संपादकीय

Date : 19-Nov-2019

मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले का एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें पिछली भाजपा सरकार के एक विवादग्रस्त मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को एक महिला के साथ बताया गया है। इस वीडियो के साथ जो बातचीत मध्यप्रदेश के अखबारों में छपी है वह इस मंत्री के अपने मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह, और उनके परिवार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से भरी हुई भी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज मध्यप्रदेश की कांगे्रस सरकार ऐसे आरोपों की जांच करवाने का काम करे, या इसे छोड़ दे?

हमने पहले देश और कई प्रदेशों की सरकारों को लेकर लगातार यही बात लिखी है कि संविधान की शपथ लेकर जो मंत्री-मुख्यमंत्री सत्ता पर आते हैं, यह उनकी पसंद का मामला नहीं हो सकता कि वे ऐसे आरोपों की जांच करवाएं, या न करवाएं। यह तो पद की संवैधानिक बाध्यता रहती है कि भ्रष्टाचार या किसी गलत काम की जो जानकारी उनके सामने आए, चाहे वह किसी शिकायत की शक्ल में रहे, या फिर वह मीडिया के मार्फत सार्वजनिक रूप से सामने आए, उसकी जांच करवानी ही चाहिए। यह आरोप डराने वाला नहीं होना चाहिए कि विपक्षियों और विरोधियों की जांच के पीछे राजनीतिक दुर्भावना रहती है। जब कोई जुर्म होते हैं, उस जुर्म के कोई सुबूत या गवाह होते हैं, तो उनकी कही हुई बातों के आधार पर जांच जरूर ही होनी चाहिए। अगर सत्ता पर आए लोग विरोधियों से रियायत करते हुए जांच से परहेज करें, तो यह राजनीतिक लेन-देन का एक बड़ा भ्रष्टाचार बन जाएगा।

आज मीडिया, सोशल मीडिया, और तरह-तरह के स्टिंग ऑपरेशनों के चलते हुए बहुत से ऐसे मामले सामने आते हैं जिनके पुख्ता सुबूत ऑडियो-वीडियो शक्ल में मौजूद रहते हैं। इनकी मदद से जांच करके आगे कार्रवाई करना हर सरकार की जिम्मेदारी रहती है, और बहुत से मामलों में जब सरकार कार्रवाई नहीं करती है, तो अदालतें दखल देती हैं। मध्यप्रदेश के ही इस हनीट्रैप मामले में हाईकोर्ट को एक से अधिक बार यह कहना पड़ा कि राज्य सरकार बार-बार जांच अफसर क्यों बदल रही है? राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, सामने आए हुए हर संदिग्ध मामले की जांच तो होनी ही चाहिए। हम पहले भी यह बात लिख चुके हैं कि जब किसी प्रदेश में किसी पार्टी की सत्ता बदलती है, तो विपक्ष से सत्ता पर आने वाली पार्टी के बीते बरसों में लगाए गए अनगिनत ऐसे आरोप रहते हैं जिनमें सत्ता के भ्रष्टाचार को उठाया गया था। सत्ता पर आने के बाद यह उस पार्टी की भी जिम्मेदारी रहती है कि वह अपनी ही उठाई गई बातों को सही साबित करे, और अपने लगाए आरोपों की जांच भी करे। अभी मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले से सत्ता के इतने लोग जुड़े हुए थे कि जिस-जिस वीडियो में जो तथ्य सामने आए, उन तमाम लोगों की कड़ाई से जांच करनी चाहिए क्योंकि सत्ता किसी पार्टी का घरेलू सामान नहीं होती है, वह देश की व्यवस्था रहती है, और उसके बेजा इस्तेमाल पर सजा मिलनी ही चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 18-Nov-2019

सड़कों की जगह पानी की नहरों वाले इटली के वेनिस शहर के इलाके की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक चल रही थी, और वहां एक पार्टी के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में विचार करने का प्रस्ताव रखा। इसे दूसरी बड़ी पार्टियों ने खारिज कर दिया। बैठक चल ही रही थी। कुदरत की चेतावनी का शायद दुनिया के इतिहास का इतना बड़ा दूसरा मामला दर्ज न हुआ हो, बैठक में प्रस्ताव खारिज हुआ, जलवायु परिवर्तन के खतरों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई, और दो मिनटों के भीतर बैठक के कमरे में पानी भरना शुरू हो गया, देखते ही देखते पानी टेबिल तक पहुंच गया। और यह किसी साजिश के तहत किसी टंकी से लाकर भरा गया पानी नहीं था, यह समंदर से जुड़ी हुई वेनिस की नहरों से आया हुआ पानी था जिसने पूरे शहर को डुबाकर रख दिया। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए लोगों ने प्रस्ताव रखा था कि आसपास के इलाकों में डीजल इंजनों पर रोक लगाई जाए और कुछ दूसरे कदम भी उठाए जाएं, लेकिन जब बैठक में हिस्सेदार लोगों ने यह तय किया कि ऐसे कदम उठाने की जरूरत नहीं है, ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाएंगे, तो कुदरत ने ही एक कदम उठाया, और मीटिंग रूम के भीतर पहुंच गई। 

कुदरत की चेतावनी पहले भी कहीं सुनामी की शक्ल में, कहीं बाढ़ की शक्ल में, और कहीं फटी हुई धरती के सूखे की शक्ल में सामने आती रही है। लेकिन अगर इस मीटिंग के बीच दो मिनटों के भीतर पानी ऐसा नहीं पहुंचा होता तो शायद यह किसी विज्ञान कथा या किसी फिल्म की बात ही मानी जाती। लेकिन कुदरत ने बैठक के भीतर घुसकर लोगों को बतलाया कि यह उसकी खुद की जरूरत का मामला नहीं है, यह डूबने जा रहे शहरों में बसे लोगों की जरूरत का मामला है, उसने शहर को डुबाकर एक नमूना सामने रख दिया। आज पूरी हिन्दुस्तान में एक्स्ट्रीम वैदर, या वैदर एक्स्ट्रीम के मामले जिस रफ्तार से बढ़ते चल रहे हैं, शहरों को पाटने वाली बर्फ की ऊंचाई जितनी बढ़ती चल रही है, दिल्ली जैसा प्रदूषण जितना बढ़ते चल रहा है, महाराष्ट्र जैसा जलसंकट जितना बढ़ते चल रहा है, नए-नए इलाकों में बाढ़ जितनी तबाही बढ़ाते चल रही है, उन सबको देखें तो लगता है कि कुदरत के साथ खिलवाड़ के खतरे धीरे-धीरे दिखते हैं, या सुनामी की शक्ल में इस रफ्तार से आते हैं कि दौड़कर समंदर से दूर जाने का वक्त भी नहीं मिलता। लेकिन जब इस खतरे से बचने के बारे में सोचा जाए, तो दुनिया का अधिकतर हिस्सा अपनी आज की सुख-सुविधा को देखते हुए खतरे को कल की तरफ धकेल देता है, और रात में एसी शुरू करके सो जाता है। 

लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समझदार दुनिया किस तरह अपनी ऊर्जा की खपत को काबू करने के साथ-साथ ऊर्जा पैदा करने के तरीकों को बदल भी रही है ताकि धरती की तबाही धीमी हो सके। अभी पश्चिम के एक विकसित देश की खबर है कि किस तरह उसने यह तय किया है कि वह कोयले से चलने वाले अपने सारे बिजलीघरों को बंद कर रहा है। दुनिया में आज सौर ऊर्जा जितनी सस्ती होती जा रही है, अभी दो दिन पहले ही उसने पेट्रोलियम से चलने वाली गाडिय़ों के मुकाबले अधिक किफायती होना साबित कर दिया है। इंसान की कल्पना से भी अधिक रफ्तार से सौर ऊर्जा पेट्रोलियम और कोयले जैसे जीवाश्म से पैदा होने वाली बिजली से सस्ती होने जा रही है, या हो चुकी है। ऐसे में यह पता भी नहीं चलेगा कि कब कोयले का बिजलीघर अपने तमाम धुएं और प्रदूषण के साथ, या उसे अनदेखा करने पर भी, सौर ऊर्जा से महंगा पडऩे लगेगा, या शायद आज भी महंगा पड़ चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे उन प्रदेशों को अपनी चली आ रही सोचने की रफ्तार को कुछ थामकर नए किस्म से सोचना चाहिए क्योंकि इस राज्य में जंगलोंतले, आदिवासी इलाकोंतले दबी हुई कोयला खदानों को खोलने की एक बड़ी मशक्कत चल रही है जिसका सामाजिक कार्यकर्ता जमकर विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के एक सबसे बड़े उद्योगपति के हवाले होने जा रही छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों को लेकर यह भी समझने की जरूरत है कि क्या दस-बीस बरस बाद सचमुच ही इतने कोयले की जरूरत बची रहेगी, या सस्ती सौर ऊर्जा कोयला-बिजलीघरों को कबाड़ बनाकर रख देगी? यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोयले के खरीददार नहीं बचेंगे, तो बेदखल किए गए आदिवासियों को उनके हक की जमीन, और उनके हक के जंगल कहां से लाकर, और कैसे लौटाए जा सकेंगे? यह भी समझने की जरूरत है कि कोयले की बिजलीघरों के घाटे में चले जाने के बाद उन पर लगे हुए पूंजीनिवेश का क्या होगा, और क्या वे दीवालिया होकर बैंकों में आम जनता की जमा पूंजी को ही डुबाएंगे? लेकिन बैंकों के डूबने से परे, आम जनता की जमा पूंजी के डूबने से परे, धरती के डूबने के बारे में पहले सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के सामने, और हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों के सामने एक ऐसी बड़ी संभावना मौजूद है जो कि दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में नहीं है। यहां पर साल के कम से कम आठ महीने सूरज की इतनी रौशनी रहती है कि सौर बिजलीघर जरूरत की तकरीबन सारी बिजली पैदा कर सकते हैं। हर घर और हर इमारत की छत भी अपनी जरूरत का बिजलीघर बन सकती है, हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर नहरों पर ऐसे सोलर पैनल कामयाबी से लग चुके हैं जो वहां के पंप चलाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला खदान वाले राज्य को कुछ थमकर यह देखना चाहिए कि कोयला खदानों को बढ़ाए बिना भी, कोयला उत्पादन बढ़ाए बिना भी किस तरह देश-प्रदेश का काम चल सकता है? और भारत सरकार को चाहिए कि एक तरफ सौर ऊर्जा के कोयला-बिजली से सस्ते हो जाने के बाद, और दूसरी तरफ पेट्रोलियम की जगह बैटरियों से चलने वाली गाडिय़ों के किफायती हो जाने के बाद, इस देश की ऊर्जा की जरूरत और इसकी तकनीक के बारे में एक बार फिर से सोचे। और तब तक यह होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकारें थोड़ी सी दूरदर्शिता दिखाते हुए इतना काम करें कि कोयला खदानों के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को बेदखल और खत्म करना रोक दें। पर्यावरण और कारोबार दोनों से जुड़ा हुआ यह इतना बड़ा मुद्दा है कि हिन्दुस्तान की सर्वोच्च अदालत, या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल खुद होकर भी ऐसी एक रोक लगा सकती हंै, या कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर ऐसा अनुमान मांग सकती हैं कि आने वाले दिनों में ऊर्जा की जरूरत, ऊर्जा की तकनीक, और कोयले के बिजलीघरों का भविष्य, इन सब पर जवाब दे। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला-राज्य को इस मामले में पहल करनी चाहिए, और जंगल-आदिवासियों की बेदखली को तो तुरंत ही स्थगित करना चाहिए। जो पानी इटली की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक में पहुंचकर लोगों के दिमाग को खटखटा चुका है, वह खटखटाहट किसी और शक्ल में पूरे हिन्दुस्तान के सिर पर भी हो सकती है, छत्तीसगढ़ के सिर पर भी। अभी तक कुदरत की मार से धरती नाम के इस गोले को बचाने के लिए इतना बड़ा कोई हेलमेट बना नहीं है, इसलिए देश-प्रदेश की सरकारें धरती की जिंदगी को अपनी पांच बरस की जिंदगी से अधिक लंबा मानकर चलें, अपने कार्यकाल से अधिक महत्वपूर्ण मानकर चलें। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Nov-2019

चुनाव आयोग में राजनीतिक दलों को अपना खर्च बताना होता है। आन्ध्र की सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस ने अपने खर्च में साढ़े 37 करोड़ रूपए राजनीतिक और चुनावी सलाह देने के लिए मशहूर प्रशांत किशोर की कंपनी को दिए हैं। विधानसभा चुनाव के पहले इस पार्टी के अध्यक्ष और अब आन्ध्र के मुख्यमंत्री जगन मोहन ने प्रशांत किशोर की कंपनी की सेवाएं ली थीं। राजनीतिक दलों द्वारा किया गया खर्च चुनाव आयोग की प्रत्याशी खर्च सीमा में नहीं आता, और इसलिए 176 सीटों वाली इस विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर पर इस पार्टी ने हर सीट के लिए औसतन 21 लाख रूपए खर्च किए। चुनाव आयोग की एक सीट पर खर्च करने की सीमा उम्मीदवार के लिए तो इससे कम है लेकिन जाहिर तौर पर पार्टी में आयोग की छूट इस्तेमाल करते हुए प्रत्याशी से अधिक खर्च सलाहकार पर कर दिखाया है। लोगों को पिछले काफी समय से लगातार खबरों में आ रहे चुनावी चंदे की भी याद होगी कि किस तरह देश में आज अधिकतर चुनावी चंदा भाजपा को मिल रहा है, और बाकी पार्टियां उसके बहुत पीछे हैं। चुनाव आयोग में अगर चुनावी खर्च का एक छोटा सा हिस्सा ही पार्टियां घोषित करती हैं, ऐसा अंदाज है। अब एक पार्टी चुनाव सलाहकार कंपनी को कितना पैसा चेक से देती है, और कितना नगद कालाधन, इसका हिसाब न तो आयोग रख पा रहा है, और न ही केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई एजेंसियां। लोगों का अंदाज यह है कि घोषित खर्च के मुकाबले अघोषित खर्च पांच से दस गुना तक अधिक रहता है। अब सवाल यह है कि एक पार्टी आयोग के नियमों के तहत ही अगर एक-एक विधानसभा सीट पर सलाह और रणनीति के लिए किसी कंपनी को 21-21 लाख रूपए का घोषित भुगतान कर रही है, तो किस तरह की पार्टियां विधानसभाओं में पहुंचेंगी, किस तरह की पार्टियों की सरकार बन सकेगी? और जब विधानसभाओं में ऐसा हाल है, तो यह सोचना एक नासमझी ही होगी कि लोकसभा में हाल कुछ और होगा। 

कुल मिलाकर हालत यह है कि घोषित और अघोषित वजहों से भारतीय राजनीति में चुनावी दल इतने बड़े चंदे के कारोबार में लग गए हैं, और सामान्य समझबूझ के मुताबिक घोषित चंदा अघोषित के मुकाबले बहुत थोड़ा सा होता है, ऐसे में क्या चुनाव जीतना महज पैसों का खेल नहीं रह गया है, जिन पैसों से जनधारणा प्रबंधन से लेकर चुनावी रणनीति तक, और वोटरों की खरीदी तक आम बात है। अब चुनाव हो जाने के बाद विधायकों की खरीदी, पार्टियों में विभाजन की खरीदी, और पूरी की पूरी पार्टी का गठबंधन बदल एक और बात है जो कि बहुत अनजानी नहीं है। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी चुनाव क्या सचमुच ही लोकतांत्रिक रह गए हैं, और क्या वे सचमुच ही जनता की स्वतंत्र पसंद का जरिया रह गए हैं? अब आन्ध्र में जगन रेड्डी की पार्टी की उस वक्त से धनकुबेर होने की साख थी जब जगन के पिता वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री थे। उस वक्त से ही जगन की टकसाल जैसी कमाई की चर्चा रहती थी। कई किस्म की जांच भी चली, और शायद अब तक कार्रवाई जारी भी है। ऐसे अथाह पैसे से अगर कोई पार्टी ऐसे सलाहकार और रणनीतिकार की सेवा खरीद सकती है जिसने कभी मोदी को गुजरात जीतने में मदद की, तो कभी नीतीश कुमार को बिहार जीतने में, तो फिर ऐसे पैसे के मुकाबले अगर दूसरी कोई ईमानदार पार्टी है, दूसरे कोई ईमानदार उम्मीदवार हैं, तो उनके जीतने की कोई गुंजाइश बच भी जाती है? 

आज जो लोग चुनाव के तौर-तरीकों को जानते हैं, वे एक मामूली सा केलकुलेटर लेकर अपने प्रदेश की विधानसभा की एक औसत सीट पर किया गया पूंजीनिवेश आसानी से हिसाब कर सकते हैं। इसी तरह अपने प्रदेश की लोकसभा सीटों पर किया गया पूंजीनिवेश भी लोग निकाल सकते हैं। मतलब यह कि कोई विधानसभा, या लोकसभा काम शुरू करने के पहले ही इतने बड़े पूंजीनिवेश की बुनियाद पर बनी होती है कि उसकी भरपाई, और अगले ऐसे कुछ चुनावों की तैयारी प्रतिनिधियों और पार्टियों का एक बड़ा मकसद रहता है। जाहिर है कि ऐसे सदन किसी भी तरह से गरीब के हिमायती नहीं रह सकते, उन्हें गरीबों की फिक्र नहीं रह सकती क्योंकि चुनाव जीतने के लिए गरीबों के जो वोट लगते हैं, वे मतदान के पहले के ताजा-ताजा नोटों से पाए जा सकते हैं, पाए जा रहे हैं। तकनीकी रूप से हिन्दुस्तान के हर वोटर के हाथ में बराबर का हक है, लेकिन हकीकत यह है कि इन वोटों में से एक बड़ा हिस्सा नोटर के हाथ बिकने वाला रहता है, और जीतने वाले उम्मीदवार की कामयाबी का एक बड़ा हिस्सा रहता है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जहां पर सबसे ताकतवर खरीददार जीत को खरीद सकते हैं, वहां पर अपने मन को झांसा देने के लिए भी क्या यह सोचना ठीक है कि यह जनता का लोकतांत्रिक फैसला है? क्या हिन्दुस्तान में अब चुनावों का फैसला वोटों के साथ-साथ, या वोटों से अधिक, नोटों से तय नहीं होने लगा है? क्या जनता भी ऐसे ताकतवर और संपन्न उम्मीदवार को पसंद नहीं करने लगी है जो अगले पांच बरस उसकी जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा कर सके? क्या जनता के वोट प्रदेश और देश का भविष्य तय करने के बजाय, उसके खुद के आज और आने वाले कल की सहूलियतों को तय करने के हिसाब से नहीं डाला जा रहा है? क्या जिंदगी के, देश और प्रदेश के असल मुद्दों से परे निहायत ही खोखले लेकिन भड़काऊ-भावनात्मक मुद्दे चुनावी नतीजे तय करने के लिए नोटों पर सवार होकर वोटों तक जा रहे हैं? इन तमाम पहलुओं को देखें तो लगता है कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है। यह लिखा हुआ छपने जा ही रहा था कि एक खबर सामने आई, कर्नाटक में कांग्रेस छोड़ भाजपा जाने वाले विधायक-मंत्री एमटीबी नागराज ने 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए भरे पर्चे में अपनी संपत्ति 1223 करोड़ घोषित की है, जो कि 18 महीने पहले की घोषणा से 160 करोड़ अधिक है। दौलत की ऐसे तेज रफ्तार और ताकतवर सुनामी के सामने किस पार्टी के कौन से उम्मीदवार टिक सकते हैं?
-सुनील कुमार


Date : 16-Nov-2019

जेएनयू पर चारों तरफ चर्चा के बीच अपने राज्य के विवि देखें?

इन दिनों देश में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय खबरों में सबसे अधिक बना हुआ है। जिन लोगों ने इसके कैम्पस को देखा नहीं है, उन्हें यह जानकर हैरानी हो सकती है कि पूरी दुनिया में भारत के सबसे अधिक चर्चित इस विश्वविद्यालय में दस हजार से भी कम छात्र-छात्रा हैं। उनकी गिनती कम है, लेकिन देश में सरकारी नौकरी के सबसे बड़े इम्तिहान, यूपीएससी, में कामयाबी पाने वालों में इसी एक विश्वविद्यालय के लोग सबसे अधिक रहते हैं। शिक्षा की उत्कृष्टता आकार पर हावी है, तमाम आंदोलनों के बावजूद यहां के छात्र-छात्राएं और रिसर्च स्कॉलर खुले दिमाग से पढ़ते हैं, काम करते हैं, वैचारिक सहमति-असहमति का सम्मान करते हैं, और अपनी सोच को विकसित करते हैं। जेएनयू का योगदान गिनती में कम है, लेकिन उत्कृष्टता में बहुत अधिक है। एक विश्वविद्यालय को ऐसा होना भी चाहिए कि उसकी पढ़ाई-लिखाई, वहां के शोधकार्य का विश्व के लिए कोई महत्व हो, और जहां के नौजवान एक विश्व दृष्टि रखने को विदेशी संस्कृति का हमला न मानें। जैसा कि किसी विश्वविद्यालय के नाम से ही जाहिर होता है, उसका नजरिया पूरे विश्व का होना चाहिए, वहां की पढ़ाई-लिखाई लोगों को बाहर देखने के काबिल भी बनाए, और बाहर की दुनिया को समझने के भी। वरना कमोबेश उसी किस्म की पढ़ाई तो किसी कॉलेज में भी हो सकती है, और विश्वविद्यालय में अलग से किसी अध्ययन केन्द्र की जरूरत ही क्यों होना चाहिए?

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में एक खबर आई कि रायगढ़ जिले में एक नया विश्वविद्यालय खुलने वाला है। पिछले दो बरस में ही दुर्ग में एक विश्वविद्यालय खोला गया। इस तरह अब राज्य में बस्तर संभाग के पास अपना एक विश्वविद्यालय है, रायपुर संभाग के पास एक, दुर्ग संभाग के पास एक, सरगुजा संभाग के पास एक, और बिलासपुर संभाग में अभी तो एक विश्वविद्यालय है, और दूसरे के खुलने की बात कही गई है। एक वक्त था जब मध्यप्रदेश भी नहीं बना था, और उस वक्त मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ का सारा इलाका सागर विश्वविद्यालय के तहत आता था। उच्च शिक्षा के लिए सरगुजा का बिहार और उत्तरप्रदेश को छूता हुआ इलाका भी सागर पर निर्भर करता था। बाद में कई विश्वविद्यालय बने, और छत्तीसगढ़ में कई निजी विश्वविद्यालय भी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में बने, सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुए, और फिर बाद में नए नियमों के तहत फिर से बने। आज अगर इस राज्य में विश्वविद्यालयों की गिनती करने बैठें, तो खासी मुश्किल होती है क्योंकि चिकित्सा शिक्षा के लिए अलग विश्वविद्यालय है, तकनीकी शिक्षा, कृषि शिक्षा, पत्रकारिता शिक्षा, के लिए अलग-अलग विश्वविद्यालय हैं, और एक ओपन विश्वविद्यालय भी है, बिलासपुर में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय भी है, और केन्द्र सरकार के यहां शुरू हुए तीन संस्थान तो विश्वविद्यालय की बराबरी का दर्जा रखते ही हैं, आईआईएम, आईआईटी, और एम्स। करीब आधा दर्जन निजी विश्वविद्यालय भी इस राज्य में काम कर रहे हैं, और केन्द्र सरकार के इग्नू जैसे खुले विश्वविद्यालय से भी छत्तीसगढ़ से हजारों लोग पढ़ाई करते हैं, और इम्तिहान देते हैं। इन सबको मिलाकर एक विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं की औसत संख्या घटती चली गई है।

छत्तीसगढ़ में एक वक्त रविशंकर विश्वविद्यालय पहला था, और पूरे प्रदेश के कॉलेज छात्र-छात्राओं के इम्तिहान यहीं से होते थे, डिग्री यहीं से मिलती थी, और रायपुर में इस विश्वविद्यालय का अध्ययन केन्द्र था। बाद में अलग-अलग संभागीय विश्वविद्यालय बनते चले गए, और इस पहले अध्ययन केन्द्र से परे भी कई केन्द्र बन गए। यह याद रखने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी कॉलेजों में भी प्राध्यापकों के सैकड़ों पद खाली हैं, और विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की जितनी जगहें हैं, उन पर भी बहुत औसत दर्जे के ही प्राध्यापक दिखते हैं। पूरे राज्य के सारे विश्वविद्यालयों को मिला भी लें, तो भी ऐसे गिनती के भी प्राध्यापक नहीं हैं जिनकी लिखी हुई किताबें बाकी देश में भी कहीं कोर्स में चलती हों। गिने-चुने ऐसे प्राध्यापक हैं जिनकी की हुई, या करवाई हुई रिसर्च का कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मान हुआ हो। बल्कि प्रदेश के अकेले विश्वविद्यालय अध्ययन केन्द्र में अध्ययन और शोधकार्य की, सुविधाओं और लाइब्रेरी-प्रयोगशाला की जो उत्कृष्टता थी, या हो सकती है, वह भी हर संभाग में खुले विश्वविद्यालयों की वजह से घट गई। न प्राध्यापक बहुत ऊंचे दर्जे के, और न ही वहां की सहूलियतें।

दरअसल इस राज्य में पिछले दशकों में क्षेत्रीय गौरव की भावना को पहले उकसाकर, और फिर उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वविद्यालय खोले गए, क्षेत्रीय विश्वविद्यालय भी बनाए गए, और खास किस्म की शिक्षा के लिए भी। जहां पर छात्र-छात्राओं को सिर्फ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामों से वास्ता पड़ता था, जहां सिर्फ एक प्रशासनिक दफ्तर से ऑनलाईन काम चल सकता था, वहां भी सैकड़ों करोड़ की लागत वाले, और करोड़ों रूपए महीने के खर्च वाले विश्वविद्यालय बना दिए गए। नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रीय तुष्टिकरण तो हो गया, लेकिन उत्कृष्टता घटती चली गई। हालत यह है कि इस राज्य के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं का दाखिला है, जिनमें से बहुत से दाखिले दूसरे प्रदेश से आकर दाखिला लेने वालों के सिर्फ कागजी दाखिले हैं। इतनी पढ़ाई तो प्रदेश के पहले विश्वविद्यालय के मातहत कॉलेजों में भी पत्रकारिता विभाग में हो सकती थी, इतना बड़ा सफेद हाथी खड़ा करने की जरूरत नहीं थी।

प्रदेश के संभागों से अधिक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय बन जाने के बाद अब बाकी संभागों में भी जिला स्तरों पर और विश्वविद्यालय खोले जा सकते हैं, और आखिर में जाकर प्रदेश में विश्वविद्यालयों का एक विश्वविद्यालय और खोला जा सकता है। गिनती और उत्कृष्टता का रिश्ता खत्म हो चुका है, और यही वजह है कि इस राज्य की उच्च शिक्षा देश में कहीं दर्ज नहीं होती।

-सुनील कुमार


Date : 15-Nov-2019

दो-तीन अलग-अलग खबरें बहुत फिक्र खड़ी करती हैं। एक तो खबर बैंक की है कि किस तरह खाते की कुछ जानकारी पाकर ठगों ने किसी के एफडी की रकम भी निकाल ली। अभी तक फिक्स्ड डिपॉजिट के बारे में तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि उसे भी लूटा जा सकता है, लेकिन अब वह भी हो गया है। एक दूसरी खबर भारत सरकार से ही संबंधित है, कई ऐसी फर्जी वेबसाईटें चल रही हैं जो कि अपने आपको पासपोर्ट दफ्तर बताती हैं, और वहां फीस जमा करवाकर पासपोर्ट के लिए इंटरव्यू का समय भी दे देती हैं, जब लोग पहुंचते हैं तो पता लगता है कि उनका संपर्क किसी फर्जी वेबसाईट से हुआ था। खुद भारत सरकार ने ऐसी आधा दर्जन वेबसाईटों को बताया है कि लोग उनसे संपर्क न करें, वे फर्जी हैं। इसके साथ-साथ कई अलग-अलग खबरें हर कुछ हफ्तों में आती हैं जिनमें कहीं पर सरकारी नौकरी लगाने के नाम पर लोगों से कुछ रकम जमा करवाई जाती है, या दूसरे तरह की ऑनलाईन ठगी होती है। एक खबर में यह भी है कि बैंक खातों में इतनी बड़ी संख्या में ठगी इसलिए हो पा रही है कि ठग बड़ी आसानी से खाते खोल रहे हैं, ठगी की रकम उसमें जमा करके निकालकर गायब हो जाते हैं, और फिर उनका कोई सुराग नहीं लगता। 

देश में चल रही ऐसी तमाम बैंक और साइबर ठगी को देखें, तो लगता है कि सरकार का निगरानीतंत्र और सरकार का साइबर सुरक्षातंत्र ऐसे छेदों से भरा हुआ है जिनसे होकर ठग और जालसाज आसानी से आवाजाही करते रहते हैं, और जनता लुटती चली जा रही है। अब अगर लोगों के एफडी की रकम भी गायब हो जा रही है, तो ऐसे कितने लोग हैं जो कि रोज अपनी एफडी की रकम जांचते हों? बहुत से लोग तो हर महीने या हर साल एफडी का ब्याज निकलवाने से परे अपने इन खातों की कोई जानकारी नहीं लेते हैं। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, का हाल यह है कि वह खाते में जमा या उसमें से रकम की निकासी का कोई एसएमएस भेजता है, और कोई एसएमएस नहीं भेजता। मतलब यह कि सबसे बड़े बैंक में भी हिफाजत का इंतजाम ऐसा कमजोर है। हमारे खुद के देखने में आया है कि एसबीआई से ऑनलाईन ट्रांसफर करते हुए फोन पर जो ओटीपी आता है, उसे डाले बिना ही कभी-कभी खाते से रकम चली जाती है। चूंकि यह हमारा खुद का देखा हुआ है, तो ऐसे भी बहुत से लोग होंगे जो उतनी बारीकी से अपने खाते पर नजर नहीं रखते होंगे या नहीं रख पाते होंगे, और जिन्हें बरसों तक रकम कम होने का पता भी नहीं चलता होगा। 

हम पहले भी इस जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि भारत सरकार जिस आक्रामक अंदाज में डिजिटल बैंकिंग और भुगतान-ट्रांसफर को बढ़ावा दे रही है, उसके लायक सरकार और बैंकों का अपना हिफाजत-इंतजाम नहीं है। सरकार देश में कैशलेस इकॉनॉमी बढ़ाना चाहती है, लेकिन सबसे जानकार और संपन्न तबका पहले से उसका इस्तेमाल कर रहा है, अब धीरे-धीरे नीचे के लोग उसमें आते जा रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम कम आयवर्ग की तरफ बढ़ते हैं वहां पर तकनीकी जानकारी घटती जाती है, लोगों को फोन या कम्प्यूटर, या बिना नगदी भुगतान के कई औजारों की जानकारी और समझ कम है। हालांकि अभी जो खबरें आती हैं, उनमें बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए सरकारी कर्मचारी भी ठगी और जालसाजी का शिकार हो रहे हैं, तो ऐसे में कम पढ़े-लिखे लोगों के तो भगवान ही मालिक होंगे। 

फिलहाल भारत सरकार, उसकी बैंकों, और उसके दूसरे संस्थानों को चाहिए कि देश में एक बहुत तगड़ा साइबर निगरानी और सुरक्षातंत्र विकसित करें, क्योंकि एक बार जनता या सरकार की रकम निकल गई, तो फिर उसके वापिस हाथ लगने की गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं रहती है। जैसे-जैसे बैंक खाते बढ़ रहे हैं, लोग मोबाइल बैंकिंग, या ऑनलाईन बैंकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं, कार्ड से पेमेंट कर रहे हैं, वैसे-वैसे ठगों के पास उनके धंधे के लिए आबादी भी बढ़ रही है। सरकार को कैशलेस को बढ़ावा देना रोककर, खुफिया निगरानी, और सुरक्षा के इंतजाम विकसित करने चाहिए। इसके बिना लोगों का भरोसा भी कैशलेस पर से कम होता जाएगा, बैंकों पर से लोगों का भरोसा पहले ही घट चुका है, नोटों पर से भी लोगों का भरोसा कम हो गया है क्योंकि सारे बड़े दाम के नोट नकली आ चुके हैं, और किसी भी दिन सरकार बड़े नोटों को बंद कर देगी, ऐसा अंदेशा लोगों को है। देश के लोग वैसे भी बहुत बुरे हाल से गुजर रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं, जिंदा रहने को कमाई कम पड़ रही है, और ऐसे में अगर उनके पास की थोड़ी-बहुत रकम कोई ठग लेते हैं, तो इस देश की जनता उसे बर्दाश्त करने की हालत में बिल्कुल नहीं है।
-सुनील कुमार