राजपथ - जनपथ

09-Mar-2021 5:31 PM 221

दवा कम्पनी पर मेहरबानी के लिये जान से खिलवाड़? 

सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर कई बार सवाल उठते हैं पर मामले दब जाते हैं। खुलते हैं तो भी कार्रवाई में इतनी देर कर दी जाती है कि वे कम्पनी का कोई नुकसान नहीं होता, भले ही मरीजों की जान पर खतरा क्यों न हो। पेट दर्द और एसिडिटी की दवा एल्यूमिनियम हाईड्रोक्साइड सिरप मुंगेली, गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही और बिलासपुर जिले में अमरवती की कम्पनी ग्लेशियर ने अगस्त 2019 में करनी शुरू की थी। सरकारी निगम सीजीएमएससी के जरिये ही इस तरह की खरीदी होती है। डॉक्टरों और मरीजों की ओर से शिकायत आने लगी कि दवा किसी काम के नहीं, बल्कि इसके साइड इफेक्ट भी हो रहे हैं। शिकायत के बावजूद पहला पत्राचार जुलाई 2020 में किया गया। कम्पनी से जवाब नहीं आया और इधर दवाईयां भी मरीजों को पिलाई जाती रही। अब जब ज्यादातर दवाईयां खप चुकी हैं, कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड किया गया है और दवाओं को वापस मांगा जा रहा है। ऐसी दवायें जाहिर है सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने वालों में बांटी जाती है, जिनमें से ज्यादातर लोग गरीब वर्ग के होते हैं। इन दवाओं के चलते किसी की मौत होने की कोई ख़बर नहीं है इसलिये इस मामले ने तूल नहीं पकड़ा, वरना अपने प्रदेश का नसबंदी कांड भी लोगों को याद है जिसमें 16 महिलाओं की मौत हुई थी।

आत्महत्या भी हो तो गंभीरता कम नहीं

यह स्वाभाविक है कि विधानसभा में पाटन इलाके के बठेना में हुई पांच मौतों का मामला गूंजा। फंदे पर एक साथ लटकती दो लाशें, तीन महिलाओं के अधजले, जले शव और सुसाइडल नोट। विवेचना अधिकारियों को मामले की तह तक पहुंचने की जिम्मेदारी है। इसी इलाके के खुड़मुड़ा गांव में चार लोगों की हत्या का मामला अब तक सुलझ नहीं पाया है। दोनों को लेकर पुलिस को आलोचना तो झेलनी पड़ रही है। गृह मंत्री को भी कानून व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार का बचाव करना पड़ रहा है। गृह मंत्री इसे आत्महत्या बता रहे हैं तो विपक्ष ने एक साथ लटके दो शवों के आधार पर इसे हत्या का मामला कहा है। कुछ खबरों में कहा गया कि जुए, सट्टे की वजह से काफी खेती मृतक परिवार के मुखिया को बेचनी पड़ी और कर्जदारों का उस पर भारी दबाव था। अपराध होने के बाद सारी जिम्मेदारी पुलिस पर आती है और सवाल कानून व्यवस्था पर उठते हैं। पर ऐसी घटनाओं के लिये समाज का बिगड़ता माहौल कितना जिम्मेदार है, इस पर निगरानी रखने की जवाबदेही किस पर है, इसके लिये कोई ठोस तंत्र नहीं है। राज्य में बढ़ते अपराध, जुए सट्टा, सूदखोरी, शराबखोरी के चलते हो रहे अपराधों को रोकने के लिये कौन कदम उठाये, वे कदम क्या हों, इस पर भी इन गंभीर मामलों को देखते हुए अब बात होनी चाहिये।

कोरोना वारियर्स से वैक्सीन की कीमत?

वैक्सीनेशन के दूसरे चरण में 60 वर्ष से अधिक और गंभीर बीमारियों से पीडि़त 45 साल से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगाने का अभियान चल रहा है। सरकारी केन्द्रों में यह मुफ्त है, पर अब निजी अस्पतालों में इसके लिये 250 रुपये देने हैं। दो बार टीका लगना है अत: 500 रुपये कुल खर्च है। दूसरा चरण शुरू होने के बावजूद बड़ी संख्या में वे लोग बचे रहे हैं जिन्हें पहले चरण में टीका लग जाना था। इनमें स्वास्थ्य कर्मी, कोरोना वारियर्स, डॉक्टर आदि शामिल हैं। अब तक इन्हें प्राइवेट अस्पतालों में मुफ्त टीका लग रहा था लेकिन अब इनसे भी वही राशि वसूल की जायेगी जो अन्य से ली जा रही है। यह फैसला कुछ अटपटा लग रहा है क्योंकि हाल ही में कोविड-19 के मामले फिर से बढऩे के बाद वैक्सीनेशन की रफ्तार भी बढ़ गई है। सरकारी अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है। लम्बा वक्त लग रहा है। सर्वर डाउन भी हो रहा है। ऑन द स्पॉट रजिस्ट्रेशन सुविधा शुरू होने के कारण भी वक्त लग रहा है। ऐसे में कोरोना के खिलाफ जंग लडऩे वालों से किसी भी अस्पताल में टीका लगवाने का शुल्क क्यों लगना चाहिये?


08-Mar-2021 5:16 PM 187

बंद होते जन औषधि केन्द्रों में जश्न

ब्रांडेड दवाओं की भारी कीमतों से आम लोगों को बचाने के लिये पांच साल पहले 21 फरवरी 2016 को जन औषधि केन्द्रों की शुरूआत की गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ से ही इसकी शुरुआत की थी। देशभर में एक साथ 100 केन्द्रों का भी उन्होंने ऑनलाइन उद्घाटन किया। सरकारी डॉक्टरों को केवल जेनेरिक दवायें लिखने का निर्देश मिला। ब्रांडेड दवायें लिखने पर 104 नंबर पर शिकायत करने का प्रावधान भी किया गया।

कल 7 मार्च को जब मोदी टीवी पर आये तब लोगों को ध्यान गया कि अब भी सस्ती दवायें मिल रही हैं। पर असलियत यह है कि प्रदेश में खोले गये 180 केन्द्रों में से अधिकांश बंद हो चुके हैं। वजह है दवाओं की समय पर सप्लाई नहीं होना। 732 प्रकार की जेनेरिक दवायें इन केन्द्रों के लिये सूचीबद्ध है पर इनमें से एक तिहाई भी नहीं मिलतीं। पैरासिटामॉल जैसी मामूली दवायें भी कई जगह पर उपलब्ध नहीं। अब तो डॉक्टरों की आदत भी जेनेरिक लिखने की छूट चुकी है और लोग 104 में इसकी शिकायत भी नहीं करते। पता चला है कि पहले जेनेरिक दवायें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय खुद तैयार करता था लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी निजी कम्पनियों को दे दी गई। इनके हाथ में ब्रांडेड दवायें बनाने का काम भी है। जेनेरिक में मुनाफा कम है, इसलिये वे समय पर आपूर्ति करने में रुचि नहीं लेते। छत्तीसगढ़ में जन औषधि केन्द्रों में दवा आपूर्ति गड़बड़ाई हुई है तो जाहिर है दूसरे राज्यों में भी इससे मिलता-जुलता हाल ही होगा। पर, जैसी खबर है, शिलांग में प्रधानमंत्री ने 7500वें केन्द्र का उद्घाटन किया है। क्या अफसरों ने योजना सफल बताने के लिये बंद हो चुके केन्द्रों को भी गिनती कर ली?

अवैध प्लॉटिंग  का मकडज़ाल

प्रदेश में कांग्रेस सन् 2018 में चुनाव मैदान पर उतरी थी तो अनेक लुभावने वायदों में से एक यह भी था कि छोटे प्लॉट की रजिस्ट्री शुरू की जायेगी। ऐसा हो गया। भाजपा सरकार ने पांच डिसमिल से छोटी जमीन की रजिस्ट्री पर रोक लगाई थी। इसके चलते जमीन खरीदी बिक्री के धंधे से छोटे निवेशक बाहर हो गये। आम लोगों को भी कम लागत पर अपना मकान बनाने का मौका नहीं मिल रहा था। फायदा बड़े कारोबारियों, अधिकारियों और नेताओं को मिला। अब छोटे प्लॉट की रजिस्ट्री की बाढ़ आई हुई है। पंजीयन विभाग आय बढऩे पर खुश है। उसने साफ कर दिया है कि वह रजिस्ट्री के वक्त यह नहीं देखती कि रेरा रजिट्रेशन, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की मंजूरी है या नहीं। गलत बिक्री है तो राजस्व विभाग का काम है कि वह नामांतरण रोक दे।

रायपुर के बाहरी हिस्से में ऐसे छोटे प्लाट 300 रुपये फ़ीट के आसपास मिल रहे हैं। वहीं अप्रूव्ड प्रोजेक्ट में उसी इलाके में 1000 रुपये से जमीन की शुरूआत होती है। कम दाम वाले प्लॉट दो-चार साल बाद बेचने पर मुनाफे का सौदा होता है। महंगे प्लाट के दाम तेजी से नहीं बढ़ते। रायपुर, बिलासपुर सहित कई बड़े शहरों में तेजी से यह धंधा चल रहा है। इस उम्मीद में भी कई लोग प्लॉट खरीद रहे हैं कि आगे चलकर मकान बना लेंगे। देर-सबेर कॉलोनी को नगर निगम अपने हाथ ले ही लेगी। राजस्व विभाग के पास हर जगह ऐसी शिकायतों का अम्बार है। तालाब, गोचर व सरकारी जमीन को दबाने की भी शिकायत है। इसके बावजूद कार्रवाई एक दो पर ही दिखावे के लिये हो रही है। शायद सरकार ने नरमी बरतने कहा हो। चुनावी वायदे का सवाल है।

भीड़ नहीं जुटा पाने पर कार्रवाई

मुंगेली की महिला कांग्रेस जिला अध्यक्ष ललिता सोनी को प्रदेश अध्यक्ष ने पद से हटा दिया और उनकी जगह पर नया अध्यक्ष जागेश्वरी वर्मा को नियुक्त कर दिया। दरअसल, कुछ दिन पहले महिला कांग्रेस ने सभी जिला मुख्यालयों में केन्द्र सरकार के खिलाफ महंगाई को लेकर प्रदर्शन करने का निर्देश दिया था। इस प्रदर्शन में कुल जमा 8 महिलायें इक_ी हुईं। स्वयं जिला अध्यक्ष पारिवारिक व्यस्तता का हवाला देते हुए नहीं पहुंचीं।

कुछ दिन पहले प्रदेशभर के जिला मुख्यालयों में जीएसटी के खिलाफ व्यापारियों के विरोध में भी कांग्रेस ने समर्थन दिया था और प्रमुख चौक-चौराहों पर पहुंचकर नारेबाजी की। ज्यादातर जगहों पर इसमें भी भीड़ नहीं जुटी। कई जिलों में तो प्रदर्शन ही नहीं हुआ।

दूसरी तरफ भाजपा ने हाल ही में राज्य सरकार के खिलाफ कुछ प्रदर्शन किये, जिसमें ठीक-ठाक भीड़ पहुंच गई। ऐसा लगता है कि सत्ता में आने के बाद कांग्रेस संघर्ष करना भूल रही है। प्रदेश के बाकी नेताओं को इसकी चिंता है या नहीं यह तो पता नहीं पर महिला अध्यक्ष फूलो देवी नेताम ने बता दिया कि उनको इसका ध्यान है।

रेस्त्रां जाकर भी फोन से...

महीनों की बेरोजगारी और फटेहाली के बाद जब रेस्त्रां शुरू हुए, तो कुछ सावधान और जिम्मेदार रेस्त्रां ने अधिक सतर्कता बरतना शुरू किया है। रायपुर के कोर्टयार्ड-मैरियट होटल के रेस्त्रां को देखें तो वहां टेबिलों पर ऐसे कागज सजे हैं जिन्हें अपने स्मार्टफोन से स्कैन करके फोन से ही सीधे खाना ऑर्डर कर सकते हैं। खाना तो इंसान ही लाकर रखेंगे, लेकिन खाने के बाद एक दूसरे निशान को स्कैन करके भुगतान कर सकेंगे। इस तरह कर्मचारियों से मिलना-जुलना, उनका मेन्यूकार्ड लाना, आखिर में बिल लाना, भुगतान के बाद बाकी चिल्हर लाना यह सब स्कैन करने से खत्म हो जाता है, और आप अपने फोन से ही इतने काम कर लेते हैं। अब इसके लिए अपने स्मार्टफोन जितना स्मार्ट भी लोगों को होना पड़ेगा, और फोन से भुगतान की सुविधा भी जरूरी होगी। लेकिन कुल मिलाकर लोग कम मिलने, कम छूने के रास्ते निकाल रहे हैं, यह रेस्त्रां उस दिशा में दो कदम आगे बढ़ा है।


07-Mar-2021 5:32 PM 246

अफसरों के फेरबदल का वक्त

विधानसभा सत्र निपटने के बाद प्रशासनिक फेरबदल हो सकता है। दो-तीन कलेक्टरों के साथ-साथ कुछ विभागों के सचिवों को इधर से उधर किया जा सकता है। आदिम जाति कल्याण सचिव डीडी सिंह जून में रिटायर हो रहे हैं। राजनांदगांव कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा और पीएचई के विशेष सचिव एस प्रकाश सचिव हो गए हैं। प्रकाश से ऊपर पहले से ही सिद्धार्थ कोमल परदेशी हैं। ऐसे में प्रकाश का वहां से हटना तय है। इन सब वजहों से फेरबदल तय है।

दूसरी तरफ, रीना बाबा साहेब कंगाले वर्तमान में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के पद पर हैं। चर्चा है कि सरकार ने उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी देने के लिए आयोग से अनुमति मांगी है। हालांकि इस तरह का पत्र पहले भी लिखा जा चुका है। उस समय तत्कालीन सीएस के पत्र की भाषा से मुख्य निर्वाचन आयुक्त इतने खफा हो गए थे कि अनुमति नहीं मिल पाई। देखना है कि आयोग अब अनुमति देता है, अथवा नहीं।

वैसे तो संसदीय सचिव सोनमणि बोरा के पास भी कोई काम नहीं है। मगर उनके दिल्ली जाने को लेकर इतना हल्ला मच चुका है कि उन्हें  अतिरिक्त कोई जिम्मेदारी दी जाएगी, इसकी संभावना कम दिख रही है। टोपेश्वर वर्मा को कमिश्नर बनाया जा सकता है, तो बिलासपुर कमिश्नर डॉ. संजय अलंग की सचिव के रूप में महानदी भवन में वापिसी हो सकती है। कलेक्टरी के लिए वर्ष-2008 बैच के अफसर अनुराग पाण्डेय भी हैं जिनकी तरफ अब तक सरकार की नजर नहीं पड़ी है। जबकि उनसे जूनियर कई कलेक्टर बन चुके हैं।

रायपुर कलेक्टर एस भारतीदासन और कोरबा कलेक्टर किरण कौशल को भी बदले जाने की चर्चा है। कुछ लोग किरण को रायपुर कलेक्टर बनने का अंदाजा लगा रहे हैं। मगर एक बात तय है कि दोनों की कार्यक्षमता को देखते हुए महत्व किसी भी दशा में कम नहीं होने वाला है।

अभी भी रमन सिंह...

विधानसभा में बुरी हार के बाद भाजपा हाईकमान ने ढाई साल बाद पूर्व सीएम रमन सिंह की सुध ली है, और उन्हें उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार के खिलाफ असंतोष को दूर करने की जिम्मेदारी दी गई है। कुछ दिन पहले ही सीएम भूपेश बघेल ने रमन सिंह पर कटाक्ष किया था कि रमन सिंह की स्थिति पॉलिटिकल आइसोलेशन में जाने की है। पार्टी के लोग उन्हें पूछ नहीं रहे हैं। उन्हें आइसोलेशन में रख दिया है।

मगर अब जब उन्हें उत्तराखंड का पर्यवेक्षक बनाया गया, तो यह साफ हो गया कि रमन सिंह को महत्व मिल रहा है। उनकी स्थिति समकक्ष, पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे से तो बेहतर है, जिन्हें पार्टी ने पूरी तरह किनारे कर रखा है। छत्तीसगढ़ भाजपा में तो अभी भी रमन सिंह की राय के बिना कोई बड़े फैसले नहीं हो रहे हैं। यह भी संभव है कि चुनाव के आते-आते तक परिस्थिति थोड़ी बदल जाए, लेकिन अभी उनकी स्थिति पॉलिटिकल आइसोलेशन में जाने जैसी तो बिल्कुल नहीं दिख रही है।

मेडागास्कर और छत्तीसगढ़

मेडागास्कर दक्षिण अफ्रीका का 120 द्वीप समूहों वाला गणराज्य है। इन दिनों वह इसलिये चर्चा में है कि वहां भयंकर सूखा पड़ा है और दुनिया के अनेक देश उसकी मदद करने के लिये आगे आ रहे हैं जिनमें भारत भी है। मेडागास्कर की दो तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। रोचक, मिनटों में फुर्ती लाने वाला रग्बी यहां राष्ट्रीय खेल है। जिस देश की दो तिहाई आबादी पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय मानक में गरीब हो, वहां सूखे का क्या असर हुआ होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। आर्थिक स्थिति के अलावा शिक्षा व पोषण की स्थिति भी वहां चिंताजनक है।

छत्तीसगढ़ से इसकी क्या तुलना हो सकती है? बस एक-‘अमीर धरती के गरीब लोग।’ इस देश का भी इसी नाम से जिक्र किया जाता है। मेडागास्कर में विपुल वन, वन्य जीव व खनिज सम्पदा है।

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ को भी ‘अमीर धरती के गरीब लोग’ परिभाषित किया था। फिर इस पर, एक पर्यावरण पर काम करने वाले संगठन, सीएसई ने इसी शीर्षक के साथ एक मोटी किताब छापी।

छत्तीसगढ़ अलग राज्य कुछ महीनों के बाद 21 साल हो जायेगा। प्रति व्यक्ति आमदनी बढऩे, कई-कई गुना बढ़े बजट के आकार के बावजूद यहां कुपोषण-सुपोषण, शिक्षा, आर्थिक उन्नति के आंकड़े बताते हैं कि लम्बी लड़ाई जारी रखनी होगी। देश के अनेक छोटे राज्यों से भी मुकाबला करने की जरूरत है, जहां स्थिति हमारे प्रदेश से अच्छी है।

कुछ समय पहले उपभोग की क्षमता के आधार पर रिजर्व बैंक ने एक हैंडबुक तैयार किया था। इसमें बताया गया कि छत्तीसगढ़ में 39.93 प्रतिशत, यानि करीब 40 प्रतिशत लोग गरीब हैं। गोवा, सिक्किम, मणिपुर, दिल्ली जैसे अनेक छोटे राज्यों के मुकाबले यह बहुत खराब स्थिति है। राज्य में 56 लाख परिवार हैं, जिनमें से 33 लाख परिवारों को बीपीएल कार्ड मिले हैं। यह अलग बात है कि इनमें जांच हो तो कई सरकारी सेवक, आयकर दाता भी निकल आयें। पूर्ववर्ती सरकार ने तो करीब 8 लाख ऐसे बीपीएल कार्ड बना दिये, जिन्हें चुनाव के बाद रद्द करना पड़ा।

बहरहाल, कुछ साल पहले केन्द्र व राज्य सरकार की टीम ने एक सर्वे किया था, जिसमें पाया गया कि 73 प्रतिशत से ज्यादा सरकारी प्रायमरी स्कूलों के बच्चे अपनी किताब में लिखी जानकारी तो देना दूर, उसे पढ़ भी नहीं पाते। बड़ी संख्या में- करीब 52 फीसदी पद शिक्षकों के खाली हैं। पहली से पांचवी तक पढ़ाने का बोझ भी एक साथ है। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक है। इन्हें ही प्रभारी प्रधान-पाठक भी बनाया गया है।

मेडागास्कर की गरीबी की वजह रिपोर्ट्स में बताई गई है- वनों में रहवास का व्यापक विनाश, पेड़ों की गैर कानूनी कटाई, झूम खेती के चलते जंगल की कटाई, खनन, जानवरों का शिकार।

बतायें, 43 प्रतिशत से ज्यादा वनों से घिरे छत्तीसगढ़ में कौन-कौन से कारण समान हैं?

अदालती फैसले किस भाषा में हों?

खासकर सेशन कोर्ट से बड़ी अदालत, जिनमें ट्रिब्यून्लस, लेबर कोर्ट्स भी शामिल हैं आदेश प्राय: अंग्रेजी में होते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे अनेक राज्य हैं जहां अदालती अंग्रेजी आम लोगों के सिर के ऊपर से गुजर जाती है। चलन में ही नहीं। न केवल अशिक्षित बल्कि पढ़े लिखे लोगों में भी। वे सब वकीलों के ही भरोसे होते हैं। ऐसे में शासन व्यवस्था की तीनों पालिकाओं के प्रमुख, राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द का कल आया यह सुझाव महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ज्यादा से ज्यादा फैसले स्थानीय भाषा में हों। फैसले अंग्रेजी में भी हों तो उसे साथ-साथ हिंदी और जरूरत के मुताबिक दूसरे स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध हों। सुप्रीम कोर्ट में मांग पर स्थानीय, जिनमें हिंदी सहित 8 और भाषायें शामिल हैं, उपलब्ध कराई जाती है। पर मूल आदेश अग्रेजी के होते हैं। निर्णय हिन्दी या भारत की अधिसूचित भाषाओं में कम ही दिये जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में हमें मई 2001 से सितम्बर 2006 तक पदस्थ जस्टिस स्वर्गीय फखरुद्दीन याद आते हैं, जिन्होंने एक महिला की अर्जी पर छत्तीसगढ़ी में फैसला दिया। यह किसी दूसरे जज ने शायद अब तक नहीं दोहराया। छत्तीसगढ़ी पृष्ठभूमि के अनेक जज हाईकोर्ट में हैं पर ऐसा नहीं करना उनका अपना विवेक है।

जस्टिस यतीन्द्र सिंह हुए। छत्तीसगढ़ में वे सन् 2012 में चीफ जस्टिस बने। करीब दो साल वे इस पद पर रहे। उन्होंने अधिकांश फैसले हिंदी में दिये और उसके बाद अनुवादक उसे अंग्रेजी में तैयार करते थे। उनका मूल फैसला हिंदी में होता था।

सन् 2016 में तब के चीफ जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक सख्त फैसला दिया था। पीएससी 2003 के घोटाले को उन्होंने पकड़ा और सारी सूची निरस्त कर फिर से बनाने का आदेश दिया। अनेक एसडीएम, एडीएम की नौकरी जा रही थी। अभी सुप्रीम कोर्ट से स्थगन मिला हुआ है। हाल ही में इन अधिकारियों का प्रमोशन भी हो गया। इस मामले में याचिकाकर्ता थीं डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे, जिनको दलीलों के मुताबिक डिप्टी कलेक्टर पद मिलना था। जस्टिस गुप्ता ने वर्षा डोंगरे को अनुमति दी। वह खुद ही अपना वकील बनीं, हिंदी में   पूरी दलील दीं। न केवल डोंगरे बल्कि जज और प्रतिवादी वकीलों ने हिंदी में ही बहस की। हर सुनवाई के दौरान कोर्ट की दर्शक दीर्घा भरी होती थी, क्योंकि सुनवाई सब समझ पा रहे थे।

अदालती फैसले अंग्रेजी में देने के पीछे तर्क यह रहा है कि इनमें उल्लेख किये गये वाक्य, शब्द डिक्शनरी में मान्य हैं। स्थानीय भाषा में उन्हीं वाक्यों, शब्दों के कई अर्थ निकल सकते हैं, जिससे अलग बहस खड़ी हो सकती है। हिंदी के साथ तो समस्या है कि वह केवल राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं।

भारतेन्दु कह गये थे- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल।

देखें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राष्ट्रपति की अपील का क्या असर होगा। क्या जस्टिस फखरुद्दीन और यतीन्द्र सिंह जी दोहराये जायेंगे?

खून-खून होते रिश्ते

दुर्ग जिले के पाटन में पांच लोगों की मौत। घटना ह्दय विदारक है। सुसाइडल नोट मिला है, जांच जारी है। शुरुआती जानकारी है कि मृतक घर का मालिक लगातार अपनी जायजाद बेच रहा था। बेचते-बेचते कुछ रह नहीं गया। उसे जुए, सट्टे की लत थी। उस पर 20 लाख रुपये का कर्ज था।

इधर रायपुर के उरला में एक ने अपनी बहू और उसकी मां की हत्या कर दी। बिलासपुर के नजदीक कोनी की ख़बर है। पत्नी मायके से ससुराल जाने के लिये राजी नहीं हुई तो बाप ने 13 दिन की नवजात बिटिया को जहर पिला दिया। नवजात का इलाज चल रहा है।

ये सब दहलाने वाली एक ही दिन की ख़बरें हैं। सारी घटनायें रिश्तेदारों के बीच की है। अपनों के बीच इतना तनाव, ऐसा प्रतिशोध संघर्ष क्यों हो रहा है? क्या पंचायत, पारिवारिक बैठक, समाज में संवाद और सुलह कर विवाद, तनाव घटाने की प्रक्रिया खत्म हो रही है? क्या इन घटनाओं को उनका व्यक्तिगत मामला या अपवाद मान लें? या फिर इसमें शासन-प्रशासन के विभागों जैसे समाज कल्याण विभाग, महिला बाल विकास विभाग की भी कोई भूमिका हो? 


06-Mar-2021 5:36 PM 240

बहिष्कार पर बंटा विधायक दल

विभागवार बजट पर चर्चा के लिए अतिरिक्त समय न मिलने पर भाजपा विधायक सदन की कार्रवाई का बहिष्कार कर रहे हैं। वे पिछले दो दिनों से अनुदान मांगों पर चर्चा में भाग नहीं ले रहे हैं। मगर बजट चर्चा में हिस्सा न लेकर भाजपा सदस्यों ने सरकार को घेरने का बड़ा मौका खो दिया है। गृह जैसे दर्जनभर विभागों के बजट बिना किसी असुविधा के पारित हो गए। चर्चा है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक खुद बहिष्कार करने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन बृजमोहन खेमे के दबाव के चलते बाहर जाना पड़ा।

सुनते हैं कि पूर्व सीएम रमन सिंह भी बजट चर्चा के बहिष्कार के फैसले से इतने नाखुश थे कि वे अगले दिन दिल्ली चले गए, और सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया। हाल यह है कि भाजपा विधायक दल इस फैसले पर दो धड़ों में बंट गया है। भाजपा के कुछ लोग भी मानते हैं कि आसंदी का अतिरिक्त समय नहीं देने का फैसला गलत नहीं है। कौशिक खुद विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। कौशिक और कम से कम अन्य सीनियर विधायक भली भांति जानते हैं कि सदन में दल संख्या के आधार पर चर्चा के लिए समय तय किए जाते हैं। भले आसंदी चाहे तो इसमें छूट दे दे। ऐसे में अतिरिक्त समय के लिए दबाव बनाना कतई उचित नहीं था।

चर्चा है कि संसदीय कार्य मंत्री रविन्द्र चौबे, भाजपा विधायकों को मनाने के लिए गए थे, लेकिन विधायकों के एक खेमे का तर्क था कि विधानसभा अध्यक्ष खुद इसके लिए पहल करे। जबकि कौशिक और उनसे जुड़े विधायक मामले को ज्यादा तूल देने के पक्ष में नहीं थे। विधानसभा अध्यक्ष, इन विधायकों के तौर तरीकों से इतने खफा हैं कि वे चर्चा के लिए तैयार नहीं हैं।

अंदर की खबर यह भी है कि पार्टी हाईकमान ने भी अनुदान मांगों पर चर्चा में हिस्सा नहीं लेने के फैसले को संज्ञान में लिया है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने संगठन के प्रमुख नेताओं से बात की है। ऐसे में बहिष्कार के फैसले से हड़बड़ाए विधायक अब सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि सत्ता पक्ष की तरफ से कोई पहल हो जाए। देखना है कि सोमवार को कोई रास्ता निकल पाता है, अथवा नहीं।

समय से पहले विधानसभा खत्म ?

विधानसभा का बजट सत्र निर्धारित समय से पहले खत्म हो सकता है। वैसे तो सत्र 26 तारीख तक चलना है, लेकिन मौजूदा हाल यह है कि 15 तारीख के आसपास खत्म हो सकता है। इसकी प्रमुख वजह दो विधायक अरूण वोरा और देवव्रत सिंह का कोरोना संक्रमित पाया जाना भी है।

दोनों विधायक सदन की कार्रवाई में हिस्सा ले रहे हैं, और अन्य विधायकों के संपर्क में भी थे। ऐसे में कुछ विधायकों ने अपना कोरोना टेस्ट भी कराया है। अब कोरोना संक्रमण के और मामले आए, तो विधानसभा का तय समय तक चल पाना मुश्किल है। अरूण और देवव्रत के संपर्क में रहने वाले विधायक डरे हुए हैं। ऐसे में समय से पहले विधानसभा खत्म हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अभी यह कोशिश भी हो रही है कि विधानसभा में ही तमाम विधायकों और विधानसभा स्टाफ का कोरोना टीकाकरण हो जाये।

मुजरिम को भी इंसाफ चाहिये

जांजगीर जिले का एक मामला पिछले एक पखवाड़े से चर्चा में है। एक युवक ने फरवरी माह में पुलिस महानिरीक्षक के दफ्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश की। उसकी अब जाकर हालत सुधरी है और पुलिस में वह बयान दर्ज कराने के लिये राजी है। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने जो सफाई दी उसमें यह बात उसने प्रमुखता के साथ बताई कि वह आदतन अपराधी है, उसके खिलाफ आठ मामले दर्ज हैं। जब वह हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया तो हालत इतनी खराब थी कि कई दिन तक होश में भी नहीं आया। उसे उसी हाल में हथकड़ी पहना दी गई। जब पुलिस से पूछा गया कि जो होश में ही नहीं उसके साथ ऐसा क्यों? पुलिस का कहना था कि उसके भागने का खतरा था। मामले ने तूल पकड़ा तो हथकड़ी निकाली गई। अब होश में आने के बाद वह जहर पीने की वजह बता रहा है कि उसकी पत्नी के साथ गांव के एक रसूखदार ने घर के भीतर घुसकर छेड़छाड़ की। जब वह थानेदार के पास शिकायत के लिये पहुंचा तो उसे भगा दिया गया, उल्टे उसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की धमकी दी। आईजी साहब तो थे नहीं, जो मौजूद थे उन्होंने न्याय का कोई आश्वासन नहीं दिया।

पुलिस अपनी छबि सुधारने के लिये बहुत से कार्यक्रम करती है। चौपाल लगाती है। आम लोगों से मित्रता के लिये अभियान चलाती है, पर जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो समझ में आता है कि जनता और पुलिस के बीच आखिर दूरी क्यों है? जिन पहले के अपराधों में खुदकुशी की कोशिश करने वाला जिम्मेदार है, उस पर तो कानून, अदालत काम करेगी, पर उसके साथ कोई नाइंसाफी हो रही हो तो क्या उसे आवाज़ उठाने का हक नहीं?

क्या शराबबंदी इसलिये नहीं?

शराब पर लगाये गये अतिरिक्त कर, सेस का इस्तेमाल स्वास्थ्य विभाग की अधोसंरचना में विकास के लिये लगाया गया कर उस काम के लिये खर्च किया ही नहीं गया। पहले देसी पर 10 रुपये, अंग्रेजी पर 10 प्रतिशत फिर बाद में 5 रुपये और सेस लगाया गया। खर्च कहां किया गया, विधानसभा में विपक्ष को संतोषजनक जवाब मिला ही नहीं। वे महालेखाकार से शिकायत करने पहुंचे थे। यह अलग बात है कि उनकी सरकार के दौरान इससे कई गुना गड़बड़ी होती रही। सन् 2017 में महालेखाकार ने 3000 करोड़ की गड़बड़ी अपनी रिपोर्ट में सार्वजनिक की थी।  समाज विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं ने कई बार बताया है कि शराब के चलते न केवल स्वास्थ्य पर किया जाने वाला खर्च कई गुना बढ़ जाता है बल्कि सडक़ दुर्घटनाओं और अपराधों में वृद्धि होती है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अब ढाई साल निकाल दिये हैं। शराबबंदी उन वादों में शामिल है जिन्हें पूरा करने को लेकर वह हिचकिचा रही है। शराब पर मिलने वाला टैक्स तो अपनी जगह है ही, कहीं कल को उनकी समिति यह रिपोर्ट नहीं दे दे, कि जरूरी कामों के लिये सेस सिर्फ शराब पर लगाया जा सकता है इसलिये फिलहाल शराबबंदी नामुमकिन है।

लिविंग इन्डेक्स पर खुश हो जायें

रायपुर और बिलासपुर दोनों को लिविंग इन्डेक्स में केन्द्र सरकार की सर्वे एजेंसियों ने टॉप टेन में जगह दी है। ये आंकड़े किस तरह इक_े किये जाते हैं, इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाती है पर जब रिपोर्ट आती है तो वह पहले पन्ने की ख़बर बनती है। रायपुर और बिलासपुर दोनों ही बड़े शहर हैं। कोरबा भी एक बड़ा शहर है। शायद वह औद्योगिक प्रदूषण के कारण पीछे रह गया होगा। लेकिन इन तीनों शहरों में एक समान बात है कि सिटी बस सेवायें चरमरा चुकी हैं। कोरोना के बाद हालत और बुरी हुई है। जहां नागरिकों को आसान, सस्ती, सुलभ परिवहन सेवा न हो उन्हें रहने के लिये बेहतर शहर के रूप में गिना कैसे जा सकता है। शायद सर्वे में उन आम लोगों को शामिल होने का मौका नहीं मिला, जो इस तकलीफ को भोग रहे हैं।


05-Mar-2021 5:54 PM 199

पुलिस महकमे में ट्रांसजेंडर

इस समुदाय के लिये यह भर्ती इतिहास में दर्ज हो गई। रायपुर जिले से आठ, राजनांदगांव से दो तथा बिलासपुर, कोरबा और सरगुजा से एक-एक ट्रांसजेंडर को पुलिस में नौकरी मिली है। समाज में ज्यादातर लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। वे कटे से अलग रहते हैं। पर इस भर्ती ने उन्हें सहज, सम्मानजनक जीवन बिताने का रास्ता दिखाया है। 

रायपुर में विद्या राजपूत जैसी अनेक ट्रांसजेंडर अपने वर्ग को आगे बढ़ाने के लिये काम कर रही हैं और बिना किसी संकोच अधिकारियों, संस्थाओं से मिलकर न केवल अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहीं, बल्कि आम लोगों की सोच बदलने की कोशिश कर रही हैं।

समय-समय पर किन्नरों ने अपनी काबिलियत मौका मिलने पर साबित भी किया। रायगढ़ में मधु किन्नर महापौर बनीं तो अनेक लोगों ने राजनीति में किस्मत आजमाई। इन्हें शहडोल की विधायक रहीं शबनम मौसी से भी प्रेरणा मिली ही होगी। आज से छह सात साल पहले खबर आ ही चुकी है कि कोयम्बटूर में लोटस टीवी ने पहली बार एक ट्रांसजेंडर पद्मिनी प्रकाश को न्यूज एंकर बनाया था। पश्चिम बंगाल के नादिया जिले की महिला कॉलेज में मानबी बेनर्जी प्राचार्य नियुक्त हुईं। टीवी कार्यक्रमों में अपने सुलझे हुए विचारों के चलते लोकप्रिय हुईं लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने तो बाद में किन्नर अखाड़ा बनाया। इन्हें संत समाज ने महामंडलेश्वर का दर्जा भी दे दिया है। उन्होंने परम्परा से हटकर किन्नर अखाड़ा महिला, पुरुष सबके लिये खोल रखा है।

छत्तीसगढ़ पुलिस में शामिल ट्रांसजेंडर्स ने बताया कि किस तरह तरह अपमान सहते हुए वे आगे बढऩे का साहस बनाकर रखा, खुद को मजबूत रखा, हौसला टूटने नहीं दिया। स्कूल के शौचालय में बाहर से दरवाजा बंद कर दिया जाता था। ट्रकों में क्लीनर, हेल्पर और बर्तन मांजने, झाड़ू-पोछा लगाने तक का काम किया।

केन्द्र की सामाजिक अधिकारिता न्याय मंत्रालय ने इन्हें समान अधिकार दिलाने के लिये सन् 2019 में एक अधिनियम बनाया था, जिसे बीते 10 जनवरी से लागू किया जा चुका है। उम्मीद करनी चाहिये कि समाज के साथ-साथ प्रशासन की सोच भी उनके लिये बदलेगी।

टीसी नहीं मिलने पर खुदकुशी ?

पुलिस ने सिमगा जिले के एक प्राइवेट स्कूल संचालक को बीते 3 मार्च को गिरफ्तार किया है। बेमेतरा के किरीतपुर गांव के एक 52 साल के व्यक्ति ने दिसम्बर महीने में जहर खा लिया। अस्पताल में उसकी मौत हो गई। पुलिस की जांच चलती रही। पुलिस ने परिवार वालों, स्कूल स्टाफ और बच्चों से पूछताछ की तो मालूम हुआ कि स्कूल संचालक बच्चों की टीसी देने से मना कर रहा था। वह पैसे मांग रहा था। हो सकता है यह बकाया फीस के नाम पर मांगा जा रहा हो।

कोरोना लॉकडाउन के दौरान लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हुई तो इसका असर सबसे ज्यादा बच्चों पर पड़ा। वे स्कूल तो नहीं जा पाये, पर ज्यादातर निजी स्कूलों में स्कूल फीस के लिये कोई नरमी नहीं दिखाई। फीस वसूली के लिये ऑनलाइन पढ़ाई में उन्हें आईडी पासवर्ड नहीं दिये जाते थे। इसका विवाद अब तक चल रहा है। स्कूलों को समितियां बनाने का निर्देश दिया गया है, जिनमें पालक भी शामिल होंगे। फीस बढ़ाने की वजह बतानी होगी और अनुमोदन के बाद ही वृद्धि की जा सकेगी। लेकिन अधिकांश स्कूलों में समितियां नहीं बनी है और पहले की तरह फीस वसूली जा रही है। फीस को लेकर हाईकोर्ट में भी याचिकायें लगाई गई हैं।

प्राय: देखा गया है कि नियमों को लागू कराने प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग कड़ाई नहीं बरतता। निजी स्कूलों के साथ उनकी साठगांठ होने की बात भी आती है। जिस अभिभावक ने खुदकुशी कर ली वह शिक्षा अधिकारियों से शिकायत भी कर सकता था, पर शायद उसे अधिकारियों पर भरोसा नहीं था। या फिर इस रास्ते के बारे में पता नहीं रहा होगा। पर, टीसी पाने के में विफल होने के बाद उठाये गये उसके आत्मघाती कदम ने बच्चों के भविष्य को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है, जिनकी उसे फिक्र थी।

वैक्सीन लगवाने के बाद मौत

कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिये बुजुर्गों में बड़ा उत्साह दिखाई है। इतना तो स्वास्थ्य विभाग के कार्यकर्ताओं की बारी चल रही थी तब नहीं देखा गया। पर इसी बीच एक अप्रिय सूचना यह आई कि जांजगीर की एक वृद्धा की कोरोना टीका लगवाने के 18 घंटे बाद मौत हो गई। यह महिला एक दिन पहले ही अस्पताल से लौटी थी और बताया गया कि उसे शुगर व सांस की तकलीफ थी। परिजनों ने पोस्टमार्टम कराने से मना कर दिया। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि परिजनों ने इसे स्वाभाविक मौत माना और इसकी जरूरत नहीं समझी।

वैक्सीनेशन की मुहिम शुरू की गई तो यह बात कही गई थी कि जिन्हें बीमारी के लक्षण हों, सर्दी, खांसी, बुखार हो उन्हें इंजेक्शन नहीं लगाया जायेगा।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से फील्ड में काम करने वालों को साफ बताना चाहिये कि किन बीमारियों में टीका नहीं लगेगा और किनमें लगेगा। यदि कोई मरीज सिर्फ यह बता देता है कि वह स्वस्थ है तो क्या उसका कहना काफी है, या फिर उसके दावे को क्रॉस चेक करने के लिये स्वास्थ्य विभाग ने कोई सिस्टम बनाया है?

पूर्व विधायक का फेसबुक पेज हैक?

जैसे-जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ रहा है, और लोग घर-दफ्तर के कम्प्यूटर से परे भी दूसरों के कम्प्यूटरों से अपने सोशल मीडिया पेज खोलने लगे हैं, उनके पेज में घुसपैठ बढऩे लगी है। आज दोपहर राजिम के पूर्व विधायक संतोष उपाध्याय ने पुलिस में शिकायत की है कि उनके फेसबुक के वेरीफाईड पेज पर वे खुद भी आज नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनका लॉगइन बंद हो गया है। उन्होंने शक जाहिर किया है कि उनके पेज को हैक कर लिया गया है।

फेसबुक पर हर दिन ही कुछ लोगों का लिखा हुआ पढऩे मिलता है कि उनके नाम से कोई नकली पेज तैयार कर लिया गया है जिसमें उनकी असली फोटो लगाई गई है, और उस अकाऊंट से उनके दोस्तों को संदेश भेजकर कोई जालसाज कर्ज मांग रहा है। लोग ऐसी सावधानी के साथ यह अपील भी जारी करते हैं कि कोई ऐसे धोखेबाजों को पैसा न दे।

ऐसी दर्जनों किस्म की जालसाजी और धोखाधड़ी के खतरे से बचने का एक तरीका यह भी है कि लोग हर महीने-दो महीने में अपना पासवर्ड बदल दें। यही काम एटीएम के पिन नंबर के साथ भी होना चाहिए, ईमेल का पासवर्ड भी हर कुछ महीनों में बदल लेना चाहिए।  इंटरनेट पर सर्च करें तो यह दिख जाता है कि सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले पासवर्ड कौन से रहते हैं, वैसे पासवर्ड बनाने से बचना चाहिए।


04-Mar-2021 6:08 PM 194

आठ करोड़ रुपये के जाली नोट

वैसे प्रधानमंत्री कभी भुलाये नहीं जाते हैं क्योंकि जैसे ही कोई न्यूज़ चैनल खोलें, उनकी ख़बर या तस्वीर आ जाती है। पर, आज उनका वह बयान याद आ रहा है जिसमें नोटबंदी करते वक्त उन्होंने कहा था कि अब नकली नोट बाजार में लाने वालों का खेल खत्म। कुछ नहीं, केवल 8 करोड़ रुपये के नकली नोट हमारी सजग पुलिस ने आंध्रप्रदेश, ओडिशा की सीमा पर जांच के दौरान एक कार से जब्त कर लिये। आज, एक न्यूज़ चैनल की एंकर भी याद आ रही हैं जिन्होंने रहस्योद्घाटन किया था कि असली नोटों में चिप लगी होती हैं।

हैरानी यह है कि जांजगीर-चाम्पा से रायपुर आकर के जिन लोगों ने नकली नोट छापे, वे बेरोजगार नहीं हैं बल्कि उनमें एक फैक्ट्री का इंजीनियर भी है।

आपको क्या लगता है कि क्या ये लोग पहली बार में ही धरे गये। इससे पहले इन्होंने दूसरे राज्यों में  या अपने प्रदेश में नकली नोट नहीं खपाये होंगे? असली-नकली नोट पता नहीं किन-किन राज्यों से गुजर कर आपके हाथ में भी वापस आ गये होंगे। ज्यादा तनाव लेने की जरूरत नहीं है। यदि आप एक साथ तीन नकली नोट किसी को थमाते हैं, तभी आप पर केस बन सकता है। अनजाने में एक या दो नकली नोट आपके व्यवहार में आ गया होगा, तो आपका दोष नहीं। बस आशंका हो तो शिकायत कर दें।

मान गये सिंहदेव

को-वैक्सीन के 72 हजार से ज्यादा टीके स्वास्थ्य विभाग के गोदाम में पड़े हुए हैं। इसे इस्तेमाल नहीं करने की घोषणा स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कर दी थी। राज्य टीकाकरण अधिकारी समेत स्वास्थ्य विभाग के दूसरे अफसरों ने भी मंत्री की हां में हां मिलाई। इस बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके बाद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से सपत्नीक को-वैक्सीन टीका ही लगवाया। एक तरह से यह भी तो तीसरे चरण का ट्रायल था। जब शीर्ष नेता बेखौफ हैं तो बाकी की क्या बिसात कि विरोध करें। उनके टीका लगवाने पर कोई प्रतिक्रिया दी जाती, इसके पहले ही तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजे भी आ गये। इसी की तो दरकार थी। जैसी जानकारी निकली है, 80 फीसदी से ज्यादा सफलता तीसरे चरण के ट्रायल में मिली है। इस आंकड़े के बाद सिंहदेव का बयान आया है कि वे न केवल को-वैक्सीन के इस्तेमाल की इजाजत देंगे बल्कि पहला टीका भी वे ही लगवायेंगे।

अच्छा है इस मामले में राजनीति खत्म हो गई।

मीडिया के लिये बड़ा संकट

वैसे भी अधिकारी पत्रकारों से कन्नी काटते हैं। राजनीति से जुड़े लोग पत्रकारों की तब खिदमत करते हैं जब उन्हें भरोसा होता है कि इनके लिखने, छापने से उनका वजन बढ़ेगा। पर अब आम लोगों का भरोसा टूटने के दौर में हैं हम। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दौर में कुछ सीमायें थीं पर वेब पोर्टल आने के बाद हर शहर, गांव में हर दूसरे चौथे घर में एक पत्रकार पैदा हो चुका है। इनमें बहुत से लोग गंभीर हैं और अपने दायित्व को समझते हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने इसकी आड़ में न केवल अफसरों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की नाक में दम कर रखा है बल्कि मुख्य धारा मे रहकर पत्रकारिता करने वालों को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीते माह मुंगेली के एक फारेस्ट रेंजर से एक करोड़ 40 लाख रुपये वसूल करने के आरोप में एक युवती सहित दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। दोनों को जेल भेजा गया। अब जांजगीर-चाम्पा में कांग्रेस नेता को मारने के लिये दो कथित पत्रकारों ने 10 लाख रुपये की सुपारी ली। जिसे मारने के लिये सुपारी ली गई, उनसे भी वसूली की गई। दोनों व्यक्ति गिरफ्तार कर लिये गये हैं। जो लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं उन्हें भी समझना मुश्किल है कि कोई व्यक्ति इस पेशे में आ रहा है उसकी नीयत, नजरिया क्या है फिर आम लोग इसे कैसे समझेंगे? छत्तीसगढ़ सरकार इस पेशे से जुड़े लोगों को बड़ी उदारता से मान्यता देने की नीति पर काम कर रही है। आने वाले दिन इसके क्या खतरे हैं इन घटनाओं से समझ सकते हैं।


03-Mar-2021 6:55 PM 151

कोरोना पर सुविधाजनक गाइडलाइन

महाराष्ट्र के साथ-साथ ओडिशा भी उन राज्यों में शामिल है जहां कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते पाबंदियां कुछ कड़ी की गई है। दूसरे राज्यों से आने वाले यात्रियों के लिये सात दिन का होम क्वारंटीन यहां जरूरी है।

अब हो रही है रेलवे भर्ती बोर्ड परीक्षा। छत्तीसगढ़ से सैकड़ों परीक्षार्थी हैं जिनका परीक्षा केन्द्र भुवनेश्वर है। इनके सामने समस्या आ गई कि वे ओडिशा पहुंचने के बाद क्वारंटीन पर रहें या परीक्षा दें। रेलवे बोर्ड ने ओडिशा सरकार से इस समस्या पर बात की और अब यह तय है कि उन्हें क्वारांटीन पर नहीं रहना पड़ेगा। ढील चाहे किसी भी वजह से दी गई हो, यदि खतरा निश्चित है तो किसी को भी क्वारंटीन में छूट क्यों? यदि खतरा नहीं है तो बाकी लोगों पर पाबंदियां क्यों?

अपने छत्तीसगढ़ में ही देख रहे हैं कि दूसरे राज्यों खासकर महाराष्ट्र और ओडिशा से प्रदेश की सीमा पर प्रवेश करने वालों की चेकिंग करने का निर्देश जारी किया गया है, पर क्या यह हो रहा है? रेलवे ने ज्यादातर मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों को स्पेशल के ही नाम पर सही चालू कर दिया है। यहां तक कि कुछ पैसेंजर ट्रेनों की भी महाराष्ट्र (गोंदिया आदि) और ओडिशा (झारसुगुड़ा) आवाजाही हो रही है। इनमें आ जा रहे यात्रियों की चेकिंग के लिये तो रेलवे ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं।

इसलिये, कोरोना से बचे हैं तो आपकी किस्मत।

गुलाबी पर भारी सफेद प्याज

प्याज के दाम आंसू निकालने लगे थे। छत्तीसगढ़ में लाल-गुलाबी प्याज का ही चलन रहा है, पर इस बार सफेद प्याज भी बाजार में आये हैं। सफेद प्याज इस्तेमाल करने वालों ने पहले इसकी गुणवत्ता और उपयोगिता की तहकीकात की। पता चला कि यह तो प्रचलन की लाल-गुलाबी प्याज से भी ज्यादा गुणकारी है। आयुर्वेद के पन्ने बताते हैं कि पथरी, एनीमिया, ह्रदयरोग, जोड़ों के दर्द, पुरुषत्व के लिये फायदेमंद है। सफेद प्याज की मांग रायपुर के बाजारों में इसलिये बढ़ी क्योंकि सामान्य प्याज की कीमत ज्यादा हो रही थी। दाम 55-60 रुपये तक पहुंच चुके थे। इधर सफेद प्याज आई और 30 से 40 रुपये में मिलने लगी। बाजार मांग और आपूर्ति के गणित पर टिका है। अलीबाग, सूरत, भावनगर, अलवर, भरतपुर आदि राजस्थान और गुजरात के जिलों में इसका विपुल उत्पादन है। वहां ये 5-10 रुपये किलो में भी मिल जाता है। परिवहन और मुनाफा जोडऩे के बाद भी प्रचलित प्याज से कम दाम पर यह बाजार में उतर रहा है। नागपुर के बाजारों में सफ़ेद प्याज खूब चलता है।

नया किसान कानून इजाजत देता है कि सफेद प्याज की भी डम्पिंग कर दें। फिर दाम क्या होगा?

एसपी की पाठशाला

अखिल भारतीय और राज्य सेवा में पहुंचने के लिये कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। सफलता के बाद का संतोष पूरे जीवन को आनंदित कर सकता है। हजारों युवाओं की आंखों में इसका सपना तैरता है पर अवसर नहीं मिलते। अवसर हों भी तो नामुमकिन मानकर कोशिश नहीं करते।

नये बने गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिले के पुलिस अधीक्षक एसएस परिहार ने भी बड़ी कोशिशों के बाद अपना मुकाम हासिल किया। सोशल मीडिया पर उनके सैकड़ों वीडियो और हजारों दर्शक हैं, जिनमें शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं को आजमाने के टिप्स हैं। अनेक विशेषज्ञों के साथ उन्होंने बातचीत भी इनमें डाल रखी है। अब एक और पहल की। उन्होंने गौरेला में एक लाइब्रेरी खोल दी। इसमें प्रतियोगी परीक्षाओं के काम आने वाली किताबें, मैग्जीन और अख़बार हैं। एक सुविधाजनक स्टडी सेंटर है। पिछले पखवाड़े शुरू की गई लाइब्रेरी में 100 से ज्यादा लोगों ने सदस्यता ले ली है, जो बढ़ती जा रही है। संचालन आसान हो इसके लिये थोड़ा सा शुल्क है पर बीपीएल, नि:शक्त, एसटी एससी वर्ग के लिये यह सुविधा मुफ्त रखी गई है।

छत्तीसगढ़ में बीते दो-तीन साल के भीतर देखा गया है कि आदिवासी अंचल के युवाओं ने शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में बड़ी कामयाबी हासिल की है, खासकर बस्तर से। जीपीएम एसपी ने यह करके बता रहे हैं कि प्रशासनिक सेवाओं में पहुंचना, हौवा नहीं है। यह परिश्रम करने वाले हर एक युवा को हासिल हो सकता है।

बस जब उनका तबादला हो तब भी ये लाइब्रेरी चलती रहे, इसकी व्यवस्था हो जाये।


02-Mar-2021 5:35 PM 241

बड़े काम का श्रेय किसी एक को नहीं...

बिलासपुर से हवाई सेवा शुरू होने के मौके पर रखे गये समारोह में मंच पर सभी दलों के नेता थे, लेकिन विपक्ष के नेता भारी पड़ रहे थे। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने अपनी बारी आई तो गिनाया कि छत्तीसगढ़ राज्य बना, हाईकोर्ट और रेलवे जोन बिलासपुर को मिला तब अटल बिहारी बाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे। और आज जब यहां से हवाई सुविधा शुरू हुई है, तब भी केन्द्र में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है। (वैसे कांग्रेस के कार्यकाल में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, एनटीपीसी और एसईसीएल मिला है, जो अपने वक्त की बड़ी मांगें थीं।)

बस, फिर क्या था- मंच के सामने एकजुट होकर बैठे भाजपाईयों ने मोदी, मोदी, मोदी, नारे लगाना शुरू कर दिया। जिले के प्रभारी मंत्री गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू की बारी आई तो उन्होंने धीमे से पलटवार किया। सब मोदी ही दे रहे हैं तो कौशिक जी बतायें कि पिछले कार्यकाल में जब डॉ. रमन सिंह सीएम थे और दिल्ली में मोदी की ही सरकार थी, तब हवाई सुविधा शुरू क्यों नहीं हुई? यह तो भूपेश बघेल जी हैं, जिन्होंने हवाईअड्डे के लिये 27 करोड़ रुपये मंजूर कर दिये, जिसके चलते हवाईपट्टी तैयार हो पाई और उड़ानें चालू हुईं। आगे बात समेटते हुए साहू ने कहा कि जब कोई बड़ा काम होता है तो सबका योगदान रहता है। किसी एक दल या किसी एक व्यक्ति को श्रेय नहीं जाता।

जिला प्रशासन ने 30 से ज्यादा विशिष्ट अतिथि बुलाकर कार्यक्रम को गैर राजनीतिक बनाने की पूरी कोशिश की थी लेकिन तमाम नेता एक मंच पर बैठे हों तो राजनीति घुसनी ही थी।

पुलिस एक लिस्ट इनकी भी बनाये..

एक सप्ताह में दूसरी बार कांग्रेस नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं की हरकतों से शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। किसी लडक़ी से अश्लील हरकत करते हुए वीडियो कॉल वायरल होने के बाद कोंडागांव के शहर कांग्रेस अध्यक्ष जितेन्द्र दुबे को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। अब अम्बिकापुर से युवक कांग्रेस के प्रदेश सचिव दीपक मिश्रा के खिलाफ थाने में घुसकर एक सिपाही से मारपीट करने को लेकर एफआईआर दर्ज की गई है। महकमे के जवान पर हुए हमले के बावजूद पुलिस दबाव में थी और घंटों बाद रिपोर्ट लिखी जा सकी। प्रदेश युवक कांग्रेस ने अपने पदाधिकारी को पार्टी के पद से हटाते हुए जांच कमेटी बनाई गई है और पुलिस से निष्पक्ष कार्रवाई करने के लिये कहा है। मालूम तो यह भी हुआ है मारपीट में शामिल अन्य लोगों में एक और व्यक्ति कांग्रेस में किसी पद पर नहीं है लेकिन एक मंत्री का करीबी है।

भाजपा ने सतर्क विपक्ष की तरह दोनों मुद्दों को हाथों-हाथ लिया, लेकिन एक दो मामले तो उनकी पार्टी में भी कुछ दिन पहले ही हुए। दिसम्बर माह में राजनांदगांव में एक भाजपा पार्षद गगन आईच पर सरेराह दो युवतियों से छेड़छाड़, गाली-गलौच और और मारपीट का आरोप लगा। पुलिस ने करीब आधा दर्जन धाराओं में उसके खिलाफ अपराध दर्ज किया। इसी जिले के खैरागढ़ में एक भाजपा नेता और पूर्व पार्षद शेष नारायण यादव के खिलाफ छेडख़ानी और मारपीट का अपराध दर्ज किया गया। यह घटना बीते 26 जनवरी की है। पीडि़ता गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होकर लौटी थी। डोंगरगांव में मानव तस्करी का मामले की जांच में पुलिस गहराई में उतरी तो पता चला कि यह तो एक संगठित गिरोह चलाने वालों का काम है। इसमें रायपुर से गिरफ्तार महिला गंगा पांडे भाजपा से जुडी थी और उसके पति को एक पूर्व मंत्री का करीबी होने की बात भी सामने आई।

छत्तीसगढ़ में अपराधों का ग्राफ ऊपर जा रहा है। भाजपा तो अभी-अभी इसे अपराधगढ़ कहा था। ऐसे मामले सामने आते जायेंगे तो पुलिस का काम बढ़ जायेगा। एक अलग कॉलम बनाकर रिकॉर्ड रखना होगा कि अपराधियों, आरोपियों में नेतागिरी करने वालों की तादात कितनी है।

कोरोना हुआ तो पालक जिम्मेदार!

नवमीं और 11वीं की परीक्षायें ऑफलाइन मोड में लेने की छूट मिलने के बाद केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल की वार्षिक परीक्षायें शुरू हो गईं। ऑफलाइन क्लासेस में बच्चों की उपस्थिति जहां 10-20 फीसदी ही चल रही थी, वहीं मामला परीक्षा का था, इसलिये अधिकांश स्कूलों में 100 प्रतिशत उपस्थिति देखी जा रही है। हालांकि पालक चिंतित भी हैं। राजधानी के एक बड़े स्कूल में तो पालक अड़ गये। ऑफलाइन परीक्षा के लिये बच्चों को भेजने से मना कर दिया। मजबूरन स्कूल को परीक्षायें रद्द करनी पड़ी। पालकों के विरोध की एक वजह है कि ऑनलाइन पैटर्न में पूरी क्लासेस चली, जिसमें सीखने-समझने का तरीका अलग था। अब केवल परीक्षा क्यों ऑफलाइन ली जा रही है। हैरानी यह है कि कई स्कूल प्रबंधक स्कूल आने वाले छात्र-छात्राओं के पालकों से एक फॉर्म पर दस्तखत भी करा रहे हैं। इसमें लिखा गया है कि यदि बच्चों को कोरोना होगा तो स्कूल प्रबंधन नहीं, पालक ही जिम्मेदार होंगे। यह फॉर्म किसके निर्देश पर भरवाया जा रहा है? शादी, ब्याह, त्यौहारों में भीड़ इक_ी होने पर सरकार ने साफ-साफ निर्देश जारी किया है कि इसके लिये आयोजक जिम्मेदार होंगे। फिर स्कूलों में ऐसा क्यों? स्कूलों में बच्चों को बुलाकर एक जगह इक_ा कर रहा है प्रबंधन, और कोई कोरोना से पीडि़त हो जाये तो जिम्मेदार अभिभावक?   


01-Mar-2021 5:36 PM 87

प्रायोगिक परीक्षाओं के बाद सन्नाटा

कोर्स पूरा हो न हो प्रायोगिक परीक्षाओं की रिपोर्ट तो अच्छी है। माध्यमिक शिक्षा मंडल के पास पहुंचे आंकड़ों के मुताबिक 80 फीसदी स्कूलों में ऑफलाइन मोड पर ली गई प्रायोगिक परीक्षायें पूरी हो गई है। कुछ ही स्कूल बच गये हैं। प्रायोगिक परीक्षायें कोरोना काल से पहले भी औपचारिक हुआ करती थीं। अब तो शिक्षकों ने और भी उदारता बरती। ये मार्कशीट में नंबर सुधारने के काम आयेंगे। स्कूलों को खोलने के निर्देश के बाद भी अधिकांश जगह छात्र सिर्फ प्रायोगिक परीक्षा देने पहुंचे। उसके बाद फिर से सन्नाटा पसरा हुआ है। छात्रों, पालकों की बस ये चिंता है कि ऑनलाइन पढ़ाई जो ठीक से हुई नहीं, उसके बावजूद उन्हें कक्षाओं में मौजूद रहकर ऑफलाइन परीक्षा दिलानी है। पता नहीं क्या रिजल्ट आये।

बड़ी के नाम पर बड़ा घोटाला?

स्कूल शिक्षा विभाग ने सोयाबीन बड़ी की खरीदी के नाम पर बड़ा घोटाला कर दिया। ऐसा आरोप विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने लगाया। आरोप लगाते हुए उन्होंने यह चूक कर दी कि इसे प्राइवेट कम्पनी से की गई खरीदी बता दी। स्कूल शिक्षा मंत्री ने साफ किया कि किसी निजी कम्पनी से नहीं बल्कि बीज विकास निगम के माध्यम से खरीदी की गई है। दो सवाल रह गये, एक बीज निगम ने खरीदी किससे की, क्या वह प्राइवेट पार्टी थी। दूसरा, जब बाजार में 55-60 रुपये में बड़ी मिल रही है तो 105 रुपये किलो में किस आधार पर खरीदी की गई? जबाब आना बाकी है।

ब्याज के ही 5 हजार करोड़

छत्तीसगढ़ राज्य जब बना था तो इसका पहला बजट सिर्फ 6500 करोड़ रुपये का था और इसी के आसपास लगातार कई वर्षों तक यह चलता रहा। पहले तीन सालों में पेश किये गये बजट में दूसरे राज्यों के मुकाबले स्थापना व्यय कम करीब 34 प्रतिशत, होने को उपलब्धि के तौर पर गिना जाता था। छत्तीसगढ़ को वन, खनिज सम्पदायुक्त राज्य होने के कारण काफी धनी राज्य भी माना गया। बजट का दायरा भी एक लाख करोड़ को पार कर चुका है। पर आज स्थिति यह है कि राज्य सरकार पर 70 हजार करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ है। इनमें से 42 हजार करोड़ पिछली सरकार का है तो बाकी कांग्रेस की दुबारा बनी सरकार का। इस राशि के ब्याज में ही 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा जा रहे हैं जो दो तीन बड़े विभागों के कुल बजट के बराबर है। विपक्ष की यह चिंता जायज है कि ये कर्ज विकास के किसी काम नहीं लगाये गये, बल्कि लोगों को अनुदान, प्रोत्साहन, राहत बांटने में खर्च किये जा रहे हैं। क्या ग्रामीण अर्थव्यस्था में इस रकम से इतना सुधार हो पायेगा कि वे सरकार का राजस्व बढ़ाने और कर्ज चुकाने में मदद करे? 

यह नाम भी घर की बच्ची का !

लोग अपनी गाडिय़ों पर कहीं धर्म का नाम लिखवा लेते हैं, तो कहीं जाति का। डॉक्टर और वकील, सीए और पत्रकार अपने पेशे के निशान गाडिय़ों पर चिपका लेते हैं ताकि उनका जितना असर होना है हो जाए। बहुत से लोग अपने बच्चों के नाम लिखवा लेते हैं जिससे बच्चों के प्रति उनके प्रेम के साथ-साथ उनका धर्म, और कभी-कभी उनकी जाति भी उजागर होती है। ऐसे में अभी एक गाड़ी छत्तीसगढ़ विधानसभा के पास सडक़ पर देखने मिली जो गैस सिलेंडर भरकर ले जा रही थी। गाड़ी का नंबर प्लेट राजस्थान का दिख रहा था, और पीछे तीन नाम लिखे हुए थे, भाटी, भेड़, और बबलु। अब इन नामों को देखकर हैरानी होती है कि क्या किसी बच्ची का नाम भेड़ है, या घर की भेड़ को भी बच्चों की तरह ऐसे पाला जा रहा है कि उसका नाम भी गाड़ी पर लिखवाया गया है!

 


28-Feb-2021 6:19 PM 291

अफसर और अतिथि

पिछले दिनों दादा साहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म अवॉर्ड फंक्शन में फिल्मी हस्तियों को अवॉर्ड बांटकर टूरिज्म बोर्ड की एमडी रानू साहू सुर्खियों में आ गईं। अवॉर्ड फंक्शन में रानू साहू बतौर अतिथि मौजूद थीं। उन्होंने अभिनेत्री सुष्मिता सेन और राधिका मदान को अवॉर्ड प्रदान किया। अब कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विधिवत अनुमति ली है अथवा नहीं, इसको लेकर प्रशासनिक हल्कों में कानाफूसी शुरू हो गई है।

कार्यक्रम का वीडियो क्लिप वायरल होने के बाद यह भी पता लगाया जा रहा है कि बोर्ड की तरफ से कोई अनुदान तो नहीं दिया गया है। क्योंकि बोर्ड तकरीबन दिवालिया होने के कगार पर है। कुछ साल पहले इंडोर स्टेडियम में आयोजित केबीसी के कार्यक्रम में दो अफसरों ने अमिताभ बच्चन के साथ ठुमके क्या लगा दिए थे, उन्हें नोटिस थमा दिया गया था। रानू साहू के मामले में क्या होता है, यह देखना है।

जोगी पार्टी एनडीए की...

 खबर है कि जोगी पार्टी एनडीए का हिस्सा बनना चाहती है। अमित जोगी इसके लिए कोशिश भी कर रहे हैं। अमित की इस सिलसिले में केन्द्रीय मंत्री रामदास आठवले से बात भी हुई है। वैसे तो एनडीए का हिस्सा न होने के बावजूद जोगी पार्टी और भाजपा के बीच बेहतर तालमेल है। विधानसभा में दोनों ही एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आते हैं।

नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव में भी जोगी पार्टी ने कई जगह भाजपा को सपोर्ट किया था। जोगी परिवार जब कांग्रेस में था, तब भी उन पर भाजपा के साथ सांठ-गांठ कर कांग्रेस के लोगों को हराने का आरोप लगता था। अब जब भाजपा के साथ खुलकर दिख रहे हैं, ऐसे में देर सवेर एनडीए का हिस्सा बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

धान के बोनस पर ग्रहण तो नहीं लगेगा?

धान खरीदी पर किसानों को 2500 रुपये का भुगतान करने का पेंच फंसता जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के साथ मुख्यमंत्री की बातचीत उन्हीं के शब्दों में ‘निराशाजनक’ रही है। केन्द्र को समर्थन मूल्य से अधिक कीमत पर धान खरीदने पर आपत्ति है। इससे छत्तीसगढ़ से खरीदा गया धान और उससे बने चावल का एफसीआई में समायोजन नहीं हो पा रहा है। यदि केन्द्र का रुख नरम नहीं होता है तो छत्तीसगढ़ को भारी आर्थिक नुकसान होना तय है।

केन्द्र ने राज्य सरकार की इस दलील को मानने से इंकार कर दिया है कि राजीव गांधी किसान न्याय योजना, केन्द्र की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना जैसी ही है। इसे धान पर ही समर्थन मूल्य के अतिरिक्त दी जाने वाली राशि के तौर पर देखा जा रहा है, जो सच भी है। राजीव न्याय योजना को जब तक धान से अलग नहीं किया जायेगा, धान के उठाव में केन्द्र के साथ तनातनी चलती रहेगी। सरकार को ऐसे रास्ते ढूंढने की जरूरत पड़ेगी जिसमें किसानों को अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी मिले पर वह केवल धान की बिक्री की वजह से न हो। वैसे भी राजीव न्याय योजना की राशि की अंतिम चौथी किस्त मार्च 2021 तक देने की घोषणा तो सरकार ने कर दी है, पर इस साल खरीदे गये धान की अतिरिक्त राशि कब दी जायेगी, इस पर कोई घोषणा नहीं की गई है।

कांग्रेस पदाधिकारियों की लम्बी सूची

हाल ही में भाजपा ने अनेक मोर्चा पदाधिकारियों, कार्यकारिणी की सूची जारी की। प्रदेश स्तर से जारी सूची में कई विवाद खड़े हुए। कुछ जिलों में अब तक नियुक्तियां आम सहमति नहीं बन पाने की वजह से ही नहीं हो पा रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस में इस तरह का कोई झंझट ही नहीं। सबको संतुष्ट करना हो तो एक पद पर दस, बीस, तीस लोगों को बिठा दो। जिले से नाम कट गया तो प्रदेश से जुड़वा लो। नये बने जिले गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही में ऐसा ही हुआ। जिला कांग्रेस कमेटी ने बीते दिनों जिले के कार्यकारिणी की एक सूची अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अनुमोदन व प्रदेश कांग्रेस की सहमति लेकर जारी कर दी। इसमें बहुत से लोग छूट गये। छूटे हुए लोग नाराज हो गये। वे सीधे प्रदेश कार्यालय पहुंच गये। वहां वे महामंत्री रवि घोष से मिले। महामंत्री ने कहा, कोई बात नहीं, बताइये किनका नाम जोडऩा है। उन्होंने नाम दिये और एक अतिरिक्त सूची फिर जारी कर दी गई। अब जिला इकाई हैरान है। उनकी जानकारी या अनुशंसा के बगैर प्रदेश से यह अतिरिक्त सूची कैसे जारी हो गई। वे इन नये नामों को मानने के लिये तैयार नहीं हैं। कहा है कि वे ही पदाधिकारी काम करेंगे जिनका नाम पहली सूची में है। अतिरिक्त नाम जुड़वाने वालों को शायद ऐतराज न हो, क्योंकि काम करने के लिये पद लेता ही कौन है?  प्रदेश कांग्रेस से जारी लेटर पैड में उनका नाम है, उनका लेटर पैड, विजिटिंग कार्ड भी इसी के सहारे बन जायेगा।

स्वामी आत्मानंद स्कूलों के लिये सेल

निजी स्कूलों में बच्चों को दाखिला दिलाने का एक बड़ा कारण होता है, पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होना। पर यदि कोई सर्वे किया जाये तो मालूम होगा कि कोर्स की तकनीकी अंग्रेजी के अलावा व्यावहारिक अंग्रेजी का ज्ञान उन्हें बहुत कम स्कूलों से मिल पाता है। हिंदी से उनका नाता तो टूट ही चुका रहता है, अंग्रेजी में भी निपुण नहीं होते।

अब छत्तीसगढ़ सरकार ने निजी स्कूलों की ही टक्कर में स्वामी आत्मानंद इंग्लिश स्कूल खोल दिये हैं। अब तक 50 से अधिक स्कूल खुल चुके हैं, जबकि कुल 118 खोले जाने हैं। प्रवेश के लिये बड़ी संख्या में आवेदन आये। वजह यह है कि एक तो इसका माध्यम अंग्रेजी है, दूसरा कम फीस पर यहां उपलब्ध कराई सुविधायें किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल से कम नहीं। पर, इन स्कूलों की लोकप्रियता आगे तभी बनी रह सकती है जब शैक्षणिक स्तर भी ऊंचा बनाकर रखा जाये।

पहली बार स्कूलों में पढ़ाई के स्तर पर निगरानी के लिये अलग से सेल राज्य स्तर पर बना दिया गया है। इसमें संयुक्त संचालक स्तर के अधिकारी को प्रमुख बनाया गया है। ये स्वामी आत्मानंद स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर निगरानी रखेंगे और आवश्यकता अनुसार शोध कर उसमें सुधार लायेंगे। विशेषकर अंग्रेजी ज्ञान व्यवहारिक और आम जीवन में भी उपयोगी हो, इस पर बल दिया जायेगा। इन स्कूलों के परिणाम को लेकर शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों में बड़ी जिज्ञासा है। क्या दिल्ली की तरह छत्तीसगढ़ में ऐसा हो पायेगा कि सरकारी स्कूलों के परिणाम निजी से बेहतर आये।


27-Feb-2021 6:15 PM 225

पेट पर वार

विधानसभा में अकसर ऐसा मौका आता है, जब सरकार के मंत्री पिछली सरकार के भ्रष्टाचार, या फिर भाजपा नेताओं के कारोबार पर कटाक्ष कर देते हैं, और सदन का माहौल गरम हो जाता है। ऐसे ही धान की मिलिंग-परिवहन के सवाल पर खाद्य मंत्री अमरजीत भगत घिरने लगे, तो वे सवाल करने वाले भाजपा सदस्य शिवरतन शर्मा से कह गए, कि आपको तो परिवहन की काफी जानकारी है।

फिर क्या था, शिवरतन शर्मा भडक़ गए, और उन्होंने मंत्री से कहा कि उन्हें न सिर्फ परिवहन बल्कि आपके पूरे विभाग की जानकारी है। दरअसल, शिवरतन शर्मा के परिवार के लोग नान के बड़े परिवहनकर्ता हैं। परिवहन संबंधी गड़बड़ी के एक मामले में शिवरतन के परिवार के एक सदस्य के खिलाफ डेढ़ साल पहले प्रकरण भी दर्ज हुआ था। और जब अमरजीत ने शिवरतन के पारिवारिक व्यवसाय पर कटाक्ष किया, तो उनका भडक़ना स्वाभाविक था।

ऐसी-ऐसी जानकारी मांगी

सरकार के एक मंत्री, अपने तिकड़मी पीए की वजह से बुरी तरह उलझते-उलझते रह गए। पीए, हमेशा कारोबारियों के संगत में रहते हैं, और उन्होंने मंत्रीजी के नाम से अपने विभाग के प्रमुख सचिव से ऐसी-ऐसी जानकारी मांगी, जिससे बाद में दिक्कतें पैदा हो सकती थी। सुनते हैं कि जिस अंदाज में पीए ने प्रमुख सचिव से जानकारी चाही, उससे शक पैदा हो गया। प्रमुख सचिव ने तुरंत मंत्रीजी से संपर्क साधा, और जानना चाहा कि वाकई उन्होंने इस तरह की जानकारी मांगी है? मंत्रीजी ने अनभिज्ञता जताई। पीए की इस हरकत पर मंत्रीजी, कोई कार्रवाई करते, उन्हें बचाने के लिए कई प्रभावशाली लोग आगे आ गए। फिर क्या था, पीए की कुर्सी बच गई।

क्या पैर उखड़ रहे हैं नक्सलियों के?

बस्तर में माओवादी कितने सक्रिय और ताकतवर हैं इसके लिये अगर मुठभेडों को पैमाना माना जाये तो लगातार सरकार की स्थिति सुधर रही है। सन् 2020 में कुल 84 मुठभेड़ हुईं, जो 2019 की 121 और 2018 की 166 मुठभेड़ के मुकाबले काफी कम हैं। पर ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नई सरकार के बनने के बाद ही यह स्थिति बनी। मुठभेड़ों में कमी पिछले पांच सालों से दर्ज की जा रही है। 2016 में 211, 2017 में 198 मुठभेड़ हुईं थीं। यानि गिरावट का सिलसिला भाजपा की सरकार के रहने के दौरान ही शुरू हो चुका था।

यह कहा जाता है कि बस्तर के औद्योगिकीकरण के लिये असहमति, अधिसूचित क्षेत्रों के लिये बने कानूनों और ग्राम सभाओं की परवाह किये बिना पूर्ववर्ती सरकार के दौरान बड़ी-बड़ी परियोजनायें लाई गईं, जिसकी रफ्तार में अब कमी आई है। पर बीते एक साल से जो ख़बरें आ रही हैं, उससे भी आभास मिलता है कि नक्सली मूवमेंट कम क्यों हो रहे हैं। अक्टूबर 2019 में मारे गये एक नक्सली के पास से बरामद पत्र में खुलासा हुआ था कि सरकारी नीतियों के प्रति आदिवासियों का झुकाव बढऩे के कारण उन्हें अपना पैर जमाये रखने में दिक्कत हो रही है। बीते साल जनवरी में खबर आई थी कि नये लड़ाके नक्सली संगठनों में शामिल होने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। वे अपनी संख्या बढ़ाने के लिये हर परिवार से एक लडक़ा और 50 रुपया मांग रहे हैं। वैसे नक्सली यहां के व्यापारियों, कुछ चिन्हित विभागों और सरकारी निर्माण कार्य में लगे ठेकेदारों से आम तौर पर फंड जुटाते ही रहे हैं। पर उनके आर्थिक स्त्रोत घटे हैं।

इसके बावजूद क्या सचमुच नक्सलियों के पैर उखड़ रहे हैं? नई सरकार बनने के बाद ही भाजपा के एक विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। बस्तर पुलिस ने बीते साल खुलासा किया था कि कम संख्या में अधिक प्रभावी हमला करने के लिये नक्सली स्नाइपर ट्रेनिंग देने की योजना पर काम कर रहे हैं। हाल ही में पुलिस द्वारा चिपकाये गये एक पर्चे को भाजपा ने मुद्दा बनाया था, जिसमें ग्रामीणों को नक्सली खतरे के चलते गांव छोड़ देने की सलाह दी गई थी।

कोदो, कुटकी के लिये एमएसपी

दिल्ली में आंदोलनरत किसानों की मांगों में तीनों कृषि कानून वापस करने के अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाने की मांग भी शामिल है। केन्द्र सरकार का रुख अब तक तो इस पर साफ नहीं है, सिवाय इसके कि विचार करेंगे। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने धान पर समर्थन मूल्य के साथ राजीन किसान बोनस और कई स्थानीय फसलों, वनोपज को समर्थन मूल्य पर देने का फैसला लिया। इसी पर आगे कदम बढ़ाया गया है कोदो, सवां, ज्वार, कुटकी, बाजरा आदि का समर्थन मूल्य तय करना। छोटे किसान और जंगल में तराई में खुली जमीन पर खेती करने वाले आदिवासी इसे बड़े पैमाने पर उगाते हैं। इसमें पानी और खाद की कम जरूरत पड़ती है, लागत कम आती है। आम तौर पर कोदो, कुटकी गरीबों की ही खेती है। कोदो कुटकी पौष्टिक होने के अलावा ब्लड प्रेशर, शुगर आदि रोगों के लिये कारगर है। औषधियों में भी इसका उपयोग होता है। अभी इसका कोई दाम नहीं। व्यापारी, आढ़तियों की मनमानी चलती है। एमएसपी तय होने से किसानों को मेहनत का वाजिब भुगतान होने की संभावना बनती है। पर यहां दिक्कत यह है कि कहीं किसान जब तक खरीदी केन्द्र में अपनी उपज लायें, उसके पहले व्यापारी ही उन तक पहुंच जाये और कम दाम देकर खरीद लें। खरीदी की व्यवस्था निचले स्तर पर हो तो ही इसका लाभ उत्पादक किसानों को मिलेगा वरना आढ़तिये ही उनकी उपज लेकर खरीदी केन्द्रों में खड़े दिखेंगे।

हर सवाल का एक जवाब...

विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिये कांग्रेस वही कर रही है जो दिल्ली में बैठी भाजपा सरकार कर रही है। यानि उनके कार्यकाल का अध्याय खोलकर रख देना। पूर्व स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप ने आरोप लगाया कि आरटीई के 74 लाख रुपये गबन कर लिये गये। गरीब बच्चों की फीस की बंदरबांट कर ली गई। आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। टेकाम ने जवाब देते हुए कहा कि 250 करोड़ रुपये आरटीई के अब भी केन्द्र के पास रुके हुए हैं, वह राशि दिलवायें। आगे यह भी कहा कि भाजपा के समय शिक्षा और परीक्षा का क्या हाल था, सब जानते हैं। परीक्षार्थी की जगह कोई दूसरा बैठकर परीक्षा देता था। जाहिर है, यह कश्यप पर सीधे प्रहार था, क्योंकि मामला सीधे-सीधे उनसे ही सम्बन्धित था। दूसरी तरफ केदार कश्यप द्वारा उठाया गया मामला गंभीर है। जनवरी में रायपुर से रिटायर्ड हुए जिला शिक्षा अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने आरटीई फीस के रूप में 74 लाख ऐसी स्कूलों को लौटाये जो बंद थे। रकम भी स्कूल के खाते में नहीं, निजी एकाउन्ट में डाले गये। अब इस बहस में घोटाले पर क्या कार्रवाई हुई या होगी, लोग नहीं जान सकें।

फोटोग्राफर सत्यप्रकाश पांडेय ने देखा और लिखा-

‘बिलासपुर के पक्षियों के गाँव ‘कोपरा’ में पिछले दिनों कुछ लोग पहुंचे, चिडिय़ों के लिए महोत्सव रखा गया था। सरकारी कोशिशों के बीच पक्षियों के संरक्षण को लेकर जागरूकता की अलख जगाने के दावे किए गए। पक्षी महोत्सव का नफा-नुकसान भविष्य की तारीखें तय करेंगी, फिलहाल वन अफसर के उन दावों का सच तस्वीरें बयान कर रहीं हैं जिसमें स्वच्छता का उल्लेख था। अरे साहब। मेला, महोत्सव के बाद भी कोपरा हो आये होते। पढ़े-लिखे और जागरूकता का संदेश देने पहुंचे लोगों द्वारा छोड़ी गई हकीकत आपको भी दिखाई पड़ जाती। ये खाने के पैकेट्स और पन्नियों का कचरा जगह-जगह किसी और ने नहीं बल्कि महोत्सव में उत्सव मना रहे कुछ लोगों ने छोड़ा है।’ 


26-Feb-2021 6:19 PM 232

बस नाम ही काफी है!

बाजार में मुकाबला इतना अधिक हो गया है कि लोगों को अटपटे नाम रखकर अपनी दुकान की तरफ ग्राहकों को खींचने का काम करना पड़ता है। राजधानी रायपुर से लगे हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चुनाव क्षेत्र अमलेश्वर में अगल-बगल के दो बिरयानी-सेंटरों के नाम देखें, ताबड़-तोड़ बिरयानी, धाकड़ बिरयानी। अब यहां सामने से निकलने वाले स्कूली बच्चे इन्हें देखते हुए निकलेंगे तो स्कूल में हिन्दी के पर्चे में ताबड़-तोड़ और धाकड़ के क्या मतलब लिखेंगे? यहीं अमलेश्वर के एक भोजनालय का बोर्ड देखें- आखरी ठिकाना भोजनालय! (यहां खाने के बाद कुछ और बाकी ही नहीं रहता है क्या?)

लेकिन देश के अलग-अलग प्रदेशों में कई नामी-गिरामी दुकानें भी अटपटे नाम रखती हैं। एक नाम कई शहरों में देखने मिलता है- ठग्गू के लड्डू! और इस दुकान का नारा रहता है- ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे हमने ठगा नहीं...

कई शहरों में बेवफा चायवाले दिखते हैं। ये लोग पत्नी से प्रताडि़त लोगों के लिए मुफ्त में चाय देते हैं, प्यार में धोखा खाए हुए लोगों के लिए रियायती चाय, प्रेमी जोड़ों के लिए अलग दाम की चाय, अकेलेपन की चाय और अलग दाम की।

एक ‘बेकरार छोले’ वाले का बोर्ड देखें तो उस पर लिखा है- दिल्ली के दिलजले छोले, दिल को जलाएं।

मंत्री भगत के पुत्रों को क्लीन चिट

जशपुर में मंत्री अमरजीत सिंह भगत के बेटों पर कोरवा आदिवासियों की जमीन हड़पने के आरोप पर जांच हो गई और नतीजे भी आ गये। इसमें भगत के पुत्रों की कोई गलती नहीं पाई गई। कलेक्टर ने 7 कोरवा आदिवासियों की शिकायत के आधार पर जांच समिति बनाई। निष्कर्ष निकाला कि सौदे में कोई दबी-छुपी बात नहीं थी। जिनकी जमीन खरीदने का सौदा हुआ वे भूमिहीन नहीं बल्कि उनके संयुक्त खाते में 100 एकड़ से अधिक जमीन दर्ज है। दरअसल, जिस जमीन का सौदा हुआ वह संयुक्त नाम पर था और इस सौदे से कुछ सदस्य असहमत थे। आम सहमति नहीं बनने के बाद तय यह किया गया कि यह जमीन वापस कर दी जायेगी। ऐसी घोषणा मंत्री ने अपने बेटों की ओर से पहले ही कर दी थी। वैसे यह तय है कि किसी भी संयुक्त खाते की जमीन में सभी हिस्सेदारों की जब तक सहमति नहीं होगी, सौदे पर सभी के हस्ताक्षर नहीं होंगे, तब तक जमीन बिक ही नहीं सकती। इस मामले में इतनी आशंका जरूर हो सकती थी कि मंत्री पद के प्रभाव में असहमत लोग भी सहमत करा लिये जाते, पर, शायद बात बनी नहीं हो। विरोधियों ने संरक्षित जाति और भूमिहीनों का मामला कहकर इसे सनसनीखेज बना दिया था। कहीं इसकी वजह यही तो नहीं थी कि प्रशासन कम से कम इसी बहाने अलर्ट मोड में आये और जो लोग सौदे से सहमत नहीं हैं, उनकी मदद हो जाये?

पहचानो तो जानें!

करीब 32 बरस पुरानी यह तस्वीर राजीव गांधी के वक्त की है जिसमें सेवादल के एक ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनिंग कैम्प में शामिल एक नौजवान है। छत्तीसगढ़ के लोग भी इस वर्दीधारी सेवादल कार्यकर्ता को मुश्किल से ही पहचान पाएंगे।

मास्क नहीं पहनने पर फिर कड़ाई..

कोरोना संक्रमण का पहला केस छत्तीसगढ़ में 18 मार्च 2020 को आया था, जब लंदन से लौटी एक युवती की जांच हुई थी। उस वक्त वह जो हडक़म्प मचा तो कई इलाकों को सील कर दिया गया। छत्तीसगढ़ में कोरोना की रफ्तार सुस्त पड़ चुकी थी, जिससे लग रहा था कि साल पूरा होते-होते मास्क उतर जायेगा, सोशल डिस्टेंस रखने की बाध्यता खत्म हो जायेगी और इसका अंतिम संस्कार कर दिया जायेगा। लेकिन पड़ोसी राज्यों खासकर महाराष्ट्र में फिर से केस बढऩे लगे। अब देश के टॉप 10 प्रभावित राज्यों में छत्तीसगढ़ आ गया है, सरकार फिर से अलर्ट मोड पर आ गई है। कल से पुलिस ने फिर मास्क पहने बिना बाहर निकलने वालों पर सख्ती शुरू की । कई जिलों में 200 से लेकर 500 लोगों पर 100-100 रुपये का जुर्माना लगाया गया । यह कार्रवाई आज भी चल रही है।

वैसे कोरोना केस कम होने और वैक्सीन आ जाने के बाद भी मास्क पहनना जरूरी है, स्वास्थ्य विभाग और सरकार की दूसरी एजेंसियां लगातार बता रही थीं। इसके बावजूद लोग इसकी अवहेलना कर रहे थे। टीवी, न्यूज पेपर और टेलीफोन डायल टोन पर आने वाले संदेशों को सब उपेक्षित करने लगे थे। अब पुलिस ने फिर मोर्चा संभाला है। संभलने की जरूरत है। ताकि लॉकडाउन 4 की नौबत न आये। पुलिस के अच्छे-बुरे बर्ताव के वो दिन फिर न लौटें।

धान चावल बेचने का समय सही?

छत्तीसगढ़ केबिनेट ने किसानों से खरीदे गये अतिरिक्त धान की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी है। 16 फरवरी से ट्रेडर्स और मिलर्स का पंजीयन भी शुरू हो गया है। केन्द्र और राज्य सरकार की चावल की जरूरत पूरी होने के बाद करीब 20.8 लाख मीट्रिक धान को बेचने का निर्णय लिया गया है। यदि तय बेस प्राइज 2057 रुपये पर भी धान बिक जाता है तो सरकार को करीब 450 रुपये घाटा तो सिर्फ उस राशि का है जो वह किसानों को समर्थन मूल्य और राजीव गांधी न्याय योजना के अंतर्गत देती है। लेकिन खरीदी के लिये प्रबंध करने, परिवहन में भी अच्छी खासी रकम खर्च होती है। भाजपा के आरोप को मानें तो पिछले साल करीब 1000 करोड़ रुपये का धान खुले गोदामों में पड़े रहने से खराब हो गया। धान बर्बाद हो, इससे बेहतर तो इसकी घाटे पर ही सही नीलामी कर देना समझ का फैसला लगता है। इधर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि धान, चावल बेचने के लिये यह सही समय नहीं है। बाजार में इसकी अभी मांग नहीं है और उपलब्धता काफी है। धान सुरक्षित रखा जाये और बाद में बेचा जाये।

वास्तव में, मुद्दा तो सुरक्षित रखे जाने का ही है। बीते 20 सालों में अतिरिक्त उपज को संभाल सकने का मैकेनिज्म छत्तीसगढ़ में बन नहीं सका। धान ही नहीं दूसरी फसलों के लिये भी। जरूरी है कि बड़ी संख्या में शेड, चबूतरे हों, कोल्ड स्टोरेज और गोदाम हों और मांग के समय बाजार में इन्हें निकालें। फिलहाल जो धान रखा रहेगा वह कुछ या ज्यादा खराब होना ही है।


25-Feb-2021 6:06 PM 263

असम में विकास, मोदी का नहीं, कांग्रेस का..

असम में विकास उपाध्याय का डंका बज रहा है। तीन महीने पहले ही उन्हें कांग्रेस हाईकमान ने असम प्रदेश कांग्रेस का सह प्रभारी बनाया था। इन तीन महीनों में विकास और उनकी टीम ने खूब मेहनत की है, और इसका प्रतिफल यह रहा कि सभी बूथ कमेटियां चार्ज हो गई, और   तकरीबन हरेक विधानसभा में कार्यकर्ताओं का अच्छा खासा नेटवर्क तैयार हो गया है। सीएम भूपेश बघेल को चुनाव प्रभारी बनाया गया है, और उनके कार्यक्रम में अच्छी खासी भीड़ उमड़ी है।

कुल मिलाकर विकास और उनकी टीम  के कार्यों की पार्टी बड़े नेता भी तारीफ कर रहे हैं। हाल यह है कि असम में पार्टी के कार्यक्रम में विकास हो या न हो, उनकी तस्वीर जरूर होती है। विकास कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं, लेकिन यदि असम में चुनाव नतीजे अनुकूल आए, तो विकास का कद बढऩा निश्चित है। हालांकि यह आसान भी नहीं दिख रहा है। पार्टी के नेता मानते हैं कि पार्टी संगठन को छह महीना पहले ही सक्रिय होना चाहिए था। खैर, पार्टी को अभी भी असम में काफी उम्मीदें हैं। 

अमितेश उत्तेजित क्यों

अमितेश शुक्ल विधानसभा के बजट सत्र में काफी सक्रिय दिख रहे हैं। वे मौके-बेमौके पर खड़े होकर भाजपा को खूब कोसते नजर आ रहे हैं। सत्ता और विपक्षी सदस्य उनके तेवर का खूब लुफ्त भी उठा रहे हैं। बुधवार को अमितेश खड़े हुए, और शराब बिक्री से जुड़े नारायण चंदेल के सवाल-जवाब के बीच कूद पड़े, और भाजपा पर हमला बोलने लगे। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमितेश उत्तेजित क्यों है? उन्होंने उत्तेजना का कारण पूछ लिया? इस पर रविन्द्र चौबे ने कहा कि अमितेश उत्तेजित क्यों हैं, ये तो वे ही बता पाएंगे। इस पर अजय चंद्राकर ने कहा कि अमितेश जी आपको (रविन्द्र चौबे) को हटाने के लिए मेहनत कर रहे हैं। इस पर सदन में जमकर ठहाका लगा।

22.5 करोड़ का एक इंजेक्शन!

कोरबा के एक एसईसीएल कर्मचारी सतीश कुमार की 14 माह की शिशु सृष्टि की जान बचाने के लिये भरसक कोशिश हो रही है। सृष्टि स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी टाइप-1 बीमारी से पीडि़त है। उसका पूरा शरीर लगभग पैरालाइज है और वह कृत्रिम सांसों के सहारे जी रही है। इसका इंजेक्शन ‘जोलजेन्समा’ भारत में नहीं मिलता। इसे स्विट्जरलैंड नोवार्टिस कम्पनी से मंगाना होगा और इसे भारत लाने की टैक्स सहित कीमत होगी 22.5 करोड़ रुपये। महाराष्ट्र की पांच माह की तीरा को भी यही बीमारी है। वहां पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस की कोशिश के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से 6.5 करोड़ आयात शुक्ल माफ करने की घोषणा की गई है, जिसके चलते अब 16 करोड़ रुपये में यह दवा मिल जायेगी। सृष्टि के लिये भी यदि आयात शुल्क माफ कर दिया जाता है तब भी 16 करोड़ की व्यवस्था कैसे हो? यह इतनी बड़ी रकम है कि किसी आम आदमी के पास होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अमीरों को भी हाथ फैलाने के लिये मजबूर कर सकती है। कोयला कर्मचारियों के एक यूनियन ने कहा है कि यदि एक दिन का वेतन सभी कर्मचारी मिलकर दे दें तो इतनी बड़ी रकम इक_ी हो सकती है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने भी प्रधानमंत्री मोदी तथा कोयला मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि कोल इंडिया सृष्टि के इलाज का खर्च उठायें।

यह जिज्ञासा लोगों में है कि इस इंजेक्शन में ऐसा क्या है कि कीमत 16 करोड़ रुपये है? एक अख़बार में नोवार्टिस के भारत में प्रतिनिधि सीईओ नरसिम्हन का बयान है कि यह दवा मेडिकल थैरिपी की एक बड़ी खोज है। यह अत्यन्त दुर्लभ बीमारी है, साथ ही जैनेटिक भी है। यानि किसी एक को हुआ है तो उसकी बाद वाली पीढ़ी को भी हो सकती है। यह इंजेक्शन न केवल मरीज को ठीक करता है बल्कि आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिये जीन को रिप्लेस कर देता है। रिसर्च पर होने वाले खर्च और दवाओं की मांग के आधार पर कीमत तय होती है। तीसरे चरण के ट्रायल के बाद कम्पनी ने  इसकी लागत के आधार पर कीमत 16 करोड़ रुपये तय की है। दवा की कीमत मांग बढऩे पर कम होगी। शुक्र है, कोरबा की सृष्टि और महाराष्ट्र की तीरा की उम्र दो साल से कम है। इसलिये उन्हें सिर्फ एक डोज देना होगा। यदि दो साल से ज्यादा उम्र की होती तो उन्हें चार टीके लगाने पड़ सकते थे।

बहरहाल, जब तक सांस, तब तक आस की स्थिति चल रही है और हर किसी को लग रहा है कि किसी तरह सृष्टि को नया जीवन मिल जायेगा। सृष्टि के पिता, उनके दोस्त, परिवार के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी है। उम्मीद है कि वे किसी तरह सृष्टि को नया जीवन दे पायेंगे।

अब रेलवे किराया घटाने वाली नहीं

कोरोना संक्रमण के बाद लॉकडाउन लगाने के बाद बिलासपुर रेलवे जोन से चलने वाली अधिकांश एक्सप्रेस ट्रेनों को अधिक किराये पर स्पेशल ट्रेनों के नाम से चलाया जा रहा था। इसके बाद दबाव बढ़ा तो लोकल पैसेंजर ट्रेनों को भी शुरू किया गया। पर किराया स्पेशल के नाम पर अधिक ही रखा गया। अब चूंकि यातायात के बाकी साधनों का सामान्य परिचालन शुरू हो चुका है, रेलवे के सामने भी सवाल है कि आखिर सामान्य टाइम टेबल, पुरानी रूट और स्टापेज रखते हुए आखिर कितने दिनों तक किसी ट्रेन को स्पेशल के नाम पर चलायें? धीरे-धीरे स्पेशल ट्रेनों को सामान्य करना ही होगा। पर, सवाल यह है कि स्पेशल ट्रेनों के नाम पर जो अतिरिक्त किराया मिल रहा है उसका क्या होगा। इसके चलते अब रेलवे ने घोषणा कर दी है कि लोकल ट्रेनों में न्यूनतम किराया 30 रुपये तय कर दिया गया है। रेलवे की ओर से लगभग साफ कर दिया गया है कि ट्रेनों को जब स्पेशल की जगह सामान्य ट्रेनों की तरह चलाया जायेगा तब भी इस किराये में कोई कमी नहीं की जायेगी। रेलवे ने इसकी वजह पहले ही की तरह भीड़ को कम बनाये रखने की बताई है। दरअसल, लम्बी दूरी के यात्रियों का किराया इस अनुपात में नहीं बढ़ाने की वजह है कि इसके विकल्प के रूप में लोग शेयर टैक्सी या हवाई जहाज का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर कम दूरी की यात्रा अकेले करनी हो तो ट्रेन ही उनके लिये आसान साधन रहा है। हजारों नौकरीपेशा और छोटे मोटे रोजगार धंधा करने वालों के लिये अब अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा रेलवे टिकटों पर खर्च करना होगा। जो लोग रोजाना सफर करते हैं उनके लिये यह परेशानी भरा है क्योंकि अब तक मासिक सीजन टिकटों का बनना शुरू नहीं हुआ है। हो सकता है बाद में मासिक टिकटें शुरू की जायें पर कोरोना काल के पहले की तरह रियायत मिलेगी, इसकी उम्मीद कम ही है।

करोड़पति हुए कोटवार

मालगुजारी के जमाने से कोटवारों को सेवायें देने के लिये खेती की जमीन बांट दी जाती थी, जिसे वे बेच नहीं सकते पर पीढिय़ों तक हस्तांतरित होती रहती है। इक्के-दुक्के ऐसे मामले आते रहते हैं जिसमें कोटवारी जमीन को अवैध तरीके से पटवारी और राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर मालिकाना हक वाली बता दी गई। बाद में इसे बेच दिया गया। पर गरियाबंद जिले में तो एक साथ इतने मामले पकड़ में आये हैं कि प्रशासन भी हैरान है। अकेले देवभोग तहसील में 50 कोटवारों ने 219 लोगों को अपनी सेवा भूमि बेच दी। यह खेल 2016 से हो रहा है। बस्तियों के विस्तार के साथ-साथ नई सडक़ें बनीं, राज्य मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग बने, जिसके बाद कोटवारी जमीन खेती की जगह कमर्शियल इस्तेमाल के लायक हो गई। कोटवारों को गुजर-बसर के लिये 5 एकड़ से लेकर 30 एकड़ तक जमीन आबंटित की जाती है। अब इस जमीन के मालिक वे नहीं, कई बड़े-बड़े कारोबारी हैं। देवभोग के अलावा जिले के दूसरे हिस्सों से भी ऐसे ही मामले सामने आये हैं। अब इन भूखंडों पर बड़ी-बड़ी इमारत भी खड़ी हो चुकी है। प्रशासन का कहना है कि पहले वे यह खरीद-बिक्री अवैध घोषित करेंगे फिर बेदखल। लेकिन जमीन जिसने खरीद ली, कब्जा कर लिया उसे हटाना, बेदखल करना कितना मुश्किल है यह किसी भी तहसील या एसडीएम ऑफिस में लम्बित मुकदमों का आंकड़ा निकालकर समझा जा सकता है।


24-Feb-2021 5:52 PM 189

को-वैक्सीन को ना, कोरोलिन को हां ?

एक बार फिर बाबा रामदेव ने कोरोलिन दवा को कोरोना के उपचार के लिये कारगर बताते हुए लांच कर दिया। इस बार पुख्ता तैयारी थी कि उनके दावे पर कोई सवाल न उठे। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तो थे ही, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी मौजूद थे। बाबा रामदेव ने दावा किया कि इस दवा को भारत सरकार ही नहीं, डब्ल्यूएचओ ने भी सर्टिफाई किया है।

कोशिश यही थी कि पतंजलि के इस उत्पाद को इस बार कोरोना की दवा साबित करने में कोई कसर बाकी न रहे। मगर, लोग तो बाबा के पीछे ही पड़ गये। जैसे, न्यूज लांड्री और इंडियन मेडिकल एसोसियेशन। न्यूज लॉड्री ने अगले ही दिन सबूतों के साथ दावे को गलत बता दिया। आईएमए ने भी बाबा रामदेव के बयान पर सवाल उठाये। दक्षिण पूर्व एशिया डब्ल्यूएचओ की तरफ से कोरोलिन का नाम लिये बिना तुरंत खंडन आ गया कि उन्होंने कोई सर्टिफिकेट किसी पारम्परिक औषधि को नहीं दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर आचार्य बालकृष्ण का ट्वीट आया। उन्होंने कहा कि वे इस भ्रम का निवारण करना चाहते हैं। डब्ल्यूएचओ किसी भी दवा का अनुमोदन नहीं करता है। उन्होंने सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन का हवाला दिया है। आईएमए ने इस पर भी सवाल किया है कि किसी भी डॉक्टर को किसी खास दवा को प्रमोट करने का अधिकार नहीं है फिर डॉ. हर्षवर्धन ने ऐसा क्यों किया, जबकि वे डब्ल्यूएचओ की गवर्निंग बॉडी में भी सदस्य हैं।

बीते जून 2020 में निम्स जयपुर के निदेशक डॉ. बीएस तोमर की मौजूदगी में कोरोलिन को बाबा रामदेव ने पहली बार लांच किया था। इसमें बताया गया था कि 200 लोगों पर टेस्ट किये गये, 70 प्रतिशत लोग 3 दिन में तो 100 प्रतिशत लोग एक सप्ताह में ठीक हो गये। पर आयुष मंत्रालय ने इसे मान्यता देने से इंकार कर दिया और कहा कि यह कोरोना की दवा नहीं है। इसके प्रचार-प्रसार, विज्ञापन पर भी पाबंदी लगा दी। बाबा और आचार्य उस वक्त पलट गये कि उन्होंने इसे कोरोना की दवा बताई थी।

अब आते हैं, छत्तीसगढ़ को कोरोना से मुक्त करने के उपायों पर। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और भाजपा की प्रतिक्रियाओं की परवाह किये बगैर राज्य सरकार इस बात पर टिकी हुई है कि वह को-वैक्सीन का टीकाकरण के लिये इस्तेमाल नहीं करेगी। इसका कारण है कि को-वैक्सीन के तीसरे चरण का ट्रायल नहीं होना। मगर इसी राज्य में कोरोलिन दवा कोरोना के नाम पर धड़ल्ले से बिक रही है। न केवल पतंजलि स्टोर्स, मेडिकल स्टोर्स में बल्कि किराना दुकानों में भी। महाराष्ट्र सरकार ने आईएएम और डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया के बाद कोरोलिन की बिक्री पर पाबंदी लगी दी है। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। कोरोलिन का हो सकता है को-वैक्सीन की तरह साइड इफेक्ट की आशंका नहीं हो। पर छत्तीसगढ़ सरकार यह सुनिश्चित तो करे कि क्या यह कोरोना का नाम लेकर बेचा जा सकता है। जो लोग खरीद रहे हैं, वे तो पतंजलि के दावे पर विश्वास कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार का स्वास्थ्य विभाग क्या उनके दावे की पुष्टि करता है?

सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी!

चूंकि हिन्दुस्तान में सरकार ने ही यह नारा गढ़ा है कि सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी है, इसलिए लोग उसका तरह-तरह से इस्तेमाल करते हैं। अभी एक पत्रकार को एक महंगे रेस्त्रां में चाय-कॉफी के साथ यह शक्कर परोसी गई जो कि भारतीय रेल के लिए पैक की गई है। जाहिर है कि यह रेलवे से ही चोरी होकर आई होगी। आमतौर पर चोरी के माल को लोग पर्दे के पीछे, यानी घर के भीतर इस्तेमाल कर लेते हैं, यह रेस्त्रां भी अगर अपने किचन में शक्कर का इस्तेमाल कर लेता तो दिक्कत नहीं होती, बात नहीं पकड़ाती, लेकिन उसने तो धड़ल्ले से टेबल पर इसे परोस दिया।

वैसे शासकीय सम्पत्ति आपकी अपनी है यह बात लोगों को समझाने का नतीजा यह निकला था कि जब रेलगाडिय़ों में पहली बार बर्थ पर गद्दे लगे तो लोग उसके ऊपर का फोम लैदर ब्लेड से काटकर ले जाते थे, और उससे थैले बना लेते थे। फोम लैदर और फोम का नुकसान रेलवे को सैकड़ों झोलों से अधिक महंगा पड़ता था। धीरे-धीरे वह चोरी अब कम हुई क्योंकि लोगों को चोरी करने के लिए अधिक आसान और अधिक फायदेमंद दूसरे सरकारी सामान मिलने लगे हैं।

शिष्टाचार के हिसाब से बात गलत होगी, लेकिन शायद सरकारी नारा बदलकर, सरकारी सम्पत्ति आपके बाप की नहीं है, करने से हो सकता है कि कुछ असर हो।

लेकिन यह लिखने के बाद एक बात और भी है। जहां कहीं, प्लेन में या ट्रेन में, या किसी फास्टफूड रेस्त्रां में टेबिल पर खाने के साथ शक्कर, नमक, या टमाटर-सॉस के सैशे (पैकेट या पाऊच) दिए जाते हैं जो कि जूठन के साथ फेंक दिए जाएंगे, तो उन्हें उठाकर ले आना चाहिए, और बाद में इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन रेस्त्रां में सर्व किए गए ऐसे सैशे तो कहीं से बचाकर लाए हुए नहीं हो सकते, चोरी किए हुए ही हो सकते हैं।

महिला की जगह, पुरुष नहीं तो बैठक नहीं...

पंचायती राज कानून के तहत महिलाओं को तीन स्तरीय संरचना में पहले 33 फीसदी, फिर 50 फीसदी आरक्षण दिया गया। गांवों में महिला स्व सहायता समूह के जरिये आर्थिक स्थिति, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की वजह से बदलाव भी दिखा है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि अनेक महिला प्रतिनिधि आज भी अपने पति, पिता या बेटे के नाम पर चुनी जाती हैं। वे खुद फैसले नहीं ले पाती और उनके पुरुष रिश्तेदार ही उनके अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। गांवों में एसपी का मतलब सरपंच पति मान लिया गया है। यदि कोई पुरुष जनपद, जिला पंचायत प्रतिनिधि कहा जा रहा है तो पता चल जाता है कि वह निर्वाचित नहीं हो सका, उसने रिजर्वेशन की मजबूरी के चलते अपने घर की किसी महिला को चुनाव जितवाया है। चुनाव महिला ने जीता पर पद को उनका पुरुष प्रतिनिधि जी रहा होता है। यहां तक कि सरकारी विभागों में, राजनीतिक सभाओं में निर्वाचित महिलायें या तो नदारत होती हैं या पीछे बैठी होती हैं। सरकारी बैठकों में भी उनकी जगह पर बैठ जाते हैं। समय-समय पर राज्य सरकार ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि ऐसा न होने दें। पर सामान्यत: ऐसा होता नहीं है।

जनपद पंचायत बेमेतरा की पिछले गुरुवार की बैठक में सीईओ ने महिला प्रतिनिधियों की जगह पर उनके पति या बेटे के साथ बैठक लेने से इन्कार कर दिया। सीईओ को समझाने पुरुष प्रतिनिधि उनके चेम्बर में डटे रहे। सीईओ नहीं माने, बोले बैठक में तो जो निर्वाचित सदस्य हैं वे ही बैठेंगे, बाकी लोग बाहर होंगे। पुरुष सदस्यों की नहीं चली तो उन्होंने बैठक का बहिष्कार ही करा दिया। महिला प्रतिनिधियों ने बैठक में शामिल होने से मना कर दिया। बैठक नहीं हो पाई।

हैरानी है कि जिला प्रशासन या महिला आरक्षण के हिमायत करने वाले राजनैतिक दलों में इस गंभीर घटना की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं है। यह सीधे-सीधे प्रशासनिक कामकाज को अनाधिकृत व्यक्तियों द्वारा अपने प्रभाव से रोकने का महिला विरोधी दु:स्साहस है। यह उन महिला नेत्रियों के लिये भी सोचने का विषय है जो अपने वर्ग की बराबरी के लिये सडक़ से लेकर संसद तक लडऩे का दावा करती हैं। जो महिला प्रतिनिधि बैठक के बहिष्कार के लिये राजी हो गईं, वे अपने घर के पुरुषों के दबाव में किस तरह काम कर रही हैं?

आध्यात्मिक आचार्य..

अटल बिहारी बाजपेयी यूनिवर्सिटी बिलासपुर के नव नियुक्त कुलपति प्रो. अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। जब वे पहली बार कल बिलासपुर पहुंचे तो थ्री पीस सफेद सूट में लाल टाई पहना था। उनकी ही तरह बहुत से विद्वानों को हमने दाढ़ी रखते, टोपी पहनते व माथे पर तिलक लगाये हुए देखा है। यह सब उनके गहरे आध्यात्मिक झुकाव का परिचय तो देता ही है, पर प्रभार ग्रहण करते समय उन्होंने जो प्रक्रिया अपनाई उससे तय हो गया कि वे अपने धार्मिक मान्यताओं को भी खासा महत्व देते हैं। निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि अपने दफ्तर में भी। विश्वविद्यालय के अपने कक्ष में प्रभार ग्रहण करने के लिये वे पहुंचे तो द्वार पर ओढ़ी हुई शॉल बिछा दी और हवन करने बैठे। पूजा-पाठ के बाद उन्होंने कक्ष में प्रवेश किया और कार्यभार संभाला। विश्वविद्यालय के स्टाफ ने नये कुलपति के आते ही वातावरण बदला-बदला सा महसूस किया है। अब छात्रों की इनसे मिलने की बारी है, जिनके पास समस्याओं और परेशानियों का अम्बार है।

 


23-Feb-2021 5:26 PM 111

कुछ हजार करोड़ का लोकतंत्र!

दक्षिण भारत के राज्य पुदुचेरी में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद अब दक्षिण भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया है। लेकिन वैसे तो तकरीबन पूरे भारत में कांग्रेस हाशिए पर आ गई है और गिने-चुने राज्य ही उसके कब्जे में हैं। आज देश में कांग्रेस का सबसे मजबूत राज्य छत्तीसगढ़ बच गया है जहां पर पार्टी विधायकों का बहुमत इतना बड़ा है कि उसे आसानी से तोडऩा, खरीदना, उससे इस्तीफे दिलवाकर सरकार गिरवाना नामुमकिन माना जा रहा है। फिर भी आज भारत की राजनीति में कई ऐसी चीजें हो रही हैं जो बीते कल तक नामुमकिन लगती थीं।

एक के बाद एक राज्य में कांग्रेसी या दूसरे गैरभाजपाई  विधायकों के दलबदल या इस्तीफे से जो माहौल बना है उसके हिसाब से देश में विधायकों की कुल संख्या गिन लेना भी ठीक नहीं होगा। करीब ढाई दर्जन राज्यों की विधानसभाओं को देखें तो कुल 4036 विधायक हैं। इनमें से आधे विधायक अलग-अलग विधानसभाओं में हों तो सरकार बनना वैसे भी तय रहता है। इसलिए 2018 विधायकों को या तो जिताकर लाना है, या खरीदकर। यह आंकड़ा भी अंकगणित का है। सच तो यह है कि किसी भी विधानसभा में आधे विधायकों की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि कुछ न कुछ अलग पार्टियां रहती हैं या निर्दलीय विधायक रहते हैं।

अब चंडूखाने की गप्पों की बात करें तो एक विधायक के अधिक से अधिक दाम 35 करोड़ रूपए सुनाई पड़े हैं। यह भी सुनाई पड़ा है कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने अपने आपको बचाने के लिए सचिन पायलट के साथ चले गए कांग्रेस विधायकों को खुद ही वापिस खरीदा था। जो भी हो राजनीतिक आत्माएं अब आसानी से बिकने के लिए बाजार में हैं।

2018 विधायकों में से किसी बड़ी पार्टी के पास खुद होकर भी तीन चौथाई तो विधायक खुद के छाप वाले रहते ही हैं। अब एक चौथाई में से कई को मंत्री बनाकर, और कुछ को अगर खरीदकर जुटाना हो, और 35 करोड़ का रेट हो, तो भी मामला कुछ हजार करोड़ रूपए का ही बनता है। इसलिए आंकड़ों के हिसाब से एक बड़ी पार्टी कुछ हजार करोड़ रूपए में देश की लगभग हर विधानसभा में अपनी सरकार बना सकती है।

संसद में लोगों को सवाल पूछने के लिए जिस तरह आत्मा बेचते देखा है, उसे देखते हुए कुछ हजार करोड़ रूपए में संसद में भी तस्वीर बदल सकती है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

पेट्रोलियम के दाम की कड़वी घूंट धीरे-धीरे पीयें

डीजल-पेट्रोल का दाम बढऩे का असर अब बाकी चीजों पर भी दिखाई दे रहा है। ट्रांसपोर्ट का धंधा इससे सीधा प्रभावित है। डीजल के दाम में जिस तरह रोजाना थोड़ी-थोड़ी बढ़ोतरी हो रही है, ट्रांसपोर्ट व्यवसायी उस हिसाब से भाड़ा नहीं बदल पाते। इसलिये इनके राष्ट्रीय संगठन ने हर तीन माह में एक बाद दाम की समीक्षा और वृद्धि करने का प्रस्ताव दिया है। पेट्रोलियम कम्पनियों ने यूपीए सरकार के समय से ही ऐसा करना बंद कर दिया है। पहले हर पखवाड़े रेट की समीक्षा की जाने लगी फिर इसे हर दिन तक लाया गया। सरकार को इसका लाभ यह हुआ कि 25-50 पैसे की घटत बढ़त को लोगों ने नजरअंदाज करना शुरू कर दिया । पेट्रोल, डीजल के दाम भी धीरे-धीरे तीन माह से बढ़ रहे हैं लेकिन लोगों के कान तब खड़े हुए जब यह 85-90 रुपये पहुंचने लगे। लोगों ने हिसाब लगाना शुरू किया कि वास्तविक कीमत कितनी है और केन्द्र तथा राज्य सरकार इस पर टैक्स कितना वसूल रही हैं। ट्रांसपोर्ट वेलफेयर एसोसियेशन ने 26 फरवरी को पूरे देश में एक दिन का आंदोलन करने का निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ के बस ओनर्स भी 40 से 50 फीसदी भाड़े में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। सीमेन्ट का भाड़ा 200 रुपये प्रति टन बढ़ाने की मांग उठी है। सरकारी ठेका लेने वाले बिल्डर्स भी कच्चे माल की लगातार कीमत के कारण परेशान हैं। सब्जियों, खासकर बाहर से आने वाले प्याज की कीमत फिर से बढऩे लगी है। मतलब यह है कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस खरीदते वक्त ही लोग महंगाई के तेवर को महसूस नहीं कर रहे हैं। वह भी तब जब लोगों की आमदनी इस बीच बढ़ी नहीं है। आने वाले दिनों में इसका असर और ज्यादा दिखाई दे तो आश्चर्य नहीं।

दंतेवाड़ा के कैदी की जांच रायपुर में?

अम्बेडकर अस्पताल में सीनियर डॉक्टर से दुर्व्यवहार व एक अन्य डॉक्टर को तमाचा जडऩे वाले जेल प्रहरी पर पुलिस ने कार्रवाई कर और डॉक्टरों की सुरक्षा बढ़ाकर किसी तरह मामला शांत किया है। पर कुछ प्रश्न खड़े होते हैं। इस तरह की अप्रिय स्थितियां रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, कोरबा के मेडिकल कॉलेजों में अक्सर पैदा होती हैं। प्राय: सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र व कई बार जिला अस्पतालों से भी मरीज को सीधे मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है। जबकि उनक़े उपचार और जांच की व्यवस्था वहीं हो सकती है। कल जो घटना रायपुर में हुई उसमें कैदी को दंतेवाड़ा से लेकर जेल प्रहरी आया था। ऐसी कौन सी नौबत थी कि जिसके चलते 350 किलोमीटर का सफर करके कैदी को जांच के लिये रायपुर लाना पड़ा। इस बात की कोई सफाई नहीं ली जाती कि निचले स्तर के स्वास्थ्य केन्द्रों में ही इलाज व जांच क्यों नहीं हो जाती। कैदी को लेकर आने की तो जेल प्रबंधन की बाध्यता थी लेकिन सोचने की बात है कि यदि बस्तर के लोगों को एमआरआई के लिये रायपुर आना पड़ा, तो स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हम खड़े हैं।

नोटिस का कोई नतीजा निकलेगा?

सरगुजा आयुक्त ने संभाग के सभी आरईएस कार्यपालन यंत्रियों को एक सिरे से नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। वजह है निर्माण कार्यों के पूरे होने मे देरी। बीते तीन सालों में सरगुजा के आदिवासी विकास प्राधिकरण में 96 करोड़ रुपये से भी अधिक के 17 सौ से अधिक निर्माण कार्य मंजूर किये गये लेकिन इसमें से केवल 4 सौ पूरे हो पाये हैं। यानि 13 सौ बाकी है। इनसे पूछा गया है कि ऐसी नौबत क्यों आई। संभागायुक्त और जिला कलेक्टर लगभग हर सप्ताह समीक्षा बैठकें करते हैं। ऐसी चेतावनी हर बार दी जाती है। अधिकारी इसे रुटीन की फटकार मानकर खौफ नहीं खाते हैं। दबाव भी तब ज्यादा बनता है जब वित्तीय वर्ष समाप्त होने वाला हो। बहरहाल, सरगुजा में कद्दावर मंत्रियों के रहते हुए विकास प्राधिकरण के कार्यों का क्या हाल है इस नोटिस से पता चल रहा है।


22-Feb-2021 6:38 PM 212

गांवों का नये जिले में जाने से इन्कार 

गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही, जीपीएम जिले के गठन के साथ ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोरबा जिले के उन 19 गावों को नये जिले में शामिल करने की घोषणा की थी जिनके लिये गौरेला मुख्यालय आना सुविधाजनक है। इनमें ज्यादातर गांव पोड़ी-उपरोड़ा अनुभाग के पसान क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। गौरेला की दूरी इन गांवों से एक घंटे में पूरी हो सकती है जबकि कोरबा के लिये उन्हें दो घंटे या उससे ज्यादा का सफर करना पड़ता है। पर यह घोषणा अभी पूरी नहीं हो पाई है। दरअसल, गांवों को नये जिले में शामिल करने के लिये ग्राम सभाओं की सहमति मांगी गई। इनमें से केवल 8 गांवों ने नये जिले में शामिल होने की इच्छा जताई बाकी 11 लोगों ने मना कर दिया। मना करने वाले गांव गौरेला की दिशा में भी हैं। गौरेला से ज्यादा नजदीक गांवों ने नये जिले में आने से मना कर दिया है, कुछ दूर वाले गांव के लोग आना चाहते हैं। मना करने वालों का कहना है कि जिले में आखिर उनका काम ही कितना पड़ता है? एसडीएम, तहसीलदार तो कटघोरा और पोड़ी-उपरोड़ा में भी मिल जाते हैं। बाजार भी कटघोरा का पास है और गौरेला के बाजार से कहीं बड़ा। छत्तीसगढ़ में बहुत से जिलों का नक्शा इसीलिये भूल-भुलैया जैसा है। रायपुर से बिलासपुर की ओर चलें तो एक छोर पर बेमेतरा, दूसरी तरफ दुर्ग, एक तरफ मुंगेली तो दूसरी ओर बलौदाबाजार जिले के हिस्से मिलते हैं। बहुत पहले नदियों और बड़े नालों से सीमा तय कर दी जाती है, पर अब सडक़ों के जरिये भी इसका निर्धारण किया जा रहा है। इस मामले में केवल 8 गांवों की सहमति मिलने के कारण मुख्यमंत्री की घोषणा पर अमल नहीं करने का निर्णय राजस्व विभाग ने लिया है।

नये राज्य में पहली बार नियमित शिक्षक

कोरोना संकटकाल के चलते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई को हुए नुकसान की भरपाई अब स्कूलों को खोलकर पहले की तरह पढ़ाई शुरू करने की कोशिश की जा रही है। राज्य शासन ने बिना किसी शोर-शराबे के छत्तीसगढ़ के लोक शिक्षण संचालनालय को मेरिट के आधार पर नियमित शिक्षक के करीब 14 हजार पदों पर नियुक्ति को हरी झंडी दे दी है। नियुक्तियों की प्रक्रिया करीब दो साल पहले शुरू हुई थी पर कोरोना और शिक्षा कर्मियों के संविलियन जैसे दूसरे कारणों से आगे की प्रक्रिया टलती जा रही थी। खास बात यह है कि अब से करीब 25 साल पहले जब पंचायतों और नगरीय निकायों को शिक्षाकर्मियों की नियुक्तियों का अधिकार दिया गया था, शिक्षा विभाग ने सीधी नियुक्ति बंद कर दी थी। राज्य बनने के बाद पहली बार नियुक्ति हो रही है। बस, दिक्कत यह है कि ये नियुक्तियां एक साथ नहीं होंगी बल्कि ज्यों-ज्यों स्कूल खुलेंगे और कक्षाओं का लगना शुरू होगा, नियुक्ति पत्र थमाने की पक्रिया चलेगी। यानि चयनित शिक्षकों को शिक्षा विभाग के बार-बार चक्कर लगाकर अपने स्टेटस का पता लगाना पड़ेगा। ऐसे में हाथ में नियुक्ति आदेश पाने के लिये कितना खर्च करना पड़ सकता है, थोड़ा अनुमान आप भी लगा सकते हैं। 

कोरोना काल में बबल जोन कहां था?

कोरोना महामारी के दौरान ज्ञान में आये कई नये शब्दों से लोगों में दहशत थी, जैसे लॉकडाउन, क्वारांटीन और कंटेनमेन्ट जोन। शहीद वीर नारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में शुरू होने वाले रोड सेफ्टी वर्ल्ड क्रिकेट सीरिज के खिलाडिय़ों को एक सप्ताह पहले बुलाया जा रहा है। वे नया रायपुर के रिसोर्ट में रुकेंगे। वे इस रिसोर्ट से प्रैक्टिस के लिये स्टेडियम तो निकलेंगे पर और उनका कहीं आना-जाना प्रतिबंधित रहेगा। यहां देखभाल के लिये तैनात स्टाफ और सुरक्षा में तैनात जवानों के लिये भी यही गाइडलाइन है। वे किसी से मिल नहीं सकेंगे, अपने परिवार से भी नहीं। इस व्यवस्था को बबल जोन नाम दिया गया है। बबल जोन उस इलाके को कहा जाता है जहां भीड़ इक_ी न हो, संघर्ष और कानून व्यवस्था की कम से कम परेशानी खड़ी हो। केवल बबल का हिन्दी में मतलब तो बुलबुला होता है जो आम लोगों को समझ में आता है। कोरोना काल में कंटेनमेन्ट की दहशत को कम करने के लिये बबल जोन भी नाम दिया जा सकता है, पर जाने दीजिये अब तो वह दौर गुजर चुका है।


21-Feb-2021 5:20 PM 250

आदित्यों का उदय...

सरगुजा की राजनीति में विशेषकर कांग्रेस दूसरी पीढ़ी के नेताओं का दबदबा बढ़ रहा है। इन दिनों दो ‘आदित्य’ की जमकर चर्चा है। टीएस सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वर शरण सिंहदेव, जो कि जिला पंचायत के सदस्य भी हैं, वे काफी सक्रिय हैं। एक तरह से टीएस का राजनीतिक प्रबंधन आदित्येश्वर ही संभालते हैं। इससे परे सरगुजा के एक और प्रभावशाली नेता और सरकार के मंत्री अमरजीत भगत के बेटे आदित्य भगत की भी ग्रैंड लॉचिंग हो चुकी है।

आदित्य को एनएसयूआई में राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें सोशल मीडिया विभाग का चेयरमैन बनाया गया है। आदित्य की नजर अगले लोकसभा चुनाव पर है, जिसके लिए वे अभी से मेहनत कर रहे हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि आदित्येश्वर भी विधानसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। कुल मिलाकर दोनों ‘आदित्य’ की कार्यशैली पर लोगों की निगाहें टिकी हैं।

पेपर की बात छोडि़ए

डी पुरंदेश्वरी के प्रदेश भाजपा का प्रभार संभालने के बाद से पार्टी के नेता अचानक सक्रिय हो गए हैं। खुद पुरंदेश्वरी मोर्चा-प्रकोष्ठों की गतिविधियों की मॉनिटरिंग कर रही हैं। इस वजह से बेहतर कार्यक्रम करने के लिए पदाधिकारियों पर काफी दबाव भी है। कार्यक्रम हो रहे हैं, तो खर्च भी हो रहा है। ऐसे में पदाधिकारी फंड के इंतजाम के लिए बड़े नेताओं के आगे-पीछे हो रहे हैं।

पिछले दिनों अंबिकापुर में पार्टी की संभागीय बैठक में केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह अपने विभाग के कामकाज का बखान कर रहीं थी कि उनके विभाग का पूरा काम पेपरलेस हो गया है, तो एक सीनियर पदाधिकारी ने उन्हें टोक दिया, और कहा कि पेपर की बात छोडि़ए, फंड के बारे में सोचिए। इस पर वहां जमकर ठहाका लगा।

बड़े दिल के लोग

आज जब चारों तरफ मकान मालिक आर किराएदार एक-दूसरे के खिलाफ अदालत में खड़ नजर आते हैं, तब भी इस कलयुग में ऐसे बड़े दिल के लोग रहते हंै जिन्होंने अपनी 50 साल की किराये की दुकान (3000 फीट) बिना किसी दबाव के, बिना किसी पैसे के खाली कर दी और चाबी जगह के मालिक ट्रस्ट को दे दी। ऐसे ही एक वाकया आज ही हुआ है। श्री ऋषभदेव मंदिर व दादाबाड़ी ट्रस्ट एमजी रोड रायपुर में बहुत से किरायेदार हैं, जिनमें से एक किरायेदार हैं श्री स्टील, जिनके मालिक हैं अनिल, अनुराग एवं आकाश श्रीवास्तव। करीब पचास बरस से ये श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के किरायेदार थे। दादाबाड़ी की इस विशाल भूमि पर एक भव्य मंदिर एवं दादाबाड़ी का निर्माण कार्य जोरशोर से चल रहा है, इसके लिए ट्रस्ट को अपनी जमीन किरायेदारों से वापस चाहिए। ट्रस्ट ने श्री स्टील के मालिकों से केवल एक बार बात की, श्री स्टील के मालिकों ने बिना कुछ बताए, बिना कुछ लिए अपना ऑफिस खाली कर ट्रस्ट को चाबी उस समय भेज दी जब ट्रस्ट के सभी ट्रस्टी मंदिर के लिए मार्बल खरीदने मकराना गए हुए थे। आज दादाबाड़ी के एक धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन में ट्रस्ट बोर्ड ने अनिल श्रीवास्तव को बहुमान हेतु आमंत्रित किया, जिसमें उन्होंने बड़ी उदारता एवं सरलता से बड़े भाव से ये कहा कि ये तो मंदिर की जमीन थी और हम तो किरायेदार थे और भगवान की इस जमीन से हमने कमाया और ये तो हमारा फर्ज था कि आपकी जमीन आपको वापस दें। उन्होंने इतनी बड़ी बात इतनी सहजता से कह दी जो कि बहुत बड़े दिलवाले ही कर सकते हैं। ट्रस्ट मंडल ने कहा कि आज ऐसे व्यक्ति का सम्मान करने का मौका मिला। ट्रस्ट मंडल भगवान से प्रार्थना करता है कि वे और उनका परिवार उतरोत्तर तरक्की करे।

भाजपा को पेशोपेश में डाला डॉ. जोगी ने

छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की विधायक डॉ. रेणु जोगी ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक को पत्र लिखकर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिये समर्थन मांगा है। जकांछ ने मरवाही उप-चुनाव में कांग्रेस को शिकस्त देने के लिये भाजपा को समर्थन दे दिया था। हालांकि इसके बावजूद नतीजे को पलटा नहीं जा सका। कांग्रेस बार-बार जकांछ पर आरोप लगाती रही है कि यह भाजपा की ‘बी’ टीम है। अब यदि भाजपा और जकांछ साझा अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस सरकार के खिलाफ विधानसभा में लाती है तो कांग्रेस सरकार अपने बचाव में इसी बात को फिर दोहरायेगी।

भाजपा इस बार भले ही बहुत कम सीटों पर सिमट गई है लेकिन इतनी भी कमजोर नहीं है कि अकेले अविश्वास प्रस्ताव ला सके। सदन के 10 प्रतिशत विधायकों की ही मांग जरूरी है। इस लिहाज से उसके पास पर्याप्त विधायक तो हैं ही। अविश्वास प्रस्ताव गिरने की आशंका होने के बावजूद विपक्ष की ओर से प्राय: इसलिये लाया जा सकता है कि वह सरकार की विफलताओं पर सदन में बोलें और उसे पूरा प्रदेश सुने।

भाजपा और उनके मोर्चा संगठन इन दिनों प्रदेश भर में अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार को सडक़ पर घेरने में लगी हुई है, पर इनकी पार्टी के रणनीतिकारों के ध्यान में यह बात नहीं आई कि सरकार के दो साल होने के बाद उन्हें अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार मिल गया है। यह मुद्दा उठाने का श्रेय जकांछ को मिल गया जिसके कुल जमा चार विधायक हैं। डॉ. रेणु जोगी की चि_ी का भाजपा की ओर से कोई जवाब नहीं आया है। शायद वे सोच रहे हैं कि वे कहें अविश्वास प्रस्ताव तो हम लायेंगे, समर्थन आप दीजिये।

दूसरी वैक्सीन के लिये भी मान-मनुहार

कोविड टीका कोविशील्ड लगाने का लक्ष्य पूरा हो इसके लिये पहले चरण में विभिन्न जिलों के स्वास्थ्य अधिकारी और प्रशासन ने बहुत कोशिश की तब यह लक्ष्य 70 प्रतिशत के आसपास पहुंचा। पहला टीका लगवाने वालों को यह बात अच्छी तरह बताई गई थी कि कोरोना से बचाव तभी होगा जब 28 दिन के भीतर दूसरा डोज भी ले लिया जाये। अब जब दूसरे चरण का वैक्सीनेशन शुरू हुआ है तो और भी मुश्किल खड़ी हो रही है। कहीं-कहीं तो 10 प्रतिशत लोग भी दुबारा टीका लगवाने नहीं आ रहे। कोई कह रहा है सर्दी, खांसी है, कोई तो बिना संकोच बता रहा है कि शराब पीना शुरू कर दिया था, पहला डोज बेकार हो गया, दूसरे से क्या फायदा? क्या इसका मतलब यह निकाला जाये कि पहले चरण में टीका जिन लोगों ने लगवाया वे कोरोना को लेकर चिंतित नहीं थे बल्कि हेल्थ वर्कर्स और अधिकारियों की बात रखने के लिये टीकाकरण सेंटर तक पहुंच पाये? वैक्सीनेशन पर भरोसा जगाने के लिये अब किसी नये उपाय की तलाश करनी पड़ेगी।

दो जिलों के बॉर्डर पर जुआ

सट्टा और जुए के खेल में किस तरह पुलिस से बचने के लिये नये-नये तरीके निकाले जाते हैं वह बलौदाबाजार और बिलासपुर सीमा पर शिवनाथ नदी के किनारे लगे जुआरियों के मेले में पुलिस के हाथ लगी नाकामी से पता चलता है। वैसे तो इस छापेमारी में पुलिस ने करीब 50 हजार रुपये जब्त किये और 15 जुआरियों को पकड़ा। पर जितना बड़ा फड़ था, यह कुछ नहीं है। पुलिस ने मौके से करीब 70 दुपहिया वाहन और तीन कारें जब्त की हैं। यानि खेलने वालों की संख्या डेढ़ सौ के आसपास थी। उनके पास की रकम कुछ हजार में तो होगी नहीं, कई लाख हो सकती है।

दरअसल, बलौदाबाजार जिले के जुआरियों ने जिस जगह को चुना वह शिवनाथ नदी के दूसरी तरफ है। यह बिलासपुर जिले का हिस्सा है। जैसे ही पुलिस की दबिश हुई जुआरियों ने नदी पार की और जिले की सीमा से बाहर निकलकर अपने जिले में आ गये। पुलिस हाथ मलती रह गई। दोनों जिलों की पुलिस यदि तालमेल से काम करती तो शायद दोनों तरफ से घेराबंदी होती और ज्यादा जुआरी धर लिये जाते।


20-Feb-2021 6:15 PM 180

एक और छत्तीसगढ़ भवन

दिल्ली के द्वारका में करोड़ों की लागत से एक और छत्तीसगढ़ भवन का निर्माण हो रहा है। निर्माण एजेंसियां नए कार्यों में विशेष रूचि लेती हंै। तभी तो प्राइम लोकेशन में स्थित पुरानी प्रापर्टी को खरीदने के बजाए नए भवन के निर्माण का फैसला लिया गया।

दिल्ली में विशिष्ट लोगों के ठहरने के लिए छत्तीसगढ़ भवन और छत्तीसगढ़ सदन पहले से ही मौजूद है। इनमें से छत्तीसगढ़ भवन राज्य बंटवारे में मिला था। यह भवन सरदार पटेल मार्ग पर स्थित है, जहां कई और राज्यों के भवन हैं। सरकार ने लोगों की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए उनके ठहरने के लिए एक और भवन बनाने का फैसला लिया।

कुछ लोगों का सुझाव था कि नए निर्माण के बजाए छत्तीसगढ़ भवन से कुछ कदम की दूरी पर स्थित विजय माल्या की प्रापर्टी को खरीद लिया जाए। शराब कारोबारी विजय माल्या की प्रापर्टी को बैंक नीलाम कर रही थी। विजय माल्या का यह बंगला आलीशान है, और छत्तीसगढ़ भवन के नजदीक होने के कारण सुविधाजनक भी था। बंगले की कीमत भी नव निर्मित बंगले के बराबर ही बैठ रही थी।

मगर सरकारी स्तर पर नीलामी में हिस्सा लेने का कोई फैसला हो पाता, इससे पहले ही यस बैंक के लोगों ने ही नई कंपनी बनाकर बंगले को खरीद लिया। कुल मिलाकर प्राइम लोकेशन की एक बेहतर प्रापर्टी हाथ से निकल गई। वैसे भी नए निर्माण का अलग ही मजा होता है।

नंदकुमार साय और जैविक खेती

किसान आंदोलन के बीच छत्तीसगढ़ के दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं। वे इसके लिए मुहिम भी चला रहे हैं, और चाहते हैं कि केन्द्र सरकार इसके लिए ठोस कदम उठाए। वे खुद खेती में रासायनिक खाद का उपयोग नहीं करते, और जशपुर जिले के किसानों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं।

पिछले दिनों साय इस सिलसिले में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से भी मिले। किसान आंदोलन की टेंशन के बावजूद तोमर ने साय से गर्मजोशी से मुलाकात की। नंदकुमार साय अविभाजित मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे, तब तोमर संगठन में प्रदेश मंत्री के पद पर थे। तोमर ने साय के सुझाव को काफी महत्व दिया है। देखना है कि सरकारी स्तर पर इस पर कितना अमल किया जाता है।

शिकारियों की ढूंढ निकालने में माहिर सिम्बा, नैरो

इन दिनों वन विभाग के पास मौजूद दो प्रशिक्षित डॉग कमाल कर रहे हैं। ये मुंगेली जिले के अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) में तैनात डॉग नैरो और सिंबा हैं। जब इन्हें लाया गया तो यही मंशा थी कि यहीं के जंगल में होने वाले शिकार और लकडिय़ों की कटाई करने वाले अपराधियों की खोज में मदद मिले, पर इनकी प्रदेशभर में मांग हो रही है। कवर्धा वनमंडल के सहसपुर लोहारा परिक्षेत्र में करंट लगाकर बीते 16 फरवरी को एक तेंदुए को शिकारियों ने मार डाला था। वन विभाग की टीम ने अपनी तरफ से अपराधियों का पता लगाने की कोशिश की लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो एटीआर से एक डॉग सिम्बा को वहां बुलाया गया। सिम्बा ने दो शिकारियों को पहचान लिया और वन विभाग ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आरोपियों ने अपना जुर्म भी कबूल किया है।

वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि 6 साल की उम्र वाले इन कुत्तों के खाते में पिछले चार साल के दौरान दो दर्जन से ज्यादा कामयाबी हाथ लग चुकी है। चीतल, तेंदुआ, सांभर, बाघ, हाथी के शिकारियों की गर्दन इन्होंने नापी है। कई बार तो नाखून के हिस्से को भी सूंघकर शिकारियों तक पहुंच चुके हैं। ये बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ के हर कोने में जा चुके हैं।

वैसे प्रशिक्षित कुत्तों के जरिये अपराधियों तक पहुंचने का काम तो काफी पहले से लिया जा रहा है। पुलिस अपराधियों के ठिकाने तक पहुंचने के लिये तो आरपीएफ संदिग्ध सामानों की तलाशी में इसका इस्तेमाल करती ही है। बस्तर में तो विस्फोटक ढूंढने के लिये एक बार आवारा कुत्तों को भी प्रशिक्षित करने की योजना बनी। नेरो और सिम्बा के हाथ जो कामयाबी लग रही है उसे देखते हुए आने वाले दिनों में पुलिस भी इनकी सेवायें लेने पर विचार करे तो कोई आश्चर्य नहीं।

लाइट मेट्रो क्या है?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लाइट मेट्रो परियोजना के लिये बजट में 11 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान कर रखा है। छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन मंत्री ने दिल्ली में केन्द्रीय आवास व शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी से मिलकर लाइट मेट्रो की मांग रख दी है। याद होगा कि भाजपा शासनकाल के दौरान रायपुर से प्रमुख शहरों के लिये मेट्रो रेल चलाने का प्रस्ताव दिया गया था। उस समय मेट्रो मैन ई. श्रीधरन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को बताया था कि यात्रियों की संख्या तथा निर्माण व संचालन में आने वाले खर्च की तुलना करें तो अभी इसकी आवश्यकता नहीं है।

लाइट मेट्रो नई यातायात सेवा है। दिल्ली में ड्राइवरलेस मेट्रो ट्रेन पिछले साल शुरू हो ही चुकी है। इस साल वहां से लाइट मेट्रो शुरू हो सकती है। उत्तरप्रदेश सरकार ने भी गोरखपुर, प्रयागराज और मेरठ में लाइट मेट्रो चलाने की योजना बनाई है।  लाइट मेट्रो सडक़ के समानान्तर चलने वाली एक मिनी ट्रेन की तरह होगी, जिसकी सवारी क्षमता 300 होती है।। स्टेशन बस स्टैंड की तरह होंगे। कोलकाता में मेट्रो ट्रेन को चलते हुए हमने देखा ही है, पर लाइट मेट्रो सडक़ों से नहीं बल्कि उसके किनारे से गुजरेगी और आवश्यकतानुसार इसके लिये पुल पुलियों की चौड़ाई बढ़ाई जायेगी। परियोजना की निर्माण लागत भी कम होती है और संचालन का भी खर्च कम होता है। 

छत्तीसगढ़ में मंजूरी मिली तो नया रायपुर, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव जैसे शहरों को इससे जोड़ा जा सकता है। रायपुर में अस्त-व्यस्त होती यातायात व्यवस्था को ठीक करने में मदद मिलेगी। छत्तीसगढ़ की राजधानी से प्रमुख शहरों के बीच आवागमन के साधन सीमित हैं। बसों और लोकल ट्रेनों की संख्या कम तो है ही रोज आना-जाना करने वालों के लिये यह खर्चीला भी है। ऐसे में लाइट मेट्रो मंजूर होती है तो छत्तीसगढ़ के लिये एक उपलब्धि ही होगी।

वैसे, नगरीय प्रशासन विभाग को सिटी बसों के भी पूर्ववत सुचारू संचालन के बारे में भी सोचना चाहिये। खासकर राजधानी रायपुर व बिलासपुर में कोरोना के बाद बंद बसों के चलते रोजाना हजारों लोग एक जगह से दूसरे जगह पहुंचने में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।

रंग-बिरंगी गोभी

कुछ वर्ष पहले जब छत्तीसगढ़ के मॉल में सब्जियों की बिक्री शुरू हुई तो फ्रीजर में रखी कुछ साफ-सुथरी रंगीन सब्जियां ध्यान खींचती थी और ग्राहक उसकी कोई भी कीमत देकर खरीदना चाहते थे। इनमें से एक थी ब्रोकली। यह गोभी का ही एक प्रकार है जिसका छत्तीसगढ़ में उत्पादन नहीं लिया जाता था, क्योंकि इसके बीज के बारे में पता नहीं था। अब ब्रोकली का उत्पादन छोटे रकबे के किसान भी करने लगे हैं। बाजार में यह मॉल के मुकाबले चौथाई कीमत पर उपलब्ध है। इसी तरह फूलगोभी की जानी पहचानी वैरायटी सफेद रंग की या फिर हल्का पीलापन लिये होता है। पर अब गांवों में चार पांच रंगों की गोभियां उगाई जाती हैं। इनमें लाल, चटक पीला, हरा और बैंगनी रंग शामिल है। मस्तूरी, मल्हार के एक किसान ने इसी तरह की अलग-अलग रंगों की गोभी अपने खेत में बोई है। वे बताते हैं कि इसकी कीमत आम गोभी से ज्यादा मिल जाती है और इसकी खेती काफी फायदेमंद है।


19-Feb-2021 6:03 PM 268

बोरा का इंतजार जारी

भाप्रसे के अफसर सोनमणि बोरा को राज्य सरकार ने केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने की हरी झंडी दे दी है, लेकिन अब तक उनकी वहां पोस्टिंग नहीं हुई है। चूंकि उन्होंने खुद होकर केन्द्र सरकार में काम करने की इच्छा जताई थी, लिहाजा, यहां उन्हें कोई अहम दायित्व नहीं सौंपा गया है। उनके पास अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण संसदीय कार्य विभाग का प्रभार दे दिया गया है, जहां रोज-रोज फाइल भी नहीं आती है। विधानसभा सत्र के दौरान थोड़ा बहुत काम रहता है।

98 बैच के अफसर बोरा केन्द्र में संयुक्त सचिव के पद पर इम्पैनल हुए हैं। मगर फिलहाल उनकी पोस्टिंग की संभावना कम दिखाई दे रही है। वजह यह है कि केन्द्र सरकार में पोस्टिंग के लिए समिति की बैठक काफी समय से नहीं हुई है। कोरोना की वजह से बैठक टल रही है, और अगले कुछ हफ्ते बैठक होने की संभावना भी नहीं दिख रही है। यानी बोरा को केन्द्र में प्रतिनियुक्ति के लिए अगले दो-तीन महीने और इंतजार करना होगा।

 ऊंची छलांग

छत्तीसगढ़ के कई मीडिया संस्थानों में काम कर चुके डॉ. संजय द्विवेदी ने ऊंची छलांग लगाई है। डॉ. द्विवेदी आईआईएमसी के डीजी के पद पर हैं। यह पद केन्द्र सरकार में अतिरिक्त सचिव के समकक्ष है। आईआईएमसी में ऑल इंडिया इनफार्मेशन सर्विस के अफसर ट्रेनिंग लेते हैं, और यह देश के सबसे पुराने प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है।

आमतौर पर यहां अतिरिक्त सचिव स्तर के आईएएस अफसर ही डीजी के पद पर रहे, लेकिन पहली बार सीनियर जर्नलिस्ट को मौका मिला है। संघ परिवार के करीबी माने जाने वाले डॉ. संजय द्विवेदी, भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी विवि में कुलसचिव के पद पर थे।

डॉ. द्विवेदी से परे गत वर्ष आईआईएस में चयनित शालिनी अवस्थी  ट्रेनिंग पूरा कर सूचना एवं प्रसारण विभाग के डीएवीपी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर पदस्थ हुई हैं। शालिनी मूलत: छत्तीसगढिय़ा हैं, और वे छत्तीसगढ़ की अकेली अफसर हैं, जो आईआईएस में चयनित हुई। शालिनी भी मीडिया संस्थान में काम कर चुकी हैं, और आईआईएस में आने से पहले वे दिल्ली म्युनिसिपल में अफसर थीं।

रहस्यमय तरीके...

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक सबसे व्यस्त चौक, शारदा चौक पर ट्रैफिक पुलिस जब झपटकर किसी दुपहिए-चौपहिए को रोकती है, तो शुरूआती बातचीत के बाद एक ट्रैफिक सिपाही ड्राइवर को लेकर बगल के मंदिर में जाता है। हो सकता है कि वहां ड्राइवर को ईश्वर के सामने यह कसम दिलाई जाती होगी कि वे दुबारा ट्रैफिक नियम नहीं तोड़ेंगे, लेकिन हर बात में बुराई देखने वाले कुछ लोगों का यह मानना है कि ट्रैफिक पुलिस जब ट्रैफिक की नजरों से परे किसी को ओट में ले जाती है, तो वह कोई धार्मिक कसम दिलाने के लिए नहीं ले जाती।

बात यहां तक रहती तो भी ठीक था। शंकर नगर और केनाल रोड के जंक्शन पर जब ट्रैफिक पुलिस इसी तरह किसी को झपट्टा मारकर पकड़ती है, तो ड्राइवर को लेकर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडेय के बंगले के गेट पर बनी छोटी सी कोठरी में ले जाती है। पांडेयजी के बंगले में चहल-पहल कम रहती है, और गेट पर गार्ड का कमरा खाली रहता है। अब पुलिस ड्राइवरों को यहां लाकर पता नहीं कौन सी कसम दिलवाती है!

श्रीराम की एक भूमि कोरबा में भी...

प्रदेशभर से सरकारी और निजी जमीन की आ रही अफरा-तफरी की खबरों के बीच राजस्व मंत्री के जिले कोरबा से एक अनूठी खबर आई है। ऑनलाइन रिकॉर्ड में एक जमीन भगवान राम, पिता दशरथ, निवास अयोध्या चढ़ी हुई मिली। पटवारी, तहसीलदार से शिकायत हुई तो पहले यह कहा गया कि यह नामांतरण ऑनलाइन एंट्री के दौरान ट्रायल के लिये किया गया होगा, जिसे बाद में सुधारा नहीं गया। यहां तक तो ठीक है अब इसके बाद रिकॉर्ड सुधरा तो यह जमीन सीएसईबी के नाम पर चढ़ गई।

सीबीएसई के अधिकारियों ने साफ किया कि उनका इस जगह पर कोई भूखंड नहीं है। अब तहसीलदार कह रहे हैं आईडी किसी ने हैक कर ली और जान-बूझकर शरारत की गई है। बहरहाल, गड़बड़ी करने वालों का अब तक पता नहीं चला है। इधर, इस जमीन के दो दावेदार सामने आये हैं और दोनों ही दावा कर रहे हैं कि जमीन का रिकॉर्ड उनके पास है। असली भू-स्वामी कौन है यह तय होना अभी बाकी है। जमीन का मामला संवेदनशील है।

पटवारी बस्ते में बंद दस्तावेजों में भी छेड़छाड़ होती रही है पर रिकॉर्ड का ऑनलाइन किया जाना तो जीरो ईरर होना चाहिये। इस तरह से जमीन का मालिकाना हक बदलना आसान रहा तो गड़बडिय़ां इतने बड़े पैमाने पर शुरू हो सकती है, जिन्हें पकडऩा मुश्किल हो जायेगा। धान बिक्री के रकबे की एंट्री के दौरान भी ऐसी गड़बडिय़ां सामने आ चुकी हैं। 

नेताओं को  फुरसत नहीं नाम कटाने की

गवाही, चालान की प्रक्रिया को यदि पूरी गंभीरता और तेजी से निपटाया जाये तो राजनीतिक आंदोलन ही बंद हो जायेंगे। न धरना-प्रदर्शन होगा, न चक्काजाम। इन आंदोलनों में शामिल होने वालों की उम्मीद बनी रहती है कि यदि कोर्ट में केस भी चला तो गवाह नहीं टिकेंगे। सरकार बन गई तो केस खत्म करने की प्रक्रिया भी शुरू हो जायेगी। कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए भाजपा सरकार के खिलाफ खूब धरना, प्रदर्शन किया, गिरफ्तारियां दी। अब इन राजनीतिक मुकदमों के खात्मे की प्रक्रिया शुरू हुई है। गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रियों की एक उप-समिति भी बनी है, जिसकी एक बैठक भी हो चुकी।

अब यह हो रहा है कि किस तरह के मामलों का खात्मा करने का प्रस्ताव बनाया जाये यह थानेदारों को समझ नहीं आ रहा है। बहुत से गंभीर आपराधिक प्रकरण हैं जिन पर ये नियम लागू नहीं हो सकता, हालांकि वे राजनैतिक लोगों से ही जुड़े हुए हैं। इसके अलावा जिन नेताओं के विरुद्ध मामले दर्ज हैं वे खुद आवेदन लेकर नहीं आ रहे हैं, जो एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह बात खुद गृह मंत्री ने बैठक में उठाई है। इधर, प्रदेश में ‘बिगड़ती कानून-व्यवस्था’ को लेकर 20 फरवरी को भाजपा महिला मोर्चा प्रदर्शन करने जा रही है। वे आंकड़े बता रही हैं कि किस-किस तरह के अपराध कितने बढ़े। अगर ये राजनीतिक मामले भी शून्य हो जायें तो फेहरिस्त थोड़ी छोटी ना हो जाती?

स्कूल में फैले संक्रमण से सबक लेंगे?

महाराष्ट्र सरकार ने सार्वजनिक स्थानों, खासकर ट्रेनों में यात्रा के दौरान कोरोना गाइडलाइन का पालन सुनिश्चित करने के लिये बड़ी संख्या में वालिंटियर्स तैनात करने का निर्णय लिया है। हाल ही में संक्रमण के मामलों ने वहां फिर रफ्तार पकड़ी, जिसके चलते यह निर्णय लिया गया। अपने यहां भी स्कूल, कॉलेज, मल्टीप्लेक्स, बस, ट्रेन में गतिविधियां सामान्य हो रही है। इधर राजनांदगांव के एक स्कूल में 9 शिक्षकों और दो छात्रों में कोरोना का संक्रमण पाया गया। संभवत: आगे इनकी संख्या और बढ़ सकती थी।

कोरोना गाइडलाइन का पालन करना जरूरी है यह अब सिर्फ रेडियो, टीवी के विज्ञापनों में सुनाई दे रहा है। सार्वजनिक स्थलों पर लोग जागरूक रहें, इसकी कोई कोशिश नहीं हो रही। कोरोना के दौरान जब लोगों की सहूलियत के लिये कुछ घंटे, दिन के लिये अनलॉक किये गये तो हाट-बाजार में वालेंटियर्स तैनात किये जाते थे। अब जिस तरह से इस ओर बेफिक्री दिखाई दे रही है, वह किसी भी दिन चिंता बढ़ा सकती है। महाराष्ट्र का प्रयोग छत्तीसगढ़ में भी किया जाये तो कुछ गलत नहीं।


18-Feb-2021 5:36 PM 135

खाली दौड़ रहीं पैसेंजर ट्रेनें

लम्बे समय से बंद लोकल ट्रेनों को रेलवे ने आखिरकार शुरू किया. पर इनमें भीड़ नहीं है। बोगियां खाली दौड़ रही हैं। 13 फरवरी को जब ट्रेनें शुरू की गई तो रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर के बीच केवल 25-30 सवारी मिलीं। रेलवे ने एक दर्जन पैसेंजर और मेमू ट्रेनों को फिर से शुरू कर दिया है। इन्हें स्पेशल ट्रेनों के नाम पर चलाया जा रहा है। रायपुर-बिलासपुर के बीच चलने वाली ट्रेनों में सीटें कुल 3000 है लेकिन यात्रियों की संख्या अधिकतम 250 तक ही पहुंच पाई है। यानि 10 फीसदी सीटें भी नहीं भर पा रही है।

लोग इसके कई कारण बता रहे हैं। एक वजह तो ये है कि कई छोटे स्टेशनों पर ट्रेनें नहीं रोकी जा रही हैं, दूसरे किराया, स्पेशल के नाम पर अधिक लिया जा रहा है। मासिक सीजन टिकट भी बंद है। रिश्तेदारी, शादी-ब्याह में लोगों ने ज्यादा आना-जाना बंद कर रखा है। इसके अलावा 11 महीने ट्रेन नहीं चलने के कारण लोगों ने वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इन सबके बीच बड़ी वजह यह भी बताई जा रही है कि लोकल ट्रेनों में छोटे काम धंधे वाले ज्यादा चलते थे। इनमें बहुत से श्रमिक वर्ग के भी होते हैं जिनके रोजगार पर कोरोना की मार पड़ी है।

पूजा स्पेशल ट्रेनों को जब शुरू किया गया तो रेलवे ने कोरबा से रायपुर, हसदेव एक्सप्रेस को स्पेशल ट्रेन बनाकर चलाया था लेकिन सवारियां नहीं मिलने के कारण उसे बंद करना पड़ा। अब यही आशंका लोकल ट्रेनों को लेकर भी देखी जा रही है।

भाजयुमो का उलझता विवाद

भारतीय जनता युवा मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी में बने रहने के लिये अब पदाधिकारियों तथा कार्यकारिणी के सदस्यों को अपनी मार्कशीट दिखानी पड़ेगी। मोर्चा की नियुक्तियों को लेकर राजधानी रायपुर ही नहीं दूसरे जिलों के कई वरिष्ठ नेता नाराज हो गये हैं। उनकी सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया गया। शायद संतुलन बनाकर पदाधिकारी नियुक्त किये जाते तो यह विवाद खड़ा ही नहीं होता।

पहले भी तय उम्र सीमा को उपेक्षित करके नियुक्तियां होती आई हैं। बताया तो यह जा रहा है कि यदि कड़ाई से उम्र सीमा के नियम का पालन किया गया तो 50 फीसदी पदाधिकारियों को बाहर करना पड़ेगा। इसके बाद असंतोष बढ़ेगा या थमेगा, अभी कहा नहीं जा सकता लेकिन अनुशासन को लेकर पहचाने जाने वाली भाजपा में ऐसा देखने को कम ही मिला है।

बस्तर में ग्रामीणों की नाराजगी

बस्तर के सुदूर नारायणपुर इलाके के बडग़ांव में करीब दो दर्जन गांवों के सैकड़ों ग्रामीण पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ धरने पर बैठ गये हैं। इनका आरोप है कि पुलिस ने जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया गया वे माओवादी नहीं हैं। ग्रामीण पुलिस पर मारपीट का आरोप भी लगा रहे हैं। गिरफ्तारी 9 फरवरी को हुई थी।

बस्तर में तैनात सुरक्षा बलों पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं वे निर्दोष ग्रामीणों को माओवादी बताकर पकड़ लेती है या फिर एनकाउन्टर कर दिया जाता है। पिछली सरकार के कार्यकाल में ऐसी घटनाएं हुई हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इनके खिलाफ आवाज भी उठाई । इस मामले में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। ग्रामीण भी सही हो सकते हैं और पुलिस भी।

ग्रामीणों के बीच नक्सलियों को पहचान पाना एक बारीक सा काम है। कई बार वे नक्सली गतिविधियों में अपनी मर्जी से नहीं बल्कि दबाव में जुड़ते हैं। इसका तोड़ यही है कि सुरक्षा बल और ग्रामीणों में एक दूसरे के प्रति ज्यादा से ज्यादा भरोसा जगे। हाल ही में वैलेन्टाइन डे के दिन नक्सली जोड़ों का विवाह कराया गया। उसके पहले भूमकाल दिवस पर ग्रामीणों के साथ पुलिस ने समारोह आयोजित किया। कुछ जगहों में पुलिस शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये भी काम कर रही है। सुरक्षा बलों को शायद और प्रयास करते रहने की जरूरत है।

सरस्वती पूजा का पहला अक्षर...

हिन्दुस्तान में धर्म और संस्कृति इतने मिले-जुले हैं कि सरस्वती पूजा के दिन घरों में छोटे बच्चों से स्लेट-पट्टी पर पहली बार कुछ लिखवाकर उनकी पढ़ाई-लिखाई का सिलसिला शुरू किया जाता है। अभी एक सज्जन सरस्वती पूजा के पहले की शाम को बाजार में स्लेट-पट्टी ढूंढते रहे। कुछ देर हो गई थी इसलिए दुकानें बंद होने लगी थीं। अपने बचपन को याद करके वे लकड़ी की फ्रेम और काले पत्थर वाली स्लेट ढूंढते रहे, तो पता लगा कि अब उसका चलन बंद हो गया है, और अब प्लास्टिक की फ्रेम में टीन की चादर पर स्लेट-पट्टी आने लगी है। एक दुकानदार ने जब स्लेट-पट्टी और उसकी पेंसिल की मांग सुनी, तो पूछा- कल सरस्वती पूजा है क्या?

शहरों में जिन हिस्सों में बच्चों के कार्यक्रमों के लिए कपड़े किराए पर मिलते हैं वहां जन्माष्टमी जैसे त्यौहारों पर ट्रैफिक जाम हो जाता है क्योंकि मां-बाप बच्चों को राधा-कृष्ण बनाने के लिए इन दुकानों पर भीड़ लगा लेते हैं। सरस्वती पूजा पर वैसी भीड़ तो नहीं लगती, लेकिन स्कूल-कॉलेज में यह पूजा फिर भी हो ही जाती है, यह अलग बात है कि इस बरस स्कूल-कॉलेज ठंडे पड़े हुए हैं।

देवियों की भूमि पर देव!

अभी भाजपा का पूरे देश में राम मंदिर चंदा अभियान चल रहा है। मुहल्लों में लाउडस्पीकर लेकर रोज सुबह लोग निकलते थे और एक रूपये से लेकर एक करोड़ रूपये तक दान देने की अपील करते थे। इसी बीच बंगाल के चुनाव को लेकर वहां भाजपा अतिसक्रिय हुई तो राजनीति के कुछ विश्लेषकों ने लिखा कि बंगाल राम की पूजा करने वाला प्रदेश नहीं है, वह देवी की पूजा करने वाला है। और याद भी करें तो बंगाल में जन्माष्टमी, रामनवमीं, या गणेशोत्सव सुनाई नहीं पड़ता है। दूसरी तरफ सरस्वती पूजा, लक्ष्मी और काली पूजा, दुर्गा पूजा की खबरों से बंगाल का मीडिया भरे रहता है, और ये प्रतीक वहां के इश्तहारों में भी रहते हैं। अब बंगाल इतना देवीपूजक क्यों है इसे जानने-समझने के लिए वहां की संस्कृति पर कुछ गंभीर लेख पढऩे पड़ेंगे, लेकिन वहां महिलाओं का इतना सम्मान तो है कि बाग-बगीचे में किसी पुरूष साथी के साथ बैठने पर भी उसका कोई अपमान बंगाल में नहीं होता। सोचकर देखें कि वहां देवियों की ही पूजा क्यों है?