राजपथ - जनपथ

30-Jun-2020 6:40 PM

शादी सादगी से करने की मजबूरी

लॉकडाउन के सख्त नियमों के चलते नामी लोगों के यहां की शादियां बिना बाजे-गाजे के सादगी से निपट रही हैं। ये चाहकर भी ज्यादा लोगों को नहीं बुला पा रहे हैं। पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह की बेटी की शादी भी चुनिंदा लोगों के बीच संपन्न हो गई। रेणुका सिंह की बेटी, सहकारिता अफसर पूर्णिमा सिंह, का रिश्ता बिलासपुर के जसवीर सिंह के साथ तीन-चार महीने पहले तय हुआ था। जसवीर भी एकाउंट अफसर हैं।

रेणुका के परिवार की यह पहली शादी थी। लिहाजा, शादी तय करते वक्त दोनों परिवारों को उम्मीद थी कि कोरोना का दौर जल्द ही खत्म हो जाएगा। तब से धूमधाम से शादी की योजना थी और इसकी तैयारी भी चल रही थी। चूंकि रेणुका प्रदेश से केन्द्र में अकेली मंत्री हैं, और उनका संपर्क भी अच्छा खासा है। ऐसे में स्वाभाविक था कि प्रदेशभर से भाजपा-कांग्रेस के नेताओं के अलावा समर्थक शादी में पहुंचते।

मगर देश-प्रदेश में कोरोना का प्रकोप थम नहीं रहा है। इससे बचने के लिए सामाजिक दूरी जरूरी है। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकार ने शादी और अन्य समारोहों के लिए गाईडलाइन जारी की हैं। इसमें यह साफ है कि शादी में दोनों परिवारों को मिलाकर सौ से अधिक लोग शामिल नहीं हो सकते हैं। ऐसे में रेणुका को अपनी लाडली की शादी परिवार के सदस्यों और कुछ करीबी लोगों की मौजूदगी में ही करनी पड़ी। बिलासपुर के एक होटल में आयोजित इस समारोह में पार्टी के नेताओं में सिर्फ तीन प्रमुख नेता, धरमलाल कौशिक, अमर अग्रवाल और पुन्नूलाल मोहिले, ही मौजूद थे।

चर्चाएं कोरोना की तरह...

पिछली सरकार के जो खास अफसर इस सरकार के निशाने पर हैं, उन्हें लेकर अफवाहें कभी कम नहीं होतीं। कब राज्य के कौन से अफसर इन अफसरों से दिल्ली में मिले, यह सुगबुगाहट चलती ही रहती है, इसके अलावा हर कुछ हफ्तों में यह अफवाह भी सामने आती है कि दिल्ली में बसे इन चर्चित अफसरों में से कौन-कौन छत्तीसगढ़ आकर किस-किस अफसर से मिलकर गए। लोग दिन और तारीख, समय और फॉर्महाऊस सभी के साथ जमकर दावा करते हैं, लेकिन कोई भी बात कभी साबित नहीं हो पाई है। इस बीच इतना जरूर हुआ है कि छत्तीसगढ़ में बड़े अफसर, बड़े नेता, और मीडिया में जो लोग अपने को बड़ा या महत्वपूर्ण मानते हैं, वे सब सिमकार्ड वाले फोन पर कॉल करना कम कर चुके हैं, या बंद कर चुके हैं। कुछ समय पहले तक लोग वॉट्सऐप पर बात कर लेते थे, लेकिन अब उससे परे के सिग्नल और टेलीग्राम जैसे मैसेंजर पर कॉल करते हैं। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार, दोनों की एजेंसियों पर लोगों का शक रहता है, और जब सरकार पर बैठे हुए बड़े-बड़े ताकतवर लोग वॉट्सऐप पर भी बात करना नहीं चाहते, और जोर देकर किसी एक कंपनी के मोबाइल फोन के एक एप्लीकेशन पर जोर देते हैं, तो लोगों को लगता है कि सचमुच ही खतरा बड़ा है। लेकिन यह खतरा और लोगों की आवाजाही की अफवाहें कोरोना की तरह अदृश्य हैं, जिनकी दहशत बहुत है, लेकिन कन्फर्म कुछ भी नहीं है।

दिल के बहलाने को खयाल...

भारत सरकार ने चीनी कंपनियों के बनाए हुए 59 मोबाइल एप बंद कर दिए, तो चीन के खिलाफ फतवे देने वाले लोगों को बड़ी खुशी हुई, और लोगों ने एक-दूसरे को बधाई देना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह का माहौल बन गया है कि मानो 59 सिरों वाले रावण को मार डाला गया है। बहुत से लोगों ने नेहरू को भी याद किया कि नेहरू ने कभी ऐसा हौसला नहीं दिखाया। ऐसा लिखने वाले लोग इस बात को भूल गए कि नेहरू 1964 में गुजर चुके थे, और उस वक्त चीन के साथ कोई कारोबारी रिश्ते भी नहीं थे, और कम से कम उस वक्त का हिन्दुस्तानी बाजार और कारोबार चीन के उस किस्म के चंगुल में नहीं था, जैसा कि आज है। आज भारत की दवा कंपनियों ने केन्द्र सरकार से गुहार लगाई है कि अगर उनका कच्चा माल चीन से आने में इसी तरह का अड़ंगा लगते रहा, तो वे दुनिया के दूसरे देशों से उन्हें मिले दवा के ऑर्डर समय पर पूरे नहीं कर सकेंगे। हिन्दुस्तान का जो असली कारोबार है, वह चीन के कच्चे माल, और चीन के पुर्जों पर टिका हुआ है। वहां से खरीदते कम हैं, उसमें जोडक़र उसे कई गुना अधिक दाम का सामान बनाया जाता है। एक चीनी को भूखा मारने के पहले चार हिन्दुस्तानी भूखे मरेंगे, तो जाकर चीन का बहिष्कार हो पाएगा। मोबाइल एप के बहिष्कार से चीन का तो कुछ नहीं जा रहा, हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को यह मानसिक संतुष्टि मिल रही है कि उन्होंने दुश्मन को निपटा दिया। अब मानसिक संतुष्टि तो और भी कई किस्म के नशे से मिल सकती है। अपनी-अपनी पसंद की बात है। चीन के प्रतीक के रूप में ड्रैगन नाम के एक आग उगलते अजगर किस्म के प्राणी को दिखाया जाता है? हिन्दुस्तानी बहिष्कार अब तक लपटें उगलते इस ड्रैगन पर पानी की एक बूंद भी नहीं है कि जिससे ड्रैगन की मुंह की लपटें ठंडी हो जाएं।

 

 

 

 

 

 

 


29-Jun-2020 7:08 PM

हर चीज ताले में रखने जरूरत

स्टेट बैंक ने अपने एटीएम में सेनेटाइजर की शीशी को एक ताले वाले बक्से में रखा है, और बाहर सिर्फ उसकी टोंटी है जिससे सेनेटाइजर निकाला जा सकता है। बिलासपुर के आईजी दीपांशु काबरा ने इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा कि क्या अपने ही नागरिकों से 50 रूपए की बोतल की हिफाजत नहीं हो सकती? तो ऐसे में प्रगति कैसे होगी? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हमें हमारी हिफाजत के नियम मानने के लिए भी लगातार किसी की चौकीदारी की जरूरत है? क्यों यह अनुशासन खुद होकर नहीं आता? इस पर लोगों ने उनसे असहमति भी जताई और एक ने तो नमूने के रूप में एक एटीएम के भीतर छत पर लगे सुरक्षा कैमरे की रिकॉर्डिंग भी पोस्ट की है जिसमें एक व्यक्ति भीतर आता है, सेनेटाइजर की बोतल से हाथ पर निकालकर हाथ साफ करता है, फिर दाएं-बाएं देखकर बोतल को जेब में रखता है, एटीएम का कोई इस्तेमाल नहीं करता, कचरे की टोकरी में थूकता है, और निकल जाता है।

जब लोगों का हाल जरा-जरा सी बात पर इतना खराब है, तो सार्वजनिक सुविधाओं को सुरक्षित कैसे रखा जा सकता है? लोग ट्रेन के पखाने से 25-50 रूपए दाम वाला स्टील का मग्गा चुराने के लिए चेन तक तोडक़र उसे ले जाते हैं। सीट के गद्दे पर से कवर को काटकर ले जाते हैं, और उससे झोले सिलवा लेते हैं। जब लोग की नीयत इतनी खराब हो तो एटीएम में बिना ताले के सेनेटाइजर कैसे रखा जाए?

लेकिन यह बात सिर्फ गरीबों तक सीमित नहीं है। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और लोगों को टीवी, वीसीआर, या कम्प्यूटर जैसे कई सामान विदेश से लौटते हुए बिना कस्टम ड्यूटी लाने की छूट दी गई थी, तब भारत के बहुत से कारोबारियों ने इसे धंधा बना लिया था कि वे हर कुछ हफ्तों में सिंगापुर चले जाते थे, और लौटते में ये सामान ले आते थे। लेकिन यही लोग प्लेन के बाथरूम में रखा गया लिक्विड सोप, यूडी कोलोन, जैसी बोतलों को जेब में भरने के लिए प्लेन में चढ़ते ही बाथरूम की दौड़ लगाते थे। यह हाल देखकर एयरलाईंस ने बोतलों के ढक्कन हटाकर उन्हें रखना शुरू किया। लेकिन हिन्दुस्तानी दिमाग ने आवश्यकता से तुरंत ही आविष्कार को जन्म दे दिया, पिछली बार लाई हुई बोतलों के ढक्कन लेकर लोग जाने लगे, और बाथरूम में घुसते ही बोतलों पर ढक्कन लगाकर उन्हें जेब में रखकर निकलने लगे।

अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में जब मुफ्त की शराब बंटती है, तो महंगे मुसाफिरों के बीच भी उसकी छोटी-छोटी बोतलों के लिए जो छीनाझपटी होती है, उसके सामने छत्तीसगढ़ की शराब दुकानों पर होने वाली धक्का-मुक्की भी फीकी पड़ जाती है। अभी कुछ ही महीने हुए हैं जब सोशल मीडिया पर सिंगापुर या मलेशिया जैसे किसी देश का एक वीडियो आया जिसमें एक हिन्दुस्तानी परिवार ने होटल छोडऩे के पहले उस होटल के कमरे से हर सामान को अपने सूटकेस-बैग में भर लिया था, और होटल वालों ने शक होने पर जब उनका सामान गाड़ी से उतरवाकर तलाशी ली, जो जमीन इन सामानों से पट गई थी, परिवार की शर्मिंदगी देखने लायक थी।

आज एटीएम से सेनेटाइजर को उठाकर ले आना कोई बड़ी बात नहीं रहेगी, लोग किसी कॉफीशॉप या किसी रेस्त्रां में लाकर रखे गए शक्कर के पैकेट, या शुगरफ्री के सैशे बेधडक़ जेब में रखकर ले आते हैं। ऐसे देश में सेहत की हिफाजत के लिए रखे गए सामानों के बस ईश्वर ही मालिक हो सकते हैं।

पीए को लेकर दुविधा

सरकार के एक मंत्री की पैंतरेबाजी से उनके पीए परेशान हैं। मंत्रीजी के पीए को सरकारी नौकरी में आए महज तीन-चार साल ही हुए हैं, लेकिन मंत्री के स्टॉफ में आते ही जिस तेज रफ्तार से बैटिंग कर रहे हैं, उससे कई बार मंत्रीजी भी असहज हो जाते हैं। मंत्रीजी ने तीन-चार बार अपने निजी स्टॉफ में नए पीए की पोस्टिंग के लिए नोटशीट भी चलाई थी, लेकिन तकनीकी कारणों से बात आगे नहीं बढ़ पाई।

जीएडी ने मंत्रीजी के प्रस्ताव के अनुरूप पुराने पीए को मूल विभाग में भेजकर नए पीए की पोस्टिंग के लिए फाइल चलाई, तो मंत्रीजी का अलग ही रूख सामने आ गया। मंत्रीजी ने प्रस्ताव रखा कि पुराने को हटाया न जाए, बल्कि स्टॉफ में एक और की पदस्थापना कर दी जाए। निजी स्टॉफ के लिए नियम तय है, उससे अधिक की पदस्थापना नहीं हो सकती है। ऐसे में नए अफसर की पोस्टिंग नहीं हो पा रही है, लेकिन मंत्रीजी की नोटशीट की भनक मिलने के बाद पीए परेशान हैं। उसे अपने साम्राज्य पर खतरा महसूस हो रहा है, और मंत्रीजी हैं कि दुधारू गाय को छोडऩा भी नहीं चाहते।

आरएसएस भूपेश से खुश !

वैसे तो सीएम भूपेश बघेल आरएसएस-परिवार के घोर आलोचक हैं, मगर जिस तरह भूपेश सरकार ने गांवों और गौवंश के संवर्धन के लिए योजनाएं चलाई हैं , उसकी आरएसएस ने जमकर तारीफ की है। ऐसी तारीफ आरएसएस ने शायद ही कभी रमन सरकार की हो।अजय चंद्राकर और भाजपा के प्रवक्ता सरकार की गोबर योजना पर कटाक्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ आरएसएस के बड़े पदाधिकारी बिरसाराम यादव ने न सिर्फ खुले तौर पर योजना को सराहा बल्कि इसे ऐतिहासिक करार दिया।

आरएसएस पदाधिकारियों का मानना है कि इस योजना से गौ-पालकों को रोजगार मिलेगा। आरएसएस की भूपेश सरकार की तारीफ से भाजपा में हलचल मच गई है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आरएसएस के ज्यादातर पदाधिकारी पिछली भाजपा सरकार के कामकाज से नाखुश रहे हैं। कुछ समय पहले भोपाल के एक कार्यक्रम में तो मोहन भागवत ने भाजपा सरकार के रहते बस्तर में बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण पर हैरानी भी जताई थी। अब जब आरएसएस के लोग कांग्रेस सरकार की तारीफ कर रहे हैं, तो भाजपा में खलबली मचना स्वाभाविक है।

 

 


28-Jun-2020 5:16 PM

भ्रष्ट की पकड़ और पहुंच 
जो अफसर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद ऊंचे पद पर बैठे होते हैं, वे चालाक और बेहद सतर्क भी रहते हैं। ये अफसर न सिर्फ अपने मंत्री बल्कि उनके निजी स्टॉफ को भी खुश कर चलते हैं। ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर, शिकायत करना भी आसान नहीं रहता है। 

चालाक अफसर तकरीबन हर डिपार्टमेंट में हैं। ऐसा ही एक प्रकरण हेल्थ डिपार्टमेंट का है। यहां एक बड़े अफसर के खिलाफ कई तरह की जांच चल रही है। अफसर पर गिरफ्तारी की भी तलवार अटक रही है। मगर चर्चा है कि मंत्री के स्टॉफ के वरदहस्त के चलते अफसर का कुछ बिगड़ नहीं पा रहा है। यद्यपि हेल्थ मिनिस्टर टीएस सिंहदेव की पहचान एक भले नेता की है, लेकिन कई बार वे भी चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। उन तक कई बार कोई गंभीर बात पहुंच नहीं पाती है। 

पिछले दिनों अफसर के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा लेकर कुछ कर्मचारी नेता हेल्थ मिनिस्टर के पास पहुंचे, वे शिकायतों का पुलिंदा सौंपने वाले थे कि इससे पहले ही अफसर का फोन कर्मचारी नेताओं के पास आ गया। मगर अफसर से परेशान हो चुके कर्मचारी नेताओं ने हेल्थ मिनिस्टर को शिकायत कर ही दी और साथ ही उनके स्टॉफ का हाल भी बता दिया कि किस तरह उनके शिकायत करने के पहले ही अफसर को इसकी जानकारी हो गई। सिंहदेव ने इन शिकायतों को गंभीरता से लिया है। देखना है अब आगे क्या होता है। 

इस फेहरिस्त में जल्द ही
खबर है कि कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ईडी के निशाने पर हैं। नेताजी सक्रिय राजनीति में आने से पहले नौकरशाह थे। तब के एक बड़े घोटाले में उनकी संलिप्तता की चर्चा रही है। वैसे तो प्रकरण की सीबीआई जांच कर रही है, लेकिन हाई प्रोफाइल प्रकरण होने के साथ-साथ जांच आहिस्ता-आहिस्ता चलते रही। यद्यपि जांच अभी तक किसी किनारे नहीं पहुंच पाई है। 

नेताजी के मोदी सरकार के खिलाफ तीखे तेवर रहे हैं। अब उन्हें आक्रामक तेवर का खामियाजा उठाना पड़ सकता है। चर्चा है कि घोटाले के पुराने प्रकरण की जांच में अब ईडी भी कूद सकती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता पी चिदम्बरम, अहमद पटेल पहले ही  ईडी की जांच झेल रही हैं। इस फेहरिस्त में जल्द ही प्रदेश संगठन जुड़े इस दिग्गज का नाम भी आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

पुलिस में गुमनाम चिट्ठी
कई बार कोई गुमनाम चिट्ठी सर्कुेलेशन में आती है उसके बाद लोग अटकलें लगाते हैं कि लिखने वाले कौन होंगे। छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे के सबसे बड़े अफसरों में से एक के बारे में ऐसी चिट्ठी घूम रही है, लेकिन जहां चिट्ठी नहीं पहुंची है, वहां भी उसकी चर्चा पहले पहुंच गई है। जिनके पास चि है उनके मुताबिक इसे ठीक-ठाक अंग्रेजी में लिखा गया है, और इसमें एक बड़े अफसर पर बुरी तोहमतें लगाई गई हैं। 

गुमनाम चिट्ठी की तोहमत को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बेहतर इंग्लिश से शक का दायरा बड़ा छोटा हो गया है कि इसेे किसने लिखा होगा। गिने-चुने नाम सामने आ रहे हैं, और बड़ी अटकल इस बात पर लग रही है कि यह अकेले लिखा गया है या मिलकर लिखा गया है? मिलकर लिखा गया है तो इसमें कौन-कौन शामिल होंगे? वक्त ऐसा आ गया है कि तोहमतों की चर्चा नहीं, उन्हें लगाने वाले गुमनाम चेहरों की ही अधिक चर्चा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


27-Jun-2020 6:43 PM

रमेश बैस की सिफारिश 

खबर है कि भाजपा हाईकमान ने प्रदेश में पदाधिकारियों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव पर सहमति दे दी है। वैसे तो राष्ट्रीय परिषद में अनुमोदन के बाद ही पदों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। मगर हाईकमान तदर्थ रूप से इसकी अनुमति दे सकता है। सभी धड़ों के नेताओं को एडजस्ट करने की योजना बनाई गई है। अगले दो-तीन दिनों में जिलाध्यक्षों  की भी नियुक्ति होनी है। विवादों के कारण 11 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति  रोक दी गई थी।

विष्णुदेव साय के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह तकरीबन साफ हो गया है कि दुर्ग जिले में सरोज पाण्डेय की पसंद पर मुहर लग सकती है। रायपुर शहर में चाहे जो भी अध्यक्ष बने, लेकिन रायपुर ग्रामीण में पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस की सिफारिश को ही महत्व मिलने की उम्मीद ज्यादा है। बैस प्रदेश के अकेले भाजपा नेता हैं, जो कि संवैधानिक पद पर हैं। ऐसे में उनकी सिफारिश को अनदेखा करना पार्टी के रणनीतिकारों को ही मुश्किल हो रहा है।

कितना बहिष्कार होगा चीनी का?

कोरोना संक्रमण के बीच चीनी वस्तुओं की बिक्री के खिलाफ अभियान चल रहा है। भाजपा और स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े लोग चीनी वस्तुओं को छोडक़र स्वदेशी अपनाने पर जोर दे रहे हैं। सरहद पर तनाव से पहले चीनी वस्तुओं के खिलाफ इतना माहौल नहीं था। और तो और प्रदेश भाजपा दफ्तर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में भी फर्नीचर चीन की लगी है।

चर्चा है कि फर्नीचर पसंद करने पार्टी के दो नेता चीन भी गए थे। वैसे भी कुशाभाऊ ठाकरे परिसर के निर्माण में कितना खर्चा आया है, यह कभी खुले तौर पर सामने नहीं आई। यहां का हिसाब-किताब कुछ प्रमुख लोगों तक ही सीमित रहा है। ऐसे में चीनी वस्तुओं के खिलाफ अभियान चल रहा है, तो पार्टी के भीतर दबी जुबान में चीनी फर्नीचर को लेकर चर्चा भी हो रही है।

लेन-देन का झगड़ा

कांग्रेस के एक नए नवेले विधायक से उनके पुराने मित्र काफी खफा हैं। विधायक चिकित्सा पेशे से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपने साथी चिकित्सकों के साथ मिलकर एक बड़ा अस्पताल भी बनवाया। अस्पताल भी ठीक ठाक चल रहा था कि कांग्रेस की टिकट भी मिल गई। माहौल अनुकूल था इसलिए विधायक भी बन गए। चूंकि चुनाव में काफी खर्च हुआ था। इसका हिसाब-किताब भी अब जाकर हुआ है। साथियों ने मिलकर करीब डेढ़ सीआर खर्च किए थे, इसको लौटाने के लिए साथियों ने  दबाव बनाया है, लेकिन विधायक महोदय ने इस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसे में साथियों की नाराजगी स्वाभाविक है। कुछ  नजदीकी लोग मानते हैं कि जल्द विवाद नहीं सुलझा, तो देर सवेर लेन-देन का झगड़ा सार्वजनिक हो सकता है।


26-Jun-2020 7:12 PM

कौन बनेगा आईएएस?

 सरकार ने गैर प्रशासनिक सेवा (अन्य सेवा) से आईएएस अवॉर्ड के लिए आवेदन की तिथि बढ़ा दी है। अब 30 तारीख तक अलग-अलग विभागों के डिप्टी कलेक्टर के समकक्ष वेतनमान वाले अफसर आवेदन कर सकेंगे। वैसे तो अन्य सेवा से सिर्फ एक ही अफसर को आईएएस बनने का मौका मिल पाएगा। मगर ज्यादातर विभागों के ताकतवर अफसर आईएएस अवॉर्ड के लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं।

अन्य सेवा से आईएएस अवॉर्ड का अब तक का इतिहास बताता है कि अफसर में अन्य योग्यताओं के साथ-साथ राजनीतिक संपर्क भी जरूरी है। अविभाजित मप्र में अन्य सेवा से उद्योग या फिर जनसंपर्क विभाग के अफसर को ही आईएएस बनने का मौका मिला था। तब अन्य सेवा से आईएएस बनने वालों में एमए खान, एसके मिश्रा, वसीम अहमद और राकेश श्रीवास्तव थे। इनमें वसीम अहमद को छोडक़र बाकी सभी अफसर उद्योग विभाग के थे। छत्तीसगढ़ बनने के बाद आलोक अवस्थी जनसंपर्क, शारदा वर्मा आदिमजाति कल्याण विभाग और उद्योग विभाग के अनुराग पांडे को आईएएस अवॉर्ड हुआ।

आलोक अवस्थी के रिटायर होने के बाद अन्य सेवा से आईएएस अवॉर्ड के लिए पद खाली हुआ है। सुनते हैं कि अब तक उद्योग, वाणिज्यिक कर(जीएसटी) सहित अन्य विभागों से दर्जनभर अफसरों के नाम जीएडी पहुंच चुके हैं। पहले एक पद के लिए पांच नाम तय किए जाते थे और फिर यूपीएससी चेयरमैन अथवा सदस्य की अध्यक्षता वाली कमेटी चयनित अभ्यार्थियों का इंटरव्यू लेकर एक नाम पर मुहर लगाती थी। अब चयन प्रक्रिया थोड़ी बदल गई है।

 चयन समिति एक रिक्त पद के लिए सिर्फ दो का ही इंटरव्यू लेगी। सीएस की अध्यक्षता में गठित कमेटी अन्य विभागों से आए नामों में से अंतिम रूप से दो नाम छांटने के लिए जुलाई के पहले हफ्ते में बैठक कर सकती है। प्रशासनिक हल्कों में जिन दो अफसरों को आईएएस अवॉर्ड के लिए मजबूत दावेदार माना जा रहा है, उनमें संयुक्त कमिश्नर (जीएसटी) गोपाल वर्मा और उद्योग विभाग के एडिशनल डायरेक्टर प्रवीण शुक्ला चर्चा में है।

गोपाल और प्रवीण शुक्ला, दोनों का नाम अपने-अपने विभाग की तरफ से जीएडी को भेजा जा चुका है। गोपाल वर्मा, राजनांदगांव कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा के नजदीकी रिश्तेदार हैं, और राजनीतिक पकड़ भी है। सारे समीकरण गोपाल के पक्ष में दिख रहे हैं। प्रवीण भी किसी से कम नहीं हैं, वे सीएम भूपेश बघेल के ओएसडी रह चुके हैं। मगर बाद में सीएम ने उन्हें हटा दिया था। यही एक वजह है,जो उनकी स्थिति को कमजोर बनाती है। इसके अलावा कृषि और अन्य विभाग से आर्थिक रूप से ताकतवर अफसर भी जोर आजमाइश कर रहे हैं। देखना है कि  इंटरव्यू बोर्ड तक पहुंचने में किन दो अफसरों को सफलता मिल पाती है।

कोरोना के चलते आत्महत्याएं

पाकिस्तान की खबर है कि कुछ हफ्ते पहले वहां के मुसाफिर विमान क्रैश हुआ था, और दर्जनों लोग मारे गए थे, उसमें तकनीकी खामी नहीं थी बल्कि दोनों पायलट पूरे वक्त कोरोना की दहशत की बातें कर रहे थे, और उनके दिमाग पर उसी का तनाव हावी था। अब कोरोना की दहशत का लोगों को अंदाज नहीं लग रहा है। देश में दर्जनों आत्महत्याएं हो चुकी हैं जो सीधे-सीधे कोरोना से जुड़ी हुई हैं। कहीं क्वारंटीन सेंटर में रहते हुए, तो कहीं आइसोलेशन में रहते हुए लोग खुदकुशी कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों में ऐसी आत्महत्याएं हुई हैं।

अभी कुछ दिन पहले हरिद्वार के शांतिकुंज में गायत्री परिवार के एक बहुत पुराने अनुयायी और वहां नियमित काम करने वाले एक शादीशुदा आदमी ने खुदकुशी कर ली। यहां पर यह बात खबर इसलिए बनी कि मृतक छत्तीसगढ़ का रहने वाला था। खुदकुशी की खबर में वजन नहीं आएगी, लेकिन गायत्री परिवार को एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि वहां रात-दिन लोगों का रेला लगे रहता था, और गायत्री परिवार के ये सदस्य रोज बहुत से लोगों के संपर्क में आते थे, अब लोगों की आवाजाही बंद होने से वे मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) की स्थिति में आ गए थे, और उसी के चलते उन्होंने आत्महत्या की। आत्महत्या रोकने में लगे जानकार लोग बताते हैं कि आसपास लोगों को देखते रहना चाहिए, और कोई बहुत निराशा में, बहुत दहशत में दिखें, तो उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, उनका साथ देना चाहिए।

श्रवण कुमार-श्रवण कुमारी

जिन लोगों को सरकारी नौकरी, स्कूल-कॉलेज, या निजी दफ्तर के काम से घर से वीडियो कांफ्रेंस करनी पड़ रही है, उन लोगों के बच्चों का जीना हराम है। कम्प्यूटर, इंटरनेट, जूम, स्काईप, या वेबेक्स जैसी चीजों को नई पीढ़ी ज्यादा आसानी से समझती है, और मां-बाप या घर के बुजुर्ग बच्चों को इस काम में जोत देते हैं। एक वक्त था जब वीडियो कैसेट प्लेयर का जमाना था, और वीसीपी या वीसीआर चलाना भी सीखना बड़ों को मुश्किल पड़ता था, बच्चे आसानी से सीख लेते थे। आज भी बहुत से परिवारों में बड़ों के स्मार्टफोन बच्चे ही सेट करते हैं, उसके एप्लीकेशन अपडेट करते हैं। हर वक्त कोई न कोई एक पीढ़ी टेक्नालॉजी में कमजोर रहती है, और उसकी अगली नौजवान पीढ़ी उसके काम आती है। बुढ़ापे में औलाद कांवर में लेकर चारधाम करवाए या न करवाए, अभी कोरोना-लॉकडाऊन के चलते औलाद जगह-जगह श्रवण कुमार या श्रवण कुमारी साबित हो रही है।


25-Jun-2020 6:55 PM

यह वक्त न शादी का, न मरने का

कोरोना के चलते हुए आज देश भर में इतने तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं कि कोई समझदार इंसान न इस बीच मरेंगे, और न ही शादी करेंगे। मरने पर कंधा देने वाले इतने कम लोग रहेंगे कि घर के लोगों को छोडक़र बाकी लोग कोसते हुए लौटेंगे क्योंकि जरूरत से अधिक कंधा देना पड़ेगा। दूसरी तरफ शादी का खर्च तो न्यूनतम खर्च तो होगा ही, पचास मेहमानों में से लिफाफे आ भी जाएंगे, तो कितने आएंगे? ऐसे माहौल में हिफाजत से घर में रहना, जिंदगी को बचाकर रखना, और शादी को आगे किसी बेहतर मौके के लिए बचाकर रखना ही बेहतर होगा। लेकिन राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ऐसा हो नहीं पा रहा है। कचरे के निपटारे के प्रोजेक्ट की शुरूआत हुई, तो उसी में भीड़ ऐसी लगी कि तस्वीरों में धक्का-मुक्की दिख रही थी। अब कौन समझाए कि इस धक्का-मुक्की में कोई एक भी कोरोना पॉजिटिव निकल गया, तो तमाम लोग एक पखवाड़े के लिए घर कैद कर दिए जाएंगे। दूसरी जो बात लोगों को समझ नहीं आ रही है, वह यह कि महज खुद मास्क लगाना काफी नहीं है, सामने के लोगों को भी मास्क लगाना जरूरी है, वरना उनके बोलते हुए उनके थूक के छींटे आप पर पड़ सकते हैं। और सबसे अधिक खतरनाक तो है एक मेज पर बैठकर लोगों का खाना जिसमें खाते हुए थूक के छींटे सामने या अगल-बगल वालों के खाने पर गिरना तय सा रहता है। अब खाते हुए तो मास्क भी नहीं लगाया जा सकता, और चबाते हुए बोलने का मतलब छींटे उड़ाना ही रहता है। आगे लोग अपनी जिंदगी की खुद ही परवाह करें क्योंकि यमराज किनारे बैठकर आराम कर रहे हैं, और कोरोना से चार तरकीबें सीख भी रहे हैं।

उइके फिर खबरों में, उम्मीद से, पर...

पूर्व विधायक रामदयाल उइके एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वे विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस छोडक़र भाजपा में चले गए थे। मगर उन्हें पाली-तानाखार सीट से करारी हार का सामना करना पड़ा। वे दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के निधन के बाद से मरवाही में सक्रिय हैं। उइके पहली बार भाजपा की टिकट से मरवाही से विधायक बने थे, लेकिन अजीत जोगी के सीएम बनने के बाद अपनी सीट जोगी के लिए छोड़ दी थी और कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

उइके जोगी परिवार के करीबी रहे हैं। वे अब मरवाही में भागदौड़ कर रहे हैं। मरवाही से सात किमी दूर उनका अपना मकान है जहां हाल ही में मरम्मत कराने के बाद से रह रहे हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि उइके मरवाही से भाजपा प्रत्याशी हो सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि जाति प्रमाण पत्र के उलझनों के चलते अमित जोगी उपचुनाव नहीं लड़ते हैं, तो जोगी पार्टी, उइके का समर्थन कर सकती है। हल्ला तो यह भी है कि उइके देर सवेर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। वैसे भी कई जोगी के कई करीबी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। चुनाव को लेकर अमित जोगी ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। चाहे कुछ भी हो, रामदयाल उइके की सक्रियता चर्चा का विषय बना हुआ है।

जन्मदिन हो, और विवाद नहीं, ऐसा कैसे?

पिछले दिनों सरकार के मंत्री अमरजीत भगत के जन्मदिन के मौके पर बधाई देने अंबिकापुर में समर्थकों की भीड़ उमड़ी, तो सामाजिक दूरी धरी की धरी रह गई। लॉकडाउन के बीच भगत के जन्मदिन कार्यक्रम को लेकर काफी आलोचना हो रही है। हालांकि भगत ने सफाई दी कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए मास्क बांटने का कार्यक्रम रखा गया था, लेकिन यह जन्मदिन के उपलक्ष्य में नहीं था। उम्मीद नहीं थी कि मास्क लेने के लिए इतनी भीड़ आ जाएगी।

मंत्रीजी को कौन समझाए। कोई चीज मुफ्त में बंट रही हो और उसे लेने के लिए लोग न आए, ऐसा कैसे हो सकता है। खैर, सोशल मीडिया में मंत्रीजी के जन्मदिन समारोह को लेकर काफी कुछ लिखा गया। यह भी कहा गया कि मंत्रीजी से जन्मदिन कार्यक्रम को लेकर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। कुछ मंत्रियों के हवाले से यह बात कही गई कि भगत के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मगर ऐसा कुछ नहीं था। किसी ने स्पष्टीकरण नहीं मांगा बल्कि सीएम और अन्य मंत्रियों ने फोन कर भगत को जन्मदिन की बधाई दी।

 विशिष्ट व्यक्तियों के जन्मदिन समारोह में सामाजिक दूरी का पालन हो, यह बेहद कठिन है। बृजमोहन अग्रवाल के पिछले महीने जन्मदिन के मौके पर लॉकडाउन की खुले तौर पर धज्जियां उड़ी। यद्यपि बृजमोहन ने समर्थकों से अपील की थी कि वे जन्मदिन की बधाई देने निवास न आएं । मगर समर्थक कहां मानने वाले थे। बड़ी संख्या में उनके निवास पर जमा हो गए। अब भगत तो सरकार में हैं , और कोई चीज मुफ्त में बांट रहे हैं तो भीड़ आना स्वाभाविक था।

सीनियर और जूनियर अब साथ-साथ

आखिरकार निलंबन और बहाली के छह महीने बाद काबिल आईएफएस अफसर एसएस बजाज की लघुवनोपज संघ में पोस्टिंग हो गई। उन्हें एडिशनल एमडी बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि संघ के एमडी संजय शुक्ला हैं, जो कि कॉलेज के दिनों से ही एक दूसरे से परिचित हैं। आईएफएस के 87 बैच के अफसर संजय शुक्ला वैसे तो कॉलेज में बजाज से एक साल जूनियर हैं। जबकि आईएफएस कैडर में एक साल सीनियर हैं। बजाज 88 बैच के हैं। कॉलेज के जूनियर, संघ में अब बजाज के सीनियर हैं।


24-Jun-2020 9:01 PM

कहां मलाई बाकी है, कहां खुरचन भी नहीं..

निगम-मंडलों की सूची जल्द जारी हो सकती है। कुछ दावेदार तो पसंदीदा निगम-मंडल छांट रहे हैं। एक दावेदार ने निगम-मंडलों का अध्ययन कर पाया कि ज्यादातर निगमों की माली हालत बेहद खराब है। कुछ तो अपने कर्मचारियों को वेतन तक नहीं दे पा रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि पूर्व में काबिज लोगों ने इतने गुलछर्रे उड़ाए कि कुछ निगम-मंडल तो दिवालिया होने के कगार पर है। 

आरडीए, हाऊसिंग बोर्ड और पर्यटन बोर्ड को ही लीजिए, यहां बैठे लोगों ने इतने पैसे बनाए कि एक-दो तो खुद की कॉलोनियां बनवा रहे हैं। आरडीए का हाल अब यह है कि पुरानी प्रापर्टी बेचकर किसी तरह कर्ज अदा कर पा रही है। आरडीए की खराब माली हालत को देखते हुए विभाग ने हाऊसिंग बोर्ड में विलय का प्रस्ताव दे दिया है। हाऊसिंग बोर्ड के चेयरमैन का पद काफी मलाईदार रहा है। पर मौजूदा हाल यह है कि बोर्ड के पास अपने कर्मचारियों को किसी तरह वेतन दे पा रहा है। 

पर्यटन बोर्ड का हाल भी कुछ ऐसा ही है। प्रदेश के तकरीबन सभी पर्यटन पूछताछ केन्द्रों को बंद कर दिया गया है। संविदा-दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को निकाल दिया गया है, जो काम कर रहे हैं, उन्हें भी समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है। ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन को लेकर अब  धारणा बदल गई है। पहले मलाईदार माने जाने वाले इस कॉर्पोरेशन में नियुक्ति के लिए काफी हसरत रहती थी। 

पिछली सरकार में तो एक मीसाबंदी ने कॉर्पोरेशन के चेयरमैन का पद पाने के लिए नागपुर से जुगाड़ लगवाया था। पद पाने के थोड़े दिन बाद ही मीसाबंदी पुरानी मोटरसाइकिल से महंगी गाड़ी में घूमते देखे जाने लगे। मगर अब कॉर्पोरेशन के लिए वैसा आकर्षण नहीं रह गया है। सरकार ने शराब खरीदी के लिए अलग से मार्केटिंग कारपोरेशन का गठन कर दिया है। इससे कॉर्पोरेशन का काम सिमटकर रह गया है। यानी सारी मलाई अब मार्केटिंग कंपनी में है। 

कुछ तो मानते हैं कि ऐसे निगम-मंडलों में तो उपाध्यक्ष-सदस्य के पद से बेहतर तो एल्डरमैन के पद हैं। एल्डरमैन का कम से कम मानदेय तो तय है। अलबत्ता, नागरिक आपूर्ति निगम, छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल को लेकर क्रेज अभी भी बाकी है। निगम भले ही घपले-घोटालों के लिए कुख्यात रहा है, मगर सालाना टर्नओवर 5 हजार करोड़ से अधिक का है। कुछ इसी तरह कर्मकार कल्याण मंडल में अभी भी पांच सौ करोड़ योजनाओं के मद में रखे हैं। ऐसे में इन्हीं दोनों पद के लिए ज्यादा खींचतान देखने को मिल रही है। 

जोगी की मोदी की यादें... 

पूर्व सीएम अजीत जोगी के निधन के बाद जोगी पार्टी के प्रमुख  नेताओं की भाजपा से नजदीकियां चर्चा में हैं । पूर्व सीएम के निधन के बाद मरवाही में उपचुनाव होना है। इन सबके बीच दिवंगत पूर्व सीएम के पुत्र अमित जोगी ने श्री जोगी के निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के डॉ. रेणु जोगी को लिखे पत्र को फेसबुक पर साझा किया है। 

अमित ने लिखा कि आदरणीय मोदीजी के प्रति मेरे पिताजी की क्या भावनाएं थीं, उसकी अभिव्यक्ति पापा की कोरोनाकाल में लिखी और जल्द ही प्रकाशित होने वाली आत्मकथा से मैं उन्हीं के ही शब्दों में कर रहा हूं:

मैं इसे भी अपना सौभाग्य मानता हूं कि जब मैं कांग्रेस का मुख्य प्रवक्ता था तो मेरे साथ ही भाजपा के दो अत्यन्त वरिष्ठ नेता, वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज, भाजपा के मेरे समकालीन प्रवक्ता थे। उन दिनों टेलीविजन के चारों चैनलों में हमारी जोरदार बहस हुआ करती थी पर कई बार एक साथ टेलीविजन स्टूडियो द्वारा भेजी गई कार में हम लोगों को एक साथ आना पड़ता था और डिबेट के पहले और बाद हम लोगों में बड़े अंतरंग पारिवारिक संबंध बन गये थे। मैं इसे श्री नरेन्द्र मोदीजी का बड़प्पन मानता हूं कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कभी मुझसे यह प्रेम संबंध नहीं तोड़े। वे बड़े सफल और विश्वस्तरीय नेता बन गये हैं और एक ही उदाहरण उनकी उदारता को प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त होगा।

जब 2014 में वो प्रधानमंत्री बने तो उसके पहले कांग्रेस पार्टी के बहुत से नेताओं को शासकीय आवास किसी न किसी बहाने से आवंटित किये गए थे। स्वाभाविक कारणों से वे सभी शासकीय आवास के आवंटन निरस्त किये गये और सभी को अपनी अलग से व्यवस्था करनी पड़ी। कांग्रेस संगठन की जवाबदारियों के कारण मुझे दिल्ली में रहना अनिवार्य था और स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं दिल्ली में महंगे किराये के मकान में रह सकूं।

मेरे सौभाग्य और संयोग से उन्हीं दिनों संसद भवन की आउटर गैलरी में मैं अपनी व्हील चेयर चलाता हुआ जा रहा था कि दूसरी ओर से तमाम सुरक्षा कवच से भरे हुये प्रधानमंत्री जी आ रहे थे। दूर से उन्हें देखकर सम्मान देने की दृष्टि से मैंने अपनी व्हील चेयर अत्यन्त किनारे कर ली और उनके निकलने का इंतजार करने लगा। उनकी पैनी नजर दूर से ही मेरे पर पड़ गई और सीधे सुरक्षा कवच को चीरते हुये मेरे पास तक आये और मेरी व्हील चेयर पर अपने हाथों से पकड़कर भरे प्रेम से मेरा और मेरे परिवार का हालचाल पूछा। हम दोनों प्रवक्ताकाल में एक-दूसरे को भाई साहब कहा करते थे। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि उन्होंने मुझे भाई साहब कहकर मुझसे बातचीत की।

न जाने क्यों मुझे लगा कि मैं आवास के बारे में अपनी कठिनाई उन्हें बताऊं और मेरे मुंह से निकल पड़ा कि भाई साहब, आप प्रधानमंत्री बन गये हैं और मेरे जैसा व्यक्ति आवास के लिये आपके रहते हुये भी दर-दर भटक रहा है। उनके बड़प्पन की पराकाष्ठा थी कि उन्होंने इस संबंध में मुझे कोई आश्वासन नहीं दिया। मुझे लगा कि वे टालकर चले गये। देर शाम मुझे उनके प्रमुख सचिव और सीनियर आईएएस नृपेन्द्र मिश्रा का फोन आया और मुझसे कहा कि प्रधानमंत्रीजी ने उन्हें आदेशित किया है कि तत्काल नार्थ या साऊथ ऐवेन्यू में मेरी सुविधानुसार आवास आवंटित किया जाय। स्वाभाविक रूप से दूसरे ही दिन मनचाहा आवास मिल गया और उसे खाली करने के लिये कोई नोटिस नहीं मिला। (rajpathjanpath@gmail.com)


23-Jun-2020 6:29 PM

दिल्ली जाकर अब पछता रहे हैं...
सरकार बदलने के बाद ख़ासकर पिछली सरकार के करीबी आईएएस अफसरों के केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की होड़ मच गई थी। पहले रिचा शर्मा, फिर सुबोध सिंह, मुकेश बंसल प्रतिनियुक्ति पर चले गए। एक आईपीएस-आईएफएस, पति-पत्नी भी दिल्ली जाने के इच्छुक थे। मगर कोरोना के फैलाव के बाद अफसर तो बैठकों के सिलसिले में भी दिल्ली जाने से परहेज करने लगे हैं। कोरोना के बाद दिल्ली का जीवन डराने लग गया है। सुनते हैं कि जो भी दिल्ली में हैं, वे अब पछताने लग गए हैं। कोरोना के चलते अफसरों के परिवार एक तरह से घर में कैद होकर रह गए हैं। अफसर किसी तरह नौकरी कर पा रहे हैं। एक आईएएस ने बताया की दफ्तर पहुंचकर 30 मिनट तो कंप्यूटर, के बोर्ड, और टेबल खुद साफ करने में लग जाते हैं, उतना ही वक्त घर लौटने के बाद खुद को साफ करने में लग जाता है।

दिल्ली की हालत पर छत्तीसगढ़ में बरसों तक ऊंचे पद पर काम कर चुके एक पूर्व आईएएस अफसर का कहना है कि दिल्ली में भले ही कोरोना पीडि़तों की संख्या 65 हजार के आसपास बताई जा रही है, मगर 10 लाख लोग इससे संक्रमित हैं। बिना लक्षण वाले कोरोना मरीजों को तो डॉक्टर भी नहीं देख रहे हैं। उन्हें घर में ही रहने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने बताया कि केवल गंभीर मरीजों का ही इलाज हो पा रहा है। कोरोना पीडि़तों के लिए अस्पतालों में बेड नहीं है। आप चाहे कितने भी बड़े अफसर हैं, दिल्ली में मौजूदा हालत में कोई पूछपरख नहीं रह गई है। दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में कोरोना का फैलाव तो है, लेकिन जनजीवन सामान्य है। यहां कोरोना पीडि़तों में 85 फीसदी प्रवासी मजदूर हैं। कोरोना संक्रमित भी जल्द ठीक हो जा रहे हैं। ऐसे में जो बाहर हैं उन्हें भी अब छत्तीसगढ़ लुभाने लगा है।

हर मोड़ पर हिना फूड कॉर्नर!
देश भर में चाइनीज खाना खिलाने वाले रेस्त्रां से लेकर खेलों तक की हालत खराब है। अपने बोर्ड से लेकर मेन्यु कार्ड तक चाइनीज नाम का क्या करें? गुजरात में तो लोगों ने कुछ गुजराती सा लगने वाला शब्द चाइनीज की जगह लिख दिया है और लोग उसी से चाइनीज ढांक रहे हैं। लोगों को याद होगा कि साल दो साल पहले जब पाकिस्तान से तनाव हुआ था तो कहीं करांची बेकरी पर हमला हो रहा था, तो कहीं किसी और पाकिस्तानी नाम पर। अब चीनी नामों पर हमला होने के करीब आ गए हैं। ऐसे में एक कल्पनाशील ठेले वाले ने अंग्रेजी के चाइना से च हटा दिया, और हिना रह गया। थोड़े दिन में हिना नाम की लड़की और महिला को अजीब सा लगेगा कि हर मोड़ पर उसके नाम के ठेले या रेस्त्रां हैं। 

सेवा के बदले में मेवा? 
सरकार के निगम मंडलों में नियुक्ति के लिए कई नाम सोशल मीडिया में तैर रहे हैं। इनमें से एक युवा नेता के नाम पर तो कुछ लोग शर्त लगाने के लिए भी तैयार हैं। सुनते हैं कि युवा नेता को एक बड़े पदाधिकारी के सत्कार की जिम्मेदारी दी गई थी। युवा नेता ने पदाधिकारी के सेवा सत्कार में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। 

पार्टी जब संसाधनों की कमी से जूझ रही थी ऐसे समय में भी युवा नेता, पदाधिकारी के लिए रैंज रोवर या फिर फॉर्चूनर गाड़ी लेकर हाजिर रहते थे। बताते हैं कि पदाधिकारी युवा नेता के सेवा से काफी खुश हैं, और वे उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं। अब जब लालबत्ती बंटने वाली है, तो युवा नेता का नाम चर्चा में है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि युवा नेता की लालबत्ती के लिए पदाधिकारी वीटो भी लगा सकते हैं। सेवा के बदले में मेवा मिलता है या नहीं, यह देखना है। 

कोचिंग, अभी ठंडी, आगे क्या?
छत्तीसगढ़ के 10वीं और 12वीं के नतीजे निकल गए। अब ऐसा लगता है कि इस बरस तो इन क्लासों के बच्चे राजस्थान के कोटा जाने से रहे जहां पर कोचिंग-उद्योग अभी-अभी कोरोना की वजह से बहुत बुरा हाल देख चुका है। अभी जो नतीजे निकले हैं, ये तो कोटा गए हुए बच्चों के नहीं हैं, और अभी जो 10वीं पास कर रहे हैं उनमें से संपन्न परिवारों के चुनिंदा बच्चे जरूर कोटा जाते हैं, लेकिन इस बार स्थानीय कोचिंग का कारोबार बढऩे की उम्मीद है, जब कभी भी सरकार इसकी छूट देगी। सिर्फ प्रवासी मजदूरों का बाहर जाना कम नहीं होगा, पढऩे के लिए बाहर जाने वाले बच्चे भी यहीं रहकर पढऩे की कोशिश करेंगे। अभी फिलहाल 15 अगस्त तक न स्कूल-कॉलेज खुलते दिख रहे, और न ही कोई कोचिंग क्लास। इसके बाद हो सकता है कि पढ़ाई के नुकसान की भरपाई के लिए अधिक लोग कोचिंग क्लास की ओर देखने लगें। (rajpathjanpath@gmail.com)


22-Jun-2020 5:04 PM

आपस की गंदगी, फुटपाथ तक बदबू 

अभी दो दिन पहले ही हमने इसी जगह अलग-अलग किस्म के काम से बनने वाले अलग-अलग मिजाज की बात कही थी। सबसे बुरा हाल तब होता था जब एक अखबार वाला दूसरे अखबार वाले के पीछे पड़ता था। नतीजा चारों तरफ गंदगी बिखरने पर जाकर खत्म होता था, और चौराहे पर दोनों के कपड़े उतर जाते थे। इसीलिए यह कहा जाता था कि अखबार वालों को अखबार वालों के खिलाफ नहीं लिखना चाहिए, और इसके लिए एक अवैज्ञानिक मिसाल भी ढूंढ ली जाती थी कि कुत्ता कुत्ते को नहीं काटता। ऐसा कहीं नहीं लिखा हुआ है कि कुत्ता कुत्ते को नहीं काटता।

अब अखबारों से आगे बढ़कर यह बात एक ताजा तबके पर आ गई है, जिसे आरटीआई एक्टिविस्ट कहते हैं। अब होता यह है कि अच्छे दिनों में आरटीआई एक्टिविस्ट मिलकर काम करते हैं, लेकिन जब उनमें खटपट हो जाती है, तो अच्छे दिनों तमाम बुरी बातों की यादों को लेकर वे एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कुछ ऐसा ही चल रहा है, आपस की गंदगी को सड़कों पर इतना ज्यादा धोया जा रहा है कि फुटपाथ तक बदबू फैल चुकी है। अब दोनों ही तरफ के लोग पुलिस, कोर्ट-कचहरी सबके इतने जानकार हैं कि हमारे जैसी मामूली समझ के लोगों के पास उनके लिए कोई नसीहत भी नहीं है। लेकिन इससे बाकी लोगों को एक समझ मिलेगी कि अच्छे दिनों में भी अपने राज चना-मुर्रा की तरह न बांटें, किसी दिन आप ही के खिलाफ बेकाबू होकर इस्तेमाल होंगे। 

दौरे का राज कुछ और?
पीएल पुनिया अचानक रायपुर पहुंचे, तो कांग्रेस में हलचल मच गई।  वैसे तो यह प्रचारित किया गया कि वे निगम मंडलों में नियुक्ति के मसले पर चर्चा के लिए आए थे। मगर अंदर की खबर कुछ और है। सुनते हैं कि प्रदेश के एक दिग्गज नेता ने राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री केसी वेणुगोपाल को काफी कुछ कहा था। 

वेणुगोपाल कांग्रेस के राज्यसभा प्रत्याशी थे। नेताजी को पार्टी की तरफ से चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वेणुगोपाल चुनाव जीत गए, तो नेताजी की बात पर गौर किया और उन्होंने हाईकमान को इससे अवगत कराया। फिर क्या था पुनिया को रायपुर जाकर वस्तुस्थिति की जानकारी लेने और सबकुछ ठीक करने के लिए कहा गया। पुनिया रात में चुपचाप पहुंचे और फिर अलग-अलग नेताओं के साथ बैठक की। कुछ दिग्गजों के बीच खींचतान चल रही थी, जिसे दूर करने की कोशिश हुई। अब आ गए, तो लगे हाथ निगम मंडलों की नियुक्ति को लेकर भी चर्चा हो गई। मगर पुनिया के दौरे से क्या फर्क पड़ता है, यह देखना है। 

 ऐसा फिलहाल दिखता नहीं
कांग्रेस के रायपुर संभाग के एक सीनियर विधायक को वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी है। वैसे तो विधायक महोदय मंत्री बनना चाह रहे थे। मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें भी थीं। जिस मंत्री को बाहर करने की चर्चा थी, वे दो दिन पहले ही बेटे के साथ दाऊजी से मिल आए थे। मंत्रीजी ने अपनी तरफ से गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की। आखिरकार फेरबदल की अटकलों पर विराम लग गया।

अब 18 महीने बिना लालबत्ती के गुजार चुके हैं। ऐसे में और इंतजार करना विधायक महोदय को भारी पड़ रहा था। लिहाजा जो मिला उसमें संतोष करना उचित समझा और आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हो गए। ये अलग बात है कि विधायक महोदय, अविभाजित मध्यप्रदेश और फिर जोगी सरकार में मंत्री रह चुके हैं और मौजूदा मंत्रिमंडल में कई तो उस समय विधायक भी नहीं थे। दूसरी तरफ, पूर्व मंत्री अमितेष शुक्ला के तेवर अभी भी नरम नहीं दिख रहे हैं। चर्चा है कि उन्हें निगम मंडल का ऑफर दिया गया था, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया है। शुक्ल बंधुओं के इकलौते राजनीतिक वारिस अमितेष को उम्मीद है कि देर सवेर उन्हें मंत्री बनाया जाएगा। अब अमितेष की उम्मीद तो सरकार इस कार्यकाल में पूरी होगी, ऐसा फिलहाल दिखता नहीं है। 

पार्टनरशिप ऑफर
पिछले 15 साल भाजपा के लोगों का ट्रांसपोर्ट व्यावसाय में एकतरफा राज रहा है। रेत से लेकर कोयला परिवहन में उन्हीं की ट्रकें लगती थीं। धमतरी और कांकेर जिले की रेत खदानों में तो भाजपा के पूर्व मंत्री के इशारे के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था। अब तस्वीर बदल गई है। रेत और मायनिंग में अब कांग्रेस के लोग कूद पड़े हैं और एक-एक कर भाजपा के लोगों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। 

इसमें दुर्ग संभाग के युवा विधायक और युवक कांग्रेस के ऊंचे ओहदे पर बैठे पदाधिकारी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। जिन अफसरों पर भाजपा नेताओं को पूरा भरोसा था और उनके सहारे मलाई छान रहे थे, वे अब कांग्रेस नेताओं के मार्गदर्शक बन गए हैं। भाजपा के लोग अब कांग्रेस के बड़े नेताओं के आगे पीछे हो रहे हैं और अपनी तरफ से पार्टनरशिप ऑफर भी भिजवा रहे हैं ताकि उनका धंधा जारी रहने दिया जाए। मगर उनकी दिक्कत यह है कि कांग्रेस के लोग उनके ऑफर पर गौर तक नहीं कर रहे हैं। 

रमन ने कह दिया
प्रदेश भाजपा की नई टीम का गठन होना है। नई टीम में राजेश मूणत और भूपेन्द्र सवन्नी को महामंत्री के रूप में जगह मिलना तकरीबन तय माना जा रहा है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में पूर्व सीएम रमन सिंह ने भूपेन्द्र सवन्नी को महामंत्री कह दिया। अब रमन सिंह ने कुछ कह दिया, तो उसे सच मान लेना चाहिए। वैसे भी उन्होंने नेता प्रतिपक्ष और फिर प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपनी पसंद पर मुहर लगवाकर अपनी ताकत दिखा चुके हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


21-Jun-2020 5:44 PM

योग दिवस और चर्चा

कोरोना की वजह से योग दिवस का कार्यक्रम सिमटकर रह गया। सरकारी आयोजन तो हुए ही नहीं, थोड़ी बहुत भाजपा कार्यालय एकात्म परिसर में रौनक देखने को मिली। यहां भाजपाध्यक्ष विष्णुदेव साय कुछ पुरुष-महिला पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ योग करते दिखे। एकात्म परिसर के समानांतर पूर्व सीएम रमन सिंह के घर पर भी योग दिवस का कार्यक्रम हुआ। यहां रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक,राजेश मूणत और भूपेन्द्र सवन्नी योग करते नजर आए।

रमन सिंह के घर से चंदकदम दूरी पर अजय चंद्राकर का भी घर है, लेकिन इस बार वे रमन सिंह के बजाए अपने घर में ही योग करते दिखे। यह बात जाहिर है कि कुछ समय पहले सरकार के खिलाफ भाजपा नेताओं का धरना प्रदर्शन हुआ था। तब अजय अपने घर में धरना देने के बजाए रमन सिंह के घर जाकर साथ ही धरने पर बैठे थे। ये बात अलग है कि उस समय प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हुई थी। अब सारी नियुक्तियां हो चुकी है, ऐसे में अब इधर-उधर जाने का कोई मतलब भी नहीं रह गया है। कुछ भी हो, भाजपा के योग दिवस कार्यक्रम की काफी चर्चा रही।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने योग दिवस पर अपनी योग करते तस्वीरें पोस्ट कीं, तो लोग हैरान रह गए। इस उम्र में भी वे शीर्षासन करते हैं, और रोज करते हैं। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों को देखकर लोग उन्हें देश का सबसे फिट सीएम करार देते रहे।

खबर ना मिली तो खफा !

पहली बार पीएल पुनिया चुपके-चुपके शनिवार को रायपुर पहुंचे। पीसीसी ने उनका दौरा कार्यक्रम जारी नहीं किया था। कुछ नेताओं को छोडक़र बाकियों को तो इसकी भनक भी नहीं लगी। जो चार-पांच नेता उन्हें लेने पहुंचे थे, वे भी विमानतल के बाहर अपनी कार में बैठे थे। जैसे ही पुनिया अपने पीए के साथ बाहर निकले, इन नेताओं ने कार से बाहर निकलकर औपचारिक रूप से उनका स्वागत किया और अपने साथ ले गए।

पुनिया के आने की खबर जैसे-जैसे पीसीसी के बाकी नेताओं और सरकार के मंत्रियों तक पहुंची, हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक थे कि आखिर बिना पूर्व सूचना के क्यों आए हैं? निगम-मंडल के कुछ दावेदार नेता भागदौड़ करते रहे। कुछ तो बहुत टेंशन में भी थे। वजह यह थी कि जब भी पुनिया रायपुर आते थे, वे उनका स्वागत के लिए जाते थे। मगर इस बार उन्हें पुनिया के आने की सूचना भी नहीं मिली।

 इससे खफा पीसीसी के एक नेता ने रात में काफी हंगामा मचाया। चर्चा है कि नाराज नेता ने पुनिया के एक सहयोगी को गुपचुप दौरे के लिए जमकर खरी खोटी सुनाई। वे यही नहीं रूके, उन्होंने पुनिया और अन्य बड़े नेताओं को फोन भी किया, लेकिन रात काफी हो चुकी थी, किसी ने उनके फोन का जवाब नहीं दिया। वे यह कहते भी सुने गए कि बड़े नेताओं का रवैया ऐसा ही रहा, तो छत्तीसगढ़ में भी कोई सुशांत सिंह जैसा कदम उठा सकता है।

कौन चोर कौन पुलिस?

पुलिस विभाग में अखबारों का हमेशा से खासा महत्व रहा है। पुलिस के छोटे-बड़े सभी दर्जे के कर्मचारी-अधिकारी अपनी कामयाबी की शोहरत छपवाना चाहते हैं, और कतरनों की फाईलें रखते हैं। जब किसी मुजरिम को पकड़ा जाता है, या लूट-डकैती का सामान, तस्करी का सामान बरामद होता है, तो उसके पीछे खड़े होकर पुलिस फोटो खिंचवाती है। अब ऐसे में अखबारों में कई बार दिक्कत यह आती है कि आई हुई तस्वीर में तीन अपराधी और चार पुलिसवाले एक साथ कतार में पीछे खड़े रहते हैं, और ये पुलिसवाले वर्दी में भी नहीं रहते। ऐसे में किसी होशियार सबएडिटर ने मुजरिमों के चेहरों पर गोला बनाना शुरू कर दिया ताकि पुलिस और मुजरिम का फर्क दिख जाए। लेकिन एक बार गलती से चोर का गोला पुलिस के चेहरे के इर्द-गिर्द आ गया। बवाल इतना मचा कि उसके बाद यह होशियारी दिखाना भी बंद हो गया। अब एक कतार में आधा दर्जन लोग खड़े रहते हैं, और अखबारों के पाठक खुद तय कर लें कि उसमें से कौन चोर जैसे दिख रहे हैं, और कौन पुलिस हैं।


20-Jun-2020 8:00 PM

मिजाज का असर काम पर भी...

लोगों का मिजाज अलग-अलग होता है। कुछ काम ऐसे रहते हैं जिन्हें एक खास किस्म के मिजाज की जरूरत पड़ती है, और अगर वहां किसी दूसरे मिजाज के लोगों को बिठा दिया गया तो बर्बादी की कोई सीमा नहीं होती। सरकारों में बैठे हुए लोग उसे बेहतर समझ सकेंगे कि सीएनजी के लोगों को अगर योजना मंडल में बिठा दिया गया, तो वे हिसाब-किताब और प्रक्रिया की खामियां निकालने के काम में लग जाएंगे, और आगे की कोई योजना ही नहीं बन पाएंगी। इसी तरह अगर किसी योजनाशास्त्री को सीएजी में बिठा दिया जाए, तो बारीकी से ऑडिट होना खत्म ही हो जाएगा।

सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हुए लोगों का पूरा परिवार अगर सामाजिक आंदोलन से जुड़ा हुआ न हो, तो घर के भीतर भी बवाल होते रहते हैं। एक सोशल एक्टिविस्ट के घर पर किसी ने कुछ जोर देकर कहा कि खाने में नमक कुछ कम डलना चाहिए, तो परिवार के सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य ने कहा कि घर का खाना किसी एक की मर्जी से नहीं बन सकता, सबकी बात सुननी चाहिए। गनीमत यही कि एक बैनर बनवाकर बाप के खिलाफ धरने पर नहीं बैठ गए।

कुछ समझदार लोग होते हैं तो वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि ऐसे जागरूक और सक्रिय लोगों को न उलझा जाए जिनका कि काम ही ऐसे मुद्दों पर संघर्ष करना है। नतीजा यह होता है कि कानूनी अधिकार के लिए लड़ाई लडऩे वाली लड़कियों की शादी की बात चलती है, तो लोग तुरंत माफी मांग लेते हैं कि हमारे घर बहू भेजना चाहते हो, या हमारे खिलाफ कोई वकील खड़ी करना चाहते हो?

लोगों के मिजाज में उनकी राजनीतिक विचारधारा भी इतनी हावी हो जाती है कि वामपंथी सोच के लोग दक्षिणपंथी सोच के परिवारों से रिश्ते भी करना नहीं चाहते, और इसका ठीक उल्टा भी लागू होता है कि संघ की सोच वाले परिवार कम्युनिस्टों से बचकर चलते हैं। लोगों को पता नहीं याद है या नहीं कि अपने कॉलेज के दिनों में अटल बिहारी वाजपेयी जिस लडक़ी से मोहब्बत करते थे, और शादी करना चाहते थे, उसके पिता कम्युनिस्ट थे, और ट्रेड यूनियन वाले थे। उन्होंने संघ की शाखा वाले अटलजी के लिए शुरू से ही मना कर दिया था, और वह शादी कभी हो ही नहीं पाई, यह अलग बात है कि जिंदगी का आखिरी बहुत लंबा हिस्सा अटलजी ने इसी महिला के साथ गुजारा था, जो उस वक्त शादीशुदा हो चुकी थीं।

इसलिए लोगों को मिजाज को भूलकर कोई काम नहीं करना चाहिए। जिस तरह का मिजाज हो उसी किस्म के काम पर लगाना चाहिए। मजदूरों के हक के लिए लडऩे का जिसका इतिहास हो, उसे कोई समझदार कंपनी कर्मचारियों के मामले देखने की ड्यूटी पर नहीं लगाती।

घड़ा फोडऩे एक सिर मिला...

छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े के भीतर आधा दर्जन हाथी अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग वजहों से मारे गए, और एक बीमार का इलाज जारी है। इसमें आखिरी के तीन हाथी तो दो दिनों के भीतर गुजरे और उसके भी पहले से वन विभाग में यह हल्ला शुरू हो गया था कि पीसीसीएफ (वन्यजीवन) अतुल शुक्ला का तबादला कर दिया जाए। यह एक अलग बात है कि उनके तबादले में हाथियों की मौत का एक संयोग या दुर्योग जुड़ गया, उनके तबादले की पूरी तैयारी पहले से कर ली गई थी क्योंकि वे विभाग के कई तौर-तरीकों को निभा नहीं पा रहे थे। जो लोग उन्हें हटाना चाहते थे उनको हाथियों की मौत हथियार के रूप में मिल गई, और आनन-फानन उन्हें सरकारी जुबान की लूपलाईन में भेज दिया गया। जबकि इस कुर्सी पर आने के बाद से अतुल शुक्ला ने जानवर या जानवर के हाथों इंसानों की मौत, सभी मामलों में पूरे प्रदेश में जमकर दौड़-भाग की थी। और अगर बिजली के अवैध तारों की वजह से दो-दो, तीन-तीन हाथी मर रहे हैं, लोग जहर देकर मार रहे हैं, या हाथी रास्ते के दलदल में फंसकर मर रहे हैं, इनमें से किसी भी बात की जिम्मेदारी रायपुर में बैठे किसी वन अधिकारी की नहीं हो सकती, और यह बात सरकार भी अच्छी तरह जानती थी। लेकिन बड़े-बड़े सिरों वाले हाथियों की इतनी मौत का घड़ा किसी बड़े सिर पर ही फूटना था, इसलिए बिना राजनीतिक संबंधों वाले ईमानदार अफसर अतुल शुक्ला को एकदम उपयुक्त सिर माना गया।

अब जानवरों और इंसानों के बीच छत्तीसगढ़ में जो कठिन लड़ाई चल रही है, उसके चलते इस पर काबू पाने के लिए नरसिंह राव नाम के अफसर को लाया गया है जिनके नाम में इंसान भी है, और जानवर भी, और किसी बात का असर हो या न हो, नाम के असर से हो सकता है कि टकराव और मौतें घट जाएं।

कोरोना की दहशत

राजधानी में कोरोना पांव पसार रहा है। राजभवन के आसपास और सीएम हाऊस के बाहर एक सुरक्षाकर्मी भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। सरकारी दफ्तरों में भी कोरोना का खौफ देखने को मिल रहा है। स्वास्थ्य विभाग की जिस महिला अफसर को कुछ दिन पहले तक फ्रंटलाइनर कोरोना वारियर्स के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, वह अपने दफ्तर के एक कर्मचारी की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने की सूचना मिलते ही आनन-फानन दफ्तर छोडक़र निकल गयीं।

कुछ इसी तरह की स्थिति दो दिन पहले महानदी भवन मंत्रालय में भी बन गई थी। आरोग्य सेतु एप में मंत्रालय के आसपास कोरोना संक्रमित होने का अलर्ट दिखाया गया। यह देखते ही लंच तक कई अधिकारी-कर्मचारी दफ्तर छोडक़र निकल गए। मंत्रालय में वे लोग ही बच गए थे, जिन्होंने एप नहीं देखा था। या फिर वे जिन्हें इस अलर्ट पर भरोसा नहीं था या खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। दूसरी तरफ, कोरोना संक्रमण से रोकथाम के लिए कई दफ्तरों में सैनिटाइजर टनल लगाए गए हैं। अरण्य भवन, उद्योग भवन के टनल तो खराब भी हो गए। उद्योग भवन स्थित एक निगम के दफ्तर का हाल यह है कि वहां सभी को सैनिटाइजर उपलब्ध कराने का जिम्मा एक बाबू को दिया गया है। बाबू के पहुंचने के बाद ही सबको हाथ साफ करने के लिए सैनिटाइजर मिल पाता है। तब कहीं जाकर दफ्तर का काम शुरू हो पाता है।


19-Jun-2020 7:09 PM

लॉकडाऊन, और संभावनाएं...

देश के अधिकतर संपन्न लोग, उच्च-मध्य वर्ग के लोग, और आपात सेवाओं को छोडक़र बाकी काम करने वाले लोग लॉकडाऊन के दो महीने घर में ही कैद सरीखे रहे। बाहर निकलना भी हुआ, तो भी मजबूरी में। बहुत से लोगों ने इस दौरान चर्बी चढ़ जाने की तकलीफ बताई, अधिकतर संपन्न लोगों ने बोरियत, और खाली बैठे लोगों ने लॉकडाऊन हालत में परिवार के भीतर के गढ़े गए लतीफे आगे बढ़ाए, सोशल मीडिया पर कार्टून पोस्ट किए।

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी निकले जिन्होंने इस वक्त का इस्तेमाल किया। गुजरात के एक-एक परिवार की कहानी छपी, जिसने अपने घर की तमाम दीवारों को टेराकोटा रंग में रंगकर उस पर महाराष्ट्र के मछुआरा लोक कलाकारों की वारली शैली के भित्ती चित्र बनाए, और घर बाहर-बाहर से एक कला संग्रहालय जैसा हो गया। बहुत से लोगों ने इंटरनेट पर कई नए हुनर सीखे, भाषाएं सीखीं, कम्प्यूटर पर काम करना सीखा, कम्प्यूटर पर नई तरकीबें सीखीं। सबके सामने यह मौका था कि कभी न देखा हुआ, न कभी सुना हुआ एक ऐसा दौर आया जिसमें घरों में कैद रहना मजबूरी था, और लोगों ने उसे अपने-अपने हिसाब से या तो पूरे का पूरा बर्बाद कर दिया, या लोगों ने उसे जिंदगी का सबसे उत्पादक दौर भी बना लिया। वक्त वही था, दौर भी उतना ही था, लेकिन कुछ ने उसे आबाद किया, कुछ ने बर्बाद किया।

इस अखबार के पाठकों को याद होगा कि इसके संपादकीय में लोगों को बार-बार यह मशविरा दिया गया था कि वक्त खराब न करें, और अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है, अभी घर के बाहर की जिंदगी सीमित रहने वाली है, और लोगों के पास रोजाना कई घंटे सिर्फ घर में रहना ही हिफाजत की बात रहने वाली है। ऐसे में अभी भी कुछ सीखें, अभी भी कुछ नया करें, वरना आगे जाकर अगली पीढिय़ों को क्या मुंह दिखाएंगे कि कोरोना-लॉकडाऊन में क्या किया था?

मौत के लिए भी वीआईपी?

राजधानी की कई पॉश कॉलोनियां कोरोना मरीज मिलने के बाद  कंटेंटमेंट जोन में तब्दील हो चुकी हैं। इन्हीं में से एक सिविल लाइन का इलाका भी है। यहां बड़े कारोबारियों के साथ-साथ कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता भी रहते हैं। चूंकि कंटेंटमेंट जोन बन चुका है, ऐसे में यहां के लोगों की बाहर आवाजाही प्रतिबंधित है। मगर कुछ लोगों को बेरोकटोक आने-जाने की अनुमति देने के लिए वहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों पर दबाव है।

सुनते हैं कि दो दिन पहले सिविल लाइन कंटेंटमेंट जोन में सफाई व्यवस्था का जायजा लेने एक विधायक वहां पहुंचे। जाते-जाते उन्होंने ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों को दो कारोबारियों का नाम देकर कहा कि उन्हें बेरोकटोक आने-जाने दिया जाए। विधायक द्वारा पुलिस कर्मियों पर दबाव बनाने की सूचना मिलते ही कुछ भाजपा नेता वहां पहुंच गए। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि यदि कुछ विशेष लोगों को ही आने-जाने की अनुमति दी जाती है, तो बाकी लोग कंटेंटमेंट जोन के नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे। माहौल बिगड़ता देख पुलिस कर्मियों ने भरोसा दिलाया कि कंटेंटमेंट जोन के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाएगा। तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ।


18-Jun-2020 6:32 PM

इंटरनेट के मेले में ठग...

इन दिनों इंटरनेट पर बहुत सी वेबसाईटों के बीच इस किस्म के जालसाजी के इश्तहार मासूम चेहरा बनाए खड़े रहते हैं कि आपने किसी पर क्लिक किया, तो वे आपको या तो पोर्नोग्राफी बेचने वाली किसी वेबसाईट पर ले जाएंगे, या फिर ठगी-जालसाजी वाली किसी वेबसाईट पर। जो भले लोग भी अपनी वेबसाईटों को विज्ञापनों के लिए गूगल के हवाले कर देते हैं, वहां पर अपने आप इस तरह के सेक्स या जालसाजी के इश्तहार आने लगते हैं। आज सुबह महिला अधिकारों की एक प्रतिष्ठित वेबसाईट पर ऐसा ही एक इश्तहार दिखा जो इस शहर के किसी के एकाएक करोड़पति बन जाने की खबर दिख रहा था। उत्सुकता से उस पर क्लिक किया गया तो ठगी की एक कहानी की तरह दो महीनों में करोड़ों रूपए, दो बंगले, और मर्सिडीज कार जैसी कमाई बताने वाला एक बंदा अपने को बेच रहा था। जिस तरह मेलों में ठग मिलते हैं, उसी तरह इंटरनेट पर अच्छी-भली वेबसाईटों के बीच भी धोखेबाज और जालसाज मिल जाते हैं। उन पर भरोसे के पहले लोगों को अपनी समझ पर भरोसा करना चाहिए।

आईएएस बनने की हड़बड़ी..

राप्रसे से आईएएस अवॉर्ड के लिए जल्द ही डीपीसी हो सकती है। सरकार ने आईएएस के सात रिक्त पद के लिए 21 राप्रसे अफसरों के नाम भेज दिए हैं। इसमें वर्ष-2003 बैच के डिप्टी कलेक्टर संवर्ग के अफसरों के नाम भी हैं। इस बैच के अफसरों की चयन प्रक्रिया में काफी गड़बड़ी हुई है, और यह प्रकरण अभी अदालत में भी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इस बैच के अफसरों की नाम आईएएस अवॉर्ड के लिए नहीं भेजने का आग्रह भी किया गया था। इस बैच में चयन प्रक्रिया भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लडऩे वाली वर्षा डोंगरे ने राज्य शासन से पत्र व्यवहार भी किया है, लेकिन जब तक उनका पत्र मंत्रालय तक पहुंच पाता, डीपीसी की फाइल डीओपीटी को भेजी जा चुकी थी।

चर्चा है कि डीपीसी को लेकर किसी तरह की कानूनी अड़चनें न आए, इसके लिए इस बैच के अफसर लामबंद हो गए हैं। वे डीओपीटी के अफसरों से संपर्क की कोशिश में भी जुट गए हैं। ताकि हाईकोर्ट के फैसले के चलते पदोन्नति में किसी तरह की समस्या न आए। यही नहीं, वे कानूनी परामर्श भी कर रहे हैं। चूंकि तकरीबन सभी मलाईदार पदों पर हैं। इसलिए कोई आर्थिक समस्या भी नहीं है। ऐसे में वे सभी पदोन्नति को लेकर उम्मीद से हैं। हालांकि अभी डीपीसी की तिथि तय नहीं हुई है। लिहाजा, पदोन्नति खटाई में पडऩे की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा रहा है।

हलके और भारी विधायक...

विकास योजनाओं और ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर कई जगहों पर कांग्रेस के विधायकों में आपसी मनमुटाव चल रहा है। प्रदेश के एक जिले के तीन कांग्रेस विधायकों में से दो एक राय के हैं, तो एक विधायक की एकला चलो की रणनीति रही है। इससे अकेले विधायक को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। जिले के शीर्ष अधिकारियों की पोस्टिंग की बात आई, तो अकेले विधायक की सुनवाई नहीं हो पाई। दोनों विधायक एक राय होकर पहले कलेक्टर को बदलवाने में सफल रहे, और अब डीएफओ के लिए अपनी तरफ से नाम प्रस्तावित कर दिए हैं। लोकतंत्र में वैसे भी भीड़ का महत्व होता है। लिहाजा, योजनाओं की स्वीकृति हो या फिर ट्रांसफर-पोस्टिंग, दोनों विधायक हर जगह भारी पड़ रहे हैं।


17-Jun-2020 6:24 PM

बुरे वक्त में एक अच्छा बाजार

बुरे वक्त में भी कई अच्छे धंधे पनप सकते हैं। जिस शहर में मच्छर अधिक हैं वहां मच्छर मारने के कई तरह के सामान खूब बिकते हैं। किसी धर्म के लोगों को हिंसा लग सकते हैं, लेकिन सभी धर्मों के कारोबारी ऐसे सामानों का छोटा या बड़ा धंधा करने लगते हैं। अभी कोरोना का हमला हुआ तो तरह-तरह के मास्क बिकने लगे। मुम्बई में सुशांत राजपूत नाम का अभिनेता गुजरा, तो उसकी शोहरत को आनन-फानन भुनाते हुए विशेष श्रद्धांजलि देते हुए मास्क बन गए, और सडक़ों पर बिकने लगे। जब कभी कोई अगला मैच होगा, तो हो सकता है कि कोकाकोला, या पेप्सी जैसी कोई कंपनी अपने इश्तहार के मास्क मुफ्त बांटने लगे, या आज भी दुकानों पर कई सामानों के साथ उनके इश्तहार वाले मास्क आ भी गए हों, तो भी पता नहीं।

कारोबार का उसूल यही है, कि जरूरत न हो तो जरूरत खड़ी की जाए, लोगों को खरीदने के लिए उकसाया जाए, नई-नई फैशन, नए रंग, और नए डिजाइन, इन सबसे लोगों को खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। अब मास्क, सेनेटाइजर के अलावा बाजार में ऐसे दूसरे सामान तेजी से घुस गए हैं जो किसी दरवाजे को बिना छुए खींचकर या धकेलकर खोलने-बंद करने के काम आते हैं, और किसी हैंडिल को बिना छुए वे काम किए जा सकते हैं। यह तो आज चीन के साथ तनातनी बहुत अधिक चल रही है, वरना वहां पर वुहान की लैब से, या वुहान के पक्षी बाजार से कोरोना निकलने के पहले ही उससे निपटने के सामान बनना शुरू हो चुके होंगे। आज भारत में बहिष्कार का खतरा न हो, तो ऐसे दर्जनों सामान गली-गली बिकने लगेंगे जो कि चीन से आए हुए होंगे।

वैसे भी कोरोना कोई जल्दी जाने वाला नहीं है, और ऐसे में कागजों को वायरसमुक्त करने के सामान आ चुके हैं, मोबाइल फोन को वायरसमुक्त करने के उपकरणों के इश्तहार धड़ल्ले से चल रहे हैं, और कोरोना हैरान हो रहा है कि उसकी वजह से मंदा धंधा अब फिर किस तरह नए-नए सामान लेकर खड़ा हो रहा है। यह देश की विज्ञापन एजेंसियों के लिए सही समय है कि वे मास्क एडवरटाइजिंग  के काम पर फोकस करें, बिहार का चुनाव इसमें सबसे पहला बाजार बन सकता है। कुल मिलाकर लोगों को मास्क मुफ्त में मिलें, इतना तो हो ही जाना चाहिए। फिलहाल दूल्हा और दुल्हन के लिए तरह-तरह के खूबसूरत मास्क भी बाजार में आ रहे हैं, ऐसे एक ताजा मास्क के जोड़े पर एक पर मिस्टर लिखा है, और एक पर मिसेज।

 

चीनी सामानों को जलाने का मौसम

हर साल एक-दो बार चीनी सामानों के बहिष्कार का दौर हिन्दुस्तान में आते ही रहता है। लोग चीन के खिलाफ अपनी भावनाओं को दिखाने के लिए उसके बहिष्कार को एक अच्छा जरिया मानते हैं, वहां के राष्ट्रपति की चार तस्वीरें, वहां के चार झंडे, और चीन के बने कुछ खराब हो चुके सामान सडक़ों पर आग लगाकर चीनी कैमरों से ही नजारे की तस्वीर खींचकर चारों तरफ फैलाई जाती है।

अब क्या सचमुच ही दुनिया में ऐसे किसी एक बड़े देश का बहिष्कार हो सकता है जो कि सबसे बड़ा मैन्युफेक्चरिंग-हब हो? हिन्दुस्तान के बिजलीघरों में से बहुत से चीन के बने हुए हैं, और उनकी बनी बिजली नेशनल ग्रिड में जाती है। इस तरह चीनी बिजलीघरों की बिजली देश के हर घर-दफ्तर में पहुंच रही है। तो क्या हिन्दुस्तान बिजली का इस्तेमाल बंद कर सकता है? इसी तरह मोबाइल फोन के अधिकतर हैंडसेट चीन के बने हुए हैं, अधिकतर कम्प्यूटर या उनके हिस्से चीन के बने हुए हैं, फोटोकॉपी की मशीनें चीन की बनी हुई हैं, दूरदर्शन से लेकर दूसरे निजी चैनलों तक कैमरे और माईक, प्रसारण के उपकरण, स्टूडियो की लाईट, ये सब चीन के बने हुए हैं। भारत में बनने वाली बहुत सारी दवाईयों के रसायन चीन से आते हैं। घरेलू मशीनों से लेकर गाडिय़ों तक में चीन के बने हुए हिस्से लगते हैं। क्या सचमुच ही इन सबका बहिष्कार हो सकता है, या फिर सिर्फ प्रतीक के लिए, प्रचार के लिए लोग बहिष्कार का ऐसा फतवा देते हैं? और दूसरी बात यह कि अगर भारत चीन के सामान बुलाना बंद करता है, तो मेक इन इंडिया का पूरा अभियान ठप्प पड़ जाएगा, क्योंकि चीनी पुर्जों के बिना अधिकतर सामान भारत में भी पूरे नहीं बन पाएंगे, और सारा काम-धंधा ही ठप्प हो जाएगा। आज भारत चीन के पुर्जों, चीन के कच्चे माल, और चीन की टेक्नालॉजी के बिना ठप्प हो जाने की हालत में है। इसलिए बहिष्कार के फतवों की तस्वीरें कुछ दिन खींचकर अगर यह भड़ास कम होती है, और अपना खराब हो चुका चीनी मोबाइल जलाने वाले लोगों को खुद के लिए शहीद का दर्जा पाने का हक मिलता है, तो वैसा ही हो जाए।


16-Jun-2020 8:04 PM

कंधों पर हल्के बोझ का फायदा...

गांवों में किसान नए बैल को हल में जोतने के पहले लकड़ी का एक ढांचा बनाकर उसके गले में पहना देते हैं ताकि उसे गर्दन पर बोझ ढोने की आदत हो जाए। यह बात जिंदगी में हर दायरे में लागू होती है, और किसी भी किस्म का असल बोझ आने के पहले लोगों पर उसके एक हिस्से का बोझ डालकर उसे ढोने की आदत डाल देनी चाहिए।

सरकार में प्रशासन की बुनियादी बातों को देखें तो अच्छा प्रशासन यह कोशिश करता है कि किसी अफसर के कलेक्टर बनने के पहले उसे कम से कम एक म्युनिसिपल का कमिश्नर बनने का मौका मिल जाए जिससे वह शहरी कामकाज समझ सके। इसके अलावा कम से कम एक जिला पंचायत का सीईओ बनने मिल जाए ताकि वह पंचायत और ग्रामीण विकास का काम समझ ले। यह भी एक किस्म से जिले के हल में जोतने के पहले गर्दन पर बोझ डालने जैसा रहता है ताकि गर्दन उसकी आदी हो जाए। यह बात पुलिस की अलग-अलग कुर्सियों पर लागू होती है, और एक अच्छा शासन अफसरों के एसपी रहते हुए उन्हें अलग-अलग किस्म के दो-तीन जिलों में काम करने का मौका देता है ताकि वे शहरी और ग्रामीण, औद्योगिक और आदिवासी, सभी किस्म के जिलों के काम को समझ लें, ताकि आईजी बनने के बाद उन्हें अपनी रेंज के हर तरह के जिले का तजुर्बा रहे। लेकिन ये पुरानी परंपराएं अब खत्म हो चुकी हैं, और अब अफसर अपनी कोशिश से अधिक कमाऊ या अधिक महत्वपूर्ण जिलों से परे कोई और ट्रेनिंग नहीं चाहते। एक वक्त ऐसा था कि जब अजीत जोगी कलेक्टर रहते हुए सिर्फ कलेक्टर ही रहे, और उन्होंने कभी सचिवालय या संचालनालय में कोई काम नहीं किया। इसी तरह राज्य पुलिस सेवा से आगे बढ़े हुए एक वक्त के रायपुर के सीएसपी रूस्तम सिंह आईजी बनने तक कभी फील्ड से बाहर तैनात नहीं रहे, कभी पुलिस मुख्यालय या किसी दफ्तर में काम नहीं किया। जोगी कलेक्टर रहते हुए ही राज्यसभा चले गए थे, और रूस्तम सिंह आईजी रहते हुए ही राजनीति में चले गए, और भाजपा के विधायक बनकर मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बन गए थे।

सांसद निधि बिन सब सून...

कोरोना संकट की वजह से सांसद निधि टालने के फैसले से ज्यादातर सांसद नाखुश हैं। कांग्रेस के सांसद तो खुले तौर पर ऐतराज जता चुके हैं, अब भाजपा सांसद भी दबी जुबान से इसका विरोध कर रहे हैं। कुछ भाजपा सांसदों ने पार्टी फोरम में इस बात को रखा भी है। भाजपा सांसद इस बात से दुखी हैं कि एक साल तक वेतन में 30 फीसदी की कटौती होगी, इसके अतिरिक्त भी पीएम केयर्स में एक माह का वेतन दे चुके हैं। इन सबके चलते अपने कार्यालय का खर्चा निकालने में भी मुश्किलें आ रही है।

छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों के भाजपा सांसद ज्यादा दुखी हैं, जहां भाजपा की सरकार भी नहीं है। सांसद, सांसद निधि से हर साल 5 करोड़ तक का काम अपने संसदीय क्षेत्र में करा पा रहे थे, वे अब नहीं करा पाएंगे। सांसद निधि का पैसा तुरंत जारी हो जाता है। इसलिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में सांसद निधि से काम कराने की होड़ मची रहती थी। कमीशन भी अच्छा खासा बन जाता था।

एक पुराने सांसद के नजदीकी रिश्तेदार, जो उनका कार्यालय संभालते थे। वे कार्यालय के खर्चे के नाम से कमीशन लेने में किसी तरह का संकोच नहीं करते थे। इन सबके बावजूद सांसदों की ग्रामीण इलाकों में पकड़ भी बनी रहती थी। अब जब निधि को ही स्थगित कर दिया गया है, तो सांसदों की पूछ परख कम हो गई है। सुनते हैं कि आगामी संसद सत्र के दौरान कुछ भाजपा सांसद, इस बात को केन्द्रीय मंत्रियों के सामने में रखने की सोच रहे हैं। देखना है कि केन्द्र सरकार-पार्टी उनकी दिक्कतों पर क्या कुछ कदम उठाती है।


15-Jun-2020 6:31 PM

अजब नामों की गजब दास्तां

हिन्दुस्तान में मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के नाम पर रखे गए सडक़-चौराहों और शहरों के नाम बदलना हाल के बरसों में एक बड़ा शगल बन चुका है। जाति, धर्म, और देश के मुद्दे चलन पर हावी हो गए हैं। ऐसे में रायपुर के एक संस्कृति-कर्मी राहुल सिंह ने लिखा है कि महापुरूषों की आत्माएं नामकरण के लिए उनके समर्थकों के माध्यम से भटकती रहती होंगी। उन्होंने लिखा है- क्या आप जानते हैं कि नवापारा-राजिम में एक मैडम चौक है, और यह नाम बोर्ड पर लिखाता भी है। रायपुर में टिल्लू चौक है, बिलासपुर में मन्नू चौक है, और करोना चौक भी है।

हर शहर में कुछ न कुछ जगहों के नाम ऐसे रहते हैं, जो कि लोगों की नजरों में खटकते हैं, और मौका पड़ते ही उन नामों को खिसकाकर अपनी पसंद के महापुरूष (महामहिला तो शायद हो ही नहीं सकती) का नाम टांग दिया जाता है।

इतना कुछ करने के बाद भी..

खबर है कि एक बड़े राजनीतिक दल के दो दिग्गज नेताओं के बीच चंदे की रकम के हिसाब-किताब को लेकर मनमुटाव चल रहा है। एक पर चंदा एकत्र करने में सहयोग करने की जिम्मेदारी थी, तो दूसरे के पास संभालकर रखने और खर्च करने की जिम्मेदारी रही है। चंदा इक_ा करने वाले नेताजी इस बात से परेशान हैं कि उन्हें कोई हिसाब-किताब नहीं बताया जा रहा है। सुनते हैं कि कुछ समय पहले उन्होंने अपने विश्वस्त सहयोगी को पार्टी दफ्तर के कोष अधिकारी के पास हिसाब-किताब जानने भेजा था। मगर कोष अधिकारी ने नेताजी के सहयोगी को खरी-खोटी सुनाकर उल्टे पांव लौटा दिया।

नेताजी का चंदा इक_ा करने में भरपूर सहयोग रहा है, तो हिसाब-किताब जानने की इच्छा भी स्वाभाविक है। चंदा जुटाने वाले और रखने वाले, दोनों नेता आमने-सामने बैठते भी हैं, लेकिन हिसाब-किताब को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कह पाते हैं। चंदे को लेकर पार्टी की अपनी गोपनीयता भी है। हिसाब-किताब देखने के लिए हाईकमान एक-दो लोगों को ही अधिकृत कर रखते हैं। इससे परे कोई भी हिसाब-किताब की जानकारी नहीं ले सकता। पार्टी अध्यक्ष तक को भी इसका पावर नहीं होता। मगर चंदा जुटाने वाले नेताजी इस बात से ज्यादा निराश है कि इतना सबकुछ करने के बाद भी कोई उन्हें बताने के लिए तैयार नहीं है।

जब सैंय्या भए कोतवाल...

छत्तीसगढ़ में शराब मिलना तो शुरू हो गया है, लेकिन पीने की दिक्कत कम नहीं हुई है। शराबघर खुल तो गए हैं, लेकिन वहां दूर-दूर बैठाकर पिलाने के नियम की वजह से लोगों को पीना अटपटा लग रहा है। ऐसे में जाहिर है कि लोग कारों में बैठकर, या सडक़ किनारे किसी अंधेरे कोने में रूककर पीने लगे हैं। जो लोग रात में घूमने निकलते हैं, उन्हें अपने इलाके में पीने के ऐसे अड्डे दिखते हैं, लेकिन कौन शराबियों से झगड़ा मोल ले? इसलिए लोग अनदेखा करके आगे बढ़ जाते हैं। जो लोग सुबह घूमने निकलते हैं, उन्हें ऐसी तय जगहों पर किनारे शराब की बोतलें और नमकीन के खाली पैकेट पड़े दिखते हैं, जो कि जाहिर तौर पर सफाई कर्मचारियों को भी दिखते होंगे। अगर सफाई कर्मचारी ऐसे ठिकाने पुलिस को बताने लगें, तो ऐसा पीना तुरंत पकड़ में आ जाएगा, लेकिन खाली बोतलें भी कुछ दाम दे जाती हैं, और कचरा गाडिय़ां ऐसी जगहों पर रोजाना रूककर बोतलें उठाने की आदी हो जाती हैं, वे भला पुलिस को क्यों बताएं? और फिर पुलिस के पास भी शराबियों को ही पकडऩे का काम बचा है क्या? अब आखिर में बचता है शराब नियंत्रित करने वाला आबकारी विभाग। तो यह विभाग खुद ही आज एक नंबर और दो नंबर दोनों किस्म की दारू बाजार में खपाकर लाल हो गया है, यह भला पीने वालों को क्यों पकड़े? जानकारों का तो यह भी कहना है कि पुलिस को कह दिया गया है कि शराब पीने वालों को न पकड़ा जाए, शायद यही वजह है कि इस जुर्म में कोई नहीं धरे जा रहे, जबकि कानून काफी कड़ा है। आबकारी विभाग ही दारू कारोबारी भी हो गया है, तो अब कार्रवाई कौन करे?

भूपेश की गंगा में डुबकी

 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल ने आज एक पुराना वाक्या लिखा है. उन्होंने फेसबुक पर लिखा-  भूपेश 13 साल का हुआ तो तब हम लोग परिवार सहित, मेरी पत्नी बिंदेष्वरी देवी और झुमरलाल टावरी सर्वोदय सम्मेलन गये हुए थे। लौटते समय हमने बनारस में गंगा नदी में नौका विहार किया तथा बीच गंगा में चॉदी का सिक्का भूपेश को दिखाया और बोला कि गंगा नदी से इस सिक्के को निकालना है. मैंने सिक्के को गंगा नदी में फेंका और भूपेश ने उस सिक्के को गंगा में कूदकर निकाल लिया।  नाविक उस समय बहुत ही ज्यादा गर्म हो गया और उसने कहा यदि यह बच्चा नदी में डृब जाता तो उसका जिम्मेदार कौन होता ? पुलिस मुझे ही पकड़ लेती। आज उसी का ही परिणाम है कि विषम परिस्थिति में भी भूपेश भयभीत नहीं होता है, जब भी संकट का समय होता है तब वह और उसकी सरकार मुकाबला कर लेते हैं ।


14-Jun-2020 6:22 PM

संगमरमर में से बस मर मर बचा !

जब तक लोग सत्ता पर रहते हैं तब तक उनका पसीना भी गुलाब होता है। लेकिन सत्ता से उतरने के बाद हाल बुरा हो जाता है। खासकर तब जब किसी दूसरी पार्टी की सरकार आ जाती है, या अपनी ही पार्टी के किसी विरोधी खेमे की सरकार आ जाती है। अब बिलासपुर के तिफरा के हाईटेक बस स्टैंड को 7 करोड़ से अधिक की लागत से बनाया गया था। और यहां पर एक-एक पौधा लगाने के लिए एक-एक नेता के नाम संगमरमर में कुरेदकर उन्हें जड़ा गया था। पौधे तो खैर कुछ महीनों में खत्म हो जाने थे, जो कि हो चुके, लेकिन इन पत्थरों के सामने जिस दर्जे का घूरा इक_ा है, वैसा घूरा तो मुहल्लों में भी नहीं दिखता है। अब जिन चार लोगों के नाम संगमरमर में लिखाए थे, उनमें से दो तो रायपुर में बसे हैं, लेकिन दो तो बिलासपुर में ही रहते हैं। उस वक्त के विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, और उस वक्त के ताकतवर मंत्री अमर अग्रवाल ये तो बिलासपुर के ही बाशिंदे हैं। उन्हें जाकर एक बार यह देखना चाहिए कि इनके लगाए पौधों का क्या हाल है, और इनके लिए लगाए गए संगमरमर का क्या हाल है। उसमें से महज संग बच गया है, बाकी सब मर मर गया है। तस्वीरें खींचकर इस तरफ ध्यान खींचा बिलासपुर के सत्यप्रकाश पांडेय ने।  इस तरह के चबूतरे और ऐसे संगमरमर की तस्वीरें देखकर कुछ लोगों ने सत्यप्रकाश पांडेय से कहा कि ऐसा लग रहा है कि किसी की समाधि की ऐसी दुर्गति हो रही है।

जानवर और इंसान में फर्क !

सरगुजा में हाथी इंसानों को मार रहे हैं, और शायद कुछ इंसान जहर देकर हाथियों को भी। और इनके बीच में वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी निलंबित हो गए हैं, जो कि जिम्मेदार हैं, या नहीं, इसका कोई सुबूत अभी नहीं मिला है। यह भी सुबूत नहीं मिला है कि इनकी लापरवाही से तीन हथिनियां मरी हैं। अगर गांव के लोगों ने उन्हें जहर देकर मारा है, तो भी सजा ऐसे लोगों को मिलनी चाहिए थी, न कि वन विभाग के लोगों को। लेकिन सरकार तो सरकार होती है, जब उसे लगता है कि कुछ करते हुए दिखना है, तो बिना सुबूत सारे अमले को सस्पेंड कर दिया।

अभी दस दिन पहले राजधानी रायपुर में इस बात के वीडियो सुबूत सामने आए थे कि एक जगह कंटेनमेंट इलाका बनाने के बाद भी वहां से लोग निकल रहे थे, और वहां का थाना इंचार्ज भयानक बुरी तरह लाठी से उनका बदन तोड़ रहा था। उसके खिलाफ तो वीडियो सुबूत भी थे, लेकिन न तो वह सस्पेंड हुआ, न उसकी बर्खास्तगी हुई, उसे महज लाईन अटैच करके विभागीय जांच शुरू करवा दी गई जो कि पुलिस का ही एक अफसर कर रहा है। अब लोगों का कहना है कि इंसानों की हड्डियां तोडऩे सरीखी लाठी मारो तो लाईन अटैच, और जानवरों को मारने में कोई जिम्मेदारी न भी दिख रही हो, तो भी निलंबित। अब वन मंत्री मो. अकबर को तो ऐसी कार्रवाई करने से पहले सोचना था कि उन्हीं के शहर में उन्हीं की समझी जाने वाली पुलिस की भयानक मार के वीडियो सुबूत मौजूद थे, फिर भी मारने वाले अफसर का निलंबन नहीं हुआ। जानवर और इंसान के बीच इतना बड़ा सरकारी फर्क !

क्रॉस वोटिंग का सौदा और जांच

रायपुर नगर निगम के जोन अध्यक्ष के चुनाव में क्रास वोटिंग के प्रकरण की जांच के लिए कांग्रेस ने टीम बनाई है। क्रास वोटिंग की वजह से जोन क्रमांक-3 में कांग्रेस के अनिमेष भारद्वाज अध्यक्ष बनने से रह गए। सुनते हैं कि भाजपा के कुछ नेताओं ने दो और जोन में अपना अध्यक्ष बिठाने तैयारी कर ली थी। दो निर्दलीय पार्षद अमर बंसल और गोपेश साहू को भाजपा में शामिल कराकर उन्हें अध्यक्ष बनाने की योजना बनाई थी। मगर भाजपा के एक पूर्व मंत्री के कड़े विरोध के चलते उन्हें अध्यक्ष पद का प्रत्याशी नहीं बनाया गया। बाद में दोनों निर्दलीय उम्मीदवारों ने कांग्रेस का साथ देकर उनके उम्मीदवारों के जोन अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ कर दिया।

जिस जोन क्रमांक-3 में कांग्रेस का बहुमत था वहां भाजपा के प्रत्याशी को सफलता मिली। कांग्रेस की जांच समिति इस पूरे मामले की पड़ताल कर रही है और यह भी स्पष्ट हुआ है कि क्रास वोटिंग के एवज में लेन-देन भी हुआ है। क्रास वोटिंग करने वाला पार्षद भी चिन्हित हो गया है। अब दिक्कत कार्रवाई को लेकर है। कांग्रेस का एक खेमा चाहता है कि नोटिस देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। क्योंकि कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है। जबकि दूसरा खेमा इस मामले पर कड़ी कार्रवाई के पक्ष में है।

चर्चा है कि भाजपा के एक कारोबारी नेता के घर में क्रास वोटिंग के लिए डील हुई थी। इसमें दो युवक कांग्रेस नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी। वैसे तो दो कांग्रेस पार्षदों को क्रास वोटिंग के लिए तैयार किया गया था, लेकिन एक ने डील पक्की होने के बावजूद अंतिम समय में क्रास वोटिंग करने से मना कर दिया। कहा जा रहा है कि कांग्रेस संगठन न सिर्फ पार्षद बल्कि दोनों युवा कांग्रेस नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती है।


13-Jun-2020 7:46 PM

हाईटेक, हाईहेडेक भी...

धीरे-धीरे करके जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली अधिकतर चीजें हाईटेक होने लगी हैं। अब पांच-दस लाख रूपए की कार में भी ऐसे फीचर आने लगे हैं कि कार एक सीमा से ज्यादा रफ्तार पर पहुंचे, तो पहले से तय किए गए एक मोबाइल नंबर पर मैसेज चले जाए। यह भी आसानी से सेट किया जा सकता है कि अगर कार एक निश्चित दूरी के बाहर निकले, तो भी तुरंत मैसेज चले जाए। कार शुरू हो या बंद हो, उसका भी मैसेज चला जाए। और तो और दूर से अपनी कार को बंद भी किया जा सकता है, और लुटेरे अगर कार लूटकर भाग गए, तो उसे अपने मोबाइल फोन से ही बंद किया जा सकता है। इसी तरह आपका मोबाइल फोन चोरी हो गया हो तो उसे भी दूर से बंद किया जा सकता है, उसकी सारी जानकारी मिटाई जा सकती है, और अंग्रेजी जुबान के मुताबिक उसे ब्रिक बनाया जा सकता है, यानी ईंट की तरह मुर्दा। लेकिन ऐसे तमाम हाईटेक सामानों के साथ कई खतरे भी रहते हैं। घर पर लगा स्मार्ट टीवी अपने कैमरे से आपकी जासूसी भी कर सकता है, क्योंकि उसे इंटरनेट के रास्ते हैक किया जा सकता है। लोग दूर बैठे कार के स्क्रीन पर दिखते हुए नक्शे में भी छेडख़ानी कर सकते हैं, और ड्राइवर को किसी गलत दिशा में मोड़ सकते हैं। ऐसे में एक पुरानी कार की यह घोषणा बड़ी दिलचस्प है कि उसमें कोई भी तकनीक नहीं है, और इस तरह वह किसी भी समस्या से दूर है। वरना इन दिनों के नए उपकरणों में आए दिन कोई न कोई फीचर खराब होता है, और मरम्मत और खर्च मांगता है।

बेटे पर असर छोड़ गए जोगी?

मरवाही के पूर्व विधायक अमित जोगी अपने पिता अमित जोगी को याद कर भावुक हो गए और उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि पापा मुझे बहुत कुछ दे गए और मेरा कुछ ले भी गए...।

अमित ने लिखा - ‘‘पापा हमेशा कहते थे कि जो अपने क्रोध को पीता है वही दूसरों के दिल में जीता है। देखना जब मैं ईश्वर के पास जाऊंगा तो अपने साथ तुम्हारे क्रोध को भी संग ले जाऊंगा। मुझे, अपने अंदर के इस अवगुण को सार्वजनिक स्वीकारने और त्यागने में गर्व है। मैं उन सभी लोगों से ह्दय से, हाथ जोडक़र क्षमा याचना करता हूं, जिन्हें मैंने क्रोध से जाने-अनजाने में दुखी किया हो। चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियां मेरे जीवन में आए, मैं पापा की तरह क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने दूंगा।’’

अमित के इस पोस्ट की राजनीतिक हल्कों में जमकर चर्चा है। विधानसभा चुनाव के पहले और बाद में अजीत जोगी के ज्यादातर करीबी लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया था। इसके लिए कई लोगों ने अमित को कोसा था। और तो और पूर्व सीएम के दशगात्र कार्यक्रम के बाद उनके बेहद करीबी और विधायक प्रतिनिधि ज्ञानेन्द्र उपाध्याय ने भी जोगी परिवार का साथ छोड़ा तो उन्होंने भी कह दिया कि वे अमित के साथ काम नहीं कर सकते।

दूसरी तरफ, अजीत जोगी के अस्पताल में रहने के दौरान भी जोगी परिवार के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें लगाई जाती रही हैं। कांग्रेस के नेताओं को ज्यादा शिकायत अमित से ही रही है। यही वजह है कि जोगी पार्टी के कांग्रेस में विलय की चर्चा आई-गई वाली बात होकर रह गई। अब जब अमित ने सार्वजनिक रूप से खेद प्रकट कर दिया है, तो कांग्रेस में मौजूद जोगी के पुराने समर्थक भावुक दिख रहे हैं और निजी चर्चाओं में उन्हें कांग्रेस में लेने के पक्षधर हैं। ऐसे कांग्रेस नेताओं का मानना है कि जोगी परिवार को साथ लेने से कांग्रेस के जनाधार में वृद्धि होगी।

कुछ आलोचक दिवंगत पूर्व छात्रनेता और जोगी परिवार के करीबी रहे बालकृष्ण अग्रवाल को भी याद कर रहे हैं। बालकृष्ण के खिलाफ कई अपराधिक प्रकरण दर्ज थे। बाद में उन्होंने अखबारों में विज्ञापन छपवाकर पुराने कृत्यों के लिए माफी मांगी थी और यह भी कहा था कि वे अब सुधर चुके हैं। मगर बालकृष्ण के कारनामों का सिलसिला जारी रहा। उनके खिलाफ कई और आपराधिक प्रकरण दर्ज हुए। हालांकि अमित ने अपने पोस्ट में भावी राजनीतिक कदम को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उनकी टिप्पणी को पार्टी छोड़ चुके पुराने नेताओं को साथ लाने की कोशिशों के रूप में भी देखा जा रहा है। अमित के फेसबुक पोस्ट का मतलब चाहे कुछ भी हो, क्या अमित का नया रूप देखने को मिल सकता है ?

जोगी और अमन सिंह

दूसरी तरफ आज के इंडियन एक्सप्रेस में रमन सिंह के प्रमुख सचिव रहे अमन सिंह का एक लेख अजित जोगी पर छपा है जिसमें और बातों के अलावा उन्होंने लिखा है- मेरे उनके साथ अनोखे सम्बन्ध रहे. वे मेरे पिता को अच्छी तरह जानते थे, और हम दोनों भोपाल के एक ही कॉलेज से पढ़े थे. जब वे कोई काम करवाना चाहते थे, तो मुझे तीन वज़हें गिनाते थे कि वह काम मुझे क्यों करवाना ही है. वे कहते थे- तुम मेरे भतीजे हो, मैं तुम्हारा सीनियर हूँ, और जब जोगी सीएम बनेगा, अमन सिंह उसका सेक्रेटरी रहेगा।


12-Jun-2020 7:49 PM

कभी खाया है यह फल?

एक भूतपूर्व पत्रकार, और वर्तमान सामाजिक कार्यकर्ता पुरूषोत्तम सिंह ठाकुर सक्रिय पत्रकारिता से बाहर चले गए हैं, लेकिन पत्रकार उनके भीतर से बाहर नहीं जा पाया है। इसलिए वे लगातार फोटोग्राफी के साथ-साथ लिखने का काम भी करते हैं। अभी उन्होंने कुछ जंगली फलों की तस्वीरों को पोस्ट किया, तो शहरों में बसे लोगों को याद आया कि ये फल तो शहरों में मिलते नहीं, और गांव-जंगल में जाना अब होता नहीं है। एक फल, कुसुम की फोटो उन्होंने पोस्ट की और साथ में उसे पकाकर मसाले के साथ किस तरह खाया जाता है उसकी फोटो भी। एक जानकार ने उस पर लिखा कि इस फल में प्रोटीन, फैट, मिनरल, फाईबर, कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी, कैल्शियम, फास्फोरस, कितना-कितना होता है। अब जंगली फलों के ये आंकड़े भी पाना आसान नहीं है, लेकिन जाहिर तौर पर आदिवासी ज्ञान और समझ परंपरागत रूप से इन फलों के फायदों को जानते थे, और उनका इस्तेमाल करते थे। किसी ने इस पर पोस्ट किया कि कांकेर के आसपास ये फल अभी भी मिलते हैं। कुछ शहरियों को याद है कि ये खट्टा-मीठा होता है, और देखकर मुंह में पानी आ जाता है। जिन लोगों ने अब तक यह फल न चखा हो, वे अपना तजुर्बा और ज्ञान दोनों बढ़ा सकते हैं।

रिटायर्ड के बारी?

सरकार में फिर रिटायर्ड अफसरों का पुनर्वास हो सकता है। सूचना आयुक्त के एक खाली पद के लिए आवेदन तो ले लिए गए हैं, लेकिन नियुक्ति नहीं हो पाई है। इस पद के लिए कई रिटायर्ड अफसर होड़ में हैं। इनमें पूर्व एसीएस केडीपी राव भी शामिल हैं। इसी तरह पूर्व आईएएस आरपी जैन का कार्यकाल खत्म होने के बाद से विभागीय जांच आयुक्त का पद खाली है। जैन की नियुक्ति दो साल के लिए हुई थी, लेकिन कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें एक्सटेंशन मिलते रहा। कुछ माह पहले उनका कार्यकाल खत्म हुआ, तो फिर एक्सटेंशन के लिए फाइल चली। मगर सरकार ने इसमें रूचि नहीं दिखाई। विभागीय जांच आयुक्त पर के लिए दिलीप वासनिकर, निर्मल खाखा, नरेन्द्र शुक्ला सहित कई अन्य रिटायर्ड अफसरों के नामों की चर्चा है। सरकार फिलहाल कोरोना रोकथाम में लगी हुई है। इस वजह से इन रिक्त पदों को भरने में रूचि नहीं ले रही है। हालांकि इन पदों को भरने के लिए सिफारिशें काफी आ रही है। ऐसे में कुछ जानकारों का अंदाजा है कि कम से कम विभागीय जांच आयुक्त पद पर नियुक्ति हो सकती है।

20 के बाद कुछ हो सकता है...

अजीत जोगी के निधन के बाद जोगी पार्टी में हलचल है। पार्टी के कुछ नेता साथ छोडक़र कांग्रेस में चले गए हैं। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद भी जोगी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। लॉकडाउन के बीच दिवंगत पूर्व सीएम के अंतिम संस्कार के बाद की सारी रस्म अदायगी हो चुकी है। कंवर आदिवासी समाज की रीति-रिवाज के अनुसार अमित जोगी को पागा (पगड़ी) पहनाई गई और सामाजिक रूप से यह मान्यता दी गई कि अमित जोगी अब परिवार के मुखिया हैं।

दिलचस्प बात यह है कि दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के परिवार के सदस्यों बल्कि उनके समर्थकों ने भी दशगात्र के मौके पर मुंडन कराया। तमाम रस्म अदायगी के बाद जोगी परिवार के रूख की तरफ लोगों की नजरें हैं। फिलहाल जोगी परिवार के सदस्य किसी तरह की राजनीतिक टीका-टिप्पणी से बच रहे हैं।

सुनते हैं कि संभवत: 20 तारीख को रायपुर में पूर्व सीएम की आत्मा की शांति के लिए सर्वधर्म प्रार्थना सभा रखी गई है। इसके बाद जोगी परिवार का रूख साफ हो सकता है। मगर जोगी के निधन के बाद खाली मरवाही विधानसभा सीट में उपचुनाव को लेकर अभी से हलचल शुरू हो गई है। पूर्व सीएम के विधायक प्रतिनिधि रहे ज्ञानेन्द्र उपाध्याय, अमित जोगी के पगड़ी रस्म कार्यक्रम के अगले दिन ही कांग्रेस में शामिल हो गए। हालांकि ज्ञानेन्द्र का काफी विरोध हो रहा है। भाजपा के लोग भी सक्रिय हो गए हैं। लॉकडाउन के बावजूद मरवाही इलाके में सरगर्मी है। अमित जोगी का रूख साफ होने के बाद यहां राजनीतिक उठा-पटक तेज हो सकती है।


11-Jun-2020 7:20 PM

काम की जिम्मेदारी, और समझदारी?

छत्तीसगढ़ में महिलाओं की बहादुरी के किस्से गिनाने वाले लोग बाकी तमाम फिक्र परे रख देते हैं, और केवल बहादुरी का बखान करते हैं। अभी आज सुबह ही पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर ताम्रध्वज साहू ने बस्तर के कोंडागांव की अपने विभाग की एसडीओ श्रीमती पूर्णिमा चंद्रा की कई तस्वीरों के साथ उनकी तारीफ अपने फेसबुक पेज पर की है। उन्होंने लिखा है कि वे अपने डेढ़ बरस के बच्चे के साथ अतिसंवेदनशील पहुंचविहीन नवनिर्माणाधीन सडक़ का भीषण गर्मी में निरीक्षण कर रही हैं। उनका यह काम कर्तव्यनिष्ठा और दायित्व के प्रति उनके समर्पण को बताता है और वह अन्य अधिकारियों के लिए भी एक मिसाल है।

अफसर का मौके पर जाकर मुआयना करना अच्छी बात है, लेकिन जिस मौके पर भीषण गर्मी हों, और खुद मंत्री के मुताबिक यह अतिसंवेदनशील मार्ग हो, वहां पर दर्जन भर लोगों के बीच खुद भी बिना मास्क लगाए और कर्मचारियों-मजदूरों के भी बिना मास्क लगाए हुए, ऐसी गर्मी में बच्चे को लेकर जाना कर्तव्य से परे दूसरी जवाबदेही की बात भी है। अभी-अभी बस्तर के हथियारबंद मोर्चे पर एक कमांडो महिला की तारीफ का बखान सरकार ने किया था कि वह छह महीने की गर्भवती होने के बाद भी जंगल-जंगल नक्सल मोर्चे पर बंदूक लिए दौड़-भाग कर रही थी। अब इस महिला अधिकारी की तारीफ हो रही है। महिला और बाल विकास मंत्री को दखल देकर बच्चों की फिक्र करनी चाहिए क्योंकि तारीफ करने वाले पुरूष नेता-अफसर तो इस बारीकी को समझ नहीं पाएंगे।

शिवरतन पर बवाल

शिवरतन शर्मा एक टीवी डिबेट में कांग्रेस नेता के साथ आमने-सामने क्या हुए, पार्टी के भीतर विवाद खड़ा हो गया। दरअसल, कांग्रेस ने दो साल पहले सोनिया गांधी और भूपेश बघेल के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने पर शिवरतन शर्मा का बायकाट कर रखा है। बावजूद इसके उनके साथ डिबेट में कुछ नेता बैठे, जिस पर कुछ नेताओं को आपत्ति है।

वैसे तो शिवरतन शर्मा, कांग्रेस की सरकार बनते ही कई बार सीएम से मिल चुके हैं, और चर्चा है कि वे अपनी गलतियों के लिए खेद भी प्रकट कर चुके हैं। शिवरतन के एक भतीजे को राशन घोटाले के चलते तीन माह जेल में भी रहना पड़ा था। इन सब वजहों से वे आक्रामक बयानबाजी से बचते हैं। उन्होंने भाजपा के मीडिया विभाग को उनके नाम से आपत्तिजनक बयानबाजी न करने की सख्त हिदायत भी दे रखी है।  इतना सब कुछ होने के बाद भी कांग्रेस नेता भूलने के लिए तैयार नहीं है।

एक कांग्रेस नेता ने इस मामले को लेकर पार्टी संगठन के कुछ प्रमुख नेताओं के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका तर्क है कि शिवरतन ने सार्वजनिक तौर पर माफी नहीं मांगी है, तो उनका बायकाट वापस क्यों लिया गया। आपत्ति करने वाले नेता को कौन समझाए, कि बंद कमरे में सबकुछ हो चुका है। इसलिए खुले तौर पर हर बात कहना जरूरी नहीं है। वैसे भी पार्टी सत्ता में है, ऐसे में थोड़ा उदार रूख अपनाना चाहिए।

भाजपा टीम में कौन?

भाजपाध्यक्ष विष्णुदेव साय जल्द से जल्द अपनी टीम बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं। उन्होंने पार्टी के सीनियर नेता रामप्रताप सिंह से बंद कमरे में करीब एक घंटे तक चर्चा की। सुनते हैं कि रामप्रताप सिंह अपने करीबी पूर्व विधायक निर्मल सिन्हा को महामंत्री के पद पर देखना चाहते हैं। जबकि कई नेता इससे सहमत नहीं हैं। पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और अन्य प्रमुख नेता, राजेश मूणत को महामंत्री बनाना चाहते हैं। मूणत की छवि तेज तर्रार नेता की है, और चूंकि साय सीधे-साधे नेता हैं। इसलिए महामंत्री का दायित्व तेज तर्रार नेता को सौंपने की कोशिश हो रही है।

दूसरी तरफ, दिल्ली में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा भी जल्द अपनी कार्यकारिणी घोषित कर सकते हैं। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रमन सिंह और सरोज पाण्डेय को अहम जिम्मेदारी मिलना तय माना जा रहा है। राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिलने की चर्चा है। नड्डा प्रदेश के प्रभारी रह चुके हैं। वे यहां के सभी नेताओं और उनकी कार्यशैली से परिचित हैं। पार्टी हल्कों में चर्चा है कि अजय चंद्राकर को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिल सकती है। इससे परे बृजमोहन अग्रवाल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय, नारायण चंदेल सहित कई और नामों की चर्चा है। जानकारों का अंदाजा है कि गुटीय संतुलन बनाए रखने के लिए रमन सिंह विरोधी खेमे के कुछ नेताओं को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिल सकती है।

इशारे-इशारे में नसीहत

इन दिनों इंटरनेट और सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोग संकेतों में अधिक बात करने लगे हैं। कुछ चीजों पर पहले भी ऐसा होता था, जब एक गधे की फोटो बनाकर लिख दिया जाता था- पेशाब कर रहा है।

अब अभी रायपुर शहर की दीवार पर उसी अंदाज की एक नई वॉल राइटिंग सामने आई है जो बता रही है कि इंसानों के लिए शौचालय क्यों जरूरी है।