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02-Dec-2020 7:57 PM 18

दिल्ली, 2 दिसंबर | जली के तारों के झुंड से ढकी हुई एक तंग गली के तीन मंज़िला मकान की छत पर खड़ी एक महिला हमारा इंतज़ार कर रही थीं.

34 साल की राधा रानी ने इसी साल अगस्त महीने से दूसरी मंज़िल पर एक छोटा घर किराए पर ले रखा है जहाँ उनके दो बच्चे भी साथ रह रहे हैं.

उन्होंने बताया, "लॉकडाउन ख़त्म होने के दो महीने बाद ही मुझे ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चला. हम जम्मू में थे जहाँ डॉक्टर ने दिल्ली आकर पहले सर्जरी और फिर इलाज कराने की सलाह दी."

राधा रानी के पति नौकरी करते हैं और इन दिनों श्रीनगर में तैनात हैं. दिल्ली में किराए का मकान लेकर इलाज कराने के अलावा कोई चारा नहीं था. लेकिन मुश्किलें और भी थीं.

उन्होंने कहा, "रिश्तेदारों ने कहा दिल्ली में ट्रीटमेंट नहीं लेना है, कोरोना फैला हुआ है. लेकिन हमको ट्रीटमेंट लेना था हम आ गए. सर्जरी के बाद मेरी कीमोथेरेपी शुरू होनी थी लेकिन उसके पहले कोविड टेस्ट में मेरा पॉज़िटिव आ गया. इसके चलते हमारी थेरेपी एक महीना आगे बढ़ानी पड़ी."

कोरोना वायरस और ब्रेस्ट कैंसर

इस साल के जनवरी महीने में भारत में कोरोना वायरस ने दस्तक दी थी जिसके चलते 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी.

एक तरफ़ जहाँ अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मियों का लगभग पूरा ध्यान इस वैश्विक महामारी की रोकथाम में लगा वहीं दूसरी तरफ़ नागरिकों को संक्रमण से बचे रहने की हिदायतें दी गईं.

इस प्रक्रिया में दूसरी जानलेवा बीमारियों का इलाज करा रहे लोगों पर ख़ासा असर पड़ा और अनुमान है कि कैंसर, ख़ासतौर से ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े क़रीब 40% ऑपरेशन टल गए.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ साल 2018 के दौरान भारत में ब्रेस्ट कैंसर से क़रीब 87,000 मौतें हुईं थीं. जबकि महिलाओं को होने वाले कैंसर में से 28% मामले ब्रेस्ट कैंसर के ही थे. बढ़ते आँकड़ों के बीच कोरोना आ पहुँचा.

दिल्ली के मनिपाल अस्पताल में सर्जिकल ओंकोलोजी प्रमुख और ब्रेस्ट कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर वेदांत काबरा कहते हैं, "भारत में अमेरिका, इंग्लैंड या कनाडा जैसे उन्नत देशों की तरह कोई सरकारी स्क्रीनिंग प्रोग्राम नहीं है इस वजह से 60-70% ब्रेस्ट कैंसर के मरीज़ हमारे पास तीसरी-चौथी स्टेज में आते हैं."

उन्होंने बताया, "कोविड आने से जिनको जानकारी नहीं थी वो तो वैसे ही बैठे हुए थे लेकिन जिन्हें जानकारी थी वो भी ब्रेस्ट कैंसर या उनके लक्षणों के बारे में कोविड की वजह से इतने ज़्यादा डर गए थे कि लक्षणों के बावजूद अस्पताल नहीं आ रहे थे."

ब्रिटेन की ब्रेस्ट कैंसर नाउ नामक चैरिटी संस्था के मुताबिक़ कोविड-19 महामारी के दौरान क़रीब दस लाख ब्रितानी महिलाओं को अपनी सालाना ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग जाँच छोड़नी पड़ी और अमेरिका और यूरोप से भी ऐसी ख़बरें आती रही हैं.

भारत में ब्रेस्ट कैंसर की स्थिति और ख़तरनाक हो सकती है क्योंकि पहले से ही महिलाओं में इसका प्रतिशत सबसे ज़्यादा है और जानकारों का मानना है कि अगले दस सालों में ब्रेस्ट कैंसर हर दूसरे कैंसर को पीछे छोड़ सकता है.

भारत में कैंसर रिसर्च से शुरुआत से जुड़े रहे और गंगाराम, अपोलो और आरटेमिस जैसे अस्पतालों में ओंकोलॉजी विभाग की कमान संभाल चुके डॉक्टर राकेश चोपड़ा कहते हैं कि 2019 की तुलना में इस साल आधे से भी कम कैंसर ऑपरेशन हुए और इसमें ब्रेस्ट कैंसर मामलों की तादाद बहुत है."

उन्होंने कहा, "कैंसर के मरीज़ों की इम्यूनिटी यानी शरीर के किसी भी संक्रमण से लड़ने की क्षमता दूसरों के मुक़ाबले बहुत कम होती है. इस डर के अलावा अगर ब्रेस्ट कैंसर के लिहाज़ से देखें तो आज भी ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों या छोटे शहरों में महिलाएं, ख़ासतौर से शादी-शुदा, अपने बीमारियों से ज़्यादा अपने परिवार-बच्चों पर ध्यान देती हैं. ऊपर से कोरोना वायरस का डर बना रहा है जिससे हालात ख़राब होते चले गए."

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहने वाली अनुपमा (नाम बदला हुआ) दो साल पहले अपनी सास का इलाज कराने शहर के संजय गांधी पीजीआई अस्पताल जाया करती थीं.

बात-बात में एक दिन उन्होंने अपनी सास की महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर से कहा कि पिछले चार महीनों में उनका वज़न ख़ुद-ब-ख़ुद साढ़े चार किलो कम हुआ है.

डॉक्टर ने तुरंत उनकी जाँच की और शरीर के कई हिस्सों में छोटी-छोटी गठिया मिलने के बाद उसी शाम उनकी मैमोग्राफ़ी कराई तो उन्हें स्टेज-3 का ब्रेस्ट कैंसर निकला.

स्तन हटाने की सर्जरी के बाद उन्हें कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी दी गई लेकिन इसी साल फ़रवरी में हुए स्कैन में दोबारा कैंसर सेल्स दिखे.

इस बार उनका इलाज दिल्ली में शुरू हुआ लेकिन इसी बीच लॉकडाउन की घोषणा हुई और इलाज रोकना पड़ा.

अनुपमा ने बताया, "जून के पहले हफ़्ते में दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट आने पर पता चला कि कैंसर अब फेफड़ों तक फैल चुका था. हालांकि कुछ कैंसर मरीज़ों का इलाज लॉकडाउन में होता रहा लेकिन शायद हम ही लोग ज़्यादा डर गए थे. अब पता नहीं क्या होगा?".

दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में ब्रेस्ट कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर आर सरीन के मुताबिक़, "लॉकडाउन के पहले तक हर महीने क़रीब 200 ब्रेस्ट कैंसर मरीज़ हमारे यहाँ इलाज के बाद के फ़ॉलोअप में आते थे लेकिन अब इसमें 70% तक की गिरावट दिखी है."

भारत में कोरोना वायरस फैलने के शुरुआती दिनों में मरीज़ों के नाम-पते सार्वजनिक करने के दौरान ब्रेस्ट कैंसर जैसी आम होती बीमारी को भी बड़ा झटका लगा. ज़ाहिर है इसमें जागरूकता की ख़ासी ज़रूरत है जिस पर पिछले कई सालों से काम तो जारी है लेकिन असर अभी भी कम दिखा है.

पश्चिमी दिल्ली में रहने वाली शमीम ख़ान ने एक कैंसर सपोर्ट ग्रुप की शुरुआत की जिस दौरान उनके अपने परिवार में इस बीमारी ने दस्तक दी थी.

शमीम बताती हैं, "ब्रेस्ट कैंसर हो या कैंसर, भारत में आज भी इस पर पर्दा रखा जाता है. एक तो हममें झिझक बहुत है, शर्म बहुत है, हम डॉक्टरों को नहीं बताते, अपने घरों में भी नहीं बताते कि ब्रेस्ट कैंसर हुआ है. जब होता है तो हम इधर-उधर, हक़ीम-वकीम के पास जाते हैं. यानी जागरूकता की कमी है."

लिमफ़ोमा सपोर्ट ग्रुप की सह-संस्थापक शमीम के मुताबिक़, "मैं झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में काम करती हूँ और आज भी औरतें कहती हैं हम अपने ब्रेस्ट को कैसे दिखाएँ, कैसे बताएँ कि उसमें से ब्लीडिंग हो रही है या बदलाव हो रहे हैं."

उम्मीद की किरण

ब्रिटेन की जानी मानी पत्रिका 'द लैंसेट' के मुताबिक़ भारत में हर साल कैंसर के क़रीब दस लाख नए मामले सामने आते हैं और कोरोना काल में इनपर गहरा असर पड़ेगा.

लेकिन अस्पतालों और विशेषज्ञों ने इसी दौरान कैंसर ट्रीटमेंट में भी कुछ सफल प्रयोग किए हैं.

डॉक्टर वेदांत काबरा के अनुसार, "भारतीय महिलाओं में ब्रेस्ट और सरवाइकल कैंसर सबसे ज़्यादा हैं और विशेषज्ञों ने कोरोना वायरस को देखते हुए इलाज में ज़रूरी बदलाव किए. मरीज़ों के अस्पताल आने में कमी लाने से लेकर थेरेपी देने की संख्या के अलावा उन्हें ये भरोसा दिलाया गया कि सर्जरी कराना सुरक्षित है, उससे बचने में नुकसान ज़्यादा है."

डॉक्टर राकेश चोपड़ा के मुताबिक़, "कोरोना के दौर में ही कैंसर विशेषज्ञों का एक बड़ा ग्रुप बनाया गया, ख़ासतौर से उन मरीज़ों के लिए जो दूर-दराज़ से दिल्ली या मुंबई या बड़े शहर इलाज कराने के लिए आते थे. भले ही उनके यहाँ सुविधाओं का स्तर बड़े शहरों जैसा नहीं है लेकिन हम लोग वहाँ के स्थानीय चिकित्सकों से लगातार बात करते हुए ये कोशिश करते हैं कि इलाज में बाधा न आए."

भारत सरकार की आयुष्मान स्वास्थ्य परियोजना के तहत साल 2020 की शुरुआत तक, क़रीब 70 लाख महिलाओं की ब्रेस्ट कैंसर और 30 लाख की सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग या जाँच हो चुकी है.

लगभग सभी कैंसर विशेषज्ञों का मत है कि इसे अब कई गुना तेज़ी से बढ़ाने की ज़रूरत है.

वैसे भारत सरकार ने इस बात को भी शुरू से ही साफ़ कह रखा है कि मरीज़ों की आवाजाही या इलाज पर लॉकडाउन या उसके बाद में किसी क़िस्म की पाबंदी नहीं लगाई जाएगी लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार को भी कोरोना से एक सीख लेने की ज़रूरत है.

डॉक्टर राकेश चोपड़ा कहते हैं, "सरकार ने जैसे मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग की कैम्पेन पूरे देश में चलाई उससे जागरूकता रातों-रात बढ़ी और कामयाब साबित हुई. ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारी के बारे में अगर इसका 50% भी दोहरा लेंगे, तभी ब्रेस्ट कैंसर की आने वाली सुनामी से बचा जा सकेगा."(www.bbc.com/hindi)


02-Dec-2020 5:34 PM 38

-अभय शर्मा

 तेलंगाना के कुल 119 विधायकों और 17 सांसदों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के केवल दो विधायक और चार सांसद ही हैं। इसके बाद भी भाजपा राज्य के एक नगर निगम चुनाव में अपनी पूरी ताक़त झोंक रही है। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव (जीएचएमसी) एक दिसंबर को होना हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र यादव, जिन्होंने बिहार में भाजपा की जीत की रणनीति तैयार की थी, उन्हें इस चुनाव की जि़म्मेदारी दी गई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या एक हफ़्ते से यहां के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। यह चुनाव इस हफ्ते तब और सुखिऱ्यों में आ गया, जब गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी यहां प्रचार के लिए पहुंच गए। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि तेलंगाना का एक छोटा सा नगर निगम चुनाव भाजपा के लिए आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?

विधानसभा उपचुनाव ने भाजपा का मनोबल बढ़ाया

बीते नवंबर में तेलंगाना की दुब्बाक विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था। यह सीट राज्य की सत्ताधारी पार्टी-तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के विधायक की मौत के बाद ख़ाली हुई थी। टीआरएस ने उपचुनाव में दिवंगत विधायक की पत्नी को ही उम्मीदवार बनाया था। यह सीट टीआरएस के लिए काफी अहम मानी जाती है क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जिस सीट से चुनाव जीत कर आते हैं, वह इससे सटे हुए इलाके में ही आती है। एक तरह से इसे टीआरएस का गढ़ कहा जाता है। उपचुनाव में इस सीट पर टीआरएस का पूरा चुनाव प्रबंधन के चंद्रशेखर राव के भतीजे हरीश राव ने संभाला था। हरीश राव को टीआरएस का अहम चुनावी रणनीतिकार माना जाता रहा है। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बाद भी टीआरएस यह उपचुनाव हार गई और भाजपा को यहां से जीत मिली। भाजपा का मनोबल दुब्बाक उपचुनाव में मिले वोट प्रतिशत ने भी बढ़ाया, जो पिछली बार के 13।75 फ़ीसद से बढक़र 38।5 फ़ीसद पर पहुंच गया।

पंचायत से पार्लियामेंट

तक पहुंचने का नारा

भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह ने अपने कार्यकर्ताओं को एक नारा दिया था, उन्होंने कहा था कि पार्टी अपना विस्तार तभी कर सकती है, जब वह ‘पंचायत से पार्लियामेंट’ तक पहुंचने का लक्ष्य रखेगी। इसके बाद पार्टी ने हरियाणा सहित कई राज्यों में यह रणनीति अपनाई और इसी फार्मूले के तहत उसने न केवल कार्यकर्ताओं में जोश भरा बल्कि इन राज्यों की सत्ता पर भी कब्जा किया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह काफी समय से दक्षिण भारत में अपनी पार्टी का विस्तार चाहते हैं। भाजपा को लगता है कि अगर ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में उसने जीत हासिल की या कोई अच्छा प्रदर्शन भी किया तो इसकी गूंज पड़ोसी राज्य तमिलनाडु तक पहुंचेगी जहां अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं।

कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि 2014 के बाद से यह पहली बार है जब तेलंगाना के किसी चुनाव में भाजपा अपने मनमुताबिक प्रचार की रणनीति अपनाने के लिए स्वतंत्र है। चूंकि अब वह चंद्रशेखर राव की मदद के बिना भी उच्च सदन में अपने अहम बिल पास करा सकती है इसलिए वर्तमान चुनाव में भाजपा ने चंद्रशेखर राव के खिलाफ काफी आक्रामक रुख अपना रखा है।

तेलंगाना में जगह बनाने का भाजपा के लिए बेहतरीन मौका

पिछली बार हैदराबाद के जीएचएमसी चुनाव में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के बेटे केटी रामा राव ने पूरी रणनीति तैयार की थी। जानकारों की मानें तो के चंद्रशेखर राव ने पार्टी में अपने बेटे का कद बढ़ाने के लिए उसे यह जिम्मेदारी दी थी क्योंकि पार्टी में केटी रामा राव से ज़्यादा उनके भतीजे हरीश राव की चलती थी। केटी रामा राव के नेतृत्व में टीआरएस ने जीएचएमसी चुनाव में 150 में से 99 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को 44, भाजपा को तीन और कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं। इस बार भी जीएचएमसी चुनाव की जिम्मेदारी केटी रामा राव के पास है और हरीश राव उप-चुनाव में हार की वजह से फि़लहाल साइडलाइन कर दिए गए हैं। जानकारों की मानें तो टीआरएस की अंदरूनी लड़ाई, हैदराबाद में इस साल दो बार आई बाढ़ के चलते लोगों की नाराजगी और दुब्बाक चुनाव में हार की वजह से इस समय टीआरएस थोड़ी कमजोर नजर आ रही है। ऐसे में भाजपा को लगता है कि राज्य में जगह बनाने का यह अच्छा मौका हो सकता है। तेलंगाना के कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस नगर निगम चुनाव में भाजपा के पूरी ताकत से उतरने के पीछे एक और वजह भी बताते हैं। इनके मुताबिक तेलंगाना में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस है। (बाकी पेज 5 पर)

जो लगातार राज्य में कमजोर होती जा रही है। बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज तीन सीटें जबकि राज्य में पैर जमाने की कोशिश कर रही भाजपा को चार सीटें मिली थीं। हालिया दुब्बाक उपचुनाव में पूरा जोर लगाने के बाद भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही थी। ऐसे में भाजपा नेताओं का मानना है कि दो चुनावों के बाद अब अगर उनकी पार्टी ग्रेटर हैदराबाद निगम चुनाव में भी कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन कर देती है तो कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा तेलंगाना की मुख्य विपक्षी पार्टी बन जायेगी।

भाजपा को जीत की उम्मीद क्यों?

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम देश के सबसे बड़े नगर निगमों में से एक है। यह नगर निगम चार जिलों में फैला हुआ है जिसमें पुराना हैदराबाद, रंगारेड्डी, मेडचल-मलकजगिरी और संगारेड्डी इलाके आते हैं। इस नगर निगम में तेलंगाना की 24 विधानसभा सीटें और पांच लोकससभा की सीटें आती हैं। पूरे ग्रेटर हैदराबाद में करीब 65 फीसदी हिन्दू और 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। धर्म के आधार पर जनसंख्या के इन्हीं आंकड़ों से भाजपा को यहां अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है।

पुराने हैदराबाद में दस विधानसभा सीटें आती हैं और यहां 50 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। यह क्षेत्र असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का गढ़ माना जाता है, पिछले विधानसभा चुनाव में उसे यहां की सात सीटों पर जीत हासिल हुई थी। यही वजह है कि ओवैसी की पार्टी केवल इसी इलाके की 51 सीटों पर नगर निगम चुनाव लड़ रही है। लेकिन भाजपा और सत्ताधारी टीआरएस ने नगर निगम की सभी 150 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा इस चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश में है। उसके नेताओं ने रोहिंग्या मुसलमान, सर्जिकल स्ट्राइक, बांग्लादेश और पाकिस्तान को इस चुनाव का अहम मुद्दा बन दिया है। वे इन सबके बहाने ओवैसी पर निशाना साध रहे हैं और ओवैसी और चंद्रशेखर राव को अंदरखाने एक बता रहे हैं। हैदराबाद के कुछ पत्रकारों के मुताबिक भाजपा को लगता है कि पुराने हैदराबाद में ओवैसी ज्यादा सीटें ले जाएंगे। लेकिन, बाकी इलाकों में वह टीआरएस से सीधी टक्कर लेगी और हिंदू वोटों के धुर्वीकरण के चलते वह निगर निगम की सत्ता तक भी पहुंच सकती है। (satyagrah.scroll.in)

 


02-Dec-2020 5:32 PM 20

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

यह नवंबर का महिना भी क्या महिना था। इस महिने में छह शिखर सम्मेलन हुए, जिनमें चीन, रुस, जापान, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान समेत आग्नेय और मध्य एशिया के देशों के नेताओं के साथ भारत के प्रधानमंत्री और उप-राष्ट्रपति ने भी सीधा संवाद किया। उसे संवाद कैसे कहें ? सभी नेता जूम या इंटरनेट पर भाषण झाड़ते रहे। सबने अपनी-अपनी बीन बजाई। सब कोरोना की महामारी पर बोले। सब ने अपने-अपने युद्ध-कौशल का जिक्र किया। सब ने वे ही घिसी-पिटी बातें दोहराईं, जो ऐसे सम्मेलनों में प्राय: वे बोलते रहते हैं। उन्होंने अपने विरोधी राष्ट्रों को भी घुमा-फिराकर आड़े हाथों लिया। असली प्रश्न यह है कि इन शिखर सम्मेलनों की सार्थकता क्या रही? बेहतर तो यह होता कि भारत अपने पड़ोसी देशों से सीधा संवाद करता। इस संवाद के लिए दक्षेस (सार्क ) का निर्माण हुआ था। अब से लगभग 40 साल पहले जब इसके बनने की तैयारी हो रही थी तो हम आशा कर रहे थे कि भारत और उसके पड़ौसी देश मिलकर यूरोपीय संघ की तरह एक साझा बाजार, साझा संसद, साझा सरकार और साझा महासंघ खड़ा कर लेंगे लेकिन यह सपना भारत-पाक तनाव का शिकार हो गया।

इन दोनों देशों के वेबनाव और मनमुटाव के कारण दक्षेस सम्मेलन कई बार होते-होते टल गया। जब हुआ तो भी कोई बड़े फैसले नहीं हो पाए। दक्षेस सम्मेलनों में होता क्या है ? इन देशों के प्रधानमंत्री वगैरह भाग लेते हैं। वे अपने रस्मी भाषण देकर बरी हो जाते हैं और बाद में उनके अफसर उन्हीं भाषणों के आधार पर सहयोग के छोटे-मोटे रास्ते निकालते रहते हैं। सरकारें आपसी सहयोग करते वक्त इतने असमंजस में डूबी रहती हैं कि कोई बड़ा फैसला कारगर ही नहीं हो पाता। तब क्या किया जाए ? मेरी राय है कि दक्षेस तो चलता रहे लेकिन एक जन-दक्षेस (पीपल्स सार्क) भी कायम किया जाए, जिसमें दक्षेस के आठों देशों के कुछ प्रमुख लोग तो हों ही, उनके अलावा म्यामांर, ईरान, मोरिशस, सेशेल्स और मध्य एशिया के पांच गणतंत्रों के लोगों को भी जोड़ा जाए। मैं इन लगभग सभी देशों में रह चुका हूं और वहां इनमें अपनेपन का दर्शन कर चुका हूं। यदि इन 17 देशों के जन-प्रतिनिधियों का एक संगठन खड़ा किया जा सके तो अगले पांच वर्षों में 10 करोड़ नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, एशिया का यह क्षेत्र यूरोप से अधिक समृद्ध हो सकता है और तिब्बत, कश्मीर, तालिबान आदि मामले भी अपने आप सुलझ सकते हैं। यह सैकड़ों साल से चले आ रहे बृहद् आर्य-परिवार का पुनर्जन्म होगा।

 (नया इंडिया की अनुमति से)


02-Dec-2020 5:12 PM 18

मानवाधिकार संस्था रेड क्रॉस ने चिंता जताई है कि कोरोना वैक्सीन को लेकर फैलाई जा रही फेक न्यूज "दूसरी महामारी" की शक्ल ले रही है. ऐसे में कोरोना से निजात पाना मुश्किल हो सकता है.

  dw.com

कभी फेक न्यूज सिर्फ राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर रहा था, लेकिन अब वह कोरोना महामारी से निबटने के प्रयासों पर भी असर डाल रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस के अध्यक्ष फ्रांसेस्को रोका का कहना है कि कोरोना महामारी को रोकने के लिए "फेक न्यूज की महामारी" को रोकना बेहद जरूरी है. एक वर्चुअल बैठक में उन्होंने कहा कि दुनिया भर में टीकाकरण को ले कर कर और खास कर कोरोना वैक्सीन को ले कर अविश्वास की भावना बढ़ रही है.

फ्रांसेस्को रोका ने जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के उस शोध की ओर ध्यान दिलाया है जिसके अनुसार जुलाई से अक्टूबर के बीच 67 देशों के लोगों में वैक्सीन को ले कर शंका बढ़ी है. रोका ने बताया कि शोध में हिस्सा लेने वाले एक चौथाई देशों में स्वीकृति दर 50 फीसदी या फिर उससे भी कम पाई गई. जापान में जहां पहले 70 फीसदी लोग वैक्सीन के हक में थे, अब केवल 50 फीसदी ही इसे लेने के लिए तैयार हैं. इसी तरह फ्रांस में यह दर 51 से गिर कर 38 प्रतिशत तक रह गई है.

पश्चिम के अलावा अफ्रीका में भी संदेह
फ्रांसेस्को रोका ने यह भी कहा कि वैक्सीन को ले कर शक केवल पश्चिमी देशों तक ही सीमित नहीं है. आठ अफ्रीकी देशों की मिसाल देते हुए उन्होंने बताया कि विकासशील देशों में भी वैक्सीन को ले कर विश्वास में कमी आ रही है. उन्होंने कांगो, कैमरून, गाबोन, जिम्बाब्वे, सिएरा लियोन, रवांडा, लेसोथो और केन्या का नाम लिया. उन्होंने कहा, "कई अफ्रीकी देशों में हमने अमूमन वैक्सीन के प्रति ऐसी धारणाएं देखी हैं कि विदेशी लोग अफ्रीका को मेडिकल टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं."

शोध दिखाते हैं कि अफ्रीका में यह मानने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है कि कोरोना वायरस अफ्रीकी युवाओं को नुकसान नहीं पहुंचा सकता. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि कोरोना वायरस हुआ करता था, लेकिन अब नहीं है.

पाकिस्तानी लोग कोरोना से अनजान
साल 2020 पूरा ही कोरोना महामारी से जूझते हुए निकल गया लेकिन दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिन्हें आज तक इसके बारे में कुछ पता ही नहीं. मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में हुए एक शोध में दस फीसदी लोगों को पता ही नहीं था कि कोविड-19 क्या है. ऐसे लोगों तक टीका पहुंचाना और उन्हें टीका लगाने के लिए मनाना स्थानीय सरकार के लिए बेहद मुश्किल काम होगा. रोका ने इस बारे में कहा, "हमें लगता है कि कोविड वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाने के लिए जितनी मेहनत की जरूरत है, उतनी ही मशक्कत लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए भी करनी होगी."

पाकिस्तान उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल है जहां आज भी पोलियो की बीमारी मौजूद है. वजह यही है कि इतने दशकों बाद भी कुछ लोगों को टीकाकरण के लिए राजी नहीं किया जा सका है. अगर कोरोना वायरस के मामले में भी ऐसा ही होता है, तो अगले कई दशकों तक इस खतरनाक वायरस से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकेगा. अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसाइटी दुनिया के 192 देशों में सक्रिय है जहां इसके लगभग डेढ़ करोड़ वॉलंटियर हैं. 

आईबी/एमजे (एपी)


02-Dec-2020 12:37 PM 20

किसानों के प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों के बीच हुई बैठक बेनतीजा रही. विवादास्पद कृषि कानूनों पर एक समिति गठित करने के सरकार के प्रस्ताव को किसानों ने ठुकरा दिया.

 डायचेवेले पर चारु कार्तिकेय का लिखा 

35 किसान संगठनों के प्रतिनिधि मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी पीयूष गोयल और सोम प्रकाश से मिले थे. बैठक में मंत्रियों ने  किसानों के सामने तीनों नए कृषि कानूनों पर उनकी आपत्तियों पर चर्चा करने के लिए एक समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया.

मीडिया में आई खबरों के अनुसार किसानों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि जब तक सरकार कानूनों को रद्द नहीं करती तब तक उनके प्रदर्शन जारी रहेंगे. कुछ किसानों का यह भी मानना था कि सरकार यह समिति आंदोलन में शामिल सैकड़ों किसान संगठनों के बीच फूट डलवाने के लिए बनाना चाहती थी लेकिन विरोध कर रहे सभी किसान एकजुट हैं और अपनी मांग पर कायम हैं.

बुधवार को किसान संगठनों की आपस में बैठक होगी जिसमें वो सरकार से हुई बातचीत की समीक्षा करेंगे और आंदोलन के लिए आगे की रणनीति तय करेंगे. गुरूवार को किसानों की केंद्रीय मंत्रियों के साथ एक और बैठक निर्धारित है. इस बीच किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं और उन्हें समर्थन देने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है.

किसान इससे पहले नए कानूनों के विरोध में भारत बंद भी आयोजित कर चुके हैं. ये तीन कानून हैं आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून.

बताया जा रहा है कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों से और भी किसान दिल्ली के तरफ निकल चुके हैं. महाराष्ट्र से भी किसानों के दिल्ली आने की संभावना व्यक्त की जा रही है. धरने पर बैठे किसानों को समर्थन देने दिल्ली की सीमाओं पर कई विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी और एक्टिविस्ट भी पहुंच रहे हैं.

कई खिलाड़ियों ने भी उनकी मांगों को अपना समर्थन दिया है और अर्जुन पुरस्कार प्राप्त कर चुके हॉकी खिलाड़ी सज्जन सिंह चीमा जैसे खिलाड़ियों ने घोषणा की वो किसानों के साथ किए जा रहे बर्ताव के विरोध में अपने पुरस्कारों को सरकार को वापस लौटा देंगे.

किसान इससे पहले नए कानूनों के विरोध में भारत बंद भी आयोजित कर चुके हैं. ये तीन कानून हैं आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून.

कानूनों के आलोचकों का मानना है कि इनसे सिर्फ बिचौलियों और बड़े उद्योगपतियों का फायदा होगा और छोटे और मझौले किसानों को अपने उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पाएंगे.

इनका उद्देश्य ठेके पर खेती यानी 'कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग' को बढ़ाना, खाद्यान के भंडारण की सीमा तय करने की सरकार की शक्ति को खत्म करना और अनाज, दालों, तिलहन, आलू और प्याज जैसी सब्जियों के दामों को तय करने की प्रक्रिया को बाजार के हवाले करना है.

कानूनों के आलोचकों का मानना है कि इनसे सिर्फ बिचौलियों और बड़े उद्योगपतियों का फायदा होगा और छोटे और मझौले किसानों को अपने उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पाएंगे. सरकार ने कानूनों को किसानों के लिए कल्याणकारी बताया है, लेकिन कई किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का कहना है कि इन कानूनों की वजह से कृषि उत्पादों की खरीद की व्यवस्था में ऐसे बदलाव आएंगे जिनसे छोटे और मझौले किसानों का शोषण बढ़ेगा.


02-Dec-2020 10:35 AM 19

Shagun Kapil-

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बताया कि कृषि सुधार विधेयक, 2020 के विरोध में देशभर के किसान आगामी 25 सितम्बर को सभी जिला मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन और चक्का जाम करेंगे। उन्होंने कहा है कि देश की संसद के इतिहास में पहली दुभार्ग्यपूर्ण घटना है कि अन्नदाता से जुड़े तीन कृषि विधेयकों को पारित करते समय न तो कोई चर्चा की और न ही इस पर किसी सांसद को सवाल करने का अधिकार दिया गया। उनका तर्क है कि मंडी के बाहर खरीद पर कोई शुल्क न होने से देश की मण्डी व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। सरकार धीरे-धीरे फसल खरीदी से हाथ खींच लेगी। वह कहते हैं कि किसानों को बाजार के हवाले छोड़कर देश की खेती को मजबूत नहीं किया जा सकता। डाउन टू अर्थ ने इन सभी मुद्दों पर उनसे बातचीत की। 

  प्रश्न- राज्य सभा में तीन कृषि सुधार बिल गत 20, 2020 को किए गए। केंद्र सरकार का कहना है  कि इन कानूनों से मंडियों और अढ़तियों के एकाधिकार से किसानों को मुक्ति मिलेगी। वास्तव में सरकार को कितनी चिंता है किसानों की?

टिकैत-  देखिए हमारी सबसे बड़ी चिंता यह है कि मंडियों और बाहर के लेनदेन अलग-अलग होंगे। जबकि मंडी शुल्क लगाएगी और बाहर कोई कर या बाजार शुल्क नहीं लगेगा। इससे मंडी व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। यहां देखा जाए तो सरकार सीधे कृषि उपज मंडी समितियों को समाप्त नहीं कर रही है। हालांकि यह ध्यान देने वाली बात है कि मंडी प्रणाली न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करती है, जो धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।

प्रश्न- केंद्र सरकार का कहना है कि समर्थन मूल्य जारी रहेगा, यही नहीं यह बात प्रधानमंत्री ने भी कही है, ऐसे में किसान क्यों नहीं उन पर विश्वास कर पा रहे हैं?  

टिकैत- हम बार-बार सरकार से यह बात कह रहे हैं कि एमएसपी को अनिवार्य बनाते हुए बिल में इतना संशोधन किया जाए कि कीमत नीचे होने पर खरीदना गैर कानूनी हो। यदि प्रधानमंत्री कहते हैं कि एमएसपी रहेगा तो इसे कानून के अंतर्गत लाने में क्या मुश्किल है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक बार बड़े कारपोरेट और निजी कंपनियां बाजार में प्रवेश करते हैं तो वे कीमतों पर बोली लगाएंगे। हमारा सरकार से सबसे बड़ा सवाल है कि संसद में बिल पारित करने से पहले सरकार ने बिल से जुड़े देश में किसी भी हितधाकों से परामर्श करना मुनासिफ क्यों नहीं समझा? मेरा कहना है कि जब भूमि अध्यादेश अधिनियम लाया गया था तो इसी भाजपा सरकार की ही नेत्री सुमित्रा महाजन तब स्टैंडिंग कमेटी की चेयरमैन थी तो उन्होंने एक बार नही कम से कम सात से आठ बार किसानों से सलाहमशविरा किया था। ऐसे में अब ऐसी क्या मजबूरी आ गई है सरकार के सामने कि उसने किसानों से जुड़े इस महत्वपूर्ण बिल के संबंध में उनसे बात करना भी गवारा नहीं समझा।  

प्रश्न- संसद में पारित किसान बिलों का मुख्य लक्ष्य है कि भारत में कांट्रैक्ट फार्मिंग को कानूनी जामा पहनाना, इससे किसानों के हित पूरी तरह से सुरक्षित होंगे, इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है?

टिकैत- कानून के अनुसार कंपनी वाला हो या कोई भी खरीदार, किसान को तीन दिनों के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए। और यदि इस भुगतान में देरी होती है तो किसान कैसे इस भुगतान को वसूलेगा और कहां भटकेगा? उदाहरण के लिए गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 के अंतर्गत नियम है कि गन्ने की आपूर्ति के 14 दिन के अंदर बकाया भुगतान किया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह नियम जमीनी स्तर पर अब तक लागू हो पाया है? इसका अंदाजा इस एक बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में किसानों का गन्ना बकाए की राशि 14 हजार करोड़ तक जा पहुंची है। अनुबंध खेती का हमारा पिछला अनुभव बहुत कड़वा रहा है। इसके तहत बताया गया था कि खरीददार उपज की गुणवत्ता को आधार बनाकर अंतिम समय में खरीदने से इंकार कर सकता है। और सबसे बड़ा सवाल है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे की निगरानी करने वाला कौन है? हालांकि सरकार का तर्क है कि इस संबंध में किसान कानूनी रास्ता अपना सकते हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि इस बात के लिए देश के लाखों  किसानों के पास समय और संसाधन है?

प्रश्न- किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का कहना है कि मंडियों के बाहर किसानों को बेहतर मोलभाव करने का अवसर मिलेगा और इससे छोटे किसानों का शोषण से बचाव संभव होगा। लेकिन हमारे एफपीओ अभी भी नवजात अवस्था में हैं। नए ढांचे में वे कितने कुशल हैं?  

टिकैत- एफपीओ को अभी भी पूरी तरह से प्रभावी नहीं माना जा सकता है। वर्तमान समय में वे कई मामलों में उन्हें किसान समूहों की तरह नहीं चलाया जाता है। हां एफपीओ को केवल एक छोटे व्यापारी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। जिसके तहत एक व्यक्ति एफपीओ बनाता है और कुछ और लोगों को समूह में शामिल करता है। एक तरह से यह एक व्यक्ति का एक लाभदायक व्यवसाय मात्र बन कर रह गया है। यही नहीं मैं यहां यह भी बताना चाहूंगा कि हमारे उत्तर भारतीय राज्यों में तो बहुत अधिक एफपीओ हैं भी नहीं। लेकिन हां इसे सरकार का एक अच्छा कदम कहा जा सकता है, लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि इस प्रणाली के लाभ हमें कुछ सीलों में ही ज्ञात होंगे। (downtoearth)

 


01-Dec-2020 6:43 PM 30

-सौतिक बिस्वास

नंदन नीलेकणि कहते हैं कि शुरुआत में वैक्सीन की कीमत 3 से 5 डॉलर (लगभग 220 से 369 रुपये) होती है तो हर भारतीय के लिए इसकी दो खुराक की कीमत 10 डॉलर (करीब 739 रुपये) और भारत के लिए 13 अरब डॉलर (लगभग नौ खरब रुपये से ज़्यादा) हो सकती है। ये बहुत मंहगा होगा।

इसलिए डॉक्टर गगनदीप कांग कहती हैं कि भारत के लिए एक अच्छी वैक्सीन की लागत 50 सेंट (कऱीब 2।25 रुपये) प्रति खुराक से कम होनी चाहिए। ये भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो और इसकी एक खुराक की जरूरत हो।

जब वैक्सीन बनाने और देने की बात होती है, तो भारत उसके लिए बड़े एक पावरहाउस की तरह है।

भारत में बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं, यहां दुनिया भर की 60 प्रतिशत वैक्सीन बनती हैं और यहां आधे दर्जन वैक्सीन निर्माता मौजूद हैं, जिनमें दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल है।

इसमें हैरानी की बात नहीं कि भारत सरकार अरबों लोगों तक कोविड-19 की वैक्सीन पहुंचाने की इच्छा रखती है।

भारत की अगले साल जुलाई तक वैक्सीन की 50 करोड़ डोज़ बनाने और 25 करोड़ लोगों का टीकाकरण करने की योजना है।

भारत का ये आत्मविश्वास तब और बढ़ जाता है जब वो हर साल बड़ी संख्या में टीकाकरण के अपने पिछले रिकॉर्ड को देखता है।

देश का 42 साल पुराना टीकाकरण अभियान दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य अभियानों में से एक है जिसे 55 करोड़ लोगों तक पहुंचाया जाता है। इनमें खासतौर पर नवजात शिशु और गर्भवती महिलाएं शामिल हैं जिन्हें हर साल कई बीमारियों से बचाव के लिए वैक्सीन की करीब 39 करोड़ मुफ्त खुराकें मिलती हैं।

भारत के पास इन वैक्सीन को संग्रहित करने और उन पर नजऱ रखने का एक बेहतरीन इलैक्ट्रॉनिक सिस्टम भी है।

ऑक्सफर्ड की बनाई कोरोना वैक्सीन जिसका एस्ट्राज़ेनिका बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली है। इन सबके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि पहली बार लाखों वयस्कों सहित अरबों लोगों तक कोरोना की वैक्सीन पहुंचाना सरकार के सामने एक असाधारण चुनौती होगी।

भारत में विकसित की जा रहीं 30 वैक्सीन में से पांच का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इनमें से एक है ऑक्सफर्ड़ और एस्ट्राजेनिका की वैक्सीन जिस पर फिलहाल भारत के सीरम इंस्टीट्यूट में ट्रायल चल रहा है। भारत बायोटेक एक स्वदेशी कोरोना वैक्सीन विकसित कर रही है।

भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सचिव डॉक्टर रेणु स्वरूप बताती हैं, ‘एक स्वदेशी वैक्सीन का होना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।’ वहीं माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉक्टर गगनदीप कांग कहती हैं, ‘कई वैक्सीन में से एक को चुनना और फिर उसे चुने गए समूहों तक पहुंचाना, ये सब बड़ी चुनौतियां हैं।’

गगनदीप कांग रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन की फेलो चुनी जाने वालीं पहली भारतीय महिला हैं। वह कहती हैं, ‘हम इस काम की जटिलता को समझते हैं। भारत की आधी आबादी का टीकाकरण करने में ही कुछ साल लग जाएंगे।’

ऐसे में ये समझने की कोशिश करते हैं कि टीकाकरण के बेहतरीन अनुभव के बावजूद भारत सरकार के सामने कोविड-19 की वैक्सीन लोगों तक पहुंचाने में क्या चुनौतियां हैं।

वैक्सीन की आपूर्ति और संग्रहण

वैक्सीन प्रभावी रहे इसके लिए जरूरी है कि उसे उचित तापमान पर स्टोर किया जाए। भारत में 27,000 कोल्ड स्टोर्स हैं जहां से संग्रहित की गईं वैक्सीन को 80 लाख स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। लेकिन, क्या ये पर्याप्त होगा?

देश में जितनी संख्या में वैक्सीन की जरूरत होगी, उतनी ही संख्या में अपने आप नष्ट हो वाली सीरिंज (इंजेक्शन) की भी ज़रूरत होगी ताकि उनके दोबारा इस्तेमाल और किसी तरह के संभावित संक्रमण को रोका जा सके।

दुनिया के सबसे बड़े सीरिंज निर्माता का कहना है कि वो वैक्सीन की मांग को पूरा करने के लिए अगले साल तक एक अरब सीरिंज बनाएगा। इसके अलावा कांच की उन शीशियों की आपूर्ति को लेकर भी सवाल हैं जिनमें वैक्सीन की खुराक रखी जाएगी।

वहीं, उस मेडिकल कचरे के निपटारे को लेकर क्या किया जाएगा जो इस टीकाकरण अभियान से बड़े स्तर पर निकलेगा?

इन सबके अलावा भारत में आम तौर पर होने वाले टीकाकरण कार्यक्रम को पूरा करने के लिए कऱीब 40 लाख डॉक्टर और नर्सों की ज़रूरत होती है। लेकिन, कोविड-19 के टीकाकरण के लिए और ज़्यादा लोगों की जरूरत पड़ेगी।

देश की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोकॉन की संस्थापक किरन मजूमदार शॉ कहती हैं, ‘मुझे चिंता है कि ग्रामीण भारत तक इन संसाधनों का विस्तार हम कैसे करेंगे।’

किसे पहले मिलेगी वैक्सीन

सरकार के लिए ये फैसला लेना भी चुनौतीपूर्ण होगा कि सबसे पहले किसे वैक्सीन दी जाए।

स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना है कि निजी और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों और अन्य विभागों के फ्रंटलाइन वर्कर्स को पहले वैक्सीन दी जाएगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना आसान नहीं होगा।

एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया कहते हैं, ‘हमारे पास वैक्सीन की पर्याप्त आपूर्ति कभी नहीं होगी। ऐसे में किसे पहले वैक्सीन दी जाए ये तय करना अपने आप में बड़ी चुनौती बनने वाला है।’

एक और बात का ध्यान रखा जाना ज़रूरी है। भारत एक ऐसा देश है जहां बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी निजी क्षेत्र से जुड़े हैं। तो क्या एक निजी क्षेत्र के स्वास्थ्यकर्मी को सरकारी स्वास्थ्यकर्मी के मुकाबले प्राथमिकता दी जाएगी? क्या स्थानीय कर्मियों को अनुबंध पर काम करने वालों के मुकाबले प्राथमिकता दी जाएगी?

अगर पहले से दूसरी बीमारियों से जूझ रहे बुज़ुर्गों को पहले वैक्सीन दी जाएगी तो उसमें अलग-अलग बीमारियों के हिसाब से किन्हें प्राथमिकता मिलेगी?

जैसे भारत में सात करोड़ लोगों को डायबिटीज है, ये आंकड़ा पूरी दुनिया में दूसरे नंबर है। तो क्या इन सभी लोगों को पहले वैक्सीन दी जाएगी।

वहीं सभी 30 राज्यों में कोरोना की वैक्सीन पहुंचाना संभव नहीं है। तो क्या उन राज्यों में वैक्सीन पहले दी जाएगी जहां कोरोना वायरस के ज़्यादा मामले हैं?

लाखों खुराकों की निगरानी

वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट में स्वास्थ्य देखभाल आपूर्ति श्रृंखला का अध्ययन करने वाले डॉक्टर प्रशांत यादव के मुताबिक वैक्सीन के अच्छे पोर्टफोलियो वाले वैक्सीन निर्माताओं से विनिर्माण अनुबंध करने से भारत को लोगों तक जल्दी पर्याप्त वैक्सीन पहुंचाने में मदद मिलनी चाहिए।

लेकिन वो कहते हैं कि नियमित टीकाकरण में सफलता मिलना कोविड-19 वैक्सीन के मामले में सफलता की गारंटी नहीं देता।

डॉक्टर प्रशांत यादव का कहना है, ‘नियमित टीकाकरण में सरकार के पास पहले से बनी हुई व्यवस्था है लेकिन ये ज्यादातर सरकारी क्लीनिक्स के लिए है। फिलहाल वयस्कों के लिए बड़े स्तर पर कोई टीकाकरण कार्यक्रम नहीं है और वयस्क सरकारी स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में नियमित तौर पर नहीं जाते।’

किरण मजूमदार शॉ और इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि सुझाव देते हैं कि भारत को वैक्सीन की हर खुराक का रिकॉर्ड रखने और निगरानी के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल करना चाहिए।

नंदन नीलेकणि ने एक अख़बार से कहा, ‘हमें एक ऐसी प्रणाली बनाने की ज़रूरत है जिससे देशभर में एक दिन में एक करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा सके लेकिन ये सब एक डिजिटल आधार द्वारा एकीकृत हो।’

धोखाधड़ी की आशंका

इस बात को लेकर भी चिंता जताई जा रही है कि वैक्सीन पहुंचाने में भ्रष्टाचार भी हो सकता है।

प्रशासन उन लोगों की पहचान कैसे करेगा जो नकली दस्तावेजों के आधार पर उन लोगों में शामिल होने की कोशिश करेंगे जिन्हें शुरुआती टीकाकरण के लिए चुनाव गया है। वहीं, दूर-दराज के बाजारों में बेची जा रही नकली वैक्सीन को कैसे रोका जाएगा?

दुष्प्रभावों की निगरानी

कुछ लोगों में वैक्सीन के दुष्प्रभाव भी सामने आ सकते हैं। भारत के पास टीकाकरण के दौरान सामने आने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जांच करने के लिए 34 साल पुराना निगरानी कार्यक्रम है।

लेकिन, शोधकर्ताओं ने पाया है कि दुष्प्रभावों के बारे में बताने के लिए मानक अभी भी कमजोर हैं और गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की संख्या अभी भी अपेक्षित संख्या से कम है।

वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों की पारदर्शी रूप से रिपोर्ट करने में विफलता के कारण इसे लेकर डर पैदा हो सकता है।

किसे देने होंगे पैसे

ये संभवत: एक बड़ा सवाल है। क्या सरकार वैक्सीन की सभी खुराकें लेकर उसे निशुल्क या सब्सिडी के साथ टीकाकरण अभियान में लोगों को देगी? या फिर टीके को निजी वितरण और बिक्री के माध्यम से बाज़ार की क़ीमत पर दिया जाएगा?

डॉक्टर लहरिया जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को हर भारतीय को टीका लगाने के लिए भुगतान करने को तब तक तैयार रहना चाहिए जब तक कि महामारी ख़त्म न हो जाए।

डॉक्टर किरण मजूमदार शॉ का कहना है कि निजी कंपनियां अपने कर्मचारियों को टीका लगाने के लिए खुद भुगतान कर सकती हैं।

नंदन नीलेकणि कहते हैं कि शुरुआत में वैक्सीन की कीमत 3 से 5 डॉलर (लगभग 220 से 369 रुपये) होती है तो हर भारतीय के लिए इसकी दो खुराक की कीमत 10 डॉलर (करीब 739 रुपये) और भारत के लिए 13 अरब डॉलर (लगभग नौ खरब रुपये से ज़्यादा) हो सकती है। ये बहुत मंहगा होगा।

इसलिए डॉक्टर गगनदीप कांग कहती हैं कि भारत के लिए एक अच्छी वैक्सीन की लागत 50 सेंट (कऱीब 2।25 रुपये) प्रति खुराक से कम होनी चाहिए। ये भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो और इसकी एक खुराक की जरूरत हो। (bbc.com)


01-Dec-2020 6:23 PM 29

-प्रकाश दुबे

सोनिया गांधी ने पहला चुनाव कर्नाटक के बेल्लारी से जीता था। बेल्लारी का नाम बलारी हो चुका है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने लोहे से सोना बनाने वाले रेड्डी बंधुओं के कारण चर्चित बलारी जिले को तोड़ कर दो भागों में बांट दिया। रेड्डी बंधुओं की धौंस के कारण मुख्यमंत्री को कई बार झुकना पड़ा था। लोहे को सोने में बदलने वाले एक दूसरे कीमियाकार आनंद सिंह ने काम आसान किया। दलबदल किया। मंत्री बने। खनन घोटाले में सुर्खियों में रहे आनंद सिंह हास्पेट विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। नए जिले का नाम विजयनगर होगा और जिला मुख्यालय हास्पेट। विजयनगर के ऐतिहासिक गौरव से पार्टी का लाभ होगा और रेड्डी भाइयों को ठिकाने लगाने से मुख्यमंत्री का। गुजरात में प्रधानमंत्री की जाति को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया। मुख्यमंत्री उसी तरह स्वजातीय लिंगायतों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कराना चाहते हैं। शुक्रवार को मंत्रिमंडल की बैठक में कुछ मंत्रियों ने ही विरोध कर इरादे पर पानी फेर दिया।

बेटी बचाओ के युग में

बिहार के लोगों को इतिहास में नाम दर्ज कराने का, लगता है, वरदान प्राप्त है। नई सरकार बनने के बाद विधानसभा में बहस का स्तर बच्चे पैदा करने की पूछताछ तक पहुंच गया। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी ने मुख्यमंत्री से सवाल किया-बेटी पैदा होने के डर से आपने दूसरी संतान पैदा नहीं की? मुख्यमंत्री को ठिठोली भारी पड़ी। कहा था-बेटे की चाहत में लालू प्रसाद लड़कियों के बाद लड़कियां पैदा करते रहे। तमतमाए तेजस्वी ने कहा-हम दो भाइयों के बाद बहन का जन्म हुआ। इस मामले में वैसे तेजस्वी कुछ कर भी नहीं सकते थे। योजना और कार्यक्रम तो मां-बाप बनाते हैं। प्रचार के दौरान तेजस्वी पर हमले करते हुए कई नेताओं ने लालू प्रसाद के कार्यकाल का मखौल उड़ाकर कहा-विकास के नाम पर लालू जी बच्चे पैदा करते रहे। नीतीश कुमार जैसे संयमी तू तड़ाक पर उतरे। इसका कारण था। तेजस्वी ने फब्ती कसी थी-कहते हो, पिछले बार तुम्हारे चेहरे के भरोसे हम लोग चुनकर आए थे। अपने चेहरे के बावजूद आप तीसरे क्रम पर फिसल गए और हमारी पार्टी अव्वल नंबर है। इसे कहते हैं दलदलद का न्याय।

अमानत में अचानक सेंध 

महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश के उन्नाव की पूर्व सांसद अनु टंडन ने कांग्रेस पार्टी से नाता तोड़ लिया।  अनु टंडन के पति रिलायंस समूह में काम करते थे। बेटे काम करते हैं। चर्चा है कि अनु को स्वरोजगार के लिए मुकेश अम्बानी ने आठ हजार करोड़ रुपए दिए थे। ताज़ा झटका रायबरेली की विधायक अदिति सिंह ने दिया। उत्तर प्रदेश सरकार के आर्थिक अपराध विभाग को लिखा कि कमला नेहरू एजुकेशन सोसायटी के घोटालों की जांच करो। रायबरेली की लोकसभा सदस्य सोनिया गांधी हैं।। अदिति के पिता अखिलेश सिंह नेहरू-गांधी परिवार के कृपापात्र रहे। पांच बार विधायक रहे। अदिति ने पिछले बरस ही पंजाब के कांग्रेस विधायक अंगद सिंह से विवाह किया। सोनिया गांधी किसी नतीजे पर पहुंचतीं, उससे पहले परिवार और पार्टी के आर्थिक व्यवहार संभालने वाले आपदा प्रबंधक अहमद पटेल का निधन हो गया। नुकसान एक पार्टी, परिवार और व्यक्ति का है। आयु, आक्रमण और तौर तरीकों में कोई समानता नहीं। सिवा इसके, कि अनु टंडन और अदिति दोनों ने 15 दिन पहले एक ही दिन जन्मदिन मनाया। अ नाम के नेताओं की बगावत का अमित रहस्य आसानी से समझ में नहीं आएगा। उ प्र के मुख्यमंत्री योगी है। नाम भी आदित्य है। उनकी योग साधना के बाद ही सच उजागर हो सकता है।

एक पिता एकस के हम बारिक

ईश्वर से मेल कराने का दावा सभी धर्म और पंथ प्रचारक करते हैं। इंसान की बराबरी और भाईचारे की बात करते करते आपस में सिर फुटव्वल करने से बाज नहीं आते। ऐसे माहौल में बीवी जागीर कौर तीसरी बार शिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक कमेटी की अध्यक्ष चुनी गईं। सिख पंथ की बुनियाद समता पर आधारित है। दुनिया का यह एकमात्र पंथ है जिसमें नाम के आधार पर विषमता नहीं फैलती। जागीर के साथ सिंह जुड़ा तो पुरुष और कौर जुड़ा तो महिला। गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है-एक पिता एकस के हम बारिक (संतान)। बीवी जागीर कौर का पंथ और अकाली राजनीति का लम्बा अनुभव है। दुख-सुख झेले। पंजाब में मंत्री रहीं। बेटी की हत्या के आरोप में जेल में भी रहीं। 2019 में बरी होते ही बीवी जागीर पूरे साल गुरु नानक देव के 550 वें जयंती वर्ष-प्रकाश पर्व आयोजन में जुटी रहीं शिखर पद पर बीवी जागीर कौर के तीसरी बार पहुंचने से समता का नया कीर्तिमान बना। शिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक समिति देश के अनेक हिस्सों में बने गुरुद्धारों की देखभाल और सेवा पर निगरानी रखती है।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


01-Dec-2020 6:21 PM 28

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पिछले एक हफ्ते में हमारे विदेश मंत्रालय ने काफी सक्रियता दिखाई है। विदेश मंत्री जयशंकर, सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल और विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला एक के बाद एक हमारे पड़ौसी देशों की यात्रा कर रहे हैं। ये यात्राएं इसलिए भी जरुरी थीं कि एक तो अमेरिका में सरकार बदल रही है, दूसरा पड़ौसी देशों में इधर चीन असाधारण सक्रियता दिखा रहा है और तीसरा, नेपाल, श्रीलंका और सेशल्स जैसे देशों में ऐसे नेताओं ने सरकार बना ली हैं, जो भारत के प्रति आवश्यक मैत्रीपूर्ण रवैए के लिए नहीं जाने जाते।

पिछले कुछ वर्षों से चीन ने भारत के पड़ौसी देशों को उसी तरह अपने घेरे में ले लेने की कोशिश की है, जैसा कि उसने पाकिस्तान के साथ किया है। यह ठीक है कि अन्य सभी पड़ौसी देशों का भारत के प्रति वैसा शत्रुतापूर्ण रवैया नहीं है, जैसा कि पाकिस्तान का है लेकिन ये सभी छोटे-छोटे देश भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाने से बाज़ नहीं आते।चीन की रेशम महापथ की योजना को किस देश ने स्वीकार नहीं किया है ? चीन उन्हें मोटे-मोटे कर्ज दे रहा है। उनकी सडक़ें, हवाई पट्टियां और बंदरगाह बनाने की चूसनियां लटका रहा है। उनके साथ फौजी सहकार के समझौते भी कर रहा है। चीन के राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और बड़े नेता, जो इन देशों के नाम से कभी वाकिफ नहीं होते थे, वे अब उनकी परिक्रमा करने से नहीं चूकते।

चीन को टक्कर देने के इरादे से ही अब अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपिओ श्रीलंका और मालदीव-जैसे छोटे-छोटे देशों की यात्रा करने में भी संकोच नहीं करते। उन्होंने अभी-अभी सउदी अरब जाकर इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी भेंट की और इस्राइल से संयुक्त अरब अमारात आदि के कूटनीतिक संबंध भी जुड़वाए। यदि भारत उन्हीं के चरण-चिन्हों पर चलकर अपने प्रतिनिधियों को इन्हीं देशों में भेज रहा है तो भारत को अपने कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे।भारत किसी भी राष्ट्र का पिछलग्गू नहीं बन सकता। चीन और अमेरिका आपस में लड़ रहे हैं तो जरुर लड़ें लेकिन उसमें भारत को उसका मोहरा कदापि नहीं बनना चाहिए। चीन से द्विपक्षीय स्तर पर कैसे निपटें, यह भारत अच्छी तरह जानता है। यदि ट्रंप-प्रशासन ईरान को अपना शिकार बनाना चाहता है और अफगानिस्तान में अपनी जगह भारत को उलझाना चाहता है तो भारतीय विदेश मंत्रालय को बाइडन-प्रशासन के आने का इंतजार करना चाहिए। उसे ट्रंप के इशारे पर थिरकने की जरुरत नहीं है।

 (नया इंडिया की अनुमति से)


30-Nov-2020 6:58 PM 45

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

ईरान के परमाणु-वैज्ञानिक मोहसिन फख्रीजाद की हत्या एक ऐसी घटना है, जो ईरान-इस्राइल संबंधों में तो भयंकर तनाव पैदा करेगी ही, यह बाइडन-प्रशासन के रवैए को भी प्रभावित कर सकती है। फख्रीजाद ईरान के परमाणु-बम कार्यक्रम के अग्रगण्य वैज्ञानिक थे। उनका नाम लेकर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें काफी खतरनाक आदमी बताया था। ईरानी सरकार का दावा है कि तेहरान के पास आबसर्द नाम के गांव में इस वैज्ञानिक की हत्या इस्राइली जासूसों ने की है। इसके पहले इसी साल जनवरी में बगदाद में ईरान के लोकप्रिय जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या अमेरिकी फौजियों ने कर दी थी।

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनई ने कहा है कि ईरान इस हत्या का बदला लेकर रहेगा। यों भी पिछले 10 साल में ईरान के छह वैज्ञानिकों की हत्या हुई है। उसमें इस्राइल का हाथ बताया गया था। हत्या की इस ताजा वारदात में अमेरिका का भी हाथ बताया जा रहा है, क्योंकि ट्रंप के विदेश मंत्री माइक पोंपिओ पिछले हफ्ते ही इस्राइल गए थे और वहां उन्होंने सउदी सुल्तान और नेतन्याहू के साथ भेंट की थी।

ईरानी सरकार को शंका है कि ट्रंप-प्रशासन अगली 20 जनवरी को सत्ता छोडऩे के पहले कुछ ऐसी तिकड़म कर देना चाहता है, जिसके कारण बाइडेन-प्रशासन चाहते हुए भी ईरान के साथ तोड़े गए परमाणु समझौते को पुनर्जीवित न कर सके। ओबामा-प्रशासन और यूरोपीय देशों ने ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया था, उसे ट्रंप ने भंग कर दिया था और ईरान पर से हटे प्रतिबंध को दुबारा थोप दिया था। अब ईरान गुस्से में आकर यदि अमेरिका के किसी बड़े शहर में कोई जबर्दस्त हिंसा करवा देता है तो बाइडन-प्रशासन को ईरान से दूरी बनाए रखना उसकी मजबूरी होगी। यह दुविधा ईरानी नेता अच्छी तरह समझ रहे होंगे।

यह तो गनीमत है कि ट्रंप ने अपनी घोषणा के मुताबिक अभी तक ईरान पर बम नहीं बरसाए हैं। अपनी हार के बावजूद हीरो बनने के फेर में यदि ट्रंप ईरान पर जाते-जाते हमला बोल दें तो कोई आश्चर्य नहीं है। वैसे भी उन्होंने पश्चिम एशिया के ईरान-विरोधी राष्ट्रों— इस्राइल, सउदी अरब, जोर्डन, यूएई और बहरीन आदि को एक जाजम पर बिठाने में सफलता अर्जित की है। बाइडन-प्रशासन की दुविधा यह है कि वह इस इस्राइली हमले की खुली भर्त्सना नहीं कर सकता लेकिन वह किसी को भी दोष दिए बिना इस हत्या की निंदा तो कर ही सकता है। ईरान और बाइडन-प्रशासन को इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रखना होगा।

 (नया इंडिया की अनुमति से)


30-Nov-2020 6:57 PM 43

-गिरीश मालवीय

देखिए! क्या विडंबना है कि देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अडानी इंटरप्राइजेज को ऑस्ट्रेलिया की करमाइल खान प्रोजेक्ट के लिए 1 बिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 5450 करोड़ रुपए) की रकम लोन देने जा रहा है। ये खबर हमें तब पता लगती है जब ऑस्ट्रेलिया के सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रही वनडे सीरीज का पहले मैच में एक शख्स हाथ ऊपर उठाकर एक पोस्टर लेकर बीच पिच पर पहुंच जाता है जिस पर लिखा होता है- ‘भारतीय स्टेट बैंक हृह्र $१ड्ढठ्ठ ्रस्रड्डठ्ठद्ब द्यशड्डठ्ठ’। तब जाकर हमे पता लगता हैं कि एसबीआई अडानी को 1 बिलियन डॉलर का लोन देने जा रहा है।

कल खबर आई है कि फ्रांस के बड़े फंड हाउस आमुंडी ने कहा कि भारतीय स्टेट बैंक यदि ऑस्ट्रेलिया में अडानी के कार्मिकेल कोयला खदान को 5,000 करोड़ रुपए का लोन देगा, तो वह अपने पास मौजूद एसबीआई ग्रीन बांड को बेच देगा। आमुंडी एसबीआई के प्रमुख निवेशकों में से एक है। आमुंडी यूरोप का सबसे बड़ा फंड मैनेजर है और ग्लोबल टॉप 10 में शामिल है।

दरअसल अडानी की यह परियोजना पर्यावरण से जुड़ी हुई है और यह सारे वित्तीय संस्थान ग्रीन फाइनेंसिंग के लिए प्रतिबद्ध है। दुनिया की सभी बड़ी बैंक जैसे सिटी बैंक, डॉयशे बैंक, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड, एचएसबीसी और बार्कलेज ने इस प्रोजेक्ट पर अडाणी ग्रुप को लोन देने से इंकार कर दिया है दो चीनी बैंक भी मना कर चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 में ऑस्ट्रेलिया यात्रा के समय ही एसबीआई ने अडानी समूह को ऑस्ट्रेलिया में कोयला खदानें संचालित करने के लिए एक अरब डॉलर कर्ज देने का समझौता किया था लेकिन तब सिर्फ सहमति पत्र पर दस्तखत हुए थे।

बाद में जब एसबीआई से आरटीआई के माध्यम से पूछा गया कि वह अडानी को लोन देने जा रहा है उसे पहले से कितना कर्ज दिया जा चुका है ? और किस आधार पर कर्ज दिया गया है तो एसबीआई ने जवाब दिया कि उद्योगपति गौतम अडाणी द्वारा प्रवर्तित कंपनियों को दिए गए कर्ज से जुड़े रिकॉर्ड का खुलासा नहीं किया जा सकता है क्योंकि भारतीय स्टेट बैंक ने संबंधित सूचनाओं को अमानत के तौर पर रखा है और इसमें वाणिज्यिक भरोसा जुड़ा है।

2016 में अडानी को दिए गये लोन का मामला राज्यसभा में भी गुंजा था, जनता दल यूनाइटेड के सांसद पवन वर्मा ने गुरुवार को सरकारी बैंकों के औद्योगिक घरानों पर बकाए कर्ज का मुद्दा उठाया। उन्होंने देश के बड़े बकाएदारों के नाम लेते हुए व्यापारिक समूहों पर सीधे तौर पर हमला बोला। उन्होंने अडाणी समूह का विशेष रूप से जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इस व्यापारिक समूह और उसकी कंपनी पर 72 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं।

क्रेडिट सुइस ने 2015 के हाउस ऑफ डेट रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि अडानी समूह बैंकिंग क्षेत्र के 12 प्रतिशत कर्ज लेने वाली 10 कंपनियों में सबसे ज्यादा ‘गंभीर तनाव’ में है. लेकिन जैसे ही मोदी जी सत्ता में आई गौतम अडानी भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक बन गए

अडानी को नरेंद्र मोदी बार बार बचाते आए हैं गुजरात के चीफ मिनिस्टर रहते हुए मोदी ने अडानी को बेहद सस्ती दर मुद्रा पोर्ट की सैंकड़ों किलोमीटर की जमीन आबंटित कर दी थी

 2012 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इसी मुंदड़ा प्रोजेक्ट से पर्यावरण को हुए नुकसान के आरोपों की जांच के लिए सुनीता नारायण की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को हुए व्यापक नुकसान और अवैध तरीके से जमीन लेने जैसी बातों को खुलासा किया ओर इसकी सिफारिश के आधार पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कारण  यूपीए सरकार ने अडानी समूह पर 200 करोड़ का जुर्माना लगाया लेकिन जैसे ही मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने उन्होंने वो जुर्माना निरस्त कर दिया, साफ है कि पर्यावरण के मामले में अडानी का रिकॉर्ड पहले से ही खराब रहा है

कोरोना काल मे अभी सरकारी बैंकों का एनपीए तेजी से बढ़ता जा रहा है और अभी सबसे ज्यादा एनपीए भारतीय स्टेट बैंक के हिस्से ही आ रहा है ऐसे में अडानी को ऐसी विवादित परियोजना के लिए लोन दिया जाना कितना सही है ?


30-Nov-2020 6:56 PM 30

-राकेश दीवान

सत्ता और सरकारों के कर्ज-माफी सरीखे टोटकों को किसानों की नजर से देखें तो लगातार बढती किसान आत्महत्याएं दिखाई देती हैं। जाहिर है, यह किसानों और राज्य व केन्द्र की सरकारों के बीच गहरी संवादहीनता की बानगी है। ऐसी संवादहीनता जिसमें सरकार की क्रूर मनमर्जी के बावजूद एक तरफ किसान उत्पादन में आज भी झंडे गाड रहा है, कृषि लागत को लगातार कम कर रहा है और दूसरी तरफ, बेरुखी से सरकार उसे अनसुना कर रही है। देश की आजादी के सवा सात दशकों बाद, आज पहली बार किसान अपने बुनियादी सवालों को लेकर खडा हुआ है। ऐसे में सत्ता  और समाज को ध्यान देकर उसकी बात सुननी चाहिए। ऐसा न हो कि हाथ आया यह मौका भी छूट जाए।

केन्द्रीय अनाज भंडारों में 80-85 फीसदी योगदान करने वाले पंजाब और हरियाणा के किसान इन दिनों देश की राजधानी में आने और अपनी असहमति का प्रदर्शन करने को बेचैन हैं और केन्द्र सरकार के आधीन हिलती-डुलती दिल्ली-पुलिस ने उन्हें चारों तरफ की सीमाओं पर रोकने के पुख्ता इंतजाम कर दिए हैं। कोविड-19 महामारी के संकट काल में केन्द्र सरकार द्वारा संसद के पिछले सत्र में पारित करवाए गए कृषि संबंधी तीन कानूनों ने देशभर के किसानों को हलाकान कर दिया है। कृषि-लागत की कीमतों को अनियंत्रित रखने और कृषि-उत्पादनों पर कम-से-कम ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) को बंधनकारी बनाने के बुनियादी मुद्दों को ठेंगे पर मारते हुए बनाए गए तीनों कानून हैं – ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून-2020,’ ‘कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन-कृषि सेवा पर करार कानून-2020’ और ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम – 2020।’ पंजाब, हरियाणा हरित-क्रांति के प्रमुख राज्य रहे हैं और उनका अनुभव बताता है कि तीनों ताजा कानून किसानी की रीढ तोडकर रख देंगे। सवाल है कि किसानों के मौजूदा देशव्यापी आंदोलन और कृषि कानूनों को मनवाने की जिद पर अडी केन्द्र  सरकार की अपनी-अपनी क्या वजहें हैं?

किसानों की बात करें तो कृषि-नीति विश्लेषक देवेन्दर शर्मा का कहना है कि पिछले 40 सालों की मंहगाई के पैमाने पर देखा जाए तो किसानों की आय में कोई बदलाव नहीं हुआ है। जहां गेहूं की कीमतें करीब 19 गुना बढी हैं, वहीं कर्मचारियों के वेतन में 120 से 150 गुना तक की वृद्धि हुई है। शर्मा के मुताबिक इसकी भरपाई करने के लिए दी जाने वाली किसानों की कर्ज माफी से कई गुना राशि उद्योगों की टैक्स-माफी में बिना किसी हीले-हवाले के हर साल खारिज कर दी जाती है। इसके अलावा उद्योगों को दिए कर्जों को जीम जाने से ‘नॉन पर्फार्मिंग असेट’ (एनपीए)  की अप्रत्याशित बढौतरी होती रहती है। दिल्ली की एक संस्था ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डॅवलपिंग सोसाइटीस’ (सीएसडीएस) के मुताबिक किसान की कर्ज-माफी असल में सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सीडी का एक तरीका भर है, लेकिन क्या इससे किसानों की दशा में कोई सुधार होता है? ‘नाबार्ड’ के सर्वे से पता चलता है कि बीते सालों में, तरह-तरह की ‘विज्ञापनी राहतों’ के बावजूद किसानों की आय कुल जमा 2505 रुपए मासिक भर बढी है। वर्ष 2016-17 में किसान परिवारों की मासिक औसत आय 8931 रुपए हुई, जबकि वर्ष 2012-13 में यह 6426 रुपए मासिक थी। नतीजे में गांवों में रहने वाले 41 फीसदी परिवार कर्जे में दबे हैं और इनमें से 43 फीसदी शुद्ध खेती की आय पर निर्भर हैं।

मौजूदा सरकार किसानों की इसी आय को सन् 2022 तक दुगनी करने के वायदे कर रही है। अव्वल तो पांच सदस्यों के किसान परिवार की करीब नौ हजार रुपए की मासिक आय दुगनी होकर 18 हजार हो भी जाए तो इस मंहगाई में क्या तीर मार लेगी? दूसरे, किसानों की आय दुगनी करने के लिए खेती की मौजूदा तीन फीसदी की विकास-दर को बढाकर 10.4 फीसदी सालाना करना होगी, जो वर्तमान राजनीतिक, आर्थि?क हालातों में असंभव दिखाई देती है। तीन फीसदी की मौजूदा विकास दर के हिसाब से खेती की आय को दुगना करने में करीब 25 लंबे सालों का इंतजार करना होगा। यदि इस कमी की भरपाई कर्जों की मार्फत की जाए तो क्या होगा? 

‘नीति आयोग’ के ‘नए भारत के लिए रणनीति’ दस्तावेज में कृषि मामलों के विशेषज्ञ रमेशचंद के मुताबिक गरीब राज्यों में कर्ज माफी का फायदा दस से 15 फीसदी किसानों को ही मिलता है। एक और आंकडे के अनुसार बेंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का फीसद करीब आधा यानि 46.2 है। इसके अलावा 19.8 फीसदी किसान स्वयं-सहायता समूहों, 16.9 फीसदी किसान सूदखोर महाजनों, 22.7 फीसदी किसान परिचितों-रिश्तेदारों और 8.8 फीसदी किसान अन्य स्रोतों से कर्ज हासिल करते हैं। माफी लायक कर्जा राज्यों के सहकारी और राष्ट्रीयकृत बेंकों से मिला होता है जिसे सरकारों की ‘मेहरबानी’ से माफ भी किया जा सकता है, लेकिन शेष बचे आधे कर्जों को कैसे पटाया जाए? इससे भी बडा सवाल है कि किसानों को कर्ज की जरूरत ही क्यों  हो? ‘नीति आयोग’ के रमेशचंद ही एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि कर्ज माफी की मांग इसीलिए उठती है क्योंकि किसानों की आमदनी ‘अपर्याप्त’ है। सवाल है कि आखिर किसानों की आमदनी क्यों पर्याप्त? नहीं है?

इस सवाल का जबाव ‘नीति आयोग’ के उक्त पोथे में ही देखा जा सकता है। इसमें किसानों की आमदनी बढाने के लिए ‘न्यूनतम रिजर्व प्राइस’ तय करके फसलों की नीलामी करने और ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ निर्धारित करने वाले ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ को खत्म करके ‘कृषि ट्रिब्यूनल’ गठित करने की तजबीज पेश की गई है। अलबत्ता, इस दस्तावेज में कहीं किसान के मुताबिक उसके उत्पादन की वाजिब कीमत तय करने, खेती में लगने वाली खाद, दवाओं, यंत्रों जैसे आदानों की कीमत पर नियंत्रण रखने और बाजार की बजाए भूख से निपटने की किसी तजबीज का कोई जिक्र नहीं किया गया है। कथित कृषि विकास की खातिर हाल में बने तीन कानूनों की पूर्व-पीठिका की तरह नीति आयोग का यह दस्तावेज कर्जों पर जोर देता है। जाहिर है, जिस किसान को कर्ज कुंभीपाक नरक की तरह दिखता था, उसकी समूची खेती कर्जों के बल पर ही सरसब्ज करने की जुगत बिठाई जा रही है।    

अहर्निश ‘चुनाव मोड’ में रहने वाले राजनेताओं को ‘एमएस स्वामीनाथन आयोग’ की सिफारिशों के मुताबिक कृषि उत्पादों की लागत से डेढ-गुनी कीमतें दिलवाने जैसे ज्यादा समय लेने वाले अपेक्षाकृत सस्ते, कारगर उपायों की बजाए कर्ज वितरण और फिर कर्ज-माफी अधि?क ‘गारंटीड’ तजबीज लगती है और इससे सत्ता भी हासिल हो जाती है। ‘ 

सीएसडीएस’ के अध्ययन के मुताबिक राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, तेलंगाना, उत्तरप्रदेश, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात और अन्य राज्यों में किसानों की कर्ज माफी की घोषणाओं के बदले राजनीतिक दलों को सत्ता हासिल हुई है। गद्दी पर विराजने के दिन मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 34 लाख किसानों का 38 हजार करोड रुपयों का और छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 16 लाख किसानों का 6100 करोड रुपयों का कर्ज माफ कर दिया था। इसके पहले के चुनावों में भाजपा ने महाराष्ट्र में 34000 करोड रुपए, उत्तरप्रदेश में 36000 करोड रुपए और कांग्रेस ने पंजाब में दस हजार करोड रुपए तथा कर्नाटक में आठ हजार करोड रुपयों के कर्ज माफ करने का वायदा किया था। थोडा और खंगालें तो पिछले कुछ सालों में कर्ज माफी के ऐसे अनेक उदाहरण उजागर किए जा सकते हैं, लेकिन सवाल है -- कर्ज माफी से किसानों पर क्या और कितना प्रभाव पडा है?

सत्ता और सरकारों के कर्ज-माफी सरीखे टोटकों को किसानों की नजर से देखें तो लगातार बढती किसान आत्महत्याएं दिखाई देती हैं। जाहिर है, यह किसानों और राज्य व केन्द्र की सरकारों के बीच गहरी संवादहीनता की बानगी है। ऐसी संवादहीनता जिसमें सरकार की क्रूर मनमर्जी के बावजूद एक तरफ किसान उत्पादन में आज भी झंडे गाड रहा है, कृषि लागत को लगातार कम कर रहा है और दूसरी तरफ, बेरुखी से सरकार उसे अनसुना कर रही है। देश की आजादी के सवा सात दशकों बाद, आज पहली बार किसान अपने बुनियादी सवालों को लेकर खडा हुआ है। ऐसे में सत्ता  और समाज को ध्यान देकर उसकी बात सुननी चाहिए। ऐसा न हो कि हाथ आया यह मौका भी छूट जाए।


30-Nov-2020 1:30 PM 35

-चैतन्य नागर 

कोविड-19 संक्रमण के इस मुसीबत भरे, अनिश्चित समय में लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि दुर्भाग्य से जो इसकी चपेट में आ जाएँ, तो किस अस्पताल में, किस डॉक्टर में पास जाएँ और कैसे उनका इलाज होगा। इसी अफरातफरी के बीच आयुर्वेद और एलोपैथी की सर्जरी की पद्धतियों को लेकर उठा विवाद अनावश्यक और ध्यान भटकाने वाला है। पर विवाद पुराना है और कई आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से जुड़ा हुआ है, इसलिए एक बार इसकी गंभीर पड़ताल जरुरी भी है।   

सरकार ने करीब एक हफ्ते पहले एक अधिसूचना जारी की है जिसके तहत आयुर्वेद की कुछ शाखाओं के स्नातोकोत्तर छात्रों को सुदम्य ट्यूमर, गैंगरीन को हटाने, मोतियाबिंद, कान, नाक, गले संबंधी कुछ ऑपरेशन करने की अनुमति दी जाएगी। इस फैसले के पीछे एक सक्रिय आयुर्वेदिक लॉबी भी है। अक्सर एमबीबीएस करने की कोशिश में विफल छात्र बीएएमएस करके आयुर्वेदिक डॉक्टर बन जाते हैं। एम बी बी एस की तुलना में उनकी प्रतिष्ठा और आय भी काफी कम होती है। आयुर्वेद के प्राइवेट कॉलेज के मालिक अक्सर बड़े नेता और धनी लोग होते हैं। आयुर्वेद और खासकर इसकी सर्जरी को लोकप्रिय बनाने से उन्हें सीधा फायदा यह होगा। शल्ययन को इसमें शामिल करने से ज्यादा छात्र इन कॉलेजों में भर्ती होने के लिए लालायित होंगे और आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की लोकप्रियता बढ़ेगी। डोनेशन के रूप में भी मोटी रकम आने की संभावनाएं भी बनती है। चिकित्सा की दुनिया में आयुर्वेदिक डॉक्टर एक निरीह, दोयम दर्जे के नागरिक सा है। अक्सर इन आयुर्वेदिक डॉक्टर को बहुत ज्यादा कामयाबी न मिल पाने के कारण एलोपैथी अस्पतालों के आईसीयू में सहायक चिकित्सकों के रूप में नियुक्ति भी दी जाती है, पर वे एमडी या एमएस के मातहत के रूप में ही काम करते हैं।     

आयुर्वेद को अधूरा और अपर्याप्त इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसमें शल्य चिकित्सा विकसित नहीं हुई। ऐसी मशीनें नहीं बनीं जिनकी मदद से अंदरूनी अंगों को देखा-समझा जा सके। एलोपैथी में अल्ट्रा साउंड, एक्स रे, एमआरआई जैसे कई तरीके हैं जिनकी मदद से उसने काफी विकास किया है। आयुर्वेद में संज्ञाहरण या अनेस्थेशिया को लेकर भी कई विवाद हैं क्योंकि आयुर्वेदिक डॉक्टर और एलोपैथी के सर्जन ऑपरेशन के लिए एक ही तरह की संज्ञाहरण दवा का इस्तेमाल करते हैं। बगैर कुशल संज्ञाहरण विशेषज्ञ के कोई भी सर्जरी संभव नहीं। एलोपैथी में इस पर कई शोध हुए हैं, जो आयुर्वेद में नहीं हो सके हैं।   

आयुर्वेद के वैद्य और छात्र आयुर्वेद की तारीफ करते नहीं थकते। ईसा से करीब 600 साल पहले जन्मे सुश्रुत प्राचीन भारत के चिकित्साशास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे जिन्हें आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा का जनक भी कहा जाता है। ऋषि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को लेकर कई प्रयोग किए। ऑपरेशन के उपकरणों को लेकर सुश्रुत ने कटहल, खीरा और कद्दू जैसे फलों और सब्जियों पर प्रयोग किये। मृत पशुओं के अलावा लकड़ी और मोम से बने कृत्रिम मानव अंगों को चीरने-फाडऩे के प्रयोग भी किये। किसी भी शल्य चिकित्सक को मानव देह के बारे में गहरी जानकारी होनी चाहिए और इसके लिए सुश्रुत ने मृत देह पर प्रयोग किये। मृत देह को बहते हुए पानी में करीब दस या पन्द्रह दिन के लिए छोड़ दिया जाता था और इसके बाद उस पर प्रयोग किये जाते थे। सर्जरी के समय कोई इन्फेक्शन न हो इसके लिए उनका सुझाव था कि यह काम इंसानों की बस्ती से दूर किया जाए, वहां वातावरण साफ हो, पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी उपलब्ध रहे। दिलचस्प बात यह है कि भारत में सर्जरी का अच्छा विकास न हो पाने का एक बड़ा कारण है जाति प्रथा। ऑपरेशन की बारीकियां सीखने के लिए मृत देह को छूना जरूरी था और मृत देह को छूना ब्राह्मणों के लिए वर्जित था, जबकि वैद्य और चिकित्सक बनने का काम, स्वास्थ्य दान देने का काम उन्हीं के हिस्से में आता था।      

आज के समय में आयुर्वेद को लेकर मरीज के भरोसे का प्रश्न बहुत बड़ा है। ऐसा कोई मरीज शायद ही मिले जो अपनी मोतियाबिंद जैसी मामूली सर्जरी के लिए भी किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाना पसंद करेगा। पहले मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए अस्पताल में पूरा कुनबा इकठ्ठा हो जाता था। परिवार वाले ऑपरेशन के लिए सर्दी के मौसम की प्रतीक्षा करते थे और प्रार्थना करते थे कि रोगी ईश्वर की कृपा से सकुशल घर लौट आए। अब जब तक रोगी ऑपरेशन टेबल पर लेटता है, उसके नीचे उतरने, और वापस घर जाने का समय हो जाता है। अलबत्ता, आप जरुर इस बात से वाकिफ होंगे कि मोतियाबिंद जैसी मामूली दिखने वाली सर्जरी ह्रदय संबंधी जटिलताओं को भी जन्म दे सकती हैं। कोई भी ऑपरेशन सरल नहीं होता, और इसलिए हर ऑपरेशन के जोखिम को समझाते हुए रोगी के निकट संबंधियों से लिखित अनुमति ले ली जाती है। पित्ताशय में पथरी के लिए अब सिर्फ की-होल सर्जरी की जाती है, न कोई लंबा चीरा लगता है, न ही ढेरों टांकें। यह मामूली ऑपरेशन भी पित्ताशय के संकुचित हो जाने की वजह से बहुत जटिल हो जाता है। यह जानना जरूरी है कि हर सर्जरी एक गंभीर घटना है, भले ही वह बहुत ही साधारण सी दिखती हो। 

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आयुर्वेद में लगातार शोध होते रहे हैं जो शल्य चिकित्सा पर ही केन्द्रित हों। एलॉपथी में आज से डेढ़ सौ साल पहले तक ही बगैर किसी संज्ञाहरण के सर्जरी की जाती थी। आज अनेस्थेशिया एलोपैथी की एक अलग विधा है और किसी भी सर्जरी के दौरान एक संज्ञाहरण विशेषज्ञ की निरंतर उपस्थिति लगातार बनी रहती है, रोगी को बेहोश करने के क्षण से लेकर उसके होश में आने तक। 

इससे पहले कि आयुर्वेदिक वैद्य को सर्जरी जैसी गंभीर विधा में प्रवेश की अनुमति दी जाए, यह आवश्यक है कि इस चिकित्सा पद्धति के बारे में आम लोगों के प्रश्नों और दुविधाओं के समाधान किये जाएँ। जैसे एलोपैथी दवाइयों के साइड इफेक्ट को लेकर लोग चिंतित रहते हैं, वैसे ही आयुर्वेदिक औषधियों के भी साइड इफेक्ट होते हैं। इनमे धातु आयनों के कारण होने वाली विषाक्तता एक बहुत ही सामान्य बात है। सीसा, पारा और आर्सेनिक की विषाक्तता काफी सामान्य है और इनका आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है। आर्सेनिक का उपयोग कैंसर के इलाज में होता है जबकि यह खुद ही त्वचा, फेफड़े और ब्लैडर के कैंसर का कारण बनता है। साथ ही पारे का उपयोग एंटी बायोटिक की तरह किया जाता है जबकि इसकी अपनी खुद की ही विषाक्तता है। स्वर्ण भस्म और अन्य धातुओं की भस्म का उपयोग भी आयुर्वेद में किया जाता है, और अधिक मात्रा में यह देह को नुकसान पहुंचाती हैं। कई औषधियां दूषित मिटटी में ही पैदा होती हैं, मिटटी के हानिकारक रसायन उन जड़ी बूटियों में भी पहुँच जाते हैं, खासकर ऐसे समय में जब इन जड़ी बूटियों का बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन हो रहा हो। इस संबंध में आयुर्वेद में गंभीर काम होना चाहिए।   
      
गौरतलब है कि बीमारी में चिकित्सक का चयन बड़ा ही व्यक्तिगत मामला है जिसका संबंध मरीज के भरोसे, और डॉक्टर के साथ उसके पीढिय़ों के साथ चलते आ रहे रिश्तों के साथ भी है। डॉक्टर किसी पर थोपे नहीं जा सकते। आयुर्वेदिक चिकित्सकों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे मरीजों का भरोसा जीतें, और इसके लिए उन्हें पहले से स्थापित एलोपैथी के डॉक्टर की सामने अपनी कुशलता को साबित करना कोई आसान बात नहीं होगी। और भी कई सवाल होंगे जिनका जवाब आयुर्वेद के विशेषज्ञों और सरकार को भी देना होगा- मसलन, आयुर्वेदिक सर्जन किस तरह के संज्ञाहरण के तरीकों या अनेस्थेशिया का उपयोग करेंगे, वे आयुर्वेदिक होंगे या एलोपैथिक; सर्जरी से पहले और बाद में मरीज की देखभाल के कौन से तरीके अपनाये जायेंगे, ऑपरेशन के बाद दर्द निवारक दवाएं आयुर्वेदिक या एलोपैथिक होंगी; क्या मरीज को एंटी-बायोटिक दी जाएंगी, यदि हाँ, तो आयुर्वेद में सर्जरी के बाद दी जाने वाली कौन सी एंटी-बायोटिक हैं; मरीज को ऑपरेशन की जरुरत है, इस नतीजे तक पहुँचने के लिए आयुर्वेदिक सर्जन जांच के कौन से तरीके अपनायेंगें? पिछले दो दशकों में सभी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में आयुर्वेदिक सर्जन द्वारा किये गये ऑपरेशन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए; आयुर्वेदिक सर्जन को प्रशिक्षण देने वाले क्या एलोपैथिक सर्जन होंगे या आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सक? क्या देश के अमीर लोग और नेता, राजनीतिज्ञ भी आयुर्वेदिक सर्जरी के लिए तैयार होंगे या फिर यह सिर्फ गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए ही होगी? 

एलोपैथी की तकनीक और विज्ञान पर भी पांच-सितारा दवाई कम्पनियों की मजबूत पकड़, शुद्ध वाणिज्यिक तौर-तरीके और अमानवीय मुनाफाखोरी भी लोगों को इसके प्रति प्रश्न उठाने पर बाध्य करती है। आने वाले समय में अलग-अलग चिकित्सकीय तरीकों के संश्लेषण पर जरूर कुछ लोग गंभीरता से काम करेंगे। हर विधा में कुछ है जो अनूठा है, गंभीर शोध का परिणाम है। तिब्बती चिकित्सकीय पद्धति की कई अद्भुत विशेषताएं हैं। एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर की भी अपनी खूबियाँ हैं। प्राकृतिक चिकित्सा का अपना सौन्दर्य है। गांधी जी का दृष्टिकोण इस मामले में बहुत ही वैज्ञानिक था। शुरू से ही वे प्राकृतिक चिकित्सा के हिमायती थे पर गांधीजी को 1919 में पाइल्स के लिए डॉ. दलाल से और 1924 में डॉ. मैडोक से अपेंडिसाइटिस का ऑपरेशन करवाना पड़ा था। 1921 में दिल्ली में एक मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करते हुए उन्होंने आधुनिक एलोपैथी प्रणाली के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया और इस बात पर बहुत खुश हुए कि नए अस्पताल में आयुर्वेद और यूनानी दवाओं के अलावा एलोपैथी का भी इंतजाम है। वे चाहते थे कि चिकित्सा की सभी विधाएं मिलजुल कर समरसता के साथ काम करें।  चिकित्सा का भविष्य शायद सभी तरह की पद्धतियों के संश्लेषण में ही है। एक तरह की चिकित्सकीय मतनिरपेक्षता में, या चिकित्सकीय दृष्टि से सर्वधर्म-समभाव में। 


30-Nov-2020 9:35 AM 27

आज (30 नवंबर 2020) सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक की 551वीं जयंती गुरु परब है. उनका जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था.

नानक ने सिख धर्म में हिन्दू और इस्लाम दोनों की अच्छाइयों को शामिल किया. हालांकि सिख धर्म हिन्दू और इस्लाम का महज संकलन नहीं है.

गुरु नानक एक मौलिक आध्यात्मिक विचारक थे. उन्होंने अपने विचारों को ख़ास कविताई शैली में प्रस्तुत किया. यही शैली सिखों के धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब की भी है.

गुरु नानक के जीवन के बारे में बहुत कुछ लोगों को पता नहीं है.

हालांकि सिख परंपराओं और जन्म सखियों में उनके बारे काफ़ी जानकारियां हैं. गुरु नानक के अहम उपदेश भी हम तक जन्म सखियों के ज़रिए ही पहुंचे हैं.

बालक नानक का जन्म 1469 में लाहौर से 64 किलोमीटर दूर हुआ था.

सिख परंपराओं में यह बताया जाता है कि नानक के जन्म और शुरुआती साल कई मायनों में ख़ास रहे. कहा जाता है कि ईश्वर ने नानक को कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया था.

नानक का जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था, लेकिन उन्होंने जल्द ही इस्लाम और व्यापक रूप से हिन्दू धर्म का अध्ययन शुरू किया.

इसका नतीजा यह हुआ कि नानक में बचपन में ही कवि और दर्शन की अद्भुत क्षमता आ गई.

गुरु नानक के बारे में एक प्रसिद्ध कहानी है कि वो 11 साल की उम्र में ही विद्रोही हो गए थे. इस उम्र में हिन्दू लड़के पवित्र जनेऊ पहनना शुरू करते हैं, लेकिन गुरु नानक ने इसे पहनने से इनकार कर दिया था.

उन्होंने कहा था कि लोगों को जनेऊ पहनने के मुक़ाबले अपने व्यक्तिगत गुणों को बढ़ाना चाहिए.

नानक ने एक विद्रोही आध्यात्मिक लाइन को खींचना जारी रखा. उन्होंने स्थानीय साधुओं और मौलवियों पर सवाल खड़ा करना शुरू किया. वो समान रूप से हिन्दू और मुसलमानों पर सवाल खड़ा कर रहे थे. नानक का ज़ोर आंतरिक बदलाव पर था. उन्हें बाहरी दिखावा बिल्कुल पसंद नहीं था.

गुरु नानक ने कुछ वक़्त के लिए मुंशी के तौर पर भी काम किया था, लेकिन कम उम्र में ही ख़ुद को आध्यात्मिक विषयों के अध्ययन में लगा दिया. नानक आध्यात्मिक अनुभव से काफ़ी प्रभावित थे और वो प्रकृति में ही ईश्वर की तलाश करते थे.

नानक का कहना था कि चिंतन के ज़रिए ही आध्यात्म के पथ पर बढ़ा जा सकता है. उनका मानना था कि अपनी जीवनशैली के ज़रिए ही हर इंसान अपने भीतर ईश्वर को देख सकता है.

1496 में नानक की शादी हुई थी. उनका एक परिवार भी था. नानक ने भारत, तिब्बत और अरब से आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत की और यह यात्रा 30 सालों तक चली. इस दौरान नानक ने काफ़ी अध्ययन किया और पढ़े लिखे लोगों से बहस भी की.

इसी क्रम में नानक ने सिख धर्म की राह को आकार दिया और अच्छे जीवन के लिए आध्यात्म को स्थापित किया.

गुरु नानक ने जीवन के आख़िरी वक़्त पंजाब के करतारपुर में गुज़ारे.

यहीं पर उन्होंने अपने उपदेशों से भारी संख्या में अनुयायियों को आकर्षित किया. गुरु नानक का सबसे अहम संदेश था कि ईश्वर एक है और हर इंसान ईश्वर तक सीधे पहुंच सकता है.

इसके लिए कोई रिवाज़ और पुजारी या मौलवी की ज़रूरत नहीं है.

गुरु नानक ने सबसे क्रांतिकारी सुधार जाति व्यवस्था को ख़त्म कर किया. उन्होंने इस चीज़ को प्रमुखता से स्थापित किया कि हर इंसान एक है, चाहे किसी भी जाति या लिंग का हो. (bbc)


29-Nov-2020 8:04 PM 209

-परिवेश मिश्रा

मेरे वरिष्ठ मित्र और प्रगतिशील किसान बालकराम पटेलजी का आज जन्मदिन है। वे छत्तीसगढ़ की कृषि और सामाजिक पद्धतियों में बदलाव के न केवल गवाह रहे हैं बल्कि इसमें उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका भी रही है।

1947 में उनका जन्म हुआ था। उस वर्ष अंग्रेज़ भारत को बदहाल छोडक़र गये थे। न सरकार के खजाने में पैसा था, न खेतों में अनाज। कृषि और सिंचाई व्यवस्थाएं अपने पैरों पर खड़ी हो ही रही थीं कि इसी बीच दो लगातार सालों की अवर्षा और सूखे ने खाद्यान्न व्यवस्था की कमर तोड़ दी। देश भीषण अकाल और भुखमरी की दहलीज पर पहुंच गया। 1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी को आह्वान करना पड़ा था कि देशवासी सप्ताह में एक समय का भोजन छोड़ दें। सोमवार की शाम भारत के घरों में चूल्हे जलना बंद हो गए थे। उन्हीं दिनों शास्त्रीजी के जय जवान-जय किसान नारे का जादू भी पूरे उफान पर था।

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के बोतल्दा गांव के युवा किसान-पुत्र बालकराम पर इन सब बातों का गहरा असर पड़ा। उसके बाद कृषि और कृषक-सेवा मानों उनके जीवन का ध्येय बन गया।

शास्त्रीजी की मृत्यु (और भारत-पाक युद्ध) के बाद जब इंदिरा गाँधीजी ने सत्ता संभाली तब तक स्थिति पूरी तरह बिगड़ चुकी थी। (युद्ध और मौसम ने पाकिस्तान को भी बेहतर स्थिति में नहीं छोड़ा था)।

प्रधानमंत्री के रूप में इंदिराजी का पहला सबसे महत्वपूर्ण फैसला था भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का। खाद्य मंत्री सी. सुब्रमण्यम, कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन (उसी स्वामीनाथन आयोग वाले जिनकी सिफारिशों को लागू करने की मांग किसान कर रहे हैं) और अमेरिका में भारतीय राजदूत बी. के. नेहरू ने भारतीय इतिहास के इस ऐतिहासिक मोड़ पर श्रीमती इंदिरा गांधी के लिए वही भूमिका अदा की जो 1991 में श्री नरसिंह राव के लिए डॉ. मनमोहन सिंह ने की।

तात्कालिक समाधान के रूप मे 1967 में भारत ने मेक्सिको से एकमुश्त 18000 टन अनाज का आयात किया। लेकिन छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए यह आयात कोई राहत की खबर नहीं थी। लगभग सारा का सारा अनाज गेहूं था और यहां चावल ही खाया जाता था/है। अधिकांश जनसामान्य का गेहूं से परिचय भी नहीं था।

सरकार को छत्तीसगढिय़ों की आदत की जानकारी न हो ऐसा नहीं था। पर उसकी भी मजबूरी थी। विदेशी मुद्रा पर्याप्त नहीं थी और रुपये का भुगतान स्वीकार करने में मैक्सिको का विकल्प नहीं था (अमरीकी पी.एल. 480 नामक कानून के कारण)। मैक्सिको की मजबूरी यह थी कि क्रिस्टोफर कोलम्बस जब वहां पहुंचे तो थे तो गेहूं के बीज लेकर पहुंचे थे, चावल के नहीं। ऊपर से पंद्रहवीं सदी में स्पैनिश शासन के दौरान यह इलाका गेहूं के खेतों से भर दिया गया। 1967 में  मैक्सिको, अमेरिका और कनाडा में स्थिति यह बनी थी कि यदि गेहूं का कोई लेने वाला न मिलता तो कीमत स्थिर रखने के लिए गेहूं को समुद्र में फेंकना पड़ जाता।

नेहरूजी ने पहली पंचवर्षीय योजना में बजट का 31त्न आवंटन कृषि क्षेत्र के लिये किया था (पिछले छह वर्षों में यह 2.3त्न से 5.2त्न के बीच रहा है)। इसका एक नतीजा यह हुआ था कि देश में उन दिनों की सरकारी व्यवस्था में कृषि विभाग का ग्राम सेवक एक बहुत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली कर्मचारी हो गया था। सदियों से खेती के पारम्परिक तौर-तरीकों में रचे बसे किसानों के ‘आधुनिकीकरण’ और कृषि क्षेत्र के विस्तार का पूरा दायित्व ग्राम सेवकों पर आ गया  था।

भारत में कम से कम तीन उदाहरणों की जानकारी मुझे है (आपके पास और हों तो बताएं) जहाँ भारतीयों को एक नये स्वाद/आदत से परिचित कराने के लिए ‘डायरेक्ट मार्केटिंग’ का इस्तेमाल तब किया गया जब ये शब्द प्रचलन में नहीं थे।

घी और तेल के बीच पीढिय़ां गुज़ार चुके भारतीयों के बीच 1937 में हिन्दुस्तान यूनिलीवर कम्पनी के पुरखों ने पहली बार ‘डाल्डा‘ के नाम से वनस्पति को प्रवेश दिलाया था। बम्बई (मुम्बई) में जब यह लॉन्च हुआ तो सडक़ के किनारे कुछ कुछ दूरी पर ‘सेल्स-गर्ल’ के रूप में नियुक्त महिलाओं को स्टोव, कड़ाही और बेसन के साथ बैठाया गया था। उनका काम था डाल्डा में भजिया तलना और आते जाते को रोक कर खिलाना।

इसके पहले चिलम और हुक्के के आदी भारतीयों को जब इम्पीरियल टोबैको कम्पनी (अब आई.टी.सी.) ‘सिगरेट’ नाम की नयी वस्तु से परिचित कराने मैदान में उतरी तो मेला और हाट बाज़ारों में मुफ्त में सिजर्स सिगरेट पिलायी जाती थी।

1967 में सरकार ने कुछ इसी तरह की डायरेक्ट मार्केटिंग का जिम्मा छत्तीसगढ़ के ग्राम सेवकों को दिया था। जगह जगह स्टॉल लगा कर गेहूं की रोटियाँ सेंक कर लोगों को खिलायी गयी थीं। युवा बालकराम ने इन कार्यक्रमों में वॉलेन्टियर के रूप में बढ़-चढक़र हिस्सा लिया। कृषि अधिकारियों को इस युवा के उत्साह और नये को आजमाने और सीखने की ललक ने प्रभावित किया।

उसी समय भारत में ‘हरित क्रांति’ की शुरूआत हुई। 1967 में मेक्सिको में गेहूं की जो बम्पर फसल हुई थी वह अमेरिका की रॉकफैलर फाउंडेशन के द्वारा मेक्सिको में कृषि विकास के लिये 1943 से लगातार किए गए प्रयत्नों का नतीजा थी। इस कार्यक्रम को वहां ‘ग्रीन रिवोल्यूशन’ कहा गया था। गेहूं के साथ साथ वही कार्यक्रम भारत आ गया और हरित क्रांति कहलाया।

हरित क्रांति के साथ ही कृषि विभाग के अमले पर एक दबाव और आ गया - इलाक़े में खेती के लिये ट्रैक्टर और दूसरी मशीनरी के उपयोग को बढ़ावा देने का। छत्तीसगढ़ में नांगर (हल) जोतकर धान उपजाया जाता था और बैल गाड़ी में ढो कर इधर से उधर पहुंचा दिया जाता था। बाकी काम हाथ से। ऊंची मेड़ वाले कटोरीनुमा खेतों में ट्रैक्टर न तो व्यावहारिक था न आवश्यक।

यहाँ कृषि विभाग वालों की नजऱ पड़ी इस उत्साही युवा बालकराम पर। परिवार में डेढ़ सौ एकड़ के सिंचित खेत थे और दिल में इलाके की खेती विकसित करने का जज़्बा। नये नये ग्रेजुएट हुए बालकराम को उन्होंने बुधनी जाने के लिए प्रेरित किया। मध्यप्रदेश में भोपाल और इटारसी के बीच बुधनी में भोपाल के नवाब से दान में प्राप्त एक हजार एकड़ भूमि में हरित क्रांति के दौर का एक बहुत बड़ा और अहम संस्थान स्थापित हुआ था। यहां ट्रैक्टर और दूसरी कृषि मशीनरी की टेस्टिंग और ट्रेनिंग अभी भी होती है। यह भी रॉकफैलर फाउंडेशन के सहयोग से हुआ था और मेक्सिको के अलावा विश्व में इस तरह का यह अकेला संस्थान था।

इस संस्थान ने बालकराम को ट्रैक्टर टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षित किया और लौटकर इन्होने अपने इलाके में पहले तो पचास एकड़ खाली पड़ी भूमि पर खेत बना कर उसमें दो साल गेहूं उगाया और फिर किसानों को ट्रैक्टर खरीदने के लिए प्रेरित किया। सरकार भी पीछे नहीं थी। बैंकों से सस्ती ब्याज दरों में ऋण दिलाने के अलावा  कीमत में भारी सब्सिडी भी दी गयी थी। बालकराम जी ने अपनी ओर से तकनीकी मदद-वह भी नि:शुल्क-की गैरन्टी दी। उन दिनों मध्यप्रदेश में सब्सिडी वाले नये ट्रैक्टर सिर्फ भोपाल में मिलते थे। भोपाल में खरीदी होती और बालकराम जी हज़ार किलोमीटर की दूरी पांच दिनों तक ट्रैक्टर चला कर पूरी करते और नया ट्रैक्टर किसान के दरवाजे पहुंचाने लगे। जिस इलाके ने ट्रैक्टर नहीं देखा था, वहां एक एक करते पचास से अधिक ट्रैक्टर आ गये। फ्री-सर्विस देते दस वर्ष बीत गए। किसानों के सामने बालकरामजी की शर्त बस यह रखी जाती कि जब ट्रैक्टर मरम्मत के लिए भेजें तो एक युवक जो कम से कम मैट्रिक पास हो जरूर साथ भेजें। बालकरामजी ऐसे युवाओं को मैकेनिक बनाकर वापस भेजते। आज नतीजा यह है कि इलाके में ट्रैक्टर रिपेयर के वर्कशॉप नहीं दिखते। हर किसान स्वयं मालिक के साथ साथ मैकेनिक भी है। दस साल तक नि:शुल्क सेवा देने के बाद किसानों का दबाव पड़ा और 1980 में उन्होंने अपना एक वर्कशाप और शो-रूम शुरू किया। आज उनकी डिज़ाईन की गयी और बनायी ट्रॉली खरीदने दूर दूर से किसान आते हैं। उनका शुरू किया गया उपक्रम ‘बोतल्दा ट्रैक्टर्स’ छत्तीसगढ़ राज्य की सबसे बड़ी ट्रैक्टर डीलरशिप है।

बालकराम पटेलजी को लम्बे, स्वस्थ और सफल जीवन की शुभकामनाएं।


29-Nov-2020 8:02 PM 32

-प्रकाश दुबे

इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन चाहते हैं कि वेस्ट मिनिस्टर यानी ब्रिटेन के संसद भवन में आधे आसनों पर महिलाएं विराजमान हों। ईसाई धर्म के कैथोलिक पंथ पर रूढिवादी सोच का दबदबा है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में कैथोलिक पादरी घूम घूम कर रिपब्लिकन पार्टी का प्रचार करते हैं। मतदान के लिए रात रात भर कतार में लगे रहते हैं। चर्च ने गर्भपात को अनैतिक घोषित कर रखा है। रिपब्लिकन पार्टी गर्भपात कानून का विरोध करती है।

भारत के कुछ साधु-संतों की सक्रिय सहभागिता से हल्का सा अंतर है। पादरी चुनाव राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं। इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट पंथ के अनुयायी अधिक हैं। नर नारी समता का विरोध नहीं करते। गिरजाघर और ईसाई धर्म संस्थाओं के बड़े पद पर महिलाओं की नियुक्ति के पक्ष में अभियान जोर पकड़ रहा है। यह बात और है कि गत वर्ष चुनाव में बोरिस की कंजरवेटिव पार्टी ने मात्र 30 प्रतिशत महिलाओं को उम्मीदवारी दी जबकि लेबर पार्टी ने 53 प्रतिशत महिलाओं को मैदान में उतारा।

 इंग्लैंड की संसद दुनिया की संसदों की लकड़दादी है।102 वर्ष पूर्व महिलाओं को संसद चुनाव लडऩे का अधिकार मिला। पहला विरोधाभास-लोकतंत्र में सत्ता की कमान सदियों से राजपरिवार के पास है। कई दशकों से महारानी राज करती है। राजा नहीं। यूरोप विरोधाभासों का महाद्वीप है। कोरोना से बचाव में मास्क लगाने के समर्थन में महिलाओं ने जुलूस निकाला। जुलूस के चित्र और वीडियो करोड़ों लोगों ने बार बार देखे। इतने प्रभावित? कारण जानिए। महिलाओं के मुंह पर पट्?टी या नकाब था। बाकी देह अनावृत्त। जिम्मेदारी भरे ओहदों के लिए महिलाओं की पात्रता को स्वीकृति मिल रही है। अमेरिका में महिला उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुई। इंग्लैंड की गृहमंत्री महिला है। दोनों भारतीय मूल की हैं।

चीन, रूस और भारत की तरह डोनाल्ड ट्रम्प भी अमेरिका के एकमात्र लोकप्रिय नेता बनकर उभरना चाहते थे। मतदाताओं ने उनकी दाल नहीं गलने दी। महिलाओं को खास अदा में महत्व देने में ट्रम्प की बराबरी सिर्फ ब्लादिमिर पुतिन कर सकते हैं। सहयोगी सुंदरी के साथ यात्रा के कारण कोरोना संक्रमण ट्रम्प के गले पड़ा। पुतिन ने जिमनास्ट अलीना को गले लगाकर राष्ट्रीय संवाद ग्रुप का नियंत्रण सौंपा। साढ़े 78 करोड़ रूबल सालाना (करीब सवा 6 करोड़ रुपए मासिक) की व्यवस्था कर दी। अलीना को रूस की गुप्त प्रथम महिला कहा जाता है। पहली मर्तबा राष्ट्रपति चुनाव लड़ते समय पुतिन की सहेली का नाम स्वेतलाना था। स्वेतलाना आज एक बेटी की मां तथा सात अरब रुपए की स्वामिनी हैं। स्वेतलाना की बेटी ने जन्म प्रमाणपत्र में पिता के नाम का कालम खाली छोड़ा। वह गोत्र या जातिनाम व्लादिमिरोव्ना लिखती है। 25 नवम्बर को पुतिन के प्रवक्ता पेस्कोव ने पूछताछ की बौछार का सामना करते हुए सफाई दी-एलिजावेता व्लादिमिरोव्ना नाम की लडक़ी को मैं नहीं जानता। पत्रकार पीछे पडऩे के आदी होते हैं। इसीलिए नेताओं से पिटते और प्रताडि़त होते हैं। पत्रकार ने पलट कर कहा-पेस्कोव से नहीं पूछा कि वह जानता है या नहीं। पुतिन उसे जानते हैं या नहीं? हम यह जानना चाहते हैं। पंगा लेने वाले जान लें कि राजनीति में आने से पहले पुतिन लगभग वही जिम्मा संभालते थे जो भारत में अजीत डोभाल के सिपुर्द है। विकसित या विकासशील देशों में महिलाओं को बराबरी पर लाने के नाम पर होने वाले गोरखधंधों के कई किस्से हैं।

 भारत में केन्द्रीय वित्त मंत्री महिला है। झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना के राजभवन महिलाओं के सिपुर्द हैं। पुद्दुचेरी में किरण बेदी बेंत फटकार रही हैं। मानव संसाधन मंत्री महिला थी। न तो ईरानी-तूरानी होने के कारण पद से हटना पड़ा, न शिक्षा-दीक्षा का बखेड़ा कारण बना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अन्य किसी की आपत्ति के कारण हटाने की बात गले नहीं उतरती। केन्द्रीय वित्तमंत्री के कामकाज पर अंगुली उठाने वाले विचार करें। कुछ अपवाद छोडक़र बाकी केन्द्रीय मंत्रियों ने कौन से किले फतह कर लिए? प्रतिपक्ष की काबिलियत का प्रधानमंत्री समय समय पर बखान करते रहते हैं। मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के कामकाज का कच्चा-चिट्?ठा उनकी नजऱ से छुपा नहीं है।  पश्चिम बंगाल छोडक़र किसी अन्य राज्य में महिला मुख्यमंत्री नहीं है। पत्थर टांकने वाले समुदाय की बेटी को बिहार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया। प्रशासन और शोध संस्थाओं में अनुपात कम है। सत्ता के बूते महिला मित्रों को उपकृत करना महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में महिलाओं की बराबरी के किस्सों के अनुपात में बलात्कार और प्रताडऩा की कहानियों की भरमार है। राष्ट्रीय दल बार बार चुनाव घोषणा पत्र में महिलाओं को निर्वाचित सदनों में एक तिहाई आरक्षण देने का वादा दोहराते हैं। चुनाव के दौरान मीठी मीठी बातें कर दिलासा देते हैं। दो तिहाई बहुमत जुटाने में किसी प्रकार की कठिनाई न होने के बावजूद वचन पूरा नहीं कर सके।  चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई उम्मीदवारी नहीं मिलती। वादाखिलाफी का कलंक उनके माथे पर चिपका है। सात समुंदर पार से आकर भारत को डेढ़ सदी तक गुलाम बनाने वाले फिरंगी नर नारी समता को लागू करने के निर्णय तक पहुंच चुके हैं। राजनीतिक दलों का एक तिहाई आरक्षण का वचन समता नहीं है। इस वादे को चुनाव घोषणा पत्र में टांके रखना बेतुका लगता है। बेहतर है, इसे अन्य वादों की तरह भुला दिया जाए।

खफा मुझसे है अहले-दैरो-हरम (काशी-काबे वाले) जो मैंने का था-मुकरता नहीं।

मिरी एक खूबी यही है बहुत, जुबां से जो कहता हूं, करता नहीं।–जाजि़ब आफ़ाक़ी

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


29-Nov-2020 8:01 PM 35

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों को दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति देकर केंद्र सरकार ने अक्ल का काम किया है लेकिन उन्हें दो दिन तक जिस तरह दिल्ली में घुसने से रोका गया है, वह घोर अलोकतांत्रिक कदम था। देश के किसान सबसे अधिक उपेक्षित, प्रताडि़त और गरीब हैं। यदि आप उनकी मांगें नहीं सुनेंगे तो कौन सुनेगा? संसद में बहुमत का डंडा घुमाकर आप जो भी कानून बना दें, उस पर यदि उससे प्रभावित होने वाले असली लोग अपनी राय प्रकट करना चाहते हैं तो उसे ध्यान से सुना जाना चाहिए और उसका हल भी निकाला जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों में कुछ कांग्रेसी और खालिस्तानी हो सकते हैं और उनमें से कुछ ने यदि नरेंद्र मोदी के खिलाफ बहुत घटिया किस्म की बात कही है तो वह भी निंदनीय है।

क्या ही अच्छा हो कि सरकार अब खेती के बारे में एक चौथा कानून भी पारित कर दे और जिन 23 उपजों पर समर्थन मूल्य वह घोषित करती है, उसे वह कानूनी रुप दे दे। उसे केरल सरकार से सीखना चाहिए, जिसने 16 सब्जियों के न्यूनतम मूल्य घोषित कर दिए हैं। किसानों को घाटा होने पर वह 32 करोड़ रु. की सहायता करेगी और उन्हें उनकी लागत से 20 प्रतिशत ज्यादा मुनाफा देगी। भारत के किसानों का सिर्फ 6 प्रतिशत अनाज मंडियों के जरिए बिकता है और 94 प्रतिशत उपज खुले बाजार में बिकती है। पंजाब और हरयाणा की 90-95 प्रतिशत उपज समर्थन मूल्य पर मंडियों के जरिए बिकती है। किसानों को डर है कि खुले बाजार में उनकी उपज औने-पौने दाम पर लुट जाएगी। उनके दिल से यह डर निकालना बेहद जरुरी है।

अमेरिका में किसान खुले बाजार में अपना माल जरुर बेचते हैं लेकिन वहां हर किसान को 62 हजार डालर की सहायता प्रति वर्ष मिलती है ? वहां मुश्किल से 2 प्रतिशत लोग खेती करते हैं जबकि भारत में खेती से 50 प्रतिशत लोग जुड़े हुए हैं। हमारे यहां किसान यदि नाराज हो गया तो कोई सरकार टिकी नहीं रह सकती।खेती की उपज के लिए बड़े बाजार खोलने का फैसला अपने आप में अच्छा है। उससे बीज, खाद, सिंचाई, बुवाई और उपज की गुणवत्ता और मात्रा भी बढ़ेगी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है लेकिन खेती के मूलाधार किसान को नाराज करके आप यह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर यदि पहल करें और आगे होकर किसान नेताओं से मिलें तो इस किसान आंदोलन का सुखांत हो सकता है।

 (नया इंडिया की अनुमति से)


29-Nov-2020 6:43 PM 40

-कृष्ण कांत 

मीडिया इस पर बहस नहीं करता कि सरकार किसान विरोधी कानून क्यों लाई? मीडिया इस पर भी बात नहीं करता कि सरकार किसानों के संसाधन छीनकर कृषि बाजार को पूंजीपतियों का गुलाम क्यों बनाना चाहती है? मीडिया प्रोपेगैंडा पर बहस करता है कि किसानों को कोई 'भड़का' रहा है.

क्या मीडिया ने ईमानदारी से ये बताने की कोशिश की कि किसान संगठनों के विरोध के कारण जायज हैं? जनता की तरफ से दूसरी आवाज विपक्ष की हो सकती थी, अगर वह मुर्दा न होता!
नए कानून से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका सीधा नुकसान किसानों को होगा.
इन तीनों कृषि कानूनों के आने से ये डर बढ़ गया है कि ये कानून किसानों को बंधुआ मजदूरी में धकेल देंगे.

ये विधेयक मंडी सिस्टम खत्म करने वाले, न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने वाले और कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान होगा.
बाजार समितियां किसी इलाक़े तक सीमित नहीं रहेंगी. दूसरी जगहों के लोग आकर मंडी में अपना माल डाल देंगे और स्थानीय किसान को उनकी निर्धारित रकम नहीं मिल पाएगी. नये विधेयक से मंडी समितियों का निजीकरण होगा.
नया विधेयक ठेके पर खेती की बात कहता है. जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा. इसका नुकसान सिर्फ किसान उठाएगा.

अब तक किसानों पर खाद्य सामग्री जमा करके रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी. ये पाबंदी सिर्फ़ व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी. अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूंजीपतियों को तो फ़ायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका नुक़सान झेलना पड़ेगा.

किसानों का मानना है कि ये विधेयक "जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी की आजादी" का विधेयक है. विधेयक में यह स्पष्ट नहीं है कि किसानों की उपज की खरीद कैसे सुनिश्चित होगी. किसानों की कर्जमाफी का क्या होगा?
नए कानूनों से जो व्यवस्था बनेगी उसकी दिक्कत ये है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मंडियों के समाप्त होने के बाद बड़े व्यवसायी मनमाने दामों पर कृषि उत्पादों की खरीद नहीं करेंगे.

सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाध्यकारी और उसके उल्लंघन को कानूनी अपराध घोषित करना चाहिए था. यही किसानों की मांग है, लेकिन सरकार उनकी बात सुनने की जगह प्रोपेगैंडा फैलाने में लगी है. ये कृषि कानून स्पष्ट तौर पर किसानों के विरोध में और बड़े व्यावसायिक घरानों के पक्ष में हैं.

सरकार के पास पुलिस बल की ताकत है, हो सकता है सरकार लाठी और गोली चलाकर जीत जाए, लेकिन उस बर्बादी का क्या होगा जो इन कानूनों से संभावित है? सबसे पते का सवाल ये है कि आप अपनी जनता की बात सुनने की जगह जनता से ही भिड़ने की हिमाकत क्यों कर रहे हैं?

 


28-Nov-2020 2:47 PM 32

राज ढाल

एक महेन्द्र सिंह टिकैत थे जो दिल्ली-लखनऊ कूच का ऐलान करते तो सरकारों के प्रतिनिधि उनको मनाने रिझाने सिसौली रवाना होने लगते। लेकिन टिकैत जो चाहते थे करते वही थे। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक उनके फोन को तरसते थे लेकिन यह उनकी ताकत का असर था जो उनकी सादगी, ईमानदारी और लाखों किसानों में उनके भरोसे के कारण थी। आंदोलनों में चौधरी साहब हमेशा मंच पर नहीं होते थे। वे हुक्का गुडगुडाते हुए किसानों की भीड़ में शामिल रहते थे। बहुत से विदेशी पत्रकारो को उनसे मिल कर समझ नहीं आता था कि वे जिससे मिल रहे हैं वे वही चौधरी साहब हैं। धूल माटी से लिपटा उनका कुर्ता, धोती और सिर पर टोपी के साथ बेलाग वाणी, उनको सबसे अलग बनाए हुई थी। जब पूरा देश उनकी ओर देखता था तो भी वे रूटीन के जरूरी काम उसी तरह करते हुए देखे जाते थे जैसा भारत में आम किसान अपने घरों में करता है। उनमें कभी कोई दंभ नहीं दिखा। आंदोलन सफल हुए हों या विफल हरेक से वे सीख लेते थे। किसी आंदोलन के लिए कभी किसी ने किसी बड़े आदमी से चंदा मांगते नहीं देखा। किसान अपना आंदोलन भी अपने दम खम पर करते थे और खुद नहीं बाकी लोगों को खिलाने के लिए भी साथ सामग्री ले जाते थे।

विशाल आंदोलनों को नियंत्रित करना आसान काम नहीं होता है। लेकिन टिकैत इस मामलें में बहुत सफल रहे। बड़ा से बड़ा और सरकार को हिला देने वाला आंदोलन क्यों न रहा हो, वह अनुशासनहीन नहीं रहा। मेरठ या दिल्ली में लाखों किसानों के जमावड़े के बाद भी न कहीं मारपीट न किसी दुकान वालों से लूटपाट या कोई अवांछित घटना नहीं हुई। आंदोलनों में भीड़ को नियंत्रित करना सरल नहीं होता। लेकिन चौधरी साहब ने आंदोलनों को अलग तरीके से चलाया। गांव से महिलाएं खाने पीने की सामग्री, हलवा, पूड़ी, छाछ, गुड़ इतनी मात्रा में भेजती थीं कि किसान ही नहीं पुलिस, पत्रकार और आम गरीब लोग सब खा पी लेते थे, कम नहीं पड़ता था। हर आंदोलन में टिकैत पूर्व सैनिकों को भी जोड़ लेते थे।

हर आंदोलन में चौधरी टिकैत ने किसानों के वाजिब दाम को केंद्र मे रखा। जीवन भर वे किसानों की लूट के खिलाफ सरकारों को आगाह करते रहे। उनका यह कहना एक हद तक सही है कि अगर 1967 को आधार साल मान कर कृषि उपज और बाकी सामानों की कीमतों का औसत निकाल कर फसलों का दाम तय हो तो एक हद तक किसानों की समस्या हल हो सकती है।

 


28-Nov-2020 12:42 PM 42

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संविधान-दिवस पर यह मांग फिर उठी है कि देश में सारे चुनाव एक साथ करवाएं जाएं। 1952 से 1967 तक यही होता रहा। विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते रहे। इनमें प्रायः सर्वत्र कांग्रेस ही सरकार बनाती रही लेकिन 1967 से हालात बदलने लगे। कई राज्यों में सरकारें गिरती-उठती-बदलती रहीं। अब ढर्रा ऐसा बिगड़ा कि पांच साल क्या, हर साल और उससे भी ज्यादा लगभग हर महिने देश में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर-निगमों के चुनावों में भी लाखों-करोड़ों रु. खर्च होते हैं और विभिन्न पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी उनमें सक्रिय हो जाते हैं। इसका नतीजा क्या होता है ? पहला, देश और प्रदेश का शासन चलाने से हमारे नेताओं का ध्यान हटता है। वे अपनी शक्ति और समय चुनावों में खर्च करते रहते हैं। दूसरा, चुनावी खर्च बहुत बढ़ जाता है।

2019 के अकेले संसदीय चुनाव में 55 हजार करोड़ रु. के खर्च का अनुमान है। अलग-अलग चुनावों का खर्च सब मिलाकर इससे कई गुना हो जाता है। तीसरा, चुनाव के लिए पैसा जुटाने के लिए भ्रष्टाचार का झरना बह निकलता है। कई चुनावों के लिए इस झरने का बटन कई बार दबाना पड़ता है। चौथा, चुनावी दंगल में कई नैतिक-अनैतिक, जातीय और मजहबी पैंतरे सभी दल मारते हैं। इन पैंतरों की धारावाहिकता कभी रुकती नहीं, क्योंकि आए दिन कोई न कोई चुनाव होता रहता है। इसीलिए पिछले कई वर्षों से यह मांग उठ रही है कि देश की समस्त विधायी संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। मैं भी इस मांग का कई वर्षों से समर्थन कर रहा हूं। इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मांग को बार-बार उठा रहे हैं लेकिन जो इस मांग के विरुद्ध हैं, उनके भी कुछ ठोस तर्क हैं। उनका पहला तर्क है कि मोदी का जोर इस मांग पर इसलिए है कि आजकल पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर का कोई विपक्षी नेता है नहीं, जो मोदी को टक्कर दे सके। इसीलिए एक साथ चुनाव हुए तो केंद्र में तो भाजपा सरकार बनाएगी ही, सभी राज्यों में भी वह छा जाएगी। लेकिन मेरा कहना है कि इसका उल्टा भी तो हो सकता है ! 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस का क्या हुआ था ? दूसरा, यदि सभी निकायों के चुनाव एक साथ होंगे तो स्थानीय और प्रांतीय महत्व के मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के साथ गुम हो जाएंगे।

यह संभव है लेकिन ऐसा असाधारण स्थितियों युद्ध, महामारी, अकाल या सर्वोच्च नेता की हत्या आदि में ही होता है। ऐसा कई बार हुआ है कि राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ होने पर भी नतीजे अलग-अलग आए हैं। तीसरा, दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के लगभग 90 करोड़ मतदाता यदि एक साथ लोकसभा, विधानसभा, नगरपालिका और पंचायत के लिए वोट डालेंगे तो क्या उनका दिमाग हिचकोले नहीं खा जाएगा और उनकी गिनती कैसे होगी ? भारत का नागरिक काफी जागरुक है और अब तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि मत-गणना कठिन नहीं होगी। चौथा, यदि विधानसभाएं और लोकसभा बीच में ही और अलग-अलग समय में भंग हो गईं तो उनके चुनाव एक साथ कैसे होंगे ? पांच साल की निश्चित अवधि के पहले उन्हें भंग न करने का संवैधानिक संशोधन करना होगा और वैकल्पिक सरकार बने बिना चलती सरकार का हटना संभव नहीं होगा। यह विषय ऐसा है, जिस पर देश में जमकर बहस चलनी चाहिए।

 


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