संपादकीय

Date : 22-Jul-2019

छत्तीसगढ़ से लगे हुए, मध्यप्रदेश के डिंडौरी में आवासीय नवोदय विद्यालय में छठवीं की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली। उसने लिख छोड़ा है कि उसे स्कूल नर्क जैसा लग रहा था, और पहली खबर में स्कूल प्रबंधन ने अपनी गलती मानी है। दरअसल नवोदय एक बिल्कुल अलग किस्म की सोच पर बना हुआ स्कूल है, और देश भर में इसका कई किस्म का बड़ा योगदान है। इसकी वजह से गांव के बच्चे, अनुसूचित जाति-जनजाति के बच्चे, गरीब बच्चे, इन सबको समाज के बाकी तबकों के बच्चों के साथ सबसे अच्छी सरकारी तालीम पाने का एक मौका मिलता है। इसमें दाखिले का इम्तिहान पारदर्शी होता है, और इसकी वजह से देश में धर्म और जाति से परे की एक अलग किस्म की समानता विकसित हो रही है। यह एक अलग बात है कि शिक्षा के मुद्दे पर गंभीर बात करने वाले कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देश भर में विपन्न सरकारी स्कूलों के बीच एक संपन्न ढांचे वाले नवोदय की सोच अपने आपमें सामाजिक असमानता की है, और इससे संतुष्ट केन्द्र सरकार बाकी स्कूलों की बहुत मामूली जरूरतों को भी अनदेखा करती है। नवोदय में दाखिले के तरीके को जानने वाले यह कह सकते हैं कि वह एक पारदर्शी व्यवस्था है जिसमें शहरी और ग्रामीण का अनुपात भी है, और आरक्षित वर्गों के लिए भी उनका अनुपात सुरक्षित है। जिन लोगों को नवोदय की अधिक जानकारी नहीं है उनके लिए यह जानना काम का हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के एक जिले में नवोदय की 80 सीटों के लिए 40 हजार से अधिक बच्चे दाखिला-इम्तिहान में बैठे थे। लेकिन आज की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि देश भर के नवोदय स्कूलों में बहुत से बच्चों ने अलग-अलग समय पर आत्महत्या की है जो कि बहुत फिक्र की बात है। 

दरअसल कड़े दाखिले इम्तिहान के बाद बच्चे जहां भी पहुंचते हैं, वहां उनमें से बहुत से ऐसे रहते हैं जिनका तनाव आगे की मेहनत में बढ़ जाता है। जो बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, लेकिन वहां की पढ़ाई का बोझ नहीं झेल पाते, उनमें से भी बहुत से आत्महत्या कर बैठते हैं। कुछ ऐसा ही हाल नवोदय मेें हो रहा है जहां दाखिले के समय जो बच्चे सही जवाब दे देते हैं लेकिन बाद में पढ़ाई के ऊंचे स्तर में जो कदम मिलाकर नहीं चल पाते, दूसरे बच्चों के साथ हॉस्टल की जिंदगी जिनको माकूल नहीं बैठती, वहां ऐसे बच्चे एक तनाव में रहते हैं। इस हालत का कोई आसान इलाज भी हमको नहीं सूझ रहा है, लेकिन इसके बारे में सोचना जरूर चाहिए क्योंकि आत्महत्या तो खबरों और आंकड़ों में आ जाती है, और दिखती है, लेकिन जो बच्चे आत्महत्या करने के पहले तक के तनाव में जिंदा हैं, उनके बारे में किसी को पता नहीं चलता। राष्ट्रीय स्तर पर समानता की सोच के साथ शुरू किया गया नवोदय विद्यालय पढ़ाई के लिए और राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत अच्छा है, लेकिन वहां सबसे गरीब तबके के, सामाजिक हिसाब से निचले तबके के जो बच्चे पहुंचते हैं, उनको बाकी बच्चों की बराबरी तक लाने के लिए पढ़ाई से परे भी कुछ जरूरत रहती है, और स्कूलों में परामर्शदाता का अनिवार्य रूप से इंतजाम करना चाहिए। चूंकि ये स्कूल केन्द्र सरकार की संपन्नता से सुविधा संपन्न रहते हैं, इसलिए वहां पर परामर्शदाता की सलाह कोई महंगी सलाह नहीं है। दूसरी बात यह कि जब छठवीं क्लास से बच्चों को ऐसी असमानता से आकर एक अलग किस्म की समानता के बीच आगे बढऩा रहता है, तो उन्हें परामर्शदाता की मदद भी मिलनी चाहिए। 

दरअसल इस बात की शुरुआत तो हम नवोदय से कर रहे हैं, लेकिन आईआईटी जैसे उत्कृष्ट शिक्षा के संस्थान भी छात्रों की आत्महत्या बड़ी संख्या में झेल रहे हैं। वहां भी अनिवार्य रूप से परामर्शदाता रहने चाहिए, और नवोदय के मामले खबरों में आने के बाद आईआईटी भी इस बारे में गौर कर सकती है। 


Date : 21-Jul-2019

नवजोत सिंह सिद्धू इस बात की एक अच्छी मिसाल हैं कि लोगों की जुबान किस तरह उनकी दुश्मन बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में, और खासकर निर्वाचित राजनीति में लोगों को बोलते हुए गांधी के नाम से प्रचलित इस बात को याद रखना चाहिए कि सच बोलो, लेकिन कड़वा सच मत बोलो। गांधी खुद तो वैसे खासा कड़वा बोलते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने हो सकता है किसी संदर्भ में यह बात कही हो। और भी बहुत से लोग इस बात की वकालत करते हैं कि कड़वा नहीं कहना चाहिए। लेकिन कड़वे से परे भी कई और किस्म की बातें रहती हैं जो सार्वजनिक जीवन में चुनाव लडऩे वाले लोगों को नुकसानदेह हो सकती हैं। जब पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दुस्तानियों की भावनाओं को पेट्रोल के चूल्हे पर उबाला जा रहा था, उस वक्त सिद्धू ने पाकिस्तान के बारे में एक सही बात कह दी, लेकिन वह एक नाजुक राजनीतिक मौके पर कही हुई नुकसानदेह बात साबित हो गई। उनके नाम पर ऐसा बवाल खड़ा किया गया कि उन्हें टीवी के एक कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने भी कुछ अरसे तक उन्हें चुनाव प्रचार से परे रखा। लोगों को याद होगा कि सिद्धू के पहले लालकृष्ण अडवानी भी पाकिस्तान प्रवास के दौरान जिन्ना के बारे में एक बात कहकर ऐसे बवाल में फंसे कि भाजपा के भीतर वे किनारे लग गए। 

जहां तक सिद्धू की बात है तो पंजाब की राजनीति में भी वे भाजपा से कांग्रेस में आए थे, लेकिन पार्टी के भीतर अपनी जगह धीरे-धीरे बनाने के बजाय वे शायद अपने को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान बैठे जिस पर राजीव गांधी को राजीव कहने का रिश्ता रखने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह काबिज थे। इससे सिद्धू को सुर्खियां तो मिलीं, और मीडिया को यह मसाला मिला कि पंजाब सीएम को एक मुकाबला मिला है, चुनौती मिली है। लेकिन धीरे-धीरे सिद्धू के बयान और उनके काम आत्मघाती साबित होते चले गए, और एक बरस के भीतर ही वे पंजाब केबिनेट से भी बाहर हो गए, और अब सरकारी बंगले से भी, टीवी से तो पहले ही बाहर हो चुके थे। 

राजनीति में मंच, माईक, माला, और महत्व सामने देखकर बड़े-बड़े लोग आपा खोने लगते हैं। ऐसे लोगों को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को याद रखना चाहिए जिन्हें न तो आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में देखा जाता, और न ही मीडिया से बात करते हुए। चुपचाप घर पर रहकर वे ऐसा राज चलाते हैं कि देश भर के राज्यों में सेंध लगाने में कामयाब भाजपा को भी इस राज्य में कामयाबी नहीं मिली, और नवीन पटनायक एक बार फिर शानदार तरीके से सरकार में लौटे हैं। उनकी कही हुई कोई भी बात आज तक उनके खिलाफ नहीं गई है, और अपनी चुप्पी से उन्हें फायदा ही हुआ है। दूसरी तरफ इसी दौरान अपने बयानों की वजह से कई पार्टियों के कई नेता ठिकाने लग गए, उनका राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया। 

यह बात कुछ नेताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी राजनीति में सक्रिय सारे ही लोगों पर लागू होती है, और लोगों को इससे नसीहत लेना चाहिए। हम छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश समेत देश के बहुत से राज्यों के, कई पार्टियों के कई नेताओं को देखते हैं जो कि बेवक्त बेअक्ल बात करने को अपनी कामयाबी मानते हैं। लालकृष्ण अडवानी और नवजोत सिंह सिद्धू की तस्वीरें सभी नेताओं के अपने टेबिल पर कांच के नीचे लगाकर रखना चाहिए, इससे वे पटरी से उतरने से बच सकते हैं, कुर्सी से उतरने से भी। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Jul-2019

छत्तीसगढ़ सरकार ने कल एक बड़ा फैसला लिया है, और राज्य में जमीनों के सरकारी रेट में तीस फीसदी की कमी कर दी है। इससे लोगों को रजिस्ट्री ऑफिस में लगने वाले सरकारी टैक्स में कमी आएगी, लेकिन इसकी भरपाई सरकार रजिस्ट्री का रेट बढ़ाकर कर ले रही है। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद की बिक्री पर होने वाली कमाई पर आयकर विभाग जो कैपिटल गेन टैक्स लेता है उसमें भी लोगों को राहत मिलेगी। आज होता यह है कि कई इलाकों में सरकारी रेट बाजार भाव से खासा अधिक तय कर दिया गया है। सरकार रजिस्ट्री शुल्क तो सरकारी रेट के आधार पर लेती ही है, आयकर विभाग भी सरकारी रजिस्ट्री रेट के हिसाब से कैपिटल गेन गिनता है, और राजधानी रायपुर के कई इलाके ऐसे हो गए हैं जहां जमीन बेचने पर लोगों को अपनी जेब से आयकर को भुगतान करना होगा, उनके घर कुछ भी नहीं आएगा। 

पिछले कुछ बरसों में छत्तीसगढ़ के जमीन-जायदाद के बाजार ने सबसे ही बुरा दौर देखा है। बाजार ठप्प हो गया है, जिनको अपनी जमीन बेचने की मजबूरी है, उनको बाजार भाव से आधे भाव पर बेचना पड़ रहा है। ऊपर से सरकार कलेक्टर के तय किए हुए रेट से रजिस्ट्री शुल्क ले रही है, और कैपिटल गेन टैक्स पटाने के बाद लोगों के पास बहुत कम पैसा बच रहा है। यह सिलसिला खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने तमिलनाडू की एक मिसाल इस्तेमाल की है जहां पर सरकारी रेट को गिराने से जमीनों का कारोबार बढ़ा था, लोग एक नंबर के पैसे से रजिस्ट्री करवाने लगे थे, और राज्य सरकार को कुल मिलाकर बढ़े हुए शुल्क और बढ़े हुए कारोबार से कमाई बढ़ गई थी। आज हालत यह है कि एक बिल्कुल ही झूठे सरकारी रेट के चलते बाजार ठप्प पड़ा है, लोग बिना रजिस्ट्री मुख्तियारनामे से काम चला रहे हैं, और आयकर विभाग लोगों के पीछे लाठी लेकर पड़ा हुआ है। राज्य सरकार का यह फैसला सभी लोगों के फायदे का है, और इससे जमीन-जायदाद के धंधे से दो नंबर की रकम भी काफी कम होगी, और ऐसा लगता है कि कारोबार बढऩे से आयकर विभाग को भी भरपाई हो ही जाएगी। आज राज्य में सबसे बड़ा नुकसान यह था कि राज्य सरकार बिना कुछ कमाए अपने नागरिकों पर आयकर विभाग का अंधाधुंध बोझ डालकर केन्द्र सरकार की कमाई बढ़ा रही थी, और राज्य का कारोबार ठप्प हो गया था। 

राज्य सरकार के इसी रूख के अनुरूप कुछ फैसले और लिए जाने चाहिए। जमीनों का किस इलाका में कैसा उपयोग हो इसे नया रायपुर के इलाके में राज्य सरकार ने पिछले बरसों में एक तानाशाह के अंदाज में काबू कर रखा है जिससे वहां की जमीनें बिक नहीं पा रही हैं, लोगों को दाम नहीं मिल रहा है, जिनकी जमीनें हैं वे अपने मकान तक नहीं बना पा रहे हैं। नया रायपुर में सरकारी मकानों को बेचने, और सरकारी प्लाट बेचने के लिए सरकार ने निजी जमीनों पर प्रतिबंधों की एक पूरी फेहरिस्त ही लाद दी थी। जब तक किसी के पास कई हेक्टेयर जमीन न हों, वे वहां पर अपना खुद का मकान भी नहीं बना सकते। रमन सरकार के समय भी हमने इसी कॉलम में कई बार इस मनमानी के खिलाफ लिखा था, और भूपेश सरकार को इस तरफ गौर करना चाहिए। संविधान में अपनी संपत्ति के उपयोग का जो बुनियादी हक दिया गया है, उसके भी खिलाफ जाकर नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने ऐसे नियम बनाए थे कि कई हेक्टेयर जमीन के मालिक भी वहां अपना घर भी नहीं बना सकते। आज नया रायपुर का पूरा इलाका मरघटी-सन्नाटे से घिरे रहता है, और इस नौबत को अगर बदलना है, सरकार को सिर्फ अपने खर्च से परे, नागरिकों को भी नया रायपुर में बसाना है, तो उसे अपने तानाशाह प्रतिबंधों को खत्म करना होगा, और शहरी विकास की योजनाओं के बुनियादी नियमों तक अपनी मनमर्जी को सीमित रखना होगा। इस शहर और इस प्रदेश के विकास में जमीन-जायदाद और मकान-दुकान की खरीद-बिक्री के कारोबार का बड़ा योगदान रहा है, और उसके खिलाफ नियमों का जाल बिछाकर सरकार कुछ हासिल नहीं कर पा रही है। बाजार व्यवस्था के ठीक खिलाफ जाकर सरकार क्या हासिल करती है यह देखना हो तो हाऊसिंग बोर्ड को देखना चाहिए जो सरकार की खुद की एजेंसी है, और सरकार से मुफ्त में मिली जमीन के बावजूद आज उसके हजारों करोड़ के निर्माण खंडहर होते जा रहे हैं। सरकार ने नया रायपुर के इलाके में सरकारी मकान-जमीन की बिक्री बढ़ाने के लिए निजी निर्माण और निजी उपयोग पर रोक लगा दी, न निजी निर्माण हुआ, और न ही सरकार का निर्माण बिका। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले बरसों में नया रायपुर को एक नियंत्रित टापू बना लिया था, और बाकी जनता, बाकी दुनिया से उसे काट दिया था। इस तरह कोई भी कारोबार नहीं चलता, चाहे वह निजी हो, चाहे सरकारी। इसलिए राज्य सरकार को अगर नया रायपुर नाम के मरघट को बसाना है, तो उसे वहां के घोषित हजारों एकड़ के इलाके पर लादे गए अपने निहायत-नाजायज नियमों को खत्म करना होगा। 
-सुनील कुमार


Date : 19-Jul-2019

कानूनी मुद्दों का अध्ययन करने वाले देश के एक गैरसरकारी संगठन, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी, ने एक अध्ययन में यह पाया है कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले पिछले सौ जजों में से 70 ऐसे हैं जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद केन्द्र या राज्य सरकारों के मनोनीत पद संभाले हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो सामने आई है वह यह है कि इन पदों में से आधे से अधिक ऐसे हैं जिनमें संवैधानिक जरूरत ही सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की है। ऐसी शर्त की वजह से ही रिटायर्ड जज ही इन पदों पर रखे जा सकते हैं, हालांकि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को राज्यपाल भी बनाया जो कि उस कुर्सी की कोई शर्त नहीं थी। 

ये आंकड़े कुछ चौंकाने वाले हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के बाद कई बरस तक उसी दर्जे की सहूलियतें, और मोटी तनख्वाह मिलने की एक गुंजाइश रहती है, तो जाहिर है कि जज की कुर्सी पर बने रहते वक्त यह संभावना अनदेखी तो नहीं रहती होगी, और जैसा कि आम मानवीय स्वभाव रहता है, हो सकता है कि जजों के कुछ फैसले सरकार में बैठे हुए लोगों की पसंद और प्राथमिकता को देखते हुए भी प्रभावित होते हों, क्योंकि रिटायर्ड जजों में से किसे किसी कुर्सी पर बिठाना है, या किसे बस बिदा ही कर देना है, यह फैसला तो सरकार में बैठे लोग ही लेते हैं। और यह बात महज जजों के साथ नहीं है, और महज केन्द्र सरकार के साथ नहीं है, राज्यों में भी ऐसा होता है, और रिटायर्ड अफसरों की नजरें राज्य की कई संवैधानिक, और दूसरी महत्वपूर्ण-ताकतवर कुर्सियों पर पहले से लग जाती हैं, और उनके फैसले उन सत्तारूढ़ लोगों को खुश रखने के हिसाब से होने लगते हैं जिन्हें इन ओहदों पर चेहरे बिठाने होते हैं। हम इसी जगह बहुत बरसों से लिखते आ रहे हैं कि राज्य के भीतर रिटायर होने वाले जजों और अफसरों को उसी राज्य में किसी कुर्सी पर रिटायरमेंट के बाद नहीं बिठाना चाहिए। अगर कोई संवैधानिक जरूरत है, या राज्य के हित में किसी अनुभवी की जरूरत है, तो उसके लिए राज्य के बाहर से अर्जियां बुलवानी चाहिए, और राज्य का न होना एक अनिवार्य शर्त रखनी चाहिए। 

जहां कहीं भी इंसाफ की बात होती है, एक पैमाना सबसे पहले लागू किया जाता है, हितों के टकराव का। किसी अदालत में कोई जज ऐसा कोई मामला नहीं सुन सकते जिससे वे बीते हुए कल या आज किसी भी तरह से जुड़े हुए हों। ठीक इसी तरह सरकार में कोई फैसला लेने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि उनसे संबंधित लोगों के मामले हों, तो वे अपने को फैसले से अलग कर लें। ऐसा ही हाल सरकार के मनोनीत लोगों का रहता है चाहे वे जज हों, चाहे अफसर हों। अगर वे रिटायर होने के बाद लाभ और सहूलियत का कोई पद लेते हैं, तो जाहिर है कि पहले उनके कामकाज से खुश सरकार ही ऐसा फैसला लेगी, और सरकार की यह खुशी आमतौर पर सरकार में बैठे लोगों की निजी खुशी होती है, न कि जनहित की खुशी। 

अगर कोई ऐसी जनहित याचिका लेकर अदालत भी जाए, तो भी उसकी सुनवाई में हमें शक है क्योंकि सुनने वाले जजों को भी रिटायर होने के बाद पुनर्वास की संभावना अच्छी ही लगती है, वे भला ऐसे नियम क्यों लागू करना चाहेंगे जिससे उनकी अपनी संभावनाएं खत्म हो जाएं। केन्द्र सरकार के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के जजों की अनिवार्यता वाले पदों का कोई आसान हल अभी हमें नहीं सूझ रहा है, लेकिन राज्यों के मामले में तो यह तुरंत लागू हो सकता है, और होना चाहिए, कि किसी राज्य में काम कर चुके जज और अफसर उस राज्य में कहीं मनोनीत न हो सकें। तंग दायरे में पसंद करने से बेहतर यही होगा कि राज्य सरकारें देश भर से काबिल लोगों की अर्जियां बुलवाएं, और लोगों को नियुक्त करें। दूसरी बात केन्द्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति को भी केन्द्र सरकार के एकाधिकार से बाहर निकालना चाहिए, और ऐसी नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों, बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, जैसे लोगों को शामिल करना चाहिए।

इनके अलावा एक दूसरी प्रक्रिया लोगों को जज बनाते हुए, या रिटायर्ड जजों को किसी पद पर बिठाते हुए अपनाने की वकालत हम पहले भी कर चुके हैं। अमरीका में किसी भी बड़े संवैधानिक पद पर किसी की नियुक्ति के पहले संसद की कमेटी के सामने उसकी खुली सुनवाई होती है, और कई-कई दिन तक ऐसे लोगों से बहुत से सवाल किए जाते हैं जो कि विचारधारा, प्रतिबद्धता, पसंद-नापसंद से लेकर उनकी निजी जिंदगी के विवादास्पद मुद्दों तक पर पूछे जाते हैं। हिन्दुस्तान में भी ऐसी प्रक्रिया बहुत से मनोनयन के पहले अपनानी चाहिए, और इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता आएगी, जवाबदेही बढ़ेगी। जब कोई पसंद महज सत्ता पर छोड़ दी जाती है, तो उसके अच्छे होने की संभावना घट जाती है। 
-सुनील कुमार


Date : 18-Jul-2019

अयोध्या मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का यह रूख सामने आया है कि इसकी सुनवाई करने वाले जज अगर रिटायर भी हो जाते हैं, तो भी वे इस केस के खत्म होने तक जज बने रहेंगे, और सुनवाई करते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की कही हुई यह बात खबरों में सामने आई है, और कभी-कभी ऐसा भी होता है अदालतें अपनी कही हुई बातों को किसी आदेश या फैसले में शामिल नहीं करती हैं, या कभी-कभी फैसले में फेरबदल भी कर देती हैं। जो भी हो, आज तो हम यहां यह मानकर लिख रहे हैं कि अदालत इस बार अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को निपटाने के इरादे में दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह रूख अच्छा है कि अयोध्या की सुनवाई करने वाले जज फैसले तक रिटायर नहीं होंगे, क्योंकि नए जजों के आने पर मामले की फिर से सुनवाई भी होने लगती है। और हो सकता है कि अदालत का यह रूख ऐसे कुछ और मामलों में भी काम का साबित हो, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अभी हाल में ही प्रधानमंत्री को लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ानी चाहिए क्योंकि अदालतों में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और मामलों के पहाड़ खड़े हुए हैं। 

मामला आजादी के पहले से हिन्दू और मुस्लिम लोगों के बीच झगड़े और दावे की शक्ल में चले आ रहा है, और अंग्रेज सरकार से होते हुए वह आजादी के बाद नेहरू सरकार के सामने भी रहा, और अदालत में इसे ले जाने वाले लोगों में से भी कुछ लोग मर-खप गए हैं। ऐसे में इस विवाद का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने वाले लोगों को इसकी शक्ल में एक बहाना मिलता है, और वे हर चुनाव में, या हर मौके पर इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को हिम्मत जुटाकर, दिल कड़ा करके इस मामले को निपटाना चाहिए। इस बारे में यह समझ लेना जरूरी है कि यह किसी धार्मिक आस्था के झगड़े के निपटारे का मामला नहीं है, यह महज जमीन पर मालिकाना हक का मामला है। 

लंबे समय तक हिन्दुस्तान में बहुत से अमन-पसंद लोग यह मानते रहे कि इस मामले का कोई अदालती इलाज न निकालना ही सबसे बेहतर इलाज है। ऐसे लोग किसी फैसले के आने पर देश में सामने आने वाले तनाव की सोचकर इसे टालना चाहते थे। लेकिन उस टालने से इस मुद्दे के राजनीतिकरण का खतरा एक हकीकत बन गया, और लगातार देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के बीच यह भावना फैलाई गई कि अदालत फैसला इसीलिए नहीं दे रही है कि वह बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने का खतरा उठाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ अनगिनत हिन्दू पार्टियां, और संगठन लगातार ऐसे आक्रामक बयान देते रहे कि फैसला चाहे जो हो उस जगह पर मंदिर बनकर रहेगा। मंदिर वहीं बनाएंगे, इस नारे के साथ बाबरी मस्जिद को पहले तो गिराया गया, और फिर कहा गया कि वहां कभी मस्जिद थी ही नहीं। कुल मिलाकर देश में लगातार चौथाई सदी से अधिक वक्त से ऐसा माहौल बना हुआ है कि वहां पर मंदिर बनना देश के लिए सबसे जरूरी मुद्दा है, और रामलला को एक भव्य मंदिर मिल जाने से देश की तमाम दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। 

लेकिन ऐसी किसी भी योजना या साजिश से परे, हमारा सोचना यह है कि लोकतंत्र में अदालतों को अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, और नाजुक मुद्दों को अंतहीन टालते रहना कोई चतुराई नहीं है। दुनिया में बड़े-बड़े लोकतंत्र कई किस्म के तनाव झेलते हैं, और ऐसे तनावों से गुजरकर ही कोई लोकतंत्र मजबूत हो सकता है। इसलिए अयोध्या के विवाद को निपटाकर, और उसके बाद अगर कोई तनाव होता है तो उस तनाव से कड़ाई से निपटकर ही भारत अपने आपको एक जिम्मेदार और परिपक्व लोकतंत्र साबित कर सकेगा। अराजक मवालियों की भीड़ से डरकर कोई लोकतंत्र नहीं चल सकता। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Jul-2019

दुनिया में आए दिन सरकारी या समाजसेवी संगठनों के खर्च से कोई न कोई बैठक या कांफ्रेंस चलती ही रहती है। जो लोग इन पर समय गंवाने में अधिक भरोसा नहीं करते, उन्हें भी बीच-बीच में कभी शिष्टाचार के चलते, तो कभी किसी और वजह से इनमें जाना पड़ता है। और जो लोग समाज में जितने अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, उनमें से अधिकतर को उतनी ही अधिक बैठकों में शामिल होना पड़ता है। इस तरह कुल मिलाकर बैठकें अपरिहार्य हैं, जिनसे बचा नहीं जा सकता, और जिनके बारे में यह सोचना बेहतर होगा कि उन्हें अगर होना ही है, तो इस तरह इनकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। 

किसी बैठक में अगर किसी नेता या बड़े अफसर को आना है, तो यह खतरा बने रहता है कि वे देर से आकर उन तमाम लोगों का वक्त बर्बाद करें जो आदतन समय पर पहुंचते हैं, और अक्सर ही अपने वक्त की ऐसी बर्बादी झेलते हैं। इसके बाद जब सबसे ऊंची कुर्सी पर कोई काबिज हो चुके रहते हैं, तो स्वागत का सिलसिला शुरू होता है जिसमें तमाम किस्म के झूठे विशेषणों के साथ खासी मात्रा में चापलूसी मिलाकर मौजूद बड़े लोगों को उनके असल कद से और बहुत बड़ा दिखाते हुए फूलों को बर्बाद किया जाता है। यह सिलसिला खत्म होने के बाद जब काम की कोई बात शुरू होने का मौका आता है तो बोलने वालों में से जो जितने बड़े होते हैं, वे यादों में उतना ही गहरा गोता लगाते हैं, और सुनने वालों पर अपने संस्मरणों का गैरजरूरी पानी उलीच देते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी सम्मेलन या बैठक का मुद्दा धरे रह जाता है, और बोलने वाले वही बोलते हैं जो अपनी जिंदगी के बारे में वे बोलना तय करके आते हैं, फिर चाहे कांफ्रेंस के बैनर पर कोई भी विषय लिखा हो। बड़े लोगों की यादों के बड़े और लंबे कारवां को बाकी लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनने का नाटक करते हैं, और जिन्हें ऐसे नाटक में कोई दिलचस्पी नहीं होती उनका वक्त और बर्बाद होते चलता है। हालांकि यादों की बारात देखते हुए सिर हिलाने और आखिर में तालियां बजाने का मौका चापलूसों या मातहतों के लिए खासा मायने रखता है, और वे उसे चूकना नहीं चाहते। 

किसी बड़ी बैठक या सम्मेलन में हर किसी के बोलने का वक्त भी तय रहता है, लेकिन जब लोग बोलना शुरू करते हैं, तो वे यह मानकर चलते हैं कि उनकी कही बातें इतना मायने रखती हैं कि मौजूद लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे दुगुने वक्त तक उन्हें सुनें। नतीजा यह होता है कि विषय की गाड़ी पटरी से ऐसे उतरती है कि कोई एक व्यक्ति ऐसे इंजन-डिब्बों को उठाकर फिर पटरी पर ला भी नहीं पाते। दिक्कत यह होती है कि जिन लोगों को अमूमन मंच और माईक पर से बोलना होता है, उन्हें कभी बोलना सिखाया नहीं जाता, कभी रोका-टोका नहीं जाता, और नतीजा यह होता है कि वे अपने कहे में मुद्दे की बात से परे खासी बर्बादी अपने वक्त की भी करते हैं, और बाकियों के वक्त की भी। आमतौर पर कांफ्रेंस टीवी पर चल रहे उस अकेले चैनल जैसी हो जाती है जिसमें आगे शायद कुछ जरूरी आएगा मानकर बहुत सारा कूड़ा बर्दाश्त करना होता है। 

कम से कम सरकारों को, और राजनीतिक संगठनों को अपने लोगों को चुस्त, प्रासंगिक, और रोचक बोलना सिखाना चाहिए ताकि वे सरकार, पार्टी, या किसी और संगठन का नजरिया ठीक से सामने रख सकें। कुछ संगठन अपने सदस्यों के लिए मंच पर से बोलना सिखाने की ट्रेनिंग रखते हैं, और सरकार में भी, राजनीतिक दलों में भी ऐसी ट्रेनिंग जरूरी है। टीवी पर राजनीतिक दलों के बहुत से ऐसे औसत प्रवक्ता या प्रतिनिधि पहुंच जाते हैं जो कि यादों और संस्मरणों की नाव पर बहस को पार कर लेना चाहते हैं। कुछ बड़े वकील अपनी पार्टियों की बात को रखते हुए उसे ऐसा जटिल कानूनी बनाने में जुट जाते हैं कि मानो किसी छोटी अदालत के साधारण ज्ञान वाले जज को अपने ज्ञान के आतंक से दहशत में ला रहे हों। जनता के बीच न तो गैरजरूरी यादों का कोई असर होता, न ही गैरजरूरी तकनीकी-तर्कों का। इसलिए किसी कांफ्रेंस या बैठक से लेकर प्रेस कांफ्रेंस या टीवी बहस तक तमाम लोगों को यह सीखना और सिखाना चाहिए कि सीमित समय में मुद्दे की बात कैसे कही जाए, और कैसे महज मुद्दे की बात कही जाए। पटरी से उतरकर बोलना किसी मौके को बर्बाद करने से कम नहीं रहता। ऐसी बहुत सी कतरा-कतरा बातें हैं जो कि लोगों का वक्त बर्बाद होने से बचा सकती हैं, और लोगों की कही बातों को असरदार भी बना सकती हैं। चापलूस विशेषणों के सैलाब से लेकर यादों की बारात तक, सबमें भारी कटौती की जरूरत है, और यह बात हर संगठन को, हर सरकार को अपने लोगों को खूब अच्छी तरह सिखाना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 16-Jul-2019

छत्तीसगढ़ के बस्तर के लगातार जीतने वाले एक कामयाब आदिवासी विधायक कवासी लखमा को राज्य की भूपेश बघेल सरकार ने जब मंत्रिमंडल की पहली लिस्ट में ही रखा, तो उस समय भी यह सवाल उठा था कि वे लिखना-पढऩा नहीं जानते हैं, और ऐसे में मंत्री की जिम्मेदारियां किस तरह पूरी कर पाएंगे? इसके बाद से विधानसभा की कार्रवाई उनके विभागों से जुड़े सवालों पर दूसरे मंत्री जवाब देते आए हैं। कवासी लखमा की समझ, उनका तजुर्बा, और उनकी राजनीतिक क्षमता पर किसी को शक नहीं है, लेकिन मंत्री के पद से जुड़ी हुई कुछ ऐसी जिम्मेदारियां होती हैं जो कि फाईलों और कागजों से होते हुए विधानसभा या अदालत में जवाब देने तक खड़ी रहती हैं। ऐसे में यह सवाल उठाना नाजायज नहीं होगा कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी उनके लिए कोई ऐसी भूमिका तय नहीं कर सकती थी कि जिससे वे अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए आज की तरह असुविधा से नहीं गुजरते?

किसी जननेता का अकेला सम्मान मंत्रीपद नहीं होता, उसे महत्व देने के लिए सत्ता और संगठन में कई किस्म के काम हो सकते हैं। कुछ मामलों में मंत्रिमंडल में बिना विभागों वाले मंत्री भी रखे जाते हैं, जिनकी क्षमता का इस्तेमाल फाईलों से परे भी किया जाता है। आज कवासी लखमा को आबकारी विभाग देखना होता है जो कि राज्य में सबसे बड़ी कमाई वाला विभाग है, जो परंपरागत रूप से सबसे अधिक भ्रष्ट भी रहते आया है, और जिस विभाग से जुड़े दारू कारोबारी राज्य की राजनीति में अपनी थैलियों से सबसे अधिक दखल भी रखते हैं। जाहिर है कि ऐसे विभाग को चलाते हुए सिर्फ एक मजबूत समझ काफी नहीं हो सकती, उसके लिए फाईलों को पढऩा, उनको समझना, उन पर लिखना भी जरूरी होता है। कल को अगर इस विभाग की फाईलों को किसी अदालत में खड़ा होना पड़े, तो यह बात एक मुद्दा बन सकती है कि मंत्री ने जब पढ़कर समझा नहीं है, तो उन्होंने उस पर दस्तखत कैसे किए? और यह बात अदालत में सरकार के खिलाफ जा सकती है। कवासी लखमा को वाणिज्य और उद्योग जैसे विभाग भी दिए गए हैं जो कि कारोबारियों से, उद्योगपतियों से, और पूंजीनिवेशकों से जुड़े रहते हैं। वैसे तो किस मंत्री को क्या विभाग दिए जाएं, यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन इन विभागों को कवासी लखमा को देने से एक ऐसी छवि भी बनती है कि इनको अफसरों के मार्फत ही चलाया जा रहा है। यह नौबत ठीक नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल भी नहीं है कि निर्वाचित नेता अफसरों के किए हुए पर महज दस्तखत करें या अंगूठा लगाएं।

कवासी लखमा जितनी बार मुश्किल बस्तर के आदिवासी इलाके से जीतकर आए हैं, उन्हें सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार में एक बड़ा महत्व मिलना जायज और जरूरी है। लेकिन यह महत्व मंत्रीपद के मौजूदा ढांचे में फिट नहीं बैठ रहा है। मुख्यमंत्री चाहें तो उन्हें अपने बंगले पर लगने वाली जनचौपाल का प्रभारी बना सकते हैं जहां वे लोगों की बातें सुनकर अधिकारियों को जुबानी निर्देश दे सकते हैं, और किसी फाईल पर दस्तखत करने की मजबूरी भी नहीं रहेगी। हम किसी भी तरह से समझ को ज्ञान के नीचे नहीं मान रहे, लेकिन मंत्रीपद की कुछ जिम्मेदारियां पढ़े-लिखे बिना पूरी नहीं हो सकतीं। राज्य सरकार ने मंत्री स्तर का दर्जा देने के कई प्रावधान हैं और उनका इस्तेमाल करके कवासी लखमा का सम्मान बरकरार रखा जा सकता है, और सरकार शासकीय कामकाज को नियमों के मुताबिक करने की अपनी जिम्मेदारी भी निभा सकती है। आज जिस तरह से उनसे काम लिया जा रहा है यह किसी दिन उन्हीं के खिलाफ कानूनी दिक्कत खड़ी कर सकता है। ऐसी नौबत से सबको बचना चाहिए, और किसी के पढऩे-लिखने की कमी को मजाक या कानूनी परेशानी का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए। सत्तारूढ़ पार्टी अपने संगठन में, या सरकार में कवासी लखमा की क्षमता के अनुरूप कोई दूसरी जिम्मेदारी ढूंढे।
-सुनील कुमार


Date : 15-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के एक ब्राम्हण भाजपा विधायक की बेटी ने मर्जी से एक दलित लड़के से शादी की, और उसके बाद एक वीडियो बयान जारी किया कि अपने विधायक पिता से उसे और उसके पति को जान का खतरा है। विधायक ने इसका खंडन किया, और कहा कि उनसे किसी को खतरा नहीं है। लेकिन सुरक्षा मांगते हुए जब यह नवविवाहित जोड़ा हाईकोर्ट पहुंचा, तो आज वहां हाईकोर्ट के अहाते में ही उनसे मारपीट हुई। इस पर हाईकोर्ट ने विधायक को चेतावनी भी जारी की है, और पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहा है। सोशल मीडिया इस पर दो खेमों में बंट गया है, एक खेमा यह मानता है कि जिस पिता ने लड़की को बड़ा किया, उसके खिलाफ ऐसी बदनामी करना बेटी की एक नाजायज हरकत थी। दूसरा खेमा यह मानता है कि इस लड़की को अपने लिए खतरे को समझने और उससे हिफाजत मांगने का पूरा हक है। चूंकि ऐसे कई मामले हाल के दिनों में सामने आए हैं, और कल ही छत्तीसगढ़ में एक पेड़ से टंगा हुआ एक जोड़ा मिला भी है जिसकी शिनाख्त नहीं हो पाई है, इसलिए इस मुद्दे पर लिखना जरूरी है। 

देश भर मेें कई जगहों पर ऐसे जोड़ों के साथ हिंसा होती है, जगह-जगह हत्याएं हो रही हैं, और बहुत से परिवार ऐसा कत्ल करके फख्र भी हासिल करते हैं, इसलिए अगर किसी ने सोशल मीडिया पर खतरे की आशंका जाहिर करते हुए अदालत से हिफाजत मांगी है, तो वह एक कारगर तरीका दिख रहा है। और भी जोड़े इस तरह का काम कर सकते हैं कि अपने बयान के साथ अदालत से हिफाजत मांगें, और फिर उन पर हिंसक हमले का इरादा रखने वाले लोगों के हौसले कुछ पस्त हों। यह सिलसिला बहुत जल्द खत्म इसलिए नहीं होने वाला है कि भारत की कट्टर जाति व्यवस्था के बीच अपनी बेटी किसी दलित के घर जाते हुए देखने के बजाय बहुत से सवर्ण मां-बाप उसे मार डालना बेहतर समझते हैं, या ऐसे लड़कों को मार डालना बेहतर समझते हैं जो कि उनकी लड़की से शादी की हिम्मत करते हैं। एक तरफ तो देश का कानून यह कहता है कि अनुसूचित जाति या जनजाति में इन जातियों से बाहर के लोग अगर शादी करते हैं, तो उन्हें सरकार की तरफ से नगद सहायता भी मिलती है। दूसरी तरफ इनकी हिफाजत मुश्किल हो चली है। 

जिस तरह बहुत सी सामाजिक कट्टरता को खत्म करने के लिए कानून की जरूरत पड़ते आई है, उसी तरह आज अंतरजातीय, या विधर्मी विवाह के लिए, प्रेम-विवाह के लिए बालिगों को एक अलग से हिफाजत देने का कानून न सही, सुप्रीम कोर्ट का आदेश जरूरी है जिसे मानना देश भर की पुलिस के लिए एक बाध्यता होगी। एक ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे ऐसे जोड़े जिले के कलेक्टर या एसपी को एक हलफनामा दें, और उसके बाद उनकी खतरे की आशंका को दर्ज किया जाए, वे जिनसे खतरा बता रहे हैं उन्हें बुलाकर सावधान कर दिया जाए कि किसी हमले के होने पर वे खतरे में फंसेंगे। आज देश में ऐसी हिंसा की घटनाएं तो कम होती हैं, लेकिन मर्जी से शादी न होने पर आत्महत्याएं खासी अधिक होती हैं, और नौजवान पीढ़ी का एक हिस्सा कुंठा में जीता है। आज जब 21वीं सदी में सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में लोगों के लिए बच्चे पैदा करने के लिए भी शादी की बंदिश नहीं रह गई है, जहां जाति और धर्म मायने नहीं रखते हैं, जहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली हुई है, वहां आजादी की पौन सदी गुजर जाने पर भी हिन्दुस्तान एक खाप पंचायत की तरह बर्ताव कर रहा है। यह एक अच्छी बात है कि यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा है, और इसे लेकर एक कानूनी व्यवस्था लागू होनी चाहिए जो कि लोगों को हिफाजत दे सके, और बालिगों को मर्जी से शादी का मौका दे सके। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अंडे को लेकर एक विवाद चल रहा है कि स्कूलों में दोपहर के भोजन में बच्चों को अंडा दिया जाए, या नहीं? हिन्दू समाज के एक बहुत छोटे हिस्से, और जैन समाज को अंडे से परहेज है। कुछ लोगों का परहेज पिछले कुछ दशकों में घट गया है क्योंकि अंडे के हिमायती बताते हैं कि अब वह मांसाहारी नहीं रह गया क्योंकि अब उससे बच्चे नहीं निकलते, इसलिए वह शाकाहारी हो चुका है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में यह विरोध एक बिल्कुल ही अलग तबके की तरफ से शुरू हुआ है, कबीरपंथियों की तरफ से। अंडे का विरोध जैन या ब्राम्हण करते, या मारवाड़ी करते तो वह अधिक स्वाभाविक लगता, लेकिन कबीरपंथियों की तरफ से यह विरोध लोगों को थोड़ा चौंका गया है, इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि संपन्न शहरियों को शायद कबीरपंथ में प्रचलित मान्यताओं की जानकारी कम थी। 

खैर, जो भी हो, आज मुद्दा यह है कि स्कूली बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए उन्हें दोपहर के भोजन में अंडा देना ठीक है, या नहीं? मामला थोड़ा जटिल है। स्कूलों के भोजन में एक समय इस बात को लेकर एक तबके का विरोध चल रहा था कि खाना पकाने के लिए किसी दलित महिला को न रखा जाए। फिर हिन्दुस्तान के कुछ हिस्सों में कुछ समय तक यह विरोध भी चला कि सवर्ण बच्चे दलितों बच्चों के साथ एक पंगत में बैठकर कैसे खाएंगे? और कैसे उन्हीं थालियों का इस्तेमाल करेंगे जो कि पिछले दिन जाने किस जाति के बच्चे ने इस्तेमाल की होगी। यह मामला अब कम से कम अधिक जगहों पर तो सुनाई नहीं पड़ता है, और सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले, आमतौर पर गरीब बच्चे सभी बिना किसी जाति-धर्म के हल्ले के, किसी का भी पकाया हुआ, किसी के भी साथ बैठकर खाने लगे हैं। एक समाजशास्त्री का यह निष्कर्ष था कि भिलाई जैसे कारखाने वाले शहर में सार्वजनिक उपक्रम बीएसपी में जाति व्यवस्था की तंगदिली कमजोर थी, लेकिन उसी भिलाई के निजी कारखानों में उसी दर्जे के मजदूरों के बीच वह कायम थी। हो सकता है कि हिन्दुस्तान के सरकारी स्कूलों में दोपहर के भोजन के चलते इस पीढ़ी से जाति व्यवस्था कमजोर हो रही हो, और महंगी निजी स्कूलों में सवर्ण बहुतायत की वजह से वह मजबूती से जारी हो। 

अब सवाल यह उठता है कि कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा दिया जाए या नहीं? देश के कई हिस्सों में यह व्यवस्था चले आ रही है, और राजनीतिक ताकतों से परे इसका कोई विरोध भी नहीं हुआ। वैसे भी यह स्कूली खाने में एक अतिरिक्त सामान ही रहने जा रहा है, जिन बच्चों को अंडा खाना हो वे खाएं, और जिन्हें न खाना हो वे न खाएं। लेकिन जिन परिवारों को अंडे से परहेज है, उनके लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि बाकी बच्चों को अंडा खाते देखकर उनके बच्चे भी वैसा करने लगें, तो पारिवारिक प्रथा टूट जाएगी। लेकिन देखादेखी अगर कोई प्रथा टूटनी है, तो वह तो महंगे स्कूलों में घर से टिफिन में मांसाहार लेकर जाने वाले बच्चों के शाकाहारी परिवारों के बच्चों पर असर से भी टूट सकती है। जहां तक कुपोषण से लडऩे का सवाल है तो शाकाहारी तबका मांसाहारी लोगों के तर्क मानने से वैसे भी इंकार कर देता है कि कुछ जरूरी तत्व सिर्फ मांसाहार से मिल सकते हैं। शाकाहारी लोग मांसाहार का विकल्प ढूंढ ही लेते हैं, लेकिन उसके लिए उनकी खर्च की ताकत होना जरूरी रहता है। 

सरकारी स्कूलों में उन इलाकों के कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा खिलाने पर बाकी लोगों का विरोध फिजूल का है। स्कूल का सारा खाना अंडे का नहीं रहेगा, और जो बच्चे उसे न खाना चाहते हों, वह बाकी खाना खा सकते हैं। जब गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है, तो स्कूलों के खाने के रास्ते ही उनकी मदद की जा सकती है। और बाकी बच्चों में इसके लिए एक बर्दाश्त विकसित करना जरूरी है। आज पूरे हिन्दुस्तान में जिस तरह से खानपान को लेकर कुछ लोगों को हिंसक तेवर सड़कों पर दिखते हैं, उन्हें देखते हुए खाने की अलग पसंद रखने वाले लोगों के साथ जीना भी आना चाहिए। आज देश के कुछ राज्यों में हिन्दूवादी सरकारों ने खानपान तैयार करने का जिम्मा ऐसे धार्मिक या शाकाहारी संगठनों को दे दिया है जिन्होंने स्कूल के खाने से प्याज-लहसुन तक अलग कर दिया है। हिन्दू या जैन समाज के एक बहुत छोटे तबके की खानपान की पसंद को बाकी लोगों पर इस तरह लादना ठीक नहीं है। विज्ञान के मुताबिक अब अंडा शाकाहारी माना जाता है, और उससे एक आक्रामक परहेज उन लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जो कि कुपोषण के शिकार हैं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज किसी धर्म के, कुछ जातियों के, या मांसाहार करने वाले लोगों को देश के अधिकतर शहरों में कई रिहायशी इलाकों या इमारतों में मकान नहीं मिल पाते। इस आक्रामकता की धार को वैज्ञानिकता से ही कम किया जा सकता है, और स्कूलों में अंडा देना इसकी एक बुनियादी शुरुआत हो सकती है। लोगों के सामाजिक संस्कारों को देखते हुए यह जरूर ध्यान देना चाहिए कि अंडा पकाने और खिलाने का काम उन्हीं बच्चों के लिए हो जो उसे चाहते हों। और ऐसा तो आज किसी भी रेस्त्रां में होता ही है कि वहां मांसाहार भी बनता है, और शुद्ध शाकाहारी भी वहां जाकर अपनी मर्जी का शाकाहारी खाना खाते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Jul-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जमीन के एक झगड़े में आमने-सामने हुए कुछ हिन्दू और कुछ मुस्लिम लोगों के तनाव को साम्प्रदायिक रंग देने में पेशेवर दंगाई जुट गए हैं। एक टीवी चैनल जो कि पूरे ही वक्त इस देश में साम्प्रदायिकता की बात करता है, उसने इस तनाव को धर्म के रंगों में रंगकर साम्प्रदायिकता भड़काने की पूरी कोशिश की, लेकिन छत्तीसगढ़ का मिजाज कुछ ऐसा है कि यहां ऐसे दंगे भड़कते नहीं हैं। लोगों को आमतौर पर याद भी नहीं पड़ता कि उन्होंने पिछला कफ्र्यू कब देखा था, या कब कोई साम्प्रदायिक टकराव हुआ था। ऐसे में खुलकर तनाव को भड़काना किसी किस्म से मीडिया का काम नहीं है, यह एक अलग बात है कि टेक्नालॉजी की मेहरबानी से एक मशीन हो तो अखबार छापा जा सकता है, और उससे अधिक पूंजीनिवेश हो तो कोई टीवी चैनल शुरू करके उस पर मनचाही खबरें फैलाई जा सकती हैं। देश का कानून कहने के लिए तो इस मामले में खासा कड़ा है कि टीवी चैनल के लिए लाइसेंस या इजाजत लेने में लोगों को बरसों लग जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बड़े-बड़े दुष्ट और भ्रष्ट लोग अपने जाने-पहचाने कारोबार के बाद भी टीवी चैनल शुरू कर लेते हैं, साम्प्रदायिकता भड़काने के लिए झूठी खबरें दिखाकर पकड़ में आने वाले लोगों के चैनल भी जारी रहते हैं, और कमोबेश ऐसा ही हाल प्रिंट मीडिया के मालिकों का रहता है जिनके किसी भी किस्म के काम में मीडिया से जुड़े कानून आड़े नहीं आते, और उनका कारोबार जारी रहता है। 

लेकिन बाकी कारोबारी मामलों से परे जब देश की साम्प्रदायिकता एकता की बात आती है तो उसे सोच-समझकर बिगाडऩे में लगे हुए लोगों को किसी मीडिया की आड़ लेकर यह काम नहीं करना चाहिए। दंगाई अगर सीधे-सीधे पहचान में आते हैं तो उन पर कार्रवाई आसान होती है, लेकिन जब किसी धर्म, किसी आध्यात्मिक संगठन, किसी मीडिया का चोला पहनकर यह काम करते हैं, तो उन पर कार्रवाई कुछ मुश्किल रहती है। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को साम्प्रदायिकता बनाने की कोशिश मीडिया का काम नहीं कही जा सकती, फिर चाहे इसके लिए मीडिया के नाम के मालिकाना हक का इस्तेमाल हो, या मीडिया के लिए प्रचलित औजार का इस्तेमाल हो। मीडिया के औजार अगर साम्प्रदायिकता या हिंसा के हथियार बना लिए जाएं, तो उस पर सरकारी कार्रवाई में मीडिया के नाम पर किसी रियायत की न तो उम्मीद करनी चाहिए, और न ही वकालत। 

इस देश में कुछ दशक पहले तक श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था जो कि पत्रकारों के हक की लड़ाई तो लड़ता ही था, वह पत्रकारिता के सिद्धांतों को लेकर भी लड़ता था और जिसके मंच पर इस पेशे के सिद्धांत, उसकी ईमानदारी की बात भी होती थी। वह दौर खत्म हो गया, और अब एक बिल्कुल ही अलग चाल, चरित्र, और जरूरत वाली संस्था, प्रेस क्लब, देश के अलग-अलग शहरों में चलन में हैं। दिल्ली से लेकर रायपुर तक अब मीडिया के मुद्दे प्रेस क्लब के बैनरतले उठने लगे हैं क्योंकि श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मरकर गहरे दफन हो चुका है। लेकिन प्रेस क्लब को अपने नाम के क्लब वाले हिस्से को अपने पर हावी नहीं होने देना चाहिए, और अगर वह मीडिया से जुड़े मुद्दों को उठाना चाहता है, तो उसे लोकतंत्र में मीडिया की बुनियादी जिम्मेदारी को समझते हुए मीडिया के सिद्धांतों पर भी चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को सोच-समझकर साम्प्रदायिकता का रंग देने की कोशिश लोकतंत्र का मीडिया-औजार नहीं है, यह लोकतंत्र के खिलाफ एक हथियार है। और ऐसी कोशिशों का साथ देने के पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी के प्रेस क्लब को यह भी समझना चाहिए कि अपने बीच के गलत लोगों को बचाकर कोई संस्था न तो इज्जत पा सकती, और न आगे चलकर किसी सही को बचाने के लिए उसकी ताकत काम आएगी। 

छत्तीसगढ़ एक शांतिप्रिय राज्य रहा है, और यहां पर घोर साम्प्रदायिक संगठन भी दुबके हुए ही चलते हैं। साम्प्रदायिक आक्रामकता की इस राज्य में कोई जगह नहीं है, और मीडिया के जो गिने-चुने लोग साम्प्रदायिकता फैलाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी भी छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में कोई जगह नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Jul-2019

देश के एक बड़े स्टील निर्माता नवीन जिंदल को कल केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र ने जिस तरह अपने कारखाने का दौरा करवाया है वह हैरान करने वाला है। नवीन जिंदल पर केन्द्र सरकार की ही जांच एजेंसी सीबीआई मुकदमा चला रही है कि उन्होंने रिश्वत देकर, गलत तरीके से केन्द्र सरकार से कोयला खदान हासिल की। इस मामले में अपनी कंपनी के सभी बड़े अफसरों के साथ नवीन जिंदल जमानत पर रिहा हैं। केन्द्र सरकार के भला कौन से उपक्रम की यह समझदारी कही जाएगी कि वह केन्द्र सरकार के खिलाफ साजिश करके, भ्रष्टाचार से खदान हासिल करने वाले को मेहमान बनाकर अपना कारखाना दिखाए? और यह बात उस वक्त अधिक गंभीर हो जाती है जब अंतरराष्ट्रीय खुले बाजार में भिलाई इस्पात संयंत्र और नवीन जिंदल एक-दूसरे के मुकाबले खड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि एक वक्त जब बीएसपी के एमडी विक्रांत गुजराल थे, और बीएसपी रेलपांत बनाने के काम में सबसे आगे थी, तब जिंदल ने रेलपांत बनाना शुरू किया था, और गुजराल बीएसपी को छोड़कर जिंदल की नौकरी में चले गए थे, और आज तक उसी कंपनी में हैं। उस वक्त भी ये आरोप लगे थे कि गुजराल ने बीएसपी के मुखिया रहते हुए जिंदल के इंजीनियरों को रेलपांत बनाने की तकनीक दिखाई थी, जिसका फायदा जिंदल को मिला। 

आज जब मोदी सरकार एक-एक करके बहुत से सार्वजनिक उपक्रम बेचने की अपनी नीयत और तैयारी खुलकर बता चुकी है, तब बीएसपी को इस तरह एक दूसरे कारोबारी के सामने खोलकर रख देना किसी तरह का शिष्टाचार नहीं है, यह सीधे-सीधे बीएसपी के हितों के खिलाफ एक साजिश है, फिर चाहे इसका फैसला किसी भी स्तर पर क्यों न लिया गया हो। लोगों को याद है कि एनडीए और यूपीए सरकारों के वक्त जब एक-एक करके निजी फोन कंपनियां बाजार में आ रही थी, तो किस तरह सरकारी टेलीफोन कंपनी को आधुनिकीकरण में सोच-समझकर सुस्त रखा गया था, और उसे घाटे की कंपनी बनने पर मजबूर किया गया था। जब निजी विमान सेवाएं चालू हुईं, तो उन्हें मुनाफे के रास्ते दिए गए, और सरकारी विमान कंपनी को कोशिश करके घाटे में लाया गया। वहां से लेकर छत्तीसगढ़ में राज्य परिवहन निगम बंद करने के पहले जोगी सरकार के वक्त जो नौबत लाई गई, उसके चलते सरकारी बसें घाटे में आईं, और निजी बसों का धंधा आसमान पर पहुंच गया। कुछ और आगे बढ़कर देखें तो जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ में निजी अस्पताल बढ़ते चले गए, वैसे-वैसे सरकारी चिकित्सा ढांचे को कमजोर किया गया, बिगाड़ा गया, ताकि लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हों। इसके बाद सरकारी चिकित्सा बीमा योजना में सारे निजी अस्पतालों को शामिल करके सरकारी अस्पतालों को एक किस्म से अप्रासंगिक ही बना दिया गया कि जनता को तो बीमे के तहत निजी अस्पतालों से इलाज मिल ही रहा है। 

सरकार को सोच-समझकर घाटे में लाने की यह योजना कोई नई नहीं है। जिस बीएसपी से जिंदल उसका एमडी छीनकर ले गया था, उसी बीएसपी में उसी जिंदल के लिए लाल कालीन बिछाकर स्वागत करना वहां के अफसरों की नीयत उजागर करता है, और हो सकता है कि इसके पहले दिल्ली की मंजूरी भी रही हो। यह समझने की जरूरत है कि नवीन जिंदल के अपने कारखाने बिक गए हैं, जिन्हें उनके भाई ने ही खरीदा है। ऐसे में इतनी बड़ी बीएसपी को किस उम्मीद से जिंदल के सामने पेश किया जा रहा है? नेहरू के बनाए हुए देश के इस पहले सबसे बड़े औद्योगिक तीर्थ को एक पशु बाजार में पशु कारोबारी के सामने खड़ा कर दिया गया है, और मानो नवीन जिंदल इसकी देह को टटोलकर इसमें गोश्त का अंदाज लगाने आया हुआ हो। इसके बाद देश में केन्द्र सरकार द्वारा अपराधी साबित करने के लिए जितने लोगों को कटघरे में खड़ा किया गया है, वे भी जमानत मिलने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र आकर मांग कर सकते हैं कि उन्हें भी कारखाना घुमाया जाए। भारत का संविधान दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव की इजाजत नहीं देता है, यह एक अलग बात है कि जिन लोगों पर अब तक केन्द्र सरकार के साथ साजिश और भ्रष्टाचार करने का मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, और जिन्हें जमानत लेने की जरूरत नहीं पड़ी है, उन लोगों को बीएसपी के अफसर घुमाने से मना भी कर सकते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Jul-2019

कल गुजरात की खबर थी कि एक गैरदलित से शादी करने वाले दलित नौजवान को ससुराल वालों ने पीट-पीटकर मार डाला। कल ही किसी और जगह की खबर थी कि उत्तरप्रदेश भाजपा के एक ब्राम्हण विधायक की बेटी ने एक वीडियो जारी करके बयान दिया है कि उसने एक दलित से शादी की है, और उसे अब पिता की ओर से जान का खतरा लग रहा है। एक तीसरा वीडियो कल से हवा में तैर रहा है कि किस तरह उत्तराखंड में भाजपा का एक निलंबित विधायक दोनों हाथों में बंदूक-पिस्तौल थामे हुए, और मुंह में एक और पिस्तौल दबाए हुए शराब पीते हुए, गालियां देते हुए फिल्मी गाने पर डांस कर रहा है। कुल मिलाकर हिंदुस्तानी समाज की तस्वीर भयानक है जिसमें जगह-जगह प्रेमीजोड़ों को मारा जा रहा है, सामाजिक रीति-रिवाज का पालन न करने पर खाप पंचायतें लोगों पर जुर्माना लगा रही हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।

हिंदुस्तान सदियों से चली आ रही सती प्रथा से किसी तरह उबरा था। उसके बाद बाल विवाह के खिलाफ बने कानून को लागू करने में आज तक सरकारों की जान निकली जा रही है, लेकिन हर बरस अक्षय तृतीया पर देश भर में हजारों बाल विवाहों की खबरें आती हैं। छुआ-छूत देश में इस बुरी तरह फैला हुआ है कि दलितों को न तो शादी में घोड़ी पर चढऩे मिलता, न बस्ती के कुएं से पानी लेने मिलता, और कहीं किसी मंदिर के गरम तपते पत्थर पर किसी दलित बच्चे को नंगा बिठा दिया जाता है। हैवानियत कही जाने वाली, लेकिन हकीकत में इंसानियत, के चलते जगह-जगह इंसान और इंसान में फर्क इतने दुस्साहस के साथ किया जाता है कि मानो देश में कोई कानून हैं ही नहीं। 

कुछ बातें एक-दूसरे से अलग लगती हैं, लेकिन रहती नहीं हैं। जब देश में धर्मांधता, कट्टरता, रक्तशुद्धता, और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता है, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच तमाम मामलों में अवैज्ञानिक होने लगती हैं। जाति व्यवस्था सिर उठाने लगती है क्योंकि किसी जाति के बेहतर होने, और किसी जाति के बदतर होने की सोच जोर पकडऩे लगती है। आज हिंदुस्तान की घड़ी मानो एक सदी पीछे ले जाई जा रही है, और समाज में जगह-जगह राजनीति से परे के लोग भी चलन से बाहर हो चली कट्टरता को फिर से इस्तेमाल में लाने लगे हैं। देश की सोच से वैज्ञानिकता का खत्म होना बहुत भयानक इसलिए है कि आने वाली पीढिय़ां इसी सोच के साथ बड़ी होंगी, और वे महिला विरोधी होंगी, वे गरीबी और बीमारी को ईश्वर की दी हुई सजा मानेंगी, वे एक जाति के दूसरे से बेहतर होने पर भरोसा करते हुए छुआ-छूत को बढ़ावा देंगी, और कुल मिलाकर दशकों की मेहनत से देश की सोच में आया हुआ सुधार ढहने लगेगा, ढह रहा है।

किसी देश या समाज की सोच को कतरे-कतरे में नहीं सुधारा जा सकता। या तो लोगों को तमाम मामलों में बराबरी से लोकतांत्रिक समझ दी जा सकती है, या फिर वे न्यायसंगत, तर्कसंगत न बनकर अलोकतांत्रिक बन जाते हैं, और उनके लिए संसद या अदालत से अधिक महत्व खाप पंचायतों के अंदाज की जीवनशैली का हो जाता है। इसीलिए हिंदुस्तान में जगह-जगह प्रेमी जोड़े हर दिन आत्महत्या करते हैं, घर और शहर छोड़कर भाग जाने को मजबूर होते हैं, या फिर परिवार वालों के हाथ मार दिए जाते हैं। ऐसा लगता है कि इन मामलों में अदालत को जितनी सक्रियता दिखानी चाहिए, वह नहीं हो रही है। कानून बने हुए हैं, लेकिन उनके खिलाफ काम करने को पारिवारिक और सामाजिक गौरव मान लिया जा रहा है, और उसके मुताबिक हिंसा की जा रही है। जो नेता वोटों के मोहताज होते हैं, उनसे अधिक उम्मीद नहीं की जाती कि वे सामाजिक कट्टरता के खिलाफ खुलकर सामने आएं, ऐसे में अदालतें ही किसी काम की हो सकती हैं।
-सुनील कुमार


Date : 10-Jul-2019


कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार जिस हद तक डांवाडोल चल रही है, उसका जारी रहना भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, लेकिन जिस अंदाज में सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक अपनी सरकार को गिराने के लिए एक साजिश की तरह लगे हुए हैं, वह लोकतंत्र के लिए उससे भी बड़ा खतरा है। फिर यह बात भी है कि आज तो इस राज्य में भाजपाविरोधी इन दो पार्टियों के गठबंधन में ऐसी तोडफ़ोड़हो रही है, लेकिन जब राज्य में महज भाजपा की सरकार थी, उस वक्त भी सत्तारूढ़ भाजपा विधायक बाढ़ में घिरे हुए अपने चुनाव क्षेत्रों को छोडक़र आन्ध्र के सात सितारा होटलों में ऐश कर रहे थे, और सरकार गिराने की पूरी कोशिश कर रहे थे। यह राज्य इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता को भुगत चुका है, और भुगत रहा है। 
इसके पीछे की वजहों को देखें, तो कर्नाटक के बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं की अवैध खनन से हुई दसियों हजार करोड़ की कमाई दिखती है जिसके चलते उनके सिर पर सुषमा स्वराज जैसी बड़ी नेता का हाथ रहते आया था, और जिसके चलते वे भाजपा-सरकार में ताकतवर मंत्री थे, और मुख्यमंत्री को पलटने के लिए वे विधायकों को लेकर दूसरे प्रदेशों में ठीक वैसे ही डेरा डाले हुए थे जैसा आज मुंबई या गोवा में सत्तारूढ़ विधायक डालकर बैठे हैं। रेड्डी बंधुओं की पैसे की ताकत, और दो नंबर के खनिज-धंधों की कर्नाटक में संभावनाओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि आज वहां सरकार पलट भी जाए, तो भी भाजपा सत्तारूढ़ होकर भी रेड्डी बंधुओं के प्रभामंडल से मुक्त नहीं हो पाएगी। लोगों को याद है कि जब कानूनी मामलों में फंसे होने की वजह से इन्हें भाजपा ने उम्मीदवार नहीं बनाया, तो भी इनके इलाके में इन्हीं की मर्जी के भाजपा उम्मीदवार रहे, और उनके लिए जीत भी इन्हीं ने ही खरीदी थी। 
अब अगर आज की मौजूदा कांग्रेस-जेडीएस सरकार को देखें तो यह कुछ अटपटे गठबंधन पर बनी और टिकी हुई है जिसमें बड़ी पार्टी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोटी पार्टी जेडीएस को दी है, और शुरू से ही इन दोनों पार्टियों के बीच तनातनी चल ही रही थी। इस बीच जब दिल्ली में नरेन्द्र मोदी की सरकार एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत के साथ लौटकर आई, तो उसका असर देश के हर प्रदेश पर कुछ न कुछ पड़ रहा है। ऐसे में बहुत कम बहुमत से चलने वाली गठबंधन सरकार पर इसका जल्द असर पडऩा था, और कर्नाटक में यह बात सामने आई है। यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसे कमाऊ राज्य में मंत्री बनने का मतलब अरबपति बनने की संभावना भी होता है, और कम ही विधायक ऐसे होंगे जो ऐसी संभावनाओं तक पहुंचने के लिए दल-बदल से कोई परहेज करें, या अपनी ही सरकार को पलटने और फायदा पाने का लालच छोड़ सकें। इसलिए आज महज भाजपा पर दल-बदल कराने और सरकार गिराने की तोहमत ठीक इसलिए नहीं है कि इस राज्य की संस्कृति ऐसी ही चली आ रही है, खुद खालिस भाजपा सरकार के भीतर भी ऐसी नौबत आ चुकी है, और आज राज्य की इन तीनों पार्टियों के लोग अगर सरकार गिराने, और सत्ता में आने के खेल में लगे हैं, तो वे तमाम पेशेवर खिलाड़ी हैं, और उनका यह खेल अगली किसी सरकार में भी जारी रहेगा। 
कर्नाटक एक मिसाल है कि किसी राज्य में जब विधायकों और मंत्रियों की कमाई अंधाधुंध हो जाती है, तो लोकतंत्र किस तरह जूते मारकर भगा दिया जाता है। लोकतंत्र को सरकार और विधानसभा के सामने की सडक़ों के पार फुटपाथ पर नैतिकता और ईमानदारी के साथ बैठकर भीख मांगनी पड़ती है। यह सिलसिला लोकतंत्र को खारिज कर चुका है, और इसे महज एक सरकार गिराने से परे भी देखना चाहिए क्योंकि एक-एक करके बहुत से संपन्न राज्यों में काली कमाई के फेर में ऐसी विधायक खरीद-बिक्री बढ़ती चली जाएगी जिससे अगले किसी भी चुनाव में जनता की लोकतांत्रिक पसंद की बात एक गंदी लतीफा बनकर रह जाएगी। अभी हम केन्द्र सरकार और उसकी जांच एजेंसियों के दबाव का जिक्र इसलिए नहीं कर रहे हैं कि अभी तक कर्नाटक के नाटक में उसकी जरूरत दिखी नहीं है। जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी आत्मा बेचने के लिए मंडी में खुद ही खड़े हुए हैं, तो उनके पीछे किसी बंदूक के टिके होने की आशंका करने की जरूरत भी नहीं है। फिलहाल कर्नाटक की यह खरीद-बिक्री, मोलभाव, इस प्रदेश के लोकतंत्र के नाम पर कालिख है, और ऐसा लगता है कि अब भारत की राजनीति में किसी को कालिख से कोई परहेज रह भी नहीं गया है।

 


Date : 09-Jul-2019

देश भर में गटर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए मरने वाले लोग खबर नहीं बन रहे हैं, और यह बेरूखी खबर बन भी रही है। कुल मिलाकर ऐसी मौतें आंकड़ों की शक्ल में आती हैं, और अगले दिन तक खबरों में उनकी तेरहवीं भी हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों ने इन्हें सरकारी हत्या करार देना शुरू किया है, और कम से कम एक सरकार ऐसी है जिसने इन मौतों की रोकथाम के लिए कोशिश शुरू की है, और ऐसी अमानवीय जिंदगी जीने वाले सफाई कर्मचारियों की बेहतरी के लिए कुछ कोशिश की है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार केन्द्र सरकार से लगातार टकराव झेलने के बाद अब अपने बूते जो कर पा रही है, उसमें लगी हुई है। उसने वहां पर ऐसे सफाई रोबो खरीदने की तैयारी शुरू की है जो गटर और नालों में उतरकर रिमोट कंट्रोल से सफाई करेंगे, और इंसानों को इस काम में झोंकना घटेगा, और शायद धीरे-धीरे बंद भी हो सकेगा। 

कल ही छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की एक खबर थी कि शासन ने प्रदेश की म्युनिसिपलों से इस किस्म के काम में होने वाली मौतों की जानकारी मांगी थी, और अधिकतर म्युनिसिपलों ने जानकारी नहीं भेजी है, इसलिए उन्हें नोटिस जारी किया गया है। देश में ऐसा अंधाधुंध शहरीकरण तो हो गया है जिसके चलते शहरी सड़कों और इमारतों के नीचे नाले दब गए हैं। इस देश में ऐसी संपन्नता भी आ गई है कि शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना अंधाधुंध कचरा पैदा करता है। लेकिन लोगों में यह जागरूकता नहीं आई है कि अपने पैदा किए हुए कचरे को कैसे ठिकाने लगाएं। नतीजा यह होता है कि जो कचरा अलग-अलग करके म्युनिसिपल के हवाले करना चाहिए, वह एक जैसा मिलाकर, उसमें इमारतों की तोडफ़ोड़ का मलबा और जोड़कर कचरा गाड़ी के लिए ढेर तैयार रखा जाता है। ऐसे में एक बार इन सबके मिल जाने पर इनको अलग करना नामुमकिन रहता है, और म्युनिसिपल अंधाधुंध खर्च करके भी कचरे के इन छोटे-छोटे टीलों को शहर के बाहर पहाड़ भर बना सकती है, उनका निपटारा नहीं कर सकती। और इसी बीच ढेर सा कचरा नालियों और नालों को बंद कर देता है, जिसे साफ करते हुए ऐसी मौतें होती हैं। जितना बड़ा और जितना संपन्न शहर होगा, उसमें सफाई कर्मचारियों की उतनी ही अधिक मौतें होंगी। और मौत तो फिर भी आंकड़ों की शक्ल में एक छोटी खबर बन जाती है, उससे परे जिस बुरे हाल में सफाई कर्मचारी गटर में डूबकर उसकी सफाई करते हैं, वह कचरा पैदा करके उसे गलत जगह, गलत तरीके से फेंकने वाले लोगों के लिए शर्म से डूब मरने की बात रहती है। 

आज की चर्चा का मकसद यह है कि सरकारों को संवेदनशील होना चाहिए, और आज महज मजबूरी में सफाई कर्मचारी ऐसे जानलेवा और अमानवीय, सेहत के लिए भयानक खतरनाक काम करने को अगर उपलब्ध हैं, तो उसे एक स्थाई व्यवस्था मान लेना बहुत ही अलोकतांत्रिक ज्यादती है। अधिक से अधिक सरकारों को अपना शहरी ढांचा ऐसा बनाना चाहिए कि उसमें मरने के लिए इंसानों को गटर में न उतारना पड़े। जो लोग शहरों में करोड़ों का घर बनाकर रहते हैं, उन्हें गटर की सफाई के लिए टैक्स देने पर भी मजबूर करना चाहिए। दिल्ली की सरकार ने गरीबों के लिए शानदार मुहल्ला क्लिनिक बनाकर एक मिसाल पेश की है, और वहां की सरकारी स्कूलें भी देश की सबसे अच्छी सरकारी स्कूलें बन गई है। ऐसे में जब केजरीवाल सरकार गटर साफ करने के लिए रोबो खरीदने की तैयारी कर रही है, तो इससे भी देश के बाकी प्रदेशों की सरकारों को, और केन्द्र सरकार को भी एक सबक लेना चाहिए। अगर इस देश में न्यूनतम मानवीय अधिकार की गारंटी देनी है, तो वह सफाई कर्मचारियों की जिंदगी बेहतर बनाए बिना नहीं हो सकती। एक लोकतंत्र को अपने देश के सबसे बदहाल लोगों के बारे में सबसे अधिक फिक्र करनी चाहिए, और ऐसे में गटर-शहीदों के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ऐसी शहादत रोकना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Jul-2019

केन्द्र सरकार के बताए आंकड़ों के मुताबिक अलग-अलग राज्यों में पुलिस के लाखों पद खाली पड़े हुए हैं। एक तरफ तो देश मेें बेरोजगारी के आंकड़े आसमान पर हैं, दूसरी तरफ साइबर अपराधों के चलते पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों पर काम का बोझ अंधाधुंध बढ़ते चल रहा है। इसके अलावा सामाजिक तनाव के बढऩे से पारिवारिक हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं, लोगों के सही या गलत किस्म के प्रेम और सेक्स-संबंधों के मामले पुलिस और अदालत तक पहुंच रहे हैं, और हर किस्म के अपराधी पहले के मुकाबले अधिक साधन-संपन्न भी होते जा रहे हैं। ऐसे में पुलिस की कमी से मौजूदा पुलिस पर दबाव इतना बढ़ता जा रहा है कि जिन मामलों में सत्ता पर बैठे लोगों की दिलचस्पी होती है, या जो खबरों में अधिक बने रहते हैं, बस उन्हीं की जांच तेजी से हो पाती है, बाकी आम लोगों के आम मामले पड़े रह जाते हैं। 

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में एक चौथाई से अधिक पुलिस-पद खाली हैं, बिहार में यह हाल और खराब है। नए बने राज्य तेलंगाना में करीब 40 फीसदी वर्दियां खाली हैं, और नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में 71606 पदों में से 11916 पद खाली हैं। देश का महज एक छोटा सा राज्य, उत्तर-पूर्व का नागालैंड ऐसा है जहां स्वीकृत पदों से करीब 10 फीसदी अधिक पुलिस है। लेकिन इन आंकड़ों में कोई नई बात नहीं है, और पिछले कुछ बरसों से सुप्रीम कोर्ट भी लगातार राज्यों से जानकारी ले रहा है, हलफनामे ले रहा है कि वे कब तक भर्तियां कर लेंगे, लेकिन यह काम बड़ी धीमी रफ्तार से चल रहा है। पुलिस विभाग के जानकार बड़े अफसरों का एक तर्क यह भी है कि एकमुश्त इतनी भर्तियां करने से आवेदन करने वाले लोगों में से सबसे अच्छे उम्मीदवारों को लेने के बाद बहुत से औसत उम्मीदवारों को भी ले लेना पड़ेगा जो कि ठीक नहीं होगा। इसके अलावा भर्ती के बाद के प्रशिक्षण का इंतजाम भी उतने लोगों का एक साथ नहीं हो सकता, इसलिए पुलिस विभाग के बाहर बैठे लोगों को इस काम में लापरवाही लग सकती है, लेकिन पुलिस के अपने तर्क हैं।
 
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले डेढ़-दो बरस में राज्य के पुलिस-परिवारों का एक आंदोलन देखा जिसे कुचलने के लिए उस वक्त की रमन सरकार का पूरा पुलिस महकमा जुट गया था, और किसी तरह बागी तेवरों को काबू में किया गया था। उसके बाद पुलिस जागी थी, और एक कमेटी बनाकर पुलिस कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश देने सहित कई किस्म की मांगों को मंजूर करने की बात की गई थी, अभी यह साफ नहीं है कि उनमें से कितनी बातों पर अमल हुआ है, और उससे पुलिस की दिक्कतें कितनी दूर हुई हैं। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों जगहों पर पुलिस को साप्ताहिक अवकाश देने को अपनी चुनावी घोषणा में शामिल किया था, और उसकी जरूरत चारों तरफ महसूस की जा रही थी। 

हम इसी जगह पर कई बार लिखते हैं कि पुलिस कर्मचारियों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तर पर जिस तरह अर्दली बनाकर चपरासियों जैसा काम लिया जाता है, वह बंद होना चाहिए। यह टैक्स देने वाली जनता पर एक बोझ भी है, और इससे प्रशिक्षित पुलिस कर्मचारियों का स्वाभिमान भी खत्म होता है, उनका मनोबल भी टूटता है। आज किसी भी राज्य में पुलिस की कमी की एक वजह यह भी है कि उन्हें गैरपुलिसिया काम में झोंककर रखा जाता है, कहीं वे बच्चे खिलाते हैं, कहीं वे कुत्ते घुमाते हैं। इसे करने के साथ-साथ राज्यों को पुलिस की खाली कुर्सियों को इसलिए भरना चाहिए कि जांच और कार्रवाई में देर होने से पेशेवर हो चुके अपराधी लोगों को तरह-तरह से लूट रहे हैं, ठग रहे हैं, और अपनी तकनीकी जानकारी में वे पुलिस से सौ कदम आगे चलते हुए तरह-तरह के साइबर-जुर्म कर रहे हैं। हाल के बरसों में चिटफंड से लेकर दूसरे कई तरह के आर्थिक अपराध बढ़ते गए हैं, और उन सब पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस बहुत ही कम है। अभी तो बात पुलिस के स्वीकृत पदों की ही रही है जिनके लिए बजट में इंतजाम है, लेकिन इससे परे भी जाकर पुलिस को अगर अधिक चौकस नहीं बनाया गया, उसकी क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो जनता का बड़ा नुकसान होते रहेगा, और मुजरिमों से उसकी बहुत ही कम जब्ती हो पाती है। 

पुलिस की कमी से जो मौजूदा लोग हैं उन पर काम का अंधाधुंध बोझ रहता है, और उनके परिवार उपेक्षित होकर बड़ा नुकसान झेलते हैं, छोटे पुलिस कर्मियों के बच्चे जुर्म में शामिल होने लगते हैं। इस नौबत को दूर करने के लिए पुलिस के खाली पदों पर तेजी से भर्ती करनी चाहिए, और इस बात की तैयारी जरूरत सिर पर आ जाने के बाद करने के बजाय पहले से करनी चाहिए। ऐसा न करना योजना और तैयारी की एक बड़ी कमी है, जो कि राज्यों को महंगी भी पड़ रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Jul-2019

सोशल मीडिया और असल जिंदगी में भी लड़के-लड़कियों, आदमी-औरत के बीच भेदभाव के खिलाफ लडऩे वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता ने लिखा है कि एक परंपरा खत्म करना जरूरी है, स्कूल के मंच के अतिथियों का सिर्फ बच्चियों द्वारा स्वागत करना। यह बात पिछले कई बरसों से अलग-अलग शक्लों में सामने आती है कि किस तरह जिंदगी में बंधी-बंधाई भूमिकाओं को बचपन से ही बच्चों के सामने रखते चले आने से उनका दिमाग उसी तरह काम करने लगता है, और बाकी जिंदगी वे वही उम्मीद करने लगते हैं। छोटे-छोटे बच्चों की स्कूल की शुरुआती किताबों में भी सिखाया जाता है कि लड़का पढ़ता है, लड़की खाना पकाती है, या पानी भरती है। पिता बाहर काम करता है, और मां घर का काम करती है। और बचपन से ही जो पूर्वाग्रह मन में घर कर चुका रहता है, वह कई तरह से सामने आती है। आज भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, या राष्ट्रपति के कार्यक्रम में भी उन्हें गुलदस्ता देने के लिए मेजबान या आयोजकों के हाथ में गुलदस्ता पहुंचाने का जिम्मा किसी लड़की या महिला को ही दिया जाता है, मंच पर कभी भी यह काम करते कोई लड़का या आदमी नहीं दिखेंगे। इस तरह एक सहायक का किरदार निभाते-निभाते इन्हें लोग बराबरी का दर्जा देना खत्म ही कर देते हैं। 

इस पर लिखने की जरूरत आज इसलिए भी हो रही है कि मध्यप्रदेश में वहां के पुलिस महानिदेशक वी.के. सिंह ने अभी एक तर्क सामने रखा है कि लड़कियों के अपहरण के मामले इसलिए ज्यादा हो रहे हैं क्योंकि लड़कियां स्वतंत्र ज्यादा हो रही हैं, स्कूलों में, कॉलेजों में जा रही हैं, और ऐसे में लड़कों के साथ उनका इंटरएक्शन हो रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे में वे जब घर से चली जाती हैं तब परिवार अपहरण की रिपोर्ट लिखाता है। मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार के पुलिस प्रमुख का यह बयान ऐसा रूख जाहिर करता है कि लड़कियों की स्वतंत्रता इस जुर्म के लिए जिम्मेदार है, या कि लड़कियां मर्जी से चली जाती हैं, उनका अपहरण नहीं होता। एक जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे हुए पुलिस के मुखिया को इस तरह की लापरवाह बात नहीं करना चाहिए जिसे कि उनके विभाग के मातहत अफसर और कर्मचारी दिशा-निर्देश मान लें। 

इसके पहले हमने कई केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अफसरों को देखा है जो कभी लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों को रेप के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, कभी लड़कियों के शाम को बाहर निकलने को रेप का जिम्मेदार बताते हैं, और तो और इस देश में ऐसे भी महान बकवासी हुए हैं जिन्होंने सेंवई या नूडल्स को बलात्कार के लिए वजह बताया है। कुल मिलाकर महिलाएं या लड़कियां अपने बलात्कार के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं। अभी पिछले बरस एक प्रदर्शनी लगी थी जिसमें बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के कपड़े प्रदर्शित किए गए थे जिनमें से कोई भी बदन को उघाड़कर दिखाने वाले नहीं थे, और उससे यह साबित किया गया था कि बलात्कारी किसी लड़की या महिला के खुले बदन देखकर ही उत्तेजित नहीं होते हैं। ऐसी प्रदर्शनी में रखे गए कपड़ों में छोटी बच्चियों के पहने गए फ्राक भी रखे गए थे जिससे यह खुलासा हो सके कि इतनी छोटी बच्चियों के बदन फ्राक में ढंके रहकर भी कैसे बलात्कारी को उत्तेजित कर सकते हैं? 

दरअसल भाषा के भीतर के भेदभाव से लेकर, परिवार के भीतर लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव तक बहुत सी बातें बचपन से ही लड़कों को एक अलग सोच दे देते हैं, और वे इस पर चलते हुए बड़े होने पर सोशल मीडिया पर लड़कियों और महिलाओं को बलात्कार की धमकी देते हैं, लड़कियों को ब्लैकमेल करते हैं, उनके असली या नकली वीडियो बनाकर फैलाते हैं, कामकाज की जगहों पर लड़कियों और महिलाओं का यौन शोषण करते हैं, या उन्हें दूसरी तरह परेशान करना अपना हक मानते हैं। इसलिए जिम्मेदार परिवारों को चाहिए कि बचपन से ही अपने बच्चों के सामने आदमी और औरत की अलग-अलग किस्म की जिम्मेदारियों का भेदभाव खत्म करें। लड़के और आदमी रसोई में हाथ बंटाएं, खाना परोसने में मदद करें, परिवार के दूसरे लोगों को चाय-पानी दें, और पिता जितना महत्व मां को भी दें। ऐसी बुनियाद के ऊपर समझदारी का एक ऐसा ढांचा खड़ा हो सकता है जो कि दुनिया को एक बेहतर जगह बना सके। सोशल मीडिया पर कुछ अरसा पहले ऐसे पोस्टर भी आए थे जो कि हिन्दुस्तान में किताबों की दुकान पर बिकते थे। इनमें एक अच्छी महिला या एक अच्छी लड़की की खूबियों को तस्वीरों में बताया गया था कि वे अगर घरेलू काम में एक आज्ञाकारी बनकर लगी रहती हैं, तो ही वे अच्छी हैं। समाज के साहित्य से, रिवाजों से, और रोज के व्यवहार से ऐसा भेदभाव हटाना जरूरी है। 

लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी बेटियां आमतौर पर दूसरे घरों में बहू बनकर जाती हैं, और वहां उनके साथ अगर बुरा सुलूक होगा, तो उन्हें कैसा लगेगा? उनके परिवार की महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर जाती हैं, बाहर काम करने जाती हैं, सफर करती हैं, और ऐसे में अगर उनके साथ कोई आदमी बुरा सुलूक करेगा तो उन्हें कैसा लगेगा? ऐसी मिसाल जिन पर लागू न होती हो, उनको भी यह तो सोचना ही चाहिए कि दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना हर किसी की जिम्मेदारी है। दुनिया के आज के तमाम कामों को लेकर यह सोचना चाहिए कि क्या लड़कों के लिए एक अलग दुनिया, और लड़कियों के लिए एक अलग दुनिया बनाकर दुनिया का कुछ भला हो रहा है? 
-सुनील कुमार


Date : 06-Jul-2019

भाजपा सरकार ने हरियाणा में सरकारी स्कूलों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है जिसके तहत बच्चे हर दिन कान पकड़कर उठक-बैठक करेंगे। इसे सरकार ने वैज्ञानिक रूप से साबित 'सुपर ब्रेन योग' करार दिया है, और कहा है कि इससे दिमाग का काम करना बढ़ता है। सरकार की इस घोषणा के पीछे फिलीपींस के एक आध्यात्मिक गुरू की एक किताब बताई जा रही है। वे योग और आध्यात्म पर काम करते हैं, और एक कामयाब कारोबारी हैं। उन्होंने अपनी वेबसाईट पर लिखा है कि ऐसी उठक-बैठक एक प्राचीन भारतीय तकनीक है जिससे शरीर की ऊर्जा को दिमाग की शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 

कान पकड़कर ऐसी उठक-बैठक आमतौर पर स्कूलों में सजा के लिए ही दी जाती है जिस पर कानूनी रोक लग चुकी है। लेकिन कानून सिर्फ सजा के तौर पर कुछ करवाने को लेकर है, इस तरह के प्रयोग के खिलाफ कोई कानून नहीं है। यह एक अलग बात है कि देश के कई हाईकोर्ट ऐसे आदेश दे चुके हैं कि मंत्रियों के स्वागत में, या किसी और कार्यक्रम में स्कूल के बच्चों को न भेजा जाए, न स्वागत में खड़ा किया जाए। फिलहाल हरियाणा सरकार का यह फैसला किसी कानून को तोड़ते हुए तो नहीं है, लेकिन अक्ल के खिलाफ जरूर है। जिस अक्ल को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक कही जा रही ऐसी तकनीक का दावा किया जा रहा है, वह एक विदेशी कारोबारी के दावे की तकनीक है, और हिन्दुस्तान में जहां योग सैकड़ों-हजारों बरस से चल रहा है, उसमें कभी ऐसी तकनीक का सुना नहीं गया था। और तो और योग के नाम पर हजार किस्म के कारोबार शुरू करने वाले बाबा रामदेव ने भी अगर ऐसे किसी योग के बारे में सुना होता, तो अब तक पतंजलि उसका पेटेंट करवा चुका होता, और इस तकनीक की किताबें रामदेव की दुकानों में बिकती रहतीं। फिर एक बात यह भी है कि धर्म और आध्यात्म, रहस्यमय योग, मंत्र और वैदिक गणित जैसी बातों को बढ़ावा देकर, और विज्ञान को कुचलकर बच्चों को जिस तरह अक्ल से दूर किया जा रहा है, वैसे में उनके भीतर अक्ल को बढ़ाने की जरूरत रह भी क्या गई है? अब तो इम्तिहान में उत्तर पुस्तिका पर जयश्रीराम लिखने से पत्थरबुद्धि बच्चे भी तैरते हुए अगली क्लास तक पहुंच जाने चाहिए, ऐसे में उनकी अक्ल को बढ़ाने की बात कुछ अटपटी है। 

स्कूलों को राजनीतिक दल, और उनसे जुड़े हुए अमूमन बेदिमाग संगठन तरह-तरह के प्रयोगों की जगह मानकर चलते हैं, और यह सिलसिला पाठ्य पुस्तकों से लेकर नैतिक कही जाने वाली शिक्षा तक फैल चुका है। सरकार बदलती है तो कोर्स बदल जाता है, कुछ विवादास्पद लोग वीर हो जाते हैं, या उनकी वीरता गलत करार दे दी जाती है। विज्ञान को मिटाकर, इतिहास को नया गढ़कर जिस तरह बच्चों के सामने भ्रम की एक धुंध खड़ी की जाती है, वह सिलसिला अपने आपमें काफी नुकसानदेह है, और उस बीच बच्चों को मानो उठक-बैठक की ऐसी सजा देकर साबित किया जा रहा है कि वे कोई गलती करते हैं जिसे रोज सुधारना जरूरी है। 

अगर किसी भी राज्य में स्कूली बच्चों के  दिमाग तेज ही करने हैं, तो उन्हें धर्मान्धता से ढांकना बंद करना चाहिए, उन पर झूठे इतिहास को थोपकर एक झूठा गौरव देना भी बंद करना चाहिए। एक वैज्ञानिक पद्धति के तहत उन्हें सवाल पूछने के लिए उकसाना चाहिए, और  उन सवालों के जवाब देते हुए शिक्षकों को, स्कूल के बाहर के बड़े लोगों को अपना भी ज्ञान बढ़ाना चाहिए, अपनी तर्कशक्ति भी बढ़ानी चाहिए। सवालों को कुचलकर अगर कोई यह सोचे कि उठक-बैठक से दिमाग तेज होगा, तो यह एक परले दर्जे की बेवकूफी की बात है। आज पूरे देश में छोटे और बड़े तमाम लोगों के सवाल पूछने को देश के साथ गद्दारी मान लिया जाता है, देश की संस्कृति के खिलाफ मान लिया जाता है। गढ़े हुए झूठे इतिहास पर किसी कीर्तन की तरह भरोसा करके रात भर सिर हिलाने को देशप्रेम मान लिया जाता है। यह सिलसिला पूरी नौजवान पीढ़ी के लिए बहुत खतरनाक है। ऐसे ही सिलसिले के चलते छत्तीसगढ़ सहित देश की कई सरकारी स्कूलों में दोपहर के खाने के पहले किसी एक धर्म की प्रार्थना करवाई जा रही है, देश भर के बच्चों को एक धर्म के एक हिस्से की सोच के मुताबिक खाना दिया जा रहा है, और प्याज-लहसुन से लेकर अंडे तक पर रोक लगाई जा रही है। देश के आदिवासी इलाकों में भी स्कूलों में बच्चों को इन चीजों को दोपहर के भोजन में नहीं दिया जा रहा है, जबकि उन बच्चों की घरेलू जिंदगी में भी वे इन चीजों को खाते हैं। अपनी धार्मिक आस्था को दूसरे बच्चों पर थोपना, खासकर सरकारी खर्च पर थोपना निहायत ही नाजायज है। इसी तरह सुपर ब्रेन योग नाम की यह अनजानी तकनीक बच्चों पर थोपना निहायत गलत है। हरियाणा की भाजपा सरकार कम से कम देश के राजकीय योग गुरू रामदेव से तो इस बारे में सलाह ले सकती थी, बजाय एक फिलीपीन कारोबारी की सोच बच्चों पर थोपने के। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Jul-2019

भारत की वित्तमंत्री ने कल संसद में देश की आर्थिक स्थिति पर सरकार की समीक्षा पेश करते हुए यह संभावना जताई है कि देश में लोगों की बढ़ती हुई औसत उम्र को देखते हुए उन्हें रिटायर करने की उम्र बढ़ाकर 70 बरस तक की जा सकती है। यह बात अगर संसद में सरकार की तरफ से कही हुई नहीं होती तो यह अविश्वसनीय और अटपटी लग सकती थी, लेकिन अब इसे सरकार की सोच, और एक संंभावना मानकर इस पर कुछ चर्चा की जरूरत है। 

यह बात मोटे तौर पर सरकारी सेवाओं के लिए ही है जिनमें आज अधिकतर जगहों पर 60 बरस की उम्र में लोगों को रिटायर किया जाता है। पहले यह 58 बरस थी, और अब इस सीमा को बढ़ा दिया गया है। आम सरकारी अमले से परे कुछ ऐसे तबके हैं जिनमें यह उम्रसीमा पहले से बढ़ी हुई है। प्राध्यापक 65 बरस की उम्र तक पढ़ाते हैं, और सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी शायद 65 बरस तक सेवा में रहते हैं। अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री को एक चि_ी लिखकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का सुझाव दिया है क्योंकि देश की अदालतों में इतनी बड़ी संख्या में जजों की कुर्सियां खाली हैं, और लोग अपने मामले-मुकदमे लेकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इस राज्य के बनने के समय से अब तक डॉक्टरों की सैकड़ों कुर्सियां खाली ही हैं, उनके लिए लोग मिल नहीं रहे हैं, और देश भर में जगह-जगह ऐसी कई और सेवाएं हो सकती हैं जहां पर लोगों की कमी को देखते हुए मौजूदा लोगों की नौकरी कुछ और लंबी की जानी चाहिए। 

लेकिन यह सोच एक तरफ तात्कालिक जरूरत को पूरी करने वाली जरूर दिखती है, लेकिन दूसरी तरफ इसके कई खतरनाक पहलू भी हैं जिनके बारे में सोचना चाहिए। अभी-अभी देश के बेरोजगारी के आंकड़े सामने आए हैं जो बताते हैं कि पिछले 45 बरस में इतनी बेरोजगारी कभी नहीं रही। ये तो मौटे तौर पर सरकार की निगाह में आने वाले आंकड़े हैं, लेकिन इनसे परे देश भर में आर्थिक मंदी के चलते हुए बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है, निजी कारोबार नीचे जा रहे हैं, और नई नौकरियां कहीं निकल नहीं रही हैं। देश में मजदूरों के बेहतर अधिकारों के लिए जो कानून बन रहे हैं, वे भी सरकार और कारोबार दोनों पर खर्च बढ़ा रहे हैं, और दोनों ही जगहों पर यह तय हो रहा है कि नए लोगों को काम पर न रखा जाए। बीएसएनएल में आधा-एक लाख लोगों की छंटनी की खबर है, एयर इंडिया भयानक घाटे में है, और दर्जनों पब्लिक सेक्टर बिकने के करीब हैं। ऐसे में निजी हाथों में जाने के बाद इन सबमें और बुरी छंटनी होगी, और आज जिस तरह जेट एयरवेज बंद होने के बाद उसके कर्मचारी फुटपाथ पर पड़े हैं, वैसी नौबत और बहुत से लोगों की आने वाली है। केन्द्र सरकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या घटा रही है, और बैंक एक-दूसरे में मिलकर कर्मचारियों की जरूरत को कम करेंगे, नई नियुक्तियां नहीं होंगी। 

बेरोजगारी की ऐसी भयानक नौबत को देखते हुए यह समझ से परे है कि केन्द्र सरकार रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाने की कैसे सोच सकती है? अगर कुर्सियां और दस बरस तक खाली नहीं होंगी, तो उसका यह मतलब भी तो रहेगा कि दस बरस उन कुर्सियों के लिए कोई नई नियुक्ति नहीं होगी। बेरोजगार ऐसी संभावनाओं को खो बैठेंगे। यह बात भी समझने की जरूरत है कि आज 60 बरस की उम्र में रिटायर होने के बाद भी सरकार के अधिकतर कर्मचारियों के पास पेंशन, पीएफ जैसा कोई न कोई सहारा रहता है। लेकिन बेरोजगारों के पास आज तो जिंदा रहने के लिए कोई बेरोजगारी भत्ता तक नहीं है, उनके पास सिर्फ निराशा और कुंठा है। फिर यह भी है कि नए लोग कुछ बरसों में उन्हीं कामों के लिए जितनी तनख्वाह पाते हुए तैयार हो जाते हैं, रिटायर होने वाले लोगों को उन्हीं पदों और उन्हीं कामों के लिए सरकार को काफी अधिक तनख्वाह देनी पड़ती है। इनसे परे एक दूसरी बड़ी बात यह है कि उम्र और सेहत के चलते न सही, सरकारी नौकरी में सुरक्षा की भावना के चलते हुए बहुत से लोगों की काम में दिलचस्पी एकदम खत्म होने लगती है, और वे सरकार और जनता के लिए उत्पादक नहीं रह जाते। 

अब इस मामले के एक और पहलू को समझने की जरूरत है। सरकारी नौकरी में बहुत से लोग जिस हद तक भ्रष्ट हो जाते हैं, जिनको रिश्वत लेते पकड़ा जाता है, जिनके खिलाफ आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हो जाते हैं, जो अनुपातहीन संपत्तिके साथ पकड़े जाते हैं, ऐसे लोग भी कुछ महीनों के बाद फिर उन्हीं विभागों की कमाऊ कुर्सियों पर इस तर्क के साथ बिठा दिए जाते हैं कि उनकी जगह काम करने वाले दूसरे लोग नहीं हैं। उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी पांच-पांच, दस-दस बार संविदा नियुक्ति दी जाती है, और जो जितने भ्रष्ट रहते हैं, उनके लिए यह संभावना उतनी ही अधिक रहती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी ढांचा, वह केन्द्र का हो, या राज्यों का, वह ऐसे भ्रष्ट लोगों को और लंबा ढो सकता है? आज तो एक जरूरत यह भी महसूस की जा रही है कि 50 बरस की उम्र या 20-25 बरस की सेवा के बाद लोगों का आंकलन करना चाहिए कि उनका काम कैसा है, और उसके बाद ही उन्हें नौकरी पर जारी रखना चाहिए। आज जब एक-एक सरकारी कुर्सी के लिए दसियों हजार लोग कतार में लगते हैं, तो जाहिर है कि लोग उपलब्ध हैं। यह सरकारों की अपनी कमजोरी है कि वह वक्त रहते लोगों को नियुक्त करके अपने ढांचे को ठीक से नहीं रख पातीं। ऐसे में होना तो यह चाहिए कि नौकरी 50 बरस की उम्र तक की ही होनी चाहिए, और उसके बाद हर पांच बरस में ऐसा सेवा-विस्तार होना चाहिए जो कि उनकी ईमानदारी की साख, मेहनत, क्षमता, और सेहत को देखते हुए हो। हो सकता है कि इन पैमानों पर खरे उतरने के बाद कुछ लोग 70 बरस तक काम करने के लायक मिलें, लेकिन कुछ लोग 50 बरस की उम्र में ही हटाने के लायक भी मिलें। इस तरह कुल मिलाकर बेरोजगारों का हक छीने बिना उतनी ही कुर्सियों पर कुछ को 50, कुछ को 60, और कुछ को 65-70 बरस तक भी जारी रखा जा सकेगा। जब तक नाकाबिल और भ्रष्ट लोगों को हटाने का अभियान नहीं चलेगा, तब तक महज बढ़ती औसत उम्र को देखते हुए रिटायर होने की उम्र बढ़ाना ठीक नहीं होगा। सरकार की तमाम नौकरियां जनता के पैसों से चलती हैं, और जिस तरह निजी कारोबार में मालिक बेहतर काम करने की उम्मीद रखते हैं, निगरानी रखते हैं, सरकार को भी अपने अमले की उत्पादकता पर नजर रखनी चाहिए, और भ्रष्ट और निष्क्रिय लोगों को हटाने का काम लगातार करना चाहिए। रिटायरमेंट की उम्र 60 से 70 करने के बजाय उसे 50 बरस करना चाहिए, और उसके बाद पांच-पांच बरस के चार सेवा-विस्तार की व्यवस्था करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 04-Jul-2019

दुनिया का मीडिया बड़े दिलचस्प दौर से गुजर रहा है। इंटरनेट की मेहरबानी से चोरी और नकल सांस लेने की तरह आसान काम हो गए हैं, और इससे जरा ही मुश्किल काम रह गया है ऐसी चोरी या नकल को पकडऩा। अभी तृणमूल कांग्रेस की नई सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा में अपना पहला भाषण दिया, तो भाजपा-आरएसएस और देश के आज के माहौल को लेकर उन्होंने मोदी सरकार और उसकी समर्थक ताकतों पर ऐसा तगड़ा हमला बोला कि लोग याद करने लगे कि किसी नई-नई राजनेता का संसद में ऐसा दमदार पहला भाषण क्या उन्होंने पहले कभी सुना था? महुआ एक अंतरराष्ट्रीय बैंक में विदेश में काम करती थी, और वे हाल ही में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में आकर चुनाव के रास्ते संसद पहुंची हैं, और उन्होंने संसद में कोई हथगोला फेंके बिना महज अपने भाषण से अपनी दमदार आमद दर्ज कराई है। 

जाहिर है कि मीडिया का एक तबका जो कि मोदी, भाजपा, आक्रामक-हिन्दुत्व, उग्र राष्ट्रवाद की किसी भी किस्म की आलोचना पर कलम फेंककर त्रिशूल उठा लेने पर आमादा रहता है, वह तुरंत ही महुआ के भाषण के पोस्टमार्टम में जुट गया। इस सांसद ने अपने धारदार भाषण में किसी देश में फासीवाद के आने के शुरुआती संकेतों की एक फेहरिस्त गिनाई जिसे एक समाचार चैनल ने तुरंत ही चोरी साबित करने का दावा किया। उसने समाचार बुलेटिन में एक खास धमाकेदार अंदाज में गिनाया कि महुआ ने संकेतों की इस लिस्ट को एक अमरीकी ब्लॉगर के लिखे हुए में से सीधे ही चुरा लिया है। देश के कुछ और लेखक-स्तंभकार भी राष्ट्रवाद की दवात में कलम डुबाकर लिखते हैं, उनका भी मानो दिन निकल पड़ा, और उन्होंने भी इस तेज मिजाज सांसद की चोरी का भांडाफोड़ करने में बहती गंगा में अपने भी हाथ धो लिए। 

लेकिन हिन्दुस्तान में इन दिनों कुछ ऐसी वेबसाईटें हैं जो कि चर्चित या विवादास्पद समाचारों को लेकर, उनकी तह तक जाकर यह भांडाफोड़ करती हैं कि उनमें कही गई बातें, दिखाई गई तस्वीरें, या पोस्ट किए गए वीडियो सच्चे हैं, या झूठे हैं। ऐसी ही एक वेबसाईट ने तुरंत सांसद महुआ मोइत्रा के भाषण की जांच की, और जीन्यूज के किए भांडाफोड़ को भी परखा, तो पता चला कि भाषण की लाईनें सचमुच ही इस अमरीकी ब्लॉग से ली गई हैं। लेकिन और जांच करने पर पता चला कि अमरीका में युद्ध की यादों के एक संग्रहालय में एक पोस्टर में ये लाईनें इसी तरह लिखी हुई हैं और उसी पोस्टर से बहुत से लेखक, बहुत से ब्लॉगर इन लाईनों का जिक्र करते हैं, और संसद के इस भाषण में महुआ ने आखिर में यह जिक्र भी किया था कि फासीवाद की शुरुआत के संकेतों की जो लिस्ट उन्होंने गिनाई है, वह अमरीकी युद्ध संग्रहालय में मौजूद है। 

अब सवाल यह उठता है कि इस जिक्र के साथ अगर किसी सांसद ने ऐसे पोस्टर का जिक्र किया है जहां से उन्होंने इन लाईनों को लिया है, तो इसमें चोरी क्या है? संसद में दिया गया यह भाषण पूरे का पूरा खबरों में छाया हुआ था, उसका वीडियो चारों तरफ तैर रहा था, और यह मुमकिन नहीं है कि जीवंत प्रसारण वाला यह वीडियो दिल्ली में बैठे हुए एक संपन्न और सक्षम टीवी चैनल को हासिल नहीं था। इस वीडियो में भाषण के अंत में कही हुई बातों को पूरी तरह अनदेखा करके भाषण देने वाली हौसलामंद नौजवान सांसद पर चोरी का इल्जाम लगाना, और इस चोरी को पकडऩे को एक महान कामयाबी की तरह पेश करना बहुत ही शर्मनाक हरकत रही। लेकिन सोशल मीडिया की मेहरबानी से वह अमरीकी ब्लॉगर खुद होकर सामने आया जिसके ब्लॉग से लाईनों को चुराने का आरोप महुआ पर लगाया गया था, और उसने ऐसे दक्षिणपंथी लोगों को अमरीकी सड़क की जुबान में गालियां देते हुए लिखा कि ऐसे लोग दुनिया के हर देश में एक ही किस्म के रहते हैं। 

आज मीडिया और सोशल मीडिया की अतिसक्रियता के ऐसे दौर में न तो किसी को चोरी की हिम्मत करनी चाहिए, और न ही ऐसी फर्जी टीवी रिपोर्ट बनाने की जो कि बनने से पहले ही झूठी साबित हो चुकी थी क्योंकि सांसद के भाषण में कही गई बातों के लिए यह जिक्र किया गया था कि ऐसे खतरों की लिस्ट युद्ध के संग्रहालय में टंगी हुई है। आज के वक्त में बदनीयत से किसी को बचाने की कोशिश किसी तरह कामयाब नहीं हो सकती, न बदनाम करने की कोशिश, न बचाने की कोशिश। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अपनी खुद की विश्वसनीयता को खोकर वे किसी और की विश्वसनीयता को बढ़ा नहीं सकते, और न ही ऐसी साजिशों से किसी की विश्वसनीयता को कम कर सकते। कमअक्ल, कमसमझ कुछ लोग कुछ देर के लिए झांसे में आ सकते हैं, लेकिन आज के वक्त में ऐसे झांसे की उम्र एक बुलबुले की उम्र से भी कम रहती है क्योंकि झूठ का भांडाफोड़ करने के लिए पूरी दुनिया एक दूसरे से इस कदर जुड़ गई है कि अनजाने लोग भी ऐसा भांडाफोड़ करने में मददगार हो जाते हैं।
-सुनील कुमार


Date : 03-Jul-2019

दुनिया भर में मशहूर ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एक श्वेत शोध छात्रा ने इस प्रतिष्ठित संस्थान को छोडऩे की घोषणा करते हुए एक लंबा बयान लिखा है जो कि यहां पर रंगभेदी-नस्लभेदी ढांचे और संस्कृति पर हमला करता है। इंडियाना सेरेसिन नाम की संपन्न परिवार से आने वाली इस छात्रा ने यहां पर अपने देखे हुए बहुत से मामलों में रंगभेद का आरोप लगाते हुए कहा कि तकरीबन पूरा विश्वविद्यालय अश्वेतों की गैरमौजूदगी बताता है, न छात्र, न पढ़ाने वाले। उसने कहा कि वह ऐसे संस्थान में शोध करने का फायदा उठाने को अनैतिक रंगभेदी फायदा मानती है, और इसलिए इस विश्वविद्यालय को छोड़ रही है। उसका कहना है कि विश्वविद्यालय से पूरे शोध कार्य के लिए उसी मिली हुई स्कालरशिप का इस्तेमाल करना उसके सिद्धांतों के खिलाफ रहेगा और इससे उसके बौद्धिक कामकाज के सिद्धांत और ईमानदारी भी खतरे में पड़ेंगे। उसने माना है कि एक श्वेत छात्रा के रूप में वह इस विश्वविद्यालय के रंगभेदी ढांचे का फायदा पाने वाली बन जाएगी जो कि वह नहीं चाहती। 

आज हिन्दुस्तान में विश्वविद्यालयों से लेकर सार्वजनिक जीवन तक, और संसद से लेकर विधानसभाओं तक, क्या कोई इस दर्जे की सैद्धांतिकता और नैतिकता की बात करते दिखते हैं? यह सवाल बड़ी दिक्कत खड़ी करने वाला है, और अधिकतर लोग इससे बचना चाहेंगे। इस देश में संसद और विधानसभाओं जिस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी गिने-चुने परिवारों से आए लोगों से भरती चली जा रही हैं, जिस तरह संपन्न तबके का एकाधिकार देश की सबसे बड़ी पंचायत पर बढ़ते जा रहा है, जिस तरह कुछ लोग पांच-पांच, दस-दस बार सांसद या विधायक बनकर अपने इलाके से बाकी तमाम लोगों की संभावनाओं को खत्म करते जा रहे हैं, क्या उनके बीच नैतिकता और सैद्धांतिकता का ऐसा कोई सवाल खड़ा किया जा सकता है? यही बात राजनीतिक दलों के संगठन के भीतर है, यही बात स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले लोगों की जाति, धर्म, उनके समुदाय के बारे में है, कुछ ऐसी ही बात हिन्दुस्तानी मीडिया के मालिकान के जाति-धर्म के बारे में है, और मीडिया के समाचार-विचार के विभागों में काम करने वाले पत्रकारों की जाति और उनके धर्म के बारे में भी है। 

दूसरे वंचित तबकों के हक को छीनकर गिने-चुने मौकों पर काबिज होने की बात हिन्दुस्तानी समाज के हर दायरे में दिखती है, इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो दिखती है वह यह कि आरक्षित वंचित तबकों के भीतर मलाईदार तबके का एक दबंग-एकाधिकार जिस तरह पूरे तबके के सारे हक अकेले निगल लेता है, उसकी अनैतिकता पर तो कोई चर्चा भी नहीं होती। इस देश में ओबीसी आरक्षण के भीतर तो मलाईदार तबके को फायदों से अलग करने की बात होती भी है, लेकिन सबसे कुचले हुए होने की वजह से आरक्षण के हकदार दलित-आदिवासी तबकों के भीतर मलाईदार-ताकतवर तबकों को हटाने की बात भी नहीं होती। और इसलिए नहीं होती कि जिन बड़े अफसरों को सरकार में ऐसा संविधान-संशोधन बनाना पड़ेगा, जिन सांसदों को संसद में, और जिन विधायकों को विधानसभाओं में इसे पास करना पड़ेगा, और जिन सुप्रीम कोर्ट जजों को ऐसे संशोधन के खिलाफ अपील सुननी पड़ेगी, वे सारे के सारे मलाईदार तबके की परिभाषा में आएंगे, और उनकी आल-औलाद आरक्षण के फायदों से बाहर हो जाएगी। हितों के ऐसे स्पष्ट टकराव का मामला होते हुए भी इनमें से किसी भी तबके से इस सामाजिक न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, जैसे सामाजिक न्याय के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की इस अकेली छात्रा ने एक बड़ा मुद्दा उठाया है, और अब तक मीडिया में भी मोटे तौर पर चर्चा से परे रहते आई ऐसी रंगभेदी-नस्लभेदी व्यवस्था पर हमला किया है। 

हिन्दुस्तान के भीतर जिन विश्वविद्यालयों के जो लोग सामाजिक न्याय के लिए लडऩे वाले जाने जाते हैं, क्या उनमें से कुछ लोग भारतीय सामाजिक-अनैतिकता की बात छेड़ सकेंगे? आगे बढ़ा सकेंगे? और ऐसी अनैतिकता का नफा पाने वाले लोगों से असुविधाजनक सवाल कर सकेंगे? और बात महज विश्वविद्यालयों की नहीं है, यह बात सभी सामाजिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, और संसदीय संस्थाओं पर भी लागू होती है जहां पर जमींदारी प्रथा चलती दिखाई पड़ती है, सामंती व्यवस्था जारी दिखती है, छुआछूत जारी दिखता है, और लोकतंत्र नदारद जान पड़ता है। 
-सुनील कुमार