राजपथ - जनपथ

13-Mar-2020

केटीएस तुलसी का नाम कैसे आया?

बीती कल दोपहर के पहले छत्तीसगढ़ में किसी को यह अंदाज नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील के.टी.एस. तुलसी को यहां से राज्यसभा भेजा जाएगा। कांग्रेस ने मोतीलाल वोरा की जगह इस नामी वकील को भेजना तय किया, तो लोग हैरान हुए। ऐसा तो लग रहा था कि उम्र को देखते हुए वोराजी को अब कांग्रेस मुख्यालय में बैठने के लिए राजी कर लिया जाएगा, और राज्यसभा में किसी ऐसे को भेजा जाएगा जिसकी सक्रियता अधिक हो। नब्बे बरस से अधिक के होने की वजह से राज्यसभा में बाकी लोग वोराजी से एक सम्मानजनक फासला भी बनाकर चलते थे, और कांग्रेस को वहां मेलजोल का फायदा नहीं मिल पा रहा था। वोराजी खुद भी आश्वस्त नहीं थे कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल उनका नाम सुझाएंगे, हालांकि ऐसी चर्चा है कि टी.एस. सिंहदेव, चरणदास महंत, और ताम्रध्वज साहू वोराजी के नाम के साथ थे। ताम्रध्वज को वोराजी का अहसान भी चुकता करना था जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपना सारा दमखम लगा दिया था, और सोनिया गांधी को लेकर राहुल के घर तक चले गए थे। खैर, वोरा के संसदीय कार्यकाल का एक बहुत लंबा अध्याय पूरा हुआ, और वे अपनी ताकत संगठन में लगा सकेंगे।

अब के.टी.एस. तुलसी की बात करें, तो एक वक्त था जब 2007 में वे गुजरात सरकार के वकील थे, लेकिन उन्होंने शोहराबुद्दीन मुठभेड़ मौतों में गुजरात सरकार की तरफ से खड़े होने से इंकार कर दिया था। एक वक्त वे अमित शाह को बचाने के लिए अदालत में खड़े होते थे। और आगे जाकर एक वक्त ऐसा आया जब वे सीबीआई के वकील थे, और अमित शाह के खिलाफ खड़े थे, तो सुप्रीम कोर्ट ने ही तुलसी को कहा था कि वे चूंकि शाह के वकील रह चुके हैं, इसलिए उनके खिलाफ खड़े होना ठीक नहीं है, वे अपना नाम वापिस लें, और तुलसी ने नाम वापिस ले लिया था।

यह एक दिलचस्प बात है कि जिस शोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ हत्या/मौत मामले में के.टी.एस. तुलसी वकील नहीं बने, उस केस में शोहराबुद्दीन के एक करीबी सहयोगी की भी हत्या हुई थी, और उसका भी नाम तुलसी (प्रजापति) था।

7 नवंबर 1947 को पंजाब के होशियारपुर में पैदा तुलसी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से वकालत शुरू की थी। फिर सुप्रीम कोर्ट तक आते-आते वे कई राज्य सरकारों और सुप्रीम कोर्ट के बड़े चर्चित मामले लड़ चुके थे। वे राजीव हत्याकांड से जुड़े मामलों में भी भारत सरकार की ओर से खड़े हुए, और तमिलनाडू सरकार की तरफ से शंकराचार्य के खिलाफ केस लड़ा। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के जमीन-जायदाद के मामले भी उन्होंने लड़े हैं। 2014 में यूपीए सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा में भेजा था।

के.टी.एस. तुलसी महंगी पार्टियां देने के शौकीन हैं, और पुरानी कारों को जमा करने के भी। 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वे हर पेशी पर खड़े होने की पांच लाख रूपए फीस लेते थे, लेकिन जरूरतमंद लोगों को मुफ्त में भी मदद करते हैं। वे एक ऐसे क्रिमिनल लॉयर हैं जो कि सरकारों की तरफ से भी केस लडऩे का काम करते हैं।

उनका नाम छत्तीसगढ़ की तरफ से भेजना कैसे तय हुआ, यह बात कुछ दिनों में सामने आएगी, लेकिन वे राजीव गांधी से लेकर रॉबर्ट वाड्रा तक के केस लड़ते हुए गांधी परिवार के करीब रहे हैं, और अपने खुद के दमखम से देश के प्रमुख वकीलों में उनका नाम है। छत्तीसगढ़ सरकार आज जितने तरह की कानूनी कार्रवाई में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक व्यस्त है, वैसे में राज्यसभा सदस्य के रूप में के.टी.एस. तुलसी की सलाह उसके काम भी आ सकती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत राज्यसभा की दोनों सीटों पर जीत की गारंटी है, और यहां कांग्रेस पार्टी में न कोई मतभेद हैं, न कोई बागी महत्वाकांक्षी हैं, ऐसे में यहां से राज्य के बाहर के तुलसी को उम्मीदवार बनाने में कोई दिक्कत नहीं थी। पहले भी मोहसिना किदवई यहां से दो बार राज्यसभा की सदस्य रह चुकी हैं, यह एक और बात है कि उनका कोई योगदान न राज्य में रहा, न संसद में।

एमपी में सिंहदेव की मदद से...

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे का थोड़ा-बहुत असर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी पड़ सकता है। सिंधिया के करीबी और मप्र सरकार में मंत्री महेन्द्र सिंह सिसोदिया, स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के समधी हैं। सिसोदिया की पुत्री ऐश्वर्या की शादी सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वरशरण सिंहदेव से हुई है। सिसोदिया उन 20 कांग्रेस विधायकों में शामिल हैं, जिन्होंने सिंधिया के साथ भाजपा में जाने का फैसला लिया है। हालांकि अभी सिसोदिया के मान-मनौव्वल की कोशिश हो रही है।

सुनते हैं कि कांग्रेस के रणनीतिकार टी.एस. सिंहदेव के छोटे भाई (और आदित्येश्वरशरण सिंहदेव के पिता) एएस सिंहदेव के जरिए सिसोदिया को मनाने की कोशिश हो रही है। फिलहाल तो सिसोदिया को मनाने में कामयाबी नहीं मिल पाई है। दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में सिंधिया के चुनिंदा समर्थक हैं। इनमें दुर्ग के दीपक दुबे भी हैं।

दीपक के अलावा खैरागढ़ राजघराने के सदस्य देवव्रत सिंह भी सिंधिया के करीबी माने जाते हैं।  वैसे तो देवव्रत जनता कांग्रेस में हैं और वे कांग्रेस से निकटतता बढ़ा रहे हैं लेकिन बदली परिस्थियों में वे धीरे-धीरे भाजपा के करीब आ जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी जनता कांग्रेस के दो अन्य विधायक धर्मजीत सिंह और प्रमोद शर्मा ने नगरीय व पंचायत चुनाव में भाजपा का साथ दिया था। ऐसे में माना जा रहा है कि सिंधिया के चलते भाजपा मजबूत हो सकती है।

प्रियंका की नामंजूरी

अब जब पूरे देश के राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम सामने आ चुके हैं, तब यह साफ हो गया है कि प्रियंका गांधी राज्यसभा नहीं जा रहीं। वे चाहतीं तो कई राज्यों से उनका नाम जा सकता था, छत्तीसगढ़ से भी, लेकिन सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं से यह कहा था कि प्रियंका राज्यसभा जाना पसंद नहीं करेंगी। दरअसल सोनिया और राहुल लोकसभा में हैं, और अगर प्रियंका राज्यसभा जातीं, तो कुनबापरस्ती की बात एक बार और जोर पकड़ती। छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेताओं ने सोनिया गांधी से यह अनुरोध जरूर किया था, लेकिन इस पर कोई जवाब नहीं मिला था।

कल की कांग्रेस की लिस्ट में अखिल भारतीय कांग्रेस के संगठन प्रभारी के.सी. वेणुगोपाल को राजस्थान से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। पहले उनका नाम छत्तीसगढ़ से चल रहा था, लेकिन फिर उन्हें राजस्थान की लिस्ट में रखा गया।


13-Mar-2020

फोन रिकॉर्डिंग की दहशत

सरकारों के लिए लोगों के मन में शक रहता ही है कि किसके फोन रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। लोगों को याद होगा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्द ही भूपेश बघेल ने रायपुर के साईंस कॉलेज के एक कार्यक्रम में मंच पर ही माईक से कहा था कि ढांढ सर भी पिछली सरकार के वक्त उनसे वॉट्सऐप कॉल पर ही बात करते थे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनके कॉल रिकॉर्ड हो रहे हैं। इस वक्त स्टेज पर विवेक ढांड भी मौजूद थे जो कि रमन सरकार में अपने कार्यकाल के आखिरी दिन तक मुख्य सचिव थे, और बाद में राज्य की सबसे ताकतवर कुर्सी रेरा पर काबिज हुए। क्योंकि उन्होंने इस बात का कोई खंडन नहीं किया, इसलिए जाहिर है कि भूपेश बघेल की कही बात सही थी। अब जब राज्य के कुछ नए-पुराने अफसरों और कुछ कारोबारी-नेताओं पर आयकर छापे पड़े, और बहुत बड़ा बवाल हुआ, तो यह बात सामने आई कि इन लोगों के टेलीफोन शायद इंटरसेप्ट किए जा रहे थे, और आयकर विभाग पूरी जानकारी लेकर आया था। अफसरों ने छापे के बाद इन तमाम लोगों के फोन पर से जानकारी भी निकाल ली थी, और लोगों को अब यह खतरा दिख रहा है कि फोन पर कोई भी बात सुरक्षित नहीं है, और वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर की जानकारी भी फोन हाथ आने पर वापिस निकाली जा सकती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग बड़ी तेजी से वॉट्सऐप से ऐसी दूसरी मैसेंजर सेवाओं पर जाने लगे हैं जो कि लोग वॉट्सऐप से अधिक सुरक्षित मान रहे हैं। 

अभी तीन दिन पहले ऐसी ही एक दूसरी मैसेंजर सर्विस का पेज खोलने पर उन लोगों को बड़ा दिलचस्प नजारा देखने मिला जिनकीफोनबुक पर ऐसे तमाम लोगों के फोन नंबर दर्ज थे। सिग्नल और टेलीग्राम जैसे दूसरे मैसेंजरों के पेज पर यह दिखता है कि फोनबुक के और कौन-कौन लोग उस सर्विस को शुरू कर रहे हैं। तीन दिन पहले दोपहर के दो घंटों में ही छापों से प्रभावित लोगों में से आधा दर्जन ने सिग्नल शुरू किया, और उनके नाम दूसरों की स्क्रीन पर एक के बाद एक दिखते रहे, इनमें अफसर, भूतपूर्व अफसर, कारोबारी सभी किस्म के लोग थे। 

अब वॉट्सऐप या ये दूसरी सेवाएं कितनी सुरक्षित हैं, और कितनी नाजुक हैं, इसका ठीक-ठीक अंदाज कम से कम आम लोगों को तो नहीं है। लेकिन एक दूसरा खतरा यह खड़ा हो रहा है कि किसी मैसेंजर सर्विस को पूरी तरह महफूज मानने वाले लोग उस पर अंधाधुंध संवेदनशील बातें करने लगते हैं, और यह भरोसा पता नहीं कितनी मजबूत बुनियाद पर है। 

फिलहाल राजनीति, मीडिया, सरकार, और कमाऊ-कारोबार के बड़े लोग फोन पर बात हिचकते हुए कर रहे हैं, कुछ को राज्य सरकार की एजेंसियों से खतरा दिखता है, और कुछ को केन्द्र सरकार की एजेंसियों से। बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि रमन सरकार के दौरान चर्चित अघोषित-गैरकानूनी इंटरसेप्टर का इस्तेमाल आज भी कोई सरकारी या कोई गैरसरकारी लोग कर रहे हैं। फिलहाल इस खतरे के चलते हुए ही सही, लोग फोन पर बकवास कम करने लगें, वही बेहतर है। 

सिंधिया ने नीयत को मौका दिया
लोगों को राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन के वीडियो और उसकी तस्वीरें अपनी नीयत की बात लिखने का मौका देते हैं। अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में गए, तो जाहिर है कि दस-बीस मिनट के कार्यक्रम में किसी पल वे मुस्कुरा रहे होंगे, किसी पल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा मुस्कुरा रहे होंगे, और किसी पल दोनों खुश होंगे, या दोनों उदास होंगे। ऐसे में हर किसी को अपने मन की बात लिखने के लिए एक उपयुक्त फोटो या वीडियो हाथ लग ही गए, और लोगों ने उसकी व्याख्या करते हुए मन की बात लिख डाली। लोगों ने ट्विटर और फेसबुक पर तरह-तरह की भड़ास निकाली, और इस दलबदल से जुड़े, या उसके लिए जिम्मेदार, हर नेता-पार्टी को निशाना बनाया। होली का मौका था, जिस त्यौहार पर लोग आमतौर पर दारू या भांग पीकर मन की बात निकालते हैं, तो लोगों को इस बड़ी राजनीतिक हलचल के बहाने, और इस मौके पर भड़ास का मौका बढिय़ा मिला। 

आज सुबह जब लोगों ने टीवी की खबरों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को केन्द्रीय रक्षा मंत्री, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिलते देखा, तो फिर लिखने का मौका मिला। राजनाथ सिंह अपने शिष्ट मिजाज के मुताबिक ठीक से बैठे थे, और ज्योतिरादित्य सिंधिया पांव मोड़कर झूलते हुए दिख रहे थे। फिलहाल भोपाल में क्या होगा इसे लेकर लोगों को सट्टा लगाने का एक बढिय़ा मौका मिला है, और सट्टा बाजार से कोरोना वायरस को थोड़ी सी छुट्टी मिलेगी। 

बंजारा कुत्तों का बुरा मानना तय
जिस तरह मध्यप्रदेश के कांग्रेस और भाजपा के विधायक झुंड में कहीं बेंगलुरू, तो कहीं हरियाणा ले जाकर छुपाए जा रहे हैं, उससे लोगों को बहुत मजा आ रहा है। पार्टियों के कुछ तेज और तजुर्बेकार विधायक ऐसे बागी हो चुके, या बागी होने से बचाए जा रहे विधायकों को घेरकर चल रहे हैं उन्हें देखकर एक जानकार ने कहा- जब भेड़ों के रेवड़ लेकर लंबा सफर किया जाता है, तो गड़रिए बंजारा नस्ल के कुछ तेज कुत्तों को साथ लेकर चलते हैं। ऐसे दो-चार कुत्ते ही दो-चार सौ भेड़ों को दाएं-बाएं होने से रोककर रखते हैं। थोक में दलबदल की नौबत आने पर अतिसंपन्नता वाले ऐसे माहिर नेताओं को विधायकों की खरीदी के लिए, या उन्हें बिक्री से बचाने के लिए तैनात किया जाता है। हालांकि यह बात तय है कि बंजारा नस्ल के कुत्तों को उनकी यह मिसाल अच्छी नहीं लगेगी, फिर भी बात को सरल तरीके से समझाने के लिए यही उदाहरण अभी सबसे सही लग रहा है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


09-Mar-2020

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मंथन जारी
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। सुनते हैं कि पूर्व सीएम रमन सिंह, धरमलाल कौशिक और सौदान सिंह के बीच  गंभीर चर्चा भी हुई है। यह चर्चा सौदान सिंह के दिल्ली के भाजपा के पुराने दफ्तर स्थित कक्ष में हुई। रमन सिंह और धरमलाल कौशिक, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय को ही अध्यक्ष बनाने के पक्ष में बताए जाते हैं। मगर प्रदेश के सांसद इससे संतुष्ट नहीं हैं। यह भी चर्चा है कि रमन, धरम और सौदान मिलकर शिवरतन शर्मा का नाम आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन ये नेता आदिवासी वोटबैंक को लेकर भी चिंतित हंै। ऐसे में  राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम के नाम पर भी चर्चा हुई है। हल्ला है कि रामविचार के लिए सौदान तो तैयार हैं, लेकिन रमन-धरम की जोड़ी सहमत नहीं है। ऐसे में सभी धड़ों के बीच तालमेल रखने वाले नेता के नाम को आगे किया जा सकता है। ऐसे में कोई नया नाम आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा के एक बड़े नेता ने पार्टी के भीतर चल रही इस मशक्कत पर कहा- समुंद्र मंथन तो कई दिनों से चल रहा है, देखें छत्तीसगढ़ के हाथ अमृत लगता है, या विष...

सरकारी अस्पताल को चुनौती
छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास के खिलाफ अकेले अभियान चलाते हुए डॉ. दिनेश मिश्रा ने देश-विदेश में सब जगह नाम कमाया है, और नीयत नाम कमाने की नहीं थी लोगों को जागरूक करने की थी। अब समाज में जागरूकता को नापने-तौलने की कोई मशीन तो होती नहीं, इसलिए यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि उनकी मेहनत के बाद अंधविश्वास कितना घटा, और जागरूकता कितनी बढ़ी।

बलौदाबाजार जिले के बिलाईगढ़ के ग्राम नरधा में सरकारी उपस्वास्थ्य केंद्र के सामने ही एक बाबा का घर है, और लोग बीमारियों के साथ ही अन्य तकलीफों से मुक्ति पाने झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र वाले बाबा का सहारा ले रहे हैं। इलाज कराने आए लोगों का कहना है बाबा के पास आस्था लेकर लोग काफी दूर-दूर से आते हैं और इलाज कराते हैं। बाबा मां दुर्गारानी के समक्ष मंत्रोच्चार कर हर व्यक्ति का इलाज करते हैं और इसके एवज में पैसा नहीं केवल नारियल और अगरबत्ती लेते हैं। 

दिक्कत यह है कि अनपढ़ समझे या कहे जाने वाले लोग ही ऐसे बाबा के शिकार नहीं होते, पढ़े-लिखे कहे जाने वाले लोग भी अंधविश्वास में कहीं कम नहीं हैं। ऐसे बाबा बीमारियों के साथ-साथ बुरे सायों को हटाने का दावा भी करते हैं, और सरकारी अस्पताल के ठीक सामने सरकार और विज्ञान दोनों को चुनौती दे रहे हंै। अब लोकप्रियता की एक वजह यह भी हो सकती है कि बाबा इलाज के एवज में पैसा नहीं केवल नारियल और अगरबत्ती लेते हैं। दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में क्या लिया जाता है, इस तकलीफ को पूरी जनता जानती है। 

वहां इलाज कराने आए मरीज रजिस्टर में एंट्री कराकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। बाबा बहादुर सिंह प्रधान उर्फ ननकी प्रधान का कहना है कि इनके इलाज से लोग ठीक हो रहे हैं तभी यहां इलाज कराने आ रहे हैं। बाबा ने आगे बताया कि जब वह 7 साल का था तब उनको दुर्गा देवी ने आशीर्वाद के रूप में उन्हें ये प्रदान किया है। तब से लेकर आज तक इलाज करते आ रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ में सरकारी डॉक्टरों की बड़ी कमी है, और ऐसे में स्वास्थ्य विभाग ऐसे बाबा लोगों की सेवाएं ले सकता है, डॉ. दिनेश मिश्रा का क्या है, वे तो वैज्ञानिक सोच की बात करते हैं, जो कि आज एक अवांछित चीज है।


08-Mar-2020

कोरोना का खौफ-1
कोरोना वायरस का खौफ बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में कोरोना को लेकर डर कुछ ज्यादा ही है। कोरोना के चलते  रायपुर के कई लोगों ने दिल्ली और विदेश यात्रा भी स्थगित कर दी है। पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के यहां विवाह कार्यक्रम था। प्रदेश के दर्जनभर से अधिक भाजपा नेता कोरोना के खौफ के साये में दिल्ली गए। 

चूंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के यहां कार्यक्रम था, तो जाना ही था। विवाह का रिसेप्शन नड्डा के दिल्ली बंगले में था। बताते हैं कि कोरोना के चलते रिसेप्शन में अतिरिक्त सतर्कता बरती गई थी। मेहमानों की अगुवानी केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, भूपेन्द्र यादव और बीएल संतोष कर रहे थे। कार्यक्रम स्थल में प्रवेश से पहले मुख्य द्वार पर मेहमानों का हाथ सेनिटाइजर से साफ कराया गया। अंदर में भी किसी तरह के इंफेक्शन से बचने के लिए काफी बंदोबस्त किया गया था। एक अलग से काउंटर पर सेनिटाइजर रखा हुआ था। भोजन के काउंटर पर तैनात वेटर मुंह पर मास्क लगाए हुए थे। 

खाने की प्लेट लेने से पहले फिर मेहमानों के हाथ पर सेनिटाइजर लगवाया जाता था। पूरे रिसेप्शन के दौरान ज्यादातर मेहमान एक-दूसरे से हाथ मिलाने से परहेज कर रहे थे और हाथ जोड़कर अभिवादन करते नजर आए। इस समारोह में पीएम समेत पूरा कैबिनेट और अन्य राज्यों के राज्यपाल-सीएम समेत भाजपा के तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे। लौटते समय कई नेता तो काउंटर से सेनिटाइजर लेकर निकलते भी नजर आए। 

कोरोना का खौफ-2
छत्तीसगढ़ में कोरोना के दो-तीन ही संदिग्ध मिले हैं, लेकिन इसको लेकर जनता में खौफ साफ दिख रहा है। कोरोना के चलते राजधानी रायपुर में ज्यादातर नेताओं ने होली मिलन के कार्यक्रम भी निरस्त कर दिए हैं। रायपुर में सबसे पहले सांसद सुनील सोनी ने इसकी शुरूआत की। उन्होंने कटोरा तालाब-सिंचाई कॉलोनी स्थित अपने सरकारी बंगले में रविवार को होली मिलन का कार्यक्रम रखा था, इसमें पूरे लोकसभा क्षेत्र से करीब 5 हजार लोगों को न्यौता भेजा गया था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन उन्होंने पीएम के संदेश के बाद होली मिलन का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। 

कोरोना के चलते सतर्कता बरतने के इरादे से सुनील सोनी के होली मिलन कार्यक्रम निरस्त होने की सूचना चारों तरफ फैल गई। बृजमोहन  अग्रवाल और कई नेताओं ने उनका अनुसरण कर अपने यहां कार्यक्रम निरस्त कर दिए। सीएम भूपेश बघेल और संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे ने भी फैसला लिया है कि वे होली मिलन के कार्यक्रम से दूर रहेंगे। कुल मिलाकर सुनील सोनी ने अपने यहां का कार्यक्रम निरस्त कर कोरोना से सतर्क रहने के लिए दूसरों को भी प्रेरित किया। 

कोरोना का खौफ-3

विधानसभाध्यक्ष चरण दास महंत की नातिन अभी पांच हफ्तों की हुई है, और वह अमरीका से भारत आई, तो एक दावत तो बनती ही थी। कोरोना के चलते बहुत से समारोह रद्द हो रहे हैं, लेकिन यह निजी कार्यक्रम था, इसलिए हुआ। महंतजी को कुछ निजी शुभचिंतकों ने यह भी सुझाया कि छोटी बच्ची को लोगों की शुभकामनाओं से कुछ दूर घर के भीतर रखें, लेकिन उत्साही मेहमानों के जोश के सामने ऐसी कोई रोक खड़ी ही नहीं हो पाई, टिकना तो दूर की बात थी। फिर भी अधिकतर लोग साफ-साफ बोलकर एक-दूसरे से हाथ मिलाने से कतराते रहे और वह सावधानी असर करते दिखी जो कि भारत सरकार कल सुबह से मोबाइल फोन पर सुना रही है। फोन करते ही खांसने की आवाज आती है, और कोरोना से बचाव की तरकीब सुनाई जाती है। लोग सावधान हो रहे हैं, मेरा देश बदल रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


07-Mar-2020

महंत के कामयाब दिन

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने कार्य-संचालन के मामले में देश में अलग ही पहचान बनाई है। विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने   विधानसभा के कार्य संचालन को लेकर कई नियम बनाए, जिनसे  सदन की कार्रवाई अच्छी तरह से चल रही है। शुक्ल ने सदन की कार्रवाई के दौरान गर्भगृह में जाने पर सदस्य के निलंबित होने का नियम बनाया था, जिसका अब भी पालन हो रहा है। भाजपा शासनकाल में प्रेमप्रकाश पांडेय के अध्यक्षीय कार्यकाल को बेहतर आंका जाता है। उनके बाद धरमलाल कौशिक और गौरीशंकर अग्रवाल भी अध्यक्ष रहे, लेकिन मौजूदा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत अपने पूर्ववर्ती राजेंद्र प्रसाद शुक्ल और प्रेमप्रकाश पांडेय की तरह मजबूत पकड़ वाले नजर आए। उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में सदन के कार्य संचालन मामले में अलग ही छाप छोड़ी है। 

डॉ. महंत पहली बार अविभाजित मप्र में वर्ष-1980 में विधायक बने। वे लोकसभा के भी सदस्य रहे हैं। उन्हें संसद और विधानसभा का गहरा अनुभव है और इसकी झलक उनकी कार्यपद्धति में भी नजर आती है। पिछले दिनों उन्होंने हल्के सवाल पूछने पर एक सदस्य को टोक दिया। उन्होंने कहा कि विधायकों के एक सवाल के जवाब पर 10 लाख रुपये खर्च होते हैं। कॉलेज में कितने पद खाली हैं और खाली पद कब तक भरे जाएंगे, जैसे एकदम सामान्य सवालों का जवाब वे मंत्री से व्यक्तिगत तौर पर मिलकर ले सकते हैं। आसंदी के सुझाव की संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे और पूर्व सीएम अजीत जोगी ने भी तारीफ की। इसी तरह उन्होंने  एक सवाल के परिशिष्ट में 170 पेज के जवाब पर चिंता जताई। उन्होंने फिजूलखर्ची की तरफ सरकार और सचिवालय का ध्यान आकृष्ट कराया। डॉ. महंत के कार्यकाल में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर 2 दिन का विशेष सत्र हुआ। जिसमें सत्ता और विपक्ष के सदस्य एक ही तरह के पोशाक में आए थे और सदन में महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन पर यादगार चर्चा हुई। इस तरह का आयोजन देश में पहली बार किसी विधानसभा में हुआ था। अब तक के तौर-तरीकों से महंत कई मामले में अपने पूर्ववर्तियों से भी बेहतर दिख रहे हैं। 

पिछले दिनों अमरीका के दौरे पर गए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल महंत को साथ ले गए थे। वहां हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यक्रम में सीएम से सवाल किया गया कि उन्होंने एक दलित को मुख्य सचिव बनाया है, और एक कबीरपंथी को विधानसभाध्यक्ष, तो भूपेश ने महंत की तारीफ करते हुए उनके लंबे और कामयाब चुनावी और राजनीतिक इतिहास को इस रफ्तार से गिना दिया था कि मानो वे इस जवाब की तैयारी करके गए थे।

म्युनिसिपल में कोई सुनने वाले हैं?
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का सबसे अधिक इस्तेमाल हो चुका श्मशान ऐसे बुरे हाल में है कि देखते नहीं बनता। जाने किस वक्त इसका नाम किस वजह से मारवाड़ी श्मशान रखा गया था। अब वहां अर्थियों के साथ आ जाने वाले गद्दे-तकियों से लेकर दूसरे कपड़ों तक के ढेर भीतर लगे हुए हैं जिनसे लगता है कि हफ्तों से यहां की सफाई नहीं हुई है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब किसी न किसी अंतिम संस्कार में म्युनिसिपल के पार्षद या वहां के अफसर न पहुंचते हों, लेकिन जिस शहर में दसियों लाख रुपये खर्च करके स्मार्ट सिटी के नाम पर सफाई की तस्वीरों से दीवारों को भर दिया जा रहा है, उस शहर में ऐसी गंदगी को हटाने में दिलचस्पी नहीं दिखती क्योंकि वॉल राईटिंग का महंगा ठेका होता है, और कचरा हटाने में वैसी कमाई शायद नहीं रहती है। पता नहीं केंद्र सरकार के दिल्ली से आने वाले लोग मरघट तक जाने की जहमत उठाते हैं या नहीं, लेकिन अगर शहर के बीच के इस बहुत पुराने श्मशान की गंदगी वे देखें तो इसका दर्जा और नीचे चले जाना तय है। फिर यह भी है कि रोजाना इस जगह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों को कम से कम घंटे भर ऐसी ही गंदगी के बीच बैठना पड़ता है। म्युनिसिपल में कोई सुनने वाले हैं? (rajpathjanpath@gmail.com)


05-Mar-2020

धरना खत्म करवाने का राज

छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से हिस्सों में इस बात को लेकर हैरानी है कि राजधानी रायपुर के बीच चौक किनारे खाली जगह पर रोज रात चलने वाले शाहीन बाग धरने को जिला प्रशासन ने वहां से हटा दिया। यह धरना पूरी तरह शांतिपूर्ण चल रहा था, और मुख्यमंत्री सहित कांग्रेस पार्टी इस बात को लेकर शाहीन बाग धरने की मांग के साथ भी थे कि नागरिकता-संशोधन के नए कानून को लागू नहीं करना चाहिए। ऐसे में अचानक एक रात इस धरने को पुलिस के खत्म करवाने से लोगों को कुछ हैरानी हुई है। लेकिन इसके पीछे की कहानी राज्य में कानून व्यवस्था को बचाने से जुड़ी हुई है। इस शाहीन बाग धरने के जवाब में कुछ हिन्दू संगठनों ने हनुमान चालीसा पाठ जैसा एक मुकाबला शुरू कर दिया था, और इन दोनों को एक साथ देखने पर शासन-प्रशासन को यह समझ आ रहा था कि राज्य में एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज साम्प्रदायिक तनाव खड़ा हो सकता है। इस राज्य की गौरवशाली  धर्मनिरपेक्ष परंपरा को जारी रखने के लिए तय किया गया कि सभी किस्म के धरनों को खत्म करवाया जाए। (rajpathjanpath@gmail.com)


04-Mar-2020

सरकार और पार्टी की राहत

छत्तीसगढ़ में हाल ही में पड़े आयकर छापों पर कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ सरकार दोनों ने केन्द्र सरकार से जमकर विरोध तो जाहिर किया है कि एक केन्द्रीय सुरक्षा बल, सीआरपीएफ, को साथ लाकर ये छापे डाले गए जो कि देश की संघीय व्यवस्था के खिलाफ है। जो लोग कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों पर समाचार देखते हैं, वे अपने समझ के स्तर के मुताबिक इस संघीय ढांचे को संघ यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ढांचा समझ रहे हैं, और इस बात पर हैरान हो रहे हैं कि मोदी सरकार अगर संघ के ढांचे के मुताबिक काम नहीं करेगी, तो और किस तरह करेगी? लेकिन छापों का दौर खत्म हो जाने के बाद अब सरकार और कांग्रेस पार्टी कम से कम सार्वजनिक रूप से तो राहत की सांस लेते दिख रही हैं क्योंकि छापों में जो नगदी बरामद हुई है, वह बड़ी-बड़ी चर्चाओं में रहने वाले लोगों की बेइज्जती खराब कर रही है। अब इतना बुरा वक्त किसने सोचा था कि महापौर एजाज ढेबर के घर खुद से 25 हजार रूपए मिलेंगे, और उनकी मां के पास से चार लाख रूपए। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि जिस मां के चार-पांच कारोबारी बेटे हों, उसके पास इतनी रकम में हैरानी की कोई बात तो है नहीं। आबकारी विभाग के सबसे खास अफसर त्रिपाठी के पास नोटों से भरी आलमारियां मिलने की खबरें फैली थीं, लेकिन ऐसी सारी आलमारियों की हकीकत 60 हजार रूपए तक सिमट गई। रेरा चेयरमैन विवेक ढांड के घर पर करीब तीन लाख रूपए नगद मिले हैं जो कि उनकी और उनकी पत्नी की एक महीने की तनख्वाह से भी कम रकम है। कांग्रेस के एक पार्षद अफरोज अंजुम से छापे में 18 सौ रूपए मिले हैं, और पार्टी ने उन्हें गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाला बताया है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि गुरूचरण होरा के घर और दफ्तर से एक करोड़ रूपए से कुछ अधिक रकम मिली है, और वे भाजपा के सदस्य हैं। अब कांग्रेस पार्षद से 18 सौ, और भाजपा सदस्य से एक करोड़ से अधिक! कोई हैरानी नहीं कि ऐसे में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यह सुझा रहे हैं कि आयकर विभाग को अपना विशेष विमान का खर्च निकालने के लिए भाजपा के लोगों पर ही छापा डालना चाहिए। 

पड़ोस का भी फायदा
छत्तीसगढ़ के कल के बजट में किसानों को धान का बाकी भुगतान करने का इंतजाम कर दिया गया है जिसे मिलाकर उन्हें 25 सौ रूपए के रेट से भुगतान पूरा हो जाएगा। धान खरीदी के समय केन्द्र सरकार के नियमों की वजह से राज्य सरकार समर्थन मूल्य से अधिक दाम नहीं दे पाई, इसलिए फर्क का पैसा अब दिया जाना है। लेकिन राज्य सरकार का कुछ या अधिक नुकसान इसमें भी हो रहा है कि छत्तीसगढ़ से लगे हुए दूसरे राज्यों से सरहद पार करके धान यहां लाया गया, और इस राज्य के अधिक रेट पर बेचा गया। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि कड़ी चौकसी की वजह से ऐसा धान अधिक नहीं आया है, लेकिन उनकी अपनी जानकारी यह है कि राज्य की सरहद के जिलों में फसल कम हुई थी, लेकिन हर किसान प्रति एकड़ 15-15 क्विंटल धान बेच रहे हैं। अब इस अधिकतम सीमा तक धान की बिक्री कम फसल की उपज से तो हो नहीं सकती थी, इसलिए पड़ोसी राज्यों से धान आया ही आया है। 

मुख्यमंत्री का चमकदार जोश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बजट की शाम अखबारों के संपादकों को नाश्ते पर बुलाया था, और उनका जोश एक लखपति बजट पेश करने वाले मुख्यमंत्री-वित्तमंत्री जैसा था। दूसरी तरफ मीडिया के चेहरों पर झेंप थी क्योंकि पिछले हफ्ते भर में आयकर छापों को लेकर उसकी खबरों के गुब्बारे की हवा निकल गई थी। हवा भरे गुब्बारे जितने बड़े आंकड़ों से घटते हुए हकीकत हवा निकले गुब्बारे के आकार की बच गई थी, और भूपेश बघेल इस नौबत का मजा तो ले रहे थे, लेकिन उन्होंने कोई जुबानी हिसाब-किताब भी चुकता नहीं किया जो कि उनके आम मिजाज से कुछ हटकर था, और वहां से निकलते हुए मीडिया भी राहत की सांस ले रहा था। दरअसल इस बार के आयकर छापों के दौरान और उसके बाद भी आयकर विभाग ने कोई ठोस आंकड़े जारी नहीं किए, और जिन पर छापे पड़े थे, उनसे जब्त नगदी निराशाजनक थी। ऐसे में सरकार के करीबी कहे और समझे जाने वाले इन लोगों के बारे में प्रकाशित और प्रसारित गलत जानकारी और अटकलों ने मीडिया की कमजोरी उजागर कर दी थी।  नौबत यह थी कि जितने सवाल मीडिया कर रहा था, उससे अधिक पैने सवाल मुख्यमंत्री के पास थे, लेकिन वे अपने सवालों की धार को हवा में लहरा नहीं रहे थे। 

भूकंप के पहले की फाल्टलाईन
छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा खुले विश्वविद्यालय के पिछली सरकार के नियुक्त कुलपति अब भी जारी रखे गए हैं। और दूसरी तरफ कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में किसी वामपंथी या कम से कम धर्मनिरपेक्ष कुलपति की नियुक्ति का इंतजार किया जा रहा था, उस जगह पर भी संघ परिवार के एक जाने-माने व्यक्ति को कुलपति बना दिया गया। दो दिनों में ऐसी दो नियुक्तियों से छत्तीसगढ़ राजभवन और केन्द्र सरकार के बीच में, भूगोल की भाषा में, फाल्टलाईन उजागर हो गई है, जहां पर धरती के नीचे चट्टानों के खिसकने से किसी दिन भूकंप आ सकता है। कुलपति नियुक्त करने का सारे का सारा अधिकार पिछली सरकार ने राजभवन को दे दिया था, और वह इस सरकार पर बहुत भारी पड़ा है। बाहर आम जनता यह तो नहीं समझती है कि सरकार और राजभवन के अधिकारों में कहां पर सीमा रेखा है, लोग तो यही समझ रहे हैं कि भूपेश सरकार के चलते संघ के दो-दो कुलपति बन गए। राजभवन अगर बीच का कोई रास्ता निकाल पाता, और दोनों पक्षों की बर्दाश्त के लायक नाम तय किए जाते तो ऐसी नौबत नहीं आती कि राज्य सरकार कानून बनाकर राज्यपाल से अधिकार वापिस लेने की सोचने लगती। मौजूदा राज्यपाल अनुसुईया उइके के साथ शुरूआती महीनों के परस्पर-सम्मान के संबंधों के बाद अब राज्य सरकार एक संवैधानिक चुनौती के दौर में खड़ी हो गई है, या कर दी गई है। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


02-Mar-2020

कांग्रेस संगठन पर चर्चा

प्रदेश कांग्रेस में फेरबदल की तैयारी है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया इस सिलसिले में प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम और सीएम भूपेश बघेल के साथ ही अन्य प्रमुख नेताओं से लगातार चर्चा भी कर रहे हैं। सुनते हैं कि मरकाम के करीबी कोंडागांव के रवि घोष को गिरीश देवांगन की जगह प्रभारी महामंत्री बनाया जा सकता है। गिरीश सीएम भूपेश बघेल के करीबी हैं और चर्चा है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा में भेज सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि यदि राज्यसभा में नहीं गए, तो उन्हें निगम-मंडल में जगह मिल सकती है। 

चर्चा यह भी है कि मप्र के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने अपनी तरफ से दो-तीन नामों की सिफारिश की है। इनमें से एक अल्पसंख्यक नेता भी है। हल्ला तो यह भी है कि प्रदेश संगठन में हिसाब-किताब रखने की पोजिशन में मरकाम अपने किसी विश्वस्त नेता को चाहते थे। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के लिए दबाव भी बनाया था। इसके लिए मरकाम को एक प्रभावशाली मंत्री का साथ भी मिला। मगर चर्चा है कि पार्टी के कई और प्रभावशाली नेताओं के दबाव के चलते उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही है। यानी हिसाब-किताब के लिए किसी नए पर भरोसा नहीं किया जाएगा। मौजूदा व्यवस्था कायम रहेगी। 

भाजपा संगठन, और अटकलें

प्रदेश भाजपा का मुखिया कौन होगा, इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही है। यह तकरीबन तय हो गया है कि सर्वमान्य नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जाएगी। चर्चा है कि प्रदेश के सांसदों ने पार्टी हाईकमान को साफ तौर पर बता दिया कि जाति समीकरण को ध्यान में रखकर प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है। अभी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। ऐसे में पार्टी को खड़ा करने के लिए तेजतर्रार अध्यक्ष की जरूरत है। सांसदों की सलाह पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय के नाम को नजर अंदाज कर नए नाम पर विचार हो रहा है। अब तेजतर्रार होने के पैमाने पर खरा माने जाने वाले एक सवर्ण नेता से जब कहा गया कि उन्हें अध्यक्ष बनना चाहिए, तो उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने 15 बरस सरकार चलाई है, वे ही लोग विपक्ष के इन दिनों में संगठन भी चलाएं, उनको पार्टी अगर आखिरी दो बरस में प्रदेश अध्यक्ष बनने कहेगी, तो वे सोचेंगे।

आंदोलन कितना उग्र हो?
धान खरीद मसले पर भाजपा एक बड़ा आंदोलन खड़ा करना चाहती थी। सरकार ने बात मान ली, तो आंदोलन का फैसला वापस ले लिया गया। मगर आंदोलन से पहले ही भाजपा नेताओं में आपसी मतभेद उभरकर सामने भी आ गए। सुनते हैं कि आंदोलन की तैयारी बैठक में एक तेजतर्रार पूर्व मंत्री ने यह सुझाव दिया कि कम से कम एक बेरिकेड्स तोड़कर आगे बढऩा होगा, तब कहीं जाकर माहौल बनेगा। इस पर किसान मोर्चा के एक पदाधिकारी ने उन्हें यह कहकर चुप करा दिया कि आंदोलन की अगुवाई उन्हें (पूर्व मंत्री) ही करना होगा, क्योंकि तोडफ़ोड़ की स्थिति में पुलिस कार्रवाई को सहने के लिए आम कार्यकर्ता तैयार नहीं है। उन्होंने पूर्व मंत्री की यह कहकर खिंचाई की कि पहले भी वे इस तरह की सलाह दे चुके हैं और खुद गायब हो जाते थे। किसान नेता की तीखी प्रतिक्रिया के बाद बैठक में थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। ( rajpathjanpath@gmail.com)


29-Feb-2020

राज्यसभा, चर्चा नहीं, अटकलें शुरू

राज्यसभा के चुनाव 26 मार्च के लिए तय हुए हैं और महीना भर बाकी रहने पर भी अटकलें तो हर जगह लगती ही हैं क्योंकि राज्यसभा पहुंचना बहुत बड़ी बात होती है, छह बरस के लिए जिंदगी का सुख, दिल्ली में असर, और बाकी जिंदगी की पेंशन-सहूलियतें सब तय हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ से अभी दो सीटें खाली हुई हैं जिनमें एक मोतीलाल वोरा की भी है। दूसरी सीट रणविजय सिंह जूदेव की है, लेकिन भाजपा इस बार विधायकों की कमी से किसी को राज्यसभा भेज नहीं पाएगी, और वह किसी नाम को छांटने की फिक्र से भी मुक्त है। दोनों नाम कांग्रेस के तय होना है, और एक अनार सौ बीमार वाली नौबत है। 

मोतीलाल वोरा कांग्रेस पार्टी के लिए इतनी अधिक अहमियत रखते हैं कि वे दिल्ली में सोनिया गांधी के सबसे करीबी लोगों में तो हैं ही, वे नेशनल हेरल्ड जैसे पार्टी-कारोबार को भी सम्हालते हैं, और यह जिम्मा सम्हालते हुए वे सोनिया और राहुल के साथ अदालती कटघरे में भी पहुंचे हुए हैं। एक नाव में सवार इन तमाम लोगों की एक-दूसरे पर निर्भरता भी मायने रखती है। जानकारों का कहना है कि वोराजी एक बार और राज्यसभा जाने के लिए बिल्कुल तैयार हैं, उनकी सेहत भी उम्र के विपरीत, किसी जवान नेता के टक्कर की है, और वे छत्तीसगढ़ में पैदा न होने पर भी पूरी जिंदगी से छत्तीसगढ़ की राजनीति करते आए हैं। दूसरी तरफ दिल्ली के जानकार कुछ लोगों का यह भी कहना है कि केरल के के.सी. वेणुगोपाल का नाम भी छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए तय हो सकता है, इनके लिए पार्टी अतिरिक्त कोशिश करेगी क्योंकि राहुल गांधी केरल से ही विशाल बहुमत से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए हैं, और केरल ने कांग्रेस की लोकसभा में इज्जत बचाकर रखी है। लेकिन ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस तरह छत्तीसगढ़ी-राजनीति कर रहे हैं, एक नाम खालिस छत्तीसगढ़ी का होगा। अब इसमें उनके पास संगठन के अपने सहयोगी गिरीश देवांगन, और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा के नाम हो सकते हैं, दोनों ही छत्तीसगढ़ी माटीपुत्र हैं, दोनों ही ओबीसी तबके के हैं। हालांकि इस बारे में मुख्यमंत्री के कुछ करीबी लोगों से पूछने पर उनका कहना है कि अभी मुख्यमंत्री के आसपास राज्यसभा को लेकर कोई चर्चा भी शुरू नहीं हुई है, और लोग अपने-अपने अंदाज से अटकलें लगा रहे हैं। 

जब अटकल की ही बात आती है तो मध्यप्रदेश में सिंधिया और दिग्विजय सिंह दोनों को राज्यसभा भेजने की तैयारी बताई जाती है, लेकिन अगर दिग्विजय सिंह को वहां से न भेजकर छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में भेजा जाएगा, तो भी छत्तीसगढ़ के तमाम कांग्रेस विधायक खुश होंगे, क्योंकि सारे ही विधायक उन्हीं के साथी और प_े रहे हुए हैं। लेकिन यह बात सिर्फ राजनीतिक संबंधों के आधार पर है, यह अटकल की दर्जे की बात भी नहीं है। फिलहाल जो एक नाम अधिक संभावना रखता है वह मोतीलाल वोरा का है, क्योंकि वे खुद तैयार हैं, दूसरा नाम प्रदेश के भीतर या बाहर कहीं का भी हो सकता है। 

पुराने गुरू काम आए

पूर्व सीएम अजीत जोगी और नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया के बीच चोली-दामन का साथ रहा है। जोगी, डहरिया के राजनीतिक गुरू माने जाते हैं। मगर जोगी ने कांग्रेस छोड़ी तो डहरिया ने उनका साथ छोड़ दिया। इसके बाद दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। डहरिया अभी भी जोगी को लेकर सहज नहीं दिखते हैं। इसका नजारा विधानसभा में उस वक्त देखने को मिला जब भाजपा सदस्यों ने डहरिया की टिप्पणी से खफा होकर उनके विभागों के सवालों का बहिष्कार कर दिया। 

पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तो डहरिया के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार करते हुए यहां तक कह दिया कि आसंदी चाहे तो उनके (चंद्राकर) खिलाफ कार्रवाई कर दे, लेकिन वे नगरीय प्रशासन मंत्री से सवाल नहीं पूछेंगे। फिर क्या था, अजीत जोगी, भाजपा सदस्यों और डहरिया के बीच सुलह सफाई के लिए आगे आए। उन्होंने डहरिया के प्रति अपना प्रेम दिखाते हुए छत्तीसगढ़ी में गुजारिश की कि मैं तोर संरक्षक हौं, तोर अभिभावक रहैंव। हॉस्टल से यहां (विधानसभा) लाए हौं। मोर बात मान ले, एक लाईन मीठा बोल दे। सब कुछ ठीक हो जाही। कखरो मन में कोई बात नहीं रहई। डहरिया खड़े हुए और सफाई दी कि चंद्राकर और अन्य विपक्षी सदस्यों का वे सम्मान करते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि वे जोगीजी का भी सम्मान करते हैं। छात्र राजनीति के दौर में जोगीजी जब कलेक्टर थे, तब एक बार हॉस्टल में उनका घेराव भी कर चुके हैं। वे जोगी से जुड़े रहे हैं, लेकिन बोचकने (अलग होने) में काफी समय लगा। उनकी टिप्पणी से जोगी समेत बाकी सदस्य भी हंस पड़े। 

रमन सिंह का बदला मिजाज

पूर्व सीएम रमन सिंह अब बाकी भाजपा सदस्यों को साथ लेने के लिए आतुर दिख रहे हैं। वे अब हरेक मुद्दे पर अपने विरोधी माने जाने वाले पार्टी विधायकों से चर्चा में परहेज नहीं कर रहे हैं।  दरअसल, नेता प्रतिपक्ष के चयन के बाद से रमन सिंह और बृजमोहन-ननकीराम कंवर खेमे के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। हाल यह रहा कि ननकीराम कंवर ने रमन सिंह के पीएस रहे अमन सिंह और मुकेश गुप्ता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा सीएम भूपेश बघेल को सौंप दिया था और सरकार ने जांच के लिए एसआईटी बिठा रखी है। 

कंवर की तरह पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल भी रमन सिंह से छिटके रहे हैं। शीतकालीन सत्र में तो रमन सिंह वकीलों की फीस से जुड़े सवाल पूछकर उलटे घिर गए थे। सीएम भूपेश बघेल और सत्तापक्ष के सदस्यों ने उन पर बुरी तरह चढ़ाई कर दी थी। हालांकि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और शिवरतन शर्मा ने थोड़ा बहुत सत्ता पक्ष के सदस्यों का प्रतिकार किया, लेकिन यह काफी नहीं था। बाकी भाजपा सदस्य खामोश रहे। धरमलाल कौशिक को तो बाकी भाजपा सदस्यों का साथ मिल रहा है, लेकिन रमन सिंह के साथ ऐसा नहीं था। सुनते हैं कि यह सब भांपकर रमन सिंह ने अपने खिलाफ नाराजगी को दूर करने के लिए खुद पहल की है। 

विधानसभा में ननकीराम कंवर के पास जाकर उनसे किसानों से जुड़े विषयों पर चर्चा की। यही नहीं, वे अजय और बाकी सदस्यों से भी लगातार बतियाते दिखे। इसका कुछ असर भी हुआ और भाजपा सदस्य विधानसभा में पिछले सत्रों के मुकाबले ज्यादा मुखर दिखे।  ( rajpathjanpath@gmail.com)


24-Feb-2020

जयदीप जर्मनी चले...

छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर जयदीप सिंह की पोस्टिंग जर्मनी के भारतीय दूतावास में हो गई है। 97 बैच के आईपीएस जयदीप सिंह लंबे समय से आईबी में पदस्थ हैं। पिछले कुछ समय से वे छत्तीसगढ़ में आईबी का काम देख रहे हैं। जयदीप सिंह स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक सिंह के पति हैं। चूंकि पति की विदेश में पोस्टिंग हो गई है, तो संभावना जताई जा रही है कि निहारिका बारिक सिंह भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा सकती हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया है। करीबी जानकारों का कहना है कि अभी तुरंत उन्होंने ऐसा कुछ सोचा नहीं है।

अमितेष चुप नहीं रह पाए...
राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान विपक्ष की तरफ से टोका-टाकी की आशंका जताई जा रही है, लेकिन सबकुछ शांतिपूर्ण चल रहा था। तभी अमितेष शुक्ल खड़े हुए और उन्होंने राज्यपाल का अभिभाषण शांतिपूर्वक सुनने के लिए विपक्षी सदस्यों को साधुवाद दे दिया। यानी टोका-टाकी की शुरूआत खुद सत्तापक्ष के सदस्य ने कर दी। अमितेश की टिप्पणी पर सदन में ठहाका लगा। पिछले बरस अक्टूबर में जब गांधी पर विधानसभा का विशेष सत्र हुआ तो अमितेष शुक्ल ने तमाम विधायकों की तरह विशेष कोसा-पोशाक पहनने से इंकार कर दिया था, और नतीजा यह हुआ था कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरण दास महंत ने दो दिन के उस सत्र में अमितेष को बोलने नहीं दिया था, और वे नाराजगी से सदन के बाहर चले गए थे। इस बार उन्हें बोलने का मौका मिला। बाद में अभिभाषण खत्म होने के बाद भाजपा सदस्य बृजमोहन अग्रवाल ने धान खरीदी बंद होने से किसानों की परेशानी का मुद्दा उठाया। 

आडंबर से उबरना भी जरूरी...
अभी-अभी महाशिवरात्रि के मौके पर एक बार फिर यह सवाल उठा कि कुपोषण के शिकार इस देश में जहां बच्चों को पीने के लिए दूध नसीब नहीं है, वहां पर क्या किसी भी प्रतिमा पर इस तरह दूध बर्बाद करना चाहिए? और बात महज हिन्दू धर्म के किसी एक देवी-देवता की नहीं है, यह बात तो तमाम धर्मों के लोगों की है जिनमें कहीं भी, किसी भी शक्ल में सामान की बर्बादी होती है, और लोग उससे वंचित रह जाते हैं। कई धर्मों को देखें, तो हिन्दू धर्म में ऐसी बर्बादी सबसे अधिक दिखती है। शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध नाली से बहकर निकल जाता है, और ऐसे ही मंदिरों के बाहर गरीब भिखारी, औरत और बच्चे भीख मांगते बैठे रहते हैं। जाहिर है कि ऐसे गरीबों को दूध तो नसीब होता नहीं है। 

लेकिन समाज अपने ही धार्मिक रिवाजों से कई बार उबरता भी है। अभी सोशल मीडिया पर एक तस्वीर आई है जिसमें शिवलिंग पर दूध के पैकेट चढ़ाए गए हैं, और उसके बाद ये पैकेट गरीब और जरूरतमंद बच्चों को बांट दिए जाएंगे। धार्मिक रीति-रिवाजों में पाखंड खत्म करके इतना सुधार करने की जरूरत है कि ईश्वर को चढ़ाया गया एक-एक दाना, एक-एक बूंद गरीबों के लिए इस्तेमाल हो। जब ईश्वर के ही बनाए गए माने जाने वाले समाज में बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार हैं, तो दूध को या खाने-पीने की किसी भी दूसरी चीज को नाली में क्यों बहाया जाए? यह भी सोचने की जरूरत है कि जब कण-कण में भगवान माने जाते हैं, तो ऐसे कुछ कणों को भूखा क्यों रखा जाए? धार्मिक आडंबर में बर्बादी क्यों की जाए? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब लोगों को ढूंढने चाहिए, और चूंकि धार्मिक आस्था तो रातोंरात घट नहीं सकती, नई तरकीबें निकालकर बर्बादी घटाने का काम करना चाहिए। धर्म के नाम पर पहले से मोटापे के शिकार तबके को और अधिक खिला देना उन्हें मौत की तरफ तेजी से धकेलने का काम है, उससे कोई पुण्य नहीं मिल सकता। खिलाना तो उन्हें चाहिए जिन्हें इसकी जरूरत हो। अभी की शिवरात्रि तो निकल गई लेकिन अगली शिवरात्रि तक समाज के बीच यह बहस छिडऩी चाहिए कि दूध को इस तरह चढ़ाया जाए कि वह लोगों के काम आ सकें, जरूरतमंदों के काम आ सके। (rajpathjanpath@gmail.com)


23-Feb-2020

किस्सा भूतों..., मतलब भूतपूर्वों का

राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष अजय सिंह 29 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। उन्हें नाराजगी के चलते सरकार ने सीएस के पद से हटाकर राजस्व मंडल भेज दिया था। बाद में उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। अब चूंकि वे रिटायर हो रहे हैं, तो उनकी पोस्टिंग को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। यह संकेत हैं कि अजय सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर आगे भी बने रहेंगे। वैसे भी, राज्य बनने के बाद जितने भी सीएस रहे हैं, उनमें से आरपी बगई और पी जॉय उम्मेन को छोड़ दें, तो बाकी सभी को रिटायरमेंट के बाद कुछ न कुछ जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आरपी बगई और पी जॉय उम्मेन को भी पद का ऑफर दिया गया था, लेकिन दोनों ने यहां सरकार में काम करने से मना कर दिया।  

बगई को पीएससी चेयरमैन का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। बगई का सोचना था कि पीएससी चेयरमैन का पद प्रमुख सचिव के समकक्ष है। वे कोई अहम जिम्मेदारी चाह रहे थे, जिसके लिए रमन सरकार तैयार नहीं थी। बाद में वे दुबई चले गए और एक निजी कंपनी में नौकरी करने लगे। जबकि जॉय उम्मेन को सीएस के पद से हटाने के बाद सीएसईबी और एनआरडीए चेयरमैन के पद पर यथावत काम करने के लिए कहा गया था, लेकिन वे सीएस के पद से हटाए जाने के बाद इतने नाखुश थे कि वे रिटायरमेंट के बाद अपने गृह प्रदेश केरल चले गए, जहां केरल सरकार में वे राज्य वित्त निगम के चेयरमैन हो गए थेे। बाद में वे एक मंत्रालय के सलाहकार बनाए गए थे और जब भ्रष्टाचार के चलते उस मंत्रालय के मंत्री की कुर्सी चली गई, तो उम्मेन का काम भी खत्म हुआ।

राज्य के पहले सीएस अरूण कुमार प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष बनाए गए। उनका बनना भी बहुत दिलचस्प है। सीएस रहते हुए उन्होंने कोई काम नहीं किया, फाईलें उनके कमरे में जाती थीं, वहां से वापिस नहीं आती थीं। लेकिन रिटायर होने के बाद उन्हें पुनर्वास की बहुत तलब थी। अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे, और सुनिल कुमार उनके सचिव थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने सुनिल कुमार की ऐसी घेरेबंदी की कि आखिर में थक-हारकर उन्होंने जोगीजी से कहा कि इन्हें कहीं भी कुछ भी बना दें, ताकि परेशान करना बंद करें। ऐसे में एक प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर अरूण कुमार को एक साल के लिए उसमें रखा गया। जिसने नौकरी में रहते काम नहीं किया, उसे प्रशासनिक सुधार का काम दिया गया। सरकार में इस किस्म की बर्बादी को अधिक गंभीर नहीं माना जाता है, और हर सरकार में ऐसे कई पद बर्बाद होते ही हैं।

उनके बाद के सीएस एस के मिश्रा राज्य विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन बनाए गए। इसके बाद भी वे कई अहम पदों पर काम करते रहे। वे रिटायरमेंट के बाद सबसे लंबी पारी खेलने वाले अफसर रहे। एसके मिश्रा के उत्तराधिकारी एके विजयवर्गीय राज्य के पहले मुख्य सूचना आयुक्त बने। उनके बाद शिवराज सिंह भी पहले राज्य निर्वाचन आयुक्त फिर राज्य योजना आयोग और राज्य पावर कंपनी  के चेयरमैन रहे, वे सीएम के सलाहकार के पद पर भी काम करते रहे। शिवराज सिंह के बाद जॉय उम्मेन और फिर सुनिल कुमार सीएस बने। सुनिल कुमार ने भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष, और मुख्यमंत्री के सलाहकार के पद पर काम किया। उनके बाद विवेक ढांड रिटायरमेंट के पहले ही इस्तीफा देकर रेरा के चेयरमैन बने और वे इस पद पर काम कर रहे हैं। विवेक ढांड के बाद अजय सिंह सीएस बनाए गए थे। भूपेश बघेल सरकार ने आते ही अजय सिंह को हटाकर सुनील कुजूर को सीएस बनाया गया। कुजूर को रिटायरमेंट के बाद वर्तमान सरकार ने सहकारिता आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। अब अजय सिंह को उनके पूर्ववर्तियों की तरह कोई जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


22-Feb-2020

बापू की कुटिया...

पिछली भाजपा सरकार के दौरान रायपुर के बहुत से बगीचों में एक उत्साही कलेक्टर ने बापू की कुटिया बनवा दी थी। कलेक्टरों के पास जिला खनिज निधि का बहुत सा पैसा मर्जी से खर्च करने के लिए रहता था, जिसमें अब कलेक्टरों की मर्जी काफी कम कर दी गई है। उस वक्त छह या आठ कोने के ऐसे कमरे बगीचों में बनवाए गए थे जो सिर्फ बुजुर्गों के बैठने के लिए रखे गए थे। उनमें टीवी भी लगाया गया था, और जूते-चप्पल बाहर उतारकर आने के नोटिस भी लगाए गए थे। पता नहीं बुजुर्गों को यह रास नहीं आया, या फिर जूते-चप्पल बाहर चोरी होने का खतरा था, ये उजाड़ पड़े हुए हैं, और अब पता चल रहा है कि म्युनिसिपल इन्हें महिलाओं को किटी पार्टी जैसी जरूरतों के लिए किराए पर देने के लिए ठेकेदार तय कर रहा है। अगर पार्टी की बाजारू जगह ही बनानी थी, तो हरियाली की जगह पर नियम तोड़ते हुए क्यों ऐसे निर्माण किए गए? बगीचों का ऐसा इस्तेमाल पूरी तरह नियमों के खिलाफ रहेगा। म्युनिसिपल के अफसरों और नेताओं ने यह भी कोशिश नहीं की कि बापू की कुटिया की जगह बा की कुटिया नाम करके देखा जाता कि क्या महिलाएं वहां बैठने में दिलचस्पी लेती हैं? आम महिलाएं बैठ सकें इसके बजाय अब महंगा भाड़ा देकर पार्टी रखने वाली, और गंदगी फैलाने वाली खास महिलाओं के लिए ये ढांचे अब रह गए हैं। म्युनिसिपल को इनका बाजारू इस्तेमाल करने के बजाय किसी और तरह का सामाजिक उपयोग करना चाहिए क्योंकि ये सामाजिक पैसे से सामाजिक जगह पर बने हुए ढांचे हैं। 

बगीचे और शऊर 
छत्तीसगढ़ के अधिकतर शहरों में बाग-बगीचों में म्युनिसिपलों ने कसरत करने के लिए मशीनें लगाई हैं। किसी भी जगह एक किस्म की एक ही मशीन है, और उस पर एक या दो लोग ही कसरत कर सकते हैं। आठ-दस किस्म की मशीनें, और उस पर दर्जन भर लोगों की गुंजाइश, क्योंकि महिलाओं और आदमियों का आमने-सामने एक ही मशीन पर कसरत करने का यहां के बाग-बगीचों में चलन है नहीं। ऐसे में किसी एक मशीन पर दो महिलाएं बैठकर कमर पर जोर डालने के बजाय जब गप्पें मारने लगती हैं, तो फिर बाकी लोगों का वह कसरत करना हो नहीं पाता। अभी राजधानी रायपुर के ऐसे ही एक बगीचे में दो लड़कियां आमने-सामने जम गईं, एक अपने हाथ में चिप्स के पैकेट से एक-एक चिप्स निकालकर उसके बारे में देर तक घूरते हुए यह सोच रही थी कि मार दिया जाए, या छोड़ दिया जाए। पैकेट खत्म होने के पहले तो उसका वहां से हिलने का सवाल नहीं था, और हर चिप्स उसके सामने जीवन का सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा करते दिख रहा था कि खाऊं या न खाऊं। उसके ठीक सामने बैठी लड़की मोबाइल फोन पर कुछ देखे जा रही थी, और आधा घंटा गुजर जाने पर भी उसका देखना जारी था। उस मशीन पर कसरत करने की हसरत रखने वाले एक-दो लोग पास की मशीनों पर खड़े उन्हें घूर रहे थे, लेकिन इस जोड़े की एकाग्रता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। बाद में बगल से निकलते हुए एक आदमी ने इस लड़की के फोन की स्क्रीन पर एक नजर डाली, तो उस पर बिना कपड़ों की एक लड़की की तस्वीर दिख रही थी। यह तुलना करना मुश्किल था कि एक लड़की की देह में एकाग्रता अधिक गहरी थी, या उसके सामने चिप्स में एकाग्रता। जो भी हो, हिन्दुस्तानियों को इतना सलीका और शऊर सीखना चाहिए कि कसरत की मशीनें बैठने की बेंच-कुर्सी नहीं होती हैं। राजधानी के अफसरों की समझ का यह हाल है कि जिन जगहों पर पैदल घूमने या कसरत करने को बढ़ावा देना चाहिए, वहां पर वे मुफ्त का वाईफाई देकर चर्बी को बढ़ावा दे रहे हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


21-Feb-2020

केंद्रीय कानून के विरोध से अपात्रता?
छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव देवेन्द्र वर्मा भोपाल  शिफ्ट हो गए हैं। उनकी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से गहरी छनती रही है। देवेन्द्र वर्मा कई और राजनेताओं के करीबी रहे हैं। वे संसदीय मामलों के गहरे जानकार भी माने जाते हैं। वे प्रेमप्रकाश पाण्डेय के पुत्र के विवाह समारोह में शिरकत करने पहुंचे, तो उन्होंने अनौपचारिक रूप से मीडिया से जुड़े लोगों के साथ निजी चर्चा में एनआरसी-सीएए पर अपनी राय रखी। 

छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों के सीएम एनआरसी-सीएए का खुलेतौर पर विरोध कर चुके हैं। उन्होंने अपने राज्यों में एनआरसी-सीएए लागू नहीं होने देने की बात कही है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने भी दो दिन पहले मीडिया में यही बात दोहराई है। पूर्व प्रमुख सचिव देवेन्द्र वर्मा का मानना है कि केन्द्रीय कानून को रोकने का अधिकार राज्यों को नहीं है। ये बात कानून के खिलाफ टीका-टिप्पणी करने वाले राजनेता भी जानते हैं। मगर उनकी यह टिप्पणी संविधान के खिलाफ भी है।  

वे कहते हैं कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने संविधान की शपथ ली है और ऐसे में उनकी कानून के खिलाफ टिप्पणी असंवैधानिक है। पूर्व पूर्व विधानसभा सचिव का मानना है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का एनआरसी-सीएए को लागू नहीं करने की बात कहना सदन से अयोग्यता का कारण भी बन सकता है। यह उनकी अयोग्यता साबित करने के लिए एकदम फिट केस है। जिस तरह एनआरसी-सीएए के खिलाफ टीका-टिप्पणी हो रही है, उसको लेकर देर सवेर संबंधित नेताओं की सदस्यता समाप्त करने के खिलाफ कोई सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है, क्योंकि संवैधानिक विषयों पर सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही सुनवाई हो सकती है। फिलहाल तो गली-मोहल्लों में एनआरसी-सीएए को लेकर बहस ही चल रही है।

भाजपा का समुद्रमंथन जारी

प्रदेश भाजपा के नए मुखिया की तलाश चल रही है। पूर्व सीएम रमन सिंह और बाकी दिग्गज नेताओं की अपनी अलग पसंद बताई जा रही है। इन चर्चाओं के बीच पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल और शिवरतन शर्मा प्रदेश अध्यक्ष को लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के समक्ष बेबाकी से अपनी बात कह चुके हैं। चूंकि नड्डा छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी भी रह चुके हैं। और उनके प्रदेश के इन तीनों समेत कई अन्य से उनके व्यक्तिगत संबंध भी हैं। ऐसे में नड्डा ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना।  

तीनों नेताओं ने इशारों-इशारों में कह दिया कि नेता प्रतिपक्ष की तरह ही प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पार्टी को खड़ा करना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आक्रामक प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत पर बल दिया। तीनों नेताओं को सुनने के बाद नड्डा के कहने पर राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने प्रदेश के सभी सांसदों से भी रायशुमारी की है। सुनते हैं कि सांसदों के विचार भी अजय, नारायण और शिवरतन से मेल खाते दिखे। प्रदेश अध्यक्ष के लिए खुद अजय चंद्राकर, विजय बघेल और रामविचार नेताम का नाम चर्चा में है। पूर्व सीएम रमन सिंह और सौदान सिंह की जोड़ी ने विष्णुदेव साय का नाम बढ़ाया है। चर्चा है कि आरएसएस सहित एक पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने बिलासपुर के सांसद अरूण साव को प्रदेश संगठन की कमान सौंपने की वकालत की है। 

खास बात यह है कि हाईकमान ने रमन सिंह की पसंद पर विधायकों के बहुमत को नजरअंदाज कर धरमलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनाया था। देखना है कि प्रदेश अध्यक्ष के चयन में पार्टी चंद्राकर, नारायण और शिवरतन की तिकड़ी की राय को महत्व देती है, अथवा नहीं। कुल मिलाकर नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन से हाईकमान के सामने दिग्गजों की अपनी ताकत का भी प्रदर्शन हो जाएगा। 
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20-Feb-2020

टैक्स चोरी और आयकर छापे

टैक्स चोरी के खिलाफ आयकर विभाग का अभियान चल रहा है। प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक कारोबारियों के प्रतिष्ठानों में आयकर जांच चल रही है। देशभर में मंदी का माहौल हैं, ऐसे में कारोबारी आयकर जांच से काफी दिक्कत महसूस करते दिख रहे हैं। पिछले दिनों कैट के एक कार्यक्रम में एक व्यापारी नेता ने तो मुख्य आयकर आयुक्त से गुजारिश भी कर दी थी कि छत्तीसगढ़ से आयकर का लक्ष्य कम रखा जाए, ताकि व्यापारियों पर आयकर का प्रेशर कम रहे। 

आयकर आयुक्त ने साफ तौर पर बता दिया कि आयकर का लक्ष्य कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह खुलासा कर व्यापारियों की बोलती बंद कर दी, कि किसी भी कारोबारी को जानबूझकर परेशान नहीं किया जा रहा है, बल्कि आयकर विभाग के पास पूरा डेटा है कि कई व्यापारी आयकर चोरी कर रहे हैं। ऐसे 962 कारोबारी चिन्हित भी किए गए हैं, केवल उन्हीं के यहां जांच-पड़ताल हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कारोबारियों ने जांच में आयकर चोरी की बात मानी थी और इसको पटाने का भी वादा किया था, लेकिन वे सरेंडर राशि जमा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब टैक्स प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो चुकी है। ऐसे में किसी को बेवजह परेशान नहीं करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

कुछ एसपी बदलेंगे...
प्रदेश के कुछ आईपीएस अफसरों को जल्द ही इधर से उधर किया जा सकता है। इस पर सीएम के अमरीका प्रवास से लौटने के बाद फैसला हो सकता है। फेरबदल की स्थिति बलौदाबाजार एसपी नीतू कमल की वजह से बनी है। नीथू कमल की सीबीआई में पोस्टिंग हो चुकी है। वे सीबीआई में एसपी बनकर जा रही हैं। सीएम के लौटने के बाद उन्हें रिलीव किया जा सकता है। इसके अलावा कवर्धा एसपी लाल उमेद सिंह को भी दो साल से अधिक हो चुके हैं। वे एकमात्र एसपी हैं जिनकी पोस्टिंग पिछली सरकार में हुई थी, और उन्हें बदला नहीं गया है। ऐसे में उनका भी तबादला संभव है। रायपुर एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर सहित कुछ नाम है, जिन्हें एसपी बनाया जा सकता है। 

हिचकियों का भयानक राज...
अभी शादियों के एक सैलाब में छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े शहरों में जिस भयानक स्तर तक लाऊडस्पीकर बजे हैं, उनसे लोगों का जीना हराम हो गया है। कई लोग अपने घर के भीतर किसी ऐसे कमरे में सोने लगे हैं जहां आवाज का हमला कुछ कम रहे, लेकिन हर किसी को तो इतने बड़े घर नसीब होते नहीं हैं। चारों तरफ शादियों के ढोल-धमाके, लाऊडस्पीकर, और फिर रही-सही कसर धार्मिक शोरगुल पूरी कर देता है। ऐसे में जब आसपास से बिगड़ैल पैसे वाले भारी-भरकम बुलेट-मोटरसाइकिल का सायलेंसर फाड़कर निकलते हैं, तो लोग खूब गालियां देते हैं। 

एक दिलचस्प कहानी अभी सोशल मीडिया पर तैर रही है। एक परिवार में अचानक कुछ सदस्यों को हिचकियां आने लगती हैं, और बढ़ते-बढ़ते नौबत इतनी बुरी हो जाती है कि उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। डॉक्टर कई किस्म की जांच करवाता है, और उसमें कोई सुराग न निकलने पर वह मरीजों के साथ आए हुए नौजवान से पूछता है- क्या आपके घर में अभी-अभी किसी ने बुलेट खरीदी है? 

डॉक्टर के सवाल से हैरान नौजवान कहता है कि हां ली तो है, लेकिन उससे हिचकियों का क्या लेना-देना? 

डॉक्टर फिर पूछता है कि क्या बुलेट का सायलेंसर बदलकर जोरों की आवाज वाला सायलेंसर लगवाया है? 

और अधिक हैरान होते हुए नौजवान कहता है कि हां लगवाया तो है, लेकिन उससे घरवालों की हिचकियों का क्या लेना-देना?

डॉक्टर अपनी अक्ल के तजुर्बे से कहता है- तुम मोटरसाइकिल का शोर मचाते हुए जितनी जगह घूमते हो, वहां के लोग तुम्हारे घर के लोगों को याद करते हुए गालियां देते हैं, और उसी की वजह से तुम्हारे घर के लोगों को इतनी हिचकियां आ रही हैं। 

अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसे हजारों लोग घूम रहे हैं, जो दूसरों का जीना हराम कर रहे हैं, और लाखों लोगों की बद्द्ुआओं का असर उनके परिवार पर तो होगा ही होगा, आज नहीं हुआ है तो कल की गारंटी है। इसलिए शोर वाला सायलेंसर लगाते हुए अपने परिवार के उन लोगों का ख्याल रखें जिन्हें लोग आमतौर पर गालियां दे सकते हैं, आपकी वजह से। कम लिखे को अधिक समझें, और अपने परिवार पर मेहरबानी रखें।
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19-Feb-2020

बैठक क्यों हुई, अटकलें जारी...

पिछले दिनों राहुल गांधी ने दिल्ली में सीएम भूपेश बघेल, डॉ. चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू के साथ बैठक की। बैठक में प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया और अध्यक्ष मोहन मरकाम भी थे। यह खबर आई कि राहुल ने सरकार के कामकाज की समीक्षा की है, मगर बैठक के औचित्य को लेकर पार्टी के भीतर कयास लगाए जा रहे हैं।

वैसे तो हाल ही में प्रदेश में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल के लिए समन्वय समिति का गठन किया गया है, लेकिन राहुल की बैठक में समन्वय समिति के कई सदस्यों को नहीं बुलाया गया था।  चुनिंदा नेताओं के साथ बैठक की जरूरत क्यों पड़ी, इसको लेकर भी पार्टी नेता अंदाजा लगा रहे हैं। 

सुनते हैं कि प्रदेश के दिग्गज नेता पिछले कुछ समय से हाईकमान के समक्ष सीएम-सरकार के खिलाफ कानाफूसी कर रहे थे। किसी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा हो, उससे पहले ही राहुल गांधी ने प्रमुख नेताओं को एक साथ बिठाकर वस्तुस्थिति जानने की कोशिश की। ताकि समस्या का मौके पर ही इलाज किया जा सके। बैठक में सरकारी योजना और चुनाव नतीजों पर सामान्य चर्चा हुई, मगर बैठक में किसी भी नेता ने सीएम-सरकार के कामकाज पर कोई सवाल खड़े नहीं किए। ऐसे में राहुल करते भी तो क्या, सबको मिलजुलकर काम करने की मसीहाई नसीहत देकर रवाना कर दिया। पीठ पीछे जाकर कोई कुछ भी कहे, सामने जब कुछ कहा नहीं गया तो राहुल क्यों और क्या करते?

दूसरी तरफ अभी मुख्यमंत्री के अमरीका जाने से राजनीतिक उबाल कुछ ठंडा पड़ा हुआ था, लेकिन इस बीच उनके संसदीय सलाहकार राजेश तिवारी ने अपने फेसबुक पेज पर एक फोटो पोस्ट की है जिसमें वे मुख्यमंत्री के दूसरे सलाहकार विनोद वर्मा, और दो अन्य करीबी लोगों के साथ प्रियंका गांधी से मिलते हुए दिख रहे हैं। जाहिर तौर पर यह तस्वीर दिल्ली में मुलाकात की दिखती है, और मुख्यमंत्री के इतने करीबी इतने लोगों को कांगे्रस हाईकमान की इतनी करीबी प्रियंका से मिलने पर काफी कुछ कहने का मौका तो मिला ही होगा।

कबाड़ का बाजार बंगला
अफसरों में बहुत से ऐसे रहते हैं जिन्हें सामानों का भुगतान नहीं करना पड़ता। नतीजा यह होता है कि सामान बढ़ते चलते हैं, और हर बार तबादले पर एक ट्रक बढ़ जाती है। ऐसे लोगों में भी अगर परिवार में किसी को कबाड़ जमा करके रखने का शौक हो, तो मुसीबत और बढ़ जाती है। राज्य में तैनात अखिल भारतीय सेवा के एक जोड़े के साथ ऐसी ही दिक्कत हो गई है। पति-पत्नी में से एक गैरजरूरी सामानों से छुटकारा चाहते हैं, और दूसरे की चाहत अखबारों की रद्दी तक को सम्हालकर रखने की है। नतीजा यह है कि नया सामान आते जाता है, जिसका भुगतान आमतौर पर करना नहीं पड़ता, और पुराना सामान भी जमा रहता है जिससे बंगले के कुछ कमरे भर जाते हैं। जब तक जिलों के बड़े बंगलों में तैनाती रहती थी, तब तक तो किसी तरह काम चल जाता था, वहां भी बंगले के अहाते में टीन के शेड बनवाकर गोदाम की तरह सामान रखना पड़ा, लेकिन राजधानी में तो बंगले सीमित आकार के ही मिलते हैं, और उनमें गोदाम जोडऩे की सहूलियत भी नहीं रहती है। नतीजा यह हुआ है कि यह परिवार इतने सामानों से लद गया है कि जरूरत के वक्त सामान ढूंढना मुमकिन नहीं होता, और तलाश से बचने के लिए एक बार फिर किसी को कहकर सामान बुलवा लिया जाता है। ऐसे ही एक मातहत विभाग के छोटे अफसर को बंगले के इंतजाम के लिए रखा गया है, जिसका कहना है कि बंगले में से ही सामान निकालकर सामने रख दिया जाए तो भी साहब और मैडम को पता नहीं चलेगा कि वह बाजार से आया है, या उनके घर में ही पैक पड़ा हुआ सामान है। ऐसे मातहत विभाग में अब यह मजाक चल निकला है कि मनोचिकित्सक से कहकर कबाड़प्रेम का इलाज करवाया जाए, वरना इससे बड़ा बंगला मिलने में तो अभी दस बरस बाकी हैं। 

खुद नंगे हो रहे हैं...
सोशल मीडिया पर अपनी असहमति पर आधारित आलोचना लिखने में कुछ लोग इतने हमलावर हो जाते हैं कि दूसरे की इज्जत मटियामेट हो या न हो, अपनी खुद की इज्जत जरूर मिट्टी में मिला लेते हैं। खासकर जब किसी महिला पर हमला करना हो, तब अगर उसके साथ बलात्कार की धमकी पोस्ट की जाए, उसके गुप्तांगों के साथ क्या सुलूक करना चाहिए यह पोस्ट किया जाए, तो उस महिला का चाहे जो हो, पोस्ट करने वाला तो बलात्कार की मानसिकड्डता वाला दिखता ही है। अब यह तो इस देश का सबसे कड़ा आईटी कानून लागू करने वाले अफसर केंचुए की तरह के बिना रीढ़ वाले प्राणी हैं, इसलिए वे कुछ चुनिंदा मामलों को छोड़कर और कुछ नहीं करते, वरना हर दिन छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में भी दर्जन भर लोग गिरफ्तार होते, और कुछ हफ्तों में ही जेल के बाहर बचे मर्दों की बलात्कारी मानसिकता ठंडी पड़ जाती। फिलहाल तो दिल्ली से छत्तीसगढ़ आई वामपंथी नेता बंृदा करात के खिलाफ जहर उगलने वालों ने बंृदा का तो नुकसान नहीं किया, खुद अपना चाल-चलन और अपनी सोच जरूर उजागर कर दी। सोशल मीडिया एक ऐसी दुधारी तलवार है जिसमें अपने तरफ की धार अधिक घातक होती है।

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17-Feb-2020

अमरीका दौरे पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ गए उनके सलाहकार प्रदीप शर्मा ने इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा है- कुछ मौकों पर आपको एक बाउंसर (पीछे धकेलने वाले) की तरह काम करना पड़ता है, खासकर तब जब आपके बॉस ने एक सचमुच ही शानदार भाषण दिया हो, और वे घिर गए हों, भूपेशजी ने अपने भाषण से बॉस्टन में हलचल मचा दी है।

बजाज के दिन फिरेंगे?
सालभर से निलंबन का दंश झेल रहे आईएफएस अफसर एसएस बजाज की जल्द ही बहाली हो सकती है। सीएम भूपेश बघेल अमरीका  प्रवास से लौटने के बाद बजाज की बहाली पर फैसला ले सकते हैं। नवा रायपुर के पौंता चेरिया में सोनिया गांधी ने जिस जगह पर नई राजधानी का शिलान्यास किया था, उस जमीन को पिछली सरकार ने आईआईएम संस्थान को दे दिया गया था। वर्तमान सरकार ने इसके लिए तत्कालीन सीईओ एसएस बजाज को जिम्मेदार माना था। 

वैसे तो राज्य सरकार अखिल भारतीय सेवा के अफसर को निलंबित कर सकती है, लेकिन इसके लिए केन्द्र का अनुमोदन जरूरी है। बजाज ने निलंबन के खिलाफ अपील भी की थी। केन्द्र ने बजाज का निलंबन खत्म करने की अनुशंसा की है। राज्य सरकार का रूख भी नरम है।  बजाज की साख अच्छी है। ऐसे में पूरा विभाग उनके साथ खड़ा दिख रहा है। आईएफएस एसोसिएशन पहले से ही बजाज का निलंबन खत्म करने का आग्रह कर चुका है। चूंकि निलंबन का फैसला कैबिनेट ने लिया था। ऐसे में वापसी भी सीएम की सहमति जरूरी है। माना जा रहा है कि सीएम के अमरीका लौटने के बाद बजाज की बहाली पर मुहर लग सकती है। बजाज शानदार साख वाले अफसर हैं जिसकी वन विभाग में थोड़ी सी कमी भी रहती है। वे छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले हैं, यहीं के इंजीनियरिंग कॉलेज के पढ़े हुए हैं, इस सरकार में बाहर से बड़ी ताकत रखने वाले लोगों ने भी पिछले बरसों में बजाज का अच्छा काम देखा हुआ है, और भूपेश के कांगे्रस के भीतर के एक करीबी सहयोगी शैलेष नितिन त्रिवेदी बजाज के सहपाठी भी रहे हैं। आज जब वन विभाग को एक किस्म से सोच-समझकर भ्रष्ट बनाया जा रहा है, जब आधे डिवीजनों में गैरआईएफएस को सोच-समझकर प्रभार दिया गया, तो ऐसे माहौल में काबिल और ईमानदार अफसरों की वैसे भी कमी दिख रही है।

फरमाईशों की लिस्ट
शादी के विज्ञापन लोगों के पूर्वाग्रह भी बताते हैं, और हिन्दुस्तानी अंदाज की पसंद भी। अब इस एक विज्ञापन को देखें तो समझ आता है कि लड़कों की उम्मीदें कैसी आसमान छूती होती हैं। पांच फीट आठ इंच के एक बीडीएस डेंटिस्ट ने एक ईश्तहार दिया है। वह अभी काम भी नहीं कर रहा है, और उसकी फरमाईश कोई मूर्तिकार ही पूरी कर सकता है। उसे बहुत ही गोरी, खूबसूरत, बहुत ही निष्ठावान, बहुत ही भरोसेमंद, प्यारी, ख्याल रखने वाली, बहादुर, ताकतवर, पैसे वाली, अत्यंत ही देशप्रेमी, और भारत की फौजी क्षमता को बढ़ाने की हसरत रखने वाली, भारत की खेल क्षमता बढ़ाने वाली, शिशुपालन में विशेषज्ञ, शानदार पकाने वाली, भारतीय हिन्दू-ब्राम्हण कामकाजी लड़की चाहिए। यह लड़की झारखंड या बिहार से होनी चाहिए, संपूर्ण कुंडली मिलान, और 36 गुण मिलना जरूरी। यह सब हो तो ही इस लड़के को शादी में कोई जल्दी नहीं है, और यह सिर्फ एसएमएस पर आने वाले प्रस्ताव का जवाब देगा, फोन नहीं उठाएगा। 

अब जो डेंटिस्ट कोई कामकाज भी नहीं कर रहा है, उसकी फरमाईशों की लिस्ट इतनी लंबी है कि उसे कोई मूर्तिकार या कोई ईश्वर ही पूरा कर सकते हैं, और इतने हुनर, इतनी खूबसूरती एक बदन में फिट कर सकते हैं। 

नंबर प्लेट 
लोगों को अपनी ताकत और अपना खास दर्जा दिखाने के लिए गाडिय़ों के आगे-पीछे का इस्तेमाल करते हैं। राजनीति से जुड़े हुए कुछ लोग गाडिय़ों के ऊपर तरह-तरह की लाईट लगा लेते हैं, सायरन और लाऊडस्पीकर लगा लेते हैं, ताकि चौराहे पर खड़े सिपाही दहशत में आ जाएं। राजनेताओं की गाडिय़ों में सायरन एक आम बात हो गई है, और वह सड़क पर आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। नंबर प्लेट की जगह किसी धार्मिक या सामाजिक संस्था का नाम, किसी साम्प्रदायिक संगठन का नाम, या किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह को लगा लेना एक आम बात है। पुलिस भी आमतौर पर ऐसी गाडिय़ों को नहीं छूती है क्योंकि ऐसी एक गाड़ी पर कार्रवाई से जितने फोन आने लगेंगे, और जितना बवाल होने लगेगा उतनी देर में दस दूसरी गाडिय़ों पर कार्रवाई की जा सकेगी। 

अब अभी एक ऐसी गाड़ी देखने मिली जिसकी नंबर प्लेट पर लिखा हुआ तो है सामान्य नागरिक, लेकिन इसके साथ की बाकी नंबर प्लेट पर नियमों के खिलाफ पूरा छत्तीसगढ़ लिखा हुआ है। अब नियम तोडऩे के बाद भी कोई अपने आपको सामान्य नागरिक साबित करने की कोशिश करे, तो वह तो बड़ी अटपटी बात है।
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16-Feb-2020

भूपेश ने की महंत की तारीफ ही तारीफ

अमरीका के दौरे पर गए हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय राजनीति और जातिवाद को लेकर बहुत सवाल किए गए। दरअसल उनके भाषण का विषय भी यही था, और छत्तीसगढ़ में उन्होंने पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण बढ़ाने का फैसला जिस तरह लिया, उससे भी जाति आधारित आरक्षण और राजनीति एकदम से खबरों में आए। हार्वर्ड में भारत के कुछ सबसे प्रमुख और चर्चित लोगों को इस कार्यक्रम में व्याख्यान के लिए बुलाया गया है, जिनमें भूपेश बघेल एक हैं। 

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में भूपेश बघेल से मंच पर यह सवाल किया गया कि भारत में आरक्षण से दलित-आदिवासी (एसटी/एससी), ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ा दिया गया है, और जब ऐसे लोग कॉलेज या किसी जगह पर पहुंचते हैं तो सवाल उनके मेरिट पर किए जाते हैं, लोग सवाल करते हैं कि आपके भीतर वैसी क्वालिटी नहीं थी, लेकिन आरक्षण से आ गए। ऐसे में आपने छत्तीसगढ़ में आपने एक दलित अधिकारी को मुख्य सचिव बनाया है, एक कबीरपंथी को विधानसभा अध्यक्ष बनाया है, इस पर आप जो कहेंगे वो हमें भी आगे इन मुद्दों पर जवाब देने में काम आएगा। 

इस पर भूपेश बघेल ने कहा- सवाल अवसर का है। डॉ. चरणदास महंत विधानसभा अध्यक्ष हैं, मैं आपको बताना चाहूंगा वे पहले केन्द्रीय मंत्री थे, तीन या चार बार सांसद थे, और 1980 से लगातार विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में वे गृहमंत्री थे, और उन्होंने अपनी काबिलीयत सिद्ध की है। 1980 से वे लगातार चुनाव लड़ भी रहे हैं, और अधिकांश चुनाव जीते भी हैं, जनता के बीच जाकर जीतकर भी आए हैं, और अपनी काबिलीयत साबित भी की है। 

भूपेश बघेल के साथ अधिकारियों के अलावा चरणदास महंत भी गए हुए हैं, और अभी यह नहीं मालूम है कि इस कार्यक्रम में वे मौजूद थे या नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री ने जिस दरियादिली से महंतजी की तारीफ की है, वह दरियादिली राजनीति में कुछ कम ही दिखाई पड़ती है। हार्वर्ड से आए एक वीडियो में सिर्फ मंच दिख रहा है, इसलिए दर्शकों में बैठे लोगों में कौन थे, यह पता नहीं चल रहा।

और खरीदने की जरूरत
भाजयुमो के एक पदाधिकारी पंचायत चुनाव जीतकर भी मायूस हैं। वजह यह है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपाध्यक्ष प्रत्याशी बनाने का वचन दिया गया था। भाजयुमो नेता ने सदस्यों को अपने पाले में करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। तीन सदस्यों को अपने खर्चे पर  प्रदेश से बाहर भेज दिया।  

चुनाव के दो दिन पहले पदाधिकारी तीनों सदस्यों को लेकर रायपुर पहुंचे, तो उन्हें कहा गया कि एक और सदस्य के समर्थन की जरूरत होगी। इसके लिए जो खर्चा बताया गया, उसे सुनकर पदाधिकारी भी चकरा गए। भाजयुमो पदाधिकारी पहले ही तीनों सदस्यों पर काफी कुछ खर्च कर चुके थे। उन्होंने और बोझ उठाने से मना कर दिया। फिर क्या था, पार्टी ने उनकी जगह दूसरे को प्रत्याशी बना दिया। अंतिम क्षणों में प्रत्याशी बदलने का नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ा और उपाध्यक्ष चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। 

घड़ा फोडऩे के लिए सिर मौजूद
पूरा एक बरस हो गया छत्तीसगढ़ में सरकार के कुछ बड़े कार्यक्रमों, चुनावों, और छत्तीसगढ़ी त्यौहारों की खबरों से परे अगर किसी किस्म की खबरें मीडिया पर लदी हुई हैं तो वे एफआईआर, अदालती पिटीशन, और स्टेऑर्डर की खबरें हैं। जो लोग एक-एक कतरन सम्हालकर नहीं रखते, उन्हें यह भी याद नहीं होगा कि किसके खिलाफ मामला कहां तक पहुंचा है, किस अदालत से जांच पर रोक लगी है, और उस रोक को हटाने का पिटीशन लगा है या नहीं? पूरे एक बरस में सरकार की जांच एजेंसियों, या जिला पुलिस की कार्रवाई अदालत में खड़ी होते नहीं दिख रही है। मामूली समझ रखने वाले लोग भी कार्रवाई के पहले ही समझ जाते हैं कि कागजों में कौन-कौन सी कमजोरियां छोड़ी जा रही हैं ताकि अदालत से तुरंत ही स्थगन मिल सके। ऐसी भी चर्चा रहती है कि सरकार के कुछ अफसर और आरोपी के वकील मिल-बैठकर कार्रवाई के कागज तैयार करते हैं, और ऐसा किसी एक मामले में ही हो रहा हो, ऐसा भी नहीं है। एक-एक करके सारे ही मामले अदालतों में जसपाल भट्टी के फ्लॉप शो साबित हो रहे हैं। जिन मामलों का सुप्रीम कोर्ट तक जाना तय है, उनके कागजात में भी जब कुएं जितने चौड़े और गहरे गड्ढे छोड़ दिए जाते हैं, तो लोगों को समझ आ जाता है कि यह कैसी मिलीजुली कुश्ती खेली जा रही है, और ऐसे टीम-वर्क के बाद जब घड़ा फोडऩे की बारी आती है, तो फिर एडवोकेट जनरल का सिर तो मौजूद रहता ही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


15-Feb-2020

फनसिटी से जाने देना, फन खत्म

म्युनिसिपल की तुलना में जिला पंचायत चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन कुछ बेहतर रहा है। कवर्धा, जशपुर, बस्तर और बलरामपुर में तो भाजपा का अध्यक्ष बनना ही था, लेकिन राजनांदगांव, बेमेतरा और कोरिया में अपना अध्यक्ष बिठाने के लिए काफी कुछ संसाधन झोंकना पड़ा। रायपुर में तो एक दिन पहले तक भाजपा के साथ 9 सदस्य दिख रहे थे,  और पार्टी के रणनीतिकार पूरी उम्मीद पाले थे कि अध्यक्ष पद पर उनका कब्जा होगा। जबकि पिछली बार सरकार होने के बाद भी पार्टी  यहां अपना अध्यक्ष नहीं बिठा पाई थी। मगर इस बार तो दुर्गति हो गई। अध्यक्ष पद के भाजपा समर्थित उम्मीदवार को बुरी हार का सामना करना पड़ा।

सुनते हैं कि रायपुर में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों ने पुख्ता रणनीति तैयार की थी। शहर के बाहर एमएम फन सिटी में सभी जिला पंचायत सदस्यों के खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी। खाने-पीने के बाद दो सदस्य राजू शर्मा और मोहन साहू (जिला पंचायत सदस्य पति) वहां से निकल गए। पार्टी के रणनीतिकारों ने उन्हें जाने भी दिया। वैसे भी राजू शर्मा का परिवार तो जनसंघ के जमाने से पार्टी के साथ रहा है। और वैसे भी उन्हें उपाध्यक्ष का प्रत्याशी बनाना तय हुआ था। मगर रणनीतिकार गच्चा खा गए। राजू शर्मा, मोहन साहू के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। 

दो सदस्यों के टूटने के बाद भी पार्टी के रणनीतिकारों को चमत्कार की उम्मीद थी, क्योंकि कांग्रेस समर्थित तीन सदस्य, भाजपा के संपर्क में थे, मगर चुनाव नतीजे आए, तो ठीक इसका उल्टा हुआ। अध्यक्ष चुनाव में झटका मिलने के बाद भाजपा के रणनीतिकार फिर एकजुट हुए।  और अपने साथ के सदस्यों को खरी-खोटी सुनाई। बताते हैं कि दो महिला सदस्य तो रो पड़ी। बाद में साथ रहने का कसम खाकर बैठक से उठे। इसके बाद भाजपा के रणनीतिकारों ने कांग्रेस समर्थित सदस्यों पर डोरे डालना शुरू किया। कांग्रेस के जो तीन सदस्य संपर्क में थे, उनकी मतदान के पहले जरूरतें पूरी की गर्इं। तब कहीं जाकर उपाध्यक्ष पद पर भाजपा का कब्जा हो पाया।

हम नहीं तो कांग्रेस भी नहीं...
बलौदाबाजार और बेमेतरा में कांग्रेस को झटका लगा है। यहां अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा ने अजय चंद्राकर के फार्मूले पर काम किया। अजय ने चुनाव के पहले सुझाया था कि जहां अध्यक्ष-उपाध्यक्ष बना पाना संभव न हो, वहां निर्दलीय को समर्थन कर कांग्रेस को रोकने की कोशिश की जाए। पार्टी की यह रणनीति दोनों जिलों में कारगर रही। 

बलौदाबाजार में तो कांग्रेस को भारी समर्थन मिला था। कांग्रेस ने जिस उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा था, वह आर्थिक रूप से बेहद सक्षम था। सुनते हंै कि कांग्रेस उम्मीदवार ने राजीव भवन के मठाधीशों को साध लिया था। इसका नतीजा यह रहा कि जिला पंचायत सदस्यों की रायशुमारी के बिना ही उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया। भाजपा को सदस्यों की नाराजगी की भनक लगी और कांग्रेस के ही एक अन्य धड़े को उचकाया। कांग्रेस के सदस्य दो फाड़ हो गए। फिर क्या था कांग्रेस समर्थित अधिकृत उम्मीदवार को हार का मुख देखना पड़ा।  भाजपा के सहारे कांग्रेस के बागी प्रत्याशी को जीत हासिल हो गई। 

चर्चा है कि हार के बाद कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार काफी गुस्से में हैं। उनके समर्थकों ने मतगणना स्थल के बाहर हंगामा भी मचाया था। कुछ इसी तरह का बेमेतरा में भी हुआ। यहां भाजपा ने बागी को उपाध्यक्ष का पद देकर अध्यक्ष पद हथिया लिया। इन सब जीत के बाद भी भाजपा की पंचायत चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी हार है। 

पुनिया कौन होते हैं तय करने वाले...
इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस लोगों को हेलमेट पहनाने की कोशिश कर रही है, और कांग्रेस पार्टी के एक विधायक यह साबित करने में लगे हैं कि जनता का सिर भीतर से खाली रहता है, उसमें कोई नाजुक चीज नहीं रहती है, और कोई खतरा नहीं रहता है, इसलिए हेलमेट पहनना जरूरी न हो। जनता के वोटों से जीतने के बाद जनता के सिर में दिमाग होने पर इतना गहरा शक छोटी बात नहीं है, और जब ऐसी जनता ने वोट दिया है, और उसे बेदिमाग समझा जा रहा है, तो आगे फिर चुनाव तो आएगा ही। चारों तरफ खबरें हैं कि कांग्रेस विधायक विकास उपाध्याय की इस बात को लेकर राष्ट्रीय कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रभारी पी.एल. पुनिया से बड़ी नोंकझोंक हुई है, और विधायक ने पुनिया को ऐसा कहा जाता है कि कहा है कि अब उन्हें राजनीति क्या पुनिया से सीखनी पड़ेगी? बात तो सही है, पुनिया और उनके बेटे दोनों ही चुनाव हार चुके हैं, और विकास उपाध्याय जीते हुए विधायक हैं, इसलिए यह तय करने का हक तो विधायक का ही होना चाहिए कि जनता के सिर के भीतर दिमाग बिल्कुल भी नहीं है, हेलमेट की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


14-Feb-2020

पर्यवेक्षक पहुंचे भी नहीं

जनपद पंचायतों में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली है। ऐसा इसीलिए संभव हो पाया कि भाजपा ने जनपद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई। ज्यादातर जगहों पर भाजपा ने चुनाव लडऩे की औपचारिकता ही निभाई। चुनाव के लिए भाजपा ने जिलेवार पर्यवेक्षक तो नियुक्त किए थे, लेकिन एक-दो जगहों पर तो पर्यवेक्षक ही नहीं पहुंचे। 

सुनते हैं कि बस्तर संभाग के एक जिले के जनपदों में चुनाव के लिए नियुक्त किए गए पर्यवेक्षक ने जिलाध्यक्ष को फोन लगाया और अपने आने की सूचना दी। जिला अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि यदि चुनाव में खर्च करने के लिए कुछ लेकर आ रहे हैं, तभी आना ठीक होगा, वरना खाली हाथ आने का कोई मतलब नहीं है। फिर क्या था, पर्यवेक्षक गए ही नहीं। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल को सरगुजा में चुनाव का जिम्मा दिया गया था। पूरा चुनाव निपट गया, अमर अग्रवाल झांकने तक सरगुजा नहीं गए। कई भाजपा कार्यकर्ता मानते हैं कि बड़े नेताओं की बेरूखी की वजह से चुनाव में हार हुई है, तो एकदम गलत भी नहीं है। 


झारखंड और रामविचार
झारखण्ड चुनाव में भाजपा की बुरी हार के बाद सुनते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को भाजपा में शामिल करने की तैयारी चल रही है। 17 तारीख को बड़ी रैली में मरांडी को भाजपा में प्रवेश दिलाया जाएगा। मरांडी की पार्टी का भाजपा में विलय होगा। झारखण्ड की राजनीति में होने वाले इस बदलाव के विमर्श की प्रक्रिया में सौदान सिंह कहीं नहीं है। अलबत्ता, रामविचार नेताम की पूछपरख जरूर हो रही है। वे आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और इस नाते उन्हें झारखण्ड में भाजपा संगठन को मजबूत करने के लिए जो भी निर्णय लिए जा रहे हैं, उसमें नेताम की भी अहम भूमिका है। 
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13-Feb-2020

हार और सन्नाटा

हमेशा से भाजपा का चुनाव-कार्यक्रम प्रबंधन बाकी दलों से काफी बेहतर रही है। मगर छत्तीसगढ़ में सत्ता से बेदखल होने के बाद हर मामले में कमी दिखाई दे रही है। लोकसभा चुनाव में तो खराब चुनाव प्रबंधन के बाद भी मोदी के नाम पर जीत हासिल हो गई, लेकिन म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव में तो बुरा हाल रहा है। म्युनिसिपल चुनाव में बुरी हार से भाजपा ने कोई सबक नहीं सीखा। पंचायत चुनाव में स्थिति और बुरी होने जा रही है। जो भाजपा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील और सक्रिय रही है, वहां पर्यवेक्षकों की सूची जनपद चुनाव के दो दिन पहले जारी की गई। 

सुनते हैं कि पर्यवेक्षक अपने प्रभार वाले जिले की बैठक ले पाते, इससे पहले ही कांग्रेस के लोगों ने ज्यादातर जिलों के जनपदों में नवनिर्वाचित सदस्यों को अपने पाले में कर लिया था। ऐसे में पर्यवेक्षकों के लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं रह गया है। यही हाल जिला पंचायतों का भी हो गया है। बस्तर-जशपुर और कवर्धा को छोड़ दें, तो ज्यादातर जिलों में कांग्रेस का कब्जा होना तय है। भाजपा का एक बड़ा खेमा इसके लिए हाईकमान को जिम्मेदार ठहरा रहा है। 

नाराज भाजपा नेताओं का तर्क है कि हाईकमान प्रदेश अध्यक्ष को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं कर पाया है। हाल यह है कि संगठन की गतिविधियां सिमटकर रह गई हैं। मौजूदा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी सिर्फ अपने गृह जिले कांकेर तक ही सीमित रह गए हैं। वहां भी कई स्थानीय नेता उसेंडी के खिलाफ खड़े हो गए हैं। ऐसे में चुनाव पर ध्यान दे पाना मुश्किल हैं। फिलहाल पार्टी कार्यकर्ता खामोश हैं और नए अध्यक्ष की नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। फिर भी कार्यकर्ताओं की खामोशी का असर चुनाव में तो पड़ता ही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)