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अमिताभ 50 साल पहले आज ही के दिन पहली बार पर्दे पर दिखे थे
अमिताभ 50 साल पहले आज ही के दिन पहली बार पर्दे पर दिखे थे
Date : 07-Nov-2019

वंदना
सात नवंबर 1969 - आज से 50 बरस पहले हिंदी की एक फि़ल्म रिलीज़ हुई थी सात हिंदुस्तानी।
दिग्गज लेखक-निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास की इस फि़ल्म में उत्पल दत्त थे जो साहित्य, पत्रकारिता और फिल्मी दुनिया की जानी मानी शख्सियत थे। साथ में था दुबला पतला और लंबे कद वाला एक नया लडक़ा- नाम था अमिताभ बच्चन। ऐसा नाम जिसे तब तक कोई नहीं जानता था।
निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास से जब अमिताभ से पहली बार मिले तो उस मुलाकात का जिक्र किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ में किया गया है।
इस किताब में सईदा हमीद और इफ्फ्त फातिमा ने अब्बास की आत्मकथा और उनके लेखों को एक जगह समेटा है। किताब में अब्बास साहब ने लिखा है -
ख्वाजा अहमद अब्बास - आपका नाम ?
जवाब- अमिताभ...
ख्वाजा अहमद अब्बास - फिल्मों में पहले काम किया है ?
जवाब- किसी ने लिया नहीं अब तक...
ख्वाजा अहमद अब्बास - क्यों क्या कमी लगी आपमें ?
जवाब- (कई बड़े नाम लेते हुए) सब कहते हैं कि उनकी हीरोइनों के हिसाब से मैं बहुत लंबा हूँ।
ख्वाजा अहमद अब्बास- हमारी फिल्म में ऐसी कोई दिक्कत नहीं क्योंकि इसमें हीरोइन ही नहीं है।
जब फिल्मफेयर ने किया अमिताभ को रिजेक्ट
अब्बास को अपनी फिल्म के लिए ऐसे युवक की तलाश थी जो एक्टिंग के गुर जानता हो, दिखने में दुबला-पतला हो, ख़ूबसूरत और जोशीला हो।
बात 1969 से पहले की है। उस वक्त अमिताभ बच्चन कलकत्ता की ‘बर्ड एंड को’ कंपनी में काम किया करते थे। सुबह से शाम दफ्तर में काम और शाम को थिएटर करते। एक्ंिटग का शौक अमिताभ को लग चुका था।
अमिताभ बच्चन ने कुछ साल पहले अपने ब्लॉग में लिखा था, ‘मैंने मैगजीन फिल्मफेयर-माधुरी की प्रतियोगिता के लिए फोटो भेजी जो फिल्मों में जगह बनाने वाले चेहरों के लिए अच्छा मंच होता था। मेरी फ़ोटो रिजेक्ट हो गई, क्या ये कोई अचरज की बात थी।
लेकिन अमिताभ ने फिल्मों में किस्मत आजमाने का मन बना लिया था। वो कलकत्ता में अपनी ठीक ठाक नौकरी छोड़ मुंबई आ गए।
उन्हीं दिनों के ए अब्बास गोवा की आज़ादी के संघर्ष पर फि़ल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें सात हीरो चाहिए थे जो एक दूसरे से एकदम जुदा हों।
एक रोल के लिए अब्बास साहब ने नए लडक़े टीनू आनंद को लिया था जो उनके दोस्त और मशहूर लेखक इंदर राज के बेटे थे। टीनू आनंद की एक दोस्त थी नीना सिंह, जो मॉडल थी। सातवें हिंदुस्तानी के लिए नीना को लिया गया। अमिताभ बच्चन दूर-दूर तक फि़ल्म का हिस्सा नहीं थे।
पहले रोल के लिए मिले 5000
निर्देशक और एक्टर टीनू आनंद कई बार मीडिया से बातचीत में ये किस्सा सुना चुके हैं, ‘हुआ कुछ यूँ कि मुझे बीच सत्यजीत रे के सहायक निर्देशक बनने का प्रस्ताव मिला। वैसे भी मैं वो रोल शौकिया तौर पर कर रहा था। मैंने वो रोल छोड़ कलकत्ता जाने का फैसला किया। इससे पहले मेरी दोस्त और अब फिल्म की हीरोइन बन चुकी नैना ने अपने कलकत्ता के किसी दोस्त की फोटो सेट पर दिखाई। अब्बास साहब जरा गर्म मिजाज़ के आदमी थे। नीना ने गुजारिश की कि मैं वो फोटो अब्बास साहब को दिखाऊँ ताकि ऑडिशन हो जाए। बस उस नए लडक़े को को सेट पर बुलाया गया।’
किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ किताब के एक लेख में अब्बास लिखते हैं,  ‘मैंने अमिताभ से मिलने के बाद कहा कि मैं 5000 रुपए से ज़्यादा नहीं दे सकता। अमिताभ के चेहरे पर थोड़ी मायूसी दिखी। मैंने पूछा कि क्या नौकरी में ज़्यादा पैसे मिलते हैं? जवाब आया हाँ, 1600 रुपए हर महीने।
तो मैंने पूछा ऐसी नौकरी छोडक़र क्यों आए हो जबकि अभी सिर्फ एक चांस भर है कि तुम्हे रोल मिल सकता है? तब अमिताभ ने बहुत ही आत्मविश्वास से कहा कि इंसान को ऐसा दांव खेलना पड़ता है। बस वो आत्मविश्वास देखते ही मैंने कहा रोल तुम्हारा।’
तो इस तरह अमिताभ बच्चन को उनकी पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी मिलना तय हो गया।
जब पता चला कि अमिताभ ‘बच्चन’ के बेटे हैं
लेकिन अभी एक पेंच बाकी था। जब रोल का कॉन्ट्रेक्ट लिखा जा रहा था तो अमिताभ ने अपना पूरा नाम बताया -अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन।
इससे पहल तक उन्होंने के ए अब्बास को अपना नाम केवल अमिताभ बताया था। लेकिन डॉक्टर हरिवंश का नाम सुनकर ही ख्वाजा अहमद अब्बास ठिठक गए। हरिवंश राय बच्चन उस समय के उम्दा कवि थे और के ए अब्बास से उनकी जान-पहचान थी।
के ए अब्बास नहीं चाहते थे कि डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन से किसी तरह की गलतफहमी हो जाए। के ए अब्बास ने कहा डॉक्टर बच्चन को टेलीग्राम किया जाए कि उनका बेटा फिल्मों में काम करने वाला है।
दो दिन बाद पिता की टेलीग्राम आई और उसके बाद ही सात हिंदुस्तान के लिए कॉन्ट्रेक्ट साइन हुआ।
इस तरह 15 फरवरी 1969 को अमिताभ बच्चन ने अपने करियर की पहली फि़ल्म सात हिंदुस्तानी साइन की जो 7 नंबवर 1969 को रिलीज हुई।
इत्तेफाक की बात है कि जिस नीना सिंह ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और जो फिल्म की हीरोइन भी थीं और जो टीनू आनंद अमिताभ का नाम लेकर अब्बास साहब के पास गए थे, दोनों ही फिल्म नहीं कर सके।
नीना सिंह शूटिंग के एक शेड्यूल के बाद मुंबई लौटी ही नहीं और टीनू आनंद अपना रोल छोड़ सत्यजीत रे के सहायक बनने चले गए।
नीना की जगह जलाल आगा की बहन शहनाज को लिया गया जिन्होंने बाद में टीनू आनंद से शादी की।
हफ्ता भर पहले से लगानी पड़ती थी दाढ़ी
फिल्म की शूटिंग की कहानी भी काफी दिलचस्प है। फिल्म एक महिला क्रांतिकारी के नजरिए से आगे बढ़ती है जो अस्पताल में लेटे-लेटे उन पुराने दिनों को याद करती है जब देश के अलग-अलग धर्मों और इलाकों से आए उसके साथियों ने मिलकर गोवा को पुर्तगालियों से आजादी दिलवाई थी।
अमिताभ बच्चन बिहार के एक मुसलमान युवक अनवर अली का रोल कर रहे थे। फिल्म का बजट काफी कम था और ऐसे में मशहूर मेक अप आर्टिस्ट पंधारा जूकर बिना फ़ीस के काम करने के लिए तैयार हो गए लेकिन वो बहुत व्यस्त रहते थे।
के ए अब्बास एक किताब के विमोचन पर अमिताभ ने अपनी पहली फि़ल्म का किस्सा सांझा किया था, ‘शूटिंग मुंबई में नहीं गोवा में थी। मेक अप आर्टिस्ट जूकरजी ने कहा कि मेरे पास शूटिंग से एक हफ़्ते पहले का समय है तो मैं अमिताभ की दाढ़ी एक हफ़्ते पहले लगाकर चला जाऊँगा। उन दिनों मेक अप का काम उतना विकसित नहीं था। एक-एक बाल जोडक़र दाढ़ी बनती थी। मैं एक हफ़्ते तक दाढ़ी लगाकर घूमता रहा। एक हफ्ते तक नहाया तक नहीं कि दाढ़ी निकल न जाए।’
फिल्म में अमिताभ के काम की बहुत तारीफ  हुई थी। उन्हें एक ऐसे मुसलमान व्यक्ति का रोल करना था जो छह क्रांतिकारियों के साथ मिलकर गोवा की आज़ादी के लिए लड़ रहा है लेकिन सात हिंदुस्तानियों में वो अकेला है जिस पर अपने मजहब की वजह से शक का साया है कि कहीं वो गद्दार तो नहीं।
एक नए कलाकार के लिए वो मुश्किल रोल था। फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ का एक साथी और आरएसएस कार्यकर्ता मान लेता है कि अनवर यानी अमिताभ ने जेल में देश से गद्दारी की है।
लेकिन एक दिन लडख़ड़ाते अमिताभ को गोवा की जेल से बाहर फेंका जाता है जहाँ उसके पैर के तलवे चाकू के निशानों से कटे पड़े हैं जो दिखाता है कि प्रताडऩा के बावजूद उन्होंने देश के बाद गद्दारी नहीं की। इन चंद सीन में अमिताभ की अभिनय प्रतिभा का अंदाज़ा लग जाता है।
नहीं लगा कि ये दुबला पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बनेगा
फिल्म में एक ही महिला किरदार था जिसे अभिनेत्री शहनाज ने निभाया था। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया था, उनकी आवाज जरूर शानदार थी लेकिन उन्हें देखकर मुझे उस वक्त तो कम से कम कतई नहीं लगा कि ये दुबला-पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बन पाएगा। सेट पर वो बिलकुल खामोश रहते थे। फिर फिल्म के एक सीन में उन्हें पुर्तगाली टॉर्चर कर रहे हैं। उनका पांव काट दिया गया है और वो रेंग रहे हैं। ये सीन उन्होंने जब किया तो सेट पर मौजूद सारे लोग तालियां बजाने लगे और तब मुझे अहसास हुआ कि ये बंदा काफी दूर तक जाएगा।’ शहनाज बाद में टीनू आनंद की पत्नी बनी।
अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म होने के अलावा भी सात हिंदुस्तानी बहुत अहम फिल्म रही जो राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीयवाद और भाषाओं की दीवारों को लांघती एक फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
दरअसल के ए अब्बास एक प्रयोग करना चाहते थे कि जो एक्टर जिस भाषा या राज्य से है उससे एकदम अलग किरदार उससे वो फिल्म में करवाएँगे।
सो बंगाल के हीरो उत्पल दत्त को पंजाब का किसान बनाया, मलायली हीरो मुध को बंगाली बनाया, मॉर्डन दिखने वाला जलाल आगा को ग्रामीण मराठी बनाया, अभिनेता अनवर अली (महमूद के भाई) को एक आरएसएस कार्यकर्ता का रोल मिला था जिसे उर्दू से नफरत है और अमिताभ को उर्दू शायर का रोल दिया जो हिंदी को नापसंद करते हैं।
फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ को हिंदी में चि_ी आती है लेकिन वो ये कहते हुए पढऩे से इंकार कर देते हैं कि ये अरंतु-परंतु की भाषा अपने बस की नहीं और कहते हैं कि क्या जबड़ा तोड़ जुबान लिखी है।
फिल्म के एक किरदार में हिंदी के अरंतु-परंतु से चिढऩे वाला यही नौजवान आगे चलकर हिंदी फिल्मों का शहंशाह कहलाया- अमिताभ बच्चन। और आज उनकी पहली फिल्म को 50 साल हो गए हैं।

 

 

 

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