राजपथ - जनपथ

Date : 20-Apr-2019

प्रदेश में दूसरे चरण की सीटों में जमकर पोलिंग हुई। सबसे अच्छी बात यह रही कि तीनों लोकसभा क्षेत्रों में कहीं भी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। शांतिपूर्वक मतदान को एक जिले में प्रशासन के आला अफसरों ने सेलीब्रेट भी किया। जिला प्रशासन के मुखिया और जिला पंचायत के सीईओ मतदान खत्म होने के बाद अपनी पत्नियों को साथ लेकर स्ट्राँग रूम पहुंचे और उन्हें पूरा इंतजाम समझाया। 

स्ट्राँग रूम में निर्वाचन से बाहर के लोगों का प्रवेश वर्जित रहता है। विधानसभा चुनाव में इसको लेकर बखेड़ा भी खड़ा हो गया था, लेकिन अफसरों ने इसका ध्यान नहीं रखा। इतना ही नहीं, ईवीएम जमा होने के बाद वहां खान-पान का दौर भी चला। एक तरह से मतदान के थकाऊ माहौल के बीच प्रशासनिक अफसरों ने पिकनिक मनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।  खैर, इसकी मौखिक शिकायत ऊपर तक पहुंच गई है। देखना है आगे क्या होता है। 

तर्क तो था, पर बड़ा बेहूदा...

भाजपा के प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने पिछले दिनों पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं के साथ बैठक कर रायपुर और दुर्ग के पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति की समीक्षा की। चर्चा में यह बात आई कि रायपुर के अभनपुर विधानसभा सेे पार्टी प्रत्याशी सुनील सोनी को सर्वाधिक बढ़त मिलेगी। अनिल जैन ने इसका कारण पूछा, तो उन्हें एक नेता ने बताया कि अभनपुर में पार्टी के दो बड़े नेता चंद्रशेखर साहू और अशोक बजाज जमकर मेहनत कर रहे हैं। दोनों को उम्मीद है कि अभनपुर विधानसभा के उपचुनाव होंगे और उन्हें चुनाव मैदान में उतरना पड़ सकता है। साहू और बजाज अपनी तैयारी कर रहे हैं। अनिल जैन ने जानना चाहा कि आखिर अभनपुर में विधानसभा के उपचुनाव क्यों होंगे? इस पर उन्हें बताया गया कि अभनपुर के कांग्रेस विधायक धनेंद्र साहू, महासमुंद लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनके लोकसभा चुनाव जीतने के बाद स्वाभाविक तौर पर उन्हें विधानसभा की सीट छोडऩी पड़ेगी। ऐसे में यहां उपचुनाव होगा। इस पर अनिल जैन नाराज हो गए और कहा कि हम महासमुंद का चुनाव जीत रहे हैं। अभनपुर में विधानसभा उपचुनाव की नौबत नहीं आएगी। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 19-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के समय हमने ग्यारह ऐसी सीटों की लिस्ट छापी थी जो कि राज्य में बार-बार सरकार चुनती हैं, और नतीजों ने फिर साबित किया कि इन ग्यारह में से नौ सीटों ने इस चुनाव में कांग्रेस को चुना था। अब देश भर में लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं, और चुनाव के गणितज्ञ एक बार फिर हिसाब लगा रहे हैं कि ऐसी बेलवैदर सीटें कौन-कौन सी हैं जो कि अधिकतर वक्त दिल्ली में सरकार बनाने वाली पार्टी को ही चुनती हैं? 

चुनावी नतीजों के आंकड़ों से इन सीटों को निकालना बड़ा मुश्किल भी नहीं है। 1977 से लेकर 2014 के बीच में कुछ सीटें ऐसी थीं जिन्होंने बार-बार सरकार चुनीं। इस दौर के तमाम ग्यारह लोकसभा चुनावों में जिन सीटों ने हर बार दिल्ली में सरकार बनाईं, ऐसी दो ही सीटें थीं। एक तो गुजरात की वलसाड, और दूसरी दिल्ली की पश्चिम दिल्ली। जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में दस बार सरकार बनाईं वे थीं महाराष्ट्र की बीड़, चंडीगढ़, हरियाणा की फरीदाबाद और गुडग़ांव, दिल्ली की उत्तर-पश्चिम दिल्ली, झारखंड की पलामू और रांची, मध्यप्रदेश की शहडोल सीटें। 

1977 से लेकर 2014 के बीच जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में से नौ बार सरकार बनाईं वे हैं- गुजरात की बनासकांठा, जामनगर, जूनागढ़, और पोरबंदर। राजस्थान की भीलवाड़ा, गंगानगर। पूर्वी दिल्ली, हरियाणा की करनाल, और कुरूक्षेत्र। मध्यप्रदेश की खंडवा और मंडला। उत्तरप्रदेश की कुशीनगर और वाराणसी। हिमाचल की मंडी। महाराष्ट्र की नासिक। बिहार की पश्चिम चम्पारण। ओडिशा की सुंदरगढ़ सीटें। 

अब ऐसी सीटों पर इस चुनाव में भी पार्टियों के आसार देखकर नतीजों का अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस सीट ने हर बार विजेता पार्टी को चुना है, ऐसी दो सीटों में से एक पश्चिम दिल्ली है, जो कि पूरी तरह शहरी सीट है, और दूसरी गुजरात की वलसाड है जो कि आदिवासी आरक्षित सीट है। एक तरफ पश्चिम दिल्ली देश के सबसे संपन्न लोगों की सीट है, तो दूसरी तरफ वलसाड ऐसी है जिसके दो प्रमुख जिलों में से एक डांग, देश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है। 

विधानसभा चुनावों के नतीजे आने पर ग्यारह दिसंबर को छत्तीसगढ़ में यह साफ हुआ था कि जो ग्यारह सीटें बार-बार राज्य सरकार चुनती हैं, उनमें से दस सीटों पर कांग्रेस जीती थी, और राज्य में उसी की सरकार बनी। ये ग्यारह सीटें थीं- जशपुर (पिछली तीन सरकारें), बिलासपुर (पिछली तीन सरकारें), अहिवारा (पिछली तीन सरकारें), बेलतरा (पिछली तीन सरकारें), कुनकुरी (पिछली चार सरकारें), धरसीवां (पिछली चार सरकारें), नारायणपुर (पिछली चार सरकारें), नवागढ़ (पिछली पांच सरकारें), डोंगरगढ़ (पिछली पांच सरकारें), बीजापुर (पिछली छह सरकारें), और जगदलपुर (पिछली नौ सरकारें), चुनने वाली सीटें थीं। इस बार के चुनाव में भी इनमें से कुल एक सीट बेलतरा ऐसी थी जिस पर भाजपा जीती, और ग्यारह में से बाकी तमाम दस सीटों ने राज्य के विजेता को चुनने की परंपरा को जारी रखा था। 

वोटों के बाद बस्तर का हिसाब
प्रदेश की चार लोकसभा सीटों पर मतदान हो चुका है। यहां मतदान के बाद नतीजों को लेकर दोनों ही मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस आशान्वित हैं। विधानसभा में बुरी हार के बाद भाजपा ने सभी सांसदों की टिकट काटकर सारे के सारे नए चेहरों पर दांव लगाया है। जिन चार सीटों, बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में मतदान हुआ है, वहां कांटे की टक्कर देखने को मिली है। 

बस्तर में दंतेवाड़ा विधायक भीमा मण्डावी की हत्या के बाद दंतेवाड़ा शहर, बचेली और आसपास सहानुभूति का माहौल था। चुनाव के शुरूआती दौर में भाजपा एकदम पिछड़ी दिख रही थी वह प्रचार खत्म होने तक कड़े मुकाबले तक ले आई। फिर भी यहां कांग्रेस बेहतर स्थिति में रही। कांकेर में भी भाजपा और कांग्रेस, दोनों के प्रत्याशियों की साख अच्छी है। ऐसे में मतदाताओं के लिए दोनों में से एक को चुनना काफी कठिन था। कांकेर लोकसभा के बालोद इलाके में पीएम की सभा भी हुई। यह इलाका कांग्रेस के लिए मजबूत रहा है। फिर भी  मुकाबला मतदान तक काफी कड़ा हो गया था। इन सबके बावजूद बस्तर संभाग की दोनों लोकसभा सीट पर कांग्रेस को बड़े फायदे की उम्मीद है। 

महासमुंद के साहू और साहू
महासमुंद लोकसभा में पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को कांग्रेस दिग्गज धनेन्द्र साहू के मुकाबले काफी हल्का माना जा रहा था, लेकिन शहर-कस्बों में मोदी फैक्टर ने उन्हें मजबूत बना दिया। समाज के लोगों धनेन्द्र के मुकाबले उन्हें ज्यादा साथ मिला, लेकिन गैर साहू वोटरों में धनेन्द्र की पकड़ नजर आई। हाल यह रहा कि महासमुंद जिले में धनेन्द्र, तो धमतरी जिले में चुन्नीलाल के पक्ष में माहौल रहा। गरियाबंद जिले की सीटों पर बराबरी का मुकाबला देखने को मिला। यहां दोनों के बीच हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 

नांदगांव में आखिर होगा क्या?
राजनांदगांव लोकसभा सीट से भाजपा ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और उनके पुत्र मौजूदा सांसद अभिषेक को टिकट न देकर पार्टी ने आरएसएस की पसंद पर संतोष पाण्डेय को चुनाव मैदान में उतारा। जबकि कांग्रेस ने खुज्जी के दो बार के विधायक भोलाराम साहू पर दांव लगाया। आरएसएस के स्वयंसेवक नांदगांव में बड़ी संख्या में डटे रहे। विधानसभा चुनाव में राजनांदगांव शहर को छोड़कर बाकी सीटों पर भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन लोकसभा चुनाव में स्थिति बेहतर दिखाई दी। 

संतोष पाण्डेय के पक्ष में राजनांदगांव शहर, खुज्जी और खैरागढ़ में माहौल था। जबकि भोलाराम डोंगरगढ़, मानपुर मोहला और पंडरिया में मजबूत नजर आए। कवर्धा और डोंगरगांव में दोनों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। यहां भी हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अब तक तो यह साफ हो चुका है कि पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस बेहतर स्थिति में रहेगी। क्योंकि पिछली बार मात्र एक सीट मिली थी, जबकि इस बार स्थिति पिछले चुनावों के मुकाबले काफी बेहतर रह सकती है। 

वोराजी से बौखलाए कांग्रेसी...
दुर्ग लोकसभा सीट में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। यह सीट कांग्रेस के लिए काफी प्रतिष्ठापूर्ण मानी जा रही है। खुद सीएम भूपेश बघेल यहां की पाटन सीट के विधायक हैं, तो गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू दुर्ग और बेमेतरा के प्रभारी मंत्री हैं। जबकि कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे भी बेमेतरा जिले के साजा से चुनकर आते हैं। इन सबसे वरिष्ठ पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सदस्य मोतीलाल वोरा भी दुर्ग से आते हैं। इन दिग्गजों के मुकाबले भाजपा ने पूर्व संसदीय सचिव विजय बघेल को उतारा है, जो कि मोदी फैक्टर और व्यक्तिगत साख के चलते मजबूत दिख रहे हैं। 

कांग्रेस नेता हर हाल में सीट जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जोगी पार्टी के कई नेता उनके साथ जुड़ गए हैं। न चाहते हुए भी कई को पार्टी में लेना भी पड़ा। ऐसे ही दुर्ग शहर के नेता प्रताप मध्यानी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल होना चाह रहे थे, तो वोराजी ने पेंच अड़ा दिया। अब कांग्रेस नेता बुदबुदा रहे हैं कि एक-एक वोट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में वोराजी का रूख समझ से परे है। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Apr-2019

नान घोटाला प्रकरण में ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से लंबी पूछताछ की। चिंतामणी नान का अफसर है। जब पहली बार मैडम सीएम का घोटाले में जिक्र हुआ था, तब प्रकरण में जांच की अगुवाई कर रहे मुकेश गुप्ता ने आगे बढ़कर सफाई दी थी कि मैडम सीएम का मतलब चिंतामणी चंद्राकर मैडम है। यह भी हल्ला उड़ा कि चिंतामणी चंद्राकर, भूपेश बघेल का रिश्तेदार है। मगर, एसआईटी ने बुधवार को उससे लंबी पूछताछ कर पसीने छुड़ा दिए।  

सुनते हैं कि चिंतामणी चंद्राकर को मुकेश गुप्ता का बेहद करीबी माना जाता है और वह एमजीएम अस्पताल का ट्रस्टी भी रहा है, जिस ट्रस्ट में बहुत बड़े-बड़े लोग ही ट्रस्टी हैं जो कि अनिवार्य रूप से मुकेश गुप्ता के करीबी भी हैं। ऐसे में एक अदना सा कर्मचारी इस ट्रस्ट में बराबरी का ट्रस्टी कैसे बन गया, यह हैरानी की बात है। ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से घोटाले की रकम के बंदरबांट को लेकर भी पूछताछ की है। दिलचस्प बात यह है कि चिंतामणी चंद्राकर का नाम पहले भी कई बार आया, लेकिन उससे पूछताछ नहीं हुई और जब एसआईटी ने उन्हें (चिंतामणी) नोटिस जारी किया, तो बीमारी का हवाला देकर बचने की कोशिश की। आखिरकार, उन्हें पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ा। 

चर्चा है कि एसआईटी ने एमजीएम ट्रस्ट से उनके संबंधों को लेकर भी पूछताछ की है। हल्ला यह भी है कि वर्ष-2013 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नान से करोड़ों रूपए इधर-उधर किए गए थे। इसको लेकर भी कुरेद-कुरेद कर पूछा गया। इसका हिसाब-किताब नान डायरी के बाद में बरामद हुए 125 पन्नों में जिक्र है। खैर, चिंतामणी चंद्राकर से पूछताछ होना काफी मायने रखता है क्योंकि नान से लेकर एमजीएम ट्रस्ट तक उसकी दखल रही है। जांच में लगे हुए अफसरों का यह भी मानना है कि नागरिक आपूर्ति निगम से भ्रष्टाचार के करोड़ों रुपये निकलकर एमजीएम में गए हो सकते हैं, और कागजों पर ट्रस्ट का नाम न आए इसलिए उसे नान के ही एक कर्मचारी और एमजीएम के ट्रस्टी चिंतामणी के नाम पर दर्ज किया गया हो।

एक बार फिर सुर्खियों में
 भाजपा के ताकतवर नेता सौदान सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उन पर विदिशा जिले के पैतृक गांव कागपुर में तालाब गहरीकरण-सौंदर्यीकरण में अनियमितता के आरोप लगे हैं और मध्यप्रदेश ईओडब्ल्यू इसकी पड़ताल कर रही है। पहले भी उनके गृहग्राम की भव्य कोठी को लेकर भी पार्टी के भीतर तरह-तरह की चर्चा होती रही है। पार्टी में दिवंगत पूर्व सांसद ताराचंद साहू और वीरेन्द्र पाण्डेय तो उनकी कार्यशैली की शुरू से खिलाफत करते रहे हैं, लेकिन सौदान का ही प्रभाव था कि उन्हें पार्टी छोडऩी पड़ी। 


न सिर्फ सौदान सिंह बल्कि उनके पीए गौरव तिवारी की तड़क-भड़क जीवन शैली भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय रही है। आम तौर पर संगठन मंत्री सिर्फ पार्टी संगठन तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन सौदान सिंह की रमन सरकार में पूरी दखल थी। उनके पिछली सरकार में ताकतवर रहे कई अफसरों से उनके बेहद करीबी संबंध रहे हैं, इसको लेकर भी पार्टी के भीतर उनकी आलोचना होती रही है। पहली बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनके खिलाफ कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूटा था। खैर, रमन सिंह  और उनके करीबी लोगों के खिलाफ अलग-अलग प्रकरणों में जांच हो रही है, ऐसे में किसी संगठन मंत्री का जांच के दायरे में आना भी कम चौंकाने वाला नहीं है। इससे कम से कम यह तो साबित होता है कि सरकार में न रहते हुए भी पार्टी के भीतर उनका विरोध है।

 


Date : 17-Apr-2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल छत्तीसगढ़ आकर साहू-कार्ड खेल गए, और ऐसा लगता है कि मतदान के पहले भाजपा इसी को तुरूप का इक्का मान रही है। अब कांगे्रस के जिम्मे यह बात तो आती ही है कि इसका कोई ऐसा जवाब दे जो कि साहू समाज को मोदी लहर में पडऩे से रोक सके। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने मोदी के भाषण के तुरंत बाद मिनटों में फेसबुक पर लिखा- 'मोदी ने फिर वही चाल चली जो वे 2002 से चलते आ रहे हैं। धर्म, जाति, और सम्प्रदाय के बीच जहर बोने की चाल। उन्होंने छत्तीसगढ़ के साहू समाज को पहले मोदी से जोड़ा, फिर पूरे समाज को चौकीदार से। फिर कहा कि जो लोग चौकीदार को चोर कह रहे हैं, वे पूरे समाज का अपमान कर रहे हैं। दरअसल भाजपा चाहती है कि एक पिछड़ी जाति कांग्रेस से नाराज हो जाए, और इसी बहाने चौकीदार भी बरी हो जाए। लेकिन वह शायद नहीं जानती कि साहू समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, और इस समाज की राजनीतिक चेतना राज्य में सबसे प्रखर है। वह किसी के बहकावे में यूं नहीं बहक जाएगा।'

दरअसल विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पांच साहू उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से चार जीते थे। और भाजपा ने 14 साहू उम्मीदवार बनाए थे जिनमें से 13 निपट गए थे। यह बात भाजपा के भूलने की नहीं थी, और इसलिए मोदी ने साहू समाज को खासकर छुआ।

कांग्रेस अब खोद-खोदकर जानकारी निकाल रही है कि भाजपा ने साहू नेताओं के साथ पहले क्या सुलूक किया था। एक नेता ने आज सुबह एक जानकारी भेजी कि राज्य के भाजपा के कुछ बिहारी नेताओं ने ताराचंद साहू को पार्टी छोडऩे के लिए मजबूर किया था। जब उन्हें प्रदेश भाजपाध्यक्ष पद से हटवाया गया, तब उस साजिश के वक्त मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि जागेश्वर साहू को वैशालीनगर उपचुनाव में टिकट देने के बावजूद भाजपा के मंत्रियों ने साजिश करके हरवाया, 2014 में सरोज पाण्डेय ने दुर्ग सांसद रहते हुए साहू समाज के तहसील अध्यक्ष राम कुमार साहू को तीन झापड़ मारे थे, तब मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि 26-11 के मुंबई हमले में जब मोदीजी के परमप्रिय मित्र नवाज शरीफ के भेजे गए पाकिस्तानी आतंकी मौत का खेल खेल रहे थे तब छत्तीसगढ़ के ही बहादुर जांबाज कमांडो दिनेश साहू ने आतंकवादियों की लाशें बिछा दी थीं।

कांग्रेस की तुरतबयानी बता रही है कि इतना बड़ा साहू-समर्थन वह  खोना नहीं चाह रही है। यह एक अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में मिली हुई टिकट कटने के बाद प्रतिमा चंद्राकर ने ताम्रध्वज साहू से रूबरू जो सलूक किया था, उसने आज दुर्ग को कांग्रेस के लिए खासी, खासी मुश्किल सीट बना दिया है। लेकिन दुर्ग से परे भी और जगहों पर कांग्रेस को एकजुट साहू वोटों का ख्याल तो रखना ही है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 16-Apr-2019

दुर्ग लोकसभा में चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यहां कांग्रेस की प्रतिमा चंद्राकर और भाजपा के विजय बघेल के बीच कांटे की टक्कर है। विजय, सीएम भूपेश बघेल के भतीजे हैं। दोनों का कार्यक्षेत्र पाटन रहा है। भाजपा ने भूपेश और विजय की रिश्तेदारी को प्रचार में भुनाना शुरू कर दिया है। विशेषकर पाटन के मतदाताओं से कहा जा रहा है कि एक टिकट में दो पिक्चर देखें। यानी भूपेश को तो आपने सीएम बना दिया। अब विजय को सांसद बनाने के लिए वोट दें। चूंकि पाटन सीएम का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त दिलाना उनके लिए जरूरी भी है, लेकिन भाजपा का नारा पाटन के लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। यह सुरसुरी प्रेमप्रकाश पांडेय ने दुर्ग के नामांकन के दिन छोड़ी थी, जब उन्होंने अपने भाषण में कहा कि एक पार्टी का विधायक तो है ही, दूसरी पार्टी का सांसद भी रख लो, चूंकि सीट मुख्यमंत्री की है इसलिए यहां तो काम हो ही जाएगा, दिल्ली में मोदी सरकार में विजय बघेल काम करवा पाएंगे। कुछ और लोगों ने अटकल को आगे बढ़ाते हुए फैलाया कि सांसद बनने जा रहे भाजपा उम्मीदवारों में विजय बघेल सबसे मजबूत रहेंगे इसलिए उन्हें मोदी सरकार में इस्पात एवं खान राज्यमंत्री बनाया जा सकता है, और इसलिए विजय बघेल को वोट दें। लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों के कुर्मी उम्मीदवारों के बीच दुर्ग जिले के एक और कुर्मी नेता प्रीतपाल बेलचंदन के पुराने मामलों पर अभी कार्रवाई की सुगबुगाहट क्यों शुरू हुई है, यह कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है। लोगों का मानना है कि सहकारिता क्षेत्र में तो जिस नेता की फाईल खोलें, उसमें गड़बड़ी ही दिखेगी, इसलिए बेलचंदन की बारी अभी क्यों आई है यह दो कुर्मी नेताओं की चुनावी लड़ाई के बीच समझना थोड़ा सा मुश्किल है। 

विधायक तो है ही, सांसद भी-2

महासमुंद के कांग्रेस प्रत्याशी धनेन्द्र साहू के लिए उनके ही समाज के पदाधिकारियों ने मुश्किलें पैदा कर दी है। समाज के कुछ पदाधिकारियों ने यह अभियान चलाया है कि धनेन्द्र वर्तमान में विधायक हैं। जबकि भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू अभी खाली है। ऐसे में चुन्नीलाल को वोट देना चाहिए, ताकि उनका भी राजनीतिक कद बढ़ सके। चुन्नीलाल एक बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी टिकट काट दी गई थी। महासमुंद लोकसभा में साहू मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है और धनेन्द्र की पकड़ भी है। लेकिन सामाजिक रूप से चल रहे अभियान से चुन्नीलाल साहू वोटरों के बीच में धनेन्द्र से ज्यादा मजबूत दिख रहे हैं। हालांकि यहां आदिवासी और कुर्मी वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में अन्य जातियों के वोट किधर जाएंगे, यह कह पाना अभी मुश्किल है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Apr-2019

जांजगीर-चांपा के भाजपा प्रत्याशी गुहाराम अजगले ने पार्टी दफ्तर को ही ठिकाना बना लिया है। वे दिनभर प्रचार के बाद जिला पार्टी दफ्तर में ही रात्रि विश्राम करते हैं। प्रचार खत्म होने के बाद पार्टी दफ्तर में अपने कपड़े धोते हैं और सुबह तैयार होकर प्रचार के लिए निकल जाते हैं। एक बार सांसद रह चुके गुहाराम अजगले से नामांकन फार्म भरने के लिए पार्टी नेताओं ने उनसे इनकम टैक्स ब्यौरा मांगा तो उन्होंने कह दिया कि इनकम ही नहीं है, तो टैक्स कैसा? पूर्व सांसद के रूप में उन्हें कुल 20 हजार रूपए पेंशन मिलती है। और गांव में थोड़ी सी जमीन है, उसी से उनका गुजारा होता है। 

चुनाव संचालन कर रहे नेताओं ने उनसे अपनी तरफ से कुछ संसाधन जुटाने के लिए कहा, तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। अब हाल यह है कि उनके लिए पार्टी नेताओं को गाड़ी किराए पर लेनी पड़ी, जिसमें वे क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। पन्द्रह साल की सरकार में पार्टी के कई छोटे-बड़े नेता करोड़पति-अरबपति बन गए हैं, लेकिन गुहाराम फक्कड़ ही रहे। गुहाराम की सादगी और सरलता के कारण ही पार्टी के छोटे-बड़े नेता उनके पक्ष में प्रचार के लिए निकल पड़े हैं और उन्हें जिताने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। 

जिम्मा फिर सौदान सिंह पर
लोकसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय सहमहामंत्री (संगठन) सौदान सिंह सक्रिय दिख रहे हैं। जबकि विधानसभा चुनाव में हार के बाद काफी दिनों तक गायब थे और पार्टी के भीतर हल्ला था कि उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग कर दिया गया है। प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन हरियाणा और मध्यप्रदेश में ज्यादा समय दे रहे हैं, तो यहां की जिम्मेदारी सौदान सिंह पर आ गई है। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के लिए उन्हें ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। 

दुर्ग और कुछ और जगहों पर तो कार्यकर्ताओं ने सौदान के खिलाफ आग उगली थी। खैर, सौदान सिंह सभी लोकसभा क्षेत्रों में जाकर पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। पिछले दिनों वे हेलीकॉप्टर से अंबिकापुर पहुंचे और वहां प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने यह कहा कि प्रदेश की सभी 11 सीटें जीत रहे हैं, तो एक-दो कार्यकर्ता मुंह दबाकर हँसने लगे। 

उन्होंने सरगुजा से भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह को फोन लगाया और कहा कि उनकी स्थिति अच्छी है। और वे चुनाव जीत रहीं हैं। फिर उन्होंने रेणुका को सभी के साथ समन्वय बनाकर काम करने की नसीहत देकर फोन काट दिया। सुनते हैं कि वे खुद टिकट वितरण से नाखुश हैं। वे राजनांदगांव से अभिषेक, रायगढ़ से विष्णुदेव साय को टिकट दिलाना चाहते थे, पर हाईकमान ने एक लाइन में सभी सांसदों की टिकट काटने का फैसला लेकर झटका दिया है। चूंकि वे संगठन मंत्री हैं तो बैठक में औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 14-Apr-2019

पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले मुख्य दलों के प्रत्याशी इस बार  खर्च कम कर रहे हैं। भाजपा चुनाव खर्चों को लेकर हमेशा उदार रही है। मगर प्रदेश में सरकार न होने की वजह से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है। ऊपर से नए चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है, जो कि आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम भी नहीं हैं। पिछले पन्द्रह बरस में राज्य सरकार ने बैठे हुए लोग अरबपति बनने के बाद अब अगर चुनाव लड़ते, तो बात ही कुछ और होती। सुनते हैं कि पार्टी ने चुनाव संचालकों के हाथों में ही फंड थमा दिया है, जिससे कुछ प्रत्याशी नाराज बताए जा रहे हैं। एक भाजपा प्रत्याशी ने कुछ पार्टी नेताओं को अपनी व्यथा सुनाई है, कि वे अपने जेब से 15 लाख खर्च कर चुके हैं, लेकिन चुनाव संचालक ने अभी तक एक फूटी कौड़ी नहीं दी है। और तो और चुनाव संचालक फोन भी नहीं उठा रहे हैं। 

प्रदेश में कांग्रेस सरकार में होने के बावजूद प्रत्याशी कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। चर्चा है कि पार्टी हाईकमान ने यहां के जिम्मेदार नेताओं को अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के उम्मीदवारों को मदद करने के लिए कह दिया है, जिससे वे टेंशन में बताए जा रहे हैं। कुछ प्रत्याशियों ने टिकट से पहले खर्च को लेकर काफी कुछ वादे किए थे, लेकिन वे अब पार्टी का मुंह ताक रहे हैं। एक शिकायत पर प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने एक प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। साथ ही चुनाव खर्च भी प्रत्याशी के बजाए चुनाव संचालक को देने के लिए कहा है। 

अमितेष लोकसभा चुनाव प्रचार में!
पूर्व मंत्री और राजिम के विधायक अमितेश शुक्ल लोकसभा चुनाव प्रचार में डटे हैं। वे सालों बाद लोकसभा का चुनाव प्रचार कर रहे हैं। आमतौर पर लोकसभा चुनाव के दौरान वे पारिवारिक कारण गिनाकर प्रदेश से बाहर चले जाते थे। उनकी जगह स्थानीय नेताओं को प्रचार की जिम्मेदारी दी जाती रही है। पूर्व सीएम अजीत जोगी दो बार महासमुंद से चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्होंने राजिम में अमितेश की जगह अन्य नेताओं को चुनाव संचालक बनाया था। इस बार अमितेश के पुत्र भवानी शंकर खुद टिकट के दावेदार थे। अमितेश अपने पुत्र को टिकट दिलाने के लिए मेहनत भी कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह धनेन्द्र साहू को प्रत्याशी बनाया। धनेन्द्र स्व. श्यामा चरण शुक्ल के कट्टर समर्थक  रहे हैं। ऐसे में अमितेश का चुनाव प्रचार छोड़कर जाने का कोई कारण नहीं बचा था। वे विधानसभा का चुनाव 55 हजार से अधिक मतों से जीते हैं और अभी तक धनेन्द्र के लिए पूरी मेहनत करते दिख भी रहे हैं।  दरअसल श्यामाचरण शुक्ल के वक्त से उनका परिवार साहू समाज की खास फिक्र रखते आया है क्योंकि राजिम में इस परिवार की जीत साहू वोटों की मर्जी के बिना नहीं हो सकती। इसलिए राजिम से किसी शुक्ल की टिकट पाते हुए श्यामाचरण-अमितेष यह कोशिश भी करते आए हैं कि अड़ोस-पड़ोस की सीटों पर किसी साहू को जरूर टिकट मिल जाए।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 13-Apr-2019

सरकार जाते ही भाजपा के कारोबारी नेता, कांग्रेस के लोगों से संबंध मधुर करने में लग गए हैं। ताकि कारोबार में किसी तरह की दिक्कत न आए। ऐसे ही एक भाजपा नेता पिछले दिनों सरकार के एक मंत्री के घर पहुंचे। और मंत्रीजी की तारीफों के पुल बांधने लगे। यह सुनकर असहज हो रहे मंत्रीजी के समर्थकों में से एक ने भाजपा नेता को टोक दिया और याद दिला दिया कि आप तो मंत्रीजी के खिलाफ अपनी पार्टी के प्रत्याशी का चुनाव संचालन कर रहे थे। 

यह सुनकर वाकपटु भाजपा नेता कुछ क्षण के लिए असहज हो गए, लेकिन तुरंत संभलकर कहा कि हां, मैं मंत्रीजी के खिलाफ चुनाव संचालन कर रहा था, पर मंत्रीजी के कुशल प्रबंधन का कोई तोड़ नहीं है। हमें बुरी तरह हरा दिया। भाजपा नेता और मंत्रीजी के समर्थकों के बीच चर्चा का दौर चल रहा था कि मंत्रीजी ने काम पूछ लिया। फिर क्या था, भाजपा नेता असल मुद्दे पर आ गए। उन्होंने गुजारिश की कि जिस बोर्ड के वे पदाधिकारी थे वहां काम कर रही सीए फर्म को न हटाया जाए, उसे काम करने दिया जाए। मंत्रीजी ने तुरंत फोन कर उनका काम कर दिया। तब कहीं जाकर भाजपा नेता वहां से निकले। 


छत्तीसगढ़ का हार्दिक पटेल

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक 'हार्दिक पटेल' का उदय हो रहा है। सेनानी स्व. खूबचंद बघेल के गृहग्राम पथरी से तालुक रखने वाले अमित बघेल की तुलना कई उत्साही लोग गुजरात के हार्दिक पटेल से कर रहे हैं। अमित विधानसभा चुनाव के दौरान सुर्खियों में आए। उन्होंने कसडोल में गौरीशंकर अग्रवाल और धरसींवा के भाजपा प्रत्याशी देवजी पटेल व महासमुंद के डॉ. विमल चोपड़ा को टारगेट किया और उन्हें चुनाव में बुरी तरह हरवाने में अहम भूमिका निभाई। 

अमित भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश महामंत्री रहे हैं, लेकिन देवजी से अनबन के चलते उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद अमित ने श्रमिक नेता रामगुलाम सिंह ठाकुर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना का गठन किया। जब सिलतरा के एक उद्योग से कुछ लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया, तो क्रांति सेना के बैनर तले अमित नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के समर्थन में आंदोलन खड़ा किया। फिर क्या था, उन्हें जेल भेज दिया और रमन सरकार के प्रभावशाली लोगों ने तीन माह तक उनकी जमानत नहीं होने दी। जेल से निकलने के बाद उनकी हैसियत और बढ़ गई। उनके संगठन का विस्तार अब प्रदेशभर में हो चुका है। 

विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें भाजपा के लोगों ने अपने साथ लाने की कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। प्रदेश के गैर छत्तीसगढ़ी मूल के दिग्गज भाजपा नेताओं को चिन्हित कर उनके खिलाफ मुहिम चलाई और चुनाव में उनके खिलाफ माहौल बनवाने में सफल रहे। पूर्व सांसद सोहन पोटाई भी उनके साथ जुड़ गए हैं और छत्तीसगढ़ी समाज के हितों की बात कर रहे हैं। वे कांग्रेस और भाजपा के उद्योगपति-कारोबारी नेताओं के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। 

सुनते हैं कि कोरबा में सरकार के मंत्री जयसिंह अग्रवाल के खिलाफ अभियान चलाया, तो सीएम भूपेश बघेल को उन्हें फोन कर समझाना पड़ा। उनका मानना है कि राजस्थान-उत्तरप्रदेश, हरियाणा से आए भाजपा और कांग्रेस के नेता यहां जनप्रतिनिधि बन गए हैं और छत्तीसगढिय़ों का शोषण कर रहे हैं। उनके भाषण से प्रभावित बड़ी संख्या में युवा उनसे जुडऩे लगे हैं। कुछ लोग आर्थिक सहयोग भी कर रहे हैं। वे खूबचंद बघेल, गुरूघासीदास, शहीद वीर नारायण सिंह और संत पवन दीवान जैसे छत्तीसगढ़ के महापुरूषों को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं के सपनों के अनुरूप शोषण मुक्त छत्तीसगढिय़ा राज चाहते हैं। वैसे, छत्तीसगढिय़ा शोषण के नाम पर कई संगठन तैयार हुए और जल्द ही खत्म भी हो गए, लेकिन अब क्रांति सेना का आगे क्या होता है यह देखना है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Apr-2019

सरगुजा में भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो गई है। सीतापुर इलाके में तो पार्टी पदाधिकारियों ने बकाया भुगतान न होने पर काम नहीं करने की धमकी दे दी है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए पार्टी के बड़े नेताओं के कहने पर स्थानीय कुछ नेताओं ने साहूकारों से कर्ज लेकर चुनाव में लगा दिया। उनसे कहा गया था कि चुनाव निपटते ही पैसा मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

हाल यह है कि जिन लोग ने कर्ज दिए थे वे स्थानीय जिम्मेदार नेताओं के पीछे पड़ गए हैं। अकेले पेट्रोल पंपों का ही लाखों का बिल बकाया है। विधानसभा प्रत्याशी की स्थिति यह है कि चुनाव में हारने के बाद उन्होंने स्थानीय नेताओं से दूरी बना ली। प्रदेश में सरकार नहीं है, तो कोई पूछने वाला नहीं है। अब लोकसभा चुनाव हैं, तो नेताओं ने कर्ज वापसी के लिए दवाब बनाया है। 

स्थानीय नेताओं ने प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन के सामने भी अपनी बात रखी है। साथ ही साथ चुनाव संचालक रामप्रताप सिंह को चेताया है। उन्हें भरोसा दिया गया है कि जल्द ही उन्हें पैसा लौटा दिया जाएगा। फिर भी दूध से जले नेता, इस वादे पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि बकाया रकम की वापसी के बाद ही काम करेंगे। 

खफा-खफा से हैं  महाराज
क्या पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव खफा हैं, यह सवाल पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय है। दरअसल, सिंहदेव चुनाव प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन वे अपने क्षेत्र सरगुजा से दूर हैं। सरगुजा राजघराने के मुखिया सिंहदेव की पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सीटों पर प्रत्याशी उन्हीं की पसंद से तय किए गए थे और उन्होंने जिताया भी। सरगुजा लोकसभा प्रत्याशी खेलसाय सिंह भी सिंहदेव के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। 

सुनते हैं कि सिंहदेव ने सरगुजा लोकसभा में प्रचार की रणनीति बनाने सिर्फ एक बार बैठक ली है। जिसमें विधायकों के अलावा जिलाध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी भी थे। इसके बाद खेलसाय को स्थानीय नेताओं के भरोसे छोड़ दिया है। अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, भाजपा की स्थिति लगातार मजबूत दिख रही है। चर्चा है कि कुछ लोग सिंहदेव से मार्गदर्शन लेने गए, तो उन्होंने कह दिया कि जैसा करना है वैसा करें। सिंहदेव सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, तो ब्लॉक स्तर के नेता भी सुस्त पड़ गए हैं। वे अपने ही गढ़ में दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहे हैं, इसकी चर्चा भी हो रही है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों से वे सहमत नहीं हैं और यही वजह है कि ओडिशा में ज्यादा समय दे रहे हैं। पार्टी ने उन्हें ओडिशा में प्रचार का अतिरिक्त दायित्व भी दिया है। अब सरगुजा में प्रचार के लिए समय नहीं निकाल पाने का बहाना भी है।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 11-Apr-2019

नौकरशाह चिराग के जिन्न की तरह होते हैं। जिनके पास चिराग होता है नौकरशाह उसी का कहना मानते हैं। लेकिन 15 साल सरकार में रहने के बाद  कई भाजपा नेता इस जुमले को भूल चुके थे। सरकार बदलने के बाद नौकरशाहों के तेवर बदले, कुछ भाजपा नेताओं को झटका भी लगा है। ऐसे ही एक मामले में एक भाजपा नेता की रायपुर जिले के बड़े अफसर से नोंक-झोंक भी हो गई। बात देखने-दिखाने तक पहुंच गई। आखिरकार नेताजी को अपमानित होकर लौटना पड़ा। 

हुआ यूं कि भाजपा नेता चुनाव संबंधी शिकायत को लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे थे। अफसर की भाजपा सरकार के एक मंत्री से निकटता रही है। वे मंत्रीजी के स्टॉपमें भी रहे हैं। अफसर के साथ नेताजी का उठना-बैठना था पर जब शिकायत लेकर पहुंचे तो अफसर ने कुछ कानूनी बातें बता दी। यह बात नेताजी को हजम नहीं हुई। उन्होंने अफसर पर नाराजगी जाहिर की, तो उन्हें ऐसी फटकार लगाई कि नेताजी सन्न रह गए। तुरंत नेताजी पूर्व मंत्री के पास पहुंचे और अफसर की शिकायत की। पूर्व मंत्री ने उन्हें प्यार से समझाया कि सरकार बदल चुकी है, तो अफसर के तेवर बदलना भी स्वाभाविक है। बेहतर होगा कि अनुनय-विनय कर किसी तरह अपना काम निकाला जाए। 

जोगी-नेताओं का बुरा हाल
जोगी पार्टी के कई नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। जोगी पार्टी के चुनाव अभियान प्रमुख रहे पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, जोगी के कहने पर भूपेश बघेल को खूब गरियाते थे। अब वे क्षमा मांगकर वापस आना चाहते हैं, लेकिन भूपेश बघेल तो दूर,बाकी कांग्रेस नेता भी उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। हाल यह है कि जो लोग आ गए हैं उनकी भी हालत कोई अच्छी नहीं है।

जोगी पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रहे अब्दुल हमीद हयात को रायपुर लोकसभा के केंद्रीय कार्यालय में अहम जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन पिछले दिनों एक कांग्रेस नेत्री ने वहां पहुंचकर जोगी और उनके समर्थक रहे लोगों को इतना भला-बुरा कहा कि उन्होंने कार्यालय जाना ही बंद कर दिया। सुनते हैं कि खुद जोगी परिवार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि कांग्रेस में उनके विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 10-Apr-2019

बात दो दशक से भी ज्यादा पुरानी है। अविभाजित मध्यप्रदेश में लोकसभा के चुनाव थे। तब उस समय शरदचंद बेहार सीएस और शरदचंद सक्सेना डीजीपी थे। तब बस्तर में नक्सलवाद पांव-पसार रहा था। चुनाव में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा के लिए जगदलपुर में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में आईजी-एसपी और वन अफसर विशेष रूप से मौजूद थे। चूंकि नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर रखा था, इसलिए मतदान के दौरान छिटपुट हिंसा की आशंका भी जताई जा रही थी। 

बस्तर और कांकेर लोकसभा में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा हो रही थी कि एक नौजवान एडिशनल एसपी ने बड़े आत्मविश्वास से कह दिया कि चुनाव में नक्सल हिंसा नहीं होगी और सब कुछ शांतिपूर्वकनिपट जाएगा। यह सुनते ही डीजीपी शरदचंद सक्सेना,  एएसपी पर भड़क गए, तब सीएस शरदचंद बेहार ने उन्हें शांत किया और फिर एडिशनल एसपी की तरफ  मुखातिब होते हुए कहा कि चुनाव शांतिपूर्वक कैसे हो जाएगा, तब एएसपी ने अलग से चर्चा की इच्छा जताई।
 बैठक के बाद शरदचंद बेहार ने एएसपी को कलेक्टर के कक्ष में मिलने कहा। सुनते हंै कि एएसपी ने सीएस बेहार और डीजीपी सक्सेना को बताया कि एक राजनीतिक दल के प्रत्याशी ने नक्सल नेताओं को पैसा पहुंचा दिया है, इसके बाद अंदरूनी इलाकों में भी प्रचार की छूट दे दी गई है। अब चुनाव में हिंसा नहीं होगी। एएसपी की सूचना सही निकली और चुनाव शांतिपूर्वक निपट गया। पर जब अविभाजित मध्यप्रदेश में परिवहन मंत्री रहे लिखीराम कांवरे की नक्सलियों ने हत्या की थी, तब भी उस समय राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा रही कि कांवरे नक्सलियों को नियमित रूप से पैसा पहुंचाते थे, लेकिन बाद में नक्सलियों की तरफ से डिमांड ज्यादा आई और कांवरे ने मना कर दिया, तो नक्सलियों ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया। 

इससे अलग तरह का वाकया वर्ष-2008 के विधानसभा चुनाव के बाद राजनांदगांव जिले में हुआ था। तब नक्सलियों ने विधानसभा चुनाव निपटने के बाद एक नेता की गोली मारकर हत्या कर दी। चर्चा है कि नेताजी ने चुनाव के वक्त नक्सलियों को कुछ आश्वासन दिया था, जिसे पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। यह भी सुनने में आता है कि विशेषकर बस्तर संभाग में संपन्न तबके के दोनों ही प्रमुख दलों के नेता नक्सल हिंसा से बचने या समर्थन जुटाने के लिए नक्सलियों से मदद लेते आए हैं। ये अलग बात है कि दोनों ही दल एक-दूसरे पर नक्सलियों के साथ सांठ-गांठ का तोहमत लगाते हैं। 

अब जब दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों ने हत्या की है, तो कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पुलिस कह रही है कि विधायक को दंतेवाड़ा के कुंआकोंडा इलाके के श्यामगिरी के पहाड़ी वाले रास्ते पर जाने से मना किया गया था, उन्हें नक्सल खतरों से भी अवगत कराया गया था। इस सबको नजरअंदाज कर प्रचार के लिए निकल पड़े। भीमा मंडावी और उनके साथ सभी चारों सुरक्षाकर्मी मौत के आगोश में समा गए, अब इस घटना ने कई सवाल पीछे छोड़ दिए हैं। इसका जवाब मिलना भी मुश्किल है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 09-Apr-2019

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रचार तंत्र अपेक्षाकृत बिखरा-बिखरा सा है। कुछ जगहों पर प्रत्याशियों की हालत खराब है, लेकिन वहां पार्टी नेता पूरी तरह ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। मसलन, रायगढ़ में जूदेव परिवार और भाजपा में एकजुटता की वजह से भाजपा प्रत्याशी गोमती साय की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। सीएम भूपेश बघेल वहां कई बार जा चुके हैं, सबसे ज्यादा जरूरत पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव की है, मगर, वे ओडिशा और दूसरे क्षेत्रों में ज्यादा प्रचार कर रहे हैं। बस्तर में उनकी जरूरत भी नहीं थी, फिर भी एक के बाद एक सभाएं ले रहे हैं। वहां सभाओं में वैसे भी कोई ज्यादा भीड़ जुट नहीं रही है। कांग्रेस प्रत्याशी मजबूत स्थिति में है। 

सिंहदेव की उपयोगिता सबसे ज्यादा रायगढ़ लोकसभा में है और वे जशपुर राजघराने के प्रभाव को कम करने की ताकत रखते हैं। मगर, वहां का प्रचार तंत्र सिर्फ उमेश पटेल के भरोसे छोड़ दिया गया था। जो कि पूरे लोकसभा में प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे हैं। यही हाल, जांजगीर-चांपा सीट का है। जांजगीर-चांपा में त्रिकोणीय मुकाबला है और बसपा की दमदार मौजूदगी से भाजपा को बड़े फायदे की उम्मीद है। 

कांग्रेस प्रत्याशी रवि भारद्वाज की छवि अच्छी है और उनके पिता पांच बार सांसद रहे हैं। लेकिन जांजगीर-चांपा के ज्यादातर बड़े नेता कोरबा कूच कर गए हैं। यहां पूर्व सांसद करूणा शुक्ला और महंत राम सुंदरदास जैसे नेताओं को प्रचार में झोंकने की जरूरत है, पर यह सब नहीं हो पा रहा है। इसी तरह कांग्रेस के एक अन्य स्टार प्रचारक ताम्रध्वज साहू की सबसे ज्यादा जरूरत दुर्ग सीट पर है, लेकिन उन्हें भी हेलीकॉप्टर देकर यहां-वहां प्रचार में भेजा जा रहा है। जहां भीड़ भी ज्यादा नहीं होती है। विधानसभा चुनाव में प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया इन सब चीजों की मॉनिटरिंग करते थे, लेकिन वे अपने बेटे के चुनाव प्रचार में भी व्यस्त हो गए हैं। इन सबके चलते अनुकूल माहौल के बावजूद कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। 

दोनों की दिक्कतें एक सरीखी
रायपुर लोकसभा में मौजूदा महापौर प्रमोद दुबे और पूर्व महापौर सुनील सोनी के बीच सीधी टक्कर है। दोनों की समस्याएं एक जैसी है। दोनों को अपनों से ही दो-चार होना पड़ रहा है। प्रमोद ने कई पार्षदों को नाराज कर रखा है। रायपुर उत्तर से टिकट की भी दावेदारी की थी। इस वजह से भी बाकी दावेदार नाराज हैं। दूसरी तरफ, सुनील सोनी को तो पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी यह कह आए कि आपने मेरे लिए गड्ढा खोदा था, लेकिन मैं आपके लिए ऐसा नहीं करूंगा। अब इतना सब कुछ कहने के बाद श्रीचंद अपनी ताकत झोंक रहे होंगे, यह सोचना भी गलत है। फिर भी दोनों को नाराज लोगों को मनाने में महारत भी हासिल है। अब यह देखना है कि दोनों में से कौन यह बेहतर काम कर सकता है। दोनों इसी नगर निगम में महापौर रह चुके हैं, और नये-पुराने पार्षदों की दोनों से कुछ-कुछ नाराजगी रहते आई है जो कि चुनाव में असर डाल सकती है। फिलहाल सुनील सोनी को बृजमोहन अग्रवाल की क्षमता पर अपार भरोसा है।

अंडा कहना थोड़ा अटपटा
नया रायपुर विकास प्राधिकरण का नाम इतने बरसों से एनआरडीए चले आ रहा था जो कि अब गड़बड़ा गया है। रमन सरकार के वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के गुजरने पर उनकी स्मृति में नया रायपुर का नाम बदलकर अटल नगर तो कर दिया गया, लेकिन बाद में जब अटल नगर विकास प्राधिकरण के अंग्रेजी प्रथमाक्षर जोड़कर देखे गए तो वे एएनडीए, यानी अंडा बन रहे थे। अब अंडा बोलने में कुछ अटपटा भी लगता है, लेकिन नाम है तो है।

अब सरकार ने नया रायपुर के कामकाज को तकरीबन रोक ही दिया है, और वहां बस चलना भी मुश्किल हो रहा है। चलाने वाले ऑपरेटर को न डीजल का पैसा मिला है, न ड्राइवर-कंडक्टर की तनख्वाह। अब अगर बसें बंद हो जाएंगी, या कम हो जाएंगी तो सरकारी कर्मचारी भी नया रायपुर जाकर बसना छोड़ देंगे, और यह शहर देश का सबसे बड़ा शहरी सुनसान इलाका होकर रह जाएगा। वैसे भी आज तपती दोपहर में अगर कोई जख्मी हो जाए, तो उसे कोई गाड़ी नसीब न हो। एक जानकार ने कहा- नया रायपुर के हाल अइसे होगे हे, कि मरे रोवय्या न मिले...। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 08-Apr-2019

कांकेर से भाजपा के मोहन मंडावी और कांग्रेस के वीरेश ठाकुर के बीच टक्कर है। दो अलग पार्टियों में रहने के बाद भी दोनों के बीच संबंध काफी मधुर हैं। दोनों दूर-दराज के रिश्तेदार हैं। वीरेश जब भी भानुप्रतापपुर से कांकेर आते हैं, तो मोहन मंडावी के ही गोविंदपुर के मकान में रहते हैं। अब जब चुनाव में दोनों आमने-सामने हैं, तो वे एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बच रहे हैं। वीरेश के बड़े भाई  बीबीएस ठाकुर मप्र में एडीजी रह चुके हैं। न सिर्फ वीरेश बल्कि उनके पूरे परिवार की साख अच्छी रही है। उनके पिता सत्यनारायण ठाकुर तीन बार एमएलए रह चुके हैं और चाचा अजीत सिंह ठाकुर बस्तर के पहले आईएएस रहे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी भी छवि के मामले में वीरेश से किसी तरह उन्नीस नहीं पड़ते हैं। वे धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं और उनकी अपनी रामायण मंडली है। वे गांव-गांव में रामायण पाठ करते रहे हैं। ऐसे में वे किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ऐसे में कांकेर के मतदाताओं के सामने दुविधा है कि दो बेहतर में से किसका चुनाव किया जाए। 

मंदी और चंदा
मंदी के माहौल में चुनावी चंदा जुटाने में राजनीतिक दलों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के लोग फिर भी बेहतर स्थिति में हैं। क्योंकि केन्द्र में उनकी सरकार है और ज्यादातर बड़े उद्योग घराने उन्हें दिल खोलकर मदद कर रहे हैं। यहां भी पिछले 15 साल सरकार होने के कारण भाजपा के कई नेताओं का उद्योगपतियों से घरोबा रहा है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में ही भाजपा के लोगों ने इतना कुछ जुटा लिया गया था कि लोकसभा में दिक्कत नहीं आनी चाहिए थी, पर राजनीतिक माहौल कुछ ऐसा हो गया कि खर्च करने में कंजूसी करने लग गए। सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस की स्थिति कोई बेहतर नहीं है। चर्चा है कि दिल्ली ने काफी कुछ दबाव बना दिया है और यहां से ओडिशा को भी फंडिंग हो रही है। हल्ला तो यह है कि कुछ मंत्रियों को बकायदा टारगेट भी दिया गया। एक मंत्री तो धमतरी में रेस्टहाउस दो दिन रहे और ट्रांसफर-पोस्टिंग के एवज में काफी कुछ जुटाया भी। लेकिन भाजपा के साधन-सुविधा आज भी कांगे्रस से अधिक हैं। राजधानी रायपुर के भाजपा उम्मीदवार सुनील सोनी के काम में लगे एक बड़े भाजपा नेता ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि खर्च में प्रमोद दुबे कहीं नहीं टिकेंगे, और यह कमजोरी भारी भी पड़ सकती है। लोगों को याद है कि दो चुनाव पहले दुर्ग के विधानसभा प्रत्याशी अरूण वोरा की हार हो गई थी क्योंकि  मतदान के पहले का खर्च जुट नहीं पाया था। यह उस वक्त हुआ था जब उनके पिता मोतीलाल वोरा कांगे्रस के राष्ट्रीय नेता थे, और शायद कोषाध्यक्ष भी थे।

जिम्मेदारी मिली, तो पुरानी बातें...
भाजपा में कुछ नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपे जाने से नाराजगी भी है। मसलन, अवधेश जैन को चुनाव कंट्रोल रूम प्रभारी बनाया गया है। अवधेश के पिता जगदीश जैन शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं, और अवधेश भी एबीवीपी के पदाधिकारी रहे हैं। अवधेश राज्य बनने के बाद एबीवीपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वे कांग्रेस नेता एजाज ढेबर के करीबी माने जाते रहे हैं। जोगी सरकार में जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी के पुतले को सड़क में घसीटा गया था, तो एजाज के साथ अवधेश जैन भी इसमें शामिल थे। खैर, कांग्रेस की सरकार गई, तो अवधेश फिर भाजपा में आ गए। अब चूंकि पुराने भाजपा परिवार से रहे हैं, तो अटलजी के पुतले का अपमान करने की बात भी पीछे छूट गई। अब वे मुख्यधारा में आ गए। ये अलग बात है कि उन्हें अहम दायित्व सौंपे जाने से पार्टी के कई लोग नाराज हैं। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 07-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में चुनाव का सिलसिला शुरू हुआ ही है कि नक्सलियों ने बस्तर में तो हिंसा की ही है, राजधानी से लगे हुए धमतरी जिले में भी सीआरपीएफ के एक जवान को नक्सलियों ने मार दिया। शहर के लोगों को अधिक हड़बड़ी राजधानी के करीब नक्सल मुठभेड़ होने से है, बस्तर के भीतरी जंगलों में जो होता है उसके आंकड़ों से अधिक दिलचस्पी शहर की नहीं होती। 
ऐसी हिंसा को देखते हुए चुनाव आयोग ने तुरंत ही एयर एंबुलेंस का इंतजाम करने को कहा है जिसे मतदान तक लगातार तैनात रखा जाएगा ताकि बस्तर या नक्सली इलाके में कोई भी वारदात होने पर घायलों को एयर एंबुलेंस से बड़े अस्पताल तक लाया जाए, और रास्ते में इलाज हो सके। अब सरकार के सामने एक दिक्कत यह आ रही है कि एयर एंबुलेंस के पिछले रेट विधानसभा चुनाव के समय के हैं जो कि कुछ ही राज्यों में हो रहे थे। अब पूरे देश में आम चुनाव हो रहा है इसलिए बाकी विमानों के साथ-साथ एयर एंबुलेंस की मांग भी बढ़ गई है, और साथ-साथ उसके रेट भी। चुनाव आयोग ने तो राज्य सरकार को इंतजाम के लिए लिख दिया है, लेकिन राज्य सरकार इस बात से जूझ रही है कि पिछले टेंडर के रेट पर एंबुलेंस नहीं है, और नए टेंडर बुलाने को समय नहीं है। लेकिन जिंदगियों को खतरा देखते हुए सरकार रेट में भी ढील दे सकती है, और टेंडर की जरूरत को खत्म कर सकती है। 

अरण्य भवन में हुई बैठक चुनावी?
सरकार के कमाऊ विभागों में चुनाव के ठीक पहले जब ऐसे अफसरों की बैठक होती है जिनसे सत्तारूढ़ पार्टी को नगदऊ मिल सकता है, तो पूरे विभाग को पता लग जाता है, उन लोगों को भी जो कि बैठक में मौजूद नहीं रहते। अभी-अभी नया रायपुर के अरण्य भवन में प्रदेश भर के डीएफओ इक_ा हुए। बैठक की बात जाने दें, अहाते में गाडिय़ों इतनी भर गई थीं कि रोज ड्यूटी के बाद वहां से जाने वाले कर्मचारियों की बसें भी फंसने लगीं। अब बैठक के भीतर क्या हुआ होगा, यह बहुत बड़े रहस्य की बात नहीं है। लेकिन इस बैठक में पहुंचे एक अफसर ने राहत की सांस लेते हुए कहा, विधानसभा चुनाव के मुकाबले हालत बेहतर है, क्योंकि जोगी चुनाव मैदान को बाहर हैं, और उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आ रहे। दूसरे अफसर ने इस पर जड़ा- कम बोलो, कहीं अपनी ही नजर न लग जाए, और फोन न आने लगे कि हाथी के लिए चारा चाहिए।

भूपेश जैसा कोई नहीं...
वैसे तो देश में अब खींचतानकर आधा दर्जन के करीब कांग्रेस मुख्यमंत्री हो गए हैं, लेकिन मीडिया में आती खबरों और बयानों को देखें, तो अकेले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला किए हुए हैं। तकरीबन रोज ही वे मोदी के खिलाफ बयान दे रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं, और यह सब उस वक्त जब वे खुद सीबीआई की एक जांच में अभियुक्त बनाए गए हैं, और मामला चल ही रहा है। कुछ लोगों का यह मानना है कि वे दिग्विजय सिंह के असली चेले हैं, और वे छोटे-मोटे वार में भरोसा नहीं रखते, और सीधे आमने-सामने टक्कर देते हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बहुत नेता आए-गए, लेकिन भूपेश जैसे तेवर किसी और के नहीं रहे। न ही अपनी पार्टी के भीतर रहकर एक वक्त नुकसान पहुंचाने वाले किसी नेता के खिलाफ, और न ही आज देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ। 
आज सुबह से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के सबसे करीबी दो अफसरों पर आयकर के छापे पड़े हैं जो कि कमलनाथ के साथ बहुत लंबे समय से जुड़े हुए हैं, जिन्हें कमलनाथ अपना सबसे भरोसेमंद मानते हैं, और जिनके जन्मदिन पर कमलनाथ ने अपने फेसबुक पेज पर अपने साथ उनकी तस्वीर पोस्ट करके उनकी तारीफ की थी। अब ठीक चुनाव के वक्त जिस तरह कर्नाटक के एक कांग्रेस मंत्री के बाद मध्यप्रदेश में कमलनाथ के अफसरों पर इंकम टैक्स के छापे पड़े हैं, बाकी कांग्रेस राज्यों को भी सावधान हो जाने की जरूरत है। 

आईआईएम में पढ़ाने लायक
छत्तीसगढ़ में पिछली रमन सरकार के दौरान कई विभागों के कामकाज जो अब एक-एक कर सामने आ रहे हैं, उन सब पर एक-एक पेपर तैयार होना चाहिए। समाचारों का पेपर नहीं, आईआईएम में पढ़ाने का। सरकार और राजनीति का मैनेजमेंट कैसा होना चाहिए कि उसमें इस तरह के काम न हो सकें, इसे पढ़ाने के लिए इन विभागों को एक मॉडल की तरह पेश करना चाहिए। आम तौर पर पढ़ाया यह जाता है कि काम कैसे-कैसे किया जाए। लेकिन सरकार का मैनेजमेंट बराबरी से, या कुछ अधिक हद तक इस पर टिका होता है कि काम कैसे-कैसे न किया जाए। अब राजधानी में सरकार के सबसे खुले खर्च से बदले जा रहे डीकेएस अस्पताल का हाल आज यह है कि मौजूदा अफसरों और मंत्री से वह न निगला जा रहा, न उगला जा रहा है। न सिर्फ भ्रष्टाचार, बल्कि मनमानी भी इस दर्जे की हुई है कि लोग देखकर हक्का-बक्का हैं कि क्या रमन सरकार ही वापिस आ जाती, तो भी सीएजी के सामने यह अस्पताल नहीं फंसता? जैसे बड़े-बड़े दिग्गजों ने मिलकर इस अस्पताल के नाम पर मंजूर और गैरमंजूर रकम को खर्च किया है, वह हक्का-बक्का कर देने वाला काम है। और अभी इस भ्रष्टाचार से जुड़े हुए लोगों के कई और मामले कब्र फाड़कर बाहर निकलने को उतावले हैं जिनसे सेक्स, क्राइम, और थ्रिल, इन सबसे मिली हुई एक फिल्मी कहानी सामने आने वाली है। नई सरकार के लोग यह देखकर भी हैरान हैं कि नागरिक आपूर्ति निगम और डीकेएस अस्पताल जैसे मामलों के भ्रष्टाचार सरकार में हर बच्चे को मालूम थे, और बड़े ओहदे पर बैठे लोग मानो इससे अनजान थे। अब चल रही जांच में बहुत सी ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं जिनसे नई सरकार हैरान भी है, और कुछ हद तक परेशान भी है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Apr-2019

चुनाव में कालेधन का उपयोग हमेशा होते आया है। प्रमुख राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों को चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा से अधिक राशि  उपलब्ध कराती है। मगर, खुफिया कैमरे के सामने इसको कबूल करने से बिलासपुर सांसद लखनलाल साहू मुश्किलों में घिर गए हैं। सुनते हैं कि इस चुनाव में दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को तय सीमा 75 लाख से अधिक  राशि उपलब्ध करा रही है। भाजपा ने 70-70 लाख रूपए सभी प्रत्याशियों के खाते में जमा भी करा दिए हैं। लेकिन पार्टी में सबको मालूम है कि इससे परे दो-दो करोड़ अलग से कैश उपलब्ध कराए जाएंगे। इसी तरह कांग्रेस की भी पहली किश्त जारी हो गई है। कांग्रेस उम्मीदवारों को भी पार्टी 70-70 लाख रूपए दे रही है। मगर, व्यक्तिगत तौर पर सभी प्रत्याशियों को ज्यादा से ज्यादा राशि खर्च करने के लिए कहा गया है। कांग्रेस के सभी प्रत्याशी आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्होंने टिकट मिलने से पहले ही अपनी क्षमता का ब्यौरा पार्टी के रणनीतिकारों को दिया था। इसके बाद भी एक-दो प्रत्याशी खर्च करने में कंजूसी कर रहे हैं। इस पर एक मंत्री ने राजनांदगांव लोकसभा के प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। 

जोगी के विधायक किधर जाएं?
खबर है कि पूर्व सीएम अजीत जोगी ने अपने विधायकों को किसी का भी समर्थन करने की छूट दे दी है। चर्चा है कि पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में विधायक प्रमोद शर्मा ने रायपुर लोकसभा प्रत्याशी प्रमोद दुबे को समर्थन देने की इच्छा जताई। प्रमोद शर्मा ने कहा कि कांग्रेस प्रत्याशी उनके राजनीतिक गुरू रहे हैं। ऐसे में अब पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है, तो वे कांग्रेस की मदद करना चाहते हैं। धर्मजीत सिंह बिलासपुर से कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव का समर्थन कर रहे हैं। देवव्रत सिंह पहले ही रमन सिंह से मिल आए हैं। इन सबसे परे अजीत जोगी वैसे तो बसपा गठबंधन के साथ रहने की बात कह चुके हैं। वे जांजगीर में बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के साथ मंच भी साझा करेंगे, लेकिन खुद बसपा का खुलकर प्रचार करेंगे। इसमें कुछ लोगों को संदेह है, क्योंकि ऐसा करने से उनके कांग्रेस में आने की संभावना खत्म हो जाएगी।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 04-Apr-2019

प्रदेश में लोकसभा के पहले और दूसरे चरण की सीटों के लिए मतदान में 15 दिन से कम समय बाकी रह गया है। दोनों चरणों में कुल चार सीटों पर वोटिंग होगी। इन सीटों पर प्रचार तेजी से चल रहा है। कांग्र्रेस और भाजपा प्रत्याशी प्रचार के बीच कुछ न कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मतदाताओं के दिलों में उनके लिए जगह बने। ऐसे ही महासमुंद सीट से कांग्रेस प्रत्याशी धनेन्द्र साहू ने कलार समाज के सम्मेलन में तेली-कलार, भाई-भाई का नारा दिया। 

सम्मेलन में धनेन्द्र ने कहा कि तेली और कलार, एक ही पिता की संतान हैं। पुराने जमाने में महुआ का उत्पादन काफी होता था। एक ही पिता की संतान, जो महुआ से शराब बनाने में लग गए वे कलार कहलाए, जबकि महुआ के बीज से तेल निकालने का जो काम करने लगे वे तेली हो गए। उन्होंने खुद को कलार समाज से जुड़ा बताकर समर्थन मांगा। महासमुंद इलाके में कलार समाज के लोगों की संख्या अच्छी खासी है। धनेन्द्र के तर्कों से प्रभावित होने के बाद भी कलार समाज के लोग इस दुविधा में हैं कि दोनों ही मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी तेली समाज से हैं। ऐसे में उनके लिए भाई-भाई में से किसी एक भाई का चुनाव करना आसान नहीं है। 

बदले-बदले से नजर आते हैं...

सरगुजा जिले की राजनीति में राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम और पूर्व मंत्री रेणुका सिंह एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन रेणुका के प्रत्याशी बनने के बाद रामविचार का रूख काफी बदला-बदला सा दिख रहा है। उन्होंने रेणुका को जिताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। रामविचार के बदले तेवर से भाजपा के कई लोग हैरान हैं। 
सुनते हैं कि रामविचार ने रमन सिंह के विरोधियों को एकजुट करना शुरू कर दिया है। रामविचार से जुड़े लोगों का मानना है कि पार्टी में व्यवसायी तबके के लोगों का दबदबा रहा है। रमन राज में व्यवसायी नेता काफी फले-फूले हैं। आम छत्तिसगढिय़ा और आरएसएस से जुड़े पुराने लोग उपेक्षित रहे हैं। इस वजह से पार्टी की छवि भी छत्तीसगढ़ी विरोधी बन गई है। इन्हें दूर करने के लिए रामविचार आगे आए हैं। चर्चा है कि वे दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर के संपर्क में हैं, तो अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल जैसे नेताओं से मेल-जोल बढ़ा रहे हैं। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी का भी साथ मिल रहा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी में एक नए खेमें का उदय होने का संकेत भी है। 

कांग्रेस को जोगी से राहत
छत्तीसगढ़ की 11 में से जिन 3 सीटों पर अजीत जोगी की ओर से खतरा खड़ा हो सकता था, वह टल गया है। जोगी ने इसे राष्ट्रीय चुनाव मानकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी को इससे बाहर कर लिया है, और तमाम 11 सीटों पर मायावती की बसपा के हाथी छाप उम्मीदवारों का साथ देने की घोषणा की है। इससे कांग्रेस में लोगों ने राहत की सांस ली है, लेकिन कांग्रेसी नेता चौकन्ने भी हो गए हैं। कल कांग्रेस का राष्ट्रीय घोषणापत्र जारी हुआ, तो अजीत जोगी ने उसकी तारीफ करते हुए राहुल गांधी की भी तारीफ की। कल एक टीवी चैनल पर इक_ा लोगों ने जब कैमरे से परे राजनीति पर चर्चा की, तो बात निकली कि जोगी ने राहुल और उनके घोषणापत्र की तारीफ नहीं की है, कांग्रेस वापिसी की अर्जी लगा दी है जो कि दिखने में घोषणापत्र की तारीफ जैसी दिखती है। 

नाम और काम
छत्तीसगढ़ के बहुत से अस्पतालों को लेकर आए दिन मरीजों से लूटपाट की शिकायतें सामने आती हैं, और यह भी लगातार खबरों में रहता है कि निजी अस्पताल किस तरह सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना का बेजा इस्तेमाल करते हुए कभी जवान महिलाओं का गर्भाशय निकाल देते हैं, तो कभी बच्चों के दांतों में वायरिंग करने का एक फ्रॉड करते हैं। कुल मिलाकर निजी अस्पतालों में से बहुत से ऐसे बदनाम हैं कि उनके काम सरकारी अस्पतालों के काम के मुकाबले बहुत अधिक खराब हैं। 

ऐसे में एक सामाजिक कार्यकर्ता उचित शर्मा ने आज फेसबुक पर लिखा है कि छत्तीसगढ़ के अधिकतर अस्पतालों के नाम देवी-देवता और ईश्वर के नाम पर रखे गए हैं, और हरकतें डाकू मलखान सिंह की तरह की हैं। ऊपर वाला भी इनकी हरकतों को देखकर केवल अपील ही करता होगा कि हमारे नाम को बख्श दे। 

इस पर जब इंटरनेट पर मौजूद छत्तीसगढ़ के निजी अस्पतालों के नाम देखे गए, तो अधिकतर अस्पतालों के नाम इसी तरह मिले। गायत्री हॉस्पिटल, रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल, धनवंतरी हॉस्पिटल, सांई बाबा नर्सिंग होम, अग्रसेन हॉस्पिटल, श्री मां शारदा आरोग्यधाम, बाल गोपाल हॉस्पिटल, नारायणा हॉस्पिटल, अष्टविनायक हॉस्पिटल, सांई कल्याण हॉस्पिटल, महादेवम हॉस्पिटल, जगन्नाथ हॉस्पिटल, श्रीनारायणा हॉस्पिटल, श्रीबालाजी इंस्टीट्यूट, देवी लक्ष्मी हॉस्पिटल, श्रीराम हॉस्पिटल, महादेव हॉस्पिटल, श्री सांईराम हॉस्पिटल, श्री स्वामिनारायण हॉस्पिटल, श्री कृष्ण हॉस्पिटल, श्री सांई केयर हॉस्पिटल, वगैरह-वगैरह। अब अपने आस्था के केन्द्र के नाम पर अस्पताल खोलकर भी अगर लोग वहां मरते हुए मरीजों से धोखाधड़ी करते हैं, तो इससे उनके ईश्वर की ताकत का भी पता लगता है। 


Date : 03-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में भाजपा की जैसी बुरी हार हुई थी उसे लेकर लोग प्रदेश के भाजपा नेताओं को खारिज करने में इस कदर जुट गए कि हार की वजहों में से एक वजह पर किसी ने चर्चा भी करना मुनासिब नहीं समझा क्योंकि उससे राज्य के भाजपा नेताओं को खारिज करने में कुछ दिक्कत होती। जब लोकप्रिय और लुभावनी सुनामी मौजूद हो, तो उसकी लहरों के खिलाफ जाकर कौन अपनी बाहों को थकाए? लेकिन जब विधानसभा चुनाव की टिकटों की घोषणा हुई थी, तो भाजपा की करीब 70 नामों की जो लिस्ट आई थी, उसमें 20 नाम ऐसे थे जिन्हें भाजपा के प्रदेश के नेताओं ने पहली नजर में ही हारा हुआ मान लिया था। फिर यह हताशा बढ़ते-बढ़ते मतदान तक बुरे हाल में पहुंच गई। भाजपा के कुछ बड़े लोगों ने उसी वक्त बताया था कि किस तरह दिल्ली में जब बैठक में रमन सिंह के रखे हुए बहुत से नामों को खारिज कर दिया गया था, तो उन्होंने बाहर निकलकर तुरंत रायपुर लौटने के लिए विमान का इंतजाम करने को कहा था जबकि उनका अगली सुबह रायपुर आना तय था। उनके करीबी लोगों का कहना था- साहब ने बैठक से निकलकर कहा कि अब घर लौट चलो, यहां रायता पूरी तरह फैल चुका है। विधानसभा चुनाव में शर्मनाक हार की वजह से, और उसके बाद, सार्वजनिक रूप से भाजपा ने इस पर चर्चा ही नहीं होने दी कि हारने वाले वे नाम किसके कहे तय हुए थे जिनसे कि रमन सिंह असहमत थे। 
लेकिन आज इस चर्चा की एक वजह यह है कि इस बार भाजपा ने दिल्ली में ही तमाम 11 नाम तय किए हैं, और इनका क्या होगा, यह राज्य के भाजपा नेता भी बंद कमरों में अटकल लगाते हैं, और खुले में मोदी पर भरोसा जताते हैं। 

दुर्ग में कांग्रेस की पहेली
प्रदेश में कांग्रेस की सबसे कमजोर सीट दुर्ग को माना जा रहा है। वहां पर जनचर्चा यह है कि विधानसभा चुनाव में जब प्रचार में लगी हुई घोषित कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिमा चंद्राकर को यह खबर लगी कि उन्हें हटाकर ताम्रध्वज साहू को विधायक-प्रत्याशी बनाया गया है, तो वे बिफर पड़ीं। वे तुरंत ताम्रध्वज साहू के घर पहुंचीं जहां साहू समाज के लोग ताम्रध्वज के साथ बैठकर खुशी मना रहे थे।
इस मौके के बारे में चर्चा यह है कि प्रतिमा चंद्राकर ने अपनी निराशा और गुस्से के बीच ताम्रध्वज साहू को भला-बुरा कहा, और फिर प्रतीक के रूप में वे वहां पर थूककर लौट गईं। अब इस बात का कोई सुबूत तो चलन में नहीं है, लेकिन इसकी चर्चा बहुत है। लोग इसके साथ इसके पहले के चुनाव का तजुर्बा गिनाते हैं कि लोकसभा चुनाव में सरोज पांडेय ने किस तरह एक साहू को थप्पड़ मार दिया था, और वे पूरे प्रदेश में चुनाव हारने वाली अकेली भाजपा-उम्मीदवार बन गईं थीं। अब दुर्ग की कमजोरी की इस चर्चा के साथ एक दूसरी बात यह भी है कि वहां भाजपा के उम्मीदवार विजय बघेल भी कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिमा चंद्राकर की तरह कुर्मी समाज के हैं। इसलिए कुर्मी वोट तो दोनों तरफ बंटेंगे, लेकिन साहू वोट कांग्रेस या प्रतिमा के खिलाफ जाएंगे, ऐसा लोगों का अंदाज है। विजय बघेल के साथ भाजपा के बड़े नेताओं का यह अंदाज भी फायदे का है कि उनकी छवि सरोज पांडेय के विरोधी की है, और इसका उन्हें फायदा मिलेगा। लेकिन इन सब बातों के बीच यह बात अपनी जगह है कि दुर्ग की लोकसभा सीट वहीं से आने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और तकरीबन मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए ताम्रध्वज साहू दोनों का गृह जिला भी है, और इसके साथ-साथ कई दूसरी बातें भी पर्दे के पीछे चर्चा में हैं कि जीत और हार से किसका क्या नफा होगा, किसका क्या नुकसान होगा, और अगर कांग्रेस की हार हुई तो ठीकरा किस सिर फूटेगा। ताम्रध्वज इस सीट से अपने बेटे के लिए टिकट पाने को जान पर खेल गए थे, और अब उनके सामने यह दुविधा भी रहेगी कि जो साहू समाज उन्हें मुख्यमंत्री देखना चाह रहा था, उसे आज कैसे समझाएं, कितना समझाएं, और समझाएं तो क्यों समझाएं?

अब लडऩे का वक्त गया?
क्या पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल में 'पैचअप' हो गया है, यह चर्चा पार्टी के अंदरखाने में हो रही है। दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता रही है, लेकिन सरकार के पिछले कार्यकाल में कटुता बढ़ गई थी। एक दफा तो रमन, जलकी कांड की आड़ में बृजमोहन को कैबिनेट से बाहर करने के लिए भी तैयार बैठे थे। तब हाईकमान ने इसकी अनुमति नहीं दी। रमन के करीबी मानते हैं कि दोनों के बीच दूरियां बढ़ाने में 'सुपर सीएम' की अहम भूमिका रही है।  सरकार से हटने के बाद रमन सिंह की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 
अंतागढ़ प्रकरण में रमन सिंह खुद जांच के घेरे में आ गए हैं। नान मामले में भी अब तब घिर सकते हैं। दामाद पुनीत गुप्ता पुलिस से भागे-भागे फिर रहे हैं। ऐसे समय में बृजमोहन के उस बयान से रमन को झटका लगा, जिसमें उन्होंने पुनीत के खिलाफ जांच पर यह कह दिया कि सरकार अपना काम कर रही है। जबकि रमन, सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगा रहे थे। 
सुनते हैं कि बदली परिस्थितियों में रमन सिंह को बृजमोहन की जरूरत महसूस हुई है और दोनों के बीच दूरियां खत्म करने की पहल भी की गई। पिछले दिनों दोनों हेलीकॉप्टर में भाटापारा कार्यकर्ता सम्मेलन में साथ-साथ गए। दोनों के बीच काफी कुछ चर्चा की भी खबर है। इसके बाद रमन सिंह ने बृजमोहन के विधानसभा क्षेत्र रायपुर दक्षिण के कार्यकर्ता सम्मेलन में भी शिरकत की। काफी दिनों बाद वे बृजमोहन के क्षेत्र के किसी कार्यक्रम में गए।
हल्ला तो यह भी है कि जिस 'सुपर सीएम' की वजह दोनों के बीच दरार आई थी, उससे रमन सिंह ने किनारा कर लिया। जबकि 'सुपर सीएम' कुछ दिन पहले तक पूर्व सीएम को नान प्रकरण में कानूनी सलाह दे रहे थे। जांच रूकवाने में कामयाबी नहीं मिल पाई, तो सरकार के खिलाफ सड़क की लड़ाई लडऩा ही एकमात्र विकल्प रह गया है, ऐसे में बृजमोहन का साथ भी जरूरी है। वैसे भी अब सत्ता नहीं रह गई है। बेटे की टिकट कट गई, तो आपसी लड़ाई का कोई फायदा नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 02-Apr-2019

भाजपा की प्रचार सामग्री तैयार हो गई है और एक-एक कर सभी लोकसभा क्षेत्रों में पहुंचाई जा रही है। प्रचार सामग्री में पीएम मोदी का कटआऊट भी है। साथ ही डॉ. रमन सिंह के भी कटआऊट भेजे जा रहे हैं। सुनते हैं कि एक-दो लोकसभा क्षेत्र से डॉ. रमन सिंह का कटआऊट नहीं भेजने का आग्रह किया गया। रायपुर में भी चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों की बैठक में डॉ. रमन सिंह का कटआऊट नहीं लगाने का सुझाव भी दिया गया। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि डॉ. रमन सिंह के खिलाफ मुहिम चल रही है और उनके दामाद की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है। ऐसे में उनका कटआऊट-पोस्टर लगाने से चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

दिलचस्प बात यह है कि कभी डॉ. रमन सिंह पार्टी का मुख्य चेहरा हुआ करते थे। वर्ष-2008 और वर्ष-2013 का विधानसभा का चुनाव उन्हीं के चेहरे पर लड़ा गया था, और पार्टी को जीत हासिल हुई थी। पिछले लोकसभा चुनावों में भी डॉ. रमन सिंह राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के स्टार प्रचारक हुआ करते थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद पार्टी के लोग उनसे कन्नी काटने लग गए हैं। हाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्टार प्रचारकों की सूची में उनका नाम नहीं है जबकि मप्र के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान का नाम प्रमुखता से रखा गया है। फिलहाल मोदी के चेहरे और उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार कर वोट मांगे जा रहे हैं। इससे पार्टी को कितना फायदा होता है, यह देखना है।  फिलहाल तो हाल यह है कि भाजपा की राष्ट्रीय लीडरशिप ने छत्तीसगढ़ के सारे के सारे बल्ब एक साथ बदल दिए हैं, इसलिए चुनावी नतीजे भी यह साबित नहीं कर पाएंगे कि जीत के जिम्मेदार कौन रहेंगे, या हार का जिम्मा किसका रहेगा। छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार नीरज मिश्रा ने एक समाचार-विचार पोर्टल पर छत्तीसगढ़ का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि अमित शाह-नरेन्द्र मोदी ने इस राज्य को तीसरे और चौथे स्तर की भाजपा-लीडरशिप को परखने की प्रयोगशाला बनाया है। पहले और दूसरे स्तर की सारी लीडरशिप खारिज कर दी गई है। नीरज ने लिखा है कि अगली संसद में देश भर से भाजपा के ऐसे चेहरे रहेंगे जो कि सीधे मोदी-शाह की पसंद रहेंगे।

एक और आईना भेंट
एक-दूसरे को आईने भेंट करने का सिलसिला कुछ और आगे बढ़ा है। कांगे्रस पार्टी से जुड़े हुए एक प्रमुख चिकित्सक, डॉ. राकेश गुप्ता ने अजय चंद्राकर को एक आईना भिजवाया है, और ऑनलाइन खरीदी की रसीद ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा है- स्वास्थ्य मंत्री रहते आपकी चौकीदारी में सरकार का दामाद करोड़ों की हेराफेरी करके भाग गया है। अस्पताल को गिरवी रख देने के लिए छत्तीसगढ़ की जनता आपसे जवाब मांग रही है। तोहफे में आईना भिजवा रहा हूं, अपना मुंह देखकर जवाब दें।

दुधारी तलवार
पिछली भाजपा सरकार में प्रदेश के मंत्री रहे, बस्तर के नेता महेश गागड़ा ने आज फेसबुक पर लिखा है- लोकसभा चुनाव के बीच एक बात सभी वर्गों के बीच से सुनाई दे रही है कि लोकसभा चुनाव होने दो, तब पता चलेगा। बाप रे?

इस पर जब लोगों ने पूछा कि महेश गागड़ा का इशारा किस तरफ है तो उन्होंने जवाब दिया- प्रदेश सरकार की ओर से आहट है, उनसे जुड़े हुए लोगों का इशारा है। इस पर एक ने लिखा- आपके कार्यकाल में विकास तो हुआ, पर इन पन्द्रह वर्षों में आपके कार्यकर्ताओं में घमंड उफान पर था। केवल और केवल अपना व्यक्तिगत हित साधने के लिए कुछ लोगों ने पार्टी के नाम और जिम्मेदारी का गलत फायदा उठाया है। मतलब यह कि सोशल मीडिया दुधारी तलवार रहता है, आप कोई चर्चा तो छेड़ सकते हैं, लेकिन वह किस तरफ मुड़ जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Apr-2019

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नरेन्द्र मोदी को आईना भेजकर एक शुरूआत कर दी है। कुछ मिनटों के भीतर ही भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव ने सांसद अभिषेक सिंह को आईना भेज दिया और कहा कि अपना चेहरा देखें। आने वाले दिन जैसे-जैसे मतदान करीब आएगा, हो सकता है कि कई और भाजपा नेताओं को आईने मिलें। यह बात कुछ सौ रुपये के आईने के एवज में लाखों की शोहरत दिलाने वाली है, और भूपेश बघेल की पहल कल सुबह तक देश भर के मीडिया में कई जगहों पर अच्छी खासी जगह पा लेगी। अब भाजपा के नेता इसके मुकाबले, मैंभीचौकीदार, जैसा कोई अभियान शुरू करें तो अलग बात है वरना कांगे्रस के इस चुनावी औजार में जो कल्पनाशीलता है, वह मुफ्त में प्रचार पाने वाली है। 

नींद हराम होने का सामान
एक वक्त के छोटे कस्बे धमतरी से निकली हुई एक लड़की बीमा एजेंट बनकर मॉडलिंग और छत्तीसगढ़ी फिल्मों तक तो पहुंची, लेकिन लोगों को ब्लैकमेल करते हुए वह जेल भी पहुंच गई, और उसका रंग-ढंग ऐसा रहा कि भाई ने ही थककर उसका कत्ल कर दिया, और लाश ठिकाने लगाने में मां ने भी मदद की। अब उसके रायपुर के घर से पुलिस को जो तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग मिली हैं, उसके फोन पर जो मैसेज और कॉल डिटेल्स मिले हैं, वे जांच के दर्जनों करोड़पतियों के दरवाजे तक ले जाने वाले हैं। यह अलग बात है कि कातिल को पुलिस पकड़ा जा चुका बता रही है, लेकिन ब्लैकमेलिंग का जो बाकी सिलसिला है, उसका सामने आना बाकी है, और लोगों को यह भी अंदेशा है कि जिन हाथों में ब्लैकमेलिंग के लायक इतनी रिकॉर्डिंग है, उन हाथों से उसका बेजा इस्तेमाल भी हो सकता है। फिलहाल जिन लोगों ने इस युवती या इसके साथ की दूसरी युवतियों के साथ रातें जागते हुए गुजारी होंगी, अब वे फिक्र में रातें जागते हुए गुजार रहे हैं। 


Date : 31-Mar-2019

महासमुंद लोकसभा सीट हमेशा हाईप्रोफाइल रही है। यहां से दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री बृजलाल वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सांसद रहे हैं। ये सब नेता राष्ट्रीय राजनीति में दखल रखते थे। इसी सीट से संत कवि पवन दीवान भी सांसद रहे जो कि पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन को चलाने वाले शुरूआती लोगों में से एक थे, और जनता पार्टी के दिनों में वे अविभाजित मध्यप्रदेश के जेल मंत्री थे। अपने साधू जैसे हुलिए की वजह से वे मंत्री बनते ही खूब खबरों में रहते थे। महासमुंद सीट पर बड़े नेताओं के लगातार लडऩे की वजह से यहां प्रचार में काफी खर्च किया जाता रहा है। पिछले चुनाव में चंदूलाल साहू ने अजीत जोगी को हराकर सबको चौंका दिया था। चुनाव में चंदूलाल साहू को निपटाने के लिए दर्जन भर दूसरे चंदूलाल साहू खड़े किए गए थे, और उन सबको मिलाकर आधा-पौन लाख वोट मिले भी थे। इस बार चंदूलाल चुनाव मैदान में नहीं हैं। भाजपा ने उनकी जगह चुन्नीलाल साहू को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस से दिग्गज नेता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू मुकाबले में हैं। 

धनेन्द्र और चुन्नीलाल, दोनों ही साहू समाज से हैं। वर्ष-2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी थी। तब भाजपा से चंदूलाल और कांग्रेस से मोतीलाल साहू, चुनाव मैदान में थे। दोनों नेताओं ने एक तरह से मिलकर चुनाव लड़ा था। उन्होंने अघोषित रूप से प्रचार के नाम पर फिजूल खर्च को रोक दिया था। तब प्रचार के लिए पैसे की आस रखने वाले दोनों ही पार्टी के कार्यकर्ता काफी निराश थे और ग्रामीण इलाकों में नारा चर्चा में था कि लादेन न बुश, दोनों डहर साहू खुश। अब दस साल बाद फिर साहू आमने-सामने हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या इस बार पुराना नारा गूंजेगा। 

सबकी इज्जत रह गई
राजेश मूणत पार्टी की सरकार और अपना मंत्रीपद जाने के बाद कल पहली बार आक्रामक तेवर लेकर सामने आए। कांगे्रस पार्टी के एक पदाधिकारी ने कांगे्रस भवन से भाजपा कार्यालय तक घोटालों की बारात निकालने का एक नाटक किया था जिसमें घोड़ी सवार दूल्हे भी भ्रष्टाचार का प्रतीक बने चल रहे थे। सुबह-सुबह ही मूणत ने ट्विटर पर पोस्ट कर दिया था कि भाजपा कार्यालय आकर देखें, ऐसा जवाब दिया जाएगा कि आबर-बाबर सब याद आ जाएगा। चूंकि यह बारात एक मुस्लिम पदाधिकारी ने निकाली थी, इसलिए बाबर का उलाहना मायने रखता था। इसके बाद भाजपा के कार्यकर्ता अपने दफ्तर एकात्म परिसर के बाहर सड़क पर जूते लेकर बैठ गए थे कि बारात आए, तो उसका स्वागत करें। लेकिन पुलिस को सारे माहौल का अंदाज था, और उसने रास्ते में ही बारात का विसर्जन करवा दिया। राजेश मूणत की चेतावनी पर अमल की नौबत नहीं आई। राजनीतिक तनातनी के बहुत से ऐसे ही प्रदर्शन रहते हैं जिनमें पुलिस और फोटोग्राफर न हों, तो प्रदर्शन ही न हों, और न ही उनका जवाब हो। फिलहाल बारात निकलने से एक पार्टी की इज्जत रह गई, और स्वागत की असल नौबत न आने से दूसरी पार्टी की इज्जत रह गई। मीडिया और पुलिस अलग-अलग काम करते हुए भी कई लोगों की इज्जत बचाने का काम करते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)