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अभी हर्ड इम्यूनिटी से उम्मीद ठीक नहीं, और भारत में यह कहीं बड़े विनाश को न्योता है : म्लादेन एंतोनोव
अभी हर्ड इम्यूनिटी से उम्मीद ठीक नहीं, और भारत में यह कहीं बड़े विनाश को न्योता है : म्लादेन एंतोनोव
31-May-2020 8:48 PM

बीते मार्च में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का एक बयान सुर्खियों में रहा था। एक पत्रकार वार्ता के दौरान हर्ड इम्यूनिटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि यह नए कोरोना वायरस से होने वाली महामारी कोविड-19 को रोकने या नियंत्रित करने का एक उपाय हो सकता है। हालांकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने हर्ड इम्युनिटी का जिक्र तो किया लेकिन, इसके साथ उन्होंने इसे हासिल करने के तरीके या अपनी सरकार की रणनीति पर कोई ठोस बात नहीं की। नतीजा यह हुआ कि उनके इस बयान के साथ, पहले से ही महामारी से सबसे बुरी तरह से प्रभावित ब्रिटेन में लोगों को आशंका हो गई कि कोविड-19 पर काबू पाने में कमजोर पड़ रही सरकार आगे यही विकल्प अपनाने वाली है। वहां इस बात पर चर्चा होने लगी कि सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक लोग कोरोना वायरस के संक्रमण का शिकार हो जाएं।

हर्ड इम्यूनिटी से जुड़ा कौन-सा तथ्य इस आशंका या बहस की वजह बना, इस पर हम आलेख में आगे चर्चा करेंगे। फिलहाल, बताते चलते हैं कि इस बहस के चलते ब्रिटिश सरकार और उसके प्रतिनिधियों को बार-बार सफाई देनी पड़ी कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए अलग-अलग कोशिशें की जा रही हैं और हर्ड इम्यूनिटी हासिल करना इन कोशिशों का उद्देश्य नहीं बल्कि साइड इफेक्ट है। यह और बात है कि उलझाने वाली इन अस्पष्ट बातों के जरिए की गई डैमेज कंट्रोल की तमाम कोशिशों के बावजूद यह घटना बोरिस जॉनसन पर से जनता का विश्वास घटाने वाली साबित हुई।

बोरिस जॉनसन के बयान ने दुनिया भर में हर्ड इम्यूनिटी शब्द को वैज्ञानिक चर्चाओं से निकालकर आम लोगों की जुबान पर ला दिया था। इस बात को अब दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। इतने दिनों में बदली हुई परिस्थितियों में एक बार फिर यह शब्द ज्यादा चर्चा में आ गया है। फिलहाल जब अमेरिका, स्वीडन और भारत समेत कई देश हर्ड इम्यूनिटी को लेकर अलग-अलग तरह से विचार कर रहे हैं या खबरों में में बने हुए हैं तो इसके बारे में थोड़ा जान लेना ठीक रहेगा।

हर्ड इम्यूनिटी क्या है?

हर्ड इम्यूनिटी, जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है यह किसी हर्ड यानी झुंड के सदस्यों में मौजूद रोग प्रतिरोधक क्षमता है। किसी जनसमूह में हर्ड इम्यूनिटी होने से मतलब इसके एक बड़े हिस्से -आमतौर पर 70 से 90 फीसदी लोगों - में किसी संक्रामक बीमारी से लडऩे की ताकत विकसित हो जाना है। ये लोग बीमारी के लिए इम्यून हो जाते हैं। जैसे-जैसे इम्यून लोगों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है। इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो इम्यून नहीं हैं। इसे किसी जनसमूह की सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कहा जा सकता है।

असल में किसी भी वायरस को फैलने के लिए नया शरीर यानी होस्ट चाहिए होता है। अगर 100 में से 80 फीसदी लोगों में इम्यूनिटी विकसित हो जाएगी तो वायरस को यह नया होस्ट मिलने की संभावना बहुत कम हो जाएगी। वायरस का भी एक तय जीवनकाल होता है। इस दौरान अगर उसे नया होस्ट न मिले तो वह खत्म हो जाता है। यानी 80 फीसदी लोग इम्यून हों तो 20 फीसदी लोग भी वायरस से काफी हद तक सुरक्षित हो जाते हैं।

हर्ड इम्युनिटी संक्रमण को रोकने में दो-तरफा कारगर होती है। मसलन 80 फीसदी लोगों के इम्यून होने पर 20 फीसदी लोगों तक संक्रमण नहीं पहुंचता है। उसी तरह अगर किन्हीं विपरीत परिस्थितियों में इन 20 फीसदी लोगों को कोरोना संक्रमण हो जाता है तो वह बाकी 80 फीसदी तक नहीं पहुंचेगा क्योंकि वे पहले से इम्यून हैं। ऐसे में वायरल संक्रमण के फैलाव की प्रक्रिया रुक जाती है और महामारी से निजात मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

किसी भी जनसमूह में संक्रामक रोगों के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के दो तरीके हैं। पहला तरीका टीकाकरण (वैक्सीनेशन) है। यानी बीमारी का इलाज खोजा जाए और इससे अधिक से अधिक लोगों के शरीर में ऐसी जैविक व्यवस्था (एंटीबॉडीज) तैयार की जाए कि उन्हें संक्रमण न हो। दूसरा तरीका है, नैचुरल इम्यूनिटी यानी अधिक से अधिक संख्या में लोग बीमारी के शिकार हों ताकि उनके भीतर अपने आप संक्रमण का सामना करने वाली एंटीबॉडीज विकसित हो सकें। इस तरह संक्रमण के शिकार लोग हर्ड इम्यूनिटी का वह बहुसंख्यक हिस्सा बन जाएंगे जो संक्रमण से सुरक्षित रहेंगे और बाकी लोग संक्रमण से बचे रहेंगे। यहां पर इस बात का जिक्र करते चलते हैं कि हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने का यह दूसरा तरीका ही वह वजह बना जिसके चलते बोरिस जॉनसन के बयान पर सारे ब्रिटेन में अफरा-तफरी मच गई। क्योंकि, हर कोई जानता है कि टीके के जरिए इसे हासिल करने का विकल्प फिलहाल दुनिया में किसी के भी पास नहीं है।

हर्ड इम्यूनिटी किन परिस्थितियों में कारगर है?

ज्यादातर वैज्ञानिक हर्ड इम्यूनिटी के लिए हर्ड प्रोटेक्शन (सामूहिक सुरक्षा) शब्द इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। इनके मुताबिक किसी भी बीमारी के लिए हर्ड प्रोटेक्शन तब ही सही तरह से कारगर हो सकती है जब बीमारी से बचाव के लिए वैक्सीन (टीका) उपलब्ध हो। दरअसल, जनसमूह के एक बड़े हिस्से का टीकाकरण होने के चलते, उस हिस्से के साथ-साथ वे लोग भी संक्रमण से सुरक्षित हो जाते हैं जिनका टीकाकरण नहीं हुआ हो। हर्ड प्रोटेक्शन उन परिस्थितियों में सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होती है जब एक समूह विशेष का टीकाकरण संभव ना हो या फिर टीके के बावजूद लोगों में इम्यूनिटी ना विकसित हो पाए। उदाहरण के लिए नवजात बच्चों को लगने वाले कई टीके एक निश्चित अंतर और आयु पर ही लगाए जाते हैं, तब तक हर्ड इम्यूनिटी ही उनका बचाव करती है। इसके अलावा, अधिक आयुवर्ग के लोगों में भी उम्र बढऩे के साथ इम्यूनिटी कम हो जाती है। इसी तरह गंभीर बीमारियों का सामना करने वाले लोगों को भी हमेशा संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है।

कुछ लोग टीकाकरण ना करवाने के लिए भी हर्ड प्रोटेक्शन को बहाने की तरह इस्तेमाल करते हैं कि जब आसपास के सारे लोग संक्रमणों से सुरक्षित हैं तो वे भी अपने आप ही होंगे। ऐसा कहना तार्किक रूप से सही भी लगता है लेकिन व्यावहारिक तौर पर सोचा जाए तो अगर समूह का एक बड़ा हिस्सा यही बात कहते हुए टीका न लगवाए तो यह सुरक्षाचक्र टूटने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसके अलावा भी, वैज्ञानिक टीके को ही सुरक्षा का अंतिम और ठोस उपाय इसलिए भी बताते हैं क्योंकि हर्ड प्रोटेक्शन को सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता, खासकर मीजल्स, एन्फ्लुएंजा और कोविड-19 जैसी अतिसंक्रामक बीमारियों के मामले में।

हर्ड इम्यूनिटी से जुड़ा, एक अलग लेकिन ध्यान दिया जाने वाला तथ्य यह भी है कि हर्ड इम्युनिटी किसी भी देश में महामारी को फैलने से तो रोक सकती है लेकिन कई बीमारियों के मामले में यह काम नहीं आती। उदाहरण के लिए टिटनेस, जो एक जीवाणु जनित बीमारी है। चाकू से उंगली कटने भर से हो सकने वाला टिटनेस एक ऐसी बीमारी है जिसके लिए टीका भी उपलब्ध है। लेकिन इससे बचाव के लिए हर व्यक्ति को समय-समय पर इसका टीका लगवाते रहना जरूरी होता है क्योंकि इसमें हर्ड प्रोटेक्शन किसी काम नहीं आती है।

क्या हर्ड इम्यूनिटी कोविड-19 से निपटने का विकल्प है?

कोविड-19 के मामले में हर्ड इम्यूनिटी का जिक्र करते हुए कुछ बातों पर गौर करने की ज़रूरत है। सबसे पहले तो यही कि नए कोरोना वायरस यानी सार्स-कोव2 (स््रक्रस्-ष्टशङ्क2) के संक्रमण से बचाने के लिए हमारे पास अब तक कोई वैक्सीन नहीं उपलब्ध हो पाई है। यहां तक कि कोविड-19 का इलाज करने में इस्तेमाल होने वाली एंटीवायरल और अन्य दवाओं पर भी अभी डॉक्टर्स एकराय नहीं हो पाए हैं।

दूसरी बात यह है कि वैक्सीन न होने की सूरत में प्राकृतिक तरीके से हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने की राह में कई तरह के खतरे हैं। ये खतरे कोरोना वायरस को लेकर अब भी मौजूद अनिश्चितताओं से जुड़े हैं। मसलन, कई शोधों के बावजूद अब भी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि एक बार ठीक हो जाने के बाद किसी मरीज को कोरोना वायरस का संक्रमण दोबारा होगा या नहीं। कई बार पहली बार में ही मरीजों को गंभीर साइड इफेक्ट्स और कई बार मौत तक का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, अभी इस सवाल का जवाब भी नहीं मिल पाया है कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोगों को कोविड-19 होने पर उनकी हालत गंभीर हो जाती है जबकि बाकियों की नहीं। कई मामलों में स्वस्थ और युवा लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण होने पर उनकी हालत गंभीर होते देखी गई है। वहीं, उम्रदराज और गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे लोगों के मामले में तो यह ज्यादातर बार जानलेवा भी साबित होता है।

कुल मिलाकर, कोरोना वायरस के संक्रमण और इलाज के बारे में हम अब तक जो जानते हैं, वह काफी नहीं है। ऐसे में प्राकृतिक तरीके से हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने का कदम बहुत ही ज्यादा जोखिम भरा हो जाता है। जोखिम इसलिए भी ज्यादा है कि ज्यादातर देशों में स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी अच्छी नहीं है कि बड़ी मात्रा में संक्रमित लोगों का इलाज आसानी से हो सके। कोविड-19 के मामले में तो दुनिया की सबसे बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश भी बुरी तरह असफल साबित हुए हैं।

बगैर टीके के हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने की कोशिश असफल क्यों हो सकती है, इसे स्वीडन के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। स्वीडन, वह पहला देश है जहां किसी भी और विकल्प पर हर्ड इम्यूनिटी के कॉन्सेप्ट को वरीयता दी गई थी। कोरोना संकट के इस पूरे समय में यहां केवल फिजिकल डिस्टेंसिंग के नियम लागू किए गए थे और इस दौरान स्कूल-कॉलेज, ऑफिस, रेस्तरां वगैरह भी खुले हुए थे।

अब स्वीडन में कोविड-19 से मरने वालों की दर 11।9 फीसदी है। यह आंकड़ा कितना भयावह है इस बात का अंदाजा इस तरह लगाया जा सकता है कि बहुत बुरी प्रभावित होने वाले देशों में से एक अमेरिका में मृत्युदर 5।9 फीसदी ही है जबकि भारत के मामले में यह आंकड़ा 2।9 फीसदी है। हाल ही में स्वीडन द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक राजधानी स्टॉकहोम में अब तक केवल सात फीसदी जनता ही इम्यूनिटी हासिल कर सकी है और मई में भी हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के आंकड़े (कम से कम 20 फीसदी) तक पहुंच पाने की कोई संभावना नहीं है। दूसरी तरह से कहें, हर्ड इम्यूनिटी का रास्ता अपनाकर स्वीडन ने हजारों लोगों की बलि दे दी, फिर भी वहां के हालात बाकी दुनिया से कुछ अलग नहीं हैं।

भारत के संदर्भ में हर्ड इम्यूनिटी के क्या मायने हैं?

भारत के संदर्भ में हर्ड इम्यूनिटी के विकल्प को अपनाना कितना कारगर होगा, इसे स्वीडन से तुलना करते हुए समझते हैं। 2019 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक स्वीडन की जनसंख्या 1।02 करोड़ है जबकि भारत की जनसंख्या इसके सवा सौ गुने से भी ज्यादा, लगभग 130 करोड़ है। कोविड-19 से जुड़े आंकड़ों पर गौर करें तो यह रिपोर्ट लिखे जाने तक स्वीडन में कोरोना वायरस के ज्ञात संक्रमण मामलों की संख्या 36,476 है और इनमें 4,350 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, भारत में ज्ञात मामलों की संख्या पौने दो लाख है और मरने वालों की संख्या पांच हजार के करीब हो चुकी है। ऐसा तब है जब भारत में कोविड-19 से होने वाली मौतों की दर लगभग तीन फीसदी है जबकि स्वीडन में इससे लगभग चार गुनी। ऐसे में अगर स्वीडन की तरह हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के पहले चरण में सिर्फ 20 फीसदी लोगों तक संक्रमण पहुंचने की बात सोची जाए तो करीब 25 करोड़ लोग इसकी जद में आएंगे और मृत्युदर स्थिर मानी जाए तो भी मरने वालों का आंकड़ा 75 लाख तक होगा।

भारत के मामले में, नियंत्रित परिस्थितियों में हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने का विचार इसलिए भी व्यावहारिक नहीं है क्योंकि यहां इतने बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सुविधाएं और संसाधन भी उपलब्ध नहीं है। उदाहरण के लिए पब्लिक हेल्थ पर शोध करने वाले संस्थान सेंटर फॉर डिजीज डायनामिक्स, इकनॉमिक एंड पॉलिसी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल 19 लाख हॉस्पिटल बेड्स हैं। इनमें से केवल 95,000 आईसीयू बेड्स हैं और सिर्फ 48,000 के साथ वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध है। अगर भारत में हर्ड इम्यूनिटी पर विचार किया गया तो संक्रमित होने वाले लोगों में से तीन फीसदी को आईसीयू और वेंटिलेटर सुविधा की जरूरत पड़ेगी जो आज के हालात में संभव नहीं है। इसके अलावा, इसमें लगने वाला समय भी काफी लंबा यानी लगभग तीन साल है जबकि इतने वक्त में वैक्सीन खोज लिए जाने की संभावना कहीं ज्यादा मजबूत है। ऐसे में इतनी भारी संख्या में लोगों की जान दांव पर लगाने का कोई तुक बनता नहीं दिखता।

कुल मिलाकर, वर्तमान परिस्थितियों में प्राकृतिक तरीके से हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने का विचार किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है लेकिन भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए तो यह विध्वंसक ही है।

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