विचार / लेख

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Date : 21-Feb-2020

आज महाशिवरात्रि का दिन है। आपको हर जगह मार्केट में फूलों की दुकान पर एक ऐसा फल दिखेगा, जिसमें कांटे भी होंगे। इस फल का नाम धतूरा है। भगवान शिव का ये प्रिय फल आपकी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। हालांकि इसका इस्तेमाल केवल ऊपर से करना है।
यह आपकी चोट के दर्द को चुटकियों में दूर कर सकता है। इसके अलावा भी इसके कई फायदे हैं, जिनके बारे में नीचे पूरी जानकारी दी जा रही है। इस बात का विशेष ध्यान दें कि धतूरे को खाने के लिए बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करना है। यह जानलेवा भी हो सकता है।
फायदे जानने से पहले यह बात जान लें कि इसे केवल त्वचा पर इस्तेमाल करना है। इसे खाना नहीं है, क्योंकि इसमें कुछ जहरीले तत्व भी पाए जाते हैं। ओरल रूप में किया गया इनका सेवन जानलेवा भी हो सकता है। खासकर इसे बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
​कान के किसी भी रोग में करें उपयोग
कान में दर्द और सूजन की स्थिति में आप धतूरे का प्रयोग कर सकते हैं। धतूरे में एंटी-इन्फेल्मेट्री और एंटी-सेप्टिक गुण पाया जाता है। इस कारण से यह कान की इस समस्या को खत्म करता है।गंजेपन से परेशान लोग इसके रस को प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं। इसके रस में ऐसे विशेष गुण होते हैं, जो सीबम को स्वस्थ करते हैं और गंजेपन की समस्या को रोक देते हैं।
​गंजेपन की समस्या को करता है खत्म
गंजेपन से परेशान लोग इसके रस को प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं। इसके रस में ऐसे विशेष गुण होते हैं, जो सीबम को स्वस्थ करते हैं और गंजेपन की समस्या को रोक देते हैं।
​हड्डियों के जोड़ बनाता है मजबूत
हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए भी धतूरे का उपयोग किया जाता है। धतूरे में कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाई जाती है। इसका रस निकालकर हड्डियों के जोड़ पर मालिश करने से यह स्किन पोर से सोख लिया जाता है। जिससे हड्डियों को मजबूती मिलती है।
​चुटकियों में दूर होंगे कई दर्द
अगर आपको किसी प्रकार का दर्द है तो आप इसके जरिए उसे चुटकियों में दूर कर सकते हैं। धतूरे को पीसकर इसका पेस्ट बना लें और इसमें दो चार बूंद शहद की मिला लें। अब इसे दर्द वाले स्थान पर लगा लें। एंटीसेप्टिक गुण होने के कारण इसका पेस्ट आपके दर्द को ठीक कर देगा।
​​चोट की सूजन को करता है दूर
धतूरे के फल में एंटीइन्फ्लेट्री गुण पाया जाता है, जिसके कारण से यह चोट की या सामान्य रूप से हुई सूजन को कम कर देता है। चोट की सूजन को दूर करने के लिए इसके फलों को खूब अच्छी तरह कूट लें। पेस्ट बनाकर इसे सूजन वाली जगह पर लगाकर राहत पाई जा सकती है। प्राइवेट पार्ट में क्रिकेट आदि खेलने के दौरान होने वाली सूजन को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

 


Date : 21-Feb-2020

पुष्यमित्र

बसंत के मौसम में शिव के विवाह की वर्षगांठ आज आप सबको को मुबारक हो। पता नहीं सनातन धर्मावलंबियों ने क्यों इस अद्भुत देव को संहारक की उपाधि दे दी। इनका बाह्य आवरण भले ही एक औघड़ संन्यासी का लगता हो, मगर दिल से वे अनन्य प्रेमी और सद-गृहस्थ ही लगते हैं। तभी अविवाहित युवतियां शिव जैसे पति की कामना करती हैं। वैसे पति के लिए 16 सोमवार का व्रत रखती है।
यह दिलचस्प है कि विष्णु और उनके अवतार राम जैसे एक पत्नी व्रती और कृष्ण जैसे 16 हजार कन्याओं को छोड़ कर सनातन महिलाओं ने आदर्श प्रेमी और पति के रूप में शिव को मान्यता दी, जो स्वभाव से ही फक्कड़ है। वह अपने परिवार को कोई सुख नहीं देता, मगर सनातन धर्म का संभावत: अकेला देव है जो अपने भरे पूरे परिवार के साथ सार्वजनिक रूप से दिखता है। उसके लिए उसकी पत्नी भांग भी पीस देती है, उसके तमाम नखरे उठाने के लिए तैयार रहती है।
वह एक पत्नी व्रती भी नहीं है। उसका मन पुरुष से स्त्री बने विष्णु के मोहिनी अवतार पर भी डोल जाता है। काली जैसी क्रोधित हो जाने वाली देवी और हिमालय से वेग के साथ उतरी गंगा जैसी स्त्रियों को वही वश में कर पाते हैं। क्या शिव भारतीय मिथकों के आदर्श पुरुष और प्रेमी हैं?
यह शिव ही हैं जिन्हें स्त्रियां अपने रूप से रिझाती हैं, कामदेव उन्हें अपने प्रयोग का निमित्त बनाते हैं। यह वही शिव हैं जो अपनी पत्नी की मृत्यु पर इतने बावले हो जाते हैं कि उन्हें शांत करना मुश्किल हो जाता है। यह वही शिव हैं जिन्हें देखकर कर्मयोगी ऋषियों की पत्नियां बावली हो जाती हैं। यह वही शिव हैं जिनकी पूजा उनके लिंग के स्वरूप में होती है।
हिन्दू धर्म में शिव को देवता के रूप में देर से मान्यता मिली। अमृत मंथन के वक़्त उन्हें देवों के हिस्से का अमृत नहीं मिला, उन्होंने असुरों के हिस्से का विषपान किया। असुर उनसे अक्सर वरदान लेते रहे। हालांकि वे छले भी जाते रहे। उनका अनगढ़ व्यक्तित्व अन्य देवों के समझ से परे था, मगर सनातन स्त्रियों ने उन्हें खूब समझा और अपना माना।
आज भी पूर्वी भारत में शिव गुरु के नाम से एक सम्प्रदाय काफी प्रसिद्ध है, जिसकी प्रचारक घरेलू महिलाएं हैं। उनका शैव सम्प्रदाय देवियों के पूजक शाक्त सम्प्रदाय के काफी करीब है। सभी शाक्त देवियों का शिव से कोई न कोई रिश्ता रहा है। यही वजह है कि शिव को एक अनन्य प्रेमी के बदले संहारक कहना मुझे जँचता नहीं है।
(यह मिथिला पेंटिंग अर्चना मिश्रा जी की वाल से साभार)

 

 


Date : 21-Feb-2020

देवेंद्र शाडिल्य

शिव एकलौते ऐसे हैं जो अपने विवाह को अपने फॉलोवर्स के साथ हर साल सेलिब्रेट करते हैं, धूमधाम से डीजे और बारात निकालकर। बाकी शादियां तो उनके साथ वालों की भी हुई हैं और बाद वालो की भी लेकिन हम नहीं जान पाए कि ये कब हो गया। उनका विवाह इतिहास का हिस्सा नहीं बन पाया। ना ही यादों का।
शिव एकलौते ऐसे हैं जो अपनी पत्नी की पूजा अलग से करवाते हैं। उनकी पर्सनाल्टी बड़ी थी लेकिन उन्होंने अपनी पर्सनाल्टी से फैमिली के बाकी लोगों को फेड या ब्लर नहीं किया। उनके बड़े बेटे देश के अलग राज्यों में पूजे जाते हैं और छोटे बेटे अलग राज्य में। दोनों बेटों ने भी कभी एक-दूसरे की सीमाओं में अतिक्रमण करने का प्रयास नहीं किया।
सबको स्पेस देने का मामला सिर्फ बीवी बच्?चों तक सीमित नहीं रहा। सवारी करने वाले नंदी की पूजा अलग होती है और धारण करने वाले सर्प और गंगा की अलग। शिव अपने कामों से यह दिखाते हैं कि ऐसा सोचना गलत है कि परिवार में सिर्फ वही महत्वपूर्ण हैं।
शिव की पर्सनाल्टी को एक्सप्लोर करने वाला जो भी लिटरेचर हमारे पास उपलब्ध है वो दर्शाता है कि उस इंसान का पूरा जीवन डाउन टू अर्थ बीता। उनका रहन-सहन, खाने पीने का पैटर्न, दोस्त यार सब कुछ सहज। एक सर्वशक्तिमान के पास से इलीट होने की बू कभी नहीं आई। वह बहुत बड़े हैं उसका आतंक उन्होंने अपने अगल-बगल वालों पर तारी होने नहीं दिया।
शिव को भांग और गाजे का शौकीन दिखाया गया है। वह इसे छिपकर नहीं सरेआम लेते हैं। नशा व्यक्ति की जिंदगी का एक पहलू होता है उसकी पूरी पर्सनाल्टी नहीं। शिव इस बात की तस्दीक करते हैं और यह कहने की कोशिश करते हैं कि किसी व्यक्ति को जज इसलिए ना किया जाए कि वह फला चीज खाता है, फला कपड़े पहनता है और फला लोगों के साथ रहता है। शिव की बारात जो दृश्य है वह समाजवाद का बेहतरीन प्रतीक है। उनकी बारात में चलने के लिए इस कायनात के सबसे सोफेस्टिकेटेड और पॉवरफुल लोग खुशी से तैयार होते। लेकिन वह किसको लेकर गए इससे आप वाकिफ हैं।
भारत, खासकर उत्तर और मध्य भारत में सबसे ज्यादा मंदिर शिव के हैं। वह गांव हों, कस्बे हों या शहर। प्राचीन शिवाले हर तरह के लोगों के बैठने का एक स्?थान रहे हैं। कभी भी यह आतंक ही मन में नहीं आया कि शिव की चौखट में बैठने के लिए कुछ डेकोरम और रुल्स फॉलो करने होंगे। उनकी चौखट में बैठकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी बतियाई गई है और चिलम के कश भी लगते दिखे है। शिव सबको अपने में समाहित करने वाले हैं।
ऐसे समय जब मंदिर और आस्?था को एक वीपेन की तरह काम में लाया जा है शिव इसमें एक अवरोध की तरह दिखते हैं। वह धर्म की अफीम को इतना बड़ा नहीं करते कि वह नशे की तरह नशों में फैल जाए। वह नशे को नशे की तरह देखते हैं और धर्म को धर्म की तरह...
बचपन से होश संभालने के बाद हम सबने यही जाना था कि धर्म और ईश्वर हमारी रक्षा करता है। इधर पिछले कुछ सालों से यह उल्टा हो गया। हमें बताया गया कि नहीं ऐसा नहीं है। हम गलत पैटर्न पर हैं। दरअसल हमें धर्म और ईश्वर की रक्षा करनी है। आस्?था और धर्म के इस बदले पैटर्न के बीच भी शिव उसी परंपरा में कायम हैं जहां ईश्वर व्यक्ति की रक्षा करता है।
शिव और पार्वती जी को विवाह की बहुत बहुत शुभकामनाएं...। 

 


Date : 21-Feb-2020

जोनाथन मार्कस

आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2018 से 2019 के बीच जर्मनी ने अपना रक्षा बजट 9.7 फीसदी बढ़ाया है। साल 2019 में दुनिया भर में रक्षा पर होने वाला खर्च 2018 के बनिस्बत चार फीसदी बढ़ गया। बीते दशक के किसी एक साल में होने वाली ये सबसे बड़ी वृद्धि थी।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ ने कुछ रोज़ पहले ही म्यूनिख सिक्योरिटी कांफ्रेंस में अपनी सालाना रिपोर्ट मिलिट्री बैलेंस जारी किया है जिसमें ये आंकड़े शामिल किए गए हैं।
यूरोप में भी रक्षा ख़र्चों में बढ़ोतरी हुई है जबकि वित्तीय संकट से पहले वहां ये चलन नहीं देखा गया था। साल 2018 में यूरोपीय देशों ने रक्षा बजट दो फीसदी की दर से बढ़ाया था जबकि पिछले साल ये वृद्धि चार फीसदी थी। ये बताता है कि दुनिया बदल रही है और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा फिर से लौट रही है।
आईएनएफ समझौता अंतरमहाद्वीपीय और कम दूरी की मिसाइलों पर रोकथाम के लिए अमरीका और सोवियत संघ के बीच हुआ था। आईएनएफ़ समझौता अंतरमहाद्वीपीय और कम दूरी की मिसाइलों पर रोकथाम के लिए अमरीका और सोवियत संघ के बीच हुआ था
चीन और अमरीका ने साल 2019 में रक्षा पर होने वाला अपना ख़र्च 6.6 फीसदी की दर से बढ़ा दिया है। हालांकि अमरीका का रक्षा बजट लगातार बढ़ रहा है जबकि चीन के मामले में इसकी रफ़्तार सुस्त है।
एशिया का उदाहरण देखें तो वहां क्षेत्रीय ताक़त के तौर पर चीन के उभरने के साथ ही इस महादेश का रक्षा पर होने वाला खर्च बढ़ता रहा है और ये सिलसिला लगातार जारी है। एशिया में बीते एक दशक में सामान्य रक्षा खर्चों पर 50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। इसकी एक वजह तो एशिया की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का बढऩा भी है।
मिलिट्री बैलेंस की रिपोर्ट ये बताती है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल में होने वाली दिक्कतों का असर रक्षा बजट से जुड़ी बहसों पर पड़ता है। एशिया में बीते एक दशक में सामान्य रक्षा खर्चों पर 50 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।
एशिया में बीते एक दशक में सामान्य रक्षा खर्चों पर 50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है
दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तौर तरीकों को अब चुनौती दी जा रही है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है कि दुनिया में आज की तारीख में निशस्त्रीकरण के जितने भी समझौते हैं, उन पर शीत युद्ध की छाया महसूस की जा सकती है।
मिलिट्री बैलेंस की रिपोर्ट में इंटरमीडिएट रैंक न्यूक्लियर फ़ोर्सेज़ ट्रीटी यानी आईएनएफ समझौते के ग़ायब हो जाने का भी जिक्र है। ये समझौता अंतरमहाद्वीपीय और कम दूरी की मिसाइलों पर रोकथाम के लिए अमरीका और सोवियत संघ के बीच हुआ था।
पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने औपचारिक तौर पर इसे खत्म कर दिया। मानवरहित विमानों की मौजूदगी बढ़ी है, साथ ही इसे नष्ट करने वाली टेक्नॉलॉजी की मांग भी की।  मानवरहित विमानों की मौजूदगी बढ़ी है, साथ ही इसे नष्ट करने वाली टेक्नॉलॉजी की मांग भी
परमाणु हथियारों को कम करने के लिए रूस और अमरीका के बीच हुए न्यू स्टार्ट ट्रीटी के भविष्य को लेकर भी जानकार सशंकित हैं। न्यू स्टार्ट ट्रीटी की मियाद ख़त्म होने में एक साल से भी कम समय बचा है। दो परमाणु ताक़तों के हथियारों के जखीरे की हद तय करने वाला ये एकमात्र समझौता है जो इस समय वजूद में है।
रूस के बर्ताव के लेकर नैटो देशों की चिंताएं लगातार बनी हुई है और इसका असर नैटो देशों के बढ़ते रक्षा बजट पर देखा जा सकता है।
यूरोप का खर्च भी बढ़ रहा है। रक्षा खर्च के मामले में यूरोप साल 2019 में उस स्तर पर वापस आ गया जहां वो वित्तीय संकट के शुरू होने के समय 2008 में था।
रिपोर्ट ये संकेत देती है कि रक्षा खरीद, रिसर्च और विकास में पहले से ज़्यादा रकम खर्च की जा रही है। आईआईएसएस की रिपोर्ट बताती है कि यूरोपीय देशों के रक्षा ख़र्चे में हुई कुल वृद्धि का एक तिहाई अकेले जर्मनी के हिस्से से रहा है। 
आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2018 से 2019 के बीच जर्मनी ने अपना रक्षा बजट 9.7 फीसदी बढ़ाया है। हालांकि नैटो का इरादा है कि उसके सदस्य देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का दो फ़ीसदी रक्षा पर खर्च करें लेकिन जर्मनी ने ये वादा पूरा नहीं किया है।
नैटो के केवल सात देशों ने ये लक्ष्य पूरा किया है। वो हैं, बुल्गारिया, ग्रीस, इस्टोनिया, रोमानिया, लातविया, पोलैंड और ब्रिटेन।
रणनीति के स्तर पर रूस और चीन दोनों ही देश हाइपरसोनिक टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। इसके तहत हाइपरसोनिक ग्लाइडिंग व्हीकल्स, हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें और ऐसे सुपरफास्ट सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं जो मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली को चुनौती दे सकते हैं। रिपोर्ट क्रीमिया में रूस की शुरुआती कार्रवाई से लेकर पूर्वी यूक्रेन में दखलंदाज़ी को लेकर रूस के इनकार तक का जिक्र है।
ये रिपोर्ट न केवल किसी देश की सैन्य ताकत और खुफिया काबिलियत को दर्शाती है बल्कि ये भी बतलाती है कि कोई देश खुद नए तौर तरीकों को अपनाने के लिए कितना तैयार है। (बीबीसी)


Date : 20-Feb-2020

साकिब सलीम
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक राजनीतिक शाखा है। इस पार्टी के अधिकतर बड़े नेता, फिर चाहे वह अटल बिहारी वाजपयी हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सक्रिय राजनीति में आने से पहले आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। यह कहना गलत न होगा कि भाजपा के शरीर में संघ की ही रूह बसती है।
हम सभी यह जानते हैं कि माधव सदाशिव या ‘गुरूजी’ गोलवलकर आरएसएस के वैचारिक एवं बौद्धिक गुरु हैं। उनके विचार आज भी संघ का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी पुस्तक ‘अ बंच ऑफ थॉट्स’ संघ के लिये आज भी प्रेरणास्रोत मानी जाती है। अगर हम गुरूजी के राजनीतिक विचारों और उनकी अपने समय के राजनीतिज्ञों की आलोचनाओं पर ध्यान दें तो पायेंगे कि आज की भाजपा उनसे शायद ही प्रभावित है।
मिसाल के तौर पर उनकी पुस्तक के खंड तीन में मौजूद अध्याय 24वें अध्याय - ‘फाइट टू विन’-पर नजर डालते हैं जो उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान लिखा था।
‘जब हम अपने महान नेताओं को ये सब बताने लगते हैं तो वे कहते हैं कि देश की इस मुश्किल घड़ी में सरकार की आलोचना न कीजिये’ गुरू गोलवलकर सरकार की आलोचना को देशहित में सबसे ज़रूरी बताते हुए लिखते हैं, ‘क्या वे ये चाहते हैं कि हम उनके हर निर्णय को शत-प्रतिशत सही मान लें? क्या ऐसी चापलूसी से देश का कोई भला हो सकता है? यदि उनकी सारी पालिसी और निर्णय ठीक होंगे तो खुद ही कोई आलोचना नहीं करेगा। दूसरी ओर अगर उनमें कोई ख़ामी है तो देशभक्त नागरिक होने के नाते यह हमारा फज़ऱ् बनता है कि हम उनको गलती का अहसास कराकर उन्हें सही करें।’
अब इसकी तुलना आज की भाजपा सरकार से कीजिये जहां हम आये दिन सुनते हैं कि फलां मंत्री, सांसद या विधायक ने सरकार की आलोचना करने वालों को देशद्रोही कह दिया। नोटबंदी के बाद भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने, जिनमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हैं, सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया। भाजपा के बंगाल अध्यक्ष ने तो यह तक कह दिया कि दिल्ली में नोटबंदी का विरोध करने पर वे ममता बनर्जी को पुलिस से पिटवा भी सकते थे।
भाजपा नेताओं के ये बयान उस संस्कार से मेल खाते नहीं दिखते जो गुरूजी उन्हें सिखाना चाहते थे। बल्कि वे तो यहां तक लिखते हैं कि, ‘यह तथ्य कि हमारे नेता आलोचना के इतना खिलाफ हैं यह समझने में मदद करता है कि उनको आलोचना की जरूरत है।’ गुरूजी की मानें तो ईमानदार लोगों की आवाज़ दबाना स्टालिन और हिटलर की तानाशाही जैसा ही है। और वे यह भी याद दिलाते हैं कि इनकी तानाशाही अधिक समय तक न टिक सकी थी। आज उनको कोई अच्छे नाम से याद नहीं करता।
दूसरा फर्क़ जो गुरूजी की शिक्षा से आज की भाजपा में देखने को मिल रहा है वह यह है कि गुरूजी व्यक्तित्व पंथ या ‘पर्सनेलिटी कल्ट’ के बिल्कुल खिलाफ थे। आज यह बात जगजाहिर है कि किस प्रकार भाजपा के छोटे-बड़े सभी नेता प्रधानमंत्री मोदी के लिये ‘भक्ति’ की हद तक जा पहुंचे हैं। उनकी मानें तो नरेंद्र मोदी न तो कुछ गलत कर सकते हैं और न ही उन्होंने कभी ऐसा किया है।
गुरूजी उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में लिखते हैं, ‘हम प्रधानमंत्री की इज्जत करते हैं और मानते हैं कि वे एक महान वैश्विक नेता हैं। परन्तु हम उनकी चापलूसी नहीं कर सकते, न ही उनके हर कदम को हमेशा सही मान सकते हैं।’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘व्यक्तित्व पंथ न केवल हमारे समाज और संस्कृति से बाहर का है, यह राष्ट्रहितों को नुकसान भी पहुंचाता है।’
इसे समझाने के लिये वे दो उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार पानीपत के तीसरे युद्ध में जब सदाशिवराव भाऊ हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठे तो दिखाई न देने के कारण उनकी सेना को लगा कि उनकी मौत हो गई। इससे सेना का मनोबल टूट गया और वह तितर-बितर हो गई। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि यहां एक व्यक्ति ही प्रेरणास्रोत था न कि कोई विचारधारा।
दूसरी ओर मराठों का कोई भी प्रतिनिधि राजा शिवाजी की मौत के 20 बरस बाद तक भी उनके बीच मौजूद नहीं था। संभाजी की हत्या हो चुकी थी। शाहू मुगलों की कैद में थे। और राजाराम भी जिंजी में नजरबंद ही थे। तब भी बीस साल तक मराठे औरंगज़ेब की मौत तक उसकी सेना से लड़ते रहे। क्योंकि उनका प्रतिनिधित्व कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार कर रहा था।
गुरूजी विचार को किसी भी व्यक्ति से ऊपर रख कर देखते थे और उनके अनुसार व्यक्ति विशेष का अनुयायी होने से विचारों की लड़ाई को भारी धक्का पहुंचता है। लेकिन आज की भाजपा इस पाठ को भूल हर तरह से यह मनवाने में लगी हुई है कि कुछ चुने हुए व्यक्तियों द्वारा लिया हुआ हर फैसला न केवल सही होता है बल्कि केवल वही देश का उद्धार कर सकता है। और एक चीज जो कि खासतौर पर नोटबंदी के संदर्भ में याद रखने वाली है वह यह कि जहां एक ओर सरकार आम जनता को धैर्य का पाठ पढ़ा रही थी और कम खर्च करने को कह रही थी तो दूसरी तरफ उसके अपने कई नेता ही ऐसा नहीं कर रहे थे। नितिन गडकरी व अन्य दिग्गज नेता खुलेआम शादी इत्यादि पर पैसा बहा रहे थे जबकि जनता से कहा जा रहा था कि वह संयम बरते। ताजा खबर यह भी है कि इस आम चुनाव में भाजपा ने सबसे ज्यादा खर्च किया और इसका आंकड़ा 27 हजार करोड़ रू. तक पहुंच गया।
गुरूजी इस संबंध में लिखते हैं, ‘बेशक ये आमतौर पर जनता को किफायत करने को कहते हैं। लेकिन जिस तरह से वे ख़ुद फिजूलखर्ची कर रहे हैं उससे लगता है कि देश के सामने कोई ख़ास समस्या है ही नहीं।’
यानी गुरू गोलवलकर के साहित्य को करीब से पढ़ा जाये तो ऐसे कई मौके आयेंगे जब लगेगा कि भाजपा वैचारिक रूप से उनकी शिक्षाओं से बहुत दूर निकल आई है। (सत्याग्रह)

 


Date : 20-Feb-2020

विष्णु नागर
मैं दिल्ली में आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं, लेकिन लोग पहले भी कहते थे और अब मैं भी कहना चाहता हूं कि यह पार्टी बगैर किसी विचारधारा के चल रही है। अभी उसका काम इसलिए अच्छी तरह चल रहा है कि उसकी पार्टी की सरकार ने सचमुच कुछ काम किए हैं। वही काम भाजपा के घृणित प्रोपेगेंडा के बीच भी काम आया है। ऐसा होना भी चाहिए था।
लेकिन केजरीवाल की जिस राजनीतिक परिपक्वता की बहुत तारीफ हो रही है,उससे मैं बहुत सहमत नहीं हूं। परिपक्वता यह है कि आपको अपने पिछले पांच साल के काम पर भरोसा तो था मगर इतना भरोसा भी नहीं था कि आप शाहीनबाग पर खुलकर स्टैंड ले सकें। 
आपको भरोसा था काम पर मगर आपने राज्यसभा में सीएए का विरोध किया मगर चुनाव में चुफ रहे। भरोसा तो था मगर मोदी से इतने डरे हुए भी थे और हैं कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में तमाम मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित करने का साहस भी नहीं कर पाए क्योंकि इससे मोदीजी को यह लगता कि आप भाजपा और मोदी विरोधी मंच की तरह शपथग्रहण समारोह का इस्तेमाल कर रहे हैं। आप मंच पर आम आदमियों के नाम पर शिक्षकों से लेकर सेवक तक को बुलाकर एक नया संदेश देते हैं मगर फिर प्रधानमंत्री को बुलाकर अपनी ही बात पर गोबर भी पोत देते हैं। आप त्रिशंकु बन रहे हैं। कोई आप पर भरोसा नहीं कर सकता, सिवाय आपकी अपनी पार्टी के। आप तो कांग्रेस, राजद,समाजवादी पार्टी और यहां तक कि इन मामलों में बसपा से भी गए बीते साबित हुए। वैसे केजरीवालजी आपकी महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय दल बनने की है-बगैर विचारधारा का राष्ट्रीय दल वाह-वाह।
इतनी व्यवहारिकता भी अच्छी नहीं। आप भूल रहे हैं कि केंद्र शासित प्रदेश होने के बावजूद जो बहुत से अधिकार आपको मिले हैं, वे मोदीजी ने नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं। उसके बाद भी अड़ंगेबाजी उपराज्यपाल की ओर से जारी रही है। पिछले पांच सालों में भाजपा के तीन विधायक 67 सीटों से जीती सरकार के साथ शोभनीय और संसदीय गरिमा के अनुकूल व्यवहार नहीं करते रहे हैं।  अब आठ हैं तो कारण से अधिक अकारण शोरगुल मचाते रहेंगे। चुनाव में भी भद्रता और संसदीय मर्यादा की धज्जियां शाह मोदी समेत सबने उड़ाई। मोदी-शाह की जोड़ी उन्हीं के सारे अपराध और जो अपराध नहीं भी है,क्षमा करती है,जो पूरी तरह उनके साथ आ जाएं। और अगर सीएए की तरह साथ आकर, कश्मीर में धारा 370 हटाने पर चुप रहकर आप वर्चुअली भाजपा की गोद में जाने की तैयारी कर रहे हैं तो यह भयानक है।
 इस तरह का समझौतावाद आपको गड्ढे में ले जाएगा। आप इस प्रकार अगले पांच सालों में कुछ खास कर दिखाएंगे,  इसकी विशेष आशा नहीं है। आपने शक्ति लडऩे-भिडऩे से प्राप्त की है। आप गलतफहमी में हैं कि आपके इस नए रुख से मोदी-शाह आप पर अधिक कृपावान हो जाएंगे, बल्कि अधिक हावी होते जाएंगे और आप तथा आपकी पार्टी को कहीं का नहीं छोड़ेंगे। शत्रु सब होंगे, मित्र कोई नहीं। फिर भी आस अभी पूरी तरह छोड़ी नहीं है मगर रास्ता आशाहीनता की तरफ जाता हुआ लगता है। शायद मैं गलत साबित होऊँ, जिसकी मुझे खुशी होगी।

 


Date : 20-Feb-2020

हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का दंतेवाड़ा जिला राष्ट्रीय स्तर पर एक और बार सुर्खियों में रहा। महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर भारत के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिने जाने वाले इस आदिवासी जिले के एक पोलियोग्रस्त बालक में क्रिकेट को लेकर ललक देखकर हैरान थे। दिव्यांग बालक मड्डाराम के वीडियो को शेयर करते हुए सचिन ने लिखा- 2020 की शुरुआत इस प्रेरणादायक वीडियो से कीजिए।
कभी नक्सल हिंसा से ग्रस्त रहा दंतेवाड़ा जिला भी मड्डाराम की तरह अपने हौसले से उपलब्धियां हासिल कर रहा है। उपलब्धियां यह कि जिले में नक्सल घटनाओं में भारी कमी आई है। कुपोषण का स्तर लगातर कम हो रहा है। यहां की महिलाएं सेनेटरी नैपकिन उत्पादन जैसे अपारंपरिक उद्यम से हजारों की तादाद में जुड़ रही हैं। जैविक उत्पादों के मामले में दंतेवाड़ा एक ब्रांड बन चुका है। 
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं- यदि हमने हाथों को हल नहीं दिए तो वे बंदूक थाम लेंगे। नक्सलवाद के खात्मे का यही एकमात्र उपाय है। वे कहते हैं- कुपोषण और मलेरिया जैसी समस्याओं का जड़ से खात्मा करना पहली जरूरत है, क्योंकि ये नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक हैं। श्री बघेल की इसी सोच को दंतेवाड़ा में परिणामों के रूप में परिणित होते देखा जा सकता है।
यह महज संयोग नहीं है कि श्री बघेल छत्तीसगढ़ के लिए अपनी हर महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत दंतेवाड़ा जिले से करते हैं। छत्तीसगढ़ को कुपोषण से मुक्त करने के अभियान की शुरुआत वहीं से हुई, बस्तर संभाग को मलेरिया से मुक्त करने की मुहिम का आगाज भी वहीं से हुआ और अब छत्तीसगढ़ के पिछड़े क्षेत्रों को गरीबी के दंश से मुक्त करने के लिए इसी जिले को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चुना गया है। दंतेवाड़ा में – पूना दंतेवाड़ा माड़ाकाल- अभियान की शुरुआत हो चुकी है। पूना दंतेवाड़ा माड़ाकाल स्थानीय गोंडी भाषा का वाक्य है, जिसका अर्थ है- नया दंतेवाड़ा गढ़ेंगे।
दंतेवाड़ा जिले में गरीबी का प्रतिशत 70 है, जो कि राष्ट्रीय औसत 22 प्रतिशत से बहुत ज्यादा है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस जिले को देश के अति पिछड़े जिलों की श्रेणी से मुक्त करते हुए विकसित जिले की श्रेणी में ला खड़ा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। नयी कार्ययोजना में वनोपजों की सही कीमत और पर्याप्त आय दिलाना उच्च प्राथमिकता में है। इस वर्ष सरकार ने 22 लघु वनोपजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का निर्णय लिया है। खरीदी की ठोस व्यवस्था होने से अब 30 करोड़ रुपए के वनोपज की उचित दर प्राप्त होगी। 
बालूद ग्राम पंचायत में 100 करोड़ रुपए की लागत से वनोपज प्रसंस्करण हब की स्थापना की जा रही है। इस पूरी योजना से 5000 परिवारों को प्रति परिवार 25 हजार रुपए की सालाना आय प्राप्त होने की संभावना है। 
जिले में 9 हजार 534 लोगों को वन अधिकार पट्टा प्राप्त है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इन लोगों की भूमि का विकास करके मसाला, कोसा, मुनगा, कॉफी और वनौषधियों का उत्पादन किया जाए। इन प्रयासों से प्रति परिवार 30 हजार रुपए की सालाना आमदनी होने की उम्मीद है। 
बांस के विदोहन और प्रसंस्करण से 28 गांवों के लगभग 1500 परिवारों के लिए 30 से 35 हजार रुपए की सालाना आमदनी सुनिश्चित की जा रही है। जैव विविधता पंजी के निर्माण के लिए 143 ग्राम पंचायतों के 10वीं पास युवक-युवतियों को प्रशिक्षण देकर 6 हजार 500 रुपए प्रति माह प्रदान करने की व्यवस्था की जा रही है। सब्जी और फलोत्पादन से 387 किसान परिवारों को 40 हजार रुपए की सालाना आमदनी प्राप्त हो रही है। स्व सहायता समूहों की महिलाएं अमचूर और आचार का निर्माण कर आय प्राप्त कर रही हैं। 50 परिवार दो डेयरी यूनिटों के माध्यम से 30 हजार रुपए की सालाना आय प्राप्त कर रहे हैं। 4 और यूनिटें प्रक्रियाधीन है। जिले की 2002 स्व सहायता समूहों में लगभग 20 हजार 857 महिलाएं कार्यरत हैं। इनमें से 262 स्व सहायता समूह सुपोषण अभियान के तहत कुपोषित महिलाओं और बच्चों के लिए गर्म भोजन की व्यवस्था करती हैं। 8 महिला स्व सहायता समूहों द्वारा सेनेटरी नैपकीन का उत्पादन कर अब तक 11 लाख 93 हजार रुपए की आमदनी प्राप्त की जा चुकी है।
...लंबी फेहरिस्त है। यह उपलब्धियों की शुरुआत भर है, क्योंकि नया दंतेवाड़ा गढऩे का काम अभी-अभी तो शुरु हुआ है। काम कितने जोर-शोर से हो रहा है उसके लिए सुपोषण अभियान का यह आंकड़ा देखना चाहिए- मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान प्रारंभ होने के बाद जनवरी 2020 में जून 2019 के वजन के आधार पर जिले में कुपोषण में 4.52 प्रतिशत की कमी आई है। 
मड्डाराम की तरह दंतेवाड़ा भी अपने जज्बे के साथ अपने सुघर भविष्य को गढऩे के लिए उठकर खड़ा हो चुका है। हौसलों के पांवों पर दौड़ रहा है, रन बना रहा है। 
-तारन प्रकाश सिन्हा
(भाप्रसे, आयुक्त जनसंपर्क, छत्तीसगढ़)

 


Date : 19-Feb-2020

प्रियंका दुबे

ख़ारिज हुई दया याचिकायों के एक चक्र के बाद अब दिसंबर 2012 के निर्भया कांड में दोषी सिद्ध हुए मुकेश कुमार, पवन गुप्ता, विनय कुमार शर्मा और अक्षय कुमार को फांसी होना लगभग तय है। 21वीं सदी में हिंदुस्तान को झकझोर देने वाला बलात्कार का सबसे ऐतिहासिक मामला अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर बढ़ता सा नजऱ आ रहा है, अदालत ने फांसी की तारीख़ 3 मार्च तय कर दी है।
‘निर्भया’ की कहानी एक ऐसी कहानी है जिसकी स्मृति भारतीय जनमानस के पटल पर आने वाले कई सालों तक जि़ंदा रहेगी। साथ ही, इस घटना के बाद भारतीय कानून व्यवस्था में स्त्रियों के पक्ष में आए तमाम बदवालों की वजह से भी ये मामला हमेशा याद दिया जाएगा।
16 दिसंबर 2012 की वो ख़ौफनाक रात
सात साल पहले 12 दिसंबर को 23 वर्षीय निर्भया अपने दोस्त के साथ दिल्ली के साकेत सिलेक्ट सिटी वॉक सिनेमा हॉल में लाइफ़ ऑफ़ पाई फिल्म देखने गई थीं। एक कॉल सेंटर में काम करके फिजियोथेरेपी की अपनी पढ़ाई के ख़र्च का इंतज़ाम करने वाली निर्भया उस शाम हर लिहाज से महत्वकांक्षी युवा भारत का प्रतीक थीं।
ठ्ठह्वद्यद्य
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ठ्ठह्वद्यद्य।
मेहनती, सपने देखने वाली और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-तोड़ प्रयास करने वाली। हफ़्ते भर के काम के बाद रविवार को दोस्त के साथ फि़ल्म देखने जाने की मोहलत निकलने वाल भारत का एक आम युवा- आपकी-मेरी तरह।
उस शाम जब निर्भया जब अपने मित्र के साथ फि़ल्म देख रही थीं, तब दक्षिण दिल्ली के आरके पुराम इलाक़े की रविदास बस्ती में रहने वाला 31 वर्षीय राम सिंह अपने भाई मुकेश सिंह के साथ अपने रविवार को 'रंगीन' बनाने की योजना बना रहे थे। उसी मोहल्ले में रहने वाले पवन गुप्ता और विनय शर्मा भी इन दोनों भाइयों के साथ शामिल हो गए।
नशे और उन्माद में धुत इन चारों ने आगे बस क्लीनर की तरह काम करने वाले अक्षय ठाकुर और एक नबालिग लडक़े को अपने साथ ले लिया।
इधर फि़ल्म ख़त्म होने के बाद निर्भया अपने दोस्त घर वापसी के लिए ऑटो का इंतज़ार करने लगे। काफ़ी देर तक जब द्वारका जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो किसी तरह वो एक ऑटो में बैठकर मुनीरका बस स्टैंड तक आ गए। यहां से भी द्वारका वापसी के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था।
पशोपेश में पड़े निर्भया और उनके दोस्त की नजऱ सामने आकर खड़ी हुई एक प्राइवेट बस पर पड़ी। 'द्वारका-द्वारका' की आवाज़ सुनकर दोनों बस में चढ़ गए। उस वक़्त बस में मौजूद लोगों को सहयात्री समझ रहे इन दोनों युवाओं को इस बात का कोई इल्म नहीं था कि उनके सिवा बस में मौजूद 6 आदमी दरअसल अभी-अभी दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती से 'मज़े करने' के उद्देश्य से निकल कर आए हैं।
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रात के तकऱीबन 9।30 बजे मुनीरका से आगे महिलपालपुर के पास पहुँचते ही नबालिग लडक़े और उसके साथियों ने दोनों के साथ झड़प शुरू कर दी। कहा-सुनी से शुरू हुए एक मामूली झगड़े के बाद एक घंटे तक जो हुआ - वह एक ऐसा घाव है जो शायद आज़ाद भारत के स्मृतिपटल से कभी नहीं मिट पाएगा।
राम सिंह और उसके साथियों ने एक तरफ़ निर्भया के मित्र के साथ मारपीट की, वहीं दूसरी ओर निर्भया को बस के पीछे ले जाकर मारा-पीटा गया। अपराधियों ने यहीं बारी-बारी से उनका बलात्कार किया। विरोध करने पर लोहे की रॉड पीडि़ता के शरीर में डालकर जानलेवा हमले किए गए।
उनके दोस्त को भी मार-मार कर लहुलुहान कर दिया गया। एक घंटे तक चले इस हिंसा के तांडव के दौरान यह सफ़ेद प्राइवेट बस दक्षिण दिल्ली में गोल-गोल चक्कर काटती रही। इसके बाद पीडि़तों को मरा हुआ समझकर उन्हें सडक़ के किनारे फेंक दिया गया।
उन्होंने दोनों युवाओं के मोबाइल फ़ोन, पर्स, पैसे, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड छीन लिए। पुलिस को दिए गए बायनों में पीडि़तों ने बताया कि बस से बाहर फेंकने के बाद अपराधियों ने उन्हें बस से कुचल कर उनकी सांसों से साथ सबूत मिटाने की भी आखऱिी कोशिश की थी।
जि़ंदगी के लिए संघर्ष
उधर शाम से गई बेटी का इंतज़ार कर रहे निर्भया के माता-पिता रात दस बजे के बाद से ही उनसे बात करने का प्रयास करते रहे लेकिन फ़ोन लगतार बंद जाता रहा।
रात 11।15 पर निर्भया के पिता को एक फ़ोन आया। फ़ोन पर निर्भया के 'एक्सीडेंट' की सूचना मिलते ही परिवार भागा-भागा सफ़दरजंग अस्पताल पहुंचा जहां पीडि़ता जिंदगी और मौत से जूझ रही थी।
घने कोहरे की चादर में ढकी दिल्ली अगली सुबह अपने हालिया इतिहास के बड़े सदमों में से एक के साथ आँखें खोलने वाली थी। मेडिकल जांच के दौरान पता चला कि दोषियों ने लोहे के रॉड के लिए गए हमलों के दौरान पीडि़ता के प्राइवट पार्ट्स के साथ साथ उनकी आंत भी बाहर निकला दी थीं।
निर्भया का इलाज कर रहे वरिष्ठ सरकारी डॉक्टरों ने मीडिया को बताया कि उन्होंने अपने पूरे मेडिकल करियर में सामूहिक बलात्कार का इतना वीभत्स मामला नहीं देखा था।
अगले दो हफ़्तों तक निर्भया का मौत के ख़िलाफ़ संघर्ष चलता रहा। लेकिन पूरे शरीर पर मौजूद चोटों और अंतडिय़ों के पूरी तरह बाहर निकाले जाने की वजह से उनके ठीक हो पाने की संभावना क्षीण थी। हालाँकि प्राथमिक इलाज के बाद उनके मित्र की अस्पताल से छुट्टी कर दी गई।
निर्भया की हालत खऱाब होते देखकर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने 27 दिसंबर को उन्हें हवाई एंबुलेंस ने सिंगापुर भिजवाने का निर्णय लिया।
महज एक ही दिन के बाद 29 दिसंबर की सुबह निर्भया ने सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। लेकिन उनकी त्रासद और असमय मृत्यु पूरे देश में महिलाओं पर हो रही हिंसा के ख़िलाफ़ एक ऐसी अलख जगा दी जिसकी रौशनी में आज भी दिल्ली के जंतर मंतर से पटना, हैदराबाद और बंगलुरु तक में होने वाले नारीवादी आंदोलनों में दिखती है।
विरोध प्रदर्शन और जस्टिस वर्मा कमेटी
अब भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में 'निर्भया' के नाम से पहचाने जानी वाली पीडि़ता के समर्थन में पूरा देश एक हो गया। दिल्ली समेत भारत के तामाम राज्यों की राजधानियों में मोमबत्तियाँ और प्लेकार्ड पकड़े हुए हुआ 'बलात्कारियों को फाँसी दो', 'लडक़ी के कपड़े नहीं, अपनी सोच बदलिए' और 'बेटियों के लिए चाहिए सुरक्षा' जैसे नारे लगा रहे थे।
आज़ादी के बाद गहरे शोक और गुस्से में भारत के एक साथ आने का यह दुर्लभ और ऐतिहासिक मौक़ा था। पुलिस के आँसू गैस, डंडों और तेज पानी के इस्तेमाल के बावजूद दिल्ली के इंडिया गेट के सामने प्रदर्शनकारी डटे रहे।
लगातार हफ़्तों चले प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। जस्टिस वर्मा कमेटी के नाम से पहचानी जाने वाली इस कमेटी का काम महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नए क़ानून बनाने का जि़म्मा दिया गया था।
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स्त्री सुरक्षा के मुद्दे पर देश भर से आए सुझावों के आधार पर महज 29 दिनों में तैयार की गई 630 पन्नों की यह रिपोर्ट बाद में 2013 में पारित किए गए 'क्रिमिनल अमेंडमेंट ऐक्ट' का आधार भी बना। इस नए क़ानून के तहत विशेष मामलों में बलात्कार की सज़ा को सात साल से बढ़ा कर उम्र क़ैद तक किया गया।
साथ ही, मानव तस्करी के साथ साथ यौन हिंसा और एसिड अटैक को लेकर भी नए प्रावधान जोड़े गए।
जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट का एक ओर जहां सभी मुख्य राजनीतिक पार्टियों ने स्वागत किया, वहीं फ़ौज और सुरक्षा बलों द्वारा महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा जैसे विवादस्पद मुद्दों पर साफग़ोई न रखने की वजह से एक वर्ग ने इस रिपोर्ट की निंदा भी की।
पुलिस जांच और गिरफ़्तारियां
दिल्ली पुलिस ने एक हफ़्ते से कम समय में राम सिंह, मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता, अक्षय ठाकुर और एक नबालिग समेत कुल 6 लोगों को पकड़ा। सडक़ के पास मौजूद दुकानों से मिले सीसीटीवी से मिले फ़ुटेज के ज़रिए पीडि़तों को ले जाने वाली एक सफ़ेद प्राइवेट बस की पहचान की गई।
पुलिस ने फ़ोरेंसिक सबूतों और पीडि़तों के बायनों के आधार पर एक मज़बूत केस तैयार कर गिरफ़्तारियों के एक हफ़्ते के भीतर ही अदालत में चार्ज शीट फ़ाइल कर दी। पुलिस तहक़ीक़ात के साथ साथ मृत्यु से पहले दिए गए निर्भया के स्पष्ट बयान और इसके बाद अदलात के सामने दिए गए उनके दोस्त के मज़बूत बयानों ने केस को पीडि़ता के पक्ष में खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस बीच मार्च 2013 में मुख्य अभियुक्त राम सिंह की तिहाड़ जेल में मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक़ राम सिंह ने आत्महत्या कर ली थी। अगस्त 2013 में नाबालिग अभियुक्त को जुविनाइल कोर्ट ने बलात्कार और हत्या का दोषी घोषित करते हुए 3 साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया।
दोषियों को फांसी की सज़ा
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बाक़ी बचे चार दोषियों - मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और अक्षय ठाकुर- को सितंबर 2013 में दिल्ली की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने के लिए दोषी ठहराया। अदालत के बाहर खड़े प्रदर्शनकारी लगतार दोषियों के लिए फांसी की सज़ा की मांग कर रहे थे।
सज़ा में नरमी बरतने की सारी अजिऱ्यों को ख़ारिज करते हुए निचली अदालत ने चारों को मौत की सज़ा सुनाई। अपराध को 'क्रूर, अमानवीय और देश के सामूहिक अवचेतन को हिला देने वाला' बताते हुए योगेश खन्ना की अदालत ने कहा कि 'वह ऐसे आमनवीय जघन्य अपराधों पर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते'।
हालांकि सितंबर 2013 से अब फऱवरी 2020 तक यह मामला दिल्ली उच्च न्यायलय और सर्वोच्च न्यायालय से होता हुआ दया याचिकाओं के साथ राष्ट्रपति के दरवाज़े तक हो आया है। लेकिन हर दरवाज़े पर अपराधियों की मृत्यु दंड टालने की अजऱ्ी को सिरे से ख़ारिज ही किया जाता रहा है।
पाँच फऱवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को अपनी फांसी टालने के लिए दया याचिकाएँ और क़ानूनी अजिऱ्यों के सारे रास्ते इस्तेमाल करने का नोटिस दिया था। लेकिन इस बीच भी उनकी दया की गुहार लगती उनकी सभी याचिकाएँ ख़ारिज कर दी गई हैं।
उधर निर्भया की माँ, आशा देवी भी दोषियों को फांसी देने में हो रही देरी पर लगतार सवाल उठाते हुए यह कह रही हैं कि अपराधी दया याचिकाओं का इस्तेमाल केस को खींचने के लिए कर रहे हैं।
14 फऱवरी को विनय शर्मा की दया याचिका ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को चारों दोषियों के लिए नए डेथ वारंट जारी करवाने की अनुमति भी दे दी।
दोषियों को फांसी देने के लिए मेरठ से बुलाए गए जल्लाद तिहाड़ जेल पहुँच चुके हैं। नए डेथ वारंट जारी के होने के बाद दोषियों को फांसी पर तो चढ़ा दिया जाएगा, लेकिन अगर बड़े फलक पर देखें तो आज भी देश में यौन हिंसा का शिकार हो रही हज़ारों महिलाएँ न्याय की लंबी और दुरूह लड़ाइयों से जूझ रही हैं।
2018 में 34000 बलात्कार के मामले दर्ज करने वाले इस देश में हर पंद्रह मिनट में एक लडक़ी यौन हिंसा और बलात्कार का शिकार होती है। यह भयावह आँकड़ा जस्टिस वर्मा कमेटी और निर्भया कांड के न्यायिक नतीजे से आने वाले व्यापक सामाजिक बदलावों की उम्मीद पर बड़े सवाल खड़े करता है।
यह स्थिति तब है, जब आज भी भारत में यौन हिंसा की शिकार दर्जनों महिलाएँ सामाजिक दबाव और पारिवारिक प्रतिष्ठा के भय के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करवा पाती हैं।
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Date : 19-Feb-2020

राजेन्द्र धोड़पकर

छत्रपति शिवाजी भारतीय इतिहास के सबसे बडे गौरव पुरुषों में से हैं। महाराष्ट्र के तो वे सबसे बड़े नायक हैं। शिवाजी हिंदुत्ववादियों के भी अतिप्रिय हैं जो उन्हें मुस्लिम सत्ता के ख़िलाफ़ हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की मुहिम का नायक मानते हैं। शिवाजी के योद्धा स्वरूप को लोग जानते हैं और उसी का गुणगान किया जाता है क्योंकि वही लोगों को रास आता है। लेकिन क्या शिवाजी सचमुच हिंदुत्ववादी, मुस्लिम विरोधी राजा थे? या शिवाजी के व्यक्तित्व के और भी पहलू हैं जिन्हें इसलिए नजऱअंदाज़ कर दिया जाता है कि वे उनका गुणगान करने वाले लोगों के लिए असुविधाजनक हैं?
शिवाजी के इन पहलुओं के बारे में गोविंद पानसरे ने अपनी विख्यात किताब ‘शिवाजी कोण होता’ (शिवाजी कौन थे ) में बहुत सुंदर ढंग से लिखा है। हम जानते हैं कि गोविंद पानसरे की हत्या कट्टरवादी तत्वों ने कर दी थी। उन्होंने लिखा है कि शिवाजी महत्वाकांक्षी और साहसी व्यक्ति थे और बहुत थोड़े से सहयोगियों के साथ उन्होंने एक साम्राज्य खड़ा करने का सपना देखा था। जब उन्होंने पहला कि़ला जीता तो उनके साथ 100 लोग भी नहीं थे। लेकिन शिवाजी की महत्वाकांक्षा सिर्फ सम्राट बनने की नहीं थी। वे एक आदर्श प्रजापालक सम्राट बनना चाहते थे। अपना अभियान शुरू करने के पहले ही उन्होंने इसकी तैयारी की थी।
शिवाजी के पिता के पास कर्नाटक के अलावा पुणे की जागीर भी थी जहां शिवाजी अपनी माता जीजाबाई और दादाजी कोंडदेव की देखरेख में बढ़े पले। गोविंद पानसरे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के हवाले से बताते हैं कि यह इलाक़ा मुग़लों और आदिलशाह हुकूमत के बीच युद्धों का मैदान बन गया था, इसलिए यहां गांव उजड़ गए थे, खेतों की जगह जंगल उग आए थे और जंगली जानवर घूमते थे। शिवाजी ने गांव वालों को फिर बसाया, उन्हें बीज और पालतू जानवर दिए, कज़ऱ् दिए जिनकी वसूली दो तीन साल बाद शुरु होती थी।
शिवाजी की सेना आम किसान, चरवाहों और निचली जाति के लोगों से बनी हुई थी। उस वक्त आम चलन ज़मींदारी का था जिसमें शासक इलाक़े के ज़मींदार से निश्चित मात्रा में कर उगाहते थे जो आम जनता से नकदी या फ़सल के रूप में मनमाना लगान वसूलते थे। शिवाजी ने अपने राज में ज़मीन की पैमाइश और किसान की देने की क्षमता का आकलन करके लगान निश्चित किया और ज़मींदारों से उगाही का अधिकार छीन लिया। अब सरकारी कर्मचारी लगान लेते थे और ज़मींदार को उसका हिस्सा देने के बाद बाक़ी सरकारी खजाने में जमा करते थे। 
शिवाजी ने कई अत्याचारी ज़मींदारों की हवेलियां और महल तुड़वा दिए और उन्हें किसानों की तरह सादे घरों मे रहने का आदेश दिया। फ़सल खऱाब होने की स्थिति में लगान माफ़ कर दिया जाता था और उन्हें कज़ऱ् भी दिया जाता था जिसे चार-पांच साल में चुकाना होता था।
शिवाजी के राज में सेना को यह सख़्त ताक़ीद थी कि सैन्य अभियान पर जाते हुए किसी भी किसान की फ़सल को नुक़सान न पहुंचे। शिवाजी का यह भी आदेश था कि सेना किसी से भी अनाज आदि की ज़बरन वसूली नहीं करेगी और जिस चीज़ की जरूरत हो उसे उचित दाम देकर खऱीदा जाए। उन्होने एक चि_ी में लिखा है कि ‘किसानों को एक तिनके का भी नुक़सान नहीं होना चाहिए।’
शासन प्रणाली में शिवाजी ने पुराने ग्रंथों से प्राप्त ज्ञान का इस्तेमाल किया। कुछ मुग़ल राज्यप्रणाली से भी लिया, ख़ासकर अकबर के शासन प्रबंध से। अकबर से वे काफी प्रभावित थे। जजिय़ा कर के विरोध में औरंगज़ेब को लिखी उनकी एक चि_ी से भी यह ज़ाहिर होता है। इसमें वे औरंगज़ेब को याद दिलाते है कि उनके पूर्वज अकबर ने 52 साल राज किया जिसमें उन्होंने सभी धर्म के लोगों का ख्याल रखा, इसलिए उनकी ख्याति जगदगुरु की तरह हुई। उसके बाद जहांगीर ने भी न्याय के साथ राज किया और उसी परंपरा को शाहजहां ने भी निभाया। इसलिए इन बादशाहों को जीते जी यश और मरने के बाद भी कीर्ति हासिल हुई। वे औरंगज़ेब को याद दिलाते हैं कि वे अपने इन महान पुरखों की राह पर नहीं चल रहे हैं।
इतिहासकार बीएन लूनिया अपने ग्रंथ ‘मराठा प्रभुत्व’ में लिखते हैं कि शिवाजी ने मजदूरों के लिए एक लाख रुपये का स्थायी कोष बनाया था, ताकि मज़दूरों को मज़दूरी का भुगतान हर हाल में सुनिश्चित हो सके। शिवाजी के इस तरह के जनकल्याणकारी शासन प्रबंध की वजह से आम लोगों को यह लगता था कि शिवाजी का राज उनका अपना राज है। महाराष्ट्र में इस तरह की कई कहानियां प्रचलित हैं कि किस तरह आम लोग खुद को शिवाजी की सेना का सिपाही मान कर उनकी ख़ातिर मरने को भी तैयार रहते थे।
शिवाजी बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। समर्थ रामदास उनके गुरु थे और रामदास के कई पद शिवाजी को संबोधित हैं। इतिहास की किताबों में जि़क्र आता है कि जब शिवाजी रामदास के मठ में जाते थे तो आम शिष्यों की तरह ही रहते थे। उनके शिष्यों के साथ वे भिक्षा मांगने भी जाते थे। रामदास के मठ में नियम था कि रोज़ एक शिष्य को कीर्तन करना होता था और उसमें एक स्वरचित पद भी सुनाना होता था। शिवाजी ने भी इसी तरह कीर्तन किया था और एक स्वरचित पद सुनाया था।
शिवाजी धार्मिक थे, लेकिन वे संकीर्ण नहीं थे। न ही अंधविश्वासी थे। वे सभी धर्मों का आदर करते थे। जिन समकालीन संतों को वे गुरुवत मानते थे उनमें सूफ़ी संत बाबा याकूत भी थे। शिवाजी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते थे। उनके राज्य में बड़े पदों पर मुस्लिम धर्मावलंबी भी थे। जब वे अफज़़ल खान से मिलने प्रतापगढ़ जा रहे थे तो उनके दस कऱीबी अंगरक्षकों में तीन मुस्लिम थे। उनके आठ मंत्रियों में परराष्ट्रसचिव मुल्ला हैदर थे जिन पर दूसरे राज्यों से रिश्तों की जि़म्मेदारी थी।
शिवाजी के एक फऱमान में लिखा हुआ है - हर किसी को अपना धर्म पालन करने की आज़ादी है। इसके बारे में कोई बखेड़ा न किया जाए। शिवाजी का सख्त आदेश था कि किसी भी सैनिक मुहिम में किसी भी धर्म के धर्मस्थल या धार्मिक पुस्तक को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। अगर किसी सैनिक को कोई धार्मिक पुस्तक मिलती है तो उसे सम्मान उस धर्म के किसी व्यक्ति के पास पहुंचा दिया जाए। 
लूनिया लिखते हैं- प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार खाफी खान ने भी जो शिवाजी का प्रमुख आलोचक था, उनकी धार्मिक उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता की प्रशंसा की है। उसने अपने ग्रंथ ‘मुन्तखब उल लुवाब’ में लिखा है कि ‘उसका (शिवाजी का) यह नियम था कि जहां भी उसके अनुयायी लूट करने जाते थे तो वे किसी मस्जिद को क्षति नहीं पहुंचाते थे, क़ुरान का अपमान नहीं करते थे और किसी भी स्त्री का अपमान नहीं करते थे।’ युद्ध भूमि में मृत मुसलमानों का उनके धर्म और समाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता था। औरंगज़ेब को लिखी चि_ी में शिवाजी याद दिलाते हैं कि क़ुरान जिस ईश्वर ने दी वह सिफऱ् मुसलमानों का नहीं बल्कि सारी दुनिया का ईश्वर है, इसलिए धर्म के आधार पर भेदभाव करना ईश्वर की वाणी के ख़िलाफ़ जाना है।

इतिहासकार ग्रैंट डफ़ और जदुनाथ सरकार ने भी इस बात का जि़क्र किया है कि शिवाजी धर्म के मामले में बहुत उदार थे। मुस्लिम शासकों द्वारा मुस्लिम धर्मस्थलों को जो अनुदान दिया गया था उसे उन्होंने अपने राज में भी जारी रखा। वे अपने अभियानों के दौरान हिंदू धर्मस्थलों के साथ साथ मुस्लिम धर्मस्थलों को भी धर्मादा देते थे।
शिवाजी के राज की एक प्रमुख विशेषता थी स्त्रियों का सम्मान। यह जि़क्र पहले भी हो चुका है कि शिवाजी के सैनिक किसी सैनिक अभियान में किसी स्त्री का अपमान नहीं करते थे। दुश्मन की स्त्रियों को भी सम्मान के साथ उनके किसी संबंधी के पास पहुंचा दिया जाता था। जब तक कोई संबंधी नहीं मिलता तब तक स्त्रियों की देखभाल करना भी कर्तव्य में शामिल था। ऐसी कई कहानियां हैं कि शिवाजी ने किसी बड़े जागीरदार या सेनानायक को किसी गऱीब किसान की बहू-बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए अत्यंत कठोर सज़ा दी।यह कहानी तो अत्यंत प्रसिद्ध है कि कल्याण पर विजय के बाद कल्याण के सूबेदार की बहू को पकड़ कर शिवाजी के दरबार में लाया गया। बताया जाता था कि उसकी सुंदरता के बहुत चर्चे थे। शिवाजी ने उससे कहा - हमारी माता ऐसी सुंदर होती तो हम भी सुंदर होते। और सम्मान स्वरूप उसे वस्त्राभूषण देकर वापस अपने परिजनों के पास भेज दिया। (सत्याग्रह)


Date : 18-Feb-2020

अशोक वाजपेयी
भाषा में जो दजऱ् होता है वह काफी देर तक बना रहता है। साहित्य की उत्तरजीविता का मूलाधार उसका भाषा में होना है। इस दर्ज होने का अर्थ तत्कालीन समय, समाज, व्यक्ति का दर्ज होना है। यह तो मानी हुई सचाई है। पर इस दर्ज होने के बरक्स चुप्पियां होती हैं जो खुद तो शायद दर्ज हो जाती हैं पर बाक़ी कुछ दर्ज नहीं करतीं। मनुष्य अपने लंबे इतिहास में भाषा और चुप्पी के बीच कहीं फंसा रहा है। चुप्पी, किसी दौर में, कितनी भयानक और कायर, अन्यायपूर्ण और अमानवीय होती है इसका विशद विश्लेषण, नाजियों के दौर के विश्लेषण से जिस महान आलोचक और चिंतक जार्ज स्टाइनर ने दशकों पहले किया था, उसका हाल में देहावसान हुआ।
हमारे एक बड़े कवि ने कभी चुप्पी के दहाड़ होने का जिक़्र किया था। ऐसा संयोग हो सकता है कि लोग चुप रहकर भी अपना विरोध या इनकार दर्ज करें। पर अगर किसी समय में आप  बाकी सब कुछ दर्ज कर रहे हों, जिनमें मानवीय संबंध और मनोभाव, प्रकृति, प्रेम, लगाव-अलगाव आदि शामिल हों पर सार्वजनिक जीवन में जो घट रहा है उसके बारे में आप चुप्पी साध लें तो यह न तो अलक्षित जा सकता है और न ही उसका कोई मानवीय बचाव हो सकता है। साहित्य अपनी प्रकृति से सुरक्षाकामी कर्म नहीं है। वह इसी संसार में घटता और अभिव्यक्ति के खतरे उठाता रहता है। उसकी असली सुरक्षा साहस, कल्पनाशीलता और अपने को सदा वेध्य बनाये रखने में होती है। हमारे ही एक दूसरे कवि ने दशकों पहले कहा था, ‘जो बचेगा, कैसे रचेगा?’
एक बात और ध्यान देने की है। हमारे समय में भाषा में दजऱ् करने का एक अधिक लोकव्यापी अधिक प्रभावशाली, अधिक दूरगामी माध्यम मीडिया है। उसका बहुत बड़ा हिस्सा गोदी में, सत्ता और धन-दौलत की गोदी में बैठा मीडिया है जो झूठों-अफ़वाहों को ख़बर की तरह दर्ज  कर सच की तरह फैला-बढ़ा रहा है। 
हमारे लोकतंत्र में मीडिया का इतना व्यापक अध:पतन एक बड़ी दुर्घटना है। वह भाषा में किया गया सबसे बड़ा और अथक चल रहा प्रदूषण है। इसका एक अभागा अर्थ यह भी है कि इस समय जो सचमुच हो रहा है उसे दर्ज  करने के लिए अधिकांश मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता। और भाषाओं का पता नहीं, पर हिंदी मीडिया इस समय व्यापक रूप से अप्रामाणिक और अविश्वसनीय हो चुका है। इसके सैकड़ों उदाहरण हर रोज दिए जा सकते हैं जिनकी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों में ही भरमार है। यह भयानक है कि हिंदी का लगभग एक भी बड़ा अख़बार इस अध:पतन से बच नहीं पाया है। जो थोड़े बहुत हैं उनके साहस की प्रशंसा की जाना चाहिए पर उनका प्रभाव सीमित है और वे परिदृश्य को निर्णायक रूप से नहीं बदल पाते।
ऐसे भयावह समय में साहित्य की भाषा संबंधी जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है। उसे भाषा को उसकी मानवीयता में सजीव रखना है और उसे हर हालत में सत्यवादी बनाए रखना है। बाद में, यह कहा जा सकना चाहिए कि ऐसे समय में साहित्य ने भाषा और सच दोनों को बचाया।
साहित्य और विचारधारा के संबंध पर बहुत चर्चा और विवाद हुए हैं। वे लगभग छह दशक पुराने हैं। यह बहस ज़्यादातर वाम विचारधारा पर केंद्रित रही है। अरसे तक तो विचाराधारा का अर्थ वाम विचारधारा ही लिया जाता था। एक तरह का युग्म प्रचलन में था- वाम और वाम-विरोध। यह मानने में बड़ी हिचक या वैचारिक अड़चन थी कि इन दोनों से अलग या इनके बीच की भी कोई धारा हो- बह सकती है। 
वाम विचारधारा का यह थोड़ा संदिग्ध सौभाग्य था कि उसके कई संगठन और मंच थे जो आक्रामक रूप से उस पर इसरार करते थे। इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि ऐसे संगठनों के सदस्य होने का अर्थ वाम विचारधारी हो गया, भले अपने साहित्य-कर्म में वह इतना प्रगट या स्पष्ट न हो। इन संगठनों ने दशकों तक कई वर्जनाएं भी प्रचारित कीं। लेखकों और कृतियों का, आयोजनों और संस्थाओं का बहिष्कार किया गया। इनकी संख्या, हिन्दी में तीन थी। उनमें आपस में भी कई मतभेद और विवाद होते रहे। यह उनका वाम लोकतंत्र रहा। वाम-विरोधी उतने संगठित नहीं रहे, न ही उतने आक्रामक होने की उन्हें कोई जरूरत लगी। पर उनमें से अनेक अपनी जि़द पर अड़े रहे और कई बार अपने विरोध में ध्रुरुवान्त पर भी ले जाते रहे। थोड़े परस्पर घुसपैठ दोनों तरफ़ होती रही। मध्यवर्ती उदार कहे जा सकते हैं- वे वाम के कुछ मूल्यों से सहमत रहे और कई से असहमत। वे वामविरोधी के ध्रुवान्तों पर भी विचलित होते रहे। इस घमासान भरे परिदृश्य के कुछ दुष्परिणाम भी हुए। 
पहला विचारधारा की सारी बहस विचार पर कम, धारा पर अधिक हुई। दूसरा, तथाकथित विचार या वैचारिक दृष्टि को साहित्य में ज़रूरत से कहीं अधिक महत्व दिया जाने लगा। तीसरा, इसकी लगभग अनदेखी होने लगी कि साहित्य की अपनी वैचारिक सत्ता है और उसे अनिवार्य या वांछित रूप से किसी विचार या विचारधारा का उपनिवेश नहीं होना चाहिए। चौथे, ऐसे बहुत सारे लेखक उपेक्षित होने लगे जो इन खांचों से बाहर थे। 5वां, अनेक लेखकों और कृतियों के बारे में व्यापक दुराग्रह फैल गए।
यह दिलचस्प है कि इस दौरान साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, संकीर्णता आदि की व्याप्ति पर विचार तो हुआ पर यह बात इस विमर्श से बाहर ही रही आयी कि हिंदी समाज का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे, वाम और उदार दृष्टियों की सक्रियता के बावजूद, हिंदुत्व जैसी भेदभाव फैलाने और घृणा उपजाने वाली प्रवृत्ति को मानने और पोसने लगा है। यह नहीं कि साहित्य ने इसका पूर्वाभास और चेतावनी न दिए हों, यही कि उसके पोषक तत्वों का विश्लेषण नहीं हुआ। पिछले लगभग सात दशकों से व्यापक रूप से मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्ति की जो उपेक्षा हुई साहित्य में उसका एक परिणाम यह है कि उस आध्यात्मिक शून्य को भरने एक छद्म वृत्ति हिंदुत्व घुस गई। 
हिंदू लेखकों ने मिलकर एकजुट होकर हिंदू धर्म की भयानक दुव्र्यख्या और सतही समझ पर आधारित हिंदुत्व का विरोध आज जक नहीं किया। हमारे समय का यह एक केन्द्रीय द्वन्द्व है और वाम के अलावा उदार दृष्टि वाले लेखकों को भी अपनी चुप्पी तोडऩा चाहिए। 
पिछले कुछ बरसों से लग रहा था कि सिविक स्पेस पर उन शक्तियों ने कब्ज़ा कर लिया है जो लोकतंत्र और उसके मूल्यों में विश्वास नहीं करतीं। एक सर्वग्रासी मानसिकता राजनीति-धर्म-मीडिया-बाज़ार के गठबंधन से इस स्पेस पर लगातार हावी हो रही है और उसके चंगुल से असहमति और संवाद के लिए जगह निकालना लगभग असम्भव हो गया है। विशेषत: राजनीति में भाषा से भद्रता और सौम्यता को लगभग देश निकाला दे दिया गया है। इधर, खासकर शाहीन बाग़ के बाद और छात्र-आंदोलनों से, लगने लगा है कि भद्रता, सौजन्य और अहिंसक विरोध-प्रतिरोध बचे हुए हैं और सिविक स्पेस में कुछ घुसपैठ कर पा रहे हैं।
‘सिविक स्पेस में समाज-विज्ञान’ विषय पर एक फ्रेंच-भारतीय परिसंवाद में कुछ समय जाने का सुयोग जुटा। अकसर समाज-विज्ञानी इस सचाई को नजऱअंदाज करते हैं कि साहित्य और कलाएं भी सिविक स्पेस का अनिवार्य हिस्सा होती हैं और इस स्पेस को बनाने और सक्रिय रखने में उनकी भूमिका होती है। अगर आज भारत में ऐसा स्पेस फिर से स्पन्दित होता लगता है तो यह याद रखना चाहिए कि कविता, संगीत, कला आदि उसमें महत्वपूर्ण ढंग से सक्रिय हैं।
एक दिक्कत शायद इस बात से आती है कि समाज-विज्ञान कुछ सामान्य अवधारणाएं या तो लेकर चलता है या फिर ज्ञात तथ्यों-ब्यौरों के आधार पर ऐसी अवधारणाएं गढ़ता-तलाशता है। सामान्यीकरण में हमेशा कुछ-न-कुछ ब्यौरे हिसाब से बाहर हो जाते हैं क्योंकि वे सामान्यीकरण की सीमाओं में अंटते नहीं हैं। साहित्य और कलाओं की प्रकृति ऐसे सामान्यीकरण में सरली$कृत किए जाने के विरुद्ध होती है।  दूसरे, समाज-विज्ञान में समाज का प्रभुत्व है, व्यक्ति का महत्व अपने आप में नहीं समाज के अंग के रूप ही होता है। इसके बरक़्स साहित्य और कलाओं में व्यक्ति का अपने आप में भी महत्व होता है। साहित्य का देवता ब्यौरों में बसता है पर समाजविज्ञान का बड़ी सांख्यिकी और अवधारणाओं में। साहित्य और कलाओं में छोटे से छोटा सच भी खऱाब नहीं जाने दिया जाता जबकि ऐसा सच समाजविज्ञान का ध्यान नहीं खींच पाता।
सिविल नाफऱमानी पर एक परचा था और उसमें उसका आधुनिक संसार में इतिहास ट्रेस किया गया था। एक आपत्ति यह उठी कि राजनीतिक-सामाजिक होने के बावजूद सविनय अवज्ञान नैतिक कर्म होती हैं और उससे नैतिक तत्व को अलग नहीं किया जा सकता। मुझे यह कहना उचित लगा कि जहां तक हिंदी साहित्य का सवाल है पिछली एक सदी में साहित्य ने औपनिवेशिक काल और लोकतंत्र में भी सत्ता के बरक़्स सविनय अवज्ञा की ही भूमिका निभायी है। यह और बात है कि इसे समाज-विज्ञान में लक्ष्य और विश्लेषित नहीं किया गया है। (सत्याग्रह)

 


Date : 18-Feb-2020

प्रकाश दुबे

तोपची की तलाश तो करो  
केन्द्र हो या राज्य, राज्यमंत्रियों को काम नहीं दिया जाता। मालूम था लेकिन कारण पता नहीं था। अब समझा। राज्यमंत्री श्रीपद नाईक ने संसद में लिखित उत्तर में बताया कि रक्षा जैसे संवेदनशील मंत्रालय में सवा दो लाख से अधिक पद रिक्त हैं। थलसेना में कमीशंड अफसरों के 36 हजार से अधिक पद खाली पड़े हैं। हर तरह की सेना में हजारों वरिष्ठ अधिकारियों की जगह खाली है। दूसरा कोई कहता तो देशद्रोही हो जाता। चिंता करने के कुछ और भी कारण हैं। बजट पर उत्तर देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने कार्यकाल में रक्षा क्षेत्र में हुए कामों पर स्वयं की पीठ थपथपाई। इस बात के लिए भी, कि रफैल तोप से लेकर बहुत सारी खरीदारी कर ली है। बजट में रक्षा मद पर बड़ी रकम देने का दावा किया। हथियारों में खरीदारी के लिए हड़बड़ी। हथियार चलाने वाले सैनिकों को जुटाने में लापरवाही। राजनाथ जी, इस भांड़ाफोड़ का असली राज आप जानो। 
 बालाजी की कश्मीर यात्रा
सैकड़ों नहीं, देश के लाखों राजनीतिक तिरुपति बालाजी जाकर अपने भले की मनौती मानते हैं। तिरुमला पहाड़ी में विराजमान वेंकटेश्वर को चढ़ावा भरपूर आता है और वे मुक्त हस्त से प्रसाद बांटते हैं। यही कारण होगा कि संविधान का अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पहला मंदिर बालाजी का बनेगा। कश्मीर केन्द्र प्रशासित क्षेत्र के नायब राज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने सौ एकड़ जमीन देने पर हामी भर दी है। यह जमीन किसी सरकारी एजेंसी को मुफ्त नहीं दी जा रही है और न किसी स्थानीय या राष्ट्रीय ट्रस्ट को। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम को जमीन मिलेगी। श्रीनगर से जम्मू को जोडऩे वाले राजमार्ग पर तिरुपति जैसे मंदिर की प्रतिकृति तैयार की जाएगी। मंदिर के साथ अस्पताल भी बनेगा। जमीन तिरुपति देवस्थानम को दी जाएगी। मुर्मू गुजरात के केडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।  गुजरात के प्रभावशाली पूर्व मुख्यमंत्री के साथ काम किया। वर्ष 2012 में जगन को घोटालों के कारण जेल जाना पड़ा था। उनके आर्थिक सलाहकार विजय साईं उनके एकदम बाद गिरफ्तार हुए।  जेल काटी। राज्यसभा सदस्य विजय साईं रेड्डी तिरुपति देवस्थानम के अध्यक्ष हैं। ये जानकारियां सामान्य ज्ञान यानी जीके बढ़ाने के लिए।   
कहि देवै संदेश
एयर इंडिया को बेचा नहीं जाएगा। इतना विस्फोटक वाक्य कहते ही दोबारा प्रबंधन निदेशक बनाए गए अश्विनी लोहनी की छुट्टी हो गई। आइएएस राजीव बंसल को लाने जैसी फुर्ती भारत संचार निगम लिमिटेड में नहीं दिखाई। बीएसएनएल को जिंदा रखने के लिए 15 हजार करोड़ रुपए का पैकेज घोषित किया गया था। साल 2019 बीत जाने के बावजूद संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद और बीएसएनएल के कर्ताधर्ता पुरवार के पास लागू कराने के लिए समय नहीं है। संचार क्षेत्र में बड़े और चहेते उद्योग घरानों की घुसपैठ नई खबर नहीं। बीएसएनएल में सबसे बड़ी खबर यही है कि महीनों से कर्मचारी वेतन विहीन हैं। दूसरी खबर यह है कि ये अधपेट कर्मचारी 24 फरवरी को हड़ताल करने की धमकी दे रहे हैं। उनकी आवाज कमजोर है। उच्चतम न्यायालय की नहीं सुनी। बीएसएनएल कर्मचारी किस खेत की मूली हैं?
हारे हैं शान से
नैतिकता और निस्वार्थ राजनीति का सपना देखने वाले योगेन्द्र यादव को आम आदमी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। योगेन्द्र ने स्वराज इंडिया नाम की अलग पार्टी बना ली। किसानों के लिए आंदोलन किए। बड़ी संख्या में जमा होने वाले अंदोलनकारी वोट नहीं देते। हरियाणा में किसानों के हित में सरकार को झुकाने वाले यादव की स्वराज पार्टी का खाता तक नहीं खुला। योगेन्द्र हैं कि शुचिता की राजनीति का साथ नहीं छोड़ते। दिल्ली के चुनाव में दर्जन सूरमा मैदान में उतारे। ओखला और त्रिलोकपुरी विधानसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों ने कांग्रेस के पक्ष में बैठने का ऐलान किया। योगेन्द्र ने अपनी पार्टी के दोनों उम्मीदवारों को मतदान से चार दिन पहले निकाला। डूबना दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को था। योगेन्द्र की पार्टी का इस बार भी खाता नहीं खुला। योगेन्द्र ने कट्टर विरोधी अरविंद को जीत के लिए बधाई देने में विलम्ब नहीं किया।  
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 18-Feb-2020

अव्यक्त
उपरोक्त दोनों ही शब्दों में ‘पु’, ‘ल’ और ‘स’ कॉमन हैं। लेकिन हमारी पुलिस-व्यवस्था और हमारे पुलिसकर्मी अनकॉमन बना दिए गए हैं। परसाईजी ने नोटिस किया था कि भारत के हर पुलिस थाने और हर पुलिस लाइन में हनुमान जी का मंदिर अवश्य होता है।
अब हनुमानजी तो बल, बुद्धि और विद्या तीनों के देवता माने जाते हैं। लेकिन मालूम होता है हमारे पुलिसकर्मी और पुलिस मंत्री अपने बजरंग बली से केवल बल ही मांगते हैं। बुद्धि और विद्या में उनकी ज्यादा रुचि नहीं है। नहीं तो मंदिर के साथ-साथ हर थाने और पुलिस-लाइन में एक सुंदर लाइब्रेरी भी बनाते। उसमें मनुष्य, समाज और लोकनीति से जुड़ी किताबें रखी जातीं। पुलिसकर्मियों को इसका विशेष अवसर दिया जाता कि वे इन पुस्तकों को आकर पढ़ें। पुलिस मंत्री भी कभी-कभी यहां आकर पढ़ लेते।
जिन अंग्रेजों की नकल के आधार पर भारत की पुलिस-व्यवस्था खड़ी की गई, उन अंग्रेजों ने तो अपने देश में ‘नेशनल पुलिस लाइब्रेरी’ तक बनाई हुई है जो यूरोप की सबसे बड़ी पुलिस लाइब्रेरी है।
इस लाइब्रेरी में केवल अपराधशास्त्र की किताबें नहीं हैं, बल्कि सामाजिक विज्ञान और मनोविज्ञान समेत 55 हज़ार से अधिक किताबें और पत्र-पत्रिकाएं हैं। डिजिटल आर्काइव और ऑनलाइन एक्सेस करने की सुविधा भी है। जहां पुस्तकें ही पुस्तकें हों, वहां लाठी का क्या काम?  पंचतंत्र और ईसप की कहानियों में तो बुद्धिमान खरगोश हमेशा जालिम शेर पर भारी पड़ता रहा है।
‘बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहुँ कलेश विकार’ बुदबुदाने वालों को समझना चाहिए कि बल के साथ-साथ बुद्धि और विद्या आएगी, तभी कलेश और विकार दूर होंगे।
और बल भी कैसा? केवल पशुबल नहीं। बल्कि वह बल जो गांधीजी सिखा गए हैं। ऐसा नैतिक आत्मबल जिसके सामने बड़े-बड़े बलियों में भी खलबली मच जाती है।
इंग्लैंड वाले अंग्रेजों के भारत छोडऩे से लगभग दो महीने पहले 5 जून, 1947 को कॉलेज के विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए गांधीजी ने खुद ही कहा था- अगर मेरा वश चलता तो मैं सेना और पुलिस में बुनियादी सुधार से शुरुआत करता।  इंग्लैंड में पुलिस को लोग अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र, सहायक और कर्तव्य-भावना का मूर्तरूप समझते हैं, मगर भारत में पुलिस को आम आदमी खौफनाक और अत्याचारी समझता है।
भारत के लोगों को चाहिए कि वे अपने प्रयासों से पुस्तकें दान कर पुलिस थाने और पुलिस लाइनों में पुस्तकालय बनवाएँ। पुलिस भाई और पुलिसनी बहनें उन किताबों को पढ़ें।
हमलोग और हमारे बच्चे भी वहां जाकर पढ़ें। इससे आपसी मेल-जोल बढ़ेगा। दूरियां और गलतफहमियां कमेंगीं। हम सबके भीतर की पुलिस-वृत्ति का शमन हो सकेगा। हम दु:शासन से शासनमुक्ति की ओर बढ़ सकेंगे।


Date : 17-Feb-2020

पीएम तिवारी
मदरसों का नाम लेते ही आंखों के सामने आमतौर पर एक ऐसे स्कूल की तस्वीर उभरती है जहां अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र पारंपरिक तरीके से तालीम हासिल करते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल के मदरसों में यह तस्वीर बदल रही है। राज्य के मदरसों में न सिर्फ ग़ैर-मुसलमान छात्र पढ़ते हैं, बल्कि उनकी तादाद भी लगातार बढ़ रही है।
राज्य में सोमवार से शुरू मदरसा बोर्ड की परीक्षा ने इस बार एक नया रिकॉर्ड बनाया है। इस परीक्षा में शामिल 70 हज़ार छात्रों में से लगभग 18 फीसदी हिंदू हैं। मदरसा बोर्ड की यह परीक्षा दसवीं के समकक्ष होती है। इससे पहले साल 2019 की परीक्षा में ग़ैर-मुस्लिम छात्रों की तादाद 12.77 फीसदी ही थी। राज्य में सरकारी सहायता-प्राप्त 6,000 से ज़्यादा मदरसे हैं।
पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अबू ताहेर कमरुद्दीन बताते हैं, बीते कुछ वर्षों से परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों की तादाद दो से तीन फीसदी की दर से बढ़ रही है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैले इन मदरसों में अब दसवीं कक्षा तक ग़ैर-मुस्लिम छात्र भी बड़ी तादाद में दाखिला ले रहे हैं।
कमरुद्दीन बताते हैं कि बांकुड़ा, पुरुलिया और बीरभूम जिलों में चार सबसे बड़े मदरसों में तो ग़ैर-मुस्लिम छात्रों की तादाद मुस्लिम छात्रों से ज़्यादा है। कमरुद्दीन के मुताबिक ग़ैरमुस्लिम छात्र ज़्यादातर हाई मदरसे में दाखिला लेते हैं। इसकी वजह यह है कि इन मदरसों में सेकेंडरी बोर्ड के पाठ्यक्रम के मुताबिक़ पढ़ाई होती है।
वो कहते हैं, देश ही नहीं बल्कि यह पूरी दुनिया में अपने लिहाज से अनूठी बात है। यहां हिंदू छात्र न सिर्फ पढ़ रहे हैं, वो मुसलमान छात्रों के मुक़ाबले बेहतर नतीजे भी ला रहे हैं।
बर्धवान जि़ले के एक मदरसे में पढऩे वाली 14 वर्षीय सेन कहती हैं, मदरसे में हमारे साथ धर्म के आधार पर कभी भेदभाव नहीं होता।
पश्चिम बंगाल में सेकेंडरी बोर्ड के तहत पढऩे वाले छात्रों की तादाद ज़्यादा होने की वजह से छात्र और अभिभावक ( ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में) इन मदरसों को तरजीह देने लगे हैं। इससे पहले भी बंगाल के मदरसों की अनूठी ख़ासियत पर कई अध्ययन हो चुके हैं। इन ख़ासियतों में मदरसों में लड़कियों का दाख़िला भी शामिल है।
बीते साल मदरसा बोर्ड की परीक्षा में शामिल होने वाले कुल छात्रों में लड़कियों की तादाद लगभग 60 फ़ीसदी थी। बीते साल मदरसा बोर्ड की परीक्षा में पूर्व बर्दवान जिले के केतुरग्राम स्थित अगरडांगा हाई मदरसा की तीन हिंदू छात्राओं, साथी मोदक, अर्पिता साहा और पापिया साहा ने 90 फीसदी से अधिक नंबर हासिल किए थे। इस मदरसे में पढऩे वाले 751 छात्रों में से लगभग 45 फीसदी हिंदू हैं। बोर्ड की परीक्षा में इस बार शामिल होने वाले 68 में से 23 छात्र हिंदू हैं।
अगरडांगा मदरसे के प्रभारी शिक्षक मोहम्मद अनीसुर रहमान बताते हैं, वर्ष 1925 में स्थापित होने के बाद से ही हिंदू छात्र इस मदरसे का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इलाके में दूसरा कोई स्कूल नहीं होने की वजह से हिंदुओं ने इस मदरसे को तरजीह दी थी। यहां पठन-पाठन के सत्र को देखते हुए बाद में तीन और स्कूल खुलने के बावजूद इस मदरसे में ही हिंदू समुदाय के सबसे ज़्यादा बच्चे पढऩे आते हैं।
इसी जि़ले के ओरग्राम चतुष्पल्ली हाई मदरसे में पढऩे वाले 1320 छात्रों में से 65 फीसदी हिंदू हैं। इस मदरसे में छात्राओं की तादाद (720) छात्रों (600) के मुक़ाबले 20 फीसदी अधिक है।
आखिर इन मदरसों में हिंदू छात्र-छात्राओं की तादाद क्यों बढ़ रही है? इसका जवाब है, यहां पठन-पाठन का बेहतर स्तर और माहौल। पेशे से किसान रमेश माझी की दो बेटियां चतुष्पल्ली मदरसे में पढ़ती हैं। माझी बताते हैं, इलाके में कई अन्य सरकारी स्कूल हैं। लेकिन मदरसे में पढ़ाई-लिखाई का स्तर और सुविधाएं बेहतर होने की वजह से मैंने दोनों बेटियों को यहां भेजने का फ़ैसला किया। ऐसा ही एक उदाहरण कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जि़ले में पेशे से किसान सोमेन मंडल के बड़े बेटे का है जो पहले स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ता था। लेकिन सीटों की कमी की वजह से जब दूसरे बेटे को सरकारी स्कूल में दाखिला नहीं मिला तो उन्होंने नज़दीक के एक मदरसे में उसे भर्ती करवा दिया। मंडल को मदरसे का माहौल इतना पसंद आया कि बड़े बेटे का नाम भी सरकारी स्कूल से कटा कर उसे मदरसे में दाख़िल करा दिया।
वो बताते हैं, सरकारी स्कूल में संबंधित विषय के शिक्षक नहीं थे। भूगोल का शिक्षक गणित पढ़ाता था तो विज्ञान का शिक्षक इतिहास। स्कूल में अनुशासन भी ठीक नहीं था। दूसरी ओर, मदरसे में पढ़ाई तो बेहतर होती ही थी, परिसर में अनुशासन भी बेहतर था। इसी वजह से मैंने बड़े बेटे का दाख़िला भी मदरसे में ही करा दिया।
मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अबू ताहेर भी मंडल की बातों की पुष्टि करते हैं। वो कहते हैं, मदरसों में शिक्षा का स्तर पहले के मुक़ाबले काफी बेहतर हुआ है। छात्रों को स्कॉलरशिप भी दी जा रही है। इसलिए ख़ासकर बीरभूम, पूर्व बर्धवान और बांकुड़ा जि़ले में ग़ैर-मुस्लिम छात्रों और अभिभावकों में इन मदरसों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। ताहेर बताते हैं कि राज्य के मदरसों में ग़ैर-मुस्लिम शिक्षकों की तादाद 29 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है।
बीबीसी ने जब शिक्षा विभाग के एक अधिकारी से मदरसे में बढ़ती हिंदुओं की संख्या पर बात की तो उन्होंने कहा, इन मदरसों में गैर-मुसलमान छात्रों की तादाद बढऩे के दो प्रमुख कारण हैं। पहला, नियमित स्कूलों में सीटों की कमी और दूसरा, मदरसों को उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से मिली मान्यता। इसके अलावा कई स्कूल डोनेशन की मांग करते हैं। इसकी वजह से भी गऱीब छात्र मदरसों का रुख करते हैं।
उत्तर 24-परगना जि़ले के एक मदरसे में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले अमिताभ मंडल कहते हैं, सामान्य स्कूलों में सीटों की कमी है। इसके अलावा फ़ीस कम होने के कारण भी छात्र मदरसों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। राज्य सरकार ने ग़ैर-मुसलमान छात्रों को अरबी भाषा में होने वाली दिक्कत को भी दूर कर दिया है। अरबी भाषा के 100 अंकों के प्रश्नपत्र में वह लोग 65 अंकों के सवाल का जवाब दूसरी भाषा में लिख सकते हैं।
मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष कमरुद्दीन कहते हैं, हमने मदरसों को भी सामान्य स्कूलों जैसा बना दिया है। यहां छात्र और छात्राएं साथ ही पढ़ते हैं। हमने दकियानूसी परंपराओं को ख़त्म कर दिया है। सरकार ने मदरसा छात्रों के लिए छात्रवृत्ति भी शुरू की है। इन मदरसों के कई छात्र आगे चल कर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला ले रहे हैं। (बीबीसी)

 

 


Date : 17-Feb-2020

अनुराग भारद्वाज

अंग्रेजी के मशहूर साहित्यकार टीएस इलियट ने भारतीय दार्शनिकों के बारे में कहा था- ‘महान भारतीय दार्शनिकों के सामने पश्चिम के दार्शनिक किसी स्कूल के बच्चों की मानिंद नजऱ आते हैं।’ यह बात अगर बीती सदी पर लागू करें तो जिद्दू कृष्णमूर्ति बिलकुल इसी कड़ी का हिस्सा लगते हैं। हां, यह अलग बात है कि वे ‘राष्ट्रीय पहचान’ को नकारते थे! कृष्णमूर्ति ने जिस तरह स्थापित परंपराओं को किनारे कर लोगों को आत्म साक्षात्कार की तरफ प्रेरित करने का काम किया था, वह उन्हें बीती सदी का दुनिया का सबसे बड़ा दार्शनिक भी बनाता है।
जिद्दू का जन्म तमिलनाडु के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 1895 में हुआ था। इनके पिता का नाम था जिद्दू नारायणिया। माता-पिता की आठवीं संतान होने के नाते कृष्ण की तर्ज पर इनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। जिद्दू नारायणिया थियोसॉफिक़ल सोसाइटी से जुड़े हुए थे। उस दौर में यह एक ऐसा संगठन था जिसकी सबसे बड़ी मान्यता थी कि दुनिया में जल्द ही एक विश्वगुरू आने वाला है।
इस धार्मिक-आध्यात्मिक संगठन के एक शीर्ष पदाधिकारी चार्ल्स वेब्सटर लीडबीटर ने ही भविष्य के उस धर्मगुरू की छवि कृष्णमूर्ति में देखी थी। यह 1909 की बात है जब लीडबीटर तत्कालीन मद्रास के अड्यार तट पर टहल रहे थे और उन्हें मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए, अपने में ही गुम एक 13 वर्षीय कृशकाय बालक दिखा। किशोरवय में कदम रख चुके कृष्णमूर्ति में लीडबीटर को कुछ ऐसा अनोखा भी दिखा जिसे वे अब तक खोजते रहे थे। 
कुल मिलाकर लीडबीटर ने कृष्णमूर्ति को पाकर समझ लिया था कि उनके संगठन की तलाश पूरी हो चुकी है। इसके बाद वे इस किशोर को संगठन में ले आए और फिर एक तरह से कृष्णमूर्ति थियोसॉफिकल सोसायटी के केंद्र बन गए। बाद में इस संगठन की सर्वेसर्वा मिस एनी बेसेंट ने जिद्दू को शिक्षा-दीक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया। यहां से 1921 में वे जब लौटकर आए तो उन्हें बेसेंट ने ‘विश्व गुरू’ घोषित कर दिया।
जिद्दू कृष्णमूर्ति ने बतौर दार्शनिक खुद की खोज में सबसे पहले गुरुवाद पर चोट की। 1929 में उन्होंने थियोसॉफिक़ल सोसाइटी द्वारा उन्हें दिया गया ‘आर्डर ऑफ़ दी ईस्ट’ का खि़ताब लौटाकर उस संस्था से संबंध तोड़ लिया था। इसके साथ ही उन्होंने घोषणा कर दी कि न तो वे कोई विश्व गुरु हैं और न ही उनका कोई अनुयायी है। गुरुवाद को लेकर उनका मानना था कि गुरु एक सत्ता होती है और किसी भी प्रकार की सत्ता का अनुयायी कभी-भी अपने चेतन-अचेतन को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं समझ सकता।
सत्ता के दूसरे महीन स्वरूपों का जिक्र करते हुए जिद्दू का मानना था, ‘किसी भी धर्म, दर्शन-विचार या सम्प्रदाय के मार्ग पर चलकर सत्य को हासिल नहीं किया सकता।’ उन्होंने सत्य को ‘मार्ग रहित भूमि’ मानते हुए कहा, ‘सत्य की खोज में मनुष्य का सभी बंधनों से मुक्त होना ज़रूरी है।’
जिद्दू ने तकरीबन हर आम और ख़ास मसलों पर राय दी है। उन्होंने एक परिचर्चा में उपस्थित लोगों से पूछा था, ‘राष्ट्रीयता के जाने पर क्या आता है?’ जैसा कि उनकी परिचर्चा में होता था, जिद्दू ने खुद अपने सवाल का जवाब कुछ यूं दिया, ‘राष्ट्रीयता के जाने पर बुद्धिमत्ता आती है। लोग एक धर्म त्यागकर दूसरा अपना लेते हैं, एक राजनीतिक पार्टी छोडक़र दूसरी पकड़ लेते हैं, यह सतत बदलाव उस अवस्था को दर्शाता है जिसमें बुद्धिमता नहीं है।’
जिद्दू का मानना था कि राष्ट्रीयता-राष्ट्रवाद के मायने और निहितार्थ जानकर, इसकी बाह्य और आंतरिक महत्ता समझकर ही इससे छुटकारा पाया जा सकता है। उनके मुताबिक़ बाह्य मायनों से टकराव पैदा होता है जिससे समाज विभाजन की ओर बढ़ता है। दूसरी तरफ अंदरूनी मायनों में राष्ट्रवाद मानसिक तौर पर स्वयं, यानी व्यक्ति के अहंकार को बढ़ावा देता है।
जिद्दू उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि अगर कोई व्यक्ति किसी छोटे गांव या बड़े शहर में रहता है तो उसकी कोई पहचान नहीं है। पर अगर वह ख़ुद को एक बड़े समूह या देश, या स्वयं को हिंदू कहता है तो इससे उसका अहम् संतुष्ट होता है और उसमें एक सुरक्षा का बोध आता है, लेकिन सुरक्षा का यह बोध अंतत: भ्रम है। तो जहां राष्ट्रवाद एक ओर कलह और टकराव को जन्म देता है, दूसरी ओर वही राष्ट्रवाद लोगों में भ्रम पैदा करता है। लेकिन जब कोई इसके पूरे मायने समझ लेता है तो राष्ट्रवाद ख़त्म होने लगता है।
जिद्दू कृष्णमूर्ति मानते थे कि ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया, बल्कि ईश्वर का जन्मदाता तो खुद मनुष्य है। मनुष्य ने ईश्वर का आविष्कार अपने फ़ायदे के लिए किया है। ईश्वर उन्हें एक विचार से ज़्यादा कुछ नजऱ नहीं आया जो देश, काल और समय के साथ बदलता है। यानी, मनुष्य की जैसी अवधारणा है, उसका भगवान वैसा ही है। इसीलिए हर मज़हब का भगवान अलग है। कृष्णमूर्ति के मुताबिक अगर ईश्वर है भी तो उसके होने से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता।
कृष्णमूर्ति की सेक्स के विषय में भी अपनी एक सुलझी हुई राय थी। उनका कहना था कि सेक्स करना कोई समस्या नहीं है, लेकिन उसके बारे में हरदम सोचते रहना एक समस्या है जिससे ज्यादातर लोग पीडि़त हैं। उनके मुताबिक सेक्स की क्रिया यानी संभोग कुछ पलों के लिए ही सही लेकिन इंसान के अहम को पूरी तरह गायब कर देती है। इस तरह वह इन पलों में खुद को और अपनी तमाम समस्याओं को भुला देता है और फिर बार-बार यह स्थिति पाने की कोशिश करता है। यहीं से सेक्स एक समस्या बन जाती है।
जिद्दू सेक्स को लेकर इस प्रबल आकर्षण के पीछे लोगों के अकेलेपन को जिम्मेदार ठहराते हैं। यहां अकेलेपन का मतलब यह नहीं है कि कोई इंसान अकेला रह रहा है। अकेलापन यानी किसी इंसान का इतना स्वकेंद्रित हो जाना कि वह हर किसी से अपना फायदा निकालने के बारे में ही सोचे और समाज के साथ अपने सहज और सच्चे संबंध कायम न रख पाए।  
उनका मानना था कि जब तक लोग इस अकेलेपन के कारणों को नहीं समझेंगे उनके लिए सेक्स का अतिविचार एक समस्या बनी रहेगी। बीती सदी के जो भी महान लोग जिद्दू कृष्णमूर्ति के समकालीन रहे, जैसे जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, हेनरी मिलर, एल्डस हक्सले (सभी साहित्यकार) या डेविड बोम (अलबर्ट आइंस्टीन के उत्तराधिकारी कहे जाने वाले वैज्ञानिक), ये सभी उनके करीबी दोस्त थे। इन लोगों के अलावा धर्म-अध्यात्म और मनोविज्ञान से लेकर चिकित्सा जगत तक के दिग्गज उनसे विचार-विमर्श के लिए आते रहते थे। इन सब लोगों के साथ उनकी जो भी बातचीत रही उसका सार निकालें तो वो यही बनता है कि बुनियादी इकाई के रूप में व्यक्ति ही पूरे समाज में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का साधन है।
कृष्णमूर्ति कहा करते थे कि जब तक लोग संगठित धर्म और राष्ट्रीयता-राष्ट्रवाद जैसी विभाजनकारी ताक़तों को समझकर इनके प्रभाव से मुक्त नहीं होंगे, तब तक वे अपनी चेतना में बदलाव नहीं ला पाएंगे। और तब तक समाज भी नहीं बदलेगा।
इसके साथ ही जिद्दू के विचार आज के मठाधीशों और स्वघोषित गुरुओं के अस्तित्व को चुनौती भी देते हैं। अगर आज वैज्ञानिक युग में भी ऐसे ढोंगियों की फ़सल लहलहा रही है तो इसका कारण हम ही हैं। क्यूंकि न हम सत्य को जानते हैं, न ही जानना चाहते हैं और न ही लीक से हटकर उस ‘मार्गरहित ज़मीन’ को तलाशना चाहते हैं जिसकी बात जिद्दू करते थे। 
हमें स्वर्ग तो चाहिए पर उसके लिए मरना नहीं चाहते, ईश्वर तो ढूंढ़ते हैं पर किसी और की उंगली पकडक़र। हम नाव में बैठे हुए वो मुसाफिऱ हैं जो नाख़ुदा को ख़ुदा समझने की भूल करते हैं और जब नैया डोलती है तो ख़ुदा-ख़ुदा करते हैं। ज़्यादा हो गया, जाने दीजिए। वो कहते हैं; ‘फ़लसफ़ी में बैठकर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर सुलझाने चला है सिरा मिलता नहीं।’ (सत्याग्रह)


Date : 16-Feb-2020

-मनीष सिंह

मेरे गाजीपुर के जन्मे, हार्वर्ड में पढ़े, पूर्व आईएएस और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक।  भारत की संचित निधि के एकाउंट जांच कर संसद को रिपोर्ट करने का जिम्मा होता है।  2008 में जब राय ने पद पाया, हिंदुस्तान अपने इतिहास के सबसे तेज ग्रोथ की फेज में था। मनमोहन-मोंटेक-प्रणब की तिकड़ी काम पर थी। और अचानक घपलों की खबर आने लगी। पहले 2जी स्पेक्ट्रम और फिर कोयले की खदानों में ऐसे आकाशीय आंकड़े, जिसमें जीरो गिनने में सुबह हो जाए। ये प्रिजम्प्टिव लॉस था। सरकार की गलत नीतियों से खजाने को इतना चूना लगने की संभावना थी। देखते ही देखते आंदोलन खड़ा हो गया। सरकार को काठ मार गया।
ऑडिटर का काम होता है, हिसाब-किताब के आंकड़े मिलान करना। योजनाओं के इम्प्लीमेंटेशन में अनियमितता भी उजागर करते हैं। घपलों में सरकारी खजाने का पैसा निकलता है, किसी की जेब मे जाता है। मगर विनोद राय के घोटाले में बताया गया पैसा न किसी को मिला था, न खजाने से गया था। तो फिर खजाने को कौन सी चपत लगी, जिसने बवाल मचा दिया? इस उदाहरण से समझिए। सोचिए कि जंगल के बीच, बियाबान में कोई मैदान है। इसे एक कॉलोनी बनाने के लिए एक रुपये गज़़ में कई कंपनियों को बांट दिया गया। शुरुआत में बियाबान में पड़ी जमीन की कीमत कुछ नही थी। कंपनियों ने पैसा लगाया, शानदार कॉलोनी बना दी।  इसमें एक कंपनी ऐसी थी, जिसने डेवलप तो कुछ किया नहीं।  मगर जब कॉलोनी बढिय़ा बन गई, तो अपनी जमीन किसी और को हजार रूपये गज़़ में बेच दी। कुछ किए बगैर कमा लिया। विनोद राय आए। पूरा मामला देखा। और ये हिसाब बताया कि जमीन की मार्केट वैल्यू हजार रुपये गज़़ थी, मगर सरकार ने तो एक रूपये गज़ में बांट दिया। अब 999 रुपये गज के हिसाब से सरकार को लॉस- एक लाख पच्चीस हजार करोड़ का। जनता ने सोचा, ये पैसा सोनिया गांधी खा गई। या मनमोहन ने बाथरूम की टाइल्स में छुपा दिया। लोगो ने मनमोहन के बाथरूम में झांकना शुरु कर दिया।
अभी इससे निजात हुई नहीं थी, की कोयला खदान में भी यही थ्योरी ले आए। इस बार घाटा बताया एक लाख पचहत्तर हजार करोड़। इस दौर में जीजाजी और सीडब्ल्यूजी घोटाले भी खबरों में आए।  सरकार बदनाम हो गई। लोग चिल्लाने लगे।  पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे चोरों से। बहरहाल, हम लड़े।  चोर हार गए, डकैत आ गए। कोर्ट में कोयला, टूजी, सीडब्ल्यूजी, जीजाजी कुछ साबित नही हुआ। सब निर्दोष साबित होकर बाहर आ गए।
 विनोद राय, अच्छी-खासी अर्थव्यवस्था को जिस स्पाइरल में डाल कर गए, वह पेंदे में बैठ चुकी है। टेलीकॉम और पॉवर सेक्टर वहीं से फिसलना शुरू हुआ। एनपीए वहीं से बनना शुरू हुआ। एक एकाउंटेंट की गलत राय पूरे धंधे की वाट लगा सकता हैं। कभी-कभी समूचे देश की।  साहब शेषन बनने चले थे, कुछ शेष न बचने दिया। बुढ़ापे में राय साहब बीसीसीआई के प्रेसिडेंट बन गए। यू सी।। बीसीसीआई इज प्रिफेर्ड रिफ्यूज ऑफ स्काउंडरल्स !!
साहब ने किताब लिखी है- नॉट जस्ट एन एकाउन्टेंट, तत्कालीन मंत्री टेलीकॉम ए राजा भी मानते हैं कि साहब मामूली एकाउन्टेंट नहीं थे।  उन्होंने तो राय साहब को कांट्रेक्ट किलर करार दिया था।
वो शानदार सरकार आज भी बदनाम है। मगर ए राजा चुनकर आज भी संसद में बैठते हैं। कभी-कभी स्पीकर की गद्दी पर भी। राय साहब को पेंशन मिलती ही होगी। देश उनके दिए घाव चाट रहा है।
उल्टी राय- सीधी राय!


Date : 16-Feb-2020

-विष्णु नागर
जिस प्रकार कांग्रेस द्वारा की गई उपेक्षा से क्रूद्ध  होकर सरदार पटेल ने भाजपा ज्वाइन कर ली, उसी तरह भाजपा की उपेक्षा से नाराज होकर उन हनुमानजी ने भी-जिन्हें हम वाया हनुमान चालीसा, भगवान राम के दास रूप में जानते हैं, आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर ली है। उपेक्षा सबको बुरी लगती है, हनुमानजी को भी लगी तो किम आश्चर्य! अब राम कह रहे हैं, आओ भरत सम मेरे भाई हनुमान, रामदुआरे के रखवारे, राम रसायन के वाहक, बल, बुद्धि, ज्ञान-गुण के सागर, सर्वसुख के दाता, अतुलित बल के स्वामी, आओ पवनपुत्र ,मेरे खातिर मेरे साथ रहो। मेरे बिना तुम्हारा गुजारा नहीं और तुम्हारे बिना मेरा भी नहीं। हम अलग होंगे तो हमारी जगहंसाई होगी। अयोध्या में जो विशाल राममंदिर बन रहा है,मैं वचन देता हूँ कि चाहे जो हो जाए, अपने चरणों में तुम्हें जगह दिलवाकर रहूंगा। तुम जानते हो, राम का वचन खाली नहीं जाता। रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।
इसके बावजूद हनुमानजी मानने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि बाकी सब ठीक है। मगर आप ही बताइए कब तक आपके चरणों में पड़ा रहूँ? इक्कीसवीं सदी आ गई है। दासप्रथा न जाने कब खत्म हो चुकी है और आप चाहते हैं कि अब भी मैं आपका दास बना रहूं?  आपको दास रखने का इतना ही शौक है तो जरा आडवाणी, मोदी, शाह, आदित्यनाथ को ट्राय करके देखो। ये एक घंटे में रफूचक्कर हो जाएंगे, पलटकर दुबारा नहीं आएंगे। 
दूसरी तरफ मैं हूं।  मैं लाखों वर्षों तक आपका दास बना रहा मगर आज तक मिला क्या? इससे तो मोदी का दास बन जाता तो कम से कम खेल मंत्री बन जाता। मेरा तो कोई प्रमोशन ही नहीं हुआ। वही दास का पद।तुलसीदास ने तो सदा रहो रघुपति के दासा कहकर आपकी गुलामी का पट्टा मेरे नाम लिख दिया। लिखते रहें सौ तुलसीदास। अब मैं आपका ही नहीं, किसी का भी दासत्व स्वीकार नहीं करूंगा। 
जब सरदार पटेल, नेहरू का साथ छोड़ सकते हैं, तो मै क्यों आपका साथ नहीं छोड़ सकता? आपके रहते मेरी उपेक्षा भाजपा में पिछले तीस साल से हो रही थी, मगर आपने एक बार भी मेरी तरफ उनका ध्यान ध्यान दिलाया? कभी नहीं। फिर भी मैंने अभी तक धीरज रखा। अपने प्रभु की न्यायप्रियता पर भरोसा किया मगर आपने मुझे लाइटली लिया। यू ट्रीटेड मी लाइक डर्ट। आपने सोचा कि यह हनुमान तो मेरा युगों-युगों से दास है, ये जाएगा कहां? मुझे आपकी यह सोच अब अच्छी तरह समझ में आ चुकी है। दिल्ली चुनाव में मौका मिला तो मैं पलटी मार गया, आपसे, भाजपा से मुक्त हो गया, केजरीवाल का, आप का हो गया। अब मैं अपने मंदिर में और आप अपने मंदिर में रहो। अब ऐसा तो होगा नहीं कि आपका साथ छोड़ देने के कारण मेरे भक्त मेरे मंदिर में आना छोड़ दें। हर मंगलवार को भीड़ लगाना छोड़ दें। मेरे पास छह दिन और एक मंगलवार है। आपके पास साल में सिर्फ एक मंगलवार यानी रामनवमी है और बाकी 364 दिन सामान्य हैं। मेरा महत्व आपसे अधिक नहीं तो कम भी नहीं।
मेरे केजरीवाल को तो पूरी हनुमान चालीसा याद है, जबकि आपके भाजपाइयों को रामायण तो छोड़ो, वंदेमातरम तक याद नहीं। आप अयोध्या मेंं मंदिर बनवाते रहो। हमारा तो कनाटप्लेस हनुमान मंदिर बना हुआ है और भी हजारों हैं, मोर दैन इनफ हैंं।  आप रहिए उधर, हम रहेंगे इधर। हम दलबदलू कपिल मिश्रा नहीं हैं। आप में हैं तो कट्टर सेक्युलर हैं, भाजपा में आ गए तो भयंकर सांप्रदायिक हो गए। हमने अपनी पार्टी चुन ली है। 
देखना है कि भविष्य में राममंदिर पार्टी जीतती है या हनुमान चालीसा पार्टी। वैसे आना हो तो आप भी इधर आ जाओ। भविष्य सेक्युलरिज्म का है, हिंदु सांप्रदायिकता का नहीं। कहो तो मैं केजरीवाल से बात करूं। देखो केजरीवाल ने मोदी-शाह जैसों को अपने काम के दम पर पटखनी दे दी है। भाजपाइयों के होश गायब कर दिए हैं। अभी भी वक्त है, आ जाइए। सेक्युलरिज्म का साथ दीजिए। आपको आपको आपका हनुमान मिल जाएगा, मुझे मेरे राम लेकिन एक बात साफ है, हनुमान अब आपके चरणों में नहीं रहेगा। मंजूर हो तो बात चलाऊँ? सोच लो,आज नहीं, कल बता देना मगर बता देना, कनफ्यूजन में मत रखना। प्रणाम।


Date : 16-Feb-2020

-डॉ. अजय खेमरिया
मप्र के उत्तरी और मालवा इलाके में सोशल मीडिया पर एक नारा ट्रेंड कर रहा है- 'माफ करो कमलनाथ, हमारे नेता तो महाराजÓ। कमलनाथ के दिल्ली आवास पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ समन्वय बैठक में हुए कथित टकराव के बाद मप्र में सिंधिया समर्थक आग बबूला है। खुलेआम मुख्यमंत्री कमलनाथ के विरुद्ध मुखर होकर बयानबाजी हो रही है।  दावा किया जा रहा है कि अभी तो सिंधिया समन्वय बैठक से बाहर निकलकर आएं हैं। अगर पार्टी से बाहर चले गए तो मप्र में दिल्ली जैसे हालात हो जाएंगे।
 असल में मप्र कांग्रेस की अंदरुनी लड़ाई अब सड़कों पर है।  मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी खुलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की चुनौती को स्वीकार कर उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए कह दिया है। 15 वर्षों तक सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के लिए मप्र में मुसीबत बीजेपी से कहीं ज्यादा खुद कांग्रेसियों से खड़ी होतीं रही है। सीएम पद की रेस में रहे सिंधिया लोकसभा का चुनाव हारने के बाद खुद को मप्र में अलग-थलग महसूस करते हैं। 
सरकार के स्तर पर मामला चाहे राजनीतिक नियुक्तियों का हो या प्रशासन में जो महत्व दिग्विजय सिंह को मिलता है वह सिंधिया को नहीं। इसलिए समानांतर सत्ता केन्द्र के लिए  समर्थकों द्वारा पिछले एक वर्ष से उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने के लिए आलाकमान पर दबाब बनाया जा रहा है। सिंधिया खुद अक्सर सरकार के विरुद्ध बयान देते रहे हैं जिससे मुख्यमंत्री के लिए असहजता की स्थिति निर्मित हो जाती है। अथिति शिक्षकों की मांगों को लेकर सिंधिया ने एक बार फिर कमलनाथ के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर सड़कों पर उतरकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष का एलान कर दिया। किसानों की कर्जमाफी को लेकर भी उन्होंने जिस अतिशय विपक्षी सुर में अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उसने शांत प्रवृत्ति के कमलनाथ को जबाबी हमले के लिए मजबूर कर दिया। 
बताया जाता है कि दिल्ली में कमलनाथ के बंगले पर हुई बैठक में दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर भिंड़त हो गई और सिंधिया बैठक से निकलकर चले गए। मुख्यमंत्री जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी है अब खुलकर कह रहे है कि अगर सिंधिया को सड़कों पर उतरना है तो बेशक उतर जाएं। 
आमतौर पर कमलनाथ इस तरह के सीधे  टकराव से अभी तक बचते रहे हैं। पहला अवसर है जब कमलनाथ ने सीधे सिंधिया को उनकी हद बताने का प्रयास किया है। वस्तुत: मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है और कमलनाथ ने उनके साथ आरंभ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है। अक्सर सरकार के ऊपर होने वाले सभी नीतिगत हमलों को दिग्विजय सिंह ही फेस करते हैं। उनके समर्थक विधायक और मंत्री संख्या में सबसे अधिक है और कभी भी उनके द्वारा कमलनाथ की संप्रभुता को चैलेंज नहीं किया जाता है। दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक मंत्री अक्सर अफ़सरशाही, वचनपत्र से लेकर प्रदेश अध्यक्ष जैसे विषयों पर कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। 
मप्र के सियासी समीकरण में सबसे अहम फैक्टर दिग्विजय सिंह है और यह सर्वविदित है कि कमलनाथ को सीएम की कुर्सी सिंधिया के  नाम पर दिग्विजय के वीटो से ही मिल सकी है। सिंधिया और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक अदावत दो पीढ़ी पुरानी है। ग्वालियर अंचल में सिंधिया परिवार के दो राजघरानों की सभ्य और संसदीय अदावत में दिग्विजय सिंह सदैव बीस साबित हुए हैं। 
मप्र की मौजूदा लड़ाई असल में कांग्रेस की जन्मजात गुटीय लड़ाई का ही एक पड़ाव है। कमलनाथ कभी मप्र की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहे है, जैसे दिग्विजय या सिंधिया। न ही उनका वैसा कोई जमीनी और कैडर आधरित जनाधार है। राजनीतिक परिस्थितियों के चलते दिग्विजय सिंह कमलनाथ के साथ है और इसकी एक वजह सिंधिया को रोकना भी है। असल में सिंधिया जिस शाही आवरण के साथ सियासत करते है वह मप्र के दूसरे सियासी क्षत्रपों को रास नहीं आती है। अपने पिता के उलट उनके राजनीतिक विरोधी प्रतिक्रियात्मक धरातल पर उनसे मुकाबले के लिए खड़े हो जाते हैं। 
गुना लोकसभा में उनकी अप्रत्याशित पराजय ने उन्हें मप्र में सत्ता विमर्श के केंद्र से बाहर  सा कर दिया है। इसीलिए उनके समर्थक जिन्हें उनकी भी सहमति होती है पार्टी लाइन से परे जाकर प्रदेश अध्यक्ष के लिए लाबिंग करते रहे हैं। मप्र में इस बार कांग्रेस की वापसी में ग्वालियर चंबल की उन 34 सीटों का निर्णायक योगदान है जिनमें से 26 पर पार्टी को जीत मिली है। सिंधिया इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते है और विधानसभा चुनावों की पूरी कैम्पेन अबकी बार सिंधिया सरकार के साथ हुई थी। ऐसे में सिंधिया और उनके समर्थकों को लगता है कि आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है। इस बीच लोकसभा चुनाव में हुई हार ने माहौल को औऱ खराब कर दिया है।
पिछले 7 महीने से सिंधिया अक्सर सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।  किसान कर्जमाफी को लेकर उनके बयान विपक्षियों की भाषा और लहजे की प्रतिध्वनि करते हैं। ताजा क्लेश अथिति शिक्षकों के नियमितीकरण का है जिसे लेकर सिंधिया ने सरकार के विरूद्ध सड़कों पर उतरने की धमकी दी। उन्होंने पार्टी के वचनपत्र को लेकर भी कमलनाथ को कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुख्यमंत्री ने जिस तल्खी के साथ पहली बार सिंधिया को जबाब दिया है। वह बताता है कि पार्टी में अब गुटबाज़ी नियंत्रण से परे हो चली है। प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोविन्द सिंह ने तत्काल सिंधिया को सरकार के खाली खजाने का अवलोकन करने की सलाह दे डाली। इस बयान को दिग्विजय कैम्प का जबाब भी कहा जा रहा है। 
वहीं  सिंधिया समर्थक मंत्री  गोविंद राजपूत ने सागर में एक दिन पहले कर्जमाफी न कर पाने पर सिंधिया की मौजूदगी में अफसोस जताया था। यानी मप्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के साथ भी नहीं चल रही है।
दूसरी तरफ दिग्विजय और कमलनाथ के कैमेस्ट्री अभी भी बेहतरीन मिली हुई है। मार्च में प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर भी मतदान होना है। एक सीट पर दिग्विजय सिंह का जाना तय है वहीं दूसरी पर सिंधिया की दावेदारी रोकने के लिए अब आदिवासी या ओबीसी कार्ड भी चला जा सकता है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सत्ता का समानांतर केंद्र विकसित किया जाए।
अध्यक्ष चाइल्ड वेलफेयर कमेटीशिवपुरी (मप)


Date : 15-Feb-2020

खुदरा व्यापारी हर साल अरबों यूरो के नए कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों को नष्ट कर रहे हैं। यूरोप के सांसद वस्तुओं को ऐसे नष्ट किए जाने पर जल्द से जल्द कानून लाना चाहते हैं। यह प्रक्रिया पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है।
   फ्रांस ने खाद्य पदार्थों की बर्बादी पर रोक लगा दी है। ऐसा करने वाला वो दुनिया का पहला देश बन गया है। फरवरी के पहले हफ्ते में यहां की संसद ने खाद्य पदार्थों के अलावा बाकी चीजों की बर्बादी करने पर भी रोक लगाने फैसला लिया। जर्मनी की पर्यावरण मंत्री स्वेन्या शुल्त्स भी नए सामानों को नष्ट किए जाने के खिलाफ हैं। इसे रोकने के लिए आने वाले दिनों में जर्मनी में भी कानून बनाए जाने की तैयारी की जा रही है। मीडिया में एचएनएम और बरबरी जैसी बड़े फैशन कंपनियों में उपयोग के काबिल सामान को अपने वेयरहाउस में जलाए जाने की रिपोर्ट आने के बाद जर्मनी और फ्रांस के पर्यावरण मंत्रालय ने इन कंपनियों पर कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
अमेजन, सालांडो और ऑटो जैसे ऑनलाइन रिटेल प्लेटफॉर्म कई कंपनियों का सामान एक ही जगह बेचते हैं। ऐसी वेबसाइट पर लगाम लगाने के लिए नियम लाना जरूरी है। फैशन की दौड़ में यह आर्थिक मॉडल जरूरत से ज्यादा सामान बना रहा है जो किसी के लिए उपयोगी नहीं है। फ्रांस की अल्मा ड्यूफोर सामान की बर्बादी के खिलाफ अभियान चलाती हैं। वह कहती हैं, सामान फिर से बेचने के बजाय इसे नष्ट कर दिया जाता है। यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। वहीं कुछ देश हैं जो रिटेल के कचरे से निपटने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोगों के सामने चुनौती दूसरी है, बड़ी कंपनियां के लिए ऐसा कोई कानून नहीं है जिसके तहत वे बताएं कि कितना सामान नष्ट करते हैं। 
यूरोपीय संघ में शामिल देश हर साल कितना सामान नष्ट करते हैं इसका सही अनुमान किसी भी देश की सरकार के पास नहीं है, लेकिन फ्रांस और जर्मनी की सरकार ने हाल ही में एक अनुमान प्रकाशित किया है। इस अनुमान के मुताबिक 2014 में फ्रांस में कंपनियों ने 63 करोड़ यूरो और 2010 में जर्मनी में कंपनियों ने 700 करोड़ यूरो का सामान नष्ट किया। फ्रांस और यूरोपीय संघ के खुदरा व्यापार पर किए कई अध्ययन अलग अलग प्रकार के सामानों के नष्ट होने के प्रतिशत का सिर्फ अनुमान लगाते हैं लेकिन सार्वजनिक लेखांकन की कमी इनको सत्यापित करना असंभव बना देती है। जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है। सामान की बर्बादी पर फ्रांस की सरकार की वेबसाइट जहां 80 करोड़ यूरो का आंकड़ा पेश करती है तो वहीं पर्यावरण मंत्रालय 63 करोड़ यूरो का। लेकिन पर्यावरणविदों के मुताबिक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। जर्मनी की लेखिका और जर्मन सोशल एंटरप्राइजेज इनाचुरा की संस्थापक यूलियाना क्रोनन के मुताबिक, जर्मन सरकार ने 700 करोड़ यूरो के सामान की बर्बादी के जो आंकड़े दिए हैं वह पर्याप्त नहीं हैं लेकिन किसी और के पास कोई दूसरा आंकड़ा भी नहीं है।
बड़े ऑनलाइन रिटेलर जांच के दायरे में आ गए हैं क्योंकि ग्राहक ऑनलाइन शॉपिंग को तरजीह दे रहे हैं। जो सामान ग्राहकों को नहीं चाहिए वह पैकेज वापस भेज दिया जाता है। इएचआई रिटेल इंस्टीट्यूट ने जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड की कंपनियों का सर्वेक्षण किया। जिसमें पाया गया कि वापस लौटे 70 प्रतिशत सामान को नए सामान के तौर पर बेचा जाता है लेकिन बाकी 30 प्रतिशत सामान का क्या होता है इस बारे में नहीं बताया गया। 
ब्रिटेन में दान करने वाली संस्थाओं के सर्वेक्षण में पाया गया कि पैकेज की बर्बादी सिर्फ ग्राहक के पैकेज वापस करने से ही नहीं होती। बीसीजी रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी में आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाहर निकलने वाले दो से तीन प्रतिशत उत्पाद मुख्य रूप से दोषपूर्ण पैकेजिंग, मिसलेबलिंग, ज्यादा उत्पादन और पुराने उत्पादों की जगह नए सामान का बाजार में लॉन्च होना है। वहीं 2019 में बामबैर्ग विश्वविद्यालय के अध्ययन में पाया गया कि 3।9 प्रतिशत वापस लौटे पैकेजों को नष्ट किया गया।
कंपनियां कितना सामान बर्बाद करती हैं इसका ब्यौरा भी नहीं देती। सालांडो और ऑटो कंपनियों के मुताबिक वापस आए सामान का केवल एक प्रतिशत हिस्सा नष्ट किया जाता है। वहीं जर्मनी की अमेजन कंपनी की प्रवक्ता ने नष्ट किए सामान का प्रतिशत तो नहीं बताया लेकिन वह कहती हैं, "जब कोई विकल्प नहीं बचता तभी वापस आए सामान को रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है या कूड़ेदान में।" फ्रांस में भी अमेजन ने 2019 में कहा था कि जो सामान नहीं बिकता उसके छोटे से हिस्से को ही नष्ट किया जाता है।
ब्रिटिश फैशन कंपनी बरबरी ने 2018 में 3।8 करोड़ यूरो के बैग और परफ्यूम को नष्ट कर दिया था, जिसके बाद उसे  सार्वजनिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इसके बाद कंपनी ने सामान को नष्ट करना बंद कर दिया। स्वीडन की फैशन कंपनी एचएनएम पर भी 2017 में ऐसा आरोप लगा। जब कंपनी ने शहर के बिजली संयंत्र में कपड़े जला दिए। कंपनी की दलील थी कि यह कपड़े दोबारा इस्तेमाल होने लायक नहीं थे। कंपनी के जर्मनी के प्रवक्ता का कहना है, हमारे लिए पहनने योग्य और सुरक्षित उत्पादों को नष्ट करना विकल्प नहीं है। कंपनी ने यह नहीं बताया कि अब तक कितना सामान नष्ट किया गया है। 

 


Date : 15-Feb-2020

दिनेश श्रीनेत

अरविंद केजरीवाल की पार्टी ‘आप’  की जीत के बाद अब विरोधी दल के पास शर्मिंदगी छिपाने का एक ही तरीका बचा है कि दिल्ली की जनता को ‘मुफ्तखोर’ कहकर अपमानित किया जाए। आप कुछ मत कीजिए ट्विटर पर  मुफ्तखोर दिल्ली वाले हैशटैग सर्च करके देखिए- किस तरह ट्रोलर्स लगातार अपमानजक भाषा में दिल्ली वालों को निकम्मा, मुफ्तखोर, लालची और भिखारी कह रहे हैं। एक सभ्य कहे जाने वाले लोकतांत्रिक समाज में कितनी गंदी भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता यह भाजपा के ट्रोलर्स से सीखा जा सकता है।
मुफ्त बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य और परिवहन पर दिल्ली का पढ़ा-लिखा मिडल क्लास भी नाक-भौं सिकोड़ता है। स्टेट की तरफ से लोक कल्याणकारी योजनाएं चलाना कोई नई बात नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद यूरोप के अधिकांश देशों ने इस मॉडल को अपनाया और अपने देशवासियों को अवसर की समानता तथा एक अच्छे जीवन के लिए न्यूनतम प्रावधान पर जोर दिया। यहां यह समझना होगा कि यह मॉडल पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित है। यहां पर पूंजीवाद के मॉडल का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों और जन-कल्याण के लिए होता है।
आजादी के बाद नेहरू के समाजवादी मॉडल की अपनी खामियां और खूबियां रही होंगी मगर आर्थिक उदारीकरण के बाद लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कहीं पीछे छूट गई। एशियन डेवलपमेंट बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भारत इस मामले में अभी भी बहुत पीछे है। भारत में सामाजिक सहायता के मद में जीडीपी का महज 1.7 फीसद हिस्सा खर्च होता है, जबकि एशिया के कई दूसरे देशों में यह आंकड़ा 3.4 फीसदी, चीन में 5.4 फीसदी और एशिया के अधिक आमदनी वाले देशों में 10.2 फीसदी है।
उदारीकरण के बाद कारपोरेट, मीडिया और राजनीतिक दलों के गठजोड़ से जो सरकारें बनीं उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं से हाथ पीछे खींचने शुरू किए। घाटे का तर्क देकर सरकारें सार्वजनिक उपक्रमों को एक-एक करके खत्म करने लगीं। जबकि सावर्जनिक उपक्रमों के घाटे में जाने की वजह सरकारों की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार था, मगर सरकारें किसी भी किस्म की जवाबदेही से मुक्त रहीं। इस बार के बजट में एयर इंडिया और भारतीय रेल के बाद एलआईसी को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी हो गई। तर्क दिया गया है कि सरकार ने अगले वित्त वर्ष में घाटे को कम करने का लक्ष्य रखा है। उस पैसे को जुटाने के लिए केंद्रीय बीमा कंपनी एलआईसी के शेयर निजी कंपनियों को बेचेगी।
पिछले दिनों जेएनयू और जामिया के आंदोलनों में एक और जुमला उछला था। उसकी तर्क श्रृंखला यह थी कि हमारे टैक्स से इन विश्वविद्यालयों में ये देशद्रोही मुफ्त में पढ़ते हैं। अब जरा देखिए कि डायरेक्ट टैक्स पेयर हैं कितने। शेखर गुप्ता ने द प्रिंट के अपने एक आर्टिकल में लिखा है, सीबीडीटी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वित्त वर्ष में केवल 6,351 व्यक्तियों ने 5 करोड़ से ज्यादा की आय का रिटर्न भरा, जिनकी औसत आय 13 करोड़ रुपये थी। इससे कितना अतिरिक्त राजस्व आएगा? मात्र 5,000 करोड़ रु।, जो कि आईपीएल के सालाना टर्नओवर से बहुत ज्यादा नहीं है। गरीबों को यह सोचकर मजा आएगा कि अमीरों को निचोड़ा जा रहा है।  जबकि हकीकत यह है कि आज भी देश की लोअर मिडिल क्लास और गरीब जनता ही असली टैक्स देती है।
इसके बदले उन्हें मिलता क्या है?
यहीं पर लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना सामने आती है। केरल से लेकर बांग्लादेश तक, सरकार ने जहां भी स्वास्थ्य के मद में हल्का सा जोर लगाया है वहां मृत्यु-दर और जनन-दर में कमी आई है। अब यूरोपीय देशों की तरफ देखते हैं। वहां के आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में जर्मनी और फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड शामिल हैं। इसके अलावा स्कैंडेनेवियन देशों में भी बहुत सी ऐसी योजनाएं चलती हैं जो वहां के सामान्य लोगों के जीवन स्तर और हैपिनेस इंडैक्स को बेहतर बनाती हैं।
जर्मनी में अनइंप्लाइमेंट इंश्योरेंस स्कीम चलाई जाती है। जिसमें बेरोजगार लोगों को लिविंग अलाउंस देने के अलावा उन्हें रोजगार तलाशने में मदद और ट्रेनिंग की भी व्यवस्था है। इसके अलावा जर्मनी में बच्चों के डे-केयर सेंटर बड़ी संख्या में नॉन प्रॉफिट आर्गेनाइजेशन द्वारा चलाए जाते हैं और सरकार से उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहयोग मिलता है। यूरोप के लगभग सभी देशों में डिसएबल लोगों तथा उम्रदराज़ लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार की तरफ से योजनाएं चलती हैं। स्वीडेन में जो लोग घर का खर्च वहन नहीं कर सकते उन्हें हाउसिंग अलाउंस दिया जाता है। यूके में स्वास्थ्य सुविधाएं एनएसएच के अधीन हैं। 
ये स्थानीय प्रशासन की तरफ से चलाए जाने वाले स्वास्थ्य केंद्र थे जो अमूमन नि:शुल्क होते थे। हालांकि पिछले कुछ सालों वहां पर भी निजीकरण की कवायद और उसका विरोध जारी है। केजरीवाल ने लंबे समय बाद सरकार को पुन: कल्याणकारी योजनाओं के लिए जवाबदेह बनाने का प्रयास किया है। इस बात की प्रसंशा करनी होगी कि सारी नफरत फैलाने की कोशिशों, जबरदस्त पैसा झोंकने और मीडिया का सहारा लेने के बाद भी उन्होंने अपनी भाषा संतुलित रखी, अपने काम पर फोकस किया और एक शानदार जीत हासिल की।
हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण लेखक स्रड्ड4 क्कह्म्ड्डद्मड्डह्यद्ध अपनी पोस्ट में लिखते हैं, उनके (मनीष सिसोदिया) विरुद्ध भाजपा ही नहीं, दिल्ली में बेहद ताकतवर ‘शिक्षा-माफिय़ा’ भी लगा हुआ था। शिक्षा और स्वास्थ्य ये दो मुख्य मुद्दे थे। स्पष्ट है कि देश की राजधानी दिल्ली ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को नागरिक सौहार्द्रता की भावना से नकार दिया है। यह समाज में किसी भी स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य अहिंसा के साधनों की भी जीत है। तो अगली बार अगर आपको कोई मुफ्तखोर वाला जुमला सुनाए तो...
उसे भी सुना दीजिए।


Date : 15-Feb-2020

ध्रुव गुप्त
भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। निश्चित रूप से मिजऱ्ा ग़ालिब उनमें से एक हैं।  मनुष्यता की तलाश, शाश्वत तृष्णा, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के सौंदर्यबोध से गुजरना एक दुर्लभ अनुभव है। लफ्ज़़ों में अनुभूतियों की परतें इतनी कि जितनी बार पढ़ो, नए-नए अर्थ खुलते जाते हैं। 
वैसे तो हर शायर की कृतियां अपने समय का दस्तावेज होती हैं, लेकिन अपने दौर की पीड़ाओं की नक्काशी का ग़ालिब का अंदाज़ भी अलग था और तेवर भी जुदा। यहां कोई रूढ़ जीवन-मूल्य, स्थापित जीवन-दर्शन नहीं है। रूढिय़ों का अतिक्रमण जीवन मूल्य है, आवारगी जीवन-शैली और अंतर्विरोध जीवन दर्शन। जि़न्दगी की तमाम दुश्वारियों और भावनाओं की जटिलताओं से टकराते हुए ग़ालिब ने देश-दुनिया को वह सब दिया जिसपर आने वाली सदियां गर्व करेंगी।
दीवान-ए-ग़ालिब को पढऩा एक बिल्कुल अलग अहसास है। वहां हम ग़ालिब के अंतर्संघर्षों, उनके फक्कड़पन और उन हज़ारों ख्वाहिशों की दबी-दबी चीखें भी पढ़ पाते हैं जिनके पीछे ग़ालिब उम्र भर भागते रहे। ग़ालिब मतलब अधूरे सपनों और नामुकम्मल ख्वाहिशों का वैसा सफऱ जो कभी किसी का भी पूरा नहीं होता। ग़ालिब मतलब रवायतों को तोडक़र आगे निकलने की बेचैनी। जीवन और मृत्यु के उलझे हुए रिश्ते को सुलझाने की बेचैनी। दुनियादारी और आवारगी के बीच जऱा तालमेल बिठाने की बेचैनी। अपनी तनहाई को लफ्ज़़ों से पाटने की बेचैनी। इश्क़ के उलझे धागों को खोलने और उसके सुलझे सिरों को फिर से उलझाने की बेचैनी।
ग़ालिब की पुण्यतिथि (15 फरवरी) पर खिराज़-ए-अक़ीदत !

 


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