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अर्थव्यवस्था में मंदी, फिर शेयर मार्केट में तेजी क्यों?
अर्थव्यवस्था में मंदी, फिर शेयर मार्केट में तेजी क्यों?
Date : 13-Jan-2020

अनुराग शुक्ला

शेयर बाजार में असाधारण तेजी जारी है। आज शुरुआती कारोबार में ही बंबई स्टॉक एक्सचेज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 290 से भी ज्यादा अंकों की तेजी के साथ 41893 पर पहुंच गया। यह इसका अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। उधर, निफ्टी भी करीब 81 अंकों की बढ़त के साथ 12337 के एक नए शिखर पर पहुंच गया।
कुछेक हफ्ते पहले मोदी सरकार के पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भारतीय प्रबंधन संस्थान, (आईआईएम) अहमदाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। आईआईएम, अहमदाबाद के ‘एनसई सेंटर फॉर बिहैवरियल साइंस इन फाइनेंस, इकोनॉमिक्स एंड मार्केटिंग’ के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा, ‘मैं आशा करता हूं कि यह सेंटर सबसे पहले इस पहेली को सुलझाएगा कि भारत की अर्थव्यवस्था इस समय लगातार नीचे की ओर जा रही है, लेकिन यहां का स्टॉक मार्केट लगातार ऊपर जा रहा है।’ उन्होंने कहा कि अगर आप इस पहेली को सुलझा लेंगे तो इसे समझने के लिए मैं अमेरिका से फौरन भागा-भागा आऊंगा।
अरविंद सुब्रमण्यम दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हैं और वह ऐसी पहेलियों को बखूबी समझते हैं। अपने व्यंग्य के जरिये वे बस शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था की विसंगति की ओर इशारा कर रहे थे। लेकिन, अर्थव्यवस्था के बारे में सामान्य समझ रखने वाले लोगों के लिए तो वाकई यह पहेली ही है कि जब अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र से सुस्ती गहराने की खबरें आ रही हैं तो शेयर बाजार लगातार कुलांचे क्यों भर रहा है?
शेयर बाजार के आंकड़े अर्थव्यवस्था के हालात को बिल्कुल सही तो कभी भी प्रतिबिंबित नहीं करते हैं, लेकिन फिर भी आर्थिक स्थिति का शेयर मार्केट पर कुछ न कुछ फर्क तो दिखता ही है। लेकिन, अगर पिछले कुछ महीनों से देखें तो शेयर मार्केट अर्थव्यवस्था से कुछ अलग ही रास्ता अख्तियार करता दिख रहा है। नवंबर के आखिर में आंकड़े आए कि वित्तीय वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर की रफ्तार सिर्फ 4.5 फीसद रह गई है। इससे पहले भी अर्थव्यवस्था में गहरी सुस्ती और इसके लंबे चलने की आशंका दुनिया भर की एजेंसियां जता रही थीं। लेकिन, इन सूचनाओं का शेयर बाजार पर बहुत फर्क नहीं पड़ा। अगर थोड़ा- बहुत फर्क पड़ा भी तो शेयर बाजार ने फिर अपने आपको संभाल लिया। शेयर बाजार या तो बढ़त दर्ज कर रहे थे या स्थिर बने हुए थे।
अक्टूबर से दिसंबर के बीच अर्थव्यवस्था को लेकर कई ऐसी सूचनाएं आईं, जिनके चलते बेहद संवेदनशील शेयर बाजार को प्रतिक्रया में तेजी से गिरना चाहिए था। लेकिन, ऐसा कुछ हुआ नहीं बल्कि शेयर बाजार धीरे-धीरे अपने सर्वोच्च स्तर की ओर बढ़ता रहा। आंकड़ों के मुताबिक, कोर इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री इस साल सितंबर में 5.2 फीसद सिकुड़ चुकी है। अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर लगातार नकारात्मक आंकड़े दर्शा रहे हैं। लेकिन, 2020 के पहले सप्ताह में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 41253 पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 12168 के उच्च स्तर पर था।
अर्थव्यवस्था के गिरते आंकड़ों से शेयर बाजार के सूचकांक बेफिक्र क्यों दिख रहे हैं। जानकार इसकी कई वजहें मानते हैं। इनका मानना है कि शेयर बाजार की मौजूदा स्थिति की वजह अर्थव्यवस्था के साथ उसके जटिल संबंधों में छिपी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जुलाई में आए मोदी सरकार के बजट में सुपर रिच टैक्स के प्रावधान के बाद बाजार तेजी से गिरने शुरु हुए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि सुपर रिच टैक्स देश के अमीरों के साथ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर भी आयद किया गया था। इसके बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालनी शुरु कर दी। शेयर बाजार लुढक़ने लगे। इस टैक्स को लेकर सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी। सरकार इसकी वापसी को लेकर काफी दिन पशोपेश में रही। लेकिन, लगातार आती मंदी की खबरों और निवेशकों के रुख के कारण उसे आखिरकार सुपर रिच टैक्स को वापस लेना पड़ा।
जानकार मानते हैं कि सरकार के सुपर रिच टैक्स लगाने और इसे वापस लेने के फैसले ने शेयर बाजार को अलग तरीके से प्रभावित किया। एफपीआई पर सुपर रिच टैक्स लगाने के चलते शेयर बाजार तेजी से गिरे। गिरते बाजार के कारण घरेलू निवेशकों ने भी शेयर बाजार से पैसे निकालने शुरु कर दिए। जिसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी दोनों तेजी से लुढक़े। लेकिन सुपर रिच टैक्स वापस होते ही नजारा बदल गया। 
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बाजार में वापस आने लगे। गिरे हुए बाजार में बहुत सारे शेयर उस कीमत से नीचे आ चुके थे, जिन पर सुपर रिच टैक्स लगने के बाद एफपीआई बिकवाली करके निकले थे। ऐसे में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने दोबारा जमकर निवेश किया और शेयर बाजार में फिर तेजी आने लगी। शेयर बाजार के संभलने के बाद बिकवाली कर रहे घरेलू निवेशकों ने भी बदलते माहौल को देख लिवाली शुरु कर दी।
यह गौर करने वाली बात है कि देश की अर्थव्यवस्था से सुस्ती की खबरें अब भी लगातार आ रहीं थी। लेकिन, शेयर बाजार उन खबरों उतना प्रभावित नहीं हो रहा था। जानकारों के मुताबिक, सुपर रिच टैक्स लगने और हटने के घटनाक्रम से यह भी समझा जा सकता है कि शेयर बाजार का चढऩा-उतरना कैसे कुछ दूसरे ही फैक्टर्स से नियंत्रित होता है।
लेकिन, जब गहराती मंदी की सूचनायें लगातार आ रही थीं तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक क्या सिर्फ सुपर रिच टैक्स की वजह से दोबारा भारतीय स्टॉक में पैसा लगा रहे थे? आंकड़ों और विश्लेषणों से साफ हो चुका है कि भारत में आर्थिक सुस्ती गिरती खपत की वजह से है। इसका मतलब है कि लोग खर्च नहीं कर रहे हैं और शहरों से लेकर देहात तक यह प्रवृत्ति लगातार गहरा रही है। 
यह रोजगार में आई कमी और लोगों की घटती आय से जुड़ी हुई है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के असंगठित क्षेत्र के छोटे उद्योग धंधे हैं। लगातार गिरती खपत के कारण बड़ी कंपनियों का भी मुनाफा तो कम हो रहा है, लेकिन इस मंदी के कारण उनकी बैलेंसशीट बहुत दबाव में हो, ऐसा भी नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, एफपीआई इसी वजह से भारत की बड़ी ब्लू चिप कंपनियों (वे कंपनियां जिनसे सेंसेक्स और निफ्टी जैसे सूचकांक बनते हैं) के शेयरों में निवेश कर रहे हैं। उनका मानना है कि इन कंपनियों की आर्थिक सेहत ठीक है और देर-सबेर मंदी छंटने पर इनमें निवेश उन्हें अच्छा रिटर्न देगा। जाहिर है कि एफपीआई निवेश करते समय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को भी ध्यान रख रहे हैं, लेकिन उनके निवेश के कारण चढ़ता सेंसेक्स अर्थव्यवस्था की सही स्थिति नहीं बता रहा है।
सुपर रिच टैक्स हटने के बाद सरकार के एक और फैसले में शेयर बाजार की इस ऊंचाई की वजह छुपी है। मंदी से निपटने के क्रम में सरकार ने अलग-अलग सेक्टर्स के लिए कुछ घोषणायें भी कीं। इनमें सबसे चौंकाने वाली घोषणा यह थी कि उसने कॉरपोरेट टैक्स में अचानक दस फीसद की कमी कर दी। 
सरकार ने यह फैसला क्यों किया, इस पर काफी बहस हुई। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना था कि देश में गिरती खपत के कारण मंदी है, इसलिए सरकार को ऐसी नीतियां लागू करनी चाहिए जिससे जनता के हाथों में पैसा पहुंचे। लेकिन, सरकार ने इसके बजाए कंपनियों को कॉरपोरेट टैक्स में कमी के रूप में एक बड़ी सौगात दे दी। सरकार की इसके पीछे सोच यह थी कि इस टैक्स माफी के चलते कंपनियां अपने मुनाफे के इस हिस्से का निवेश करेंगी। इससे रोजगार और अन्य आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी जो अर्थव्यवस्था की मंदी भी कम होगी।
लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि देश में लगातार गिरती खपत के कारण कंपनियां नया निवेश करने को तैयार नहीं थीं। हां, कॉरपोरेट टैक्स कम होने का नतीजा यह निकला कि कंपनियों का मुनाफा उस हालात में भी बढ़ गया, जब बाजार में कोई खास मांग नहीं थी। 
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, ज्यादातर कंपनियों ने इस टैक्स कटौती से हुए लाभ से अपनी बैलेंसशीट सुधारीं। शेयर बाजार में इसका भी फर्क पड़़ा। 
देश में मंदी थी, लेकिन कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजबूत नजर आ रही थी। जाहिर है यह सूचना निवेशकों को प्रोत्साहित करने को काफी थी। यही वजह है कि कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के बाद ब्लू चिप कंपनियों के शेयर तेजी से बढ़े। यानी सरकार ने जो टैक्स कटौती की वह मंदी से निपटने में भले ही ज्यादा कारगर न रही हो, लेकिन इससे शेयर बाजार में बड़ी कंपनियों के शेयर तेजी से उछले।
देश में मंदी की खबरें काफी समय से आ रहीं थी। पहले आरबीआई द्वारा लगातार कर्ज सस्ते कर इससे निपटने की कोशिश की जा रही थी। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि आम लोगों ने इन कर्जों का ज्यादा लाभ नहीं उठाया क्योंकि खराब आर्थिक परिदृश्य के चलते वे नए कर्ज लेने का आत्मविश्वास नहीं जुटा पा रहे हैं। जानकारों का मानना है कि इस सस्ते कर्ज का लाभ अगर किसी को मिला तो वह संगठित क्षेत्र को ही मिला। इसके चलते भी बड़ी कंपनियों को ही लाभ हुआ। जिससे शेयर बाजार में इन कंपनियों में निवेश के बारे में अच्छी धारणा बनी।
लेकिन, इस सस्ते कर्ज ने एक नई स्थिति पैदा की। सस्ते कर्ज देने के लिए बैंकों की छोटी बचत योजनाओं में ब्याज की दरें कम होने लगी। इसके चलते छोटे निवेशक दूसरे तरीके खोजने लगे। एक समय म्यूचुअल फंड में कम रिटर्न के कारण जो निवेशक इससे मुंह मोडऩे लगे थे वे फिर इसकी ओर लौटने लगे। अक्टूबर में म्युचुअल फंड्स में एसआईपी के जरिये 8246 करोड़ का निवेश हुआ है जो पिछले साल की इसी महीने से 3।2 फीसद ज्यादा है। यानी कि एसआईपी के जरिये भी बड़ी रकम शेयर बाजार में निवेश की जा रही है जो उसके स्तर को ऊंचा बनाये हुए है।
ये कुछ वजहें हैं जो बताती हैं कि गहराती मंदी के बीच भी शेयर बाजार ऊंचा क्यों बना हुआ है। लेकिन, इसका एक दूसरा पहलू भी है। शेयर बाजार के हालात पर गौर करें तो देखा जा सकता है कि इस समय उसमें आया उछाल ज्यादातर बड़ी कंपनियों के शेयरों की वजह से हैं। मिड कैप (मध्यम दर्जे की कंपनियों का संवेदी सूचकांक) और स्माल कैप (छोटी कंपनियों का संवेदी सूचकांक) के हालात ऐसे नहीं हैं। शेयर बाजार के जानकार मानते हैं कि पेशेवर निवेशक अपने रिटर्न के गणित के चलते ब्लू चिप कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं, उनकी देखा-देखी फुटकर निवेशक भी इन शेयरों की खरीद कर रहे हैं जिसके कारण ये शेयर ओवरवैल्यूड (वास्तविक कीमत से ज्यादा) हो रहे हैं।
इसके अलावा बड़ी कंपनियों के शेयरों में तेजी और छोटी कंपनियों के शेयरों में गिरावट यह भी बता रही है कि अर्थव्यवस्था में समस्या छोटे कारोबार और असंगठित क्षेत्र में है। शेयर बाजार किसी नकली बूम के बजाय वास्तविक और तर्कसंगत रिटर्न दे, इसके लिए जरूरी है कि इन क्षेत्रों की समस्याओं को दूर किया जाए। (सत्याग्रह)

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