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कश्मीर के जंगलों में रहने वाले बाशिंदे जो अचानक हो गए बेघर
21-Nov-2020 8:01 PM 33
कश्मीर के जंगलों में रहने वाले बाशिंदे जो अचानक हो गए बेघर

अब्दुल अज़ीज़ खताना

-रियाज़ मसरूर

अब्दुल अज़ीज़ खताना पाँच पीढ़ियों से पहलगाम के लिड्रू में रहते हैं. यह कम आबादी वाली, जंगलों के बीच बसी एक ख़ूबसूरत जगह है जो जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से क़रीब सौ मील दूर पहलगाम की पहाड़ियों के बीच है.

लेकिन अब 50 साल के खताना, उनके भाई-बहन, पत्नी और बच्चे मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके अपने घर के पास बैठे रो रहे हैं. मिट्टी की दीवारों से बने इस घर को वो 'कोठा' कहते थे.

अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने 'वन भूमि के अतिक्रमण' को लेकर एक नया अभियान शुरू किया है जिसके तहत खताना का घर तोड़ा गया है.

अभियान का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ अधिकारी मुश्ताक़ सिमनानी कहते हैं कि 'जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के आदेश पर वन भूमि का अतिक्रमण करने वाले घरों और इमारतों को हटाया जा रहा है.'

पहलगाम विकास प्राधिकरण के प्रमुख मुश्ताक़ कहते हैं, "कोर्ट ने शहर में जंगल की क़रीब 300 एकड़ की ज़मीन पर किये गए सभी अतिक्रमण और ग़ैर-क़ानूनी निर्माण को हटाने का आदेश दिया है. ये अवैध ढांचे हैं और इन्हें हटाकर हम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं."

इसी साल अक्तूबर में कोर्ट ने प्रशासन को जंगल की ज़मीन से ग़ैर-क़ानूनी अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था.

अब्दुल अज़ीज़ खताना और उनके जैसे कई लोगों के लिए यह एक सदमे की तरह है कि जिस घर में वे पीढ़ियों से रहते आये, अब वो घर उनका नहीं रहा. वो अचानक ही बेघर हो गए थे.

बीबीसी से बातचीत के दौरान ग़मगीन आवाज़ में खताना ने कहा, "मुझे नहीं पता कि ये क़ानून किस बारे में है. मुझे पता है कि ये घर जो अब मलबे का ढेर बन गया है, वो मेरे परदादा ने बनाया था."

खताना के घर के पास एक दूसरा कोठा भी है जो उनकी भाभी नसीमा अख़्तर का है.

नसीमा के तीन बच्चे हैं. जिस वक़्त अधिकारी उनका घर तोड़ने के लिए आये, उस वक़्त वो अपने बच्चों को खाना खिला रही थीं.

अब्दुल अज़ीज़ खताना का घर जो अब नष्ट हो चुका है

अभियान को लेकर लोगों में नाराज़गी

नसीमा रोते-रोते कहती हैं, "हम डर गए थे. बच्चे रोने लगे और हम चीख रहे थे. यहां सैंकड़ों अधिकारी और पुलिस के लोग थे. उनके हाथों में कुल्हाड़ियां, रॉड और बंदूक़ें थीं. उन्होंने देखते ही देखते मेरे घर को गिरा दिया."

प्रशासन के इस क़दम को लेकर प्रदेश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. कई वरिष्ठ राजनेताओं ने इलाक़े का दौरा किया है और आश्वासन दिया है कि वो पीड़ित परिवारों के साथ हैं.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और पूर्व मंत्री मियां अलताफ़ कहते हैं, "भारत का वन अधिकार क़ानून जंगलों में रहने वाले अदिवासियों और वनवासियों को ज़मीन का हक़ और जंगलजात उत्पादों को जमा करने का हक़ देता है. खानाबदोश समुदायों और आदिवासियों को सशक्त करने की बजाय इस नए क़ानून को ग़ैर-क़ानूनी तरीके से लागू किया जा रहा है ताकि ग़रीबों को बेघर किया जा सके."

मियां अलताफ़

देश की संसद ने वन अधिकार क़ानून, 2006 पारित तो कर दिया था लेकिन अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को मिले विशेष अधिकार के कारण इस क़ानून को वहां लागू नहीं किया जा सका था.

बीते साल अगस्त में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को आंशिक स्वायत्तता देने वाले अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया था जिसके बाद सरकार ने वहां कई क़ानून लागू किए हैं, इन्हीं में से एक है- वन अधिकार क़ानून.

मियां अलताफ़ सवाल करते हैं, "खानाबदोशों को बेघर करना ग़ैर-क़ानूनी है क्योंकि क़ानून उन्हें भी अधिकार देता है. और वन पारिस्थितिकी तंत्र यानी फ़ॉरेस्ट इकोसिस्टम के लिए जंगलों में रहने वाले यानी वनवासी लोग बेहद अहम हैं. आप उन्हें कैसे बेघर कर सकते हैं."

बीजेपी ने आरोपों को किया ख़ारिज

लेकिन बीजेपी ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है और कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश में वन अधिकार क़ानून लागू किया गया है.

जम्मू कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया कि "आदिवासी और वनवासियों को क़ानून के तहत जो अधिकार दिए गए हैं वो उनका लाभ उठा सकते हैं. कुछ पार्टियां अपने राजनीतिक हितों के लिए इस मामले का इस्तेमाल कर रही हैं लेकिन केंद्र सरकार अपने वादे से पीछे नहीं हटेगी."

हालांकि वनवासी अल्ताफ़ ठाकुर की बात से इत्तेफ़ाक रखते नहीं दिख रहे. इस अभियान के ख़िलाफ़ वनवासियों के नेता मोहम्मद यूसुफ़ गोर्सी ग़ैर-आदिवासी लोगों और राजनीतिक पार्टियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

बकरवाल समुदाय की महिलाएं

लिड्रू में बेघर हो चुके खानाबदोशों के एक कार्यक्रम में गोर्सी कहते हैं, "हम ये बर्दाश्त नहीं कर सकते. जंगल के पास ग्रीन ज़ोन में बड़ी-बड़ी इमारतें और घर बनाए गए हैं लेकिन सरकार उन वनवासियों को सज़ा दे रही है जो पीढ़ियों से यहां रहते हैं. वन अधिकार क़ानून का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है और मुझे नहीं पता कि खानाबदोश समुदाय के मुसलमानों को ही क्यों परेशान किया जा रहा है."

'सरकार ग़रीब हटाना चाहती है या ग़रीबी?'

जम्मू कश्मीर सीपीआईएम के सेक्रेटरी ग़ुलाम नबी मलिक ने एक बयान जारी कर कहा है कि ये दुख की बात है कि जो वनवासी सदियों से जंगलों का सुरक्षा कर रहे हैं उन्हें ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बेघर किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "धर्म और राजनीति से हटकर, उन सभी लोगों के ख़िलाफ़ कठोर क़दम उठाए जाने चाहिए जो वनभूमि का अतिक्रमण कर रहे हैं, लेकिन यहां ग़रीब खानाबदोशों को उनके ढोक (अस्थाई रिहाइश) से निकाला जा रहा है."

मीडिया से बातचीत में अनंतनाग ज़िला प्रशासन ने उन पर लगे आरोपों से इनकार किया है.

बकरवाल समुदाय के एक परिवार का घर

एक रिपोर्ट के अनुसार अनंतनाग के डिप्टी कमिश्नर कुलदीप कृष्णा सिधा ने मीडिया से कहा, "कुछ लोगों का आरोप है कि खानाबदोश समुदाय (गुर्जर-बकरवाल) के लोगों को बेघर किया जा रहा है और उनके घरों को तोड़ा जा रहा है. ये आरोप बेबुनियाद हैं."

पहलगाम में प्रशासन के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ अभियान से स्थानीय ग़ैर-अदिवासी भी नाराज़ हैं.

पहलगाम शहर में रहने वाले मोहम्मद रफ़ी कहते हैं, "हमें सुनने को मिलता है कि सरकार ग़रीबी ख़त्म करना चाहती है. लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार ग़रीबों को उनके घर नष्ट करके और उन्हें बेघर करके सज़ा देना चाहती है. ये एक मानवाधिकार संकट है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे."

कुछ लोग इस अभियान की तुलना फ़लस्तीनियों के अधिकारों के हनन और उनके इलाक़े में इसराइल की बस्तियां बसाने से कर रहे हैं.

इतिहासकार और टिप्पणीकार पीजी रसूल कहते हैं, "गुर्जर समुदाय में केवल मुसलमान ही नहीं हैं, बल्कि हिंदू भी खानाबदोश गुर्जर हैं और ये भारत में अनुसूचित जनजाति की आबादी का क़रीब 70 फ़ीसदी हैं. अगर मुसलमान खानाबदोशों को इस अभियान में निशाना बनाया जाएगा तो पीड़ितों को लगेगा कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है जैसा इसराइल फ़लस्तीनियों के साथ करता है."

जम्मू कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सोमवार को केंद्र शासित प्रदेश में गुर्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों को वनभूमि से हटाने की मुहिम को लेकर सरकार को चेतावनी दी है और कहा है कि अगर उन्हें परेशान किया गया तो नतीजे भयानक हो सकते हैं.

मीडिया के साथ बात करते हुए उन्होंने कहा, "ये केवल कश्मीर में नहीं हो रहा है. अगर आप जम्मू के दूसरे इलाक़ों को देखें भटिन्डी, सुजवान और छत्ता जैसे इलाक़े जहां गुर्जर-बकरवाल मुसलमानों की आबादी है वहां उन्हें निशाना बनाया जा रहा है जंगलों से निकाला जा रहा है. ये वो लोग हैं जो असल में जंगलों को बचाते हैं. सर्दियों में ये लोग कहां जाएंगे?"

पूर्व मुख्यमंत्री ने गुर्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों को भरोसेमंद और शांतिप्रिय बताया और कहा कि अगर उन्हें परेशान करना जारी रहा तो सरकार को इसके भयानक परिणाम भुगतने होंगे.

हालांकि अनंतनाग के डिप्टी कमिश्नर कुलदीप ने कहा है कि केवल वही ढांचे हटाए जा रहे हैं जो अवैध रूप से बनाए गए हैं.

वन अधिकार क़ानून लागू करना

जंगल की ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने का अभियान

सरकार के प्रवक्ता के हवाले से समाचार एजेंसी पीटीआई ने कहा है कि जम्मू कश्मीर के चीफ़ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यम ने बुधवार को अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) क़ानून, 2006 लागू करने संबंधी रिव्यू मीटिंग में शिरकत की थी. जम्मू और कश्मीर पुर्नगठन अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद वन अधिकार क़ानून भी प्रदेश में लागू हो गया था.

उनका कहना था कि इस साल अक्तूबर से अदिवासी मामलों के विभाग समेत, जंगल, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग ने इस क़ानून को लागू करने के लिए काम करना शुरू कर दिया था.

वो कहते हैं, "ये बताया जाना ज़रूरी है कि वन अधिकार क़ानून, 2006 देश भर के वनवासियों को अधिकार दिए गए हैं."

पीटीआई के अनुसार प्रवक्ता का कहना था कि क़ानून के तहत ये तय किया गया है कि पारंपरिक तौर पर वनवासी और जंगलों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों के रहने के लिए, ख़ुद खेती करने के लिए, आजीविका कमाने के लिए, मालिकाना हक़ और लघु वन उत्पाद जमा करने, इस्तेमाल करने और बेचने का अधिकार दिया गया है. इसके अलावा जंगलों से मिलने वाले मौसमी संसाधनों पर भी उनका अधिकार होगा.

चीफ़ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यम ने जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) क़ानून, 2006 लागू करने के लिए वन विभाग से चार-स्तर पर समितियां बनाने के लिए कहा है. ये समितियां हैं - राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग समिति, ज़िला स्तरीय मॉनिटरिंग समिति, सब डिविज़नल स्तरीय समिति और वन अधिकार समिति. (bbc)

 

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