राजपथ - जनपथ

Posted Date : 15-Jan-2018
  • सरकार के कामकाज को लेकर एक अलग किस्म की जुबान लोगों के बीच रहती है और खुद सरकार के भीतर के लोग भी इसका इस्तेमाल करते हैं। अब यह समझना मुश्किल है कि कमाऊ, खाऊ, मलाईदार जैसे विशेषण सरकार से निकलकर जनता में आए, या जनता से निकलकर सरकार में गए। लेकिन इनका इस्तेमाल भरपूर होता है। दूसरी तरफ लूपलाईन, पनिशमेंट पोस्ट, साईडलाईन जैसे दूसरे विशेषण हैं जो यह जाहिर करने के लिए हैं कि सरकार में कुछ अफसरों को किस तरह सजा दी जाती है। 

    अब सजा और मजा, ये दोनों ही सरकारी काम का हिस्सा रहते हैं। कुछ बड़े काबिल लोग रहते हैं, लेकिन वे लगातार इस जुबान के मुताबिक सजा ही सजा पाते रहते हैं। दूसरी तरफ कुछ नाकाबिल या भ्रष्ट लोग रहते हैं, जो कि इस जुबान के मुताबिक लगातार मजा ही मजा पाते रहते हैं। सरकार की इस जुबानी भाषा को देखें तो कुछ और शब्द हवा में तैरते दिखते हैं। कुछ नेताओं या अफसरों के कुछ ब्लाईंड-स्पॉट होते हैं, यानी ऐसे लोग जिनकी कोई गलती ही उन्हें नहीं दिखती। ऐसी कमजोरी वाले नेताओं या अफसरों में ऐसे लोग भी रहते हैं जो कि बड़े ईमानदार रहते हैं, बड़े काबिल रहते हैं, बड़े पारखी रहते हैं, लेकिन कुछ लोग उनकी कमजोरी रहते हैं, और उन मातहतों की कोई खामी उन्हें दिखती ही नहीं है। 
    सरकार में कुछ लोग लगातार इस फिक्र में रहते हैं कि कभी उन्हें लूपलाईन में न जाना पड़े, और इसके लिए वे कोई भी समझौता करने के लिए तैयार रहते हैं। दूसरी तरफ कुछ लोग बेफिक्र रहते हैं कि उन्हें उनकी काबिलीयत का काम अगर नहीं दिया जाएगा तो क्या फर्क पड़ेगा, खाली बैठे हुए भी तनख्वाह तो मिलती ही रहेगी। 
    लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले सत्रह बरसों को देखें, तो बहुत से अफसर ऐसे रहे हैं जो कि मध्यप्रदेश के वक्त से ही अच्छा काम करते आए हैं, और कोई भी मुख्यमंत्री, किसी भी पार्टी वाली सरकार ने उन्हें महज चुनौती वाली कुर्सियोंं पर बिठाया। दूसरी तरफ कुछ अफसर ऐसे भी रहे जो कि किसी भी सरकार के राज में बिना चुनौती वाली अदना सी कुर्सियों पर बिठाए गए। मध्यप्रदेश के वक्त से अब तक के कुल दौर को देखें तो यह साफ दिखता है कि काबिलीयत और साख बेकार नहीं जाते, दुष्ट और भ्रष्ट चाहे कभी-कभी मजा पा लें, लेकिन अच्छी साख और अच्छी क्षमता अमूमन सजा नहीं पातीं।

    सब बदल गए, सिवाय राव के
    सीएस बदल गए लेकिन राजस्व मंडल चेयरमैन केडीपी राव की मंत्रालय में वापिसी नहीं हो पाई। वे अपनी पदस्थापना को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिल पाई। नए सीएस अजय सिंह के आने के बाद उनसे जुड़े लोगों को मंत्रालय में अहम दायित्व मिलने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सुनते हैं कि राव आईएएस कैडर पद पर आईएफएस अफसरों को बिठाने के खिलाफ रहे हैं। उन्होंने अलग-अलग स्तरों पर अपनी बात को रखा था।  लेकिन इससे सरकार के रणनीतिकार नाराज हो गए। एक तरह से प्रशासनिक हल्कों में कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले उन्हें मंडल में ही बनाकर रखा गया। वे अगले साल रिटायर होंगे। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि यदि यही सरकार चुनाव के बाद भी बनी रही तो केडीपी राव इसी पद से रिटायर हो जाएंगे। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 14-Jan-2018
  • सरकार में बैठे हुए बड़े-बड़े अफसर भी अपने खुद के मामलों में छोटी-बड़ी चूक करते चलते हैं। खासकर जब बात जमीन-जायदाद की जानकारी भरकर सरकार में दाखिल करने की होती है, तो बड़े काबिल अफसर भी कभी किसी जायदाद को भूल जाते हैं, कभी उसका आकार कम या अधिक हो जाता है, और कभी उसके दाम घट-बढ़ जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक, और ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों से लेकर मंत्रियों और सांसदों तक ऐसी जानकारी पता नहीं क्यों गलतियों से भरी रहती हैं, या अधूरी रहती हैं, या कोई जानकारी जानबूझकर छुपाई हुई रहती हैं। और इसके बाद फिर आरटीआई एक्टिविस्ट का काम शुरू होता है जो कि आज भारतीय लोकतंत्र में मीडिया का एक बड़ा सोर्स बन चुके हैं। दिक्कत यह है कि सूचना देने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है, उन्हीं लोगों के बारे में सूचना मांगते-मांगते लोगों का दम टूट चुका है, और लोकतंत्र पर से भरोसा उठ चुका है। ऐसे में ही फिर लोग पुख्ता जानकारी समेत हमला करने के बजाय गुमनाम चि_ियों से हमला करने लगते हैं। छत्तीसगढ़ में सूचना पाना और दुश्मन बनाना कमोबेश एक ही बात हो गई है। 

    छत्तीसगढ़ में राहुल का सीधा आदमी
    पिछले दिनों महाराष्ट्र में जातीय हिंसा के बाद दलित नेता जिग्नेश मेवाणी फिर सुर्खियों में आ गए। उन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फे्रंस लेकर मोदी-भाजपा सरकार पर जमकर हमला बोला। मेवाणी की प्रेस कॉन्फ्रेंस की पूरी तैयारी अलंकार सवाई ने कराई थी। आमतौर पर पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले अलंकार पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस के चलते भाजपा नेताओं के निशाने पर आ गए। आप सोच रहे होंगे कि मेवाणी-अलंकार का जिक्र यहां क्यों किया जा रहा है। वह इसलिए कि  अलंकार, राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं और वे कई बार गुपचुप तरीके से छत्तीसगढ़ के दौरे पर आ चुके हैं। 
    सुनते हैं कि अलंकार प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से मेल-मुलाकात भले ही नहीं करते, लेकिन वे प्रदेश के नेताओं के काम के तौर-तरीकों से वाकिफ हैं। कहा जाता है कि अंतागढ़ कांड के खुलासे के बाद अलंकार के कहने पर ही राहुल ने जोगी पिता-पुत्र को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। अलंकार सालभर पहले छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान बस्तर गए थे। वे वहां काम करने वाले एनजीओ और कई प्रमुख आदिवासी नेताओं के सीधे संपर्क में हैं। यानी प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से परे अलंकार की अगुवाई में गुपचुप तरीके से राहुल की टीम बस्तर-सरगुजा संभाग में चुनाव को लेकर रणनीति तैयार कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर संभाग में अच्छी सफलता मिली थी, लेकिन सरगुजा में भाजपा कांग्रेस को बराबरी पर रहे। इस बार आदिवासी इलाकों में सफलता के लिए अलंकार ने ब्लू प्रिंट तैयार किया है। पार्टी यहां चुनाव के लिहाज से किस तरह काम करती है और क्या परिणाम होता है, यह देखना है। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 13-Jan-2018
  • सड़कों पर जब पुलिस या आरटीओ के लोग किसी गाड़ी के कागजात की जांच करते हैं, तो देखते हैं कि उसका बीमा हुआ है या नहीं, और बीमा पूरा हुआ है या नहीं, वह गुजर तो नहीं चुका है, और एक्सीडेंट में किसी और को चोट लगने या नुकसान पहुंचने पर उसकी भरपाई के लिए थर्ड पार्टी बीमा हुआ या नहीं। बीमा न होने पर चालान और जुर्माने का इंतजाम है। लेकिन हर सड़क पर रात-दिन चलने वाली सरकारी गाडिय़ों का कोई भी बीमा नहीं होता। सरकार यह मानकर चलती है कि किसी हादसे में जख्मी होने या मरने वाले को मुआवजा देना अधिक सस्ता पड़ता है बजाय बीमे के प्रीमियम के। इसके साथ-साथ सरकारी गाड़ी को एक्सीडेंट के बाद सुधरवाना भी बीमे के मुकाबले सस्ता पड़ता है। मंत्रालय के एक बड़े अफसर ने बताया कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से सरकार ने एक आदेश निकालकर सरकारी गाडिय़ों का बीमा करवाना खत्म कर दिया था, और वह अब तक जारी है। लेकिन सवाल यह है कि केंद्र सरकार के मोटर वीकल एक्ट में जो वाहन-बीमा अनिवार्य है, उससे सरकारी गाड़ी को छूट राज्य सरकार कैसे दे सकती है? 

    रामदेव के पतंजलि ब्रांड ने लोगों की खपत और ब्रांड की पसंद को देशभक्ति और देशद्रोह से जोडऩे का नुस्खा आजमाया है, और ग्राहकों को लग रहा है कि पतंजलि और स्वतंत्रता संग्राम एक ही हैं। नतीजा यह हुआ है कि बाजार में दूसरे देशी-विदेशी, या मिले-जुले ब्रांड अब वेद की शक्ति वाले टूथपेस्ट बना रहे हैं, और उसके भीतर रखकर पंचांग भी तोहफे में दे रहे हैं। हालात से ख्यालात बदलते हैं, एक वक्त विदेशी वैज्ञानिकों की शोध के नतीजे के नाम पर सामान बिकते थे, आज वेद-विज्ञान के नाम पर बिक रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Jan-2018
  • आखिरकार सरकार ने रायपुर एसपी बने अमरेश मिश्रा को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की अनुमति देने से मना कर दिया। वे केंद्रीय मंत्री एसएस अहलूवालिया के पीएस बनने वाले थे। उनकी सीबीेआई में भी पोस्टिंग हो गई थी, लेकिन उन्हें रिलीव नहीं किया गया। अमरेश की गिनती काबिल पुलिस अफसरों में होती है। वे 5 साल आईबी में रह चुके हैं। इन सबसे परे वे अपनी ऊंची पहुंच के लिए भी जाने जाते हैं। सुनते हैं कि रायपुर पोस्टिंग से पहले उन्हें सीएम हाउस तलब किया गया था। वे अकेले पुलिस अफसर हैं जिन्हें आदेश निकलने से कई दिन पहले नई पोस्टिंग की जानकारी दे दी गई थी। उनसे यह भी कहा गया कि वे रिलीव होने के लिए जोर न दें। इतना मान-सम्मान किसी जूनियर अफसर को नहीं मिलता। ऐसे में खुशी-खुशी प्रदेश में ही काम करने के लिए तैयार हो गए। दुर्ग में रहे एसपी को इतना महत्व मिलने का यह दूसरा मौका है। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब देश में जगह-जगह दंगे हुए, तो भोपाल के दंगों के बीच उस वक्त दुर्ग के एसपी सुरेंद्र सिंह को भोपाल ले जाकर वहां का एसपी बनाया गया था। बाद में वे मध्यप्रदेश के डीजीपी भी बने। और उन्हें ट्रेन से भोपाल पहुंचने का भी वक्त नहीं दिया गया था, भोपाल से सरकारी विमान रायपुर आया था, और उन्हें ले जाकर दंगाग्रस्त भोपाल का चार्ज दिया गया था। दुर्ग में ही एडिशनल एसपी रहे ऋषि शुक्ला अभी मध्यप्रदेश के डीजीपी हैं।

    सरकार शब्द इस तरह शुरू हुआ...

    नया रायपुर में प्रदेश भर की सरकार के सभी विभागों के मुखिया बैठते हैं, और उनका लंबा-चौड़ा तजुर्बा रहता है। उनके बीच भी जब कोई फाईल इस अंदाज में चलती है कि लगता है कि वह फाईल न होकर धोबी का गधा है, न घर का न घाट का, तो वे लोग भी सरकारी कामकाज के तरीके और रफ्तार को कोसने लगते हैं। ऐसे ही एक आला अफसर ने अपने मातहत को तंज कसते हुए सुनाया- जानते हो कि सरकार नाम कैसे पड़ा? जो सरक-सरककर चलने की मशीन हो, उसे सरकार कहते हैं। इसलिए तुम जिस रफ्तार से काम कर रहे हो, वह ईमानदारी से सरकारी रफ्तार है। मातहत के पास इसका कोई जवाब तो था नहीं।

    काला रंग नकारात्मक क्यों?
    दुनिया के कुछ अधिक विकसित और अधिक सभ्य लोकतंत्रों में अब किसी विरोध प्रदर्शन के लिए काले रंग के इस्तेमाल के खिलाफ एक सोच विकसित हो रही है। लोगों का मानना है कि दुनिया में काले रंग वाले अधिकतर लोग अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों के रहते हैं, और उनकी गरीबी अधिक रहती है। इसलिए गोरी, संपन्न, और विकसित नस्लों के बीच काले रंग को विरोध का रंग मान लिया जाता है। ऐसे में काले झंडे, काला फीता, काले कपड़े, और काले रंगों को लेकर तरह-तरह के नारे, जैसे काला कानून, बुरी नजर वाले का मुंह काला, वगैरह-वगैरह। अब काले रंगों वाले दलित, आदिवासी, अफ्रीकी, और ऐसे दूसरे देशों, नस्लों, और जातियों के लोग एक नई जागरूकता लेकर सामने आ रहे हैं कि उनका इस्तेमाल किसी चीज को नकारात्मक बताने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में दुनिया को विरोध और नकारात्मक बातों के लिए नया रंग ढूंढना बड़ा मुश्किल होगा। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 11-Jan-2018
  • मुख्य सचिव विवेक ढांड के अचानक इस्तीफे और तुरंत ही रेरा के चेयरमैन बनने से प्रशासन और मीडिया दोनों हक्का-बक्का रह गए हैं। लोग अटकलें लगा रहे थे कि मार्च तक के कार्यकाल के बाद उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है, और वे किसी तरह चुनाव तक मुख्य सचिव बने रह सकते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कई फैसले इसी तेजी और झटके से करने के आदी रहे हैं, मीठे फैसले भी, और कड़वे फैसले भी। विश्व रंजन को डीजीपी की कुर्सी से हटाने, समय के पहले जॉय ओमेन को मुख्य सचिव के पद से हटाने के फैसले कुछ इसी किस्म के थे। विवेक ढांड के बारे में कल तक सबको यह पता था कि वे मुख्यमंत्री के साथ विदेश प्रवास पर जा रहे हैं, लेकिन वे कुल नया रायपुर से पुराने रायपुर के प्रवास पर आ गए। मुख्य सचिव के दफ्तर से रेरा के दफ्तर तक।
    वैसे उन्होंने मुख्य सचिव का सरकारी बंगला खाली करना कई दिन पहले ही तय कर लिया था। पुराने पुलिस मुख्यालय से लगा उनके पिता का घर बहुत बड़े अहाते का है, और वहां पुराने घर से अलग एक नया घर भी पिता ने उनके लिए पहले से बना लिया था। अब पिछलेे कुछ हफ्तों से वे जिस तरह इस घर में रहने की तैयारी में लगे थे, उससे जाहिर था कि उन्हें खुद तो यह अंदाज था ही कि वे लंबे समय तक मुख्य सचिव निवास में नहीं रहेंगे। अब उनका निजी घर और रेरा का नया दफ्तर एक किलोमीटर के दायरे में ही हो जाएगा। दूसरी तरफ नए मुख्य सचिव बन रहे अजय सिंह को भी अपने मौजूदा घर से मुख्य सचिव निवास जाने के लिए बस सड़क पार करनी होगी, और आधा किलोमीटर चलना होगा।
    विवेक ढांड की जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा कुल दो वर्गकिलोमीटर के दायरे में गुजरा और गुजरने जा रहा है। घर, होलीक्रॉस बैरनबाजार स्कूल, छत्तीसगढ़ क्लब, डीकेएस भवन, मुख्य सचिव निवास, और अब रेरा का दफ्तर, सब कुछ दो किलोमीटर के घेरे में। उनके सबसे करीबी दोस्त भी इस दायरे के भीतर ही रहते हैं, बाकी बातों के साथ-साथ पेट्रोल और सड़क पर लोड भी बचेगा।

    सभी 90 सीटों पर लड़ेगी आप
    दिल्ली में परंपरागत दो बड़ी पार्टियों, कांगे्रस और भाजपा, को निपटाकर आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ने एक अलग चुनावी इतिहास रचा था। उसके बाद से किसी भी नए नेता या नई पार्टी को बिना मौका दिए खारिज कर देना समझदारी की बात नहीं कही जाती। अब छत्तीसगढ़ में आप सभी 90 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही है, और यह पूरा महीना हर बूथ तक उसके कार्यकर्ता पहुंचने वाले हैं। इसके अलावा मार्च में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप का चेहरा, अरविन्द केजरीवाल रायपुर आने वाले हैं। नतीजा यह है कि प्रदेश की बहुत सी सीटों पर इस पार्टी के उम्मीदवार जीत और हार की लीड से खासे अधिक वोट पाकर संतुलन तो बिगाड़ ही सकते हैं, कुछ या कई सीटों पर जीत भी जाएं, तो भी लोगों को हैरान नहीं होना चाहिए। जिस तरह आईआईटी से निकले और इनकम टैक्स में बड़े अफसर रहे अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति में एक करिश्मा कर दिखाया, उसी तरह छत्तीसगढ़ में राजनीति से दूर रहते आए एक कृषि वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. संकेत ठाकुर बिना किसी बुरे इतिहास के मैदान में डटे हुए हैं, और हो सकता है कि जनता का कुछ भले उम्मीदवारों पर भरोसा भी हो जाए। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 10-Jan-2018
  • प्रदेश कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साए से मुक्त हुई है। राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब गैरजोगी समिति के अध्यक्ष बने हैं। इससे पहले वर्ष-03, वर्ष-08 और वर्ष-013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति की बागडोर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के हाथों में थी। खास बात यह है कि तीनों चुनाव में 5-7 सीटों के हेरफेर से पार्टी सरकार बनाने से वंचित रह गई। खुद चुनाव अभियान समिति के प्रमुख होने के बावजूद जोगी पर भीतरघात के आरोप लगे थे। इस बार जोगी के पार्टी से बाहर रहने पर समिति की कमान डॉ. चरणदास महंत को दी गई है। यह समिति कांग्रेस में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका को तो सिर्फ टिकट बंटवारे तक ही रहती है। लेकिन बाद में प्रचार की पूरी जिम्मेदारी अभियान समिति के प्रमुख संभालते हैं। कुल मिलाकर नया दायित्व पाकर महंत और उनके समर्थक गदगद हैं। पार्टी में यह भी चर्चा है कि यदि पिछले तीन चुनावों से अलग हटकर पार्टी के पक्ष में परिणाम आए तो महंत के सितारे चमक सकते हैं। कांगे्रस की राजनीति में एक भूचाल आने की आशंका भी कई लोगों को है। सेक्स-सीडी कांड से जुड़ी हुई दो-तीन धाराएं ऐसी हैं जिनमें सीबीआई भूपेश बघेल को घेर सकती है। इस मामले में आईटी एक्ट की कुछ ऐसी धाराएं हैं जिन्हें लेकर भूपेश बघेल पर भी कार्रवाई की आशंका है। और अगर सीबीआई ऐसा कुछ करती है, तो उसके तुरंत बाद राज्य की एसीबी के पास भी भूपेश बघेल और उनके परिवार के खिलाफ भिलाई-साडा की जमीन का एक मामला दर्ज है। राजनीतिक ताकतें अभी ऐसी किसी कार्रवाई के राजनीतिक-चुनावी नफे-नुकसान को तौल रही हैं, और सीबीआई या एसीबी की कार्रवाई उसे देखते हुए भी होने के आसार हैं।

    दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में लगा यह स्टॉल बताता है कि आसाराम के भक्तों की भीड़ तो अभी भी उनकी किताबों और सामानों की दूकान पर लगी है। यहां से कुछ किताबें लेकर उनका एक भक्त रायपुर में इस अखबार के दफ्तर आया कि उन्हें पढ़कर देखें। जब उनसे कहा गया कि अच्छे साहित्य को उनके गुरु ने खुद ने क्यों नहीं पढ़ा? तो उन्होंने कहा कि पहले गुरु को जमानत मिल जाए, तभी तो उनसे पूछा जा सकेगा। अब साहित्य की दुनिया में किसी पर कोई रोक तो रहती नहीं, हिटलर की लिखी किताबें भी बिकती हैं, और नाथूराम गोडसे की लिखी हुई भी। इसलिए विश्व पुस्तक मेले में सभी की जगह है।  

    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 09-Jan-2018
  • विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग समितियों की जिम्मेदारी दी गई है। पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द्र साहू को तो सबसे ज्यादा पांच समितियों में रखा गया है, लेकिन उन्हें फिलहाल स्वतंत्र रूप से किसी समिति का मुखिया नहीं बनाया गया। सुनते हैं कि जल्द ही दोनों ही नेताओं को अहम दायित्व दिया जा सकता है। सरकार के खिलाफ आरोप पत्र तैयार करने के लिए समिति का गठन होना बाकी है। समिति  प्रमुख की जिम्मेदारी अकबर को दी जा सकती है, क्योंकि वे ही सबसे ज्यादा तथ्य और आंकड़ों के साथ सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ते आए हैं। धनेन्द्र को भी पार्टी के सामने आगे अगर किसी तरह की विपरीत परिस्थितियां आती हैं, तो अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है।
    दूसरी तरफ कांगे्रस के भीतर और बाहर एक सवाल यह उठ रहा है कि सेक्स-सीडी कांड में गिरफ्तार किए गए पत्रकार-राजनीतिक प्रशिक्षक विनोद वर्मा की अब पार्टी में क्या भूमिका होगी? वे अभी तक अपनी खुद की घोषणा के मुताबिक पार्टी का सोशल मीडिया का काम देख रहे थे, और पार्टी के लोगों को सोशल मीडिया इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी दे रहे थे। उनकी गिरफ्तारी को कांगे्रस को नाजायज साजिश करार दिया है। तो अब ऐसे में विनोद वर्मा आगे कांगे्रस का काम जारी रखेंगे, या कांगे्रस ने अपने काम के लिए उनसे किनारा कर लिया है?


    बीवी को ईश्वर मानकर चुप रहें..
    सुबह घूमने निकले हुए जोड़ों की बातचीत दिलचस्प रहती है। राजधानी रायपुर के मरीन ड्राइव पर चलते-चलते तालाब के किनारे बैठ गए जोड़े की बातचीत किसी को सुनने मिली जिसे चलते-चलते जूते के फीते बांधने के लिए रूकना पड़ा। बीवी ऊनी कपड़ों से लदे हुए अपने पति को एक ऐसे आदमी को दिखा रही थी जो कि हाफपैंट और टी-शर्ट में बिना किसी गर्म कपड़े तेजी से चल रहा था। कहा- देखो औरों को तुम्हारे जैसी ठंड नहीं लगती है, तुम्हीं को ठंड पकड़े हुए है।
    आदमी ने जवाब दिया- मैं हमेशा से पूरे कपड़े पहनते रहा हूं। 
    बीवी ने कहा- पैदा हुए थे, तब भी क्या पूरे कपड़े पहनकर ही आए थे?
    नतीजा : दिन की शुरूआत बहस से नहीं करनी चाहिए, और खासकर बीवी से बहस में नहीं उलझना चाहिए। जिन लोगों को यह बात समझ नहीं आती है, उन्हें इस तस्वीर को देखना चाहिए जो कि किसी समझदार आटो वाले ने अपनी समझदारी के सुबूत की तरह सामने रखी है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 08-Jan-2018
  • सरकार ने चुनावी साल में भू-राजस्व कानून में संशोधन कर जोखिम मोल ले लिया। विपक्ष के नेता प्रस्तावित कानून को आदिवासी हितों के खिलाफ बताकर सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। लेकिन सत्ता पक्ष के कई नेताओं के विरोध में सुर में सुर मिलाने से सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई है। सुनते हैं कि कानून में संशोधन पर कोई खास दिक्कत नहीं होने का भरोसा था। यही वजह है कि आनन-फानन में विधेयक को विधानसभा में लाया गया और बहुमत के आधार पर पास भी हो गया। 
    कानून में संशोधन के पीछे की वजह जो बताई जा रही है उसके अनुसार आदिवासी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया जटिल होने के कारण सौ से अधिक प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं। इनमें रेल लाइन से लेकर एनीकट और सड़क निर्माण की परियोजनाएं शामिल है। चूंकि अब नए कानून में कलेक्टर की निगरानी में आदिवासी जमीन की खरीदी हो सकती है। इसलिए इसमें गड़बड़ी की गुंजाईश भी नहीं है। मुआवजा भी काफी बेहतर हो गया है। इसलिए सरकार को उम्मीद थी कि इससे जमीन देने वाले आदिवासियों को लाभ होगा बल्कि परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ सके गी। कानून में संशोधन सिर्फ सरकारी परियोजनाओं के लिए किया गया है। विपक्ष के हमलों का जवाब तो सरकार हर स्तर पर दे सकती है, लेकिन अपनों का वार भारी पड़ रहा है। एक-दो दिनों में प्रस्तावित कानून को लेकर गलतफमियों को दूर करने की कोशिश की जाएगी, यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्रस्तावित कानून को ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। चुनाव के साल में हकीकत चाहे जो हो, जनधारणा अधिक मायने रखती है। ऐसा पता लगा है कि मुख्यमंत्री ने इस मामले की आगे खुद वकालत करने से इंकार कर दिया है।

    कबीरपंथी महंत धार्मिक दिखावे में फंसे
    चुनावी बरस में प्रदेश कांगे्रस के भूतपूर्व अध्यक्ष चरणदास महंत को चुनाव अभियान संचालन समिति का मुखिया बनाकर पार्टी ने उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी दे दी है। और उन्होंने पहला काम यह किया कि हनुमानजी की ऐसी पूजा करवाई जिसमें उन्हें हर सीट के लिए एक-एक किस्म की मिठाई चढ़ाई गई। गनीमत यह है कि छत्तीसगढ़ में 90 ही सीटें हैं, इसलिए हनुमानजी 90 मिठाईयों से ही बच गए। अगर इससे अधिक मिठाईयां खानी पड़ती, तो सेहत के लिए नुकसानदेह होतीं। वैसे तो महंत कबीरपंथी हैं, लेकिन कबीर की खरी-खरी और खुरदुरी सोच आज के जमाने में लुभावनी-लोकप्रियता नहीं दिला सकतीं। इसलिए कबीर की बुनियादी सोच के खिलाफ जाकर भी महंत एक धार्मिक आडंबर में उलझ गए, और उन्होंने ठीक वही किया जो कि उनके नेता राहुल गांधी ने गुजरात में किया था। धर्म की मूलधारा में नहाकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश। अब धर्म के असर का जहां तक सवाल है, तो वोटरों को धार्मिक पार्टियों में बी-टीम क्यों पसंद आएगी यह भी एक बड़ा सवाल है। धर्म ही मुद्दा रहेगा तो क्या भाजपा ही अधिक धर्मालु और धार्मिक नहीं दिखेगी? फिलहाल देखना यह है कि 90 थाल मिठाई से हनुमान कितने प्रभावित होते हैं, और कांगे्रस का कितना साथ देते हैं।

    नक्सलियों को खून देने वाली पुलिस
    देश के एक बड़े इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने अभी ट्विटर पर यह अफसोस जाहिर किया है कि हिंदुओं के कट्टरपंथी संगठनों से अधिक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कांगे्रसी वकील मुकदमे लड़ रहे हैं। इसके जवाब में तुरंत कई लोगों ने यह लिखा कि वकालत एक पेशा है जो कि निजी राजनीतिक सोच से परे भी चलता है। 
    लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में कई मौकों पर मुठभेड़ के बाद घायल नक्सलियों को उन्हीं पुलिस जवानों ने अस्पताल में खून दिया, जिनके साथी पुलिसवालों को उसी मुठभेड़ में नक्सलियों ने मार भी दिया था। ऐसा कई बार हुआ है। रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार को यह इतिहास याद रखना चाहिए कि वकील अपनी निजी सोच के मुताबिक किसी का मुकदमा मुफ्त में लड़ लें, तो वह उनका अपना फैसला है, लेकिन किसी दूसरी सोच वाले को वकील न मिले, यह तो कोई बात नहीं है। ऐसे में छोटे बच्चों से बलात्कार करके उनकी हत्या करने वाले को कोई वकील ही न मिले, क्योंकि शायद ही कोई वकील बलात्कार और हत्या के हिमायती हों। लेकिन मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को भी वकील मिला ही था, और बुरे से बुरा जुर्म करने वालों के लिए भी वकील अगर नहीं जुटता है, तो सरकार और अदालत उसका इंतजाम करते हैं। देश के कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने इमरजेंसी के दौरान मुंबई में देश के सबसे कुख्यात स्मगलरों के केस भी लड़े थे, और वे कुछ दूसरे मामलों में तस्करी रोकने वाले विभाग कस्टम के वकील भी थे। 
    टिकट काटना आसान, बांटना मुश्किल
    सत्तारूढ़ भाजपा छत्तीसगढ़ में कई उन सीटों पर नए उम्मीदवार छांट रही है, जहां पर आज कांगे्रस के विधायक हैं, या कि भाजपा के ऐसे विधायक हैं जिनकी टिकट काटना जरूरी है। इनमें से कुछ नाम आज जिला पंचायतों में सक्रिय नेताओं के भी हैं। सरगुजा संभाग में एक जिला पंचायत में दो ऐसे नेताओं की शिनाख्त हुई है जो कि दो अलग-अलग सीटों पर भाजपा के अच्छे उम्मीदवार बन सकते हैं, लेकिन आज वहां बहुत से ऐसे गड़बड़ फैसले और आदेश हो रहे हैं कि वे दोनों ही वहां लोकप्रियता खो भी रहे हैं। एक तरफ तो भाजपा के कई ऐसे मौजूदा विधायक हैं जो कि अपने कुनबे के कुकर्मों के चलते वैसे भी हार पाने वाले हैं अगर उन्हें टिकट मिले। और दूसरी तरफ जिनकी संभावना है, उन्हें भी गलतियों और गलत कामों से बचाकर रखना एक बड़ी चुनौती है। भाजपा के एक बड़े नेता ने कहा कि टिकटें काटना तो आसान होगा, लेकिन जिनको बांटना है उन्हें संभालकर रखना अधिक मुश्किल हो रहा है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 07-Jan-2018
  • सेक्स-सीडी विवाद से घिरे होने के बाद भी कांग्रेस हाईकमान ने भूपेश बघेल पर फिर भरोसा जताया है। भूपेश की तेजतर्रार छवि उनके पक्ष में गई। हालांकि संगठन में उनकी हैसियत पहले जैसी नहीं रह गई है। उन्हें दो कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार डहरिया और रामदयाल उइके के साथ मिलकर कोई फैसला लेना होगा। पूरी सूची देखें तो शैलेश नितिन त्रिवेदी का कद काफी बढ़ा है। उन्हें संचार विभाग का अध्यक्ष बनाया गया है। शैलेश को सालभर पहले ही मीडिया विभाग से हटाया गया था। लेकिन चुनावी साल में उनकी जरूरत महसूस करते हुए उन्हें बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले संचार विभाग की जिम्मेदारी दी गई है।  
    एआईसीसी में संचार विभाग का पद है लेकिन छत्तीसगढ़ में पहली बार यह विभाग बनाया गया है। संचार विभाग के अंतर्गत मीडिया विभाग-आईटी सेल भी आते हैं। मीडिया विभाग और आईटी सेल के प्रमुख को संचार विभाग का सदस्य बनाया गया है। अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य प्रवक्ता रहे राजेन्द्र तिवारी और रमेश वल्र्यानी भी शैलेश की टीम का हिस्सा होंगे। कुल मिलाकर कांग्रेस की अलग-अलग मीडिया टीम शैलेश के  मार्गदर्शन में ही काम करेगी। ऐसे में स्वाभाविक रूप से शैलेश अब सबसे ज्यादा प्रभावशाली महामंत्री हो गए हैं। उनकी कुछ खूबियों में से एक यह भी है कि वे आज के कांगे्रस संगठन में जोगी खेमे की सबसे अधिक समझ रखने वाले नेता हैं। वे लंबे समय तक अजीत जोगी, और फिर रेणु जोगी के साथ काम करते रहे, और रेणु जोगी को विधायक के रूप में मिले मकान में भी वे लंबे समय तक रहे। बाद में जब जोगी पिता-पुत्र को शैलेष से परहेज हुआ, तो उन्होंने उनके कहने पर रातों-रात रेणु जोगी के नाम से आबंटित मकान को खाली करके चाबी भेज दी थी। आज प्रदेश कांगे्रस के सामने भाजपा तो घोषित चुनौती है, लेकिन अजीत जोगी अघोषित और रहस्यमय चुनौती हैं। ऐसे में जोगी की नस-नस से वाकिफ शैलेष नितिन त्रिवेदी का इस बरस बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा। वैसे भी मीडिया के लोगों से कांगे्रस के किसी पदाधिकारी को अगर सबसे अधिक और गहरे दोस्ताना रिश्ते हैं, तो वे शैलेष के ही हैं। 

    खाने को लेकर दो नसीहतें
    शादी या दूसरी दावतों में लोग प्लेट में खाना इतना भर लेते हैं कि ऐसे नजारे पर कपिल शर्मा से लेकर राजू श्रीवास्तव तक बहुत से कॉमेडियन शानदार लतीफे बना चुके हैं कि ऐसी प्लेट में कौन सा पकवान क्या महसूस करता है। ऐसे ही नजारे के लिए अभी रायपुर के एक समझदार ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया- इतना ही लो थाली में, फिंक न जाए नाली में। 
    यह तो एक नसीहत है, लेकिन एक दूसरी नसीहत भी है जो कि अधिक खाते-पीते लोगों के लिए है, जिनके लिए अधिक खाना नुकसानदेह होता है। उनका कहना है कि पेट में बर्बाद करने के बजाय प्लेट में बर्बाद कर लेना बेहतर है। इन दोनों नसीहतों को देखें तो यह लगता है कि धीरे-धीरे खाना चाहिए, प्लेट में कम लेकर खाना चाहिए, और फिर जरूरत हो तो दुबारा ले लेना चाहिए। न प्लेट में बर्बाद करना चाहिए, न पेट में बर्बाद करना चाहिए। 


    उप्र-मप्र के बेहाल अफसर देखकर...
    छत्तीसगढ़ के आईएएस-आईपीएस अफसर जब कभी उत्तरप्रदेश या मध्यप्रदेश के अपने साथियों से बात करते हैं, तो उसके बाद राहत महसूस करते हैं कि वे योगी या शिवराज के राज में नहीं हैं। उत्तरप्रदेश में जिस अंदाज में योगी सरकार सरकारी इमारतों, पुलिस थानों, और यहां तक कि हज हाऊस को भी भगवा पुतवा चुकी है, उसे देखकर अफसर सहमे हुए हैं कि उन्हें कब तक भगवा वर्दी से छूट मिली है, और जाने किस दिन उन्हें भी भगवा पहनना पड़े। बड़े अफसरों की एक पार्टी में उत्तरप्रदेश में पहली बार मांसाहार नहीं रखा गया, दारू रखना तो दूर की बात थी। बड़े-बड़े आला अफसरों को लगा कि वे सत्तारूढ़ सोच के गुलाम हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी दो दिन पहले जब मंडला की एक मुस्लिम कलेक्टर शंकराचार्य के खड़ाऊ सिर पर उठाकर मीलों पैदल चलीं, तो यह देखकर बाकी अफसर भी हक्का-बक्का रह गए।
    छत्तीसगढ़ में अफसरों को अभी भी इज्जत के साथ रहने और जीने की आजादी है, वे अपनी मर्जी से खा-पी सकते हैं। छत्तीसगढ़ से दिल्ली जाकर केंद्र सरकार में काम कर रहे एक आईएएस ने अभी वहां से छत्तीसगढ़ में अपने साथियों को यह बताया कि केंद्र सरकार में भी किस तरह निजी चाल-चलन पर भी सत्ता की सोच हावी है। छत्तीसगढ़ के एक आईएएस ने कहा कि सत्ता को खुश करने के लिए जो अफसर इमारतों को बिना जरूरत रंगवा रहे हैं, या खड़ाऊ सिर पर लादकर चल रहे हैं, वे अदालतों में जवाबदेह हो सकते हैं। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 06-Jan-2018
  • अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अभी आई एक किताब में उनकी निजी जिंदगी से लेकर उनके सरकारी और कारोबारी कामकाज तक पर भयानक जानकारियां सामने आई हैं। जानकारी तो जानकारी होती है, उसमें से कुछ सच भी हो सकती हैं, कुछ झूठी भी हो सकती हैं। लेकिन ट्रंप की साख अमरीका में इस कदर मिट्टी में मिल चुकी है कि हर कोई ट्रंप के बारे में बुरी से बुरी बात पर भरोसा करने पर आमादा हैं।  उनके करीबी लोगों ने ही इस किताब के लेखक को इतनी जानकारियां दी हैं कि किताब आने के पहले उसकी एक-एक बात पर अमरीकी मीडिया में बहस चल रही है। हिंदुस्तान में भी बड़े नेताओं को चौकन्ना रहना चाहिए कि उनके करीबी लोग उनके बारे में आगे चलकर क्या-क्या बता सकते हैं। अब जैसे ट्रंप को तरह-तरह की मानसिक बीमारियों या कमजोरियों का शिकार बताया जा रहा है, और यह कहा जा रहा है कि वे इन्हीं की वजह से अखबार नहीं पढ़ पाते क्योंकि उनका ध्यान एक जगह नहीं रह पाता। यह एक अलग बात है कि वे अपने बेडरूम में एक साथ तीन-तीन टीवी देखते हुए मीडिया पर चीखते रहते हैं। अब इससे यह भी साबित होता है कि अखबार पढऩे के लिए अधिक अक्ल लगती है, और टीवी देखने के लिए कम! इसलिए हिंदुस्तान के नेताओं को भी अखबारों पर कुछ अधिक ध्यान देना चाहिए, साथ-साथ अपना कामकाज, अपने तौर-तरीके ऐसे रखने चाहिए कि आगे चलकर उन पर लिखी गई किताब बेस्टसेलर न बन जाए।

    मुंबई की मौतों से सबक लेंगे?
    मुंबई में अभी एक मॉल के भीतर लगी आग में 14 मौतें हुईं। अब रिपोर्ट में आया है कि एक हुक्का-बार के हुक्के से निकली चिंगारी से आग तेजी से भड़की और पर्दों से होते हुए दूसरे सजावटी सामानों तक पहुंच गई। बात की बात में लोग मारे गए। इधर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मॉल से लेकर गली-मुहल्लों तक जगह-जगह हुक्का-बार चल रहे हैं और बहुत से महंगे रेस्त्रां खुले रेस्त्रां में ही लोगों को हुक्का पिला रहे हैं। बार-बार रायपुर सहित दूसरे शहरों में पुलिस छापे मारती है, लेकिन वह बात किसी गिरफ्तारी तक पहुंचते दिखती नहीं। दरअसल सरकारों की नींद थोक में मौतों के बाद ही खुलती है। आज स्कूली बच्चे भी हुक्का-बार में बार-बार पकड़ाते हैं, लेकिन किसी बार वाले की गिरफ्तारी सुनाई भी नहीं पड़ी है। 

    वक्त किस तरह लौटकर आता है यह देखना हो तो हुक्का बार में एक ही हुक्के को बारी-बारी से कई लोगों को पीते देखा जा सकता है। एक वक्त था जब गांव में किसी जाति का समूह जब बैठता था, तो वहां एक हुक्का सुलगा लिया जाता था, और फिर उसी को हर कोई इस्तेमाल करते थे, किसी जूठे का ख्याल किए बिना। अब फिर वैसा ही दिन लौटकर आ गया है। लेकिन उस वक्त खाप पंचायतों या जात पंचायतों में किसी को सजा सुनाते हुए उसका हुक्का-पानी बंद करने की सजा एक आम बात थी। अब बाजार में हुक्का-बार में कोई किसी का हुक्का बंद कर नहीं सकते। अपने साथ बिठाने से मना कर सकते हैं, लेकिन लोग बगल की मेज पर बैठकर अपना खुद का हुक्का गुडग़ुड़ा सकते हैं।

    देवव्रत के मार्फत बाकी राजघराने?
    कांग्रेस छोड़ चुके पूर्व सांसद देवव्रत सिंह किधर जाएंगे, यह सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। खुद देवव्रत ने  अभी तक अपना रूख साफ नहीं किया है। लेकिन जोगी पार्टी के साथ-साथ भाजपा के प्रमुख नेता उनके संपर्क में हैं। प्रदेश कांग्रेस, देवव्रत के पार्टी छोडऩे को कोई ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। वजह यह है कि उनका अपने खैरागढ़ क्षेत्र में कोई खास प्रभाव नहीं रह गया है और संगठन के प्रमुख नेता मौजूदा कांग्रेस विधायक के टिकट काटकर उन्हें आश्वासन देने की भी स्थिति में नहीं है। मगर पार्टी हाईकमान देवव्रत के पार्टी छोडऩे को गंभीरता से ले रही है और एक-दो प्रमुख नेताओं को देवव्रत से बात करने के लिए कहा गया है। देवव्रत अभी दुबई में हैं। वे 7 तारीख को दिल्ली पहुंचेंगे। उनके  दिल्ली पहुंचने के बाद उन्हें मनाने की कोशिश भी होगी। इससे परे जोगी पार्टी के नेता आश्वस्त हैं कि देवव्रत उनके साथ ही रहेंगे। लेकिन सुनते हैं कि देवव्रत की पहली पसंद भाजपा है। चर्चा है कि भाजपा उन्हें टिकट देने के लिए भी तैयार है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि देवव्रत के आने का बड़ा फायदा यह है कि कई और राजघराने भाजपा से जुड़ सकते हैं। सराईपाली राजघराने के प्रमुख पूर्व मंत्री महेंद्र बहादुर सिंह, देवव्रत की उपेक्षा का आरोप लगाकर पहले ही कांग्रेस पर हमला बोल चुके हैं। रायगढ़ के साथ-साथ कुछ और राजघराने के प्रमुखों को भी देवव्रत के जरिए भाजपा से जोडऩे की तैयारी भी चल रही है। ऐसे में अब देवव्रत के रूख पर निगाहें टिकी हुई हैं। इसके साथ-साथ देवव्रत का एक बड़ा आकर्षण यह भी है कि वे मुख्यमंत्री और उनके सांसद बेटे के घर और चुनाव क्षेत्रों के आसपास के इलाके के हैं। 


    सिर्फ भगवान देखकर लौटे
    केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में पद्मनाभस्वामी मंदिर अपनी अथाह संपत्ति के लिए खबरों में रहते आया है, और उसके बंद खजाने को गिनने के लिए अदालत ने लोगों को नियुक्त किया था। बाहर के लोगों में इस मंदिर की चर्चा इसकी दौलत के लिए अधिक रहती है। ऐसी ही चर्चा पढ़कर छत्तीसगढ़ के एक अधिकारी अभी इस मंदिर होकर आए। उनसे पूछा गया कि अनुभव कैसा रहा, तो उनका कहना था कि खजाने की खबर पढ़कर गए थे, वहां से सिर्फ भगवान को देखकर लौटना पड़ा। 

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Posted Date : 05-Jan-2018
  • राज्य पॉवर जनरेशन कंपनी में एमडी की नियुक्ति की प्रक्रिया पिछले तीन माह से चल रही है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर आवेदन बुलाए गए थे। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में आवेदन आए हैं कि इसकी छानबीन में ही एक महीने लग गए। जनरेशन कंपनी के गठन के बाद अब तक तीन एमडी हुए हैं, जिनमें से दो एनटीपीसी से थे। स्थानीय पॉवर कंपनी के अफसरों को लेकर सरकार का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। यही वजह है कि एनटीपीसी के अनुभवी अफसर को ही पिछले दो बार से यहां एमडी के पद पर नियुक्त किया गया। लेकिन इस बार स्थानीय अफसरों ने दबाव बनाया है कि यहां के ही  अफसर को जनरेशन एमडी पद पर नियुक्ति दी जाए। इसके लिए अलग-अलग स्तरों पर सिफारिशें भी हो रही है। मुख्य सचिव विवेक ढांड की अध्यक्षता में गठित कमेटी एमडी का चयन करेगी। बैठक इस माह के आखिरी तक हो सकती है। सुनते हैं कि पॉवर कंपनी के बिजली संयंत्रों से जिन अफसरों ने आवेदन किए हैं, उनकी रूचि ठेकों को लेकर ज्यादा रही है। बिजली उत्पादन की लागत में कमी लाने की दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किए गए। जबकि एनटीपीसी से आए एमडी रहे एसबी अग्रवाल ने तो अपने दो साल के कार्यकाल में पॉवर कंपनी के बिजली संयंत्रों में इतना समय गुजारा चुके थे कि कई अफसर तो पूरे कैरियर में वहां नहीं गए। ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा है कि फिर से एनटीपीसी अथवा अन्य केन्द्र सरकार के उपक्रम के अनुभवी अफसर को ही एमडी के पद पर नियुक्त किया जा सकता है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 04-Jan-2018
  • छत्तीसगढ़ में सरकारी अफसर और कर्मचारी इस बात से हक्का-बक्का हैं कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह न तो थकते हैं, और न ही थमते हैं। वे पिछली बार छुट्टी मनाने कब बाहर गए, यह भी किसी को याद नहीं है। लगातार कोई न कोई कार्यक्रम, अभियान, और दौरों ने नीचे के स्तर पर सरकारी मशीनरी को उसके पंजों पर चौकन्ना बना रखा है। अब दौरों के बाद जिस अंदाज में उन्होंने बाकी जगहों के लिए वीडियो पर छोटी-छोटी जगहों के लोगों से बातचीत करके कार्रवाई करना शुरू किया है, उससे सरकारी मशीनरी को समझ आ गया है कि काम किए बिना और कोई गुजारा नहीं है। सरकारी अफसरों के लिए दूसरी दिक्कत यह है कि मुख्य सचिव विवेक ढांढ भी जमकर-बैठकर काम करने के आदी हैं, और मुख्यमंत्री के करीबी लोग बताते हैं कि सीएस को सीएम से जिस किसी कार्यक्रम के लिए खास ध्यान देने को कहा जाता है, वे भिड़कर उसे सौ फीसदी करने में लग जाते हैं। लेकिन यह सिलसिला पिछले कम से कम एक बरस से इसी रफ्तार से जारी है, और एक बरस से कम का समय चुनाव को बाकी है, उसमें यह और बढ़ते जाना तय है। जिला कलेक्टरों और जिला पंचायत सीईओ पर राजधानी से इतनी पैनी नजर रखी जा रही है कि जरा भी लापरवाही उनकी कुर्सी बदल सकती है। आने वाले हफ्ते राज्य में चुनाव के पहले का सबसे बड़ा बदलाव देखने वाले हैं, पुलिस में भी, और प्रशासन में भी।

    कड़े काबू में भी बेकाबू दारू
    पूरे प्रदेश में शराब कारोबार सरकार ने अपने हाथ में तो ले लिया है, लेकिन इस धंधे के तौर-तरीके पहले सरीखे ही चले आ रहे हैं। कल एक जगह एक ग्राहक को शराब दूकान के कर्मचारियों ने पीट-पीटकर मार डाला। यह तो कत्ल की वारदात थी, इसलिए यह खबरों में आई, लेकिन चारों तरफ तरह-तरह की जालसाजी, धोखाधड़ी, और अधिक दाम पर दारू बेचना जारी है। अब चूंकि सरकार ही दूकानदार है, और सरकार के ही जिम्मे गड़बड़ी की रोकथाम है, इसलिए कोई कार्रवाई आमतौर पर न होती है, न सामने आती है। लेकिन जो लोग बाग-बगीचों में, या स्कूल-कॉलेज के मैदान पर सुबह घूमने निकलते हैं, उन्हें किनारों और कोनों पर खाली बोतलें, प्लास्टिक की गिलासें, और पानी के पाऊच पड़े मिलते हैं, जिससे जाहिर होता है कि लोग शाम के बाद जहां जगह सूनी दिखती है, वहां पीने लगते हैं। शराब खरीदना और पीना गैरकानूनी नहीं है, लेकिन लोगों की इस कानूनी जरूरत को सरकार ने इतने नियमों में बांधकर रखा है कि लोगों को कानून तोडऩा ही पड़ता है। सरकार कारोबार को नियंत्रित करे, कारोबार न करे, ऐसा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बोल गए थे। 
    अब शराब के मामले में सरकार बिक्री का कारोबार करती है, और पीने की जगहों का कोई कानूनी इंतजाम नहीं है। चूंकि दारू पीने वालों के साथ किसी की हमदर्दी नहीं रहती है, इसलिए नाजायज नियम-कायदे भी बिना विरोध लागू हो रहे हैं। 

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Posted Date : 03-Jan-2018
  • पुलिस के बहुत सारे नियम-कायदे अंगे्रजों के समय से चले आ रहे हैं, और उनमें कोई फेरबदल हुआ भी है तो वह बड़ा मामूली सा है। अब थाने की हिरासत में रखे गए किसी आदमी या औरत को खाना खिलाने के लिए एक वक्त का साढ़े 12 रुपये का रेट जाने कबसे चले आ रहा है। साढ़े 12 रुपये में जितना खाना आता है, अगर उतना दिखा दिया जाए, तो मानवाधिकार आयोग इस पर नोटिस जारी कर दे। लेकिन यह रेट जाने कबसे बढ़ा नहीं है। पुलिस कर्मचारियों को जो वर्दी मिलती है, उसके मोजे दो साल तक चलाने का नियम है। अब दिन में 12 घंटे से अधिक पांवों पर चढ़ा हुआ, और चमड़े के जूतों के भीतर दबा हुआ मोजा किस तरह दो साल साथ दे सकता है, यह कोई सुझा नहीं सकते।
     जब पुलिसकर्मी रिटायर होते हैं, तो उनके लिए यह नियम है कि वे पुलिस से मिले हुए सारे सामान, जिनमें जूते-मोजे और वर्दी भी हैं, उन सबको लौटाए। पुराने कपड़े-मोजे भी अगर नहीं लौटाए गए, तो उसमें कड़ी सजा का इंतजाम है। पुलिस को आज भी 25 रुपये महीने साइकिल भत्ता मिलता है, यह अलग बात है कि आज साइकिल पर किसी का भी काम चलता नहीं है। नतीजा यह होता है कि शुरू से ही पुलिस को दूसरों से मुफ्त में काम करवाने या वसूली करने का बढ़ावा दे दिया जाता है। 

    बिना समानता स्मार्ट सिटी नहीं
    राजधानी रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने पर केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक, और स्थानीय म्युनिसिपल तक तमाम लोग आमादा हैं। करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, और स्मार्ट बनने की इस कोशिश में सैकड़ों करोड़ खर्च हो जाएंगे, सिटी स्मार्ट बन पाएगी या नहीं, यह तो वक्त बताएगा। जिस तरह पूरे छत्तीसगढ़ में, और हो सकता है कि बाकी देश में भी, खुले में शौचमुक्त गांव-शहर का दर्जा पाने के लिए परले दर्जे की बेईमानी की गई है, और झूठे आंकड़ों से, अद्र्धसत्य से यह दर्जा पा लिया गया, यह एक अलग बात है कि लोग खुले में बैठ ही रहे हैं। 
    अभी स्मार्ट सिटी का दर्जा पाने के लिए चारों तरफ रंग-बिरंगे डिब्बे टांगकर लोगों से उम्मीद की जा रही है कि वे कचरा इनमें डालेंगे। लेकिन डिब्बों से अगर जागरूकता आई होती, तो फिर कारखाने ही संसद हो गए रहते, और उन्हें बनाने वाली मशीनें लोकतंत्र बन जातीं। जनता में जागरूकता आए बिना खर्च नाली में बह जाता है। अभी इस शहर को देखें तो यही समझ आता है कि लोग नाले-नालियों में उतरकर बदबूदार और खतरनाक कचरा साफ करने वाले कर्मचारियों को सफाईवाला नहीं समझते, कचरेवाला समझते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कचरा पैदा करने की ताकत रखने वाले संपन्न तबके का कोई वास्ता सफाई करने वाले विपन्न तबके के लोगों से नहीं पड़ता। इसलिए गटर और नाले में उतरकर भयानक हालात में जानलेवा काम करने वालों की कोई इज्जत बाकी समाज में नहीं है, और इसीलिए कचरा फैलाने और नालियां जाम कर देने से किसी को परहेज नहीं है। एक ऐसा समाज जिसमें नालियां साफ करने वाले कुचले लोगों के हक के लिए बाकी लोगों के मन में जागरूकता हो, वहीं पर कचरा कम हो सकता है, जहां पर उनके दुख-दर्द से लोगों का वास्ता न हो, वहां पर नालियां कचरे से पटी ही रहेंगी। स्मार्ट सिटी महज खर्च से नहीं बन सकती, उसके लिए जनता में जागरूकता और जिम्मेदारी का अहसास जरूरी है। 
    जिस तरह अमरीकी राष्ट्रपति भवन में बराक ओबामा इमारत के भीतर सफाई करते कर्मचारी का कंधा थपथपाकर उससे दोस्ताना कायम करते हैं, उस तरह का बराबरी का दर्जा जब तक हिंदुस्तानी समाज में सफाई करने वालों के लिए बाकी लोगों के मन में नहीं रहेगा, तब तक सफाई की जरूरत इन लोगों को महसूस नहीं होगी। स्मार्ट सिटी के लिए प्लास्टिक के डिब्बे काफी नहीं होंगे, एक स्मार्ट समानता की सोच जरूरी होगी।


    भाजपा मंत्री, और भाजपा पदाधिकारी
    प्रदेश के श्रम खेल एवं युवा कल्याण मंत्री के सामने सरगुजा के चिरमिरी में मंच पर भाजपा के मंडल अध्यक्ष मंच पर नीचे पैर लटकाकर बैठे रहे। वहीं कांग्रेस पदाधिकारियों से घिरे मंत्रीजी को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगा। मंडल अध्यक्ष की उपेक्षा से नाराज कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया में फोटो पोस्ट कर अपनी नाराजगी व्यक्त की। एक बार फिर प्रदेश के श्रम मंत्री के मंच पर ऐसा नजारा देखने को मिला जिससे कि पार्टी के पदाधिकारियों ने इसे पार्टी पदाधिकारी का अपमान करार दे रहे हैं। 
    दरअसल, कोरिया जिले के चिरमिरी में बहुरूपिया प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जहां मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के श्रम खेल एवं युवा कल्याण मंत्री भईया लाल राजवाड़े अन्य अतिथियों के साथ पहुंचे। सोशल मीडिया में वायरल तस्वीर में मंत्रीजी के दाएं तरफ कांग्रेस की जिला अध्यक्ष प्रभा पटेल और बाएं तरफ भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष विजय शर्मा, उनके पास कांग्रेस के विधि प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष रमेश सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष तीरथ गुप्ता, भाजपा विधायक श्याम बिहारी जायसवाल सहित कई आमंत्रित अतिथि मंच पर दिखाई दे रहे हैं। भाजपा मण्डल अध्यक्ष सुरेन्द्र चक्रघारी मंच पर बिराजे अतिथियों के सामने फर्श पर ही पैर लटकाकर बैठ गए। 
    इस तरह की फोटो भाजपा कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया में वायरल करते हुए सवाल भी खड़े किए कि भाजपा सरकार के मंत्री मंच पर हैं और उनकी ही पार्टी के एक प्रमुख पदाधिकारी मंच के फर्श पर अकेले पैर लटकाकर बैठे हंै।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 02-Jan-2018
  • तीन दिन बस्तर में गुजारने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) सौदान सिंह से जुड़े लोगों को यह लगने लगा है कि विधानसभा चुनाव में मिशन-65 का लक्ष्य कठिन है। पहले प्रदेश के पदाधिकारियों ने बस्तर में सब-कुछ ठीक ठाक होने की रिपोर्ट दी थी। बस्तर की कुल 12 में से 4 सीटों पर ही भाजपा है। इस बार पार्टी के रणनीतिकारों ने यहां सीट दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन सौदान सिंह के साथ प्रमुख नेताओं की टीम जब वहां पहुंची तो कार्यकर्ताओं से चर्चा कर ऐसा लगने लगा कि मौजूदा हालात में सीट दोगुनी तो दूर, यथास्थिति बरकरार रही तो बड़ी बात होगी। 
    कांकेर जिले की बैठक में एक महिला नेत्री ने साफ तौर पर कह दिया कि पार्टी की हालत दयनीय है। सुनते हैं कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव है। उनकी शिकायत थी कि प्रभारी मंत्री जिले का दौरा नहीं करते हैं। एक मंत्री को लेकर यहां तक कहा गया कि उनसे मिलने के लिए कार्यकर्ताओं को कम से कम तीन घंटे इंतजार करना पड़ता है। वे कार्यकर्ताओं के बीच बैठने से ज्यादा वीडियोगेम खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। पार्टी के रणनीतिकारों की दिक्कत यह है कि चुनावी साल में किसी तरह फेरबदल का जोखिम भी नहीं लिया जा सकता। ऐसे में फिलहाल डैमेज कंट्रोल की रणनीति बनाई जा रही है। 
    सौदान सिंह की साख हर उस प्रदेश में कामयाबी पाने की है जहां-जहां उन्हें संगठन ने जिम्मा दिया। छत्तीसगढ़ में भाजपा के तमाम नेता-कार्यकर्ता उनकी ताकत और पकड़ दोनों को ठीक से जानते हैं, इसलिए जब वे एक-एक इलाके में जाकर इस चुनावी वर्ष में अंदाज लगा रहे हैं, तो उन इलाकों के नेताओं का भविष्य भी इसी पर टिका हुआ है। संगठन के एक पुराने नेता ने कहा कि सरकार और संगठन दोनों ही सौदान सिंह के मातहत काम करते हैं, उनसे परे कुछ भी नहीं है। इसलिए जिन नेताओं की शिकायतें अभी सामने आई हैं, उन्हें फिक्र करने की जरूरत तो है। बस्तर के बाद वे सरगुजा में हैं, जहां कि पार्टी की हालत काफी गड़बड़ है।
    गुलदस्तों की बहार का क्या करें?
    कल नए साल के पहले दिन मंत्रालय में कई अफसर अपने पहले मेहमान की राह देखते रहे कि उनके लाए गुलदस्ते लेकर वे अपने से बड़े अफसरों का फेरा लगा आएं। लेकिन जैसे-जैसे मामला ऊपर पहुंच रहा था, वहां के अफसर को और ऊपर जाने की जगह ही गिनी-चुनी थीं, इसलिए सबसे ऊपर पहाड़ सरीखा बनने लगा। मंत्रालय में कुछ कंपनियों के लोग नए साल के कार्ड के गट्ठे लेकर एक-एक कमरा ढूंढते भी दिखे। 
    बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को आए दिन गुलदस्ते मिलते रहते हैं। नया साल हो, दीवाली हो, या कि कोई और जन्मदिन जैसा मौका हो, जितना बड़ा ओहदा, उतने अधिक गुलदस्ते। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि लोग इतने गुलदस्तों का करते क्या होंगे? एक बड़े अफसर थे जो कि उन्हें मिले गुलदस्ते पास की अलग-अलग स्कूलों में बारी-बारी से भेज देते थे ताकि बच्चों की क्लास में उन्हें रखा जा सके। अभी मंत्रालय में एक एसीएस आर.पी. मंडल ऐसे हैं जो उन्हें मिले हुए गुलदस्ते अपने दफ्तर के छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को दे देते हैं कि घर जाकर अपने पति/पत्नी को उपहार में देना। इसके बाद भी और गुलदस्ते बचते हैं तो वे पड़ोस के किसी अफसर के मातहत कर्मचारियों को बुला लेते हैं। ऐसे मौकों पर आने वाले लोगों को खुद खड़े होकर मिठाई भी खिलाते हैं। 

    गुलदस्तों से बेहतर गमछा
    भाजपा के एक नेता छगन मुंदड़ा का स्वागत करने, बधाई देने का तरीका गुलदस्तों से अधिक स्थाई है। उनका घर-दफ्तर, उनकी गाड़ी भाजपा के रंगों वाले दुपट्टे/गमछे से हमेशा लैस रहते हैं। जहां किसी का स्वागत करना हो, वे एक गमछा पहना देते हैं जो कि गुलदस्ते के मुकाबले अधिक दिनों तक कायम रहता है। और इसके लिए हर बार ताजा गुलदस्ता लेने फूलवालों के पास जाना भी नहीं पड़ता। 

    चूंकि बिलासपुर से परहेज है...
    गुजरे साल के आखिरी दिनों में पुलिस अमले में छोटा सा फेरबदल हुआ। इसमें जी.पी. सिंह को दुर्ग और दीपांशु काबरा को रायपुर आईजी बनाया गया। हालांकि पहले काबरा को रायपुर लाने की चर्चा थी। लेकिन सेक्स-सीडी प्रकरण के चलते रायपुर आईजी को बदलने का विचार छोडऩा पड़ा। सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया जी.पी. सिंह की पोस्टिंग को लेकर हुई है। सुनते हैं कि दो जिले के एसपी ने रेंज के बाहर की पोस्टिंग मांग ली है। पहले उन्हें रेंज में ही अहम जिला देने की चर्चा चल रही थी। अब उनकी बातों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है यह फेरबदल की सूची देखकर ही साफ हो पाएगा। दीपांशु  काबरा को दुर्ग रेंज में कुल एक बरस हुआ था, और उन्हें वहां से हटाने की कोई वजह भी नहीं थी। लेकिन जी.पी. सिंह पीएचक्यू से बाहर तो निकलना चाहते थे, लेकिन बिलासपुर जाना नहीं चाहते थे क्योंकि उनके वहां आईजी रहते ही वहां के नौजवान एसपी राहुल शर्मा ने खुदकुशी कर ली थी, और उसके पीछे जी.पी. सिंह की डांट-फटकार को जिम्मेदार माना गया था। प्रदेश में ऐसे किसी बड़े अफसर की खुदकुशी वह पहला मामला था, और जी.पी. सिंह के लिए बिलासपुर अब एक अनचाही जगह हो गई है।

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Posted Date : 01-Jan-2018
  • पूर्व सीएम अजीत जोगी हेलीकॉप्टर से प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। वे गुरू घासीदास जयंती समारोह में शिरकत कर रहे हैं। चर्चा है कि वे 19 दिसम्बर से ही दौरे की शुरूआत करना चाहते थे। लेकिन हेलीकॉप्टर के लिए पैसे का जुगाड़ देरी से हुआ। इस कारण 27 तारीख से ही यात्रा शुरू हो पाई। जोगी  पार्टी फंड की समस्या से जूझ रही है। मंदी की मार झेल रहे उद्योगपति-व्यापारियों ने पहले ही मदद से हाथ खड़े कर दिए हैं। 
    सुनते हैं कि पार्टी के रणनीतिकारों ने टिकट के दावेदारों से सहयोग राशि लेकर फंड की कमी दूर करने की योजना बनाई थी। यह योजना भी अपेक्षाकृत सफल नहीं हो पाई। करीब आधा दर्जन जिलों की विधानसभा सीटों के दावेदारों से ले देकर 4 लाख का ही जुगाड़ हो पाया। पैसे की कमी के चलते ही पार्टी की जनाधिकार यात्रा भी 35 विधानसभाओं तक ही सीमित रही। अब नए साल में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसे में पार्टी के कुछ लोग फंड की कमी से प्रचार अभियान प्रभावित होने की आशंका भी जता रहे हैं। हालांकि कई लोग मानते हैं कि चुनाव के नजदीक आते ही जोगी पार्टी में फंड की दिक्कत दूर हो जाएगी। क्योंकि वे ज्यादातर सीटों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति पैदा कर सकते हैं, और जिस पार्टी को भी ज्यादा नुकसान की आशंका होगी, वह स्वाभाविक रूप से जोगी पार्टी की मदद करेगा।
    आधी आबादी को राहत
    छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले कुछ दिनों में दसियों लाख ऐसे एसटी-एससी लोगों को फायदा देने का फैसला लिया है जो कि अपनी जाति के नाम के हिज्जे अलग-अलग होने, या उच्चारण अलग-अलग होने की वजह से जाति प्रमाणपत्र नहीं पा रहे थे, और आरक्षण की कोई सहूलियतें उन्हें नहीं मिल पा रही थीं। दरअसल दलित-आदिवासी तबकों का इतिहास भी किसी ने अच्छी तरह दर्ज किया नहीं है। इतिहास तो शासकों का दर्ज होता है, जीतने वालों का दर्ज होता है। दबे-कुचले लोगों का इतिहास दर्ज होता नहीं। ऐसे में पहली बार छत्तीसगढ़ सरकार ने उदारता से इन जातियों के सभी तरह के प्रचलित नामों को आरक्षण की लिस्ट में शामिल करके इनके लिए एक बड़ा फैसला किया है। हालांकि इन तबकों के बाहर के लोगों में से कम लोगों को ही इसका कोई महत्व समझ आया है, लेकिन सरकार में फैसला लेने वाली सीएम के करीबी अफसरों ने जिस दिन पहली लिस्ट आई, उस दिन उसकी कामयाबी पर एक पार्टी भी रखी थी, बहुत ही गिनेचुने लोगों की। उस दिन की लिस्ट हिज्जों वाली थी, और कल आई लिस्ट उच्चारण वाली है। यह साल जाते-जाते छत्तीसगढ़ की आबादी के आधे हिस्से के लिए एक बड़ी राहत देकर जा रहा है।
    दुबई में छुट्टियां मना रहे देवव्रत
    पूर्व सांसद देवव्रत सिंह के कांग्रेस छोडऩे के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई है। कांग्रेस के कई नेता उन्हें मनाने में जुटे हैं, तो भाजपा और जोगी पार्टी के लोग अपने साथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन देवव्रत ने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कोई फैसला नहीं लिया है। वे अपने परिवार के साथ दुबई में नए साल की छुट्टियां मना रहे हैं। कुछ लोग पूर्व सीएम अजीत जोगी से नजदीकियों के चलते उनके जोगी पार्टी में जाने की बात कह रहे हैं, तो कई भाजपा में भी जाने की अटकलें लगा रहे हैं। सुनते हैं कि देवव्रत भाजपा के प्रभावशाली लोगों के संपर्क में भी हंै। वे सात तारीख को दिल्ली लौटेंगे। इसके बाद ही आगे का भविष्य तय करेंगे। 

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Posted Date : 31-Dec-2017
  • मध्यप्रदेश के दिनों से अब तक शायद पहली बार छत्तीसगढ़ के चुनावों में बहुत सी सीटों पर किसी सस्पेंस फिल्म की तरह वोटों की गिनती तक लोग हैरान होते रहेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नाहक ही जोगी को तीसरी ताकत नहीं कह दिया है, वे कई सीटों पर तस्वीर बदलने की ताकत तो रखते ही हैं। उर्दू में कही गई एक लाईन जोगी पर एकदम सही बैठती है- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। विपक्ष में 14 बरस, और पार्टी के भीतर भी तकरीबन विपक्ष के अंदाज में ही काम करते हुए अजीत जोगी पहियों की कुर्सी पर आ गए, लेकिन उनकी रफ्तार कम नहीं हुई। एंबुलेंस सरीखी गाड़ी पर सवार होकर भी वे एक-एक शादी में पहुंच जाते हैं, और अपनी सक्रियता, जिंदादिली, और हौसले से लोगों को हैरान भी करते हैं। फिर उनके बागी तेवरों के बारे में कई लोगों का कहना है कि वे घर के भीतर भी जारी रहते हैं जब वे कभी-कभी अपने बेटे से भी असहमत हो जाते हैं, और राजनीति की लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं। दूसरी तरफ उनकी पत्नी रेणु जोगी चाहे जिस वजह से अब तक कांगे्रस में बनी हुई हैं, कुछ लोगों का ऐसा भी अंदाज है कि वे अगले चुनाव में भी कांगे्रस में बनी रह सकती हैं। उनके साथ हैरान करने वाला एक पहलू यह है कि उस सतनामी समाज पर उनकी पकड़ है, जिसके बारे में वे कहते हैं कि वे उस समाज के नहीं हैं। दूसरी तरफ वे अपने को जिस आदिवासी समाज का कहते हैं, उसी समाज ने 2003 के विधानसभा चुनाव में उनकी सत्ता को खारिज कर दिया था। यह राजनीतिक विरोधाभास एक बड़ी पहेली है कि वे अपने को जिनका बताते हैं वे ही साथ नहीं हैं, और वे जिनका न होना बताते हैं, वे साथ हैं। ऐसे में उनकी ताकत आने वाले विधानसभा चुनाव में कहां दिखेगी, और किसका नुकसान करेगी, यह अंदाज लगाना भी थोड़ा मुश्किल है।

    सीनियर की इज्जत
    डीजी रैंक के पुलिस अफसर एमडब्ल्यू अंसारी शनिवार को रिटायर हो गए। हालांकि सरकार ने उन्हें 15 दिन पहले ही पद से हटा दिया था और उनकी जगह लोक अभियोजन और एफएसएल का अतिरिक्त प्रभार एडीजी पवन देव को दिया गया। लेकिन पवन देव ने सीनियर की इज्जत करते हुए नया दायित्व नहीं संभाला और अंसारी को पद पर बने रहने दिया। वे नये साल में यह अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालेंगे। 
    अंसारी पर केन्द्रीय अल्पसंख्यक आयोग में पदस्थापना के दौरान अनियमितता का आरोप लगा था और उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। यह फाइल ढाई साल तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय में दबी रही और फिर उनके रिटायरमेंट के ठीक पहले खुली और आरोप पत्र थमा दिया गया। सुनते हैं कि अंसारी के खिलाफ एक ताकतवर लॉबी काम कर रही थी और उसकी सक्रियता से ही पुरानी फाइल खुल गई और रिटायरमेंट के पहले जांच बिठा दी गई। 


    आधार कार्ड के संदेश सुन-सुनकर थके हुए लोगों को यह कार्टून कुछ राहत दे सकता है कि किस तरह एक इंसान हिंदुस्तान में अपनी हर चीज को आधार कार्ड से जोडऩे के बाद अपने-आपको मकड़ी के जाल में उलझा हुआ पा रहा है। 


    नए साल का फलसफा
    कोई भी बड़ा त्यौहार हो, या कि नए साल जैसा मौका हो, लोगों के ऐसे मौकों पर संदेश बरसने लगते हैं, और लोग आमतौर पर उन्हें खोले बिना, सेम टू यू, जैसा जवाब भी भेजने लगते हैं। कुछ लोग बहुत सोच-समझकर तंज कसते हुए संदेश भेजते हैं, और उसके लिए लोगों की गालियां भी सुनते हैं। लेकिन कुछ संदेश सचमुच ही सोचने को मजबूर भी करते हैं। अब जैसे नए साल पर कल एक संदेश आया- कैलेंडर हमेशा तारीख को बदलता है, लेकिन एक दिन ऐसी तारीख आती है, जो कि कैलेंडर को ही बदलकर रख देती है। इसलिए सब्र रखें, वक्त हर किसी का आता है। 

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Posted Date : 30-Dec-2017
  • खैरागढ़ राजघराने के प्रमुख पूर्व सांसद देवव्रत सिंह ने आखिरकार कांग्रेस से नाता तोड़ ही लिया। देवव्रत की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल से पटरी नहीं बैठ रही थी। चर्चा है कि वे बघेल को हटाने की मुहिम भी चला रहे थे। देवव्रत की हाईकमान तक अच्छी पहुंच भी रही है। लेकिन वे अपनी मुहिम में सफल नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने प्रदेश के कुछ नेताओं के सामने खैरागढ़ से विधानसभा टिकट की शर्त रखी लेकिन कोई भी नेता इसके लिए स्पष्ट रूप से सहमति देने की स्थिति में नहीं थे। उनके करीबी लोग मानकर चल रहे थे कि भूपेश के रहते उन्हें टिकट नहीं मिल सकती। ऐसे में उन्होंने पार्टी के बाहर जाकर ही अपना राजनीतिक भविष्य देखना बेहतर समझा। और फिलहाल इस साल के आखिरी दो दिन उन्हें लेकर सनसनी कुछ अधिक इसलिए बनी रहेगी कि उन्होंने अभी भाजपा या जोगी किसी के साथ जाना बताया नहीं है, और खैरागढ़ का इलाका मुख्यमंत्री और उनके सांसद बेटे के गृहनगर या उनके चुनाव क्षेत्र के आसपास प्रभाव रखने वाला इलाका है।
    दुर्ग के बेरला की मातृभाषा पंजाबी!
    जो लोग इंटरनेट को ज्ञान का खजाना मानकर चलते हैं, उनको यह सावधानी भी बरतनी चाहिए कि इंटरनेट पर अज्ञान भी तेजी से फैलते चलता है। विकीएडिटडॉटओआरजी नाम की एक वेबसाइट की जानकारी को बड़ा भरोसेमंद माना जाता है, लेकिन उस पर दुर्ग जिले के बेरला गांव की जानकारी बड़ी दिलचस्प है। छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के एक अधिकारी राहुल सिंह ने इस वेबसाइट का एक स्क्रीन शॉट पोस्ट किया है जिसमें भारत के छत्तीसगढ़ के दुर्ग के बेरला गांव की मूल भाषा पंजाबी बताई गई है। इस वेबसाइट पर लिखा गया है कि बेरला की मातृभाषा पंजाबी है, और अधिकतर लोग बातचीत के लिए पंजाबी का ही इस्तेमाल करते हैं। 
    दरअसल बेरला के इलाके के बारे में परसों से दुर्ग जिले में यह जानकारी सबको है कि वहां हरियाणा-पंजाब से आए हुए लोगों ने हजारों एकड़ जमीनें खरीदी हैं, और वहां खेती करते हैं, या करवाते हैं। पंजाब-हरियाणा में एक एकड़ जमीन बेचकर छत्तीसगढ़ में कई एकड़ जमीन खरीदी जा सकती है, और शायद इसी के चलते यहां पर बाहर से आए लोगों ने बड़ी जमीनें खरीद ली हैं। अब विकीएडिट की जानकारी अगर इस जानकारी से निकली है, तो भी उसे सुधारने की जरूरत है, क्योंकि वहां जमीनों के मालिक चाहे हरियाणा-पंजाब के क्यों न हों, जुबान तो वहां अब भी छत्तीसगढ़ी ही चलती है। 
    विकीएडिट को देखें तो बेरला के पास के एक और गांव भांड की जुबान भी पंजाबी बताई गई है। तारालिम, पतोरा, भरचट्टी, परपोड़ा, कुम्हीगुड़ा, हथबंद, बनसा, नेवनारा, अकोली, पिरदा, हरदी, भालेसर, कंडरखा, गुढ़ेली, सांकरा, जामगांव, उफारा, आनंदगांव, तेलगा, जमघट, रांका, रवेली, किरीटपुर, सरदा, टाकम, संडी, सलधा, घोटमर्रा, सुरूजपुरा, बहेरा, खुड़मुड़ी, कुसमी, मनियारी, कठिया, देवरी, देवादा, बारगांव, भरदा, ढाबा, खम्हरिया, तिलई, बोरिया जैसे दर्जनों दूसरे गांवों की जुबान भी पंजाबी बताई गई है। इनकी बाकी भौगोलिक जानकारी सही है। 

     

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Posted Date : 29-Dec-2017
  • बड़े शहरों में चौराहों पर भीख मांगने वाले लोगों को लेकर सोचने वाले लोगों के मन में हमेशा एक दुविधा बनी रहती है कि वहां पर भीख दी जाए, या नहीं? ऐसे चौराहों पर रेडलाईट पर थमी गाडिय़ों के प्रदूषण से हवा जहरीली और भारी रहती है, और भीख मांगने वाले लगातार केवल थमी हुई गाडिय़ों के बीच ही काम करते हैं, और उन्हें शायद यह अहसास भी नहीं होता कि यह जहर उनकी जिंदगी किस तरह खत्म करते चल रहा है। वैसे तो एक भिखारी की जिंदगी का जो हाल रहता है, उसमें शायद यह बात बहुत अहमियत भी नहीं रखती कि वे कितना लंबा जीते हैं, क्योंकि यह जिंदगी भी भला कोई जिंदगी है? 
    लेकिन रायपुर के सबसे बड़े चौराहे, शास्त्री चौक पर गाडिय़ों के बीच जमीन पर घिसटकर चलने वाला एक ऐसा नौजवान भिखारी है जो कि गाडिय़ों के ड्राईवरों को कई बार दिखाई भी नहीं पड़ता है, और उसके कुचल जाने का खतरा बने रहता है। दूसरी तरफ तकरीबन हर बड़े चौराहे पर बहुत छोटे से बच्चे को गोद में लिए हुए ऐसी महिलाएं भीख मांगते दिखती हैं जिनके बारे में ऐसी चर्चा रहती है कि वे इन दुधमुंहे बच्चों को किराए पर लेकर आती हैं, और ये बच्चे गोद में टंगे हुए दिन भर वैसी ही जहरीली हवा पाते हैं। 
    लोगों की दुविधा यह रहती है कि चौराहों पर भीख दें, या न दें? इसका कोई सुलझा हुआ जवाब निकलकर सामने नहीं आता है क्योंकि इन्हीं भिखारियों में से कुछ सचमुच के जरूरतमंद भी हो सकते हैं, और बहुत से ऐसे हो सकते हैं जो कि पेशेवर या आदतन हों, और इन चौराहों पर उन्हें कमाई का एक बेहतर ठिकाना मिल गया हो।
    राजधानी रायपुर की सड़कों पर इन दिनों सिर मुंडाए हुए, इस्कॉन के सन्यासी चौराहों और डिवाइडरों पर गाडिय़ों को रोक रहे हैं, और वहां पर गीता बेचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में चौराहों पर और डिवाइडरों पर गाडिय़ों की कतारें लग जा रही हैं, लेकिन उनके हॉर्न से बेफिक्र आधा-आधा दर्जन सन्यासी गाडिय़ों पर टूट पड़ते हैं। कुछ तो उनके चोगे का रंग, और कुछ गीता पर छपी तस्वीर का असर, आस्थावान लोग गाडिय़ों के शीशे उतारकर देखना शुरू कर देते हैं। 
    चौराहों का इस्तेमाल उन लोगों के लिए भी है जिन्हें ईश्वर ने कुछ भी नहीं दिया है, और खुद ईश्वर के लिए भी है!   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 28-Dec-2017
  • बैंकों में ग्राहकों के लॉकर काटकर उसमें से गहने और नगदी या कागज सब कुछ ले जाने वाले सेंधमारों से अब आम जनता की नींद हराम हो गई है। एक से अधिक बैंकों में ऐसे हादसे हो गए हैं, और लोगों को अपने खुद के पुराने खानदानी गहने पाने के लिए फर्जी बिल बनवाने की सलाह दी जा रही है ताकि अदालत से उन्हें गहने मिल सकें। दूसरी तरफ बैंकों में जमा रकम के बारे में यह हल्ला उड़ रहा है कि सरकार कानून बना रही है कि अगर बैंक दीवालिया हो जाएंगे, तो उन्हें ग्राहकों की जमा रकम में से कुल एक-एक लाख रुपये लौटाने होंगे, बाकी का इस्तेमाल बैंक अपना घाटा पूरा करने के लिए कर सकेंगे। यह बात अफवाह से कुछ अधिक वजनदार है क्योंकि बैंक अधिकारियों के एसोसिएशन ने ऐसे बयान जारी किए हैं।
    छत्तीसगढ़ में कुछ तजुर्बेकार लोगों ने इसका कुछ हद तक इलाज ढूंढा है। उन्होंने एक से अधिक अलग-अलग बैंकों में लॉकर रखना तय किया है ताकि किसी एक में डाका पड़ जाए, तो भी दूसरे में तो कुछ बचे। इसके अलावा कुछ लोगों ने अभी हाल ही में बैंकों में जमा अपने एफडी एक से अधिक बैंकों में बांट दिए हैं, कि दीवाला निकलेगा भी तो किसी एक बैंक का ही निकलेगा, और पूरी रकम नहीं डूबेगी। मोदी सरकार ने लोगों को नगदी न रखने की सलाह दी है, लेकिन बैंकों का माहौल और उन्हें लेकर चर्चा लोगों को नगदी की तरफ धकेल रही है, शायद सोने की तरफ भी।

    तबादले-अनुकंपा नियुक्ति, पीएचक्यू पर भी घेरा
    पुलिस में तबादले और अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरणों को लेकर शिकवा-शिकायतों का दौर चल रहा है। कुछेक मामलों को लेकर पीएचक्यू पर भी उंगलियां उठ सकती है। सुनते हैं कि बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों से बड़ी संख्या में सिपाहियों-हवलदारों के तबादले हुए, लेकिन इसके लिए शासन की मंजूरी नहीं ली गई। इसी तरह शहीद परिवार के अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरणों में भी अलग-अलग मापदंड अपनाया गया। एक प्रकरण पर आश्रित को लिपिक की नौकरी दे दी गई, लेकिन इसी तरह के प्रकरण में ऐसा करने से मना कर दिया गया। वैसे तो डीजीपी एएन उपाध्याय को उनके पूर्ववर्तियों के मुकाबले ज्यादा नियम कानून का जानकार माना जाता है। लेकिन चर्चा है कि वे भी इस तरह की गड़बडिय़ों को पकड़ नहीं पाए। ऐसे में अब सारे मामले इकट्ठा किए जा रहे हैं, तो विवाद होना स्वभाविक है।    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 27-Dec-2017
  • विधानसभा चुनाव में दस माह बाकी रह गए हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में नित नए बनते-बिगड़ते समीकरणों की चर्चा सुर्खियों में है। इन सबके  बीच पूर्व सीएम अजीत जोगी की नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव से गर्मजोशी से मुलाकात की खबर मीडिया में छायी रही और उनकी कांग्रेस में वापिसी को लेकर फिर हल्ला उड़ा। इस पर प्रभारी पीएल पुनिया के साथ-साथ नेता प्रतिपक्ष को भी स्थिति स्पष्ट करने आगे आना पड़ा। 
    सुनते हैं कि हाईकमान जोगी को पार्टी से निकालने के महीने भर बाद वापिसी के  लिए तैयार भी हो गई थी। तब उस समय के प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी बीके हरिप्रसाद  के मार्फत भूपेश-सिंहदेव की जोड़ी ने कड़ा विरोध जताया था। जोगी खेमे की तरफ से भी कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक बयानबाजी के चलते वापिसी ठंडे बस्ते में चली गई। सिंहदेव, जोगी सरकार में बिना किसी पद में रहते हुए भी इतना अपमान झेल चुके हैं कि जोगी की कांग्रेस में वापिसी पर सक्रिय राजनीति से अलग होने की इच्छा रखते हैं। राज्य गठन के बाद भूपेश-सिंहदेव की जोड़ी ने प्रदेश में आदिवासी सीएम बनाने की मुहिम छेड़ी थी। जोगी सीएम बने, तो दोनों कांग्रेस की राजनीति में हाशिए पर ढकेल दिए गए। भूपेश फिर भी जोगी सरकार में मंत्री थे, लेकिन उनकी हालत किसी विपक्षी-विरोधी से बेहतर नहीं थी। महीनों तक तो भूपेश कैबिनेट का बहिष्कार करके अपने कमरे में चुपचाप अकेले बैठे रहते थे। दूसरी तरफ सिंहदेव की हालत ऐसी थी कि जोगी के सरगुजा आने पर उनके किसी भी कार्यक्रम में पीछे की सीट मिलती थी। 
    कहा जाता है कि जोगी ने पहले तत्कालीन विधायक गोपाल राम की सीट खाली करवाकर सरगुजा जिले की सीतापुर सीट से चुनाव लडऩे का मन बनाया था। जोगी के करीबी लोगों ने इस मामले में सिंहदेव से भी रायशुमारी की। सरगुजा राजघराने के प्रमुख सिंहदेव ने उनका वेलकम किया और प्रचार में हर संभव सहयोग का वादा किया। कुछ दिन बाद जोगी सीतापुर पहुंचे तो उन्हें बैठक में तो बुलाया गया लेकिन फिर उन्हें ब्लॉक कार्यकर्ताओं के बीच बिठाया गया। तब से सिंहदेव मानकर चलते हैं कि जोगी के कांग्रेस में रहते उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। यही वजह है कि वे जोगी की वापिसी पर घर बैठने की बात कहते हैं, और यह बात वे कहते नहीं हैं, यह उनकी तरफ से आखिरी फैसला भी है।
    वैसे अमित जोगी ने अभी पी.एल. पुनिया के बारे में यह कहकर कांगे्रस के मुंह का स्वाद कड़वा कर दिया कि यह पुनिया-टुनिया कौन है? 

    सस्ती मशीनें महंगी पड़ सकती हैं...
    राजधानी रायपुर में म्युनिसिपल ने कई बाग-बगीचों और सार्वजनिक जगहों पर कसरत करने के लिए तरह-तरह की मशीनें लगाई हैं। इनका रोज हजारों लोग इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ मशीनों की टूट-फूट देखकर यह समझ में आता है कि उनकी बनावट में ही कमजोरी है, और जब लोग इन पर कसरत करते हैं तो इस तरह की टूट-फूट लोगों को बुरी तरह जख्मी भी कर सकती है। इसलिए कसरत की मशीनों की मजबूती में किसी तरह की चोरी बड़ी भारी पड़ सकती है, और कानूनी जागरूकता के इस वक्त में म्युनिसिपल को कोई उपभोक्ता फोरम में भी घसीट सकते हैं क्योंकि यह सारा काम म्युनिसिपल जनता से टैक्स लेकर करती है, और उसकी सहूलियतों पर जनता का ग्राहक की तरह हक है।    rajpathjanpath@gmail.com

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