विचार / लेख

विरोधी के दृष्टिकोण को न समझना सचमुच एक गंभीर बीमारी है
विरोधी के दृष्टिकोण को न समझना सचमुच एक गंभीर बीमारी है
Date : 23-Mar-2020

अव्यक्त 

आज डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती है। संत कबीर की भांति शाब्दिक जीवन पाए होते तो आज 110 साल के होते। डॉ. लोहिया को अगर दलगत राजनीति का कीड़ा न काटता तो स्वातंत्र्योत्तर भारत को उनके मौलिक और मानवतावादी चिंतन का और भी लाभ मिल सकता था। जवानी के दिनों में लोहियाजी भी मानते थे कि चरखा चलाने से भला आज़ादी कैसे आएगी! उन्हीं के शब्दों में वे उसे ‘बुढिय़ा की करतूत’ या ‘बूढ़े-बूढिय़ों के कारनामे’ मानते थे।
उन्होंने गांधीजी को लगभग चिढ़ाने के अंदाज में एक लेख लिखा। उसमें कहा कि हाथ से धान की भूसी उड़ाने और चावल कूटने से विदेशी सत्ता का खात्मा भला क्या होगा? इतना ही नहीं, उन्होंने लेख की एक प्रति गांधीजी को भेजते हुए उनसे जवाब भी तलब कर लिया।
इस बारे में लोहिया ने लिखा है कि उनकी समझ में वह अकेला अवसर था जब गांधीजी उनसे नाखुश हुए थे। क्योंकि गांधीजी ने पोस्टकार्ड पर अपने जवाबी पत्र में लोहिया को लिखा था- ‘तुम्हें मुझसे जवाब लिखने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि मैं समझता हूँ तुममें अपने विरोधी के दृष्टिकोण के लिए तनिक भी सहिष्णुता नहीं है।’
हालांकि बकौल लोहिया, इसके बाद गांधीजी का एक ‘मधुर और मुलायम उत्तर’ वाला दूसरा पत्र भी आया। लोहिया को इसका जीवन भर मलाल रहा कि अपने यायावरी जीवन के चलते वे उस पत्र को संभाल कर नहीं रख पाए। 
‘विरोधी के दृष्टिकोण के प्रति सहिष्णुता’ वाली गांधीजी की बात उनके हृदय को धक से लगी थी और वे आजीवन इस बात को भूल न सके। 14 अगस्त, 1960 को ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ के अपने एक लेख में लोहिया ने लिखा- ‘विरोधी के दृष्टिकोण को न समझना सचमुच एक गंभीर बीमारी है। मन की इस शक्ति का आधुनिक युग में निश्चित ही अभाव हो रहा है। हम अपने ही विचारों में इतने डूबे रहते हैं कि जब दूसरा व्यक्ति बात करता है और हमारी कमियों या तर्कों के छिद्रों की ओर इशारा करता है तो हम उसे सुनना नहीं चाहते।
...लगता है हम सिर्फ अपनी ही बात सुनते हैं। दूसरों से बातें करते समय अक्सर ऐसा लगता है जैसे हम उनसे सचमुच बात नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि सामनेवाला भी अपनी ही बात की धारा में बहता रहता है और इसका ध्यान नहीं रखता कि मैं क्या कहूंगा या कहता।जबकि अपने से विरोधी दृष्टिकोण को समझना और उसे मानना सर्वथा भिन्न बात है।
एक बार दक्षिण भारत की किसी सभा में डॉ. लोहिया भारत के सभी राजनीतिक दलों की कथनी और करनी का फर्क समझा रहे थे। उन्होंने कहा कि इन दलों के लिए कथित ‘विशेष परिस्थितियों’ की आड़ में सब कुछ जायज हो जाता है।
दक्षिण भारतीय श्रोताओं को संस्कृतमय अंदाज में इस बात को समझाने के लिए उन्होंने दिलचस्प अदा के साथ कुछ ऐसा कहाा- ‘वाक् स्वातंत्र्यम्, कर्म नियंत्रणम्, इति जनतांत्रिक अनुशासनम्।
विपरीतम् कर्म स्वातंत्र्यम्, वाक् नियंत्रणम् भारते प्रचलित पंथ:।’
केवल गुणदर्शन की भावना से और साफ-सुथरे मन से डॉ. राम मनोहर लोहिया को पढऩा कई बार झकझोरता भी है और गुदगुदाता भी है।
भारतीय समाज भटकाव का शिकार हुआ, क्योंकि वह विवेकानंद, गांधीजी, विनोबा और डॉ. लोहिया जैसे मौलिक, मानवतावादी और कर्मयोगी विचारकों को या तो भूल गया, या फिर उनके विचारों में घालमेल कर और उन्हें विकृत कर अपने और दूसरों के सामने परोसता रहा। यह हमारी एक मानवोचित कमी ही है और इस दोष को समय रहते दूर भी किया जा सकता है। 

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