जांच नहीं कर पाएगी, और इस मामले में भी तकरीबन सारे लोग रिटायर हो चुके हैं, या सरकार की फिक्र उन्हें लेकर नहीं है। अब चूंकि सीबीआई केन्द्र सरकार के मातहत है, इसलिए लोग यह अटकल भी लगा रहे हैं कि क्या भाजपा सरकार के दौरान का यह बड़ा मामला पूरी तरह हल किया जाएगा, या फिर सीबीआई कुछ नरमी बरतेगी? सीबीआई के कामकाज की जानकारी रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि उसकी जांच में बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं डाला जा सकता, और अगर कागजात भ्रष्टाचार बताएंगे, तो वह बात जांच में आ ही जाएगी। 

फिलहाल यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक सबसे बड़ा भ्रष्टाचार दिख रहा है, और सबसे बड़े नामों वाला भी। आगे पता लगेगा कि इसके लिए कौन कुसूरवार पाए जाते हैं। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


30-Jan-2020

आदिवासी भाजपा नेताओं में तलवारें
भाजपा के दो पूर्व गृहमंत्री रामविचार नेताम और रामसेवक पैंकरा के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई है। नेताम की पत्नी पुष्पा नेताम जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ रही हैं। पुष्पा जिस क्षेत्र से चुनाव लड़ रही है, वह प्रतापपुर विधानसभा का हिस्सा है, जहां से पैकरा विधायक रह चुके हैं। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में पैकरा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। सुनते हैं कि पैंकरा कतई नहीं चाहते थे कि रामविचार की पत्नी प्रतापपुर इलाके से चुनाव लड़े। 

नेताम अपनी पुत्री को तो अपने विधानसभा क्षेत्र रामानुजगंज से चुनाव लड़ा रहे हैं, लेकिन पत्नी को दूसरे के इलाके से चुनाव मैदान में उतार दिया है। पुष्पा चुनाव जीत जाती है, तो प्रतापपुर में रामविचार की दखल बढ़ जाएगी। वैसे भी रामानुजगंज के बजाए रामविचार प्रतापपुर विधानसभा सीट को अपने लिए ज्यादा बेहतर मानते हैं। यही वजह है कि वे अपनी पत्नी को जिताने के लिए मेहनत कर रहे हैं। दूसरी तरफ पार्टी के स्थानीय नेताओं के बीच चर्चा है कि पैंकरा से जुड़े लोग कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार को मदद कर रहे हैं। ऐसे में पुष्पा की राह आसान नहीं रह गई है। फिलहाल जानकारों की नजर इस हाईप्रोफाइल बन चुके जिला पंचायत सीट पर टिकी हैं।

देवव्रत ने पलटी मारी
वैसे तो म्युनिसिपल चुनाव में जोगी पार्टी के विधायक देवव्रत सिंह ने  कांग्रेस का साथ दिया था। मगर पंचायत चुनाव में उन्होंने पलटी मार दी। उन्होंने अपने खैरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के जिला पंचायत के चुनाव में पूर्व सीएम रमन सिंह के भांजे विक्रांत सिंह को सपोर्ट किया। देवव्रत की मेहनत का ही नतीजा है कि विक्रांत किसी तरह चुनाव जीतने में सफल रहे। सुनते हैं कि देवव्रत ने अपने इलाके में लोधी फैक्टर को कमजोर करने के इरादे से ऐसा किया है। 

खैरागढ़ में लोधी समाज के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। एक बार देवव्रत की पत्नी लोधी फैक्टर के चलते हार गई थी। खुद विधानसभा का चुनाव सिर्फ इस वजह से जीत पाए कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही लोधी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। लोधी मतों के बंटने का फायदा देवव्रत को मिला और वे किसी तरह चुनाव जीतने में सफल रहे। हल्ला यह भी है कि विधानसभा चुनाव में विक्रांत और उनके समर्थकों ने देवव्रत का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया था। ऐसे में देवव्रत ने विक्रांत को सहयोग किया है, तो गलत नहीं है। वैसे भी देवव्रत को छोड़कर जोगी पार्टी के अन्य विधायक भाजपा के ज्यादा करीब दिख रहे थे। अब देवव्रत भी इसी राह पर जा रहे हैं। 

हवा बदली है समझो साहब...
छत्तीसगढ़ सरकार में अफसरों को भाजपा सरकार के तीन कार्यकाल के बाद बदले हुए माहौल को समझने में थोड़ा सा वक्त लग रहा है। आज गांधी पुण्यतिथि पर देश भर में केन्द्र सरकार के निर्देश पर लंबे समय से शहीद दिवस मनाया जाता है। केन्द्र सरकार के ही निर्देश का ही जिक्र करते हुए राज्य शासन ने कल एक आदेश निकाला जिसमें स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले लोगों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा गया। यह आदेश हर बरस से चले आ रहा है, और केन्द्र सरकार में भी यूपीए के समय का है। इसमें गांधी की शहादत की सालगिरह का कोई जिक्र नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नई कांग्रेस सरकार लगातार गांधी को एक मुद्दा बनाकर एक वैचारिक लड़ाई लड़ते आ रही है। ऐसे में इस सर्कुलर में गांधी का जिक्र भी न होना थोड़ा सा अटपटा था, फिर चाहे वह प्रतिवर्षानुसार ही क्यों न हो, चाहे वह केन्द्र सरकार के सर्कुलर के अनुसार ही क्यों न हो। बीती रात जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ध्यान इस तरफ खींचा गया, तो उन्होंने खासी नाराजगी जाहिर की, और उसके बाद हड़बड़ी में स्कूल शिक्षा विभाग का एक सर्कुलर निकाला गया जिसमें आज गांधी पुण्यतिथि पर दो मिनट के मौन का जिक्र किया गया। 

कुछ ऐसा ही हाल मुख्यमंत्री की उस घोषणा का हुआ था जो कुछ महीने पहले उन्होंने विधानसभा में की थी। स्कूलों में संविधान का पाठ पढ़ाया जाएगा, इसकी घोषणा के बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग ने ऐसा कोई आदेश नहीं निकाला था, और न ही कोई योजना बनाई थी। अभी चार दिन पहले स्कूल शिक्षा के नए प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के आने के बाद ऐसा आदेश निकला और स्कूलों में संविधान पर चर्चा शुरू होने जा रही है। सरकार में कामकाज बंधी-बंधाई लीक पर चल रहा है, और देश-प्रदेश में बदली हुई सोच की कोई झलक उसमें कम ही दिखाई पड़ती है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


29-Jan-2020

जनसंपर्क की बदली हवा

सरकार बदलने के बाद जनसंपर्क विभाग के कामकाज में काफी बदलाव देखने को मिला है। आमतौर पर जनसंपर्क विभाग के सचिव-संचालक का पद काफी प्रतिष्ठा और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। पिछली सरकार में तो इन पदों पर तैनात अफसरों पर राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त रहने और विपक्षी नेताओं की सीडी बनवाने जैसे संगीन आरोप तक लगे थे। विभाग के कई अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। इन सबको देखकर सीएम भूपेश बघेल ने साफ-सुथरी छवि के अफसरों की पोस्टिंग की। अब डीडी सिंह को सरकार के प्रचार-प्रसार का जिम्मा दिया गया है। 

डीडी सिंह प्रदेश के उन चुनिंदा अफसरों में से हैं, जो राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए और केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव पद के लिए सूचीबद्ध हुए हैं। उनकी साख काफी अच्छी है। उनके मातहत संचालक तारण प्रकाश सिन्हा को भी डीडी सिंह की तरह नियम-कायदे पसंद और लो-प्रोफाइल में रहकर काम करने वाला अफसर माना जाता है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह पहला मौका है कि जनसंपर्क सचिव के पद पर राज्य का ही एक आदिवासी अफसर नियुक्त हुआ है। डीडी सिंह के पहले झारखंड के आदिवासी राजेश सुकुमार टोप्पो इस विभाग के विशेष सचिव और प्रभारी सचिव रहे, लेकिन उनके कार्यकाल का अंत बहुत ही खराब हुआ।

खास बात यह है कि डीडी सिंह और तारण सिन्हा, दोनों ही अफसर छत्तीसगढिय़ा हैं और उनकी अपनी नौकरी का ज्यादा हिस्सा छत्तीसगढ़ में ही गुजरा है। बरसों बाद ऐसा मौका आया है जब मीडिया पर सरकारी तंत्र का कोई दबाव नहीं दिख रहा है। न सिर्फ दोनों बल्कि विभाग के अन्य अफसर पर चुपचाप लो-प्रोफाइल में काम करते दिख रहे हैं। इसका नजारा गणतंत्र दिवस के संवाद दफ्तर के ध्वाजारोहण कार्यक्रम में उस वक्त देखने को मिला, जब संवाद के प्रमुख उमेश मिश्रा ने खुद ध्वजारोहण करने के बजाए सबसे पुरानी महिला सफाईकर्मी से ध्वजारोहण कराकर सामाजिक भागीदारी और बराबरी का संदेश देने की कोशिश की।

बीच में एक समय ऐसा भी आया था जब रमन सिंह के एक जनसंपर्क सचिव अपने और अपने पिता के प्रचार में लगे रहते थे, और मीडिया से विभाग के संबंध सबसे खराब स्तर पर पहुंच गए थे। बाद में जब इस सचिव को गंभीर शिकायतों के चलते जनसंपर्क से हटाया गया, तो साथ-साथ उसका मलाईदार विभाग आबकारी भी चले गया था।

कमाई का जरिया बढ़ा...
जिला स्तर पर सरकारी अफसरों की कमाई के कुछ बंधे-बंधाए जरिये होते हैं। कुछ विभाग ही कमाऊ होते हैं जो विभागीय अफसरों के लिए और उनके ऊपर के अफसरों के लिए नियमित कमाई जुटाते रहते हैं। अब छत्तीसगढ़ में ऐसी कमाई में एक बड़ा इजाफा रेत की खदानों को लेकर हुआ है। सरकार ने रेत खदानों नीलामी की, तो अधिकतर पुराने शराब ठेकेदारों ने अपने लोगों के नाम से लॉटरी डाली, और जगह-जगह उनको खदानें मिल गई हैं। एक वक्त रेत खदान चलाने वाले छोटे लोग रहते थे, लेकिन अब जब कलेक्ट्रेट में यह बात साफ हो गई है कि किन नामों के पीछे कौन से अरबपति भूतपूर्व दारू ठेकेदार हैं, तो रेत से भी अफसरों को दारू जैसी कमाई की उम्मीद बंध गई। खनिज विभाग के अफसर रेत खदानों के एग्रीमेंट के पहले अपना हिस्सा भी रखवा रहे हैं, और अपने से ऊपर वालों का भी। नतीजा यह है कि कारोबार शुरू होने के पहले बड़ा पूंजीनिवेश हुए जा रहा है। एक जिले में कलेक्टर ने इतना बड़ा मुंह फाड़ दिया है कि खदान पाने वाले ने काम छोड़ देना तय किया है। खनिज अफसर अधिक व्यवहारिक रहते हैं, इसलिए वे कमाई का अंदाज लगाकर अपना हिस्सा मांगते हैं। लेकिन बड़े अफसर तो बड़े अफसर रहते हैं। ऐसे एक कलेक्टर को मातहत लोगों ने जाकर कहा कि उनके करीबी, एक दूसरे जिले के कलेक्टर इससे आधा भी नहीं ले रहे हैं, उनसे एक बार समझ तो लीजिए। 


28-Jan-2020

तस्वीरें असली हैं या नकली?
अड़ोस-पड़ोस के कुछ जिलों के कलेक्टर-एसपी और कुछ अन्य आला अफसरों  की पार्टी मनाते तस्वीरें वायरल हुई हंै। तस्वीरों में ऐसा-वैसा कुछ नहीं है। मगर पार्टी में मौजूद एक महिला अफसर ने सेल्फी ली और मोबाइल का एंगल कुछ इस तरह बन गया कि टेबल में मौजूद वाइन, और बीयर की बोतलें और चखना-चिकन भी आ गया। इसमें भी कोई बुरी बात नहीं है। गणतंत्र दिवस में प्रशासनिक-कानून व्यवस्था का टेंशन काफी रहता है। ऐसे में थकाऊ भरे कार्यक्रम के सफलतापूर्वक निपटने पर पार्टी तो बनती है। मगर आलोचकों का ध्यान खाद्य सामग्री पर ज्यादा है और वे इस पर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। दिक्कत यह भी हो गई है कि सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि फोटो गणतंत्र दिवस की शाम की हैं और पोस्ट करने के कुछ देर बाद उन्हें हटा भी दिया गया था। अब गणतंत्र दिवस को दारूबंदी रहती है, इसलिए फोटो अधिक सनसनीखेज लग रही हैं। यह ठिकाना नहीं है कि ये तस्वीरें सचमुच इनमें से एक अफसर के फेसबुक पर पोस्ट की गई थीं, या फिर किसी फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर से कहीं की फोटो किसी दिन की पोस्ट पर जोड़कर उसे गणतंत्र दिवस पर पीने की फोटो बता दिया गया। सब कुछ मुमकिन है। और लोगों का काम तो है ही कुछ न कुछ कहना....। 

कुर्सी गायब ही हो गई...
प्रोफेसर रोहणी प्रसाद को सरगुजा विवि के कुलपति पद से तो हटा दिया गया था, लेकिन रविवि में उनकी ज्वाइनिंग नहीं ली जा रही है। प्रसाद पर  यौन उत्पीड़ऩ सहित कई अन्य आरोप हैं। इन आरोपों के चलते उन्हें पद से हटाया गया। हालांकि प्रसाद ने जांच रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि आरएसएस के करीबी होने की वजह से उन्हें निशाना बनाया गया। वैसे ऐसा कहना उन महिलाओं का अपमान है जिन्होंने यौन प्रताडऩा की शिकायत की थी। खैर, प्रसाद पद से हटे हैं, तो उनकी मूल पदस्थापना स्थल पर ज्वाइनिंग होनी थी। मगर रविवि प्रशासन ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि प्रसाद के पास कोई रिलीविंग ऑर्डर नहीं है। 

चूंकि सरगुजा विवि में प्रसाद को हटाकर सरगुजा कमिश्नर को कुलपति का चार्ज दिया गया। कमिश्नर ने एकतरफा चार्ज भी ले लिया। ऐसे में उन्हें रिलीव कौन करता? प्रसाद ने राजभवन को पत्र भेजकर वस्तु स्थिति से अवगत कराया। सुनते हैं कि राजभवन ने रविवि प्रशासन को प्रसाद को पद से हटाए जाने की सूचना भी भेजी है। इन सबके बाद भी प्रसादजी की जाइनिंग नहीं हो पा रही है। प्रसादजी का हाल यह है कि वे कुलपति और कुल सचिव से मिल रहे हैं। मगर उन्हें ज्वाइन क्यों करने नहीं दिया जा रहा है, यह कोई बता नहीं रहा है। 


24-Jan-2020

हाथी का खरीददार नहीं
रायपुर का एक भव्य विवाहघर बिकने जा रहा है। चर्चा है कि विवाहघर की निर्माण में कई नेताओं ने अपनी पूंजी लगाई थी, लेकिन अपेक्षाकृत मुनाफा नहीं हो रहा है। उल्टे प्रभावशाली लोगों के यहां की शादियों के लिए तो किराया भी कम कर देना पड़ता है। यह सब देखकर अब निवेशकों ने विवाहघर के संचालक पर दबाव बनाया है कि वह उसे बेच दे। 

सुनते हैं कि पहले सवा सौ करोड़ के आसपास में विवाहघर को बेचना तय हुआ था। यह सौदा कई कांग्रेस नेताओं के पास भी पहुंचा। मगर इतनी राशि देने के लिए कोई तैयार नहीं है। भारी मंदी के चलते विवाहघर के लिए कीमत अब आधी कर दी गई है, लेकिन बाजार का हाल इतना बुरा है कि कोई खरीददार आगे नहीं आ रहा है। हाथी को पालना आसान नहीं होता, वह सर्कस में काम न करे, चुनावी रैली में न निकले, झांकियों में किराए पर न चले, तो भी रोज एक क्विंटल खाता है, और दो मजदूरों के उठाने लायक हगता है। ऐसे बड़े विवाहघर का हाल भी यही है।

दूसरे का माल, खुद की वाहवाही
रायपुर स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों की केन्द्र सरकार गुपचुप जांच करा रही है। हुआ यूं कि डीएमएफ से हुए कई निर्माण कार्यों को स्मार्ट सिटी के मद से होना बता दिया गया है। स्मार्ट सिटी के ब्रोशर में नालंदा परिसर, आक्सीजोन सहित कई योजनाओं का जिक्र है। मगर ये सब कार्य डीएमएफ से हुए हैं। ऐसे में स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों में भारी अनियमितता की शिकायत भी हुई है। इन शिकायतों को केन्द्र सरकार ने गंभीरता से लिया है। स्मार्ट सिटी के बहाने राज्य सरकार को घेरने का मौका भी है और देर सबेर कई छोटे-बड़े अफसर लपेटे में आ सकते हैं। रायपुर म्युनिसिपल और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की एक दिक्कत यह भी है कि इनकी रग-रग से वाकिफ सुनील सोनी दो बार यहां महापौर थे, और अब सांसद होने के नाते संसद की इस कमेटी में भी हैं जो स्मार्ट सिटी को भी देख रही है।

दांत तो दांत, अब पथरी भी!
स्मार्ट कार्ड से गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधा रहती है। सरकार ने कुछ बीमारियों को इससे अलग कर दिया है। जिसमें दांतों के रोग और पथरी की बीमारी भी शामिल हैं। दोनों बीमारियों के इलाज के नाम पर चिकित्सक मालामाल हो रहे थे। दांतों की चिकित्सा के नाम पर स्मार्ट कार्ड की राशि के दुरूपयोग के मामले की पड़ताल भी चल रही है। कुछ चिकित्सकों पर कार्रवाई भी हुई है। प्रदेश के दंत चिकित्सक और पथरी का ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं कि स्मार्ट कार्ड से इलाज की सुविधा दोबारा चालू की जाए। सुनते हैं कि कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेताओं ने पथरी के डॉक्टरों के लिए लॉबिंग की है। पार्टी के बाबूजी ने भी अनुशंसा की है कि स्मार्ट कार्ड से इलाज की सुविधा में कम से कम पथरी के ऑपरेशन को भी रखा जाए। मगर सरकार है कि इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है।  ((rajpathjanpath@gmail.com))


23-Jan-2020

रिकॉर्ड टूटेगा या नहीं?
पंचायत चुनाव में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है। दिग्गज नेता अपने करीबियों को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव अपने भतीजे आदितेश्वर शरण सिंहदेव (आदि बाबा) को अच्छे मतों से जिताने के लिए खुद मेहनत कर रहे हैं। आदि बाबा के पक्ष में अच्छा खासा माहौल भी दिख रहा है। सरगुजा के बड़े भाजपा नेता आदि बाबा के आगे नतमस्तक होते दिख रहे हैं। 

सिंहदेव के उत्साही समर्थक दावा कर रहे हैं कि आदि बाबा को रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल होगी। जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में सबसे ज्यादा मतों से जीत का रिकॉर्ड कवर्धा के पूर्व विधायक योगीराज सिंह के नाम पर दर्ज है। उन्हें जिला पंचायत चुनाव में करीब 92 फीसदी वोट मिले थे। आदि बाबा के समर्थक इस रिकॉर्ड को ध्वस्त करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। पहले तो यह लग रहा था कि आदि बाबा आसानी से रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकते हैं। मगर जाति समीकरण भी आड़े आता दिख रहा है। उनके क्षेत्र में रजवाड़ वोटर काफी हैं। भाजपा ने यहां रजवाड़ समाज के प्रत्याशी का समर्थन कर आदि बाबा को थोड़ी चुनौती देने की कोशिश की है। ऐसे में योगीराज का रिकॉर्ड टूटेगा या नहीं, यह देखना है। 

खतरा और हिफाजत
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक उद्योगपति के अपहरण के बाद प्रदेश के पैसे वालों में एक दहशत फैली हुई हैं। जाहिर है कि जो तबका अपने आपको किसी धमकी या फिरौती के लायक संपन्न पाता है, उसे न सिर्फ डर होगा, बल्कि उस पर एक असर खतरा भी मंडराता रहेगा। फिर इस बार तो यह भी पता लगा है कि किसी अधिक संपन्न के धोखे में कम संपन्न उद्योगपति को उठा लिया गया क्योंकि दोनों के कारखाने अगल-बगल थे, और दोनों की गाडिय़ां एक रंग, एक मॉडल की थीं। अब बहुत से लोगों ने हिफाजत के लिए गनमैन रख लिए हैं, कुछ ने खुद के लिए नहीं रखे, तो अपने बच्चों के लिए रख लिए हैं। दूसरी तरफ मोबाइल फोन पर कुछ ऐसे एप्लीकेशन भी हैं जो कि फोन की लोकेशन दूसरे तय किए गए फोन पर दिखा सकते हैं, और इस तरह एक कंपनी के कुछ लोग, या एक परिवार के कुछ लोग एक-दूसरे की लोकेशन जानने की इजाजत फोन पर सेट कर सकते हैं। 

लेकिन इससे लोकेशन तो पता लगती है, लेकिन अपहरण करने वाले तो सबसे पहले मोबाइल फोन कब्जे में करके उसे बंद कर देते हैं ताकि आगे की फरारी का रास्ता पुलिस को फोन की लोकेशन से न दिखे। ऐसे में लोग बिना घंटी वाला एक दूसरा छोटा फोन, या लोकेशन-ट्रैकर कपड़ों में कहीं छुपा कर रख सकते हैं, और अगर वह अपहरण करने वालों को न दिखा तो उसकी चार्जिंग तक तो घर-दफ्तर के तय किए गए नंबरों पर लोकेशन दिखेगी। ये बातें तो साधारण समझ की हैं, लेकिन कुछ ऐसी जानकार इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां बाजार में हैं जो कि मोबाइल फोन से छोटे लोकेशन-ट्रैकर भी बेचती हैं। इनमें से कुछ लोकेशन-ट्रैकर तो सिक्कों से थोड़े बड़े ही हैं। अब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करके अपनी जरूरत के लायक ट्रैकर छांटें, और थोड़ी सी प्राइवेसी खोकर बड़ी सी हिफाजत का इंतजाम भी करें। ऐसे ट्रैकर महंगे सामानों के बैग में भी रखे जा सकते हैं, और स्कूली बच्चों के बैग में भी। लेकिन ये तभी तक हिफाजत देते हैं जब तक इनसे जुड़े हुए फोन किसी मुजरिम के हाथ न लग जाएं। 

अभी रायपुर में हुए अपहरण के बारे में यह पता लग रहा है कि इधर-उधर जगह बदलते हुए अपहरणकर्ता उद्योगपति के मोबाइल से ही उसके परिवार को फोन लगा लेते हैं, और फिर फोन बंद कर लेते हैं। पुलिस और अपहरणकर्ताओं के बीच लुकाछिपी चल रही है, और ऐसे में ज्यादा जानकारी देना जिम्मेदारी नहीं है, हालांकि गलाकाट मुकाबले के इस दौर में मीडिया के अपने पापी पेट का भी सवाल है जो अपने ग्राहकों को रोजाना कुछ न कुछ नई जानकारी देने को मजबूर भी हैं। 

अब उद्योगपतियों और कारोबारियों को हिफाजत की जरूरत के समय जो फोन एप्लीकेशन और उपकरण सूझ रहे हैं, वे बाहर घूम-फिरकर काम करने वाले कर्मचारियों पर नजर रखने के काम भी आ सकते हैं, और कहीं-कहीं पर आ भी रहे हैं। जो कारोबार के काम से दौरे पर रहते हैं, या शहर में ही घूम-फिरकर काम करते हैं, उनके फोन भी उनका ठिकाना और वक्त अच्छी तरह बता सकते हैं। टेक्नालॉजी तो अपने आपमें कोई अक्ल नहीं रखती है, लोकेशन पर नजर चाहे कुत्तों पर रखनी हो, चाहे बच्चों पर, चाहे खुद पर और या फिर कर्मचारियों पर। 


22-Jan-2020

पहले भुगतान का खतरा

खबर है कि सीएम भूपेश बघेल की सख्ती के चलते सरकारी स्कूलों में खेल सामग्री सप्लाई के नाम पर गड़बड़ी की कोशिशों पर अंकुश लगा है। सुनते हैं कि एक दिग्गज नेता ने कई सप्लायरों से ऑर्डर दिलाने  के नाम पर काफी कुछ ले लिया था। एक-दो ने तो बाजार से ब्याज पर रकम लेकर नेताजी को अर्पित कर दी थी। 

चर्चा है कि काफी दिनों तक ऑर्डर नहीं मिला तो सप्लायरों ने नेताजी के समक्ष गुहार लगाई। नेताजी झांसा देते रहे कि आबंटन अभी जारी नहीं हुआ है जैसे ही जिलों को आबंटन जारी हो जाएगा, उन्हें सप्लाई ऑर्डर मिल जाएंगे। मगर स्कूल शिक्षा विभाग की एक चिट्ठी से सप्लायरों के हाथ के तोते उड़ गए। चिट्ठी में यह साफ उल्लेखित था कि किन-किन जिलों को कितनी राशि का आबंटन हुआ है। कुल मिलाकर साढ़े 11 करोड़ का आबंटन खेल सामग्री का खरीदी आदेश महीनाभर पहले जारी हो चुका है। 

खेल सामग्री खरीदी के लिए स्कूल स्तर पर समिति बनाई गई है। ऐसे में सप्लायरों को ऑर्डर लेने के लिए हर स्कूल जाकर मशक्कत करनी पड़ेगी। यानी जिस काम के लिए उन्होंने नेताजी को अपना सबकुछ अर्पित कर दिया था। वह उन्हें नहीं मिलता दिख रहा है। इधर, जिन सूदखोरों ने ब्याज पर रकम दी थी, वे अब वापसी के लिए दबाव बना रहे हैं। नेताजी का हाल यह है कि वे अब भी दिलासा ही दे रहे हैं।  इन पूरी गतिविधियों पर नजर रखने वाले कुछ लोगों का अंदाज है कि नेताजी ने रकम वापस नहीं की, तो कुछ अनहोनी घट सकती है। 

मिस्टर 35 परसेंट कायम है
इस बीच सुना है कि स्कूल शिक्षा मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल और बाद में केदार कश्यप के वक्त स्कूल लाइबे्ररी खरीदी में सरकारी मिस्टर 35 परसेंट रहा अधिकारी अभी तक उतने ही परसेेंट पर कारोबार चला रहा है, न महंगाई से परसेंटेज बढ़ा, न मंदी से घटा!

अमितेश हाशिए पर...
खबर है कि पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ल के तौर-तरीकों से प्रदेश के बड़े नेता खफा हैं। अमितेश ने पहले मंत्री नहीं बनाए जाने पर खुले तौर पर नाराजगी जाहिर की थी। बाद में वे खामोश भी हो गए। मगर चर्चा है कि  वे दिल्ली दरबार में राज्य के प्रमुख नेताओं की शिकायत करते रहते हैं।  शुक्ल बंधुओं के इकलौते वारिस होने की वजह से दिल्ली में अमितेश की बातें सुनी भी जाती है। 

अमितेश गांधी जयंती के मौके पर विधानसभा के विशेष सत्र में अलग पोशाक में थे। जबकि सभी सदस्यों को एक ही तरह की पोशाक में आना तय हुआ था। इससे डॉ. चरणदास महंत इतने खफा हो गए कि संसदीय कार्यमंत्री के आग्रह के बाद भी अमितेश को बोलने का मौका नहीं दिया। पार्टी की नई समन्वय समिति में भी अमितेश का नाम गायब है। जबकि सत्यनारायण शर्मा और धनेन्द्र साहू को जगह दी गई है। पार्टी नेता बताते हैं कि चूंकि अमितेश को मंत्री नहीं बनाया गया है इसलिए ताकतवर समन्वय समिति में उन्हें जगह मिलना तय माना जा रहा था। मगर उनके तौर-तरीकों से प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से लेकर सभी बड़े नेता खफा हैं। यही वजह है कि वे खुद ब खुद हाशिए पर जा रहे है। 

पत्रकारिता विवि का सस्पेंस 
 छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पर 10 महीनों से सस्पेंस बना हुआ है। वो भी तब जब सरकार ने अपने पसंद के व्यक्ति को कुलपति बनाने के लिए नियमों में आमूलचूल परिवर्तन किया। नए नियमों के मुताबिक बीस साल पत्रकारिता का अनुभव रखने वाले को कुलपति बनाया जा सकता है। नियमों में बदलाव के बाद माना जा रहा था कि किसी वरिष्ठ पत्रकार को वीसी की कुर्सी मिल सकती है। दिल्ली के पत्रकार उर्मिलेश का नाम कुलपति के लिए प्रमुखता से उभरा था। 

इसी बीच संघ पृष्ठभूमि से जुड़े और वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने के नाम ने सभी को चौंका दिया। इसके अलावा बलदेव शर्मा, डॉ. आशुतोष मिश्रा, दिलीप मंडल, डॉ. मुकेश कुमार और पत्रकार निधीश त्यागी, सुदीप ठाकुर का नाम भी गाहे-बगाहे उछलता रहा है। लेकिन कहा जा रहा है कि जगदीश उपासने की एंट्री से पूरा मामला खटाई में चला गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार ने अपनी पसंद के उम्मीदवार को वीसी बनाने इतनी कवायद की तो देरी किन कारणों से हो रही है? तो इसका जवाब आता है कि राजभवन ने नियुक्ति को अटका कर रखा है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि वीसी की नियुक्ति राज्य सरकार के परामर्श से होगी। ऐसे में राजभवन नियमों के खिलाफ जाए और सरकार के साथ टकराव की स्थिति निर्मित करे, इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है। 

विवि के कुछ जानकारों का कहना है कि सरकार ने जिस खास को कुलपति बनाने के लिए सारी कवायद की, उन्होंने पद लेने से इंकार कर दिया है, जिसके कारण पूरा मामला लटक गया है। हालांकि जगदीश उपासने की मजबूत दावेदारी का प्रमाण सोशल मीडिया में देखने को मिला। उनका नाम आते ही सोशल मीडिया में खिलाफ में जमकर लिखा-पढ़ा गया। जेएनयू विवाद में भी वे खूब सुर्खियों में रहे। ऐसे में राजभवन के चाहने भर से राज्य की कांग्रेस सरकार किसी भी कीमत में उनको वीसी बनाने के लिए तैयार होगी, ऐसा लगता तो  नहीं। जगदीश उपासने की मां रजनी उपासने भाजपा की विधायक थीं, और छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने भाजपा के पुराने नेता हैं और विधानसभा व अन्य चुनाव भी लड़ चुके हैं जिसमें उनके लिए मीडिया मैनेजमेंट करने के लिए दिल्ली से, इंडिया टुडे से, छुट्टी लेकर जगदीश उपासने रायपुर आकर डेरा डालते थे। 

कुल मिलाकर इस पूरे एपिसोड में किरकिरी सरकार की हो रही है, क्योंकि संघ के बैकग्राउंड के कारण जिस तत्परता से परमार को हटाया गया था, वैसी तेजी वो नई नियुक्ति में बिल्कुल भी दिखाई नहीं पड़ती, बल्कि संघ के दूसरे दावेदार के कारण कांग्रेस सरकार में नियुक्ति अटकना आश्चर्यजनक लगता है। 

जानकार यह भी बताते हैं कि इस पद पर जिस किसी खास के लिए रास्ते खोले गए थे, उनके इंकार के बाद चाहने वाले अभी भी उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चक्कर में विवि को नए कुलपति के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन वास्तव में अगर कुलपति के लिए मान मन्नौवल का दौर चल रहा है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो सरकार के लिए कितना खासमखास है। खैर, विवि के लोग तो इस बात से अपने-आपको तसल्ली दे रहे हैं कि अगर समय लग रहा है तो देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर यहां किसी विशेष की एंट्री होना तय है। (rajpathjanpath@gmail.com)