संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दिवस पर हिंदी पर कर लें कुछ चर्चा?
14-Sep-2021 5:09 PM (214)

आज के दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है। लोग इस भाषा के बारे में कई तरह की बातें लिखते हैं और सालाना श्रद्धांजलि के अंदाज में इस भाषा के महत्व को याद किया जाता है। ऐसे मौकों पर बहुत से लोग भावुक होने लगते हैं और राष्ट्रभाषा की उपेक्षा गिनाते हुए वे हिंदी सेवा की जरूरत पर बोलने और लिखने लगते हैं। हिंदी सेवा, हिंदी सेवक जैसे शब्द पूरे वक्त कहीं न कहीं हवा में तैरते रहते हैं। बहुत से लोग इसी नाम से बनाए गए संगठनों की कुर्सियों पर काबिज रहते हैं, कुछ लोग इसे एक पूर्णकालिक पेशे की तरह भी बना लेते हैं और वे हिंदी सेवक का दर्जा पाकर एक किस्म की शहादत की कोशिश में लग जाते हैं। यह माहौल कुछ उसी तरह का लगता है जैसे घूरों पर पलती गायों के देश में लोग पूर्णकालिक गौसेवक हो जाते हैं। गाय को सिर्फ पॉलिथीन वाला घूरा नसीब होता है और गौसेवक गाय के हिस्से की रोटी खाने लगते हैं।

हिंदी भाषा की सेवा बड़ा मजेदार शब्द है। हिंदी को कम पढऩे वाले कोई विदेशी अगर सुनेंगे तो वे हिंदी को मां समझेंगे और उन्हें लगेगा कि ऐसे सेवक मां के पैर दबाने में लगे रहते हैं। हम अपनी साधारण समझ से जब यह सोचते हैं कि इस बड़े देश में सबसे बड़ा हिस्सा जब हिंदी बोलने वालों का है, तो फिर हिंदी इस्तेमाल करने वालों का बुरा हाल क्यों है? कुछ लोग इस बात को मुगल राज तक ले जाएंगे जब भारत में उर्दू का प्रचलन शुरू हुआ और सरकारी कामकाज उसमें होने लगा। फिर अगर देखें तो ईस्ट इंडिया कंपनी आई और देश का सरकारी काम, अदालती काम उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी में भी होने लगा। फिर जब भारत के आजाद होने का वक्त आया, देश के संविधान को बनाने की बात आई, तो दुनिया के बहुत से संविधानों की मिसालें अंग्रेजी में थीं, और भारत का उस वक्त का सत्ता का तबका अंग्रेजी जानने-समझने वाला था, तो कानून अंग्रेजी में बना। सरकार का कामकाज भी आजादी के बाद अंग्रेजी में शुरू हुआ, इसलिए देश के बीच के एक बड़े हिस्से को छोडक़र बाकी राज्यों में हिंदी बोलचाल की भाषा भी नहीं थी, बोली भी नहीं थी।

भारत के नक्शे को अगर देखें तो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान इतने राज्य ही अपने थोड़े या अधिक हिस्से में हिंदी बोलने वाले थे, बाकी के तमाम राज्य हिंदी से परे की दूसरी जुबानों वाले थे। और जिन राज्यों को यहां हम गिना रहे हैं, इनके भीतर भी क्षेत्रीय बोलियां बहुत ताकतवर थीं, जैसे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी, और दो-तीन और बोलियां, ऐसा हाल हिंदी भाषी इन प्रदेशों का भी था। जैसे भोजपुरी में, राजस्थानी में, हरियाणवी और गढ़वाली में कितने ही किस्म की फिल्में बनती हैं, संगीत रिकॉर्ड होता है, साहित्य लिखा जाता है, लोकगीत चले आ रहे हैं। इनकी लिपि देवनागरी होने से इनको हिंदी भाषी मान लिया गया और वह गिनती हकीकत से थोड़ी दूर रही।

लेकिन यह भी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था, और हिंदी से सत्ताहीन तबके, कमजोर तबके, उद्योग-बाजार और आयात-निर्यात से परे के तबके, तकनीकी शिक्षा और उच्च शिक्षा से परे के तबके अपना काम चलाते रहे और कमजोर बने भी रहे। चूंकि कामयाबी का एक रिश्ता अंग्रेजी से एक सदी से अधिक से बना हुआ था, इसलिए वह चलते रहा, और देश के बाहर हिंदुस्तान का अधिकतर लेना-देना अंग्रेजी भाषी देशों से था इसलिए भी वह चलते रहा। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते-समझते थे, और जिनके लिए हिंदी में ऊंची पढ़ाई करना मुश्किल था, बाहरी दुनिया से संपर्क मुश्किल था, कम्प्यूटर से लेकर टेक्नोलॉजी तक का काम मुश्किल था, वे पीछे रहते चले गए। और जिस तरह पीछे रह गई एक पीढ़ी की अगली पीढ़ी के पीछे रहने का खतरा अधिक रहता है, उसी तरह का हाल हिंदी बोलने वालों का हुआ। दूसरी तरफ हिंदी को एक भावनात्मक मुद्दा मानने वाले लोग उसकी सेवा के नाम पर अंग्रेजी के विरोध को आक्रामक तरीके से बढ़ाते रहे, और हिंदी इलाकों में एक के बाद दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी की जानकारी के बिना, अंग्रेजी में काम करने वाले राज्यों के लोगों से पीछे रहती चली गईं।

भाषा को लेकर आज इस जगह इस चर्चा में अपने विचार लिखने के लिए हमारे पास दो छोटी-छोटी बातें हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तान में जो लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं उनको यह भी समझना होगा कि जिस शुद्ध हिंदी को वे राष्ट्रभाषा करार देना चाहते हैं, वह हिंदी यहां की राष्ट्रभाषा नहीं रही, नहीं है, और नहीं रहेगी। मुगलों की उर्दू और अंग्रेजों की अंग्रेजी आने के पहले भी हिंदुस्तान के आज के कुछ हद तक के हिंदी भाषी राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों की इतनी जबर्दस्त पकड़ थी, और आज भी है कि आज की खड़ी बोली जैसी हिंदी, शुद्ध कही जाने वाली हिंदी, मोटे तौर पर बहुत सीमित थी। जिस तरह हिंदी को अलग, और हिंदुस्तानी को अलग मान लिया जाता है, उससे हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। आज की हिंदी के साथ उर्दू, अंग्रेजी, और हिंदुस्तान की दर्जनों दूसरी भाषाओं और बोलियों ने मिलकर जो हिंदुस्तानी जुबान बनाई है, उसमें से फेंटकर सिर्फ खालिस हिंदी को जब अलग कर लिया जाता है, और उसे एक सेवा की तरह की भावना से जोड़ दिया जाता है तो वह बाकी हिंदुस्तानियों के काम की नहीं रह जाती। जिस तरह किसी मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम समाधि या दरगाह पर जब इनमें से किसी एक ही धर्म के रीति-रिवाज, उसी धर्म के रंगों को लेकर हावी हो जाते हैं, तो दूसरे धर्म वहां से हटना बेहतर समझते हैं। इसी तरह का हाल हिंदी का हुआ, और हिंदी इलाकों को यह ठीक से पढऩे-समझने भी नहीं मिला कि गैरहिंदी राज्यों में, खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी किस हद तक बेकाम की जुबान है। उसका न कोई अस्तित्व है, न उसकी वहां कोई जरूरत है। वहां हिंदी जानने, समझने और बोलने वाले लोग ऐसे कामगार हैं जिनका कि भारत के हिंदी भाषी राज्यों से कामकाज का वास्ता पड़ता है। इससे परे वे अपनी क्षेत्रीय भाषा में खुश हैं और आगे बढऩे की संभावनाएं देने वाली अंगे्रजी जुबान के साथ खुश हैं।

हिंदुस्तानी से अपने-आपको अलग करने के फेर में शुद्धतावादी हिंदी ने अपने दायरे को बहुत सीमित कर लिया। वरना एक वक्त था जब प्रेमचंद जैसे लेखक उर्दू को भी समझते थे, उर्दू में भी लिखते थे, और जब वे हिंदी लिखते थे, तो वह गरिष्ठतावादी, शुद्धतावादी हिंदी से परे की हिंदुस्तानी जुबान होती थी, यही वजह है कि वह आसानी से लोगों के समझ आती थी, और आज पौन सदी बाद भी वह आज के बहुत से हिंदी लेखन के मुकाबले समझने में अधिक आसान है। हिंदी की सेवा या शुद्धता के नाम पर जो लोग लगे रहते हैं, उन्हीं से इस भाषा की संभावनाओं को नुकसान हुआ। किसी भाषा का असरदार होना, उसकी संवाद-क्षमता का अधिक होना जरूरी होता है, न कि उसका शुद्ध होना। हिंदी को जब लगातार शुद्ध बनाए रखने की ऐसी कोशिशें हुईं कि वह अधिक से अधिक लोगों की समझ से परे होती चली गई, तो वह अपना असर और खोती चली गई, क्योंकि वह कम लोगों के इस्तेमाल की रह गई। हिंदी के साथ एक दिक्कत और यह हो गई है कि अंग्रेजी से नापसंदगी के चलते हिंदी के जो लोग अंग्रेजी से परहेज करने लगे, उनका ज्ञान-संसार भी सीमित रहने लगा, और ज्ञान के विकल्प की तरह उन्होंने भावनाओं और विशेषणों का इस्तेमाल अधिक किया।

भाषा इस्तेमाल के लिए होती है, उसका मकसद किसी से अपने पैर दबवाना नहीं है, उसका मकसद किसी एक की बात को दूसरे तक पहुंचाना है। भाषा एक औजार की तरह है जो अगर अच्छी तरह अपना काम करे, हुनरमंद कारीगर के काम में उससे मदद मिले, तो ही उस औजार की इज्जत है। जिस घन से अच्छा वार हो सके, वह लोहे का भी अच्छा। और जिसके वार से चोट न पहुंचे, वह सोने का घन भी किसी काम का नहीं। इसलिए भाषा को बांहें फैलाकर दूसरी भाषाओं और बोलियों से मिलकर चलना चाहिए, उन्हें गले मिलाकर चलना चाहिए। भाषा से बिल्कुल परे की एक मिसाल हम यहां देना चाहेंगे जो कि हमें अपने किस्म की बेमिसाल बात लगती है। सिखों के सबसे महान ग्रंथ गुरूग्रंथ साहिब को देखें तो गुरूनानक देव ने उस वक्त के मुस्लिम, हिंदू, दलित, सभी तबकों के संतों की बातों को सिखों के इस ग्रंथ में उनके नाम सहित जोड़ा। गुरूनानक चाहते तो उन्हें सिर्फ अपनी बातों से ही यह ग्रंथ पूरा कर देने से कौन रोक सकता था? दुनिया के अधिकांश धार्मिक गं्रथ सिर्फ अपनी ही बातों के होते हैं। लेकिन धर्मों की ऐसी दुनिया में जब गुरूनानक देव ने बेझिझक दूसरे धर्मों को इतना महत्व दिया, तो उनकी उस दरियादिली से भी यह ग्रंथ इतना महत्वपूर्ण बन पाया। इसी तरह का हाल जुबान के मामले में अंग्रेजी का रहा, जिसने दुनिया की दर्जन भाषाओं से सैकड़ों शब्दों को हर बरस अपने में शामिल करने का सिलसिला चला रखा है और अंग्रेजी के शब्दकोषों में ऐसी लिस्ट हर साल जुड़ती भी है।

विचार के इस कॉलम में इस बड़े मुद्दे पर पूरा लिखना मुमकिन नहीं है इसलिए हम आधी-अधूरी बात को ही यहां छोड़ रहे हैं, यहां उठाए गए कुछ पहलुओं पर कुछ सोच-विचार की उम्मीद के साथ।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : एक बेलगाम शासन-प्रमुख से किस तरह श्रीलंका आर्थिक इमरजेंसी में !
13-Sep-2021 5:10 PM (191)

भारत के ठीक पड़ोस का एक देश श्रीलंका इन दिनों आर्थिक इमरजेंसी से गुजर रहा है। देश की हालत यह हो गई है कि लोग दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं, दुकानों में सामान खाली हो चुका है, लोग खाली झोले लिए हुए दुकानों के सामने लंबी कतारों में हैं, सामानों के दाम आसमान पर पहुंच रहे हैं. जो सामान आयात किया जाता है उसके कारोबारी भी बुरी दिक्कतें झेल रहे हैं क्योंकि श्रीलंका के रुपए का दाम डॉलर के मुकाबले 200 तक पहुंच गया है, और सरकार ने चीजों के आयात या विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल पर कई तरह की बहुत ही कड़ी रोक लगा दी है। देश में हालत कितनी खराब है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां की फौज के एक मेजर जनरल को खाने-पीने के सामानों के इंतजाम में लगाया गया है कि वह व्यापारियों की जमाखोरी पर नजर रखे जहां नियमों के खिलाफ सामान इक_े किए गए हैं उन्हें जप्त करे, और सरकारी ढांचे के तहत उन्हें उचित दामों पर ग्राहकों को बेचने का इंतजाम करें। श्रीलंका की सेना अब इस काम को देख रही है। लेकिन यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि श्रीलंका की इस नौबत के लिए कौन सी बातें जिम्मेदार हैं?

इस सिलसिले की शुरुआत कुछ जानकार लोगों के मुताबिक अप्रैल के महीने से होती है जब वहां के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने यह फैसला लिया कि पूरे देश में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद किया जा रहा है। क्योंकि रासायनिक खाद पूरे का पूरा आयात होता था, इसलिए यह सरकार के हाथ में था कि खाद का आयात, और इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए और देश को पूरी तरह जैविक खाद की तरफ ले जाया जाए। खबरें बताती हैं कि राष्ट्रपति राजपक्षे ने संयुक्त राष्ट्र में भाषण देते हुए अपने इस फैसले को ऐतिहासिक फैसला बताया था और दुनिया के भविष्य को बदलने वाला भी। राजपक्षे ने दुनिया के दूसरे देशों को भी यह नसीहत दी थी कि वे भी पूरी तरह रासायनिक खाद को बंद करके पूरी तरह जैविक खाद की तरफ जाएं। अब दिक्कत ये हुई है कि श्रीलंका की खेती जिसमें कई किस्म की फसल देशों से निर्यात होती थी, उनमें चाय पत्ती की फसल इस बार आधी ही रह जाने की आशंका चाय उगाने वाले संगठनों को है. कुछ ऐसा ही किसान संगठनों का मानना है कि देश में चावल की उपज इस साल आधी रह जाएगी। राष्ट्रपति के इस अतिमहत्वाकांक्षी या उन्मादी किस्म के फैसले का नतीजा यह निकला है कि देश में जैविक खाद का उत्पादन तो रातों-रात नहीं बढ़ पाया, लेकिन रासायनिक खाद आना बंद हो गया। श्रीलंका के बाहर के भी बहुत से कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस किस्म का फैसला एक रसायन-विरोधी सोच या पसंद को बताने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसका व्यावहारिकता से कोई लेना-देना नहीं है। वैज्ञानिक मानते, और जानते हैं कि दुनिया के किसी देश ने इस तरह रातों-रात रासायनिक खाद को छोडऩे में कामयाबी नहीं पाई, और न ही कोई देश पूरी तरह से जैविक खाद पर जा पाया है। यूरोप के जो सबसे संपन्न देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत है, वे देश भी पूरी तरह जैविक खाद पर नहीं जा पाए हैं।

दुनिया के वैज्ञानिक और अर्थशास्त्रियों का यह अंदाज है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति का यह सनकी, मनमाना, और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के लिया गया यह फैसला देश को तबाह करने जा रहा है, क्योंकि इसके पीछे न किसानी की समझ है, न अर्थशास्त्र की समझ है। यह केवल एक ऐसे शासक के तानाशाह दिमाग से निकला हुआ फैसला है, जो यह सोचता है कि वह कुछ भी कर सकता है। क्योंकि श्रीलंका की सरकार पूरी तरह से राजपक्षे कुनबे तले दबी हुई है, इसलिए कुनबे से भरा हुआ मंत्रिमंडल राष्ट्रपति के साथ है, और कोई वहां पर विरोध कर नहीं पा रहा है। राजपक्षे के छोटे भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं, तीन और मंत्री घर के हैं. कहने के लिए तो देश में आज सिर्फ आर्थिक आपातकाल लगाया गया है लेकिन वहां के कानून के जानकार लोगों का कहना है कि यह पूरी तरह से पूरा-आपातकाल ही है, और इसमें नागरिकों पर वे सारे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जो इसके पहले के आपातकाल में लगाए गए हैं। इसका मतलब यह है कि लोग वहां सरकार की किसी बात का विरोध नहीं कर पाएंगे, सरकार उन्हें बिना लंबी सुनवाई जेलों में बंद रख सकेगी, और देश की फसल गिरने की जो खतरनाक नौबत वहां आई हुई है, उसे छुपाए रखने के लिए, दबाए रखने के लिए मीडिया और आम लोगों को कुचला भी जा सकता है। श्रीलंका जो कि अभी कुछ अरसा पहले तक इस इलाके की एक अच्छी अर्थव्यवस्था माना जाता था, उसने अपने शासन प्रमुख के इस एक मनमाने फैसले के चलते दम तोड़ दिया है, और लोगों को खाने-पीने तक के सामान नसीब नहीं हो रहे हैं। यह किसी भी देश के लिए एक भयानक नौबत है कि वहां की सेना राशन का इंतजाम देख रही है।

जब कोई देश इस किस्म की भयानक हालत का शिकार रहता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय शिकारियों के लिए एक शिकार भी बन जाता है। भारत के बहुत से लोग पिछले वर्षों की श्रीलंका की चीन नीति देखते हुए कुछ परेशान भी चल रहे थे कि श्रीलंका धीरे-धीरे चीन पर अधिक से अधिक निर्भर होते चल रहा है। अब आज हालत यह है कि श्रीलंका के इस आर्थिक आपातकाल के पहले के एक साल में चीन ने उसे बहुत बड़ा कर्ज दिया हुआ है। श्रीलंका की कोरोना की पहली लहर से जूझने की कई जगहों पर तारीफ हो रही है और इसके साथ ही यह याद रखना जरूरी है कि श्रीलंका को चीन से कोरोना की वैक्सीन मिली, भारत से नहीं मिली। श्रीलंका को चीन से कर्ज मिला, भारत से नहीं मिला। भारत के पिछले कर्ज की वापिसी के लिए श्रीलंका ने कुछ और समय मांगा है, उस पर भी भारत ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है। इसलिए आज चीन आज श्रीलंका के आड़े वक्त पर उसके साथ में खड़ा हुआ देश है, और भारत को यह सोचना चाहिए कि एक तरफ पाकिस्तान, कुछ दूरी पर अफगानिस्तान, और इधर श्रीलंका, क्या यह सब मिलकर भारत की एक चीनी घेराबंदी नहीं बन रहे हैं?  दूसरी तरफ आज श्रीलंका जैसी मुसीबत से गुजर रहा है और उसे मदद की जितनी जरूरत है, उसमें हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति के तहत श्रीलंका के किस हद तक काम आना है, इसे तय किया जाना चाहिए। अगर सरकार यह तय करती है कि उसे कुछ भी नहीं करना है, तो यह एक फैसले के तहत होना चाहिए, न की कोई फैसला न लेने से ऐसी नौबत आनी चाहिए।

श्रीलंका दुनिया के तमाम देशों के लिए मनमाने आत्मघाती तानाशाह फैसले का शिकार एक देश बनकर बुरी हालत में सामने खड़ा है, देखें आगे से कौन-कौन से देश और कौन-कौन से शासन प्रमुख क्या-क्या सबक लेते हैं। श्रीलंका की नौबत से दुनिया के दूसरे देशों को चाहे जो सबक लेना हो वे लेते रहें, और शायद यह सबक सबको लेना चाहिए कि कोई शासन प्रमुख अपने बेबुनियाद और मनमाने फैसलों से देश को किस तरह गड्ढे में डाल सकते हैं, और किस तरह लोकतांत्रिक देशों को ऐसे फैसलों, और ऐसे शासकों से बचना चाहिए। श्रीलंका की भुखमरी की नौबत की तरफ जाने के खतरे को देखते हुए भारत सहित दूसरे देशों को मनमाने सरकारी फैसलों के बारे में दोबारा सोचना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के हिस्से का काम मामूली पढ़े-लिखे नेताओं को नहीं करना चाहिए।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मीडिया के सोशल मीडिया पेज पर मानहानि के लिए जिम्मेदार कौन?
12-Sep-2021 2:55 PM (276)

ऑस्ट्रेलिया में अभी वहां की सबसे बड़ी अदालत ने एक फैसला दिया है जिसमें उसने मीडिया कंपनियों को सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट के नीचे लोगों के किए गए कमेंट के लिए भी जिम्मेदार माना है. मानहानि के एक मामले में निचली अदालत से चलते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, और मीडिया कंपनियों का यह कहना था कि ये टिप्पणियां सोशल मीडिया पर दूसरे लोग करते हैं जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अदालत ने यह माना है कि जब मीडिया कंपनियां अपने समाचार या दूसरी सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट करती हैं, तो उसका मतलब यही होता है कि वह लोगों को वहां पर टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित कर रही हैं, या उनका उत्साह बढ़ा रही हैं। इसलिए उनकी टिप्पणियां मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी रहती है। मीडिया और सोशल मीडिया के संगम को लेकर यह एक दिलचस्प फैसला है और दिलचस्प इसलिए भी है कि ऑस्ट्रेलिया एक परिपच् लोकतांत्रिक देश है, और वहां की अदालत का यह फैसला मिसाल के तौर पर दुनिया के दूसरे कई देशों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा जहां की अदालतों के सामने मीडिया कंपनियों के लिए यह एक चुनौती रहेगी कि वे ऐसे तर्क को खारिज करने के लिए कोई दूसरे तर्क दें। फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया कंपनियों के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, और इस पर अंतिम फैसला दे दिया है कि एक सार्वजनिक फेसबुक पेज बनाने और उस पर समाचार सामग्री साझा करने से मीडिया कंपनियां प्रकाशक हो जाती हैं, क्योंकि उन्होंने पाठकों को टिप्पणियां करने के लिए मंच उपलब्ध कराया, और उन्हें टिप्पणियां करने के लिए प्रोत्साहित किया।

अब हिंदुस्तान में इससे मिलती-जुलती नौबत के बारे में अगर देखें तो सोशल मीडिया और इंटरनेट के आने के पहले से अखबारों में पाठकों के पत्र नाम का एक कॉलम बड़ा लोकप्रिय हुआ करता था और अखबार अपने पाठकों का उत्साह बढ़ाते थे कि वे चि_ियां लिखें, और उनमें से चुनिंदा चि_ियां प्रकाशित की जाती थीं। धीरे-धीरे जब लोगों में कानूनी जागरूकता बढ़ी और कुछ मामले मुकदमे होने लगे तो अखबार उसके नीचे यह लाइन लिखने लगे कि पाठकों की राय से संपादक की सहमति अनिवार्य नहीं है। हालांकि उस बात का कोई कानूनी वजन नहीं था, क्योंकि विचार से सहमति हो या असहमति, जब अखबार में छपा है तो उसे तो उसके छपने का फैसला तो संपादक ने ही लिया है. पाठकों के विचारों से संपादक असहमत हो सकते हैं, लेकिन जब छपा है तो संपादक की सहमति छपने में तो थी ही। किसी मामले-मुकदमे में ऐसी नौबत आई या नहीं, ऐसा तो अभी याद नहीं पड़ता है, लेकिन हाल के वर्षों में हिंदुस्तानी मीडिया में एक चलन और बढ़ गया है। अखबारों में या पत्रिकाओं में, या फिर इंटरनेट पर वेब साइटों में भी, लोगों के लिखे गए लेख के नीचे छापा या पोस्ट किया जाता है कि यह लेखक की निजी राय है। यह लाइन अपने आपमें बड़ी हास्यास्पद इसलिए है कि लेखक की अगर निजी राय नहीं होती और वह किसी और की राय को लिखते, तो जाहिर है कि उसे दूसरे के नाम के साथ लिखते। यह फिर अखबार या दूसरे किस्म का मीडिया अपनी जिम्मेदारी से कतराने की कोशिश करते हुए दिख रहा है ताकि किसी कानूनी बखेड़े के खड़े होने पर यह कहा जा सके कि हमने तो पहले ही लिख दिया था कि यह विचार लेखक के अपने हैं। लेखक का तो जो होना है वो होगा, लेकिन मीडिया के प्रकाशक अपनी जिम्मेदारी से कहीं बरी नहीं हो सकते।

ऑस्ट्रेलिया के इस मामले को लेकर यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया या वेबसाइटों पर किसी मीडिया कंपनी की सामग्री के नीचे लोग जब अपनी प्रतिक्रिया लिखते हैं, तो उस पेज के प्रबंधक को यह अधिकार रहता है कि वे अवांछित या नाजायज टिप्पणियों को हटा सकें। जो कंपनियां कुछ पोस्ट करती हैं, उन कंपनियों पर यह जिम्मेदारी सही है कि अगर वहां मानहानि या भडक़ाने की बातें लिखी जा रही हैं, तो उन्हें हटाना भी इन कंपनियों की जिम्मेदारी है, और वे अगर इसे नहीं हटाती हैं तो इसे उनकी सहमति या अनुमति माना जाना चाहिए। सोशल मीडिया का तो कहना मुश्किल होगा लेकिन बहुत सी वेबसाइटों पर लोगों की लिखी गई टिप्पणियां तुरंत ही पोस्ट नहीं हो जाती उन्हें वेबसाइट संचालक या उसके मालिक जब देख लेते हैं, और उससे सहमत रहते हैं तभी वे पोस्ट होती हैं।

ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे हिंदुस्तान पर लागू न होता हो लेकिन आगे-पीछे क्योंकि इंटरनेट और सोशल मीडिया की विश्वव्यापी मौजूदगी है, इसलिए दुनिया की अदालतों में एक दूसरे की मिसालें दी जाती रहेंगी। इसलिए इस बात से हम सहमत हैं कि पेशेवर मीडिया कंपनियों की पोस्ट की हुई सोशल मीडिया सामग्री पर जो टिप्पणियां होती हैं उनकी जिम्मेदारी से वे कंपनियां बरी नहीं हो सकतीं। कुछ ऐसा ही मामला राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया पेज पर भी होना चाहिए जिन पर लोग हिंदुस्तान में तो तरह-तरह की धमकियां देते हैं, और चरित्र हनन करते हुए लांछन लगाते हैं. ऐसे लोगों की लिखी गई बातों को अनदेखा करने के लिए इन राजनीतिक दलों को जिम्मेदार ठहराना चाहिए जिनके वेबपेज हैं। या तो वे ऐसी तरकीब निकालें कि उन पर पोस्ट होने के पहले उसे देख लें, या उसे पोस्ट होने के बाद हटाने के लिए एक नियमित इंतजाम करके रखें। मीडिया कंपनियों और राजनीतिक दलों को ऐसी रियायत नहीं दी जा सकती कि वे किसी मकान के मालिक की तरह दीवार बनाकर भीतर रहे लेकिन बाहर दीवार पर अगर कोई गालियां लिख जाए तो वे उसके लिए जिम्मेदार करार नहीं दिए जाएं। कारोबारी कंपनियों और पेशेवर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी आम लोगों के मुकाबले अधिक होनी चाहिए क्योंकि वे अपने धंधे के नफे के लिए ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दुनिया में पूरी हिफाजत तो इंसाफ ही दे सकता है, कोई ताकत नहीं दे सकती
11-Sep-2021 5:22 PM (226)

अमेरिका में 20 बरस पहले दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ था, और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारतों को ओसामा बिन लादेन के विमानों ने जाकर ध्वस्त कर दिया था, जिसमें 3000 से अधिक लोग मारे गए थे, तब से लेकर अब तक इन 20 वर्षों में अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक के कई जगहों पर आतंक को खत्म करने के नाम पर लाखों लोगों को मारा लेकिन आतंकी हमले खत्म नहीं हुए। दुनिया के अलग-अलग बहुत से इलाकों में आतंकियों ने अमरीकियों पर हमले किए, कहीं उन होटलों को बम का निशाना बनाया जहां पर अमेरिकी ठहरे हुए थे, तो कहीं ऐसे नाइट क्लब में धमाका किया जहां दर्जनों अमेरिकी मारे गए। लेकिन दुनिया का हिंसा का  हर बड़ा मामला आतंकवाद से जुड़ा हुआ हो यह भी जरूरी नहीं है, और वह धार्मिक आतंकवाद से जुड़ा हुआ हो यह भी जरूरी नहीं है। लोग जहां जिनके हाथ में जितने गैरजरूरी और जरूरत से अधिक ताकतवर हथियार आ जाते हैं वहां उनके दिमाग में हिंसा शुरू हो जाने का एक खतरा रहता ही है। आज जब चारों तरफ तालिबान की खबरें फैली हुई हैं और हिंदुस्तान जैसा देश इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि क्या कश्मीर में तालिबान की अगुवाई में, या उसकी मदद से बाहर से आतंकी आ सकते हैं, तो भारत अमेरिका और रूस जैसे दूसरे देशों से इस बारे में बात भी कर रहा है। उसने तालिबान से भी कहा है कि अफगानिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह नहीं बनना चाहिए। यह एक और बात है कि तालिबान खुद ही दुनिया के सबसे बड़े आतंकी माने जाते हैं, और वे क्या करेंगे इसके बारे में किसी को कोई अंदाज है नहीं।

अब सोचने और समझने की बात यह है कि क्या हर हमला रोकने लायक होता है? न सिर्फ पाकिस्तान या हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक चौकस और तैयार देशों में भी हमले होते हैं, और अमरीका जैसे सबसे अधिक तैयार देश में तो बिना किसी मजहबी आतंक वाले हमले भी हर बरस दर्जन भर तो हो ही जाते हैं, और कोई एक अकेला बंदूकबाज ही जाकर स्कूल-कॉलेज के बहुत से बच्चों को मार डालता है। इसलिए इस दुनिया में कोई अगर यह सोचे कि पुलिस और फौज की बंदूकों से हर जगह पर महफूज किया जा सकता है, तो वह निहायत ही नासमझी की बात होगी। दुनिया का बड़े से बड़ा इंतजाम भी किसी देश को आत्मघाती हमलों से नहीं बचा सकता। जब कोई आतंकी या किसी दूसरी किस्म का हमलावर यह तय कर ले कि उसे अपने-आपको उड़ाकर भी दूसरों को मारना है, तो भीड़ भरी जगहों पर कहीं पर भी लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता है। जब हम अपनी साधारण समझ-बूझ से ऐसे हमलों की गुंजाइश के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि दुनिया की आबादी के अधिकतर लोग आज इसीलिए जिंदा हैं, कि किसी ने उनको मारना अब तक तय नहीं किया है। अगर सरकारी इंतजाम से किसी के जिंदा रहने की बात करें, तो हिंदुस्तान जैसे सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश में दो-चार करोड़ से अधिक लोगों को बचा पाना मुमकिन नहीं होगा।

इसलिए आज न सिर्फ पाकिस्तान या भारत, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को यह सोचना होगा कि किस तरह इंसान और इंसान के बीच गैरबराबरी खत्म की जाए, किसी गरीब के हक छीनना कैसे खत्म किया जाए, किसी जाति या धर्म, किसी नस्ल या नागरिकता के लोगों को मारना किस तरह रोका जाए, ताकि बदले में जवाबी हमले में दूसरे लोग न मारे जाएं। कुल मिलाकर बात यह है कि जब तक दुनिया में आर्थिक और सामाजिक, धार्मिक और नस्लवादी भेदभाव खत्म नहीं होंगे, जब तक सामाजिक न्याय का सम्मान नहीं होगा, तब तक आतंक और हिंसा को खत्म करना मुमकिन भी नहीं होगा। और कल भी हमने इसी जगह भारत के उन लोगों को सावधान किया था जो कि आज यहां धार्मिक और सामाजिक उन्माद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि लोकतंत्र से ऊपर जाकर इस देश में कुछ तबकों के धार्मिक अधिकार खत्म करने की बात कर रहे हैं, कुछ लोग जो कि लोकतंत्र को खत्म करके एक धार्मिक-राज लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनको यह समझ लेना चाहिए कि जब हिंसा और बेइंसाफी बढ़ते हैं, तो फिर बेकाबू मौतें भी होती हैं। और अगर हिंदुस्तान या किसी दूसरे देश को जिंदा रहना है तो उन्हें सामाजिक न्याय की तरफ बढऩा होगा।

धर्म से परे भी समाज में आर्थिक न्याय जहां-जहां नहीं हुआ, भारत ऐसे तमाम इलाकों में आज नक्सल हिंसा से जूझ रहा है। इन इलाकों में सरकार के भ्रष्ट लोगों में गरीब आदिवासियों का जितना हक खाया होगा, आज सरकार नक्सल मोर्चे पर उससे हजार गुना गंवा रही है। हमारा हमेशा से यह मानना है कि सामाजिक न्याय देना, आतंक से जूझने के मुकाबले सस्ता पड़ता है, आसान रहता है, और जिंदगियां भी इसी तरह से बच सकती हैं। आज भारत में जिस तरह से एक सामाजिक अन्याय का माहौल खड़ा किया जा रहा है, उस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपने सांसदों को महज सुझाव देना काफी नहीं है। देश में एक न्यायपूर्ण वातावरण लाने की जरूरत है वरना सरहद पार एक मिसाल सामने है कि लोकतंत्र कमजोर और खत्म होने पर क्या हाल करता है। अफग़़ानिस्तान में अमरीका की बीस बरस की ज्यादती का नतीजा है कि वहां तालिबान कामयाब हुए हैं। हिंदुस्तान के भी देश-प्रदेश की सरकारों को ज्यादती से बचना चाहिए।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जब अहंकार की मालिश के लिए फरेब काफी हो...
10-Sep-2021 5:31 PM (274)

छोटी-छोटी झूठी या नामौजूद चीजों से खुशियां हासिल, जैसे रफाल से अब चीन और पाकिस्तान घुटनों पर आ गए हैं, या थाली पीटने से कोरोना भाग जाएगा, और डॉक्टर का हौसला बढ़ जाएगा। जब लोग फरेब से खुश होने लगते हैं, तो कुछ असली कामयाबी जरूरी नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान में पिछले कई बरसों में लोगों को ऐसी कामयाबी का अहसास कराया गया है जो जमीन पर चाहे हो न हो, लोगों के मन में गुदगुदी करती है, और उनके अहंकार की अच्छी तरह मालिश कर देती है। उनमें देशप्रेम का एक ऐसा अहसास करा देती है जो हकीकत नहीं होता, और जिसकी कोई जरूरत भी नहीं होती। ऐसे देशप्रेम से उस देश का भी कोई भला नहीं होता जिसके लिए वह प्रेम दिखाया जा रहा है। ऐसे अहसास किसी देश की सरकार के कराए हुए ही हों, या किसी देश-प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के करवाए हुए ही होते हों, ऐसा भी नहीं है। किसी अखबार के मालक-चालक, यानी प्रकाशक-संपादक भी अपने आपके भीतर ऐसी खुशफहमी का शिकार हो सकते हैं। अगर वे लिखने में बहुत अच्छे हैं जिससे कि वाहवाही भी होती है, तो प्रकाशक की अपनी जिम्मेदारी में वे नाकामयाब भी हो सकते हैं। अपनी हसरतों को हकीकत मान लेने की यह चूक हर किस्म के लोगों में हो सकती है, इसके लिए किसी का सत्ता पर रहना जरूरी नहीं होता, और अपने मानने वालों की भीड़ को धोखा देना भी जरूरी नहीं होता। अमूमन भीड़ खुद ही धोखा खाने को तैयार रहती है, और अलग-अलग दौर में वह अलग-अलग किस्म के लोगों के लिए दीवानगी दिखाने को एक पैर पर खड़ी रहती है।

नामौजूद चीजों से फख्र और खुशी हासिल करना महज आज की किसी बात से हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है। इतिहास इतना लंबा रहता है, और उसके भी पहले की पुराण कथाएं, बाइबिल की कहानियां, या कुछ दूसरे पुराने धर्मों की कहानियां इतनी पुरानी रहती हैं कि उन्हें सच मानकर लोग अपने स्वाभिमान नाम के अहंकार को पुष्पक पर चढ़ाकर हवाई सफर के लिए भी भेज सकते हैं। विज्ञान की हर खोज पर अपना दावा कर सकते हैं, वे गणेश के धड़ पर हाथी के सिर को प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक मौजूद होने के सुबूत की तरह पेश कर सकते हैं, और कीर्तन में ढोल-मंजीरों की ताल के साथ सिर हिलाते हुए लोग उस सुबूत पर नासा का ठप्पा भी लगा देख लेते हैं। जब गर्व करने के लिए महज ऐसे अहसास काफी होते हैं, तो फिर जिंदगी में कुछ हासिल करना जरूरी कहां रह जाता है? जिस तरह टीवी के सामने बैठकर क्रिकेट में अपने देश की टीम को जीतते देखकर जिन लोगों को अपने खेलप्रेमी होने का अहसास रहता है, और वह बढ़ते-बढ़ते उन्हें खेल में अपनी दिलचस्पी लगने लगता है, और धीरे-धीरे वे अपने को खिलाड़ी भी महसूस करने लगते हैं, तो फिर खेलने की जरूरत कहां रह जाती है? इंसान का मिजाज ही कुछ ऐसा होता है कि वे अपने भीतर पहले से तय कर ली गईं धारणा को मजबूत करने के लिए कतरा-कतरा सुबूत जुटाने लगता है। उसकी पसंद और नापसंद इस पर आ टिकती है कि उसके निष्कर्ष को मजबूत बनाने के लिए कौन सी बातें काम आएंगी, तो फिर सुबूतों की वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत कहां रह जाती है?

सडक़ किनारे फुटपाथ पर तेल या ताबीज बेचने वाले लोग एक बड़े माहिर हुनर के साथ लोगों को पहले तो उस सामान की जरूरत का अहसास कराते हैं, और एक बार यह अहसास हो जाता है, तो फिर वे उसके इलाज की तरह एक सामान पेश कर देते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही राष्ट्रवाद के मामले में भी होता है। एक आक्रामक राष्ट्रवाद पहले तो एक नामौजूद दुश्मन का पुतला पेश करता है जो कि मुमकिन कद-काठी से अधिक बड़ा भी दिखता है। इसके साथ ही दुश्मन से खतरे का एक अहसास खड़ा किया जाता है, और इसके बाद फिर दुश्मनी के बीज बो देना, उसकी फसल को खाद दे देना बड़ा आसान हो जाता है। हिन्दुस्तान इन दिनों लगातार ऐसे अहसास का शिकार है। ऐसा अहसास कि पिछले 70 बरस में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ था, और देश को जो कुछ हासिल हुआ है, यह महज पिछले 5-6 बरस की बात है। जब लोग एक नामौजूद नाकामयाबी पर भरोसा करने उतारू हों, तब उन्हें आज की नामौजूद कामयाबी पर भी भरोसा करवाना आसान हो जाता है। 70 बरस की ‘नाकामयाबी’ पर हीनभावना, और अफसोस पैदा कर दिए जाएं, तो फिर उस जमीन पर आज की ‘कामयाबी’ का बरगद तेजी से खड़ा किया जा सकता है। यह सिलसिला नेता की कामयाबी, और जनता की कमजोरी का सुबूत भी होता है कि उसके सामने कब्ज की दवा, जमालघोटा, को भरकर भी एक कटोरा पेश किया जाए, और वह इस बात को हकीकत मान चुकी हो कि यह पेट भरने का अच्छा सामान है, तो लोगों को कब्ज से छुटकारे के लिए काफी एक बीज की जगह एक कटोरा जमालघोटा भी खिलाया जा सकता है।

दुनिया के इतिहास में बहुत से ऐसे लोग रहे हैं जिनका पेशा कुछ और रहा है, जिसमें वे नाकामयाब रहे हैं, लेकिन वे अपने किसी दूसरे हुनर की वजह से अहमियत पाते रहते हैं। मिसाल के लिए किसी शहर में कोई ऐसे डॉक्टर या इंजीनियर हो सकते हैं, या वकील हो सकते हैं जो अपने पेशे में खासे कमजोर हों, लेकिन जिनका समाजसेवा का बहुत ही बड़ा और सच्चा इतिहास रहा हो। आम लोग ऐसे में उन्हें एक अच्छा इंसान और मामूली पेशेवर मानने के बजाय अच्छा पेशेवर भी मानने लगते हैं। सार्वजनिक जिंदगी में बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जो कि अपनी ऐसी अप्रासंगिक और महत्वहीन खूबियों की वजह से महान मान लिए जाते हैं। जब लोगों को खालिस और जरूरी सच से परे की गैरजरूरी और अप्रासंगिक बातों के आर-पार देखने की ताकत हासिल न हो, या उनकी आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए जिससे कि वे उसके रंग के अलावा और किसी रंग में दुनिया को देख ही न सकें, तो फिर उन्हें एक खास रंग में रंगी हुई दुनिया को ही सच मनवा देना आसान हो जाता है। लोकतंत्र में लोगों को हकीकत और अहसास में फर्क करना आना चाहिए। लोकतंत्र में लोगों को धर्म और राजनीति के दायरों को अलग-अलग देखना आना चाहिए। लोगों को किसी की निजी ईमानदारी से परे उसकी सार्वजनिक जवाबदेही में बेईमानी को भी अलग पहचानना आना चाहिए। लोगों को किसी धर्म के कपड़ों में लिपटे लोगों की हरकतों को उन धर्मों से अलग करके देखना भी आना चाहिए, वरना हिन्दुस्तान में सैकड़ों-हजारों ऐसे मां-बाप हैं जो कि अपने बच्चों को ले जाकर खुद ही बापू-बाबाओं को समर्पित करते आए हैं, क्योंकि वे उनके धर्म-आध्यात्म के चोगों से परे उनकी हरकतों का अंदाज नहीं लगा पाते हैं, उनकी आंखें बाबाओं के दिव्यप्रकाश से चौंधिया जाती हैं, और उन्हें हकीकत नहीं दिख पाती।

आज जब दुनिया चांद के बाद दूसरे ग्रहों पर पहुंच चुकी है, समंदर के अंदर तलहटी को तलाश रही है, उस वक्त लोग अगर फरेब से गुरेज नहीं करेंगे, और किसी की पेश की गई हसरतों को हकीकत मान लेंगे, तो ऐसे देश या ऐसे लोग कम से कम कुछ सदी पीछे तो पहुंच ही जाएंगे। जिस देश को आगे बढऩा है, वह किसी तस्वीर पर बनाई गई सुहानी सडक़ पर सफर करके उसका आनंद लेते हुए आगे नहीं बढ़ सकता। लोगों को कड़ी और खुरदरी सडक़ पर मेहनत से सफर करके ही आगे बढऩा होता है। सबको मालूम है पुष्पक की हकीकत लेकिन...
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : निजता पर मंडराते खतरे की अनदेखी बहुत खतरनाक
09-Sep-2021 4:48 PM (292)

सुप्रीम कोर्ट की कुछ किस्म की रोक के बावजूद हिंदुस्तान में केंद्र सरकार जिस अंदाज में आधार कार्ड से हर चीज को जोड़ती चल रही है, उसे लेकर लोगों में एक बेचैनी है। अब आधार कार्ड से जमीन की खरीदी-बिक्री को भी जोड़ा जा रहा है, उससे पैन कार्ड को भी जोड़ा जा रहा है, और कोरोना वैक्सीन तो उससे जुड़ा हुआ है ही। धीरे-धीरे करके सरकार के पास इतनी डिजिटल जानकारी आ गई है कि उससे पेगासस जैसे मंहगे खुफिया घुसपैठिया हथियार का इस्तेमाल आम लोगों पर करने की जरूरत नहीं है, और आम लोगों पर निगरानी के लिए तो उनका आधार कार्ड अकेला ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा मुखबिर बन ही चुका है। आज बैंक, क्रेडिट कार्ड, रेल और प्लेन के रिजर्वेशन, कोरोना  टीकाकरण और कई किस्म की खरीदी बिक्री, इन सबको जिस तरह से आधार कार्ड से जोड़ दिया गया है, तो उससे सरकारी कंप्यूटरों पर बैठे हुए लोग, लोगों के बारे में इतनी जानकारियां निकाल सकते हैं, जितनी कल्पना भी लोग नहीं कर सकते। यह सवाल बहुत से लोगों के जेहन में पहले से तैर रहा है। और लोगों को यह भी याद होगा कि आधार कार्ड को जिस तरह से हर चीज में अनिवार्य किया जा रहा है, उससे भी यह नौबत आ रही है कि लोगों की निजी जिंदगी की हर बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होती जाएगी, और यह तो जाहिर है ही कि सरकारें, न सिर्फ हिन्दुस्तान की, बल्कि सभी जगहों की, अपने हाथ आई जानकारी का बेजा इस्तेमाल करती ही हैं। जब दूसरों की जिंदगी, कारोबार, खरीददारी, इन सबमें ताकझांक करने का मौका सरकारों को मिलता है, तो वह अपने लालच पर काबू नहीं पा सकतीं।

दस-पन्द्रह बरस पहले अमरीका की एक फिल्म आई थी, एनेमी ऑफ द स्टेट। इस फिल्म में सरकार एक नौजवान वकील के पीछे पड़ जाती है, क्योंकि उसके हाथ सरकार के एक बड़े ताकतवर नेता के कुछ सुबूत लग जाते हैं। अब इन सुबूतों को उससे छीनने के लिए सरकार जिस तरह से टेलीफोन, इंटरनेट, खरीदी के रिकॉर्ड, रिश्तेदारियों के रिकॉर्ड, और उपग्रह से निगरानी रखने की ताकत, जासूस और अफसर, टेलीफोन पर बातचीत और घर के भीतर खुफिया कैमरों से निगरानी रखकर जिस तरह इस नौजवान को चूहेदानी में बंद चूहे की तरह घेरने की कोशिश करती है, वह अपने आपमें दिल दहला देने वाली घुटन पैदा करती है। भारत में जो लोग आधार कार्ड को हर जगह जरूरी करने के कानून के खिलाफ हैं, उनका भी मानना है कि इससे निजता खत्म होगी। भारत में आज जिस तरह आधार कार्ड को जरूरी कर दिया गया है, उससे सरकार हर नागरिक की आवाजाही, सरकारी कामकाज, भुगतान और बैंक खाते, खरीददारी, सभी तरह की बातों पर पल भर में नजर रख सकती है।

और फिर जो बातें बैंकों और निजी कंपनियों के रिकॉर्ड में आती जाती हैं, उनका इस्तेमाल तो बाजार की ताकतें भी करती ही हैं। यह एक भयानक तस्वीर बनने जा रही है जिसमें भारत की सरकार लोगों से यह उम्मीद करती है कि वे अपनी हर खरीद-बिक्री, हर टिकट, हर रिजर्वेशन को कम्प्यूटरों पर दर्ज होने दें। आने वाले दिनों में किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम के लिए किसी शहर में पहुंचने वाले लोगों की लिस्ट रेलवे से पल भर में निकल आएगी, और सत्तारूढ़ पार्टी के कम्प्यूटर यह निकाल लेंगे कि ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों में पहुंचने वाले लोग पहले भी क्या ऐसे ही कार्यक्रमों में जाते रहे हैं, और फिर उनकी निगरानी, उनकी परेशानी एक बड़ी आसान बात होगी।

आज जो दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देश हैं, वहां भी नगद भुगतान उतना ही प्रचलन में है जितना कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान करना। भुगतान के तरीके की आजादी एक बुनियादी अधिकार है, और भारत सरकार आज कैशलेस और डिजिटल के नारों के साथ जिस तरह इस अधिकार को खत्म करने पर आमादा है, उसके खतरों को समझना जरूरी है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह याद रखना चाहिए कि उनकी पार्टी के लोग भी आपातकाल में बड़ी संख्या में जेल भेजे गए थे। उस वक्त अगर संजय गांधी के हाथ यह जानकारी होती कि किन-किन लोगों ने क्या-क्या सामान खरीदे हैं, तो उस जानकारी का भी बेजा इस्तेमाल हुआ होता। ठीक उसी तरह जिस तरह जगजीवन राम के अधेड़ बेटे सुरेश राम की अपनी महिला मित्र के साथ अंतरंग तस्वीरों का उस वक़्त मेनका गाँधी ने किया था. आज भारत में निजी जिंदगी की प्राइवेसी या निजता पर चर्चा अधिक नहीं हो रही है, और यह अनदेखी अपने आपमें बहुत खतरनाक है। हिंदुस्तान के लोगों को अभी तक निजता के खत्म होने के खतरों का ठीक से एहसास नहीं है, लोग इसे गंभीरता से ले नहीं रहे हैं। जिस दिन कारोबार के मुकाबले में लोग कारोबारी राज खोने लगेंगे, जिस दिन चुराई गई जानकारी के आधार पर लोगों के परिवार खत्म करवा दिए जाएंगे, रिश्ते टूटने लगेंगे,, लोगों का एक दूसरे से अविश्वास होने लगेगा, उस दिन लोगों को समझ में आएगा कि निजता खत्म होने के खतरे क्या रहते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 11 सितम्बर हमले की बरसी पर जवाब मांगते कुछ सवाल
08-Sep-2021 5:11 PM (241)

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार बन गई है और उसके चेहरों को देखकर अमेरिका सहित बहुत से देश तनाव में होंगे क्योंकि कुछ चेहरे अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी हैं। यह भी एक बड़ी अजीब बात है कि जिस 11 सितंबर की बरसी अमेरिका में बड़ी तकलीफ के साथ हर बरस मनाई जाती है, उसके ठीक पहले अफगानिस्तान में ऐसी सरकार बन रही है। न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो आसमान छूती इमारतों को बिन लादेन के विमानों ने 11 सितंबर को ही ध्वस्त किया था, अमेरिकी मीडिया इस बरस उसे कुछ अधिक याद कर रहा है क्योंकि अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान को 20 बरस बाद उसी हालत में छोडक़र एक शर्मनाक हार झेलकर लौटी हैं और थकान उतार रही हैं। ऐसे में अमेरिकी मीडिया 2001 के 11 सितंबर के उस हमले को हर किस्म से याद करने की कोशिश कर रहा है, और उसमें कुछ ऐसे परिवार हैं जिन्हें वह हर बरस खबरों में लाता है, क्योंकि उनमें ऐसे बच्चे हैं जो उस हमले के तुरंत बाद पैदा हुए थे। अमेरिका में ऐसे बच्चों का एक पूरा समुदाय है जिन्होंने वल्र्ड ट्रेड सेंटर के उस हमले में अपने मां-बाप को खोया था। ऐसे करीब 3000 बच्चों की एक फेहरिस्त है जिनके पास उस भयानक हमले की याद है, और जख्म हैं। ऐसे ही पश्चिमी मीडिया को देखते हुए आज लंदन के अखबार गार्डियन के पॉडकास्ट में दो पॉडकास्ट ऊपर-नीचे देखने मिले, और इस वजह से उन दोनों पर एक साथ कुछ सोचने का मौका भी मिला। एक पॉडकास्ट 11 सितंबर के उस हमले के बाद बचे बच्चों के बारे में है, और दूसरा फिलिस्तीन के गाजा में इस्राएली हमले के तुरंत पहले 1 घंटे में इमारत छोडक़र निकलने वाले लोगों के बारे में है, जिनमें बच्चे चाहे कम रहे हों लेकिन फिलिस्तीनी बच्चों के मां-बाप तो वहां थे, और कुछ महीने पहले के इस इजरायली हमले में सैकड़ों मौतें भी फिलीस्तीन ने झेली हैं।

पश्चिमी मीडिया को देखें, और क्योंकि हिंदुस्तान जैसे देश में अधिकतर वही मीडिया हासिल है, इसलिए उस पर आई हुई तस्वीरें, खबरें, और वीडियो देखें तो लगता है कि 11 सितंबर से अधिक बड़ी त्रासदी इस दुनिया में और कोई नहीं हुई। यह सही है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के लिए उससे बड़ी शर्मिंदगी और कोई नहीं हुई, किसी आतंकी का किया उससे बड़ा आतंकी हमला और कोई नहीं हुआ, लेकिन जब हम अमेरिका पर हुए इस हमले के तुरंत बाद अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों पर अमेरिकी फौजियों के अंधाधुंध हमलों को देखें, और उनमें लाखों मौतों को देखें जिनमें मरने वाले अधिकतर बेकसूर नागरिक थे, जिनमें बराबरी से औरत और बच्चे थे, आबादी में बसे हुए लोग थे, शादी के जलसे में इकट्ठा एक साथ मारे जाने वाले दर्जनों लोग थे, तो फिर यह लगता है कि क्या पश्चिम का दर्द दर्द है, और इराक अफगानिस्तान जैसे देशों का दर्द दर्द नहीं है? आज जब न्यूयॉर्क के हमले में मां-बाप खोने वाले बच्चों से एक-एक करके बात की जा रही है, तो क्या उसी वक्त अमेरिका यह सोचने की जहमत भी उठाएगा कि उसकी फौज ने इराक और अफगानिस्तान में कितने बच्चों को मारा है, वे कितने लाख थे, उनके मां-बाप कितने लाख थे? क्या बमों को बरसाने के पहले यह देखा गया था कि उसमें कितने बेकसूर लोगों के मारे जाने का खतरा था? जिस तरह बिन लादेन के कहे जाने वाले विमानों ने जाकर वल्र्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारतों को खत्म कर दिया था, और कुछ हजार लोगों को मार दिया था, उतनी-उतनी मौतों वाले कितने हफ्ते इन 20 वर्षों में इराक और अफगानिस्तान ने झेले हैं?

और वह तो फिर एक धर्मांध और कट्टर आतंकी बिन लादेन था, लेकिन यह तो दुनिया का सबसे ताकतवर और बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरने वाला अमेरिका था जिसकी फौज ने संसद में मुनादी के बाद, राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद जाकर यह हमले किए थे ! आज जब अमेरिकी फौजों के सीधे हमलों के अलावा इजराइल जैसी ताकतें अमरीकी शह पर फिलिस्तीन की जमीन पर अवैध कब्जा करते हुए, फिलिस्तीनियों को बेदखल करते हुए, उन पर बम भी बरसाती हैं, और उन्हें अमेरिकी फौजियों का सहारा रहता है, अमेरिकी राष्ट्रपति के वीटो का सहारा रहता है, संयुक्त राष्ट्र के सारे प्रतिबंध और आदेश अमेरिकी बुलडोजर कुचल देते हैं, और इजराइल को खुला हाथ देते हैं। इजराइली बमबारी में गिरने वाली फिलिस्तीनी इमारतें, और उनमें मारे जाने वाले हजारों लोग, और खंडहर में तब्दील कर दिया गया एक देश, यह सब मिलकर भी 11 सितंबर के इस मौके पर सवाल बनकर खड़े होते हैं, कि बिन लादेन तो घोषित आतंकी था, लेकिन फिलिस्तीन पर बम बरसाने वाले इजराइली और उसकी पीठ पर हाथ धरकर खड़े हुए अमेरिकी तो अपने आपको लोकतांत्रिक देश करार देते हैं, फिर लादेन और अमेरिका-इजराइल के तौर-तरीकों में कोई फर्क क्यों नहीं है?

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का बनना और 11 सितंबर की बरसी का आना, अमेरिकी फौजों की वापिसी और फिलिस्तीन पर जारी इजरायली हमलों को मिलाकर अगर देखें तो लगता है कि दुनिया में कुछ देश बिन लादेन से भी बड़े आतंकी हैं, जिनमें अमेरिका और इजरायल ऐसे हैं जो कि संयुक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के काबू से भी बाहर हैं, और जिन्हें इंसानियत छू भी नहीं गई है, फिर भी उन्हें संयुक्त राष्ट्र आतंकी करार नहीं दे सकता। अमेरिकी सरगनाई में दूसरे पश्चिमी देशों की फौजों ने जिस तरह इराक और अफगानिस्तान पर हमले किए और जितने लाख बेकसूर नागरिकों को वहां पर मारा, और जिस तरह ब्रिटिश फौजी इस दौर में अफगानिस्तान में बेकसूर नागरिकों को मार-मारकर अपनी फौजी प्रैक्टिस करते रहे, अपने मारे हुए लोगों की उंगलियां काटकर उन्हें इकट्ठा करते रहे, ऐसी तमाम बातों का एक ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण होना चाहिए। तालिबान अपने किस्म के अलग दकियानूसी और कट्टर, धर्मांध और अमानवीय हो सकते हैं, लेकिन अमेरिका और इजराइल ने पिछले दशकों में फिलिस्तीन, इराक, अफगानिस्तान जैसी कई जगहों पर जो किया है, उसे अनदेखा कैसे किया जा सकता है?

 गार्डियन के पॉडकास्ट की लिस्ट में इन दो विषयों को ऊपर नीचे देखकर ऐसा लगता है कि दुनिया के ताजा इतिहास को अलग से लिखने की जरूरत भी है। तालिबान का इतिहास तो लिखा जाता रहेगा, लेकिन अभी जरूरत इस बात की है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी कब्जा खत्म होने के बाद कब्जे के इन दो दशकों पर लिखा जाए। चूँकि लिखने वाले अधिकतर लोग पश्चिम के हैं, इसलिए अभी देखा जाए कि हमलावरों के चारण और भाट के जिम्मे यह काम न लगा दिया जाए। दुनिया का यह ताजा इतिहास लिखना जरूरी इसलिए भी है कि बिन लादेन को तो खलनायक साबित करने वाला बहुत बड़ा मीडिया मौजूद था, 20 बरस तक अफगानिस्तान को कुचलने वाला अमेरिका भी खुलासे से दर्ज होता है या नहीं यह देखने की बात है।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सिर्फ ओलिंपिक पर लगाया निशाना कभी सही न बैठेगा
07-Sep-2021 3:35 PM (246)

हिंदुस्तान के केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने अभी देश के खेल संघों से यह कहा है कि वे 2024 और 2028 के ओलंपिक खेलों को ध्यान में रखते हुए उनमें भारत की स्थिति बेहतर बनाने के लिए बड़ी योजनाएं बनाएं, बड़े प्रोजेक्ट बनाएं। वे बेंगलुरु में एक खेल कार्यक्रम में बोल रहे थे और उन्होंने कहा कि लोगों के बीच खेल को लेकर धारणा बदल चुकी है क्योंकि सरकार एथलेटिक्स को अलग से बढ़ावा दे रही है. पहले टोक्यो ओलंपिक में और उसके बाद अभी पैरालंपिक में भारत का प्रदर्शन पहले के मुकाबले बहुत अच्छा रहा है, उन्होंने कहा कि लोगों का रुख खेलों के लिए बदल गया है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद खिलाडिय़ों की हौसला अफजाई कर रहे हैं।

यह बात सही है कि क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मुकाबले हों, ओलंपिक हो, राष्ट्रमंडल खेल हों, या एशियाई खेल हों, इन सबमें खिलाडिय़ों की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले अब अधिक खबरें बनने लगी हैं। टीवी पर जीवंत प्रसारण चलते रहता है, और बड़ी-बड़ी कंपनियां भी ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में गए हुए खिलाडिय़ों को बढ़ावा देती हैं। ऐसे में देश में यह उम्मीद जागना जायज है कि हिंदुस्तान इस बार अधिक मेडल पाने के बाद अब अगली बार ओलंपिक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों पर निशाना लगाकर तैयारी करेगा तो बहुत आगे बढ़ेगा। यह एक जनधारणा है जिसका सरकार भी समर्थन कर रही है और जिसे आगे बढ़ा रही है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि क्या भावनाओं से परे यह जनधारणा व्यावहारिक रूप से मुमकिन भी है? क्या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मैडल पाने की तैयारी से सचमुच हिंदुस्तान खेलों में बहुत आगे बढ़ सकेगा? हिंदुस्तान 140 करोड़ आबादी का देश है और अगर आबादी के अनुपात में मैडल देखें तो हिंदुस्तान दुनिया में कहीं भी नहीं टिकता। और अगर एक देश के रूप में देखें तो जहां 1-2 करोड़ आबादी वाले देश हैं, वह भी हिंदुस्तान से अधिक ओलंपिक मेडल पाते हुए दिखते हैं, इसलिए हिंदुस्तान का मुकाबला ऐसे देशों से मान लेना भी ज्यादती की बात होगी।  रियो के 2016 ओलिंपिक से एक लाख आबादी वाला देश ग्रेनाडा भी एक मैडल लेकर लौटा था, ढाई लाख से कम आबादी वाला जमैका 11 मैडल लेकर लौटा। हिंदुस्तान दुनिया में आबादी के अनुपात में सबसे कमजोर देश था, वह कुल दो मैडल लेकर लौटा था। टोक्यो ओलंपिक में हिंदुस्तान को 20 करोड़ आबादी पर एक मैडल मिला है, दूसरी तरफ इसी ओलंपिक को देखें तो नीदरलैंड्स को चार लाख 84 हजार आबादी पर एक मैडल मिला है, ग्रेनाडा को 1 लाख 12 हजार आबादी पर एक मैडल मिला है, और सान मारीनो को 11 हजार 313 आबादी पर एक मैडल मिला है।

खेल को अगर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों पर केंद्रित रखकर उनकी तैयारी की जाएगी तो हिंदुस्तान कहीं नहीं पहुंच पाएगा, जिस तरह आज वह आबादी के अनुपात में मैडल में दुनिया में शायद सबसे पीछे है ऐसा ही सबसे पीछे बने रहेगा और हम छोटी-छोटी कामयाबी पर एक झूठा गौरव करने के शिकार बने रहेंगे। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान को किस किस्म की तैयारी करनी चाहिए जिसमें इस देश की विशाल आबादी की अधिक भागीदारी हो सके।

पहली बात तो यह कि हिंदुस्तानी समाज की सेहत की तरफ जब तक ध्यान नहीं दिया जाएगा जब तक बच्चों को कुपोषण से नहीं बचाया जाएगा जब तक उन्हें पेट भर खाना नसीब नहीं होगा तब तक उनकी पूरी फिक्र खाने पर ही लगी रहेगी, वह गांव की धूल भरी सडक़ों पर, या बिना अहाते के मैदानों में भी दौड़ भी नहीं सकेंगे क्योंकि उनके बदन में इतनी जान ही नहीं रहेगी। आज हिंदुस्तान में कुछ समझदार राज्य लगातार इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि स्कूलों में दोपहर के भोजन के अलावा सुबह का नाश्ता भी दिया जाना चाहिए क्योंकि बहुत से बच्चे ऐसे रहते हैं, जिन्होंने पिछली शाम घर में खाना खाया रहता है, और अगला खाना उन्हें स्कूल में दोपहर को मिलता है। 15-16 या 17 घंटे की यह भूख किसी बच्चे को न तो कुछ सीखने के लायक, पढऩे के लायक छोड़ती है, और न ही कुछ खेलने के लायक। दूसरी बात यह भी है कि न तो स्कूलों में मैदान हैं, न मैदानों को समतल बनाकर रखने की गुंजाइश है. गांव-गांव के सरकारी स्कूल तो बिना  अहातों के हैं, और वहां मैदानों में कहीं जानवर बैठे रहते हैं, कहीं सरकारी सामान पड़े रहता है, इसलिए आम बच्चों को खेलने के लिए टाइम टेबल में एक पीरियड जरूर मिल जाता है, खेलने की सहूलियत कुछ नहीं मिलती। जो शहरी और महंगे स्कूलों के बच्चे हैं, उनको तो जरूर कहीं-कहीं पर खेलकूद की सहूलियत मिल जाती है लेकिन गांव-कस्बों के बच्चों के लिए मोटे तौर पर यह सहूलियत पहुंच से बाहर रहती हैं। ऐसे में एक अंदाज यह है कि 140 करोड़ की आबादी में से 130 करोड़ तो ऐसी है जिसे खेलना नसीब ही नहीं होता। तो ऐसे बच्चों का कोई ओलंपिक मैडल पाने की तैयारियों में, क्षमता में, क्या योगदान हो सकता है?

बच्चों का खानपान ठीक हो, बच्चे पढऩे और खेलने के वक्त पर भरे पेट रहें, या कम से कम भूख से परेशान न हों, और उन्हें कागज पर लिखे हुए खेल पीरियड से परे भी कुछ खेलना मिल सके तो हो सकता है कि हिंदुस्तान की तस्वीर एकदम से बदल जाए। कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय खेलों में इस आधार पर आगे नहीं बढ़ सकता कि उसके कुछ दर्जन खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय पैमानों तक पहुंच पा रहे हैं, और ओलंपिक जैसे मुकाबले में उन्हें जगह मिल रही है। इस देश में जिन प्रदेशों में भुखमरी कम है, कुपोषण कम है, जहां सरकार ने स्कूल के स्तर पर सुविधाएं दी हैं, ऐसे प्रदेशों से, पंजाब, हरियाणा और केरल से, अधिक खिलाड़ी बाहर निकलते हैं क्योंकि वहां अधिक बच्चों के बीच ऐसी खेल प्रतिभाओं को तलाशने का मौका रहता है, गुंजाइश रहती है। इसलिए सिर्फ ओलंपिक मैडल को ध्यान में रखते हुए अगर खेल तैयारी की जाएगी तो उसे हिंदुस्तान खेलों में बहुत आगे कभी नहीं बढ़ पाएगा। पूरे के पूरे समाज का खानपान, सेहत के प्रति उसका चौकन्नापन, फिटनेस के प्रति उसकी एक से अधिक पीढिय़ों की जागरूकता और खेलों की बुनियादी सहूलियतें, इन सबके ऊपर अगर ध्यान दिया जाएगा तो कहीं जाकर ओलंपिक में या दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिंदुस्तान आगे बढ़ सकता है।

आबादी बहुत है देश में जमीन भी बहुत है, बच्चे भी खूब हैं, वह इतनी बड़ी संख्या में पैदा होते हैं कि आबादी बढऩे पर रोक लगाने की कोशिशें चलते हुए आधी सदी से अधिक वक्त हो गया है। इसलिए इन सबके बीच में यह भी देखने की जरूरत है कि पिरामिड में सबसे नीचे का हिस्सा सबसे अधिक भागीदारी का हो और करोड़ों बच्चों को किसी न किसी तरह खेलों से जुडऩे का मौका मिले, वे खेलने की हालत में रहे और ऊपर के खेल मुकाबलों की तैयारी के लिए देश भर के तमाम बच्चों के बीच से बेहतर खिलाडिय़ों को छांटने की एक नौबत सरकार के पास रहे। यह सब किए बिना सिर्फ मैडल की तैयारी पर निशाना लगाना हिंदुस्तान को बहुत ही औसत दर्जे का देश बनाकर चलेगा जिसमें दो-चार मैडल पाकर ही यह देश फूले नहीं समाएगा। ओलंपिक मैडल लाने वाले खिलाडिय़ों पर देश भर से 10-10, 20-20 करोड़ रुपए की बारिश हो रही है, लेकिन छोटे-छोटे गांव के स्कूलों में बच्चों को एक फुटबॉल भी नसीब नहीं होता, उनके दौडऩे कि अगर कोई क्षमता है तो उसकी उसका कोई मूल्यांकन नहीं हो पाता। हिंदुस्तान के लोगों को चीन जैसे सबसे बड़े मैडल विजेता एक देश की तैयारियों को भी देखना चाहिए जहां चार-पांच साल की उम्र से ही प्रतिभा खोजने वाले लोग देशभर में घूम-घूमकर जिम्नास्टिक्स जैसे खेलों के लिए प्रतिभाएं ढूंढते हैं, और बच्चों को लाकर उसकी तैयारी शुरू करवा देते हैं। हिंदुस्तान को सबसे नीचे के स्तर से बच्चों को आगे बढऩे का एक रास्ता बनाना पड़ेगा तो ही हमारे प्रदेश और देश के स्तर की प्रतिभाएं अधिक बेहतर आ सकेंगी।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : राजधानी में थाने के भीतर सांप्रदायिक हमले से अधिक गंभीर और क्या हो सकता है?
06-Sep-2021 1:31 PM (301)

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव को कल देर रात जिस तरह तबादला करके पुलिस मुख्यालय भेजा गया है, उससे भी कल दिन में एक सांप्रदायिक तनाव की घटना की गंभीरता साबित होती है। रायपुर के एक इलाके में कल इतवार को एक ईसाई परिवार में प्रार्थना सभा चल रही थी, और आसपास के कुछ हिंदू संगठनों के लोगों ने इस पर आपत्ति की। तनाव बढ़ा और दोनों पक्षों को पुलिस ने थाने बुला लिया। वहां पर थानेदार के कमरे में ईसाई प्रार्थना सभा वाले पास्टर पर हिंदू संगठनों के लोगों ने जिस तरह से हमला किया और उसे जिस तरह जूतों से पीटा, उसके वीडियो हक्का-बक्का करते हैं। पुलिस थाने में मौजूद थी, और उसकी मौजूदगी में एक अल्पसंख्यक तबके के गिनती के मौजूद लोगों पर वहां बहुसंख्यक समुदाय के हमलावर लोगों ने जिस तरह का हमला किया है, उसकी कोई मिसाल छत्तीसगढ़ में याद नहीं पड़ती है। इसके पहले भी कभी किसी चर्च पर छोटा-मोटा हमला हुआ या कहीं किसी पादरी को पीटा गया, ऐसा तो हुआ था लेकिन थाने में पुलिस की मौजूदगी में ऐसा हो, और वह भी इसलिए साबित हो पा रहा है कि उसके वीडियो मौजूद हैं, तो यह बहुत ही गंभीर बात थी, और मुख्यमंत्री ने भारी नाराजगी के साथ जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को तुरंत हटाया है।

प्रदेश में भाजपा ने पिछले कुछ महीनों से धर्मांतरण में बढ़ोतरी का आरोप लगाते हुए इसके खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू किया है। भाजपा के बाकी मंत्रियों और नेताओं के मुकाबले इस बार भूतपूर्व मंत्री और राजधानी के एक भाजपा विधायक बृजमोहन अग्रवाल इस मोर्चे पर आगे हैं, वे लगातार बयान दे रहे हैं, और अभी एक प्रदर्शन में भी राजधानी में उन्हें सबसे आगे देखा गया था। भाजपा के भीतर बहुत से लोगों की दिक्कत यह है कि उन्हें अभी पार्टी के भीतर राज्य की अगुवाई के लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। ऐसे में जाहिर है कि कुछ मुद्दे अधिक प्रमुखता पा रहे हैं क्योंकि उन मुद्दों को उठाकर कुछ लोग अधिक प्रमुखता पा सकते हैं। लेकिन यह बड़ी हैरानी की बात है कि राजधानी में इतनी पुलिस मौजूदगी के बावजूद, पूरे शासन-प्रशासन की यहीं पर मौजूदगी के बावजूद, घंटों तक एक इलाके में यह सांप्रदायिक हमला चलते रहा और थानेदार के कमरे में उसकी मौजूदगी में पास्टर को जूतों से पीटा गया। यह बात बिल्कुल भी बर्दाश्त करने लायक नहीं है कि पुलिस का इंतजाम और प्रशासन इस तरह चौपट हो जाएं। सांप्रदायिक घटनाएं गहरे जख्म दे जाती हैं, जो कि लंबे समय तक रहते हैं। फिर यह भी है कि एक जगह सांप्रदायिक लोग जब ऐसी वारदात करते हैं तो वह दूसरी जगहों पर सक्रिय सांप्रदायिक लोगों के लिए एक चुनौती भी रहती है, कि वे भी कुछ कर दिखाएँ। फिर यह भी है कि आज जो लोग अल्पसंख्यक हैं, वे कल अगर आक्रामक होकर कोई जवाब देने लगे तो हिंदुस्तान में कई प्रदेशों में वैसे टकराव भी देखने मिलते हैं। यह सिलसिला बिल्कुल भी आगे नहीं बढऩे देना चाहिए।

कल ही एक दूसरी और महत्वपूर्ण घटना हुई है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल के खिलाफ पुलिस ने एक जुर्म दर्ज किया है। नंद कुमार बघेल लगातार ब्राह्मणों के खिलाफ अपनी सामाजिक नाराजगी निकालते रहते हैं और वे दलित आदिवासी और ओबीसी तबकों के और अधिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करते हैं। नंद कुमार बघेल ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया है, और वह हिंदू धर्म के ब्राह्मणवाद के खिलाफ उस वक्त से सामाजिक आंदोलन करते आए हैं, जब भूपेश बघेल राजनीति में कुछ भी नहीं थे। पिता की बहुत सी बातें और उनके बहुत से मुद्दे भूपेश बघेल के लिए राजनीति असुविधा की बात पहले भी रहे हैं, और जब जोगी सरकार में भूपेश बघेल मंत्री थे उस वक्त भी नंद कुमार बघेल को उनकी एक विवादास्पद किताब के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। अभी फिर उनके खिलाफ जुर्म दर्ज हुआ है, उसे लेकर भूपेश बघेल ने एक सार्वजनिक बयान भी दिया और कहा कि वे उनके पिता जरूर हैं लेकिन अगर उनके बयानों से सामाजिक समरसता खराब होती है, तो कानून अपना काम करेगा और मुख्यमंत्री के बयान के साथ ही उनके पिता के खिलाफ जुर्म कायम हुआ है।

छत्तीसगढ़ देश के दूसरे बहुत से राज्यों के मुकाबले सांप्रदायिक शांति और सद्भाव का केंद्र रहा हुआ है। यहां पर हालात बिगडऩे नहीं देना चाहिए। चाहे जाति को लेकर आक्रामक बातें हों या फिर धर्म को लेकर सांप्रदायिक हमले हों, इन दोनों को कड़ाई से रोकने की जरूरत है। कल एक दिन में ही भूपेश बघेल ने इन दोनों मामलों में कड़ा रुख दिखाया है। कल सुबह जब उन्होंने अपने पिता के खिलाफ एक बयान जारी किया और पुलिस ने शायद उनके निर्देश पर ही यह जुर्म दर्ज किया, तब राजधानी के एक मोहल्ले में ईसाई प्रार्थना सभा पर हमले की बात सामने भी नहीं आई थी। बाद में यह बात सामने आई और इस पर पुलिस को कड़ी कार्यवाही इसलिए करना चाहिए कि अगर सांप्रदायिक हिंसा का यह संक्रमण छत्तीसगढ़ में दूसरी जगहों पर फैला तो ईसाई तो बहुत गिनी-चुनी संख्या में प्रदेश के हजारों गांवों में हैं। इसलिए अगर कुछ उत्साही सांप्रदायिक संगठन रायपुर की घटना को एक इशारा मानकर दूसरी जगहों पर जुट जाएंगे तो राज्य की पुलिस इस नौबत पर काबू पाने में कम साबित होगी।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जिन पर संवैधानिक जिम्मा है वैज्ञानिक सोच बढ़ाने का, वे लगे हैं पाखंड को बढ़ाने में...
05-Sep-2021 5:02 PM (298)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक निर्णय में कहा कि वैज्ञानिक मानते हैं कि गाय ही एकमात्र पशु है जो ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है, तथा गाय के दूध, उससे तैयार दही तथा घी, उसके मूत्र और गोबर से तैयार पंचगव्य कई असाध्य रोगों में लाभकारी है। हिंदी में लिखे अपने आदेश में जस्टिस शेखर कुमार यादव ने दावा किया है, ‘भारत में यह परंपरा है कि गाय के दूध से बना हुआ घी यज्ञ में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है जो अंतत: बारिश का कारण बनती है।’ कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, ‘‘हिंदू धर्म के अनुसार, गाय में 33 कोटि देवी देवताओं का वास है। ऋगवेद में गाय को अघन्या, यजुर्वेद में गौर अनुपमेय और अथर्वेद में संपत्तियों का घर कहा गया है। भगवान कृष्ण को सारा ज्ञान गौचरणों से ही प्राप्त हुआ।’’  फैसले में लिखा गया है कि गाय को सरकार राष्ट्रीय पशु घोषित करे और हर हिन्दू को उसकी रक्षा का अधिकार रहे।

हिंदुस्तान बड़ी दिलचस्प जगह बनते जा रहा है। यहां पर बड़ी-बड़ी अदालतें अवैज्ञानिक बातों को विज्ञान कहकर उसे लगातार बढ़ावा दे रही हैं, और संविधान की मूल भावना में अच्छी तरह साफ-साफ लिखी गई इस बात के खिलाफ काम कर रही हैं कि देश में एक वैज्ञानिक सोच विकसित की जानी है। भारतीय संविधान की धारा 51-ए यह कहती है कि हर नागरिक की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे वैज्ञानिक सोच विकसित करें। संविधान कहता है कि वैज्ञानिक सोच लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना विकसित करते हैं।

देश के सबसे बड़े इस हाई कोर्ट के इस जज ने तमाम किस्म की अवैज्ञानिक बातों को लिखकर यह लिख दिया है कि वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं। अब इस फैसले के खिलाफ जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई आदेश नहीं आता है, तब तक इस देश में गाय के नाम पर पाखंड फैलाने वाले धर्मांध लोगों के हाथ एक बड़ा हथियार लग गया है। गाय के ऑक्सीजन छोडऩे को भाजपा के एक मुख्यमंत्री और ढेर सारे दूसरे मंत्रियों और नेताओं के साथ-साथ अब एक हाई कोर्ट जज ने भी सर्टिफिकेट दे दिया है। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले एक-दूसरे हाई कोर्ट, राजस्थान के जज महेश चंद्र शर्मा ने यह कहा था कि मोर सेक्स नहीं करते और मोर के आंसुओं को पीकर मोरनी गर्भवती हो जाती है। कुछ साल हुए हैं जब एक हाईकोर्ट जज ने यह लिखा था कि गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना चाहिए। लोगों को राजस्थान से निकलकर आने वाले एक हाई कोर्ट जज का वह फैसला याद है जिसमें उन्होंने सती प्रथा का समर्थन किया था। अलग-अलग समय पर इस केस में के फैसले लिखने वाले लोग जब हाईकोर्ट में बैठे हुए दिखते हैं तो लगता है कि बाकी मामलों में इनका राजनीतिक रुझान इनकी धार्मिक मान्यताएं इनके सांस्कृतिक पूर्वाग्रह इनके फैसलों को किस तरह प्रभावित करते होंगे। जो साधारण जानकारी है उसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए संसद की एक लंबी कार्रवाई की जरूरत पड़ती है और वह आसान नहीं होती है। जज को हटाने के लिए एक महाभियोग चलाना पड़ता है जिसके लिए बहुत सारे सांसदों की जरूरत पड़ती है। और आज तो यह सारे जज जिस भाषा को बोल रहे हैं, जैसे विचार सामने रख रहे हैं, वह तो संसद में सबसे बड़े गठबंधन की भाषा है, तो फिर वहां पर इनके खिलाफ क्या हो सकता है? लेकिन सोशल मीडिया पर, सार्वजनिक जीवन में जजों के ऐसे पूर्वाग्रहों के खिलाफ लगातार लिखे जाने की जरूरत है, और उन्हें संविधान की वैज्ञानिक जिम्मेदारी याद दिलाने की जरूरत है, ताकि अगली बार कोई दूसरा जज इस तरह का कुछ लिखते हुए चार बार सोच तो ले।

अभी-अभी हमने अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के बारे में लिखा था कि किस तरह एक बहुत ही दकियानूसी कानून को बनाने वाले राज्य में उसे रोकने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया क्योंकि जजों का बहुमत बहुत ही संकीर्णतावादी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बनाए हुए लोगों का था। भारत में जिस तरह सामाजिक हकीकत को अनदेखा करके, सर्वधर्म समभाव को अनदेखा करके कुछ जज जिस तरह कट्टरता की बात को बढ़ावा देते हैं, जिस तरह वे वैज्ञानिकता और पाखंड को बढ़ाते हैं, वह बहुत भयानक है। जाहिर है कि ऐसे जज बहुत से मामलों में अपनी इसी विचारधारा के चलते हुए किसी नेता, या किसी सरकार, या किसी नीति के पक्ष में अनुपातहीन ढंग से झुके हुए भी रहेंगे। भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने अपने आपको अवमानना का एक कानून बनाकर जिस तरह एक फौलादी कवच के भीतर सुरक्षित रखा हुआ है, उस गैरजरूरी हिफाजत को भी खत्म करने की जरूरत है। अवमानना के कानून के चलते अगर किसी जज या उसके फैसले की कोई आलोचना होती है, तो छुईमुई के पत्तों की तरह संवेदनशील न्यायपालिका तुरंत ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर देती है। इस बारे में भी देश के जागरूक तबके ने लगातार इस मुद्दे को उठाया है कि अवमानना का यह कानून खत्म किया जाना चाहिए ताकि अदालत के फैसले, उसकी सोच के बारे में जनता के बीच एक खुली चर्चा हो सके।

अदालत का अपने आपको जनचर्चा से इस तरह ऊपर रखना अलोकतांत्रिक रवैया है। अब तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से बहुत से लोग बिना डरे-सहमे और शायद अवमानना के कानून से अनजान रहते हुए कई बातें लिख भी देते हैं। और यह लोकतांत्रिक सिलसिला आगे बढऩा चाहिए क्योंकि हो सकता है कि किसी दिन ऐसे किसी मामले को अवमानना के तहत कटघरे में खड़ा किया जाए तो उस पर होने वाली बहस इस कानून की संवैधानिकता को खत्म करने के काम आ जाए। फिलहाल हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर किसी हाईकोर्ट के ऐसे फैसले का नोटिस लेना चाहिए, और उसे खारिज करने के लिए किसी अपील का इंतजार नहीं करना चाहिए, खुद होकर यह काम करना चाहिए। देश में सरकार से लेकर न्यायपालिका तक और सांसदों तक पर वैज्ञानिक सोच को विकसित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी है, लेकिन यह तीनों ही संस्थाएं लगातार अवैज्ञानिक बातों को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। इन तीनों को संवैधानिक जिम्मा याद दिलाते हुए लोगों के बीच बहस छिडऩी चाहिए और इन पर खुलकर लिखा जाना चाहिए।

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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : पसंदीदा जजों का बहुमत हो तो फिर सरकार के लिए सैयां भये कोतवाल वाला हाल
04-Sep-2021 5:06 PM (368)

हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच इन दिनों कई किस्म की लिस्ट घूम रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में कितने जज बनाना है, या देश के बहुत से हाईकोर्ट में खाली पड़ी हुई कुर्सियों में निचली अदालतों के किन जजों को, या हाई कोर्ट के किन वकीलों को जज बनाना है, इस पर केंद्र सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की बनाई लिस्ट पर चर्चा चल रही है, और सरकार की पसंद-नापसंद पर सुप्रीम कोर्ट अपनी असहमति भी जता रहा है। दरअसल किसी भी लोकतंत्र में जब सरकार के पास यह अधिकार रहता है कि वह किसी को जज बना सके या किसी का जज बनना रोक सके तो फिर हिंदुस्तान की तरह का सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम रहने पर भी केंद्र सरकार कुछ लोगों के नाम तो रोक ही सकती है। और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट से जुड़े हुए बहुत से लोगों का यह मानना है कि केंद्र सरकार अपने प्रभाव और दबाव का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट के सर्वशक्तिमान कॉलेजियम से भी अपनी पसंद के लोगों के नाम आगे बढ़वा लेती है और फिर उन्हें तुरंत मंजूरी भी दे देती है। इससे दो बातें होती हैं एक तो केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की जो विचारधारा है, उस पर जब अदालतों में किसी मामले में बहस होती है, तो ऐसे मनोनीत जज उसमें सरकार के काम आते हैं। सरकार की विचारधारा के काम आते हैं और कई मामलों में तो सरकार के फैसलों को भी सही ठहराने में उनकी भूमिका बहुत से लोगों को समझ आ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों में तो कई बार ऐसा साफ दिखने लगता है कि कौन-कौन से जज सरकार समर्थक हैं, और कौन-कौन से जज जनता के हितों की बात करते हैं। तो कहने के लिए तो हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की बिल्कुल अलग-अलग भूमिका है और न्यायपालिका का एक किस्म से कार्यपालिका पर काबू भी रहता है, लेकिन जजों को बनाने के मामले में सरकार अपनी ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी पसंद के लोगों को बिठा लेती है। ये लोग सरकार के बड़े लोगों को बड़े-बड़े जुर्म के बाद भी बचाने में काम आते हैं।

लेकिन यह बात महज हिंदुस्तान में हो ऐसा भी नहीं है। अमेरिका में तो सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होते नहीं हैं, और उनके मरने पर ही कोई कुर्सी खाली होती है। ऐसे में किसी राष्ट्रपति को 4 बरस के अपने कार्यकाल में कितने जजों को मनोनीत करने का मौका मिला है, इस बात को बड़ा ही महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे कई मनोनयन का मौका मिला, और उन्होंने अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक संकीर्णतावादी जजों को तैनात करवाया, जिससे उनके सामने किसी मामले के जाने पर वह रिपब्लिकन पार्टी की सोच, संकीर्ण सोच के मुताबिक सोचे सकें, और फैसला दें। इसका एक बड़ा सुबूत अभी 3 दिन पहले सामने आया जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के एक राज्य टेक्सास के बनाए हुए एक नए कानून पर अमल रोकने से बहुमत से इंकार कर दिया। जितने जज इस फैसले में शामिल थे, उनमें अधिक ऐसे थे जिन्होंने तुरंत कोई दखल देने से मना कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि आधी रात तक चले इस मामले में, तारीख बदलते ही टेक्सास में यह विवादास्पद कानून लागू हो गया।

रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाले इस राज्य ने एक कानून बनाया है जिसके तहत 6 हफ्ते से अधिक की गर्भवती महिला का गर्भपात नहीं किया जा सकेगा। चिकित्सा विज्ञान बताता है कि अधिकतर गर्भवती महिलाओं को 6 हफ्ते में तो यह पता भी नहीं चलता है कि वे गर्भवती हैं। ऐसी महिलाओं की जांच में भी 6 हफ्ते के बाद ही पेट के बच्चे की धडक़न का पता लगता है। इस राज्य ने जो कानून बनाया है उसके मुताबिक अब तकरीबन कोई भी महिला गर्भपात नहीं करा सकेगी क्योंकि अधिकतर गर्भपात तो इन छह हफ्तों के बाद ही होते हैं। इस राज्य की सरकार ने इस कानून को लिखते हुए इस धूर्तता के साथ इसे बनाया कि इसमें सुप्रीम कोर्ट भी कोई दखल ना दे सके। अदालत में किसी मामले को, किसी कानून को चुनौती देते हुए ऐसे लोगों को नोटिस देना होता है जिन पर उस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी रहती है। सरकार के बनाए हुए कानून के खिलाफ अदालतों में पहुंचे हुए लोग आमतौर पर सरकार के नुमाइंदों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं। लेकिन इस कानून को लिखते हुए टेक्सास की सरकार ने यह होशियारी दिखाई कि इसे लागू करने का जिम्मा उसने जनता पर डाल दिया। जनता में से कोई भी व्यक्ति अगर अदालत में यह साबित कर सके कि किसी महिला ने 6 हफ्तों के बाद गर्भपात करवाया है तो उस महिला सहित उसके सारे मददगार, डॉक्टर क्लीनिक, नर्स, और तो और उसे क्लीनिक तक ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर तक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है, और अगर यह मुकदमा साबित हो गया, तो इन तमाम लोगों पर दस-दस हजार डॉलर का जुर्माना हो सकता है, और मुकदमा करने वाले व्यक्ति को दस हजार डॉलर मिलेंगे और वकील का खर्च भी मिलेगा। इस तरह टैक्सास की सरकार ने इस कानून को लागू करवाने का जिम्मा आम जनता को दे दिया है कि वही शिकायत करके इसे लागू करवा सकती है, वहीं अदालत में जाकर किसी के खिलाफ केस कर सकती है।

 अमेरिका के कानून के विश्लेषक यह मान रहे हैं कि बहुत ही धूर्तता के साथ ऐसा कानून बनाया गया है कि जिस पर अदालत का कोई बस ना चले और अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट भी अपने पुराने फैसलों के रहते हुए भी इस कानून पर रोक न लगा सके। नतीजा यह हुआ है कि अमेरिकी संविधान में और सुप्रीम कोर्ट के कई दशक पहले के फैसलों में पूरी तरह से स्थापित यह बात धरी रह गई कि गर्भपात महिला का अधिकार है, महिला का शरीर उसका अधिकार है। अब दूसरा खतरा यह आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट के संकीर्णतावादी जजों के बहुमत ने जब इस कानून में दखल देने से मना कर दिया है, किसी तरह का स्थगन देने से मना कर दिया है, तो अब रिपब्लिकन सरकारों वाले एक दर्जन दूसरे राज्य भी ठीक ऐसा ही कानून बना सकते हैं, और उससे उनका बहुत पुराना राजनीतिक मुद्दा लागू हो सकता है कि किसी भी तरह के गर्भपात पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।

यह समझने की जरूरत है कि जब सुप्रीम कोर्ट में जज अपनी विचारधारा के बना दिए जाएं, और सरकार कानून ऐसा बना दे कि उसमें कोर्ट का दखल नामुमकिन सा हो जाए तो फिर सरकार अदालत के काबू से बाहर अपनी मनमानी कर सकती है। अमेरिका में आज यही हो रहा है और असहमति दर्ज कराने वाले जज संख्या में कम पड़ रहे हैं, और वे एक राज्य सरकार की इस हरकत पर अपना आक्रोश, अपनी निराशा दर्ज भी कर रहे हैं कि एक सरकार ने एक ऐसा कानून बना दिया है कि जिसमें अदालत दखल ना दे सके, और अदालत के कुछ जज या जजों का बहुमत उस कानून को स्थगित करने का काम भी नहीं कर रहा है। जजों के बीच बहुत गहरे मतभेद इसे लेकर हुए हैं, और आज हालत यह है कि टेक्सास में किसी महिला का अपने बदन पर कोई अधिकार नहीं बच गया है। बाकी देश में भी जहां-जहां रिपब्लिकन पार्टी की सरकारें हैं, इसी की कार्बन कॉपी लागू होने का खतरा हो गया है। दुनिया के बाकी लोकतंत्रों को भी इस बात से सबक लेना चाहिए कि अगर जजों की नियुक्ति सत्तारूढ़ लोग अपनी मर्जी से कर सकते हैं तो फिर वह अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं और अदालतें मूक दर्शक बनी बैठी रह सकती हैं।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ..कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई वफादार नहीं होता
03-Sep-2021 5:04 PM (262)

जिन लोगों की अफगानिस्तान के ताजा हाल में दिलचस्पी है, और जो अंतरराष्ट्रीय मामलों में विदेश नीति में दिलचस्पी रखते हैं, वे लोग भारत को लेकर हमारी तरह कुछ फिक्रमंद  भी हैं कि आज पाकिस्तान और चीन, अफगानिस्तान के तालिबान के एकदम करीब हैं, और हिंदुस्तान अलग-थलग पड़ गया है, क्योंकि यह पिछली अफगान सरकार के साथ इतना अधिक जुड़ा हुआ था कि वह तालिबान से दूर चला गया था। जब पिछले बरस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ एक लिखित समझौता किया था और अमेरिका की फौज को अफगानिस्तान से वापस बुला लेना तय किया था, उस वक्त भी भारत पीछे रह गया। उसने मौके को समझा नहीं और अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्तों को उसने वहां की मौजूदा सरकार के साथ रिश्तों तक सीमित रखा। उसे यह सूझा ही नहीं कि बाकी कई देश तालिबान को सम्भावना मानकर उसके साथ भी रिश्ते बना रहे थे। खैर जो हो गया सो हो गया, अब भारत सरकार ने अफगानिस्तान से बाहर तालिबान से बातचीत शुरू की है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने करीब 10 दिन पहले ही इसी जगह इस बात को लिखा था कि भारत को तालिबान के साथ बात शुरू करनी चाहिए, क्योंकि और कोई रास्ता नहीं है।

जिन लोगों को यह लग रहा है कि पाकिस्तान आज तालिबान के करीब है और इस नाते भारत, पाकिस्तान, चीन के इस तनावपूर्ण त्रिकोण में वह भारत के मुकाबले बेहतर हालत में है, उन्हें तस्वीर के बाकी पहलुओं को भी देखना चाहिए। पाकिस्तान की जमीन पर बरसों से 14 लाख से अधिक अफगान शरणार्थी चले आ रहे हैं। और इसके भी पहले से अमेरिका की मदद के तलबगार पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच मदरसों का जाल बिछाने की इजाजत देनी पड़ी थी, और पाकिस्तान की जमीन पर ही अफगानिस्तान में मौजूद रूसी फौजियों से लडऩे के लिए हथियारबंद दस्ते तैयार हो रहे थे। पाकिस्तान की जमीन पर धर्मांध और कट्टर लड़ाके तैयार करने वाले मदरसों का नुकसान खुद पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अपने लोगों के बीच कम नहीं हुआ है। पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता और धर्मांधता फैलने के पीछे जो वजहें हैं उनमें से एक यह भी है कि उसकी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच अफगान लड़ाके तैयार किए जा रहे थे। इसलिए आज अगर अफगानिस्तान में इस्लामी कट्टरता के साथ अगर कोई सरकार बन रही है और उसका पाकिस्तान से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है, तो यह रिश्ता कोई दौलत नहीं है, यह रिश्ता एक किस्म से एक बोझ भी है।

आज अफगानिस्तान के पास अड़ोस-पड़ोस के देशों को देने के लिए कुछ नहीं है, और उनसे मदद लेने के लिए उसकी जरूरतें अंतहीन हैं। ऐसे में पाकिस्तान और चीन के अलावा ईरान और रूस से भी अफगानिस्तान की तालिबान सरकार की बड़ी उम्मीदें रहेंगी। यह भी समझने की जरूरत है कि संयुक्त राष्ट्र का अंदाज यह है कि अफगानिस्तान में दसियों लाख लोगों के भूखे रहने का एक बहुत बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है। खबरें बताती हैं कि किस तरह आज अफगानिस्तान के लोग वहां की बेरोजगारी, भुखमरी और वहां पर हिंसा के खतरे को देखते हुए पाकिस्तानी सरहद पर इक_ा हैं, और पाकिस्तान के भीतर जाना चाहते हैं, क्योंकि इस जमीन पर पहले के आए हुए अफगान शरणार्थी बसे हुए हैं, और उन्हें धर्म के नाम पर, जुबान के नाम पर, पाकिस्तान में हमदर्दी और सिर छुपाने की जगह मिलने की उम्मीद है। यह नौबत किसी भी देश के लिए एक बहुत बड़ा बोझ रहती है और पाकिस्तान पहले से यह बात कहते आया है कि वह और अधिक अफगान शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता, उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है। फिर एक बात यह भी है कि आज अफगानिस्तान से जो लोग देश छोडक़र पाकिस्तान आ रहे हैं, ऐसे लोगों के बारे में तालिबान सरकार का क्या रुख रहेगा यह भी अभी साफ नहीं है। अमेरिकी सरकार वहां के अपने मददगार रहे जिन लोगों को अफगानिस्तान से ले जाना चाहती थी, उन्हें भी नहीं ले जा पाई है क्योंकि समझौते के तहत 31 अगस्त तक ही अमेरिका को वहां से हट जाना था। एक अंदाज यह है कि पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद करने वाले करीब 3 लाख अफगान ऐसे हैं जिन्हें अमेरिका खतरे में छोडक़र चले गया है, क्योंकि उसके पास भी और कोई चारा नहीं बचा था। इसलिए पाकिस्तान के आज अफगानिस्तान के साथ बहुत ही करीबी रिश्ते से उसे हासिल कम होना है, इन रिश्तों का बोझ ही उस पर अधिक रहेगा। आज पाकिस्तान की अपनी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वह अफगानिस्तान की किसी तरह से मदद कर सके। चीन और रूस जैसे दो बड़े और सक्षम देशों को अफगानिस्तान की जो मदद करनी होगी वह वहां की तालिबान सरकार को वे सीधे देना चाहेंगे, उसमें पाकिस्तान कहीं तस्वीर में नहीं आता है। इसलिए 15 लाख शरणार्थियों की संख्या और अगर बढ़ती चली जाती है तो यह पाकिस्तान पर बड़ी तकलीफ की बात रहेगी।

इसलिए अफगानिस्तान से जुड़े हुए अलग-अलग देशों के बारे में आज जो खबरें आ रही हैं, वे उन्हें अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार के साथ बड़े गहरे रिश्ते वाली बतला रही हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इन तमाम देशों के साथ अपनी घरेलू दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनके चलते हुए तालिबान के साथ बेहतर रिश्ते रखना इनकी मजबूरी भी है। चीन के भीतर उईगर मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो कि चीन की सरकार से बहुत बुरी तरह प्रताडि़त है। चीन पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वह इन मुस्लिम समुदायों के लोगों को बहुत बुरी हालत में रखता है, उनके मानवाधिकार कुचलता है। ऐसे में इस्लामी राज कायम करने वाले तालिबान पर यह नैतिक बोझ भी रहेगा कि वह चीन में मौजूद बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिम क़ैदियों के बारे में क्या करता है, क्या रुख रखता है। इसलिए भी चीन तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है कि कहीं अफगान जमीन से चीन के खिलाफ ऐसी बगावत खड़ी ना होने लगे जो कि चीन में मौजूद उईगर मुस्लिमों को आतंकी बनाने का काम करे। दूसरी तरफ रूस में 50 लाख से अधिक मुस्लिम रहते हैं और उसकी दिक्कत यह है कि वह अपनी इस बड़ी मुस्लिम आबादी के बीच किसी किस्म की राजनीतिक बेचैनी या बगावत देखना नहीं चाहता। अगर पड़ोस के अफगानिस्तान के मुस्लिम हथियारबंद लोगों के हाथों अमेरिका के हार जाने का कोई असर रूस में बसे हुए मुस्लिम समुदाय पर होगा, तो उनके भीतर एक अलग राजनीतिक चेतना आ सकती है, उनमें से कुछ बागी तेवरों वाले भी हो सकते हैं। इसलिए रूस की अपनी जरूरत यह है कि अफगानिस्तान की जमीन से कोई ऐसे हथियारबंद भडक़ाऊ या उकसाऊ काम न हों जो कि रूस में मुस्लिम लोगों को भडक़ायें।

खुद पाकिस्तान आज ऐसी नौबत में खड़ा हुआ है कि अफगान जमीन से पाकिस्तान के कई आतंकी समूहों को मदद मिल रही है, और इस बात को पाकिस्तान ने अभी-अभी  औपचारिक रूप से तालिबान के सामने रखा भी है। पाकिस्तान में मौजूद तालिबान समूहों को लेकर अभी अफगान-तालिबान ने यह साफ भी कर दिया है कि उनसे अफगान-तालिबान का कोई लेना देना नहीं है। इसलिए रूस, पाकिस्तान और चीन, इनके बारे में सीधे-सीधे ऐसा मान लेना ठीक नहीं होगा कि इन तीनों ने अमेरिका का विरोध करने के लिए अफगान-तालिबान का साथ दिया है, और आगे देते रहेंगे। इन सबकी घरेलू मजबूरियां भी हैं, जिनके चलते ये तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहते हैं। भारत की जो सरकार तालिबान को आतंकी मानती थी उसने रातों-रात एक तीसरे देश में तालिबान से औपचारिक राजनयिक बैठक की है, और संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए तालिबान को आतंकियों की एक सूची से बाहर भी करवाया है। ऐसा इसलिए भी है कि भारत पर एक खतरा यह है कि कश्मीर में तालिबान समर्थित समूह आतंकी वारदात कर सकते हैं और भारत तालिबान को कश्मीर को महज एक मुस्लिम मुद्दा मानकर उसमें दखल देने से दूर रखना चाहता है। आज हिंदुस्तान में भारत सरकार के तालिबान से बैठक करने के बारे में व्यंग्य से काफी कुछ लिखा जा रहा है। ऐसा लिखा हुआ पढक़र ही हम इस मुद्दे पर लिखने की सोच रहे थे कि विदेश नीति के मामलों को और देश के राष्ट्रीय हित के मामलों का अतिसरलीकरण, नहीं करना चाहिए। एशिया के इस पूरे हिस्से के जो मिले-जुले हित हैं या जो मिले-जुले खतरे हैं, उनको भी देखते हुए बाकी देश तालिबान के साथ तालमेल बिठाने में लगे हुए हैं, और बदले हुए इस हालात में खुद तालिबान ने यह कहा है कि वह अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय देशों के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है। वह चाहता है कि अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद, अमेरिका और यूरोप के देश लौटें, और तालिबान को अफगानिस्तान बेहतर बनाने में मदद करें। लोगों को यह बात भी कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत यही रहती है कि तालिबान का राज्य अफगानिस्तान में एक आतंकी राज्य न बन सके, और वह लोकतंत्र के जितने करीब लाया जा सके, उसके लिए दुनिया के देशों को तालिबान से अपना पुराना परहेज छोडक़र उससे बातचीत करनी ही होगी, जो कि भारत ने भी शुरू कर दी है। भारत के इस बातचीत शुरू करने के 10 दिन पहले हमने इस बात का सुझाव दिया भी था। आगे-आगे देखना है कि क्या होता है।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मौजूदा कानून के इस्तेमाल की जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय नए कानूनों में लगी सरकारें...
02-Sep-2021 5:06 PM (225)

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया, वेब पोर्टल और निजी टीवी चैनलों के एक वर्ग में झूठी ख़बरों को चलाने, और उन्हें सांप्रदायिक लहज़े में पेश करने को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे देश का नाम खऱाब हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये कहा। इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना कर रहे थे। इन याचिकाओं में पिछले वर्ष निज़ामुद्दीन मरकज़ में हुई एक धार्मिक सभा को लेकर ‘फेक न्यूज’ के प्रसारण पर रोक लगाने के लिए केंद्र को निर्देश देने और इसके जि़म्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की माँग की गई है। सुनवाई करते हुए अदालत ने पूछा, ‘निजी समाचार चैनलों के एक वर्ग में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है। आखऱिकार इससे देश का नाम खराब होगा। आपने कभी इन निजी चैनलों के नियमन की कोशिश की है?’ उन्होंने कहा, ‘फेक न्यूज और वेब पोर्टल तथा यूट्यूब चैनलों पर लांछन लगाने को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो वहाँ देखेंगे कि किसी आसानी से फेक न्यूज को चलाया जा रहा है और कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई लिखित आदेश या फैसला नहीं आया है लेकिन भरोसेमंद मीडिया में जो खबरें आई हैं उनमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो और जजों की जुबानी टिप्पणियां लिखी गई हैं। अगर उन्होंने केवल इतना कहा है तो हमें इससे थोड़ी सी निराशा भी हो रही है क्योंकि सोशल मीडिया, वेबसाइट, और निजी टीवी चैनलों में जिस तरह से सांप्रदायिकता को भडक़ाया जा रहा है, उससे खतरा केवल दुनिया में देश का नाम खराब होने का नहीं है, इससे देश के भीतर लोगों के बीच माहौल खराब हो रहा है, बहुत हद तक हो चुका है। यह खतरा हिंदुस्तान की बदनामी का नहीं है, यह खतरा यहां की आबादी के बीच नफरत की एक खाई खुद जाने का है।

यह बात सही है कि आज बिना किसी काबू के इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी पोस्ट कर सकते हैं, फेक न्यूज़ फैला सकते हैं, यूट्यूब चैनल पर जो चाहे वह पोस्ट कर सकते हैं, और बाकी सोशल मीडिया का भी ऐसा ही इस्तेमाल चल रहा है। लेकिन आज जितना खतरा इससे है, उतने का उतना खतरा इस बात से भी है कि फेक न्यूज या नफरत को रोकने के नाम पर केंद्र सरकार उसे नापसंद सभी चीजों को रोकने का काम कर सकती है, और झूठ को रोकना तो नाम रह जाएगा, असल में कड़वे सच को रोकने का काम भी होने लगेगा। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी-कभी झूठ फैलाने के भी काम आती है, कभी कभी नफरत फैलाने के भी काम आती है, लेकिन इन वजहों से उस स्वतंत्रता को कम करना कोई इलाज नहीं है। और जहां तक सरकारों का बस चले, तो वे अपने को नापसंद तमाम चीजों को रोकने के लिए सोशल मीडिया, इंटरनेट, मैसेंजर सर्विसों, सभी पर एक कड़ा काबू बनाने की कोशिश में लगी ही रहती हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह बात सही है कि निजी समाचार चैनलों के एक तबके में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है और यह बात भी सच है कि केंद्र सरकार ने इन चैनलों को काबू में रखने के लिए, इनकी नफरत पर इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए, कुछ भी नहीं किया है। इसलिए महज टेक्नोलॉजी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिर पर तोहमत का घड़ा फोड़ देना ठीक नहीं होगा। जहां सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए वहां कार्रवाई न करके कानून को नाकाफी बताना, संचार कंपनियों पर काबू को बढ़ाने की बात करना, सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर अधिक पकड़ बनाने की बात करना, यह जायज नहीं है। देश में पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल न करके नए-नए कानून बनाना या नई-नई ताकत हासिल करना जरा भी न्याय संगत नहीं है।

हर युग में टेक्नोलॉजी आजादी की नई संभावनाएं लेकर आती है। जिस वक्त छपाई चालू हुई उस वक्त भी मौजूदा शासकों को अखबार नापसंद होने लगे क्योंकि उनके तेवर सरकार के हिमायती नहीं रहते थे, और उन में सत्तारूढ़ लोगों की आलोचना भी रहती थी। सरकार को यह लगता था कि यह टेक्नोलॉजी अराजक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल हो रहा है। दुनिया के वे देश जहां लोकतंत्र परिपच् था, और जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया जाता था, वहां तो काम चल गया था क्योंकि वहां सत्तारूढ़ लोगों को मालूम था कि इस स्वतंत्रता को अधिक कुचलना नामुमकिन नहीं है। लेकिन कई देशों में सरकारें ऐसी कोशिश कर रही हैं कि उसे नापसंद छापने या दिखाने वाले लोगों के खिलाफ तरह-तरह की कार्यवाही की जाए। यह सिलसिला लोकतंत्र को कमजोर और बेअसर बनाने की नीयत वाला है, और राजनीतिक ताकतें जब तक सत्ता पर नहीं पहुंचती हैं, तब तक तो वे आजादी की हिमायती रहती हैं, और सत्ता पर आते ही उन्हें वह आजादी अराजक लगने लगती है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई कर रहा है और कई राज्यों की हाईकोर्ट में इससे जुड़े हुए जो मामले चल रहे हैं, उन्हें भी एक साथ जोड़ रहा है। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने जहां-जहां अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं, वह भी अदालत के सामने आएगा, और अदालत के मार्फत देश के सामने साफ होगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय एप्पल ने आई-फोन में झांककर चाइल्ड पोर्नोग्राफी पकडऩे की घोषणा की है, एक खतरा और..
01-Sep-2021 5:15 PM (166)

हिंदुस्तान के जिन लोगों के सिर से अब पेगासस की दहशत हट चुकी है और लोग मान चुके हैं कि अब उन्हें सरकार या किसी गैर सरकारी एजेंसी की जासूसी का खतरा नहीं है, उनके लिए एक खबर है जिससे उनकी सारी तसल्ली धरी रह जाएगी। एप्पल कंपनी ने अभी एक ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित करने की घोषणा की है जिससे वह अमेरिका के अपने तमाम आईफोन में तस्वीरों, वीडियो, और टाइप किए हुए संदेशों में झांक सकती है। उसने यह काम बच्चों की पॉर्नोग्राफी को रोकने की अमेरिकी सरकार की मुहिम के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए किया है. इस टेक्नोलॉजी से एप्पल अमेरिका के अपने हर आईफोन, और आईफोन से जुड़े हुए आईक्लाउड अकाउंट में अपने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले कंप्यूटरों से झांक सकेगी, झांकेगी, और देख सकेगी कि वहां चाइल्ड पॉर्नोग्राफी का कुछ सामान तो नहीं है। अगर उसे किसी एक फोन पर ऐसे 30 से अधिक फोटो या वीडियो मिलेंगे तो एप्पल का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उसके कर्मचारियों को सतर्क करेगा। उसके बाद वे कर्मचारी खुद इन तस्वीरों को देखेंगे, और अगर उन्हें चाइल्ड पॉर्नोग्राफी देखेगी तो वे ऐसा फोन इस्तेमाल करने वाले की जानकारी सबूत सहित अमरीकी जांच अधिकारियों को दे देंगे। इसमें कंपनी द्वारा की गई घोषणा में ही बतलाया गया है कि 13 साल से कम उम्र के जो बच्चे एप्पल आईफोन इस्तेमाल करते हैं, उनके फोन की अलग से जांच होगी, और उनमें से कोई बच्चे अगर अपनी खुद की या किसी और बच्चे की नंगी तस्वीर किसी को भेज रहे हैं, या किसी से पा रहे हैं, तो इसकी जानकारी एप्पल के कंप्यूटर तुरंत ही कंपनी के कर्मचारियों को देंगे, और नाबालिग बच्चों के मां-बाप को इसकी खबर की जाएगी। अगर कोई व्यक्ति बच्चों से ऐसी फोटो मांगने के संदेश भी भेजेंगे तो वैसे संदेश भी यह कंपनी पढ़ सकेगी। एप्पल के पहले फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों ने यह तकनीक विकसित की है, जिससे फेसबुक पर आने जाने वाली तस्वीरों में बच्चों की नंगी तस्वीरें को रोकने का इंतजाम है, और गूगल ने अपने यूट्यूब जैसे चैनल पर चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के कई इंतजाम किए हुए हैं। एप्पल इस मुहिम में पीछे था, लेकिन अभी उसने जो घोषणा की है, उसमें वह खासी बड़ी कार्यवाही करने जा रहा है।

लेकिन अमेरिका में निजता के हिमायती लोग इस बात को लेकर बड़े फिक्रमंद हैं कि कंपनी ने एक ऐसी तकनीक विकसित कर ली है जिससे वह लोगों के फोन में घुसपैठ कर सकती है, वहां पर फोटो, वीडियो और संदेश, सबको अपने कंप्यूटरों के मार्फत पढ़ सकती हैं, और शक होने पर उसके कर्मचारी भी इन तस्वीरों और वीडियो को देख सकते हैं। आजादी के हिमायती संगठनों का यह कहना है कि कुछ बरस पहले जब अमेरिका में एक आतंकी के आईफोन का लॉक खोलना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से भी नहीं हुआ तो अमेरिकी सरकार ने एप्पल से अनुरोध किया था कि वह इसका लॉक खोल दे ताकि आतंक के खतरे की जानकारी मिल सके। इसके बाद अमेरिका की बड़ी अदालत ने भी एप्पल को इसका हुक्म दिया था और कंपनी ने अदालत में यह कहा था कि उसके पास ऐसी तकनीक ही नहीं है कि वह बिना पासवर्ड के अपने फोन को खोल सके। उसने कहा था कि ऐसी तकनीक विकसित करना कैंसर विकसित करने जैसा खतरनाक काम होगा और कंपनी ऐसा नहीं करने वाली है। अदालत के आदेश के बाद भी एप्पल ने ऐसा नहीं किया था।

अब चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के लिए इस कंपनी ने काफी दूर तक घुसपैठ करने वाली ऐसी तकनीक के इस्तेमाल की घोषणा कर दी है तो लोग चौकन्ने हो गए हैं। मानवाधिकार संगठनों और निजता के समर्थकों का यह मानना है कि अब एप्पल के पास अमेरिकी सरकार या अमेरिकी अदालत में यह तर्क देने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है कि उसके पास ऐसी तकनीक ही नहीं है. अब जब वह तकनीक बना चुकी है, तो यह महज वक्त की बात है कि चाइल्ड पॉर्नोग्राफी के बाद सरकार और किस अपराध को रोकने के लिए इस कंपनी पर घुसपैठ का दबाव डालेगी, और धीरे-धीरे सरकार निजता को पूरी तरह से खत्म कर सकेगी क्योंकि कंपनी ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है। अमेरिकी निजता संगठनों का यह भी कहना है कि दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी कंप्यूटर और टेलीफोन कंपनियों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं कि वे सरकार को घुसपैठ का रास्ता बनाकर दे। एप्पल के मामले में ही अमेरिका में जो बहस चल रही है उसमें यह गिनाया जा रहा है कि चीन में वहां की सरकार ने इस कंपनी पर दबाव डालकर यह इंतजाम कर लिया है कि इसके ग्राहकों की सारी जानकारी चीन में ही इसके सरवर पर रहेगी। लोगों का मानना है कि इससे चीन में आईफोन इस्तेमाल करने वाले लोगों पर सरकार की एक पकड़ बन गई है। अमेरिका में इस पर चल रही बहस के दौरान हिंदुस्तान की सरकार का जिक्र भी किया जा रहा है कि किस तरह वह व्हाट्सएप के पीछे लगी हुई है कि उसे घुसपैठ की इजाजत दी जाए, किस तरह व ट्विटर या फेसबुक पर अपने को नापसंद सामग्री को मिटाने का इंतजाम कर रही है. डिजिटल घुसपैठ के लिए पेगासस जैसे खुफिया हैकिंग सॉफ्टवेयर का भारत में भी इस्तेमाल किए जाने की खबरें तो पिछले कुछ महीनों से चल ही रही हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट में एक गंभीर कगार तक आ पहुंची हैं।

लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि मोबाइल फोन जैसा निजी सामान अगर किसी कंपनी की बिल्कुल ही आम इस्तेमाल की तकनीक से घुसपैठ के लायक रह जाएगा तो लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी कुछ भी नहीं बचेगी, उसमें व्यक्तिगत कुछ भी नहीं रह पाएगा। आज बात एप्पल के कंप्यूटरों की है, और कल हो सकता है कि एप्पल के कोई कर्मचारी कंपनी की नीतियों से बगावत करके इसमें घुसपैठ करें, और वहां की जानकारी को लेकर बाहर निकल जाएं। एप्पल को खुद भी अंदाज है कि उसकी इस मुहिम से उसके ग्राहक बिदक सकते हैं, तो उसने अपने बिक्री करने वाले कर्मचारियों की एक अलग से ट्रेनिंग शुरू की है कि ग्राहकों की तमाम फिक्र को किस तरह सुलझाया जाए और उनका भरोसा किस तरह कायम रखा जाए। लेकिन कुल मिलाकर हकीकत यह है कि एप्पल ने ऐसी तकनीक ना केवल विकसित कर ली है बल्कि उसका इस्तेमाल शुरू करने की घोषणा की है और किसी भी सरकार की इस ताकत पर लार टपक सकती है कि वह लोगों के मोबाइल पर कुछ किस्म की फोटो कुछ किस्मों के वीडियो या कोई भी संदेश ढूंढ सकती हैं। इसके लिए कंपनी पर कब से कितना दबाव पड़ेगा या कंपनी के कंप्यूटरों में घुसपैठ करके सरकार या दूसरी हैकिंग एजेंसियां ऐसा कर पाएंगे, यह खतरा सामने खड़ा ही रहेगा। एप्पल तो दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी है और इसने अभी कुछ वर्ष पहले तक अमेरिकी सरकार और अमेरिकी अदालत की, आतंक के एक मामले में भी कोई मदद करने से साफ मना कर दिया था। दूसरी तरफ मोबाइल फोन और कंप्यूटर बनाने वाली बहुत सी ऐसी चीनी कंपनियां हैं जिनके बारे में दुनिया भर में यह शक है कि वे चीन की सरकार या खुफिया एजेंसियों को तमाम जानकारियां पहुंचाती हैं। पश्चिम के कई देशों में चीन की ऐसी बदनाम कंपनियों के टेलीफोन एक्सचेंज से लेकर उनके मोबाइल फोन तक इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं। भारत में भी शायद सरकार, फौज, और खुफिया एजेंसियां ऐसी कंपनियों के सामान इस्तेमाल करने से बचती हैं। अब सवाल यह है कि अगर चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के नाम पर भी, या शक का फायदा दिया जाए तो यह कह सकते हैं कि चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के लिए, अगर ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है तो वह बेजा इस्तेमाल के लिए भी मौजूद रहेगी। सरकारी खुफिया एजेंसियां और हैकिंग कंपनियां ये सब इस नए रास्ते के कानूनी या गैर कानूनी इस्तेमाल की संभावनाएं ढूंढने में लग चुके होंगे। आज एक कंपनी ने ऐसा किया है, आगे चलकर दूसरी कंपनियां ऐसा करेंगी, और बात मोबाइल से कंप्यूटरों तक चली जाएगी और दुनिया में कुछ भी गोपनीय या निजी नहीं रह जाएगा।

हम शायद ऐसी नौबत को ध्यान में रखते हुए हमेशा से इस बात को लिखते हैं कि लोगों का अपना चाल-चलन ठीक रखना, गैर कानूनी काम से बचना ही अकेला रास्ता है। धीरे-धीरे ऐसी तकनीक भी बन सकती है कि लोगों के मन में कोई बात आए और कंप्यूटर या फोन उसको रिकॉर्ड कर ले, इसलिए लोगों को अपना मन भी साफ-सुथरा रखना सीख लेना चाहिए। आज लोगों के मन में कोई बात आए और कल वह पोस्टर की तरह छपकर सरकारों के पास पहुंच जाए, यह बहुत खतरनाक नौबत होगी। फिलहाल मुजरिमों को पकडऩे और निजी जिंदगी की निजता को खतरे में डालने के बीच एप्पल की यह नई तकनीक आई है, और देखना है कि इसके बेजा इस्तेमाल कबसे सामने आते हैं।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
 

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बैटरी गाडिय़ों की संभावनाओं पर तुरंत काम की जरूरत
31-Aug-2021 5:18 PM (260)

मीडिया में कुछ अलग-अलग खबरें हैं, और कुछ अपने आसपास सडक़ों पर बदलती हुई तस्वीर दिख रही है, इन दोनों को मिलाकर देखें तो लगता है कि आने वाला वक्त बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों का होने वाला है। और हो सकता है कि जिस शहरी प्रदूषण को लोग कभी कम ना होने वाला मानकर चल रहे थे, वह कम होने लगे और धीरे-धीरे हवा साफ होने लगे। आज की एक खबर यह है कि हिंदुस्तान की ही एक ऑटोमोबाइल कंपनी ने अभी अपनी एक दमदार इलेक्ट्रिक कार बाजार में उतारी है जो सिंगल चार्ज में 300 किलोमीटर से अधिक चलेगी। दूसरी खबर देश की राजधानी के पास के एक औद्योगिक क्षेत्र की है कि वहां किस तरह बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों को बनाने के बहुत सारे उद्योग लग रहे हैं और वह एक इलेक्ट्रिक सिटी कहला रही है। फिर हम अपने आसपास देख रहे हैं तो पिछले दो-तीन वर्षों में लगातार शहरों में बैटरी से चलने वाले ऑटो रिक्शा बढ़ते दिख रहे हैं और अभी डीजल से चलने वाले ऑटो रिक्शा जितना प्रदूषण फैलाते हुए चलते थे धुएं के साथ-साथ जितना शोर करते हुए चलते थे, वह पूरे का पूरा सिलसिला बैटरी वाले ऑटो रिक्शा में खत्म हो गया है, और बगल से गाड़ी निकलने पर आवाज तक नहीं आती है। दिल्ली की एक खबर यह है कि वहां की सरकार ने बैटरी से चलने वाली सैकड़ों बसें खरीदी हैं।

कुल मिलाकर मतलब यह है कि मौजूदा गाडिय़ां धीरे-धीरे कम होने वाली हैं क्योंकि 15 बरस के बाद किसी गाड़ी का दोबारा रजिस्ट्रेशन कराना बहुत महंगा पडऩे वाला है, और उसे बेचना सस्ता पडऩे वाला है। दूसरी तरफ ऐसे शहर बढ़ते चल रहे हैं जहां पर डीजल ऑटो रिक्शा के बजाय बैटरी ऑटो रिक्शा को केंद्र और राज्य सरकार बढ़ावा दे रही हैं उन पर सब्सिडी दे रही हैं। यह नई गाडिय़ां इतनी सहूलियत की हैं कि इन्हें बड़ी संख्या में महिलाएं भी चला रही हैं। परंपरागत मुसाफिर और सामान ढोने के अलावा बैटरी वाले ऑटो रिक्शा में फल और सब्जियां बेचने के लिए सैकड़ों लोग एक-एक शहर में रिहायशी इलाकों में घूम रहे हैं और वहां बिना शोर किए बिना धुआं फैलाए कारोबार कर रहे हैं।

लेकिन सडक़ों पर गाडिय़ां कई किस्म की रहती हैं। ऑटो रिक्शा से परे निजी कारें और निजी दुपहिया ऐसे हैं जिनमें खूब पेट्रोल लगता है और जो कि अब सौ रुपये लीटर से अधिक महंगा हो चुका है। ऐसे में हिंदुस्तान में बाजार में उतरने वाला एक नया दुपहिया जब बहुत मामूली बिजली खर्च पर चलने का वादा कर रहा है, और एक-एक करके कई कंपनियां बिजली से चार्ज होने वाली बैटरी से चलने वाली गाडिय़ां उतारते जा रही हैं, तो आने वाला वक्त एक बदली हुई तस्वीर रहना तय है। लेकिन बैटरी से चलने वाली गाडिय़ां कुछ किस्म की नई चुनौतियां लेकर आने वाली हैं। एक तो यह कि आज जिस तरह गाडिय़ों के निकले हुए, घिसे हुए टायर पहाड़ की तरह इकट्ठे होते जा रहे हैं, क्या गाडिय़ों की बैटरी उसी किस्म के नए पहाड़ बनेंगीं, या हिंदुस्तान की जुगाड़ तकनीक उन बैटरी के दोबारा इस्तेमाल जैसा कोई रास्ता निकाल सकेगी? बैटरी की जिंदगी बढ़ाना और बैटरी की उत्पादकता बढ़ाना इन दोनों पर पूरी दुनिया में खूब काम चल रहा है, और बैटरियों का बेहतर होना केवल वक्त की बात है इसलिए इनके पहाड़ बनने का खतरा धीरे-धीरे कम भी हो सकता है। अब दूसरी बात यह है कि जब लोगों को अपनी दुपहिया या चौपहिया को घर और दफ्तर से परे चार्ज करने की सहूलियत जब तक नहीं रहेगी, तब तक बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों का आगे बढऩा कुछ धीमा भी हो सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर या अलग-अलग अपने चुनिंदा बड़े शहरों में बैटरी चार्ज करने के सेंटर बनाने चाहिए जो कि पेट्रोल और डीजल के पंपों की तरह जगह-जगह हों और उनके साथ कुछ घंटे लोगों के बैठने खाने-पीने आराम करने या नहाने जैसी सहूलियत भी जोडऩी चाहिए ताकि इस कारोबार के जिंदा रहने की गुंजाइश भी बढ़े और लोगों को एक जगह गाड़ी चार्ज होने तक इंटरनेट या मनोरंजन के साथ-साथ खाने-पीने, लेटने की सुविधा भी मिल सके। दरअसल बैटरी की गाडिय़ां अगर बढ़ जाएंगी और तब तक उनकी चार्जिंग का ढांचा विकसित नहीं होगा, तो इससे लोगों का उत्साह कम भी हो सकता है। इसलिए मौजूदा पेट्रोल पंप उनके ढांचे को भी बैटरी चार्जिंग स्टेशन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि उनके आसपास खाने-पीने की कोई न कोई जगह रहती है। दूसरी तरफ स्थानीय संस्थाएं या राज्य सरकार ऐसे नए कारोबार भी विकसित कर सकती है जिनमें चार्जिंग स्टेशन एक बड़ा आकर्षक कारोबार हो सकता है।

हिंदुस्तान के बाजार और हिंदुस्तान की सरकार इन दोनों को मिलकर इस मौके का कई तरह का इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हम बहुत तकनीकी जानकारी में नहीं जा रहे हैं, लेकिन यह संभावना भी देखनी चाहिए कि क्या सोलर पैनलों से भी बैटरी चार्ज हो सकती हैं? क्या चार्जिंग खो चुकी बैटरी की जगह तुरंत ही दूसरी बैटरी दी जा सकती है ताकि लोगों को चार्जिंग की राह देखते हुए अधिक वक्त तक रुकना ना पड़े? दुनिया के कई देशों में बैटरी की अदला-बदली एक बड़ा संगठित कारोबार बन गया है। छोटे से ताईवान में लाखों लोग बैटरी बदलकर चार्ज की हुई बैटरी देने वाली कंपनी के ग्राहक हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के शहरी विकास से जुड़े हुए विभागों को तुरंत ही अगले 10-20 बरस की ऐसी संभावनाओं को देखकर उसके हिसाब से क्षमता विकसित करनी चाहिए ताकि नया कारोबार भी पनपे, और लोगों को बैटरी की गाडिय़ां लेते हुए कोई आशंका भी ना रहे कि वह कहीं भी खड़ी हो जाएगी तो क्या होगा। आज जिस तरह कई कंपनियों की गाडिय़ों को खराब होने पर उठाकर ले जाने की सहूलियत उनकी कंपनियां देती हैं कुछ उसी तरह की बैटरी पहुंचाने की सुविधा भी रहनी चाहिए कि एक टेलीफोन करते ही कोई तकनीशियन आकर बैटरी बदल कर चले जाए। राज्य सरकारों को अपने स्तर पर भी कल्पनाशील होना चाहिए और आने वाले वक्त का अंदाज लगाकर सरकार की नीतियां बनाकर जमीन देनी चाहिए, सहूलियत देनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ऐसे बददिमाग और हिंसक अफसर की जगह सरकार नहीं, जेल में होनी चाहिए
30-Aug-2021 5:19 PM (397)

हरियाणा के एक शांतिपूर्ण किसान प्रदर्शन पर पुलिस की लाठियों से एक बुजुर्ग किसान का सिर फोड़ दिया गया और लहूलुहान कपड़ों में उसकी तस्वीरें देश के लोगों को दहला रही हैं। इस बुजुर्ग ने अपने कुर्ते पर सामने भगत सिंह का एक बिल्ला लगा रखा था, और लिखने वाले उसे भी देखकर उसका भी जिक्र कर रहे हैं। पुलिस के तो बहुत से ऐसे मामलों में लोग जख्मी होते हैं, उनकी तस्वीरें भी आती हैं, लेकिन यह मामला थोड़ा सा अलग इसलिए है कि हरियाणा के उस इलाके में एक नौजवान आईएएस अफसर एसडीएम था और उसने पुलिस को प्रदर्शनकारियों का सिर तोडऩे का निर्देश दिया था। इसके बाद भी अगर वीडियो कैमरे से इस अफसर की हिंसक बकवास रिकॉर्ड नहीं हुई होती तो भी यह मुद्दा नहीं बनता, क्योंकि पुलिस लाठियों से तो जख्मी होना और कभी-कभी मरना भी होते ही रहता है। लेकिन एक खासे पढ़े-लिखे और आईएएस अधिकारी की ऐसी जुबान को लेकर लोग बहुत विचलित हैं और उसकी बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं। इस सिलसिले में सबसे गंभीर बात तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने लिखी है उन्होंने कहां है कि जूते चाटने वाले ऐसे अफसर का नाम लेकर उन्हें धिक्कारना चाहिए क्योंकि ये लोग अगर ड्यूटी की बात कर रहे हैं, तो यह याद रखने की जरूरत है कि हिटलर के यहूदी जनसंहार शिविर पर जो नाज़ी सुरक्षा गार्ड तैनात थे, वे भी यह दावा करते थे कि वे अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। देश में बहुत से अफसरों ने, राजनीतिक दलों के नेताओं ने, और खुद हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने इस अफसर की ऐसी हिंसक बात की निंदा की है, और चौटाला ने इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा की है। अफसर ने वीडियो रिकॉर्डिंग में यह साफ-साफ कहा है कि अगर प्रदर्शनकारी आएं तो उनका सिर फूटा हुआ होना चाहिए, पुलिस को इसकी छूट है।

देश में सरकारी अफसरों की सोच का जो हाल है उसे लेकर हम बार-बार लिखते हैं लेकिन जिस दिन लिखते हैं उसके अगले ही दिन फिर ऐसी कोई बात सामने आती है, और दिल दहला जाती है। अदालतों तक ऐसे मामले जब पहुंचते हैं तो यह समझ पड़ता है कि इस देश की अदालत, इस देश की सरकार से ही लड़ रही है, या प्रदेश के हाई कोर्ट उस प्रदेश की सरकार से ही लड़ते रह जाते हैं। सरकारें कानून तोड़ते चलती है कानून कुचलते चलती हैं, तरह-तरह की हिंसा और बदमाशी करते चलती हैं, और अदालतों का शायद आधा वक्त सरकार की ज्यादतियों से जूझने में ही निकल जाता है। हर दिन हर एक राज्य के हाई कोर्ट से वहां की सरकारों के खिलाफ ढेर सारे नोटिस निकलते हैं, ढेर सारे आदेश निकलते हैं, और हर कुछ दिनों में कोई न कोई कड़ा फैसला सरकार के खिलाफ आता है। कुछ ऐसा ही सुप्रीम कोर्ट में अगर जज ईमानदार हैं, जैसा कि आज दिखाई पड़ता है, तो आए दिन सरकार कटघरे में खड़ी दिखती है, सरकार से जवाब देते नहीं बनता है। यह पूरा सिलसिला सरकार में बैठे हुए अफसरों और मंत्रियों की मनमानी की वजह से है जिनमें से भी जुल्मों के ऐसे सैकड़ों मामलों में से कोई एक-दो ही अदालत तक पहुंच पाते हैं, और निजी कार्रवाई तो शायद ही किसी मंत्री या अफसर पर होती हो।

हमें ऐसा लगता है कि आज देश में किसान आंदोलन जिस तरह खबरों में हैं और जिस तरह एक अफसर की वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है तो यह मामला पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के लिए एक माकूल मामला है जिसमें हरियाणा सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाए कि इस अफसर को बर्खास्त क्यों न किया जाए? जिस अफसर की सोच इस तरह हिंसक है कि लोगों का सिर तोड़ दिया जाए और जिसके उकसावे पर पुलिस ने सचमुच ही एक बूढ़े किसान का सिर तोड़ दिया, तो ऐसे अफसर को बर्खास्त से कम कुछ नहीं करना चाहिए। हिंदुस्तान में बेरोजगारी बहुत है पढ़े-लिखे लोग भी बहुत हैं, और ऐसे अफसरों की बर्खास्तगी एक बार शुरू होगी तो उनकी जगह तो दूसरे लोग मिल जाएंगे, लेकिन तमाम लोगों को हिंसा से दूर रहने की नसीहत भी मिल जाएगी। बड़ी अदालतों को अपने इलाकों में होने वाली ऐसी हिंसा को अनदेखा नहीं करना चाहिए। किसी राज्य के हाईकोर्ट की यह संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि उसके सामने अगर ऐसा कोई मामला कोई लेकर ना भी आए, तो भी उसे खुद होकर जनहित में उसकी जानकारी में आये ऐसे मामले दर्ज करना चाहिए और सरकार को नोटिस देना चाहिए।

सरकार में बैठे हुए लोग अपनी राजनीतिक पसंद और नापसंद के मुताबिक प्रशासन और पुलिस का लगातार बेजा इस्तेमाल करते हैं, और उनकी चापलूसी करने वाले अफसर उन्हें खुश करने के लिए इस तरह की हिंसा करते हैं, कहीं बेकसूरों को फंसाते हैं, तो कहीं मुजरिमों को छोड़ते हैं। कल ही हमने इसी पेज पर इस बात को लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और सत्ता के बीच के गठजोड़ को लेकर किस तरह की फिक्र जाहिर की है। जिस वक्त हम इस बात को लिख रहे थे, उसी वक्त यह बुजुर्ग किसान अपने जख्मों को लेकर लहूलुहान बैठा हुआ था। यह खून बेकार नहीं जाना चाहिए और जिस बुजुर्ग किसान का सिर फोडक़र उसका खून बहाया गया है, और जो बहते हुए भगत सिंह की तस्वीर वाले बिल्ले पर भी गया है, तो इस मामले को एक नमूना मानकर, एक मिसाल मानकर, अदालत से इस अफसर की बर्खास्तगी करवानी चाहिए ताकि बाकी अफसरों को भी एक सबक मिल सके। आमतौर पर अखिल भारतीय सेवाओं से आए हुए अफसरों को कोई छूने की भी जुर्रत नहीं करते हैं लेकिन यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। इसी मामले से शुरुआत हो जाए। इसे बर्खास्त करके जेल भेजना चाहिए।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अफगानिस्तान में अमरीकी फ़ौज तालिबान के रहम पर जिन्दा है !
29-Aug-2021 5:01 PM (186)

अफगानिस्तान के ताजा हालात देखें तो अमेरिका पर तरस आता है। बीस बरस जिन तालिबान पर अमेरिका बम बरसाते रहा, जिनके खिलाफ उसने अपने सहयोगी देशों की भी फौज लेकर अफगानिस्तान पर कब्जा करके रखा, अपनी पिट्ठू सरकारों को वहां लाद कर रखा, आज उन्हीं तालिबान के रहमोकरम पर अमेरिका काबुल में जिंदा है। हालत यह है कि काबुल एयरपोर्ट के भीतर तालिबानी इजाजत से अमेरिकी फौजों का काबू है, और 31 अगस्त तक है। लेकिन इसी एयरपोर्ट के पास हुए बम धमाके में अभी 4 दिन पहले 1 दर्जन से अधिक अमेरिकी फौजियों सहित करीब डेढ़ सौ मौतें हुई हैं, और उसके बाद अमेरिकी फौज तालिबान की हिफाजत में वहां से लोगों को निकालने का काम कर रही है। एयरपोर्ट का नियंत्रण अमेरिका के हाथ है लेकिन एयरपोर्ट के बाहर सुरक्षा घेरा तालिबान का है।

किसने ऐसे दिन की कल्पना की होगी कि दुनिया का सबसे ताकतवर देश होने का दावा करने वाला अमेरिका आज अपनी फौज को अफगानिस्तान से निकालने के लिए तालिबान का मोहताज है। आज अमेरिका के सामने यह बहुत बड़ा खतरा है कि अगले तीन-चार दिनों में वह जैसे-जैसे अपनी फौज वहां से रवाना करेगा, वैसे-वैसे एयरपोर्ट पर मौजूद घटती चली जाने वाली अमेरिकी फौज पर खतरा बढ़ते चले जाएगा, क्योंकि किसी हमले से जूझने के लिए वहां अमेरिकी फौज कम संख्या में रह जाएगी। इस बारे में हमने इसी जगह लिखा भी था कि जिस तरह महाभारत में अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो मां के पेट से सीखने मिल गया था, लेकिन चक्रव्यूह को तोडक़र निकलना वह नहीं सीख पाया था, कुछ वैसी ही हालत काबुल में अमेरिका की हो रही है। दुनिया के बड़े-बड़े देश इस बात को लेकर अमेरिका से खफा हैं कि उसने 20 बरस के फौजी कब्जे में तो अगुवाई की, लेकिन आज अफगानिस्तान छोडऩे की नौबत आने पर दसियों हजार अफगान सहयोगियों को छोडक़र वहां से निकल रहा है, जिन्होंने इतने बरस राज्य चलाने के लिए अमेरिका के लिए काम किया था। अमेरिका इस नौबत को लेकर इस कदर हिला हुआ है कि पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तालिबान के साथ किए गए समझौते पर अमल करते हुए भी मौजूदा राष्ट्रपति जो बाईडन के काबू में नौबत नहीं रह गई है, और अपने फौजियों के मरे जाने के बाद वे मीडिया से बात करते हुए थम गए थे। लंबे समय के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की इस तरह एक हमले में मौत हुई है, और इतनी बड़ी संख्या में हुई है।

अगले दो-तीन दिन अफगानिस्तान से किस तरह अमेरिकी फौज और अमेरिकी नागरिक खुद निकल पाते हैं इस पर दुनिया की नजरें हैं। दुनिया की नजरें इस पर भी हैं कि जितना अमरीकी फौजी सामान अफगानिस्तान में आज है, उसमें से कितना वह निकाल सकेगा। काबुल की जो खबरें हैं वे ये हैं कि एयरपोर्ट पर अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत भी चल रही है, अमेरिका मदद भी मांग रहा है, तालिबान बेरुखी से कुछ मदद कर भी रहा है, और उसी के तहत आईएस के आतंकी हमले के बाद अब ताजा हिफाजत तालिबान मुहैया करा रहा है जिसने कि एयरपोर्ट के पूरे इलाके को घेरकर रखा है, अपने कब्जे में रखा है। आज अमेरिकी फौजियों की हिफाजत उस एयरपोर्ट पर तालिबानियों की वजह से है और तालिबान के हाथ है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश अफगानिस्तान को जैसी बदहाली में छोडक़र निकल रहे हैं उसका ब्यौरा संयुक्त राष्ट्र के पास है जिसने कहा है कि अफगानिस्तान की जनता एक बहुत विशाल और विकराल मानवीय त्रासदी पेश कर रही है और दुनिया को इसके बारे में तुरंत सोचना पड़ेगा। लगे हुए पाकिस्तान और ईरान में लाखों की संख्या में अफगान शरणार्थी सरहद खटखटाते खड़े हैं, और उनके पास न खाना है इलाज का ठिकाना है। पाकिस्तान पहले ही अपने हाथ खड़े कर चुका है कि उसकी जमीन पर पहले से जो 15 लाख अफगान शरणार्थी मौजूद हैं, वह उनका ख्याल रखने की ताकत भी नहीं रखता है, और जो नया सैलाब अफगानिस्तान से अब पाकिस्तान सरहद पर पहुंचा हुआ है उसे जगह देने की ताकत पाकिस्तान में नहीं बची है। अब हैरानी इस बात को लेकर भी होती है कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमेरिकी सरकार और उसकी फौज अफगानिस्तान में 20 बरस की अपनी मौजूदगी के बावजूद इस दिन की कल्पना नहीं कर पाई थी कि उसके बाहर निकलने पर अफगान जनता का क्या होगा। खैर, जिसे खुद के निकलने का तरीका नहीं पता, उससे अफग़़ान जनता का अंदाज लगाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
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दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मंदिर में छोटे कपड़ों में जाने पर रोक क्या निजी आज़ादी को कुचलना है?
28-Aug-2021 5:43 PM (257)

हरियाणा के एक विख्यात तीर्थ स्थान माता मनसा देवी मंदिर में ट्रस्ट की सचिव ने एक जुबानी आदेश निकालकर सुरक्षाकर्मियों को कहा है कि छोटे कपड़े और जींस पहनकर आने वाले लोगों को मंदिर में इजाजत ना दी जाए। सचिव के पद पर काम कर रही इस महिला का तर्क यह है कि दूसरे श्रद्धालु और दर्शनार्थी कुछ लोगों को छोटे कपड़ों में देखकर आपत्ति करते थे और उनका कहना था कि मंदिर में मर्यादा का पालन होना चाहिए। दूसरी तरफ इस मंदिर ट्रस्ट के प्रशासक और पंचकूला जिले के कलेक्टर का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है और यह बोर्ड सचिव की निजी राय हो सकती है, ट्रस्ट ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है। कुछ लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, कुछ लोगों ने इसका विरोध किया है, कुछ लोगों ने इसे मौलिक अधिकारों का हनन, और तुगलकी फैसला बताया है, लेकिन कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि हर धार्मिक स्थल की मर्यादा रहती है, इसलिए श्रद्धालुओं को यहां भी ध्यान रखना चाहिए। मनसा देवी के मंदिर में देशभर से लोग पहुंचते हैं और यह करीब पौने 200 साल पुराना मंदिर है।

हरियाणा का यह कैसा दिलचस्प मामला है जिसमें महिलाओं के कपड़ों को लेकर या जींस को लेकर लगाई गई रोक पर मिलीजुली प्रतिक्रिया रही है। इस राज्य में लड़कियों पर कई तरह की रोक खाप पंचायतों से लेकर मौजूदा भाजपा सरकार के मंत्रियों, मुख्यमंत्री तक की तरफ से लगती रही है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि इस राज्य में कई लोग खुलकर कपड़ों पर ऐसी रोक का विरोध भी कर रहे हैं। इस बारे में सोचने की जरूरत है कि क्या मंदिर में ऐसे किसी ड्रेस कोड को लागू करना चाहिए या नहीं? हम बहुत खुले ख्याल से इस जगह पर अपनी बात लिखते हैं लेकिन इस मुद्दे पर ऐसा लगता है कि मंदिर ट्रस्ट की सचिव ने जो जुबानी प्रतिबंध लगाया है, वह प्रतिबंध एक हिसाब से ठीक है। मंदिर में अगर लड़कियां और महिलाएं छोटे कपड़ों में पहुंचेंगे तो हो सकता है कि दूसरे श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों का ध्यान देवी की तरफ से हटकर इनकी तरफ चले जाए। मंदिर में जाने वाले लोग तपस्वी और सन्यासी तो होते नहीं कि छोटे कपड़ों में महिलाओं को देखकर भी उनकी नजरें उधर न जाएँ। फिर यह भी है कि एक मंदिर में जाने वाले लोग किसी मजबूरी में वहां नहीं जाते, अपनी मर्जी से जाते हैं और अपनी तैयारी से जाते हैं। ऐसे में अगर वहां जाते हुए लोग साधारण कपड़ों में वहां जाते हैं और छोटे कपड़े नहीं पहनते हैं, या जींस नहीं पहनते हैं, तो यह उनके लिए बहुत असुविधा की बात नहीं है। एक धर्मस्थल में लोगों का ध्यान धर्म और उपासना की तरफ ही केंद्रित रह सके, इसमें उससे मदद मिल सकती है। अब दूसरे धर्म स्थलों के बारे में बात करें तो देश में जहां कहीं भी गुरुद्वारे हैं या मस्जिदें हैं उन सबमें भीतर जाते हुए लोग पगड़ी-टोपी पहनते हैं या सर पर रुमाल बांधते हैं, उसके बिना वहां कोई दाखिला नहीं होता। आज तक किसी गुरुद्वारे जाने वाले ने ऐसी शिकायत नहीं की कि उन्हें सिर पर कुछ रखे बिना, सर ढंके बिना वहां जाने नहीं मिलता है। मस्जिदों में जितनी नमाज होती हैं उनमें भी लोग सिर पर रूमाल बांधे होते हैं, या टोपी लगाए होते हैं। जो दुनिया के सबसे उदार देश हैं उनमें भी बहुत सी जगहों पर चर्च पर यह नोटिस लगे होते हैं कि भीतर आने वाले लोगों के घुटने ढंके रहें। और ये चर्च किसी गांव या कस्बे के चर्च नहीं है, ये दुनिया के मशहूर पर्यटन केंद्रों के चर्च हैं, जहां पर दुनिया भर के सैलानी घूमने-फिरने के अंदाज में बिना किसी आस्था के भी इमारत को देखने के लिए पहुंच जाते हैं, और भीतर भी देखने जाते हैं। ऐसे देशों में चर्च पर भी ऐसे नोटिस लगे होते हैं और उन पर अमल भी करवाया जाता है।

हर धर्म के अपने रीति रिवाज रहते हैं और किसी भी धार्मिक स्थान पर वहां के लोग ऐसे साधारण नियम लागू भी कर सकते हैं जिन पर अमल करना बहुत बड़ी दिक्कत की बात ना हो। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर से लेकर हिंदुस्तान में बहुत सारे ऐसे मंदिर हैं जहां पर जाने वाले पुरुषों को धोती लपेट कर ही भीतर जाना होता है। केरल का एक प्रमुख तीर्थ स्थान ऐसा है जहां सारे पुरुष काले कपड़ों में जाते हैं। अलग-अलग तरह के धार्मिक अनुशासन रहते हैं और इन्हें लोगों की आजादी में खलल मानना ठीक नहीं है। हिंदुस्तान में किसी धार्मिक स्थल पर जाति के आधार पर दाखिला ना हो या महिलाओं के दाखिले पर रोक हो तो उसके खिलाफ तो संघर्ष करना ठीक बात है। लेकिन किसी मंदिर में छोटे कपड़े पहन कर ही जाने की जिद जायज नहीं लगती है क्योंकि छोटे कपड़ों में लड़कियों या महिलाओं को देखकर उस धर्म स्थल का माहौल गड़बड़ा सकता है। इसलिए पंचकूला के कलेक्टर ने चाहे मंदिर सचिव के इस जुबानी आदेश को अनधिकृत बतलाया हो, हमारे हिसाब से यह आदेश ठीक है और जिन लोगों को ऐसे कपड़ों में वहां पहुंचने की बात नाजायज लगती है, वे लोग वहां न जाएं। हर उपासना स्थल को अपने ड्रेस कोड तय करने का अधिकार रहता ही है, और उसके खिलाफ किसी को जिद करना नहीं चाहिए। निजी स्वतंत्रता जैसे बड़े-बड़े शब्दों को ऐसे मामले में बीच में लाना पूरी तरह से फिजूल की बात है, और जिनको किसी धर्म स्थल पर वहां के नियम नहीं मानने हैं वे वहां न जाएं। हम जाति के आधार पर या धर्म के आधार पर या औरत मर्द होने के आधार पर किसी के दाखिले पर रोक टोक के खिलाफ हैं। देश के धर्म स्थलों पर ऐसी रोक हो तो लोगों को वहां संघर्ष करना चाहिए और निजी स्वतंत्रता का दर्जा इतना गिरा भी नहीं देना चाहिए कि उसका इस्तेमाल मंदिर में छोटे कपड़े पहनने की जिद के लिए किया जाए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : पति पत्नी को थप्पड़ मारे तो जेल, और रेप करे तो कोई सजा नहीं !
27-Aug-2021 5:20 PM (333)

देश की एक और अदालत ने शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार के मामले में एक फैसला सुनाया है जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा एक आदमी पर अपनी बीवी से बलात्कार करने का जुर्म दर्ज करके सुनवाई शुरू करने को खारिज किया है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने इस राज्य के एक मामले में शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार पर मौजूदा कानून का हवाला देते हुए कहा है कि अगर यह सेक्स जोर जबरदस्ती से भी किया गया है, लेकिन पत्नी 18 वर्ष से अधिक उम्र की है, और साथ रहती है, तो इसे बलात्कार नहीं कहा जाएगा। भारत में बलात्कार के कानून के तहत बहुत से प्रदेशों में ऐसे फैसले आए हुए हैं, और महिला अधिकारों के आंदोलनकारी लगातार इस कानून के खिलाफ और अदालतों के ऐसे रुख के खिलाफ बोलते आए हैं, और यह मांग करते आए हैं कि हिंदुस्तान में शादीशुदा जोड़ों के बीच भी असहमति के बाद जबरदस्ती बनाए गए सेक्स संबंधों को बलात्कार गिना जाए। लेकिन आज कानून ऐसा नहीं है और हाई कोर्ट का यह फैसला मौजूदा बलात्कार कानून की तंग परिभाषाओं के भीतर ही लिखा गया है।


कुछ लोगों को यह शिकायत हो सकती है कि अगर हाई कोर्ट के जज चाहते तो वे मौजूदा कानूनों से अपनी असहमति जताते हुए या मौजूदा कानून की आलोचना करते हुए भी फैसला यही लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कानून के दायरे में कोई आदेश या फैसला लिखते हुए किसी जज पर यह बंदिश नहीं रहती कि वे उस कानून से अपनी असहमति को अनिवार्य रूप से दर्ज करें। दूसरी तरफ देश की बड़ी अदालतों के कई जज ऐसा करते भी आए हैं और उनके ऐसा करने से कानून बनाने वाली संसद और विधानसभाओं को कुछ सोचने का मौका भी मिलता है लेकिन यह अलग-अलग जज की अपनी अलग-अलग सोच पर निर्भर बात है कि वह कानून से परे अपनी राय कितनी देना चाहते हैं। फिलहाल क्योंकि मौजूदा कानून से देश के एक बड़े मुखर तबके की बड़ी कड़ी असहमति है, इसलिए इस पर चर्चा होनी चाहिए।

भारत में महिला अधिकारों के आंदोलनकारियों की इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि इस देश में महिला को एक सामान की तरह देखा जाता है जिसका मालिक शादी के पहले उसका पिता होता है, और शादी के बाद उसका पति। महिला आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि भारत में बलात्कार को किसी महिला के शरीर पर हमले की तरह नहीं देखा जाता बल्कि उसके पिता या उसके पति के परिवार की इज्जत पर हमले की तरह देखा जाता है कि परिवार की इज्जत लुट गई या उस महिला की इज्जत लुट गई. यह नहीं देखा जाता कि उस महिला पर एक शारीरिक हमला भी हुआ है, इस हमले से उसका बड़ा नुकसान भी हुआ है जिसकी भरपाई हो सकता है कि बची पूरी जिंदगी पूरी ना हो. लेकिन हिंदुस्तान का पुरुष प्रधान नजरिया, मर्दाना नजरिया कानून को इस नजर से सोचने ही नहीं देता। आज दुनिया में कुल 36 ऐसे देश हैं जहां पर पति-पत्नी के बीच बलात्कार को बलात्कार नहीं गिना जाता। यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी के बीच में जो होता है, उसमें अगर असहमति भी है, तो भी वह जुर्म नहीं है। इस बात को लेकर भारत की महिलाओं में, और महिलाओं के हक की वकालत करने वाले पुरुषों में भी, बड़ी नाराजगी है और शादीशुदा जिंदगी के बलात्कार को एक जुर्म बनाने के लिए आंदोलन चल रहा है।

एक सांसद शशि थरूर ने 2018 में संसद में इस बारे में एक प्रस्ताव भी पेश किया था लेकिन किसी समर्थन के बिना वह विधेयक अपने-आप ही खत्म हो गया और उस पर कोई चर्चा भी नहीं हुई। आज इस बुनियादी बात पर संसद के भीतर और संसद के बाहर चर्चा की जरूरत है कि जब महिलाओं की दूसरे कई किस्म की हिंसा की शिकायत जुर्म के दायरे में आती हैं, और बिलासपुर हाईकोर्ट ने जिस मामले में इस रेप को जुर्म मानने से इनकार किया है, उस मामले में भी पत्नी के साथ पति द्वारा दूसरे किस्म की हिंसा के खिलाफ मामला चलाने की इजाजत दी है। अब सवाल यह उठता है कि एक शादीशुदा महिला से उसके पति द्वारा दूसरे किस्म की हिंसा तो जुर्म के दायरे में आ रही है लेकिन सेक्स की हिंसा को बाहर कर दिया गया है, और बलात्कार को भी सजा के लायक नहीं माना गया है। यह कानून भारत में चले आ रहे दूसरे सैकड़ों कानूनों की तरह पूरी तरह से नाजायज और खराब कानून हैं। आज पूरी दुनिया के सभी लोकतंत्रों में महिला के अधिकारों को लेकर जिस तरह की जागरूकता आई है, और जिस तरह से महिला अधिकारों के मुद्दे को उठाया जा रहा है उसे देखते हुए हिंदुस्तान को अपने इस कानून के बारे में फिर से सोचना चाहिए। एक महिला पर पति अगर हाथ हो उठा दे तो वह तो सजा के लायक है, जुर्म है, लेकिन अगर वह उसकी मर्जी के खिलाफ उससे बलपूर्वक बलात्कार करे, तो भी वह जुर्म नहीं है, यह बलात्कार की और शादीशुदा जोड़े के बीच हिंसा की एक बहुत ही खराब और बेइंसाफ परिभाषा है जिसे बदले जाने की जरूरत है. हिंदुस्तान में मर्दाना सोच इस तरह हावी है कि लोग यह मानते हैं कि शादीशुदा जोड़े के बीच अगर बलात्कार को सजा मान लिया जाएगा तो इससे शादीशुदा जिंदगी और विवाह नाम की संस्था खतरे में पड़ जाएंगे। लेकिन शादीशुदा जिंदगी और विवाह तो वैसे भी गैरसेक्स हिंसा के आधार पर खतरे में पड़ सकते हैं वे तलाक का भी पर्याप्त आधार बनते हैं, और सजा दिलाने के लायक भी हैं। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि जब थप्पड़ मारना जुर्म के लायक है, तो बलात्कार को जुर्म के लायक न मानना एक बहुत ही घटिया किस्म की सोच का सबूत है।

कानून जिस वक्त बना होगा उस वक्त अंग्रेज या हिंदुस्तानी जो भी इसके लिए जिम्मेदार रहे होंगे, लेकिन आज संसद में इस कानून को बदलने की ताकत जिन लोगों के हाथ में है वे अगर इसे नहीं बदलते हैं, तो वे इस कानून के साथ हैं, वे इस हिंसा के साथ हैं, और वे ऐसे शादीशुदा बलात्कार के हिमायती हैं। हिंदुस्तान में शादीशुदा महिला के अधिकारों को दकियानूसी और गुफाकालीन सोच से बने हुए कानूनों से कुचलना ठीक नहीं है। इस कानून को बदलने के लिए न सिर्फ महिला अधिकारवादियों को, बल्कि देश के सभी मानवाधिकारवादियों को, लोकतंत्रवादियों को, और इंसाफपसंद लोगों को खुलकर आवाज उठानी चाहिए। जो बात हिंदुस्तान में आज फैशन में नहीं है, चलन में नहीं है वह भी शुरू होनी चाहिए कि अलग-अलग इलाकों के प्रतिनिधिमंडल जाकर अपने विधायकों और सांसदों से मिलें और उन्हें कानून में फेरबदल करने के लिए कहें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महाशक्ति के महापमान के बाद दुनिया के बदल गए समीकरण
26-Aug-2021 5:09 PM (136)

अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद जिस तरह का माहौल पूरी दुनिया में बन रहा है उसे देखते हुए लगता है कि 20 बरस की फौजी कवायद के बाद जितनी बड़ी शिकस्त अमेरिका को अफगानिस्तान में मिली है उसका कोई मुकाबला नहीं है। खुद अमेरिका को ऐसी शर्मिंदगी और इतना बड़ा नुकसान शायद इसके पहले कहीं देखने नहीं मिला होगा। लेकिन तालिबान के हाथों ऐसी हार की शर्मिंदगी तो एक बात है, इसकी वजह से आज पूरी दुनिया में जो तस्वीर बन रही है, उसमें अमेरिका आज दुनिया का सबसे अधिक नुकसान झेलने वाला देश दिख रहा है। इस बात को समझने के लिए यह देखना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के जिस फौजी संगठन को साथ लेकर अमेरिका ने 20 वर्ष पहले अफगानिस्तान पर हमला किया था, उसके बाद कब्जा किया था, और आज जिस तरह वहां से जान बचाकर उसे निकलना पड़ रहा है, तो इससे अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की साख एकदम चौपट हुई है। आज जब अलग-अलग देशों के लोग वहां से नहीं निकल पा रहे हैं, और इन देशों की फौजों और सरकारों के साथ काम करने वाले स्थानीय अफगान नागरिक भी मुसीबत में फंसे हुए हैं, तो साथी देश अमेरिका को इस बात की तोहमत दे रहे हैं कि उसने तालिबान से बिना किसी शर्त के केवल जान बचाकर भाग निकलने का समझौता किया है और अपने साथियों की जान की परवाह भी नहीं की। अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की इतनी थू थू पहले कभी नहीं हुई थी। और इससे एक बात और साफ हो जाती है कि आगे अगर अमेरिका इस तरह का कोई और फौजी दुस्साहस करेगा तो शायद कोई दूसरा देश उसके साथ इस हद तक शामिल नहीं होगा। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत अमेरिका, तालिबान से हारकर अलग-थलग पड़ गया है।

अब एक दूसरी बात को देखें तो अब अफगानिस्तान की संभावित तालिबान सरकार की शक्ल में वहां एक ऐसी सरकार बनने जा रही है जो कि बगल के लगे हुए ईरान की तरह ही अमेरिका के खिलाफ बागी तेवर वाली सरकार है। आज के तालिबान का यह बयान सामने आया है कि न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर विमानों से हमले में ओसामा बिन लादेन का कोई हाथ नहीं था। यह बयान अमेरिका के उस दावे को ही खारिज करता है जिस दावे के चलते अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अलकायदा और ओसामा बिन लादेन को खत्म करने के लिए 2001 में हमले शुरू किए थे। लोगों को याद होगा कि जब इराक पर अमेरिका ने हमला किया था तो सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियारों का जखीरा होने का दावा किया था। और दुनिया को सद्दाम से बचाने के नाम पर इस हमले को जायज ठहराने की कोशिश की थी। लेकिन अमेरिका की फौज ने पूरे इराक को खंगाल डाला था, वहां से कोई हथियार बरामद नहीं हुए थे। पूरी तरह से यह साबित हुआ था कि अमेरिका ने फर्जी खुफिया रिपोर्टों के हवाले से उस हमले की साजिश बनाई थी और उसमें ब्रिटेन जैसे दूसरे पश्चिमी देशों को साथ में लेकर वहां हमला किया था जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। अब अमेरिका से बागी तेवर वाली अफगान सरकार के साथी वे देश हैं जो खुद भी अमेरिका से एक सीधा टकराव रखते हैं। तालिबान सरकार के साथ चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान और टर्की जैसे देश खड़े हैं, जो सारे के सारे अमेरिका के खिलाफ हैं। इस हिसाब से अगर देखें तो एशिया के इस हिस्से में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और ईरान, चीन और टर्की यह तमाम लगे हुए, या करीबी देश जिस तरह अमेरिका के खिलाफ तेवरों वाले हैं, उससे न सिर्फ अमेरिका को फिक्र करने की जरूरत है, बल्कि अमेरिकी गिरोह के एक सबसे हमलावर और मुजरिम देश इजराइल को भी फिक्र करने की जरूरत है। अफगानिस्तान की शक्ल में एक ऐसी नौबत आकर खड़ी हो गई है जिसमें पाकिस्तान, चीन, रूस, टर्की, और ईरान, इन सबको एक साथ आने का मौका मिल रहा है और एक साथ आने की एक बड़ी वजह भी है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को कामयाब किया जाए। आज अगर देखें तो एशिया के इस पूरे हिस्से में अमेरिका के पास अपने फौजी या खुफिया ठिकाने को बनाने के लिए भी इन तमाम देशों में कहीं पांव धरने की गुंजाइश नहीं है।

यह बात भी समझने की जरूरत है कि भारत जैसा देश जिसने अमेरिका के फेर में पिछले बरसों में ईरान से भी अपने संबंध खराब किए हैं, आज अफगानिस्तान की अगली सरकार के साथ अपने संबंध बनाए रखने के लिए उसे रूस, ईरान, या चीन की सरकारों के रास्ते अपने पांव धरने की कोई गुंजाइश निकालनी पड़ेगी। इनमें से चीन की कोई हमदर्दी भारत के साथ नहीं होगी लेकिन रणनीतिक रूप से यह बात उसके लिए अच्छी होगी कि भारत अपनी विदेश नीति के किसी एक हिस्से के लिए अमेरिका के बजाय चीन का मोहताज हो रहा है। इस तरह भारत कम से कम अफगानिस्तान के एक मामले में अमेरिका पर आश्रित रहने नहीं जा रहा है। इस नाते अमेरिका को पाकिस्तान से लगा हुआ एक और देश अपने प्रभामंडल से कुछ हद तक बाहर होते दिख सकता है। इसके अलावा इस बात को भी समझने की जरूरत है कि मुस्लिम आतंकी संगठनों से परे अगर अफगानिस्तान की सरकार बनती है, तो बहुत से दूसरे मुस्लिम देश भी उस सरकार को और अफगानिस्तान को मदद देने के लिए तैयार होंगे। इस तरह अमेरिका के खिलाफ मुस्लिम देशों का एक अलग जमघट हो सकता है, और यह बात भी इजराइल के लिए खतरनाक हो सकती है जो कि इन्हीं देशों के इलाके में ईरान के निशाने पर बना हुआ देश है।

खुद अमेरिका के भीतर आज वहां के लोग अपनी सरकार को धिक्कार रहे हैं कि किस तरह अमेरिकी सरकार का साथ देने वाले अफगान नागरिकों को छोडक़र, खतरे में डालकर अमेरिकी फौज अपनी जान बचाकर वहां से वहां से भाग निकल रही है। यह बात अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत के लिए बड़ी शर्मिंदगी की भी है और अमेरिकी नागरिक इस बात को अच्छी तरह समझ भी रहे हैं। वे इस बात से तो खुश हैं कि उनके लोग दूर के एक देश के आंतरिक झगड़ों को निपटाने के लिए अपनी शहादत देने का सिलसिला खत्म करके घर आ रहे हैं, लेकिन अमेरिका के एक तबके का यह भी मानना है कि एक देश के रूप में अफगानिस्तान से जैसी शर्मनाक शिकस्त लेकर अमेरिकी फौज घर आ रही है, वह अमेरिका की दुनिया भर में साख चौपट करने के लिए काफी है। फिर अमेरिका में मानवाधिकार की फिक्र करने वाले और उसके लिए लडऩे वाले जागरूक लोगों का भी एक तबका है और यह लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि जिन अफगान महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को लेकर लडऩे की बात अमेरिकी सरकार इतने समय से करते आ रही थी, उन्हें तालिबान के भरोसे छोडक़र निकलने पर उनके अधिकारों का क्या होगा?

यह बात भी समझने की जरूरत है कि आज बहुत सारे देश तालिबान के रुख को देखने की बात तो कर रहे हैं और लगे हाथों में यह मुद्दा भी उठा रहे हैं कि महिलाओं के बारे में तालिबान की क्या सोच सामने आएगी यह देखना अभी बाकी है। लेकिन क्या सचमुच ही बाकी देशों को अफगान महिलाओं से इतनी हमदर्दी है? या फिर यह दुनिया की जन भावनाओं के सामने अपना एक नैतिक रुख दिखाने की ऐसी कोशिश है, जिसकी कूटनीति में या फौजी रणनीति में कोई जगह नहीं रहती। आज तालिबान जिस तरह की धर्मांधता, धार्मिक कट्टरता, और दकियानूसीपन पर खड़े हुए हैं, वे लोकतंत्र से जिस तरह कोसों दूर हैं, दुनिया के, सभ्य समाज के तौर तरीकों से जिस तरह कोसों दूर हैं, ऐसे में उनके साथ रिश्ते रखने की मजबूरी वाले देशों के सामने भी अपने नागरिकों और बाकी दुनिया के सामने यह दिखाने की एक मजबूरी रहती है कि वह अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की भी फिक्र करेंगे। सच तो यह है कि तालिबान के साथ दूसरे देश एशिया के इस हिस्से में भौगोलिक मजबूरियों की वजह से रिश्ता रखना चाहते हैं, अपने-अपने फौजी मोर्चों को ध्यान में रखते हुए रिश्ता रखना चाहते हैं, और कारोबार की जरूरतों के लिए भी वे अगली तालिबान सरकार से जुडऩा चाहते हैं। अमेरिका सहित दुनिया का कोई भी देश अफगान महिलाओं के लिए किसी भी किस्म की फिक्र से पूरी तरह आजाद है। अफगानिस्तान में मानवाधिकार अफगान जनता के अलावा किसी की भी प्राथमिकता नहीं है, और दुनिया का कोई भी देश अगर अफगान लोगों के मानवाधिकार की बात करता भी है, तो वह देश केवल जुबानी जमा-खर्च कर रहा है। ऐसे देश तालिबान से किसी संबंध की संभावना नहीं रखते या इस बात की कोई फिक्र नहीं करते कि उनकी कही हुई बात तालिबान पर असर कर पाएगी या नहीं।

आज अमेरिका ने दसियों लाख अफगान लोगों की जिंदगी को खतरे में डाला है और इनमें से लाखों लोग देश छोडक़र निकलने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें दुनिया में किस देश में जगह मिलेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि अफगानिस्तान से तमाम काबिल लोग तमाम अधिक पढ़े लिखे लोग और तमाम हुनरमंद लोग पहले बाहर निकल जाना चाहते हैं जिससे कि उस देश का अपना ढांचा एक नुकसान झेलने जा रहा है। इसलिए 20 बरस कब्जा जमाए रखने के बाद अमेरिका अफगान लोगों और अफगानिस्तान को एक बड़े खतरे और नुकसान में छोडक़र निकला है और इतिहास में इसे अच्छी तरह दर्ज किया जाएगा। एक आखरी बात यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने तालिबान के पूरे कब्जे के कुछ ही हफ्ते पहले जिस तरह के बड़े-बड़े दावे करके अफगानिस्तान में तालिबान के आने की किसी भी संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया था, उससे यह साफ है कि अमेरिका की सारी खुफिया ताकत, वहां के फौजी विश्लेषक, सब बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं, और उन्होंने अपने राष्ट्रपति को एक मसखरा साबित होने दिया। यह नौबत दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले इंसान के लिए अपने देश के भीतर भी एक बड़ी शर्मिंदगी की है, और इससे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पता नहीं कैसे उबरेंगे।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : नियमों को लागू करना तो अच्छा है, लेकिन महज इतने छोटे पैमाने पर?
25-Aug-2021 5:33 PM (268)

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अभी एक फैसले में कहा है कि पुलिस में लोगों को दाढ़ी रखने का संवैधानिक अधिकार नहीं है अदालत का कहना है कि पुलिस की छवि सेक्युलर रहनी चाहिए और ऐसी छवि से राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलती है। एक मुस्लिम सिपाही को विभाग की इजाजत के बिना दाढ़ी रखने पर निलंबित किया गया था उसने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी और वहां से फैसले में यह कहा गया है कि दाढ़ी रखने का धार्मिक स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं है, और पुलिस में अनुशासन के लिए जो आदेश जारी किया गया है उसमें सिखों को छोडक़र किसी भी अन्य पुलिसकर्मी को बिना इजाजत दाढ़ी रखने की छूट नहीं है।

हाईकोर्ट के फैसले का यह हिस्सा बड़ा दिलचस्प है जिसमें जज पुलिस के लिए कह रहे हैं कि उनकी एक धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहनी चाहिए जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है। आज लखनऊ हाई कोर्ट बेंच के ही इस प्रदेश, उत्तर प्रदेश में जिस तरह धर्मनिरपेक्षता खत्म की जा रही है, हो सकता है उसे लेकर जजों के दिमाग में फिक्र बैठी हुई हो और बाकी मामलों की चर्चा किए बिना उन्होंने इस मामले के बहाने इस जरूरत को गिनाया हो। उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई हफ्ता ऐसा गुजर रहा है जब किसी शहर-मोहल्ले या किसी और जगह का नाम नहीं बदला जा रहा है। लगातार ऐसे फैसले हो रहे हैं, और उन पर अमल हो रहा है। और यह पूरा का पूरा सिलसिला एक किसी वक्त रखे गए मुस्लिम नामों को बदल कर उनके हिंदूकरण के बारे में है. ऐसा नहीं है कि किसी हिन्दू नाम को भी बदला गया है. उत्तर प्रदेश में सरकार जिस तरह एक धर्म राज्य कायम करने पर उतारू है, और जिस तरह वहां मुस्लिमों के खिलाफ तरह-तरह के केस दर्ज हो रहे हैं, और जिस तरह वहां के हज हाउस तक को भगवा रंग दिया गया था, तो ऐसी तमाम बातों को देखते हुए उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट को जो सचमुच की फिक्र होनी चाहिए वह फिक्र घटते-घटते एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी तक आ गई। इस बात पर हैरानी होती है कि संविधान की व्याख्या करने तक का अधिकार जिन हाईकोर्ट को रहता है वे अपने दायरे में इस तरह के सरकारी कामकाज देखते हुए भी चुप रहते हैं, और धर्मनिरपेक्षता का तकाजा उन्हें एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी में दिख रहा है।

खैर इस बात को छोड़ दें तो हाल के बरसों में हिंदुस्तान में सरकारों पर धर्म का जैसा साया दिखा है, वह भयानक है। मध्यप्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में अपनी इमेज के ऊपर एक मंदिर सा बनवा लिया, और वहां पर प्रतिमा, फूल मालाएं, वह नजारा देखने लायक था। फिर शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री निवास में मंदिर बनवा लिया। देश भर के बहुत से प्रदेशों में तकरीबन हर थाने में बजरंगबली के मंदिर रहते हैं। सरकारी गाडिय़ों को देखें तो उनके भीतर देवी-देवताओं की छोटी प्रतिमाएं लगी रहती हैं, सरकारी दफ्तरों में मंत्री और अफसर अपनी आस्था के मुताबिक देवी-देवता, किसी दूसरे ईश्वर, या किसी गुरु की तस्वीरें टांग कर रखते हैं, मेजों पर कांच के नीचे तस्वीरें सजाकर रखते हैं। और सरकार की जो धर्मनिरपेक्ष छवि होनी चाहिए उसका कहीं अता-पता नहीं रहता। लेकिन बात महज अपने धर्म और अपने किसी आध्यात्मिक गुरु के प्रति आस्था दिखाने तक रहती, तब तक भी ठीक था. आज तो संविधान की शपथ लेकर मंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले लोग, और सरकारी सेवा के तहत काम करने वाले अफसर और कर्मचारी जिस तरीके से सांप्रदायिकता को लादते हुए दिख रहे हैं, सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देते हुए दिख रहे हैं, भीड़त्या करने वाले लोगों के जेल से छूटने पर केंद्रीय मंत्री उनको माला पहनाते दिख रहे हैं, तो ऐसे में किसी एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी पता नहीं इस देश में सांप्रदायिकता कितना बढ़ा देगी और धर्मनिरपेक्षता को कितना घटा देगी?

हम तो ऐसी आदर्श स्थिति के पक्ष में हैं कि तमाम धार्मिक प्रतीकों को सरकार से बाहर कर दिया जाए, लोगों की तमाम आस्था को उनके घरों तक सीमित कर दिया जाए, और इसे सरकारी सेवा शर्तों में जोड़ दिया जाए, या मंत्री और जज जैसों के साथ इसे जोड़ दिया जाए कि वह किसी किस्म की धार्मिक आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करेंगे। लेकिन एक तरफ सत्ता पर बैठे हुए लोग सांप्रदायिक हिंसा पर उतारू हैं लगातार सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं इस देश की बड़ी बड़ी अदालतें ऐसे उकसाऊ और भडक़ाऊ सांप्रदायिक कामों को अनदेखा करते हुए बैठी हैं, और ऐसे में जब एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी से देश की धर्मनिरपेक्षता पर खतरा दिखता है, तो लगता है कि क्या बड़ी-बड़ी अदालतें भी इतने तंग नजरिए से काम नहीं कर रही हैं कि उन्हें एक छोटा सा उल्लंघन तो दिख रहा है, लेकिन देश के लोकतंत्र की बुनियादी समझ, धर्मनिरपेक्ष ढाँचे धर्मनिरपेक्ष पर लगातार होते वार नहीं दिख रहे ? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आबादी काबू में रखने वाले राज्य की संसद सीटें घटने का उसे मुआवजा क्यों न मिले-हाईकोर्ट
24-Aug-2021 3:43 PM (266)

तमिलनाडु के हाई कोर्ट से एक दिलचस्प सवाल निकलकर सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई पीठ ने एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों को एक नोटिस जारी किया है, और उनसे पूछा है कि 1965 के बाद से तमिलनाडु में आबादी घटने की वजह से 2 लोकसभा सीटें कम कर दी गई थी, अदालत ने कहा है कि राज्य को इसका आर्थिक मुआवजा क्यों न दिया जाए? अदालत ने यह बुनियादी बात उठाई है कि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश ने क्योंकि अपनी आबादी काबू में रखी और बाकी देश के मुकाबले कम की, इसलिए आबादी के अनुपात में लोकसभा की सीटें तय करते हुए इन दो राज्यों में 1967 के चुनाव से सीटें घटा दी गई थी। हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया है कि किसी राज्य को परिवार नियोजन और आबादी नियंत्रण को कामयाबी से लागू करने की वजह से क्या इस तरह की सजा दी जा सकती है कि लोकसभा में उसकी सीटें कम हो जाए? अदालत ने इस बात को भी याद दिलाया है कि किस तरह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट की वजह से गिर गई थी, तो ऐसे एक सांसद का महत्व कितना होता है यह उस समय सामने आ चुका है। अदालत ने कहा है कि एक सांसद का 5 वर्ष के कार्यकाल में राज्य के लिए 200 करोड़ का योगदान माना जाना चाहिए इस हिसाब से केंद्र सरकार तमिलनाडु को 14 चुनावों में 2-2 सांसद कम होने का मुआवजा 5600 करोड़ रुपए क्यों न दे?

यह बड़ा ही दिलचस्प मामला है और बहुत से लोगों को यह बात ठीक से याद भी नहीं होगी कि आबादी के अनुपात में लोकसभा क्षेत्र तय करने का मामला इमरजेंसी के दौरान एक  संविधान संशोधन करके रोक दिया गया था क्योंकि उत्तर भारत के बड़े-बड़े राज्य लगातार अपनी आबादी बढ़ाते चल रहे थे, और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्य अपनी अधिक जागरूकता की वजह से आबादी घटा रहे थे और इस नाते उनकी सीटें भी कम होने जा रही थी। यह बुनियादी सवाल मदुरई हाई कोर्ट से परे भी पहले उठाया जा चुका है कि क्या किसी राज्य को उसकी जिम्मेदारी और जागरूकता के लिए सजा दिया जाना जायज है? लोगों को यह ठीक से याद नहीं होगा कि हिंदुस्तान में हर जनगणना के बाद लोकसभा सीटों में फेरबदल की एक नीति थी लेकिन बाद में जब यह पाया गया कि उत्तर और दक्षिण का एक बड़ा विभाजन इन राज्यों की जागरूकता और जिम्मेदारी को लेकर हो रहा है और अधिक जिम्मेदार राज्य को सजा मिल रही है तो फिर आपातकाल के दौरान 1976 में 42 वें संविधान संशोधन से लोकसभा सीटों में घट बढ़ की इस नीति को रोक दिया गया, और इसे 2001 तक न छेडऩा तय किया गया। लेकिन 2001 में भी यह पाया गया कि अभी भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ी विसंगति जारी है और अगर आबादी के अनुपात में सीटें तय होंगी तो संसद में दक्षिण का प्रतिनिधित्व घटते चले जाएगा और भीड़ भरे उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व बढ़ते चले जाएगा इसलिए 2001 में इसे फिर 25 बरस के लिए टाल दिया गया और अब 2026 तक सीटों तक ऐसा फेरबदल नहीं होना है। यह एक अलग बात है कि उत्तर और दक्षिण में आबादी का फर्क, आबादी में बढ़ोतरी का फर्क, अभी तक जारी है और 2026 में भी ऐसे कोई आसार नहीं हैं कि आबादी के अनुपात में लोकसभा सीटें तय की जाएं। ऐसा होने पर जिम्मेदार राज्यों के साथ बड़ी बेइंसाफी होगी और गैरजिम्मेदार राज्यों को संसद में अधिक सांसद मिलने लगेंगे।

यह पूरा सिलसिला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के भी खिलाफ है इसलिए कि किसी व्यक्ति किसी इलाके प्रदेश या लोकसभा सीट को अधिक जिम्मेदार होने की वजह से सजा देना किसी भी कोने से जायज नहीं है। दूसरी तरफ आबादी घटाने के राष्ट्रीय कार्यक्रम और सामाजिक जरूरत के खिलाफ जाकर लगातार आबादी बढ़ाने वाले राज्यों का आर्थिक पिछड़ापन जारी है, लेकिन वे पुराने कानून के हिसाब से देखें तो संसद में अधिक सदस्य भेजने के हकदार हो सकते थे, इसलिए इस सिलसिले को रोक देना ही ठीक था। 1976 के बाद से अभी तक सीटों को बढ़ाने या घटाने का सिलसिला तो थमा हुआ है, लेकिन तमिलनाडु के इस हाईकोर्ट ने एक नया सवाल उठाया है कि क्या राज्य से छीने गए 2 सांसदों के एवज में आर्थिक भरपाई नहीं की जानी चाहिए?

इस पर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि आज तो यह मामला 2026 तक थमा हुआ है, लेकिन 2026 तक न तो राज्यों के बीच आबादी का अनुपात बहुत नाटकीय अंदाज से बदलने वाला है, और न ही 2026 में ऐसी नीति देश में लागू करना मुमकिन हो पाएगा। ऐसा करने पर उत्तर और दक्षिण के बीच एक बगावत जैसी नौबत आ जाएगी और देश टूटने की तरह हो जाएगा, जिसमें जिम्मेदार दक्षिण को लगेगा कि उसे उसकी जागरूकता की सजा दी जा रही है। इसलिए 2026 का वक्त आने के पहले देश में इस पर चर्चा होनी चाहिए, लोगों को बात करना चाहिए, दूसरे देशों की मिसालें भी देखनी चाहिए। अमरीका में काम कर रहे एक हिंदुस्तानी पत्रकार ने अभी लिखा है-‘अमरीकी संसद के उच्च सदन सेनेट (राज्यसभा) में सौ सदस्य होते हैं। अमेरिका में पचास राज्य हैं। हर राज्य से दो सदस्य सेनेट में चुनकर आते हैं। भारत में राज्यसभा सदस्य चुनने के लिए राज्यों के विधायक भी वोट डालते हैं, जबकि अमेरिकी सेनेट के सदस्य हर राज्य की पूरी जनता चुनती है। हर राज्य से दो सेनेटर होने का नियम बहुत ही जबरदस्त है। चार करोड़ की आबादी वाले कैलिफोर्निया के भी दो सेनेटर हैं और पौने छह लाख की आबादी वाले वायोमिंग राज्य के भी दो ही हैं। भारत में ऐसा होता तो राज्यसभा में मणिपुर और यूपी के बराबर सदस्य होते। इस तरह अमेरिकी सेनेट में कोई भी राज्य किसी से ऊपर या नीचे नहीं है।’
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ऑनलाइन की मजबूरी ने अनायास जुटा दिया मौका इस तरह गंवाना नहीं चाहिए
23-Aug-2021 3:24 PM (170)

अगले कुछ महीनों में हिंदुस्तान में घर से काम करने, ऑनलाइन क्लास लेने, और इंटरनेट के रास्ते सेमिनार में हिस्सा लेने के 2 बरस पूरे हो जाएंगे। इस डेढ़ बरस में बहुत से इम्तिहान नहीं लिए गए, और बच्चों को अगली क्लास में भेज दिया गया। जो स्कूल ऑनलाइन पढ़ा सकती थीं, वे इस कोशिश में लगी हुई हैं कि पढ़ाने वाले लोगों को दी जा रही पूरी या आधी तनख्वाह, कुछ हद तक बच्चों की फीस की शक्ल में वसूल हो सके। लेकिन यह मामला भी देशभर में बड़ा कमजोर सा चल रहा है और निजी स्कूलों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे कब तक इस तरह काम कर सकेंगी और अगर कोरोना महामारी की तीसरी लहर आएगी तो उसके बाद निजी स्कूलों और कॉलेजों का क्या होगा? सरकारों ने कोरोना से जूझने के तरीके तो कुछ या अधिक हद तक ढूंढ लिए हैं, लेकिन खुद सरकार का अपना काम जिस तरह वीडियो कांफे्रंस पर चल रहा है, और पढ़ाई-लिखाई जिस तरह कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर चल रही है, उस बारे में काफी कुछ करने की जरूरत है। अब कोरोना का तीसरा दौर आता है या नहीं यह तो किसी के हाथ में नहीं है, लेकिन हो सकता है कि आने वाले वर्षों में कोई और महामारी आए या किसी और वजह से स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई को ऑनलाइन करना पड़े, सेमिनार और कान्फ्रेंस ऑनलाइन होने लगें, तो उस दिन के लिए राज्य सरकारों ने कोई बेहतर तैयारी की हो, ऐसी मिसालें भी सामने नहीं आ रही हैं।

हम अपने आसपास के जितने राज्यों के बारे में खबरें पढ़ते हैं, किसी राज्य से ऐसी खबर अभी तक नहीं आई है कि सरकार ने अपने प्रदेश के स्कूल-कॉलेज के ढांचे को डिजिटल कामकाज के लिए बेहतर तैयार करने पर मेहनत की हो। स्कूल-कॉलेज में काम करने वाले शिक्षक या प्राध्यापक कंप्यूटर और इंटरनेट पर अधिक का काम करने के आदी नहीं रहे हैं। पढ़ाने, इम्तिहान लेने का काम तो ऑनलाइन करने की किसी की आदत नहीं रही है, कोई तजुर्बा नहीं रहा है। ऐसे में सरकारों को चाहिए तो यह था कि वे मामूली तकनीकों के जानकार लोगों को लेकर प्रदेश के स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों और छात्र-छात्राओं, सभी को एक डिजिटल तैयारी करवाते। आज मामूली निजी जानकारी से लोग किसी तरह काम चला रहे हैं, लेकिन एक तरफ तो पढ़ाई के ढांचे पर खर्च लगभग उतना ही हो रहा है, दूसरी तरफ छात्र-छात्राओं के एक के बाद एक बरस निकले चले जा रहे हैं। ऐसे में अगर काम को बेहतर बनाने पर मेहनत नहीं हो रही है, तो जाहिर है कि उत्पादकता और उत्कृष्टता दोनों ही कम और कमजोर रहेंगे। वही आज हो रहा है।

यह एक ऐसा मौका भारत जैसे देश के लिए सामने आया था, और आज भी खड़ा हुआ है कि अपने पढ़ाई के ढांचे का डिजिटलीकरण बेहतर तरीके से किया जाए, और कामचलाऊ अंदाज में औपचारिकता पूरी करने के बजाए अच्छी क्वालिटी का काम किया जाए। सरकार के स्कूल-कॉलेज के अधिकतर शिक्षक-शिक्षिकाओं की उम्र आसानी से सीखने की निकल चुकी है, अब अगर उनसे यह उम्मीद की जाए कि वे अपने घर-परिवार के बच्चों को पकडक़र उनसे कुछ सीख लें, तो इस उम्मीद से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सरकारों को अपने इतने संगठित ढांचे में योजनाबद्ध तरीके से अपने शिक्षक-शिक्षिकाओं को तकनीक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देना चाहिए था। इसके साथ ही स्कूल-कॉलेज के बच्चों को भी ऑनलाइन तकनीक का इस्तेमाल सिखाने पर मेहनत करनी थी।

यह तो सरकारों के हाथ में है कि वे एक और साल बिना इम्तिहान लिए बच्चों को अगली क्लास में भेज सकती हैं, लेकिन क्या इतना गुजरता जा रहा वक्त कभी लौटकर आएगा? क्योंकि सरकारों ने ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखने का फैसला लिया है और स्कूल-कॉलेज में इसे लेकर खासा संघर्ष भी जारी है यह एक ऐसा मौका है जब राज्यों को अपनी कंप्यूटर से जुड़ी किसी एजेंसी को तुरंत ही ऐसे प्रशिक्षण की तैयारी करने कहना था और आज देश में जितनी बेरोजगारी है उसमें मामूली तकनीक सिखाने के लिए हुनरमंद लोग भी तुरंत मिल सकते थे। यह एक ऐसा मौका भी है जब स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों को तरह-तरह के लेक्चर तैयार करने के लिए कम से कम शहर के स्तर पर अच्छे स्टूडियो मुहैया कराए जा सकते थे जिनसे पढ़ाने की बेहतर सामग्री तैयार हो सकती थी। यह भी हो सकता था कि इस मौके के सही इस्तेमाल से कोरोना की दिक्कतें खत्म होने के बाद भी पढ़ाई को बेहतर करने की तैयारी हो चुकी रहती, लेकिन ऐसा कहीं होते दिख नहीं रहा है। इस महामारी ने लॉकडाउन और ऑनलाइन पढ़ाई ने यह मौका दिया है कि पढ़ाई का तेजी से कंप्यूटरीकरण हो सकता था, और दूर-दूर बसे हुए स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वालों की कमी भी ऐसी ऑनलाइन पढ़ाई से दूर हो सकती थी। लेकिन बजाए बेहतर तैयारी के, बजाए एक अच्छी योजना बनाने के, सरकार ने मोटे तौर पर अपने ढांचे को किसी तरह से इस नौबत से जूझने में लगा दिया।

सरकार का अपने पढ़ाई के ढांचे पर खासा खर्च होता है और उसका इस्तेमाल एक औपचारिकता निभाने के लिए, साल काटने के लिए नहीं करना चाहिए बल्कि उसकी उत्पादकता और उत्कृष्टता दोनों को लगातार बढ़ाते चलने की कोशिश करनी चाहिए। अभी भी वक्त है समझदार राज्य अपने स्तर पर एक अच्छी योजना बनाकर पढ़ाई के पूरे ढांचे के ऐसे प्रशिक्षण का काम कर सकते हैं जिससे सबका भला हो। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अफगानिस्तान से जिस रफ़्तार से लोग निकल रहे हैं, उसी रफ़्तार से दुनिया के लिए सबक भी निकल रहे
22-Aug-2021 7:25 PM (263)

अफगानिस्तान लगातार खबरों में बना हुआ है, तकरीबन हर दिन वहां से हिंदुस्तानी लौट भी रहे हैं, और सैकड़ों हिंदुस्तानी वहां अभी भी बाकी है जिन्हें लाने की तैयारी चल रही है। इन बातों को देखें और अफगानिस्तान पर कुछ लिखने के पहले वहां के बारे में पढ़ें तो ऐसा लगता है कि अफग़़ानिस्तान का इतिहास उन इलाकों से परे भी दूसरे देशों को, दूसरे समुदायों को बहुत सी चीजें सिखा सकता है। अफगानिस्तान में एक वक्त, आज ऐसे करीब आज से करीब डेढ़ सौ बरस पहले, हिंदुस्तान पर काबिज अंग्रेज सरकार और कम्युनिस्ट सोवियत संघ के बीच अफगानिस्तान पर कब्जे की कोशिशें चलीं, और उसके बाद अभी इक्कीसवीं सदी में वहां अमेरिका ने यही काम किया। लेकिन अफगानिस्तान की स्थानीय जीवन शैली को समझे बिना जिस तरह इन विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों ने वहां पर कब्जा करने की लंबी कोशिशें की और लंबी मुंह की खाई, उससे पूरी दुनिया को एक सबक लेना चाहिए कि जिस जगह जाकर कोई बड़ा काम करने का इरादा हो, उस जगह को पहले समझ लेना बेहतर होता है।

आज दुनिया के इतिहासकार और विश्लेषक लगातार इस बात को लिख रहे हैं कि अलग-अलग वक्त पर दुनिया की इन तीन बड़ी ताकतों ने अफग़़ानिस्तान पर कब्जे का सपना देखा, कोशिश की, और दशकों तक फौजी ताकत का इस्तेमाल किया, उनकी सबसे बड़ी चूक यह हुई कि वह वे वहां पर कब्जा करने के लिए आमादा तो हो गए लेकिन वहां से निकलना नहीं जाना। उन्हें यह समझ ही नहीं आया था कि कभी उन्हें अफगानिस्तान छोडक़र निकलना भी पड़ेगा। यह नौबत इन तीनों महाशक्तियों की शिकस्त की सबसे बड़ी वजह रही कि उन्होंने अफगानिस्तान जाने की योजना या साजिश तो बना ली थी। लेकिन वहां से निकलने के बारे में कुछ नहीं सोचा था। इसलिए आज अमेरिका के सबसे करीबी साथी भी अमेरिका को इस बात के लिए धिक्कार रहे हैं कि उसने न केवल अफगानिस्तान को मंझधार में छोडक़र चले जाना तय किया बल्कि अफगानिस्तान में मौजूद लाखों मददगारों और सहयोगियों को वहां छोडक़र अमेरिका निकल आया है और अब किसी तरह उनमें से कुछ लोगों को खतरे में निकालने की कोशिश कर रहा है।

हिंदुस्तान में देखें तो पौराणिक कहानियों में एक ऐसा जिक्र आता है कि महाभारत में अभिमन्यु ने युद्ध के घेरे में घुसना तो सीखा हुआ था मां के पेट से ही, लेकिन निकलना नहीं सीखा था और इसलिए वह चक्रव्यूह में फंस गया। अफगानिस्तान दुनिया की इन तीनों महाशक्तियों के लिए चक्रव्यूह ही साबित हुई जिसमें से कोई जिंदा या कामयाब बाहर नहीं निकल पाया। अफगानिस्तान के दसियों लाख लोगों को इन डेढ़ सौ बरसों में इन फौजी ताकतों ने मारा और खुद अपने भी लाखों सैनिक खोए। यह सिलसिला दुनिया को एक सबक दे जाता है। लेकिन अफगानिस्तान से दुनिया के लिए और भी बहुत से सबक निकल रहे हैं कि किस तरह वहां पर कट्टर, धर्मांध, और हिंसक तालिबान की बनाई हुई शरिया अदालतें पूरे अफगानिस्तान के लोगों के बीच लोकप्रिय थीं क्योंकि तथाकथित शहरी लोकतंत्र की बनाई हुई औपचारिक आधुनिक लोकतांत्रिक अदालतें इस कदर भ्रष्ट हो चुकी थी कि लोगों का उन पर से भरोसा उठ गया था, और किसी कमजोर और गरीब के लिए वहां इंसाफ पाना मुमकिन नहीं था। नतीजा यह था अफगान लोग शरिया अदालतों में जाने लगे थे वहां के इंसाफ पर उन्हें भरोसा भी था और उससे परे, वे अदालत ने भ्रष्टाचार से भी दूर थी।

अब आज दुनिया में तालिबान को जिस तरह से देखा जा रहा है, कौन इस बात को आसानी से मान सकते हैं कि उनकी बनाई हुई अदालतें शहरी लोकतंत्रों की अदालतों के मुकाबले बहुत अधिक ईमानदार थीं और भ्रष्टाचार से मुक्त थीं। अब यह बात हिंदुस्तान जैसे किसी देश के संदर्भ में सोचें तो जहां पर अदालतों को आमतौर पर भ्रष्ट मान लिया गया है, और लोगों को अदालतों पर कोई भरोसा नहीं है, तो लोकतंत्र की ऐसी असफलता क्या किसी किस्म के धार्मिक फतवों को बढ़ावा दे सकती है? क्या ऐसी नौबत आ सकती है जिसमें लोगों को अपने बाहुबल पर अधिक भरोसा हो या लोग मुंबई में किसी माफिया के पास, या उत्तर प्रदेश बिहार में किसी बड़े गुंडे के पास जाने लगें, कि वहां उनके झगड़ों का आसानी से ईमानदार निपटारा हो जाए? ऐसी तमाम बातें अफगानिस्तान से आज बाकी दुनिया के लिए सबक के रूप में निकल रही हैं।

अफगानिस्तान में 1980 के पहले जिस तरह से वहां स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टी के जुल्म भरे राज को जारी रखने के लिए रूस ने दसियों हजार सैनिकों को वहां झोंक दिया था और अंधाधुंध कत्लेआम शुरू कर दिया था, वह भी एक वजह थी कि अफगान जनता कम्युनिज्म से नफरत करने लगी थी, फिर चाहे वह बराबरी के आर्थिक अधिकारों की बात करता था और महिलाओं के लिए बराबरी के अधिकार की बात भी करता था। लेकिन उसने जिस हद तक लोगों पर जुल्म ढहाना शुरू किया था उसी का नतीजा था कि कम्युनिस्टों को आखिर में जाकर अपने रूसी आकाओं के साथ सत्ता छोडऩी पड़ी थी, और रूस के आखिरी फौजी को भी अफगानिस्तान से जाना पड़ा था। लेकिन दूसरी तरफ बाहर से लाकर पश्चिमी अंदाज का लोकतंत्र लादने की अमेरिका की गुंडागर्दी की कोशिश ने जिस तरह के जुल्म किए थे और अमेरिकी सरगनाई में जिस तरह पश्चिमी फौजियों ने अफगान जनता पर जुल्म किए थे, उन्हीं का नतीजा था कि इन 20 वर्षों में धीरे-धीरे तालिबान को एक बार फिर जगह मिली और आज अमेरिका की वापिसी को तालिबान की जीत के जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। फिर चाहे अमेरिका कहने के लिए एक संविधान से बंधा हुआ लोकतंत्र क्यों ना हो, उसने अफगानिस्तान में जितने जुल्म किये हैं, उन्हीं का नतीजा रहा कि तालिबान एक बार फिर लोगों की हमदर्दी पाकर सत्ता पर आ चुके हैं। हम ऐसी किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते लेकिन मोटे तौर पर वहां की नौबत को समझाने के लिए इन बातों को कर रहे हैं कि किस तरह किसी के गलत काम दूसरे गलत लोगों के लिए एक जगह पैदा कर देते हैं। जैसे हिंदुस्तान में देश की सरकार हो या बिहार की सरकार हो, जब इन सरकारों ने खूब भ्रष्टाचार किया, तो इनकी धर्मनिरपेक्षता किनारे धरी रह गई और देश के सबसे सांप्रदायिक लोगों को भी जनता ने इनके ऊपर चुन लिया क्योंकि जनता भ्रष्टाचार से थक गई, और जनता शायद कुनबापरस्ती से भी थक गई थी। ऐसे में लोगों को लगा कि सांप्रदायिक होना इतनी बड़ी बुराई नहीं है जितनी बड़ी बुराई भ्रष्ट होना और कुनबापरस्त होना है।

अफगानिस्तान को आज देखें तो वहां 1840 के आसपास से अंग्रेजी फौजियों की जो दखल शुरू हुई थी वह 100 बरस बाद जाकर रूसी फौजियों की शक्ल में बदल गई और उसकी चौथाई सदी बाद वह अमेरिकी फौजों की शक्ल में बदल गई। इस दौरान अफगानिस्तान के भीतर स्थानीय तबकों में भी लोग अलग-अलग समय पर अलग-अलग किस्म की ताकतों को खारिज करते रहे, और अलग-अलग किस्म की ताकतों का साथ देते रहे। अफगानिस्तान का पूरा ताजा इतिहास बड़ा दिलचस्प है और यह बाकी दुनिया के लिए एक बड़ा सबक बन कर भी आया है कि सरकारों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए देश के भीतर राज्य करने की हसरत रखने वाले राजनीतिक दलों और समुदायों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। फिर अफगानिस्तान इस बात का भी एक बहुत बड़ा सबूत है कि लोकतंत्र को अपने आपको इस हद तक नाकामयाब नहीं करना चाहिए कि कट्टरता और धर्मांधता भी बेहतर लगने लगे। हिंदुस्तान सहित बाकी दुनिया के लोकतंत्रों को भी अफगानिस्तान के बारे में पढक़र अपने खुद के बारे में भी सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि धर्मांधता और कट्टरता जब वह बढऩा शुरू होती हैं, तो वे इस हद तक बढ़ जाती हैं कि अमेरिका और तमाम पश्चिमी देशों के फौजी गठबंधन को भी नाकामयाब कर देती हैं। यह भी सोचना चाहिए कि जब देशों की सरकारें किसी एक धर्म की धर्मांधता को बढ़ावा देती हैं, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देश तालिबान को किस ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं, उसे कितनी ताकत दे सकते हैं। अफगानिस्तान का यह पूरा तजुर्बा दुनिया को बहुत कुछ सीखने का मौका दे रहा है और लोगों को अफगानिस्तान की फिक्र करने के बजाए अपने देश और अपने समाज की फिक्र करनी चाहिए, अपने धर्म की खामियों की फिक्र करनी चाहिए, हिंसा और कट्टरता की फिक्र करनी चाहिए और यह सोचना चाहिए कि कैसे-कैसे उनके साथ यह नौबत ना आए।
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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मोदीविरोधी एकजुटता के साथ, कुनबापरस्त होने की दिक्कत भी
21-Aug-2021 5:01 PM (271)

सोनिया गांधी ने करीब डेढ़ दर्जन गैर-भाजपा, गैर-एनडीए पार्टियों से बात की और भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने की चर्चा की। कोरोना के खतरे को देखते हुए यह पूरी चर्चा ऑनलाइन हुई लेकिन इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश में आज यह चर्चा छिड़ चुकी है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों के चुनावों को देखते हुए और 2024 के आम चुनाव को देखते हुए जो कोई पार्टी मोदी से निपटना चाहती है, उसे दूसरे विपक्षी दलों के साथ एक तालमेल बैठाना ही पड़ेगा, उसके बिना मोदी से पार पाना मुमकिन नहीं है। एक वक्त हिंदुस्तान की राजनीति में कांग्रेस के खिलाफ बाकी सबको एक करने की जो मुहिम चलती थी, वह मुहिम अब मोदी के खिलाफ बाकी सब एक में बदल चुकी है क्योंकि आज वक्त की जरूरत वही है। आज यह आसान नहीं रह गया है कि मोदी से सिर्फ यूपीए अकेले पार पा सके।

ऐसे मौके पर मोदी विरोधियों के बीच जेल से छूटे हुए लालू यादव भी हैं, जिनके आने के बाद बिहार की राजनीति में बड़े फेरबदल होने की उम्मीद जताई जा रही थी। यह एक अलग बात है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से लालू की पार्टी उनके बेटों के आपसी झगड़ों और पार्टी के भीतर चल रही टकराहट को लेकर खबरों में बनी हुई है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अलावा डेढ़ दर्जन और पार्टियों को साथ लेकर जो एक संयुक्त बयान जारी किया है वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण तो है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सोनिया गांधी अगले चुनाव तक ऐसे किसी प्रस्तावित गठबंधन में उसके नेता के रूप में, या कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहेंगी, या फिर कांग्रेस पार्टी को कोई दूसरा अध्यक्ष मिलेगा? यह बात जरूरी इसलिए है कि विपक्ष की पार्टियों में कांग्रेस चाहे सबसे बड़ी पार्टी न भी रह गई हो, वह अकेली पार्टी है जिसकी पूरे हिंदुस्तान में मौजूदगी है। कांग्रेस के अलावा गैर-एनडीए पार्टियों में पूरे देश में पहुंचे रखने वाली कोई दूसरी पार्टी नहीं है। इसलिए कांग्रेस के जो घरेलू मामले हैं, उन मामलों में भी कांग्रेस के साथ जुडऩे वाली दूसरी पार्टियों की फिक्र जुड़ी हुई है, और उन्हें फिक्र करने का हक भी है। आज कोई भी पार्टी मोदी के मुकाबले एक किसी गठबंधन में कई किस्म की कुर्बानी देकर जुडऩे के लिए तैयार होती है तो उस गठबंधन की मुखिया पार्टी के बारे में उसके कुछ सवाल भी हो सकते हैं, और इनका जवाब दिए बिना बचा नहीं जा सकता।

आज मोदी के मुकाबले जो भी मोर्चा खड़ा होगा उसमें बिहार में लालू यादव की आरजेडी की भूमिका रहेगी ही रहेगी, और ऐसे में अगर आरजेडी के भीतर, लालू के जेल के बाहर रहते हुए भी गृहयुद्ध चल रहा है कि उनके दोनों बेटे मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं, तो इससे लालू यादव की किसी भी विपक्षी गठबंधन पर पकड़ कमजोर भी होती है। आज जिस तरह कांग्रेस के अगले अध्यक्ष को लेकर एक रहस्य, और रहस्य से भी बड़ा असमंजस फैला हुआ है, तो उससे भी किसी संभावित गठबंधन में कांग्रेस की बात का वजन घटता है। ऐसे किसी भाजपा विरोधी गठबंधन के बीच आज वैसे भी बहुत किस्म के विरोधाभास और विसंगतियां हैं, लेकिन जब बड़ी-बड़ी पार्टियों के भीतर का गृहयुद्ध या उनके भीतर का असंतोष इस तरह खुलकर सामने आएगा, तो ऐसे गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होती हैं। एक तो भाजपा के मुकाबले दूसरी बहुत सी पार्टियों पर कुनबापरस्ती की जो तोहमत लगती है, उसका कोई आसान जवाब किसी के पास नहीं है। कांग्रेस पार्टी पर तो देश में राजनीति में कुनबापरस्ती को शुरू करने की ही तोहमत लगती है, लेकिन कांग्रेस से परे भी एनसीपी का पवार परिवार, शिवसेना का ठाकरे परिवार, टीएमसी का ममता परिवार, आरजेडी का लालू परिवार, समाजवादी पार्टी का मुलायम परिवार, कश्मीर की दोनों पार्टियों के अपने कुनबे, डीएमके का स्टालिन परिवार, और इस तरह के और कई पार्टियों के परिवारवाद के जलते-सुलगते मामले सामने हैं। इनके मुकाबले भाजपा एक अधिक वजन के साथ अपने-आपको कुनबापरस्ती से परे की पार्टी साबित करने में कामयाब होती है। मोदी तो अपने को परिवारमुक्त नेता साबित करके एक साख पा ही चुके हैं।

अब देखना यही है कि मोदी विरोधी यह नया मोर्चा अपने आंतरिक विरोधाभास और अपनी विसंगतियों से किस तरह उभरता है, और इसकी हिस्सेदार पार्टियां किस तरह अपने आपको जनता के बीच एक भरोसेमंद विकल्प की तरह पेश कर पाती हैं। आज तो जिस अंदाज में लालू यादव का कुनबा जिस तरह सडक़ पर लड़ रहा है और जिस तरह पार्टी पर उनका कुनबा हावी है, यह विपक्षी गठबंधन में लालू यादव की स्थिति को कमजोर बनाने वाली बात है। कांग्रेस को भी अपने भीतर के दो दर्जन असंतुष्ट नेताओं के बीच अपने घर को चलाना सीखना होगा, वरना उसकी बात का वजन भी कम रहेगा। आगे आगे देखें होता है क्या!
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