राजपथ - जनपथ

05-Sep-2021 5:37 PM (312)

लेह की चोटी पर छत्तीसगढ़ पुलिस

बर्फीले पठारी लेह की चोटी पर चौकस रहते शहीद हुए पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों को नमन करने आयोजित हॉट-स्प्रिंग में छत्तीसगढ़ पुलिस की ओर से माल्यार्पण आईपीएस जितेन्द्र शुक्ल ने किया। 3 सितंबर को भारत-चीन की सरहद में भारतीय सेना के गौरव माने जाने वाले सपूतों की याद में केंद्रीय बल और राज्यों के पुलिस अधिकारियों ने साझा सलामी दी। हॉट-स्प्रिंग के लिए केंद्र सरकार की एक विशेष टीम की निगरानी में देश भर से जोशीले और काबिल अफसरों को हर साल चुना जाता है। राज्य पुलिस के लिए शुक्ल पहले आईपीएस के तौर सलामी देने चोटी पर पहुंचे। सुनते हैं कि आयोजन का मकसद यह है कि दुश्मन देशों को मुकाबले में मात देने सुरक्षा दस्तों में जोश भी बनाए रखना है। चीन की फौजी कार्रवाई का जवाब देने के लिए जोश खरोश से भरे सिपाहियों को सीमा पर तैनात रहने के लिए आयोजन से संदेश भी मिलता है। वैसे हॉट-स्प्रिंग का अर्थ गरम चश्मा होता है, जिसमें भूताप से गरम हुआ भूजल धरती से बाहर निकलता है। बर्फ से लदे पठारों में यह पाया जाता है।

अफसरों में इधर-उधर

मंत्रालय में कुछ सचिव स्तर के अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है। उमेश अग्रवाल के राजस्व मंडल में पोस्टिंग के बाद गृह सचिव का पद खाली है। इसी तरह कृषि सचिव डॉ. एम गीता को दिल्ली में आवासीय आयुक्त बनाया जा सकता है। डॉ. गीता ने स्वास्थ्यगत कारणों से केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन दिया था। चूंकि वहां पोस्टिंग में समय लग सकता है। इसलिए उन्हें कृषि विभाग के प्रभार से मुक्त कर दिल्ली में आवासीय आयुक्त का प्रभार दिया जा सकता है।

वर्तमान में प्रमुख सचिव (उद्योग) मनोज पिंगुआ, आवासीय आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। चर्चा है कि रजत कुमार की पोस्टिंग मंत्रालय में हो सकती है। हालांकि वो अभी जनगणना निदेशक के प्रभार से मुक्त नहीं हुए हैं। कहा जा रहा है कि जल्द ही उन्हें जिम्मेदारी दी जा सकती है। जिलों में फिलहाल ठीक चल रहा है। इस वजह से कलेक्टरों को बदले जाने की संभावना नहीं है। इन सबके बावजूद प्रमुख सचिव, सचिव, और विशेष सचिव स्तर के आधा दर्जन अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं।

खरीदी में एफआईआर के निर्देश

अंबेडकर में कैंसर की जांच के लिए पैट मशीन की खरीदी में भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट में कहा गया कि वित्त विभाग की मंजूरी के बिना ही 18 करोड़ की मशीन खरीद ली गई। प्रमुख सचिव ने डीएमई को पैट मशीन खरीदी मामले में एफआईआर कराने के निर्देश दिए हैं।

अंदर की खबर यह है कि रमन सरकार में मशीन खरीदी का फैसला ‘ऊपर’  से हुआ था। मगर फाइल पर विभाग के मुखिया के दस्तखत नहीं हैं। चर्चा यह है कि मुश्किल में फंसने का अंदेशा पहले से था। लिहाजा छोटे अधिकारी-चिकित्सकों का दस्तखत लेकर फाइल तैयार की गई, और खरीदी हो गई। ये अलग बात है कि खरीदी के एवज में ज्यादा माल ‘ऊपर’ ही पहुंचा था। अब जब एफआईआर की बात हो रही है, तो छोटे अधिकारी-चिकित्सक परेशान हैं।

नसीहत मीडिया में लीक हो गई

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष ने जगदलपुर के चिंतन शिविर में इस बात पर नाराजगी जताई थी कि बैठक की महत्वपूर्ण जानकारियां लीक हो जाती है। यह छत्तीसगढ़ के भाजपा में रोग हैं। उन्होंने नसीहत दी कि बातें बाहर नहीं जानी चाहिए। कुछ सीनियर नेताओं को इसलिए भी नहीं बुलाया गया था कि उनके कांग्रेस के प्रभावशाली लोगों से नजदीकी रिश्ते हैं। मगर संतोष की पार्टी नेताओं को दी गई नसीहत मीडिया में लीक हो गई।

कम्प्यूटर पर देख-समझकर

अंग्रेजी हो या हिंदी हो जब कम्प्यूटर के हवाले हिज्जे सुधारने का काम कर दिया जाए तो कम्प्यूटर बड़ी बर्बादी भी कर सकता है. अब आज ही सुबह एक व्यंग्य में ‘दुष्टों’ शब्द को कम्प्यूटर ‘दोस्तों’ टाइप करने पर आमादा हो गया था। और जब इस हादसे को मोबाइल फोन पर बोलकर हिंदी में टाइप किया जा रहा है तो तीन बार ‘दुष्टों’ बोलने पर भी वह तीनों बार ‘दोस्तों’ टाइप कर रहा है. अब इससे पता नहीं कैसे-कैसे संबंध खराब हो सकते हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, एक दूसरे लिखे हुए को ईमेल करते हुए जब जीमेल के सुझाए हुए करेक्शन करने की कोशिश की गई तो उसने ‘राजनैतिक’ को ‘राजनीतिक’ सुधार दिया, जाहिर है कि राजनीति में नैतिकता तो कोई बची नहीं है, इसलिए कम्प्यूटर किसी भी पार्टी के बारे में ‘राजनैतिक’  शब्द को ‘राजनीतिक’  शब्द कर देता है। लेकिन अगर ऑटो करेक्ट को ध्यान से ना देखा जाए तो वह कई शब्दों को गालियां भी बना देता है।


04-Sep-2021 6:06 PM (284)

कुदरत ने क्या पेड़ों को बदशक्ल बनाया है?

शहरों में तो म्युनिसिपल और अब उससे भी ऊपर स्मार्ट सिटी के नाम पर होने वाले अंधाधुंध खर्च का रास्ता निकालने के लिए अब अफसर पेड़ों के तनों को रंगवाने लगे हैं मानो कुदरत ने उनके तनों को बदशक्ल बनाया है और उन्हें खूबसूरत बनाने की जिम्मेदारी म्युनिसिपल की है। नतीजा यह है कि रंग-पेंट का रसायन पेड़ों के तनों से भीतर जा रहा है और कहीं कहीं पर पेड़ मर भी रहे हैं। कुछ दिन पहले रायपुर के पर्यावरणप्रेमी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को एक चि_ी लिखकर मरने वाले पेड़ों की तस्वीरों सहित आपत्ति दर्ज कराई थी कि पेड़ों के जीवन के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उन्होंने यह भी लिखा था कि राजधानी के गांधी उद्यान में अशोक के दो पेड़ ऐसे पेंट लगाकर सौंदर्यीकरण करने के बाद मर गए। उन्होंने शिकायत में यह भी लिखा था कि ऐसी खबरें छपी हैं कि भिलाई में पेड़ों पर पेंट करने में 38 लाख रुपए खर्च किए गए। अब मानो शहरों में पेड़ों की बर्बादी काफी न हो, इसलिए शहरों के बाहर भी ऐसा काम किया जा रहा है।

फेसबुक पर एक बैंक अधिकारी स्मिता ने तस्वीरें पोस्ट की हैं कि किस तरह रायपुर से सिरपुर के रास्ते पर हरे भरे पेड़ों के तनों पर बुद्ध बना दिए जा रहे हैं। इतिहास में सिरपुर एक बड़ा बौद्ध केंद्र था. लेकिन वहां के रास्ते में पेड़ों पर ऐसा रसायन पता नहीं उनका क्या नुकसान करेगा। यह काम पर्यटन विभाग ने किया है या किसी और विभाग ने, लेकिन तस्वीरों को देखने वाले लोग तस्वीरों की तारीफ कर रहे हैं. यह समझ लोगों में अभी आई नहीं है कि पेड़ों की अपनी खूबसूरती होती है, उन्हें रंग-रोगन की जरूरत नहीं होती है। और प्रदूषण निवारण मंडल तो सरकार के फैसलों पर कह भी क्या सकता है।

क्या आप बंदरों से परेशान हैं?

छत्तीसगढ़ के वनों में हाथियों की मौजूदगी की तरह ही शहरों में रहने वाले लोग बंदरों से परेशान होते हैं। इनका ठिकाना भी जंगल ही होता है, पर जब आहार की दिक्कत खड़ी होती है तो वे रिहायशी इलाकों का रुख करते हैं। दिल्ली के सचिवालय में तो बकायदा वन विभाग की टीम स्थायी रूप से बंदरों पर नियंत्रण के लिए तैनात है। अपने यहां जब बंदर छतों और आंगन में पहुंचते हैं तब उनसे निपटने का तरीका बंदर और मनुष्य दोनों के लिये खतरनाक होता है। ज्यादातर लोगों को पता नहीं है कि बंदरों पर काबू पाने के लिए वे वन विभाग की मदद ले सकते हैं। इस बात की याद दिलाने के लिए वन विभाग ने एक आम सूचना निकाली है। यदि बंदरों के उत्पात से कोई परेशान है तो वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों को खबर कर सकते हैं। पर, इसके लिए एक निर्धारित प्रारूप में आवेदन देना होगा। अपना नाम-पता तो इसमें लिखना ही होगा, पर यह भी बताना है कि बंदर दिन में कितनी बार आते हैं, वे काले मुंह के है या लाल मुंह के। आने वाले बंदरों की संख्या कितनी रहती है। कब से वह आपके इलाके में मंडरा रहे हैं। क्या बीते कुछ सालों के भीतर उनकी प्रकृति में कोई परिवर्तन आया है, क्या यह बंदर आक्रामक हैं? क्या बंदर ने किसी को काटा है यदि हां तो कौन-कौन सी घटनाएं हुई हैं? काटने की कम से कम एक घटना का विस्तार से ब्यौरा भी देना है।

अब इतनी सारी जानकारी अगर आप हासिल कर सकें तो यह तय मानिए कि आपकी बंदरों से दोस्ती हो जायेगी और वन विभाग से शिकायत करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

90 विधायकों से मिलने निकल पड़े...

खैरागढ़ ब्लॉक के भीम पुरी निवासी चंद्रशेखर राजपूत का मामला उदाहरण है कि गांव में दबंगों की सरकार चलती है और स्थानीय प्रशासन भी उनके आगे नतमस्तक होता है। चंद्रशेखर को गांव से इसलिए बहिष्कृत कर दिया गया क्योंकि उसने 150 रुपये चंदा देने से मना कर दिया। हुक्का-पानी बंद होने के बाद उसने थाने, तहसील और एसडीएम दफ्तर में शिकायत की, मगर कोई नतीजा नहीं निकला।  तब उसने तय कर लिया कि वह साइकिल यात्रा करके प्रदेश के सभी विधायकों के पास पहुंचेंगे और फरियाद करेंगे। अभी करीब 15 दिन ही उसे गांव से निकले हुए हैं। वह बस्तर से लेकर सरगुजा तक साइकिल से पहुंचना चाहते हैं। अब तक वे पूर्व विधायक डॉ रमन सिंह, विधायक देवव्रत सिंह, मंत्री रविंद्र चौबे सहित 8 लोगों से मुलाकात कर चुके हैं और सबको अपनी तकलीफ बता चुके हैं। चंद्रशेखर को लगता है कि जो अधिकारी उन्हें न्याय दिलाने में रुचि नहीं ले रहे हैं वे इन विधायकों की सिफारिश पर काम जरूर करेंगे और उसे वापस गांव वाले मिल-जुल कर रहने की मंजूरी देंगे। अच्छा होगा कोई जनप्रतिनिधि संवेदना के साथ उसकी बात सुने और काम कर दे, जिससे चंद्रशेखर बीच रास्ते से लौट जाये। एक छोर से दूसरे छोर तक विधायकों तक पहुंचने का कष्ट न उठाना पड़े।

भीड़ में भी वैक्सीन जरूरी नहीं

गणेश उत्सव के लिए जारी गाइडलाइन पिछले साल की कॉपी पेस्ट है। तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए पिछली बार की तरह मूर्ति की ऊंचाई, चौड़ाई, पंडाल का आकार, सबका नाम पता मोबाइल नंबर लिखना,  20 से अधिक लोगों का इक_ा ना होना, जैसे कई नियम जो पिछली बार भी लागू किए गए थे, इस बार भी प्रभावी रहेंगे। फर्क यह है कि तब पहली लहर में वैक्सीन नहीं आये थे। और अब बड़ी संख्या में लोगों ने कोविड-19 से बचाव के टीके लगवा लिए हैं। यह बात कुछ हैरान कर सकती है कि विभिन्न जिलों से जो गाइडलाइन जारी हुए हैं उनमें इस बात का कोई जिक्र नहीं है। गाइडलाइन में यह जोड़ा जा सकता था कि इन सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहुंचने और आयोजन की इजाजत उनको ही रहेगी, जो टीके लगवा चुके हैं। स्कूल खुलने के चलते आखिर शिक्षकों को टीके लगवाने कहा ही गया है। ऐसे वक्त में जब कोरोना के केस कम हो जाने के कारण बहुत से लोग वैक्सीन लगवाने में रुचि नहीं ले रहे हैं, इस उत्सव का प्रशासन वैक्सीनेशन बढ़ाने में इस्तेमाल क्यों नहीं कर लेता?

जहां मौका मिलता है दुकान सजा लेते हैं !

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पार्टी प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी और उसे फेसबुक पर लाइव दिखाया जा रहा था। अब लोग भी होशियार हो गए हैं जब उन्हें सरकार कहीं दिखती है तो वे सरकार से तरह-तरह की मांग करने लगते हैं। मुख्यमंत्री और उनके मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे और नीचे लोग सरकार से तरह-तरह की मांग कर रहे थे। इस बीच किसी ज्योतिषी/तांत्रिक को भी अपना कारोबार चलाने का रास्ता दिखा, तो उसने भी वहां पर वशीकरण मंत्र जैसी कई बातों को लिखना शुरु कर दिया अपना फोन नंबर डालना शुरू कर दिया और हर तरह की दिक्कत दूर करने का झांसा देने लगा। और तो और एक किसी लडक़ी या महिला ने उसके साथ लाइव वीडियो कॉल का मजा लेने के लिए एक व्हाट्सएप नंबर भी पोस्ट कर दिया गया। लोग भी खूब रहते हैं, जहां मौका मिलता है दुकान सजा लेते हैं !


03-Sep-2021 5:44 PM (441)

भाजपा के भीतर भारत-पाक जैसा झगड़ा

शदाणी दरबार के प्रमुख युधिष्ठिर लाल के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना भाजपा के तीन नेताओं को महंगा पड़ गया। सिंधी समाज के दबाव में पुलिस ने शिवजलम दुबे, और राजीव चक्रवर्ती को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। प्रकरण के एक अन्य आरोपी विजय जयसिंघानी फरार हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे प्रकरण को लेकर भाजपा दो गुटों में बंट गई है।

गिरफ्तारी से खफा भाजपा नेता दबी जुबान में यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि शहर जिला भाजपा अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी के दबाव की वजह से इन तीनों के खिलाफ प्रकरण दर्ज हुआ है। ये तीनों नेता पूर्व अध्यक्ष राजीव अग्रवाल के करीबी माने जाते हैं। हुआ यूं कि युधिष्ठिर लाल का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें पाकिस्तान के राष्ट्रगान के दौरान वो बाकियों के साथ खड़े दिख रहे हैं।

युधिष्ठिर लाल का पाकिस्तान आते-जाते हैं। शदाणी दरबार के अनुयायी पाकिस्तान में भी हैं, और वहां दरबार भी है। मगर उत्साही भाजपा नेताओं ने वीडियो परखे बिना यह टिप्पणी कर दी कि भारत में पाकिस्तान का राष्ट्रगान गाया जा रहा है। इसके बाद युधिष्ठिर लाल को काफी भला बुरा कहा गया। ये सही है कि पाकिस्तान के राष्ट्रगान के दौरान युधिष्ठिर लाल खड़े थे, लेकिन वो उस समय पाकिस्तान के एक कार्यक्रम में थे जहां राष्ट्रगान चल रहा था। ऐसे में वहां के राष्ट्रगान का सम्मान करना उनका, और हर किसी का दायित्व बनता है। मगर पाकिस्तान के विरोध में हमेशा आग उगलने वाले ये भाजपा नेता यहां गलती कर गए।

गिरफ्तार भाजपा नेताओं से जुड़े लोगों का तर्क है कि इस प्रकरण को आपस में बातचीत कर निपटाया जा सकता था। शिवजलम पार्षद चुनाव लड़ चुके हैं, और वे श्रम प्रकोष्ठ के प्रदेश पदाधिकारी भी रहे हैं। राजीव चक्रवर्ती पार्टी के पदाधिकारी हैं। तीनों ने माफी भी मांग ली थी।  मगर श्रीचंद, और उनसे जुड़े लोगों के दबाव की वजह से गिरफ्तारी हुई है। यानी इस पूरे मामले को पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी से जोडक़र देखा जा रहा है। चाहे कुछ भी हो, इन नेताओं की गिरफ्तारी से पार्टी के भीतर झगड़ा बढऩे के आसार हैं।

सांत्वना पुरस्कार

जगदलपुर के एक होटल में भाजपा का दो दिन का चिंतन शिविर खत्म हो गया। कई नेता शिविर में जगह पाने के लिए काफी बेचैन थे। इनमें से बालोद के एक नेता तो जगदलपुर भी पहुंच गए। स्वाभाविक है कि आमंत्रण नहीं था, तो शिविर में अंदर जा नहीं सकते थे। वो होटल के लॉन में बैठे रहे। और जब शिविर खत्म हुआ, तो कुछ प्रमुख नेताओं से मुलाकात कर शिविर में नहीं बुलाए जाने का अपना दर्द बयां किया।

एक पूर्व मंत्री ने नेताजी की मायूसी को दूर करने के लिए तरकीब निकाली, उन्होंने अपना ब्रोशर नेताजी को थमा दिया। और फिर प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी के साथ नेताजी की फोटो खिंचवाई। यह फोटो सोशल मीडिया में वायरल किया गया। कौन-कौन शिविर में थे, इसका नाम सार्वजनिक तो हुआ नहीं है। लेकिन ब्रोशर हाथ में लिए पुरंदेश्वरी के साथ तस्वीर वायरल होने से नेताजी की बालोद में पूछपरख बढ़ गई है।

अमरकंटक से छत्तीसगढ़ का रिश्ता

सन 2000 में जब छत्तीसगढ़ राज्य बना तब केवल अमरकंटक की नहीं बल्कि पूरे शहडोल जिले को छत्तीसगढ़ में शामिल करने की मांग उठी थी। इसके लिए वहां एक संघर्ष समिति बनाकर आंदोलन भी किया गया था। पर एक बार अधिसूचना जारी होने के बाद उसमें बदलाव नहीं हो सका। शहडोल अब संभाग बन चुका है और अमरकंटक के दोनों छोर पर अनूपपुर और डिंडोरी जिले बन चुके हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अमरकंटक प्रवास के दौरान पत्रकारों ने उनसे सवाल किया क्या आप अमरकंटक के विकास से संतुष्ट हैं मुख्यमंत्री ने कहा कि वे आध्यात्मिक यात्रा पर है और राजनीतिक बातें नहीं करेंगे लेकिन इतना जरूर कहना चाहेंगे कि यदि अमरकंटक छत्तीसगढ़ में होता तो हम नर्मदा मैया की ज्यादा अच्छी तरह से सेवा कर पाते। एक तरह से सीएम की यह बात छत्तीसगढ़ के लोगों की ही भावना है।

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी का शहडोल, खासकर अमरकंटक से विशेष लगाव रहा। वे यहां कलेक्टर भी रहे और बाद में लोकसभा चुनाव भी लड़ा। बाबा कल्याण दास आश्रम के लिए जगह का आवंटन के कलेक्टर रहने के दौरान ही हुआ था। शहडोल चुनाव अजीत जोगी हार गए थे और उसी के बाद छत्तीसगढ़ राज्य का गठन भी हुआ। कई लोग मानते हैं यदि वे शहडोल का चुनाव जीत गए होते तो शायद छत्तीसगढ़ की राजनीति में नहीं आते, न ही मुख्यमंत्री बन पाते। उन्होंने अमरकंटक को छत्तीसगढ़ में शामिल कराने के लिये बहुत प्रयास किये।

अमरकंटक की तराई में सीमा को लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच कई बार विवाद भी उठता रहा है। भाजपा शासनकाल के दौरान तब के पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने घोषणा की थी कि हम छत्तीसगढ़ के हिस्से को अमरकंटक की तरह ही आकर्षक पर्यटन स्थल का रूप देंगे। हालांकि अब भी क्षेत्र विकास की राह देख रहा है। अमरकंटक पहुंचने की दोनों सडक़ें जर्जर हो चुकी हैं। बृजमोहन के कार्यकाल में करोड़ों रुपये खर्च किये गये पर अधिकांश काम अधूरे पड़े हैं। मुख्यमंत्री ने राजमेरगढ़ का दौरा करके इसे विकसित करने की अभी घोषणा की है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के निर्देश पर अमरकंटक विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण गठन सन् 2016 में किया गया था। इसमें छत्तीसगढ़ के भी कई गांव शामिल किये गये हैं। फिलहाल इसी प्राधिकरण को सक्रिय करके अमरकंटक की तराई के छत्तीसगढ़ वाले हिस्से को संवारा जा सकता है।

टेंडर के लिये फर्जी अखबार...

कुछ लोगों को हैरानी हो सकती है की अखबार भी फर्जी छापे जाते हैं। ऐसा टेंडर के फर्जी प्रकाशन के लिए होता है। दरअसल, किसी भी विभाग को टेंडर कम से कम 2 अखबारों में प्रकाशित कराने की बाध्यता है। अधिकारी चोरी छिपे ठेका न दें, देखते हुए राज्य शासन के जनसंपर्क विभाग को इसका दायित्व दिया गया है। टेंडर निकालने के लिये संबंधित अधिकारी इसी विभाग को पत्र लिखेंगे। प्रकाशन का उद्देश्य यह है कि काम चाहने वाले हरेक व्यक्ति को सूचना मिले और वह स्पर्धा में भाग ले सके। पर ऐसा करने से अधिकारियों को अपनी जेब भरने का मौका नहीं मिलता। वे अपने चहेते ठेकेदारों को काम नहीं दिला पाते। इसके चलते किसी प्रिंटिंग प्रेस को पकडक़र नकली अखबार और उसके भीतर टेंडर के फर्जी विज्ञापन छपवा लिये जाते हैं। ये फर्जी अखबार बांटे नहीं जाते, सिर्फ फाइल में नस्ती करने के काम आता है।


02-Sep-2021 7:17 PM (338)

अफसरों के किस्से अपरंपार

जब अफसरों के किस्से निकलते हैं तो बड़ी दिलचस्प और चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ राज्य तक काम करने वाले एक आला अफसर का हाल यह था कि रायपुर से भोपाल जाने-आने के लिए जब टिकट करवानी रहती थी, तो वे कई अलग-अलग मातहत अफसरों को टिकट करवाने के लिए कह देते थे, और सरकारी खर्च पर तो टिकट बनती ही थी। इसके बाद वह एक टिकट छोडक़र बाकी टिकट कैंसिल करवा लेते थे और उसमें पैसा बच जाता था। रायपुर से भोपाल आते-जाते रास्ते में जितने स्टेशन मध्य प्रदेश के पड़ते थे, वहां पर विभाग के अफसरों से खाने-पीने का ऐसा सूखा सामान बुलवा लेते थे जो कि भोपाल पहुंचकर वापस रायपुर आने तक भी खराब ना हो और फिर हफ्ता भर उसमें काम चल जाए। तो हर स्टेशन पर ऐसा सूखा सामान पहुंचते रहता था।

ऐसे कई तरह के किस्से बहुत से अफसरों के बारे में रहते हैं। जो अक्सर छोटी-छोटी भी रिश्वत ले लेते हैं, उन्हें सरकारी जुबान में कहीं अधिक हिकारत से बुलाया जाता है और चिंदी चोर कहा जाता है कि वह तो पांच-पांच हजार भी ले लेता है. मानो सस्ते में काम निपटाने वाला बुरा इंसान हो गया, और लोगों को निचोडक़र अधिक पैसा वसूलने वाले अफसर बेहतर इंसान हो गए। सरकारी जुबान में जब किसी की भी चर्चा होती है, तो कम पैसे लेने वालों को बहुत ही गंदी नजरों से देखा जाता है, उसकी एक वजह शायद यह भी रहती है कि ऐसे लोग सरकारी काम का रेट बिगाड़ जाते हैं।

प्रदेश को मिला बाघों का नया ठिकाना

10 साल से भी अधिक लंबी प्रक्रिया के बाद आखिरकार कोरिया जिले के सोनहत ब्लाक में स्थित गुरु घासीदास नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया गया है। सन् 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने सबसे पहले इस नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था जिस पर तत्कालीन मंत्री जयराम रमेश ने सहमति भी जताई थी। अब जाकर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण एनटीसीए की तकनीकी समिति ने इसकी मंजूरी दी है। छत्तीसगढ़ में अब 4 टाइगर रिजर्व हो गये हैं। यहां पहले से इंद्रावती, सीतानदी-उदंती और अचानकमार टाइगर रिजर्व हैं।

टाइगर रिजर्व के बनने के बाद बाघों के मूवमेंट के लिए एक कॉरिडोर तैयार हो जाएगा जो अचानकमार से कोरिया और बांधवगढ़ होते हुए पलामू तक जाएगा। इससे बाघों की वंश वृद्धि में मदद मिलेगी, जिसका वनों के संरक्षण में खास भूमिका है। मध्यप्रदेश जिसे टाइगर स्टेट कहा जाता है उसके साथ जुडऩे के अब दो रास्ते छत्तीसगढ़ को मिल गए हैं। अचानकमार टाइगर रिजर्व का एक सिरा पहले से ही कान्हा नेशनल पार्क से जुड़ा हुआ है।

यह भी खास है कि मध्यप्रदेश में इस समय अफ्रीका से चीतों को लाने की तैयारी हो रही है। चीते इस देश से विलुप्त हो चुके हैं। मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के कूनो पालपुर नेशनल पार्क में अफ्रीका से चीते लाकर नवंबर में छोड़ जाएंगे। ऐसे में यदि छत्तीसगढ़ में चीते की आमद भी हो सकती है।

किसानों के गोबर की बंदरबांट

छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी नरवा-गरुवा घुरवा-बाड़ी योजना जनपद और पंचायतों के अधिकारियों कर्मचारियों के लिए इस तरह से अवैध कमाई का जरिया बन चुकी है इसकी बानगी नवागढ़ ब्लाक के खोखरा गौठान से निकल कर आ रही है।

गौ पालक किसानों की शिकायत है कि खोखरा गौठान में जब वे गोबर लेकर जाते हैं तो रजिस्टर में उसकी मात्रा 30 किलो घटाकर दर्ज की जाती है। जब गौठान समिति से पूछा गया तो उन्होंने पंचायत सचिव का नाम लिया। पंचायत सचिव ने बताया कि जनपद के सीईओ के कहने पर ऐसा किया जा रहा है। सीओ का कहना है कि उसने तो ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। यदि यह बात सही है तो सीईओ को तुरंत गोबर हड़पने वालों के खिलाफ एक्शन लेना चाहिये था। मगर, सोशल मीडिया और वेब पोर्टल पर जब स्थानीय पत्रकारों ने यह खबर चला दी तो उल्टे सीईओ ने खबर छापने वाले पत्रकार को ही एफआईआर  की धमकी दे डाली। यह सब तब हो रहा है जब गौठान समितियों में और जनपद पंचायत में कांग्रेस का ही कब्जा है।

कम से कम मदिराप्रेमियों की सुन लो...

शराब दुकानों को हटाने को लेकर तीन चार साल पहले आंदोलन होते थे तो प्रशासन अपनी बात सही ठहराने के लिये यह तर्क देता था कि ग्रामीणों की भीड़ तो ठेकेदारों की आपसी प्रतिद्वंदिता की वजह से इक_े कराई गई है। पर अब तो सब ठेके सरकारी हैं, फिर भी प्रशासन शराब दुकानों को हटाने के सवाल को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेता है। धमतरी जिले में आबकारी विभाग ने अधारी नवागांव की शराब दुकान सोरिद भाट में शिफ्ट करते हुए एक किसान की खेत में खोल दी गई है। यहां खेतों में काम करने के लिए महिलाएं गुजरती हैं। पास में ही एक मंदिर भी है। लोगों ने आंदोलन शुरू कर दिया है कि इसे हटाया जाए। हद तो यह है कि पास में ही हाई स्कूल भी है। इस डर से कि बच्चों के साथ कोई अनहोनी ना हो स्कूल को भी बंद कर दिया गया है। सैकड़ों लोग जाकर प्रदर्शन कर चुके हैं कलेक्ट्रेट में बरसते पानी के बीच। इनमें महिलाएं बड़ी संख्या में थीं। पर प्रशासन नहीं सुन रहा है।

अब थक हार कर लोगों ने शराबियों को ही समझाने की कोशिश शुरू की है। कल से एक नए तरीके से आंदोलन शुरू कर दिया गया है। शराब खरीदने के लिए दुकान पहुंचने वाले लोगों को चंदन, बंदन तिलक लगाया जा रहा है और उनसे भी समर्थन मांगा जा रहा है। शराब खरीदने वालों कहना है, भैया दुकान कहीं भी खोलें क्या फर्क पड़ता है। जहां बिकेगी वहीं से खरीद लेंगे। हम आपके साथ हैं। प्रशासन आंदोलन कर रहे लोगों की भले न सुन रहा हो, राजस्व देने वाले मदिरा प्रेमियों की बात पर तो गौर करना चाहिये।


01-Sep-2021 5:24 PM (339)

बस्तर में राहुल की तैयारी

राहुल गांधी कब आएंगे, ये अभी तय नहीं है। मगर उनके प्रस्तावित बस्तर दौरे की तैयारी शुरू हो गई है। इस सिलसिले में सीएम भूपेश बघेल ने सरकार के मंत्रियों, और बस्तर के विधायकों के साथ बैठक भी की है। केन्द्र सरकार ने एसपीजी सुरक्षा हटा दी है। इसलिए राहुल की सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था  सरकार को ही करनी होगी। नक्सल प्रभावित बस्तर उनके प्रवास को लेकर टेंशन भी है। सरकार के रणनीतिकार राहुल के प्रवास को सरकार के कामकाज को दिखाने के मौके के रूप में देख रहे हैं।

बैठक में यह बात उभरकर आई है कि धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में 6 सौ स्कूल बंद हो गए थे, लेकिन भूपेश सरकार के आने के बाद आधे से अधिक स्कूल खुल गए हैं। यही नहीं, आंध्रप्रदेश की सीमा से सटे गांव क्रिस्टाराम में स्कूल के साथ-साथ आंगनबाड़ी केन्द्र भी अच्छी तरह से चल रहे हैं। बीजापुर जिले में तो किसानों ने दो साल में 4 सौ ट्रेक्टर खरीदे हैं। यानी तेंदूपत्ता की खरीदी दर में बढ़ोतरी, लघु वनोपज की सरकारी खरीद सहित अन्य  योजनाओं का आदिवासियों को भारी लाभ हुआ है। कुल मिलाकर बस्तर में राहुल को इंप्रेस करने के लिए बहुत कुछ है।

गोबर हिट हो गया !

गोबर खरीदी योजना को लेकर भाजपा भूपेश सरकार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूकती है। मगर भाजपा शासित राज्यों में भी गोबर खरीदी योजना शुरू हो रही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने तो छत्तीसगढ़ की देखा-देखी दो रुपए किलो की दर से गोबर खरीदी का फैसला लिया है। मध्यप्रदेश सरकार भी इस दिशा में कदम उठाने जा रही है। और तो और पिछले दिनों गुजरात के विधायकों के एक प्रतिनिधि मंडल विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आए थे। उन्होंने गौठान योजना के क्रियान्वयन की जानकारी ली, और सीएम-कृषि मंत्री से मिलकर इसकी तारीफ की। ऐसे में सरकार के लोगों का खुश होना लाजिमी है।

क्या नहीं मिल पायेंगी सस्ती दवा?

नगर निगम रायपुर ने सभी दस जोन में सस्ती जेनेरिक दवा दुकान खोलने की योजना बनाई है। हर साल इन दुकानों से करोड़ों रुपयों का टर्न ओवर हो सकता है पर किसी भी कम्पनी ने टेंडर में भाग नहीं लिया। अब दुबारा फिर टेंडर निकालने की योजना बन रही है। पहले टेंडर में तय कर दिया गया था कि जेनेरिक दवा बनाने वाली कौन-कौन सी कंपनियां हैं, जिनसे खरीदी की जानी है। ऐसा करने की जरूरत भी थी, क्योंकि जेनेरिक के नाम पर गुणवत्ताविहीन दवायें न बेची जाये। अब देखना है कि दूसरे टेंडर में शर्तों में किस तरह बदलाव किया जायेगा ताकि लोग रुचि दिखायें।

नगर निगम की योजना शहर में डायग्नोसिस सेंटर्स खोलने की है। जब पहली बार मशीनों के मॉडल को लेकर आपत्ति आई तो दूसरी बार के टेंडर में बदलाव भी किया गया। इसके बाद कुछ कम्पनियों ने रुचि तो दिखाई पर टेंडर में उन्होंने भी भाग नहीं लिया। अब इसका भी टेंडर तीसरी बार निकालने की तैयारी चल रही है। बिलासपुर नगर निगम ने एक ऐसा डायग्नोसिस सेंटर चालू कर लिया है। यहां भी कम से कम चार सस्ती जेनेरिक दवाओं की दुकान खोलने की योजना है पर अभी धरातल पर नहीं आ सकी है।

नगर निकायों की जिम्मेदारियों में शहर के लोगों की सेहत का ख्याल भी रखना शामिल है। ऐसे में सस्ती दवा, सस्ते जांच की सुविधा देने के लिये की जा रही कोशिश अच्छी है। हो सकता है कि मेडिकल बिजनेस से जुड़े लोग इसमें अडंगा डाल रहे हों पर कुछ शर्तों को अव्यावहारिक भी बताया जा रहा है, जैसे 50 करोड़ रुपये के टर्न ओवर का होना जरूरी और वापस नहीं होने वाली 10 लाख रुपये प्री बिड की रकम। इसके चलते बड़ी कम्पनियां या मल्टीनेशनल कम्पनियां ही टेंडर में भाग ले सकेंगी। शहर के कई निजी डायग्नोस्टिक सेंटर्स हैं, जिनके पास डॉक्टर, स्टाफ, एम्बुलेंस आदि की सुविधा उपलब्ध है, उन्हें भारी-भरकम शर्तों की वजह से टेंडर में शामिल होने का मौका नहीं मिल पा रहा है।

राहुल गांधी नगरनार में रुकेंगे?

अगले कुछ दिनों में राहुल गांधी का दौरा कार्यक्रम आ जायेगा। वे कहां-कहां जायेंगे और रुकेंगे इसके बाद ही मालूम हो सकेगा। पर, यह निश्चित है कि वे बस्तर और सरगुजा पर फोकस करेंगे। बस्तर में वे रात भी रुक सकते हैं। जिला प्रशासन की तैयारी चल रही है कि उनकी यदि यहां आमसभा हो तो वह माड़पाल में रखी जाये। यह वही जगह है जहां नगरनार स्टील प्लांट स्थापित है और केन्द्र सरकार ने जिसे बेचने की तैयारी कर ली है। छत्तीसगढ़ सरकार ने विधानसभा में घोषणा कर दी है कि यदि इसे बेचा गया, तो वह उसे खरीदेगी। बस्तर में टाटा एस्सार द्वारा ली गई किसानों की जमीन का वायदा भी राज्य सरकार ने निभाया है। इसके अलावा वनोपज के समर्थन मूल्य को कई गुना बढ़ाने, नये उत्पादों को जोडऩे का काम भी सरकार कर रही है। बस्तर की सभी 12 विधानसभा सीटें कांग्रेस के पास है और लोकसभा की भी दो में से एक सीट है। यहीं पर इन दिनों भाजपा का चिंतन शिविर इसी खास मकसद से चल रहा है कि आदिवासियों के बीच पकड़ मजबूत की जाये। ऐसे में राहुल गांधी का बस्तर दौरा खास बन जाता है।

दूसरी तरफ यहीं पर सिलगेर का मामला भी सुलग रहा है। ग्रामीण तीन आदिवासियों की पुलिस गोली से मौत के लिये जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। पुलिस मृतकों को नक्सली बता रही है। इसके अलावा पांचवी अनुसूची था पेसा कानून लागू करने की मांग पर छत्तीसगढ़ में कई जगह कल आर्थिक नाकाबंदी की गई। आंदोलन का अगला चरण भी शुरू होना है। सरगुजा, कोरबा के जंगल में नये कोल ब्लॉक के लिये सहमति देने को लेकर भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।

कुल मिलाकर राहुल गांधी का बस्तर और सरगुजा का कार्यक्रम तय होता है तो लोग बहुत से सवालों का उनसे जवाब भी चाहेंगे।

सिर्फ 13 प्रतिशत युवाओं को दूसरा डोज...

अगस्त महीने तक प्रदेश में कोरोना से बचाव के लिये कितने लोगों ने वैक्सीन लगवाई उसका आंकड़ा श्रेणीवार जारी हुआ है। प्रदेश में 32 लाख 69 हजार 320 लोगों ने ही दूसरा डोज लगवाया है, जो पहला डोज लगवाने वाले 1 करोड़ 12 लाख 10 हजार 523 का 30 प्रतिशत भी नहीं है। हो सकता है कि इनमें से काफी लोगों को पहला डोज लगने के बाद दूसरे डोज की बारी नहीं आयेगी फिर भी यह अंतर ध्यान तो खींचता है।

फ्रंट लाइन वर्कर्स की 100 प्रतिशत से ज्यादा संख्या रही, जिन्होंने पहला डोज लगवाया। दूसरा डोज अब तक 75 प्रतिशत लोगों को ही लग पाया है। इसी तरह से हेल्थ केयर वर्कर्स जिन्हें टीका लगाना सबसे पहले शुरू किया गया था, 91 प्रतिशत लोग पहला डोज ले चुके  हैं, जबकि दूसरा डोज 81 प्रतिशत लोगों को लग पाया है।

45 साल से अधिक उम्र के 92 प्रतिशत लोगों ने पहला डोज लिया जबकि इसका दूसरा डोज लेने वालों की संख्या केवल 32 प्रतिशत है। यह अंतर बहुत ज्यादा है। ऐसा लगता है कि बड़ी संख्या में सीनियर सिटीजन्स ने दूसरा डोज लगवाने में रुचि नहीं ली।

18 साल से 44 वर्ष वर्ग की स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। इस वर्ग में अब तक केवल 39 प्रतिशत लोगों को पहला डोज लग सका है और दूसरा डोज तो सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों को लगा है। टीकाकरण की शुरूआत से लेकर 30 अगस्त 2021 की स्थिति में कुल 1 करोड़ 44 लाख 79 हजार 843 टीके लगे हैं।

अगस्त माह में कोरोना के नये मामलों में काफी सुधार रहा। पूरे माह में 37 लोगों की मौत हुई। अगस्त में पूरे प्रदेश में 2443 पॉजिटिव केस ही सामने आये और 31 लोगों की मौत हुई। इसके पहले जुलाई में आने वाले संक्रमण के मामले 7528 थे और 85 की मौत हुई थी। जून में तो 391 लोगों की प्रदेशभर में मौत हो गई थी और 23017 संक्रमण के नये मामले मिले थे।

अब वैक्सीन की कमी पहले जैसी नहीं रह गई है। मई-जून में वैक्सीन की कमी के कारण जहां कई टीकाकरण केन्द्रों को बंद करना पड़ा था वहीं अब इन केन्द्रों में टीके उपलब्ध हैं पर भीड़ नहीं उमड़ रही है। वैक्सीनेशन का लक्ष्य पूरा हुए बिना यह उदासीनता नये केस में कमी के कारण हो सकती है पर केरल, महाराष्ट्र में जिस तरह केस बढ़ रहे हैं क्या छत्तीसगढ़ आने वाले दिनों में भी इतना सुरक्षित रह पायेगा? यह सवाल इसलिये जरूरी है क्योंकि 32.69 लाख लोगों को ही दोनों डोज लग पाये हैं।


31-Aug-2021 6:40 PM (443)

पार्टी विथ डिफरेंस...
भाजपा के चिंतन शिविर से उन नेताओं को दूर रखा गया जो कि संगठन की धुरी समझे जाते थे। कई दिग्गज नेता शिविर के आमंत्रितों की क्राइटेरिया में फिट नहीं बैठ पाए, और उन्हें नहीं बुलाया गया। इनमें कोषाध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, और सुभाष राव शामिल हैं। ये नेता बरसों से संगठन के कर्ताधर्ता रहे हैं, लेकिन उन्हें बुलावा नहीं भेजा गया। सुनते हैं कि इन दिग्गजों ने शिविर में न्यौते के लिए भरसक कोशिश भी की थी।

गौरीशंकर अग्रवाल ने दो दिन पहले पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से खुद को शिविर में आमंत्रित नहीं करने की शिकायत भी की थी। मगर पूर्व सीएम ने हाथ खड़े कर दिए। चर्चा तो यह भी है कि गौरीशंकर के खिलाफ पार्टी हाईकमान को कई तरह की शिकायतें हुई है। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर तो एक-दो दफा पार्टी की बैठकों में उन्हें मंचस्थ करने पर आपत्ति कर चुके हैं।

कुछ लोग मानते हैं कि इन्हीं सब वजहों से गौरीशंकर को शिविर से अलग रखा गया है। इससे परे सुभाष राव प्रदेश के अकेले नेता हैं, जो कि प्रभारी डी पुरंदेश्वरी से तेलगू में बात करते हैं। यही नहीं, सुभाष राव और राजेश मूणत, दोनों ही शिविर की तिथि तय होने के बाद स्थल चयन के लिए जगदलपुर गए थे। उन्होंने ही चिंतन शिविर के लिए पूरी व्यवस्था की थी। लेकिन उन्हें भी नहीं बुलाया गया।

रमन सरकार के पहले कार्यकाल में अमर अग्रवाल द्वारा मंत्री पद छोडऩे, और फिर पार्टी के बड़े नेता लखीराम अग्रवाल के गुजरने के बाद पार्टी संगठन में कोई बहुत ज्यादा हैसियत नहीं रह गई है। उनकी नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक से पटरी नहीं बैठती है। ऐसे में अमर को आमंत्रित नहीं करने से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ।
शिविर में प्रदेश उपाध्यक्ष, और महामंत्री के साथ ही सांसद, विधायकों को बुलाया गया है। बस्तर के कुछ प्रमुख नेताओं को अहम पद पर नहीं होने के बाद भी आमंत्रित किया गया है। कांग्रेस में यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो खुलकर बयानबाजी होने लगती और लोग लड़-भिडक़र शिविर के भीतर घुस जाते, किन्तु भाजपा तो अलग ही तरह की पार्टी है।

राष्ट्रीय महामंत्री डी. पुरंदेश्वरी कह चुकी हैं कि अगला चुनाव किसी एक चेहरे पर नहीं बल्कि पार्टी के नाम पर लड़ा जायेगा। यह संकेत पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके समर्थकों के लिए चिंताजनक है। शायद इस चिंतन शिविर में तय हो कि कौन सा नाम सामने लाया जाये, इसलिये सूची सावधानी से और सुविधाजनक तरीके से बनाई गई हो? कुल मिलाकर विधानसभा चुनाव का रोड मैप तैयार करने के लिए हो रहे शिविर से दिग्गजों को दूर रखने की पार्टी हल्कों में जमकर चर्चा है।

एक और आईएएस दिल्ली की ओर
आईएएस की 97 बैच की अफसर डॉ. एम गीता भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा रही हैं। गीता कृषि विभाग की सचिव हैं। और कहा जा रहा है कि स्वास्थ्यगत कारणों की वजह से वो दिल्ली में रहना चाहती हैं। राज्य सरकार ने भी उन्हें अनुमति दे दी हैं। केन्द्र सरकार में पोस्टिंग होते ही उन्हें रिलीव किया जा सकता है। डॉ. गीता के जाने के बाद मंत्रालय में आधा दर्जन अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है। वैसे भी अगले एक-दो महीने में विशेष सचिव स्तर के अफसर, सचिव के पद पर पदोन्नत हो जाएंगे। इनमें से अंकित आनंद तो अहम दायित्व संभाल रहे हैं। बाकी को भी महत्वपूर्ण दायित्व दिया जा सकता है। कुल मिलाकर सीनियर अफसरों की गैर मौजूदगी में युवा अफसरों पर प्रशासन की बागडोर रहेगी।

बिजली बंद कर बचायेंगे हाथियों की जान
हाथियों से प्रभावित पत्थलगांव इलाके में हाल ही में एक हाथी की बिजली का करंट लगने से मौत हो गई। शुरुआती जांच में मालूम हुआ कि एक किसान ने अपनी फसल की हिफाजत करने के लिये बाड़ी की फेंसिंग को बिजली तार से जोड़ दिया था, जिसकी चपेट में हाथी आ गया। इस वर्ष की यह ऐसी दूसरी मौत है। अब बिजली विभाग के अधिकारियों ने वन विभाग से कहा है कि वे हमें हाथियों के मूवमेंट के बारे में जानकारी दें तो हम उस इलाके में बिजली बंद कर देंगे। अरसे से करंट से होने वाली मौतों का ठीकरा दोनों विभाग एक दूसरे के सिर पर फोड़ते रहे हैं। यह मसला भी अनसुलझा है कि हाथियों के विचरण क्षेत्र से गुजरने वाली बिजली लाइनों की ऊंचाई बढ़ाई जाये। इस पर करोड़ों रुपये खर्च होने हैं। दोनों ही इसे वहन करने के लिये तैयार नहीं है। ऐसे में मूवमेंट की सूचना देने की जिम्मेदारी वन विभाग पर बिजली विभाग ने डाल दी है। ऐसा किया गया तो विचरण वाले क्षेत्रों में कई-कई दिनों, हफ्तों तक बिजली बंद रह सकती है। इस से घरेलू उपभोक्ताओं को ही नहीं किसानों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा। हाथी तो हो सकता है बचा लिये जायें लेकिन बिजली के बगैर खेती-किसानी, व्यापार और बच्चों की पढ़ाई पर खासा असर पड़ सकता है।

तिरपाल पर यूनिवर्सिटी बिल्डिंग
आदिवासी बाहुल्य सरगुजा में गहिरा गुरु के नाम पर खोले गये विश्वविद्यालय से सरगुजा, जशपुर व कोरिया जिले के 75 से अधिक निजी व शासकीय महाविद्यालय संचालित होते हैं। अब इस यूनिवर्सिटी को बने 12 साल हो गये पर अब तक अपना बिल्डिंग नहीं मिल सका है। अंग्रेजों के जमाने में बने एक जर्जर भवन में इसे संचालित करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि सीमेंट से बनी शीट के छत से पानी टपकता है। इससे बचने के लिये छत पर तिरपाल बिछा दी गई है, ताकि महत्वपूर्ण दस्तावेजों, कुलपति और कुलसचिव के चेम्बर को पानी टपकने से बचाया जा सके। अपना काम लेकर रोजाना पहुंचने वाले छात्रों और पालकों के लिये भी बैठने या आराम करने की ठीक जगह यहां नहीं है। पता चला है कि 10 साल बाद सन् 2019 में इसके नये भवन के लिए राशि मंजूर की गई और निर्माण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग को सौंपी गई, पर अब तक कोई भी हिस्सा तैयार नहीं हो सका है जहां जाकर स्टाफ काम शुरू कर सके।

(rajpathjanpath@gmail.com)


30-Aug-2021 6:19 PM (314)

जोगी की आत्मकथा जल्द अंग्रेजी में
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के जीवनकाल से जुड़ी हिन्दी में पूर्व में प्रकाशित हो चुकी आत्मकथा का जल्द ही अंग्रेजी में प्रकाशन होगा। चर्चा है कि स्व. जोगी के राजनीतिक और प्रशासनिक संघर्षों से जुड़ी कहानियां आत्मकथा में शामिल की गई हैं। उनके बेटे अमित जोगी और कुछ सहयोगी अंग्रेजी में अनुवाद कर पुस्तक लगभग तैयार कर चुके हैं। चूंकि जोगी से जुड़ा विषय है, तो राजनीतिक कयास भी लगने ही हैं. पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस सरकार के नेतृत्व परिवर्तन के अटकलों के बीच छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस पार्टी के विलय की भी चर्चाएं जोरों पर थी। बताते हैं कि जोगी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती रेणु जोगी की दिली ख्वाहिश है कि आत्मकथा के अंग्रेजी अनुवाद का विमोचन कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों हो। पार्टी के विलय की चर्चा की असली वजह यह रही कि विमोचन के लिए श्रीमती जोगी ने दस जनपथ से समय लिया। वैसे भी रेणु जोगी के साथ श्रीमती गांधी के रिश्ते व्यक्तिगत रूप से आज भी मजबूत हैं। जोगी की आत्मकथा के अंग्रेजी में अनुवाद होने के बाद प्रकाशित होने से एक बड़े वर्ग को उनके सत्ता संघर्ष से लेकर प्रशासनिक अफसर के तौर पर किए गए कामों को समझने का मौका मिलेगा। सुनते हैं कि अंग्रेजी की पुस्तक लगभग तैयार हो चुकी है। जोगी ने अपने जीवनकाल में और भी पुस्तकें लिखी है, पर उनकी निजी जिंदगी से जुड़ी बातें आत्मकथा में खुलकर लिखीं हैं ।

भीड़भाड़ में नहीं मिलेंगे...
कांग्रेस के दिग्गज दिवंगत शुक्ल बंधुओं के इकलौते राजनीतिक वारिस पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ल को भूपेश बघेल कैबिनेट में जगह मिलने की उम्मीद थी। लेकिन उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। अमितेश को निगम-मंडल की पेशकश की गई थी, इसके लिए वो तैयार नहीं हुए। शुक्ल बंधुओं की विरासत वजह से अमितेश की दस जनपथ में पहुंच है।

कई बार वे सोनिया, और राहुल से अकेले में मिल चुके हैं। और जब पिछले दिनों  राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच एक प्रमुख नेता ने भी साथ दिल्ली चलने के लिए अप्रोच किया, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वो सीएम के साथ हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय नेताओं से भीड़भाड़ में नहीं मिलेंगे। उनके लिए अलग से टाइम लिया जाए, तभी वो दिल्ली आएंगे। स्वाभाविक है कि अमितेश मंत्री भले ही नहीं है, लेकिन रूतबा कम नहीं है।

उम्मीद थी कि...
कांग्रेस में चल रही उठापटक पर भाजपा की पैनी निगाह है। नेतृत्व परिवर्तन का हल्ला उड़ा, तो राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम पुराने प्रकरण को लेकर अपने धुर विरोधी बृहस्पत सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंच गए।

रामविचार से जुड़े लोगों को उम्मीद थी कि नेतृत्व में बदलाव होता है तो बृहस्पत सिंह के खिलाफ कार्रवाई तुरंत होगी। इसकी एक वजह यह है कि बृहस्पत सिंह, टीएस सिंहदेव के खिलाफ आग उगलते रहे हैं। मगर परिवर्तन जैसा कुछ नहीं हुआ। अब बृहस्पत सिंह को रामविचार पर हमला बोलने का मौका मिल गया, और वे यहां-वहां रामविचार के खिलाफ काफी कुछ बोल रहे हैं।

सूखे की फसल पर नजर रखने की जरूरत..
चार साल पहले राजनांदगांव जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था तो वहां भाजपा नेताओं ने पटाखे फोडक़र खुशियां मनाई थीं। कोई इलाका सूखाग्रस्त घोषित होता है तो वहां के राजनेता और अधिकारी-कर्मचारी खुश क्यों हो जाते हैं यह वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ की किताब तीसरी फसल पढक़र समझा जा सकता है। सूखाग्रस्त इलाकों में राहत पहुंचाने के लिये करोड़ों रुपये रिलीज़ किये जाते हैं और जाहिर है जो लोग इस फंड का इस्तेमाल करते हैं उन्हें अपनी फसल काटने  का मौका मिलता है।

छत्तीसगढ़ में इस बार फिर सूखे के आसार दिखाई दे रहे हैं। अब तक 30 तहसील इसकी चपेट में आ चुके हैं और आगे बारिश नहीं हुई तो प्रभावित क्षेत्रों की संख्या बढ़ सकती है। पहले देखा जा चुका है कि बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के नाम पर तो खूब मुनाफा कमाया पर सूखा पीडि़त किसान छले गये। कुछ को तो 10-20 रुपये का चेक थमा दिया गया।

इस बार छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने घोषणा की है कि अकाल प्रभावित किसानों को प्रति एकड़ 9 हजार रुपये की मदद दी जायेगी। अभी साफ पता नहीं है कि यह राशि नगद के रूप में खाते में जायेगी या फिर किसी योजना में सहायता के रूप में दी जायेगी। जनप्रतिनिधियों को अब सक्रिय हो जाना चाहिये। प्रशासन के भरोसे रहे तो उनके इलाके के सूखा पीडि़त किसान आसमान की ओर ताकते रह जायेंगे। सवाल फंड का ही नहीं, वोटों का भी है।

फिर ताबड़तोड़ नसबंदी..
कोरोना संकट के बाद एक स्थिति सुधरी कि अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत होने वाले रुके ऑपरेशन फिर शुरू किये गये हैं। नसबंदी का तो खैर अपने छत्तीसगढ़ में मामला ही अलग है। 8 नवंबर 2014 को तखतपुर के एक बंद पड़े अस्पताल में शिविर लगाकर बड़ी संख्या में महिलाओं की लापरवाही के साथ नसबंदी कर दी गई। इसके बाद 13 महिलाओं की मौत हो गई। इस मामले में दवा सप्लायरों, डॉक्टरों व स्टाफ के विरुद्ध कार्रवाई हुई पर वह नाकाफी थी। कई लोगों को बचा लिया गया। पर इसके बाद एक सबक लिया गया कि लोगों को प्रोत्साहन राशि के लालच में जबरदस्ती पकडक़र नहीं लाया जायेगा,  ना ही  नसबंदी का कोई लक्ष्य दिया जायेगा। एक डॉक्टर अधिकतम कितने लोगों की नसबंदी एक शिविर  में करेंगे यह भी तय कर दिया गया। पर सरगुजा जिले के मैनपाट में हाल ही में जो हुआ उससे लग रहा है कि सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट रहा है। यहां शिविर में 30 महिलाओं का ऑपरेशन निर्धारित किया गया था लेकिन 100 से ज्यादा कर दिये गये। पता चला कि मितानिन और स्वास्थ्य कार्यकर्ता बड़ी संख्या में महिलाओं को नसबंदी के लिये लेकर आ गये। शायद मिलने वाली प्रोत्साहन राशि इसकी वजह थी। पर डॉक्टर ने भी तय से ज्यादा ऑपरेशन करने से मना नहीं किया। अब इस मामले की जांच शुरू हो गई है, डॉक्टर को  भी शो-काज नोटिस थमा दिया गया है।

एक कोना पक्षियों के नाम...
सरकारी तौर पर बर्ड फेस्टिवल मनाये जाते हैं, पक्षी विहार बनाने के लिये बजट जारी होता है पर उसके नतीजे दिखाई नहीं देते। पर यही काम यदि समाज के जागरूक लोग करें तो खर्च भी कम होता है और असर भी ज्यादा  होता है।  महासमुंद जिले के तुमगांव के युवाओं ने विलुप्त हो रही गौरेया और अन्य पक्षियों के लिये बसेरा बनाने का बीड़ा उठाया है। शुरुआत 30 बसेरे बनाकर की गई है। इस युवा शक्ति टीम का नेतृत्व पार्षद धर्मेन्द्र यादव कर रहे हैं। उनका कहना है कि भटकते पक्षियों को इस मुहिम के माध्यम से आशियाना देने की कोशिश की जा रही है। पक्षियों के ये मजबूत घोंसले नगर की कुलदेवी कही जाने वाली शीतला माता के मंदिर परिसर में तैयार करके रखा जा रहा है। बाद में घरों में ये  बनाकर दिये जायेंगे। युवाओं का कहना है कि इन दिनों चिडिय़ों की चहक कम सुनाई दे रही है। हो सकता है उनकी कोशिश से यह कमी दूर हो। (rajpathjanpath@gmail.com)


29-Aug-2021 6:38 PM (337)

इसे कहते हैं गई भैंस पानी में

प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी ने वन भैंसा को छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु घोषित किया था। तब से लेकर अब तक उसके संरक्षण के लिए फूंके गए करोड़ों रुपयों के बजट की परिणीति यह हुई है कि आखिरी संदिग्ध वन भैंसे की भी मौत हो गई।

वन भैंसा को बचाने के नाम पर बम्हनी झूला गांव के चेतन से जनवरी सन 2007 में आशा नाम की एक मादा भैंस को जप्त कर लिया। चेतन ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ खूब झगड़ा किया। कहा कि यह मेरी पालतू भैंस है, वन भैंसा नहीं है। मगर वन विभाग ने दावा किया कि यह माता, मादा वन भैंस ही है। कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने मांग कि कि इसका डीएनए टेस्ट कराया जाए। इधर वन विभाग ने वन भैंसा प्रजनन केंद्र उदंती में रखकर इस मादा भैंस की ब्रीडिंग कराई, जिससे 5 नर और एक मादा भैंस पैदा हुई।

डीएनए टेस्ट प्रजनन के बाद हुआ। इन छह में से सिर्फ एक के बारे में दावा किया गया कि यह मादा वन भैंस है।

वन्य प्राणी विशेषज्ञ इस बात पर भी संतुष्ट थे कि राजकीय पशु वन भैंस का अस्तित्व बना रहेगा। वन विभाग के अधिकारियों ने इसका नाम भी खुशी रख दिया था। मगर दुर्भाग्य की खुशी नाम ने वन विभाग के अधिकारियों की पोल खोल कर वन्यजीव प्रेमियों को दुखी कर दिया। मालूम यह हुआ है कि वह मुर्रा भैंस है। आमतौर पर पालतू।

जंगल में अधिकारी किस तरह से करोड़ों रुपए के परियोजना को किस तरह से बिना जाने समझे बहा रहे हैं और न केवल जंगल का विनाश बल्कि वन्य जीवों को खत्म कर रहे हैं, यह मामला इसका बड़ा उदाहरण है।

ऑनलाइन पढ़ाई की लत लग चुकी ...

केरल से जरूर कोरोना महामारी के भयावह आंकड़े हैं पर दक्षिण छोडक़र बाकी राज्यों में गतिविधियों को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है। इसीलिये छत्तीसगढ़ में भी 50-50 फीसदी उपस्थिति के साथ स्कूल खोले जा चुके हैं। एक शिक्षक से पूछा गया कि क्या हाल है स्कूलों का? वह बता रहे हैं कि बच्चे 15-20 प्रतिशत ही पहुंच रहे हैं। जब बच्चों और उनके अभिभावकों से पूछा जाता है कि अनुपस्थिति क्यों? कहते हैं कोरोना फैलने का डर है। बच्चों को गाइडलाइन ठीक तरह से पता नहीं। वे एक साथ बैठेंगे। दो गज की दूरी नहीं रहेगी। मास्क निकालकर टिफिन बांटकर खायेंगे। खेल-कूद के बिना रह नहीं पायेंगे फिर एक दूसरे को मरोड़ेंगे। न- ना, स्कूल नहीं भेजेंगे।

शिक्षक कहते हैं कि यह चिंता बेकार की है। 50 फीसदी उपस्थिति पहले ही तय की जा चुकी है। खेलकूद बंद है। जो कोरोना के डर से स्कूल नहीं भेज रहे हैं वही अपने पूरे परिवार के साथ मॉल में फिल्म देखते हुए मिल गये। बच्चों को लेकर वे बाजार जा रहे और त्यौहार मना रहे हैं।

फिर वजह क्या है? दरअसल बच्चों को बीते दो साल में ऑनलाइन पढ़ाई का चस्का लग चुका है। स्कूल जाने के नाम पर कतरा रहे हैं। उन्हें मोबाइल फोन की ऑनलाइन पढ़ाई भा रही है। पालक भी स्कूल ड्रेस, टिफिन, ऑटो रिक्शा के झंझट से बचने के लिये दबाव नहीं डाल रहे हैं।

शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि स्कूल नहीं आ रहे हो, पर सोच लो। इस बार इग्ज़ाम ऑनलाइन नहीं, ऑफलाइऩ ही होगा और आनाकानी करने पर नतीजे के लिये तैयार रहें।

स्काई वाक और मल्टी लेवल पार्किंग..

भाठागांव नया बस स्टैंड और शहर के मुख्य मार्ग को तहस-नहस कर बनाये गये स्काई वाक के बाद अब इस कहीं मल्टीलेवल पार्किंग के अनुपयोगी की बारी तो नहीं? यहां 700 कारों को पार्क करने की जगह है। क्या इतनी कारों को यहां पार्क करने की जरूरत पडऩे वाली है?  पार्क करने से बेहतर क्या यह ठीक नहीं लगेगा कि कार वे घर पर ही छोडक़र निकलें और टैक्सी से कलेक्टोरेट और बाजार पहुंच जायें?


28-Aug-2021 5:57 PM (365)

शिक्षक रहना ही ठीक था

सूबे के प्रशासनिक तंत्र के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम अफसरों की गिनती में इजाफा हो रहा है। पुलिस महकमे में हालत कुछ ऐसी है कि सिस्टम के साथ नहीं जुडऩे के चलते कई पुलिस अधिकारी बटालियन और पीएचक्यू में समय काट रहे हैं। ऐसे अफसरों में 1997 बैच के राज्य पुलिस सेवा के दर्शन सिंह मरावी अपने बैच के इकलौते अफसर हैं जो प्रमोशन नहीं होने का दर्द सहते 21 वीं बटालियन में कमाडेंट के तौर पर समय काट रहे हैं। गाहे-बगाहे वह यह भी कह जाते हैं कि शिक्षक रहने में ज्यादा भलाई थी। अविभाजित राजनांदगांव के रेंगाखार से सटे रोल गांव (अब कवर्धा )से शिक्षक रहते डीएसपी चुने गए मरावी अच्छी पोस्टिंग के लिए तरस रहे हैं। सुकमा एसपी के लिए उन्हें दो माह के लिए भेजा गया। उसके बाद से वह जंगल वारफेयर कॉलेज कांकेर में दो बार और बटालियन में तैनाती का दंश झेल रहे हैं। बताते हैं कि इस आदिवासी अफसर का सिस्टम से मेल नहीं हो पाया। एक मामले में विभागीय जांच आईपीएस अवार्ड में उनकी अड़चनें दूर नहीं हुई हैं। मरावी के बैच के दीगर अफसरों को आईपीएस अवार्ड मिले काफी समय हो गया है। मरावी दर्द में खुलकर कहते हैं कि डीएसपी की नौकरी से शिक्षक रहने में ही भलाई थी।

आरटीई में दाखिले के लिये इतनी कम अर्जी क्यों?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी स्कूलों के नये प्रवेश में 25 प्रतिशत सीट गरीब वर्ग के लिये आरक्षित होती है। हर बार पालकों की शिकायत रहती है कि उनके बच्चों को आवेदन के बाद भी दाखिला नहीं मिल रहा है। पर इस बार स्थिति उलटी है। राज्य के 6533 निजी स्कूलों में आरटीई के तहत उपलब्ध सीटों की संख्या 82 हजार 220 है। पर इनमें दाखिले के लिये आये कुल आवेदन 71 हजार 882 ही हैं। हालांकि यह स्थिति जांच के बाद आवेदन निरस्त होने के बाद की है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा और जांजगीर ही ऐसे जिले हैं जहां सीटों से अधिक आवेदन हैं। पर बाकी जिलों में स्थिति यह है कि जो भी आवेदन हैं, दाखिला मिल जायेगा। इनमें दंतेवाड़ा, कांकेर, बस्तर, सुकमा, बालोद, बलरामपुर, गरियाबंद और नारायणपुर जिले हैं।

इस आंकड़े का थोड़ा विश्लेषण करें तो यह समझ में आता है कि मैदानी इलाके जहां आवागमन, संचार की सुविधा है, कुछ विकसित कहे जा सकते हैं उनमें आये आवेदन सीटों से ज्यादा हैं जैसे रायपुर, बिलासपुर या कोरबा। पर जहां से कम आवेदन आये हैं वे आदिवासी बाहुल्य जिले हैं। ये आधारभूत सुविधाओं के मामले में कुछ पीछे हैं। यह स्थिति शायद इसलिये भी हो कि आरटीई के बारे में लोग जागरूक नहीं हुए हों। आरटीई की भर्ती के बाद सरकार ट्यूशन फीस, यूनिफॉर्म और किताबों का खर्च तो उठाती है पर स्कूल से घर तक आने-जाने का नहीं। हो सकता है गरीब परिवारों को वहां यह खर्च भी भारी पड़ रहा हो। जो भी हो, निर्धन परिवारों के लिये मुफ्त शिक्षा की एक अच्छी योजना के प्रति रूचि में कमी चिंताजनक है। सरकार और समाज दोनों के लिये।

सोशल मीडिया पर समर्थकों की बेताबी

वाट्सअप, फेसबुक और ट्विटर नहीं होता तो पता नहीं चलता कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के मन में क्या चल रहा है। शीर्ष नेता लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि सब ठीक चल रहा है पर सीएम भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के समर्थन और विरोध में दनादन पोस्ट किये जा रहे थे। कोई कह रहा था हमें राजा नहीं चाहिये, किसानों के राज में किसान नेता ही चलेंगे। कोई कह रहा था, बाबा आप अभी जिम्मेदारी मत संभालिये वरना जब पांच साल पूरा होगा तो पूरा ठीकरा आपके सिर फूटेगा। फेहरिस्त लम्बी है आप इसके लिये कांग्रेस भाजपा नेताओं के पेज पर जाकर उनके समर्थकों, विरोधियों की प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स और उनकी पर्सनल पोस्ट में पढ़ सकते हैं।

जो जागत है सो पावत है..

चाणक्य कह गये हैं स्वयं की सफलता से बड़ा कोई भी लक्ष्य नहीं होता है। स्व. अजीत जोगी ने एक किस्सा एक वरिष्ठ पत्रकार को सुनाया था। संयुक्त मध्यप्रदेश के जमाने में पर्यवेक्षक गुलाम नबी आजाद की मौजूदगी में कांग्रेस सीएम के लिये नाम तय नहीं कर पा रही थी। बुंदेलखंड, मालवा, विंध्य..., अलग-अलग क्षेत्र से मांग उठ रही थी। प्रक्रिया में इतनी देर होने लगी कि बैठक में मौजूद एक दावेदार स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल कहीं विश्राम करने चले गये। इस बीच तय हुआ कि मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ का हो। स्व. शुक्ल के नाम पर सहमति बन गई। उस वक्त मोबाइल फोन तो था नहीं कि जहां हैं वहीं से उठाकर बुला लिया जाये। खोजबीन कराने पर वे नहीं मिले। फिर छत्तीसगढ़ से दूसरा नाम? वहां स्व. मोतीलाल वोरा मौजूद थे। विधायकों से सहमति ली गई और वोरा जी का नाम फाइनल हो गया, मिठाईयां बंट गई। अब बैठक में पहुंचे स्व. शुक्ल। उन्होंने कहा कि मैं तो आ गया हूं, जब पहले मेरा नाम तय हुआ तो मुझे ही मौका मिलना चाहिये। पर उन्हें बताया गया कि अब तो सब घोषणा हो गई है, कुछ नहीं हो सकता। स्व. शुक्ल ने एक बड़ा मौका गंवा दिया। आज के संदर्भ में इस किस्से का कौन सा सिरा मायने रखता है?


27-Aug-2021 5:36 PM (277)

तीसरी लहर की आहट के बीच कामयाबी...

रायगढ़ जिले ने वैक्सीनेशन का जो कीर्तिमान बनाया वह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। इस जिले में 100 फीसदी लोगों को सिंगल डोज लग चुके हैं और 30 प्रतिशत ऐसे हैं जिनको दोनों डोज लग चुकी है। जब 45 वर्ष तक के लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य रखा गया था तब भी प्रदेश में सबसे पहले कीर्तिमान इसी जिले का बना।

रायगढ़ शहर में 100 फीसदी टीकाकरण का लक्ष्य सबसे पहले हासिल किया गया। उसके बाद घरघोड़ा, बरमकेला, पुसौर और तमनार में भी 100 प्रतिशत लोगों को कम से कम एक डोज दे दी गई।

काम इतना आसान भी नहीं था। खरसिया ब्लॉक के करीब डेढ़ दर्जन गांव थे जहां लोगों को टीका लगवाने में रुचि नहीं थी। सारंगढ़ के नगरीय निकाय और करीब 15 पंचायतों में यही स्थिति थी। लोगों को समझाने के लिये अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई और आखिर लक्ष्य का एक चरण पूरा हुआ। वैक्सीन की बार-बार आपूर्ति रुकने के बावजूद यह उपलब्धि हासिल कर ली गई। पर अभी वैक्सीनेशन का अभियान चलेगा, क्योंकि दूसरा डोज तो 70 फीसदी लोगों को लगाया जाना बाकी है। केरल से जब तीसरी लहर का अंदेशा देशभर में फैलने का खतरा मंडरा रहा हो, रायगढ़ जैसी खबर बाकी जिलों से भी जल्दी आने की उम्मीद रखनी चाहिये।

सीएम की दौड़ में भी शामिल नहीं...।

पता नहीं कितने ही खिलाड़ी कप्तान बनना चाहते होंगे, पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक किसी तीसरे-चौथे नेता से उनके मन की बात पूछी ही नहीं जा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम को ही देखिये। पूछा तब उन्होंने राज खोला। उन्होंने 26 और 27 अगस्त का अपना तय दौरा रद्द कर दिल्ली जाने का फैसला नहीं लिया। वे पहले से तय जीपीएम और बिलासपुर जिले के दौरे पर हैं। मरवाही में वे फुरसत में, बड़े इत्मीनान से पत्रकारों से मिले। तमाम राजनीतिक सवालों के बीच सीएम की उनकी अपनी दावेदारी को लेकर भी पूछ लिया गया। मरकाम ने भी कह दिया- मैं दौड़ में नहीं हूं। हमारे यहां हाईकमान तय करता है, कौन मुख्यमंत्री होगा, कौन नहीं...। चलिये...एक दावेदारी तो खत्म हुई, मरकाम के बयान से चिंता घटी होगी हाईकमान की...। 

संस्कृति विभाग तुम्हारे बाप का नहीं..

रंगमंदिर में एक नाट्य समारोह 1 और 2 सितम्बर को होने जा रहा है। समारोह का नाम है- ‘संस्कृति विभाग तुम्हारे बाप का नहीं’। समारोह के इस अजीबोगरीब शीर्षक की वजह भी जान लीजिये। लॉकडाउन के दौरान मंचीय प्रस्तुतियां लगभग ठप पड़ गई थीं। कुछ नाट्य कलाकारों ने इस अवधि का इस्तेमाल करते हुए कुछ नाटक तैयार किये। अब वे इनकी प्रस्तुति हबीब तनवीर की स्मृति में करना चाहते थे। वे संस्कृति विभाग के एक अधिकारी से सहयोग मांगने गये। जैसा कि कलाकार बताते हैं कि अधिकारी ने उनसे कहा कि अभी मंचीय प्रस्तुति के लिये हमारे पास कोई गाइडलाइन नहीं आई है, आप लोग यह आयोजन ऑनलाइन कर लो। कलाकारों ने कहा- ठीक है, फिर भी साउन्ड लाइट, मंच आदि पर खर्च तो होगा। उनकी बात अधिकारी को पसंद नहीं आई और उन्होंने जवाब में यह कहा- कुछ भी प्रोजेक्ट बनाकर ले आते हो और हमारे कंधे पर रखकर बंदूक चलाते हो। संस्कृति विभाग तुम्हारे बाप का नहीं है। कलाकारों के लिये यह बात चुभने लायक थी। बस, उन्होंने तय कर लिया कि अब समारोह का नाम क्या रखा जाये।


26-Aug-2021 6:11 PM (192)

आखिर इतनी बड़ी रकम जाती कहां है?

दंतेवाड़ा में बस्तर विकास प्राधिकरण की बैठक के दौरान मौजूद एनएमडीसी के अधिकारियों के सामने जगदलपुर के विधायक ने प्रस्ताव रखा कि वे विश्वप्रसिद्ध दशहरा के लिये 10-20 लाख रुपये की मदद कर दिया करें। हर साल कर्ज लेकर काम निपटाना पड़ता है। एनएमडीसी के अफसरों ने जो जवाब दिया उससे सब चौंक गये। उन्होंने कहा कि हम तो हर साल 50 लाख और चित्रकोट महोत्सव के लिये 10 लाख रुपये देते हैं। बैठक में प्रभारी मंत्री कवासी लखमा, प्राधिकरण के अध्यक्ष लखेश्वर बघेल, दो तीन सांसद, विधायक, कलेक्टर चंदन कुमार सभी बैठे थे, यानि एनएमडीसी के अधिकारियों ने पूरी जवाबदारी के साथ बयान दिया होगा। पर ये पैसा जाता किसके पास है और खर्च कौन करता है? मंत्री, विधायक को ही इस बारे में पता नहीं है फिर किसे पता होगा? बैठक में दूसरे मुद्दे उछल गये और बात अधूरी रह गई

उद्योगों का मजदूरों से बदला...

उद्योगों में स्थानीय लोगों को तकनीकी पदों पर बिठाने या स्थायी रोजगार देने के बारे में तो अब सोचा भी नहीं जाता। पर इतनी उम्मीद तो होती है कि कम से कम उन्हें मजदूर की हैसियत से ही काम पर दे दिया जाये। खासकर, जब किसी फैक्ट्री को मजदूर की जरूरत पड़ रही हो। दुर्ग जिले के रसमड़ा में करीब दर्जन भर उद्योग स्थापित हैं। यहां के ग्रामीणों से एक अजीबोगरीब और गंभीर किस्म का बर्ताव हो रहा है। ये बताते हैं कि यहां स्थापित उद्योगों में रखने के लिये पहले आधार कार्ड दिखाने के लिये कहा जाता है और जब पता चलता है कि वे रसमड़ा के रहने वाले हैं तो उन्हें काम देने से मना कर दिया जाता है। इनमें से अधिकांश वे ग्रामीण हैं जो पहले किसान थे और इन्हीं उद्योगों के लिये अपनी जमीनें दी हैं। इन्हें रोजगार में प्राथमिकता देने की बात कही गई थी पर उद्योगों के गार्ड इनका पहचान-पत्र देखते ही गेट से दूर भगा देते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यह बदले की कार्रवाई लगती है क्योंकि वे नियमों के उल्लंघन के कारण पर्यावरण प्रदूषण से त्रस्त हैं। उनकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। घरों और खेतों में कालिख पुत रही है। इसकी शिकायत वे अधिकारियों से करते आ रहे हैं।

ग्रामीणों ने डिप्टी कलेक्टर के माध्यम से सीएम को चि_ी लिखी है और इस पक्षपात को बंद कर भुखमरी, बेरोजगारी से बचाने के लिये काम मांगा है।

सूखे की आहट और पलायन की शुरुआत

स्थिति तब और साफ होगी कि जब आने वाले एक पखवाड़े के भीतर बारिश नहीं होगी। अभी आंकड़ा है कि प्रदेश के 178 में से 100 तहसीलों में औसत से कम बारिश हुई है। 30 तहसील ऐसी हैं जहां 70 फीसदी से कम पानी गिरा है। बस्तर के कई तहसील सूखे की चपेट में हैं। सभी कलेक्टरों से आपदा प्रबंधन विभाग ने सितम्बर के पहले सप्ताह तक फसल की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है। उसके बाद योजना बनेगी रोजगार, अनुदान, बीमा भुगतान, मोटर पम्पों और उसके लिये बिजली की मंजूरी। मैदानी इलाकों से तो लोग फसल की बोनी का काम खत्म होने के बाद ही प्रवास पर निकल जाते हैं और फसल कटाई के वक्त लौटते हैं। पर बस्तर से जो खबरें आ रही हैं वह साधारण नहीं है। कोंडागांव जिले के फरसगांव इलाके की रपट है कि इस धुर नक्सल इलाके में लोगों के पास कोई काम नहीं है। न वनोपज का और न ही मनरेगा का। मनरेगा के काम का भुगतान पाने के लिये ये बार-बार बैंकों का चक्कर भी नहीं लगा पा रहे हैं, क्योंकि इसमें भी आने वाला खर्च नहीं उठा पा रहे।  ये लोग बड़ी संख्या में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना यहां तक कि बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश का रुख कर रहे हैं। इनमें नाबालिग और युवतियां भी हैं। बस लेकर दलाल किसी अंदरूनी गांव में खड़े होते हैं और ठूंसकर ले जाते हैं। सूखे का जब तक आकलन होगा और प्रशासन इनकी सुध लेने के लिये कदम उठायेगा, तब तक अधिकांश उनके घर खाली हो चुके होंगे।


25-Aug-2021 6:43 PM (311)

दूबर बर दू असाढ़....
वैसे तो कई प्रतियोगी परीक्षाएं ऑफलाइन आयोजित की जा चुकी है पर 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षा ऑनलाइन रखी गई थी। अब जब कोरोना संक्रमण कम से कम छत्तीसगढ़ में काफी हद तक नियंत्रण में है, माध्यमिक शिक्षा मंडल 12वीं बोर्ड की पूरक परीक्षाओं को ऑफलाइन आयोजित करने पर विचार कर रहा है। इसके लिए फॉर्म भरे जा रहे हैं। यानि पूरक परीक्षा में वह छूट नहीं मिलेगी जो ऑनलाइन में मिल गई। ऑनलाइन परीक्षा में सुविधा रही कि किताबों को देखकर उत्तरपुस्तिकायें भरी गई और इत्मीनान से जमा करने का वक्त भी मिला। ऑफलाइन परीक्षा तो असल परीक्षा जैसी ही होगी, जिनमें यह छूट नहीं दी जायेगी। इस बार ऑनलाइन परीक्षा के कारण ही नतीजे शानदार आये। ऐसी सुविधाजनक स्थिति में भी बहुत से छात्रों का रिजल्ट पूरक में रहा। अब इन्हें असल परीक्षा की असल तैयारी करनी होगी। बहुत से छात्र सोच रहे होंगे, काश, ऑनलाइन परीक्षा को कुछ अधिक गंभीरता से लेते तो यह नौबत नहीं आती।

एक और राजीव भवन का रास्ता साफ
भाजपा पार्षदों के कड़े विरोध के बीच बिलासपुर नगर निगम की सामान्य सभा में कांग्रेस भवन (राजीव भवन) के लिये जमीन के आवंटन का प्रस्ताव पास हो गया। दरअसल इस जमीन को कांग्रेस को देने का विरोध इस आधार पर था कि यह शहर के बीचों-बीच पुराने बस स्टैंड की खाली जगह है, जो बेशकीमती है। यहां पहले मल्टीलेवल पार्किंग का प्रस्ताव भी था। भाजपा ने सवाल किया कि विकास के दूसरे कामों में इतनी ही तेजी से काम क्यों नहीं होते? बात ठीक भी है। शहर की तमाम परियोजना अंडरग्राउंड सीवरेज, अमृत मिशन, स्मार्ट सडक़, तिफरा ओवरब्रिज आदि अधूरी पड़ी हैं। अधिकांश योजनाएं भाजपा शासन काल की हैं। ये सब चुनावी मुद्दे भी रहे, जिससे कांग्रेस को शहर में बढ़त मिली। पर अब उनके पास जवाब नहीं है। कांग्रेस भवन के लिये जमीन हासिल करना कांग्रेस के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न था। सत्ता में होने का इतना लाभ ले लेना तो बनता है। पर अगले चुनाव में हिसाब तो शहर के विकास का ही लिया जायेगा।

यूरोप की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा
छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के सहायक अभियंता चित्रसेन साहू ने अपने कृत्रिम पैरों के सहारे अविश्वसनीय उपलब्धि हासिल की।
रूस के माउन्ट एलब्रुस पर्वत की 18 हजार 510 मीटर ऊंची चोटी उन्होंने अपने कृत्रिम पैरों के सहारे फतह की। देश में अब तक कोई इतनी ऊंचाई पर कृत्रिम पैरों के सहारे नहीं पहुंचा है। उनका यह अभियान मास्को के समय के अनुसार सुबह 23 अगस्त को सुबह 10.54 बजे पूरा हुआ। इसे मिशन इंक्लूजन-अपने पैरों पर खड़े हैं- नाम दिया गया था।
अपना अनुभव सोशल मीडिया पर साझा करते हुए चित्रसेन लिखते हैं- पर्वतारोहण के लिये मौसम अच्छा नहीं था। चढ़ाई के  दौरान माइनस 25 डिग्री सेल्सियस तापमान, उस पर 50 से 70 किलोमीटर क रफ्तार में बर्फीला तूफान चल रहा था। पर लाखों की उम्मीद और आशीर्वाद से वे यूरोपीय महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा सके। चित्रसेन बताते हैं कि कि वे 7 में से 3 महाद्वीपों का सफर पूरा कर चुके हैं। अब चौथे की तैयारी कर रहे हैं। चित्रसेन को इस मिशन में नाचा (नार्थ अमेरिका छत्तीसगढ़ एसोसिएशन) के साथ ही छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, राजेन्द्र किशन लाल फाउन्डेशन, जीवन दीप, एगटेक नेक्स्ट वेल्थ आदि का साथ मिला।  

शौक बड़ी चीज है...
ये लखन लाल हैं, ड्राइवर हैं लोरमी के। अपनी मोटरसाइकिल में 15 आईने लगा के रखते हैं और उसके ऊपर जगमगाती हुई लाइट।  ‘‘कहते हैं शौक बड़ी चीज है, अलग शौक होना चाहिए’’  (तस्वीर और जानकारी अखबारनवीस रितेश मिश्रा की)

सीन 1
सुबह सब्जी मंडी का दृश्य
काका आलू कैसे दिए ।
15 के किलो बाऊजी
सही लगाओ
सही है बाऊजी
बड़ी लूट मचा रखी है 10 के लगाओ।
नही बाऊजी, नही बैठेगा ।
अरे देदो... दो किलो लूंगा
ठीक है बाउजी।

सीन 2
शाम का वक़्त घर का दृश्य:
Hello pizza hut: Yes sir.
Please book order,
one large capsicum paneer pizza
with e&tra cheez and one garlic bread.
Ans: Okay sir.
सीन 3
Knock knock.... Ting tong
कौन है ?
Pizza delivery boy: Pizza, sir.
Ohh coming...
Thanks.... कितना हुआ ?
Ans: 570 Rs. Sir.
ये लो 600 and keep the change;

बहुत मेहनत करते हो.

Ans: Thanks Sir.

सीन 4
कमरे का दृश्य -  TV में समाचार
दो किसानों ने और आत्महत्या की।
(Pizza खाते हुए) - साला, ये govt

किसानों के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोच रही...
बड़े शर्म की बात है !

नाटक समाप्त

(rajpathjanpath@gmail.com)


24-Aug-2021 6:04 PM (326)

विदेशी मेहमानों की खिदमत तो करें वन अफसर..

उत्तरी अमेरिका के ध्रुवीय इलाके से लगभग 12 हजार किलोमीटर की उड़ान भरकर गोल्डन पेसिफिक प्लोवर पक्षी ने इन दिनों छत्तीसगढ़ में डेरा डाल रखा है। देश के दो तीन और स्थानों पर ये रुके हुए हैं। यह दुर्लभ दृश्य करगी रोड कोटा के मोहनभाठा में देखा जा सकता है। 22 से 25 सेंटीमीटर के आकार वाले ये पक्षी खुराक लेने या खराब मौसम के कारण कुछ दिन के लिये रुक जाते हैं फिर अगले ठिकाने के लिये उड़ जाते हैं। लम्बी यात्रा होने के बाद भी वे अपना रास्ता नहीं भूलते। काले रंग के इन पक्षियों के शरीर में पीले धब्बे होते हैं। मोहनभाठा ऐसी जगह है जहां लुप्तप्राय पक्षियों की आमद प्राय: दर्ज होती रहती है। पक्षी प्रेमी और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर आतुरता से उसकी प्रतीक्षा करते रहते हैं, पर उनकी सुरक्षा के प्रति वन विभाग की उदासीनता सदैव की तरह बनी हुई है। पिछली बार पक्षी महोत्सव जोर-शोर से मनाया गया था कुछ जगहों को चिन्हांकित कर उन्हें पक्षी विहार के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया था। पर पक्षियों को अनुकूल माहौल मिले इसके लिये कोई प्रयास नहीं किये गये हैं। भारी वाहनों की आवाजाही, पक्षियों का शिकार करने वालों का मंडराना, तालाबों और अन्य जल स्रोतों के प्रदूषित होते जाने के कारण प्रवासियों की संख्या लगातार घट रही है। वन्यजीव प्रेमी पत्रकार प्राण चड्ढा, जो राज्य वन्यजीव सलाहकार बोर्ड के सदस्य भी रह चुके हैं- समय-समय पर सोशल मीडिया के माध्यम से इस पर चिंता जताते हैं। गोल्डन पेसिफिक फ्लोवर की तस्वीर भी उन्होंने ही खींची है।

चुनाव यूपी में है और ठोक यहां देंगे?

छत्तीसगढ़ में राम के मुद्दे को कांग्रेस ने पहले भी झटक रखा है। राम वन गमन पथ, सरकार बनने के बाद की पहली घोषणाओं में शामिल था। राम-रथ यात्रा निकाली जा चुकी है। अब तो हर गांव में रामायण मंडलियों को बाजा-गाजा खरीदने के लिये अनुदान दिया जा रहा है। दबी जुबान से भाजपा ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया था। चंदखुरी को माता कौशल्या का जन्म स्थान मानने से भी इंकार किया, पर आस्थावान वोट बिदक सकते थे इसलिये तूल नहीं दिया गया।

अब सुकमा एसपी द्वारा थानेदारों को लिखी गई चि_ी को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने धर्मांतरण पर सरकार को घेरा है। जिस तेवर से कल राजधानी में प्रदर्शन हुआ और बयान दिये गये, लगता है विधानसभा चुनाव में इसे एक मुद्दा बनाया जा सकता है। बीते कई चुनावों में देखा जा चुका है कि लोकसभा चुनाव में तो यह हुआ पर विधानसभा में राज्य सरकार के कामकाज पर ही नतीजे आये। धर्मांतरण को मुद्दा बनाना है तो लोगों का खून खौलने तक उकसाना पड़ेगा। दो चार विधानसभा क्षेत्र नहीं बल्कि पूरे राज्य में। इसके लिये समय भी करीब दो साल का है। शायद इसीलिए कल युवा मोर्चा के नेता ने कहा- ‘पहले रोकेंगे, नहीं माने तो ठोकेंगे।’ हिंसक कार्रवाई की चेतावनी दी जाने वाली यह भाषा छत्तीसगढ़ की प्रकृति को सूट नहीं करती। पार्टी वालों को चाहिये कि इन्हें वे यूपी बुला लें, क्योंकि फिलहाल चुनाव वहीं होने वाले हैं। वहां उनके ऐसे तेवर का ज्यादा ठीक तरह से इस्तेमाल हो सकेगा।

पेड़ पौधों के प्रति तृतीय लिंग की कृतज्ञता

रक्षाबंधन पर रायपुर में यह सबसे हटकर अलग दृश्य था। तृतीय लिंग समुदाय ने पेड़-पौधों को तिलक लगाकर प्रणाम किया और रक्षा सूत्र बांधा। रानी शेट्टी, विशाखा, मीठी सहित अन्य ने मितवा संकल्प समिति के बैनर पर यह कार्यक्रम रखा। इनका कहना था कि पेड़-पौधे ऑक्सीजन के स्त्रोत हैं। ये नहीं होते तो हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे। हमने कोरोना की दूसरी लहर में भी इसे देख लिया। इस कार्यक्रम में अलग-अलग सामाजिक संगठनों के लोग भी शामिल हुए, दूरी घटी, भ्रांतियों को दूर करने में मदद मिली। 

आईटीबीपी कमांडो सुधाकर शिंदे का मारा जाना

नारायणपुर जिले में जिस जगह पर आईटीबीपी के असिस्टेंट कमांडर सुधाकर शिंदे ने साथी एएसआई गुरुमुख सिंह के साथ नक्सली मुठभेड़ में जान गंवाई, वह उसी जगह की घटना है जहां 15 अगस्त को ग्रामीणों के साथ मिलकर उन्होंने तिरंगा फहराया था। ग्रामीणों को मिठाई, राशन व दवाएं भी उन्होंने उपहार में दी थी। घोर नक्सल इलाके में तैनाती देकर राष्ट्र ध्वज फहराना ड्यूटी के प्रति उनके जुनून को रेखांकित करता है। ग्रामीण उस दिन उनके साथ थे, पर शायद नक्सलियों ने भी उन्हें पहचान लिया था। सर्चिंग के लिये वे निकले थे और घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर उन्हें अपने निशाने पर ले लिया। संवेदना संदेश की औपचारिकताओं के साथ उनका नाम भी शहीदों की सूची में दर्ज हो गया। पर, अफसोस ही जता सकते हैं कि ऐसी घटनाएं अब न ब्यूरोक्रेसी को झकझोरती है न राजनीति को। क्या अगले स्वतंत्रता दिवस पर ऐसा नहीं होगा?  


21-Aug-2021 6:33 PM (378)

पारदर्शिता का तरीका
राजनांदगांव कलेक्टर तारणप्रकाश सिन्हा ने कलेक्टोरेट के अपने चेम्बर के दरवाजे बदलवाकर कांच लगवा दिया है। अब कलेक्टर अंदर क्या कर रहे हैं, यह बाहर से ही दिख जाता है। सर्वविदित है कि  ज्यादातर अफसर समस्याओं के निराकरण के लिए आए आम लोगों से मेल मुलाकात से कतराते हैं, और मीटिंग में व्यस्त होने का बहाना बना देते हैं। इस तरह की शिकायतों के चलते जीएडी को समय-समय पर दिशा निर्देश भी जारी करना पड़ता है।

बड़े अफसर तो मंत्री तक को गच्चा देने से बाज नहीं आते हैं। रमन सरकार के पहले कार्यकाल में स्कूल शिक्षा मंत्री रहे विक्रम उसेंडी, विभागीय सचिव आरसी सिन्हा से जरूरी सबजेक्ट पर चर्चा करना चाह रहे थे। उन्होंने सिन्हा को फोन लगवाया, तो जवाब मिला कि साब मीटिंग ले रहे हैं। करीब दो घंटे बाद फिर फोन मिलाया, तो वही जवाब मिला। इसके बाद उसेंडी सीधे सिन्हा के कमरे में चले गए।

सिन्हा अपने कमरे में अकेले थे, और चाय की चुस्कियां ले रहे थे। मंत्रीजी को एकाएक कक्ष में पाकर हड़बड़ा गए, और सफाई देने लगे। मंत्रीजी ने उन्हें जमकर फटकार लगाई, और फिर बाद में उन्हें विभाग से हटा दिया गया। एक सीएस, तो फाइलें निपटाकर अक्सर सरिता मैग्जीन पढ़ते थे। मगर चेम्बर के बाहर लाल लाइट जलती रहती थी इसका आशय यह था कि साब व्यस्त हैं। ऐसे चालबाज अफसरों से परे राजनांदगांव कलेक्टर ने पारदर्शी चेम्बर बनवाकर प्रशासन में पारदर्शिता लाने की कोशिश की है।

कैमरा भीतर, स्क्रीन बाहर !
भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अफसर आलोक कटियार जिस दफ्तर में रहते हैं, उसमें अपने चेम्बर के भीतर कैमरा लगवाकर उसे बाहर लगी स्क्रीन से जोड़ देते हैं। बाहर बैठे लोगों को दिखते रहता है कि साहब क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, कौन उनके साथ कितनी देर तक बैठे हैं। जो लोग किसी गलत अनुरोध के साथ आते हैं, वे कमरे में लगे कैमरे से नजारा बाहर से देखकर ही भीतर आते हैं। ऐसे में कोई गलत बात करने की हसरत जाती रहती है।  

महिला एसपी के साथ सेल्फी..
गरियाबंद में पदस्थ होने के बाद पुलिस अधीक्षक पारूल माथुर ग्रामीण इलाके के दौरे पर निकलीं। मैनपुर में  महिलायें उन्हें अपने बीच पाकर खुश हो गई। एसपी ने भी एक बच्ची को गोद में उठाकर दुलारा। गांव की महिलाओं ने उनके साथ सेल्फी लेकर इस दौरे की याद को सहेज लिया।

अपनी कोठी तैयार होने की खुशी
अंबिकापुर में नवनिर्मित कांग्रेस भवन का फीता मंत्री टी एस सिंहदेव ने काटा। पर मंत्री अमरजीत भगत के समर्थकों को यह रास नहीं आया और उन्होंने दूसरा फीता फिर बांधा, जिसे काटते हुए मंत्री भगत ने कहा कि कोई गुटबाजी वाली बात नहीं है, उनके समर्थक कार्यकर्ताओं में कुछ अधिक उत्साह था। उनकी इच्छा रखने के लिए ऐसा किया। पर लोगों का कहना है कि मंत्री भगत की खुशी इसलिए दोगुनी थी क्योंकि अब वे कांग्रेस की बैठकों में शामिल हो सकेंगे। दरअसल अब तक कांग्रेस कार्यालय महल के एक हिस्से, जिसे कोठीघर कहा जाता है, से संचालित होता रहा है। भगत वहां जाते ही नहीं थे।

श्रेय लेने की हड़बड़ी
प्रदेश में अब तक अनेक राजीव भवन यानी कांग्रेस भवनों का या तो निर्माण शुरू हो चुका या उनका लोकार्पण हो चुका है। यह हर जिले में बनाया जाना है। पर प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े जिले बिलासपुर में इसकी नींव रखना तो दूर,  अब तक जमीन का आवंटन भी नहीं कराया जा सका है। बौखलाए जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने बयान दे दिया है कि नगर निगम आयुक्त बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। भूमि आवंटन के आवेदन पर एनओसी नहीं दे रहे हैं।

हकीकत यह है कि आयुक्त को किसी जमीन आवंटन का एनओसी सामान्य सभा की मंजूरी देने का अधिकार नहीं है। सारी फाइलें तैयार है और सामान्य सभा के एजेंडे में यह शामिल कर लिया गया है। बैठक 24 को होने वाली है। मंजूरी मिलने में बस कुछ दिनों की देरी है। पर अध्यक्ष को डर था कि वे यह बयान नहीं देते हैं तो इस मंजूरी का श्रेय मेयर या किसी दूसरे नेता को मिल जाएगा।

डीएमएफ में कलेक्टर को अध्यक्ष बनाने की बात
छत्तीसगढ में कांग्रेस की सरकार बनी तो डीएमएफ के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी प्रभारी मंत्रियों को दे दी गई थी। खनिज न्यास ट्रस्ट का फंड छत्तीसगढ़ में 1000 करोड़ से अधिक का है। अधिकारी, नेता सब के लिए यह बड़े काम का है जिसमें ज्यादा औपचारिकताएं पूरी किए बगैर करोड़ों रुपए खर्च करने की मंजूरी दी जा सकती है।

अब केंद्र सरकार ने वापस कलेक्टरों को अध्यक्ष बनाने कहा है। राज्य सरकार के ऐसा न करने के आग्रह को ठुकरा भी दिया गया है। केंद्र की ओर से आरोप लगाया गया है कि इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। वैसे जब बीजेपी सत्ता में थी तब भी फंड का मनमाना इस्तेमाल किया जाता था। खान प्रभावित क्षेत्र की जगह दूसरे शहरों में ऐसे कार्यों में राशि खर्च की गई जिसका प्रावधान ही नहीं। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस इस दुरुपयोग के खिलाफ खूब आवाज उठाती रही, पर सरकार बनने के बाद वह भूल गई। शायद दो चार जिलों की जांच बिठा दी जाती तो केंद्र के सामने बदलाव रोकने के लिए दलील के काम आती। अब तो यही रह जाएगा कि कलेक्टर जिलों में नेताओ और डीएमएफ सदस्यों की बात सुन लिया करें। (rajpathjanpath@gmail.com)


20-Aug-2021 5:26 PM (428)

कांग्रेस में वीडियो बवाल 

पीएल पुनिया के करीबी सन्नी अग्रवाल का एक महिला के साथ आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक गलियारों में गदर मचा है। इस पर पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तो ट्वीट कर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम से जवाब मांग लिया है। सन्नी को माहभर पहले ही भवन-एवं सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल का चेयरमैन बनाया गया था। बताते हैं कि भाजपा नेता गौरीशंकर श्रीवास ने वीडियो सार्वजनिक प्लेटफार्म से उठाया, और फेसबुक पर अपलोड कर दिया। 

वीडियो में शामिल लड़की, मधुवन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले, राधा कैसे न जले.. गीत पर हावभाव इंगित करती दिख रही है। गौरीशंकर ने किसी का नाम नहीं लिखा, और कमेंट भी गंदा नहीं था, फिर भी सन्नी थाने पहुंच गए। सन्नी ने गौरीशंकर पर बदनाम करने का आरोप मढ़ दिया। सन्नी ने टीआई से कहा बताते हैं कि साब, मेरा और वीडियो में दिख रहे व्यक्ति का टैटू मिलान कर लीजिए, मेरा टैटू छोटा है। मेरी छबि खराब करने की कोशिश की जा रही है। 

बताते हैं कि यह वीडियो जून के महीने से टिक टॉक पर तैर रहा था। तब किसी ने ध्यान नहीं दिया। और जब गौरीशंकर ने फेसबुक पर वीडियो अपलोड किया, तो मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। सुनते हैं कि एक तिकड़मी नेता ने विवाद से बचने के लिए सन्नी को फौरन थाने में शिकायत करने की सलाह दी। सन्नी ने इसका अनुसरण किया। वैसे भी कभी-कभी अपने बचाव के लिए पहले हमला करना उपयुक्त नीति होती है। 

मगर यह मामला अब सन्नी को उल्टा पड़ता दिख रहा है। सन्नी की शिकायत के बाद गौरीशंकर थाने पहुंच गए, और पूरे वीडियो की सत्यता की जांच की मांग कर दी है। हल्ला यह है कि सन्नी की तरफ से महिला को आगे लाकर उनसे शिकायत कराने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन चर्चा यह भी है कि महिला ने ऐसा करने से मना कर दिया है। इससे परे पार्टी में जूनियर सन्नी अग्रवाल को मलाईदार निगम मिलने से कई कांग्रेस नेता नाखुश भी चल रहे हैं। उन्होंने भी वीडियो को मौके के रूप में देखा, और सन्नी की शिकायत पार्टी हाईकमान से कर दी है। देखना है अब आगे होता है क्या?

दुर्ग रेंज के लिए कौन?

प्रदेश के दूसरे पॉवरफुल रेंज माने जाने वाले दुर्ग के लिए नए आईजी की तलाश प्रशासनिक हल्के में जोरशोर से चल रही है। मौजूदा आईजी विवेकानंद सिन्हा एडीजी प्रमोट होने के बाद पीएचक्यू का रूख करने की तैयारी में है। उनकी जगह पुलिस महकमे में राजनीतिक और प्रशासनिक तालमेल में दक्ष अफसर को ही पदस्थ किए जाने की संभावना है। दुर्ग रेंज में करीब पौने दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके एडीजी सिन्हा का प्रमोशन करीब 6 माह देरी से हुआ है। अब वह पीएचक्यू में नए जिम्मेदारी सम्हालने का दिमाग लेकर दुर्ग रेंज में काम कर रहे हैं। दुर्ग में प्रदेश सरकार के ताकतवर मंत्रियों की तादाद भी है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का गृह जिला होने के साथ-साथ गृहमंत्री रविन्द्र चौबे और पीएचई मंत्री रूद्रगुरू भी इसी रेंज के विधानसभाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में पुलिस महकमे के रेंज स्तर पर मुखिया के तौर पर कुछ अफसरों का नाम चर्चा में है। बताया जा रहा है कि 2003 बैच के ओपी पाल के अलावा डॉ. संजीव शुक्ला का नाम भी रेंज आईजी के नाम चर्चा में है। 2003 बैच के ही बीएन मीणा भी केंद्रीय प्रतिनियुक्त से लौटकर नई जिम्मेदारी के लिए इंतजार में है। पीएचक्यू में आईजी स्तर के अफसरों की कमी के चलते प्रभारी आईजी के तौर पर डीआईजी अफसरों को मौका मिल सकता है। 

इतने पैसों को आखिर सहदेव संभालेगा कैसे?

सोशल मीडिया की खबरों के मुताबिक 'बसपन का प्यार...' गाकर मशहूर हुए बस्तर के सहदेव को बादशाह से एक करोड़, नेहा कक्कड़ से 50 लाख, एक कार कम्पनी की ओर से महंगी कार और राज्य सरकार से 10 एकड़ जमीन मिली है। सोशल मीडिया पर यह पढ़कर सुनकर लोग चिंतित हैं कि बालक इतने रुपये, उपहारों को संभालेगा कैसे?

पर हकीकत कुछ अलग है। एक पत्रकार ने सहदेव से सम्पर्क कर जो जानकारी सोशल मीडिया पर डाली है उसके अनुसार उसे अब तक कुल जमा 5 लाख रुपये मिले हैं।सबसे बड़ी रकम बादशाह से मिली। नेहा कक्कड़, बादशाह का एक-डेढ़ करोड़ देना केवल किस्सा है। कार नहीं मिली, बल्कि एक कार कंपनी ने 21 हजार रुपये दिये हैं। जिले के मंत्री कवासी लखमा ने एक टीवी उसे दिया है। राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना में मकान देने का आश्वासन दिया है। बादशाह ने पढ़ाई का खर्च भी उठाने की बात कही है। यानि, जीने का स्तर तो सुधरा है-पर अभी सहदेव और उसका परिवार एक साधारण जीवन ही जी रहा है।

किसान सम्मान निधि लौटाने का फरमान

प्रदेश में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की अब तक सात किश्त बंट चुकी है। हर किश्त के बाद अगले में किसानों की संख्या कम होती गई। हजारों ऐसे मामले सामने सामने आये जिसमें फर्जी किसानों को सम्मान निधि बांट दिये जाने की जानकारी बाहर आ गई। इनकी अगली किश्त तो रोक दी गई पर अब केन्द्र सरकार ने उनसे वसूली करने का आदेश जारी किया है। इसका जिम्मा कृषि विभाग को दिया गया है, क्योंकि सूची भी उनकी ही थी। अब अकेले कोरबा जिले की बात करें तो अब तक 25 हजार अपात्र किसानों का पता चल चुका है जिन्होंने पीएम किसान सम्मान निधि अंदर कर ली। इनसे कैसे वसूली की जाये यह विभाग के लिये सिरदर्द बन गया है। इसके पीछे वजह है कि वसूली भी उन्हीं अपात्रों से की जानी है जिनको पात्र बनाने के लिये एक हिस्सा एडवांस में ले लिया गया था। जिन लोगों ने फर्जी किसान बना दिये वे चिंता में हैं कि कहीं उनसे रिकव्हरी न हो जाये।

डॉक्टर ने ली रिश्वत, लोगों ने भीख मांगकर लौटाये

सरगुजा में दो माह पहले एक महिला के पति की सांप काटने से मौत हो गई। यहां के मेडिकल कॉलेज में संविदा डॉक्टर नारायण गोले ने उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख करने के एवज में 12 हजार रुपये रिश्वत ले लिये। महिला ने अपनी गरीबी का हवाला दिया तब इतने में बात तय हुई वरना मांग 50 हजार रुपये की थी। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया। सब अखबारों में घटना कवर हुई। लोगों का गुस्सा फूटा। वे डॉक्टर को बर्खास्त करने, लाइसेंस रद्द करने और रिश्वत की रकम लौटाने की मांग पर अस्पताल में ही धरने पर बैठ गये। जिला प्रशासन के आश्वासन पर आंदोलन खत्म किया गया। पर डॉक्टर को बख्श दिया गया। उसकी संविदा नियुक्ति तो समाप्त कर दी गई लेकिन कारण, सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता दिया गया। रिश्वत का कहीं जिक्र नहीं। पीडि़त महिला को रुपये भी नहीं लौटाये गये।

कई बार ऐसा हुआ है कि अधिकारियों ने रिश्वत लेने वालों को फटकार लगाते हुए रुपये वापस दिलाये हैं पर इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ। दो माह इंतजार किया गया। फिर कल कई संगठन उस गरीब महिला के रुपये लौटाने के लिये आगे आये। उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया। भिक्षा पात्र लेकर नगर भ्रमण किया और लोगों से सहयोग मांगा। इसके जरिये 11 हजार 170 रुपये मिल गये। डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के सिर से महिला को पैसे लौटाने का बोझ तो उतरा पर चर्चा शहर भर में हो गई। ऐसा उस शहर में हुआ जहां से स्वास्थ्य मंत्री प्रतिनिधित्व करते हैं।

 


19-Aug-2021 5:35 PM (396)

लालटेन का टोटा पड़ गया

बिजली की दरों में वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन में भाजपा नेताओं के पसीने छूट गए। पार्टी नेताओं ने कंडील (लालटेन) मार्च निकालने का फैसला तो ले लिया था, लेकिन जब कंडील लेकर मोहल्लों में घूमने की बारी आई, तो पता चला कि किसी के पास कंडील ही नहीं है। तब  कई  नेताओं ने कार्यकर्ताओं को गोलबाजार दौड़ाया, और खरीदकर कंडील का इंतजाम किया। इसके बाद कंडील जलाने की समस्या आ गर्ई। जलाने के लिए मिट्टी तेल नहीं था। कार्यकर्ताओं को तेल का इंतजाम करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।

कुछ को तो गरीब बस्तियों में भेजा गया, लेकिन अब तो ज्यादातर लोग उज्जवला स्कीम में आ चुके हैं, और मिट्टी तेल के बजाए गैस का उपयोग शुरू कर दिया है। फिर भी किसी तरह तेल का इंतजाम किया गया। इसके बाद कुछ कंडील जल पाए, तब कहीं जाकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया गया। पार्टी नेताओं के मुताबिक यह अब तक का सबसे कठिन प्रदर्शन था। कुछ कार्यकर्ता तो नेताओं को कोसने लगे, जो कि बिना सोचे समझे कंडील रैली का कार्यक्रम बना लिया था।

कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लेकर मिथक

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर काफी चर्चा और बयानबाजी हो चुकी है। इसके बीच छत्तीसगढ़ और अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लेकर एक रोचक मिथक चर्चा में सामने आया है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद और उससे पहले अविभाजित राज्य में छत्तीसगढ़ से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले किसी भी कांग्रेसी नेता ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। कोई भी तीन साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाया। यह अलग बात है कि वे एक से अधिक बार मुख्यमंत्री पद पर रहकर पांच साल से ज्यादा समय तक कुर्सी पर रहे। अलग राज्य बनने से पहले श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे  कभी भी तीन साल से ज्यादा समय तक सीएम नहीं रहे। पहली बार वे मार्च 1969 में मुख्यमंत्री बने और जनवरी 1972 तक पद रहे। तीन साल से करीब दो महीने पहले उन्हें कुर्सी छोडऩी पड़ी। इसके बाद वे दिसंबर 1975 से अप्रैल 1977 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस बार भी तीन साल से कम समय के लिए मुख्यमंत्री रहे। तीसरी बार श्यामाचरण दिसंबर 1989 में सीएम बने और मार्च 1990 तक पद पर रहे और इस बार भी वे 3 साल से कम समय़ के लिए सीएम रहे। इसी तरह छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले मोतीलाल वोरा अविभाजित मध्यप्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री रहे। पहली बार वे मार्च 1985 से फरवरी 1988 तक मुख्यमंत्री रहे। मतलब तीन साल से एक महीना कम समय के लिए वे सीएम रहे। इसके बाद दूसरी बार वे जनवरी 1989 से दिसंबर 1989 तक राज्य के मुखिया रहे। छत्तीसगढ़ बनने के बाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी ने शपथ ली। वे 1 नवंबर 2000 से 7 दिसंबर 2003 तक मुख्यमंत्री रहे। इस तरह वे 3 साल 34 दिन तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनका कार्यकाल भी एक तरह से तीन साल का ही माना जा सकता है, क्योंकि इस दौरान चुनावों की घोषणा और नई सरकार के गठन तक पद पर रहना संवैधानिक बाध्यता भी है। साल 2003 से 15 साल तक राज्य में बीजेपी की सरकार थी। वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत हासिल हुआ। तब 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके तीन साल का कार्यकाल इस साल दिसंबर में पूरा होगा।

आगे बढक़र स्ट्रोक लगाते महंत !

विधानसभा अध्यक्ष का पद संवैधानिक माना जाता है। इस पद पर बैठे सियासतदार आमतौर प्रोटोकॉल मेंटेंन करते हैं और राजनीतिक बयानबाजियों से परहेज करते हैं, लेकिन राज्य के मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत पिछले कुछ दिनों से मीडिया से खूब सियासी और रोचक अंदाज में बातें कर रहे हैं। सियासत को खेल-खेल में समझाने की भी कोशिश कर रहे हैं और संदेश भी दे रहे हैं। मनेन्द्रगढ़वासियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनके बयान के दूसरे दिन इलाके के लोग जिले के वासी हो जाएंगे, जबकि उन्होंने काफी स्पष्टता के साथ कह दिया था कि आने वाला कल मनेन्द्रगढ़ के लिए ऐतिहासिक होगा। राज्य के मुखिया ने मनेन्द्रगढ़ को जिला बनाने का ऐलान कर दिया। इतना ही सीएम ने महंत के विधानसभा क्षेत्र के सक्ती को भी जिला बना दिया। वे सबसे ज्यादा जिला बनवाने वाले जनप्रतिनिधि हो गए हैं। यह बात भी उन्होंने खुद स्वीकारी की कि वे सीएम से ज्यादा जिले बनवा चुके हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि जिला बनाना था तभी तो सक्ती में पहले से ही आईएएस अधिकारी की पोस्टिंग कर दी गई थी। डॉ महंत इतने में नहीं रूके और उन्होंने कह दिया कि आने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ में 36 जिले होंगे। मतलब तय माना जा रहा है कि सरकार आने वाले में 4 और जिला बनाने की घोषणा कर सकती है। महंत पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं तो कांग्रेस संगठन ने भी उनकी हां में हां मिलाया और कहा कि महंत कह रहे हैं, तो सोच-समझकर कह रहे होंगे और ऐसा जरूर होगा। खैर, महंत के इस नए रूप को देखकर कांग्रेसी और उनको करीब से जानने वाले भी आश्चर्यचकित हैं, क्योंकि लोगों ने महंत को कभी ऐसे आगे बढक़र सियासी स्ट्रोक लगाते नहीं देखा। कुल मिलाकर वे सियासी या प्रशासनिक हर तरह की गेंद को हवा में उछालकर बाउंड्री के बाहर पहुंचा रहे हैं। लिहाजा लोगों का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। खैर, खिलाड़ी और खेल से जुड़े लोग तो इस बात को जानते हैं कि मैदान पर कोच का निर्देश मिलने पर खिलाड़ी अक्सर आगे बढक़र स्ट्रोक लगाने उतावला रहते हैं, परन्तु सियासत में ऐसा कोई नियम है नहीं, इसलिए लोग अटकलें ही लगा सकते हैं कि कहीं सियासी मैदान में महंत को कोच से आगे बढक़र स्ट्रोक लगाने का निर्देश तो नहीं मिला है ?

परिंदों का रहवास उजड़ रहा, अफसर एसी कमरों में

बिलासपुर जिले के मोहनभाटा में सेना की जमीन है, जहां द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में विमान उतरने के लिए हवाई पट्टियां बनी थीं। इस महंगी जमीन पर बड़े किसानों ने कब्जा कर फल के बगीचे, फॉर्म हाउस बना लिए और छोटे किसान हर साल अपने खेत का बढ़ाते और नया कब्जा करते जा रहे हैं। खेतों में कीटनाशक छिडक़ाव और कृषि गतिविधियों के कारण जीव और वनस्पति जगत पर यहां खतरा बना है।

इसका नुकसान विलुप्त प्राय: हो रहे परिंदों को अपनी अस्तित्व खोने की कीमत देकर चुकाना पड़ है। दस साल पहले मोहन भाटा में 8-10  इंडियन कर्सर बचे थे। फिर 7 और बाद में इनकी संख्या 5  रह गई। वे यहीं प्रजनन करते रहे हैं। इस बार एक माह से ज्यादा वक्त हो गया है मात्र एक ही परिंदा दिखाई दे रहा है, बाकी कहां चले गए या शिकारियों के हाथों जान गंवा चुके पता नहीं।

दरअसल मोहनभाटा की भूमि में बारिश की पहली बौछार के साथ अर्थवर्म तेजी से पनपते हैं जो कई प्रवासी परिंदों की पसन्दीदा खुराक है। वे गीली भूमि पर इनको पकडक़र नूडल्स की तरह सुडक़ते हैं। करीबी गांव वालों की गाय चराई यहां होती है और गोबर में होने वाले कीड़े भी परिन्दों का भोजन है। मरे मवेशियों की सफाई यहां सफेद गिद्ध करते हैं।

राजस्थान में अब मिलने वाले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को काफी पहले अकलतरा में देखा जाता था, पर वहां क्रशर प्लांट और सीमेन्ट कारखाना लगने के बाद वे विलुप्त हो गये। स्थानीय लोग इस पक्षी को ‘खड़बाग’ कहते थे।

वन विभाग को सब पता है, पर कुर्सी पर जमे ऐसी रूम से निकल कर कभी इधर नहीं पधारे औऱ ना ही इस रहवास को बचाने उनके अमले ने कोई कदम उठाया। छतीसगढ़ में जैव विविधता को बचाने सरकारी अमला है पर वह कोई कार्रवाई करते दिखता नहीं। यहां शिकार से इन पक्षियों का बचाने कुछ पक्षी प्रेमी ऐसे तत्वों को अपनी हिम्मत और जोखिम उठा कर रोकते हैं. जो नाकाफी है।

(प्राण चड्ढा/फेसबुक)

तब तक सरकारी मंच पर नहीं...

मानपुर-मोहला को जिला बनाने को अम्बागढ़ चौकी की उपेक्षा मानते हुए वहां के लोगों ने आंदोलन कर दिया। कांग्रेस विधायक छन्नी साहू ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। अब मांग में परिवर्तन लाते हुए कहा जा रहा है कि नाम चाहे मानपुर ही रहे पर जिला मुख्यालय अम्बागढ़-चौकी में स्थापित हो। दूसरी ओर कोरिया की विधायक अंबिका सिंहदेव ने घोषणा कर दी है कि जब तक जिले का सही विभाजन नहीं होगा वे किसी सरकारी कार्यक्रम के मंच पर नहीं चढ़ेंगीं। यहां कहा जा रहा है कि नया जिला तो मनेन्द्रगढ़ बन गया है, पर खडग़वां और सोनहत ब्लॉक को कोरिया जिले में रहने दिया जाये। मनेन्द्रगढ़ में मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद जश्न मनाया गया तो चिरमिरी वालों ने इस मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया कि जिला मुख्यालय चिरमिरी हो। अपने विधानसभा की जनता के साथ खड़े रहना, या कम से कम खड़े होते दिखाई देना विधायकों की जरूरत भी है और विवशता भी। क्या यह विरोध नये जिलों को लेकर लिये गये फैसलों पर कोई बदलाव लायेगा, यह देखना होगा।


18-Aug-2021 5:53 PM (225)

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक..

लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी देना तो आसान रहता है लेकिन जब लोग उन अधिकारों का इस्तेमाल करने पर उतारू हो जाते हैं तो फिर अधिकार देने वालों को भी कुछ परेशानी होने लगती है। अब अभी छत्तीसगढ़ में पाठ्य पुस्तक निगम ने भारत के संविधान की बुनियादी जानकारी देते हुए किताबें छापी हैं और उन्हें प्रदेश के छात्र-छात्राओं को दिया जा रहा है। इनमें मुख्यमंत्री, राज्यपाल, शिक्षा मंत्री के साथ-साथ पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी का भी एक संदेश छपा। संदेश क्योंकि आमतौर पर किसी के लेटर पैड पर टाइप करके उसे ही छाप दिया जाता है, तो इस नाते शैलेश नितिन त्रिवेदी का मोबाइल नंबर भी लाखों बच्चों तक पहुंच गया। उनमें से कुछ लोगों ने तो उस मोबाइल पर फोन करके अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद दिया, लेकिन दुर्ग जिले के उतई के एक चाय वाले ने फोन करके शैलेश नितिन त्रिवेदी से पूछा कि क्या पानी भारतीय नागरिक का बुनियादी अधिकार है? हां में जवाब मिलने पर उस आदमी ने कहा कि वह एक चाय ठेला चलाता है, उसे पहले नल कनेक्शन मिला हुआ था लेकिन क्योंकि वह चाय ठेला भी चलाता है इसलिए कनेक्शन घरेलू बतलाकर उसे काट दिया गया। तो अब बतलाया जाए कि पानी पाना उसका बुनियादी अधिकार है या नहीं? शैलेश नितिन त्रिवेदी ने उसे सलाह दी कि वे अपने स्थानीय विधायक से अपनी दिक्कत बताएं। लेकिन वह चायवाला पीछे लग गया कि संविधान की किताब तो आपने छाप कर बच्चों को भेजी है इसलिए आप ही बताएं कि पानी का बुनियादी अधिकार उसे क्यों नहीं दिया जा रहा है?

संविधान की जानकारी दे देना आसान है इस जानकारी का इस्तेमाल करने पर लोग आमादा हो जाएं तो सत्ता पर बैठे लोगों को दिक्कत होने लगेगी।

साथ रहते हुए भी भनक नहीं

कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव ने पार्टी छोड़ दी है, और तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा बन गईं। एक दिन पहले ही वो राहुल गांधी से मिली थीं। उनके साथ संसदीय सचिव विकास उपाध्याय भी थे। विकास, असम प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं।

सुष्मिता ने विकास को भी भनक नहीं लगने दी, और राहुल से मुलाकात से पहले कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए सुझाव देती रहीं। और जब पार्टी छोडऩे की खबर आई, तो कांग्रेस नेताओं को झटका लगा। पार्टी हाईकमान द्वारा सुष्मिता के पार्टी छोडऩे के मामले पर विकास से पूछताछ की भी खबर है। कांग्रेस के कुछ और बड़े नेताओं के भी पार्टी छोडऩे का हल्ला है।

सुष्मिता के बाद यूपी के बड़े नेता, और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह के भी पार्टी छोडऩे की चर्चा है। कहा जा रहा है कि आरपीएन सिंह भी पिछले कुछ दिनों से पार्टी दफ्तर नहीं जा रहे हैं। खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ के ही नेता राजेश तिवारी, यूपी कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं। मगर विकास की तरह राजेश तिवारी को भी झटका लग जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

कर्ज से उबरने के लिए

आरडीए ने कर्ज से उबरने के लिए दो बड़ी योजना प्रस्तावित की है। इसमें रेलवे स्टेशन के समीप मार्कफेड की नूतन राइस मिल की खाली 11 एकड़ जमीन पर आवासीय कॉलोनी बनाने की योजना है। इसी तरह आकाशवाणी के समीप काली मंदिर के पीछे सरकारी जमीन पर सी-मार्ट बनाने का प्रस्ताव है। ये योजनाएं अभी कागज पर ही है, लेकिन इसका विरोध शुरू हो गया है।

समता कॉलोनी, और आसपास के लोग नूतन राइस मिल की खाली जमीन पर कॉलोनी बनाने के बजाए ऑक्सीजोन बनाने पर जोर दे रहे हैं। वजह यह है कि रेल्वे स्टेशन के नजदीक होने के कारण वहां भीड़ भाड़ काफी रहता है, और कॉलोनी बनने से प्रदूषण बढ़ेगा। यही हाल, काली मंदिर के पीछे सरकारी जमीन पर सी-मार्ट जैसा व्यावसायिक परिसर बनाने से भी कुछ इसी तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती है। लिहाजा, इस योजना के विरोध स्वरूप जन आंदोलन की तैयारी है। ऐसे हाल में आरडीए की योजना मूर्त रूप लेना कठिन होगा।

जब गणेश शंकर पूर्व सांसद प्रदीप के पहुंचने की खबर से लौटे

छत्तीसगढ़ के पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी  जीएस मिश्रा की भाजपा का दामन थामने की इन दिनों राज्य की सियासी गलियारे में जमकर चर्चा हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पहले कार्यकाल में राजनांदगांव कलेक्टर रहे जीएस मिश्रा की नई राजनीतिक भूमिका की बात जब चल रही हो तो उनके नांदगांव कलेक्टरी करते पूर्व सांसद प्रदीप गांधी से बढ़ी तल्खी को अब चटकारे लेकर छेड़ा जा रहा है।

बताते हैं कि भले ही पूर्व सांसद गांधी खुद को रमन का हनुमान बताते थे, लेकिन प्रशासनिक रूप से उनकी जीएस मिश्रा के सामने दाल नहीं गल रही थी। उनके बीच इस कदर दूरी बढ़ी कि जब पूर्व महापौर विजय पांडे के अगुवाई में होने वाले शहर के मशहूर राष्ट्रीय दशहरा उत्सव समिति के रावण दहन कार्यक्रम में मौजूद जीएस मिश्रा प्रदीप गांधी के आने की खबर मात्र से ही कुर्सी छोडक़र चले गए। दोनों के मध्य आपसी तनातनी हमेशा बनी रही। अब जीएस मिश्रा की बात हो रही है तो एक दूसरा सकारात्मक पहलू यह भी है कि बतौर जिलाधीश डोंगरगढ़ दर्शनार्थियों के पदयात्रा को सुनियोजित और व्यवस्थित रूप देकर उन्हें काफी वाहवाही बटोरी। मिश्रा की दखल से नौ दिन की पदयात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालुओं को रास्तों में रेस्टोरेंट और होटल जैसी आरामदायक सुविधाएं मिली। जिससे यात्रियों की संख्या भी बेतहाशा बढ़ी और मां बम्लेश्वरी की भव्यता भी काफी विस्तृत हुई।

महुआ फ्रांस और ब्रिटेन पहुंच गई

महुआ छत्तीसगढ़ ही नहीं अन्य राज्यों में भी आदिवासी समाज के रहन-सहन, जीवन-यापन का अभिन्न हिस्सा है। उनकी संस्कृति से भी जुड़ा है। गांवों में उपलब्ध संसाधनों के जरिये ही महुआ से शराब बना ली जाती है जो दो चार दिनों तक ही पीने लायक होती है। शराब पश्चिम के जिन देशों में  चाय, कॉफी या वेलकम ड्रिंक के रूप में प्रचलित है वहां महुआ की खूबियों पर वैज्ञानिक शोध चल रहे हैं। ऐसे में पहली बार समुद्री रास्ते से कटघोरा से महुआ की खेप फ्रांस और ब्रिटेन भेजी गई है। वैसे तो यह जानकारी केन्द्र सरकार की एपीडा (कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद विकास प्राधिकरण) ने ट्विटर पर अपनी उपलब्धि के तौर पर दी है पर जैसी जानकारी हमने जुटाई पता चला कि एक वर्ष से कटघोरा के एक युवा व्यापारी निखिल धनौंदिया अपने संपर्कों के जरिये ही सरकार के बिना किसी सहयोग से आगे बढ़े।

निखिल बताते हैं कि यह उनका एक स्टार्टअप है जिसकी एपीडा ने सराहना की। जिन देशों ने मंगाया है वो संभवत: ज्यादा टिकाऊ और बेहतर शराब बनायेंगे। सिरप और सॉफ्ट पेय में इसका इस्तेमाल हो सकता है। 11 अगस्त को पहली खेप जब भेजी गई तो एपीडा के अध्यक्ष डॉ. एम अंगमुथु ने हरी झंडी दिखाकर उसे रवाना भी किया। एकत्रित महुआ फूल को चार-पांच दिन तक धूप में सुखाकर 10 प्रतिशत नमी की स्थिति में आने तक निर्जलित (डिहाईड्रेटेड) किया जाता है फिर एक खास तरह के बैग में पैक कर दिया जाता है। ये फूल कोरबा, कटघोरा, सरगुजा, पसान, पाली, छुरी आदि के जंगलों से एकत्र किये गये थे। निखिल कहते हैं कि एपीडा का स्टार्ट अप को प्रोत्साहित करना तो अच्छा है पर किसी भी स्टार्टअप के लिये बड़ी फंडिंग, फाइनेंस की भी जरूरत पड़ती है। उन्होंने खुद तो अपने संसाधनों से एक शुरुआत कर ली है पर अनेक दूसरे युवा भी कुछ अलग हटकर काम करना चाहते हैं, उन्हें वित्तीय समर्थन मिलना चाहिये।

 


17-Aug-2021 7:19 PM (317)

जितेन्द्र आईपीएस बिरादरी से हॉट स्प्रींग के लिए पहले अफसर

नारायणपुर में 16वीं बटालियन के कमंाडेंट जितेन्द्र शुक्ला की प्रदेश में काबिल अफसरों में गिनती होती है। 2013 बैच के शुक्ला को नक्सल लड़ाई में जोश भरने के लिए भी जाना जाता है, अब वह देश का सिरमौर कहे जाने वाले लेह-लद्दाख में शहीदों की याद में सालाना होने वाले हॉट स्प्रींग के आयोजन में छत्तीसगढ़ पुलिस का प्रतिनिधित्व करेंगे। जितेन्द्र शुक्ल हॉट स्प्रींग के लिए राज्य सरकार से चुने जाने वाले पहले आईपीएस अफसर हैं। हालांकि कुछ साल पहले सुकमा से एक उपनिरीक्षक को इस समारोह में भाग लेने का अवसर जरूर मिला, लेकिन आईपीएस लेवल पर जितेन्द्र पहले अधिकारी होंगे।

 21 अक्टूबर 1959 को माइनस डिग्री में बर्फीले चट्टानों की आड़ में चीनी सेना ने धोखे से पैरामिलिट्री सीआरपीएफ पर हमला कर दिया। इस घातक हमले में 10 जवान शहीद हुए थे। उस जमाने में इस हमले को आजाद भारत के सबसे बड़े हमले के रूप में जाना जाता है। शहादत की इस घटना को याद करने के लिए हर साल देशभर के सुरक्षाबलों से चुंनिदा अफसरों को सलामी देने के लिए चुना जाता है।

बताते हैं कि केंद्र सरकार की निगरानी में प्रतिनिध् िामंडल का गठन होता है। राज्य सरकार से केंद्र ने कार्यक्रम में शामिल होने के लिए नाम मांगे थे। शुक्ला के नाम की सरकार के अफसरों ने सिफारिश की थी। 24 अगस्त से 9 सितंबर के बीच शहादत समारोह शुक्ला सलामी देकर राज्य का गौरव बढ़ाएंगे।

छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास पर किताब

भले ही अब तक देश की दूसरी भाषाओं की तरह छत्तीसगढ़ी फिल्मों को मुकाम हासिल न हुआ हो, पर, इस लिहाज से खास हैं कि हर साल बड़ी संख्या में प्रोडक्शन होता है। और यह इतिहास कुछ बरसों का नहीं, बल्कि 50 सालों का है। इसके इतिहास को सहेजने का काम किया है रायपुर के अखिलेश कुमार शर्मा ने। उन्होंने छत्तीसगढ़ी सिनेमा पर पहली किताब ‘हमर छालीवुड’ लिखी है। किताब में छत्तीसगढ़ी फिल्मों के 50 सालों के इतिहास पर रोशनी डाली गई है। पहली फिल्म और उसका पहला सीन, पहली पोस्टर इसमें दर्ज है। बहुत सी फिल्में 100 दिन से लेकर 25 सप्ताह और उससे अधिक सिनेमाघरों में चलीं, उनका भी विवरण मिलेगा। अमेरिका सहित दूसरे देशों में छत्तीसगढ़ी फिल्मों का क्या रिस्पॉन्स रहा, कब कौन से अवार्ड मिले, राजनीति में इसका क्या असर था, कलाकार कौन थे और उनकी कहानी क्या थी, इस किताब में विस्तार से है। दरअसल, यह एक पोस्टर्स का संकलन है जिसमें विवरण भी साथ-साथ दर्ज है। किताब की खूबियों को देखते हुए इसे ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज भी किया गया है। संस्था के प्रतिनिधियों ने स्पीकर डॉ. चरण दास महन्त के हाथों लेखक को यह रिकॉर्ड सौंपा। 

देवसेनापति भी प्रतिनियुक्ति पर

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर केसी देवसेनापति भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं, उनकी जनगणना निदेशालय में संचालक के पद पर पोस्टिंग हो गई है। विशेष सचिव स्तर के अफसर देवसेनापति, अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के पद पर हैं। इससे पहले रजत कुमार की पोस्टिंग हुई थी। जो कि दिल्ली चले गए। उनके जाने के बाद राज्य सरकार ने देवसेनापति का नाम पैनल में भेजा था। देवसेनापति अब छत्तीसगढ़ में जनगणना का काम देखेंगे।


16-Aug-2021 5:31 PM (243)

छात्र नेतृत्व के लिये इंटरव्यू

बीजेपी की तरह कांग्रेस कैडर बेस्ड पार्टी नहीं है इसलिये संगठन के पद नेताओं की सिफारिश और उनकी पहुंच के आधार पर दे दिये जाते हैं। पर छात्र इकाई में पदाधिकारियों के चयन के लिये इस बार कांग्रेस ने लगभग वह तरीका अपनाया है जो कैडर वाले किसी संगठन में पाया जाता है। प्रदेश एनएसयूआई का नया अध्यक्ष चुना जाना है। इसके लिये राज्य के बड़े नेताओं से नाम नहीं मंगाये गये, बल्कि जो एनएसयूआई में पहले से काम कर रहे हैं उनसे आवेदन मांगे गये। दिल्ली में इनका इंटरव्यू हुआ। उन्हें अब तक के छात्रों व समाज के लिये गये कार्यों के बारे में पूछा गया। भविष्य में किन योजनाओं को वे लाना चाहते हैं, उस पर सवाल हुए। कोरोना महामारी और छात्रों की पढ़ाई को इस अवधि में पहुंची क्षति की भरपाई कैसे होगी, यह भी पूछा गया। प्रदेश से 14 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिये चुना गया था। इनमें भावेश शुक्ला, पूर्णानंद साहू, अमित शर्मा, चमन साहू, नीरज पांडे, आदित्य सिंह, निखिल कांत साहू आदि छात्र शामिल थे। हालांकि बताया जाता है कि इन 14 नामों में अधिकांश का किसी न किसी सीनियर नेता से सम्पर्क है। बहुत पहले कॉलेजों के स्टूडेंट यूनियन के चुनाव होते थे, लोकप्रिय छात्र नेताओं का आसानी से पता चल जाता था और उन्हें एबीवीपी, एनएसयूआई में अपनी जगह अपने-आप मिल जाती थी। अब यह नये मापदंड से चुने जाने वाले छात्र नेता अपने संगठन को कितना मजबूत कर सकेंगे, समय बतायेगा।

जितने जिले, उनसे दुगने नाम

छत्तीसगढ़ में पहले सिर्फ 11 जिले थे, फिर 18 फिर 23 और 28 हो गये। अब 15 अगस्त को चार नये जिले घोषित कर दिये जाने के बाद इनकी संख्या बढक़र 32 हो जायेगी। मध्यप्रदेश से अलग राज्य बनने के बाद अवसर मिला और प्रशासनिक कसावट के लिये कई दूरदराज के इलाकों को जिला मुख्यालय घोषित किया गया। मध्यप्रदेश के समय जब जांजगीर और कोरबा को जिला घोषित किया गया तो चाम्पा में लोग आंदोलन पर उतर गये। समझौता ऐसे किया गया कि जिले का नाम ही जांजगीर-चाम्पा कर दिया गया। हालांकि अधिकांश मुख्यालय अब भी जांजगीर और नवागढ़ में ही स्थापित हैं।

बलौदाबाजार-भाटापारा, बलरामपुर-रामानुजगंज जिलों का नाम भी सबको संतुष्ट करने के हिसाब से रखा गया। अन्य नये जिलों में भी पहचान और प्राथमिकता का सवाल आया। सन् 2018 में दुबारा कांग्रेस सरकार बनी तो फिर एक नया जिला बना। नाम रखने पर विवाद न हो इसके लिये लम्बा सा नाम गौरेला-मरवाही-पेन्ड्रा रख दिया गया। इसका नाम तो इतना लम्बा हो गया कि सीजीपीएससी के कॉलम में अतिरिक्त जगह बनानी पड़ी। अब संक्षेप में लोगों ने इसे जीपीएम कहना शुरू कर दिया है।

बीते 15 अगस्त को मानपुर-मोहला जिले की भी घोषणा हुई है। इसके समीप के अम्बागढ़-चौकी के लोगों की भी जिला बनाने की मांग थी। वहां लोग मानपुर-मोहला को जिला बनाने और अम्बागढ़-चौकी को नहीं बनाये जाने के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। खास बात है कि उनके आंदोलन को अपनी ही सरकार के खिलाफ वहां की कांग्रेस विधायक छन्नी साहू भी साथ दे रही हैं। वे कहती हैं कि इसे जिला बनाने की मांग पुरानी थी। जनता अगर आंदोलन पर उतर गई है तो मुझे तो प्रतिनिधि होने के नाते उनका साथ तो देना पड़ेगा। सीएम से मिलने के लिये उन्होंने समय मांगा है। तब शायद एक जिले का नया नाम आकार लेगा, जो लंबाई में जीपीएम का भी रिकॉर्ड तोड़ देगा। वैसे विधायक एक बार पहले भी डेढ़ साल पहले भी नगर पंचायत चुनाव में हुए विवाद को लेकर राजीव भवन में जिला कांग्रेस अध्यक्ष को हटाने के लिये धरना दे चुकी हैं।

वैक्सीनेशन विहीन ट्रेन, हवाई-जहाज यात्री

कोविड वैक्सीनेशन को लेकर जागरूकता की बात की जाती है तो अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों व आदिवासी बाहुल्य जिलों का आंकड़ा सामने होता है। पर शिक्षित व समझदार समझे जाने वाले लोगों में भी इसकी कमी दिखाई दे रही है। ट्रेन और हवाई जहाज से यात्रा करने वालों को कोविड का वैक्सीन लगवाना या फिर 72 घंटे के भीतर का आरटी पीसीआर टेस्ट होना जरूरी है, पर यात्री यह जरूरी टेस्ट नहीं करा रहे हैं। रायपुर और बिलासपुर जैसे स्टेशनों में हर दिन पांच सात सौ ऐसे यात्री मिल रहे हैं जिन्होंने कोविड टीका नहीं लगवाया न ही उनके पास कोई ताजा टेस्ट रिपोर्ट है। कई यात्री तो लम्बे-चौड़े फ्लेटफार्म में गली तलाशने लगते हैं कि बिना तलाशी के वे बाहर कैसे निकल सकें।

ऐसा मान भी लिया जाये कि ट्रेनों में अमीर-गरीब हर तबके का व्यक्ति सफर करता है, कुछ लोग कम पढ़े लिखे भी होते हों, पर हवाई जहाज का सफर ऐसा नहीं है। पर रायपुर-बिलासपुर के हवाईअड्डों में भी बड़ी संख्या में ऐसे यात्री रोजाना मिल रहे हैं, जिन्होंने न तो कोविड टेस्ट निगेटिव रिपोर्ट रखी है न ही एक भी डोज वैक्सीन का लगवाया। ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे? शायद वे लैब जाने की जगह सीधे स्टेशन या एयरपोर्ट का रुख, समय बचाने के लिये कर रहे हैं। भले ही उन्हें इसके लिये अतिरिक्त राशि और समय  उन्हें गंवाना पड़ रहा है।


14-Aug-2021 5:48 PM (333)

नागों ने अब अपना चेहरा बदल लिया...

कभी नागपंचमी पर दंगल होते थे, पर अब अखाड़ा-कुश्ती का नहीं, जिम का दौर है। फूड सप्लीमेंट पर अधिक ध्यान दिया जाता है। खेतों में कीटनाशकों ने नाग और सर्पों का बड़ा विनाश किया है। नाग अब गांव-देहात में नहीं शहरों में, रूप बदल कर रहते हैं। लेकिन आस्तीन के सांप सर्वत्र मिल जाते हैं।

कहते हैं नाग खजाने की रक्षा करता है। पर अब ये नाग जमाखोरी, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी या फिर काले-पीले धंधे से सात पीढिय़ों के लिए धन अर्जित करते हैं और उस पर कुंडली मार कर बेहद कंजूसी से जीते हैं। उनका धन समाज या उनके लिए नहीं, दीमक के काम आएगा।

दहेज का नाग बहुत जहरीला है। जाने कितने घरों में इसके दंश से हर साल महिलाएं शिकार बन रही हैं या फिर बेटियां घर में सहमी हैं।

इच्छाधारी नागों ने अब बहुतेरे रूप ले लिए हैं। कई सर्प नफरत का जहर मीडिया के माध्यम बांट रहे हैं। कुछ नाग बाबा अपनी की काली करतूतों की वजह जेल में हैं या विदेश भाग गए। वापस बिल में आने को तैयार नहीं। (प्राण चड्ढा/फेसबुक से)

हाथियों ने बदल दी दिनचर्या

कोरबा व कटघोरा वन मंडल हाथियों से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यहां अब से 21 वर्ष पहले 20 हाथियों का झुंड आया था। तीन चार गांवों में ही इसका असर था। अब इनकी संख्या कई गुना बढ़ चुकी है जो कोरबा, कटघोरा, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही क्षेत्र में विचरण करते हैं। जिन 50-60 गांवों में हाथी आये दिन हमला करते हैं वहां के निवासियों को अपनी दिनचर्या में बदलाव लाना पड़ा है। वे मिट्टी के घरों में रहने के आदी रहे हैं, जिसमें वे अपने को प्रकृति के ज्यादा करीब पाते हैं, पर अब शाम होते ही उन्हें पक्के घरों में जाना होता है। यह स्कूल, पंचायत भवन या किसी का निजी मकान होता है। महुआ आदिवासियों के खान-पान का एक अंग है, उनका रोजगार भी इससे जुड़ा है पर अब घरों में वे महुआ बीज एकत्र करके नहीं रखते। या तो इसे वे पक्के घरों में रखते हैं या फिर एकत्र लेने के तुरंत बाद बाजार ले जाते हैं। ग्रामीणों ने अपनी बस्तियों में लगे कटहल के पेड़ भी काट डाले हैं क्योंकि हाथी इन्हें खाने के लिये भी पहुंचते रहते हैं। फसल की रखवाली के लिए खेतों के पास तेज बल्ब जलाये जाते हैं। रोशनी के चलते हाथी पास नहीं फटकते। कई गांवों में मचान बना लिये गये हैं, जहां से हाथियों के मूवमेंट का पता चल जाता है। यह वही इलाका है जहां लेमरू एलीफेंट रिजर्व बनाये जाने की बात कही जा रही है पर सरकारी योजना जमीन पर अभी उतरी नहीं है। जीने के तरीके में बदलाव लाने के बाद ग्रामीण अपने घरों और फसलों को बचाने में काफी हद तक सफल हो रहे हैं।

रेलवे किराया और सांसदों की खामोशी

कोरोना की दूसरी लहर के बाद अब प्राय: हालात सामान्य हो चुके हैं और सभी व्यावसायिक गतिविधियां रफ्तार पकड़ रही है। पर रेलवे के लिये ऐसा नहीं है। अब भी जिन बंद की गई ट्रेनों को दोबारा चलाने का निर्णय लिया जा रहा है उनको स्पेशल का नाम दिया जा रहा है। स्पेशल होने के कारण इनमें बढ़ा हुआ किराया वसूल किया जा रहा है। नौकरी और रोजगार के लिये रोजाना हजारों यात्री रायपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़ आदि से सफर करते हैं पर इन्हें किराये में बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है क्योंकि एमएसटी शुरू नहीं की गई है। जबकि महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लोकल ट्रेन शुरू हो चुकी है और मासिक सीजन टिकट भी जारी किया जा रहे हैं। केन्द्र में छत्तीसगढ़ से 9 लोकसभा सदस्य भाजपा से हैं पर यहां हो रहे भेदभाव की ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा है।

खेल मैदान बदनामी के स्मारक न बन जाएं ?

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार के बारे में कहा जाता है कि सरकार विलासितापूर्ण और चकाचौंध भरी गैरजरूरी निर्माण के पक्ष में नहीं है, बल्कि सरकार परंपराओं और संस्कृति के सम्मान वाले विकास को प्राथमिकता देती है। ऐसे में जब राजधानी के खेल मैदानों के ओर देखते हैं, तो ये बातें धरातल में दिखाई नहीं देती। शहर के सबसे पुराने और ऐतिहासिक सप्रे शाला मैदान का उदाहरण हमारे सामने है। यह मैदान केवल खेल गतिविधियों के कारण नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई से लेकर परंपराओं-सांस्कृतिक और एतिहासिक गतिविधियों का साक्षी है। लेकिन जिस तरह से खेल मैदानों की बरबादी और व्यावसायिक उपयोग की खुली छूट दी जा रही है, उसके बाद ऐसा नहीं लगता कि सरकार में बैठे लोगों को संस्कृति और परंपराओं के मान-सम्मान की फिक्र है। वाकई ऐसा होता तो मैदान धीरे-धीरे सिकुडक़र खत्म होने की कगार पर नहीं होते। सप्रे और दानी स्कूल के मैदान की जमीन पर पिकनिक स्पॉट और अप्पू घर जैसा हो गया है। मैदान के चारों ओर ठेले-गुमटियों की भीड़ हो गई है। सकरी सडक़ को शायद बड़ी-बड़ी गाडिय़ों की पार्किंग के लिए चौड़ा किय़ा गया हो, ऐसा लगता है। थोड़ी बहुत जगह जो बची है, उस पर कब भी कांक्रीट का जाल खड़ा हो सकता है, क्योंकि यहां शॉपिंग मॉल बनाने की प्लानिंग की चर्चा सुनाई देती रहती है। इसी तरह गॉस मेमोरियल और बीटीआई मैदान साल भर मेले-ठेले और सार्वजनिक आयोजन के उपयोग भर के लायक रहे गए हैं। राजधानी का हिंद स्पोर्टिंग मैदान जहां राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिताएं होती थी, वहां अब गंदगी के साथ रेती-गिट्टी का ढेर दिखाई पड़ता है। साइंस कॉलेज का मैदान भी अब खेलने के लायक नहीं बचा है। यहां भी ऑडिटोरियम तन गया और बाकी स्थान दूसरे आयोजन के उपयोग में आता है। कुल मिलाकर परंपराओं और संस्कृति के सम्मान की बात करने वालों को इस बारे में सोचना होगा, वरना ये भी सरकारों की बदनामी के स्मारक के रूप में जाने जाएंगे।

तंबू से कोठियों तक पहुंचा अवैध कारोबार

गांजा, सट्टा के अवैध धंधे पर रोक लगाने की अक्सर बात होती है, लेकिन यह चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ पाता। खानापूर्ति के लिए कभी-कभार कार्रवाई हो जाती है। छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों पहले तो सूबे के पुलिस मुखिया ने सभी पुलिस अधीक्षकों को गांजा-सट्टा पर कार्रवाई करने के कड़े निर्देश दिए थे। उन्होंने पुलिस अफसरों को यहां तक कह दिया था कि तंबू लगाकर अवैध कारोबार चलता रहेगा और ऐसा हो नहीं सकता कि डीजीपी को इसके बारे में पता नहीं चलेगा। उन्होंने कुछ पुलिस अधीक्षकों के बकायदा नाम लेकर कहा था कि अगर आप लोग ऐसा सोचते हैं, तो बच्चे हैं, क्योंकि उन्हे यानी डीजीपी को सब पता है। इसके बाद भी किसी जिले से सट्टा और गांजा का अवैध कारोबार करने वालों पर कोई बड़ी कार्रवाई की गई होगी, ऐसा सुनाई में तो नहीं आया, उलटे लगता है कि अवैध काम ने और जोर पकड़ लिय़ा है। अब एक जिले में गांजा तस्करों को पैसा लेकर छोड़ दिया गया। इसमें पुलिस के अधिकारियों के साथ कई और लोगों के नाम सामने आए हैं। इस मामले में एक मीडिय़ाकर्मी का नाम भी लिया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवैध धंधा बकायदा रैकेट बनाकर किया जा रहा है। अब डीजीपी साहब को कौन बताए कि तंबू वाले आलीशान कोठियों में पहुंच गए हैं।