राजपथ - जनपथ

Date : 06-Dec-2019

सत्तारूढ़ कांग्रेस में जोरदार किचकिच

काफी किचकिच के बाद रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग नगर निगम के वार्ड प्रत्याशियों की कांग्रेस की सूची नामांकन दाखिले के आखिरी दिन जारी हो सकी। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया, सीएम भूपेश बघेल और अन्य नेताओं के साथ तडक़े 5 बजे तक बैठक करते रहे। पुनिया के दिल्ली उडऩे के बाद तीनों नगर निगम के वार्ड प्रत्याशियों की सूची जारी की गईं। सुनते हैं कि बिलासपुर में सर्वाधिक विवाद हुआ है। चर्चा है कि जिन नामों पर सहमति बनी थी, उनमें से कई नाम बदलकर सूची जारी कर दी गई।

बिलासपुर में अटल श्रीवास्तव और विधायक शैलेष पाण्डेय अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाने के लिए प्रयास करते रहे। मगर सूची में हेर-फेर होने से अटल के कई लोग टिकट पा गए। सूची जारी होने के बाद इसको लेकर कानाफूसी शुरू हो गई है। इस पूरे मामले को लेकर पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम पर उंगलियां उठ रही है और समिति के एक-दो सदस्य इसको लेकर काफी खफा हैं। इसको लेकर पार्टी के भीतर घमासान होने के संकेत हैं और मामला दिल्ली दरबार तक ले जाने की तैयारी चल रही है। यह साफ है कि मोहन मरकाम को पहली बार पार्टी के भीतर मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।

सरोज की एकतरफा चली

तेजतर्रार सांसद विजय बघेल और पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय व वैशाली नगर के विधायक विद्यारतन भसीन की तिकड़ी ने राज्यसभा सदस्य सरोज पाण्डेय के खिलाफ लड़ाई लड़ी और गड़बड़ी का आरोप लगाकर संगठन चुनाव रूकवाने में सफल रहे। मगर निकाय चुनाव के टिकट वितरण में उन्हें बुरी तरह शिकस्त खानी पड़ी। दुर्ग नगर निगम में तो सरोज की एकतरफा चली।

सुनते हैं कि दुर्ग नगर निगम के एक वार्ड से प्रेमप्रकाश-विजय बघेल, दिवंगत पूर्व मंत्री हेमचंद यादव के पुत्र को प्रत्याशी बनाना चाहते थे। चुनाव समिति के कई सदस्य भी इसके पक्ष में थे, लेकिन सरोज की सूची में नाम नहीं होने के कारण उन्हें टिकट नहीं मिल पाई। जिन निकायों में सरोज हस्तक्षेप करना चाहती थी, वहां उन्हें पूरा मौका मिला। यह सब देखकर माना जाने लगा है कि संगठन में भी सरोज का दबदबा रहेगा।

rajpathjanpath@gmail.com


Date : 05-Dec-2019

अब ट्रांसफर से दूर, बहुत दूर...

छत्तीसगढ़ की राज्य सेवा से आगे पढ़कर आईएएस तक पहुंचने वाले चन्द्रकांत उइके का कल एक बीमारी के चलते निधन हो गया। वे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे, और इसलिए उनका अलग-अलग विभागों में तबादला होते रहता था। लेकिन जहां बाकी अफसरों का तबादला दो-तीन बरस में एक बार होता है, चन्द्रकांत का तबादला औसतन हर बरस होता था। वे बहुत हॅंसमुख थे, खुशमिजाज थे, और तबादलों का बुरा भी नहीं मानते थे। जनसंपर्क विभाग में तैनाती के बाद वे जब इस अखबार के दफ्तर में मिलने आए तो गर्मजोशी के साथ उन्होंने खुद ही मजा लेते हुए बताया कि वे अधिक समय इस कुर्सी पर नहीं रहेंगे, क्योंकि वे अधिक समय तक किसी भी कुर्सी पर नहीं रहे। न उन्होंने खुद होकर कहीं जाने की कोशिश की, न खुद होकर कहीं से जाने की कोशिश की, लेकिन अलग-अलग कई सरकारों ने उनको 21 बरस की नौकरी में 20 बार इधर-उधर किया। उनका हाल देखकर हरियाणा के एक आईएएस, अशोक खेमका की याद आती है कि चाहे जिस पार्टी की सरकार रही हो, औसतन हर बरस उनका एक बार तबादला हो ही गया। 

चन्द्रकांत उइके ने बताया था कि एक बार उनकी पोस्टिंग लोक आयोग में हो गई, और जब वे वहां पहुंचे, तो लोकायुक्त ने उन्हें देखते ही नापसंद कर दिया, और कहा कि वे अपना तबादला कहीं और करवा लें। लोकायुक्त ने इस अफसर से बात करते हुए कुर्सी पर बैठने भी नहीं कहा, और इस तरह चन्द्रकांत उइके इस दफ्तर से कुर्सी पर एक बार बैठे बिना ही निकल आए, और उनका दूसरी जगह तबादला हो गया। लेकिन उन्होंने आदतन इसका बुरा नहीं माना, और अगली पोस्ट पर फिर साल भर के लिए चले गए। अब यह हॅंसमुख अफसर राज्य सरकार की पहुंच से दूर ट्रांसफर पर चले गया है, और अब उसे सरकार कहीं नहीं भेज सकेगी। 

नड्डा के नाम पर भी टिकट नहीं...
सुनील सोनी के सांसद बनने के बाद शहर जिला भाजपा की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सुनील सोनी से काफी बल मिला है। इसका नमूना रायपुर नगर निगम के वार्ड पार्षदों के प्रत्याशी चयन में देखने को मिला। रायपुर के वार्ड पार्षदों के प्रत्याशी चयन में बृजमोहन का दबदबा रहा। आधे से अधिक वार्डों में सुनील सोनी और बृजमोहन की पसंद के प्रत्याशी तय किए गए। 

सुनते हैं कि महानंद नाम के एक वार्ड टिकट के दावेदार के लिए पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा के ऑफिस से सिफारिश आई थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिली। प्रत्याशी चयन में शहर जिला अध्यक्ष राजीव अग्रवाल भी अपना दमखम दिखाने में कामयाब रहे। भाजपा टिकट के दावेदार सिंधी नेताओं को श्रीचंद सुंदरानी से काफी उम्मीदें थी। सुंदरानी की सलाह पर समाज के एक प्रतिनिधि मंडल ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से भी मुलाकात की थी, लेकिन प्रतिनिधि मंडल के एक भी दावेदार को टिकट नहीं मिल पाई है। 66 वार्डों की सूची में एकमात्र सचिन मेघानी को ही टिकट मिली, उनके नाम की सिफारिश सुंदरानी के बजाए बृजमोहन अग्रवाल ने की थी। 

श्रीचंद सुंदरानी के विरोधियों का मानना है कि खुद सुंदरानी ने सिंधी समाज के दावेदारों को टिकट दिलाने में रूचि नहीं ली। वे नहीं चाहते कि भाजपा में किसी और सिंधी नेता का कद बढ़े। ताकि उनका दबदबा कायम रहे। चेम्बर ऑफ कामर्स के उपाध्यक्ष भरत बजाज ने सोशल मीडिया में पहले ही ऐलान कर दिया था कि प्रतिनिधि मंडल में गए किसी भी नेता को टिकट नहीं मिलेगी। बजाज की भविष्यवाणी सही साबित हुई और समाज के नेता श्रीचंद को कोस रहे हैं। 

एक न्यौता ऐसा भी
शादियों पर होने वाले अंधाधुंध खर्च के साथ-साथ अब रायपुर जैसे शहर में सड़कों पर मेहमानों की गाडिय़ां ऐसे ट्रैफिक जाम कर रही हैं कि पुलिस और प्रशासन महज चेतावनी देते रह जाते हैं, और शादियों के महूरत पर लगता है कि मैरिज गार्डन वाले ही इस शहर के माई-बाप हैं। अभी एक शादी में जब एक मेहमान परिवार बाहर निकला तो पाया कि उनकी गाड़ी सड़क किनारे चारों तरफ गाडिय़ों के बीच फंसी हुई है। काफी देर तक इंतजार के बाद भी जब रास्ता नहीं खुला, तो उन्होंने फोन करके टैक्सी बुलवाई, और उसमें एक दूसरी शादी में चले गए। वहां से निपटाकर निकले तो फिर टैक्सी बुलवाई और पहली शादी में आए कि अपनी गाड़ी ले जाएं। लेकिन तब तक भी रास्ता नहीं खुला था, तो गाड़ी वहीं छोड़कर टैक्सी से ही घर चले गए, और अगली सुबह ड्राइवर भेजकर गाड़ी बुलवाई। 

जो विवाह स्थल दस-दस, बीस-बीस लाख रूपए वसूलते हैं, उन पर पुलिस और प्रशासन का कोई काबू नहीं है। शादियों के मौसम के पहले हर बार बैठक ली जाती है, चेतावनी दी जाती है, और फिर हर बार की तरह मौके पर भैंस पानी में चली जाती है। ऐसी फिजूलखर्ची और ऐसी दिक्कतों के बीच अभी एक किसी परिवार का शादी का कार्ड वॉट्सऐप पर मिला जिसमें पिछले हफ्ते हुई शादी का अलग किस्म का न्यौता था। परिवार ने लिखा कि उनके बेटे ने यह सोच-समझकर तय किया कि वह रजिस्टर्ड पद्धति से शादी करना चाहता है, और शादी पर मां-बाप का पसीने का पैसा फिजूल खर्च करना नहीं चाहता है। शादी में आने वाले रिश्तेदार दस मिनट के समारोह के लिए तीन-तीन दिन का सफर, समय, और पैसा खर्चते हैं जिसकी जरूरत नहीं है। इसलिए आपसे अनुरोध है कि 28 नवंबर 2019 को शुभ समय पर हम घर पर ही चंद लोगों की मौजूदगी में रजिस्टर्ड विवाह करने जा रहे हैं, आप जहां भी हों वहीं से हमें आशीर्वाद दीजिए, हमारी भावनाओं का सम्मान कीजिए। 

एकतरफा मोहब्बत में सावधान...
इन दिनों मोबाइल फोन पर तरह-तरह के मैसेंजर की मेहरबानी से लोग एक-दूसरे से बड़ी अंतरंग बातचीत भी करने लगते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ऐसे सारे संदेश किसी ऐसे के फोन पर दर्ज होते रहें जो कि उनसे नाखुश हो, तो उनका भांडाफोड़ भी किया जा सकता है। मैसेंजर पर परेशान करने वाले कुछ लोगों के  लिए आए दिन कोई न कोई महिला फेसबुक पर यह लिखते दिखती है कि वह जल्द ही कुछ लोगों के संदेशों के स्क्रीनशॉट उजागर करेगी। ऐसा ही एक स्क्रीनशॉट अभी सामने आया है जो एक समर्पित एकतरफा आशिक का दिख रहा है। इसलिए किसी को अंतरंग संदेश भेजते हुए लोग सावधान रहें कि वे किसी पर बोझ तो नहीं हैं, वरना किसी भी दिन सरेआम कपड़े उतर जाएंगे। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 04-Dec-2019

दिल मिलने की ओर?

पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की वीरेन्द्र पाण्डेय के साथ बैठक की राजनीतिक हल्कों में जमकर चर्चा है। अटकलें यह भी लगाई जा रही हैं कि वीरेन्द्र पाण्डेय भाजपा में शामिल हो सकते हैं। पाण्डेय पिछले 11 साल से भाजपा से बाहर हैं और उन्होंने विचारक गोविंदाचार्य के मार्गदर्शन में स्वाभिमान पार्टी का गठन किया है। इन सबके बावजूद रमन सिंह की वीरेन्द्र पाण्डेय से मेल मुलाकात के राजनीतिक निहितार्थ हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रमन सिंह और वीरेन्द्र पाण्डेय के बीच सामान्य बोलचाल भी करीब एक दशक से बंद थी। वीरेन्द्र पाण्डेय, रमन सिंह के बड़े आलोचक रहे हैं और पिछली सरकार के भ्रष्टाचार के प्रकरणों को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाईयां लड़ीं। अविभाजित मप्र की जनता पार्टी सरकार में संसदीय सचिव रह चुके वीरेन्द्र पाण्डेय, भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे हैं। आज भले ही उनके पास अपेक्षाकृत जनसमर्थन नहीं है, लेकिन उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक हल्कों में गंभीरता से लिया जाता है। करीब 2 साल पहले रमन सिंह के एक मंत्री के खिलाफ सिर्फ इस बात को लेकर शिकायत केन्द्रीय नेतृत्व से हुई थी कि वे वीरेन्द्र पाण्डेय को मदद कर रमन सिंह के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं। 

खैर, रमन सिंह ने वीरेन्द्र पाण्डेय के साथ अपनी खटास को दूर करने के लिए खुद पहल की है। दिवंगत नेता ओमप्रकाश पुजारी की श्रद्धांजलि सभा में दोनों की मुलाकात हुई। रमन सिंह ने उनसे गर्मजोशी से मुलाकात की और फिर चाय पर घर आने का न्यौता दिया। इसके बाद डॉ. कमलेश अग्रवाल, वीरेन्द्र पाण्डेय को लेकर डॉ. रमन सिंह के घर गए और तीनों के बीच करीब 2 घंटे तक राजनीतिक और अन्य विषयों पर सामान्य चर्चा हुई। 

सुनते हैं कि रमन सिंह अच्छी छवि वाले नेताओं को साथ लाना चाहते हैं। ताकि भूपेश सरकार के खिलाफ लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके। वे कुछ मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई भी लडऩा चाहते हैं। ऐसे में वीरेन्द्र पाण्डेय जैसे नेता उनके लिए मददगार हो सकते हैं। 

अभी हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने नान प्रकरण की जांच रोकने के लिए दायर जनहित याचिका की जिसको लेकर काफी किरकिरी हो रही है। बिलासपुर हाईकोर्ट की स्थापना के बाद अपनी तरह की पहली जनहित याचिका है, जो कि किसी जांच को रोकने के लिए लगाई गई है। रमन समर्थकों का मानना है कि इस तरह की याचिका वीरेन्द्र पाण्डेय जैसे लोगों ने लगाई होती, तो इसका कुछ अलग ही वजन होता। अब वीरेन्द्र पाण्डेय, रमन सिंह की मुहिम का हिस्सा बनते हैं या नहीं, यह देखना है। 

जितनी ऊंची जाति, उतना जुर्माना...
छत्तीसगढ़ की राजधानी के एक पेट्रोल पंप पर दो दिन पहले की एक तस्वीर सरकार के नियम-कायदे को धता बताते हुए अपने जातिगत अहंकार का सुबूत भी है। मामला तब और गंभीर हो जाता है जब यह पेट्रोल पंप प्रदेश के आरटीओ मंत्री मो. अकबर का हो। राजधानी की पुलिस कमजोर लोगों को पकडऩे का काम तो रोज करती है, लेकिन ऐसे दुस्साहसी लोग महंगी और तेज आवाज करती मोटरसाइकिलों को अनदेखा ही करते चलते हैं कि जिसकी इतनी हिम्मत हो, उससे क्यों उलझा जाए। लेकिन नंबर प्लेट पर अहंकार का यह अकेला मामला नहीं है, कांग्रेस-भाजपा से लेकर मीडिया तक के लोग नंबर की जगह अपना घमंड लिखाकर चलते हैं। कुछ लोग इस घमंड को गाडिय़ों के शीशों पर लिखवा लेते हैं, जो कि नंबर प्लेट के मुकाबले तो फिर भी बेहतर जगह है। अभी कुछ हफ्ते पहले भिलाई की एक फोटो आई जिसमें एक कार पर स्टिकर लगा था- भीतर कुर्मी है। 

ऐसे स्टिकर दिल्ली की याद दिलाते हैं जहां- भीतर जाट है जैसे स्टिकर दिख ही जाते हैं। महंगी मोटरसाइकिलों को छूने से रायपुर की ट्रैफिक पुलिस हीनभावना की शिकार दिखती है, और उनसे दूर रहती है। इन दिनों जितनी महंगी गाड़ी, उतना ही अधिक ट्रैफिक नियमों को तोडऩा। लेकिन पुलिस बड़े लोगों से उलझने के बजाय बाकी कामों में लगी दिखती है, और ऐसी नंबर प्लेटों वाली गाडिय़ां चौराहों को धड़ल्ले से पार करती रहती हैं। जो जितनी ऊंची जाति समझी जाती है, उस पर नंबर प्लेट देखकर उतना ही बड़ा जुर्माना लगाना चाहिए। 

भाजपा टिकट के लिए राज्यपाल की भी सिफारिश?
भाजपा में नगरीय निकाय पार्षद टिकट के लिए जमकर खींचतान चल रही है। चर्चा है कि कुछ दावेदारों के लिए राज्यपालों की भी सिफारिशें आई हैं। सुनते हैं कि एक विवाह समारोह में जिले के एक बड़े पदाधिकारी से एक राज्यपाल ने पूछ लिया कि उनके नामों का क्या हुआ? चर्चा तो यह भी है कि बिलासपुर के दो वार्डों में राज्यपाल की सिफारिश पर प्रत्याशी तय किए गए। रायपुर नगर निगम से लेकर बलौदाबाजार और अन्य जगहों पर भी एक राज्यपाल ने अपनी तरफ से नाम भेजे हैं। इनमें से कई नामों पर सहमति नहीं बन पाई है, लेकिन टिकट काटने की हिम्मत भी पार्टी नेता नहीं जुटा पा रहे हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Dec-2019

सवाल महंगा पड़ गया?
पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह ने नान प्रकरण में महंगे वकीलों की सेवाएं लेने पर सवाल क्या खड़े किए, बवाल मच गया। सुनते हैं कि सीएम सदन में जवाब देने से पहले ब्रीफिंग ले रहे थे, तो उनके पास भुगतान को लेकर ऐसी-ऐसी जानकारियां आईं कि वे चकित रह गए। रमन सरकार में तो कई वकीलों ने जमकर चांदी काटी थी। ऐसे ही एक प्रकरण की जांच भी चल रही है। हुआ यूं कि रमन सरकार की तेंदूपत्ता नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई थी और इसमें सरकार की पैरवी तत्कालीन महाधिवक्ता ने की थी। चूंकि महाधिवक्ता सरकार के विधि अधिकारी होते हैं। उनका वेतन भत्ता तय रहता है। ऐसे में उन्हें शासन की पैरवी के लिए अतिरिक्त भुगतान नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके महाधिवक्ता को 13 लाख रूपए लघु वनोपज संघ से भुगतान कर दिया गया। सरकार बदलने के बाद एक आरटीआई कार्यकर्ता ने इसकी पूरी जानकारी निकलवाई और अलग-अलग स्तरों पर इसकी शिकायत की। संघ ने इस पूरे मामले में विधि विभाग से मार्गदर्शन मांगा है। विधि विभाग में पिछले छह महीने से फाइल पड़ी है, अब विधानसभा में सवाल उठा, तो इस पर भी निगाहें गईं। 

एक प्रकरण में तो एक जूनियर वकील को स्टैंडिंग कॉउंसिल बनाने पर विधि विभाग ने विपरीत टिप्पणी की थी, बावजूद इसके उनकी नियुक्ति कर दी गई। कमल विहार योजना के खिलाफ तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दर्ज प्रकरणों की पैरवी के लिए वकीलों पर ही करीब 13 करोड़ रूपए खर्च कर दिए गए। ऐसे ही ढेरों वकीलों को पिछली सरकार के दौरान भुगतान की जानकारी वर्तमान सीएम के पास पहुंची, तो वे पहले से ही भरे थे और जब पूर्व सीएम ने सरकार पर सरकारी खजाना लुटाने का आरोप लगाया, तो भूपेश बघेल भड़क गए। उनके तेवर देख पुराने सीएम भी ज्यादा कुछ नहीं बोल पाए और उल्टे उन्हें सीएम सर, सीएम मैडम के नाम पर काफी कुछ सुनना पड़ गया। 

आईएएस बिरादरी खफा...
पूर्व सीएम रमन सिंह के एक और सवाल को लेकर आईएएस बिरादरी गुस्से में है। उन्होंने पूछ लिया कि पिछले पांच साल में कितने आईएएस अफसर विदेश यात्रा पर गए थे। सबसे ज्यादा यात्राएं ऋचा शर्मा ने की, वे 24 बार विदेश प्रवास पर रहीं। कुल मिलाकर 63 आईएएस अफसर 129 बार विदेश टूर पर गए। दिलचस्प बात यह है कि खुद रमन सिंह ने इसकी अनुमति दी थी। 

आईएएस के वाट्सएप ग्रुप में पूर्व सीएम के सवाल पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई है। एक आईएएस ने लिखा कि विदेश यात्रा पर आपत्ति थी, तो उन्होंने (रमन सिंह) ने अनुमति क्यों दी? सबसे ज्यादा खफा ऋचा शर्मा बताई जा रही हैं, जिन्हें नियम-कायदे मानने वाली और ईमानदार अफसर माना जाता है। उनके पति राजकमल दुबई में एक निजी कंपनी में हैं। वे भी छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस रहे हैं, जिन्होंने बाद में नौकरी छोड़कर निजी कंपनी ज्वाईन कर ली। सुनते हंै कि ऋचा जब भी विदेश गई, उन्होंने सीएम से अनुमति ली। चूंकि उनका परिवार दुबई में रहता है, यह तत्कालीन सीएम की जानकारी में था और हर बार उन्होंने अनुमति दी। ऐसे में उनकी निजी यात्राओं को सार्वजनिक तौर पर उठाने से उनकी नाराजगी स्वाभाविक है। इनमें से हर यात्रा उन्होंने अपने निजी खर्च से की थी।

एक अन्य आईएएस ने पोस्ट किया कि निजी यात्राओं के लिए आईएएस अफसरों को अब परमिशन की जरूरत नहीं रह गई है। एक अन्य अफसर ने लिखा कि निजी कंपनी के लोग एक साल में कई बार विदेश प्रवास पर जाते रहते हैं, ऐसे में आईएएस अफसरों की निजी यात्राओं पर सवाल खड़े करना पूरी तरह गलत है। वैसे भी दुबई और अन्य एशियाई देशों में आने-जाने में कोई ज्यादा खर्च नहीं होता। चर्चा तो यह भी है कि एक-दो अफसर पूर्व सीएम के राडार पर हैं, और उनकी विदेश यात्राओं पर सवाल उठाकर उन्हें घेरने की रमन सिंह की रणनीति है। चाहे कुछ भी हो, पूर्व सीएम अब आईएएस अफसरों के पसंदीदा नहीं रह गए हैं, कम से कम आईएएस अफसरों के मैसेज देखकर तो यही लगता है।  

कुछ आईएएस अफसरों का यह कहना है कि अगर वे निजी विदेश प्रवास पर जा रहे हैं, तो यह जानकारी निजी है, और सरकार को इसे बाहर किसी को देने का कोई हक भी नहीं है, यह निजता का उल्लंघन है। सरकार खुद चाहे तो इस खर्च का हिसाब मांग ले, लेकिन बाकी दुनिया को यह जानने का हक क्यों होना चाहिए कि वे निजी प्रवास पर किस-किस देश जाते हैं?

केंद्र और राज्य की बदली तस्वीरें
बस्तर में 2012 में सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के सुरक्षाकर्मियों ने जिस तरह 17 बेकसूर आदिवासियों को थोक में मार डाला था, वह मामला आज राज्य में एकदम गर्म है। एक अजीब सी बात यह है कि उस वक्त राज्य में तो भाजपा की रमन सरकार थी, लेकिन केंद्र में यूपीए की सरकार में कांगे्रस के पी चिदंबरम गृहमंत्री थे जो कि सीआरपीएफ को नियंत्रित करने वाला मंत्रालय भी था। अब आज राज्य की भूपेश सरकार अगर इस हत्याकांड के हत्यारों को सजा दिलाती है, तो उस वक्त के गृहमंत्री के नाम पर भी आंच तो आएगी। लेकिन चिदंबरम आज जेल में हैं, और यूपीए की उस वक्त की सरकार के गृहमंत्री की छवि बचाना भूपेश सरकार की प्राथमिकता भी नहीं है। सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ मीडिया और कांगे्रस के छत्तिसगढिय़ा नेताओं का दबाव कार्रवाई के लिए है, और कार्रवाई करने की बात मुख्यमंत्री ने कल ही सार्वजनिक रूप से कही भी है। छत्तीसगढ़ में उस वक्त के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस फर्जी मुठभेड़ को पूरी तरह सही करार दिया था, और अब उनका वह सार्वजनिक बयान राजनीतिक रूप से उनके लिए भारी पड़ रहा है क्योंकि उन्हीं की शुरू करवाई गई न्यायिक जांच ने मुठभेड़ को फर्जी और मारे गए लोगों को बेकसूर बताया है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 02-Dec-2019

गुरू का संदेश या सामाजिक खिचड़ी 
सियासत में गुरू-चेले की परंपरा बरसों पुरानी है। सूबे के मुखिया भूपेश बघेल के राजनीतिक गुरु दिग्विजय सिंह पिछले दिनों रायपुर प्रवास पर आए थे। कहा गया कि वे यहां सामाजिक और व्यक्तिगत कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए थे। यही वजह है कि उन्होंने काफी संजीदगी से अपने कामकाज निपटाए, लेकिन जाते-जाते उनकी सूबे के पूर्व मुखिया डॉ. रमन सिंह से मुलाकात कार्यक्रम ने राजनीतिक हलकों को नया मुद्दा दे दिया। यह मुलाकात इस लिहाज से भी अहम हो जाती है, क्योंकि वे यहां के मुखिया के राजनीतिक गुरू माने जाते हैं और उन्होंने अपने चेले के धुर विरोधी से मुलाकात की। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखरी ऐसी क्या जरूरत पड़ गई कि उन्हें विरोधियों से मिलने के लिए होटल से लेकर रमन सिंह के घर तक पैदल चलना पसंद किया। खैर, जो भी बात रही होगी, लेकिन इससे विरोधी खेमे का उत्साह बढ़ा है। दूसरी तरफ यह चर्चा भी है कि ये मुलाकात सामाजिक कार्यक्रम के संबंध में थी और वे यहां पूर्व मुखिया को न्यौता देने गए थे। वाकई ऐसा है तो बात दूर तलक जाएगी और चर्चा शुरू हो गई कि विपक्षी दल के नेताओं के बीच कुछ सामाजिक खिचड़ी तो नहीं पक रही। अब जब बात धर्म, जाति, या किसी आध्यात्मिक संबंध पर आकर टिकती है, तो फिर राजपूत-राजपूत एक हो जाते हैं, और दिग्विजय का रमन सिंह के घर जाना हो सकता है कि महज यही एक मुद्दा रहा हो। 

शुतुरमुर्ग और अफसरों में समानता

छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम ने एक बार अफसरों को शुतुरमुर्ग बताया था। उन्होंने किस संदर्भ में कहा ये तो वे ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस ने शुतुरमुर्ग और अफसरों के बीच कई समानताओं के बारे में बताया। इतना तो तय है कि शुतुरमुर्ग-अफसर संबंध की व्याख्या करने वाले आईएएस का संदर्भ एकदम साफ है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में नई सरकार के गठन के बाद यहां के अफसरों को पूरा भरोसा था कि अब मंत्रालय की ताकतवर कुर्सियों पर नए नए चेहरे नजर आएंगे, लेकिन साल भर भी ऐसा हुआ नहीं तो बेचारे मन मसोस कर बैठ गए हैं। तब आईएएस साहब ने इसका जिक्र करते हुए किस्सा सुनाया कि जब सृष्टि की रचना हो रही थी, तो आग की रखवाली का जिम्मा शुतुरमुर्ग को दिया गया था, क्योंकि शुतुरमुर्ग ईमानदार और अनुशासित माना जाता है। अफसर भी ईमानदारी और अनुशासन की शपथ लेते हैं। इस बीच पहले आदिमानव ने शुतुरमुर्ग को एक सपना दिखाकर आग को चुरा लिया। आदिमानव ने शुतुरमुर्ग से कहा कि वह उड़ सकता है, चूंकि शुतुरमुर्ग की प्रबल इच्छा थी कि वो भी दूसरे पक्षियों की तरह खुले आकाश में उड़ सके, वह तुरंत झांसे में आ गया और आग की रखवाली से दूर हो गया। जिसका फायदा आदिमानव ने उठाया। राज्य के अफसरों ने भी सरकार बदलते ही खुले आकाश में उडऩे का सपना पाल लिया था, लेकिन ये भी शुतुरमुर्ग के सपने की तरह हवा हवाई निकला, क्योंकि शुतुरमुर्ग की तरह अफसरों को भी विशालकाय माना जाता है और वह किसी भी कीमत में उड़ नहीं सकता। शुतुरमुर्ग तेज भागने वाला माना जाता है, अफसर भी तेज भागने में भरोसा करते हैं। शुतुरमुर्ग के बारे में एक बात और प्रचलित है कि वह दुश्मन को देखकर रेत में अपना सिर छिपा लेता है, उसे लगता है कि दुश्मन देख नहीं पाएगा, इसी तरह अफसरों को भी लगता है कि उनके बारे में किसी को पता नहीं चलेगा, जबकि ऐसा होता नहीं। जिस तरह रेत में सिर छुपाए शुतुरमुर्ग सोचता है कि उसका विशालकाय शरीर भी छुप गया है, वैसे ही अफसरों के कारनामों की चर्चा तो नहीं होती, लेकिन उसके बारे में सभी को सबकुछ पता होता है। फिलहाल, हवा में उडऩे का सपना पाले बैठे अफसरों के लिए यही सलाह है कि जो काम यानी भागना आता है, तो उसी में ध्यान देंगे, तो ज्यादा बेहतर होगा। उडऩे के चक्कर में भागने की आदत छूट जाएगी, तो मुश्किल तो होगी ही है ना।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Dec-2019

जंगल में मंगल का दौर...

आईएफएस अफसर आरबीपी सिन्हा की सम्मानजनक बिदाई हो गई। उन्हें रिटायरमेंट के दिन ही पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नति मिल गई। यह सब सीएस आरपी मंडल और पीसीसीएफ (मुख्यालय) राकेश चतुर्वेदी के प्रयासों से ही संभव हो पाया। उनसे सीनियर पीसी मिश्रा, आरबीपी सिन्हा जैसे भाग्यशाली नहीं रहे। उन्हें इस बात का मलाल रहा कि सरकार चाहती, तो उन्हें पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत कर सकती थी। तब सीके खेतान जैसे कड़क अफसर वन विभाग के प्रभार पर थे, जिन्होंने पीसीसीएफ के दो अतिरिक्त पद को ही खत्म कर दिया था। 

सिन्हा के  साथ-साथ संजय शुक्ला भी पदोन्नत हुए हैं। संजय को लघु वनोपज संघ का एमडी का दायित्व सौंपा गया है। वर्तमान में चतुर्वेदी ही  लघु वनोपज संघ के एमडी का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे। वैसे संजय की पदस्थापना के बाद से वे संघ के कामकाज को लेकर निश्ंिचत हो गए थे। संजय ने कम समय में लघु वनोपज संघ में काफी काम किया है, और इसको सरकार ने भी नोटिस में लिया। यही वजह है कि पीसीसीएफ के पहले खत्म किए गए पदों को फिर निर्मित किया गया और केन्द्र से इजाजत लेकर संजय व आरबीपी सिन्हा को पदोन्नत किया गया। 

चूंकि सिन्हा अब रिटायर हो चुके हैं, ऐसे में अगले दो-तीन दिनों में फिर पीसीसीएफ पद के लिए पदोन्नति होगी और नरसिंह राव को पीसीसीएफ के पद पदोन्नति दी जाएगी। यही नहीं, नरसिंह राव के पीसीसीएफ बनने के साथ ही रिक्त एपीसीसीएफ के पद के लिए भी डीपीसी होगी। इसमें सुनील मिश्रा को एपीसीसीएफ के पद पर पदोन्नति  दी जाएगी। इसके अलावा सीसीएफ के दो रिक्त पदों के लिए भी पदोन्नति होगी। कुल मिलाकर एक साथ पीसीसीएफ, एपीसीसीएफ और सीसीएफ के पद पर पदोन्नति होगी। 

दीपक को शुरू से अक्ल की जरूरत...
देश भर में बलात्कार खबरों में है, और कई समझदार लोग यह भी लिख रहे हैं कि बेटियों को शामढले या रात में बाहर न निकलने की नसीहत न देने वाले लोग बलात्कार करने की आशंका रखने वाले अपने बेटों को ही घर के भीतर ही कैद रखें तो बेहतर होगा। इसके पहले भी लोग इस बात की तरफ ध्यान खींचते आए हैं कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की शिकार के बारे में यह माना जाता है कि उसकी इज्जत लुट गई, जबकि उसने तो कोई जुर्म किया नहीं होता। इज्जत तो बलात्कारी-मुजरिम की लुटती है, और समाज की भाषा में इसकी कोई जगह होती नहीं है। सामाजिक भाषा हमेशा से महिलाओं के खिलाफ रहती आई है, और उसका एक नमूना यह निमंत्रण पत्र भी है जिसमें बेटा ही कुल का दीपक हो सकता है, लड़की तो एक मोमबत्ती भी नहीं हो सकती। परिवार के भीतर लड़कों को जब एक अलग दर्जा देकर बड़ा किया जाता है तो उनके भीतर ऐसी सोच भी बढ़ते चलती है कि वे लड़कियों से जैसा चाहें वैसा सुलूक कर सकते हैं, और यही सोच बढ़ते-बढ़ते जब अधिक हिंसक होती है, तो वह बलात्कारी हो जाती है। इसलिए जो लोग अपनी आल-औलाद को बलात्कार के जुर्म में कैद काटते या फांसी पर चढ़ते देखना नहीं चाहते, उनको चाहिए कि परिवार के भीतर ही लड़के और लड़कियों को बराबरी का दर्जा दें, ताकि लड़कों की सोच हिंसक न हो सके, बलात्कारी न हो सके। 
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Date : 30-Nov-2019

चुनाव के बरसों पहले से लगे हैं...

छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपलों में वार्ड मेंबर बनने की हसरत वाले लोग अभी से मतदाताओं पर मेहरबानियां उंडेल रहे हैं। आचार संहिता लगी उसके पहले ही कहीं कोई तीर्थयात्रा कराने ले गए, तो कहीं किसी ने कोई छोटा-मोटा उपहार बांटना शुरू किया। राजधानी रायपुर में समता कॉलोनी-चौबे कॉलोनी इलाका संपन्न लोगों का है, इसलिए वहां के लोगों को तीर्थयात्रा पर ले जाना तो मुमकिन नहीं है, इसलिए वहां उम्मीदवारी के एक उम्मीदवार ने अपनी अर्जी के साथ घर-घर एक बड़ी सी कॉपी बांटी है जिस पर उसकी तस्वीरें हैं। जाहिर है कि कम से कम गृहिणी या बच्चे उसका इस्तेमाल करेंगे, और वोट के दिन किसी न किसी को यह कॉपी दिख भी सकती है। ये प्रत्याशी कई बरस से इस इलाके में सफाई करवाने में लगे हुए थे, और कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियां दीवाली के पहले से कचरा उठाने में लगी थीं, और वे इस काम में बरसों से लगे हुए हैं, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय से, या उसके भी कुछ पहले से। जिस इलाके में इतनी मेहनत करने वाले गैरपार्षद हों, वहां उनके पार्षद बनने की संभावना तो अधिक हो सकती है, लेकिन वे जिस भाजपा से टिकट चाहते हैं, उस भाजपा की टिकट बताते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई भी चाहते हैं। ऐसे में पहली जीत तो भाजपा के भीतर ही हासिल करनी पड़ेगी, तब पार्टी के बाहर मतदाताओं के बीच जीत-हार की नौबत आएगी। वैसे यह बात अच्छी है कि इस उम्मीदवार ने बरसों से अपनी नीयत उजागर कर रखी है, और मेहनत जारी रखी है।

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Date : 29-Nov-2019

सरकार गई, पर लड़ाई जारी...

छत्तीसगढ़ में सत्ता के भ्रष्टाचार के कुछ मुद्दों को लेकर मीडिया से कोर्ट तक लगातार लडऩे वाली मंजीत कौर बल ने आज सुबह पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के एक ऐसे अफसर का मामला उठाया है जो अभी दुर्ग में तैनात हैं। मंजीत ने इस बारे में फेसबुक पर लिखा है- 2011 में इस अफसर के खिलाफ एक गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज हुई, और उस वक्त के पंचायत मंत्री की मेहरबानी से वे फरार रहते हुए जमानत के लिए हाईकोर्ट तक पहुंचे लेकिन अर्जी खारिज हो गई। फिर 2013 में पंचायत मंत्री की मेहरबानी से इस अफसर की सत्ता में वापिसी हुई, और फरारी के दौरान ही मंत्रालय में पोस्टिंग मिली, इसी पोस्टिंग के दौरान प्रमोशन भी मिला, और उसके अपने गृहस्थान में विशेष पोस्टिंग दी गई। मंजीत ने लिखा है कि पुलिस ने इसी मामले में यह हलफनामा दिया कि यह अभियुक्त कमलाकांत तिवारी व उसके अन्य सहभागी फरार हैं, जिन्हें पकडऩे की कोशिश की जा रही है। पिछले पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर के कार्यकाल का यह मामला भूपेश सरकार बनते ही नए पंचायत मंत्री टी.एस. सिंहदेव को भी दिया गया, लेकिन चारसौबीसी और एसटीएससी एक्ट के तहत मामले दर्ज होने के बावजूद अफसर दुर्ग जिला पंचायत में संयुक्त संचालक है।

छत्तीसगढ़ के लोग मंजीत कौर बल को अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि वे बरसों से उस वक्त के मंत्री रहे अजय चंद्राकर के खिलाफ कई आयोगों और कई अदालतों में लगातार लड़ाई लड़ती रहीं। अब सत्ता बदलने के बाद भी हाईकोर्ट में पुलिस के लिए हलफनामे के खिलाफ एक अफसर प्रमोशन पाकर तैनात है, और अदालत में कहा जा रहा है कि वह फरार है। कुल मिलाकर मतलब यह कि सरकार बदली, मंत्री बदले, लेकिन मंजीत कौर बल की लड़ाई नहीं बदली, लडऩे की जरूरत जारी है।

कौन है घर का भेदी?

सरकार के भीतर एक बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि कई किस्म की जांच का सामना कर रहे निलंबित एडीजी मुकेश गुप्ता की मदद करने के लिए वे कौन लोग हैं जो तरह-तरह की ऐसी कार्रवाई कर रहे हैं जिनसे सुप्रीम कोर्ट में मुकेश गुप्ता का सरकार के खिलाफ केस मजबूत हो। इसके अलावा वे कौन लोग हैं जो सरकार की गोपनीय जानकारी निकालकर मुकेश गुप्ता तक पहुंचा रहे हैं। अब तक की पुलिस की जांच के बारे में दो अलग-अलग निष्कर्ष पता लग रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मुकेश गुप्ता की बेटियों के फोन टैप करने का गोपनीय आदेश रायपुर आईजी दफ्तर के एक कम्प्यूटर से डाऊनलोड किया गया, और वह उन तक पहुंचा। यह जानकारी बताने वाले लोग बताते हैं कि कम्प्यूटर के भीतर यह जानकारी दर्ज रहती है कि उससे कब कौन सा दस्तावेज डाऊनलोड किया गया। एक दूसरी जानकारी हवा में यह तैर रही है कि रायपुर एसपी दफ्तर का एक जूनियर कर्मचारी इस कागज को मुकेश गुप्ता तक पहुंचाने वाला है। ऐसा कहा जा रहा है कि उसने ये गोपनीय दस्तावेज वॉट्सऐप पर एक अफसर को भेजे, और फिर उस अफसर ने मुकेश गुप्ता को पहुंचाए। जो भी हो फिलहाल सरकार इस जानकारी को सार्वजनिक करने की हड़बड़ी में नहीं दिख रही है, और इस पर अगर कोई कार्रवाई हुई है तो उसे भी सार्वजनिक करने की हड़बड़ी नहीं दिख रही क्योंकि इनमें से कोई जानकारी फिर मुकेश गुप्ता के हाथ मजबूत न कर जाए।


Date : 28-Nov-2019

डाला भैया की मिस्टर विनम्र छवि

छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ विधायक को जान से मारने की धमकी मिलने की जानकारी मिलने पर तमाम जनप्रतिनिधि एकजुट हो गए। सभी ने राज्य कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और बात भी सही है, अगर माननीय ही सुरक्षित नहीं है, तो आम लोगों का क्या होगा। टीवी, मीडिया और सदन में सरकार को घेरने के लिहाज से सभी ने गंभीर और एक स्वर में मुद्दा उठाया, लेकिन विधायक महोदय को पहले से जाने वाले सदस्य और उनके पुराने दिनों के साथियों की अलग ही चिंता है। उनका कहना है कि वे जब विधायक-मंत्री नहीं बने थे, तब भी उनकी पहचान थी और वे डाला भैया के नाम से जाने जाते थे। वो दौर था धमकी-चमकी का। यह अलग बात है कि उन्हें परवाह तो उस समय भी नहीं थी, लेकिन ऐसा करने से पहले इलाके के दादा लोग भी सोचते थे, लेकिन अब माननीय बनने के बाद उन्हें धमकी लोगों को कुछ हजम नहीं हो रही है। नेताजी को जानने वाले एक दूसरे नेता ने टिप्पणी की कि लगता है धमकी देने वाला उनके पुराने तेवर से परिचित नहीं है या फिर डाला भैया मिस्टर विनम्र की छवि बना चुके हैं।

मानव बम का खौफ

छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से कांग्रेस के एक विधायक से सत्ता और विपक्ष के बड़े बड़े दिग्गज घबराने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि वे राजनीति में पॉवरफुल हो गए हैं, बल्कि विधायक बनने के बाद भी सामान्य तौर तरीके से रहते हैं और लोगों से मिलते हैं। ऐसे सहज सरल जनप्रतिनिधि मानव बम के नाम से प्रचलित हो गए हैं। लोग बाग उन्हें दूर से ही देखकर ऐसे भागते जैसे वो कोई बम-वम लेकर घूमते हों। हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, लोगों से जब इस बारे में पूछा गया तो किसी ने साफ तौर पर कुछ बताया तो नहीं, लेकिन इतना जरूर कहा कि इसके लिए आपको कुछ देर उनके साथ रहना पड़ेगा। उनके साथ रहने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन उनके बारे में जो कानाफूसी होती है, उससे यह बात समझ आई कि उनका हाजमा गड़बड़ रहता है, जिसके कारण उन्हें मानव बम की उपाधि दी गई है।

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Date : 26-Nov-2019

कुलसचिव ने ऐसे बढ़वाए नंबर 
दिल्ली के जेएनयू में आंदोलन की धमक छत्तीसगढ़ में भी दिखाई दी। यहां के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के छात्रों ने गेट के बाहर प्रदर्शन किया। छात्र नेताओं और कई नुमाइंदों ने भाषण दिया। विवि में फिलहाल कुलपति का पद खाली है और कुलसचिव ही सर्वेसर्वा हैं। उनको इस बात की जानकारी मिली कि विवि के बाहर जेएनयू के समर्थन में प्रदर्शन की तैयारी है तो उन्होंने मीडिया में बयान दिया कि ऐसे किसी भी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई है और इसमें भाग लेने वाले छात्रों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन प्रदर्शन वाले दिन उनका रवैया ठीक उलटा था। वे पूरे समय प्रदर्शन स्थल के पास ही कुर्सी लगाकर बैठे रहे और तो और छात्रों को भी प्रेरित करते रहे कि आंदोलन में शामिल हों। हद तो तब हो गई जब उन्होंने प्रदर्शन में शामिल प्रमुख लोगों के लिए अपने सरकारी आवास में दावत का इंतजाम किया। उधर, सोशल मीडिया में इसकी खूब चर्चा हो रही है और प्रदर्शन स्थल पर कुर्सी लगाए बैठे उनकी तस्वीर भी खूब वायरल हो रही है। लोगों ने यह भी लिखा है कि धरने के लाऊडस्पीकर के लिए बिजली भी विश्वविद्यालय से दी गई। हालांकि इससे उनकी सेहत पर कुछ असर पड़ेगा, इसकी संभावना तो कम ही है, क्योंकि उन्होंने अपना नंबर तो बढ़वा लिया है। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 24-Nov-2019

ये गेड़ी, भौंरा की मस्ती है...
छत्तीसगढ़ में इन दिनों दो बातें खूब चर्चा में है। पहली बात किसानों की धान खरीद और दूसरी सूबे के मुखिया भूपेश बघेल का ठेठ देसी अंदाज। कभी वो गेड़ी चढ़ते नजर आते हैं, तो कभी भौंरा चलाते या फिर नदी में आकर्षक डुबकी लगाते सुर्खियों में रहते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि वे अपने इस अंदाज के कारण खूब वाहवाही बटोर रहे हैं। इस बीच धान खरीद को लेकर भी खूब सियासत हो रही है। कांग्रेस बीजेपी दोनों एक दूसरे पर बरस रहे हैं। मामला कुछ भी हो लेकिन किसान की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि धान खरीद 1 दिसंबर शुरू होगी। ऐसे में किसान को रोजमर्रा के कामकाज और खर्च के लिए धान बेचना ही पड़ता है। दिक्कत ये है कि समर्थन मूल्य से कम कीमत पर कोचिया या व्यापारी को धान बेचने में भी खतरा बना हुआ है। खेत-खलियान से जैसी ही गाड़ी निकलती है, पुलिस और प्रशासन की पैनी नजर उस पर टूट पड़ती है। कोई किसान सपड़ा गया तो समझो गए काम से, क्योंकि उनका सीआईडी दिमाग कहता है कि हो सकता है कि धान की तस्करी हो रही हो? पुलिस और प्रशासन को समझाने-बुझाने और कागज दिखाने में कम से कम दो तीन दिन का समय बीत जाता है। जैसे तैसे गाड़ी छूटती है तो मंडी में और व्यापारियों से जूझना पड़ता है। ऐसे ही परेशानी से जूझने के बाद एक किसान ने अपनी व्यथा इलाके के बड़े नेता को बताई तो उन्होंने तपाक से छत्तीसगढ़ी में कहा कि रुक अभी गेड़ी, भौंरा और डुबकी लगाए के बाद सोचबो धान के का करना हे। इतना सुनते ही किसान समझ गया कि अभी कुछ बोलना बेकार है।

खुद का माल बेचने के लिए...
रमन सरकार के समय इस रोक के पीछे सोच बताई जा रही थी कि ऐसी तमाम बिक्री पर रोक लगने से ही नया रायपुर के भूखंड, कमल विहार के भूखंड, और हाऊसिंग बोर्ड के मकान बिक सकेंगे। सरकार ने खुद ने इन सबका ऐसा दानवाकार आकार खड़ा कर दिया था कि उसे बेचना भारी पड़ रहा था, और अब साल भर गुजारने के बाद भी भूपेश सरकार इस बोझ से उबर नहीं पा रही है। पिछली सरकार के समय हाऊसिंग बोर्ड ने इस बड़े पैमाने पर गैरजरूरी निर्माण कर लिया था जिसमें चवन्नी दिलचस्पी जरूर थी, लेकिन बोर्ड का कोई फायदा नहीं था, घाटा ही घाटा था। उस समय हाऊसिंग बोर्ड के खाली मकानों को ठिकाने लगाने के लिए सरकार के सबसे ताकतवर सचिव पुलिस महकमे के पीछे लगे थे, और डीजीपी ए.एन.उपाध्याय और हाऊसिंग बोर्ड के एमडी डी.एम. अवस्थी पर लगातार दबाव डाला गया था कि वे पुलिसवालों के लिए मकान बनाने के बजाय हाऊसिंग बोर्ड के मकान ही खरीद लें। लेकिन उन्होंने हाऊसिंग बोर्ड के निर्माण को कमजोर बताते हुए और उनका दाम अधिक बताते हुए उस पर पुलिस का पैसा खर्च करने से मना कर दिया था। उसके बजाय पुलिस हाऊसिंग कार्पोरेशन ने अपने मकान बनाए थे जो कि शहर के अलग-अलग इलाकों में, थानों के आसपास, और पुलिस लाईन के आसपास बने, और छोटे पुलिस कर्मचारियों के अधिक काम भी आए। 

छोटे प्लॉटों की छूट से जनता का भला
छोटे भू-खण्डों की रजिस्ट्री की अनुमति देने के फैसले को अच्छा प्रतिसाद मिला है। चार-पांच महीने में ही एक लाख से अधिक छोटे भू-खण्डों की रजिस्ट्री हो चुकी है। सरकार के इस फैसले से निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों को बड़ा फायदा हुआ है, जो कि सरकारी नियमों के चलते मकान नहीं बना पा रहे थे, या अपनी निजी जरूरतों के लिए भी निजी जमीन को बेच नहीं पा रहे थे। पिछली सरकार में भी 22 सौ वर्गफीट से कम भू-खण्डों की रजिस्ट्री पर से रोक हटाने की मांग उठी थी। तब कैबिनेट की बैठक में दो मंत्रियों के बीच इसको लेकर काफी विवाद हुआ था। विवाद इतना ज्यादा हुआ था कि सीएम रमन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा। रमन सिंह भी छोटे भू-खण्डों की रजिस्ट्री पर से रोक हटाने के पक्ष में थे, लेकिन एक अन्य मंत्री ने जब इसका विरोध किया  तो वे भी पीछे हट गए। इसका नुकसान विधानसभा चुनाव में भाजपा को उठाना पड़ा और परंपरागत शहरी वोट कांग्रेस की तरफ खिसक गए। 

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Date : 23-Nov-2019

लोग बड़े-बड़ेे महान लोगों की किताबों में जिंदगी के राज ढूंढते हैं। हकीकत यह है कि जिंदगी के कई किस्म के फलसफे ट्रकों के नीचे लिखे दिख जाते हैं, और कई बार लोगों के टी-शर्ट भी कड़वी हकीकत बताते हैं

स्मार्ट पुलिस के राज में किस्मत कारगर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की पुलिस स्मार्ट और हाईटेक होने का दावा करती है और यहां के पुलिस कप्तान की स्मार्ट पुलिसिंग का डंका देश-विदेश में भी बजता है, लेकिन शहर में चोरी के एक ताजा मामले में कहानी कुछ और ही कह रही है। हम जिस चोरी की बात कह रहे हैं, वह है तो एक मामूली सी चोरी, लेकिन राजधानी की स्मार्ट और हाइटेक पुलिसिंग की पोल खोलने के लिए काफी है। रायपुर के फूल चौक से करीब 15 दिन पहले एक महिला डॉक्टर की एक्टिवा बाइक चोरी हो गई थी, जिसकी रिपोर्ट मौदहापारा थाने में लिखवाई गई। जैसा कि आमतौर पर होता है कि पुलिस ने खानापूर्ति के लिए काफी जद्दोजहद के बाद रिपोर्ट तो लिख ली, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि आपको आश्चर्य होगा कि यह चोरी की गाड़ी शहर के दूसरे थाने में ही पड़ी मिली। वो तो गनीमत है कि महिला डॉक्टर के परिचित का, जो किसी काम से थाने गए तो उन्होंने बाइक को पहचान लिया। 

राजधानी रायपुर में बाइक चोरी, उठाईगिरी और सूने घरों के ताले टूटने की दर्जनों रिपोर्ट रोजाना थाने में दर्ज होते हैं, लेकिन उसमें से अधिकांश मामलों में पुलिस शायद ही किसी नतीजे तक पहुंच पाती है। पीडि़त लोग भी यह मानकर चलते हैं कि उनका चोरी हुए सामान का मिलना मुश्किल है, फिर भी पुलिस से उम्मीद लगाए लोग थाने के चक्कर जरूर काटते हैं, हालांकि पुलिस थानों के चक्कर काटते-काटते उनकी आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। किसी किस्मत वाले को ही उसका चोरी हुआ सामान वापस मिल पाता है। ऐसे ही फूल चौक की इस महिला डॉक्टर का भाग्य ने साथ दिया तो उसकी चोरी हुई बाइक 15 दिन के भीतर मिल गई। रायपुर की सुयश हास्पिटल की डॉक्टर की गाड़ी 8 नवंबर को फूल चौक स्थित घर से चोरी हो गई। उन्होंने 9 तारीख को मौदहापारा में इसकी रिपोर्ट लिखवाई। यह अलग बात है कि रिपोर्ट लिखवाने के लिए भी उन्हें खूब पापड़ बेलने पड़े। इसके बाद वो अपनी बाइक की खबर लेने रोजाना थाने जाती थीं, लेकिन पुलिस वाले उन्हें डॉटकर भगा देते थे कि रोज रोज परेशान न करें। गाड़ी के बारे में जानकारी मिलने पर फोन कर दिया जाएगा। महिला डॉक्टर ने आसपास के सीसीटीवी कैमरा के फुटेज भी पुलिस को उपलब्ध कराए थे, जिसमें सुबह 4 बजे के आसपास चोर गाड़ी ले जाते दिखाई दे रहा था, लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने कोई खोजबीन नहीं की। 

महिला डॉक्टर का 15 दिन में उत्साह धीरे धीरे ठंड़ा हो रहा था, इस बीच शुक्रवार को उनके एक रिश्तेदार किसी काम से टिकरापारा थाने पहुंचे तो उन्हें वहां एक्टिवा बाइक खड़ी दिखी। उन्होंने इसकी सूचना महिला डॉक्टर को दी तो उसने टिकरापारा थाने जाकर देखा तो वह उनकी ही गाड़ी निकली। इसके बाद उन्होंने इसकी सूचना मौदहापारा पुलिस को दी। थाने वालों ने पता करवाया तो जानकारी मिली कि गाड़ी लावारिस हालत में पड़ी मिली थी, तो उसे थाने में रखवा दिया गया था। अब सोचने वाली बात यह है कि शहर में एक थाने से दूसरे थाने के बीच सूचनाओं का आदान प्रदान नहीं हो रहा है, तो कैसी स्मार्ट पुलिसिंग का दावा किया जा रहा है। महिला डॉक्टर को किस्मत और रिश्तेदार की तत्परता के कारण गाड़ी कोर्ट से वापस मिल जाएगी, लेकिन हर किसी की किस्मत ऐसा हो जरूरी नहीं है। 

खास बात यह है कि महिला डॉक्टर ने अपनी गाड़ी को आकर्षक बनाने के लिए तरह-तरह के ग्राफिक्स बनवाए थे, इसीलिए रिश्तेदारों ने उसकी पहचान कर ली, वरना तो गाड़ी थाने में पड़े-पड़े सड़ जाती। एक और बात यह भी कि उनकी गाड़ी में पेट्रोल कम था, तो पेट्रोल खत्म होने पर चोर ने गाड़ी को लावारिस छोडऩा ही सही समझा। इस पूरे वाकये से ये सबक तो मिलता है कि गाड़ी में ज्यादा पेट्रोल न रखें और कुछ ऐसा निशान बनाकर रखें, ताकि गाड़ी और सामानों को कोई भी पहचान सके, क्योंकि रायपुर की स्मार्ट पुलिस ने शहर को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया है।
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Date : 22-Nov-2019

भ्रष्टाचार निजी स्टाफ से होकर...

मोदीजी की तरह दाऊजी, यानी भूपेश बघेल भी अपने और साथी मंत्रियों की निजी स्थापना पर नजर रखे हुए हैं। आम धारणा है कि भ्रष्टाचार मंत्री के स्टाफ से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इस पर नकेल कसने की कोशिश  हो रही है और सरकार के 11 महीने के कार्यकाल में अब तक दर्जनभर अफसर-कर्मी सीएम-मंत्री स्टाफ से निकाले जा चुके हैं। तकरीबन सभी तेज बैटिंग कर रहे थे। खुद दाऊजी अपने स्टाफ से दो को बाहर कर चुके हैं। 

शुरूआत उन्होंने अपने ओएसडी प्रवीण शुक्ला से की थी, जो कि उद्योग अफसर हैं और वे भी इन्हीं सब शिकायतों के चलते बाहर हुए।  उन्हें रविंद्र चौबे के यहां भेजा गया, लेकिन वहां भी वे ज्यादा दिन नहीं टिक पाए। इसके बाद हाल ही में सीएम हाउस से अजीत मढ़रिया को भी मूल विभाग में भेज दिया गया। अजीत सीएम भूपेश बघेेल के सबसे पुराने सहयोगी थे। चर्चा है कि दाऊजी के सीएम बनने के बाद उनके अपने निवास में समानांतर जनदर्शन चल रहा था। ये बात किसी को हजम नहीं हुई और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 

स्कूल शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह का पूरा स्टाफ बदल दिया गया। लेकिन इससे पहले तक मंत्री की जानकारी के बिना तबादला-पोस्टिंग के नाम पर प्रदेशभर से काफी कुछ बटोरकर निकल गए। जयसिंह अग्रवाल के दो पीए बदले जा चुके हैं। रूद्रकुमार गुरू के पीए पंकज देव को भी हाल में मूल विभाग में भेज दिया गया। कवासी लखमा के यहां भी छोटा सा फेरबदल हुआ है। पुराने मंत्री मोहम्मद अकबर, रविन्द्र चौबे के यहां पुराने लोग काम कर रहे हैं।

अकबर के यहां एस के सिसोदिया तो पिछली सरकार में भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे। रविंद्र चौबे के यहां डीपी तिवारी की साख अच्छी है। उमेश पटेल के यहां तो उनके पिता के पुराने सहयोगी जेके शर्मा ही काम संभालते हैं। उनकी छबि भी साफ-सुथरी है। अनिला भेडिय़ा के यहां स्टाफ पर उनके पति, रिटायर्ड आईजी रविंद्र भेडिय़ा, की पैनी निगाहें रहती हंै। इसलिए उनके यहां जो कुछ भी होता है, वह रविंद्र भेडिय़ा की जानकारी में रहता है।

 टीएस सिंहदेव के स्टाफ में उनके ओएसडी आनंद सागर सिंह का दबदबा है। आनंद भी सिंहदेव के जांचे-परखे हुए हैं। आनंद के पिता, सिंहदेव के पिता के सहायक थे। आनंद भी सिंहदेव के मिजाज से पूरी तरह वाकिफ हैं। वे ऐसा कोई काम करने से परहेज करते हैं, जो सिंहदेव को पसंद नहीं है। यही वजह है कि इन मंत्रियों के यहां भारीभरकम तबादलों के बावजूद लेन-देन की चर्चाओं मेें पुराने स्टाफ के लोगों का नाम नहीं आया। इन मंत्रियों के यहां भारी भरकम तबादलों के बाद भी गरिमा कायम रही। 

रमन सिंह के वक्त भी...

पिछली सरकार में तो रमन सिंह और उनके कुछ मंत्रियों के सहयोगियों ने ऐसे-ऐसे कारनामे किए थे, जिनके खिलाफ पीएमओ तक शिकायत हुई थी। रमन सिंह खुद शालीन रहे, लेकिन अरूण बिसेन जैसों के कारनामों को अनदेखा करना उन्हें भारी पड़ा। खुद रमन सिंह की छवि पर असर पड़ा। मंत्रियों के स्टाफ का हाल यह रहा कि दो के खिलाफ तो यौन उत्पीडऩ की शिकायत भी अलग-अलग स्तरों पर हुई थी, लेकिन मामले दबा दिए गए। यही नहीं, एक मंत्री के करीबी अफसर की प्रताडऩा से एक जूनियर इंजीनियर ने आत्महत्या तक कर ली थी, लेकिन उन पर कार्रवाई तो दूर, कुछ समय बाद प्रमोशन तक हो गया।

 रमन सरकार के एक मंत्री के ओएसडी की तो एक जूनियर अफसर ने बंद कमरे में जमकर पिटाई भी की थी। चूंकि कमरे के बाहर सिर्फ आवाज ही सुनाई दे रही थी और बाहर निकलकर ओएसडी ने किसी तरह चूं-चपड़ नहीं की इसलिए तूल नहीं पकड़ सका। केदार कश्यप के पीए आरएन सिंह के खिलाफ तो दिल्ली के एक प्रकाशक ने बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर खुलेतौर पर कमीशन मांगने का आरोप लगाया था। आरएन सिंह की तो बृजमोहन अग्रवाल के शिक्षा मंत्री रहने से लेकर केदार कश्यप के कार्यकाल तक शिक्षा विभाग में तूती बोलती थी कुछ लोग तो उन्हें अघोषित मंत्री तक कहते थे। भाजपा के पुराने नेता कहते हैं कि यदि मोदी सरकार की तरह मंत्री स्टाफ पर नजर रखी जाती, तो भाजपा का इतना बुरा हाल नहीं होता। जाहिर है कि मंत्रियों का उन्हें संरक्षण था, ऐसे में बुरा होना ही था। 
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Date : 20-Nov-2019

सारी सिफारिशें किनारे करके...
वैसे तो प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया ने कहा था कि निकाय- पंचायत चुनाव के बाद निगम-आयोगों में नियुक्ति होगी, फिर भी अल्पसंख्यक आयोग में नियुक्ति कर दी गई। महेन्द्र छाबड़ा को आयोग का अध्यक्ष बनाने का फैसला चौंकाने वाला था, क्योंकि इसमें प्रदेशभर के बड़े मुस्लिम-सिख नेताओं की नजर लगी थी। पार्टी के कई राष्ट्रीय नेताओं ने भी अपनी तरफ से अलग-अलग नामों की सिफारिशें की थी। इन सबको दरकिनार कर महेन्द्र छाबड़ा को अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। 

सुनते हैं कि छाबड़ा को अध्यक्ष बनाने में मोहम्मद अकबर की भूमिका अहम रही है। छाबड़ा राजीव भवन में मंत्रियों के मेल-मुलाकात कार्यक्रम के प्रभारी थे और मीडिया विभाग में भी अपनी जिम्मेदारी बाखूबी से निभा रहे थे। ऐसे में अकबर ने उनके नाम का सुझाव दिया, तो सीएम ने फौरन हामी भर दी। आयोग में दो सदस्यों में से एक अनिल जैन की नियुक्ति में भी अकबर की चली है।
 
अनिल, अकबर के कॉलेज के दौर के सहयोगी हैं। जबकि राजनांदगांव के हाफिज खान की नियुक्ति में करूणा शुक्ला का रोल रहा है। हाफिज खान ने विधानसभा चुनाव में राजनांदगांव में करूणा का जमकर प्रचार किया था। और करूणा ने जब उनका नाम आगे किया, तो सीएम ने बिना किन्तु-परन्तु के सदस्य के रूप में नियुक्ति कर दी। दोनों सदस्यों को राज्यमंत्री का दर्जा रहेगा। 

जब सीधा आदमी अड़ जाए...
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी सीधे-सरल माने जाते हैं। मगर कांकेर जिलाध्यक्ष पद पर अपने समर्थक विजय मंडावी को बिठाने के लिए सभी बड़े नेताओं की नाराजगी मोल ले ली। कांकेर में रमन सिंह, रामप्रताप सिंह और पवन साय व धरमलाल कौशिक एकमतेन किसी गैर आदिवासी विशेषकर सामान्य वर्ग से अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थे। क्योंकि जिले की सारी विधानसभा सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। मौजूदा जिलाध्यक्ष हलधर साहू पिछड़ा वर्ग से रहे हैं, लेकिन वे कोई परिणाम नहीं दे सके। कांकेर जिले में हर चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। 

सुनते हैं कि विक्रम को समझाने की कोशिश की गई, किन्तु वे नहीं माने। अपेक्स बैंक के पूर्व अध्यक्ष महावीर सिंह राठौर के साथ तो उनकी तीखी नोंक-झोंक भी हुई। वे अपनी पसंद का अध्यक्ष बनाने के लिए इतने अड़े थे कि पार्टी को कांकेर का 22 तारीख को होने वाला चुनाव स्थगित करना पड़ा। पार्टी नेताओं को आशंका थी कि विक्रम अपनी पसंद का अध्यक्ष न होने पर पद से इस्तीफा तक दे सकते हैं। ऐसे में पार्टी नेताओं ने फिलहाल चुनाव टालने में समझदारी दिखाई।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 19-Nov-2019

सहकर्मी से समधी तक...
दो आईएफएस अफसर संजय शुक्ला और जयसिंह म्हस्के की दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदलने जा रही है। संजय जल्द ही पीसीसीएफ बनने वाले हैं, और म्हस्के वन मुख्यालय में एपीसीसीएफ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वैसे तो म्हस्के, संजय शुक्ला से एक साल जूनियर हैं, लेकिन दोनों लंबे समय तक पंचशील नगर में एक-दूसरे के पड़ोसी रहे हैं। दोनों ही रायपुर के ही रहने वाले हैं। संजय के पिता कान्यकुब्ज सभा के अध्यक्ष भी रहे हैं और म्हस्के के परिवार के लोग राजनीति में है। और अब संजय के पुत्र सूर्यांश का विवाह अगले महीने म्हस्के की पुत्री से होने जा रहा है। दोनों का परिवार एक-दूसरे से बरसों से परिचित रहा है।

ऐसे में दोनों परिवारों ने आपसी रजामंदी से दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का फैसला लिया। संजय के पुत्र सूर्यांश की पढ़ाई विदेश में हुई है और उनका अपना खुद का कारोबार है। संजय और म्हस्के, छत्तीसगढ़ के पहले आईएफएस हैं, जो पद पर रहते आपस में रिश्तेदार बनने जा रहे हैं। इससे पहले अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे शरदचंद बेहार ने अपने पुत्र का विवाह अपने जूनियर अफसर एस के मिश्रा की पुत्री के साथ किया था। मिश्रा बाद में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव बने और रिटायरमेंट के बाद कई अहम पदों पर रहे। 

हक तो बनता है...
प्रदेश भाजपा संगठन के कर्ता-धर्ता माने जाने वाले गौरीशंकर अग्रवाल अपनी ही पार्टी के प्रमुख नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गए हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष होने के नाते गौरीशंकर को तमाम सरकारी सुविधाएं हासिल हैं। वे पूरे लाव-लश्कर के साथ पार्टी दफ्तर आते हैं। वे वैसे तो किसी अहम पद पर नहीं है, लेकिन उनके मंच पर बैठने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। 

सुनते हैं कि प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में दो वरिष्ठ नेताओं ने महामंत्री (संगठन) पवन साय को पर्ची भेजकर जानना चाहा कि गौरीशंकर को किस आधार पर मंच पर बिठाया गया। इससे पार्टी में हलचल मच गई। पिछले दिनों जिला अध्यक्ष की रायशुमारी के लिए वरिष्ठ नेताओं की बैठक में भी गौरीशंकर मौजूद थे, तब भी कुछ प्रमुख नेताओं ने उनकी मौजूदगी पर आपत्ति की थी। 

गौरीशंकर भले ही किसी पद पर न हो, पार्टी में साधन-संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी उन पर रहती है। लोगों को याद है कि जब पार्टी लगातार विपक्ष में थी तब भी रायपुर में भाजपा कार्यालय गौरीशंकर अग्रवाल ने ही खड़े रहकर बनवाया था, और तब से लेकर विधानसभा अध्यक्ष रहने तक भी राजनीतिक और चुनावी खर्च की तमाम इंतजाम बैठकों में वे रखे ही जाते थे। ऐसे में मंच पर बैठने का हक तो बनता ही है, लेकिन पार्टी दिग्गज नेताओं की नाराजगी को भी अनदेखा नहीं कर पा रही है। चूंकि पार्टी विपक्ष में है, ऐसे में दिग्गजों को साथ लेना मजबूरी भी है। इन सबको देखते हुए तोड़ निकाला गया कि मंच पर कुर्सी में अब नेताओं का नाम चिपका दिया जाता है। जिनका नाम होता है, वे ही मंच पर कुर्सी में बैठ सकते हैं। इससे सभी का सम्मान रह जाता है। 

संभावनाएं अभी बाकी हैं...
आरपी मंडल के मुख्य सचिव बनने के साथ ही उनके बैचमेंट चित्तरंजन खेतान मंत्रालय से बाहर हो गए क्योंकि आमतौर पर लोग अपने बराबर के, या अपने से जूनियर अफसर के मातहत काम नहीं करते। खेतान के राजस्व मंडल जाने के अलावा इन दोनों से वरिष्ठ एक अफसर, पूर्व मुख्य सचिव अजय सिंह भी सरकार के बाहर हैं, लेकिन वे राजस्व मंडल से नया रायपुर, योजना आयोग में उपाध्यक्ष के पद पर आ गए हैं, जहां अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। एक और सीनियर अफसर एन. बैजेंद्र कुमार केंद्र सरकार के एनएमडीसी में सीएमडी के बहुत महत्वपूर्ण और ताकतवर पद पर हैं, लेकिन उनका रिटायरमेंट भी कुछ ही महीने दूर है। ऐसे में अभी ऊपर के ये चारों नाम कुछ महीनों से लेकर डेढ़ बरस तक अलग-अलग जगह काम भी करेंगे, लेकिन लोगों की नजरें इस पर भी हैं कि क्या मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इनमें से किसी को सलाहकार भी बनाएंगे? पिछली भाजपा सरकार में शिवराज सिंह और सुनिल कुमार दो रिटायर्ड मुख्य सचिव सलाहकार बने थे, और भूपेश सरकार में कोई भी रिटायर्ड अफसर सलाहकार नहीं है। कुछ लोगों को लगता है कि भूतपूर्व अफसर भी काम के हो सकते हैं, हालांकि भूपेश बघेल ने जो चार गैरसरकारी पृष्ठभूमि वाले सलाहकार बनाए हैं, वह अपने-आपमें एक अनोखा और महत्वपूर्ण प्रयोग है। इनमें से तीन तो अखबारी दुनिया से आगे बढ़े हुए हैं, और एक राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए हैं। अब जो अफसर मुख्य सचिव बन गए, या नहीं बन पाए, उनके सामने सलाहकार बनने की एक दूर की संभावना दिखती है।

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Date : 18-Nov-2019

बड़ा और कड़ा फैसला

आखिरकार दाऊजी ने रायगढ़ के गारे पेलमा खदान से राज्य पॉवर कंपनी के संयंत्रों तक कोयला परिवहन के ठेके को निरस्त करने के आदेश दे दिया। उनके इस फरमान से पार्टी में हलचल मची हुई है, जो कि कोयला परिवहन कारोबार से जुड़े हैं। गारे पेलमा के माइनिंग ऑपरेटर अडानी समूह हैं और परिवहन में भी उनकी एकतरफा चलती है। मगर टेंडर में जो रेट आए थे वह काफी ज्यादा थे। इसके बाद उन्होंने पॉवर कंपनी के चेयरमैन शैलेन्द्र शुक्ला से चर्चा के बाद कड़ा और बड़ा फैसला ले लिया। 

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अडानी समूह के खदानों में परिवहन का ठेका अंबिकापुर के कई बड़े लोगों के पास रहा है। यहां के परिवहन ठेकेदारों का दबदबा इतना है कि अंबिकापुर के मुख्य चौराहे में गांधीजी की प्रतिमा को किनारे लगा दिया गया। ताकि गाडिय़ों के आने-जाने में दिक्कत न हो। दिलचस्प बात यह है कि राजनेता तो दूर, बात-बात पर धरना प्रदर्शन और कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी इसको लेकर खामोश रहे। मगर इस बार दाऊजी के फैसले से अडानी-समर्थकों को गहरी चोट पहुंची है। इससे पहले लेमरू हाथी अभ्यारण्य के फैसले से अडानी समूह को बड़ा झटका लगा था। क्योंकि हसदेव अरण्ड इलाके में अडानी समूह को पीएल मिला हुआ था। विरोधी भी मानने लग गए हैं कि राज्यहित में बड़ा और कड़ा फैसला दाऊजी ही ले सकते हैं। 

रमन सिंह की एक और पारी?
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी जा सकती है। पार्टी हल्कों में इसकी चर्चा चल रही है। संगठन चुनाव में जिस तरह छोटे-बड़े फैसलों में रमन सिंह की राय ली जा रही है, उससे उन्हें अध्यक्ष बनाने की अटकलों को बल मिला है। 15 साल के सीएम रमन सिंह विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद अभी भी पार्टी का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। 

जिलाध्यक्षों के चयन में उनकी राय को महत्व मिलने के संकेत हैं। खुद प्रदेश के चुनाव अधिकारी रामप्रताप सिंह और महामंत्री (संगठन) पवन साय जिलाध्यक्षों का नाम तय करने के पहले उनसे मंत्रणा कर चुके हैं। वैसे तो पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पूछ परख नहीं रह गई है। उन्होंने खुद भी दिल्ली आना-जाना एकदम कम कर दिया है। प्रदेश के नेता भी छोटी-मोटी शिकायतों को लेकर प्रदेश अध्यक्ष या अन्य किसी नेता के पास जाने के बजाए रमन सिंह के पास जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। 

सुनते हैं कि रमन सिंह ने राजनांदगांव में स्थानीय सांसद संतोष पाण्डेय और अन्य पूर्व विधायकों के विरोध के बावजूद महापौर मधुसूदन यादव को जिलाध्यक्ष बनाने के पक्ष में राय दे दी है। उन्होंने यह तर्क दिया है कि हेमचंद यादव के निधन के बाद पार्टी के पास कोई बड़ा यादव चेहरा नहीं है। चर्चा तो यह भी है कि मधुसूदन यादव को अध्यक्ष बनाने के लिए रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह का ज्यादा दबाव है। 

रमन सिंह सिर्फ दुर्ग-भिलाई में ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वहां सरोज पाण्डेय, और पे्रम प्रकाश पाण्डेय की दिलचस्पी है। बाकी जगह रमन सिंह की पसंद-नापसंदगी को तवज्जो मिल रही है। ऐसे में उन्हें प्रदेश की कमान सौंपने की अटकलें चल रही है, तो बेवजह नहीं हैं। उनके उत्साही समर्थक मानते हैं कि जिस तरह वर्ष-2003 में रमन सिंह के अध्यक्ष रहते प्रदेश में भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई थी, उसी तरह चार साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में फिर से रमन सिंह की अगुवाई में सरकार बनाने में कामयाब होंगे। मगर क्या केन्द्रीय नेतृत्व भी ऐसा सोचता है, यह अगले महीने साफ हो जाएगा। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 17-Nov-2019

सारी कायनात जुट गई...

रेडिएंट-वे स्कूल में हादसे को लेकर पिछले दिनों जमकर कोहराम मचा। हादसे में एक छात्रा बुरी तरह घायल हो गई। स्कूल में फीस बढ़ोत्तरी को लेकर पालक पहले से ही नाराज चल रहे थे। ऐसे में हादसे के बाद उन्हें प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया। पालक संघ के दबाव के बाद स्कूल संचालक समीर दुबे और अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर कार्रवाई के लिए सीएम और गृहमंत्री का भी दबाव था, लेकिन कुछ घंटे बाद मुचलके पर उन्हें छोडऩा पड़ा। 
सुनते हैं कि समीर को छोडऩे के लिए ऐसा दबाव पड़ा कि पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। विधायक कुलदीप जुनेजा ने तो समीर को छोडऩे के लिए पुलिस की नाक में दम कर रखा था। भाजपा सांसद सुनील सोनी भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने ने भी समीर को छुड़ाने के लिए आईजी और एसपी को फोन किया। समीर, दिवंगत खुदादाद डंूगाजी के नाती हैं, उनके पिता मंगल दुबे की भी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से आईएएस अफसरों के बीच बड़ी पकड़ रही है। रायपुर के आयुर्वेदिक कॉलेज का अस्पताल डूंगाजी की दान की हुई जमीन पर बना है। 

ऐसे में समीर पर आफत आई, तो कई बड़े असरदार लोग भी समीर को छुड़ाने की कोशिश में जुट गए। ऐसे में सत्ता और विपक्ष के साथ-साथ बड़े कारोबारियों को एक मंच पर देख पुलिस के हौसले पस्त पड़ गए और थोड़ी-बहुत कानूनी कार्रवाई कर रिहा कर अपनी जान छुड़ाई। वैसे नेताओं में समीर दुबे के घर सबसे अधिक जाने-आने वाला जोगी परिवार रहा है, लेकिन आज इस परिवार की सिफारिश नुकसान छोड़ कोई नफा नहीं कर सकती।

बिना वल्दियत का अज्ञान...

सोशल मीडिया के वैसे तो कई औजार हैं, लेकिन जितना आसान और प्रचलित वॉट्सऐप है, उतना और कोई नहीं। लोगों को यह दिख जाता है कि उनके दोस्त अभी ऑनलाईन हैं या नहीं, उन्होंने उनका भेजा मैसेज पढ़ लिया है या नहीं। ऐसी सहूलियत के साथ इसका प्रचलन बढ़ते चल रहा है। और साम्प्रदायिक अफवाहों के तुरंत बाद इसमें दूसरा सबसे बड़ा बेजा इस्तेमाल मेडिकल दावों का हो रहा है। लोग कहीं से ऐसा संदेश पाते हैं कि डायबिटीज का इलाज क्या है, किस तरह कैंसर ठीक हो सकता है, और आनन-फानन उसे किसी धार्मिक भंडारे के प्रसाद की तरह चारों तरफ बांटने में लग जाते हैं। ज्ञान बांटने में काफी मेहनत लगती है, और उसे पाने वाले उतना खुश भी नहीं होते। लेकिन अज्ञान के साथ ऐसी कोई दिक्कत नहीं होती, और लोग उसे पाकर भी खुश होते हैं क्योंकि वह दिमाग पर जोर नहीं डालता, और उसे खूब बांटते भी हैं क्योंकि लोगों को लगता है कि वह दोस्तों का भला करेगा। भली नीयत के साथ भी फैलाए गए बेबुनियाद मेडिकल दावे लोगों को सुख देते हैं, भेजने वाले को भी, और पाने वाले को भी। जानकार मेडिकल सलाह लोगों को कहेगी कि रोज आधा घंटा तेज पैदल चलो, मीठा खाने से बचो, रात खाना जल्दी खत्म करो। दूसरी तरफ अज्ञान के पास घरेलू नुस्खों की भरमार रहती है कि सौफ और अजवाईन से, लहसुन और सरसों  के तेल से कैसे डायबिटीज गायब हो सकता है, कैंसर खत्म हो सकता है, और दिल की तंग हो चुकी धमनियां फिर से गौरवपथ की तरह चौड़ी हो सकती हैं। सोशल मीडिया पर तैरता हुआ अज्ञान बिना वल्दियत वाला होता है, और उसकी कीमत किसी पखाने के दरवाजे पर भीतर की तरफ खरोंचकर लिखी गई बातों से अधिक नहीं होती। 
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Date : 16-Nov-2019

बजाज के शुभचिंतक...

जमीन आबंटन प्रकरण में अनियमितता के आरोप में निलंबित आईएफएस अफसर श्याम सुंदर बजाज की अब तक बहाली नहीं हो पाई है। सरकार ने उन्हें आरोप पत्र थमा दिया गया है, जिसका उन्होंने जवाब भी दे दिया है। बजाज ने अपनी बहाली के लिए केंद्र सरकार के समक्ष अपील भी की है। बजाज को नया रायपुर बसाने का श्रेय दिया जाता है। वे रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से ही पढ़े हैं। ऐसे में प्रशासन-राजनीति में तैनात इसी इंजीनियरिंग कॉलेज के कई पूर्व छात्र उनकी बहाली के लिए प्रयास भी कर रहे हैं।

सुनते हैं कि बजाज के ही सहपाठी रहे इंजीनियरिंग कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी, जो कि कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार भी हैं, उनके मार्फत सरकार की नाराजगी कम करने की कोशिश भी की गई। शैलेष ने बजाज की बहाली के लिए सीएम भूपेश बघेल से चर्चा भी की, लेकिन सीएम ने उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया। इन सबके बावजूद कई और अफसर उनकी बहाली के लिए कोशिश कर रहे हैं। मुख्य सचिव आरपी मंडल और पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी, दोनों ही रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और उनकी बजाज के प्रति सद्भावना भी है। उन पर कई और पूर्व छात्रों का बजाज की बहाली के लिए पहल करने का दबाव भी है, लेकिन वे चाहकर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

बजाज की साख पूरी सरकार में बहुत अच्छी है। लोगों का यह मानना है कि नया रायपुर और टाऊन एंड कंट्री प्लानिंग का काम देखते हुए उनकी जगह दूसरे बहुत से अफसर ‘आसमान’ पर पहुंच चुके रहते, और बजाज जमीन के जमीन पर हैं। वे छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले हैं, व्यवहार से लेकर ईमानदारी और काबिलीयत की साख के मामले में वे बेमिसाल सरीखे हैं।

म्युनिसिपलों के सामने चुनौती

छत्तीसगढ़ के नए मुख्य सचिव आर.पी. मंडल ने स्कूटर से राजधानी की गंदगी देखकर पूरे प्रदेश के म्युनिसिपल अफसरों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है, और परेशानी भी। अभी पिछले कई हफ्तों से राजधानी के म्युनिसिपल अफसरों को नियमों को तोडक़र महंगे किराये की कारें देने की खबरें छप ही रही थीं, अब तो कायदे से होना यह चाहिए कि म्युनिसिपल स्कूटर ही खरीदकर अफसरों को दे दे कि इसी पर घूमें क्योंकि ये तंग गलियों तक जा सकती हैं, और तंग हो चुकी चौड़ी सड़क़ों पर भी इस पर घूमने में आसानी रहेगी।

अब कुछ पुराने लोगों को यह याद है कि रायपुर के एक पुराने म्युनिसिपल प्रशासक ओ.पी.दुबे की याद है जो पैदल ही पूरे शहर का दौरा करते थे, और सफाई से लेकर बाकी तमाम चीजों को देख लेते थे। अब एक प्रशासक या कमिश्नर की जगह शहर में आधा दर्जन जोन बन गए, जोन कमिश्नर बन गए, एक कार की जगह म्युनिसिपल में दर्जनों कारें आ गईं, और शहर चौपट हो गया। जैसे-जैसे अफसरों की कारों का आकार बढऩे लगा, निर्वाचित प्रतिनिधियों की कारें बड़ी होने लगीं, उनका काम छोटा होने लगा। अब अपने ठाठ-बाट से परे शहर की फिक्र कम ही लोगों को, कम ही है, और ऐसे में मुख्य सचिव का ऐसा चौंकाने वाला काम म्युनिसिपल के अफसरों को ताकत के अपने गुरूर से बाहर ला सके, तो शहर साफ भी हो सकते हैं।

सामंती नामकरण

कल ही खबर आई है कि रायपुर म्युनिसिपल मुख्यालय का नाम व्हाईट हाऊस से बदलकर गांधी के नाम पर रखा जाएगा ताकि सेवा की सोच लौट सके। इस राजधानी में लोगों को अपनी सत्ता के महिमामंडन के लिए ऐसे सामंती नाम रखने का बड़ा शौक है। अमरीका के राष्ट्रपति के घर-दफ्तर का नाम व्हाईट हाऊस है, और उसी के नाम पर रायपुर म्युनिसिपल मुख्यालय का नाम रखा गया। और तो और इमारत को महलों की तरह डिजाइन किया गया। महलों जैसी इमारत में बैठकर सेवा की सोच होना तो वैसे भी मुमकिन नहीं है। राजभवन को देखें तो वहां सभागृह बनाया गया, तो उसका नाम दरबार हॉल रखा गया। इक्कीसवीं सदी में दरबार का क्या काम? दरअसल अंग्रेजों के वक्त बनाए गए भारत के राष्ट्रपति भवन में सभागृह का नाम दरबार हॉल रखा गया था, और अब इक्कीसवीं सदी में बने छत्तीसगढ़ राजभवन के सभागृह का वही नाम रखना सामंती सोच से परे कुछ नहीं है। और तो और अब नया रायपुर में जो सरकारी इमारतें बन रही हैं, उनमें भी किसी एक सभागृह का नाम दरबार हॉल रखा जा रहा है। जिस प्रदेश की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां की सरकार अपने जलसों के लिए अंग्रेजों की छोड़ी विरासत को ढोकर दरबार हॉल बनाए, यह हैरान करने वाली तकलीफदेह बात है। नया रायपुर में अंग्रेजी-अमरीकी नामकरण के तर्ज पर कैपिटॉल कॉम्पलेक्स बनाया गया। अमरीका में संसद की इमारत के इलाके को कैपिटॉल हिल कहा जाता है, और उसी की नकल करते हुए नया रायपुर में ऐसा नाम रखा गया। सत्ता की लगाम थामे हाथों को अपने आपको महिमामंडित करना सुहाता है, इसलिए सामंती नकल करने में कोई हिचक भी नहीं होती।


Date : 15-Nov-2019

हासिल आया जीरो बटे सन्नाटा

वैसे तो ट्रांसफर-पोस्टिंग लेन-देन की शिकायत हमेशा से होती रही है। सरकार कोई भी हो, ट्रांसफर उद्योग चलाने का आरोप लगता ही है।  यह भी सत्य है कि निर्माण विभागों के अलावा आबकारी व परिवहन में  मलाईदार पदों में पोस्टिंग के लिए अफसर हर तरह की सेवा-सत्कार के लिए तैयार रहते हैं। इन सबके बीच निर्माण विभाग में एक ऊंचे पद के लिए ऐसी बोली लगी कि इसकी चर्चा आम लोगों में होने लगी है। 

हुआ यूं कि सरकार बदलते ही पिछली सरकार के करीबी, दागी-बागी टाइप के अफसरों को हटाने का सिलसिला शुरू हुआ। इन सबके बीच निर्माण विभाग के एक बड़े अफसर को हटाने की मुहिम शुरू हुई।  हटाने के लिए जरूरी भ्रष्टाचार की शिकायतों का पुलिंदा तैयार किया गया। बात नहीं बनी, तो अफसर को पिछली सरकार का बेहद करीबी बताया गया। फिर क्या था, अफसर को हटाने के लिए नोटशीट चल गई। विभागीय मंत्री के साथ-साथ एक अन्य मंत्री की भी अनुशंसा ले ली गई। 

अफसर को हटाने के बाद जिस दूसरे अफसर को बिठाने का वादा किया गया था उससे काफी माल-टाल ले लिया गया। मलाईदार पद पाने के आकांक्षी अफसर ने माल-टाल जुटाने के लिए हर स्तर पर  कलेक्शन किया। सब कुछ पाने के बाद इस पूरी मुहिम के अगुवा, मंत्री बंगले के अफसर ने वादा किया था कि जल्द ही बड़े अफसर को हटाकर उनकी पोस्टिंग हो जाएगी। 
महीनेभर से अधिक समय गुजर गया, लेकिन पहले से जमे-जमाए बड़े अफसर को हटाया नहीं जा सका है। सुनते हैं कि इस पूरे लेन-देने की चर्चा दाऊजी तक पहुंच गई थी। दाऊजी ने नोटशीट को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। जिस अफसर ने मलाईदार पद पर बैठने के लिए इतना सब कुछ हुआ कि वे अब परेशान हो गए हैं। सबकुछ डूबने की आशंका तो है ही, इससे आगे लेन-देन की चर्चा भी इतनी आम हो गई है कि हर जानकार लोग अफसर से पूछने लगे हैं, शपथ कब होगा?  

संघविरोध की तीसरी पीढ़ी, भूपेश...

संघ-भाजपा, मोदी-शाह, और गोडसे को लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बयान एक अभूतपूर्व आक्रामकता से भरे हुए हैं। उनके गुरू दिग्विजय सिंह भी आक्रामकता में कहीं कम नहीं थे, और एक वक्त के दिग्विजय के गुरू अर्जुन सिंह भी ऐसे ही थे। लेकिन अर्जुन सिंह एक अलग पीढ़ी के थे, और आरएसएस पर उनका हमला वैचारिक और सैद्धांतिक अधिक रहता था। जो लोग अर्जुन सिंह को करीब से जानते थे, उनमें से कुछ का यह मानना था कि उनके एक सबसे पसंदीदा आईएएस अफसर, सुदीप बैनर्जी, ने अर्जुन सिंह की धार को और तेज करने का काम किया था। वे संघ के खिलाफ तो थे ही, लेकिन सुदीप बैनर्जी अपनी निजी विचारधारा के चलते संघ के खिलाफ बहुत से पुराने दस्तावेज निकालकर-छांटकर, संदर्भ सहित तैयार करके अर्जुन सिंह के लिए मोर्चा तैयार करने का काम करते थे। अर्जुन सिंह के साथ काम करने वाले सुनिल कुमार, और बैजेन्द्र कुमार जैसे लोग भी वैचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष, और संघ के आलोचक थे, और ऐसे दायरे में अर्जुन सिंह की आक्रामकता बढ़ती गई थी। जहां तक दिग्विजय सिंह का सवाल है तो वे संघ-भाजपा के खिलाफ अपनी बुनियादी समझ के बाद दस्तावेजों पर अधिक निर्भर नहीं करते, और हमले के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं। भूपेश बघेल में इन दोनों पीढिय़ों से ली गई कुछ-कुछ बातें दिखती हैं, और कल नेहरू जयंती पर उन्होंने कहा- संघ की वेशभूषा और उसके वाद्ययंत्र भारतीय नहीं है, ये लोग मुसोलिनी को अपना आदर्श मानते हैं, उनसे प्रेरणा लेकर काली टोपी और खाकी पेंट पहनते हैं, और ड्रम बजाते हैं जिनमें से कुछ भी भारत के नहीं हैं।

अब इंटरनेट पर मामूली सी सर्च बता देती है कि आरएसएस जिस बिगुल का इस्तेमाल करता है, वह पश्चिम का बना हुआ है, और सैकड़ों बरस पहले से वहां इस्तेमाल होते आया है। हिन्दुस्तान में शादियों में गाने-बजाने वाली बैंड पार्टी भी ऐसा ही बिगुल बजाती है जिसे ट्रम्पेट कहते हैं, और इसी एक वाद्ययंत्र के नाम पर बैंड पार्टी को परंपरागत रूप से ब्रास बैंड पार्टी कहा जाता है, क्योंकि यह ट्रम्पेट, ब्रास यानी पीतल का बना होता है। भूपेश की यह बात सही है कि संघ का हाफपैंट, या नया फुलपैंट हिन्दुस्तानी नहीं हैं, और बिगुल भी हिन्दुस्तानी नहीं हैं। संघ के पथ संचलन में जिस ड्रम का उपयोग होता है, वह भी हिन्दुस्तानी तो नहीं है। वैसे तो यह एक अच्छी बात है कि अपने देश की कही जाने वाली संस्कृति के लिए मर-मिटने को उतारू संस्था दूसरे देशों के प्रतीकों का भी इस्तेमाल करती है, और इसमें कोई बुराई नहीं समझी जानी चाहिए, लेकिन भूपेश का तर्क अपनी जगह है कि संघ इन विदेशी चीजों का इस्तेमाल करता है। भूपेश ने कल ही यह ट्वीट किया है कि आरएसएस हिटलर और मुसोलिनी को अपना आदर्श मानता है। यह भी कोई नया रहस्य नहीं है क्योंकि संघ के सबसे वरिष्ठ लोगों ने अपनी प्रकाशित किताबों में हिटलर की तारीफ में बहुत कुछ लिखा हुआ है। दरअसल नेहरू जयंती पर भूपेश ने याद दिलाया कि इटली का एक फासिस्ट प्रधानमंत्री बेनिटो मुसोलिनी नेहरू से मिलना चाहता था, लेकिन नेहरू ने उससे मिलने से इंकार कर दिया था। भूपेश का संघविरोध कांग्रेस और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की राजनीति की तीसरी पीढ़ी है, अर्जुन सिंह के बाद दिग्विजय सिंह, और दिग्विजय के बाद भूपेश बघेल। किताबों में दर्ज अपना ही कहा हुआ सच भी कोई बार-बार कुरेदे, तो वह असुविधाजनक तो हो ही जाता है। 

व्यायामशाला से जिम तक
छत्तीसगढ़ में इन दिनों कई खबरें हैं जो बता रही हैं कि बड़े-बड़े महंगे जिम में किस तरह मसल्स बनाने के नाम पर नौजवानों को प्रोटीन सप्लीमेंट्स और कुछ दूसरे नशीले सामान खिलाए-पिलाए जा रहे हैं।

इस बारे में एक वक्त व्यायामशाला जाने वाले ट्रेड यूनियनबाज अपूर्व गर्ग ने फेसबुक पर लिखा है- हम सबने आज खबर पढ़ी कि रायपुर में एक बॉडीबिल्डर को स्टेरॉइड लेने की वजह से अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आई। आज बॉडीबिल्डिंग का जबर्दस्त क्रेज है, और इससे जुड़ा कारोबारी सब कुछ बेच देना चाहता है। लेकिन लोग बॉडीबिल्डिंग तो पहले से करते आए हैं, लेकिन कभी ऐसी दवाओं का चलन यहां नहीं था। यहां से निकले हुए दिग्गज बिना प्रोटीन, बिना दवा आगे बढ़ते चले गए। 

संजय शर्मा, राजीव शर्मा, एवन जैन, जवाहर सोनी,  जंघेल, तन्द्रा राय चौधरी, युसूफ भाई जैसे जमीन से जुड़े लोगों ने इस शहर की मिट्टी को अपने पसीने से सींच कर बॉडी बिल्डर्स की फसल तैयार की।

ये फसलें पूरी तरह प्राकृतिक या आज की शब्दावली में कहें तो आर्गेनिक थी न कृत्रिम प्रोटीन न फर्जी विटामिन, स्टीरॉइड, की कल्पना तो सपने में भी नहीं की जा सकती थी।

इस शहर के पुराने मोहल्लों में व्यायाम शाला जरूर होती थी वो चाहे पुरानी बस्ती हो या लोधी पारा देशबंधु संघ या टिकरापारा, पुराना गॉस मेमोरियल हो या रायपुर की सबसे बड़ी, हवादार सप्रे स्कूल की ही व्यायामशाला क्यों न हो, अनुभवी पहलवानों की निगाहें नए नवेलों पर होती थीं। मजाल है कोई बिना लंगोट कसरत कर ले! मजाल है कोई कसरती नियमों का उल्लंघन कर ले!

इन गुरु हनुमानों के रहते किसी की मजाल नहीं होती थी कि उदण्डता, अश्लीलता या अनुशासनहीनता कोई कर सके। ये जितनी सख्ती से कसरत सिखाते थे उतना ही स्नेह करते और ख्याल रखते थे।

आज जब कुछ मॉडर्न हेल्थ गुरू अपने शागिर्दों को कसरत के नाम पर लूटकर मौत के मुँह में धकेल रहे हैं तो वो पुराने चेहरे बार-बार सामने आ रहे हैं जिनके लिए व्यायाम शाला मंदिर होता था, कसरत पूजा और शिष्य छोटे भाई या बच्चे की तरह होते थे।

ये छोटे भाई ही आज कृष्णा साहू, मनोज चोपड़ा, मेघेश तिवारी, बुधराम सारंग (रुस्तम के पिता) जैसे न जाने कितने हैं जो देश और दुनिया में शहर का नाम रोशन कर रहे हैं।

उम्मीद है आने वाली नस्लों, फसलों पर घातक केमिकल का प्रयोग कर उन्हें जहरीला नहीं बनाया जायेगा। उम्मीद है मुनाफे की हवस इस उर्वर भूमि को बंजर नहीं करेगी। उम्मीद है पुराने दिनों की तरह एक बार फिर व्यायाम शाला से बहता पसीना तय करेगा कौन श्रेष्ठ है, न कि हेल्थ क्लब में बिकती दवाईयां!! - अपूर्व गर्ग
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 14-Nov-2019

भाजपा के भीतर रस्साकसी
विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी भाजपा गुटबाजी से उबर नहीं पा रही है। दुर्ग-भिलाई में संगठन चुनाव के बहाने पार्टी के बड़े नेता आमने-सामने आ गए हैं। चुनाव में गड़बड़ी की शिकायत कर पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय और सांसद विजय बघेल ने सरोज पाण्डेय के दबदबे को खत्म करने की कोशिश की है। सरोज-विरोधियों को तो चुनाव स्थगित कराने में सफलता तो मिल गई, लेकिन आगे उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी पाने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। 

पार्टी ने नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा पत्र तैयार करने के लिए बृजमोहन अग्रवाल की अगुवाई में समिति बनाई है। बृजमोहन और प्रेमप्रकाश की घनिष्ठता किसी से छिपी नहीं है। मगर बृजमोहन के सरोज पाण्डेय से भी मधुर संबंध हैं। समिति में प्रेमप्रकाश पाण्डेय को भी रखा गया है। 

सुनते हैं कि समिति में पहले प्रेमप्रकाश पाण्डेय का नाम नहीं था। उन्हें जगह दिलाने के लिए पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल को खासी मशक्कत करनी पड़ी। अमर नगरीय निकाय चुनाव के लिए पार्टी के प्रभारी हैं। अमर ने पार्टी के प्रमुख नेताओं से बात की, तब कहीं जाकर प्रेमप्रकाश को जगह मिल पाई। अमर के कहने पर ही कोरबा के पूर्व महापौर जोगेश लांबा को भी समिति में रखा गया। जबकि समिति में सरोज की करीबी दुर्ग की महापौर चंद्रिका चंद्राकर को प्रमुखता से रखा गया है। सरोज की संगठन में पकड़ जगजाहिर है। ऐसे में उनके विरोधियों की राह आसान नहीं है। दिल्ली में छत्तीसगढ़ से किसी भाजपा नेता की सबसे बड़ी पकड़ है, तो वे सरोज पाण्डेय ही हैं। एक वक्त था जब ऐसी चर्चा भाजपा के ताकतवर नेताओं के बीच रहती थी कि किसी वजह से अगर डॉ. रमन सिंह को केंद्रीय राजनीति में ले जाया जाएगा, तो छत्तीसगढ़ में बारी सरोज पाण्डेय की ही आएगी।

विधायकों की सुनने वाला मंत्री
परिवहन मंत्री मोहम्मद अकबर की खासियत यह है कि वे दूसरे जिलों में अपने विभाग से जुड़े कोई भी कार्य अथवा योजनाओं पर स्थानीय कांग्रेस विधायकों से राय जरूर लेते हैं। उनकी कार्यशैली के अमितेश शुक्ल जैसे कई विधायक मुरीद हैं। इन विधायकों का मानना है कि सरकार के अन्य मंत्रियों को भी अकबर का अनुशरण करना चाहिए। 

सुनते हैं कि विधि-विधायी विभाग से जुड़े जिला अदालतों में नोटरी के नवीनीकरण की अनुशंसा भी कांग्रेस विधायकों से पूछ-पूछकर की। आवेदनों में जशपुर जिले के भाजपा पदाधिकारी का भी प्रकरण था। अकबर ने संबंधित विधायक को फोन लगाया, तो उन्होंने भाजपा पदाधिकारी का काम करने का आग्रह किया। विधायक ने कहा कि नोटरी भाजपा से जरूर जुड़े हैं, लेकिन उनकी विचारधारा कांग्रेस से मेल खाती है। और चुनाव में भी भरपूर मदद की थी। फिर क्या था अकबर ने विधायक की सिफारिश को मानने में देर नहीं की।  (rajpathjanpath@gmail.com)