संपादकीय

Date : 24-May-2019

लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर देश भर की तस्वीर पर कल इसी जगह हमने लिखा था, लेकिन उसमें छत्तीसगढ़ अकेले पर कुछ अधिक लिखने की गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जरूरत तो थी ही। छत्तीसगढ़ में पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस महज एक सीट पा सकी थी, और दस सीटें भाजपा को मिलते आई थीं। इस बार कांग्रेस को इससे ठीक उल्टी उम्मीद थी क्योंकि कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दस लोकसभा क्षेत्रों में नंबर वन थी, और कुल एक लोकसभा सीट  के विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कांग्रेस से आगे थी। प्रदेश में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में जमकर मेहनत की थी, एक बहुत लुभावना चुनाव घोषणा पत्र बनाया था, कर्जमाफी, अधिक समर्थन मूल्य, और धान बोनस की घोषणा की थी, और भाजपा से करीब दस फीसदी वोट अधिक पाकर 90 में से 68 सीटें पाई थीं। राज्य में सरकार बनने के तुरंत बाद इन तीनों वायदों को सरकार ने तकरीबन पूरा भी किया था, और इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तकरीबन हर दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसी न किसी तरह का राजनीतिक और चुनावी हमला भी किया था। वे देश के कांग्रेस मुख्यमंत्रियों में सबसे मुखर थे, और शायद अपने आपको अपनी पार्टी के मुखिया के सामने एक अलग तरह से स्थापित भी कर रहे थे। लेकिन चुनावी नतीजे मुख्यमंत्री, जो कि प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, को एक बड़ा सदमा देने वाले निकले। हो सकता है कि दिल के बहलाने को कुछ लोग यह तर्क ढूंढ लाएं कि पूरे देश में ही जब कांग्रेस इस बुरी तरह हारी है, तब छत्तीसगढ़ में भी ऐसा हाल तो होना ही था। लेकिन कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री ने पंजाब में पार्टी की इज्जत बचाने का काम किया है, और एक मिसाल पेश की है। इसलिए कांग्रेस को बैठकर यह देखना होगा कि कुछ महीने पहले जीता गया तकरीबन पूरा प्रदेश, आज तकरीबन पूरा का पूरा हाथ से कैसे निकल गया? कैसे छत्तीसगढ़ के लगभग हर मंत्री की सीटों पर कांग्रेस हारी है, सिवाय दो मंत्रियों के। कैसे सबसे अधिक मंत्रियों वाले, खुद मुख्यमंत्री के गृह जिले में कांग्रेस हारी है? कैसे मुख्यमंत्री पद के तीनों दावेदार रहे लोगों के प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस हारी है? प्रदेश के जिस अनपढ़-आदिवासी मंत्री कवासी लखमा का बड़ा मजाक बनाया जाता है, महज उसी के जिले में कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती है, और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत की पत्नी श्रीमती ज्योत्सना महंत ने प्रदेश में कांग्रेस को दूसरी जीत दिलाई है। 

लेकिन जितना कांग्रेस के सोचने को है, उससे जरा भी कम भाजपा के सोचने को नहीं है। पूरे देश में जब भाजपा की टिकटें तय हो रही थीं, तो छत्तीसगढ़ अकेला प्रदेश था जहां 15 बरस से अकेले मुख्यमंत्री चले आ रहे डॉ. रमन सिंह, और इन तमाम बरसों में उनकी पसंद के बनते आ रहे प्रदेश अध्यक्षों की बनाई हुई लिस्ट को अमित शाह ने पूरी तरह खारिज कर दिया था, और कुछ असंभव से लगते पैमाने लागू किए थे कि किसी भी सांसद को, किसी भी विधायक को, किसी भी हारे हुए सांसद-प्रत्याशी को, किसी भी हारे हुए विधायक-प्रत्याशी को, या उनके रिश्तेदारों को टिकट नहीं दी जाएगी। ऐसे में लगता था कि राज्य में कोई ढंग का उम्मीदवार ही नहीं मिलेगा। लेकिन अमित शाह ने तमाम 11 नए लोगों को मैदान में उतारा, और उनमें से 9 ने चुनाव जीता, और इनमें से अधिकतर लाख-लाख वोटों से अधिक से जीते। लोगों को याद होगा कि जब यह लिस्ट आई थी तब हमने इसी जगह लिखा था कि अगर राज्य भाजपा की लिस्ट को पूरी तरह खारिज करके दिल्ली की बनाई हुई लिस्ट अगर कामयाब होती है, तो उससे छत्तीसगढ़ का भाजपा संगठन, यहां के नेता बेअसर और अप्रासंगिक साबित हो जाएंगे कि मोदी-शाह जिसे चाहें उसे जिता सकते हैं। और हुआ भी वही, 11 में से 9 का जीतना एक असंभव सी लगती बात थी, और राज्य के किसी अतिरिक्त योगदान के बिना मोदी-शाह के असर ने बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ को भी जीतकर दिखा दिया, और तमाम ऐसे सांसद बनाए जो कि उनकी सीधी पसंद के हैं। राज्य में भाजपा के पास इस जीत को लेकर खुशी मनाने के तर्क तो हैं क्योंकि सीटों के अलावा देश में उनका प्रधानमंत्री फिर लौट रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नतीजे राज्य की भाजपा की अहमियत किसी भी तरह से बढ़ा रहे हैं, या फिर महज यह साबित कर रहे हैं कि मोदी-शाह दिल्ली में बैठे देश भर में जिसे जहां चाहे जिता सकते थे, और उन्होंने जिता लिया? 

छत्तीसगढ़ में कुछ महीनों बाद म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में पार्षद और पंच का फैसला ईकाई-दहाई के वोटों से हो जाता है। ऐसे में सत्तारूढ़ कांग्रेस, और हाल ही में दिल्ली की सत्ता तक पहुंची, और राज्य में भारी कामयाब साबित हुई भाजपा दोनों के सामने यह एक बड़ी चुनौती रहेगी कि वे कैसे इन चुनावों में कामयाब होते हैं? दिल्ली को इतनी फुर्सत नहीं रहेगी कि वे गली-मुहल्ले के चुनाव के बारे में देखें। और ऐसे में राज्य के ही नेताओं पर यह चुनौती रहने जा रही है। इन दोनों ही पार्टियों की अपनी बहुत सी बुनियादी दिक्कतें इस प्रदेश में हैं। उन सबकी यहां पर चर्चा मुमकिन नहीं है। लेकिन यह तय है कि आज से लेकर स्थानीय संस्थाओं के चुनावों तक जो पार्टी ढंग से तैयारी करेगी, पक्ष या विपक्ष का अपना जिम्मा ठीक से निभाएगी, उसे जीत हासिल होगी। विधानसभा कांग्रेस के हिस्से गई, और लोकसभा भाजपा के हिस्से। अब स्थानीय चुनाव इन दोनों के बीच एक बड़ी अहमियत वाला मुकाबला रहेंगे। लेकिन इसकी तैयारी के लिए यह भी जरूरी होगा कि इन दोनों पिछले चुनावों के नतीजों को देखकर अपनी-अपनी कमजोरियों को येे पार्टियां समझें, मानें, और उनको दूर करने की कोशिश करें। देश और प्रदेश दोनों में मजबूत सरकारें जारी रहने वाली हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के मुद्दे और गंभीर, और बारीक रहने वाले हैं, जो कि और बड़ी चुनौती भी रहेंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 23-May-2019

सुनील कुमार
जैसा कि चार दिन पहले के एक्जिट पोल ने बताया था, हिन्दुस्तानी वोटरों पर मोदी का जादू बरकरार है, और भाजपा की चुनाव जीतने की मशीन ने जो महारथ हासिल कर ली है, उसने एक बार फिर अपनी खूबी को साबित किया है। आज सुबह तक यह लग नहीं रहा था कि गिनती शुरू होने के तीन घंटों के भीतर देश में अगली मोदी सरकार की बुनियाद इतनी मजबूत हो जाएगी। अभी समंदर की लहरों के हर थपेड़े के साथ गिनती के आंकड़े किनारे लगते जा रहे हैं, और अब तक गिनती के रूझान से एनडीए की सरकार बन चुकी है, और बीजेपी अपने बहुमत की ओर बढ़ रही है। कांग्रेस और यूपीए के लिए एक मामूली तसल्ली की बात यह हो सकती थी कि उसने अपनी सीटें करीब-करीब दोगुनी कर ली हैं, लेकिन सुबह 11 बजे जब यह लिखा जा रहा है, उस वक्त कांग्रेस और यूपीए के नेता राहुल गांधी अपनी पारिवारिक सीट अमेठी पर स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। अगर यह रूख जारी रहता है तो कांग्रेस के पास पिछले चुनाव के मुकाबले हाथ छाप और यूपीए की सीटों की बढ़ोत्तरी गिनाने के लिए भी साहस नहीं रहेगा। देश के रूख और रूझान की एक झलक देखनी हो तो हांडी का वह चावल भोपाल है जहां पर हिंदुत्व का सबसे आक्रामक गोडसेपूजक चेहरा चुनाव जीत रहा है, और दिग्विजय सिंह निपट चुके हैं। 

आज के चुनावी नतीजों को संपादकीय के इन दो कॉलमों में समेटना मुमकिन नहीं हैं, लेकिन फिर भी कुछ कतरा-कतरा बातों को छुएं, तो यह बात जाहिर है कि देश की जनता की नब्ज पर हाथ धरने से लेकर जनता की धडक़न को अपने मुताबिक ढालने तक का जो काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया है, वह पूरी तरह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है। मोदी सरकार की पांच बरस की तमाम नाकामयाबी पर चुनाव अभियान का ऐसा सर्जिकल स्ट्राईक डिजाइन किया गया कि विपक्ष के हाथ से तमाम नारे छिन गए। हमने पिछले महीनों में लगातार यहां पर यह बात लिखी कि किसी लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए जितने किस्म के कानूनी औजार गढ़े और इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उन सबमें मोदी-शाह की जोड़ी ने रिकॉर्ड कायम किया है। इनसे परे भी कई किस्म के औजार न सिर्फ इन दोनों ने बल्कि बहुत सी पार्टियों और बहुत सी नेताओं ने इस्तेमाल किए होंगे, लेकिन हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। अब जिस दिन देश का आखिरी हिस्सा वोट डाल रहा था, उस दिन 24 घंटे अगर लगातार मोदी की केदारनाथ यात्रा टीवी पर छाई हुई थी, तो उसमें न कुछ गैरकानूनी था, न अनैतिक, और न अलोकतांत्रिक। बीजेपी ने इस तरकीब को सोचा और इसका इस्तेमाल कर लिया। और यह पहला मौका नहीं था। पिछले बरस 12 मई को जब कर्नाटक वोट डाल रहा था, और चुनाव प्रचार दो दिन पहले बंद हो चुका था, तो नरेन्द्र मोदी दिन भर नेपाल के मंदिरों में घूमते रहे, और हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों पर वही चलते रहा। इस बार वे केदारनाथ की गुफा से आंखें और मुंह खोले बिना खबर बनते रहे, और किसी ने उनके विरोधियों को ऐसी किसी तरकीब से रोका नहीं था। 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़े दमखम से मोदी के खिलाफ चुनावी हमला आखिरी दिन तक जारी रखा, लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए की मुखिया के रूप में कांग्रेस पार्टी ने एक के बाद एक, कई गलतियां कीं। अभी दो दिन पहले ही इसी जगह पर हमने लिखा था-  ‘‘पिछले आधे बरस को अगर देखें, तो जब देश की बहुत सी पार्टियां तरह-तरह के गठबंधन बना रही थीं, कांग्रेस ने जाने किस जोड़-घटाने के तहत एक के बाद दूसरा प्रदेश बिना गठबंधन अकेले लडऩा तय किया। उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के साथ किसी तालमेल की कोशिश कम से कम मीडिया में नहीं आई, बंगाल में कांग्रेस न ममता के साथ रही, न वामपंथियों के साथ, केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ भी लड़ी, और उन्हें नाराज करने की हद तक लड़ी। ऐसा और भी कई प्रदेशों में हुआ जो कि दिल्ली में जाकर खत्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल के साथ कोई तालमेल नहीं हुआ, न दिल्ली में, न पंजाब में। एक पार्टी की हैसियत से यह कांग्रेस का हक भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है कि किसी प्रदेश में वह ऐसा अपमानजनक समझौता, गठबंधन, या तालमेल न करे जो कि उस प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोडक़र रख दे और उस प्रदेश में पार्टी को जमीन से खत्म ही कर दे। यह बात तो ठीक है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जब मामला संसद में एनडीए के खिलाफ यूपीए या किसी नए गठबंधन के आंकड़े खड़े करने का हो, तो कांग्रेस को क्षेत्रीय गठबंधन के बारे में अधिक सोचना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस अकेले चलने की नीति पर टिकी हुई, या अड़ी हुई दिखती रही। यूपीए के पिछले साथियों के साथ वह जरूर है, लेकिन बहुत से राज्यों में उसने जीत की संभावनाएं तभी खो दीं, जब उसने उन राज्यों में कोई तालमेल नहीं किया।’’ 

दूसरी तरफ एनडीए के भीतर मोदी एक सबसे बड़े भागीदार शिवसेना की खुली बगावत पूरे पांच बरस तक झेलते रहे, जब उद्धव ठाकरे खुद और उनका अखबार सामना मोदी की एक-एक रीति-नीति के खिलाफ बोलते और लिखते रहे। इसके बावजूद जैसे-जैसे चुनाव करीब आया, भाजपा ने अपने तमाम साथियों के साथ तालमेल फिर कायम कर लिया, और यह उसके काम भी आया। 

लेकिन आज अगर कुछ ताजा बात करें, तो यह बात साफ है कि पांच बरसों के बहुत से गलत फैसलों के नुकसान के बावजूद भाजपा ने एक शानदार वापिसी की है, और शिवसेना जैसे उसके स्थाई आलोचक भागीदार ने भी उसका लोहा मान लिया है। भाजपा ने सात अलग-अलग तारीखों पर हुए मतदान को देखते हुए उन सीटों के मतदाताओं की नब्ज समझते हुए ठीक उसके पहले जिस तरह के मुद्दे उठाए, वह बारीक रणनीति देखने लायक थी। दूसरी तरफ देश भर में एनडीए के खिलाफ अभियान चला रही कांग्रेस पार्टी में ऐसे बारीक फेरबदल की न तैयारी थी, और न ही मानो उसे कोई फिक्र थी। ऐसा लगता है कि यूपीए और कांग्रेस में जो लोग भी सत्ता में अपने आने की संभावना देखते थे, उनको जनता के बीच मोदी के खिलाफ एक लहर की या तो उम्मीद थी, या महज हसरत थी। ये दोनों ही बातें गलत साबित हुईं, और भारत पर सरहद पार से जो आतंकी हमला मोदी सरकार की साख चौपट करने वाला होना चाहिए था उसी हमले पर एक जवाबी कार्रवाई करके मोदी ने पूरे देश में अपने पक्ष में एक लहर पैदा कर दी। देश को पाकिस्तान का खतरा दिखाया, अपने हाथों में देश को महफूज बताया, और देश के वोटरों के बीच अगर किसी एक मुद्दे ने सबसे अधिक काम किया लगता है, तो वह सर्जिकल स्ट्राईक का मुद्दा है। और मजे की बात यह रही कि जिन लोगों ने इस सर्जिकल स्ट्राईक के संदिग्ध पहलुओं और दावों पर मामूली सवाल किए, उन्हें भी पाकिस्तानपरस्त और हिन्दुस्तान के गद्दार साबित करने का एक काम सोशल मीडिया पर बखूबी किया गया। पूरे देश में एक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद इस तरह देश के स्वाभिमान के लिए जरूरी साबित किया गया, कि किसी भी और पार्टी के लिए उसके मुकाबले कोई जवाब नहीं बचा। यहां तक कि चुनाव में भाजपा के जिन तीन नेताओं ने गोडसेवादी बयान दिए, गांधी को गालियां दीं, जिन्हें भाजपा ने नोटिस भी जारी किए, वे लाखों वोट से जीतते दिख रहे हैं, इससे देश में हवा कैसी थी यह साबित होता है। दूसरी तरफ मोदी सरकार के पांच बरस के गलत फैसलों, देश की खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी, हवा में साम्प्रदायिक तनाव, अल्पसंख्यकों को खतरा जैसे तमाम मुद्दों को चुनावी मोर्चे से हटाने में मोदी-शाह कामयाब रहे, और उनके विरोधी दल इन मुद्दों को उठाने में नाकामयाब रहे। आज सुबह से जितने टीवी चैनलों पर कुछ समझदार विश्लेषकों की बातचीत आ रही है, उनमें सबसे बड़ी एक बात यह है कि कांग्रेस ने हर गरीब परिवार को 72 हजार रूपए सालाना देने की जिस न्याय योजना का वायदा किया था, वह इस पूरे चुनाव अभियान में कहीं खो गई, और खुद कांग्रेस को उसका फायदा उठाने की परवाह नहीं रह गई। 

आज यहां पर यह लिखते हुए भी खबर यह है कि अमेठी से राहुल गांधी लगातार भाजपा की स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। हालांकि वे केरल की वायनाड सीट पर बहुत लंबी लीड से आगे हैं, लेकिन वहां की कोई भी लीड उनको अमेठी के नुकसान से उबार नहीं सकेगी। ऐसा नहीं है कि देश के बड़े नेता कभी चुनाव हारते नहीं हैं, लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद इस पहले आम चुनाव में अपने आपको बेहतर तरीके से स्थापित कर सकते थे अगर वे कांग्रेस और यूपीए की सीटों में इजाफा करने के साथ-साथ अमेठी में हार से बचे होते। खैर, अभी उम्र उनके साथ है, और अगले पांच बरस का संघर्ष सामने है। हो सकता है कि भाजपा की प्रचार की रणनीति, और उसके जनधारणा-प्रबंधन के लोकतांत्रिक हिस्सों में से राहुल कुछ सीख भी पाएं। 

नतीजे पूरे आने के बाद यह अधिक दूर तक समझ आएगा कि किस-किस मोर्चे पर हार और जीत की क्या वजहें रहीं, लेकिन फिलहाल तो इस शानदार और मजबूत जीत के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह अपने साथियों के साथ बधाई के हकदार हैं क्योंकि लोकतंत्र में मतदान के नतीजों से अधिक और कुछ साबित नहीं किया जा सकता। अगले पांच बरस के लिए एनडीए, भाजपा, और खासकर मोदी को जिस तरह का मजबूत जनादेश मिला है, वह मोदी के पिछले पांच बरसों को एक बड़ी चुनौती भी है। चुनाव अभियान से परे अगर इन पांच बरसों की गलतियों से उन्होंने कुछ सीखा हो, तो देश के अगले पांच बरस बेहतर हो सकते हैं।


Date : 22-May-2019

कल दोपहर इसी वक्त तक हिन्दुस्तानी आम चुनाव के नतीजे आने शुरू हो जाएंगे, गिनती पूरी नहीं होगी, लेकिन अधिकतर सीटों पर पहला रूख जरूर दिखने लगेगा जिससे एक्जिट पोल की इज्जत भी तय होगी कि वे सही अंदाज लगा पाए हैं, या किसी वजह से उनका अंदाज गलत निकला, या सोच-समझकर एक गलत अंदाज सामने रखा गया था। दरअसल भारत की राजनीति साजिशों से इतनी भरी है कि एक जैसे दिखने वाले तमाम एक्जिट पोल को लेकर भी लोगों के मन में तरह-तरह के शक हैं कि क्या ये किसी एक पार्टी के पक्ष में रूझान दिखाने के लिए पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं, या फिर कोई और बात है। कुछ अधिक सोचने वाले लोगों की कल्पना सट्टाबाजार और शेयर बाजार तक जाती है जो कि राजनीति से किसी भी मायने में साजिश के लिए कम ताकत नहीं रखते हैं। जिस तरह एक्जिट पोल के अगले दिन शेयर बाजार हजार पाइंट ऊपर चढ़ गया, और खरबों का नफा-नुकसान हो गया, उसे देखते हुए इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि शेयर बाजार चलाने वाले लोग ऐसी हसरत रखते हों कि एक्जिट पोल को प्रभावित करें। जो भी हो, अगले एक दिन में यह साफ हो जाएगा कि एक्जिट पोल जीता या हारा। 

पिछले किसी भी चुनाव में केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन का विपक्ष से इतना अधिक चुनावी-तनाव नहीं हुआ था जितना कि इस बार हुआ है। नतीजे चाहे जो हों, अगली संसद तो पक्ष और विपक्ष दोनों वाली रहेगी, और अगले पूरे पांच बरस देश के जरूरी मुद्दों पर या तो इसमें चर्चा हो सकेगी, या पिछले पांच बरस की तरह तनातनी जारी रहेगी, या और आगे बढ़ेगी। चुनाव के दौरान हवा में जितना जहर घुला है, उतना जहर भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से वहां की हवा में भी नहीं घुला था। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कारखाने के स्टॉक में बचा हुआ जहरीला मिक नाम का रसायन खत्म करने के लिए और भी लंबे समय तक कार्रवाई करनी पड़ी थी। आज हिन्दुस्तान में नेताओं और पार्टियों के मन में एक-दूसरे के लिए ऐसा बहुत सा जहर बाकी है, और इसे खत्म करना आसान नहीं रहेगा। 

आज केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों और गठबंधनों की सरकारें हैं। इस आम चुनाव के पहले से केन्द्र और राज्यों के बीच एक तनातनी चली आ रही है जिसकी सबसे बड़ी मिसाल केन्द्र की मोदी, और बंगाल की ममता सरकार के बीच देखने मिली है। चूंकि संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं हो रहे हैं, और जो पार्टी या गठबंधन केन्द्र पर राज करेंगे, उनसे ठीक खिलाफ कई पार्टियां राज्यों में अलग-अलग वक्त के लिए जारी रहेंगी। इस चुनाव के बाद यह भी एक बड़ी चुनौती रहेगी कि भारत के संघीय ढांचे को ऐसी तनातनी के बीच कैसे बनाए रखा जाए, कैसे उसे असरदार रखा जाए, और कैसे दो राजधानियों की पार्टियां देश के हित में, देश के विकास के लिए ठीक से काम कर सकें। आज देश के बहुत से नेताओं के बीच बातचीत का रिश्ता भी नहीं बचा है। जितनी गालियां एक-दूसरे को इस चुनाव के दौरान दी गई हैं, वे कम नहीं हैं। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के हाथ में बहुत सी ऐसी टैक्स और जांच एजेंसियां हैं जिनका इस्तेमाल विपक्ष के नेताओं के खिलाफ हो सकता है, या कि होते रहने के आरोप लगते ही रहे हैं। 

आज हिन्दुस्तानी राजनीति में दरियादिली की उम्मीद करना बेकार है कि देश की संसदीय परंपराओं को बेहतर बनाने के लिए लोग काम करेंगे। ऐसी निराशा के बीच ही कुछ तबकों को तो यह कोशिश करनी ही चाहिए कि देश का संसदीय ढांचा, देश का संघीय ढांचा, और इस देश में केन्द्र-राज्य के परस्पर संबंध इतनी अधिक कड़वाहट से न भरे रहें कि तमाम राजनीति महज अविश्वास पर चलती रहे। हवा में धर्म को लेकर, जाति को लेकर, लोगों की देशभक्ति को लेकर जितने किस्म की हिंसक और गंदी बातें चुनाव के इन महीनों में घुल चुकी हैं, उनको भी दूर करने की जरूरत है, और अगले पांच बरस पूरे होने तक रहेगी। जो कोई भी इस देश की सत्ता चलाए, उसे चुनावी जहर से ऊपर उबरना चाहिए, और सत्ता पर ही बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह विपक्ष को विश्वास में लेकर चले। जो भी गठबंधन सत्ता में आए उसके सामने ऐसी ढेरों मिसालें मौजूद हैं कि किसी सरकार को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। ऐसी मिसालों को सोचते-समझते हुए अगली सरकार काम करे, तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा।
-सुनील कुमार


Date : 21-May-2019

पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, और वे कभी आरएसएस मुख्यालय पहुंचकर सुर्खियां बन जाते हैं, तो कभी कोई और बयान देकर। मोदी सरकार ने जब इंदिरा के समय से कांग्रेस के एक स्तंभ रहे प्रणब को भारतरत्न दिया, तो लोग चौंके भी थे और मोदी की अचानक प्रणब मुखर्जी से निकटता खबरों में आई थी। अब दो दिन पहले कांगे्रस के कुछ नेता प्रणब से मिलने पहुंचे, तो वे फिर सुर्खियों में आए कि ममता बैनर्जी सहित कई गैरएनडीए, गैरयूपीए नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं, और क्या कांग्रेस उनसे सहयोग मांगने गई है? लेकिन कल उन्होंने दिल्ली के एक सार्वजनिक समारोह में चुनाव आयोग की खुलकर तारीफ की और लोकसभा का अभी चल रहा चुनाव कामयाबी से शानदार तरीके से करवाने की चर्चा की।

प्रणब मुखर्जी का यह बयान आज के वक्त खासा हैरान करता है। वे अब उम्र और ओहदे के उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां से आगे वे कहीं नहीं जा सकते। वे राष्ट्रपति रह चुके हैं, और भारतरत्न बन चुके हैं। इसके बाद भारत के संविधान में और लोकतांत्रिक परंपराओं में उनके लिए कुछ नहीं बचा है। यह जरूर हो सकता है कि देश की बहुत सी पार्टियां मिलकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश करें, और वे परंपराओं को तोड़कर इसे मंजूर कर लें। लेकिन ऐसे कोई आसार दिखते नहीं हैं, और एनडीए को उनकी कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में एनडीए विरोधी पार्टियों को चुनाव आयोग से जितनी बड़ी शिकायत रही है उसे देखते हुए प्रणब की यह तारीफ बहुत ही अटपटी और बेमौके की है।

आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता एकदम ही नीचे गिरी हुई है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने उसे जैसी फटकार लगाई है, वैसा कोई पुराना मामला याद नहीं पड़ता है। चुनाव आयोग इस चुनाव में अपने भारी पक्षपाती नजरिए के लिए अच्छी तरह दर्ज हो चुका है, और आयोग के ही एक आयुक्त ने उनकी असहमति दर्ज न करने को लेकर बैठकों में जाना बंद कर दिया है। इस बीच प्रणब का यह कहना कि कार्यपालिका तीनों आयुक्त नियुक्त करती है और वे अपना काम अच्छे से कर रहे हैं, आप उनकी आलोचना नहीं कर सकते, यह चुनाव आयोग का सही रवैया है। प्रणब मुखर्जी का यह प्रमाणपत्र बहुत ही बेमौके पर आया है, और साख खो चुकी संस्था की ऐसी स्तुति करने की उनकी क्या मजबूरी है, यह समझ से परे है। आज जब चुनाव आयोग के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हुए हैं, जब आयोग मतभेद से बंट चुका है, तब ऐसी तारीफ बहुत ही अजीब है, और एक भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से प्रणब मुखर्जी को साख खोए हुए आयोग की ऐसी हिमायत करनी नहीं चाहिए थी। भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से न तो उन्हें चुनाव आयोग की आलोचना करनी थी, और न ही तारीफ। फिर भी अगर उनका मन बेचैन था, तो आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां देखते हुए उन्हें आयोग की आलोचना ही करनी थी जो कि जायज मानी जातीं। उनका बर्ताव बिल्कुल भी समय से परे है, हो सकता है उम्र उन पर हावी हो गई हो, या उम्र के इस पड़ाव पर आकर वे धार्मिक रूझान में उलझ गए हों, और उन्हें लग रहा हो कि मंदिर वहीं बनाएंगे। यह भी लगता है कि वे अपात्र होते हुए भी जिस तरह भारतरत्न बनाए गए, क्या वे उस उपकार का बदला चुकाने के लिए मोदी सरकार के हिमायती दिख रहे चुनाव आयोग की तारीफ को अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान रहे हैं? यह याद रखने की जरूरत है कि मोदी सरकार यूपीए सरकारों पर जितने तरह के आरोप लगाकर 2014 में सत्ता में आई थी, उनमें से अधिकतर ऐसे फैसले थे जिनमें प्रणब मुखर्जी भागीदार थे। और ऐसे में उन्हें भारतरत्न बनाना अपने-आपमें गलत था। आज जब वे इस तरह के चुनाव आयोग को चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हैं, तो वे एक बार फिर साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न के लायक नहीं थे।
-सुनील कुमार


Date : 20-May-2019

बीती शाम हिन्दुस्तानी आम चुनाव के आखिरी दौर का वोट खत्म हुआ, और एग्जिट पोल आना शुरू हुआ। अधिकतर समाचार चैनलों ने किसी न किसी एजेंसी के साथ मिलकर वोट डालकर निकले मतदाता का रूख भांपने का काम किया, और फिर पूरी तरह ईमानदार नतीजे सामने रखे, या जैसा कि लोगों की आशंका है मिलावटी नतीजे पेश किए, और जिन लोगों को पोल के नतीजे पसंद नहीं आए, उन्हें पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उछाला हुआ एक नया शब्द याद पड़ा, और उन्होंने इन तमाम एग्जिट पोल को महामिलावटी साबित करने की कोशिश की। जिन लोगों की निजी पसंद जैसी थी, उनको ये नतीजे वैसे ही लगे। कुछ लोगों को लगा कि आएगा तो मोदी ही, और कुछ लोगों को लगा कि हिन्दुस्तानी मीडिया मोदी के हाथों बिका हुआ  गोदी मीडिया बन चुका है, और वह उसी नमक का बदला चुका रहा है। 

चुनाव के पहले के ओपिनियन पोल हों, या मतदान के बाद के एग्जिट पोल, इनमें गलती की गुंजाइश खासी हो सकती है, और पिछले बरसों में बहुत से नामी-गिरामी चैनलों, और नामी-गिरामी एजेंसियों के नतीजे गलत साबित हुए भी हैं। लेकिन इनको अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तानी टीवी-समाचार चैनलों में से शायद सभी का सरकार में रजिस्ट्रेशन समाचार और मनोरंजन चैनल के रूप में है। ये चैनल इसीलिए दिन में कई बार कॉमेडी या नाच-गाना भी दिखाते हैं, महज समाचार नहीं। इसलिए ओपिनियन पोल हो, या एग्जिट पोल, इन दोनों को ही अपनी जरूरत जितनी गंभीरता से ही लेना चाहिए, वरना इन्हें मनोरंजन वाला हिस्सा मानकर इनका मजा लेकर फिर दूसरे किसी चैनल पर चले जाना चाहिए। 

हिन्दुस्तान में जो समाचार-पत्रिकाएं हैं, उनमें जो सबसे प्रतिष्ठित कही या मानी जाती हैं, उनमें भी एक चलन पिछले कई बरसों से लगातार चल रहा है। वे साल में एक-दो बार हिन्दुस्तानी नौजवानों, महिलाओं, या शादीशुदा जोड़ों के प्रेम और सेक्स संबंधों, विवाह से परे के बेवफाई के संबंधों के बारे में एक सर्वे करके उसे सनसनीखेज तरीके से छापती हैं। नतीजा यह होता है कि वह अंक खासा अधिक बिकता है, और जो लोग उस पत्रिका को पढऩा छोड़ चुके थे, वे भी कम से कम उस एक अंक की तरफ वापिस लौटते हैं, और एक यह संभावना बनती है कि वे एक बार फिर पाठक या ग्राहक बन सकते हैं। यह काम कहने के लिए तो पत्रकारिता के दायरे में आता है, लेकिन यह मोटे तौर पर बाहर किए गए एक सर्वे का नतीजा रहता है, और ऐसा सर्वे पत्रकारिता नहीं रहता, वह एक अलग तकनीक रहती है। सेक्स से लेकर वोट तक, लोगों की राय को जानकर, या बिना जाने भी, उस पर नतीजे निकालना, और उसे अपने ग्राहकों, पाठकों, या दर्शकों के सामने पेश करना कुछ लोगों को फिजूल का और बेईमानी का काम लग सकता है, कुछ लोगों को यह एक जरूरी जिम्मा लग सकता है। यह गर गंदा है, तो भी धंधा है, यही मानकर इसका मजा लेना चाहिए। भारत का चुनावी इतिहास हर किस्म के ओपिनियन और एग्जिट पोल से भरा हुआ है। कुछ लोग बार-बार गलत साबित होते हैं, और उसके बावजूद वे बाजार में बने भी रहते हैं। ऐसी भविष्यवाणी कुछ अखबारों में अब तक, इक्कीसवीं सदी में भी छपने वाले भविष्यफल जैसी रहती है जिसे कुछ लोग अब भी पढ़ते हैं, और उनमें से कुछ लोग अब भी भरोसा करते हैं। हिन्दुस्तान का इस बार का आम चुनाव इतना लंबा चला है कि लोग थक गए हैं, और इसी तरह के मनोरंजन से काम चलेगा। जिस तरह लोग अंतिम संस्कार के लिए मरघट जाते हैं, और वहां पर चिता की तैयारी में वक्त लगता है, फिर आग पकडऩे में समय लगता है, और कपालक्रिया की नौबत आने तक घंटे भर से ज्यादा लग चुका रहता है। वहां पर मौजूद लोग धूप, धूल, और धुएं से थककर मरने वाले की बेईमानी या बदचलनी, बदमिजाजी या बदनामी तक हर पहलू पर चर्चा कर लेते हैं, उसी तरह वोट डलने के हफ्तों बाद आने वाले नतीजों को लेकर लोगों को इंतजार भारी न पड़े, इसलिए टीवी पर कई तरह की बहस चलती हैं ताकि लोगों का वक्त कटे, और इस तरह के एग्जिट पोल सामने आते हैं ताकि लोग शर्त और सट्टा लगा सकें। इन्हें महज इतनी ही गंभीरता से लिया जाए तो किसी मीडिया पर बिके हुए होने का आरोप लगाने की नौबत नहीं आएगी क्योंकि मनोरंजन तो बेईमान होता नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 19-May-2019

वैसे तो आज जब यह अखबार छपेगा तब तक 2019 के आम चुनाव का आखिरी वोट डलने को होगा, लेकिन वोटों की चर्चा इसलिए भी होनी चाहिए कि वोट न डालने वाले लोग कुछ आत्मग्लानि में तो रहें। देश भर से आने वाली खबरें बड़ा हौसला बंधाती हैं कि अंधेरी लंबी सुरंग के आखिरी सिरे पर रौशनी की एक किरण दिखने की उम्मीद लिए हुए एक 105 और 110 बरस के लोग भी दूसरों के कंधों पर और गोद में वोट डालने पहुंचते हैं। हिमाचल के एक वोटर ऐसे हैं जो कि पहले चुनाव से लेकर अब तक हर चुनाव में वोट डालते आए हैं। बिहार के पटना में दो ऐसी लड़कियां हैं जिनका बाकी धड़ तो अलग है, लेकिन जिनके सिर बचपन से ही जुड़े हुए हैं। अब ऐसी तकलीफदेह जिंदगी का अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं रह जाता कि जुड़े हुए सिरों के साथ वे आखिर कर क्या सकती हैं? लेकिन जब वोट देने की बारी आई तो पिछले चुनाव में इन दोनों बहनों को एक मानकर इनका एक ही वोटर कार्ड बना था। इस बार इन्होंने कोशिश करके अलग-अलग दो कार्ड हासिल किए, और सिर से जुड़े-जुड़े ये बहनें अभी वोट डालने पहुंच रही होंगी। 

लेकिन अलग-अलग सिरों वाले बहुत से लोग साधन और सुविधा रहते हुए भी घर बैठे रहे, और यही नतीजा रहा कि 30-40 फीसदी वोट नहीं डाले गए हैं। इनमें बहुत से तो ऐसे वोट हैं जो कि शहरी इलाकों में हैं, जहां खतरा नहीं है, जहां दिक्कत नहीं है। नक्सल बारूदी सुरंगों पर से चलकर वोट डालने जाते हुए आदिवासियों को देखें तो लगता है कि वोट की समझ उन्हें शहरियों के मुकाबले अधिक है। जहां नक्सलियों ने वोट न डालने के फतवे जारी किए थे, जहां आए दिन बेकसूरों की नक्सल-हत्या होती है, वहां भी लोग वोट डालने उमड़ पड़े थे। लेकिन 30-40 फीसदी लोग वोट डालने नहीं पहुंचे जो कि एक फिक्र की बात भी है, और लोकतंत्र का बड़ा नुकसान भी है क्योंकि वोटों का फैसला महज कुछ फीसदी से हो जाता है, और उससे कई गुना वोटर घर बैठे रह जाते हैं। ऐसे में इन लोगों को आत्मग्लानि में डालना भी जरूरी है। 

भारत में बीच-बीच में एक बहस चालू होती है कि मतदान को अनिवार्य बनाना चाहिए ताकि जो लोग वोट नहीं डालते उनको सरकारी सुविधाएं न मिलें। लेकिन आजादी के हिमायती लोगों का यह भी मानना रहता है कि वोट न डालने की आजादी लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा रहना चाहिए। कोई पांच बरस पहले वोटर के सामने एक नया विकल्प रखा गया था, नोटा। इसका मतलब था नन ऑफ द अबोव, यानी इनमें से कोई नहीं। और नोटा की यह बटन वोटिंग मशीन पर आखिर में रखी जाती थी कि सारे वोटरों के नाम, सारी पार्टियों के नाम देख लेने के बाद भी अगर कोई पसंद न आए तो लोग नोटा को वोट दे दें जो कि सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का एक रूख रहेगा। और लोग जगह-जगह इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। लेकिन इससे आगे बढ़कर कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सांसद या विधायक को चुन लेने के बाद भी उसे वापिस बुलाने का अधिकार भी रहना चाहिए ताकि जनता का एक बड़ा तबका अगर निराश हो जाए तो एक जनमत संग्रह से उन्हें वापस बुलाया जा सके। खैर, यह एक अलग बात है आज तो चर्चा उन लोगों की हो रही है जो चुनने के लिए वोट डालने नहीं जा रहे, और उनसे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे चुने हुए को वापिस बुलाने के लिए वोट डालने की जहमत करेंगे। 

लेकिन जो लोग वोट डालने नहीं जाते हैं, उन्हें उनके आसपास के वोट डालने वाले किस तरह कोंच सकते हैं, इस पर चर्चा अभी से इसलिए होनी चाहिए कि ऐन चुनाव के वक्त वोट डालने या न डालने की सोच एक पखवाड़े में बदलती नहीं है। अब इसी हफ्ते हर सीट के, हर बूथ के वोट आ जाएंगे, और जिम्मेदार वोटरों को चाहिए कि वे अपने इलाकों की जीत-हार पर बोलने वाले लोगों को याद दिलाए कि इन नतीजों में वोट न डालकर भी उन्होंने कैसा योगदान दिया है। वोट न डालने वाले अपनी गैरजिम्मेदारी के बारे में झूठ नहीं बोलते हैं। और जिम्मेदार वोटरों की यह भी जिम्मेदारी है कि वे अपने आसपास के लोगों को भी धकेलकर पोलिंग बूथ ले जाएं, इस बार नहीं हो पाया है तो अगले किसी चुनाव में ले जाएं। चुनाव कई किस्म के होते हैं, संसद के, विधानसभा के, और पंचायत-म्युनिसिपल के। अगला चुनाव कोई न कोई तो आएगा, और तब तक निकम्मे वोटरों को धिक्कारने का काम जरूर करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 18-May-2019

पिछले दो दिनों में कांग्रेस की तीन खबरें कुछ तो आज के राजनीतिक हालात के बारे में बताती हैं, और कुछ कांग्रेस पार्टी के अपने हाल के बारे में। बिना सिलसिलेवार इन खबरों को देखें तो एक खबर है कि सोनिया गांधी 23 मई को विपक्षी पार्टियों के नेताओं को एक बैठक के लिए न्यौता भेज चुकी हैं, जो कि जाहिर है कि मोदी और एनडीए के खिलाफ एक संभावित मोर्चे या गठबंधन को लेकर है। लेकिन परसों कांग्रेस के एक बड़े नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कांग्रेस इस बात के खिलाफ नहीं हैं कि किसी क्षेत्रीय दल का नेता प्रधानमंत्री बने। और कल कांग्रेस ने यह साफ किया कि बयान का यह मतलब नहीं था, और जाहिर तौर पर किसी गठबंधन में जो सबसे बड़ी पार्टी होती है, उसके मुखिया को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। इन दो बयानों के बीच के कुछ घंटों में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मतलब निकालना शुरू कर दिया कि कांग्रेस देश में कर्नाटक प्रदेश वाला फॉर्मूला लागू कर सकती है जिसमें उसने भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अपने से छोटी पार्टी, जेडीएस, को मुख्यमंत्री का पद दिया। और ऐसा देश में अगर होता है, तो वह पहली बार नहीं होगा, देश-प्रदेश में ऐसा पहले भी हुआ है जो सबसे बड़ी पार्टी न भी हो, उसका नेता भी सरकार का मुखिया बनाया गया है। 

लेकिन कांग्रेस की जो बात परेशान कर रही है, वह यह है कि चुनावी नतीजों के आने के कुल पांच दिन पहले एक ऐसी गैरजरूरी चर्चा छेड़ी जाती है जिसे छेडऩा कोई मजबूरी नहीं थी, और फिर उसे छेडक़र उसका खंडन किया जाता है, वह भी तब जब चार दिन बाद सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं से मिलने ही वाली हैं। कुछ लोग ऐसा मान सकते हैं कि यह सोनिया की बैठक के पहले हवा के रूख को भांपने की एक राजनीतिक चतुराई रही होगी कि ऐसा बयान दिया जाए, खंडन किया जाए, और उस पर लोगों की प्रतिक्रिया देखी जाए। अगर यह सोच-समझकर किया गया है, तो यह बहुत ही नासमझी का तरीका है। और अगर यह लापरवाही में किया गया है तो कोई भी पार्टी ऐसी लापरवाही का नुकसान मुश्किल से ही बर्दाश्त करेगी। आज जब नरेन्द्र मोदी नाम की एक लहर या आंधी की आशंका के खिलाफ ऐसी तैयारी चल रही है, तो कुछ बोलने का काम तब होना चाहिए था जब सोनिया विपक्ष के बाकी नेताओं के मन की बात सुनने का काम कर चुकी होतीं। जब सुनने का मौका है, सुनने की जरूरत है, तब बेमौके बोलना, बिना जरूरत बोलना, यह समझदारी की बात तो बिल्कुल नहीं है। 

आज की संसद में कांग्रेस कुल 44 सदस्यों वाली पार्टी बनकर रह गई है, और उसकी आगे की संभावनाएं अगले हफ्ते बेहतर हो सकती हैं, लेकिन फिर भी इतनी बेहतर शायद न हों कि कांग्रेस बाकी विपक्षी पार्टियों से मीडिया के मार्फत बात करके भी सरकार बना ले। पिछले आधे बरस को अगर देखें, तो जब देश की बहुत सी पार्टियां तरह-तरह के गठबंधन बना रही थीं, कांग्रेस ने जाने किस जोड़-घटाने के तहत एक के बाद दूसरा प्रदेश बिना गठबंधन अकेले लडऩा तय किया। उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के साथ किसी तालमेल की कोशिश कम से कम मीडिया में नहीं आई, बंगाल में कांग्रेस न ममता के साथ रही, न वामपंथियों के साथ, केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ भी लड़ी, और उन्हें नाराज करने की हद तक लड़ी। ऐसा और भी कई प्रदेशों में हुआ जो कि दिल्ली में जाकर खत्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल के साथ कोई तालमेल नहीं हुआ, न दिल्ली में, न पंजाब में। एक पार्टी की हैसियत से यह कांग्रेस का हक भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है कि किसी प्रदेश में वह ऐसा अपमानजनक समझौता, गठबंधन, या तालमेल न करे जो कि उस प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोडक़र रख दे और उस प्रदेश में पार्टी को जमीन से खत्म ही कर दे। यह बात तो ठीक है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जब मामला संसद में एनडीए के खिलाफ यूपीए या किसी नए गठबंधन के आंकड़े खड़े करने का हो, तो कांग्रेस को क्षेत्रीय गठबंधन के बारे में अधिक सोचना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस अकेले चलने की नीति पर टिकी हुई, या अड़ी हुई दिखती रही। यूपीए के पिछले साथियों के साथ वह जरूर है, लेकिन बहुत से राज्यों में उसने जीत की संभावनाएं तभी खो दीं, जब उसने उन राज्यों में कोई तालमेल नहीं किया। 

कर्नाटक में कांग्रेस यह देख चुकी है कि अगर उसे भाजपा को रोकना है तो उसे अपने से कम विधायकों वाली पार्टी को भी मुखिया बनाना पड़ेगा, और उसके मातहत काम करना पड़ेगा। आज मोदी और एनडीए के खिलाफ जितनी पार्टियां हैं, उन सबको यह समझने की जरूरत है कि चुनावी नतीजों के बाद अगर ऐसी नौबत आती है कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के मुकाबले दूसरी पार्टियों या दूसरे गठबंधनों को एकजुट होना पड़े, तो उस वक्त बातचीत के रिश्ते बनाए रखने के लिए आज कांग्रेस को गैरजरूरी बातचीत नहीं करनी चाहिए। आज कांग्रेस की हसरत अपनी अगुवाई में एक सरकार की हो सकती है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर किसी की भी अगुवाई में मोदी-शाह को सत्ता से बाहर रखा जा सकता है, तो भी वह राहुल गांधी की एक कामयाबी ही कहलाएगी। आज कांग्रेस और राहुल का भविष्य महज इसमें नहीं है कि राहुल प्रधानमंत्री बने, मोदी दुबारा प्रधानमंत्री न बने, यह भी कांग्रेस और राहुल की छोटी कामयाबी नहीं होगी। इसलिए कांग्रेस के बड़बोले नेताओं को आज प्रधानमंत्री के ओहदे पर दावेदारी के बजाय एक संसदीय-लोकतांत्रिक दरियादिली की बात करनी चाहिए। ऐसे माहौल में राहुल के पीएम बनने की बात पार्टी के भीतर एक कामयाब चापलूसी तो हो सकती है, लेकिन अगर कांग्रेस दूसरी पार्टियों का दिल नहीं जीत पाएगी, तो यह चापलूसी धरी रह जाएगी। कांग्रेस हाईकमान या सोनिया गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि अपनी पार्टी के तमाम नेताओं को यह हिदायत दें कि वे अगली सरकार, गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के बारे में कुछ भी न बोलें।


Date : 17-May-2019

ब्रिटेन की एक खबर है कि वहां नौसेना के दूसरे सबसे बड़े ओहदे पर काम कर रहे एक शानदार अफसर को नौसेना के एक सबसे प्रतिष्ठित विमानवाहक पोत से हटा दिया गया है क्योंकि उन्होंने सप्ताहांत पर निजी काम के लिए सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल कर लिया था। हालांकि उन्होंने कार में पेट्रोल अपनी जेब से डलवाया था, लेकिन जांच में इस इस्तेमाल को कुल मिलाकर गलत पाया गया, और इसलिए इस पद से हटा दिया गया कि वे अपने मातहत लोगों के साथ किस तरह कड़ाई से पेश आ सकेंगे अगर वे खुद ही सरकारी गाड़ी का निजी उपयोग कर बैठे हैं। इस मामले में उनको कोई चेतावनी भी नहीं दी गई थी, सीधे हटा दिया गया है। 

अब अगर अंग्रेजों के छोड़े हुए हिन्दुस्तान को देखें, तो यहां छोटे-छोटे से सरकारी अधिकारी अपनी पूरी ताकत लगाकर सरकारी साधन-सुविधा, और मातहत कर्मचारियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। एक-एक अफसर नियमों के खिलाफ कई-कई गाडिय़ां रखते हैं, अपने बंगलों पर अनगिनत कर्मचारियों की फौज घरेलू नौकरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, कहीं शादी-ब्याह में जाने के लिए उस शहर में कोई मीटिंग या दौरा दिखा देते हैं। हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ में पिछली रमन सरकार के कार्यकाल में अफसरों के ऐसे बेजा इस्तेमाल के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उनसे ऐसा लग रहा है कि अंग्रेज लौटे नहीं हैं, और अपने इस गुलाम देश को लूटने का काम जारी रखे हुए हैं। जिस अंदाज से नेताओं और अफसरों के कुनबे सरकारी बंगलों, गाडिय़ों, बिजली, हवाई टिकटों, महंगी होटलों, और हर सामान की सरकारी खरीदी को सत्ता की एक आम संस्कृति बना चुके हैं, वह भयानक है। इस गरीब देश में जहां जनता के पास रियायती अनाज बिना पेट भरने का रास्ता नहीं हैं, जहां पर सरकारी इलाज न मिले तो मौत के अलावा कोई चारा नहीं है, जहां दोपहर का भोजन देश के दसियों करोड़ स्कूली बच्चों का पेट भरता हो, वहां पर सरकारी फिजूलखर्ची और उस पर ऐशोआराम का कोई अंत नहीं है। 

दरअसल जितना खर्च नेता-अफसर अपने और अपने कुनबों पर करते हैं, वह सरकार का ठोस नुकसान तो है ही, उनका यह मिजाज भी जनता के पैसों की बर्बादी का एक ऐसा सिलसिला शुरू करता है जो कि ऊपर से नीचे उतरते जाता है, और फिर छोटे-छोटे नेता और छोटे-छोटे अफसर भी इस फिजूलखर्ची को अपना हक मान बैठते हैं। पिछले बरसों में कभी-कभी सरकारी ड्राइवरों ने उनको रात-दिन अफसरों के निजी कामकाज में जोत देने के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन वह दब गई और उसका कुछ हुआ नहीं। लेकिन पिछले बरस छत्तीसगढ़ में जिस तरह पुलिस कर्मचारियों के परिवारों ने सड़क पर आकर आंदोलन किया था, वैसा कोई आंदोलन बंगलों पर तैनात सरकारी कर्मचारी अगर करें तो ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। लोकतंत्र में सामंती अंदाज में जनता के पैसों का ऐसा बेजा इस्तेमाल हिन्दुस्तान में एक आम संस्कृति बन गया है, और इसे खत्म करना चाहिए। 

लोगों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में लगातार इस बारे में लिखते आए हैं कि बड़े सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोगों को अंधाधुंध बड़े मकान नहीं देने चाहिए, क्योंकि उनके रख-रखाव का खर्च सरकार पर आता है, और वहां सरकारी मुलाजिमों को जानवरों की तरह जोत दिया जाता है। नेताओं और अफसरों को सिर्फ पारिवारिक जरूरत जितने बड़े मकान मिलने चाहिए, और बहुत ही सीमित संख्या में सहायक कर्मचारी मिलने चाहिए। यह बात इंसान की गरिमा के खिलाफ भी है कि उन्हें घरेलू कामों में इस तरह से लगा दिया जाए, और नौकरी की बेबसी में वे अफसर-नेता कुनबों के कपड़े धोने, कुत्तों को घुमाने, बच्चों को नहलाने जैसे काम भी करने को मजबूर हों। चूंकि सरकारी कर्मचारियों के संगठन नेताओं और बड़े अफसरों से कोई टकराव नहीं लेते हैं, इसलिए यह सिलसिला बेलगाम चलते जा रहा है, बढ़ते जा रहा है। ब्रिटेन की इस ताजा खबर को लेकर लोगों को सोचना चाहिए कि किस तरह सूचना के अधिकार से, कैमरों और स्टिंग ऑपरेशनों से कर्मचारियों और गाडिय़ों का बेजा इस्तेमाल साबित किया जा सकता है, और उसकी भरपाई के लिए अदालत में जनहित याचिका लगाई जा सकती है। हिन्दुस्तान की सरकारों में अदालती डंडे से कम कोई चीज काम नहीं करती है, और सरकारें अगर यही जुबान समझती हैं, तो लोगों को इसी का इस्तेमाल करके जनता के पैसों को बचाना चाहिए, और छोटे सरकारी कर्मचारियों को इंसान जैसी जिंदगी वापिस दिलवानी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 16-May-2019

दक्षिण भारत के, और बॉलीवुड के भी, एक विख्यात अभिनेता कमल हासन दक्षिण की एक आम परंपरा के मुताबिक फिल्मों की शोहरत के साथ राजनीति में आए, और अभी वे एक नई पार्टी बनाकर यह तौल रहे हैं कि उन्हें किसके साथ जाना है। लेकिन इस बीच वे चुनावी सभा में यह बोलकर एक बवाल खड़ा कर चुके हैं कि नाथूराम गोडसे हिन्दुस्तान का पहला हिन्दू आतंकी था जिसने गांधी की हत्या की थी। हिन्दुस्तान में आज गोडसे के बहुत से हिमायती हैं, जो कि गिनती में चाहे कम हों, लेकिन जो मुखर बहुत हैं, और आए दिन गांधी को कोसते हुए गोडसे की प्रतिमाएं लगाने में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों को जाहिर तौर पर कमल हासन की बातें खटकनी थीं, और उनकी गोडसे-आस्था पर इससे गहरी चोट लगी होगी। अब दिक्कत यह है कि अपने आपको हिन्दू धर्म का कहकर उसके बारे में किसी भी आलोचना से अपनी धार्मिक भावनाएं आहत पाने वाले लोग जब अदालत में हिन्दू धर्म पर बहस चलती है तो इसे धर्म के बजाय एक जीवनशैली करार देने पर आमादा रहते हैं। यह बहुत सहूलियत की बात रहती है कि हिन्दू धर्म को जब चाहे धर्म मानकर अपने को आहत करार देकर अदालत के भीतर और बाहर हमले शुरू कर दें, और जब चाहे तब इसे महज जीवनशैली बताकर धर्म से परे साबित कर दें। यही वजह है कि इस धर्म के कुछ लोग हिंसक और हमलावर तेवरों के साथ कहीं बाबरी मस्जिद गिराते हैं, तो कहीं गुजरात के दंगों में हजार जिंदगियां ले लेते हैं, और इसके साथ-साथ इस बात पर कानूनी आपत्ति करते हैं कि हिन्दू धर्म में कोई आतंकी हो सकता है। 

अब गांधी जैसे निहत्थे की सोच-समझकर, साजिश करके हत्या करने वाले हिन्दू संगठनों से सक्रिय जुड़े हुए नाथूराम गोडसे ने इस हत्या को जायज ठहराते हुए लंबी-चौड़ी वकालत भी की, लेकिन उसकी सोच के डीएनए के आज के वारिस यह मानने से इंकार करते हैं कि उसने कोई आतंकी काम किया था, वे यह भी नहीं मानते हैं कि हिन्दू धर्म में कोई आतंकी हो सकता है, या भगवा आतंक नाम की कोई चीज हो सकती है। कमल हासन की बात पर जो एफआईआर तमिलनाडू में दर्ज हुई है, उस पर जब कमल हासन मद्रास हाईकोर्ट पहुंचे, तो वहां के जज ने अदालती अवकाश के दौरान इसे सुनने से मना कर दिया। पुलिस ने जुर्म दर्ज किया है कि उनके बयान से धार्मिक भावनाओं को भड़काने और विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का काम हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि हत्यारा नाथूराम गोडसे, और मरने वाले गांधी, दोनों ही हिन्दू थे। ऐसे में धार्मिक भावना किसकी भड़क रही है? एक हत्यारे को जिसने एक विचारधारा का दावा करते हुए गांधी जैसे महान व्यक्ति की सोच-समझकर हथियार से हत्या की, क्या वह हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि है जिसे आतंकी कहने पर हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं भड़क रही हैं? या कौन से दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा मिल रहा है? गोडसे की औलादों और गांधीवादियों के बीच? जिस गांधी के नाम पर इस देश में कोई हिंसा नहीं होती, हिंसा महज बर्दाश्त होती है, उसे कोई क्या भड़का लेगा? ऐसे में पुलिस ने एक निहायत बदनीयत और लापरवाही से कमल हासन पर यह जुर्म दर्ज किया है, ठीक उसी तरह जिस बदनीयत और लापरवाही से देश के बहुत से धर्मनिरपेक्ष लोगों, या अंधविश्वासविरोधियों के खिलाफ जुर्म दर्ज होते हैं, या उनका कत्ल होता है।
 
गोडसेवादियों के साथ दिक्कत यह है कि गांधी को खुलकर वे कोस नहीं पाते क्योंकि गांधी इस देश के लोगों की आत्मा में हैं। लेकिन वे मुस्लिमों से नफरत करने वाले, ईसाईयों से नफरत करने वाले, मुस्लिमों को पाकिस्तानी मानने वाले, नेहरू को मानने वाले लोगों के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए बंद कमरे में दबी जुबान गोडसे का गान करते हैं, और गांधी को कोसते हैं। ऐसे ही कुछ लोग पुलिस में पहुंचकर हिन्दू आतंकी या हिन्दू उग्रवादी शब्द से अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने की रिपोर्ट लिखा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि गांधी के हत्यारे के संदर्भ में जब उसे हिन्दू आतंकी कहा जा रहा है, तो क्या गलत किया जा रहा है? क्या वह आतंक नहीं था? इस देश में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के नाम पर जिस कानून का इस्तेमाल किया जाता है, उसके चलते इस देश में महज साम्प्रदायिक और धर्मान्ध लोग ही सुरक्षित रह सकते हैं, जो लोग धर्म की खामियों को गिनाने का काम करते हैं, धर्म की हिंसा पर उसे आईना दिखाने का काम करते हैं, उन लोगों को ऐसे कानूनों के तहत जेल में डालना तमाम सरकारों को बहुत सुहाता है। लेकिन यह देश ऐसी हरकतों से चाहे-अनचाहे एक गृहयुद्ध की तरफ बढ़ेगा जब एक धर्म की हिंसा दूसरे धर्म के लोगों को मारते चल रही है, और खुद अपने धर्म के भीतर के दलितों को, आदिवासियों को कहीं अछूत मानती है, तो कहीं बंदर मानती है। यह सिलसिला लंबे समय तक नहीं चलेगा, और बेइंसाफी अगर इतनी बढ़ जाएगी कि गोडसे को हिन्दू आतंकी कहना भी जुर्म हो जाएगा, तो बहुत से लोग अलग-अलग कई किस्मों से कानून तोडऩे लगेंगे, क्योंकि कानून बेइंसाफी का हिमायती हो जाएगा, हिंसक हो जाएगा। कमल हासन ने जो कहा है, वह बिल्कुल ठीक कहा है। हिन्दुओं का एक तबका अगर आईना देखना नहीं चाहता है, तो उसे अपना बदशक्ल चेहरा दिखेगा भी नहीं, और उसका एहसास भी नहीं होगा, और ऐसे में यह धर्म अपनी साख और अधिक हद तक खोते भी चलेगा।
-सुनील कुमार


Date : 15-May-2019

अलग-अलग प्रदेशों से सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बहुत से ऐसे अच्छे कामों की कहानियां हर कुछ दिनों में सामने आती हैं जिन्हें देखकर गहरी अंधेरी सुरंग के आखिर से एक रौशनी सी आती दिखती है। इनमें से कोई अपनी जिम्मेदारियों से परे जाकर पेड़ लगवाकर जंगल खड़ा करवा देते हैं, तो कोई बच्चों को पढ़ाने का ऐसा बीड़ा उठाते हैं जिससे सैकड़ों फुटपाथी बच्चों की जिंदगी एक नई राह पर लग जाती है। ऐसे सैकड़ों तरह के काम हैं, और सैकड़ों अफसर-कर्मचारी हैं जिनका सरकारी जिम्मा कुछ और है, लेकिन जिनका योगदान किसी और दायरे में बेमिसाल रहता है। 

सरकारें आमतौर पर एक संवेदनाशून्य मशीन की तरह रहती हैं, और उसके जिस पुर्जे को जिस जगह फिट कर दिया गया है, वहां से उसके हिलने-डुलने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है। किसी की तमाम दिलचस्पी किताबों में हैं, उसके ज्ञान का भंडार दुनिया भर की किताबों से जुड़ा हुआ है, लेकिन वह पुलिस विभाग में खरीदी के ओहदे पर हैं। ऐसे में किताबों से जुड़ी तमाम दिलचस्पी और जानकारी सरकार और समाज के लिए फिजूल होकर रह जाती है। दूसरी तरफ जहां-जहां सरकारों को नौकरियों से परे लोगों को मनोनीत करने की गुंजाइश दिखती है, सरकारें अपनी मर्जी के ऐसे लोगों को उन कुर्सियों पर बिठा देती हैं जो राजनीति, और चुनावी वोट के हिसाब से फायदे के हों। खुद समाज भी ऐसा ही बर्ताव करता है। अभी-अभी एक प्रदेश में चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने मुख्यमंत्री से मुलाकात किसी और मुद्दे पर की, और अपने एक जाति के सदस्य का नाम मुख्यमंत्री को दे दिया कि उसे उस जाति की भाषा से जुड़ी साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया जाए। उसकी काबिलीयत एक व्यापारी की है, लेकिन समाज का वजन और सरकार की समझ मिलकर उसे एक साहित्य अकादमी का अध्यक्ष भी बना सकते हैं। 

सरकारों को जनकल्याण के लिए एक ऐसा लचीला नजरिया इस्तेमाल करना चाहिए जिससे कि सबसे अच्छा हुनर रखने वाले लोगों को उसकी जरूरत वाली जगहों पर बिठाया जा सके। अमरीका जैसे देश में कोई भी राष्ट्रपति अपनी पसंद के बहुत से लोगों को बहुत सी सरकारी कुर्सियों पर बिठाने का हक रखता है, और आमतौर पर यह माना जाता है कि राष्ट्रपति के चार बरस के कार्यकाल में ऐसे लोग उनको दिए गए काम को बेहतर तरीके से करके दिखाएंगे। सरकार में मनोनयन से भरी जाने वाली कुर्सियां, और सरकारी नौकरियों से पहले से भरी हुई कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों की खूबियों को देखकर अगर उन्हें उनके हुनर और उनकी पसंद के काम में झोंका जाए, तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं। लेकिन सरकार में होता क्या है इसकी एक बड़ी अच्छी मिसाल कुछ बरस पहले सामने आई। महाराष्ट्र से एक आईएएस अफसर डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ आया, और उसे यहां पर हाथकरघा-विकास के काम में लगाया गया। महाराष्ट्र में वह हाथकरघा-अफसर का काम करके तो आया था, लेकिन वहां पर उसके जिम्मे यह था कि सरकारी सेक्टर के जितने हाथकरघे नुकसान में चल रहे थे, उन सबको बंद करना। उसका तमाम तजुर्बा हाथकरघा बंद करवाने का था, उन्हें चलवाने का नहीं। और जाहिर है कि ऐसा काम देने पर नतीजा क्या निकलेगा। लोगों को उनके मिजाज के खिलाफ, उनकी समझ के खिलाफ, उनके हुनर के खिलाफ काम देकर सरकार और समाज की उत्पादकता कहीं नहीं पहुंच सकती। इसलिए जब-जब जहां-जहां से सफलता की कुछ कहानियां आती हैं, तो वैसे लोगों को सरकारी विभागों के दायरों से परे जाकर उनकी खूबी के काम में लगाना चाहिए। सरकार के भीतर सेवा-शर्तों, और नियम-कायदे का ऐसा लचीलापन रहना चाहिए कि लोग उनकी सहमति और उनकी इच्छा से उनकी खूबी वाले काम में लगाए जा सकें। आज सरकारों का काम करने का तरीका इससे ठीक उल्टा दिखाई देता है, और लोगों को अधिक कमाई, अधिक ताकत, या अधिक महत्व की जगह पर बिठाना या वहां से हटाना ही सरकार का बुनियादी रूख बन गया है। 
-सुनील कुमार


Date : 14-May-2019

ममता बैनर्जी पर गढ़कर बनाई गई एक मजाकिया तस्वीर को लेकर उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक ऐसा करने वाली एक युवती को गिरफ्तार करवा दिया। चूंकि चुनाव चल रहा है, और यह युवती भाजपा की कार्यकर्ता भी है, इसलिए मामला आनन-फानन सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और आज वहां से कुछ अफरा-तफरी के बीच उसे जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट से इसे लेकर दो किस्म के समाचार आए। पहला समाचार यह निकला कि अदालत ने इस भाजपा नेता प्रियंका शर्मा को पहले ममता बैनर्जी से बिना शर्त माफी मांगने को कहा, और उसके बाद जमानत देने की बात कही। लेकिन जब उसके वकील ने अदालत से कहा कि माफी मांगने को कहना, भाषा एवं अभिव्यक्ति की आजादी को ठेस पहुंचाने वाली बात है। अभी इस बारे में समाचार आ ही रहे हैं कि प्रियंका ने माफी मांगी तब जमानत दी गई, या बिना उसके जमानत दी गई, लेकिन चाहे पल भर के लिए अदालत का जो रूख सामने आया, वह कुछ सदमा पहुंचाने वाला था।

भारतीय राजनीति में बहुत सी पार्टियों और नेताओं के बीच अंधाधुंध कटुता चल रही है। एक-दूसरे की बातों को तोड़-मरोड़कर उन्हें जनता के बीच बेइज्जत करने के काम में देश के कुछ सबसे बड़े नेता ओवरटाईम करते हुए दिख रहे हैं। लेकिन इसके बीच भी एक बात यह है कि किसी की तस्वीर को लेकर कार्टून बनाना, या किसी का मजाक उड़ाना अभिव्यक्ति की आजादी की बुनियाद है। लोग मजाक अलग-अलग किस्म से कर सकते हैं, लोगों का हास्यबोध और व्यंग्यबोध अलग-अलग हो सकता है। लोगों की संवेदनाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में किसी कार्टून का जवाब, किसी गढ़ी गई व्यंग्य तस्वीर का जवाब गिरफ्तारी नहीं हो सकता। दुनिया में सभ्यता और लोकतंत्र के विकास का एक पैमाना यह भी है कि उस समाज में, उस देश में किसी कार्टून को कितनी आजादी हासिल है।

हिंदुस्तान में अगर देखें तो सैकड़ों बरस पहले किसी लोकतंत्र के बिना, किसी कानून के बिना, अभिव्यक्ति की किसी लिखित स्वतंत्रता के बिना कबीर ने जितने पैने व्यंग्य किए हैं, उतने तो आज आजाद हिंदुस्तान में भी करना मुमकिन नहीं है। आज मस्जिद के किसी मुल्ला को मुर्गे की तरह बाग देकर अल्लाह को बुलाने की बात लिख दी जाए, तो वह दंगा फैलाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का जुर्म हो जाएगा। पश्चिम बंगाल में इसके पहले भी ममता बैनर्जी ने उन पर बनाए गए कार्टूनों पर ऐसा ही किया है और गिरफ्तारियां करवाई हैं। इस देश में उन्हें लोकतंत्र की महान परंपराओं को देखना चाहिए जब गांधी और नेहरू के खिलाफ रोजाना कार्टून बनते थे, और आए दिन अंबेडकर पर भी। लेकिन किसी ने कभी उसका बुरा नहीं माना। हाल के बरसों में नेताओं का बर्दाश्त खत्म हो गया है, और यह लोकतंत्र के कमजोर पडऩे का एक पुख्ता सुबूत है। भारत को तुरंत अपने आईटी कानून में फेरबदल करना चाहिए जिसके चलते अब तक भी राज्य सरकारें इसका बेजा इस्तेमाल करने की ताकत रख रही हैं, बेजा इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट इस कानून में फेरबदल कर रहा है, कर चुका है, और आगे करने की ताकत रखता है, वही आज सुनवाई के दौरान जिस तरह एक युवती से बिना शर्त माफी मांगने की शर्त रख रहा था, वह आजादी की एक कमजोर समझ का संकेत भी है। सुप्रीम कोर्ट को आजादी को व्यापक अर्थों में लेना चाहिए था। खैर जो भी हो शायद आज जब यह आदेश अदालत से निकलेगा, वह सुधरा हुआ रहेगा।
-सुनील कुमार


Date : 13-May-2019

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की भाजपा सरकार जाने के बाद भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने लगातार पिछले बरसों में हुए गलत सरकारी कामकाज की कड़ी जांच शुरू करवाई है जिसमें से कुछ मामले लोगों को पहले से मालूम थे, और कुछ मामले अभी सामने आए हैं। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि नई सरकार नया कामकाज करने के बजाय गड़े मुर्दों को उखाडऩे का काम कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि जिन पुरानी मौतों को लेकर कांग्रेस पार्टी लगातार यह कहते आई थी कि वे कत्ल के मामले थे, अब सरकार में आने के बाद उन मामलों की जांच न करवाना तो विपक्ष के दिनों में जनता से किए गए वायदे के खिलाफ जाना ही होगा। इसलिए हर सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव के पहले के अपने आरोपों और वायदों को पूरा करने के लिए अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और अगर लोग गुनहगार मिलते हैं, तो उन्हें सजा भी दिलवानी चाहिए। 

लोकतंत्र में लोग ऐसी सरकार को सज्जन मान बैठते हैं जो बीते बरसों के दूसरी पार्टी के कामकाज की छानबीन न करे, और आगे बढ़ ले। लेकिन सवाल यह है कि हर सरकार आरोपों से बचने के लिए अगर ऐसा ही करते चलेगी, तो सरकार में बैठे लोगों के सरकारी जुर्म आखिर कब कटघरे तक पहुंच पाएंगे? हम इसी जगह पहले भी अपनी सोच लिख चुके हैं कि हर पार्टी को सरकार में आने पर पिछली दूसरी पार्टी की सरकार के कामकाज पर एक खुला जांच आयोग बिठा देना चाहिए, और अपने खुद के लगाए आरोप उसे दे देना चाहिए, और जनता से भी शिकायतें या आरोप बुलवाकर, सुबूत बुलवाकर उस आयोग को दे देना चाहिए। जनता के प्रति जवाबदेही ऐसे ही पूरी हो सकती है कि सत्ता ने जितने किस्म के गलत काम किए थे, उन पर इंसाफ की गारंटी की जाए। 

छत्तीसगढ़ में हो सकता है कि नई सरकार कुछ जांच राजनीतिक हिसाब चुकता करने के लिए भी शुरू कर रही हो। लेकिन जो लोग हिन्दुस्तान की जांच एजेंसियों का हाल जानते हैं, और यहां की अदालतों की संस्कृति और संभावनाएं पहचानते हैं, उनको अच्छी तरह मालूम है कि सौ गुनहगार बचकर निकल जाते हैं, लेकिन किसी बेकसूर को शायद ही कभी सजा होती हो। ऐसे में पिछली सरकार में बहुत ही ताकतवर रहे हुए, और सक्षम-संपन्न हो चुके लोगों को आज जांच से बचने के लिए पूरा मौका हासिल है, उनके पास महंगे वकील हैं, जांच में पलट जाने वाले गवाह मौजूद हैं, सुबूत वक्त के साथ कमजोर और बहुत कमजोर होते चलते हैं, और ऐसे में किसी बेकसूर को शायद ही कभी सजा हो सके। लेकिन ऐसी जांच का एक दूसरा फायदा यह है कि आज की सरकार के साथ जिन अफसरों को इन पांच बरस काम करना है, उनके दिमाग में यह बात साफ रहेगी कि पांच बरस बाद जो सरकार आएगी, वह अगर आज की सरकार से अलग होगी, तो वह भी इन पांच बरसों के कामों की जांच करवा सकती है। किसी भी सरकार में गलत काम उसी वक्त अंधाधुंध बढ़ते हैं जब सरकार हांक रहे लोगों को यह भरोसा होने लगता है कि वे अमर हो चुके हैं, और कुर्सी पर उनका कब्जा धरती के खत्म होने तक जारी रहने वाला है। पांच-पांच बरस में सरकार बदल जाना इस हिसाब से ठीक है कि सत्ता पर बैठे लोग एक दबाव के तहत काम करते हैं। यह दबाव राजनीतिक दबाव नहीं रहता जो कि सत्ता के दूसरे या तीसरे कार्यकाल में सब कुछ काबू कर लेता है, यह दबाव एक कानूनी दबाव रहता है कि पांच बरस के भीतर-भीतर सारा भांडाफोड़ होने का पूरा खतरा रहेगा। 

कोई भी सरकार अगर राजनीतिक बयानबाजी से बचे, और महज जांच एजेंसियां खुली आजादी से अपना काम करें, तो जनता के खजाने पर डकैती डालने वाले नेताओं और अफसरों को कटघरे में लाया भी जा सकता है, और सरकार दुश्मनी के आरोप से बच भी सकती है। हमारा ख्याल है कि जब पिछली सरकार के कामों के खिलाफ पुख्ता सुबूत हों, तो फिर नई सरकार को कड़े बयान देने की जरूरत नहीं पडऩी चाहिए। जब जांच एजेंसियां ही पिछले सत्तारूढ़ लोगों को जेल भेजने जितने सुबूत जुटा रही हैं, तो राजनीतिक बयान देकर जांच का वजन कम नहीं करना चाहिए। आगे-आगे देखें, जांच से अदालतों में क्या साबित होता है। 


Date : 12-May-2019

लोकसभा चुनाव अपने आखिरी दौर में है, और जो बात खुलकर सामने आई है वह भाजपा की तैयारी की है। पूरे चुनाव प्रचार, अभियान, मीडिया और सोशल मीडिया के इस्तेमाल, इन तमाम चीजों में नरेन्द्र मोदी की जो तैयारी दिखती है, वह चुनावी नतीजों को जाहिर तौर पर प्रभावित करने वाली है। नतीजे चाहे जो हों, मोदी अपनी तैयारियों के चलते अधिक वोट पाएंगे, और कांग्रेस पार्टी उनकी सबसे बड़ी विरोधी पार्टी होने के नाते अपनी कमजोर तैयारियों की वजह से संभावित वोटों को खोएगी। लोकतंत्र में वोट पाने के तमाम लोकतांत्रिक औजार सभी लोगों को बराबरी से हासिल हैं, लेकिन इसके बावजूद अगर कोई पार्टी अपनी चतुराई से उसका बेहतर इस्तेमाल कर लेती है, तो यह उसकी खामी नहीं, उसकी खूबी ही कहलाएगी। 

यह बात आज कुछ लोगों को थोड़ी सी अटपटी लग सकती है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पर केन्द्रित इस पूरे चुनाव अभियान में कुछ बड़ी चूक भी की हैं, जिनमें से एक कल ही सामने आई है। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक में अपनी रणनीतिक सूझबूझ को वायुसेना अफसरों पर लादने सरीखी एक बात कही जिसने उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया पर मखौल का सामान बना दिया है। लेकिन इस बड़बोलेपन से परे उन्होंने आम जनता की जनधारणा पर असर डालने के लिए जितनी मेहनत से तरकीबें जुटाई हैं, वे भाजपा को चुनाव जीतने की एक मशीन की तरह स्थापित कर रही हैं। जिस तरह उन्होंने एक फिल्म अभिनेता को दिए गए एक तथाकथित गैरराजनीतिक साक्षात्कार का इस्तेमाल किया, और कई दिनों तक खबरों में वही छाया रहा। जिस तरह उन्होंने एक नमो चैनल शुरू करवाया, और बाद में चुनाव आयोग ने उसे गैरसमाचार चैनल मान लिया, और सिर्फ विज्ञापन चैनल का दर्जा देकर उसे चुनाव आचार संहिता से छूट दे दी। ये तमाम बातें एक बहुत ही नकारात्मक माहौल के बीच नरेन्द्र मोदी की अनोखी कोशिशें हैं जो कि जीत के उनके वोट बढ़ाने में मदद करेंगी, या उनकी हार को छोटा बनाने का काम करेंगी। 

चुनाव के बीच कौन सी बातें नहीं कहनी चाहिए, किस तरह नहीं कहनी चाहिए, इसका अगर कोई डिग्री कोर्स शुरू हो, तो उसमें कांग्रेस के बहुत से नेता पढ़ाने के लिए जा सकते हैं। इस बार मणिशंकर अय्यर को कांग्रेस ने किसी अज्ञातवास पर भेजा हुआ है, तो मानो उनकी कमी दूर करने के लिए सैम पित्रोदा आ गए, और अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में सिक्खों के जख्मों पर नमक रगड़कर तब माफी मांगी जब राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से ऐसा करने को कहा। कांग्रेस पार्टी इस तरह की चूक से उबर नहीं रही है, हालांकि भोपाल में दिग्विजय सिंह ने अपना मुंह तकरीबन बंद रखने में कामयाबी पाई है, और उनकी बातों से कोई बखेड़ा खड़ा नहीं हो पाया है। इसकी एक वजह शायद यह भी रही कि वे साधुओं के बीच बैठकर मंत्र पढऩे में लगे रहे, और उस बीच कोई गलत बात कहने की गुंजाइश भी नहीं थी। भाजपा और उसके नेता तो अवांछित बातों को कहने के आदी रहे हैं, और उनकी ऐसी बातें उनके औजार-हथियार भी हैं, लेकिन कांग्रेस को अनर्गल बातों से कोई फायदा नहीं होता है, और उसे अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। 

मीडिया से लेकर सोशल मीडिया, और इन दिनों स्मार्टफोन पर लोकप्रिय मैसेंजर सर्विसेज का जो इस्तेमाल भाजपा ने किया है, उसे देखकर कांग्रेस और बाकी पार्टियों को काफी कुछ सीखने की जरूरत है। कल ही एक टीवी इंटरव्यू में राहुल गांधी ने यह मंजूर किया है कि वे कुछ बातें मोदी से भी सीखते हैं कि कुछ कामों को कैसे-कैसे नहीं करना चाहिए। उन्हें यह भी सीखने की जरूरत है कि जनधारणा प्रभावित करने के कुछ काम कैसे-कैसे किए जाएं। अगर जनता की लहर ही किसी एक नेता, पार्टी, या गठबंधन के खिलाफ हो, या उसके साथ हो, तो छोटे-मोटे सभी औजार-हथियार बेकार हो जाते हैं। लेकिन अगर मामला कांटे की टक्कर का हो, तो ये सब बहुत असरदार हो जाते हैं। इन चुनावों के नतीजे तो अब तकरीबन तय हो चुके हैं, लेकिन कांग्रेस जैसी पुरानी, बड़ी, और संभावनाओं वाली पार्टी को जीत या हार के बाद आगे के लिए चुनावी हुनर हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 11-May-2019

दिल्ली के लोकसभा चुनाव में एक भूतपूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर भाजपा के उम्मीदवार हैं, और उन पर आम आदमी पार्टी ने यह आरोप लगाया है कि उन्होंने आप उम्मीदवार एक महिला के चाल-चलन पर बहुत ओछी और गंदी बातें लिखकर उसका पर्चा बंटवाया है। ऐसा एक पर्चा आप ने प्रेस कांफ्रेंस में पेश भी किया है। दूसरी तरफ गौतम गंभीर ने इसके जवाब में कहा है कि अगर इसके पीछे उनका हाथ साबित हो जाए तो वे अपनी उम्मीदवारी से, चुनाव मैदान से हट जाएंगे। इस पर्चे की हकीकत चाहे जो हो, कम से कम दो दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर के साथ आए हैं कि वे उन्हें बीस बरस से जानते हैं, और उनके मन में महिलाओं के लिए जो सम्मान उन्होंने देखा है, उसके चलते यह मुमकिन नहीं लगता कि वे ऐसा पर्चा बंटवाएंगे। दूसरी तरफ दिल्ली में जिस कांग्रेस को आम आदमी पार्टी ने बेदखल किया था, उस कांग्रेस की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे, भूतपूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने कहा है कि गौतम गंभीर ऐसी गिरी हरकत नहीं कर सकते।

कुछ ऐसा ही समर्थन केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली ने सेक्स-शोषण के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का किया था, और सुप्रीम कोर्ट के कुछ दूसरे वकीलों ने भी सीजेआई का बचाव किया था। छत्तीसगढ़ के लोग इस बात को भूल गए हैं कि जिस दिन आसाराम पर एक नाबालिग छात्रा ने बलात्कार का आरोप लगाया था, और जिस दिन जुर्म दर्ज हुआ था, या गिरफ्तारी हुई थी, उस दिन छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सार्वजनिक बयान दिया था कि यह एक हिंदू संत को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश है। अब सवाल यह उठता है कि एक नाबालिग छात्रा के आरोप को बिना किसी जांच के राजनीतिक साजिश करार देना क्या उस नाबालिग लड़की के खिलाफ लांछन लगाना नहीं है? लेकिन सार्वजनिक जीवन ऐसी मिसालों से भरा पड़ा है जिनमें लोगों के खिलाफ बेबुनियाद आरोप ऐसी लापरवाही से लगाए जाते हैं जिन्हें साबित करना नामुमकिन रहता है।

दिल्ली के इस ताजा पर्चे को लेकर ही बात करें, तो ऐसे गुमनाम पर्चे को लेकर कोई यह कहे कि उसके खिलाफ किसी ने ऐसा पर्चा बंटवाया है, तो वह तो समझ में आने लायक बात है। लेकिन ऐसे पर्चे को लेकर कोई भी पार्टी या नेता जब किसी पार्टी या नेता पर आरोप लगाते हैं, तो उनसे उसकी बुनियाद भी पूछना चाहिए। मीडिया अगर महज हरकारे की तरह एक के बयान दूसरों तक, और दूसरे के बयान तीसरे तक पहुंचाते रहे, तो उसकी अपनी जिम्मेदारी कहां चली जाती है? न तो ऐसे आरोप किसी के नाम लेकर लगाने पर उसकी खबर बिना सवालों के छापनी चाहिए, और न ही किसी को मिलने वाले चरित्र प्रमाणपत्र को महत्व देना चाहिए। पहली बार पकड़ाने के पहले तक तो हर बलात्कारी गैरमुजरिम ही दिखते रहता है। ऐसे कोई भी आरोप या बयान सामने आने पर मीडिया को न सिर्फ उन पर सवाल करने चाहिए, बल्कि बयानों के साथ अपने सवाल भी छापने चाहिए। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होते चल रहा है कि मीडिया अपने सवालों को भी लोगों के सामने रखे। सवाल जवाबों के मुकाबले कभी कम मायने नहीं रखते, और अक्सर ही सवालों के साथ आने पर ही वे जवाब मायने रखते हैं जो कि सवालों के जवाब में कहे गए हैं।
-सुनील कुमार


Date : 10-May-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के शहर से सटे हुए औद्योगिक इलाके में पिछले तीन दिनों में दो बड़े कारखानों में हादसे हुए, और कई लोग बुरी तरह जख्मी हुए हैं, कुछ मौतें भी हुई हैं। यह तो राजधानी से लगे हुए कारखानों का हाल है, लेकिन इससे परे भी ऐसी ही हालत है, और पिछले एक साल में प्रदेश के सबसे बड़े कारखाने, केन्द्र सरकार के भिलाई इस्पात संयंत्र में एक से अधिक ऐसे बड़े-बड़े हादसे हुए हैं जिनमें बड़े-बड़े अफसरों की लापरवाही उजागर हुई है, और बड़ी संख्या में मौतों की वजह से इन अफसरों पर जुर्म कायम हुआ, इनकी गिरफ्तारी हुई, और बीएसपी के मुखिया को बदला भी गया। 

कुल मिलाकर उद्योगों में हालत यह है कि मजदूर कानूनों से लेकर औद्योगिक सुरक्षा तक, और औद्योगिक प्रदूषण से लेकर दूसरे नियम-कायदों तक सबको कुचलकर रख दिया गया है। दरअसल बड़े उद्योगों का चुनावी चंदे में बड़ा योगदान रहता है, और यह योगदान मुफ्त में तो किसी को मिलता नहीं है, सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्ष, या तो सरकार की मेहरबानी के लिए मिलता है, या फिर उद्योगों के अपराधों पर विपक्षी चुप्पी बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों को मिलता है। चुनाव के वक्त नेता और पार्टियां पत्थर से तेल निकालने के अंदाज में उद्योगों से उगाही करते हैं, और फिर जनता के फेफड़े इनके हवाले कर देते हैं, मजदूरों के बदन इनके हवाले कर देते हैं, और पानी से लेकर आसमान तक को जहरीला बनाने की इजाजत इनको दे देते हैं। पिछले बरसों में लगातार यह देखने में आया कि सरकार की प्रदूषण रोकने की मशीनरी का इस्तेमाल नापसंद कारखानेदारों की बिजली काटने के लिए किया गया। कई बरस तक लगातार पिछली सरकार एक दारू कारोबारी की नापसंद पर उसके मुकाबले के एक दूसरे दारू कारोबारी का शराब कारखाना बंद करवाने का औजार बनी रही। सरकारी अमला ऐसे कारोबारी मुकाबले का चपरासी बना काम करते रहा। अब जब दो दिनों में राजधानी के बड़े कारखानों में दो हादसे हुए हैं, तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि बाकी कारखानों में भी औद्योगिक सुरक्षा के इंतजाम जांच लिए जाएं। 

साथ-साथ यह भी जरूरी है कि आबादी पर जहरीला धुआं उगलने वाले, खाली जगहों पर औद्योगिक कचरा फेंकने वाले कारखानों पर कड़ी कार्रवाई भी की जाए। वैसे भी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव अब पांच बरस बाद ही आने हैं, ऐसे में सरकार को कड़ाई से कानून का पालन करवाना चाहिए। प्रदूषण निवारण मंडल सत्ता के तेवरों से चलने वाली एक बोगस संस्था बन चुकी है, और इसे फिर से असरदार संस्था बनाना चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ खनिजों पर आधारित कारखानों का प्रदेश है, और इन उद्योगों का एक मिजाज ही प्रदूषण फैलाने का रहता है। कोरबा से लेकर रायगढ़ तक, और रायपुर से लेकर भिलाई तक, चारों तरफ अंधाधुंध प्रदूषण है, मजदूर कानूनों और औद्योगिक सुरक्षा का दीवाला निकला हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार कई दूसरे मामलों में बड़े कड़े तेवर दिखा रही है, इस मामले में दिखाकर दिखाए तो जानें। 
-सुनील कुमार


Date : 09-May-2019

चुनाव करीब आने से हिन्दुस्तान में मौजूदा सरकार की नाकामयाबी के बहुत से आंकड़े सामने आते ही हैं। इनमें से एक आंकड़ा गंगा की सफाई का है जिसके बारे में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सहित दूसरी विशेषज्ञ संस्थाओं का कहना है कि इन पांच बरसों में गंगा की सफाई नहीं के बराबर हुई है। यह मौका गंगा सफाई मंत्री उमा भारती की उस सार्वजनिक कसम को याद करने का भी है जिसमें उन्होंने अपने कार्यकाल में गंगा की सफाई न होने पर जलसमाधि लेने की घोषणा की थी। खैर, वे काम चाहे न कर पाई हों, उन्हें जलसमाधि का उलाहना देना आत्महत्या के लिए उकसाना होगा, इसलिए हम वह काम बिल्कुल करना नहीं चाहते हैं। राजनीति में लोग कई तरह की बातें करते हैं, कई लोग कहते हैं कि उनका किया फलां काम कामयाब न हो तो उन्हें खम्भे से टांग दिया जाए। लेकिन ऐसी बातों को भूल जाना ही ठीक रहता है। राजनीति तो होती ही झूठ बोलने के लिए है, वोटर तो होते ही धोखा खाने के लिए हैं, और इसे अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अब गंभीरता से लेने पर तो मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि देश में कालाधन खत्म करने के लिए हजार रूपए के नोट बंद किए गए थे, तो फिर दो हजार के नोट क्यों शुरू किए गए? लेकिन ऐसे बेकार के सवालात मन में नहीं आने देना चाहिए क्योंकि जीना तो इसी देश में है, और बेचैनी इतनी क्यों बढ़ाई जाए कि वह बेकाबू हो जाए? आखिर देश के आधा दर्जन राज्यों के बस्तर जैसे जंगल के इलाकों में जो नक्सल-हिंसा चल रही है, वह बेकाबू-बेचैनी का ही तो नतीजा है। इसलिए लोगों को अपनी बेचैनी काबू में रखनी चाहिए, वायदों का चाहे जो हो वोट डालना चाहिए। 

जहां तक गंगा की सफाई का सवाल है, तो गंगा को साफ करने के नाम पर पिछले बरसों में जितने, और जैसे-जैसे नेताओं ने इस मासूम नदी में डुबकी लगाई है, उसी से यह साफ हो जा रहा था कि गंगा ऐसे में साफ नहीं होगी, बल्कि और गंदी ही होती चली जाएगी। जैसे-जैसे लोग अपने पाप का बोझ लेकर गंगा में डुबकी लगाकर उस गधे की तरह हल्का होकर निकलते हैं जिसने पीठ पर लदी नमक की बोरी का बोझ हल्का करने के लिए पानी में डुबकी लगा ली थी, वैसे पापियों के कुकर्म धोते-धोते राम तेरी गंगा मैली तो हो ही जानी थी। अब इसके साफ न होने में हैरानी क्यों होनी चाहिए? हैरानी इस बात पर होनी चाहिए कि लोग इसे साफ करने की कसम क्यों खाते हैं? कुछ लोग आदतन कसम खाने वाले होते हैं, और वे कभी सोनिया के प्रधानमंत्री बनने या संसद में पहुंचने पर भी सिर मुंडाने की कसम खाए हुए रहते हैं, और बचपन की यह बुरी आदत आसानी से जाती नहीं है।

लेकिन एक बार फिर नदी के गंदे होने की तरफ लौटें, तो यह बात साफ होती है कि दुनिया में जो करोड़ों किस्म के जीव-जन्तु हैं, उनमें इंसान नाम के प्राणी ही सबसे अधिक नाशुकरे हैं, अहसानफरामोश हैं। दुनिया का इतिहास जब लिखा गया, तो उसमें हर जगह यह बात लिखी गई कि मानव सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई। इंसान नदी के किनारे ही फसल उगाते हुए बड़े हुए, मछलियां मारकर खाते हुए बड़े हुए, नावों में दूर-दूर तक जाकर दुनिया को देखते रहे। सारी सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुईं, और इंसान की सारी असभ्यता से नदियों का विकास खत्म हुआ। ऐसा भी नहीं कि नदियों को इंसान के हाथों किसी विकास की जरूरत थी। वे तो इंसानों के आने के पहले से, उसके पुरखों, बंदरों के वक्त से, बंदरों के भी और पहले से मौजूद थीं। उन्हें बचने या बढऩे के लिए किसी की जरूरत नहीं थी। वे धरती का एक हिस्सा थीं, और इंसानी नस्ल न भी आई होती, तो भी नदियां लाखों बरस पहले की तरह आज भी जिंदा रहतीं, उनकी लहरें अठखेलियां भरती रहतीं। लेकिन जिन नदियों से इंसान ने बस लिया ही लिया, लाखों बरस तक जिनको दुहा, उन नदियों को पिछले सौ बरस के भीतर ही इंसानों ने इस कदर तबाह कर दिया कि उनकी हालत अब देखने लायक भी नहीं रह गई। गंगा अब पाप धो नहीं सकती, चमड़ी की बीमारी दे जरूर सकती है। कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि दो से तीन लाख साल पहले इंसान आए थे, और इन लाखों बरस नदियों ने इंसानों को आज का इंसान बनने में मदद की, सभ्यता और टेक्नालॉजी को बढ़ाने में मदद की, इंसानी जरूरतों को पूरा किया, और पिछले महज एक सौ बरस में शहरी गंदगी और कारखानों से निकलता जहर नदियों में डालकर इंसान ने इतने लाख बरस के अहसानों पर पेशाब कर दी। नदियों को इंसान अगर अकेला ही छोड़ देते, तो वे लाखों बरस पहले की तरह साफ-सुथरी बहती रहतीं। लेकिन यह इंसान का आम मिजाज है कि जिस थाली में वे खाते हैं, उसी में छेद भी कर देते हैं, थूक भी देते हैं। इसलिए लाखों बरस के नदियों के अहसान के मुकाबले इंसान ने उनमें शहरी गंदगी के नालों को सीधा खोल दिया, और कारखानों की गंदगी को भी नदियों में सीधा डाल दिया। नदियों के किनारे, नदियों की मदद से सभ्यता विकसित हुई, और पिछले सौ बरस में इस असभ्य और बेईमान नस्ल ने नदियों को तबाह भी कर दिया। अब इनका इस्तेमाल बेईमानी की कसम खाने के लिए भी होता है, और तस्वीरें खिंचवाकर वोट पाने के लिए भी। शहरी गंदगी और औद्योगिक गंदगी के साथ-साथ राजनीतिक नीयत की गंदगी भी इसे और अधिक बर्बाद करते चल रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 08-May-2019

सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिरी एक साफ-साफ हलफनामा दाखिल करके इस बात के लिए माफी मांगी है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चौकीदार चोर है के नारे में सुप्रीम कोर्ट का जो हवाला दिया था, वह गलत था। भारत के चुनाव शुरू होने के महीनों पहले से चौकीदार होने, और चौकीदार के चोर होने के आमने-सामने के नारे चल रहे थे। इन्हीं नारों को रात-दिन दुहराते हुए राहुल गांधी एक आमसभा में बोल गए कि अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है। जबकि सुप्रीम कोर्ट में रफाल की जो सुनवाई चल रही थी, उसमें अदालत ने अपने लिखित आदेश में, या जजों ने जुबानी भी ऐसी कोई बात नहीं कही थी। 

पिछले बरसों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सहित बहुत से नेताओं को अपने दिए गए बयानों को लेकर विरोधियों से मानहानि के मुकदमों में माफी मांगनी पड़ी है, और बहुत से नाजायज बयान तो अदालतों तक जा भी नहीं पाते हैं क्योंकि जिनके खिलाफ ये रहते हैं वे इतनी जहमत नहीं उठाते कि महंगी अदालती कार्रवाई में पड़ें, और फिर अदालती रफ्तार की वजह से आगे और तकलीफ पाएं। अधिकतर मामले तो आए-गए हो जाते हैं, लेकिन इन दिनों कांग्रेस और भाजपा के बीच जितनी कटुता चल रही है, उसमें यह जाहिर है कि कोई दूसरे की किसी नाजायज बात को बर्दाश्त करने की हालत में नहीं है।

कुछ ऐसा ही मामला हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुआ जहां कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ताओं के बयान कानूनी नोटिस की वजह बने, और फिर थाने तक पहुंचे। दोनों ही पार्टियों ने दूसरे के एक-एक प्रवक्ता के टीवी-बहिष्कार की घोषणा की, और कटुता खासी बढ़ चुकी है जितनी कि दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा के बीच है। यह कोई नई बात नहीं है और पिछले कई बरस से न सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के बीच, बल्कि दूसरी कई पार्टियों के बीच छत्तीसगढ़ और बाकी देश में बातचीत के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, और अभी ताजा मिसाल बंगाल की है जहां मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तूफान के मुद्दे पर भी प्रधानमंत्री से बात करना मुनासिब नहीं समझा। ऐसा अनबोला चाहे जिसकी गलती से हो रहा हो, चाहे सबकी गलती से हो रहा हो, बहुत ही अलोकतांत्रिक है, और हिंदुस्तान जैसे संघीय लोकतंत्र में यह कुल मिलाकर जनता के लिए नुकसानदेह है। 

जब बड़े-बड़े नेता एक-दूसरे के खिलाफ, एक-दूसरे के गुजरे हुए और शहीद नेताओं के खिलाफ गंदी जुबान में बात करें, तो यह जाहिर है कि बातचीत का रिश्ता बाकी रहना मुमकिन नहीं है। लेकिन उससे इन दोनों पार्टियों के बजाय, या ऐसी तमाम पार्टियों के बजाय अधिक नुकसान जनता के उन मुद्दों का होता है जिन पर कभी संसद के भीतर सबको मिलकर बात करना चाहिए, या उन मुद्दों का होता है जिन केंद्र और राज्य को मिलकर बात करना जरूरी होता है। ऐसी तनातनी, इतना परहेज, इतनी कड़वाहट पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। लोग अपने जख्मों को लेकर, दूसरे के हमलों को लेकर, हथियारों और शब्दों को लेकर, आज की बात और बीते कल के इतिहास को लेकर एक-दूसरे से इतना परहेज पाल चुके हैं कि उनके सदन के भीतर या बाहर बात करने की कोई जमीन बाकी नहीं है। यह सिलसिला बहुत खराब है जब लोग एक-दूसरे को, एक-दूसरे के गुजरे हुए पुरखों को गालियां देकर भी बात कर पाते हैं, उसके बिना नहीं।
-सुनील कुमार


Date : 07-May-2019

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर सेक्स-शोषण के आरोप लगाने वाली एक महिला मातहत की शिकायत की जांच सुप्रीम कोर्ट की जजों की कमेटी ने जिस अंदाज में करके उसे खारिज कर दिया है, वह हक्का-बक्का करने वाली बात है। इस मुद्दे पर हम पिछले दिनों इसी जगह पर दो बार लिख चुके हैं, और लिखने को कोई बुनियादी बात और बची नहीं है सिवाय इसके कि उसके बाद इस जांच की रिपोर्ट आ गई है जिसमें इन दिनों खासे फैशन में चल रही क्लीनचिट चीफ जस्टिस को भी दे दी गई है। यह अलग बात है कि आज दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिलाएं पोस्टर लेकर प्रदर्शन कर रही हैं, और इस पूरी जांच पर संदेह करते हुए इसका विरोध कर रही हैं। देश की जिस सबसे बड़ी अदालत से महिलाएं अपने हक के लिए इंसाफ की उम्मीद करती हैं, उसी अदालत में अपने मुखिया के आरोपों से घिर जाने पर जिस अंदाज में यह जांच की, जिस अंदाज में मुखिया को आरोपों से बरी किया, और शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए, उन सबसे यह बात जाहिर हुई कि जब अपने पर जोखिम आता है, तो सुप्रीम कोर्ट सामूहिक रूप से अपने एक साथी, या मुखिया की इज्जत बचाने को बेइंसाफी पर उतारू हो सकता है, हुआ है। 

इस पूरे सिलसिले ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। एक किसी मामूली से दफ्तर में भी अगर एक महिला सेक्स-शोषण का आरोप लगाती है, तो उसकी जांच के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी लंबी-चौड़ी प्रक्रिया तय की हुई है, और जब यह शिकायत एक हलफनामे की कानूनी शक्ल में सामने आई, तो इसे कुचलने के लिए मुख्य न्यायाधीश ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से इसके खिलाफ बयान जारी करवाया, उसके बाद खुद इसकी सुनवाई शुरू की, और फिर खुद जजों की एक कमेटी छांटी जो कि इस मामले की तथाकथित सुनवाई करेगी। पूरी तरह से अविश्वसनीय और धुंध से घिरी हुई यह प्रक्रिया शुरू से ही मानो मुख्य न्यायाधीश को बचाने की नीयत से की जा रही थी, और कानून की हमारी मामूली समझ यह कहती है कि यह प्रक्रिया अपने-आपमें अदालत की एक गंभीर अवमानना थी, और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अदालत की अवमानना का एक मामला अलग से बनता है। और यह जाहिर है कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की एक बहुत ही साख वाली महिला वकील, इंदिरा जयसिंह, ने जितने खुलकर इस क्लीनचिट का विरोध किया है, और जिस तरह कुछ महिला संगठन सड़कों पर हैं, हमारा ख्याल है कि इस क्लीनचिट से यह मामला खत्म होने वाला नहीं है, और यह लड़ाई आगे जाएगी, और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई शिकायकर्ता महिला के हलफनामे के आने पर जितने संदेह से घिरे थे, आज वे इस क्लीनचिट के बावजूद उससे अधिक संदेह से घिर गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी में जिन जजों ने इस मामले की सुनवाई की है, उन्होंने ने भी इस महिला की आपत्ति के बावजूद उसे कानूनी मदद या कानूनी-इजाजत न देकर अपनी साख को घटाया है, और अपने नतीजों को संदेह से खुद ही घेर लिया है। यह पूरा सिलसिला भारी बेइंसाफी का दिखता है, और यह रिपोर्ट खारिज कर देने के लायक है, एक बाहरी जांच, निष्पक्ष जांच, कानूनी प्रक्रिया से जांच जरूरी है, और उसके बिना यह मामला ठंडा नहीं पड़ेगा। ऐसे संदेह से घिरा हुआ सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसले देगा, उनकी विश्वसनीयता भी सीमित रहेगी, कम रहेगी, या नहीं रहेगी। एक कामकाजी महिला ने देश में सबसे ऊपर के स्तर पर शोषण का जो एक मामला कानूनी प्रक्रिया से सामने रखा था, और अपने परिवार पर जितने किस्म के जुल्म की बात सामने रखी थी, वे सब एक तटस्थ जांच कमेटी के लायक बातें थीं, और सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुखिया की अगुवाई में इन तमाम बातों की गंभीरता को निहायत नाजायज तरीके से खारिज किया, और इंसाफ की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। आने वाले वक्त बताएगा कि इतिहास में दुनिया की इस एक सबसे बड़ी अदालत का यह रूख और यह रवैया बहुत बुरी तरह दर्ज होगा।
-सुनील कुमार


Date : 06-May-2019

पिछले कुछ दिनों में लोकसभा चुनाव प्रचार में हिन्दुस्तानी फौज का जिस तरह जिक्र किया गया, और वोटों के लिए फौज की कार्रवाई, या बहादुरी को दुहा गया, वह बहुत अफसोस की बात है। यह सिलसिला पुलवामा में हुए आतंकी हमले की चर्चा से शुरू हुआ, वहां शहीद होने वाले दर्जनों सैनिकों की शहादत पर वोट मांगना खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया, और इस बात को बढ़ाकर पाकिस्तान पर हुए सर्जिकल स्ट्राईक तक पहुंचाया। इस बीच चुनाव आयोग यह खोखली नसीहत देते रहा कि फौज का जिक्र वोटों के लिए न किया जाए, लेकिन उस नसीहत को कचरे की टोकरी में फेंकते हुए मोदी के मंत्री और एक भूतपूर्व फौजी राज्यवर्धन राठौर ने यहां तक कह दिया कि पूरी फौज भाजपा और मोदी के पीछे खड़ी हुई है। आम लोगों की इस पर प्रतिक्रिया सामने आई कि क्या अब रोड शो में फौज भी शामिल होगी? लेकिन सर्जिकल स्ट्राईक का लगातार चुनावी इस्तेमाल कांग्रेस को भी इस बात के लिए मजबूर कर दिया गया कि वह अपने दस बरस के कार्यकाल में पाकिस्तान पर की गई कई सर्जिकल स्ट्राईक को तारीखों और जगह के साथ जनता के सामने रखे, और कई भूतपूर्व फौजी आला अफसर सामने आए जिन्होंने कहा कि मोदी के पहले उन्होंने सर्जिकल स्ट्राईक की अगुवाई की थी, खुद हमला किया था। 

दरअसल फौज को महिमामंडित करना, और फौजी कार्रवाई के लिए अपने आपको महिमामंडित करना राष्ट्रवाद के उस बिखराए जा रहे सैलाब के साथ मेल खाता है जिसकी लहरों पर सवार होकर मोदी सरकार में दुबारा आने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। यह हिन्दुस्तान का पहला चुनाव है जिसमें फौज और फौजी कार्रवाई का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है, और जब मोदी के पहले के वक्त के सर्जिकल स्ट्राईक गिनाए जा रहे हैं, तो मोदी उन्हें अपनी आमसभाओं में वीडियो गेम कहते हुए न सिर्फ खारिज कर रहे हैं, बल्कि पिछले फौजी जनरलों के किए हुए काम को झूठा और अविश्वसनीय भी बता रहे हैं। हिन्दुस्तान जैसे मजबूत लोकतंत्र में फौज की गैरराजनीतिक भूमिका के लिए यह एक खतरनाक नौबत है कि आज की फौज को सच और कल की फौज को झूठा करार दिया जाए, फौज के नाम पर नेताओं द्वारा किए गए अलग-अलग कई किस्म के दावों के बीच सच को समझने की कोशिश को देश के साथ गद्दारी करार दिया जाए, और फौजी कार्रवाई को जनता के बीच इतने खुलासे के साथ उजागर करके वोट मांगे जाएं। लोगों को याद होगा कि कुछ समय पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक बयान दिया था कि पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक में न तो पाकिस्तान के कोई फौजी मारे गए, और न ही वहां के नागरिक मारे गए। उनकी अंग्रेजी में सिविलियन शब्द का इस्तेमाल हुआ था, और बाद में बारीकी से फर्क करने वाले कुछ लोगों ने उसे सिटीजन शब्द से अलग कहा। इस बारीकी से भी इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि सुषमा ने उस हमले में किसी भी पाकिस्तानी के न मरने की बात खुद होकर कही थी। अब अगर बाकी मोदी-मंत्रियों के मुताबिक और भाजपाध्यक्ष अमित शाह के मुताबिक अगर उस हमले में सैकड़ों लोग मारे गए थे, तो क्या वे तमाम सैकड़ों लोग पाकिस्तान से बाहर के थे? और अगर तमाम आतंकी गैरपाकिस्तानी हैं, तो फिर भारत का आतंक के पीछे पाकिस्तानियों का हाथ होने का दावा कमजोर होता है। कुल मिलाकर यह सिलसिला भारत के लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। यहां फौज का इस्तेमाल लुभावने प्रचार के लिए एक राजनीतिक हथियार की तरह किया जा रहा है। फौज के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा आने से क्या होता है यह पाकिस्तान पिछली आधी सदी से भुगत ही रहा है। अभी कल ही वहां के एक नागरिक ने फौज के प्रवक्ता के बयान को राजनीतिक बताते हुए उसके खिलाफ अदालत जाने की बात सोशल मीडिया पर लिखी है। लेकिन हिन्दुस्तान में फौज का, झंडे का, राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान का, राजचिन्ह, गाय वगैरह का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है कि इन सबके एक खास किस्म के सम्मान से ही लोगों का देशप्रेम साबित हो सकेगा, वरना वे गद्दार कहलाएंगे। कुछ फौजी अफसर चुनाव के बीच ही जिस तरह से कश्मीर में आतंकियों को मारने को लेकर प्रेस कांफ्रेंस लेकर बयान जारी कर रहे हैं, वह भी कुछ अटपटी बात है। लोकतंत्र में फौज को सरहद पर या बैरकों में ही रहने देना चाहिए, उनका चुनावी इस्तेमाल बहुत खतरनाक है, नाजायज तो है ही।
-सुनील कुमार


Date : 05-May-2019

इस बार का हिन्दुस्तानी आम चुनाव अभियान शायद आजाद भारत का सबसे ही गंदा चुनाव है जिसमें लोगों ने घटिया बयान देने का रिकॉर्ड कायम करने का बीड़ा उठाया हुआ दिखता है। देश में यह पहला मौका है जब सरहद पर लगातार मार खाने वाले हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान पर की गई एक सर्जिकल स्ट्राईक को देश का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है, और उनके एक भूतपूर्व फौजी मंत्री ने पूरी की पूरी भारतीय सेना को भाजपा और मोदी के खिलाफ खड़े बताया है। चुनाव आयोग एक कठपुतली की तरह फौज के चुनावी-इस्तेमाल को देख रहा है, और इस गंदगी पर क्लीनचिट जारी करने के लिए रात-रात जागकर ओवरटाईम भी कर रहा है। जो लोग पाकिस्तान को एक दुश्मन मुल्क मानकर तबाह करने के लिए हवा में बांहें फडफ़ड़ाते हैं, उनकी बांहों के बीच के सिर को यह याद रहना चाहिए कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तान से दो-दो मोर्चों पर एक साथ जंग करके, पाकिस्तान के दो टुकड़े करके, बांग्लादेश बनाकर भी इंदिरा गांधी ने उसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था। और आज जब पाकिस्तान पर हुई एक सर्जिकल स्ट्राईक को अनोखी, अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, अकेली, और तबाही लाने वाली बताकर उसका चुनावी फतवा जारी किया जा रहा है, तो उसके साथ-साथ इस सर्जिकल स्ट्राईक से हुई तबाही के दावे पर सवाल पूछने वालों को गद्दार भी करार दिया जा रहा है। 

लेकिन मानो यह सब काफी नहीं था, इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल यूपी की एक आमसभा में राजीव गांधी का नाम लिए बिना कहा- आपके पिताजी को आपके राजदरबारियों ने गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन बना दिया था, लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया। यह बयान हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री ने एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री पर उस हालत में लगाया है जब जाहिर तौर पर, और मोदी की याददाश्त के दायरे में भी, राजीव गांधी की हत्या श्रीलंका के लिट्टे-आतंकियों ने बम विस्फोट से की थी, और वे कुछ बरसों के भीतर अपनी मां के बाद देश के ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री हो गए थे जिन्होंने अपने सरकारी फैसलों की वजह से आतंकियों के हाथ शहादत पाई थी। इस मुल्क में एक शहीद प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचारी नंबर वन की तरह मरने वाला कहकर मोदी ने सार्वजनिक जीवन में बयान का जो स्तर बनाया है, वह शायद ही कोई दूसरा प्रधानमंत्री भारत के बाकी भविष्य में छू सके। चुनाव की गंदगी में लोगों के हाथ और मुंह, कपड़े और कमल, सब पर कीचड़ उछला है, लेकिन यह बात भूलना नहीं चाहिए कि लोग आमतौर पर अपनी ही कुर्सी पर पहले बैठे हुए लोगों के नाम कोई गंदी बात कहने से परहेज करते हैं, और यह लोकतंत्र का ही नहीं, इंसानियत का भी एक छोटा सा, और बहुत आम तकाजा है। लेकिन इस चुनाव में नेहरू को कोसना अब बेअसर होने के बाद अब राजीव को कोसा गया, और उनकी शहादत के पल को एक भ्रष्टाचारी का अंत बताया गया। भाषण और बयान का यह स्तर अकल्पनीय है, और इसके बारे में कहने के लिए शब्द काफी नहीं हो सकते, और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को इस सदमे से उबरने में खासा वक्त लगेगा, और इतिहास इसे एक सबसे बुरी बात की तरह अच्छी तरह दर्ज कर ही चुका है। 

जहां तक इतिहास के तथ्यों की बात है, राजीव गांधी को जिस बोफोर्स-आरोप को लेकर नरेन्द्र मोदी यह बात बोल रहे थे, उस बोफोर्स की जांच और सुनवाई में दस से अधिक बरस तक राजीव-विरोधी सरकारें रहीं, लेकिन किसी जांच, किसी अदालती सुनवाई में राजीव गांधी पर कोई आंच नहीं आई है, और ऐसे में देश के लिए शहीद होने वाले एक प्रधानमंत्री को लेकर ऐसी गंदी बात कहकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय आम चुनावों को एक बहुत ही घटिया मौका साबित किया है। उनके पास राहुल गांधी के लगाए हुए आरोपों के जवाब में सोनिया और राहुल के खिलाफ, मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ, प्रदेशों की कांग्रेस सरकारों के खिलाफ बहुत से मुद्दे थे, लेकिन उन्होंने एक नाजायज मुद्दे को अमानवीय तरीके से उठाकर एक निहायत बेइंसाफी पेश की है, और इसने भारत के संसदीय लोकतंत्र की इज्जत घटा दी है। देश के लिए मोर्चों पर शहीद होने वाले लोगों की शहादत को गिना-गिनाकर जिस तरह नरेन्द्र मोदी गली-गली में वोट मांग रहे हैं, उसे देखते हुए देश के लिए शहादत देने वाले प्रधानमंत्री के बारे में इतनी ओछी बात कहना शहादत पर अपनी पूरी सोच को उजागर करना है। राजीव गांधी के वक्त और राजीव गांधी के बाद भाजपा के इतिहास के सबसे सम्माननीय नेता अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री भी रहे, और लगातार संसद में भी रहे। लेकिन उन्होंने कभी भी राजीव की स्मृति का कोई अपमान नहीं किया, और एक सम्मानजनक श्रद्धांजलि ही दी। आज अचानक चुनावी चटखारे लेते हुए मोदी ने जिस जुबान में राजीव गांधी की शहादत की बेइज्जती की है, वह इस देश में न सिर्फ प्रधानमंत्री के ओहदे के लिए, उस ओहदे की तरफ से अभूतपूर्व है, बल्कि शर्मनाक भी है। जिन लोगों के मन में इतिहास को लेकर जरा भी सम्मान है उन्हें 4 फरवरी 2004 की यह खबर देखनी चाहिए जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 64 करोड़ रूपए के बोफोर्स भ्रष्टाचार में क्लीनचिट दी थी। और इसके बाद मोदी सरकार के मातहत सीबीआई ने 13 साल देरी से एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को खुलवाने की कोशिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ही खारिज कर दिया। यह अपील खुद मोदी सरकार आने के बरसों बाद दाखिल की गई थी। आज जब मोदी का बयान टीवी पर लगातार गूंज रहा है, तब हिन्दुस्तान में शायद वे अकेले ऐसे नेता हैं जिन्होंने राजीव गांधी की शहादत को एक भ्रष्टाचारी का अंत करार दिया है। 
-सुनील कुमार