विचार/लेख

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26-Sep-2021 2:33 PM (38)

-आर.के. जैन

आज पुत्री दिवस यानी डाटर्स डे है। इस मौके पर मैं नेहरूजी द्वारा इंदिरा जी को जेल से लिखे उनके पत्रों का संकलन ‘एक पिता के पुत्री के नाम पत्र’ की पुस्तक से सभ्यता की व्याख्या पर संक्षिप्त में लिख रहा हूँ।

एक पिता की भूमिका में लिखा गया नेहरू का यह पत्र सभ्यता की सबसे सुंदर और सरल व्याख्या है।

जवाहरलाल नेहरू ने यह पत्र दस साल की इंदिरा गांधी को तब लिखा था जब वे मसूरी में थीं। अंग्रेजी में लिखे इस पत्र का हिंदी अनुवाद मशहूर लेखक प्रेमचंद ने किया था। मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता का कुछ हाल बताता हूं। लेकिन इसके पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का अर्थ क्या है? कोश में तो इसका अर्थ लिखा है अच्छा करना, सुधारना, जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना. और इसका व्यवहार किसी समाज या जाति के लिए ही किया जाता है। आदमी की जंगली दशा को, जब वह बिल्कुल जानवरों-सा होता है, बर्बरता कहते हैं। सभ्यता बिल्कुल उसकी उल्टी चीज है। हम बर्बरता से जितनी ही दूर जाते हैं उतने ही सभ्य होते जाते हैं।

लेकिन हमें यह कैसे मालूम हो कि कोई आदमी या समाज जंगली है या सभ्य? यूरोप के बहुत-से आदमी समझते हैं कि हमीं सभ्य हैं और एशिया वाले जंगली हैं. क्या इसका यह सबब है कि यूरोप वाले एशिया और अफ्रीका वालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं? लेकिन कपड़े तो आबोहवा पर निर्भर करते हैं। ठंडे मुल्क में लोग गर्म मुल्क वालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं। तो क्या इसका यह सबब है कि जिसके पास बंदूक है वह निहत्थे आदमी से ज्यादा मजबूत और इसलिए ज्यादा सभ्य है? चाहे वह ज्यादा सभ्य हो या न हो, कमजोर आदमी उससे यह नहीं कह सकता कि आप सभ्य नहीं हैं। कहीं मजबूत आदमी झल्ला कर उसे गोली मार दे, तो वह बेचारा क्या करेगा?

तुम्हें मालूम है कि कई साल पहले एक बड़ी लड़ाई हुई थी! दुनिया के बहुत से मुल्क उसमें शरीक थे और हर एक आदमी दूसरी तरफ के ज्यादा से ज्यादा आदमियों को मार डालने की कोशिश कर रहा था. अंग्रेज जर्मनी वालों के खून के प्यासे थे और जर्मन अंग्रेजों के खून के. इस लड़ाई में लाखों आदमी मारे गए और हजारों के अंग-भंग हो गए कोई अंधा हो गया, कोई लूला, कोई लंगड़ा।

तुमने फ्रांस और दूसरी जगह भी ऐसे बहुत-से लड़ाई के जख्मी देखे होंगे। पेरिस की सुरंग वाली रेलगाड़ी में, जिसे मेट्रो कहते हैं, उनके लिए खास जगहें हैं. क्या तुम समझती हो कि इस तरह अपने भाइयों को मारना सभ्यता और समझदारी की बात है? दो आदमी गलियों में लडऩे लगते हैं, तो पुलिसवाले उनमें बीच बचाव कर देते हैं और लोग समझते हैं कि ये दोनों कितने बेवकूफ हैं. तो जब दो बड़े-बड़े मुल्क आपस में लडऩे लगें और हजारों और लाखों आदमियों को मार डालें तो वह कितनी बड़ी बेवकूफी और पागलपन है। यह ठीक वैसा ही है जैसे दो वहशी जंगलों में लड़ रहे हों। और अगर वहशी आदमी जंगली कहे जा सकते हैं तो वह मूर्ख कितने जंगली हैं जो इस तरह लड़ते हैं?

अगर इस निगाह से तुम इस मामले को देखो, तो तुम फौरन कहोगी कि इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रंास, इटली और बहुत से दूसरे मुल्क जिन्होंने इतनी मार-काट की, जरा भी सभ्य नहीं हैं। और फिर भी तुम जानती हो कि इन मुल्कों में कितनी अच्छी-अच्छी चीजें हैं और वहां कितने अच्छे-अच्छे आदमी रहते हैं।

अब तुम कहोगी कि सभ्यता का मतलब समझना आसान नहीं है, और यह ठीक है। यह बहुत ही मुश्किल मामला है। अच्छी-अच्छी इमारतें, अच्छी-अच्छी तस्वीरें और किताबें और तरह-तरह की दूसरी और खूबसूरत चीजें जरूर सभ्यता की पहचान हैं। मगर एक भला आदमी जो स्वार्थी नहीं है और सबकी भलाई के लिए दूसरों के साथ मिल कर काम करता है, सभ्यता की इससे भी बड़ी पहचान है। मिलकर काम करना अकेले काम करने से अच्छा है और सबकी भलाई के लिए एक साथ मिल कर काम करना सबसे अच्छी बात है।


26-Sep-2021 1:39 PM (30)

-संजय श्रमण

ज्योतिबा फुले ने भारतीय महिलाओं को शुद्रातिशूद्र की श्रेणी में गिना था। न केवल शूद्रों की तरह उनका शोषण होता है बल्कि सवर्णों और शुद्रो दोनों श्रेणियों के मर्दों द्वारा भी उनका एक ही जैसा शोषण होता है।

भारतीय समाज व्यवस्था में बंगाल सहित पूरे देश में सवर्ण जातियों में एक पुरुष बहुत कम उम्र की बच्ची से शादी कर सकता था। ईश्वरचंद विद्यासागर के गुरू ने सत्तर पार की उम्र में पांच साल की लडक़ी से शादी की थी। ऐसे ही ज्योतिबा फुले के एक ब्राह्मण मित्र ने भी एक बच्ची से शादी की थी। उम्र में इस अमानवीय अंतर के साथ अवसरों में भी अंतर था। एक विधुर, अलग हो चुका या पहले से ही विवाहित पुरुष कई बार विवाह कर सकता था।

ऐसे में बूढ़े पति की मृत्यु से या चार पांच पत्नियों के एक पति की मृत्यु से समाज में विधवाओं और अबलाओं की संख्या बढ़ जाती थी, इस कारण समाज में व्यभिचार, अनैतिक संबन्ध आदि बढ़ जाते थे। इस बड़ी समस्या का इलाज विश्वगुरु ने अपने ही निराले अंदाज में निकाला। दुनिया का कोई सभ्य समाज ऐसे उपायों की कल्पना नहीं कर सकता। ये इलाज पूरे भारत में प्रचलित और स्वीकृत थे।

पहला इलाज था सती प्रथा, हर स्त्री को अपने पति के साथ जल मरना चाहिए।

दूसरा इलाज था कि विधवा घर के एक कोने में गाय बकरी की तरह आजन्म बंधी रहे या आत्महत्या कर ले या कुपोषित रहकर खुद ही मर जाये।

तीसरा इलाज था वैश्यालय जो हर बड़े धार्मिक तीर्थ के आसपास बन जाया करते थे।

सबसे पहले ज्योतिबा फुले ने इन स्रियों की बेहतरी के लिए आवाज उठाई, उन्होंने विधवा गर्भवतियों के लिए एक आश्रम खोला और ‘अवैध’ बच्चों की जिम्मेदारी खुद उठाई। ऐसे ही एक ब्राह्मणी विधवा के बेटे को उन्होंने अपना बेटा बनाकर पाला। इसी क्रम में स्त्रीयों के लिए स्कूल भी खोले और बेहद गरीबी की हालत में इन स्कूलों को चलाया। इस बात की चर्चा नहीं होती। क्योंकि फूले एक शुद्र हैं।

अंग्रेजों के साथ उठने बैठने के दौरान बंगाली भद्रलोक के कुछ लोगों को इसपर बड़ी शर्म महसूस हुई और उन्हीने कम से कम सती प्रथा को विराम लगाने का प्रयास किया। राजा राम मोहन रॉय ने बडे संघर्ष के बाद अंग्रेजी सरकार की मदद और प्रेरणा से इस कुप्रथा को बंद किया। इस बात की खूब चर्चा होती है। क्योंकि रॉय एक ब्राह्मण हैं।

सोचिये अगर यूरोपीय सभ्य समाज का सम्पर्क भारत से न हुआ होता तो क्या क्या नहीं चल रहा होता इस देश में?


26-Sep-2021 1:30 PM (33)

-चिन्मय मिश्रा

सन् 1978 में महाश्वेता देवी ने ‘‘द्रोपदी’’ शीर्षक से एक लघु कथा लिखी थी। पितृसत्ता से लडऩे वाली और नक्सलवादी होने के आरोप के मद्देनजर उसकी गिरफ्तारी होती है। पुलिस अधिकारी अपने कुछ सिपाहियों से उसका बलात्कार करने को कहता है। बलात्कार करने के बाद सिपाही उससे पुन: कपड़े पहनने को कहते हैं। परंतु द्रोपदी कपड़े पहनने से इंकार कर देती है। और दांतों से अपने बाकी के कपड़े भी फाड़ देती है। बड़े अफसर के सामने वह नि:वस्त्र ही जाती है और कहती है, ‘‘मैं कपड़े क्यों पहनू ? यहां कोई इंसान ऐसा नहीं है, जिससे मैं शर्माऊ।’’ इस कहानी के लिखे जाने के भी 6 बरस पहले 26 मार्च 1972 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के देसाईगंज थाना परिसर में मथुरा नाम की एक आदिवासी लडक़ी (14 से 16 वर्ष के मध्य) के साथ दो पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया था। सेशन न्यायालय ने अभियुक्तों को बरी कर दिया था। बम्बई उच्च न्यायालय ने दोनों को सजा दी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1979 में उच्च न्यायालय के फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मथुरा ने, ‘‘कोई शोर नहीं मचाया और उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे, संघर्ष के भी कोई चिन्ह नहीं मिलते अतएव कोई बलात्कार नहीं हुआ। चूंकि वह संभोग की आदी थी, तो संभव है उसने पुलिस वालों को उकसाया हो (वे ड्यूटी के दौरान नशे में थे) कि वे उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए’’ (साधारण भाषा में अनुवाद) इस निर्णय के पश्चात प्रो. उपेन्द्र बक्शी सहित तमाम लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखा, देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। निर्णय तो नहीं बदला परंतु बलात्कार संबंधी कानून में जरुर परिवर्तन हुआ।

वस्तुत: स्थितियां बहुत नहीं बदलीं। 15 जुलाई 2004 को मणिपुर की 12 महिलाओं ने मनोरमा थंगजाम की मृत्यु व कथित बलात्कार के खिलाफ, इंफाल स्थित असम राईफल्स के मुख्यालय के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया था। इन बारह माँ या इमा के हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था ‘‘भारतीय सेना हमारा बलात्कार करो’’ और ‘‘भारतीय सेना हमारा माँस ले लो।’’ मनोरमा के गोलियों से छलनी शरीर के निजी अंगों पर गोलियों के घाव थे। परिस्थितियों में उसके बाद तब भी कोई बदलाव नहीं आया। सन् 2012 में दिल्ली में हुआ निर्भया कांड जघन्यता की सभी सीमाओं को झुठला चुका था। सारा देश विचलित हुआ। फिर नए सिरे से कानूनों पर मनन हुआ और इस कांड में शामिल चार वयस्कों को 20 मार्च 2020 को फाँसी भी दे दी गई। फाँसी की सजा का अभी स्मृति लोप भी नहीं हुआ था कि 14 सितंबर 2020 को हाथरस जिले में एक 19 वर्षीय दलित युवती के साथ बलात्कार और उसके बाद दी गई यातनाओं की वजह से उसकी करीब दो हफ्ते बाद अस्पताल में मृत्यु हो गई। यानी 200 दिनों तक भी फाँसी का कोई प्रभाव नहीं रहा। इससे भारतीय पुरुष समाज या पितृसत्तात्मक मानसिकता के दंभ को समझा जा सकता है।

 

जघन्यता, कू्ररता व वीभत्सता की निरंतरता को हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी देखें! दिल्ली के एक श्मशान घाट का पुजारी और उसके साथ एक 9 वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार के दौरान आरोपी उसका मुँह इतनी जोर से बंद रखते हैं कि उसकी दम घुटने से मृत्यु हो जाती है। हैवानियत की शायद कोई सीमा नहीं होती। इस बालिका के साथ संभवत: उसकी मृत्यु के बाद भी सामूहिक बलात्कार का दौर चलता रहा होगा। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में सामूहिक बलात्कार की प्रक्रिया में युवती आँखों को एसिड (पुलिस के अनुसार जहरीली वनस्पति) से जला दिया जाता है। महाराष्ट्र में एक नाबालिग लडक़ी के साथ 8 महीनों में 33 लोग बलात्कार करते हैं। ग्वालियर में 4 साल की लडक़ी के साथ बलात्कार होता है। अपने एक शोध के दौरान मैं और मेरी पत्नी ऐसे 2 बच्चों से मिले जिनकी उम्र 3 वर्ष से कम थी और उनके साथ बलात्कार हुआ था। बारह वर्ष की ऐसी बालिका से मिले जो कि यौन संबंधों की आदी हो चुकी है और उसका परिवार उसे किराये पर देता था। वैसे अब वह मुक्त है। अनगिनत मामले हैं, महिलाओं, युवतियों और बच्चियों (और अब किशोरों व लडक़ों) के साथ भी यौन अपराधों के परंतु हमारा समाज इस समस्या से आँख नहीं मिलाना चाहता।

महाश्वेता जी की कहानी न तब काल्पनिक थी न अब! इसे एक शाश्वत सच्चाई की तरह स्वीकारना होगा। मर्दो की नंगई अब सभी सीमाएं पार कर गई है। सामूहिक बलात्कार करते हुए उन्हें अपने नग्न चित्रण तक में कोई संकोच नहीं होता। क्या यह मनुष्य कहलाने के काबिल भी हैं ? बलात्कार के वीडिया सार्वजनिक कर देने से (ना) मर्दों के सम्मान को कोई ठेस नहीं पहुंचती। शायद ऐसा इसलिए कि उन्होंने नग्नता को अपना आभूषण और अपनी मर्दानगी का सबूत समझ लिया है। गिरने की सीमा को पुरुष समाज का एक अंश तोड़ चुका है। यह नंगई शौर्य प्रदर्शन का क्या कोई नया तरीका है ? भारत के तकरीबन हर अंचल में बलात्कार व यौन प्रताडऩा देने के नए-नए वीभत्स तरीके सामने आ रहे हैं। महिलाओं का प्रतिकार समाज में उनके प्रति समर्थन जुटा पाने में असमर्थ है। कारण? संभवत: यही की पीडिताएं अधिकांशत: वंचित, आदिवासी या अल्पसंख्यक वर्गो से ताल्लुक रखती हैं। ऐसा क्यों? इस अलगाव की जड़ें बहुत पहले मजबूत की जा चुकी हैं। सीमोनंद बुआ बताती हैं। अरस्तु स्त्री को परिभाषित करते हुए कहते हैं, औरत कुछ गुणवत्ताओं की कमियों के कारण ही औरत बनती है। हमें स्त्री के स्वभाव से यह समझना चाहिए कि प्राकृतिक रूप से उसमें कुछ कमियां हैं। वह एक प्रासंगिक जीव है। वह आदम की एक अतिरिक्त हड्डी से निर्मित है। अत: मानवता का स्वरूप पुरुष है और पुरुष से संबंधित ही परिभाषित करता है। वह औरत को स्वायत्त व्यक्ति नहीं मानता। वह अपने बारे में सोच भी नहीं सकती। इसका अर्थ यह है कि वह अनिवार्यत: पुरुष के भोग की एक वस्तु है और इसके अलावा और कुछ नहीं। यानी पुरुष पूर्ण है जबकि औरत बस ‘‘अन्या’’।

भारतीय बलात्कारियों ने भले ही अरस्तु को न पढ़ा हो लेकिन वे इस वैश्विक भेदभाव को सहस्त्राब्दियों से अपने मन में सहेजे हुए हैं और उसे अपना अधिकार मानते हैं। ऐसा लगा था कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की निर्णायक भूमिका के चलते उनकी परिस्थिति में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। कुछ परिवर्तन आए भी। परंतु पुरुषवादी सोच में बहुत अंतर नहीं आया। गौरतलब है डॉ. राममनोहर लोहिया सन् 1967 के अपने लेख, ‘‘औरतें और यौन शुचिता’’ में लिखते हैं, ‘‘भारत का दिमाग बड़ा क्रूर हो गया है। जानवरों पर जैसी क्रूरता इस देश में होती है अन्य कहीं वैसी नहीं। मनुष्य एकदूसरे के प्रति क्रूर हैं। गांव क्रूर है, महल्ला क्रूर है। लेकिन ऐसे कितने कुटुम्ब और लड़कियां हैं जो गांव अथवा महल्ले की क्रूरता से बच सकें। इसलिए उन्हें परंपरा की रस्सियों और बेडिय़ों में जकड़ कर रखना पड़ता है।’’ परंतु 55 साल बाद यह प्रवृत्ति गांवों से बरास्ता कस्बों, नगरों, शहरों से होते हुए महानगरों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है। हर राज्य, हर शहर, हर कस्बा, हर गांव अपने तई दावा करता है कि वह भारत का सबसे सुरक्षित स्थान है, महिलाओं के लिए। परंतु हर सुरक्षित क्षेत्र सेंधमारी का शिकार है। किसी जमाने में मुंबई सबसे सुरक्षित माना जाता था। वर्तमान में वहां भी महिलाएं नए तरह की जघन्यताओं की शिकार हो रहीं हैं। केरल को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब? मध्यप्रदेश को तो शांति का टापू कहा जाता था लेकिन आज यहां बच्चों और महिलाओं पर होने वाले अपराधों का रिकार्ड बनता जा रहा है। दु:खद स्थिति यह है कि उत्तरपूर्वी भारत जो महिलाओं के लिए हमेशा से सुरक्षित रहा है, वहां भी उनके लिए परिस्थितियां प्रतिकूल होती जा रहीं हैं।

भारत में महिलाओं की बेहतर के लिए लगातार नए कानून बनते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एक वर्ग निरंतर यह दोहरा रहा है कि महिलाओं और बच्चों से संबंधित कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। इस विरोधाभासी स्थिति को लगातार प्रोत्साहित कर भेदभाव को कायम रखने की पुरजोर कोशिश जारी है। ठीक ऐसा ही अनुसूचित जाति व जनजाति संबंधी कानूनों को लेकर भी कहा व किया जा रहा है। जब भी स्थितियां ज्यादा प्रतिकूल होती हैं तो भारतीय शास्त्रों के कुछ उद्धहरण हमारे सामने आ जाते हैं। यह कुछ वैसा ही है कि हम अपने घरों के आसपास स्वतंत्रता दिवस और गणराज्य दिवस पर देशप्रेम के गीतों का खोखला शोर सुनते हैं। हममें से अधिकांश उन्हें आत्मसात करने की कोशिश ही नहीं करते। इस परिस्थिति को बदलने के लिए वास्तविक राजनीतिक प्रतिबद्धता और शक्ति की आवश्यकता है।

कवि चन्द्रकान्त देवताले अपनी कविता, ‘‘इधर मत आना.... यह काटीगाँव हैं’’, में महाश्वेता देवी को याद करते हुए लिखते हैं ‘अलबत्ता आ जाये दीदी महश्वेता/ बैठ जाए जीमने/ और तोड़ टुकड़ा घास रोटी का/पूछ लें काए से खाऊँ इसे?/ और कह दे अक्समात बुढिय़ा कोई/ आँसू टपकाकर भूख मिलाकर खा ले माई। तो क्या यह दुबारा। धरती फट जाने जैसा नहीं होगा?’’

भारत में तो रोज ही धरती फट रही है, पर वह भी औरतों को में समा नहीं पा रही।


26-Sep-2021 1:16 PM (42)

-ध्रुव गुप्त

भारत की सबसे पहली बोलती फिल्म थी ‘आलम आरा’। वर्ष 1931 की इस फिल्म के निर्देशक थे अर्देशिर ईरानी। उन्होंने भारतीयों के बीच संगीत की लोकप्रियता को समझा और इस फिल्म में सात गाने डाले। उनमें से पहला गाना था ‘दे दे खुदा के नाम पे प्यारे’। यह एक प्रार्थना गीत था जिसके गायक थे अभिनेता वजीर मोहम्मद खान। वज़ीर खान ने फिल्म में एक फकीर का चरित्र निभाया था। ‘आलम आरा’ सिर्फ एक सवाक फिल्म नहीं थी बल्कि यह बोलने-गाने वाली फिल्म थी जिसमें बोलना कम और गाना ज्यादा था। इस फिल्म के संगीतकार थे फिरोजशाह मिस्त्री और बी ईरानी। इसी फिल्म के साथ हमारे यहां फिल्मी संगीत की नींव पड़ी। फिल्म के साथ इसके संगीत को भी व्यापक सफलता हासिल हुई। ‘दे दे खुदा के नाम पर प्यारे’ को भारतीय फिल्म के पहले गीत और वजीर खान को पहला गायक होने का गौरव प्राप्त हुआ। उस दौर में फिल्मों में पार्श्व गायन की परंपरा शुरु नहीं हुई थी। गीत को हारमोनियम और तबले के साथ सजीव रिकॉर्ड किया गया था।

 

दुर्भाग्य से भारत की पहली बोलती फिल्म का कोई भी प्रिंट अब उपलब्ध नहीं है। गीत की उपलब्ध रिकॉर्डिंग बेहद अस्पष्ट है। फिल्म शोधकर्ताओं ने इस ऐतिहासिक गीत को श्रीमती कृष्णा अटाडकर की आवाज में रिकॉर्ड कर भारतीय सिनेमा के पहले गीत के जादू को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।

 


25-Sep-2021 8:51 PM (59)

-डॉ राजू पाण्डेय
कांग्रेस शासित प्रदेशों में से मध्यप्रदेश में पहले ही कांग्रेस ने अपनी अंतर्कलह के कारण बहुत कठिनाई से अर्जित सत्ता गंवा दी थी। कांग्रेस शासित शेष तीन राज्यों पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लंबे समय से पार्टी में असंतोष और गुटबाजी की चर्चाएं होती रही हैं। पंजाब में असंतुष्ट धड़े को सफलता मिली है और कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद दलित सिख चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मुख्यमंत्री बने हैं। इस पूरे प्रकरण को नवजोत सिद्धू की विजय और कांग्रेस आलाकमान के सम्मुख उनके बढ़ते कद के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

इन सभी राज्यों में स्थानीय क्षत्रपों की अतृप्त महत्वाकांक्षाओं के कारण ही कांग्रेस की सरकारें संकट में आई हैं। कांग्रेस आलाकमान परिस्थिति के वस्तुनिष्ठ आकलन द्वारा कोई व्यावहारिक समाधान निकालने में नाकाम रहा है। आलाकमान की कार्यप्रणाली में श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने से चली आ रही उस वर्षों पुरानी रणनीति की झलक नजर आती है जिसके तहत जनाधार वाले क्षेत्रीय नेताओं के पर कतरे जाते थे और दरबारी किस्म के वफादार नेताओं को महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपे जाते थे। दुर्भाग्य से श्रीमती इंदिरा गांधी का करिश्मा और अपने बलबूते पर चुनाव जिताने की क्षमता गांधी परिवार के वर्तमान सदस्यों के पास नहीं है, इसलिए क्षेत्रीय नेतृत्व को सम्मान देना इनके लिए न केवल नैतिक रूप से उचित है बल्कि एकमात्र कूटनीतिक विकल्प भी है।

नरेन्द्र मोदी अपने मन मंदिर के किसी गुप्त अंधकारमय कक्ष में श्रीमती इंदिरा गांधी की तस्वीर अवश्य सजाकर रखते होंगे क्योंकि उनकी कार्यप्रणाली में श्रीमती गांधी के शासनकाल की अनेक नकारात्मक विशेषताओं की झलक मिलती है जिनके लिए वे आलोचना की पात्र बनी थीं। पिछले मार्च से कर्नाटक, उत्तराखंड और गुजरात में भाजपा ने भी मुख्यमंत्री बदले हैं तथा अनेक प्रबल दावेदारों और वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा कर अल्प चर्चित चेहरों को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी है। वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी चुनाव जिताने की करिश्माई शक्ति रखते हैं इसलिए इन फैसलों पर पार्टी में कोई असंतोष व्यक्त कर पाने का साहस नहीं कर पाया है। लेकिन पंजाब में कांग्रेस द्वारा सुनील जाखड़, सुखजिंदर सिंह रंधावा आदि की उपेक्षा के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।


पंजाब कांग्रेस के वर्तमान संकट को कांग्रेस आलाकमान ने सुलझाने के बजाए उलझाने में अपना योगदान दिया है। सच तो यह है कि आलाकमान के वरदहस्त के कारण ही नवजोत सिंह सिद्धू अमरिंदर सिंह पर लगातार हमलावर होते रहे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अमरिंदर सिंह की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई थी। वे न तो जनता के लिए सहज उपलब्ध थे न विधायकों के लिए। लेकिन इस बात को भी भुलाया नहीं जा सकता कि श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिल रही असाधारण सफलताओं के बीच पंजाब में कांग्रेस को सत्तासीन कराने वाले अमरिंदर सिंह ही थे। पंजाब के विगत विधानसभा चुनावों के समय यह अमरिंदर ही थे जिन्होंने आलाकमान से  कहा कि वह चुनाव प्रचार से दूरी बनाकर रखे और उन्हें फ्री हैंड दिया जाए। ऐसा साहसिक कदम आत्मघाती भी सिद्ध हो सकता था अगर अमरिंदर पराजित हो जाते किंतु उन्हें प्रभावशाली जीत मिली। इसके बाद यह स्वाभाविक ही था कि उन्हें कांग्रेस के एक प्रभावी कद्दावर नेता के रूप में देखा जाने लगा।


यदि कांग्रेस आलाकमान ने राजपरिवार के अमरिंदर को अपने फार्म हाउस से सत्ता का संचालन करने वाले, जनता और जनप्रतिनिधियों से कट चुके अलोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में चिह्नित कर हटाया है तब भी इसे देर से उठाए गए एक सही कदम की संज्ञा ही दी जा सकती है। वह भी इतनी देर कि इस कदम के सुपरिणाम कदाचित ही मिल सकें। इतिहास भी कांग्रेस के इस निर्णय के साथ नहीं है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा 20 नवंबर 1996 को अर्थात 7 फरवरी 1997 को होने वाले विधानसभा चुनावों से करीब ढाई माह पूर्व राजिंदर कौर भट्टल को हरचरन सिंह बरार के स्थान पर पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया गया था। कारण तब भी यही गुटबाजी और अंतर्कलह थे।  तब कांग्रेस को 117 सदस्यीय विधानसभा में केवल 14 सीटें मिलीं थीं। चन्नी को जितना समय मिला है उसमें कभी न पूरी होने वाली लोकलुभावन घोषणाएं ही की जा सकती हैं।


यदि आलाकमान अमरिंदर की खुद्दारी और खुदमुख्तारी से परेशान था और उसने अमरिंदर के विरुद्ध व्याप्त असंतोष का आश्रय लेकर अपनी नाराजगी की अभिव्यक्ति की है तो हालात कांग्रेस के लिए अच्छे नहीं हैं। अगर जनता और जनप्रतिनिधियों से अमरिंदर ने दूरी बना ली थी तो क्या वे अपने नेता श्री राहुल गांधी का ही अनुसरण नहीं कर रहे थे जो सबके लिए सहज उपलब्ध नहीं हैं और अमरिंदर के लिए तो कदापि नहीं थे। अमरिंदर, राहुल के पिता स्व. श्री राजीव गांधी के स्कूली मित्र रहे हैं और राहुल उनके लिए पुत्रवत हैं। किंतु उनसे  मिलने के लिए राहुल के पास समय न था। अमरिंदर को अपदस्थ करने के लिए नवजोत सिंह सिद्धू को प्रश्रय देना कांग्रेस आलाकमान की बड़ी चूक सिद्ध हो सकती है। सिद्धू अतिशय महत्वाकांक्षी हैं, वे भाजपा में रह चुके हैं,कांग्रेस उनका वर्तमान ठिकाना है और मुख्यमंत्री पद नहीं मिलते देख आम आदमी पार्टी में जाने में उन्हें देर न लगेगी जिसके प्रति वे अपना सकारात्मक रुझान पहले ही जाहिर कर चुके हैं। जब बतौर बल्लेबाज़ उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया था तो उन्हें स्ट्रोकलेस वंडर कहा जाता था। कालांतर में उन्होंने अपने स्ट्रोक्स की रेंज बहुत बढ़ा ली थी और सिक्सर सिद्धू बन गए थे।  पहले क्रिकेट कमेंटेटर और अब बतौर राजनेता उनके पास अब भी स्ट्रोक्स की भरमार है। लेकिन दिक्कत यह है कि सही समय पर सही स्ट्रोक का चयन करने की उनकी क्षमता खत्म सी हो गई है। अंग्रेजी और हिंदी के मुहावरों के कोष उन्हें कंठस्थ हैं। वे इनका प्रयोग परिस्थितियों के अनुसार कम ही करते हैं, वे इनके प्रयोग के लिए अवसर पैदा करने की कोशिश ज्यादा करते हैं और अनेक बार तो उनके यह शब्दालंकार खीज अधिक पैदा करते हैं, चमत्कार कम। कमेंटेटर और राजनेता दोनों ही भूमिकाओं में वे अपने बयानों को लेकर विवादित रहे हैं। हो सकता है कि वक्ताओं की कमी से जूझ रही कांग्रेस यह सोचती हो कि विस्फोटक सिद्धू उसके लिए उपयोगी होंगे किंतु सिद्धू के पास शब्दों का जो गोला बारूद है वह आत्मघाती अधिक है। वे कांग्रेस में चली आ रही मणिशंकर अय्यर की परंपरा के योग्य उत्तराधिकारी हैं, नाजुक मौकों पर दिए गए जिनके बयान जीती बाजी को हार में तब्दील करने के लिए कुख्यात रहे हैं। नाराज अमरिंदर पहले ही सिद्धू के इमरान और बाजवा से रिश्तों को लेकर सवाल उठा चुके हैं और उन्हें राष्ट्र विरोधी तक कह चुके हैं। इस प्रकार आगामी चुनावों के लिए भाजपा को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल गया है। सिद्धू अपने ही शब्दों में इतने खो जाते हैं कि देश,काल और परिस्थिति का बोध उन्हें नहीं रह पाता। वे उतने ही उत्साह से, उतनी ही निर्लज्जता से उन्हीं शब्दों का प्रयोग राहुल-सोनिया की प्रशंसा के लिए कर सकते हैं जो उन्होंने चंद दिन पहले मोदी के लिए प्रयुक्त किए थे। 


श्री नरेंद्र मोदी का अनुकरण करते हुए कांग्रेस भी प्रतीकों की राजनीति की ओर उन्मुख हो रही है। जो भी हो दलित मुख्यमंत्री बनाना एक स्वागतेय कदम है। 1972 में मुख्यमंत्री बनने वाले ज्ञानी जैल सिंह ओबीसी वर्ग से थे।  इसके बाद से पंजाब में मुख्यमंत्री पद के लिए जाट सिख समुदाय के नेता ही राजनीतिक दलों की पहली पसंद रहे हैं यद्यपि इसकी आबादी 19 प्रतिशत ही है। प्रदेश की जनसंख्या के  32 प्रतिशत का निर्माण करने वाले दलित समुदाय को पहली बार पंजाब की कमान दी गई है। 

क्या कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी को आगामी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने का साहस करेगी? यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही दलितों का समर्थन कांग्रेस को मिलेगा। 

कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब में राजपरिवार के सदस्य की छुट्टी कर एक दलित को सत्ता सौंपी है। क्या इस कदम से यह संकेत भी मिलता है कि छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग के भूपेश बघेल पर फिलहाल कोई संकट नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी दावेदारी ठोंक रहे टी एस सिंहदेव भी राजपरिवार के ही सदस्य हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस उन आरोपों को आधार प्रदान करना नहीं चाहेगी जिनके अनुसार कांग्रेस सवर्णों और अभिजात्य वर्ग की पार्टी है।

एक प्रश्न आयु का भी है। 79 वर्षीय अमरिंदर का स्थान लेने वाले चन्नी मात्र 58 वर्ष के हैं। ऐसी दशा में क्या यह माना जाए कि 70 वर्षीय अशोक गहलोत के स्थान पर 44 वर्षीय सचिन पायलट पार्टी को नई ऊर्जा दे सकते हैं। 

कांग्रेस आलाकमान को अपने फैसलों में एकरूपता रखनी होगी तभी जनता में यह संकेत जाएगा कांग्रेस एक सुविचारित रणनीति के तहत वंचित समुदाय की राजनीति कर रही है और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए पार्टी में अब युवाओं को वृद्ध होने तक प्रतीक्षा नहीं करनी होगी।

पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस समर्थक बुद्धिजीवी वर्ग की रणनीति में एक स्पष्ट एवं निर्णायक बदलाव देखा जा रहा है। कांग्रेस को भाजपा को सत्ताच्युत करने में सक्षम किसी भी भाजपा विरोधी मोर्चे की धुरी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रकार पर्दे के पीछे से कांग्रेस पार्टी को संचालित करने वाले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी को स्वतः ही श्री नरेन्द्र मोदी से आमने सामने के संघर्ष के लिए विपक्ष के सेनापति का दर्जा मिल जाता है, वे विजयी होने पर प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार बन जाते हैं। 

हमें यह तो स्वीकारना ही होगा कि भाजपा को आगामी लोकसभा चुनावों में पराजित करने की कोई भी रणनीति कांग्रेस की उपेक्षा करके अथवा उसे पूर्ण रूप से खारिज करके तैयार नहीं की जा सकती। यह भी एक ध्रुव सत्य है कि नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस अविभाज्य रूप से अन्तरसम्बन्धित हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। यह रिश्ता इतना अनूठा और अपरिभाषेय है कि कांग्रेस की दुर्दशा के लिए नेहरू-गांधी परिवार को जिम्मेदार मानने वाले भी यह जानते हैं कि अगर कांग्रेस को सत्ता वापस कोई दिला सकता है तो वह नेहरू-गांधी परिवार ही है। रुग्ण और वृद्ध सोनिया की घटती सक्रियता के बीच यह चमत्कार करने के लिए इस परिवार के दो सदस्य हमारे बीच हैं- लगभग 17 वर्ष पुरानी अपनी राजनीतिक पारी का स्वरूप एवं दिशा निर्धारित करने में अब भी असमंजस के शिकार राहुल गांधी और बहुत देर से राजनीति में प्रवेश करने वाली प्रियंका गांधी जिन्हें कांग्रेस में अपनी भूमिका तय करनी है। 17 वर्षों के राजनीतिक सफर के बाद राहुल आज कांग्रेस पार्टी के किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर नहीं हैं। जब कांग्रेस केंद्र में सत्ता में थी तब भी उन्होंने कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व लेकर प्रशासनिक अनुभव प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की थी।

राहुल राजनीति में सफल और लंबी पारी खेलने के लिए आवश्यक निरंतरता दिखाने में सफल नहीं हो पाए हैं। राजनेताओं की प्राण रक्षा के लिए उन्हें सुरक्षा घेरे में रखा जाता है किंतु कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सुरक्षा देने के बहाने बंधक बनाकर रखने वाले दरबारियों और चाटुकारों से छुटकारा पाने में राहुल नाकामयाब रहे हैं। उन्होंने दरबारियों और चाटुकारों की पुरानी टीम को तो चलता किया लेकिन इनकी नई टीम बना ली। जब शीर्ष नेतृत्व प्रादेशिक नेताओं के लिए सहज उपलब्ध नहीं रहता, उन्हें प्रत्यक्ष भेंट और सीधे संवाद का अवसर नहीं देता अपितु मध्यस्थों और बिचौलियों को प्रश्रय देता है तब गलतफहमी एवं दूरी बढ़ने की गुंजाइश हमेशा रहती है।

राहुल अपने प्रतिभावान युवा साथियों को लेकर क्यों असुरक्षित महसूस करते हैं यह समझ पाना कठिन है। इस असुरक्षा का केवल एक ही स्पष्टीकरण दिया जा सकता है- वे स्वयं गांधी परिवार की ताकत और करिश्मे को लेकर सशंकित हैं।

राहुल ने कई बार अपनी नेतृत्व क्षमता से प्रभावित किया है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लिए अपरिहार्य समझे जाने वाले अजीत जोगी को दरकिनार कर नंदकुमार पटेल, भूपेश बघेल और टी एस सिंहदेव को छत्तीसगढ़ कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का उत्तरदायित्व देना एक साहसिक निर्णय था। पिछले विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया की आक्रामकता और अनुभवी कमलनाथ की संगठन क्षमता का बेहतर उपयोग लेना भी राहुल के नेतृत्व कौशल का प्रमाण था। राजस्थान कांग्रेस को दुबारा गढ़ने की जिम्मेदारी युवा सचिन पायलट को देकर राहुल ने एक चुनौतीपूर्ण पहल की थी और सचिन पायलट ने भी उन्हें सही साबित किया। पंजाब में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह को विधानसभा चुनावों में फ्री हैंड देकर राहुल ने उदारता एवं दूरदर्शिता का परिचय दिया था। 

हाल के डेढ़ साल में कोविड-19 विषयक राहुल के आकलन एवं भविष्यवाणियां आश्चर्यजनक रूप से सटीक रही हैं। उन्होंने कोविड-19 के मसले पर नरेन्द्र मोदी की तुलना में अलग ढंग से सोचा, वे अधिक तार्किक एवं विज्ञान सम्मत विचार प्रस्तुत करते रहे, उन्होंने सरकार को समयपूर्व चेतावनी भी दी और सकारात्मक सुझाव भी प्रस्तुत किए। 


भाजपा ने कांग्रेस और गांधी परिवार पर निरंतर आक्रमण कर इस बात को परिपुष्ट किया है कि भारतीय राजनीति में यदि भाजपा का विकल्प कोई है तो वह गांधी परिवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस ही है। किंतु कांग्रेस और राहुल को भावी विपक्षी गठबंधन के नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रस्तुत करने की हड़बड़ी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के संघर्ष को कुछ इस तरह हवा दे सकती है कि सारे विपक्षी दल एक मंच पर एकत्रित ही न हो पाएं। कांग्रेस यदि मुद्दों की राजनीति करे, एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम प्रस्तुत करे तो विपक्षी एकता का कठिन कार्य सरल हो सकता है। पूर्व में ऐसा हुआ भी है। कांग्रेस चाहे तो वैकल्पिक मंत्रिपरिषद बना कर मोदी सरकार की हर नीति पर अपना पक्ष रख सकती है। राहुल को यह तय करना होगा कि वे किंग बनना चाहते हैं या किंग मेकर की भूमिका उन्हें अधिक उपयुक्त लगती है। यदि वे किंग बनना चाहते हैं तो उन्हें अधिक सक्रिय, सहज उपलब्ध, जनोन्मुख तथा आक्रामक होना होगा। बतौर किंग मेकर राहुल को कांग्रेस जनों के मध्य यह संदेश पहुंचाना होगा कि कांग्रेस के लिए यह निर्णायक संघर्ष है, अस्तित्व की लड़ाई है। यही बात अन्य विपक्षी दलों को भी समझानी होगी। उन्हें कांग्रेसवाद की सर्वसमावेशी प्रकृति को आचरण में लाना होगा। 

राहुल एक अलग ढंग से मोदी का विकल्प प्रस्तुत करते हैं। मोदी की लार्जर दैन लाइफ छवि उन्हें जनता से बहुत ऊपर एक देवतुल्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती है, जिसे केवल दूर से देखा जा सकता है, जिसकी केवल पूजा की जा सकती है किंतु जिससे संवाद नहीं किया जा सकता। मोदी की अभिव्यक्तियों और निर्णयों में कठोर यांत्रिकता दिखती है जिसमें भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। राहुल को एक आम मानव मानव के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जो भूलता और गलती करता है, गिरता और संभलता है। उनकी अपूर्णता, अपरिपक्वता और अनगढ़पन उन्हें आम आदमी के अधिक नजदीक ला सकते हैं। हमने लालू प्रसाद यादव की ठेठ ग्रामीण और अनगढ़ अभिव्यक्तियों के जादू को देखा है। जनता राहुल को उनकी कमियों और कमजोरियों के साथ भी अपना सकती है, शर्त यह है कि वे इन से उबरने के लिए नायकोचित संघर्ष करते दिखें।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)


25-Sep-2021 1:27 PM (70)

-पुष्य मित्र

किसी का सिविल सेवा के लिये चयनित होना उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है। हद से हद उसके अपने परिवार की उपलब्धि। यह पूरे समाज की उपलब्धि है यह मुझे नहीं लगता।

कल से लोग जिला, राज्य, जाति, समाज के आधार पर सिविल सेवा पास करने वाले लोगों के लिये गौरवान्वित हुए जा रहे हैं। मगर मुझे लगता है कि इस सत्ता ने समाज के बीच से एक सबसे अधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति को चुन लिया है, जो अब समाज के लिए नहीं बल्कि सत्ता की मजबूती के लिये काम करेगा।

मेरा नजरिया आपको काफी नकारात्मक लग सकता है। वह शायद इसलिये भी है कि कल दो ब्यूरोक्रेट से मिलकर और उनका रवैया देखकर आया हूं। सौ में से 95 अफसर अमूमन ऐसे ही हैं। उनका काम यह तय करना है कि लोगों के काम को किन सरकारी बहानों से रोका जाये। वे अमूमन वही काम करते हैं, उसी योजना को आगे बढ़ाते हैं जिसमें उनके लिये कुछ आय की या दूसरे किस्म की सफलता की गुंजाईश हो। फिर मंत्रियों को समझाते हैं कि यह योजना उनके लिये कैसे लाभकारी है। फिर उस योजना में जनता की भलाई का रसायन मिलाया जाता है। भ्रम पैदा किया जाता है कि यह तो जनता के हित में है। मगर 75 साल का इतिहास गवाह है कि जनता के हित के नाम से जितनी योजनाएं बनी हैं उससे जनता समृद्ध हुई या नहीं यह तो पता नहीं पर नेता और अफसर हर बार समृद्ध हुए।

पिछले 75 वर्ष से इस देश पर इन सिविल सर्वेंटों की स्थायी सत्ता है। ये पढ़े-लिखे लोग हैं। इन्हें ट्रेन किया जाता है कि ये जनता पर कैसे डोमीनेट करें। इनकी सत्ता हमेशा कायम रहती है। इनकी सरकार कभी नहीं बदलती। मगर पिछले 75 वर्षों में इन्होंने देश को कितना बदला यह जाहिर है। ये लोगों पर रौब डालना जानते हैं। इनके दफ्तर का सेटअप देखिये कितना सामन्ती है। ये नेताओं और मंत्रियों को बेवकूफ बनाना जानते हैं। ये अंग्रेजी राज के बाद देश में छूट गये भारतीय अंग्रेज हैं।

कल अपने प्रिय कवि आलोक धन्वा की कविता जिलाधीश याद आ गई। आप भी पढि़ए-
जिलाधीश
तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो
तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था
तुम क्या सोचते हो
संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है
जैसी वह राजाओं के जमाने में थी
यह जो आदमी
मेज की दूसरी ओर सुन रहा है तुम्हें
कितने करीब और ध्यान से
यह राजा नहीं जिलाधीश है !
यह जिलाधीश है
जो राजाओं से आम तौर पर
बहुत ज्यादा शिक्षित है
राजाओं से ज्यादा तत्पर और संलग्न !
यह दूर किसी किले में- ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लडक़ा है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास
यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमें आजादी से दूर रख सकता है
कड़ी
कड़ी निगरानी चाहिए
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर!
कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !
मैं मानता हूं, यह पोस्ट काफी नकारात्मक है। कुछ लोग सिविल सेवा की सामन्ती ट्रेनिंग के बाद भी अच्छे बच जाते हैं। मगर यह भी हमने देखा है कि वे फिर पूरी उम्र मिसफिट रह जाते हैं। गलत विभागों में ड्यूटी करते हुए, तबादला झेलते हुए। उनके लिये यह नौकरी अभिशाप हो जाती है। इतनी ऊंची नौकरी है कि वे अमूमन छोडऩे की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। अपनी लॉबी भी इनके पक्ष में कभी खड़ी नहीं होती। मैं उनकी बात नहीं कर रहा। यह उन लोगों के बारे में है जो बहुसंख्यक हैं। अपनी परम्परा को फॉलो करते हैं। जो संगठित हैं।


25-Sep-2021 1:21 PM (223)

-अपूर्व गर्ग

शिमला में हम जहाँ रहते हैं उस फ्लैट का नंबर 14 है। 13 नंबर फ्लैट गायब है पर फ्लैट नंबर 12 के बाद 13 की जगह 12ए है। इसी तरह ब्लॉक 13 की जगह ब्लॉक 12ए है। इसी तरह शिमला के रिपन अस्पताल में बेड नंबर 12 के बाद सीधे बेड 14 है।

कुछ समय पहले हिमाचल के ही नाहन में बीजेपी ने वार्ड चुनावों में 13 वार्डों में से 12 वार्डों के अधिकृत प्रत्याशी घोषित किए जब वार्ड 13 का न घोषित करने का कारण पूछा गया तो वही मसला 13 के अशुभ होने का था।

सिर्फ हिमाचल ही  नहीं ये  देश और दुनिया 13 के शुभ-अशुभ चक्कर में शुरू से उलझी रही है।
 
जब अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन बहुमत साबित न होने पर 13 दिन बाद सरकार गिर गई तो किस तरह 13 को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया था, भूला नहीं जा सकता।

हिंदुस्तान छोडिय़े बताते हैं आज भी यूरोप तक में कई होटलों में 13 नंबर के कमरे नहीं होते, 13 लोग मिलकर कोई काम या पार्टी नहीं करते।

हरिवंशराय बच्चन बताते हैं उन्हें जब 13 विलिंगटन क्रिसेंट आबंटित हुआ तो 13 का नाम सुनते है दिमाग में एक खटका हुआ, अशुभ संख्या है, कहीं इस घर में जाना अमंगलकारी न हो! पर उन्होंने गुरुनानक की बात याद की।

गुरुनानक का मन सांस्कारिक कार्य में न लगता था। उनके पिता ने उन्हें कुछ कम्बल देकर कुछ लाभ कमाने को कहा तो उन्होंने ठंड से कांपते साधुओं को दान दे दिए।

उनके पिता ने उन्हें दूसरे काम मज़दूरों को 15-15  सेर अनाज मज़दूरी के रूप में तौल कर देने कहा।  नानक ने तौलना आरम्भ किया- तौल ठीक रखने के लिए संख्या उच्चारित करते जाते थे-1, 2, 7, 10, 12, 13  तरह को तेरा भी कहा जाता है, 13 पर उनका ध्यान चला गया होगा कबीर के इस दोहे पर
मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मोर॥

और फिर तेरा, तेरा कह कर वो अनाज देते चले गए क्योंकि नानक के लिए सब ‘तेरा’ था ‘मेरा’ कुछ भी नहीं-‘इदं न मम’।

बच्चन जी कहते हैं मैं भी तेरह को तेरा मान कर 13  विलिंगटन क्रिसेंट में  चला गया और इस घर में आगे जो हुआ मंगलमय है हुआ।

13 संख्या यदि अशुभ होती तो देश और दुनिया में 13  तारीख को कई बड़े महान कार्य  संपन्न नहीं होते।

13 नवंबर 1975 ही  वो दिन है जब एशिया की  चेचक से मुक्ति की घोषणा हुई।

13 मई 1952  ही वो शुभ दिन है जब स्वतंत्र भारत की पहली संसद का सत्र शुरू हुआ ।

13 अक्टूबर  1911 को हिन्दुस्तान के महान अभिनेता अशोक कुमार हमारे दादा मुनि का जन्म हुआ तो हम सब के प्रिय कवि  शमशेर बहादुर सिंह 13 जनवरी 1911  को अवतरित हुए

इसलिए छुटकारा 13 नंबर से  नहीं  अन्धविश्वास से पाना चाहिए

नानक की सुनिए  तेरह...तेरा है..

 


25-Sep-2021 12:57 PM (68)

-रमेश अनुपम

सन 1952 में हिंदी फिल्म में नई-नई आई हुई माला सिन्हा को लेकर किशोर साहू ने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘हैमलेट’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण किया। इसके नायक की भूमिका में वे स्वयं थे और नायिका ओफिलिया की भूमिका में माला सिन्हा। किन्ही कारणों से  किशोर साहू की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

सन 1953 में किशोर साहू ने एक महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मयूर पंख’ का निर्माण किया। यह फिल्म कई दृष्टि से एक ऐतिहासिक महत्व की फिल्म थी। इस फिल्म की दो नायिकाओं में एक ओडेट फर्ग्यूसन थी, जो उस जमाने की एक मशहूर फ्रेंच अभिनेत्री थी।

दूसरी अभिनेत्री के रूप में हिंदी फिल्म की जानी मानी अभिनेत्री सुमित्रा देवी थीं। किशोर साहू ने इस फिल्म को ईस्टमैन कलर में बनाने का निर्णय लिया, जो उस जमाने में काफी महंगी मानी जाती थी। इस फिल्म के नायक की भूमिका में स्वयं किशोर साहू थे और निर्देशन भी उन्हीं का था।

यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फिल्म को बेहद सराहा गया। सन 1954 में कांस फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को ग्रैंड पुरुस्कार के लिए नामांकित किया गया।

इस फिल्म  के निर्माण के समय का एक  दिलचस्प प्रसंग  का जिक्र भी जरूरी है।  इस फिल्म के निर्माण के दरम्यान किशोर साहू का मध्यप्रदेश के दो दिग्गज राज नेताओं से परिचय हुआ। वे दो राजनेता कोई और नहीं, बल्कि श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल थे।

श्यामाचरण शुक्ल जब भी बंबई जाते, किशोर साहू के निवास ‘वाटिका’ में खाने पर अवश्य निमंत्रित किए जाते।

एक बार किशोर साहू ने श्यामाचरण शुक्ल से उनके भविष्य की कार्ययोजना के बारे में पूछा। जिसके जवाब में श्यामाचरण शुक्ल ने कहा ‘कि मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि मैं बिजनेस में जाऊं या पॉलिटिक्स म’।

किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘तब मैं नहीं जानता था, न वे ही जानते थे कि एक दिन वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे। पिता के बाद कोई  पुत्र किसी प्रांत का मुख्यमंत्री बना हो ऐसा उदाहरण स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व था।’

विद्याचरण शुक्ल ‘मयूर पंख’ फिल्म का एक हिस्सा बन चुके थे। सन 1953 में विद्याचरण शुक्ल ‘एल्विन कूपर’ नामक एक शिकार कंपनी चला रहे थे। ‘मयूरपंख’  फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग कान्हा किसली में की गई, जिसका ठेका विद्याचरण शुक्ल को दिया गया। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान किशोर साहू ने विद्याचरण शुक्ल को बेहद  निकट से देखा और जाना था।

अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने उन दिनों को याद करते हुए विद्याचरण शुक्ल के बारे में जो लिखा है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है- ‘उनमें सतर्क दिमाग की पैनी धार थी।’

आगे चलकर किशोर साहू की यह भविष्यवाणी कितनी सच साबित हुई है, हम सब इसके गवाह हैं। विद्याचरण शुक्ल भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह सिद्ध हुए।

श्रीमती इंदिरा गांधी के निकट के राजनेताओं में उनकी गिनती होती थी। सतर्क दिमाग की पैनी धार अंत तक उनमें विद्यमान रही।

सन 1958 किशोर साहू के फिल्मी कैरियर के लिए एक नया मोड़ साबित हुआ। उन दिनों कमाल अमरोही, राजकुमार और मीना कुमारी को लेकर ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ बनाने की सोच रहे थे। उन्होंने किशोर साहू को इस फिल्म के निर्देशन का ऑफर दिया। इस फिल्म में वे पहले से ही राजकुमार को हीरो के रूप में ले चुके थे।

किशोर साहू राजकुमार की जगह दिलीप कुमार को बतौर हीरो लेना चाहते थे, मीनाकुमारी भी यही चाहती थी, पर कमाल अमरोही राजकुमार को ही इस फिल्म में हीरो के रूप में लेना चाहते थे। मीना कुमारी तब तक कमाल अमरोही से शादी कर चुकी थी।

मीना कुमारी तो किशोर साहू को इस फिल्म में हीरो के रूप में लेना चाहती थी, पर कमाल अमरोही को न दिलीप कुमार चाहिए था और न ही किशोर साहू, राजकुमार पर वे अडिग थे।

बहरहाल 20 जून सन 1958 को इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। 1959 में बनकर तैयार भी हो गई। इस फिल्म का ट्रायल शो हुआ जिसमें कमाल अमरोही, शंकर जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मीना कुमारी, राजकुमार और किशोर साहू का परिवार शामिल हुआ।

फिल्म सबको पसंद आई पर कमाल अमरोही को यह फिल्म बिल्कुल ही पसंद नहीं आई। शैलेंद्र ने भी कमाल अमरोही का साथ दिया।

फिल्म की कहानी और सीन बदलने के लिए कमाल अमरोही ने किशोर साहू पर तरह-तरह के  दबाव बनाने शुरू किए, पर किशोर साहू को वे इसके लिए राजी नहीं कर सके। किशोर साहू अपनी इस फिल्म में किसी तरह के छेड़छाड़ के खिलाफ थे।

मीना कुमारी और राजकुमार भी किशोर साहू की राय पर कायम थे।

कमाल अमरोही की जिद के चलते यह फिल्म काफी दिनों तक रिलीज नहीं हो पाई। अंत में के. आसिफ के कारण ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ फिल्म प्रदर्शन का मुंह देख पाई, लेकिन कमाल अमरोही ने निर्माता से अपना नाम हटाकर मीना कुमारी के सेक्रेटरी एस.ए.बाकर का नाम डलवा दिया, यह सोचकर कि यह फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप सिद्ध होगी।

29 अप्रैल 1960 को यह फिल्म बंबई के रॉक्सी और कोहिनूर थियेटर में रिलीज हुई। ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ सुपरहिट फिल्म साबित हुई।

कमाल अमरोही का बुरा हाल था।इस फिल्म की अपार सफलता को देखकर उन्होंने मुंबई में लगे हुए सारे पोस्टरों से निर्माता एस.ए. बाकर का नाम मिटवा कर अपना नाम लिखवाना शुरू कर  दिया।

यह था किशोर साहू के निर्देशन का जादू , जो सर चढक़र बोलता था।

कहना न होगा ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ हिंदी फिल्म में एक मील का पत्थर साबित हुई।

फिल्म की कहानी, राजकुमार और मीना कुमारी का अभिनय, शंकर जयकिशन का संगीत और  किशोर साहू के निर्देशन को भुला पाना सबके लिए मुश्किल साबित हुआ।

(बाकी अगले हफ्ते)


25-Sep-2021 12:21 PM (108)

-संदीप पौराणिक

पितृ पक्ष के दौरान कौए को आदर-सम्मान दिया जाता है। यही मौका है जब हम जनसाधारण को कौए की वैज्ञानिक वास्तविकताओं से परिचित करा सकते हैं और इसे शकुन-अपशकुन के घेरे से बाहर ला सकते हैं। कौआ हमेशा से अमंगल नहीं रहा हैं जबकि समाज में किसी व्यक्ति के मरने के बाद मृत आत्मा की शांति के लिए जो गरूड़ पुराण का पाठ कराया जाता हैं। उस कथा भी कागभुसंुडी जी के मुखारबिंद से ही गरूड़ जी को सुनाई जाती हैं तथा मृतक की आत्मा की शांति के लिए इसे मंगलकारी माना गया हैं। लेकिन अब शहरों में कौओं की संख्या घटती जा रही है और पितृपक्ष में ये देखने नहीं ‌ नहीं मिलते जबकि हिंदू मान्यता के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के लिए बनाए जाने वाले व्यंजन कौवे के माध्यम से पितरों तक पहुंचाए जाते हैं । कौए के घटने का  प्रमुख कारण कीटनाशक व चूहे तथा काकरोच जैसे जीवों पर अंधाधुंध जहरीली दवाईयों का उपयोग है। इन मरे हुए कीट मकोड़ों को खाने से भी कौवों की संख्या घटी है। लगातार दूषित होते हुए पर्यावरण के कारण पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त  होती जा रही है उनमें से एक  कौवा भी है।कौवे का सिर्फ धार्मिक ही नहीं पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्त्व है। कौवा द्वारा खाए जाने वाले पीपल बरगद एवं अन्य बीजों को अपने  विष्ठा द्वारा बाहर निकाल कर फैलाया जाता है। पीपल और बरगद का पेड़ पर्यावरण एवं ऑक्सीजन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है

कौऐ को साल भर दुतकारा जाता है। पर पितृ-पक्ष के इन पंद्रह दिनों कौए की खूब आवभगत की जाती है। इसे बुला-बुला कर ‘कौर’ खिलाया जाता है। दरअसल कौए से हमारा बड़ा पुराना रिश्ता रहा है। इसके साथ अनेक शकुनों-अपशकुनों को जोड़ा गया है। इन अंधविश्वासों से परे कौआ एक बुद्धिमान पक्षी है। साथ ही हमारा दोस्त भी है। 

कौआ हमारा सबसे करीबी पक्षी है। हमारी जिंदगी में कौए का जितना दखल और किसी भी पक्षी का नहीं है। यह सिलसिला आज का नहीं सदियों पुराना है। प्राचीनतम वेदों से लेकर आधुनिक साहित्य तक में किसी न किसी रूप में कौए का जिक्र लगातार होता रहा है। यही वजह है कि संस्कृत भाषा में कौए जितने नाम और किसी भी पक्षी के नहीं है। ‘शब्दकल्पद्रुम’ में कौए‌ के छत्तीस पर्यायवाची गिनाए गए हैं, फिर भी इसे पूरी सूची नहीं माना जा सकता। इसे संस्कृत साहित्य में द्रोणकाक, काकोल, करट, चौरिकाक, बसंतराज, ग्रामीण काक जैसे अनेक नामों से पुकारा गया है।

सवाल उठता है कि कौए को इतनी अहमियत क्यों दी गई? इसकी दो वजहें लगती है। एक तो कौआ बेहद बुद्धिमान पक्षी है और दूसरे मानव-बस्तियों को साफ-सुथरा रखने में इसका भारी योगदान है। आज वैज्ञानिकों ने ढेरों प्रयोग करके कौए की असाधारण बौद्धिक क्षमता के सबूत पेश किए हैं। पर हमारे यहां प्राचीन काल से ही कौए के तेज दिमाग का लोहा मान लिया गया था। अनेक जातक-कथाओं और लोक-कथाओं में कौए को बुद्धिमान पक्षी के रूप में दर्शाया गया है। पंचतंत्र की कहानियों का ‘काकोलूकीय’ बुद्धिमत्ता और चातुर्य का साक्षात प्रतीक है। यह तो सभी जानते हैं कि घड़े की पेंदी में मौजूद पानी को किसी तरह प्यासा कौआ ऊपर तक लाया। ऊपर तक लाया वर्तमान में ऐसे कई वीडियो अभी भी सोशल मीडिया में दिखाई देते हैं जिसमें कौवा पानी को अपनी बुद्धिमानी से ऊपर लाता है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि कौए मनुष्यों की शक्लों को याद रखते हैं और लगभग दस तक की गिनती भी गिन सकते हैं। मशहूर कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण शायद इन्हीं खूबियों के कारण कौओं के अनन्य प्रेमी थे। उन्होंने कौओं के शायद कई चित्र बनाए हैं। साथ ही उनके व्यवहार और आदतों पर भी अध्ययन किया है।

कौए का एक रूप मनहूसियत और दुष्टता का भी है। खासतौर पर वैदिक काल में कौए को अमंगलकारी माना गया है। किसी भी शुभ कार्य में कौए का दिखना या अचानक आ धमकना विघ्नकारी माना जाता था। वैदिक काल के बाद शकुन-अपशकुन विचारा जाने लगा तो कौए की स्थिति कुछ संभली। इसे कई अच्छे शकुनों से भी जोड़ा गया। जैसे घर की मुंडेर पर कौए का कांव-कांव करना किसी अतिथि के आने का सूचक माना जाता है। परंतु किसी के सिर पर कौए का बैठना अमंगलकारी जाना जाता है। कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को जल्दी ही किसी निकट संबंधी की मौत की खबर मिलती है। प्राचीन साहित्य में कौए के इन रूपों का भरपूर उल्लेख है।

कौए की दुष्टता और लालचीपन को भी किस्सों-कहानियों और प्राचीन साहित्य में जगह मिली है। ‘रामायण’ के एक प्रसंग में इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धरकर सीता को खूब तंग किया। क्रोधित होकर श्रीराम ने बाण चलाया और कौए की एक आंख सदा के लिए नष्ट कर दी। बहुत लोगों का विश्वास है कि आज भी कौए के एक ही आंख होती है। यह सच नहीं है। संभवतः भगवान राम द्वारा अभिशापित होने के कारण ही उत्तर रामायण काल में कौए की प्रतिष्ठा बहुत ज्यादा गिर गई। तांत्रिकों द्वारा किए जाने वाले दुष्कर्मों में भी कौए का इस्तेमाल होने लगा। ऐसा उल्लेख है कि तांत्रिक अपने अनुष्ठानों में कौए की चोंच, पंजे, आंख, पंख वगैरह का इस्तेमाल करते हैं।

कौए की आदतों में सबसे अनोखा इसका चौकन्नापन और फुर्ती है। इसी वजह से यह हमारे हाथ की रोटी छीनने का भी दुस्साहस कर डालता है और अक्सर कामयाब भी रहता है। तभी कवि रसखान ने भी लिखा 
काग के भाग बड़ंे सजनी
हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी। 

प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने लिखा है कि कौआ आपकी नाश्ते की मेज से भी अंडा ‘उड़ा’ सकता है। कौए को मनुष्य के मनोभावों को समझने में भी महारत हासिल है। असाधारण चौकन्नेपन के कारण ही ‘अग्निपुराण’ में राजा को कौए की तरह चौकन्ना रहने की सलाह दी गई है।

व्यवहार में इन सारी खूबियों के साथ ही कौआ हमारा दोस्त भी है। यह सड़ी-गली हर तरह की चीजें खाकर मानव बस्तियों के आस-पास सफाई रखने का काम करता है। कौए को कूड़-करकट के ढेर को कुरेद-कुरेद कर अपना भोजन तलाशते देखा जा सकता है। गंदगी का सफाया करके यह कई रोगों को फैलने से रोकता है। कौए टिड्डियों, दीमकों आदि हानिकारक कीड़ों को भारी संख्या में हजम कर जाते हैं। इस तरह यह किसानों का दोस्त भी है। पर कभी-कभी गेहूं, मक्का आदि की फसलों पर धावा बोलकर यह किसानों का नुकसान भी कर डालता है। इसीलिए बहुत से किसान कौए को न दोस्त मानते हैं और न दुश्मन। कौए तमाम जानवरों के अंडे, मेंढक, छिपकली, मुर्दे, रोटी, दाल-चावल और वह सभी कुछ जो हम खाते हैं या फेंक देते हैं, खाते हैं।

सलीम अली ने अपनी पुस्तक में देश में पाए जाने वाले दो तरह के कौओं का उल्लेख किया है - घरेलु कौआ और जंगली कौआ। कौओं के कुल को वैज्ञानिकों ने ‘कोर्विडी’ का नाम दिया है। इसमें कौए के अलावा इससे मिलते-जुलते चार पक्षी है - डिगडाल, मुटरी, बनसर्रा और जाग। घरेलु कौए को वैज्ञानिक रूप सेकोर्वस स्प्लेनडेंस नाम से पुकारा जाता है। वैसे इसे पाती कौआ, नौआ कौआ, देशी कौआ, नाऊ कौआ और ग्रामीण काक नाम से जाना जाता है।

सभी ने देखा है कि घरेलू कौआ पूरा काला नहीं होता। इसका सीना और गला सलेटी रंग का होता है। इसके कालेपन में एक बैंगनी-नीली-हरी सी चमक होती है। नर और मादा दिखने में एक जैसे होते हैं। यह साल भर लगभग पूरे देश में दिखाई देता था। हिमालय में यह चार हजार फुट की ऊंचाई तक घूमता-फिरता है। ये दिन भर भोजन की तलाश में घर-घर, बस्ती-बस्ती घूमते हैं। पर रात को झुंड बनाकर एक ही जगह बसेरा कर लेते हैं। बरगद और पीपल जैसे विशाल पेड़ों पर कई हजार कौओं का झुंड देखा जा सकता था। जब इनका पूरा झंुड एक साथ उड़ता है तो तेज आवाज होती है। इनकी बोली से ‘कॉ-ऑ-ऑ, कॉ-ऑ-ऑ’ की ध्वनि निकलती है।

घरेलू कौए का जोड़ा बांधने और अंडे देने का समय अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग है। पश्चिम भारत में इन्हें  अप्रैल से जून के बीच घोंसला बनाते देखा जा सकता है। बंगाल में इसके पहले ही घोंसले देखे जा सकते हैं। कुछ इलाकों में दिसंबर और जनवरी की कड़ाकेदार सर्दी में भी ये अंडे देते हैं। घरेलू कौआ घोंसला बनाने में बड़ा फूहड़ है। यह पेड़ की गुलेल जैसे आकार की शाखा पर घास-फूस, तार, डंडियों आदि की मदद से ऊबड़-खाबड़ घोंसला बनाता है। इसका घोंसला देखने में भले ही बदसूरत हो, पर अंदर से आरामदायक होता है। मादा इसके भीतर रूई, चिथड़े आदि लगाकर खूब आरामदेह बना देती है। मादा एक बार में चार-पांच अंडे देती है। ये हल्के नीले-हरे होते हैं, जिन पर भूरी-सलेटी चित्तियां पड़ी होती है। घोंसला बनाने से लेकर शिशुओं के लालन-पालन तक में नर और मादा बराबरी का सहयोग देते हैं।  चालाक और बुद्धिमान होने के बावजूद कोयल इनकी आंखों में धूल झोंककर अपने अंडे भी कौए के घोंसले में रख देती है। कौआ दंपत्ति ही इसके शिशुओं को पालते हैं। बाद में कोयल के बच्चे इनको धता बताकर फुर्र हो जाते हैं। 

घरेलू कौए के बाद सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले कौए को जंगली कौआ या काला या डोम कौआ कहा जाता है। इसे वैज्ञानिकों ने कोर्वस मैक्रोरिकोस का नाम दिया है। इसका आकार घरेलू कौए से बड़ा, पर चील से छोटा होता है। घरेलू कौए के विपरीत इसका पूरा शरीर काला भुजंग होता है पर चोंच मोटी होती है। इसकी आवाज भी घरेलू कौए से बहुत ज्यादा कर्कश होती है। इनमें झुंड बनाने की आदत नहीं है। एक जगह पर ज्यादा से ज्यादा पंद्रह-बीस कौए दिखाई देते हैं। ये शहरों में कम ही आते हैं। इनका निवास ज्यादातर गांव और बस्तियों से बाहर होता है। खासतौर से ऐसे स्थानों पर जहां गंदगी फेंकी जाती हो, मरे हुए जानवरों की लाशें फेंकी जाती हों तथा और भी कूड़ा-कड़कट जमा रहमा हो। जंगली कौए इसी में से अपनी पेट भरते हैं। इस तरह ये भी साफ-सफाई रखने में हमारी मदद करते हैं।

बरसात के मौसम में जंगली कौए,केकड़ों से अपना पेट भरते हैं। केकड़े अंकुरित हो रही फसलों को खा जाते हैं। इस तरह जंगली कौए भी किसानों के दोस्त साबित होते हैं। जंगल में ये कौए ऐसी जगह मंडराते हैं, जहां किसी जानवर की लाश पड़ी हो। शिकारी अक्सर इनकी कांव-कांव से बाघों-शेरों के ठिकाने का पता लगा लेते हैं। मैदानी इलाकों में जंगली कौए मार्च और मई के बीच अंडे देते हैं। घोसला बनाने, अंडा देने और शिशुओं के लालन-पालन में इनका व्यवहार ठीक घरेलू कौए की तरह है। कोयल इनके घोंसलों में भी अंडे देती है।

देश के पहाड़ी इलाकों में एक छोटा कौआ खूब दिखाई देता है। इसकी लंबाई मात्र तेरह इंच होती है। यह पूरा काला नहीं होता। इसके शरीर के कुछ हिस्सों पर भूरी स्लेटी पट्टी पड़ी होती है। इसे चौकी काक या चोर कौआ भी कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने इसे कोवर्स मौनेकुला का नाम दिया है।

पहाड़ी कौआ अक्टूबर से मार्च तक पंजाब और हिमालय के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में ज्यादा दिखाई देता है। इसकी बोली अप्रिय नहीं लगती। स्थानीय लोगों ने तो पहाड़ी कौए की बोली को संगीतमय माना है। इनकी उड़ने की रफ्तार अन्य कौओं की तुलना में तेज होती है। पहाड़ी कौए पेड़ों की बजाय चट्टानों और मकानों के सुराखों में घोसला बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। मादा कौआ चार से छह अंडे देती है, जिनके दोनों सिरे नुकीले होते हैं। कोयल इनके घोसलों में अपने अंडे नहीं रखती।

कोई दो फुट लंबाई का एक कौआ रैवेन कोर्वस के नाम से जाना जाता है। इसे द्रोण काक भी कहते हैं। इसके काले शरीर पर बैंगनी-नीली झलक रहती है। ये देश के पश्चिमी इलाके में दिखाई पड़ते हैं। इनके डैने काफी मजबूत होते हैं। इसलिए इनकी उड़ान सीधी और तेज होती है। खाने-पीने के मामले में ये अन्य कौओं से काफी मिलते-जुलते हैं। इसका घोंसला काफी मजबूत होता है, जिसे पेड़ की उंची शाखा पर सूखी टहनियों से बनाया जाता है। कभी-कभी इनके घोंसले ऊंचाई पर पहाड़ों के सुराखों में भी दिखाई देते हैं।

अगर कहें कि कुछ कौए भुर्राक सफेद भी होते हैं तो शायद आपको विश्वास न हो, पर यह सच है। रंजकहीनता यानी अल्बीनिज्म के कारण कुछ कौए सफेद हो जाते हैं। ऐसे घरेलू कौए यदा-कदा दिखाई दे जाते हैं, पर हम पहचान नहीं पाते।  प्राचीन संस्कृत साहित्य में इसे श्वेत काक या शुुक्ल काक के नाम से पुकारा गया है।

जिस तरह से कौए और अन्य पक्षी गौरैया समाप्त होते जा रहे हैं इसका एक प्रमुख कारण मोबाइल टावर से निकलने वाला विकिरण भी है यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है। कहीं ऐसा ना हो पक्षियों में सबसे चालाक पक्षी कौवा का हश्र डोडो पक्षी जैसा हो जाए।


24-Sep-2021 12:28 PM (41)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संयुक्त राष्ट्रसंघ के वार्षिक अधिवेशन में इस बार अफगानिस्तान भाग नहीं ले पाएगा। जरा याद करें की अशरफ गनी सरकार ने कुछ हफ्ते पहले ही कोशिश की थी कि संयुक्तराष्ट्र महासभा के अध्यक्ष का पद अफगानिस्तान को मिले लेकिन वह श्रीलंका को मिल गया। देखिए, भाग्य का फेर कि अब अफगानिस्तान को स.रा. महासभा में सादी कुर्सी भी नसीब नहीं होगी। इसके लिए तालिबान खुद जिम्मेदार हैं। यदि 15 अगस्त को काबुल में प्रवेश के बाद वे बाकायदा एक सर्वसमावेशी सरकार बना लेते तो संयुक्तराष्ट्र संघ भी उनको मान लेता और अन्य राष्ट्र भी उनको मान्यता दे देते। इस बार तो उनके संरक्षक पाकिस्तान ने भी उनको अभी तक औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी देश ने तालिबान के राजदूत को स्वीकार नहीं किया है। वे स्वीकार कैसे करते? खुद तालिबान किसी भी देश में अपना राजदूत नहीं भेज पाए हैं।

संयुक्तराष्ट्र के 76 वें अधिवेशन में भाग लेने के लिए उन्होंने अपने प्रवक्ता सुहैल शाहीन की राजदूत के रूप में घोषणा की है। जब काबुल की सरकार अभी तक अपने आपको ‘अंतरिम’ कह रही है और उसकी वैधता पर सभी राष्ट्र संतुष्ट नहीं है तो उसके भेजे हुए प्रतिनिधि को राजदूत मानने के लिए कौन तैयार होगा ? सिर्फ पाकिस्तान और क़तर कह रहे हैं कि शाहीन को सं.रा. में बोलने दिया जाए लेकिन सारी दुनिया प्रधानमंत्री इमरान खान की उस भेंटवार्ता पर ध्यान दे रही है, जो उन्होंने बी.बी.सी. को दी है। उसमें इमरान ने कहा है कि यदि तालिबान सर्वसमावेशी सरकार नहीं बनाएंगे तो इस बात की संभावना है कि अफगानिस्तान में गृहयुद्ध हो जाएगा। अराजकता, आतंकवाद और हिंसा का माहौल मजबूत होगा। शरणार्थियों की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने औरतों पर हो रहे जुल्म पर भी चिंता व्यक्त की है। इसमें शक नहीं कि तालिबान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा है कि संयुक्तराष्ट्र पहले उन्हें मान्यता दे तो वे दुनिया की सलाह जरुर मानेंगे।

संयुक्त राष्ट्र के सामने कानूनी दुविधा यह भी है कि वर्तमान तालिबान मंत्रिमंडल के 14 मंत्री ऐसे है, जिन्हें उसने अपनी आतंकवादियों की काली सूची में डाल रखा है। सं. रा. की प्रतिबंध समिति (सेंक्शन्स कमेटी) ने कुछ प्रमुख तालिबान नेताओं को विदेश-यात्रा की जो सुविधा दी है, वह सिर्फ अगले 90 दिन की है। यदि इस बीच तालिबान का बर्ताव संतोषजनक रहा तो शायद यह प्रतिबंध उन पर से हट जाए। फिलहाल रूस, चीन और पाकिस्तान के विशेष राजदूत काबुल जाकर तालिबान तथा अन्य अफगान नेताओं से मिले हैं। यह उनके द्वारा तालिबान को उनकी मान्यता की शुरुआत है। वे हामिद करजई और डाॅ. अब्दुल्ला से भी मिले हैं याने वे काबुल में मिली-जुली सरकार बनवाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत क्या कर रहा है ? हमारे राजदूत, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री सिर्फ बातों की जलेबियां उतार रहे हैं। सीधे अफगान नेताओं से बात करने की बजाय वे दुनिया भर के अड़ौसियों-पड़ौसियों से ‘गहन संवाद’ में व्यस्त हैं। वे यह क्यों भूल रहे हैं कि भारत के राष्ट्रहितों की रक्षा करना उनका प्रथम कर्तव्य है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
(नया इंडिया की अनुमति से)


23-Sep-2021 1:44 PM (113)

-संजीव बख्शी

प्रिय मित्र हरिहर वैष्णव नहीं रहे। यह बहुत ही दुखद हुआ। बहुत ही नेक इंसान थे वे। उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी स्मृति में पुरानी बातें याद आ रही हैं।

कोंडागाँव में हरिहर वैष्णव ने अपने घर में ‘लक्ष्मी जगार’ का पहली बार आयोजन करवाया था। मैं भी देखने गया था। सात से लेकर ग्यारह दिनों तक यह जगार चलता है। दो महिलाएं, जिन्हें गुरुमाँय कहते हैं, इस लोक महाकाव्य को ही भाषा में गाती हैं और सब सुनते हैं। उसे हरिहर वैष्णव रिकार्ड कर रहे थे। बाद में उन्होंने उसका लिप्यांतरण (ट्रांसक्रिप्शन) किया और हिंदी में अनुवाद भी। ऑस्ट्रेलिया के ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, केनबरा से क्रिस ग्रेगोरी आए तो उन्हें सुनाने के लिए फिर से एक बार ‘लक्ष्मी जगार’ का आयोजन किया गया और फिर हल्बी हिंदी और अंग्रेजी में इसे प्रकाशित कराया गया। इसमें चित्रकारी खेम वैष्णव ने की। यह अब तक वाचिक परम्परा में ही रहा परंतु पहली बार हरिहर वैष्णव ने लिखित में लाया। यह उनका एक महत्त्वपूर्ण कार्य था। ‘लक्ष्मी जगार’ के अलावा ‘तीजा जगार’, ‘आठे जगार’, ‘बाली जगार’ और इसी तरह से अन्य वाचिक परम्परा की चीजों को हरिहर वैष्णव ने लिखित स्वरूप में लाकर महत्त्वपूर्ण कार्य किया हरिहर वैष्णव ने बताया था कि गुरुमाँय सुखदयी कोर्राम गरीब स्थिति में अपने जीवन का निर्वाह किया करती थीं। उन्हें आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय की ओर से सम्मानजनक राशि दिलाई गई। इसके साथ ही उन्हें क्रिस ग्रेगोरी और उनकी पत्नी जूडिथ रॉबिन्सन की ओर से प्रति माह सम्मानजनक राशि अब भी प्रदान की जा रही है।

यहाँ यह बताना शायद प्रासंगिक होगा कि क्रिस ग्रेगोरी की पत्नी जूडिथ रॉबिन्सन 2010 से 2012 तक फिजी में ऑस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त के पद पर भी पदस्थ रहीं। मुझे स्मरण है कि 1999 में तो हरिहर वैष्णव के साहित्यिक विदेश प्रवास के लिए विदेशी आयोजकों ने टिकट आदि सब करवा लिये थे और कोंडागाँव से निकलने की तारीख में वे हरिहर को फोन कर पूछते हैं कि वे निकले कि नहीं? जवाब मिला कि उन्हें मलेरिया हो गया है और वे खाट से उठ नहीं पा रहे हैं। वे ठीक हुए उसके बाद सन् 2000 में फिर से उन्हें बुलाने के लिए सब व्यवस्था की गई तब वे गए। विदेश से लौटने के बाद उनका एक बहुत ही आत्मीय पत्र आया।


23-Sep-2021 11:49 AM (55)

 बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

दक्षेस (सार्क) के विदेश मंत्रियों की जो बैठक न्यूयार्क में होनेवाली थी, वह स्थगित हो गई है। उसका कारण यह बना कि अफगान सरकार का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? सच पूछा जाए तो 2014 के बाद दक्षेस का कोई शिखर सम्मेलन वास्तव में हुआ ही नहीं। 2016 में जो सम्मेलन इस्लामाबाद में होना था, उसका आठ में से छह देशों ने बहिष्कार कर दिया था, क्योंकि जम्मू में आतंकवादियों ने उन्हीं दिनों हमला कर दिया था। नेपाल अकेला उस सम्मेलन में सम्मिलित हुआ था, क्योंकि नेपाल उस समय दक्षेस का अध्यक्ष था और काठमांडो में दक्षेस का कार्यालय भी है। दूसरे शब्दों में इस समय दक्षेस बिल्कुल पंगु हुआ पड़ा है। यह 1985 में बना था लेकिन अब 35 साल बाद भी इसकी ठोस उपलब्धियां नगण्य ही हैं, हालांकि दक्षेस-राष्ट्रों ने मुक्त व्यापार, उदार वीजा-नीति, पर्यावरण-रक्षा, शिक्षा, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में परस्पर सहयोग पर थोड़ी बहुत प्रगति जरुर की है लेकिन हम दक्षेस की तुलना यदि यूरोपीय संघ और 'एसियानÓ से करें तो वह उत्साहवर्द्धक नहीं है। 

फिर भी दक्षेस की उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसे फिर से सक्रिय करने का भरसक प्रयत्न जरुरी है। जिन दिनों 'सार्कÓ याने 'साउथ एशियन एसोसिएशन ऑफ रीजनल कोऑपरेशनÓ नामक संगठन का निर्माण हो रहा था तो इसका हिंदी नाम 'दक्षेसÓ मैंने दिया था। 'नवभारत टाइम्सÓ के एक संपादकीय में मैंने 'दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघÓ का संक्षिप्त नाम 'दक्षेसÓ बनाया था। उस समय याने अब से लगभग 40 साल पहले भी मेरी राय थी कि दक्षेस के साथ-साथ एक जन-दक्षेस संगठन भी बनना चाहिए याने सभी पड़ौसी देशों के समान विचारों वाले लोगों का संगठन होना भी बहुत जरुरी है। सरकारें आपस में लड़ती-झगड़ती रहें तो भी उनके लोगों के बीच बातचीत जारी रहे।

यह इसलिए जरुरी है कि दक्षिण और मध्य एशिया के 16-17 देशों के लोग एक ही आर्य परिवार के हैं। उनकी भाषा, भूषा, भोजन, भजन और भेषज अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन उनकी संस्कृति एक ही है। अराकान (म्यांमार) से खुरासान (ईरान) और त्रिविष्टुप (तिब्बत) से मालदीव के इस प्रदेश में खनिज संपदा के असीम भंडार भरे हुए हैं। यदि भारत चाहे तो इन सारे पड़ौसी देशों को कुछ ही वर्षों में मालामाल किया जा सकता है और करोड़ों नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। यदि हमारे ये देश यूरोपीय राष्ट्रों की तरह संपन्न हो गए तो उनमें स्थिरता ही नहीं आ जाएगी बल्कि यूरोप के राष्ट्रों की तरह वे युद्धमुक्त भी हो जाएंगे। पिछले 50-55 वर्षों में लगभग इन सभी राष्ट्रों में मुझे दर्जनों बार जाने और रहने का अवसर मिला है। भारत के लिए उनकी सरकारों का रवैया जब-तब जो भी रहा हो, जहां तक इन देशों की जनता का सवाल है, भारत के प्रति उनका रवैया मैत्रीपूर्ण रहा है। इसीलिए भारत के प्रबुद्ध और संपन्न नागरिकों को जन-दक्षेस के गठन की पहल तुरंत करनी चाहिए। वह दक्षेस के नहले पर दहला सिद्ध होगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)


22-Sep-2021 1:49 PM (56)

भारत में बीते दशकों में सभी धर्मों के लोगों की जन्मदर में बड़ी गिरावट हुई है. अमेरिकी संस्था प्यू रिसर्च सेंटर का एक ताजा अध्ययन बताता है कि 1951 से भारत की धार्मिक बनावट में मामूली बदलाव हुए हैं.

   डॉयचे वेले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट

प्यू रिसर्च सेंटर के ताजा अध्ययन में पता चला है कि भारत के सभी धर्मों में जन्मदर लगातार घटी है जिस कारण देश की मूल धार्मिक बनावट में मामूली बदलाव हुए हैं. 1.2 अरब आबादी वाले देश में 94 प्रतिशत लोग हिंदू और मुस्लिम धर्म के हैं. बाकी छह फीसदी आबादी में ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन आते हैं.

प्यू रिसर्च सेंटर ने नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) और जनगणना के आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन किया है. इस अध्ययन के जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि भारत में धार्मिक संरचना में किस तरह के बदलाव आए हैं और अगर ऐसा हुआ है तो उनकी क्या वजह हैं.

1951 की जनगणना में भारत की आबादी 36.1 करोड़ थी जो 2011 में 1.2 अरब हो गई थी. प्यू का अध्ययन कहता है कि इस दौरान सभी धर्मों की आबादी में वृद्धि हुई है. हिंदुओं की जनसंख्या 30.4 करोड़ से बढ़कर 96.6 करोड़ हो गई है. इस्लाम को मानने वाले 3.5 करोड़ से बढ़कर 17.2 करोड़ पर पहुंच गए जबकि ईसाइयों की आबादी 80 लाख से 2.8 करोड़ हो गई.

जन्मदर का अंतर घटा

अध्ययन के मुताबिक अब भी भारत में सबसे ज्यादा जन्मदर मुसलमानों की है. 2015 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में मुस्लिम जन्मदर प्रति महिला 2.6 थी. इसके बाद हिंदुओं का नंबर आता है जो प्रति महिला 2.1 बच्चों को जन्म दे रही थी. जैन धर्म की जन्मदर सबसे कम 1.2 रही.

लेकिन अध्ययन इस बात को उजागर करता है कि यह चलन ज्यादा बदला नहीं है. शोध के मुताबिक 1992 में भी मुसलमानों की जन्मदर सबसे ज्यादा (4.4) थी जो हिंदुओं से (3.3) ज्यादा थी. स्टडी कहती है, "लेकिन, विभिन्न धर्मों के बीच जन्मदर में अंतर पहले से बहुत कम हो गया है.”

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि अल्पसंख्यकों की जन्मदर बढ़ने में सबसे ज्यादा कमी आई है. शुरुआती दशकों में मुस्लिम जन्मदर बहुत तेजी से बढ़ रही थी जबकि अब यह काफी कम हो चुकी है. प्यू रिसर्च सेंटर की वरिष्ठ शोधकर्ता स्टेफनी क्रैमर लिखती हैं कि एक ही पीढ़ी में 25 वर्ष से कम आयु की मुस्लिम औरतों के बच्चे जनने की दर में लगभग दो बच्चों की कमी हो गई है.

क्रैमर के मुताबिक 1990 के दशक में प्रति भारतीय महिला 3.4 बच्चे जन्म ले रहे थे जो 2015 में घटकर 2.2 पर आ गए. इसमें सबसे बड़ा योगदान मुस्लिम महिलाओं का है. 1990 के दशक में हर मुस्लिम महिला औसतन 4.4 बच्चों को जन्म दे रही थी जो 2015 में घटकर 2.6 पर आ गया. यानी 1992 में मुस्लिम महिलाएं हिंदुओं की अपेक्षा 1.1 बच्चे ज्यादा जन रही थीं और 2015 में यह अंतर घटकर 0.5 बच्चों पर आ गया.

मुसलमानों की आबादी सबसे ज्यादा बढ़ी

बीते 60 साल में मुसलमानों की आबादी 4 प्रतिशत बढ़ी है जबकि हिंदुओं की आबादी लगभग इतनी ही कम हुई है. बाकी धर्मों की आबादी लगभग स्थिर रही है.

2011 की जनगणना के हिसाब से भारत में 96.6 करोड़ हिंदू थे जो कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत है. 2001 की जनगणना की तुलना में यह संख्या 0.7 फीसदी कम थी और 1951 की जनगणना से तुलना करें तो हिंदुओं की आबादी 4.3 प्रतिशत कम हुई थी, जो तब 84.1 प्रतिशत हुआ करते थे.

इसकी तुलना में मुसलमानों की आबादी बढ़ी है. 2001 में भारत में 13.4 प्रतिशत मुसलमान थे जो 2011 में बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गए. 1951 की तुलना में मुसलमानों की आबादी 4.4 प्रतिशत बढ़ी थी. ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन धर्म के मानने वालों की संख्या में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ.

जनसंख्या में यह बदलाव पूरे देश में समान नहीं हुआ है. कुछ राज्यों में आबादी की संरचना में बदलाव बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा देखा गया है. मसलन, अरुणाचल प्रदेश में हिंदुओं की आबादी 2001 से 2011 के बीच 6 प्रतिशत घट गई थी लेकिन पंजाब में 2 प्रतिशत बढ़ी. (dw.com)


22-Sep-2021 11:55 AM (52)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफी दिनों बाद इस हफ्ते विदेश यात्रा करनेवाले हैं। वे वाशिंगटन और न्यूयार्क में कई महत्वपूर्ण मुलाकातें करनेवाले हैं। सबसे पहले तो वे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस से मिलेंगे और फिर चौगुटे (क्वाड) के नेताओं से मिलेंगे याने जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सूगा और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन से भी मिलेंगे। इस दौरान वे अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों के मालिकों से भी भेंट करेंगे। रूशस्रद्ब द्घद्बह्म्ह्यह्ल द्वद्गद्गह्लद्बठ्ठद्द ड्ढद्बस्रद्गठ्ठ

संयुक्तराष्ट्र संघ में उनके भाषण के अलावा उनका सबसे महत्वपूर्ण काम होगा— चौगुटे के सम्मेलन में भाग लेना। यह चौगुटा बना है— अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया को मिलाकर! इसका अघोषित लक्ष्य है— चीनी प्रभाव को एशिया में घटाना लेकिन चीन ने इसका नया नामकरण कर दिया है। वह कहता है कि यह 'एशियाई नाटोÓ है। यूरोपीय नाटो बनाया गया था, सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए और यह बनाया गया है, चीन का मुकाबला करने के लिए लेकिन चीन मानता है कि यह समुद्र के झाग की तरह हवा में उड़ जाएगा। भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि अभी पिछले हफ्ते ही अमेरिका ने एक नया संगठन खड़ा कर दिया है। उसका नाम है ऑकुस याने आस्ट्रेलिया, युनाइटेड किंगडम और यूएस ! इसमें भारत और जापान छूट गए हैं और ब्रिटेन जुड़ गया है।

अमेरिका ने यह नए ढंग का गुट क्यों बनाया है, समझ में नहीं आता। हो सकता है कि यह अंग्रेजीभाषी एंग्लो-सेक्सन गुट है। यदि ऐसा है तो माना जा सकता है कि अब चौगुटे का महत्व घटेगा या उसका दर्जा दोयम हो जाएगा। इस नए गुट में अमेरिका अब आस्ट्रेलिया को कई परमाणु-पनडुब्बियां देगा। क्या वह भारत को भी देगा ? परमाणु पनडुब्बियों का सौदा पहले आस्ट्रेलिया ने फ्रांस से किया हुआ था। वह रद्द हो गया। फ्रांस बौखलाया हुआ है।

यदि मोदी-बाइडन भेंट और चौगुटे की बैठक में अफगानिस्तान, प्रदूषण और कोविड जैसे ज्वलंत प्रश्नों पर भी वैसी ही घिसी-पिटी बातें होती हैं, जैसी कि सुरक्षा परिषद, शांघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स की बैठकों में हुई हैं तो भारत को क्या लाभ होना है ? भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों में घनिष्टता बढ़े, यह दोनों देशों के हित में है लेकिन हम यह न भूलें कि पिछले 74 साल में भारत किसी भी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं बना है। सोवियत संघ के साथ भारत के संबंध अत्यंत घनिष्ट रहे लेकिन शीतयुद्ध के दौरान भारत अपनी तटस्थता के आसन पर टिका रहा। फिसला नहीं। अब भी वह अपनी गुट-निरपेक्षता या असंलग्नता को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहता है। वह रूस, चीन, फ्रांस या अफगानिस्तान से अपने रिश्ते अमेरिका के मन मुताबिक क्यों बनाए? मोदी को अपनी इस अमेरिका-यात्रा के दौरान भारतीय विदेश नीति के इस मूल मंत्र को याद रखना है।
(नया इंडिया की अनुमति से)


21-Sep-2021 1:54 PM (170)

-ध्रुव गुप्त

1968 से 1972 के बीच तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री, इंदिरा गांधी की सरकार में दो साल केंद्रीय शहरी विकास मंत्री और राज्यसभा तथा विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे स्व. भोला पासवान शास्त्री को राजनीति का विदेह कहा जाता है।  ऐसा विदेह जिसकी  ईमानदारी, सादगी, फक्कड़पन, सच्चरित्रता की आज भी मिसालें दी जाती है। बिहार के पूर्णिया जिले के छोटे से गांव बैरगाछी में जन्मे भोला बाबू सूबे के अकेले मुख्यमंत्री रहे हैं जो हमेशा पैदल ही अपने कार्यालय जाते थे। अपने आगे-पीछे गाडिय़ों का काफिला लेकर चलने वाले मुख्यमंत्रियों को देखने के अभ्यस्त लोगों को यकीन नहीं होगा कि भोला बाबू के पास कभी अपनी गाड़ी नहीं रही और न सरकारी गाडिय़ों का इस्तेमाल उन्होंने व्यक्तिगत और रूटीन कामों में किया। उदारता ऐसी कि वेतन और भत्ते की ज्यादा रकम जरूरतमंदों में बांट दिया करते थे। अपनी जड़ों से लगाव ऐसा कि औपचारिक और खर्चीली सभाएं आयोजित करने के बजाय पेड़ के नीचे जमीन पर कंबल बिछाकर अधिकारियों और अपने लोगों से संवाद करना ज्यादा पसंद किया करते थे। सरलता ऐसी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरने के अगले ही दिन वे रिक्शे पर बैठकर पटना की सडक़ों पर घूमने और लोगों से मिलने-जुलने निकल गए। मरे तो बैंक खाते में  श्राद्ध कर्म के लायक पैसे भी नहीं थे। जिला प्रशासन को उनके अंतिम संस्कार का इंतजाम करना पड़ा था। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, लेकिन पूर्णिया के उनके पैतृक गांव में उनके परिजन आज भी खेती-मजदूरी करते हैं। उस दौर में बिहार के इस दलित मुख्यमंत्री का क्रेज ऐसा था कि युवकों में उनके जैसे बाल-दाढ़ी रखने का फैशन चल पड़ा था। अफसोस यह रहा कि उनके बाद स्व. कर्पूरी ठाकुर के एक अपवाद को छोडक़र सार्वजनिक जीवन की शुचिता कभी क्रेज नहीं बन सकी।

आज बिहार-विभूति स्व. भोला पासवान शास्त्री की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि!
 

 


21-Sep-2021 1:17 PM (50)

-श्याम मीरा सिंह

एक दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाना और राष्ट्रपति बनाने में अंतर है। राष्ट्रपति को हमारे संविधान के अनुसार ‘रबर स्टाम्प’ कहते हैं, जबकि मुख्यमंत्री को विधानसभा का ‘असली’ नेता कहते हैं।

यूपी के मुख्यमंत्री के आगे देश के राष्ट्रपति भी सर झुकाकर सलाम करते हैं। इसलिए नहीं कि यूपी का मुख्यमंत्री साधुभेष बनाया हुआ है। बल्कि इसलिए क्योंकि मुख्यमंत्री की पॉवर में और राष्ट्रपति की असल पॉवर में अंतर है, यूपी का मुख्यमंत्री बहुत कुछ पॉवर एक्सरसाईज करता है।

हालाँकि बहुत से सीएम भी रबर स्टांप रहे हैं, मगर ये सीएम के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अगर उनमें दम है तो राष्ट्रीय नेतृत्व में हस्तक्षेप रख सकते हैं। उतना स्पेस मिलने की उन्हें गुंजाइश मिल सकती है। लेकिन अगर बात राष्ट्रपति की करें तो अतीत में ऐसा कोई राष्ट्रपति नहीं रहा जिसने राष्ट्रीय नेतृत्व में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप किया हो। क्योंकि उसे संवैधानिक ताकत ही नहीं हैं। अधिकतर राष्ट्रपतियों का काम राष्ट्रपति बनने के बाद प्रिंटर से प्रिंट निकालना भर रह गया।

किसी भी पार्टी की मदद से कोई दलित नेता मुख्यमंत्री बनता है तो उसके साथ ‘प्रतिनिधित्व और विविधता’ का मूल्य भी आता है। ये अंत नहीं है मगर एक शुरुआत जरूर है। ये उस बात की शुरुआत के लिए अच्छा है जिसके बाद सीएम ही दलित नहीं होगा बल्कि वह अपनी पार्टी का शीर्ष नेता भी होगा। यानी जड़ और फल दोनों एक जगह से होंगे। अभी फल और जड़ में एक गहरा अंतर है। पैंतीस प्रतिशत दलित जनसंख्या वाला पंजाब आज पहली बार अपना सीएम देख रहा है। इसलिए जो भी है, अच्छी शुरुआत है।

दलित सीएम को लेकर इस देश का अनुभव ये रहा है कि वे अक्सर सांप्रदायिकता को बढऩे नहीं देते। अपनी क्षमता में अस्पताल और स्कूलों पर ध्यान देते हैं। सबसे अधिक ध्यान क़ानून व्यवस्था पर देते हैं क्योंकि उन्हें पता है थानों और चौकियों का सबसे अधिक शिकार उनका ही समाज रहता है। अब तक सवर्णों का राज देखने वाले इस बात को नहीं समझेंगे।

उन्हें मायावतीजी की सिर्फ मूर्तियाँ दिखेंगी, ‘सौ सैंया’ अस्पताल नहीं दिखेंगे। थानों में जिस तरह से सख्ती की गई वो नहीं दिखेगी, नकल रोकने का काम किया गया वो नहीं दिखेगा। वे हेलिकॉप्टर में उड़ते शाह-मोदी को देख सकते हैं मगर नोटों की माला पहनी मायावती नहीं। इसलिए भी जरूरी है कि इस मानसिकता और विचार पर चोट हो।


21-Sep-2021 1:13 PM (58)

-कृष्ण कांत

यूपी के विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित महात्मा गांधी की तुलना राखी सावंत से कर रहे हैं। उनका कहना है, ‘गांधी जी कम कपड़े पहनते थे, धोती ओढ़ते थे। गांधी जी को देश ने बापू कहा। अगर कोई कपड़े उतार देने भर से महान बन जाता तो राखी सावंत महान बन जातीं।’

कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग इस लायक भी नहीं हैं कि वे अपने मुंह से गांधी का नाम ले सकें, वे गांधी के बारे में ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं। ये किस स्तर की निकृष्ट राजनीति है कि गांधी की हत्या पर मिठाई बांटने वाले लोग आज 70 साल बाद भी गांधी की चरित्रहत्या पर आमादा हैं।

गांधी वे शख्स हैं जिन्हें सुभाष चंद्र बोस ने ‘राष्ट्रपिता’ घोषित किया। गांधी वे शख्स हैं जिन्हें रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘महात्मा’ नाम दिया। गांधी वे शख्स हैं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जनता का आंदोलन बनाया। यह न सिर्फ गांधी जी का, बल्कि सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर और पूरे स्वतंत्रता आंदोलन का अपमान है। यह विक्षिप्तता और आपराधिक मानसिकता से उपजा बयान है। यह वही मानसिकता है जिसके तहत गांधी-नेहरू के खिलाफ वॉट्सएप विषविद्यालय में अभियान चलाया जाता है।

गांधी उस शख्सियत का नाम है जो आर्थिक संकट के समय किसी लुटेरे की तरह 8000 करोड़ के जहाज से नहीं घूमता था। गांधी उस शख्सियत का नाम है जो उद्योगपतियों के हाथ देश बेचने पर आमादा नहीं था। गांधी उस शख्सियत का नाम है जिसने 50 सालों तक निर्विवाद रूप से सबसे ताकतवर रहकर भी एक धोती में जिंदगी गुजारी। गांधी उस शख्सियत का नाम है जिसने अपने देश की जनता को नंगा और भूखा देखा तो अपना बैरिस्टर का लिबास उतारकर उनके साथ आ गया और जिंदगी एक धोती में काट दी।

हृदय नारायण दीक्षित को ये समझना चाहिए कि वे जिस संगठन और पार्टी की दलाली कर रहे हैं, वह दशकों तक अंग्रेजों की दलाली करती थी। हृदय नारायण को समझना चाहिए कि वे इस लायक भी नहीं हैं कि वे अपनी जबान पर महात्मा गांधी का नाम भी ला सकें।

हृदय नारायण दीक्षित यूपी की विधानसभा में अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर उस कुर्सी को कलंकित कर रहे हैं। वे एक सम्मानजनक पद पर हैं। भारत के स्वतंत्रता सेनानियों, भारतीय आजादी के नायकों और देश के शहीदों का अपमान करना देश की आत्मा में छुरा घोंपने जैसा जघन्य अपराध है। यह राष्ट्रीय आंदोलन के साथ उसी किस्म की गद्दारी है जो उस समय आरएसएस कर रहा था। ये बेहद शर्मनाक और अक्षम्य है।

माननीय अध्यक्ष जी! मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आपकी फौज ऊंचे पदों पर बैठकर चाहे जितना नीचे गिर ले, गांधी अपने जीवन में ही विश्वपुरुष थे, हैं और रहेंगे। उनकी महानता को अंग्रेज भी नहीं लीप सके तो आप किस खेत की मूली हैं? आप तो उस कलंकित कुनबे के एक अदना प्रतिनिधि हैं जिनसे आजादी आंदोलन तक के साथ गद्दारी की हो!

महात्मा गांधी इस देश का गर्व हैं! यकीन न हो तो नरेंद्र मोदी से पूछ लीजिए। विदेशी धरती पर जाकर वे भी कलेजे पर पत्थर रखकर कहते हैं कि मैं गांधी के देश से आया हूं।

महात्मा गांधी के बारे में ऐसी बातें करके आप आसमान पर थूक रहे हैं जो हर हाल में लौटकर आपके चेहरे पर आएगा और शर्म की तरह चिपक जाएगा।

 


21-Sep-2021 11:57 AM (63)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड और कर्नाटक में जिस तरह मुख्यमंत्री बदले गए हैं, क्या इस प्रक्रिया के पीछे छिपे गहरे अर्थ को हम समझ पा रहे हैं? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह काफी चिंता का विषय है। इन चारों राज्यों में पिछले दिनों जिस तरह से मुख्यमंत्रियों को बदला गया है, उस तरीके में चमत्कारी एकरुपता दिखाई पड़ रही है। पंजाब में कांग्रेस है और शेष तीन राज्यों में भाजपा है। ये दोनों अखिल भारतीय पार्टियां हैं। इनमें से भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। और कांग्रेस दुनिया की सबसे पुरानी पार्टियों में से एक है। ये दोनों पार्टियाँ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी पार्टियाँ है।

इन दोनों पार्टियों की कार्यपद्धति में आजकल अदभुत समानता दिखाई पडऩे लगी है। चारों राज्यों में सत्ता-परिवर्तन चुटकी बजाते ही हो गया। कोई दंगल नहीं हुआ। कोई उठा-पटक नहीं हुई। हटाए गए मुख्यमंत्री अभी तक अपनी पार्टी में ही टिके हुए हैं। उन्होंने बगावत का कोई झंडा नहीं फहराया। दोनों पार्टियों के जो मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों में अभी भी टिके हुए हैं, उन्हें डर लग रहा है कि कहीं अब उनकी बारी तो नहीं है। जो नए मुख्यमंत्री लाए गए हैं, उनकी चिंता यह है कि अगले चुनाव में अपनी पार्टी को कैसे जितवाया जाए? दोनों पार्टियों की कोशिश है कि उन्होंने जो नए मुख्यमंत्री ऊपर से उतारे हैं, वे येन-केन-प्रकारेण चुनाव की वैतरणी तैर कर पार कर लें।

दोनों पार्टियाँ अपने आपको राष्ट्रीय कहती हैं लेकिन उनका चुनावी पैंतरा शुद्ध जातिवादी है। गुजरात में भाजपा यदि पटेल वोटों पर लार टपका रही है तो पंजाब में कांग्रेस ने दलित वोटों का थोक सौदा कर लिया है। उसने अपने कई सुयोग्य प्रांतीय नेताओं को वैसे ही दरकिनार कर दिया है, जैसे गुजरात में भाजपा ने किया है। दलित वोट पटाने के लिए उसने एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया है, जिस पर कई तुच्छ कोटि के आरोप पहले से ही लगे हुए हैं। यहां असली सवाल यह है कि इन दोनों महान पार्टियों को इस वक्त जातिवाद का नगाड़ा क्यों पीटना पड़ रहा है। कांग्रेस के बारे में तो यह कहने की जरुरत नहीं है कि उसका केंद्रीय नेतृत्व जनता की दृष्टि में लगभग निष्प्रभावी हो गया है। लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भी विश्वास खुद पर से हिल गया दिखता है। जो नेतृत्व हरयाणा में एक पंजाबी और गुजरात में एक जैन को मुख्यमंत्री बनाकर अपने दम पर जिता सकता था, अब उसकी भी सांस फूलती दिखाई पड़ रही है। वह भी नए चेहरों और जातिवादी थोक आधार की तलाश में जुट गया है। जनता में चाहे दोनों नेतृत्व कम-ज्यादा हिले हों लेकिन अपनी-अपनी पार्टी में उनकी जकड़ पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है। लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए यह शुभ नहीं है।
(नया इंडिया की अनुमति से)


20-Sep-2021 12:51 PM (62)

-अनिल जैन

‘सबसे अजब-सबसे गजब मध्य प्रदेश’ में लेखकों और साहित्यकर्मियों को उनकी प्रथम कृति प्रकाशित कराने के नाम पर 20-20 हजार रुपए का अनुदान दिए जाने का उपक्रम मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद की साहित्य अकादमी के तत्वावधान में होने वाला एक किस्म का घोटाला ही है, जिसे हर साल एक अनुष्ठान के तौर पर अंजाम दिया जाता है।

इस अनुष्ठान में दिल्ली, भोपाल, जयपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गुरूग्राम, इंदौर आदि शहरों के प्रकाशकों का गिरोह भी श्राद्धपक्ष के पंडों की तरह शामिल रहता है। सरकारी अनुदान के लिए कई लोगों की पांडुलिपियों का चयन तो प्रकाशकों की सिफारिश पर ही होता है। ये प्रकाशक इन पांडुलिपियों को छापते हैं और फिर इनकी ऊंचे दामों पर सरकारी खरीद होती है। सरकारी महकमों और शिक्षा संस्थानों में ये किताबें पड़े-पड़े सड़ते हुए दीमकों और चूहों का आहार बनती हैं।

मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद या साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार या अनुदान के नाम पर रेवडिय़ां बांटने का इतिहास पुराना है। यह काम कांग्रेस के जमाने में भी होता था, लेकिन उस समय कुछ तो लोकलाज का ध्यान रखा जाता था। तब इस तरह के अनुदान प्राप्त करने वालों की सूची 15-20 फीसदी नाम ही फर्जी लेखकों या साहित्यकारों के होते थे, लेकिन अब मामला एकदम उलट गया है।

अब ऐसी सूची में 15-20 फीसदी ही नाम ऐसे होते हैं, जिनका वास्तविक रूप से लिखने-पढऩे से सरोकार होता है और बाकी सारे नाम ऐसे होते हैं, जिन्हें साहित्य की खरपतवार या गाजरघास कहा जा सकता है।

इस बार साहित्य परिषद ने दो साल के लिए कुल जिन 80 नामों का चयन किया है, उनमें 10-12 ही अपवाद होंगे, जिनका पढऩे-लिखने से वास्ता होगा। मैंने 80 लोगों की सूची में से कुछ लोगों का फेसबुक प्रोफाइल देख कर उनके बारे में जानने की कोशिश की तो पाया कि अधिकांश ने अपने प्रोफाइल पर ताला ठोक रखा है।

ताला लगी फेसबुक प्रोफाइल वालों को मैं निहायत असामाजिक और संदिग्ध चरित्र का व्यक्ति मानता हूँ, चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो। चयनित सूची में जिन लोगों के प्रोफाइल खुले पाए गए, उनमें से भी ज्यादातर पर सिवाय मित्रों और परिजनों को जन्मदिन और शादी की सालगिरह के बधाईसंदेश और सैरसपाटे तथा पारिवारिक आयोजन की तस्वीरें ही दिखीं। कुछ की फेसबुक वाल पर संदेश विहीन लघुकथा, कविता और व्यंग्य टाइप का भी कुछ चस्पा किया हुआ दिखा, जिसमें व्याकरण अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती पाई गई।

हालांकि ऐसे लोग स्थानीय अखबारों में भी खूब छपते हैं, लेकिन इसमें हैरान होने जैसी कोई बात नहीं, क्योंकि अखबारों को अपने पन्नों पर विज्ञापन और पेड न्यूज के बाद बची खाली जगह भरने के लिए इन लोगों से मुफ्त में सामग्री मिल जाती है। वैसे अखबारों में छापने के लिए रचनाओं का चयन करने वाले कारकूनों की लिखत-पढ़त का स्तर इन्हीं कथित रचनाकारों जैसा होता है।

इस बार साहित्य अकादमी ने जिन पांडुलिपियां का चयन किया है, उनमें ज्यादातर लघुकथाओं और कविताओं की हैं, जो इस बात की परिचायक है कि साहित्य की इन दोनों विधाओं के पतन में मध्य प्रदेश की साहित्य अकादमी भी अपना योगदान देने में पीछे नहीं है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि मध्य प्रदेश की संस्कृति परिषद और साहित्य अकादमी आवारा गायों की गौशाला जैसी हो गई हैं (जैसे स्मृतिशेष व्यंग्यकार शरद जोशी भोपाल के भारत भवन को कला और संस्कृति का कब्रस्तान कहते थे), जिसमें कुछ कुलीन गायें भी जाने-अनजाने चली जाती हैं या उन्हें प्रवेश दे दिया जाता है। लेकिन जब उनके साथ भी आवारा गायों जैसा सुलूक होता है तो वे गौशाला संचालकों के चाल-चलन को देख कर अपने को अपमानित महसूस करती हैं।


20-Sep-2021 11:48 AM (49)

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारत के मुख्य न्यायाधीश नथालपति वेंकट रमन ने कल वह बात कह दी, जो कभी डॉ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे। जो बात न्यायमूर्ति रमन ने कही है, मेरी स्मृति में ऐसी बात आज तक भारत के किसी न्यायाधीश ने नहीं कही। रमनजी ने एक स्मारक भाषण देते हुए बोला कि भारत की न्याय व्यवस्था को औपनिवेशिक और विदेशी शिकंजे से मुक्त किया जाना चाहिए। यह शिकंजा क्या है? यह शिकंजा है- अंग्रेजी की गुलामी का! हमारे देश को आजाद हुए 74 साल हो गए लेकिन आज तक देश में एक भी कानून हिंदी या किसी भारतीय भाषा में नहीं बना। हमारी संसद हो या विधानसभाएं- सर्वत्र कानून अंग्रेजी में बनते हैं। अंग्रेजी में जो कानून बनते हैं, उन्हें हमारे सांसद और विधायक ही नहीं समझ पाते तो आम जनता उन्हें कैसे समझेगी? हम यह मानकर चलते हैं कि हमारी संसद में बैठकर सांसद और मंत्री कानून बनाते हैं लेकिन असलियत क्या है ? 

इन कानूनों के असली पिता तो नौकरशाह होते हैं, जो इन्हें लिखकर तैयार करते हैं। इन कानूनों को समझने और समझाने का काम हमारे वकील और जज करते हैं। इनके हाथ में जाकर कानून जादू-टोना बन जाता है। अदालत में वादी और प्रतिवादी बगलें झांकते हैं और वकीलों और जजों की गटर-पटर चलती रहती है। किसी मुजरिम को फांसी हो जाती है और उसे पता ही नहीं चलता है कि वकीलों ने उसके पक्ष या विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं और न्यायाधीश के फैसले का आधार क्या है। इसी बात पर न्यायमूर्ति रमन ने जोर दिया है। इस न्याय-प्रक्रिया में वादी और प्रतिवादी की जमकर ठगी होती है और न्याय-प्रक्रिया में बड़ी देरी हो जाती है। कई मामले 20-20, 30-30 साल तक अदालतों में लटके रहते हैं। न्याय के नाम पर अन्याय होता रहता है।

इस दिमागी गुलामी का नशा इतना गहरा हो जाता है कि भारत के मामलों को तय करने के लिए वकील और जज लोग अमेरिका और इंग्लैंड के अदालती उदाहरण पेश करने लगते हैं। अंग्रेजी के शब्द-जाल में फंसकर ये मुकदमे इतने लंबे खिंच जाते हैं कि देश में इस समय लगभग चार करोड़ मुकदमे बरसों से अधर में लटके हुए हैं। न्याय के नाम पर चल रही इस अन्यायी व्यवस्था को आखिर कौन बदलेगा? यह काम वकीलों और जजों के बस का नहीं है। यह तो नेताओं को करना पड़ेगा लेकिन हमारे नेताओं की हालत हमारे जजों और वकीलों से भी बदतर है। हमारे नेता, सभी पार्टियों के, या तो अधपढ़ (अनपढ़ नहीं) हैं या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त हैं। उनके पास न तो मौलिक दृष्टि है और न ही साहस कि वे गुलामी की इस व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन कर सकें। हाँ, यदि कुछ नौकरशाह चाहें तो उन्हें और देश को इस गुलामी से वे जरुर मुक्त करवा सकते हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)


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