राजपथ - जनपथ

19-Jan-2021 3:50 PM 294

रेणुका सिंह का प्रमोशन या...

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जल्द ही फेरबदल हो सकता है। प्रेक्षकों का अंदाजा है कि 26 जनवरी के बाद मंत्रिमंडल में नए चेहरों को जगह मिल सकती है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ से रेणुका सिंह की जगह किसी दूसरे सांसद को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। कुछ के तर्क हैं कि रेणुका का परफार्मेंस ठीक नहीं रहा है। इसके चलते उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। मगर रेणुका सिंह के समर्थक निश्चिंत हैं। उनका मानना है कि रेणुका सिंह को मंत्रिमंडल से बाहर निकालना तो दूर, उनका कद बढ़ाया जा सकता है।

रेणुका सिंह के समर्थकों के आत्मविश्वास की वजह प्रधानमंत्री का शुभकामना संदेश है, जो कि रेणुका सिंह के जन्मदिन पर 4 जनवरी को भेजा गया था । शुभकामना संदेश में प्रधानमंत्री ने लिखा है कि मंत्रिमंडल के मेरी अहम सहयोगी के रूप में आप अपने अथक परिश्रम, असीमित ऊर्जा और अटल संकल्पशक्ति से न्यू इंडिया के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि देश की समृद्धि के लिए आप जिस समर्पित भाव से अपनी सेवाएं दे रही हैं, वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।

स्वाभाविक है कि इस तरह की भाषाशैली किसी हटाए जाने की संभावना वाले मंत्री के लिए नहीं लिखी जाती। प्रधानमंत्री के शुभकामना संदेश की भाषा शैली से रेणुका समर्थकों का आत्मविश्वास बढ़ा है। मगर विरोधी इससे सहमत नहीं है। उन्होंने पत्र की बारीकियों की तरफ इशारा किया, जिसमें एक-दो मात्रा संबंधी त्रुटियां थी। चाहे कुछ भी हो, प्रधानमंत्री के शुभकामना संदेश से रेणुका समर्थकों में खुशी की लहर है।

पार्षद दल नेता नहीं चुन पा रही

भाजपा रायपुर नगर निगम पार्षद दल का नेता नहीं चुन पा रही है। पहले सूर्यकांत राठौर का नाम फाइनल कर दिया गया था, लेकिन बाद में कुछ ने पेंच अड़ा दिया। इसके बाद घोषणा अटक गई। यह तर्क दिया जा रहा है कि मीनल चौबे के पक्ष में ज्यादा पार्षद हैं। ऐसे में उन्हें ही नेता प्रतिपक्ष बनाया जाना चाहिए। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत खेमे के बीच चल रही खींचतान के चलते भाजपा सालभर बाद भी पार्षद दल का नेता तय नहीं कर पाई है।

पिछले दिनों मीनल चौबे की अगुवाई में महिला पार्षदों और कुछ नेताओं ने प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी से मुलाकात की थी, और उन्हें अब तक पार्षद दल का नेता नहीं तय होने की जानकारी दी थी। नेता ही तय नहीं है, तो निगम में भाजपा विपक्ष की भूमिका ठीक से निभा नहीं पा रही है। पुरंदेश्वरी ने पार्षदों को भरोसा दिलाया है। संकेत है कि अगले कुछ दिनों में पार्षदों से रायशुमारी कर नेता प्रतिपक्ष का चयन किया जाएगा।

पुलिस को उसी के मंच पर...

नेताओं या जनप्रतिनिधियों को अपने कार्यक्रमों में बुलाने से पुलिस को तौबा कर लेनी चाहिए। अब बालोद का मामला देखिए। यातायात सुरक्षा मास के शुभारंभ अवसर पर पहुंचे पूर्व विधायक भैयाराम सिन्हा ने मंच से आरोप लगाया कि यातायात पुलिस से आम लोग बड़े पैमाने पर परेशान हैं। ये अवैध वसूली में लगे हुए हैं। सिन्हाजी अपने समय में बड़े तेज विधायक थे। उनके खिलाफ पुलिस अधिकारी का कॉलर पकडऩे का केस भी चल चुका है। पुलिस को उगाही के नाम पर उनके ही मंच से सुना देने का ये काम दूसरी बार हुआ है। बिलासपुर में एक थाना भवन के उद्घाटन के समय विधायक शैलेष पांडे ने भी पुलिस पर ऐसा ही आरोप लगाया था। उन्होंने तो थानों में रेट लिस्ट लगाने का सुझाव भी दिया। कांग्रेस विधायक रश्मि सिंह ने भी पुलिस पर उगाही के आरोप लगाए थे। गृहमंत्री ने क्या कार्रवाई की यह किसी की जानकारी में नहीं है।  मौजूदा विधायक जब कार्रवाई के इंतजार में हों तो सिन्हा को तो कोई उम्मीद पालने की जरूरत नहीं होगी। पुलिस को भले ही किसी एक्शन की चिंता न हो पर मंच से ऐसी बातें की जाए तो बेचैनी महसूस करते होंगे। बिलासपुर में पुलिस ने ज्यादा समझ दिखाई। किसी नेता को बुलाने की गलती नहीं की। उम्मीद है बाकी जिलों की पुलिस तक भी ये खबर पहुंच जाएगी।

धान खरीदी लक्ष्य पार करेगी?

धान खरीदी को लेकर आ रहे लगातार विपरीत समाचारों के बीच एक जानकारी ये भी है कि इस बार भी लक्ष्य के मुताबिक धान किसानों से ले लिया जाएगा, इसकी पूरी संभावना है। सरकार ने पहले 85 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य रखा था, पर बाद में रकबा की रिपोर्ट मिलने पर इसे बढ़ाकर 90 लाख मीट्रिक टन किया गया। अब जब खरीदी अपने आखिरी दौर में आ चुकी है अब तक लगभग 72 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा जा चुका है। बस वे किसान बचे दिनों में अपनी बारी के लिए आपाधापी में फंस सकते हैं। अंतिम दिनों में दूसरे राज्यों का धान खपाने की कोशिश बढ़ जाती है, साथ ही आढ़तिए भी सोसाइटी में सेटिंग कर बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हैं। 

एक रिटायर्ड आला अफसर, और खानदानी किसान का कहना है कि इस बार माहो की मार बहुत रही, और फसल बहुत कम हुई है। लेकिन सरकारी आंकड़ों में फसल इसलिए ज्यादा दिखाई जाती है कि चारों तरफ के राज्यों से यहां धान लाया जाता है, और इस तस्करी से सबको कुछ न कुछ मिल जाता है। इसलिए सरकार कम फसल की बात मंजूर नहीं करती है, और असली फसल से अधिक की खरीदी हो जाती है। कई बरस पहले जब छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को दिल्ली में धान उत्पादन में सर्वाधिक बढ़ोत्तरी का केन्द्र सरकार का पुरस्कार मिला था, और दिल्ली के मंच पर उस वक्त के केन्द्रीय राज्यमंत्री चरणदास महंत भी थे, तब भी यह बात दबी जुबान में हो रही थी कि पड़ोसी राज्यों के धान की तस्करी की मेहरबानी से छत्तीसगढ़ को यह पुरस्कार मिल रहा है।


18-Jan-2021 2:17 PM 287

कुछ करने की हिम्मत क्यों नहीं?

बिलासपुर विधायक शैलेष पाण्डेय से बदतमीजी का मामला पीसीसी के लिए गले की फांस बन गया है। पीसीसी ने जांच के लिए कमेटी बिठाई थी। कमेटी ने विधायक के साथ बदतमीजी की पुष्टि की है, और इसके लिए ब्लॉक अध्यक्ष तैय्यब हुसैन को जिम्मेदार ठहराया है। कार्रवाई का आधार घटना के बाद ब्लॉक अध्यक्ष द्वारा मीडिया पर दिए गए बयान को बनाया गया। जिनमें से एक वाक्य को खास तौर पर आपत्तिजनक माना गया जिसमें उन्होंने कहा कि- हमारे विधायक, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ज्यादा ड्रामेबाज हैं। रिपोर्ट तो पीसीसी चीफ मोहन मरकाम को दे दी गई है, लेकिन रिपोर्ट पर कार्रवाई अपेक्षित है। कहा जा रहा था कि वर्धा से लौटने के बाद पीसीसी चीफ कार्रवाई करेंगे, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।

पीसीसी चीफ ने सिर्फ इतना ही कहा है कि रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। बहरहाल, रिपोर्ट की भनक मिलते ही विधायक विरोधी खेमा भी सक्रिय हो गया है और कोशिश कर रहा है कि ब्लॉक अध्यक्ष को कार्रवाई से बचा लिया जाये। विरोधी खेमे की तरफ से यह आरोप भी लगाया गया कि विवाद को विधायक कम्यूनल कलर देने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी हुआ है कि ब्लॉक अध्यक्ष के समाज के कुछ लोगों ने एक बैठक कर उन पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं करने की मांग की है। विरोधियों के दबाव के चलते ब्लॉक अध्यक्ष पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है। मगर रिपोर्ट तो आ गई है, और इस पर कुछ न कुछ कार्रवाई होना जरूरी है।

ऐसे में अब बीच का रास्ता निकाला जा रहा है, कि रिपोर्ट पर कार्रवाई टालने के लिए हाईकमान से मार्गदर्शन लेने का फैसला लिया जा सकता है। ये अलग बात है कि अंतागढ़ कांड उजागर होने के बाद पीसीसी ने उस समय मरवाही के विधायक अमित जोगी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, और पूर्व सीएम अजीत जोगी के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई कर दी थी। तब हाईकमान से पूछा तक नहीं गया था। अब विधायक के साथ बदतमीजी के मामले को कार्रवाई में आनाकानी पर सवाल तो खड़े हो रहे हैं।

समन्वयक उम्मीद से

विधानसभा चुनाव से पहले सभी विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस ने समन्वयक बनाए थे, और उन्हें चुनाव प्रचार खत्म होने तक इलाके में डटे रहने के लिए निर्देशित किया गया था। यह भी भरोसा दिलाया गया था कि पार्टी की सरकार बनने पर सबको कुछ न कुछ दिया जाएगा। विधानसभा समन्वयकों ने प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रचार में पूरा योगदान दिया। अब सरकार बन गई है, तो वे उम्मीद से हैं।

निगम-मंडलों की एक सूची जारी हो गई है, लेकिन दो-तीन को ही पद मिल पाया है। दूसरी सूची का इंतजार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दूसरी सूची के संभावित नामों पर चर्चा हो चुकी है। हल्ला है कि दूसरी सूची में भी ज्यादातर के नाम नहीं हैं। ये अलग बात है कि सूची का ही कोई अता-पता नहीं दिख रहा है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि शायद 26 जनवरी के बाद सूची को लेकर हलचल हो। यदि ऐसा नहीं होता है, तो फिर बजट सत्र तक के लिए मामला ठंडे बस्ते में जा सकता है।

चाय के कप में बीयर कभी पी है?

जो लोग बीयर पीते हैं वे जानते हैं कि इसके लिए सामान्य से बड़े ग्लास इस्तेमाल होते हैं, और एक बड़ी बोतल अधिक से अधिक दो गिलासों में खाली हो जाती है। लेकिन किसी ने चीनी मिट्टी के चाय पीने के लिए बनाए गए कप में बीयर नहीं देखी होगी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वीआईपी कही जाने वाली एयरपोर्ट रोड पर बिना दारू-लाइसेंस के एक रेस्त्रां में खुलकर बीयर पिलाई जा रही है, और उससे भरा हुआ गिलास आंखों को न खटके इसलिए वेटर बोतल के साथ चाय वाले कप लेकर आता है, और टेबिल पर कप में बीयर भरकर सर्व कर जाता है। अब इस गैरकानूनी ठिकाने के आसपास जो लोग बार की मोटी लाइसेंस फीस देकर कारोबार कर रहे हैं, वे परेशान हैं, और इस अवैध बीयर बार की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भेजकर लोगों से मदद की अपील भी कर रहे हैं।

ऑनलाइन ठगी का ऐसा मकडज़ाल

ऑनलाइन ठगी का अपराध रोजाना दर्ज हो रहा है। गूगल सर्च में भी फर्जी कस्टमर केयर और हेल्पलाइन नंबर डाल दिये गये हैं। पुलिस के अलावा बैंकों की तरफ से भी एसएमएस भेजकर सचेत किया जाता है कि फोन पर किसी को अपना कार्ड नंबर न बतायें, पासवर्ड, ओटीपी न बतायें, कोई ऐप डाउनलोड करने के लिये लिंक भेजें तो न खोलें। अधिकारिक वेबसाइट से ही हेल्पलाइन नंबर लें। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया उन अग्रणी बैंकों में है, जो इस तरह की चेतावनी अक्सर अपने ग्राहकों को देता रहता है। पर ठगों ने राजधानी रायपुर के इसी बैंक के एक रिटायर्ड अधिकारी को अपना शिकार बनाया। उन्होंने प्रोविडेंट फंड का बकाया 13 लाख रुपये का भुगतान करने के नाम पर करीब 2.60 लाख रुपये अपने खातों में जमा करा लिया। यह हो नहीं सकता कि मुख्य प्रबंधक पद से सेवानिवृत होने वाले बैंक अधिकारी ने बातचीत और रुपये ट्रांसफर करते समय सावधानी नहीं रखी होगी, इसके बावजू ऐसा मामला सामने आने से पता चलता है कि ठग अच्छे-खासे समझदार लोगों पर भी अपना विश्वास जमाने में सिर्फ फोन के जरिये सफल हो रहे हैं। फिलहाल तो, अकेले पुलिस द्वारा साइबर क्राइम के खिलाफ चलाई जा रही जागरूकता काफी नहीं लगती।

इसी को कहते हैं सरकारी ढर्रा

मुद्रलेखन एवं शीघ्र लेखन बोर्ड हर साल दो बार टाइपिस्ट की परीक्षायें आयोजित कराता है। इसे पास करने के बाद बेरोजगार युवा के पास एक और योग्यता प्रमाण-पत्र हो जाता है। उम्मीद बढ़ जाती है कि जब नौकरी का आवेदन भरा जायेगा तो यह काम आयेगा। सहायक ग्रेड-2 और समकक्ष लिपिक की भर्ती के विज्ञापनों में अक्सर लिखा होता है टाइपिंग जानना अनिवार्य। यदि कोई नहीं जानता तो उसे नौकरी लगने के सालभर के भीतर इसे पास करना भी होता है। हाल में यह परीक्षा प्रदेश के कई जिलों में हुईं। हालत यह थी कि टाइपराइटरों की कमी पड़ गई। परीक्षार्थियों को खुद टाइपराइटर का इंतजाम करना पड़ा, जिसके लिये उन्हें 500 रुपये तक खर्च करने पड़े। बेरोजगारों के सामने दोहरी मुसीबत है, टाइपराइटर पर टाइपिंग सीखना इसलिये जरूरी है क्योंकि नौकरी के लिये आवेदन करते समय अनिवार्य है। कम्प्यूटर पर भी टाइपिंग सीख लेना इसलिये जरूरी है क्योंकि दफ्तरों में इनसे ही काम हो रहा है। जब अफसर यह मानने लगेंगे कि टाइपराइटर का जमाना लद गया और कम्प्यूटर पर ही परीक्षा ली जायेगी, तब शायद यह स्थिति बदले 


17-Jan-2021 5:54 PM 362

मंदिर के लिए बैठे एक साथ

भाजपा के छोटे-बड़े नेता राम मंदिर के लिए चंदा एकत्र करने में जुट गए हैं। सुनते हैं कि पूर्व सीएम रमन सिंह ने तो दो दिन पहले अपने घर पर बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल और राजेश मूणत के साथ बैठक भी की थी। चर्चा है कि बैठक में बड़े कारोबारियों की सूची तैयार की गई, और उनसे संपर्क कर राम मंदिर के लिए सहयोग राशि लेने का फैसला लिया गया। प्रदेश के बड़े कारोबारी पिछले 15 सालों में इन्हीं चारों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में रहे हैं, और ये नेता संकट के समय में उनका सहयोग करते रहे हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि इन दिग्गजों के आगे आने पर कारोबारी राम मंदिर के लिए सहयोग करने में पीछे नहीं रहेंगे।

आरएसएस भी चंदा जुटाने के लिए अभियान चला रही है। पिछले दिनों जागृति मंडल में व्यापारी संगठनों को आमंत्रित किया गया था। इसमें आरएसएस पदाधिकारियों ने व्यापारियों से राम मंदिर के लिए सहयोग राशि देने की अपील की। एक व्यापारी ने पूछ लिया कि अगर 21 लाख रूपए चंदा देते हैं, तो मंदिर प्रागण में उनका नाम लिखा जाएगा? या फिर राम मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं, तो उनके ठहरने का मुफ्त में इंतजाम होगा? इस पर आरएसएस पदाधिकारी ने जवाब दिया कि ऐसी कोई भी उम्मीद पालना गलत होगा। अभी सिर्फ मंदिर निर्माण के लिए चंदा एकत्र करना है। दानदाताओं को वहां कोई विशेष सुविधाएं मिलेंगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है।

नेता के हाऊसिंग प्रोजेक्ट की तरफ

 रायपुर पश्चिम के इलाके की एक हाउसिंग प्रोजेक्ट की जमकर चर्चा है। यह प्रोजेक्ट कांग्रेस के एक नेता की है, और इसमें धनाढ्य लोग काफी रूचि ले रहे हैं। हल्ला तो यह भी है कि नेता के प्रोजेक्ट ने भाजपा के पूर्व मंत्री की अप्रत्यक्ष भागीदारी वाली विधानसभा मार्ग स्थित हाउसिंग कॉलोनी को पीछे छोड़ दिया है, जिसे मध्य भारत की सबसे लक्जरी कॉलोनी बताया जा रहा था।

सुनते हैं कि नेता के प्रोजेक्ट में समता कॉलोनी और अन्य क्षेत्रों के लोगों ने काफी निवेश किया है। समता कॉलोनी में पेयजल और अन्य कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही है। इसके चलते वहां के  धनाढ्य लोग कांग्रेस नेता के हाऊसिंग प्रोजेक्ट की तरफ रूख कर रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि इस हाऊसिंग प्रोजेक्ट की कुछ जमीन को लेकर समस्याएं भी हैं। मगर निवेशकर्ता निश्चिंत हैं। वजह यह है कि नेता लालबत्ती धारी भी हैं। ऐसे में थोड़ी बहुत कुछ समस्याएं होंगी भी, तो उसे निपटाने में नेता सक्षम हैं। स्वाभाविक है कि पार्टी की सरकार में हो, तो कारोबारी अड़चनें आसानी दूर हो जाती हैं ।

पहली बार हो रहा है कि

भाजपा में गुटबाजी रोकने के लिए पहल हो रही है। इस काम में खुद महामंत्री (संगठन) पवन साय लगे हैं। पवन साय बेहद शालीन और लो-प्रोफाइल में रहने वाले नेता हैं। पिछले दिनों दुर्ग के तीनों जिलाध्यक्ष अपनी कार्यकारिणी की मंजूरी के लिए कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पहुंचे, तो पवन साय ने यह कहकर रोक दिया, कि जिले के सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा करने के बाद कार्यकारिणी की घोषणा करना ठीक रहेगा।

यह बात किसी से छिपी नहीं है, कि दुर्ग भाजपा में काफी विवाद है, और तीनों जिलाध्यक्ष सरोज पाण्डेय के खेमे के माने जाते हैं। विवाद के कारण तो कुछ मंडलों के भी चुनाव नहीं हो पाए थे। सुनते हैं कि पवन साय खुद सांसद विजय बघेल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन व अन्य प्रमुख नेताओं के साथ कार्यकारिणी को लेकर बैठक करेंगे। ये नेता सरोज पाण्डेय के विरोधी माने जाते हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि विशेषकर दुर्ग में अब असंतुष्टों की भी बात सुनी जाएगी। इससे पहले तक तो सरोज की राय पर ही मुहर लगती रही है।

मुफ्त की जगह वैक्सीन की कीमत ली जाती तो?

कोविड टीकाकरण अभियान के लिये पूरे प्रदेश में शनिवार की सुबह उत्साह का वातावरण था। पर शाम होते-होते जब आंकड़े आये तो बहुत भरोसा जगाने वाला नहीं रहा। प्रदेश में केवल 61 प्रतिशत रजिस्टर्ड लोगों ने टीका लगवाया। बहुत से लोगों ने सेंटर पहुंचने के बाद बीमारी की बात बताई, जिसके चलते उनका इलाज शुरू किया गया, ग्लूकोज़ बोतलें भी चढ़ानी पड़ी। ये सब टीके से बच गये। पर कई लोग तो पहुंचे ही नहीं। बिना कोई कारण बताये। डॉक्टर्स हैरान हैं कि आंकड़ा इतना कम क्यों रहा। यह तो फ्रंटलाइन पर कोरोना मरीजों के बीच जोखिम भरी ड्यूटी निभाने वालों की सूची थी, जिन्हें कोरोना से बचाव के लिये ज्यादा उत्साहित होकर सामने आना था।

एक वैक्सीनेशन सेंटर में डॉक्टर बात कर रहे थे। उनका निष्कर्ष यह था कि एक तो पहले ही सरकार ने इसे लोगों की मर्जी पर छोड़ दिया है। लोग लापरवाह हो गये। सरकार और विशेषज्ञों के तमाम रिपोर्ट्स के बावजूद वे संतुष्ट होना चाहते हैं कि टीके का कोई रियेक्शन तो नहीं होता। दूसरी बात वैक्सीन मुफ्त लगाई जा रही है। मुफ्त की जगह टोकन के तौर पर ही इसकी कोई कीमत तय कर दी जाती तो शायद पहले टीका लगवाने की होड़ मच जाती।

40 फीसदी बचे वैक्सीन का सही इस्तेमाल

कोविड टीकाकरण अभियान के पहले दिन फ्रंटलाइन वर्कर्स को पहले चुना गया तो लोग सवाल कर रहे थे कि देश प्रदेश के प्रमुख लोगों को, अफसरों और नेताओं को पहले टीका लगवाकर क्यों उदाहरण पेश नहीं करना चाहिये। यह टीके के प्रति लोगों में भरोसा बढ़ायेगा। सरकार ने कहा कि नहीं- पहले कोविड अस्पतालों में काम करने वालों को टीका लगवायें। अगर नेताओं ने दिलचस्पी दिखाई तो कार्यकर्ता भी लाइन लगा लेंगे और जिन्हें ज्यादा जरूरी है वे वंचित रह जायेंगे। तर्क मान लिया गया और ऐसा ही किया गया। हालांकि रायपुर, बिलासपुर में कई जाने-माने डॉक्टरों ने आगे आकर खुद टीका स्वास्थ्य कर्मचारियों का हौसला बढ़ाने के लिये लगवाया। इसके बावजूद रिपोर्ट आई है कि छत्तीसगढ़ ही नहीं देश में भी आंकड़े 60 प्रतिशत के आसपास ही रहे और 40 प्रतिशत वैक्सीन बच गये। यानि वैक्सीन की कमी होने की चिंता फिलहाल नहीं है। इसलिये अब जरूर कुछ नेताओं, बड़े अफसरों को बचा हुआ टीका लगवा लेना चाहिये। सोमवार से अभियान फिर शुरू हो रहा है। ऐसा करेंगे तो टीकाकरण की रफ्तार बढ़ेगी।

चालू करते ही रिपब्लिक दर्शन

एक्टिविस्ट व सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण द्वारा रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी और बार्क के पूर्व सीईओ पार्थो दासगुप्ता के बीच कथित चैट को सोशल मीडिया पर जारी करने के बाद से ही सनसनी फैली हुई है। इस चैट को भरोसेमंद मानने वाले हैरान है कि पीएमओ और मंत्रिपरिषद् में अर्णब की कितनी पकड़ है, देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर भी वे कहां तक घुसे हुए हैं। सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और इंडिया टीवी के रजत शर्मा के बारे में क्या राय है।

छत्तीसगढ़ में भी अर्णब गोस्वामी के खिलाफ कांग्रेस नेताओं ने सोनिया, राहुल, नेहरू पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई थी। फिलहाल आगे की कार्रवाई पर अदालती रोक लगी हुई है।

जो लोग रिपब्लिक टीवी को नापसंद करते हैं उनमें से कई घरों में एक केबल नेटवर्क ऐसा भी लगा हुआ है जिसमें टीवी ऑन करते ही सबसे पहले रिपब्लिक ही दिखाई देता है। आप चैनल बदलना है तो बदलते रहिये, पसंद न हो तब भी सबसे पहले कुछ देर तक रिपब्लिक का दर्शन करना ही होगा। ऐसा भी नहीं है कि इसलिये यह चैनल दिखाई देता है क्योंकि वह क्रम में पहले है। एक उपभोक्ता ने इसकी शिकायत अपने केबल ऑपरेटर से की, तो बताया कि पूरे छत्तीसगढ़ में हमारे नेटवर्क में ऐसी सेटिंग है। वह नहीं बदल सकता। यह भी बताया यह जा रहा है कि यह नेटवर्क फ्रैंचाइजी जिन लोगों के हाथ में है वे प्रदेश के कांग्रेस नेताओं के ही बड़े समर्थक माने जाते हैं।


16-Jan-2021 4:16 PM 353

राजभवन घेराव-एक

कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस के राजभवन घेराव-प्रदर्शन ने प्रेक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। प्रदर्शन के लिए समय कम था। क्योंकि  एक दिन पहले ही पीसीसी वर्धा से लौटी थी। मगर भीड़ के मामले में यह प्रदर्शन कांग्रेस के अब तक के सभी प्रदर्शनों से बेहतर और व्यवस्थित नजर आया। वह भी तब जब सीएम और समूचा मंत्रिमंडल गैर हाजिर था।

मोहन मरकाम की अगुवाई में हुए इस प्रदर्शन में उनके दोनों महामंत्री चंद्रशेखर शुक्ला और रवि घोष का प्रबंधन था। पहले भी किसान आंदोलन-प्रदर्शन हुए हैं, लेकिन राजधानी की सडक़ों में ट्रैक्टरों के साथ किसान-कार्यकर्ताओं की भीड़ पहली बार दिखी। मरकाम खुद राजीव भवन से ट्रैक्टर चलाते हुए राजभवन के लिए निकले।

वे काफी तनाव और गुस्से में थे। वजह यह थी कि टै्रक्टर के सामने भीड़ जमा हो जा रही थी, और एक्सीडेंट का खतरा भी था। मगर पीछे से किसी चतुर नेता ने उन्हें समझाइश दी कि वे टीवी कैमरों की तरफ फोकस करें, और भीड़ को अनदेखा कर एक्सीलेटर दबा दें। फिर क्या था, मरकाम ने टीवी कैमरों की तरफ देखते हुए हाथ हिलाते गाड़ी तेजी से आगे बढ़ा दी। भीड़ खुद-ब-खुद सामने से हट गई। इसके बाद मरकाम का काफिला बिना किसी बाधा के राजभवन के समीप पहुंच गया।

गाड़ी में उतरते समय पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा का पैर फिसल गया, और उन्हें काफी खरोंच आई। मगर वे चोट की परवाह किए बिना प्रदर्शन में शामिल हुए। राजभवन घेराव-कार्यक्रम में दो दर्जन से अधिक विधायक और पदाधिकारियों ने शिरकत की।

राजभवन घेराव-दो

राजभवन घेराव-प्रदर्शन में रायपुर के छोटे-बड़े नेताओं ने अपनी उपस्थिति दिखाई। रायपुर की प्रभारी प्रतिमा चंद्राकर काफी नाराज रहीं।  चर्चा है कि शहर अध्यक्ष गिरीश दुबे खुद तो राजभवन के अंदर चले गए, लेकिन प्रतिमा का नाम नहीं लिखवाया था। प्रतिमा बाहर ही रह गई थी, बाद में मरकाम को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने प्रतिमा और कुछ प्रमुख नेता, जो बाहर रह गए थे उन्हें अंदर बुलवाया। प्रतिमा ने गिरीश को देखते ही जमकर फटकार भी लगाई। एजाज ढेबर और प्रमोद दुबे भी अपने साथियों के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए, लेकिन नए नवेले ब्लॉक अध्यक्षों ने घेराव-प्रदर्शन को बेहतर बनाने में अपना भरपूर योगदान दिया। उन्हें अपनी योग्यता साबित करनी थी, और उन्हें मौका भी मिल गया।

मंत्री क्यों नहीं पहुंचे बेरिकेड्स तोडऩे

केन्द्र के कृषि कानून, डीजल-पेट्रोल दाम और दूसरी चीजों की महंगाई के विरोध में राजभवन का घेराव हुआ। दूरदराज से पहुंचे कुछ कांग्रेस कार्यकर्ता निराश हो गये। वे तो इस उम्मीद से आये कि घेराव के कार्यक्रम में सीएम और सारे मंत्री भी शामिल होने वाले हैं लेकिन ऐन मौके पर वे पहुंचे ही नहीं। उनके सामने वे अपनी निष्ठा, भक्ति, भीड़ दिखा पाते। राजीव भवन के कार्यक्रम में तो खूब माहौल बना। राजभवन के पहले पुलिस से झूमा-झटकी कर पुलिस घेरा भी तोड़ डाला। कार्यकर्ता जब इतने जोश में थे तो उन्हें साथ देने के लिये मंत्रियों को आना तो चाहिये था? 

प्रदर्शन में शामिल कुछ दूसरे समझदार कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया। देखो, सत्ता से बाहर रहने के दौरान प्रदर्शन, आंदोलन करना आसान होता। सरकार में रहते हुए ला एंड आर्डर बनाये रखने की जिम्मेदारी भी मंत्रिमंडल की है। क्या मंत्रियों की मौजूदगी में हम लोग इतना शोर-शराबा कर पाते। उन पर लॉ एंड आर्डर हाथ में लेने का आरोप लगता। पुलिस किस पर लाठी चलाती, उन पर जिनकी सुरक्षा में वह तैनात है? विपक्ष को सरकार को घेरने का एक मौका और मिल जाता।

केबीसी में छत्तीसगढ़ की धमक

अमिताभ बच्चन के टीवी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की सबसे हटकर लोकप्रियता है। मनोरंजन के साथ-साथ इसमें सामान्य ज्ञान की परख होती है। साधारण सी पृष्ठभूमि के लोग भी अपनी तैयारी की बदौलत यहां पहुंच जाते हैं। इस बार इस प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं को उभरने का खूब मौका मिल रहा है। अक्टूबर माह में पद्मश्री फूलबासन देवी को कर्मवीर एपिसोड में बुलाया गया था जिसमें उनकी सहयोगी अभिनेत्री रेणुका शहाणे थीं। फूलबासन ने अपने जवाब से अमिताभ को काफी प्रभावित किया। रेणुका ने फूलबासन की टीम से जुडऩे की इच्छा जताई। फूलबासन 50 लाख जीतकर आईं। इसके बाद अगले माह नवंबर के आखिरी हफ्ते में जगदलपुर की एक हाईस्कूल की व्याख्याता अनूपा दास को मौका मिला। उन्होंने तो एक करोड़ रुपये जीत लिये। जगदलपुर में उनका जबरदस्त स्वागत हुआ, जगह-जगह पोस्टर भी लगे। फिर दिसम्बर महीने में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक तदर्थ भृत्य मंतोष कश्यप को मौका मिला। उसने भी तीन लाख 20 हजार रुपये जीत लिये। अब जनवरी माह में भी इस सिलसिले को आगे बढ़ाया है बिलासपुर की ही अफसीन नाज़ ने। उन्होंने 50 लाख रुपये के जवाब पर हॉट सीट छोड़ा, 25 लाख रुपये जीतकर आईं। सिलसिला जारी रहे...।  

एक क्यों, दो माह का राशन ले जाओ..

इस बार कंट्रोल का चावल उठाने वालों को सरकार की तरफ से एक ऑफर दिया गया है। न तो त्यौहार है न लॉकडाउन का संकट लेकिन उपभोक्ता चाहें तो जनवरी के साथ-साथ फरवरी का भी चावल उठा लें। शासन के सर्कुलर में इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि आखिर यह मेहरबानी क्यों की जा रही है। ज्यादा जोर लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी, जब खबरों को जोडक़र देखा गया। धान खरीदी में बारदानों का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कई जगह किसान ब्लैक में इंतजाम कर रहे हैं। मार्कफेड और फूड वालों पर बड़ा दबाव है कि वे समितियों को बोरियां उपलब्ध करायें। राशन दुकान संचालकों से गिन-गिनकर बोरियां वापस मांगी जा रही है। संचालकों ने पहले तो बोरियां संभाली नहीं थीं लेकिन हिसाब पूरा करने के लिये वे भी बाजार से खरीदकर लौटा रहे हैं। खाद्य विभाग की मेहरबानी इसी से जुड़ी हुई है। यदि उपभोक्ता एक साथ दो माह का राशन ले जायें तो दुकानों में दुगनी बोरियां खाली हो जायेंगी। ये बोरियां समितियों में भेज दी जायेंगी। धान खरीदी 31 जनवरी तक होनी है। अभी बड़ी संख्या में बोरियों का इंतजाम करना है। हालत यह है कि राशन लेने आ रहे लोगों से दुकानदार गुजारिश कर रहे हैं, भाई, दो माह का राशन उठा लो।


15-Jan-2021 4:30 PM 205

पंडे होते तो ऐसी नौबत आती क्या?

भाजपा शासनकाल में शराब दुकानों की नीलामी बंद कर सरकारी शराब दुकानें खोल दी गई। आबकारी विभाग को जो कमाई ठेकेदारों के रास्ते से मिला करती थी अब उन्हें खुद खोजना पड़ रहा है। इसीलिये धीरे-धीरे सभी अंग्रेजी शराब दुकानों के सामने चखना दुकानें पहले की तरह खुल गई हैं। पर इनमें तो छोटा हिसाब-किताब होता है। कोचिये भी इन्हें संभालने पड़ रहे हैं। थोड़े अधिक दाम पर कई ठेलों और झोपडिय़ों में यह उपलब्ध हो जाता है। अवैध शराब को खरीदो और निकलो, वरना पुलिस को भी हिस्सा देना पड़ेगा।

एक समस्या और आ गई है। शराब बिक्री की रकम आबकारी अफसरों के पास रोजाना जमा हो जाना है। दुकानों में एडहॉक पर लाये गये सुपरवाइजर और सैल्समैन के हाथों में लाखों रुपयों का हिसाब होता है, जबकि इनकी तनख्वाह मामूली होती है। इसीलिये अब तक अनेक मामले आ चुके हैं, जिनमें वे बड़ी रकम लेकर फरार हो जाते हैं। रायपुर के राजेन्द्र नगर इलाके की शराब दुकान का सुपरवाइजर भी लापता है। उसके पास करीब 20 लाख रुपये हैं। सुपरवाइजर नहीं मिला तो अधिकारी ने वहां के दो सैल्समैन की ही धुनाई कर दी। इन अस्थायी कर्मचारियों ने हिम्मत जुटाकर अफसर के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी। अपनी नौकरी को ही दांव पर लगा दिया। मामला बिगड़ते देख अफसर ने दोनों को समझाया और शिकायत वापस कराई। पर, गायब सुपरवाइजर कहां है, इसकी खबर अब भी नहीं है। आबकारी और सीएसएमसीएल  वालों को शराब बिक्री के लिये ढेर सारे इंतजाम करके दिये गये हैं पर पंडे नहीं दिये गये। अफसरों को खुद ही निपटना पड़ रहा है। अब इनकी व्यवस्था भी हो जाये तो शराब बिक्री की रकम डूबने से बच सकती है।

बर्ड फ्लू, एके नम्बर सब्बो बर...

पड़ोसी राज्यों में बर्ड फ्लू के मामले आने के बावजूद छत्तीसगढ़ की अब तक निगेटिव रिपोर्ट आने के चलते लोग राहत की सांस ले रहे थे लेकिन बालोद में अब इसकी पुष्टि हो गई है। यहां करीब 200 मुर्गियां एक साथ मरी पाई गईं, जिनमें से 10 का सैम्पल जांच के लिये भेजा गया, पांच में एच-5, एन-8 का संक्रमण मिला। गिधाली गांव जहां के एक पोल्ट्री फॉर्म में मुर्गियों की मौत हुई अब वहां के एक किलोमीटर के दायरे के सभी मुर्गियों को मारने का आदेश दिया गया है साथ ही जिले में पोल्ट्री पोडक्ट के आयात, निर्यात पर भी रोक लग गई है। सोशल मीडिया और टीवी अख़बारों का कमाल है कि देश के अनेक से बर्ड फ्लू की चिंताजनक ख़बरें बीते कई दिनों से आ रही थी। दिक्कत है ज्यादातर जागरूक लोगों के पास पशु चिकित्सा या वन विभाग के अधिकारियों के फोन नंबर नहीं हैं। इनसे ज्यादा पाला पड़ता नहीं है, पर डायल 112 की गाडिय़ां जरूर घूमती दिखती हैं। इन वाहनों में लिखा भी होता है, एके नंबर, सब्बो बर। मतलब सभी काम के लिये उपलब्ध। अब लोगों ने पक्षियों की संदिग्ध मौतों को देखकर इसी 112 नंबर पर डायल करना शुरू कर दिया है। अब ये पेट्रोलिंग वाहन वन और पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों के नंबर जुटा रहे हैं और खबर पहुंचाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। 


14-Jan-2021 4:43 PM 188

ज्योतिषी निकल लिए...

राज्यपाल आम लोगों से मेल मुलाकात से परहेज नहीं करती हैं। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोग अक्सर उनसे मिलने जाते हैं। ऐसे ही एक ज्योतिषी का पिछले दिनों राजभवन जाना हुआ। वहां उन्होंने अफसरों से भी मुलाकात की। अफसर भी फुर्सत में थे। उन्होंने जिज्ञासावश अपना भविष्यफल पूछ लिया। एक महिला अफसर को ज्योतिषी ने बताया कि उनका जल्द प्रमोशन होने वाला है। वे आईएएस बन जाएंगी। चूंकि महिला अफसर 2003 बैच की थीं। लिहाजा, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

एक अन्य अफसर को लेकर भी ज्योतिषी ने काफी अच्छी बातें कही। ज्योतिषी ने अफसर से कहा कि उनका भी जल्द प्रमोशन होगा। विभाग में उन्हें काफी महत्व मिलेगा। अफसर ने हाथ जोडक़र कहा-महाराजजी, चार महीने बाद मेरा रिटायरमेंट है। पदोन्नति अब नहीं होगी। जहां तक विभाग में महत्व का सवाल है, यदि ऐसा होता, तो राजभवन के बजाए विभाग में ही रहता। ज्योतिषी को समझ में आ गया कि उनकी भविष्यवाणी गलत साबित हो रही है, तो उन्होंने किसी तरह बात बनाकर वहां से निकल लिए।

बीजेपी में परफॉर्मेंस का दबाव

भाजपा में जिन नेताओं ने जोड़-तोडक़र पद हासिल कर लिए हैं, उन पर अब बेहतर परफार्मेंस के लिए दबाव है। भाजपा की नई प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने साफ-साफ कह दिया है कि पद में हैं, तो उन्हें परफार्मेंस दिखाना होगा। उन्होंने सरकार के खिलाफ धान-बोनस को लेकर विधानसभा सीट स्तरीय प्रदर्शन को लेकर टारगेट दिया था, और प्रदर्शन के बाद रिकॉर्डिंग कर उन्हें भेजना था। हालांकि ज्यादातर जिलों में अपेक्षाकृत भीड़ नहीं जुट पाई। 22 तारीख को फिर जिला मुख्यालयों में प्रदर्शन हैं, जिसमें प्रदेश प्रभारी खुद भी शामिल होंगी।

पदाधिकारियों की दिक्कत यह है कि धरना-प्रदर्शन के लिए भीड़ जुटाने से लेकर सारी व्यवस्था खुद करनी है। सत्ता में थे, तो सारी व्यवस्थाओं में पर्दे के पीछे सरकारी तंत्र जुट जाता था, और सारा काम आसानी से हो जाता था। अब विपक्ष में हैं, तो स्वाभाविक है कि सारा इंतजाम खुद करना है। जिन्हें पद नहीं मिला, और जो नाराज हैं उनका सहयोग नहीं मिल रहा है। ऐसे में बेहतर परफार्मेंस चुनौती बन गई है। अब 22 तारीख को धरना-प्रदर्शन है, जिसकी समीक्षा प्रदेश प्रभारी करेंगी। देखना है आगे-आगे होता है क्या।

आपकी अर्जी  फरियाद, हमारी कागज का टुकड़ा?

कोविड-19 महामारी शुरू होने के बाद जिला मुख्यालयों में जनदर्शन का जो सिलसिला बंद हुआ वह अब तक दुबारा शुरू नहीं हो पाया है। इसका मतलब यह नहीं कि समस्यायें घट गई हैं। आये दिन लोग दूर-दराज के गांवों से राशन, पेंशन, आवास, पानी, फसल आदि की समस्याएं लेकर पहुंचते हैं। लगभग हर जिले में किसी अपर कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर को इन आम लोगों की शिकायतों को लेने और आश्वस्त कर लौटाने की जिम्मेदारी दे दी गई है। लोग भले ही इस उम्मीद से पहुंचें कि सीधे कलेक्टर बात सुनें। इन्हें लगता है कि कलेक्टर ही जिले का मालिक है और यदि उन्होंने भरोसा दिला दिया तो सब ठीक हो जायेगा। पर सबको ऐसा मौका नहीं मिलता। लोग एक ही समस्या को लेकर बार-बार अपनी दिनभर की रोजी का नुकसान कर और यात्रा खर्च ढोकर पहुंचते हैं।

पर इन दिनों जिला दफ्तरों में एक खास मौका देखने मिला। अपर कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, सीईओ, एसडीएम, तहसीलदार और जिले के बड़े-बड़े अधिकारी ज्ञापन लेकर कलेक्टर के सामने एक साथ खड़े हैं। इस समय कोविड गाइडलाइन के चलते जनदर्शन बंद है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारी संघ के बैनर पर इन्होंने कलेक्टर्स को ज्ञापन सौंपा है। इस उम्मीद के साथ कि वे इसे मुख्य सचिव तक आवश्यक कार्रवाई के लिये भिजवायें। वे बैकुंठपुर में हुई रिटायर्ड अपर कलेक्टर एडमंड लकड़ा की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं, जिन्हें एक कीमती जमीन के गलत आबंटन के आरोप में पुलिस ने जेल भेज दिया।

अधिकारी बता रहे हैं कि किसी मजिस्ट्रेट पर या राजस्व न्यायालय के पीठासीन अधिकारी पर पुलिस ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकती। उन्हें संरक्षण मिला हुआ है। काश, इनमें से कोई हर्षमंदर या ब्रह्मदेव जैसा कलेक्टर हो जो इतने अधिकारियों को अपनी तकलीफ पर एक साथ तैनात देखकर बोले- आओ, काफिला लेकर सब गांव की ओर निकल चलें।

भाजपा नेताओं पर एट्रोसिटी एक्ट

आरटीओ उन दफ्तरों में से है, जहां सरकार चाहे किसी की हो, रौनक बनी रहती है। बल्कि सभाओं में भीड़ जुटाने में इसकी बड़ी जरूरत पड़ती है। सत्ता पक्ष का ख्याल तो रखा ही जाता है, ज्यादा समय तक टिके रहने के लिये विपक्ष के नेताओं का भी ख्याल समय-समय पर कर लिया जाता है। यही वजह है कि कई जिलों में ऐसे बहुत से अधिकारी हैं जो पिछली सरकार में भी ठीक-ठाक वजन रखते थे और अब भी उनका रुतबा है। यह एक सामान्य धारणा ही है। हर जगह ऐसा ही होता हो जरूरी नहीं। बहुत अधिकारी भ्रष्ट विभागों की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद बेदाग माने जाते हैं।

पर जगदलपुर क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय दूसरी वजह से चर्चा में है। भाजपा ने बीते दिनों लोकल ट्रांसपोर्टरों से हो रही कथित अवैध वसूली पर रोक लगाने की मांग की। पर उन्हें संभवत: दिक्कत छह-सात पहले लगाये गये शिलालेख से छेड़छाड़ को लेकर थी। इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों और भाजपा नेताओं के नाम थे। प्रदर्शन के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने अति उत्साह में आरटीओ की नाम पट्टिका पर स्याही पोत दी। शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि ऐसा करना उनके लिये नई परेशानी खड़ी कर देगा।

अधिकारी ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करा दी है। आंदोलन का तरीका कुछ हटकर हो तो चर्चा दूर तक हो ही जाती है। नाम पट्टिका पर स्याही पोतने से तो भाजपा कार्यकर्ता चर्चा में आ ही गये पर इस विरोध से निपटने के लिये आरटीओ ने जो तेवर दिखाया उसकी भी कम चर्चा नहीं है। अब अवैध वसूली, शिलालेख की शिकायत को किनारे रख दीजिये। कौतूहल इस बात को लेकर ज्यादा है कि पुलिस इस एफआईआर पर एक्शन क्या लेती है। 

किसान आंदोलन में ट्रैक्टर का क्रेज

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन में ट्रैक्टर का बड़ा आकर्षण है। ज्यादातर आंदोलनकारी ट्रैक्टर से ही पंजाब, हरियाणा और आसपास के दूसरे राज्यों से पहुंचे हैं। वे ट्रॉली पर बैठकर ही नारेबाजी और जोशपूर्ण गीत गा रहे हैं। खाना, पीना, सोना सब ट्रैक्टरों पर हो रहा है। खास बात यह है कि ट्रैक्टर किसानी का उपकरण होने के कारण इसे किसी इलाके में आने-जाने के लिये दूसरे मालवाहकों की तरह अलग परमिट लेने की जरूरत नहीं पड़ती। इसीलिये एक राज्य से दूसरे राज्य किसान इसे आसानी से लेकर जा रहे हैं।

बीती 7 जनवरी को हजारों ट्रैक्टरों की परेड दिल्ली में निकली थी जो 26 जनवरी को आंदोलनकारियों द्वारा किये जाने वाले प्रदर्शन का रिहर्सल थी। लोग नजर जमाये बैठे हैं कि जब रिहर्सल में इतनी लम्बी कतारें थीं तो 26 जनवरी का माहौल कैसा रहेगा?  इधर छत्तीसगढ़ के अलग-अलग शहरों में भी ट्रैक्टर रैलियां किसानों के समर्थन में निकली। ट्रैक्टर ने ऐसा असर डाला है कि अब सभी दल डीजल के दाम क्या हैं, भूलकर अपने आंदोलनों में इस्तेमाल करना चाह रहे हैं। अम्बिकापुर में किसानों के समर्थन में कांग्रेसियों ने ट्रैक्टर रैली निकाली। कल भाजपा ने भी जगह-जगह प्रदर्शन किया था, पर राज्य सरकार के खिलाफ। जगदलपुर सहित कई जगह ट्रैक्टरों पर भाजपा नेता, कार्यकर्ता निकले। मगर, फिलहाल भाजपा को ट्रैक्टरों से परहेज करना चाहिये। कहीं लोग यह न समझ लें कि वे दिल्ली बार्डर पर बैठे किसानों का साथ देने निकल पड़े हैं।


13-Jan-2021 5:36 PM 243

बर्ड फ्लू और प्रवासी पक्षी

कोरोना के चलते  घबराहट ऐसी है कि लोगों में बर्ड फ्लू (एवियन एंफ्लुएंजा) को लेकर दहशत फैलने लगी है। मगर यह उसके मुकाबले कहीं है नहीं। अपने देश में बीते 15 सालों से इसका प्रकोप देखा जा रहा है। अब तक किसी की मौत नहीं हुई । हां, जब यह फ्लू मनुष्यों में फैला तो गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ और बुखार जैसी दिक्कतें जरूर आ चुकी हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि चिकन को 100 डिग्री तापमान और अंडे को 70 डिग्री पर पकाने के बाद सेवन करने पर कोई खतरा नहीं है। यह अलग बात है कि ऐहतियातन मांसाहार के बहुत से शौकीनों ने चिकन खाना बंद कर दिया है। मध्यप्रदेश सहित कुछ दूसरे राज्यों के कई शहरों में तो बिक्री पर ही रोक लगा दी गई है। बर्ड फ्लू के 16 स्ट्रैन होते हैं, जिनमें से सिर्फ एच5 एन1 ही मनुष्यों पर हमला कर सकता है। बाकी 15 स्ट्रैन का असर केवल पक्षियों पर होता है।

लेकिन चिंता की बात एक दूसरी है। केन्द्रीय पशुपालन सचिव अतुल चतुर्वेदी का बयान है कि यह मौसम देश में प्रवासी पक्षियों के आने का है। इनके कारण सन् 2006 के बाद से ही बर्ड फ्लू का खतरा बनता आ रहा है। ठंड के जाने के बाद इसका प्रकोप भी खत्म हो जाता है। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। नया रायपुर के सेंध जलाशय में बर्ड वाचिंग का कार्यक्रम भी रखा जाता है। महासमुंद, दुर्ग, बेमेतरा, मुंगेली और बिलासपुर में अनेक तालाब और जलाशय हैं जहां साइबेरिया, चीन, तिब्बत और मध्य एशिया से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। अभी अम्बिकापुर, रतनपुर, बिलासपुर, बालोद और पंडरी (रायपुर) में कबूतर, कौवों और पोल्ट्री फार्म की मुर्गियों की मौतों की घटनायें मिली हैं। बाकी किसी घटना में बर्ड फ्लू की पुष्टि अभी नहीं हुई है। सुकून की बात यही है कि झारखंड, मध्यप्रदेश जैसे पड़ोसी राज्य में बर्ड फ्लू के कई मामले सामने आने के बावजूद छत्तीसगढ़ अब तक इससे बचा हुआ है। अभी तक प्रवासी पक्षी भी सुरक्षित कलरव कर रहे हैं। राज्य में बनाई गई रैपिड रिस्पांस टीमें ठीक काम करें तो मेहमान पक्षी भी हिफाजत से रह सकेंगे। 

स्वास्थ्य कर्मी भी टीका न लगवायें तो?

जब से कोरोना वैक्सीनेशन का देशव्यापी अभियान शुरू किया गया है, सोशल मीडिया के जरिये कई लोगों ने कहा कि पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी टीका लगवायें और बाकी मंत्री भी लगवायें। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अब कह दिया है कि पहले केन्द्रीय मंत्रियों को टीका लगवाना चाहिये ताकि लोगों को टीके पर भरोसा हो सके। हालांकि प्रधानमंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों की ओर से कोई बयान नहीं आ रहे हैं। हां, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का टीके के लिये न कहना और हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के पहले डोज के बाद भी कोरोना संक्रमित हो जाने की खबर सामने आ चुकी है। अब छत्तीसगढ़ में जिन स्वास्थ्य कर्मियों या फ्रंट लाइन वर्करों का टीका लगवाने के लिये पंजीयन किया गया है उनमें से भी कई लोगों ने इसके प्रति अनिच्छा जाहिर की है। राज्य में बाद में 50 वर्ष से ज्यादा उम्र वालों को टीका लगाया जाना है। पर पहले चरण के लिये 2.67 लाख स्वास्थ्य कर्मियों, मितानिनों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को टीका लगाने के लिये चुना गया है। आज वैक्सीन पहुंच रही है, 16 को 1300 से ज्यादा बूथों में टीका लगने का अभियान चलेगा। डॉक्टरों का कहना है कि हर एक वैक्सीन का रियेक्शन तो होता है पर यह भविष्य में बीमारी को रोकने में मदद करता है। देखना होगा राज्य में यह लक्ष्य हासिल हो पायेगा यह नहीं। राहत यही है कि जो स्वास्थ्य कर्मी टीका लगवाने से मना करेंगे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने जा रही है।


12-Jan-2021 3:45 PM 284

पुत्रमोह में पार्टी पीछे

भाजपा प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने 10 जनवरी तक मोर्चा-प्रकोष्ठों की कार्यकारिणी की घोषणा करने की हिदायत दी थी, लेकिन अभी तक भाजयुमो, महिला मोर्चा और किसान मोर्चा की कार्यकारिणी घोषित नहीं हो पाई है। भाजयुमो की कार्यकारिणी तो बड़े नेताओं की वजह से अटकी पड़ी है। कई बड़े नेताओं ने अपने बेटों को कार्यकारिणी में जगह दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है।

सुनते हैं कि प्रदेश के एक बड़े पदाधिकारी ने तो अपने बेटे को कार्यकारिणी में जगह दिलाने के लिए पूर्व सीएम के जरिए दबाव बनाया है। वे बेटे के लिए कोषाध्यक्ष का पद चाह रहे हैं। कुछ नेताओं के बेटे तो वाकई लायक हैं, और वे सक्रिय भी हैं। मगर उन्हें कार्यकारिणी में जगह मिल पाएगी अथवा नहीं, यह तय नहीं है। चर्चा है कि पार्टी के रणनीतिकारों ने हाईकमान से मार्गदर्शन मांगा है। यही वजह है कि कार्यकारिणी की घोषणा में विलंब हो रहा है।

सीखकर आयें और लोगों को भी समझायें

इन दिनों प्रदेश कांग्रेस के अनेक नेता सेवाग्राम, वर्धा पहुंचे हुए हैं। वे वहां कुछ दिन रहकर गांधीजी के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण को समझेंगे। जयंती और पुण्यतिथि पर गांधी जब याद किये जाते हैं तो लगता है कि बस एक रस्म निभाई जा रही है। पर अनुशासित सेवाग्राम में तीन-चार दिन संयम के साथ बिताना भी अपने-आपमें एक तपस्या होगी।

जब कोई नेता विपक्ष में हो तो थोड़ी सादगी के साथ रहना पड़ता है, संघर्ष के दिन होते हैं आंदोलन वगैरह करना पड़ता है। मान सकते हैं कि गांधीजी की प्रेरणा से ऐसा किया जा रहा है। पर, जब सत्ता हाथ में हो तब गांधीजी को आचरण में उतारने की कोशिश तो बेहद कठिन है। कांग्रेस नेता यदि ऐसा कर रहे हैं तो उनकी तारीफ होनी चाहिये। बस इतना करें कि जितना हो सकें खुद गांधी को समझें और लौटकर आयें तो यहां रायपुर, बिलासपुर में जो कांग्रेस पार्षद, ब्लॉक नेता आये दिन मारपीट, धमकी देने की हरकत कर रहे हैं, उनको रोकने की कोशिश करें।

कोरोना टीका पहले, पोलियो का देखेंगे

केन्द्र सरकार का सारा जोर इस समय कोरोना वैक्सीनेशन पर है। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के पालन में हर राज्य साथ दे रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार ने वृहद पैमाने पर एक साथ वैक्सीनेशन पर जोर देने को लेकर आपत्ति जताई थी पर प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में साफ कर दिया कि वह अभियान उनके यहां भी दूसरे राज्यों की तरह चलेगा। छत्तीसगढ़ में भी स्वास्थ्य मंत्री एक साथ बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन के पक्ष में नहीं है। ये सभी मानते हैं कि तीसरे चरण के परीक्षण के नतीजे आने तक रुका जाये ताकि साइड इफेक्ट को लेकर निश्चिन्त हुआ जा सके।

इधर, केन्द्र सरकार ने एक नया आदेश जारी कर इस माह की 17 से 19 तारीख के बीच होने वाले पोलियो टीकाकरण को रोकने कहा है। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में भी इस निर्देश का पालन किया जा रहा है। हालांकि पोलियो टीककरण की तैयारी माहभर से चल रही थी। स्वास्थ्य अधिकारियों का यह भी कहना है कि पोलियो टीकाकरण की उनकी तैयारी पूरी थी। कोरोना वैक्सीनेशन की टीम अलग है। पोलियो टीकाकरण की नई तारीख अभी तय नहीं की गई है। कोरोना काल में वैसे भी नसबंदी, मोतियाबिंद ऑपरेशन, एड्स, कुष्ठ और टीबी के रोगियों की ठीक देखभाल नहीं हो सकी। जैसे अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों में लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन पर रोक भी लग गई थी। अब पोलियो टीकाकरण पर भी इसका असर हुआ है।

काश कोरोना हो जाये!

कोरोना जांच की रिपोर्ट पॉजिटिव बताकर छुट्टियों का आनंद उठाने की कई ख़बरें सामने आ चुकी हैं। बीते सितम्बर माह में नोएडा की एक महिला ने अपने पति, जो एक बड़ा अधिकारी है को गर्लफ्रेंड के साथ मुरादाबाद के एक फ्लैट में रंगे हाथ पकड़ लिया था जो कई दिनों से खुद को कोरोना संक्रमित होना बताकर घर नहीं आ रहा था। इधर, अब छत्तीसगढ़ में पैरोल और जमानत पर छूटे कैदियों के अच्छे दिन खत्म होने वाले हैं। हाईकोर्ट ने जेल में कोरोना संक्रमण फैलने से रोकने के लिये कुछ श्रेणियों के कैदियों को मई माह से जमानत और पैरोल पर छोड़ा। बाद में कोरोना नहीं थमने के कारण उन्हें कई चरणों में 31 दिसम्बर तक राहत दी। सुप्रीम कोर्ट में अपील के बाद उन्हें 15 जनवरी 2021 तक आत्मसमर्पण करने की मोहलत मिल गई, पर इसके बाद विस्तार नहीं हो सका है। हाईकोर्ट ने इन सबको वापस जेल भेजने कहा है। ऐसे कैदियों की संख्या प्रदेशभर में करीब 7700 है। यह भी कहा गया है कि एंटिजन टेस्ट नहीं कराया जाये, कई बार इसकी रिपोर्ट सही नहीं होती। इन सभी का आरटीपीसीआर टेस्ट होगा। कुछ कैदी इस स्थिति में प्रार्थना कर रहे हैं कि काश उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आ जाये ताकि थोड़े दिन और खुली हवा में रह सकें। 


11-Jan-2021 4:43 PM 270

बेवजह क्यों बढ़ गये सीमेन्ट, स्टील के दाम?

कोरोना के भयावह दौर के गुजरने के बाद उद्योग धंधों में तेजी आई है। खेती और आटोमोबाइल्स सेक्टर को छोडक़र बाकी सब व्यवसायों में बीते साल गिरावट थी। खासकर पहले से रेरा, टैक्स और रजिस्ट्री के नियमों के चलते रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ी मंदी देखने को मिली। अब लोग थोड़ी राहत की सांस ले रहे हैं और इसमें निवेश की सोच रहे हैं। लोगों ने अपने रुके हुए घर, दफ्तर बनाने के काम को भी दुबारा शुरू किया है पर स्टील और सीमेन्ट के दाम बढऩे लगे हैं। लागत बढऩे की प्रमुख वजह यही है। बिल्डरों का कहना है कि न तो इस समय मजदूरी बढ़ी, न कच्चे माल का दाम बढ़ा न ही बिजली दर में कोई बढ़ोतरी हुई है फिर भी यह स्थिति बन गई है। ऐसा केवल छत्तीसगढ़ में नहीं बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी हो रहा है। एक रियल एस्टेट कारोबारी का कहना है कि जिस तरह सिंडिकेट पहले सीमेन्ट में था, अब स्टील में भी बन चुका है। बिजली की तरह एक नियामक प्राधिकरण इनकी कीमत पर नियंत्रण के लिये बनना चाहिये। भारत माला और दूसरी सडक़, ब्रिज परियोजनाओं की लागत बढऩे के कारण चिंतित केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात के संकेत भी दिये हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार पर बोलें, दिल्ली भूल जायें

छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर चल रहा संकट किसी से छिपा नहीं रह गया है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे लेकर आंदोलन शुरू करने की बात कही है। पहले 13 जनवरी को सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में धरना-प्रदर्शन की तैयारी की गई है उसके बाद 22 जनवरी को सभी जिला मुख्यालयों में रैली और प्रदर्शन किया जाना है। भले ही भाजपा के पास छत्तीसगढ़ में सीटें बहुत कम है पर कैडर तो पहले जैसा ही है। इसलिये पूरी संभावना है कि इन धरना प्रदर्शनों में ठीक-ठाक भीड़ इक_ी हो जायेगी। दूसरी तरफ इस वक्त हर किसी के दिमाग में दिल्ली में चल रहे किसानों का आंदोलन भी घूम रहा है। भले ही वहां छत्तीसगढ़ के लोग ज्यादा नहीं पहुंचे पर यहां भी कई जगहों पर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। अम्बिकापुर में तो दिल्ली के किसानों की तरह एक छोटी ट्रैक्टर रैली भी निकाली गई। छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार को धान खरीदी पर घेरने के लिये भाजपा नेता सतर्क दिखाई दे रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि वे अपने मंच से दिल्ली के किसान आंदोलन पर संभल कर बात करें। किसान कानून के फायदे गिनाने की कोशिश भी न करें। लोगों का ध्यान भटकेगा।

पोल्ट्री बिजनेस का बुरा हाल

छत्तीसगढ़ में अब तक बर्ड फ्लू का कोई केस नहीं मिल पाया है लेकिन लोग दहशत में हैं। रतनपुर में दो दिन पहले तीन कौवे एक साथ मरे पाये गये। अलग-अलग स्थानों से भी एक से अधिक संख्या में पक्षियों, मुर्गियों की मौत की खबर आई है। इनका सैम्पल शासकीय पोल्ट्री फॉर्म भेजकर जांच कराई गई है। कहीं से भी पॉजिटिव रिपोर्ट नहीं आई है। इसके बावजूद लोग चिकन और अंडे खाने से परहेज कर रहे हैं। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा सभी जगहों से खबरें हैं कि चिकन के दाम 50 फीसदी तक घट गये हैं। नानवेज के शौकीन रविवार को अधिक खरीदारी करते हैं पर कल मांग कम रही। अंडों की बिक्री में भी गिरावट आई है। पोल्ट्री फॉर्म चलाने वालों को उम्मीद है कि अगर हफ्ते, दस दिन बाद भी कोई केस नहीं आयेगा तो लोगों का डर थोड़ा कम होगा और बाजार सुधर सकेगा।


10-Jan-2021 5:37 PM 282

बैलगाड़ी का इंतजाम

छत्तीसगढ़ में भाजपा के अंदरखाने में धान खरीद में अव्यवस्था के खिलाफ 22 तारीख को सभी जिलों में प्रस्तावित धरना-प्रदर्शन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी खुद रायपुर में धरने में शिरकत करेंगी। पुरंदेश्वरी ने श्रीचंद सुंदरानी को अपने लिए एक बैलगाड़ी का इंतजाम करने कहा है। वे बैलगाड़ी में बैठकर किसानों की समस्याओं को लेकर ज्ञापन देने राजभवन जाएंगी। हालांकि बैलगाड़ी लेकर राजभवन तक पहुंचना मुश्किल है, लेकिन पुरंदेश्वरी की सक्रियता सेे कार्यकर्ता चार्ज जरूर हो रहे हैं।

पीए को हटाया किसने?

सरकार के एक मंत्री के पीए को कुछ समय पहले हटा दिया गया। मंत्रीजी के निजी स्टॉफ में दूसरी बार बदलाव हुआ। मगर इस बार पीए को हटाए जाने की काफी चर्चा रही। पीए, मंत्रीजी के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। हाल यह था कि पीए के कथन को मंत्री का आदेश माना जाता था। मगर पीए को हटाए जाने का आदेश पहुंचा, तो हर कोई हैरान रह गया। मंत्रीजी ने  तो ऊपर से आदेश होना बताया, तो खुद पीए का मानना था कि एक पूर्व आईएएस और कुछ अन्य प्रभावशाली लोगों ने उन्हें मंत्री बंगले से बेदखल करवाया है।

अंदर की खबर यह है कि मंत्रीजी खुद होकर अपने पीए से पीछा छुड़ाना चाहते थे। मंत्रीजी के पीए से काफी पुराने संबंध रहे हैं। वे उनकी बात नहीं काट पाते थे। शिकायतें ज्यादा आने लगी, तो उन्होंने खुद होकर पीए को हटवा दिया, और 'ऊपर' से आदेश होना बता दिया। लेकिन चूंकि पहले भी दूसरे कुछ मंत्रियों के यहां के स्टाफ को ऊपर के आदेश पर बदला गया था। इसलिए पीए, मंत्रीजी के कथन को सही मानकर चल रहे हैं।

भित्ति चित्र से हलबा जाति का गायब हो जाना

प्रदेश में हरेक जिला मुख्यालय की किसी प्रमुख सडक़ का चुनाव कर उसका सौंदर्यीकरण किया जाता है। सडक़ों के किनारे आकर्षक भित्तिचित्रों से उस क्षेत्र की कला, संस्कृति और जीवन शैली को प्रदर्शित किया जाता है। हाल ही में दुर्ग के नाना-नानी पार्क की सडक़ पर ऐसी ही श्रृंखला का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लोकार्पण किया था। इधर बस्तर जिले में भी जिला प्रशासन ने वन विभाग को यही काम सौंपा। आसना पार्क में छह जनजातियों मूरिया, माडिय़ा, दोरला, गोंड, धुरवा और भतरा की प्रस्तुति की गई है पर इसमें से हलबा या हलबी जनजाति गायब है। बस्तर के अलावा ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात में इनकी बसाहट है। बस्तर की जन-जातियों पर बात हो और उनमें हलबा का जिक्र नहीं हो, एक बड़ी चूक है। बस्तर जिला प्रशासन की अधिकारिक वेबसाइट में भी हलबा जनजाति का प्रमुखता से उल्लेख है। बस्तर पर लिखी गई अनेक किताबों में भी हलबा जनजाति पर विस्तार से जिक्र है।

बस्तर में 70 प्रतिशत आदिवासी हैं और उनके अपने रिवाज, प्रथा-परम्परा, पद्धति, देवी देवताओं पर मान्यता, वेशभूषा, बोली, सांस्कृतिक गतिविधियां विविध व्यापक हैं। जब अफसर अपनी तैनाती इलाके को समझने की कोशिश नहीं करते हैं तब ऐसी गलती होती है। बस्तर की तो बूझना आसान भी नहीं है।

अखिल भारतीय हलबा समाज प्रशासन की इस लापरवाही पर गुस्से में हैं। उसने कलेक्टर, डीएफओ और उच्चाधिकारियों को इस उपेक्षा को लेकर ज्ञापन दिया है और चेतावनी दी है कि यदि यह गलती नहीं सुधारी गई तो आंदोलन करेंगे।

केंवटीन नहीं केंवट कहो भाई..

किसी महिला का नाम लिखते समय उनकी जाति का तोड़-मरोडक़र जिक्र किया जाये तो कैसा लगेगा?  शर्मा को शर्माईन तो नहीं कहा जा सकता। सरनेम तो अग्रवाल, शर्मा, गुप्ता, ठाकुर वगैरह ही होना चाहिये।

बीते दिनों गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के दौरे पर पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को केंवट समाज की ओर से एक पत्र सौंपा गया। उन्होंने कहा, चकरभाठा एयरपोर्ट को ‘बिलासा बाई केंवटीन’  नाम आपने दिया उससे समाज गदगद है, आभार! सीएम ने धन्यवाद देते हुए पूछ लिया केंवटीन क्यों कह रहे हो? लोगों ने एक दूसरे की ओर सवालिया निगाह से देखा और कहा अखबारों में यही तो छपा है साहब। सीएम ने समझाया बिलासा बाई केंवट थीं तो उपनाम भी केंवट ही रहेगा न। नाम बिलासा बाई केंवट ही हुआ । सबने हामी भरी और कहा कि अब ऐसे ही लिखा बोला करेंगे। इधर प्रशासन द्वारा नामकरण पर जो चि_ी चल रही है, पता चला उसमें भी केंवटीन लिखा गया है। सीएम की सुनने के बाद उसमें सुधार किया जा रहा है। हवाई सेवा शुरू करने के लिये संघर्ष कर रहे एक नेता कहना है कि केंवट या केंवटीन का जिक्र भी क्यों हो, केवल बिलासा बाई एयरपोर्ट कहा जाना अच्छा लगेगा।

हड़ताल भी चालू और काम भी

पंचायत सचिवों का काम ग्राम स्तर पर शासकीय योजनाओं का काम देखना होता है। रोजगार सहायकों का काम महात्मा गांधी नरेगा की निगरानी, मस्टररोल और मजदूरों का वेतन बनाना होता है। पिछले एक पखवाड़े से प्रदेश भर में इनकी हड़ताल चल रही है। मांग है, दो साल की नौकरी के बाद पंचायत सचिवों को शासकीय सेवक का दर्जा मिले। रोजगार सहायकों को नगरीय निकायों की सेवा में रखा जाये, नियमित करें और पंचायत सचिवों की नियुक्ति में अनुभव के आधार पर सीधी भर्ती की जाये।

इस हड़ताल की वजह से ग्राम पंचायतों और मनरेगा के कार्यों की व्यवस्था बिगड़ी हुई है पर, हर जगह नहीं। संगठन के पदाधिकारियों ने देखा कि हड़ताल के पंडाल तो भरे हुए हैं फिर भी पंचायतों में काम रुक नहीं रहा है। पता चला कि कुछ सचिव, रोजगार सहायक हड़ताल पर भी हैं और बाद में काम भी निपटा रहे हैं। संगठन के नेताओं ने इनसे कहा कि अपना-अपना डोंगल जमा करें। इंटरनेट ही नहीं रहेगा तो काम कैसे करोगे। दिक्कत ये है कि लोग डोंगल जमा नहीं कर रहे। डोंगल जमा हो भी गया तो नेट की वैकल्पिक सुविधा इतनी अधिक है उससे काम बंद जैसी स्थिति पैदा ही नहीं हो रही है।


09-Jan-2021 5:35 PM 340

112, गमले, और हरकत...

पुलिस का काम आमतौर पर रूखा-सूखा होता है। लेकिन राजधानी रायपुर के पुलिस कंट्रोल रूम में सजे हुए ये गमले तब बनाए गए थे जब पुलिस ने 112 नाम की एक नई आपात सेवा शुरू की थी। इन्हीं गाडिय़ों के हुलिये में ऐसी छोटी-छोटी खिलौना-गाडिय़ां सरीखी बनाकर उनके गमले बनाए गए थे।

पुलिस की यह सेवा सडक़ों पर दिखती है, और फोन करने पर तेजी से पहुंचती भी है। इसके जिम्मेदार अफसरों को यह भी तय करना चाहिए कि सडक़ किनारे जगह-जगह खड़ी 112 गाडिय़ों में बैठे पुलिस कर्मचारी या निजी ड्राइवर खिड़कियों से बाहर थूकने से रोके जाएं। जब सरकार की जानी-पहचानी गाड़ी में बैठकर लोग ऐसी हरकत करते हैं, तो वह गमले के फूल जैसी अच्छी तो नहीं लगती।

तब कुछ नहीं हुआ तो भला अब क्या होगा?

भाजपा और कांग्रेस में बहुत फर्क है, खासकर अनुशासन के नाम पर। बिलासपुर में कांग्रेस विधायक शैलेश पांडे और ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष तैयब हुसैन के बीच हुए विवाद की इन दिनों बड़ी चर्चा है। विधायक ने हुसैन पर कॉलर पकडक़र धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने अगले ही दिन रायपुर जाकर के प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सहित  कई मंत्री नेताओं को इसकी शिकायत कर दी और जांच की मांग की। जांच के लिए टीम पहुंच भी गई और अपनी रिपोर्ट लेकर चली गई। जांच टीम छत्तीसगढ़ भवन के एक कमरे के भीतर बड़ी गंभीरता से दोनों नेताओं और उनके समर्थकों का बयान दर्ज कर रही थी और बाहर दोनों ही टीमों के लोग आपस में हंसते बतियाते रहे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि कांग्रेसी किसी दिक्कत में हैं।

एक का कहना था कि यह भी एक शक्ति प्रदर्शन का तरीका है। विधायक ने देख लिया कि उनका साथ देने के लिए कौन-कौन लोग पहुंचे, दूसरी तरफ ब्लॉक अध्यक्ष ने भी  जान लिया कि उनके सिर पर अपने नेता का हाथ है या नहीं।

सवाल उठा कि जांच कमेटी क्या रिपोर्ट बनायेगी और क्या सचमुच कोई कार्रवाई किसी पर होगी?  विधायक बड़ी भावुकता के साथ कह रहे हैं कि  न्याय चाहिए। मतलब, कड़ी कार्रवाई। दूसरा पक्ष उनकी बात पर प्रतिक्रिया दे रहा था कि ऐसा हरगिज़ नहीं होने वाला।

याद दिलाया कि यह तो विधायक के साथ हुई बदसलूकी की बात है। सन 2018 की  बिलासपुर की छठ पूजा में पहुंचे मुख्यमंत्री के बारे में तो हमारे ही ग्रुप के एक नेता ने अनर्गल बातें कह दी थी। उसका तो वीडियो भी वायरल जगह-जगह हो चुका है। उसे ना केवल बख्श दिया गया बल्कि मरवाही चुनाव में भी जिम्मेदारी दी गई। हमेशा से कांग्रेस ऐसे ही चलती आई है और चलती रहेगी।

निजी अस्पताल छुट्टी पाने के फिराक में

जब कोरोना संक्रमण का संकट गहरा गया था और सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की कमी पडऩे लगी थी तो प्रदेश भर में निजी अस्पतालों को भी कोरोना का इलाज करने की छूट दी गई। थोड़े ही दिनों बाद शिकायत आने लगी की इलाज के नाम पर भारी-भरकम फीस ली जा रही है। शिकायत हुई, जांच हुई पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई। वजह यह थी कि कोरोना के नाम पर तो निर्धारित फीस ही ली जा रही थी लेकिन उसके अलावा दूसरी बीमारियां भी बताकर बिल बढ़ाया जा रहा था। ऐसा सभी निजी अस्पतालों में भले ही ना हो रहा हो लेकिन कई के खिलाफ तो बड़ी गंभीर शिकायतें स्वास्थ्य विभाग को मिली। यही नहीं सरकारी सेटअप वाले कोविड अस्पतालों  के मुकाबले निजी अस्पतालों में औसत मौतें कहीं ज्यादा हुई। कोविड के नाम पर दूसरे मरीज भर्ती होने से कतराते थे।

इधर अस्पतालों की अभी स्थिति यह हो गई है कि ना तो अब वहां कोरोना के मरीज रह गए हैं और ना ही दूसरे पहुंच रहे हैं। अब वे स्वास्थ्य विभाग से फरियाद कर रहे हैं कि हमारा कोरोना वार्ड हटा दिया जाए। कुछ निजी अस्पताल तो बकायदा विज्ञापन दे रहे हैं कि हमारे यहां कोरोना  मरीज नहीं है और सामान्य मरीजों की भर्ती चालू हो गई है।

वंश खत्म होने का नाम वंश!

लोग आमतौर पर कारोबार का नाम बड़ा सोच-समझकर रखते हैं। लेकिन अभी भी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वंश चिकन एवं एग शॉप का बोर्ड दिखा। अब चिकन की तो जिंदगी ही कुछ दिनों की रहती है जब तक ग्राहक उसे ले न जाए, और खा न ले। वही हाल अंडे का रहता है। शायद ही कहीं एक-दो दिनों से ज्यादा अंडा दुकान पर रहता हो, वह भी छोटी सी जिंदगी वाला रहता है, और उसका भी वंश आगे नहीं बढ़ता। अब जो चिकन अपने वंश का आखिरी प्राणी रहता है, उसकी दुकान का नाम वंश रहना कुछ हैरान भी करता है।

पुलिस का सर्वर बैठ गया

चिप्स और एयरटेल के बीच बिल के भुगतान को लेकर पैदा हुए विवाद का प्रदेश भर के थानों में बड़ा बुरा असर पड़ा है। खास करके वे थाने जहां बड़ी संख्या में रोजाना एफ आई आर दर्ज की जाती है। बीते 10-12 दिनों से सर्विस बंद है और  एफ आई आर ऑनलाइन अपलोड ही नहीं हो रही है। इसके अलावा पुलिस की ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली भी जाम हो गई है जो अपराध सुलझाने और अपराधियों की गतिविधियों को पकडऩे में मददगार होती है।  कोई अगर ऑनलाइन एफ आई आर पुलिस की पोर्टल में जाकर देखना चाहे तो इस समय नहीं देख पाएंगे। पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग की इंटरनेट जैसी अत्यंत आवश्यक सेवा  का लगातार इतने दिनों से बंद रहना हैरान करता है। स्मार्ट पुलिसिंग, साईबर एक्सपर्ट पुलिसिंग, हाइटेक पुलिसिंग, इन सब का क्या हो रहा है?


08-Jan-2021 4:34 PM 338

सबसे बात, सबको मौका...

भाजपा की नई प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने थोड़े समय में ही अपनी अलग कार्यशैली से कार्यकर्ताओं का दिल जीतने में सफल रही हैं। वे छोटे-बड़े नेताओं को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दे रही हैं। पिछले कुछ समय से पार्टी में नियुक्तियों को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही थी। चाहे नेता प्रतिपक्ष का चयन हो, या फिर प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति, पार्टी के कई बड़े नेताओं ने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी थी। असंतुष्ट नेता पार्टी की गतिविधियों में ज्यादा सक्रिय नहीं थे, लेकिन पुरंदेश्वरी के प्रभारी बनने के बाद वे भी सक्रिय हो गए हैं।

मोर्चा-प्रकोष्ठ के प्रभारियों की बैठक में तो उन्होंने कह भी दिया कि कार्यकर्ता नाराज क्यों हैं, यह पता लगाना होगा। कोई नेता उनसे अलग से चर्चा के लिए समय मांगता है, तो वे तुरंत तैयार हो जा रही हैं, और उनकी पूरी बातों को ध्यान दे रही हैं। वे ज्यादातर सांसदों के साथ अलग से चर्चा कर चुकी हैं। पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय की भी पुरंदेश्वरी से अकेले में चर्चा हो चुकी है। जिलों का दौरा पूरा करने के बाद वे दिल्ली रवाना हुई, तो उन्हें छोडऩे के लिए दुर्ग सांसद विजय बघेल सहित कई नेता एयरपोर्ट गए थे। कुल मिलाकर पुरंदेश्वरी के कामकाज के तौर तरीकों से असंतुष्ट नेताओं का भी उन पर भरोसा दिख रहा है।

एम्बुलेंस से भी लोग जलते हैं?

ट्रकों और दूसरी गाडिय़ों के पीछे कई किस्म के फलसफे लिखे दिखते हैं। एक एम्बुलेंस के पीछे कल लिखा दिखा- जलो मत, कर्ज में हैं।

अब सवाल यह है कि एम्बुलेंस देखकर इन दिनों तो लोग नजरें फेर लेते हैं कि उसके भीतर कोरोना का कोई मरीज न हो। सडक़ किनारे एम्बुलेंस खड़ी हो, तो भी लोग कतराकर दूर से निकल जाते हैं। कल उत्तर भारत में एक जगह एक एम्बुलेंस में ले जाया जा रहा मरीज रास्ते में मर गया। कोरोना के डर और दहशत में एम्बुलेंस के कर्मचारी लाश सहित गाड़ी रास्ते में ही छोडक़र भाग गए।

लेकिन कर्ज लेकर जो लोग कारोबार के लिए ऐसी गाडिय़ां लेते हैं, वे यह भी चाहते हैं कि किसी की नजर न लगें। शायद इसलिए भी कई किस्म की बातें गाडिय़ों के पीछे लिखी जाती हैं, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, या जलो मत, बराबरी करो वगैरह-वगैरह।

वैसे एक बात है कि अब कोरोना-वैक्सीन आने पर सबसे पहले अस्पताल के कर्मचारियों को और एम्बुलेंस कर्मचारियों को यह टीका लगेगा। हो सकता है ऐसे में टीका लगे एम्बुलेंस कर्मचारी को देखकर वे लोग जलें जो टीका लगवाना चाहते हैं लेकिन जिनकी बारी महीनों या बरसों बाद आएगी।

कोविन एप में पिनकोड की समस्या

कोरोना वैक्सीनेशन की तारीख जैसे-जैसे करीब आती जा रही है, इससे जुड़ी कई ऐसी कई शंकायें खड़ी हो रही हैं, जिनका समाधान केन्द्र के पास अब तक नहीं है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने डॉ. हर्षवर्धन से दूरस्थ क्षेत्रों में वैक्सीन पहुंचाने के लिये हवाई सुविधा की मांग कर डाली। देर-सबेर इस पर हो सकता है फैसला ले लिया जाये। पर दो ऐसे सवाल थे, जिन पर कोई जवाब फिलहाल नहीं है। जैसे पूछा गया कि कोई कोरोना संक्रमित, निगेटिव होने के कितने दिन बाद टीका लगवा सकता है?  जवाब आया कि 14 दिन से 3 माह के भीतर। सिंहदेव का कहना ठीक ही था कि 14 दिन पर्याप्त है या 3 माह। साफ-साफ बतायें। केन्द्रीय मंत्री ने स्पष्ट अवधि बताने के लिये समय मांगा है। दूसरी समस्या भी देश के कई नये जिलों में आ रही होगी। कोविन एप में रजिस्ट्रेशन के दौरान जिले का पिनकोड नंबर भी दर्ज करना है। अपने प्रदेश में गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही बिल्कुल नया जिला है, जिसके लिये अभी अलग पिनकोड नंबर नहीं है। यदि पुराने जिले बिलासपुर का पिन कोड नंबर डाला जाये तो सॉफ्टवेयर उसे एप्रूव ही नहीं करेगा। अभी इसका जवाब आना बाकी है।

पुरुष आयोग के लिये भी पहल हो ही जाये

महिलाओं के अत्याचार से पीडि़त पतियों को प्राय: गंभीरता से लिया ही नहीं जाता। देश में ‘पत्नी प्रताडि़त संघ’ जैसे कई संगठन हैं। बीच-बीच में इनके धरना, प्रदर्शन जैसे आंदोलन की बातें देखने- सुनने में आती रहती हैं। पर ये संगठन ताकतवर नहीं बन पाये हैं। बहुत से लोग तो इस झिझक से इन से नहीं जुड़ते क्योंकि उनको मर्द के दर्द का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं भाता। पर ऐसे लोगों की हौसला आफजाई करते रहना चाहिये। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा है कि महिलाओं और पुरुषों दोनों को न्याय दिलाने में आयोग की भूमिका निष्पक्ष रहती है। इसके पहले भी उन्होंने कहा था कि कई बार महिलायें ही गलती करती हैं, बाद में पुरुषों पर दोष मढ़ती हैं।

यह ठीक है कि फैसला दोनों पक्षों के गुण-दोष को देखकर ही किया जाना चाहिये। पर समाजशास्त्री ज्यादा ठीक तरह से बता पायेंगे कि महिलाओं से गलती होती भी है तो उसके लिये पुरुषों की ओर से दिया जाने वाले झांसे, प्रलोभन तथा आर्थिक, मानसिक, सामाजिक सुरक्षा के आश्वासन की क्या भूमिका होती है।

अब पत्नी प्रताडि़त संगठनों से जुड़े लोगों को पुरुष आयोग गठित करने के पक्ष में आवाज चाहिये। क्योंकि महिला आयोग चाहे उनसे जितनी भी सहानुभूति रखे, सिर्फ महिलाओं की शिकायत सुन सकता है। ऐसा आयोग बनने पर कुछ और रिटायर्ड लोगों के पुनर्वास का इंतजायेगा. जाम हो

बिग-बी की आवाज का अजीर्ण होना

देश दुनिया के करोड़ों प्रशंसक अमिताभ बच्चन को बिग-बी, सुपर-स्टार, सदी का महानायक कहते हैं। अभिनय के अलावा उनकी जानदार आवाज ही है, जिन्होंने उन्हें इस ऊंचाई पर पहुंचाया । लोग उनके डॉयलाग की नकल बरसों से करते आ रहे हैं। आवाज की बहुत से रेडियो शो, विज्ञापनों, कॉमेडी के कार्यक्रमों में नकल होने लगी। करीब 10 साल पहले एक गुटखा कम्पनी ने भी ऐसा किया। इसके बाद बच्चन ने शायद अपनी आवाज का कॉपीराइट करा लिया। अब उनकी आवाज की नकल करना अपराध है।

इस बेशकीमती आवाज का सरकार भी जागरूकता अभियान में इस्तेमाल करती रही है। कोरोना संक्रमण जब फैलना शुरू हुआ तो मोबाइल फोन के कॉलर ट्यून पर एक महिला की आवाज में सतर्कता का संदेश दिया जाता रहा, पर उसके बाद भी कोरोना के केस बढ़े। शायद सरकार को लगा कि असर नहीं हो रहा है। शायद तब उन्होंने अमिताभ के साथ अनुबंध किया। संयोग देखिये, कोरोना के केस घटने लगे हैं। पर अब लोग ऊबने भी लगे हैं। किसी को इमरजेंसी कॉल करनी हो, मुसीबत में फंसा हो, जान पर बन आई हो, तब भी कोरोना संदेश। एक दिन में दस बार कॉल करें तो दस बार नसीहत। लोग मोबाइल कम्पनियों और सरकार से गुहार लगाने लगे कि ये बंद करो। पर शायद सरकार को लगता है कि कोरोना को जड़ से मिटाने में यही एक तरीका कारगर रहेगा। हलाकान लोगों को अब उम्मीद दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका से है। हालांकि याचिकाकर्ता ने कॉलर ट्यून में अमिताभ की जगह किसी असली वारियर्स को मौका देने की मांग की है। उनको अमिताभ से यह काम लेने पर शिकायत है।

अब इधर एक सलाह आई है कि कोरोना अलर्ट को सुनने से कैसे बचें। उनका कहना है कि दो-चार सेकेन्ड सलाह सुनने के बाद कॉल काट दें और उसी नंबर को डायल कर लें। दूसरी बार आप सीधे रिंग टोन में पहुंच जायेंगे। आजमाकर देखें। कई लोगों का कहना है, तरीका कारगर है।

 

 

 


07-Jan-2021 4:09 PM 398

2003 का भूत मंडरा रहा है

राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस अवॉर्ड के लिए डीपीसी को दो माह हो चुके हैं, लेकिन अभी तक अधिसूचना जारी नहीं हो पाई है। सात रिक्त पदों के लिए नवम्बर में डीपीसी हुई थी। आमतौर पर डीपीसी होने के एक-दो हफ्ते के भीतर अधिसूचना जारी हो जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया।

सुनते हैं कि डीपीसी से पूर्व जरूरी विवादों का निराकरण नहीं हो पाने के कारण ऐसी स्थिति बनी है। मसलन, एडिशनल कलेक्टर संतोष देवांगन के नाम पर विचार तक नहीं किया गया। जबकि कैट ने 23 अक्टूबर  को आदेश पारित कर देवांगन के नाम पर भी विचार करने के लिए कहा था, और चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा था। संतोष देवांगन के खिलाफ फिलहाल कोई जांच लंबित नहीं है। खास बात यह है कि  कैट के आदेश के बाद डीपीसी हुई थी, लेकिन वरिष्ठता क्रम में ऊपर होने के बाद भी संतोष देवांगन के नाम पर विचार क्यों नहीं किया गया, यह अभी साफ नहीं है। सभी संबंधित पक्षों की तरफ से अभी तक कैट में जवाब दाखिल भी नहीं किया गया है।

एक विवाद यह भी है कि राप्रसे के 98 बैच के अफसर अरविंद एक्का और हिना नेताम के खिलाफ जांच चल रही है। विभागीय जांच की वजह से पदोन्नति तो नहीं हो सकती थी, लेकिन पद रोके जाने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं हुआ, और नीचे के सभी अफसरों को पदोन्नति की अनुशंसा कर दी गई। जिन 2003 बैच के अफसरों को पदोन्नति देने की अनुशंसा की गई है, उनकी नियुक्ति ही सवालों के घेरे में हैं।

हाईकोर्ट ने पीएससी-2003 की भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी को माना था, और नए सिरे से चयन सूची तैयार करने के निर्देश दिए थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा रखी है, लेकिन भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ लड़ाई लडऩे वाली वर्षा डोंगरे ने यूपीएससी और डीओपीटी व राज्य सरकार से आग्रह किया था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक 2003 बैच के अफसरों को पदोन्नति नहीं दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका लंबित है। मगर मलाईदार पदों पर जमे अफसरों के दबाव के चलते विवादों का निपटारा किए बिना पदोन्नति बैठक तो हो गई, लेकिन अधिसूचना जारी नहीं हो पाई है। हालांकि कुछ लोग जल्द अधिसूचना जारी होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन विवाद का निपटारा जल्द होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।

इतने बड़ों पर कौन हाथ डाले?

सरकारी जमीन कब्जा करने में अफसर भी पीछे नहीं रहे हैं। एक अफसर ने तो बोर्ड में पदस्थापना के दौरान मकान खरीदा, फिर मकान से सटी जमीन पर कब्जा कर लिया। बाद में सरकारी योजना का फायदा उठाकर अवैध कब्जे को वैध करा लिया। एक बड़े अफसर ने तो अपने बंगले के पास की सरकारी जमीन में घेरा लगाकर बकायदा साग-भाजी भी उगाना शुरू कर दिया है। अब किसी छोटे अफसर औकात, जो इतने बड़े लोगों के अवैध कब्जे पर निगाह डाले।

सीएम के मिजाज से नई चिंता

संभागवार जिला मुख्यालयों का प्रवास कर रहे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का अधिकारी-कर्मचारियों के साथ संवाद खूब चर्चा में है। विभिन्न संगठनों, कार्यकर्ताओं से मुलाकात के अलावा वे अफसरों से चर्चा के लिये अलग से समय निर्धारित कर रहे हैं। इसमें वे सरकारी कामकाज की चर्चा तो बिल्कुल नहीं कर रहे न फटकार लगा रहे, बस हाल-चाल पूछ रहे हैं। मुख्यमंत्री से मिलकर अधिकारी खुश भी हो रहे हैं और अपने मित्रों को बता रहे हैं कि उन्होंने क्या पूछा, किस तरह पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया। इन सबके बीच जिलों की कमान संभाल रहे कुछ आईएएस, आईपीएस की चिंता बढ़ गई। जिले में काम करके दिखाना है, तो अपने मातहतों से वे इस तरह तो पेश आ नहीं सकते। कुछ सख्ती भी करनी होगी, कुछ फटकार भी लगानी होगी, शो कॉज वगैरह भी देते रहना पड़ेगा।

दूसरे आईएएस ने समझाया कि हम पर कोई बंदिश नहीं है। इस संवाद से यह बात समझ में आई है कि परफार्मेंस कलेक्टर, एसपी का देखा जायेगा। मुगालते में रहने का नई, जवाबदारी हम पर बढ़ गई है कामकाज दुरुस्त रखने की। पूछताछ हमीं से की जायेगी। अब ज्यादा अलर्ट मोड में रहना है।

ट्रेन तो सब चलायेंगे पर स्पेशल

रेस्तरां में स्पेशल थाली, स्पेशल सब्जी, चाय का रेट ज्यादा तो होता है पर उसमें जमीन-आसमान का फर्क नहीं होता। कोरोना लॉकडाउन के दौरान घर पहुंचने के लिये बदहवास मजदूरों से किराया वसूली के चलते रेलवे के रवैये पर सवाल उठा था, पर अब तो साफ है कि रेलवे ने कोरोना काल में कमाई की कोई कसर बाकी नहीं रखी है। दूसरी तरफ जिम्मेदारी, सेवाओं से भी हाथ खींच रही है। लॉकडाउन के दौरान बंद की गई ट्रेनों को धीरे-धीरे शुरू किया गया। पहले त्यौहारों के नाम पर पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं, जिसका धीरे-धीरे विस्तार किया गया। अब तक वे ट्रेनें चल रही है। लोगों में कोरोना का खौफ कम हुआ तो और ट्रेनें शुरू की गई। अब छत्तीसगढ़ से रोजाना करीब 23 यात्री ट्रेनें गुजरने या छूटने लगी हैं। मगर सब स्पेशल के नाम पर। नियमित चलाई जाने के बावजूद स्पेशल दर्जे पर रखने की खास वजह है। इन ट्रेनों में किसी भी जगह के लिये आप बैठें न्यूनतम किराया 500 किलोमीटर का होगा। यानि रायगढ़ गये तो भी वही किराया जो नागपुर जाने पर है। उस पर हालत यह है कि पेन्ट्री कार शुरू नहीं की गईं, सफाई के कर्मचारी गिने चुने स्टेशनों में हैं। आम यात्रियों को मिलने वाला सस्ता भोजन जन आहार बंद है। छोटे स्टेशनों में स्टापेज बंद हैं। मजदूरों, छोटे व्यापारी, कामकाजी लोगों के लिये करीब 10 माह से ट्रेनों पर सफर करना मुहाल बना हुआ है।

और, लगे हाथ बता दें कि पेट्रोल का दाम आज ही 83.95 पैसे हो गया जो अब तक की सबसे ज्यादा कीमत है।

तबादले के बाद भी जमे रहना

आम तौर पर राज्य और अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को तबादला आदेश मिलने के दो-चार दिन के भीतर रिलीव कर दिया जाता है। पर मुंगेली जिले में एक राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी स्थानांतरण के डेढ़ माह बाद भी रिलीव नहीं किये गये हैं। बताया जाता है कि दुर्ग जिले में जहां उन्हें भेजा जा रहा है वह उन्हें बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। वहां खाली बैठने के अलावा कोई काम नहीं है। बताते हैं कि वे करीबियों से कह रहे हैं कि कहीं भी भेज दो पर कुछ काम करने के लिये तो छोड़ो। फिलहाल उनको डेढ़ माह से रिलीव नहीं किये जाने की शिकायत पुलिस मुखिया से भी हो गई है।


06-Jan-2021 5:07 PM 345

मोदी-शाह से चर्चा के बाद भरोसा

केन्द्र सरकार ने काफी विवाद के बाद 24 लाख टन चावल लेने पर सहमत हो गई है। एफसीआई को निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं। वैसे तो 60 लाख टन चावल लेने का भरोसा दिया गया था, लेकिन फिलहाल 24 लाख टन चावल लेने का सहमति पत्र आने से राज्य सरकार को कुछ राहत मिली है। अब धान खरीदी की व्यवस्था ठीक करने की कोशिश हो रही है।

एफसीआई द्वारा चावल नहीं लेने से मिलिंग नहीं हो रही थी, और खरीदी केन्द्रों में धान जाम हो गया था। खुद सीएम भूपेश बघेल को आगे आकर विवाद सुलझाने के लिए पहल करनी पड़ी। सीएम ने पहले पीएम नरेन्द्र मोदी से बात की, और फिर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से चर्चा की।

दोनों से चर्चा के बाद ही विवाद सुलझ पाया। राज्य सरकार के लोगों को भरोसा है कि एफसीआई देर सवेर पूरा 60 लाख टन चावल लेगी। इस भरोसे की वजह मोदी और शाह का रूख सकारात्मक होना बताया जा रहा है, जो कि केन्द्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल के विपरीत नजर आया है।

विधायक-सांसदों को पहले लगे वैक्सीन

कोरोना वैक्सीनेशन के लिए जल्द अभियान शुरू हो रहा है। छत्तीसगढ़ में पहले फेस में करीब ढाई लाख स्वास्थ्य कर्मचारियों, डॉक्टरों को वैक्सीन लगाया जाएगा। वैक्सीन को लेकर न सिर्फ आम लोग बल्कि स्वास्थ्य कर्मचारी भी सशंकित हैं। कई स्वास्थ्य कर्मचारी इससे दुष्प्रभाव की आशंका जता रहे हैं, और दबे स्वर में वैक्सीन लगाने से आनाकानी कर रहे हैं। स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के नेताओं को अलग-अलग जिलों से फोन आने शुरू हो गए हैं।

कई स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपने संघ के नेताओं को सुझाव दिया है कि वे सरकार को ज्ञापन दें, कि सबसे पहले विधायक और सांसदों को वैक्सीन लगाया जाए। इसके बाद ही कर्मचारियों  और आम लोगों को वैक्सीन लगाया जाए। हालांकि संघ के लोग सरकार को ऐसा कोई ज्ञापन नहीं दे रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि कर्मचारियों में वैक्सीन के प्रति भरोसा जताने के लिए कुछ ठोस उपाय करना चाहिए।

चिकन, अंडों पर फिर शामत

नये साल की शुरुआत में ही बर्ड फ्लू की ख़बरों ने फिर एक बार लोगों को चिंता में डाल दिया है। मध्यप्रदेश, केरल, हिमाचल, राजस्थान, हरियाणा राज्यों में हजारों पक्षियों की मौतें हुई हैं और नये मामले भी सामने आ रहे हैं। बर्ड फ्लू की जो ख़बरें आ रही हैं वह बताती है कि यह कोरोना की तरह तेजी से तो नहीं फैलता पर जानलेवा उससे कई गुना ज्यादा है। 1997 से पता लगाये जा चुके इस वायरस में कहा जा रहा है मौतों का प्रतिशत करीब 60 है। यानि कोरोना से काफी ज्यादा। छत्तीसगढ़ में पक्षियों की मौतों के मामले इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं आये हैं, लेकिन वन विभाग ने एहतियात बरतना तो शुरू कर दिया है। बिलासपुर स्थित कानन पेंडारी में पक्षियों का वैक्सीनेशन शुरू किया जा चुका है। कोरोना और बर्ड फ्लू में फिर शामत चिकन और अंडे बेचने वालों पर आई है क्योंकि लोग सावधानीवश सबसे पहले उसे ही खाने से परहेज कर रहे हैं। कोरोना के चलते अप्रैल मई माह में तो चिकन, अंडे मुफ्त बांटने की स्थिति पैदा हो गई थी, देखें इस बार क्या होता है।

वैक्सीनेशन का टारगेट न मिले

कोरोना वैक्सीनेशन के लिये प्रदेश में किया गया पहले चरण का मॉक ड्रिल सफल रहा है। रायपुर सहित सात जिलों में इसका ड्राइ रन एक-दो शिकायतों के अलावा बाकी सभी ठीक बता रहे हैं। अब कल 7 जनवरी से मॉक ड्रिल का दूसरा चरण शुरू होने वाला है। मॉक ड्रिल के बाद असली परीक्षा टीकाकरण के दौरान ही होने वाली है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कह दिया है कि टीका लगवाना स्वैच्छिक रहेगा, किसी के साथ जबरदस्ती नहीं की जायेगी। अब एक टीवी चैनल का सर्वेक्षण कहता है कि साइड इफेक्ट को लेकर चिंतित 69 प्रतिशत आम लोग वैक्सीन लगवाने के इच्छुक नहीं है। इसके अलावा जिन स्वास्थ्य कर्मियों को पहले टीका लगाने के लिये चुना जा रहा है उनमें से भी 55 प्रतिशत लोग इच्छुक नहीं है। टीका लगाने के मुहिम से जुड़े एक डॉक्टर ने कहा कि बस हमें पोलियो टीके की तरह कोरोना टीका लगाने का कोई टारगेट नहीं दिया जाये, बाकी हम संभाल लेंगे।

घरों में सरकारी शिक्षकों की दस्तक

ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि जिन छात्रों ने 10वीं, 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के फॉर्म नहीं भरे हैं या पिछली बार की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गये हैं उनसे फॉर्म भरवाने के लिये सरकारी स्कूलों के शिक्षक न केवल फोन से बल्कि जिनसे सम्पर्क नहीं हो रहा है उनके घरों में जाकर सम्पर्क कर रहे हैं। वे उन्हें परीक्षा फॉर्म भरने के लिये कह रहे हैं। अनुत्तीर्ण छात्रों को बताया जा रहा है कि वे दुबारा सभी विषयों की परीक्षा भी दिला सकते हैं। ऐसे छात्रों के कारण परीक्षा फॉर्म भरने की अंतिम तारीख भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दी गई है जो पहले 30 दिसम्बर तक थी। मकसद है, कोरोना की वजह से छात्रों का सत्र खराब न हो। बहुत से शिक्षकों ने स्कूल से बाहर ऑनलाइन, ऑफलाइन ड्यूटी अच्छी तरह निभाई। अब ये छात्र परीक्षा भी दिला सकें और किसी तरह पास हो जायें यह कवायद की जा रही है।


05-Jan-2021 4:12 PM 287

साइबर क्राइम से कैसे निपटे पुलिस?

ऑनलाइन ट्रांजेक्शन का जिस तरह चलन बढ़ रहा है लोग जालसाजी के भी उसी गति से शिकार हो रहे हैं। साथ ही निजता पर भी संकट खड़ा हो रहा है। बेंगलूरु से डेटा चोरी की बड़ी ख़बर आई है। एक साइबर सेक्यूरिटी रिसर्चर राजशेखर ने दावा किया है कि देश के करीब 10 करोड़ क्रेडिट और डेबिट कार्ड धारकों का डेटा हासिल कर इसे विदेशी कम्पनियों को बेचा जा रहा है। यह एक पेमेन्ट गेट वे जस पे के जरिये लीक किये जाने की बात सामने आ रही है। बिक्री भी नगदी लेन-देन करके नहीं बल्कि क्रिप्टो करंसी बिटक्वाइन के जरिये की जा रही है।

इस खुलासे में यह भी बताया गया है कि कार्ड की डिटेल के साथ मोबाइल नंबर्स, इन्कम लेवल, ई मेल आईडी, पैन नंबर आदि भी लीक हुए हैं। पहले भी इस रिसर्चर ने 70 लाख से ज्यादा लोगों के डिटेल लीक होने का दावा किया था। छत्तीसगढ़ भी डेटा लीक और ऑनलाइन ठगी की समस्या से जूझ रहा है। मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने में चूक हुई, फोन कॉल के झांसे में आये और एक झटके में लोगों की जीवन भर की कमाई साफ हो रही है। पेमेन्ट गेट वे से आसानी से एक खाते से दूसरे खाते में राशि चली जाती है। परम्परागत तरीके से काम करने वाली पुलिस को साइबर क्राइम से लडऩे के लिये नये तरीके से प्रशिक्षित करने की जरूरत आ पड़ी है साथ ही बैंकों को अपना सुरक्षा तंत्र मजबूत कर ठगों की पहुंच से उपभोक्ताओं को बचाने का इंतजाम करना होगा। हालांकि बैंकों को अपनी एटीएम मशीनों को भी ठीक करने की जरूरत है। हाल ही में जगदलपुर और बिलासपुर से करीब डेढ़ करोड़ रुपये साफ कर लिये गये थे।

वैक्सीन को लेकर ऊहापोह...

कोरोना वैक्सीन अब बस लगने ही वाली है। मॉक ड्रिल हो चुकी है। जिन दो लोगों पर पहला ट्रायल किया गया उनमें से एक महिला की तबियत बिगड़ गई। इससे यह सवाल खड़ा होने लगा है कि वैक्सीन 100 फीसदी सुरक्षित है भी या नहीं। न्यूज चैनलों और अखबारों में इस पर बहस हो रही है। बहुत लोगों का मानना है कि किसी भी रोग प्रतिरोधक वैक्सीन के लिये सालों तक लम्बे रिसर्च की जरूरत पड़ती है। यह वैक्सीन तो छह-आठ माह में बना ली गई। हड़बड़ी से नुकसान हो सकता है। संभवत: इसीलिये एक जोन में एक बार में केवल 100 लोगों को डोज देने का निर्णय लिया गया है।

छत्तीसगढ़ में हर दिन करीब 2000 लोगों को वैक्सीन देने की तैयारी की गई है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन की यह घोषणा भी लोगों को उत्साहित नहीं कर सकी, जिसमें उन्होंने सभी को फ्री में वैक्सीन लगाने की बात कही थी। बिहार में तो भाजपा का यह एक चुनावी वायदा भी था। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे भाजपा का वैक्सीन बताते हुए लगवाने से मना कर दिया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि जनमानस में वैक्सीन के प्रति विश्वसनीयता बढ़ाने से ही टीकाकरण अभियान सफल हो सकता है। सरकारों के प्रतिनिधियों को सामने आना चाहिये। दूसरी ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कह दिया है कि वे वैक्सीन नहीं लगवायेंगे।

कोरोना वैक्सीन की विश्वसनीयता सौ फीसदी तय नहीं हुई है तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को ही क्यों इसके ट्रायल के लिये चुना जाये। सार्वजनिक स्थानों पर तो राजनेता ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। कोरोना का खतरा उन्हें भी तो है। क्यों नहीं उनसे ही वैक्सीन लगवाने की शुरूआत हो।

इस बार मेलों का क्या होगा?

माघ महीने में छत्तीसगढ़ में जगह-जगह मेले लगते हैं। आधुनिकता की चमक गांवों तक पहुंच चुकी है लेकिन मेलों का क्रेज खत्म नहीं हुआ। शिवरीनारायण जैसी जगहों पर तो मेला महीने भर का उत्सव होता है। पिछली बार मेले खत्म होने के कुछ दिन बाद कोरोना का प्रकोप फैलने लगा था। इसके बाद सभी धार्मिक स्थलों में ताले लग गये थे। नवरात्रि पर डोंगरगढ़, रतनपुर आदि में मेले लगा करते हैं, पर इस बरस नहीं लगे। माघ का मेला-झूला सिर्फ मनोरंजन और मेल-मिलाप का माध्यम नहीं बल्कि सैकड़ों लोगों के लिये रोजगार भी लेकर आता है। नये साल के आगमन पर कुछ शर्तों पर कार्यक्रम रखने की अनुमति दी गई थी, पर खुले में नहीं, जबकि मेले तो खुली जगह पर ही लगते हैं।


04-Jan-2021 5:04 PM 185

सीएम के सामने राहत की सांस

वैसे तो प्रशासनिक हल्कों में सीएम भूपेश बघेल की छवि कडक़ मिजाज नेता की है, लेकिन बिलासपुर में उनका मिजाज एकदम अलग रहा। जिला प्रशासन के अफसरों की सीएम से मुलाकात तो रविवार रात को ही होनी थी लेकिन सामाजिक संगठनों और कांग्रेसी नेताओं की भीड़ के चलते नहीं हो पाया।  आज सुबह चर्चा के लिए बुलाया गया, तो अधिकारी कर्मचारी दहशत में थे कि पता नहीं किस बात पर उन्हें फटकार मिले। कुछ के तो भरी ठंड में पसीने छूट रहे थे। मगर सीएम ने हाल में घुसते ही सब से कहा कि आप अपनी अपनी डायरी बाहर छोड़ कर आ जाइए। मतलब कि हम कोई निर्देश नहीं देने वाले हैं।

अफसरों को लगा कि विकास कार्यों में देरी पर उनसे सवाल किया जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री तो उनसे घर परिवार और बाल बच्चों का हाल चाल पूछने लग गए। एक नए नवेले प्रशिक्षु आईएएस सहायक कलेक्टर से उन्होंने पूछा शादी कब करोगे। उस अधिकारी ने कहा करूंगा, समय तो हो गया है। सीएम ने कहा छत्तीसगढ़ में  चांस लो।

एक डिप्टी कलेक्टर की जो बिलासपुर जिले के एक अनुभाग  में एसडीम के तौर काम कर रहे हैं उसने अपनी बारी आते ही खड़े होकर सबसे पहले बता दिया कि सर मेरी शादी हो गई है मैं शादीशुदा हूं। मुख्यमंत्री, गृह मंत्री और नगरी प्रशासन मंत्री ने ठहाके लगाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि तुमने तो मुझे शादी के बारे में  पूछने का मौका ही नहीं दिया। अब अपने बाल बच्चों के बारे में बताओ। एक महिला अधिकारी खामोश किनारे बैठी हुई थी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि तुम अपने बारे में क्यों नहीं बता रही हो। उस महिला अधिकारी ने कहा कि मेरा नाम ही  सूची में नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा तो क्या हुआ अपने बारे में बताओ। महिला अधिकारी ने बताया कि उसका मायका दुर्ग में है। उनके पिताजी एक नामी वकील थे। उस वकील को जानने के बारे में गृहमंत्री से बघेल ने चर्चा की। बिना डायरी कागज पेन के हुई इस बैठक में अधिकारी शामिल हुए और प्रफुल्लित मन से बाहर निकले। अब तक ऐसा होता रहा है कि उन्हें आदेश मिलता था और डायरी में  दर्ज करना पड़ता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ अधिकारियों को  मुख्यमंत्री का यह बर्ताव बहुत भाया।

पार्ट-2

सीएम से चर्चा के दौरान एक महिला लेबर अफसर ने बताया कि उनके पिता रतनपुर मंदिर में पुजारी हैं, लेकिन कोरोना की वजह से पिछले 8-9 महीने से काम बंद हो गया था। इस वजह से उन्हें (पिताजी) को काफी दिक्कत हुई। सीएम ने हंसते हुए कलेक्टर-एसपी की तरफ देखते हुए कहा कि ये सब इन्हीं लोगों की वजह से हुआ है। कोरोना ज्यादा कुछ नहीं था। फिर सीएम ने पूछा, अब ठीक हो गया है न। महिला अफसर ने कहा-हां सर। इसी बीच जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा किस सर मुझे आपसे दो मिनट का वक्त चाहिए अपनी बात रखने के लिए। मुख्यमंत्री ने कहा 2 मिनट तो दे दूंगा अपने क्लास के बच्चों की तरह 40 मिनट तो नहीं लेने वाले हो ना?

 दुखड़ा सुनाने पर...

भाजपा के असंतुष्ट नेता मौका मिलते ही प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी को अपना दुखड़ा सुनाने से नहीं चूक रहे हैं। इसी कड़ी में पार्टी में हाशिए पर चल रहे सच्चिदानंद उपासने भी पुरंदेश्वरी से मिलने पहुंचे, और उन्हें अपना परिचय दिया। उपासने ने कहा कि वे जिला अध्यक्ष, प्रवक्ता और प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर रहे हैं, लेकिन फिलहाल लूप लाइन में हैं। इस पर पुरंदेश्वरी ने कहा कि भाजपा में कोई लूप लाइन में नहीं रहता। हर कोई फ्रंट लाइन में रहता है।

दर्द जाता रहा

आईएफएस के 85 बैच के अफसर पीसी मिश्रा को निमोरा स्थित ग्रामीण विकास प्रशिक्षण संस्थान के पद पर संविदा नियुक्ति दी गई है। मिश्रा लंबे समय तक पंचायत में काम कर चुके हैं, और उन्हें काफी अनुभव भी है। पीसी मिश्रा के बैच के अफसर राकेश चतुर्वेदी हेड ऑफ फारेस्ट फोर्स हैं। कौशलेन्द्र सिंह भी पीसीसीएफ के पद से रिटायर हुए, लेकिन मिश्रा पीसीसीएफ नहीं बन पाए। विभाग ने उदारता नहीं दिखाई, और वे बिना पीसीसीएफ बने रिटायर हो गए।

 रिटायरमेंट की फेयरवेल पार्टी में पदोन्नति नहीं मिलने पर उनका दर्द छलक गया। अब जब निमोरा में ग्रामीण विकास संस्थान के पद के लिए अनुभवी और काबिल अफसर की तलाश की जा रही थी, तो सरकार की निगाह पीसी मिश्रा पर गई। मिश्रा ने फौरन ऑफर स्वीकार कर लिया। कई रिटायर्ड आईएएस-आईएफएस अफसर रिटायरमेंट के बाद सरकार में पद चाह रहे हैं, लेकिन उनकी हसरत पूरी नहीं हो पा रही है। ऐसे में मिश्रा को मनचाही मुराद मिल गई। उनका दर्द भी जाता रहा।


03-Jan-2021 4:57 PM 248

प्रदर्शन का क्या हुआ?

भाजपा संगठन में अंदरूनी खींचतान जारी है। नेताओं के आपसी झगड़े की वजह से कुछ तय कार्यक्रम भी नहीं हो पा रहे हैं। मसलन, पिछले दिनों सीएम के विधानसभा क्षेत्र पाटन में सांसद विजय बघेल अपने समर्थक कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में अनशन पर बैठे थे। पूर्व सीएम रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक समेत पार्टी के सांसद और विधायक वहां पहुंचे, और विजय बघेल का समर्थन किया।

चूंकि तीन दिन हो चुके थे, और शासन-प्रशासन की तरफ से कोई हलचल नहीं हो रही थी। इसलिए विजय बघेल के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए पार्टी नेताओं ने किसी तरह उन्हें मनाकर अनशन खत्म कराया। यह तय किया गया कि जल्द ही प्रदेश स्तर पर पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में एक बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा। हाल यह है कि बघेल के अनशन खत्म हुए महीनेभर हो चुके हैं, लेकिन पार्टी अब तक प्रदर्शन कार्यक्रम तय नहीं कर पाई है। विजय बघेल समर्थक कार्यकर्ता अभी भी जेल में हैं। वैसे भी दुर्ग-भिलाई में भाजपा संगठन के सभी बड़े नेताओं को एक मंच पर लाना बेहद कठिन माना जाता है।

लेकिन भाजपा की ही बात क्यों करें, दुर्ग जिला कांग्रेस के हिसाब से भी प्रदेश में सबसे भारी, सबसे जटिल जिला माना जाता है. हमेशा ही इसी एक जिले से कांग्रेस के सबसे अधिक मंत्री, पदाधिकारी रहते आये हैं. एक वक्त तो कांग्रेस की सबसे बड़ी गुटबाजी दुर्ग में ही चलती थी।

दिल्ली से आया मेरा दोस्त...

कांग्रेस के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी को उत्तरप्रदेश तैनात किया गया है। पार्टी की हालत यहां दीवालिया है, और सोनिया परिवार की प्रतिष्ठा इसी प्रदेश से जुड़ी हुई है। उन्होंने एक अनौपचारिक चर्चा के दौरान बताया कि यूपी के कांगे्रस नेताओं की समझ में यह बात आ ही नहीं पा रही है कि उन्हें दूसरे कांग्रेसियों से नहीं लडऩा है, उन्हें सपा, बसपा, और भाजपा से लडऩा है। कांग्रेस संगठन को लेकर उनका कहना था कि नेताओं की ताकत राहुल गांधी को मनाने में लग रही है कि वे पार्टी की लीडरशिप लेने तैयार हो जाएं। लेकिन अगर ऐसा नहीं भी होता है, तो भी पार्टी की प्रियंका गांधी से बड़ी उम्मीदें हैं।

अब इस महत्वपूर्ण पदाधिकारी की बातों का कोई वजन है, तो यह बात लगती है कि राहुल के अड़े रहने पर पार्टी के नेता प्रियंका के नाम को आगे बढ़ा सकते हैं।

दो चुनावों के बीच संगठन की बारी...

छत्तीसगढ़ अभी किसी भी किस्म के चुनाव से तीन बरस दूर है। तीन बरस बाद पहला चुनाव विधानसभा का होगा, और उसके बाद लोकसभा और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनाव। विधानसभा का छोटा सा सत्र निपट चुका है, और संसद ने लगने से इंकार कर दिया है। ऐसे में इस प्रदेश में दोनों प्रमुख दलों, कांग्रेस और भाजपा के लोग संगठन के काम में लगे हैं। कांग्रेस के पास तो सरकार के नाते भी कुछ काम है, लेकिन भाजपा के पास सिर्फ संगठन है। नतीजा यह है कि दोनों ही पार्टियों में संगठनों की बैठक चल रही हैं, संगठनों के जिला और ब्लॉक स्तर तक पदाधिकारी मनोनीत करने का सिलसिला चल रहा है। कुल मिलाकर दोनों पार्टियां अपना घर मजबूत कर रही हैं, यह दो चुनावों के बीच का इस काम का सही मौका भी है। फिर भाजपा में तो छत्तीसगढ़ के प्रदेश प्रभारी भी बदले गए हैं, और नए लोगों को पकड़ भी बनानी है। गैरचुनावी बरसों में संगठन की सांस चलती रहे, उसके लिए कुछ न कुछ किया जा रहा है। बीते बरसों में भाजपा ने देश भर में पार्टी ऑफिस बना लिए हैं, और अब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जिलों में कांग्रेस भवन बनाने में लगी है।

न्याय और अन्याय

जिस तरह से केंद्र सरकार ने धान उठाने पर पाबंदी लगाई है वह हैरान करने की बात है। छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले भी यह अनुरोध किया था कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के अलावा बाकी घोषणा के अनुरूप अतिरिक्त राशि केंद्र से मिल जाए। वह तो मिला नहीं, उल्टे अब यह कहा गया है कि समर्थन मूल्य से ज्यादा राशि देने के कारण धान नहीं उठाया जाएगा। किसी भी बहाने से किसानों के हाथ में कोई रकम दी जा रही है तो उस पर दिक्कत किसी को क्यों होनी चाहिए?  धान नहीं उठाने के एफसीआई के फरमान के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस गंभीर समस्या का कैसे समाधान करने वाली है।

टीका लगवाए न लगवाएं

मॉक ड्रिल के दौरान रायपुर में जिन दो लोगों को टीका लगवाया गया उनमें से एक की तबीयत बिगड़ गई और उसको तत्काल एंबुलेंस से हॉस्पिटल में दाखिल करना पड़ा। कोरोना वैक्सीन को लेकर के जितना उत्साह जिला प्रशासन और सरकार में दिखाई दे रहा है वह आम लोगों के बीच नहीं है। एक टीवी चैनल ने अभी-अभी एक सर्वे में बताया था कि लोगों को कोरोना के इलाज के अलावा कोरोना के वैक्सीन के भी साइड इफेक्ट को लेकर बड़ी चिंता है। यह रिपोर्ट तो यह कहती है कि 70 फ़ीसदी लोग कोरोना वैक्सीन लगावाना ही नहीं चाहते। मॉक ड्रिल में ही तबीयत बिगडऩे की खबर आना लोगों को और दहशत में डाल रहा है।


02-Jan-2021 3:58 PM 320

छांछ फूंकती कांग्रेस

मध्यप्रदेश में सरकार गंवाने के बाद कांग्रेस हाईकमान सतर्क हो गई है, और बाकी कांग्रेस शासित राज्यों में मध्यप्रदेश जैसी स्थिति न बन पाए, इस कोशिश में जुटी है। छत्तीसगढ़ में तो टूट-फूट की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बावजूद इसके हरेक विधायक से फोन पर अलग-अलग सरकार और संगठन को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है। इससे पहले तक हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट को ही अंतिम मानकर चलता था, लेकिन अब हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट पर ही निर्भर नहीं रहना चाहता है। कहावत है दूध का जला छांछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।

पास्को-आरोपी जिलाध्यक्ष !

भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों की सूची जारी हो रही है। दुर्ग संभाग के एक जिले में पास्को एक्ट के आरोपी को ही अल्पसंख्यक मोर्चे का जिलाध्यक्ष बना दिया गया। अगले महीने अल्पसंख्यक नेता की पेशी भी है। दिलचस्प बात यह है कि बधाई देने वालों में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के सदस्य यशवंत जैन भी हैं। चर्चा तो यह भी है कि यशवंत की सिफारिश पर नाबालिग से यौन दुव्र्यवहार के आरोपी को पदाधिकारी बनाया गया है। सोशल मीडिया में आरोपी पदाधिकारी बड़े नेताओं के साथ तस्वीर भी वायरल हुई है। अब इसकी शिकायत भी प्रदेश कार्यालय को भेजने की तैयारी है। देखना है कि पार्टी इस मामले में क्या कदम उठाती है।

ऑनलाइन के भरोसे होगी बोर्ड परीक्षा?

सीबीएसई की परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने कर दिया है। इधर छत्तीसगढ़ में तारीखें अब तक तय नहीं की गई है। हालांकि यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सीबीएसई की तरह दो तीन माह आगे खिसकाकर  छत्तीसगढ़ में भी परीक्षा ली जायेगी। पर इतना भी आगे नहीं किया जायेगा कि अगले सत्र की समय-सारिणी बिगड़ जाये। परीक्षाओं की संभावनाओं को देखते हुए छात्र-छात्राओं में तनाव बढऩे लगा है। ऑनलाइन पढ़ाई से शिक्षक और पालक क्या खुद छात्र भी संतुष्ट नहीं हैं। जो समर्थ हैं वे कोचिंग का सहारा ले रहे हैं। पर जिनकी क्षमता नहीं है वे पिछड़ गये हैं। वे सक्षम बच्चों से बराबरी नहीं कर पायेंगे।

पिछले कई वर्षों से देखा गया है ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे, सरकारी स्कूलों में पढक़र, कम संसाधनों के बावजूद अच्छे नतीजे दे रहे हैं। बीते सत्र में 10वीं और 12वीं दोनों ही कक्षाओं के टॉपर ग्रामीण स्कूलों के विद्यार्थी थे। केन्द्रीय मंत्री ने साफ कर दिया है कि बोर्ड परीक्षा ऑनलाइन आयोजित नहीं की जायेगी। यह मुमकिन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी परीक्षायें ऑफ लाइन ही होंगीं।

मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए कक्षायें शुरू कर दी गई हैं पर छत्तीसगढ़ में अब तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं दिखाई दे रही है।  बोर्ड परीक्षाओं में यदि समर्थ और वंचित विद्यार्थियों के बीच बराबरी की प्रतियोगिता रखनी है तो कक्षाओं को कुछ दिनों के लिये शुरू किया जाना जरूरी है।

लो अब गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई

गोबर की सरकारी खरीदी ने इसे लेकर लोगों की सोच में बड़ा बदलाव लाया है। गांवों में गैस सिलेन्डर पहुंचने के बाद इसका कंडे के लिये इस्तेमाल करना भी बंद हो गया था। खाद भी बाजार से खरीद लिया जाता रहा है। इस बीच ख़बरें आई हैं कि गोबर से कुछ लोगों को इतनी कमाई कर ली कि वे कच्चे घरों की पक्की मरम्मत करा रहे हैं और बाइक जैसे साधन भी खरीद रहे हैं। खाद बनाने का काम तो गोठानों में चल ही रहा है, अब गोबर की लकडिय़ां बनाने की मशीन भी आ गई है। इन लकडिय़ों का दाह-संस्कार करने में इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ शहरों नें नगरीय निकायों ने ठंड से बचाव के लिये अलाव जलाने का काम भी गोबर की लकडिय़ों से किया है।

अम्बिकापुर से तो ख़बर है कि वहां गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई है। इसे ‘गोबर एम्पोरियम’ नाम दिया गया है। दावा है कि इससे पेड़ों का काटने की नौबत कम आयेगी। जब गोबर खरीदी की योजना छत्तीसगढ़ में लाई गई तो खूब मजाक उड़ा। विरोधी दलों ने कहा कि पढ़े लिखे बेरोजगारों को नौकरी देने की जगह सरकार गोबर बीनने के काम में लगा रही है। लेकिन अब, जैसा कि विभाग के मंत्री ने दावा किया है, दूसरे राज्यों से भी इस योजना के बारे में पूछताछ हो रही है।

धान खरीदी का बंद हो जाना

धान खरीदी के मामले में पैदा हुए अभूतपूर्व संकट का सबसे ज्यादा किसानों को नुकसान हो रहा है। प्राय: सभी जिलों से खबर आ रही है कि धान का उठाव नहीं होने के कारण खरीदी रुक रही है। सरकारी तौर पर इसे घोषित तो नहीं किया गया है पर सोसाइटी में धान पहले ही से इतना जाम है कि अघोषित रूप से खरीदी बंद कर दी गई है। अकेले बिलासपुर जिले में 10 लाख क्विंटल धान जाम होने की खबर है।

राज्य सरकार का कहना है कि हर साल एफसीआई नवंबर महीने में ही धान का उठाव करने का पत्र जारी कर देती है पर इस बार जनवरी महीना आ गया, उठाव न तो शुरू हुआ है न ही इस बारे में कोई आश्वासन दिया गया है। राज्य सरकार का यह भी कहना है कि केन्द्र सरकार ने आश्वासन के मुताबिक बारदाने नहीं दिये। राइस मिलर्स को पुराने बारदाने लौटाने कहा गया पर वे फटे हुए हैं, समिति प्रबंधकों को इनकी मरम्मत करने में पसीना बहाना पड़ रहा है। किसान अपने खर्च से बारदाने की व्यवस्था कर रहे हैं।

बताया जा रहा है, राजीव न्याय योजना के अंतर्गत धान पर समर्थन मूल्य के अतिरिक्त दी जाने वाली राशि को लेकर केन्द्र को आपत्ति है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे केन्द्र की योजना किसान सम्मान निधि की तरह बताया है। प्रदेश में 2500 रुपये क्विंटल से हो रही धान खरीदी ने बाकी फसलों के प्रति किसानों की रुचि कम कर दी है। जबकि बस्तर, सरगुजा और दूसरे इलाकों में गन्ना, आलू जैसी ज्यादा लाभकारी फसलें भी ली जा रही हैं। हो सकता है कि धान के उठाव का संकट दो चार दिनों में खत्म हो जाये पर वह स्थायी समाधान नहीं है। समस्या हर साल खड़ी होने वाली है।

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने फसल चक्र परिवर्तन का अभियान चलाया था। उनकी सरकार के जाने के बाद इस पर आगे काम नहीं हुआ। अब वक्त है कि धान के अलावा दूसरी फसलें लेने पर विचार किया जाये। और सरकार इन फसलों को धान की तरह ही अच्छी कीमत देकर प्रोत्साहित करे। 

कोरोना के अलग हुई मौतें

जब कोई बड़ी चोट लगती है तो लोग पहले की तकलीफ भूल जाते हैं। साल 2020 में कोरोना ने इतना दर्द दिया कि लोग बाकी बीमारियों, मौतों को मामूली समझने लगे। पर दरअसल ऐसा हुआ नहीं। सरगुजा जिले से एक रपट है कि वहां बीते सालभर में हुए हादसों में 650 से ज्यादा लोगों की जान गई। ये वे मौतें हैं जिनमें पोस्टमार्टम कराने की नौबत आई। ज्यादातर सडक़ हादसे हैं। अम्बिकापुर में ही सामान्य मौतों की संख्या तो करीब 2300 है जो श्मशान गृह और नगर निकाय के दस्तावेजों में दर्ज हैं। और इन सबके बीच कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम केवल 90 है।

इससे मिलता-जुलता आंकड़ा दूसरे जिलों का भी हो सकता है। कोरोना से बचाव के लिये हर जिले में करोड़ों रुपये की नई स्वास्थ्य सुविधायें, संसाधन उपलब्ध कराये गये। अभियान चला अर्जेंट और इमरजेंसी मोड पर। शुक्र है, अब कोविड अस्पतालों के बिस्तर दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये काम आयेंगे क्योंकि हर जिले में प्राय: 75 प्रतिशत बेड खाली हो चुके हैं। बात ये है कि कोरोना से भी ज्यादा लील लेने वाले सडक़ हादसों को रोकने के लिये भी ऐसी ही कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई जाती?  सडक़ों में सही संकेतक हों, लोग हेलमेट पहने, ओवरस्पीड न चलें, शराब पीकर न चलें, वैध ड्राइविंग लाइसेंस रखें, गड्ढ़ों को ठीक करें। शायद यह बंदोबस्त कोरोना पर किये गये खर्च से भी कम बजट में हो जायेगा।


01-Jan-2021 5:24 PM 283

भगवाधारी कुलपति

वैसे तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेवभाई शर्मा को आरएसएस के विचारक के रूप में जाना जाता है। वे आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक भी रहे, और जब राज्यपाल ने सरकार की सिफारिशों को नजरअंदाज कर बलदेवभाई शर्मा को कुलपति नियुक्त किया, तो काफी हल्ला मचा। इसके बाद से ही बलदेवभाई शर्मा अपने को निष्पक्ष बताने की कोशिश में जुटे रहे।

सुनते हैं कि सरकार के करीबी लोगों को अलग-अलग माध्यमों से वे लगातार यह बता रहे थे कि उनका कोई एजेंडा नहीं है, और न ही आरएसएस से भी सीधा कोई नाता है। मगर नए साल में लोग उस वक्त हक्का-बक्का रह गए, जब वे भगवा पोशाक पहनकर विवि पहुंचे। प्रदेश के दूसरे विवि विद्यालयों में आरएसएस अथवा भाजपा से जुड़े कुलपति हैं, मगर इस तरह का पहनावा कभी किसी का नहीं रहा। बलदेवभाई चाहे कुछ भी कहे, लेकिन कपड़े के रंग से उनकी सोच जाहिर हो ही गई।

भाजपा में सौदान की जगह शिव

आखिरकार अ_ारह बरस बाद सौदान सिंह की छत्तीसगढ़ से बिदाई हो गई। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर चंडीगढ़ भेजा गया, और उनकी जगह बंगाल में संगठन का काम देख रहे शिवप्रकाश को अन्य राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार दिया गया है। सौदान सिंह  के छत्तीसगढ़ से हटने की खबर सोशल मीडिया में छाई रही। पार्टी के कुछ लोगों ने उन्हें फेसबुक पर जमकर कोसा, और छत्तीसगढ़ में भाजपा की दुर्दशा के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा दिया। अंदर की खबर यह है कि प्रदेश के ज्यादातर सांसद उनके खिलाफ मुखर थे, और राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से शिकायत भी की थी।

वैसे तो विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही उन्हें हटाने की मांग जोर पकडऩेे लगी थी। भाजपा विधायक दल के नेता के चयन के बाद से पार्टी के एक खेमे ने तो सौदान सिंह से राजनीतिक चर्चा करना भी बंद कर दिया था। सौदान सिंह पर गुट विशेष को संरक्षण देने का आरोप लगते रहा है। कुछ लोग याद करते हैं कि वर्ष-2002 में जब वे छत्तीसगढ़ आए, तब सबको साथ लेकर चलने पर जोर देते थे। उस समय सौदान सिंह के प्रदेश महामंत्री (संगठन) पद पर होने के बाद भी एकतरफा फैसले नहीं लेते थे। हालांकि उस समय प्रदेश भाजपा में लखीराम अग्रवाल, बलीराम कश्यप, दिलीप सिंह जूदेव, ताराचंद साहू और रमेश बैस जैसे बड़े नेता मौजूद थे। रमन सिंह के साथ सौदान सिंह की तालमेल बढिय़ा रहा। मगर वे रमन विरोधी नेताओं को साध नहीं सके।

लखीराम, बलीराम, दिलीप सिंह जूदेव के निधन और फिर ताराचंद साहू के पार्टी से बाहर चले जाने के बाद सौदान सिंह की पार्टी में पकड़ मजबूत होती चली गई। संघ की पृष्ठभूमि से आए सौदान सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी दी गई, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका मोह नहीं छूटा।

जिलाध्यक्ष तक की नियुक्तियों में सौदान सिंह का सीधा दखल रहता था। प्रदेश और जिला संगठन में नियुक्ति के बाद तो असंतुष्ट नेताओं ने उनके खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया था। नई प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी रायपुर आई, तो कुछ बड़े नेताओं ने मौका पाकर सौदान सिंह के खिलाफ शिकायतें की। वाट्सअप पर प्रदेश प्रभारी को लगातार जानकारी दी जाने लगी थी। पार्टी के भीतर आदिवासी नेता नंदकुमार साय की अगुवाई में लामबंद हो गए थे, और उन्होंने पिछलेेेे दिनों खुले तौर पर बैठक भी की थी। इससे भी पार्टी हाईकमान के कान खड़े हो गए। नंदकुमार साय समेत ज्यादातर पार्टी के बड़े आदिवासी नेता सौदान सिंह के धुर विरोधी माने जाते हैं।

चर्चा है कि पार्टी ने भविष्य में संभावित नुकसान से बचने के लिए सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजने का फैसला लिया। बताते हैं कि कुछ साल पहले भी सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के दायित्व से मुक्त करने की कोशिश की गई थी, उस वक्त सौदान सिंह मोबाइल पार्टी दफ्तर में जमा कर अपने गांव चले गए थे। बाद में उन्हें किसी तरह मनाया गया। मगर इस बार पार्टी ने प्रचारक के दायित्व से भी मुक्त कर बड़ा फैसला ले लिया। देखना है कि प्रदेश भाजपा में फैसले का क्या असर होता है।

छापे वाले सेल्फी लेने में लग गए

कोरोना संक्रमण के चलते वैसे तो न्यू ईयर पार्टी पर रोक लगी थी। लेकिन रायपुर के तकरीबन सभी बड़े होटलों में न सिर्फ पूरी रात पार्टी चली, बल्कि जाम भी छलके। एक होटल में तो बकायदा आबकारी अमला पहुंच भी गया था। पार्टी में शामिल लोग थोड़ी देर सहम गए, और जाम से भरी गिलास इधर-उधर छिपाने की कोशिश करने लगे। मगर थोड़ी देर में नजारा बदल गया, जो अमला छापा मारने के लिए आया था वह पार्टी में मशगुल हो गया। एक महिला अफसर तो सेल्फी लेते नजर आई। फिर क्या था, उत्साह दोगुना हो गया। वैसे भी खुशी मनाने का हक सबको होता है।

तथाकथित पैसेवाले, पढ़े-लिखे

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस वार्ड में लोगों ने सफाई की मुहिम छेडऩे वाले अमर बंसल को पार्षद बनाया, उस वार्ड में लोगों की नालायकी का हाल यह है कि थोक में दारू पीकर खाली बोतलें नाली में बहा देते हैं, और बोतल खाली होने की वजह से पानी पर तैरती हुई नाव की तरह जाकर कहीं फंस जाती है। चूंकि लोगों के घरों से कचरा उठाया जा रहा है, रोज दो बार उठाया जा रहा है, इसलिए यह मस्ती छाई हुई है। अगर विकसित और सभ्य देशों की तरह नाली और सडक़ किनारे फेंके गए कचरे की छानबीन करके किसी बिल या रसीद, या किसी कागज के सहारे ऐसे नालायक लोगों तक पहुंचा जा सकता, तो उनके पोस्टर सडक़ किनारे लगाने चाहिए।

दरअसल जब तक सफाई करने के लिए दलित समुदाय के गरीब लोग जिंदा हैं, तब तक ऐसी आपराधिक गैरजिम्मेदारी दिखाना लोग अपना हक समझते हैं। रात-दिन सफाई कर्मचारी नालियों में उतरकर अपनी जिंदगी घटाते हैं, और इस सहूलियत की वजह से लोग नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। किसी बारात में आए हुए मेहमानों की तरह वार्ड के लोगों की ऐसी खातिर भी जायज नहीं है जो दलितों की जिंदगी नाली में ही तय कर दे।

जो लोग सस्ती दारू की दुकानों पर गरीबों की भीड़ को हिकारत से देखते हैं, उन्हें नालियां जाम करने वाले ये महंगे ब्रांड देखने चाहिए जो कि तथाकथित पैसे वाले, और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग ही पी रहे हैं।

सुना है कि दारू पीने से सबके लीवर खराब नहीं होते, जो नालियों को इस तरह पाटते हैं, उन्हें सफाई कर्मचारियों की बद्दुआ लगती है, और उसी से लीवर खराब होता है, दारू नाहक ही बदनाम होती है।

कैदियों के लिये कोरोना खत्म

नये साल पर हर कोई खुशी की उम्मीद करता है। पर पैरोल पर छूटे कैदियों के नसीब में ये नहीं है। ओवर क्राउडेड जेलों में जब कोरोना फैलने का खतरा दिखा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट जज की अनुवाई में, प्रदेश में भी एक समिति बनी और ऐसे कैदियों, विचाराधीन बंदियों को पैरोल पर छोड़ा गया जिनकी कुल सजा 7 साल या उससे कम है। छत्तीसगढ़ में ऐसे मामले करीब 4 हजार थे। इनको बार-बार राहत दी गई। मार्च के आखिरी सप्ताह से लेकर जो छूटे तो रिहाई का वक्त बढ़ता गया। वे अब तक इसका फायदा उठा रहे थे। पर यह अवधि 31 दिसम्बर को खत्म हो गई है। यानि एक जनवरी 2021 की सुबह से इन्हें जेलों में हाजिरी देकर वापस बैरक में चले जाना है। आज दोपहर तक यह आंकड़ा नहीं मिला कि कितने कैदी ईमानदारी के साथ वापस जेलों में बंद होने के लिये खुद से पहुंच गये। हो सकता है कि कुछ लोग जेलों में लौटना मंजूर न करें और बाहर रहकर अपने खिलाफ एक और मुकदमा दर्ज होने के लिये तैयार रहें। एक सजायाफ्ता ने कोरोना खत्म नहीं होने और जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। उसे राहत मिली, पर सिर्फ 6 जनवरी तक के लिये।


31-Dec-2020 4:44 PM 242

पासवान की कमी खल रही है...

रामविलास पासवान के नहीं रहने से छत्तीसगढ़ को नुकसान उठाना पड़ रहा है। पासवान मोदी सरकार में खाद्य महकमा संभालते थे। वे विशेषकर छत्तीसगढ़ धान खरीदी से जुड़ी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए तत्पर रहते थे। मगर उनके गुजरने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार को धान खरीद में गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी विपरीत स्थिति छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से नहीं बनी।

दरअसल, केन्द्र ने सितंबर माह में ही 60 लाख मीट्रिक टन चावल लेने के लिए राज्य को सहमति की चि_ी जारी कर दी थी। मगर एफसीआई को लेने के आदेश जारी नहीं किए। अब हाल यह है कि चावल जमा नहीं होने से मिलिंग नहीं हो रही है, और खरीदी केन्द्रों में धान जाम है। 20 फीसदी केन्द्रों में धान खरीद बंद हो चुकी है। अगले एक हफ्ते में तो पूरे प्रदेश में धान खरीद व्यवस्था चरमराने के आसार दिख रहे हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार पिछले दो-तीन महीनों से धान खरीदी व्यवस्था बेहतर हो, इसके लिए भरपूर कोशिश कर रही है। सरकार ने पासवान की जगह खाद्य महकमा संभालने वाले पीयूष गोयल को चावल लेने के लिए एफसीआई को निर्देश देने का आग्रह किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हल्ला यह है कि पीयूष गोयल की तरफ से जानबूझकर दिक्कतें पैदा की जा रही है। गोयल, राज्य भाजपा के बड़े नेताओं के संपर्क में भी रहते हैं।

चर्चा तो यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भूपेश सरकार की किसान हितैषी छवि बनने से भाजपा के लोग परेशान हैं, क्योंकि अकेले छत्तीसगढ़ में सरकार 25 सौ रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदती है। ऐसे में गोयल के मार्फत धान खरीद में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश हो रही है। मगर यह सच न भी हो, लेकिन सहमति के बाद भी औपचारिक रूप से एफसीआई को चि_ी जारी करने में चार माह की देरी होने से कुछ शंका जरूर पैदा होती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के लोग पासवान को याद कर रहे हैं, जो कि कांग्रेस के नहीं थे, लेकिन बिना भेदभाव के राज्यों को सहयोग करने के लिए तैयार रहते थे।

अफसर इधर-उधर

साल खत्म होने के पहले दर्जनभर से अधिक आईएएस अफसरों को इधर से उधर किया गया। इसमें कुछ को बेहतर पोस्टिंग मिली है। मसलन, मरवाही जीत के बाद जीपीएम कलेक्टर डोमन सिंह और जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को बेहतर पोस्टिंग मिलना अपेक्षित था। डोमन सिंह को महासमुंद कलेक्टर बनाया गया है। डोमन सिंह ने अमित जोगी-ऋचा जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर कड़ा और बड़ा फैसला दिया था। इसी तरह वहां के जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को राजनांदगांव जैसे बड़े जिले में पदस्थ किया गया।

नांदगांव जिला पंचायत सीईओ तनुजा सलाम के खिलाफ कई शिकायतें थीं। जिले के प्रभारी मंत्री भी उनके कामकाज से नाखुश थे। उनका हटना तय माना जा रहा था। इससे परे महासमुंद कलेक्टर कार्तिकेय गोयल को हटाकर एमडी मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन बनाया गया है। गोयल की छह माह पहले ही महासमुंद पोस्टिंग हुई थी। उनका कामकाज भी ठीकठाक ही रहा है। इतनी जल्दी उन्हें बदलने का कोई कारण समझ नहीं आया। अलबत्ता, लंबे समय से प्रतीक्षारत धर्मेश कुमार साहू को आखिरकार कलेक्टरी का मौका मिल गया। उन्हें नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया। फेरबदल में दुर्ग कमिश्नर के पद पर भी पोस्टिंग की उम्मीद जताई जा रही थी। दुर्ग कमिश्नर टीएस महावर आज रिटायर हो रहे हैं। चर्चा यह भी है कि आज-कल में एक छोटी सूची और निकल सकती है।

रिश्वतखोरी पर थोक में एक्शन

यह दूसरा मौका है जब एसीबी ने एक साथ तीन चार जगह छापेमारी कर रिश्वत रिश्वत लेने के मामलों में गिरफ्तारी की है। इसके पहले जुलाई माह में एक ही दिन एक साथ चार कर्मचारी, अधिकारी पकड़े गये थे। इनमें एक बेमेतरा की महिला पटवारी थी, जिसे एक जमीन के कागजात के नाम पर 7 हजार रुपये लेते पकड़ा गया था। बिलासपुर जिले के भरौदा में विकास कार्यों के लिये मिली राशि को जारी करने के लिये 35 हजार रुपये की रिश्वत लेते जिला पंचायत के समन्वयक को पकड़ा गया था। साथ ही इसी दिन सूरजपुर के बीईओ को 30 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया था। अब बुधवार को भी कार्रवाई हुई है। रामचंद्रपुर के जनपद सीईओ को 60 हजार रुपये की रिश्वत लेते, सिगमा में आरईएस के एक सब इंजीनियर को 12 हजार रुपये लेते हुए तथा नारायणपुर जिले में शिक्षा विभाग के एक बाबू को 10 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।

एक साथ रेड मारने का फायदा यह होता है कि रिश्वत लेने वालों को सतर्क होने का मौका नहीं मिलता। एसीबी को वाहवाही भी खूब मिल जाती है।

कुछ माह पहले सीएम ने समीक्षा बैठक की थी तब भी यह बात सामने आई थी कि दर्जनों अफसरों के खिलाफ विभागीय मंजूरी नहीं मिलने के कारण आर्थिक अपराध के चालान पेश नहीं हो पाये हैं। सजा तो और भी कम लोगों को मिल पाती है। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पकड़े गये हैं, पर चालान रुका हुआ है। कुछ प्रकरणों में ये पकड़े गये तो खूब सनसनीखेज घटना के तौर पर सामने आई, पर अधिकारी कुछ साल बाद बरी होकर वापस अपनी ड्यूटी पर वरिष्ठता के साथ वापस पहुंच गये। छापे और रिश्वतखोरों को धरे जाने की खबर तो खूब मिल जाती है पर कितनों का चालान पेश हुआ और ब्यूरो कितने लोगों को सजा दिलाई, ये जानकारी भी तो एसीबी को देते रहना चाहिये। 

बस संचालकों से हमदर्दी...

रेलवे ने ट्रेन किराये में वृद्धि स्पेशल के नाम पर की है तो बसों में अघोषित रूप से किराया ज्यादा वसूल किया जा रहा है। खासकर लम्बी दूरी के यात्रियों से। बस्तर, रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा और जशपुर जिलों से चलने वाली अंतर्राज्यीय बसों का किराया अघोषित रूप से 25 से 50 प्रतिशत अधिक वसूल किया जा रहा है। बसों और बस स्टैंड में किराया सूची लगाने का फरमान है पर ज्यादातर जगहों पर इसका पालन नहीं हो रहा है। लगातार शिकायतों के बाद खानापूर्ति के लिये एक दो कार्रवाई कर दी जाती है। शायद कोरोना काल में बसों का संचालन बंद होने का असर सिर्फ बस ओनर्स पर ही नहीं, परिवहन विभाग पर भी पड़ा है। बस संचालक लगातार नुकसान होने की फरियाद करते रहे हैं, इसलिये उन्हें अभी ढील दी गई है। पर यात्री भी तो उसी कोरोना के कारण मंदी के शिकार हुए हैं। हमदर्दी उनके लिये क्यों नहीं?

खरीदी केन्द्र में एसडीएम का आपा खोना

धान खरीदी में आ रही दिक्कतों के चलते हर कोई परेशान है। किसान तो इसे भुगत ही रहा है, खरीदी केन्द्रों के कर्मचारी, फूड, मार्कफेड के अधिकारी और इन सब पर निगरानी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों पर भी अलग तरह का दबाव बना हुआ है। छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अधिकारी, धान खरीदी की प्रक्रिया में लगे हर किसी की भूमिका बड़ी है। पर लोरमी के एसडीएम ने यह बात नहीं समझी और अव्यवस्था देखकर आपा खो दिया।

आरोप है कि न केवल उन्होंने खुडिय़ा में धान खरीदी केन्द्र के प्रभारी के साथ मारपीट की बल्कि अपने गार्ड से भी उसे पिटवाया। मारपीट से व्यवस्था तो सुधरनी थी नहीं, तो ऐसा ही हुआ। पूरे मुंगेली जिले में कर्मचारी हड़ताल पर चले गये। वे एसडीएम को हटाने की मांग कर रहे हैं। कुछ कर्मचारी संगठन भी उनके समर्थन में आ गये हैं। इधर पूरे जिले में धान की खरीदी बंद कर दी गई है। दो दिन खरीदी बंद रहने से हड़बड़ाये जिला प्रशासन ने तहसीलदार और उनके मातहतों को खरीदी शुरू करने कहा है, पर उनसे व्यवस्था नहीं संभल रही है।

किसान वैसे भी टोकन, बोरी, अपनी बारी आने के इंतजार में पस्त हो गये हैं पर एक अधिकारी की नासमझी से व्यवस्था और बिगाड़ दी है। अब कलेक्टर पर है, वे क्या रास्ता निकालते हैं। उन्होंने जांच के बाद कार्रवाई की बात कही है। पर, जांच नायब तहसीलदार से कराई जा रही है, जो उनके अधीन काम करते हैं। क्या एसडीएम की कोई गलती नजर आयेगी?

2020 की एबीसीडी

हिन्दुस्तान के जो प्रमुख उद्योगपति ट्विटर पर लगातार सक्रिय रहते हैं उनमें हर्ष गोयनका भी शामिल हैं। उन्होंने आज दोपहर 2020 के सबसे चर्चित और प्रचलित शब्दों से एबीसीडी बनाकर पोस्ट की है। 

Harsh Goenka
A rnab Goswami
B lack lives matter
C ovid
D istancing
E lections
F armer protest
G reen
H erd immunity
I PL
J oe Biden
K angana
L ockdown
M ask
N RC
O nline
P andemic
Q uarantine
R emote working
S ushant Rajput
T rump
U nemployment
V accine
W FH
X enophobia
Y awn
Z oom call