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पुण्यतिथि : बा के लिए कैसे पति थे बापू, क्या लिखा उन्होंने अपनी वैवाहिक जिंदगी पर
22-Feb-2021 6:18 PM 20
पुण्यतिथि : बा के लिए कैसे पति थे बापू, क्या लिखा उन्होंने अपनी वैवाहिक जिंदगी पर

22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी यानि बा ने पुणे के आगा खान पैलेस में जीवन त्याग दिया. उनका देहांत हो गया. कैसा था बा और बापू का दांपत्य जीवन. फिर कैसे वो बापू की ताकत बन गईं. हालांकि किताबें कहती हैं कि दृढ़इच्छाशक्ति के मामले में वो अपने पति से भी आगे थीं.


बापू की पत्नी कस्तूरबा गांधी की आज पुण्यतिथि है. आज ही के दिन 1944 में उनका निधन हुआ था. कस्तूरबा गांधी को गांधी आश्रम में लोग प्यार से बा कहते थे. वो इसी नाम से बाद में याद की गईं. कस्तूरबा गांधी का जन्म 11 अप्रैल 1869 को पोरबंदर में हुआ था. उनके पिता गोकुलदास मकनजी एक व्यापारी थे. कस्तूरबा गांधी के पिता गोकुलदास और गांधीजी के पिता करमचंद गांधी दोस्त थे. दोनों परिवारों में रही पुरानी जान पहचान की वजह से ही गांधी और कस्तूरबा के बीच रिश्ते की बुनियाद बनीं और दोनों की शादी हुई.

1882 में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की शादी हुई. दोनों शादीशुदा जोड़े की तरह रहने लगे. लेकिन कम उम्र होने की वजह से दोनों को ही शादी एक खेल की तरह लगती थी. वो एकसाथ खेलते हुए दोस्त बन गए थे और शादी की जिम्मेदारी को समझने में असमर्थ थे. एक बार बापू ने कहा था कि उस वक्त उनके लिए शादी का मतलब था- नए कपड़े, खाने के लिए मिठाइयां और रिश्तेदारों के साथ खिलंदड़पना.

कैसा था महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी का वैवाहिक जीवन
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि शुरुआत में वो कस्तूरबा के लिए काफी आकर्षण महसूस करते थे. गांधीजी उस वक्त स्कूल में थे. एक जगह उन्होंने लिखा है कि स्कूल में भी वो कस्तूरबा के बारे में ही सोचा करते थे. बाद में वो अपने इस अहसास के लिए शर्मिंदा भी होते हैं. कस्तूरबा गांधी अशिक्षित थीं. बापू ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया. लेकिन पढ़ाई को लेकर उनमें उतना उत्साह नहीं था, क्योंकि उन्हें घर के काम-काज भी निपटाने होते थे.
शुरुआत में वो कस्तूरबा के लिए काफी आकर्षण महसूस करते थे. गांधीजी उस वक्त स्कूल में थे.

शुरुआत में वो कस्तूरबा के लिए काफी आकर्षण महसूस करते थे. गांधीजी उस वक्त स्कूल में थे.

1897 में कस्तूरबा गांधी महात्मा गांधी के साथ साउथ अफ्रीका चली गईं. वहां गांधीजी कानून की पढ़ाई के लिए गए थे. वो गांधीजी के काम में सहयोग करतीं और हर काम में उनका अनुसरण करतीं. साउथ अफ्रीका में अश्वेतों के खिलाफ बरते जाने वाले भेदभाव के खिलाफ बापू के आंदोलन में भी कस्तूरबा गांधी ने उनका सहयोग किया और उन आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई.

जब बा से बुरी तरह का झगड़ा
महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के वैवाहिक जीवन को लेकर कई बातें कही गई हैं. इसमें एक बात ये भी है कि दोनों के बीच बनती नहीं थी. अपने वैवाहिक जिंदगी को लेकर बापू ने आत्मकथा में खुद कुछ सच्चाई बयान की है और अपनी गलती कबूली है. ऐसा ही एक वाकया है बापू और कस्तूरबा गांधी के बीच हुआ एक झगड़ा, जिसमें बापू अपनी पत्नी कस्तूरबा को घर से निकालने पर आमादा हो गए थे.

शुरुआत में गांधीजी काफी हठी पति थे और बा के साथ उनके झगड़े हुआ करते थे. बा को लगता था कि गांधीजी उन पर ऐसे काम थोपते हैं, जो कतई अनुचित हैं.

साउथ अफ्रीका में महात्मा गांधी अपने यहां नौकर रखने पर राजी नहीं थे. उन्होंने कस्तूरबा गांधी को ही घर के काम-काज निपटाने के लिए कहा. हालांकि इस पर कस्तूरबा गांधी के विचार अलग थे. महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कस्तूरबा ने अपनी आंखों के सामने अपने पति को बदलते देखा. बैरिस्टर के तौर पर महात्मा गांधी ने यूरोपियन वेशभूषा अपना ली थी. उन्हीं की तरह जीवन जीना सीख लिया था. उनकी पब्लिक के बीच सक्रियता बढ़ गई थी और इस दौरान उन्हें पुलिस प्रताड़ना का शिकार भी होना पड़ता था. कस्तूरबा को न सिर्फ उनकी देखभाल करनी पड़ती बल्कि उनसे मिलने आने वाले मेहमानों की भी देखरेख करनी पड़ती थी. कस्तूरबा गांधी की सेहत पर इन सबका बुरा प्रभाव पड़ा.

जब महात्मा गांधी ने कस्तूरबा गांधी को घर से निकल जाने को कहा
एक बार महात्मा गांधी ने कस्तूरबा गांधी को हैरान कर देने वाला आदेश सुना दिया. कस्तूरबा गांधी को उन्होंने अपने यहां आए मेहमान का टॉयलेट साफ करने को मजबूर कर दिया. इस बात पर कस्तूरबा गांधी फट पड़ी. उन्होंने कहा- अब बहुत हो चुका. इसके बाद दोनों के बीच बुरी तरह से झगड़ा होने लगा.

दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ गया कि गांधीजी ने कस्तूरबा से घर से निकल जाने को कह दिया. बात इतनी बढ़ गई कि महात्मा गांधी कस्तूरबा गांधी की बांह पकड़कर घर से बाहर निकालने लगे. बाद में इस पूरे वाकये पर उन्हें काफी पश्चाताप हुआ. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘ये ठीक उसी तरह से था, जैसे मुझे एक अंग्रेज अधिकारी ने ट्रेन से धक्का देकर बाहर निकाला था. कस्तूरबा की आंखों से लगातार आंसू बहे जा रहे थे. वो चिल्ला कर कह रही थी कि तुम्हें थोड़ी भी लाज शरम नहीं है? तुम अपनेआप को इतना भूल गए? मैं कहां जाऊंगी? तुम सोचते हो कि तुम्हारी बीवी रहते हुए मैं सिर्फ तुम्हारा ख्याल रखने और तुम्हारी ठोकरें खाने के लिए हूं. भगवान के लिए अपना व्यवहार ठीक करो और गेट को बंद कर दो. इस तरह का तमाशा मत खड़ा करो.'

कुछ साल पहले जाने माने साहित्यकार गिरिराज किशोर ने बा के नाम से कस्तूरबा गांधी पर एक शोध पूर्ण किताब लिखी.

अपने किए पर शर्मिंदा हुए बापू
इसके बाद बापू लिखते हैं कि वो अपने किए पर बहुत शर्मिंदा थे लेकिन उन्होंने चेहरे पर सख्ती लाते हुए दरवाजा बंद कर दिया. बापू ने लिखा है कि अगर मेरी बीवी मुझे नहीं छोड़ सकती तो मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूं. हमारे बीच कई बार झगड़े हुए लेकिन आखिर में हमदोनों शांत रहे. बापू लिखते हैं कि कस्तूरबा मे असाधारण धैर्य और सहनशीलता थी, इसलिए वो हमेशा विजेता रही.

कुछ समय पहले बा पर लिखी गईं दो किताबें 
कुछ साल पहले कस्तूरबा गांधी पर दो किताबें आईं. दोनों शोधपरक व बेहतरीन किताबें. हिन्दी में जाने-माने लेखक गिरीराज किशोर ने कई सालों की मेहनत के बाद "बा" नाम से किताब लिखी, जिसमें बा की जिंदगी के अनछुए पहलुओं, दुविधाओं, अंतद्वंद्व और शख्सियत को उभारने की कोशिश की गई.

दूसरी किताब भी महत्वपू्र्ण है. ये किताब है लेखिका नीलिमा डालमिया आधार की "द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा". ये किताब नीलिमा के एक दशक के शोध, मेहनत का नतीजा थी.

बचपन में गांधी दब्बू थे तो कस्तूरबा साहसी
तब गांधी कमजोर, दब्बू, हुआ करते थे और कस्तूरबा इसकी ठीक उल्टी-साहसी, बेधड़क। उम्र में छह महीने बड़ी. नीलिमा डालमिया की किताब कहती है कि बा के जीवन में कई बार ऐसे मौके आए जब उन्होंने अपने अधिकारों का बेझिझक इस्तेमाल किया. साथ ही पत्नी का धर्म भी पूरी निष्ठा और सहजता के साथ निभाया.

साहित्यकार नीलिमा डालमिया अधर ने भी कस्तूरबा गांधी पर एक चर्चित किताब कुछ समय लिखी, सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा. इसमें एक स्त्री के तौर पर बा की भावनाओं और ताकत को लिखा गया है.

सही कहें तो बा ने कई लोगों के हिस्से की यात्रा को अकेले पूरा किया. पहले वह देश में थीं, फिर विदेश गईं. वहां की जेल में और फिर देश की जेलों में. बा के दायित्व बंटे थे. आश्रम, संतान, आश्रमवासी, स्वयं बापू जैसा पति और आत्म निर्णय और अंत में पति की राजनीतिक विरासत, जो बा को बांट देते थे.वह देश के लिए भी जूझती रहीं और परिवार और अस्मिता के लिए भी.

अक्सर वादविवाद में बापू को निरुत्तर कर देती थीं बा 
गिरिराज किशोर और नीलिमा डालमिया दोनों की किताबें कहती हैं कि बा और बापू के बीच वादविवाद भी होता था. हमेशा ही बा के तर्कों के आगे बापू निरुत्तर हो जाते थे. ये बात अलग थी कि अमूमन असहमति के बाद भी बा ने बापू की बातों को माना. उन्होंने जो चाहा, वो किया.

कैसे हुआ निधन
9 अगस्त 1942 को बापू के  गिरफ्तार हो जाने पर बा ने तय किया कि वो खुद मुंबई के शिवाजी पार्क पर भाषण देने जाएंगी. पार्क के द्वार पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. दो दिन बाद उन्हें पूना के उसी आगा खाँ महल में भेजा गया, जहां बापू भी गिरफ्तार थे. उस समय वह अस्वस्थ थीं. गिरफ्तारी के बाद उनका बिगड़ा स्वास्थ्य बिगड़ता गया. आखिरकार 22 फ़रवरी 1944 को उनका देहांत हो गया. हालांकि बापू के बड़े बेटे ने पिता को उस पर उलाहना जरूर दिया कि अगर वो चाहते तो पेनिसिलिन का इंजेक्शन दिलाकर बा को जीवन दे सकते थे. (hindi.news18.com)

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