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पुलिस कार्यकर्ता बने और कार्यकर्ता पुलिस की डंडा फटकार अदा में
30-Sep-2020 7:28 PM 10
पुलिस कार्यकर्ता बने और कार्यकर्ता पुलिस की डंडा फटकार अदा में

प्रकाश दुबे

कानून की परीक्षा में अव्वल आने वाले राजेन्द्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। भारत के ग्यारहवें मुख्य न्यायाधीश के पद से निवृत्त होने के 9 वर्ष बाद मोहम्मद हिदायतुल्ला उपराष्ट्रपति बने। वे किसी पक्ष के उम्मीदवार नहीं थे। चालीसवें मुख्य न्यायाधीश पलनीसामी गौडर सदाशिवम निवृत्ति के 5 महीने के अंदर राज्यपाल बनने के लिए राजी हुए। हालत यह हो चुकी है कि सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगाई राज्यसभा की सदस्यता पर मान गए। यह अमेरिका की भौंडी नकल है। वहां भी सत्ता बचाने के लिए जूझ रहे डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति चुनाव से पहले उच्चतम न्यायालय में बहुमत पक्का करना चाहते हैं।

नगरीय प्रशासन की सत्ता की ललक तथा प्रशासकों को सत्ता का आयुध बनाने की राजनीति में न्यायपालिकासे आगे निकलने की होड़ लगी है। कुछ दशक पहले सेना या पुलिस के अफसर को शिक्षा संस्था की बागडोर सौंपने पर हाय-तौबा मचता था। मुंबई के पुलिस आयुक्त सत्यपाल सिंह ने त्यागपत्र देकर बागपत से लोकसभा चुनाव लड़ा। केन्द्र में राज्यमंत्री बने। परम विशिष्ट सेवा मेडल अलंकृत सेवानिवृत्त थलसेनाध्यक्ष विजय कुमार सिंह जमीनी कार्यकर्ता नितीन गडकरी के अधीनस्थ राज्यमंत्री हैं।

रक्षक को पद और अलंकरण देना सम्मान प्रकट करने का तरीका है। नागरिक सेवाओं, सेना या न्यायपालिका के अनुभवी व्यक्तियों के राजनीति में कदम रखने तथा सत्ता के बताए मार्ग पर चलने की चाहत के उदाहरण कई राज्यों से मिल रहे हैं। कोरोना कोविड से सन्न् राष्ट्र और महाराष्ट्र में आम आदमी अपने घर में नजऱकैद रहने के साथ ही कुटुंब तक से तन दूरी बनाए रखने की कड़ी हिदायत का पालन कर रहा था। चिकित्सक और पुलिसकर्मी तक अदृश्य वायरस की चपेट में आए। ऐसे मौके पर अतिरिक्त गृह सचिव स्तर के अधिकारी ने करोड़ों के घोटाले के आरोपी को मुंबई के बाहर पर्यटन् केन्द्र में ऐश करने की विशेष अनुमति दी। हो हल्ला मचा। जांच हुई। चंद दिन दायित्व से अलग करने के बाद निर्दोष घोषित कर उसी पद पर बिठा दिया। नैतिकता की बात करने वालों को सबक मिला- हमारा क्या बिगाड़ लिया? उसी अधिकारी को हाल में मुंबई के बाद सबसे महत्वपूर्ण पुणे शहर का आयुक्त बनाकर अभयदान के प्रमाणपत्र के साथ सेवा मेडल दिया गया।

चतुर पुलिस मंत्री की मुंह खोलने की हिमाकत नहीं की। इस किस्म की दादागीरी से पुलिस महकमे को साफ सबक मिला। संकेत समझो-कार्यकर्ता मानसिकता वाला पुलिस ईनाम का दावेदार हो सकता है। डा के वेंकटेशन जैसे सक्षम अधिकारी के स्थान पर पदस्थापना से कर्तव्यनिष्ठा के दो परस्पर विरोधी छोर उजागर हुए। सुशासन बाबू का तमगा लगाए बिहार के मुख्यमंत्री नई संस्कृति में ढलते जा रहे हैं। नहीं चाहते कि उनकी कमीज औरों से अधिक चकाचक, सफेद फक्क नजर आए। पुलिस महानिदेशक डुगडुगी पीटकर कह रहा है-मेरा ओहदा विधानसभा के सदस्य से कम आंकना। 

दिल्ली के दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका से सामान्य जन के असंतोष की चर्चा होती है। उत्तरप्रदेश के पुलिस महानिदेशक तथा केन्द्रीय सशस्त्र बलों की बागडोर संभालने वाले प्रकाश सिंह ने मुट्ठी भर पुलिस प्रशासकों के कामकाज के तरीके पर अप्रसन्नता जताई। पंजाब में उग्रवाद और उससे पहले मुंबई में अपराधी गिरोहों का जाल तोडऩे वाले जूलियो रिबेरो ने पुलिस का पारदर्शिता अभियान तेज कर दिया। तीन दिन पूर्व उन्होंने सभी पुलिस कर्मियों से आत्म-मंथन करने की अपील की।अधिकारी पद की गरिमा का विचार करें। एक तरफ काम के बोझ से परेशान पुलिस है।

कोरोना-कहर में उन पर भारी शारीरिक और मानसिक दबाव है। दूसरी तरफ गिनती के मामलों में उनकी साख पर आंच आ रही है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री के कुशल संकेत को समझें। हम मान लेते हैं कि उन्होंने इतना ही कहा-किसी पुलिस अधिकारी की दलीय आसक्ति या व्यक्तिगत वफादारी के बारे में खुल्लमखुल्ला कुछ कहना अनुचित होगा। वरिष्ठ पदों पर विराजमान कई पुलिस अधिकारियों को महीनों तक तैनाती न मिलने का मतलब साफ है। इनमें कुछ अधिकारी विशिष्ट व्यक्ति या विचार को कर्तव्यनिष्ठा की अपेक्षा अधिक महत्व दे रहे थे। चलो, मान लें कि प्रशासनिक कारणों से उन्हें नई नियुक्ति देने में विलंब हुआ। सूरज उगने की राह देखे बगैर नई सरकारों के गठन की हलचल से खुफिया पुलिस का अनजान होना योग्यता पर दाग है। चुप्पी या योजना में शामिल होना योग्यता से समझौता ही माना जाएगा।

महाराष्ट्र से पहले गोवा में मध्य रात्रि के बाद शपथ ग्रहण हुआ। विभिन्न राजनीतिक दल अपनी राय रखने और राह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। कड़ाई के लिए शोहरत पाने वालीं किरण बेदी दिल्ली विधानसभा का चुनाव हारने के बाद पुदुचेरी की उपराज्यपाल नियुक्त हुईं। भारतीय पुलिस सेवा में शामिल की गई पहली महिला अधिकारी पर पार्टी कार्यकर्ता की तरह काम करने का आरोप लगा। कानून और व्यवस्था का बिगाड़ नई बात नहीं है। दिल्ली में महिलाओं पर अपराध, अनेक राज्यों में हत्याओं और डकैतियों की वारदातों ने लोगों को दहलाया है। पुलिस के निष्पक्षता से डिगने का दुष्परिणाम है कि कई जगह कार्यकर्ता पुलिस तक को धौंस देने लगे हैं। उन्हें हिंसा और हत्या करते समय पकड़े जाने का डर नहीं रहा। इस तरह की घटनाएं बढ़ीं हैं। यह खतरा बहुत बड़ा है।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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