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विष्णु नागर के संस्मरण : वामपंथ की रिपोर्टिंग
विष्णु नागर के संस्मरण : वामपंथ की रिपोर्टिंग
27-Jun-2020 12:09 PM

मेरे राजनीतिक रुझान को देखते हुए मैं नवभारत टाईम्स में रहा या हिंदुस्तान में, मुझे अनिवार्य रूप से वामपंथी दल कवर करने को दिए गए। 1986 से जनवरी, 2003 तक- जब तक मैं समाचार ब्यूरो में रहा-मन से यह काम करता रहा। मुझे वामपंथी दल देने से किसी को ऐतराज भी नहीं था क्योंकि कौन ऐसी बीट करना चाहता था? सब कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद आदि करने को उत्सुक थे, जहाँ सत्ता के साथ होने अहसास भी है और अखबार में कवरेज भी अच्छी मिलती है। मुझे किसी की एवजी में कांग्रेस या भाजपा दो चार दिन के लिए कवरेज करने को भले ही दी गई, स्थायी रूप से कभी नहीं दी गई, जबकि मेरा मानना रहा है कि संवाददाता की अपनी विचारधारा जो भी हो, मगर जब वह किसी पार्टी को कवर करे तो ईमानदारी से रिपोर्ट में उसका पक्ष रखे और जहाँ जितनी खबर हो, उतना महत्व दे। इसलिए जब एक वाम दल की ओर से उसके एक कामरेड की ओर से प्रस्ताव आया कि मैं पार्टी की सदस्यता ले लूँ तो मैंने कहा कि मैं संवाददाता और टिप्पणीकार हूँ, मैं वाम दलों की भी आलोचना का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहता हूँ, यह मौका नहीं देना चाहता कि कल आप कहें कि सदस्य होते हुए भी मैं पार्टी की आलोचना किया करता हूँँ। उसके बाद कभी ऐसा प्रस्ताव नहीं आया और आज तक मेरी यह स्वतंत्रता सुरक्षित है और अंत तक रहेगी। हाँ मेरे लेख, टिप्पणी या कविता का उपयोग करने के लिए औरों के साथ ये भी स्वतंत्र हैं। कभी अपने हिसाब से लिखा भी है उनके लिए।

यह तो एक बात हुई। इस कारण वामपंथी पार्टियों के कुछ नेताओं के संपर्क में आया, हालांकि नजदीकी किसी से खास नहीं रही। हाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बरसों सचिव रहे मुकीम फारुकी साहब के बारे मेंं यह दावा जरूर कर सकता हूँ। वह छोटे कद के मोटी खादी का कुर्ता-पायजामा पहननेवाले सीधेसादे बुजुर्ग थे। व्यवहार में पूरे गाँधीवादी। कभी उनके मुँह से ऊँची आवाज में, आक्रोश में कोई बात नहीं सुनी। दिलचस्प और दोस्ताना अंदाज होता था, उनका, जिसे सादगी की प्रतिमूर्ति कहते हैं,वे थे।जब भी जाओ, बात कर लेते थे और हमेशा खबर मिलना जरूरी भी नहीं। उनसे मिलकर अच्छा लगता था।गर्मजोशी से स्वागत करते थे।

सी.राजेश्वर राव से निकटता नहीं रही, उनका एक या दो बार साक्षात्कार अखबार के लिए जरूर लिया। मजबूत शरीर के करीब छह फुट लंबे राव साहब में भी यह सादगी थी और यही ए बी वद्ध्र्रन में भी। बेहद मामूली पैंट शर्ट में वद्र्धन अजय भवन के एक छोटे से कमरे में रहते थे। व्यक्तिगत व्यवहार में बहुत विनम्र और खरे मगर राजनीतिक लाइन में आक्रामक। इन नेताओं से मिल कर लगता ही नहीं था कि आजादी के और कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास के करीबी गवाहों से मिल रहे हैं, जिनका अपना भी संघर्षों का इतिहास है।

यही सादगी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बीटी रणदिवे, बसवपुनैया और ईएमएस नंबूदरीपाद में भी देखी। वही सहजता भी। सहज तो हरकिशन सिंह सुरजीत भी थे मगर पंजाब में आतंकवाद के दौर में चूँकि वे आतंकवादियों के निशाने पर थे तो उन्हें एक बंगला मिला हुआ था। वह शिखर की संसदीय राजनीति के अपने समय में बड़े खिलाड़ी थे। उनकी पार्टी छोटी थी मगर विश्वनाथ प्रताप सिंह, इंदर कुमार गुजराल, एच डी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनवाने में उनकी एकमात्र तो नहीं मगर केंद्रीय भूमिका थी। बातचीत को किसी नतीजे तक पहुँचाने की कला उन्हें आती थी।उनका बस चलता तो ज्योति बसु, विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद देश के प्रधानमंत्री हुए होते, जिनके नाम पर राष्ट्रीय मोर्चा गठबंधन के सारे दल एकमत थे। बसु भी राजी थे मगर जो वामपंथी दलों में लोकतंत्र न होने की बात करते हैं, उन्हें याद होना चाहिए कि माकपा की केंद्रीय समिति को सैद्धांतिक कारणों से यह स्वीकार नहीं हुआ, इसलिए पार्टी महासचिव और एक बड़े वामपंथी नेता और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की भी नहीं चल सकी।ज्योति बसु हों या उनके समर्थक न कोई पार्टी से गया, न इस कारण पार्टी नेतृत्व बदला।
मैंने जितने साल वामपंथी दलों की कवरेज की, प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कोरे चाय-बिस्कुट मिलते थे। सीपीएम की प्रेस कांफ्रेंस में एक बार बुद्धदेब भट्टाचार्य की भारी जीत पर जरूर एक-एक लड्डू मिला था,जबकि कांग्रेसी-भाजपाई चाय या ठंडा के साथ मीठा नमकीन भी प्रेसवार्ता में बँटवाते थे, कभी कभी लंच पर भी प्रेस कांफ्रेंस होती थी।इधर वामपंथी दल, तीन साला राष्ट्रीय सम्मेलन में भी कभी किसी संवाददाता को न अपने खर्च से ले जाते थे,न ठहरने का प्रबंध करते थे, जबकि कांग्रेस -भाजपा जैसी बड़ी पार्टियाँ सभी व्यवस्थाएँ करती थीं। वाम दल कवर करना है तो अखबार सारा खर्च उठाए और अधिकांंश समय अखबार इसके लिए राजी नहीं होते थे। अखबार में भी ऊपर से नीचे तक लोग कवरेज ठीक से देने के लिए राजी नहीं होते थे, चाहे खबर महत्वपूर्ण हो।हाँ बड़ी राजनीतिक उथलपुथल हो और उसमें इन पार्टियों की भूमिका हो तो अलग बात है।आज भी शायद यह है कि जो चाय,जिस कप में बाकी कार्यकर्ता पीएँगे, उसमें बड़े नेता भी पिएंगे। खाना भी वही सादा मिलेगा, जो नीचे से नीचे के कार्यकर्ता को मिलेगा। जब मैंं कवर करता था, तब तक प्रकाश कारत (सीताराम येचुरी भी) केंद्रीय समिति और बाद मेंं पार्टी के पोलिट ब्यूरो के सदस्य थे।कारत तब पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के अन्य सदस्यों के साथ एक ही वाहन में आते-जाते थे। येचुरी के पास कोई पुरानी सी कार थी। सीपीआई में शायद किसी के पास अपना वाहन रहा हो।

ये मेरे कुछ अनुभव हैं, इन पार्टियों की सफलता-विफलता या माक्र्सवादी विचारधारा का मूल्यांकन नहीं। उस पर लिखना होगा तो कभी और लिखूंगा।
-विष्णु नागर

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