संपादकीय

29-Dec-2020 6:57 PM 193

कैलेंडर बदलने के अलावा नए साल का दूसरा बड़ा इस्तेमाल अपने-आपसे कई किस्म की कसमें खाने का होता है। बहुत से लोग पहली जनवरी से दारू, सिगरेट, या तम्बाकू छोडऩे की कसम खाते हैं, बहुत से लोग कसरत, सैर, या जिम शुरू करने की कसम खाते हैं। वजन अधिक हो तो घी-मक्खन, और मीठा छोडऩे की कसम खाई जाती है। लेकिन इनमें से अधिकतर कसमें रेतीली मिट्टी पर खोदी जा रही खदानों की तरह धसक जाती हैं। साल आगे बढऩे लगता है, और लोग पुराने ढर्रे को जारी रखते हैं। दो-चार दिन सोशल मीडिया पर नए साल के संदेश लिखना और पढऩा चलते रहता है, और जनवरी का पहला हफ्ता गुजरने तक श्मशान वैराग्य की तरह नए साल का यह वैराग्य भी चल बसता है। 

लेकिन ऐसा भी नहीं कि थोड़े से लोग भी थोड़ी दूरी तक कामयाब न होते हों। जो लोग अपने-आपसे ईमानदार रहते हैं वे कोशिश जारी रखते हैं, और वे कुछ हद तक कामयाब भी हो जाते हैं। नए साल के संकल्प एकदम ही फिजूल के नहीं होते, वे अपनी कमियों और खामियों की पहचान का मौका देते हैं, बेहतरी और सुधार सुझाते हैं, और उस राह पर दो-चार कदम आगे भी बढ़ाते हैं। लेकिन जिस तरह किसी भी कड़े और लंबे सफर के साथ होता है, संकल्पों के साथ नए साल में आगे बढऩा कुछ उसी तरह मुश्किल रहता है। 

लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि खाने-पीने और कसरत-किफायत से परे नए साल के बारे में और कौन सी बातें तय की जा सकती हैं। लोग इसके लिए सोशल मीडिया भी देख सकते हैं जहां पर लोग, प्रधानमंत्री के अलावा बाकी लोग भी, मन की बात लिखते हैं। अभी एक किसी ने लिखा कि उन्हें बहुत शर्म है कि अपनी खरीदी हुई किताबों में से वे बहुत कम पढ़ पाती हैं, और बाकी किताबें अनछुई धरी रह जाती हैं। उन्होंने यह संकल्प किया है कि इस बरस वे उनके पास इक_ा हो गईं तमाम अनछुई किताबें पढक़र खत्म कर लेंगी। किताबों की इस चर्चा से यह याद पड़ता है कि लोगों को अपने पास की पढ़ी हुई, और आगे न पढऩे वाली किताबों को दूसरों को देना भी सीखना चाहिए। एक किताब के लिए एक पेड़ कटता है, और उस पेड़ की शहादत की इतनी तो इज्जत होनी चाहिए कि उससे बने कागज पर छपी किताब अधिक से अधिक लोग पढ़ सकें। डिक्शनरी और सामान्य ज्ञान की किताबों को छोडक़र किस्सा-कहानी की कम ही किताबें ऐसी रहती हैं जिन्हें लोग बार-बार पढऩा चाहें। यह भी समझने की जरूरत है कि बार-बार पढऩे में लगने वाला वक्त नई और दूसरी किताबों को पढऩे के लिए खाली रखना चाहिए। ये तमाम बातें सुझाती हैं कि लोग किताबों को पूरी तरह दान चाहे न कर दें, कम से कम दूसरों को पढऩे के लिए देते चलें। पढ़-पढक़र घिसी हुई, पुरानी पड़ गई किताब अधिक इज्जत का सामान होती है, बजाय जुड़े हुए पन्नों के आलमारी में कैद किताब के। 

लोगों के खाने-पीने और कसरत के संकल्पों के बारे में हमें अधिक कुछ नहीं कहना है क्योंकि उनका अपना भला उससे जुड़ा रहता है। लेकिन यहां बाकी दुनिया के भले के कोई फैसले होते हैं, तो उन्हें तो आगे बढ़ाना चाहिए। लोगों को अपने पास के गैरजरूरी हो चुके इक_ा सामानों से छुटकारा पाना भी आना चाहिए। यह आसान नहीं होता क्योंकि लोग इस दबाव में रहते हैं कि किसी भी दिन इनमें से किसी चीज की जरूरत पड़ जाएगी। दरअसल जिंदगी की जरूरतें बड़ी सीमित रहती हैं, इनसे अधिक जो कुछ रहता है वह शौक रहता है। लोग अगर चाहें तो अपने शौक में कुछ कटौती करके आसपास के जरूरतमंद लोगों के काम आ सकते हैं, और वही नए साल को बेहतर बनाने का एक तरीका हो सकता है। 

निजी संकल्पों से परे लोगों को अपनी सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिए अधिक करना चाहिए। अपनी चर्बी छांटना जितना जरूरी है, उससे कहीं अधिक जरूरी है सार्वजनिक जगहों को साफ-सुथरा रखना। हिन्दुस्तानियों की आम सोच यह है कि गंदगी करना उनका हक है, और उसे साफ करना म्युनिसिपल की जिम्मेदारी। जब तक इस सोच को नहीं बदला जाएगा तब तक इस देश में सफाई कर्मचारी नालियों और गटर में उतरकर काम करते रहेंगे, और बेमौत मरते रहेंगे। कुछ लोग अपने पहचान के लोगों के साथ रोजाना की सार्वजनिक जगहों पर ऐसे सामूहिक संकल्प ले सकते हैं कि किस तरह सार्वजनिक सम्पत्ति अपनी मानी जाए, और किस तरह उसे साफ और सुरक्षित रखा जाए। 

इन दिनों मोबाइल फोन कैमरे का काम भी करते हैं, घड़ी का भी, कैलेंडर का भी, और डायरी का भी। इसलिए अब नए साल पर कैलेंडर-डायरी का कोई महत्व नहीं रह गया है। अब लोगों को दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की जागरूकता दिखानी चाहिए। पहले लोग अपने कारोबार के कैलेंडर, उसकी डायरी दूसरों को बांटते थे, अब उसकी जरूरत नहीं रह गई तो लोग अच्छी किताबें बांट सकते हैं। 

नए साल के संकल्पों की फेहरिस्त का कोई अंत नहीं होता। लेकिन लोगों को सामाजिक जिम्मेदारी को इसमें ऊपर रखना चाहिए। सार्वजनिक जगहों पर वे अगर कोई गुंडागर्दी या जुर्म देखते हैं, तो उसे अनदेखा करके आगे निकलने का मिजाज छोडऩा चाहिए। यह भी समझना चाहिए कि किसी दिन ऐसी गुंडागर्दी के शिकार उनके परिवार के लोग होंगे, तो और लोग भी उसे अनदेखा कर सकते हैं। लोग अपने-अपने दायरे में इस नए साल में दूसरों के लिए क्या कर सकते हैं यह सोचना चाहिए, इसकी चर्चा करनी चाहिए, और अपने करीबी लोगों को इसके लिए तैयार भी करना चाहिए।

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28-Dec-2020 5:43 PM 244

उत्तरप्रदेश के बारे में दो दिन पहले एक अटपटी खबर आई कि वहां किसी वाहन पर अगर धर्म या जाति का स्टिकर लगा होगा, या इनका जिक्र लिखा होगा तो गाडिय़ों को जब्त कर लिया जाएगा। योगी सरकार ऐसा करेगी उस पर भरोसा करना मुश्किल था, और अगले ही दिन सरकार के आला अफसरों ने ऐसी सोशल मीडिया पोस्ट और खबरों को गलत करार दिया। अफसरों ने कहा कि गाडिय़ों पर जाति के स्टिकर लगाने पर पहले से जुर्माना तय है, इसी आधार पर एक लिखित शिकायत आई थी जिस पर विभाग के अधिकारियों ने नियमानुसार कार्रवाई की बात कही थी, और उसे लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में ऐसी खबरें उड़ गईं। 

योगी सरकार ऐसा कुछ कर सकती है इस पर भरोसा नहीं हो रहा था, और मामला वैसा ही निकला। यह सरकार पहले से चले आ रहे एक नियम के तहत जातियों का जिक्र लिखाने पर कभी-कभार जुर्माना कर देती है, और मामला वहीं खत्म हो जाता है। महाराष्ट्र के एक शिक्षक ने प्रधानमंत्री को शिकायत की थी कि उत्तरप्रदेश में बड़ी संख्या में वाहनों पर जातियां लिखी जाती हैं, और यह समाज के लिए खतरा है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने शिकायत यूपी सरकार को भेज दी, और विभाग ने एक निर्देश जारी किया जिससे चारों तरफ खलबली मची। 

जातियों का प्रदर्शन न तो कोई नई बात है, और न ही यह अकेले उत्तरप्रदेश तक सीमित है। जातिवाद और साम्प्रदायिकता के ताजा सैलाब के चलते उत्तरप्रदेश में यह मामला कुछ बढ़ गया होगा, वरना जातिवाद तो हिन्दुस्तान के लोगों में कूट-कूटकर भरा है। किसी एक जाति या किसी एक तबके की जातियों के लोग जब जुटते हैं, तो पहला मौका मिलते ही दूसरी जातियों के खिलाफ जहर के झाग उनके मुंह से निकलने लगते हैं। आबादी का छोटा तबका ऐसा होगा जो जातिवाद से परे होगा, वरना हिन्दुस्तान जातियों के ढांचे के बोझतले पिस गया है। 

सरकारी अमले के भीतर ही जाति और धर्म का जिक्र बहुत आम है। सरकारी दफ्तरों में दीवारों पर और मेज के कांच के नीचे धर्म और आध्यात्म के अपने आराध्य लोगों की तस्वीरें सजाना आम बात है। देश के बहुत से हिस्सों में पुलिस थानों में बजरंग बली का मंदिर रहता ही है। पुलिस जैसे संवेदनशील का वाले विभाग में भी दीवारों पर आस्था का खुला प्रदर्शन होता है जिससे यह जाहिर हो जाता है कि उस आस्था से परे के लोगों को पुलिस से कोई निष्पक्ष बर्ताव नहीं मिल सकता। फिर चतुर लोग ऐसी आस्था की शिनाख्त करके आनन-फानन में अपने को उससे जुड़ा बता देते हैं, और अगली बार उस तीर्थ का प्रसाद लेकर हाजिर भी हो जाते हैं। नेता या अफसर अगर मुस्लिम होते हैं, तो उनके सरकारी फोन नंबर से लेकर उनके कार्यकाल में खरीदी नई गाडिय़ों के नंबर तक मुस्लिमों के शुभ अंक के दिखने लगते हैं। 

उत्तरप्रदेश में ऐसे जुर्माने का जिक्र किया है, तो वह देश के दूसरे प्रदेशों में भी लागू होगा क्योंकि मोटर व्हीकल एक्ट पूरे देश के लिए एक सरीखा है। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कभी ऐसी बातों के लिए गाडिय़ों पर जुर्माना होने की खबर याद नहीं पड़ती। बड़ी संख्या में गाडिय़ां जाति और धर्म के जिक्र वाली रहती हैं, लेकिन उन पर कोई रोक-टोक नहीं होती। किसी भी धर्मनिरपेक्ष और जिम्मेदार सरकार को चाहिए कि गाडिय़ों पर ऐसा लिखने पर मोटा जुर्माना लगाया जाए, और सरकारी दफ्तरों में धर्म और जाति के किसी भी तरह के प्रतीक के प्रदर्शन पर कड़ी कार्रवाई की जाए। हिन्दुस्तान में धर्म और जाति ने लोगों के बीच खाई खोदी है, हिंसा बढ़ाई है, और निष्पक्ष इंसाफ की संभावनाओं को घटाया है। यह भी एक वजह है कि देश की जेलों में बंद लोगों में नीची समझी जाने वाली जातियों के लोग अधिक हैं, और ऊंची समझी जाने वाली ताकतवर जातियों के लोग जांच और अदालत की प्रक्रिया से ही बच निकलते हैं। 

उत्तरप्रदेश को लेकर यह जिक्र अधिक प्रासंगिक इसलिए है कि वह देश में सबसे बुरे जातिवाद का शिकार प्रदेश है। यूपी पुलिस पहले साम्प्रदायिक रहती है, उसके बाद वह जातिवादी भी हो जाती है। ऐसे प्रदेश में एक ही धर्म या एक ही जाति के मुजरिम, पुलिस, और अदालती कर्मचारी भी एक किस्म से अघोषित गिरोहबंदी कर लेते हैं। 

देश के बाकी प्रदेशों में भी धर्मांधता और जातिवाद के खिलाफ जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उन्हें सरकार को नोटिस देकर या जनहित याचिका दायर करके गाडिय़ों और दफ्तरों के धर्म-जाति प्रदर्शन के खिलाफ कार्रवाई करवानी चाहिए।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

 


27-Dec-2020 5:48 PM 295

किसान आंदोलन को लेकर उसके आलोचक, और फिर चाहे किसके समर्थक, जिस तरह इस आंदोलन पर हमला कर रहे हैं वह देखने लायक है। किसान इस ठंड में सडक़ों पर डेरा डाले बैठे हैं, और उनके समर्थक उनके खाने-पीने का, इलाज का जिस तरह ख्याल रख रहे हैं उसे लेकर सोशल मीडिया पर किसान-विरोधी जमकर लिख रहे हैं। उनके खाने-पीने को लेकर लिखा जा रहा है, उनके लिए गर्म पानी के इंतजाम को लेकर लिखा जा रहा है, और एक ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है कि ये किसान इतने संपन्न हैं कि इन्हें किसी हड़ताल की क्या जरूरत है, इन्हें किसी रियायत या हक की मांग करने का क्या हक है? 

हिन्दुस्तानी लोग अपने किसान को आमतौर पर बैलों के साथ भूखा मरते देखने के आदी हैं, और आए दिन किसी पेड़ की डाल से फंदे पर टंगा हुआ देखने के भी। नतीजा यह है कि जब खाते-पीते किसान मोदी सरकार किसान-कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, तो मोदी प्रशंसकों को यह लग रहा है कि खाते-पीते लोगों का आंदोलन कैसे हो सकता है? यह एक पूरी तरह से शहरी, संपन्न, और राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच है जो कि किसान को गरीब ही देखना चाहती है। 

आलोचक इस बात को भूल जा रहे हैं कि आज आंदोलन के सामने सबसे अधिक सक्रिय पंजाब के वे सिक्ख किसान हैं जो कि अपने धर्म की सीख के मुताबिक किसी भी धर्म पर आई मुसीबत को घटाने के लिए उसके लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। दुनिया में जहां कहीं प्राकृतिक या मानवनिर्मित मुसीबत आती है, यही सिक्ख समुदाय राहत और बचाव में, मदद में सबसे आगे रहता है। और यह समाज दान का चेक काटकर किसी पीएम फंड में नहीं भेजता, वह अपने हाथ-पैरों के साथ मदद करते खड़े रहता है। अपने घर का पैसा भी लगाता है, और अपने वक्त के साथ अपना बदन भी झोंकता है। ऐसा समाज क्या आज अपने किसानों की मदद के लिए आगे नहीं आएगा? शहरी-संपन्न सोच ने 80-85 बरस की बुजुर्ग सिक्ख आंदोलनकारी किसान-महिला को बदनाम करने के लिए कंगना रनौत की अगुवाई में जितनी हमलावर मुहिम चलाई, वह भी इस देश के लिए एक बड़े कलंक की बात थी। इस बुजुर्ग महिला को शाहीन बाग की एक दूसरी बुजुर्ग मुस्लिम महिला बताकर सौ-सौ रूपए में उपलब्ध महिला बताना मोदी के प्रशंसकों की एक बहुत ही किसान-विरोधी सोच थी जिसमें देश की एक सबसे हौसलामंद बुजुर्ग आंदोलनकारी को लाठी टेककर सफर करते हुए देखकर भी शर्म नहीं आई थी, इस गंदी सोच ने इस महिला को भाड़े पर चलने वाली आंदोलनकारी लिखा था, और कंगना रनौत ने इस हमले की अगुवाई की थी। 

हिन्दुस्तान को लेकर जो लोग यह कहते हैं कि यह विविधता में एकता वाला देश है, तो उनकी वह बात महज परदेसियों के बीच देश की तस्वीर बेहतर बनाने के लिए लगाया गया नारा है। सच तो यह है कि इस तथाकथित एकता के भीतर हिन्दुस्तान में फर्क की ऐसी चौड़ी और गहरी खाई है कि संपन्न शहरियों को किसान-आंदोलन देश का गद्दार लग रहा है, खालिस्तानी, पाकिस्तानी, और चीनी लग रहा है। यह देश पहले जितना बंटा हुआ था, अब उससे कहीं अधिक बंटा हुआ है। और अब बांटने को इस देश के पास पाकिस्तान नहीं रह गया है इसलिए अब यह देश किसानों को बांटने में लगा है, सिक्खों को गैरसिक्खों से बांटने में लगा है, संपन्न किसानों को विपन्न किसानों में बांटने लगा है। यह सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा, और तब तक जाने कितने और लोग गद्दार करार दिए जाएंगे। अभी सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा है कि देश के गद्दार तय करने के जो अलग-अलग पैमाने आज पढ़ाए जा रहे हैं, उन सबके आधार पर अगर तय किया जाए, तो 70 फीसदी आबादी गद्दार साबित की जा सकेगी।
 
जब किसी की अंधभक्ति में डूबे हुए लोग इस तरह देश के गद्दार तय करते हैं, तो वे किसी नेता, पार्टी, या विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी तो साबित करते हैं, लेकिन दूसरे तबकों को गद्दार करार देते हुए वे देश के भीतर एक खाई खोदने का काम करते हैं। आज जिन लोगों को किसान-आंदोलन का विरोध करने के लिए किसानों को गद्दार करार देने में जरा भी हिचक नहीं लग रही है, उन्हें याद रखना चाहिए कि एक दिन उनके मां-बाप, वे खुद, या उनके बच्चों के पेशे भी इसी तरह निशाने पर हो सकते हैं। उस दिन उन पर जब नाजायज हमले होंगे, तो फिर उन्हें कौन बचाएगा? अंधभक्ति और पूर्वाग्रह से लोगों की अपनी सोचने-समझने की ताकत किस हद तक खत्म होती है, यह देखना हो तो किसान-आंदोलन की बूढ़ी महिला पर हुए हमलों को देखना चाहिए। 

जिन लोगों ने जरा भी नैतिकता बाकी है, उन्हें अंधभक्ति से परे यह भी सोचना चाहिए कि नाजायज हमलों का यह सिलसिला उनकी अपनी अगली पीढ़ी को कैसा भविष्य देकर जाएगा?   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


26-Dec-2020 4:32 PM 173

बड़े शहरों में जब बड़े जुर्म होते हैं, तो उनकी गूंज बाकी दुनिया में भी फैलती है। दिल्ली में कुछ बरस पहले एक ऐसा बलात्कार हुआ, जिसने पूरे हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया। देश में नया कानून बना, हजार करोड़ का एक निर्भया फंड बना, और भी बहुत कुछ हुआ, संसद से लेकर सरकार तक, और अदालतों से लेकर मीडिया तक, महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन-हमलों पर लोगों की सोच बदली, एक नई जागरूकता आई। कुछ लोग इसे शहर-केंद्रित, या राजधानी-केंद्रित सोच भी कह सकते हैं, लेकिन हम अभी उस पर न जाकर यह देख रहे हैं कि ऐसे मामलों का असर कहां तक होता है, और क्या-क्या होता है। ऐसा ही एक मामला है अमरीका में कुछ बरस पहले एक भारतीय अफसर पर वहां के कानून के तहत दर्ज मुकदमे का, जिसमें उसे घरेलू कामगार के शोषण का कुसूरवार करार दिया गया था। वहां पर भारतीय और बाकी देशों के ऐसे घरेलू कामगारों ने प्रदर्शन भी किया था और पूछा था कि भारत सरकार सिर्फ अपने आरोपी अफसर को बचाने में क्यों लगी है, और भारत की ही नागरिक, शोषण की शिकार, शिकायतकर्ता के हक भारत सरकार के लिए मायने क्यों नहीं रखते हैं?

ऐसी घटनाओं को याद करते हुए हम आज भारत में घरेलू कामगारों की हालत पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं। देश भर में यह सबसे बड़े असंगठित मजदूर-कर्मचारी तबकों में से एक है, और ऐसे करोड़ों लोग सरकार के किसी कानून के तहत न कोई हिफाजत पाते, न कोई हक पाते। उनकी तनख्वाह को लेकर कोई कानून नहीं है, काम के घंटे, हफ्तावार छुट्टी जैसी कोई बात भी नहीं है। देश के मजदूर संगठनों की नजरों में भी घरेलू कामगार शायद मौजूद नहीं हैं, इसलिए इस असंगठित वर्ग की जरूरतों पर कोई चर्चा भी नहीं होती। यही तबका बाल मजदूरों का भी है, बंधुआ मजदूरों का भी है, हिंसा का शिकार भी है, और देह-शोषण का सबसे बड़ा खतरा भी झेलता है। आज हिंदुस्तान में घरेलू कामगारों की हालत अधिक चर्चा की जरूरत है, और ऐसा न करके राज्य सरकारें और केंद्र सरकार ऐसे कामगारों के मध्यम और उच्च वर्गीय लोगों पर तो मेहरबानी कर रही है, लेकिन उनसे अधिक बड़ी संख्या में जो कामगार और मजदूर हैं, उनको अनदेखा भी कर रही है।

 भारत में मजदूर संगठनों की एक दिक्कत यह भी है कि वे संगठित मजदूरों के आसानी से पहचाने जाने वाले तबके पर परजीवी की तरह पलते हैं, और उसी संगठित मजदूर आंदोलन को वे अपनी जिम्मेदारी और कामयाबी दोनों बताते हैं। देश में निजीकरण के साथ-साथ मजदूर आंदोलन कमजोर हुआ, और आर्थिक मंदी के साथ-साथ वह एक किस्म से अप्रासंगिक सा हो चला है। जबकि जरूरत की हकीकत इसके ठीक उल्टे है, और जैसी-जैसी सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र का दखल कारखानों-कारोबारों से कम होते चल रहा है, वैसे-वैसे निजी शोषण के खिलाफ मजदूर आंदोलन की जरूरत पहले के मुकाबले अधिक है। इसी तरह घरेलू कामगारों जैसे बड़े तबके को संगठित करने की भी जरूरत है ताकि लोग अपने आराम के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दूसरों की मजदूरी का सही दाम देने पर मजबूर किए जाएं। आज लोगों के गंदे कपड़ों को धोने, उनके जूठे बर्तनों को मांजने, उनकी फर्श पोंछने वाले लोगों को भी साधारण मजदूरी भी नसीब नहीं होती है। इसी तरह जब सरकार कर्मचारियों को बढ़ी हुई तनख्वाह मिलती है, तो वे अपने कामगारों को अधिक तनख्वाह देने की जरूरत नहीं समझते।

न्यूयॉर्क से ही सही, जागरूकता का मुद्दा कहीं से भी शुरू हो, उस पर आगे बात होनी चाहिए। और भारत के भीतर के घरेलू कामगारों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, ऐसा इसलिए भी अधिक जरूरी है क्योंकि समाज में जाति, ओहदे, और कमाई की वजह से जो तबके ताकतवर हैं, वे कभी भी ऐसी जिम्मेदारी न खुद निभाते, न ही वे चाहते कि सरकार ऐसा कुछ करे। बिना किसी छुट्टी या रियायत, बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने वाले घरेलू कामगारों को भी इंसान और भारतीय नागरिक समझने की जरूरत है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


25-Dec-2020 4:59 PM 182

अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका मतलब है कि हर काले बादल में चांदी की तरह चमकती एक लकीर भी होती है। हिन्दुस्तान में इन दिनों उसे आपदा में अवसर भी कहा जा रहा है। पिछले पौन बरस से बाकी दुनिया के साथ-साथ हिन्दुस्तान पर कोरोना का जितना खतरा मंडराया है, और अभी जारी भी है, उसे अगर लॉकडाऊन के साथ जोड़ दिया जाए तो यह एक सदी का इस देश का सबसे बुरा दौर चल रहा है। 1920 के पहले की महामारी भी शायद इससे अधिक बुरा वक्त था। लेकिन हिन्दुस्तान, और बाकी दुनिया के लिए इस अवांछित बीमारी और खतरे के बीच भी कई ऐसी बातें हो रही हैं जो कि कम से कम जिंदगी और सेहत के मामले में कोरोना से हुए नुकसान की भरपाई भी कर सकती हैं।

दुनिया में हिन्दुस्तान जैसे लापरवाह और भी बहुत से देश होंगे जहां या तो सरकार ने लोगों के हाथ धोने लायक बहते पानी का इंतजाम नहीं किया है, या लोग खुद ही लापरवाह हैं, और अधिक हाथ धोने में उनका भरोसा नहीं है। कोरोना के इस दौर में बहुत से लोगों ने हाथ धोना शुरू किया है, और इससे कोरोना से परे की और भी बहुत सी छोटी-मोटी बीमारियां टल सकती हैं, कम हो सकती हैं। दूसरी अच्छी बात जो कि इस दौर में हुई है, हिन्दुस्तान में जांच और इलाज का ढांचा 9 महीने पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुका है। हर प्रदेश ने अपनी-अपनी क्षमता और सोच के मुताबिक जांच की सहूलियतें बढ़ाईं, अस्पतालों में सावधानी बढ़ाईं, और कोरोना जैसे संक्रमण के मरीजों के इलाज के लिए साधन-सुविधाएं जुटाए। यह काम सरकारी अस्पतालों में भी हुआ, और निजी अस्पतालों में भी बढ़ा। इस बढ़े हुए ढांचे का नियमित और स्थाई इस्तेमाल अगर तय किया जाए तो आने वाली जिंदगी में अधिक जिंदगियां बचाई जा सकेंगी।

यह दौर अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए एक अभूतपूर्व प्रशिक्षण का भी रहा, और सबने एक बुरे संक्रामक रोग से बचते हुए अधिक से अधिक काम करना सीखा है। यह कहा जा सकता है कि अस्पताल और स्वास्थ्यकर्मी पौन बरस पहले के मुकाबले अधिक तजुर्बेकार हो चुके हैं, उन्होंने लगातार विपरीत परिस्थितियों में काम करने की अपनी ताकत को तौल लिया है, और उनकी बाकी कामकाजी जिंदगी में अगर ऐसी कोई और नौबत आती है, तो वे बेहतर तैयार रहेंगे। किसी मरीज के दिल की क्षमता की एक जांच स्ट्रेस टेस्ट (टीएमटी) भी होती है जिसमें मशीन के एक दौड़ते हुए पट्टे पर मरीज को चलाकर उसकी क्षमता आंकी जाती है। हिन्दुस्तान के अच्छे या बुरे, जैसे भी हो, चिकित्सा-ढांचे का स्ट्रेस टेस्ट इन 9 महीनों में हो गया है, और अब राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इन महीनों के तजुर्बे का एक ऑडिट करवाएं, अपनी खूबियों को पहचानें, और खामियों को, कमियों को दूर करने की योजना बनाएं।

कारोबार ने भी इस दौर में मंदी भी देखी, कच्चे माल और पुर्जों की कमी झेली, कामगारों और मजदूरों के न रहने की नौबत भी देखी, और बाजार में ग्राहकी की कमी, और ग्राहकों में खपत की कमी भी देखी। बैंकों से मिली मामूली तात्कालिक रियायतों से परे भी भारतीय कारोबार ने बहुत कुछ सीखा है, और यह सबक आगे के बुरे वक्त उसके बड़े काम आएगा। सरकारी दफ्तरों, जनसुविधाओं के दूसरे दफ्तरों, बैंकों और सार्वजनिक जगहों के मैनेजमेंट ने भी संक्रामक रोग की हालत में काम करना सीखा है, और दुबारा ऐसी किसी नौबत में इन तमाम लोगों के सामने छोटी और बड़ी सभी बातों के लिए एक सबक और मिसाल साथ रहेंगे।

हिन्दुस्तान पिछले कई बरस से डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटते आ रहा है। लेकिन इस पौन बरस ने यह साबित कर दिया कि हिन्दुस्तान में डिजिटल समानता की कितनी कमी है, और संपन्न और विपन्न तबकों के बीच कितनी चौड़ी और गहरी डिजिटल खाई है। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई को ऑनलाईन करने की कोशिश ने यह साबित किया है कि देश के अधिकतर शिक्षकों को ऑनलाईन पढ़ाई करवाने की तकनीकी दक्षता हासिल नहीं है, और इनमें से अधिकतर के पास ऑनलाईन पढ़ाई के लिए जरूरी औजार भी नहीं है। दूसरी तरफ आबादी के तीन चौथाई से अधिक लोग ऐसे हैं जिनके पास परिवार के बच्चों की रोजाना घंटों की ऑनलाईन पढ़ाई के लिए अलग से स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट की सहूलियत नहीं है, और बच्चे डिजिटल-अनाड़ी शिक्षकों से ऑनलाईन पढक़र समझने के लायक भी नहीं हैं। इस नौबत को सुधारने के लिए अगली ऐसी किसी नौबत के आने के पहले केन्द्र और राज्य सरकारों को देश के सबसे गरीब बच्चों के बारे में तैयारी करनी होगी, सबसे कम सहूलियतों वाले स्कूली-शिक्षकों को तैयार करना होगा, सबसे दूर बसे इलाकों तक डिजिटल कनेक्टिविटी की तैयारी करनी पड़ेगी, और पढ़ाई की सामग्री का डिजिटलीकरण करके रखना होगा। अब इन महीनों के खराब तजुर्बे का यह फायदा भी उठाया जा सकता है कि देश की हर पढ़ाई की सामग्री का डिजिटल रूपांतरण करके रखा जाए, और ऐसी सामग्री कोरोना के किसी भाई-बहन के आने के अलावा भी किसी भी नौबत में या नियमित रूप से काम आ सकती है। इस बरस ने हिन्दुस्तान के सामने एक बड़ी डिजिटल चुनौती पेश की है, और एक बहुत बड़ी संभावना भी सामने रखी है कि स्कूल के स्तर पर, गांव या कस्बे के स्तर पर, पंचायत भवन या किसी सामुदायिक केंद्र के स्तर पर अलग-अलग पालियों में अलग-अलग बच्चों को बड़ी स्क्रीन पर किस तरह पढ़ाया जा सकता है, और कैसे उन्हें स्थानीय क्लासरूम की संभावनाओं से ऊपर जाकर ऊंची तकनीकी तरकीबों वाली पढ़ाई करवाई जा सकती है। ऐसी डिजिटल पढ़ाई किसी भी तरह स्थानीय स्कूल और क्लास का विकल्प नहीं रहेगी, लेकिन उसमें वेल्यूएडिशन जरूर कर सकेगी।

कोरोना और लॉकडाऊन के इस दौर ने लोगों को कम सफर करके भी काम चलाने का कुछ तजुर्बा दिया है। लोगों ने घरों से काम किया है, ऑनलाईन काम किया है, दफ्तर में एक वक्त पर कम लोगों ने मौजूद रहकर भी दफ्तर का काम चलाया है। आज सरकारों और दूसरे गैरसरकारी संस्थानों को चाहिए कि ऐसे अनुभव का अध्ययन करके कटौती और किफायत के सबक लें, और अपने खर्च घटाएं।

इस दौर में यह जरूर हुआ है कि लोगों का बाहर घूमना-फिरना एकदम ही खत्म हो गया, बाहर खाना-पीना बहुत ही कम हो गया, अपने पर खर्च करना भी खासा कम हो गया है, और इससे बाजार की अर्थव्यवस्था बुरी तरह तबाह हुई है। लेकिन लोगों की निजी अर्थव्यवस्था खर्च के मामले में सम्हली है, और लोगों ने पहली बार यह पहचाना है कि उनके कौन-कौन से खर्च गैरजरूरी हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोग आगे भी फिजूलखर्ची से बच सकते हैं, और इससे धरती पर खपत का बोझ भी घटेगा। यह बात अर्थव्यवस्था का चक्का घूमने के हिसाब से तो कुछ नुकसान की लगती है, लेकिन किफायत से पर्यावरण का बड़ा फायदा भी हो सकता है। इसलिए पर्यावरण और कारोबार के बीच एक नए संतुलन का भी यह वक्त है, और यह तय है कि दुनिया इस अनुभव का कम या अधिक हद तक फायदा उठाएगी।

यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है, और जिस तरह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बहुत सारी चीजों को विभाजन के पहले और विभाजन के बाद के अलग-अलग दौर में बांटकर देखा जाता है, उसी तरह कोरोना के पहले, और कोरोना के बाद के दौर में यह दुनिया बंटी रहेगी, और लोगों को अगली किसी बुरी नौबत के लिए अच्छी तरह तैयार करके रखेगी। आपदा से होने वाले नुकसान को तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन उससे सबक लेकर कुछ दूसरे मोर्चों पर एक अलग भरपाई की जा सकती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


24-Dec-2020 5:17 PM 199

 

छत्तीसगढ़ में आज एक बड़े आईएएस अफसर रहे बाबूलाल अग्रवाल को ईडी ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। अपने कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे और अभी जिस मामले में देश की एक सबसे ताकतवर जांच एजेंसी, ईडी, ने उन्हें गिरफ्तार किया है वह भ्रष्टाचार से और आगे बढक़र एक साजिश से किया गया जुर्म है। कालेधन को सफेद करने के लिए ग्रामीण-गरीबों के नाम से बैंक खाते खोले गए, उनमें नगद रकम जमा की गई, और फिर वह रकम बाबूलाल अग्रवाल के परिवार के लोगों की कंपनी में भेज दी गई। इस पूरे सिलसिले से वे गरीब नावाकिफ रहे जिनके नाम से फर्जी खाते खोले गए थे। ऐसे सैकड़ों खाते बिना बैंक की साजिश के तो खुल नहीं सकते थे, और बहुत बड़ा होने की वजह से यह मामला उजागर हुआ। बाबूलाल अग्रवाल को केन्द्र सरकार ने पहले ही अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी है और अब नौकरी के दौरान के अपने काम उन्हें जेल पहुंचा रहे हैं।

आईएएस देश की सबसे ताकतवर नौकरी मानी जाती है। केन्द्र सरकार की दर्जनों नौकरियों में से जो सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं उनके लिए यूपीएससी का एक मुकाबला होता है, और उसमें सबसे कामयाब नौजवानों को आईएएस की नौकरी मिलती है। इसके बाद फिर आईपीएस, आईएफएस, और कई दूसरी नौकरियां। बाबूलाल अग्रवाल न तो भ्रष्ट मामलों में फंसे हुए पहले आईएएस अफसर हैं, और न ही आखिरी। और ऐसा भी नहीं कि भ्रष्टाचार सिर्फ इसी नौकरी के लोग करते हैं, और बाकी नौकरियों के लोग दूध के धुले रहते हैं। यहां पर यह भी कहना जरूरी है कि भ्रष्टाचार सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं, भारतीय समाज के हर तबके में भ्रष्टाचार अलग-अलग शक्लों में मौजूद है, और देश के एक भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण के लगाए खुले आरोपों को भूलना नहीं चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के कितने जज भ्रष्ट हैं। इसे लेकर प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मुकदमा भी झेल रहे हैं, लेकिन वे अपने आरोपों पर कायम हैं।

ऐसे देश में जब आईएएस एक सबसे ही संगठित नौकरी है, सबसे ताकतवर तो है ही, तब इस नौकरी के लोगों के एसोसिएशन को अपने लोगों के बारे में सोचना चाहिए। हिन्दुस्तान में बाकी पेशेवर लोगों या कारोबारी लोगों के संगठनों का आम चरित्र यही रहता है कि जब उनके किसी सदस्य पर कोई हमला होता है, या उसके खिलाफ कोई नाजायज दिखती कार्रवाई होती है, तो ऐसी कार्रवाई के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होना, बयान जारी करना, और सत्ता से जाकर मिलना। कुछ ऐसा ही काम पत्रकारों के संगठन भी अपने सदस्यों को लेकर करते हैं कि जब उन पर कोई हमला होता है, या नाजायज लगती सरकारी कार्रवाई होती है, तो वे बैनर लेकर सडक़ों पर उतरते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान में कोई भी संगठन अपने सदस्यों के जाहिर तौर पर दिखते नाजायज कामों को लेकर आंख और मुंह सब बंद कर लेते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर आईएएस एसोसिएशन रोजाना सक्रिय रहता है, देश भर में अपने सदस्य अफसरों के किए हुए अच्छे कामों की तारीफ करता है, उनसे जुड़ी खबरों के लिंक पोस्ट करता है, लेकिन अपने सदस्यों के किए हुए गलत कामों को लेकर कुछ भी नहीं कहता। यह बात अपनी जगह सही है कि सरकारी कार्रवाई शुरू होने के बाद अदालती सजा मिलने के बीच में बहुत बड़ा फासला रहता है, और अधिकतर ताकतवर लोग सजा से बच निकलते हैं, इसलिए जांच एजेंसियों की कार्रवाई शुरू होने से किसी को मुजरिम नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन एसोसिएशन को कुछ सैद्धांतिक बातें तो जाहिर तौर पर करनी ही चाहिए। अपने नए सदस्यों को सावधान करने के लिए, उन्हें भ्रष्टाचार में शामिल होने से बचाने के लिए एसोसिएशन को सार्वजनिक रूप से भी कुछ बातें करनी चाहिए ताकि आम जनता का भी ऐसे संगठनों पर विश्वास हो सके। अपने लोगों की महज तारीफ करने वाले संगठन अगर अपने भ्रष्ट सदस्यों के बारे में कोई सैद्धांतिक बात भी नहीं कहते, तो उनकी विश्वसनीयता कुछ नहीं रहती। लेकिन यह बात महज अफसरों के संगठनों के साथ नहीं है। भारत के संपादकों के संगठन देखें, या पत्रकारों के या टीवी चैनलों के संगठनों को देखें तो रात-दिन नफरत फैलाने, हिंसा भडक़ाने, लोगों के सामने सोची-समझी उकसाऊ-उत्तेजना परोसने वाले कुख्यात हो चुके साम्प्रदायिक लोगों के लिए उनके संगठनों के पास कोई नसीहत नहीं रहती, और जब ऐसे लोग किसी कानूनी मामले में फंसते हैं, तो ये संगठन उनके बचाव के लिए किसी फायर ब्रिगेड की तरह दौड़ पड़ते हैं।

किसी भी पेशे के लोगों के संगठनों को अपनी जिम्मेदारी बढ़ानी चाहिए। अपने लोगों को सिर्फ बचाने का काम जो करते हैं, और गलत कामों पर अगर रोकते नहीं हैं, तो इन संगठनों का महत्व किसी मुजरिम को बचाने वाले पेशेवर वकील से अधिक नहीं हो सकता। जब देश में एक के बाद एक दर्जनों आईएएस अफसर भ्रष्टाचार के पुख्ता दिखते मामलों में गिरफ्तार होते हैं, और उसके बाद भी उनके संगठन मुंह भी नहीं खोलते तो फिर वे संगठन अपने सदस्यों के प्रचार के लिए भाड़े पर ली गई जनसंपर्क एजेंसी से अधिक नहीं रह जाते। हर संगठन के लोगों को अपने भीतर यह बात भी करना चाहिए कि वे अपने सदस्यों को न सिर्फ बाहरी हमलों से बचाने का काम करेंगे, बल्कि भीतर से अगर वे भ्रष्टाचार से खोखले हो रहे हैं तो उसे रोकने की कोशिश भी वे करेंगे। ये संगठन कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने पेशे से जुड़े हुए मामलों में जो सदस्य भ्रष्टाचार की एक दर्जे से ऊपर की कार्रवाई में उलझते हैं, तो उनकी सदस्यता निलंबित की जाए। ऐसा न करके ये संगठन अपनी इज्जत खोते हैं।

डॉक्टरों और वकीलों के संगठनों को, सीए और टैक्स सलाहकारों के संगठनों को अपने-अपने लोगों के बारे में सोचना चाहिए, और उनको गलत काम से रोकने की एक तरकीब ढूंढनी चाहिए। जिस तरह बलात्कार जैसे किसी बड़े जुर्म में फंसने वाले किसी राजनीतिक व्यक्ति को उनकी पार्टी तुरंत ही निलंबित या निष्कासित कर देती है, देश के संगठनों को अपने सदस्यों पर कम से कम इतनी कार्रवाई करने का तो हौसला दिखाना चाहिए ताकि संगठन की साख बची रहे। आज तो नर्सिंग होम्स के मालिक जिस तरह सुरक्षा एजेंसियां रखकर अपने कारोबार की हिफाजत करती हैं, और कोई दिक्कत आने पर सारे मालिक एक-दूसरे की मदद के लिए एकजुट हो जाते हैं, वैसा चरित्र किसी अच्छे संगठन के लिए ठीक नहीं है। चूंकि आईएएस देश की सबसे बड़ी नौकरी मानी जाती है, और सरकारी कामकाज का सबसे बड़ा जिम्मा आईएएस लोगों पर रहता है, इसलिए इनके संगठन को एक मिसाल पेश करनी चाहिए। वैसे तो मिसाल संसद और अदालतों से निकलकर नीचे आनी चाहिए, लेकिन इन दोनों ने तो अपने आपको विशेषाधिकार, और अवमानना के कानून बनाकर इस तरह सुरक्षा चक्र के भीतर सुरक्षित रख लिया है कि उनके बारे में बाहरी लोग मुंह भी न खोल सकें। इसलिए जो संगठन ऐसे कानूनों से लैस नहीं हैं, उन्हीं से हम बात शुरू कर सकते हैं, और कर रहे हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


23-Dec-2020 4:06 PM 205

दो दिन बाद ईसाईयों का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस मनाया जाने वाला है, और ईसाईयों की खासी आबादी वाले केरल में एक नन की हत्या के एक मामले में कल 28 बरस बाद अदालती फैसला आया है जिसमें चर्च के एक पादरी और एक नन को उम्रकैद सुनाई गई है। यह हिन्दुस्तान में सबसे लंबे समय तक चलने वाला हत्या का मामला है, और यह कई मायनों में एक ऐतिहासिक मामला रहा जिस पर केरल का ईसाई समुदाय बंट गया था, और राज्य की पुलिस से लेकर सीबीआई तक इस मामले की जांच में बार-बार बेनतीजा हो रही थीं। 

कत्ल का यह मामला चर्च के भीतर के लोगों को अवैध संबंधों को उजागर करने वाला भी है क्योंकि अदालत में आखिरकार यह साबित हुआ कि जिस नन, सिस्टर अभया, की जख्मी लाश कुएं में मिली थी, वह सुबह 4 बजे पढ़ाई के लिए उठी थी, और रसोईघर में जाने पर उसकी हत्या हो गई थी। सीबीआई ने अदालत में कहा कि उसने रसोई में दो पादरियों और एक नन को अनैतिक स्थिति में देखा, और वह कहीं भांडाफोड़ न कर दे, इसलिए इन तीनों ने मिलकर उसका गला घोंटा, उस पर कुल्हाड़ी से वार किया, और चर्च के हॉस्टल के अहाते में ही उसे कुएं में फेंक दिया। लेकिन जैसा कि ईसाई चर्च अनैतिक संबंधों और देह शोषण के, बच्चों के यौन शोषण के अधिकतर मामलों में करते आया है, उसने इस मामले में संदिग्ध पाए गए पादरियों और नन को काम पर से नहीं हटाया, उन्हें निलंबित नहीं किया, और उनसे रिश्ता नहीं तोड़ा। जो लोग यौन शोषण पीडि़त ननों के हक के लिए केरल में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं वे चर्च के इस रूख पर बहुत ही निराश हैं, और उनका कहना है कि अभी भी एक चर्च प्रमुख के खिलाफ एक नन से बलात्कार का मुकदमा चल रहा है, और बरसों तक चर्च ने उसे हटाया भी नहीं। 

केरल में इस मामले की जांच खासी मुश्किल इसलिए भी थी कि कई जांच अफसर ईसाई समुदाय के थे, और यह खतरा बना हुआ था कि धर्म के प्रति आस्था उनके निष्पक्ष नजरिए को प्रभावित कर सकती थी। राज्य में मतदाताओं पर चर्च के प्रभाव को देखते हुए भी राज्य सरकार का रूख गड़बड़ा सकता था, और आखिर में जाकर सीबीआई को यह मामला दिया गया। अलग-अलग वक्त पर इस मामले से जुड़े सुबूतों को बर्बाद करने की कोशिश की गई, इस कत्ल को खुदकुशी साबित करने की कोशिश की गई, और केरल के जागरूक लोगों का यह कहना है कि यह मामला इस मायने में भी ऐतिहासिक था कि इसे बेनतीजा बंद करने की सबसे अधिक कोशिशें हुईं। 

अब भारत में जुर्म की जांच और अदालती कार्रवाई की बदहाली का यह एक पुख्ता नमूना है कि ऐसे एक जलते-सुलगते मामले पर सीबीआई अदालत का फैसला आने में 28 बरस लग जाएं। इस बीच हाईकोर्ट को कई बार इस मामले में दखल देनी पड़ी तब जाकर इसकी जांच से छेड़छाड़ बंद हुई। जांच और अदालत में 28 बरस लग जाना अपने आपमें बेइंसाफ इंतजाम है। भारतीय लोकतंत्र में जांच एजेंसियां ताकतवर के खिलाफ तकरीबन बेअसर साबित हो जाती हैं। बची-खुची नौबत अदालती कार्रवाई में खराब हो जाती है क्योंकि वहां सुबूतों और गवाहों से छेड़छाड़, दबाव, और खरीद-बिक्री आम बात है। फिर बहुत से मामलों में अगर जज रिश्वत लेने को तैयार है, तो ताकतवर लोग रिश्वत देने के लिए उतावले रहते हैं, और एक पैर पर खड़े रहते हैं। नतीजा यह होता है कि अदालती फैसला आने तक अलग-अलग स्तरों पर इंसाफ की संभावना की भ्रूण हत्या होते चलती है। 

जिस नन का कत्ल हुआ था, उसके मां-बाप भी इंसाफ का इंतजार चौथाई सदी तक करते रहे, और अभी कुछ बरस पहले मरे। इस मुद्दे पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि धर्म-संस्थान अपने मुजरिमों को किस हद तक जाकर बचाने की कोशिश करते हैं, ऐसा बहुत से धर्मों में सामने आता है। दूसरी तरफ धर्म-संस्थान से जुड़े रहने की वजह से किसी पर नैतिकता लागू नहीं हो जाती, और वे हर किस्म का जुर्म करने के लायक बने रहते हैं, हर किस्म की हिंसा कर सकते हैं, करते हैं। एक आखिर बात यह कि आसाराम (बापू) से लेकर (बाबा) राम रहीम तक इतने बलात्कारी धार्मिक व्यक्ति समाज में देखने में आते हैं कि उनके पैरों पर गिरने वाले नेता, अफसर, जज अनगिनत रहते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ किसी शिकायत को जगह नहीं मिलती, इनके खिलाफ शिकायत दर्ज हो जाए तो गवाह सडक़ों पर एक के बाद एक मारे जाते हैं, और ऐसे हजारों लोगों में से दो-चार को ही सजा हो पाती है। धर्म का हिंसक और अनैतिक रूप केरल के चर्च के इस मामले में जितना सामने आया है, उतना ही बहुत से दूसरे धर्मों के मामलों में भी सामने आते रहता है। इसलिए लोगों का भला इसमें है कि धर्मान्ध की तरह आंखें और मुंह बंद रखने के बजाय एक तर्कवादी की तरह आंखें खुली रखनी चाहिए, और सवाल तैयार रखने चाहिए। धर्म उसी वक्त तक पटरी पर चल सकता है, जब तक समाज के भीतर उससे पीछे सवाल करने का हौसला रखने वाले लोग हों, और ऐसे सवालों के लिए माहौल भी हो। लेकिन ताकत के तमाम ओहदों पर बैठे हुए लोगों में बहुतायत ऐसे लोगों की होती है जो कि धर्मान्ध होते हैं, और बेहौसला होते हैं। क्रिसमस के ठीक पहले केरल में ईसाई समुदाय के भीतर, चर्च के भीतर के इस जुर्म से वे सारे मामले भी याद आते हैं जिनमें बड़े-बड़े पादरियों के हाथों बच्चों के यौन शोषण के अनगिनत मामलों को कैथोलिक चर्च मुख्यालय, वेटिकन ने दबाने की हर कोशिश की थी। लोगों को अपने-अपने धर्मों के भीतर सुधार इसलिए करना चाहिए क्योंकि अगला हमला उनके परिवार पर भी हो सकता है। यह बात भूलना नहीं चाहिए कि धर्म-संस्थानों के लोगों के शिकार अनिवार्य रूप से उसी धर्म के, उनके भक्तों के परिवार ही होते हैं। आसाराम के बलात्कार की शिकार लडक़ी आसाराम के भक्त परिवार की बच्ची ही थी। लोग अपने परिवार को बचाना चाहते हैं तो अपने धर्म पर निगरानी रखें, और अपने परिवार को ऐसे खतरों से दूर रखें।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


21-Dec-2020 4:31 PM 279

कोरोना के खतरों को लेकर यह अखबार इस जगह पर जितनी बार लोगों को आगाह कर चुका है, उससे बहुत से लोग थक भी चुके होंगे। लेकिन हर कुछ हफ्तों में ऐसी बात सामने आती है कि हमारा लिखा हुआ जायज साबित होता है। पिछले एक पखवाड़े में कम से कम दो-तीन बार हमने लोगों को सावधान रहने के लिए आगाह किया, और अब ब्रिटेन की ताजा खबर है कि वहां कोरोना ने अपने आपमें एक ऐसा बदलाव कर लिया है कि वह मौजूदा दवाओं और वैक्सीन के काबू से परे का हो गया है। साल के सबसे बड़े त्यौहार, क्रिसमस के ठीक पहले ब्रिटेन ने न सिर्फ लॉकडाऊन किया है बल्कि वहां सरकार की इमरजेंसी बैठकें चल रही हैं। बाकी योरप और दुनिया के बहुत से और देशों ने ब्रिटेन से अपने यहां विमानों की आवाजाही बंद करवा दी है। एक बार फिर ब्रिटेन को एक नए सुरक्षाचक्र में टापू की तरह जीना पड़ेगा। यह हाल दुनिया के एक विकसित देश के संपन्न समाज का है, इसलिए यह खतरा कब किसी और देश पर किसी और तरह से नहीं पहुंच पाएगा इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। यह लड़ाई अब तक प्रचलित कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन के भरोसे चल रही थी, लेकिन जिस तरह ब्रिटेन में कोरोना ने एक नया अवतार धर लिया है, उससे यह वैक्सीन भी वहां बेअसर हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो कोरोना की इस नई नस्ल के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने की एक नई लड़ाई सिरे से शुरू करनी पड़ेगी, और वह जाने कितना वक्त लेगी।

हिन्दुस्तान में सार्वजनिक जगहों पर लोगों को देखें तो लगता है कि वे कोरोना से जंग जीत चुके हैं, और दशहरे के रावण की तरह उसे जलाकर अब सोनपत्ती बांटने के लिए निकले हैं। लोगों के चेहरों से मास्क गायब हैं, सार्वजनिक जगहों पर लोग गैरजरूरी चीजें खाने-पीने के लिए टूट पड़े हैं, कमसमझ सरकारों ने बाजार के खुलने के घंटों को सीमित करके यह मान लिया है कि दुकानों पर होने वाली धक्का-मुक्की के बजाय दुकानों के बंद शटर अधिक महत्वपूर्ण हैं। तम्बाकू के शौकीन हिन्दुस्तान में आधी आबादी सार्वजनिक जगहों पर तम्बाकू की पीक उगलते दिखती है, और इसे देख-देखकर तम्बाकू न खाने वाले भी सडक़ों पर हर कुछ मिनट में थूककर यह गारंटी कर लेते हैं कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है, और उन्हें कोई रोक नहीं सकते। लोगों ने शादी-ब्याह, राजनीतिक जलसे, और धार्मिक भीड़ में महीनों की कसर पूरी करना शुरू कर दिया है। लोगों को वैक्सीन की घोषणा सुनकर ही बदन में वैक्सीन लग जाने का एहसास हो रहा है। यह लग ही नहीं रहा है कि आखिरी व्यक्ति को वैक्सीन लगते हुए 2024 पूरा गुजर जाने का एक अंदाज अभी सामने आया है। और अंग्रेजों पर आई इस नई मुसीबत से हिन्दुस्तानियों का भल क्या लेना-देना कि कोरोना का यह नया अवतार इस वैक्सीन की ताकत से बाहर का हो सकता है।

जब किसी देश की सोच अवैज्ञानिक होने लगती है, तो वहां पर लोगों का बर्ताव ऐसा ही गैरजिम्मेदारी का रहता है। जिस वक्त चेचक का टीका इस देश में हर बच्चे को लग रहा था, उस वक्त भी चेचक से बचाव के लिए लोग माता पूजा करने में लगे हुए थे। तब से अब तक धर्म पर आस्था बढ़ते-बढ़ते धर्मान्धता पर आस्था की शक्ल ले चुकी है, और लोग कोरोना के खतरे से बेफिक्र हो गए हैं। पूरे हिन्दुस्तान में अगर कोई अकेली जगह कोरोना की दहशत से सहमी हुई है, तो वह संसद है जो कि टल गई है। बाकी तो हैदराबाद से लेकर बंगाल तक आमसभाओं की जंगी भीड़ और धक्का-मुक्की तक देश के लिए फिक्र की बात नहीं है। आज इस वक्त छत्तीसगढ़ में विधानसभा चल रही है, दूसरे कई प्रदेशों में संसदीय काम चल रहा है, महज इस देश की संसद कोरोना की फिक्र में डूबी हुई है, और काम करने से कतरा रही है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह संसद काम करने से नहीं, देश के जलते-सुलगते मुद्दों का सामना करने से कतरा रही है, और किसानों से बचने के लिए कोरोना एक सहूलियत बनकर आ गया है। खैर, जब संसद चल भी रही थी, तब भी किसानों के हक कुचलने वाले कानून बनने से कौन रोक पाए?

मुद्दे से भटकना ठीक नहीं है, इसलिए हम भयभीत संसद छोडक़र वापिस कोरोना पर आते हैं, और हिन्दुस्तानी मिजाज की बात करते हैं। हिन्दुस्तानी अंधविश्वास में जिस तरह डूबे हुए हैं, वैज्ञानिक सोच से जितने दूर हो गए हैं, दूसरों के हक को कुचलने के लिए जिस तरह बेताब रहते हैं, जिस तरह सार्वजनिक जगहों को गंदा करना उन्हें राष्ट्रवाद लगता है, उससे यह जाहिर है कि कोरोना का मौजूदा दौर चाहे नीचे चला गया हो, कोरोना का अगला कोई दौर अगर आएगा, तो हो सकता है कि वह समंदर की अगली लहर की तरह मौतों को बहुत ऊपर भी ले जाएगा। कोरोना की वैक्सीन हिन्दुस्तान में अगले महीने से लगना शुरू हो सकती है, लेकिन आबादी का बहुत थोड़ा हिस्सा शुरू में इसे पा सकेगा। फिर वैज्ञानिक सोच यह भी कहती है कि मौजूदा वैक्सीन जितनी आपाधापी में बनाई गई हैं, उससे हो सकता है कि वे उम्मीद पर खरी न भी उतरें। यह सब साबित होते-होते साल-दो साल का वक्त लग सकता है, और इस बीच हो सकता है कि कोरोना के कई नए अवतार आ जाएं। इसलिए सावधानी का जो दर्जा हिन्दुस्तानियों को बचाने के लिए चाहिए, इस देश के राजनेता उस सावधानी को कचरे की टोकरी में डालने की मिसालें रात-दिन पेश कर रहे हैं। ऐसे में आसपास के लोग, परिचित और रिश्तेदार चाहे कितनी ही खिल्ली उड़ाएं, लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तान जैसे देश में सरकारें खतरे को आसानी से मानने को भी तैयार नहीं होंगी।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


20-Dec-2020 5:44 PM 191

वैसे तो कम्प्यूटर तकनीक और मशीनों को इंसान ने बनाया है, लेकिन यह जरूरी नहीं होता कि खुद ने जो बनाया है उससे हमेशा सबक भी लिया जा सके। कम्प्यूटर की जितनी खूबियां हैं, उनसे इंसानी दिल-दिमाग बहुत सी चीजें सीख सकते हैं, और इंसान का दिमाग जिस हद तक लचीला है, उसके लिए अपने आपको ऐसा ढालना नामुमकिन तो बिल्कुल नहीं है। 

अब कम्प्यूटर की एक खूबी तो यह है कि उसकी याददाश्त से चीजों को हटाया जा सकता है। जैसे-जैसे कम्प्यूटर की हार्डडिस्क या किसी और किस्म की मेमोरी भरती जाती है, उसका काम धीमा होते जाता है। जब वह पूरी तरह भरने लगती है, तो कम्प्यूटर जटिल हिसाब-किताब नहीं कर पाता, और उसकी मेमोरी खाली करनी होती है। ऐसा ही मोबाइल फोन के साथ भी होता है जो कि एक छोटा कम्प्यूटर ही है, और जब उसमें फोटो और वीडियो भरते-भरते गले तक भर जाते हैं, वह काम करना लगभग बंद कर देता है। 

लोगों की याददाश्त पर काम करने वाले वैज्ञानिकों का यह मानना है कि अगर किसी नए विचार पर काम करना है, तो दिमाग में पहले से चल रहे बहुत से विचारों को रोकना या कम करना जरूरी होता है। ऐसा करने से बहुत सी तकलीफों से भी बचा जा सकता है, और कुछ बातों को भूले बिना आगे बढऩा मुमकिन नहीं है। यह बात कुछ उसी तरह की है कि कार को चलाते हुए अगर आगे ले जाना है, तो पीछे का दिखाने वाले आईने में झांकना बंद करना पड़ता है। यह मुमकिन नहीं होता कि पूरे वक्त पीछे देखते चलें, और आगे बढ़ते चलें। यह कुछ इस किस्म का भी है कि क्लासरूम का ब्लैकबोर्ड, या स्कूल के बच्चे की स्लेट-पट्टी, इनपे लिखे हुए को जब तक मिटाया नहीं जाता, तब तक इन पर आगे कुछ लिखा भी नहीं जा सकता। कम्प्यूटरों की चर्चा के बिना भी यह बात कही जाती है कि कोई नया काम करना हो तो क्लीन स्लेट से शुरूआत करनी चाहिए। पुराने जमाने की एक कहावत भी है, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले। 

बीते वक्त की यादों की भारी-भरकम टोकरी को सिर पर लादे हुए आगे का बड़ा और लंबा सफर मुमकिन नहीं होता। लोगों को पुराने रिश्तों या रंजिशों के बोझ से छुटकारा पाकर ही अपने को आगे के सफर के लिए तैयार होने का मौका मिलता है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि दिमाग की याददाश्त की क्षमता और सोचने की क्षमता दोनों का कोई मुकाबला कम्प्यूटर नहीं कर सकते, लेकिन जिस तरह कम्प्यूटर में अलग-अलग बिखरी हुई बातों को एक साथ करने से भी उसकी क्षमता बढ़ती है, ठीक उसी तरह इंसानी दिमाग को डीफ्रेगमेंट करना सबके लिए तो मुमकिन नहीं है, लेकिन योग-ध्यान करने वाले, प्राणायाम करने वाले अपने सोचने पर कुछ या अधिक हद तक काबू कर पाते हैं। 

 

प्राणायाम में जिस तरह बाहरी दुनिया से धीरे-धीरे अपने को अलग करते हुए अपनी ही सांसों के साथ, उसी पर ध्यान देते हुए कुछ वक्त रहने का काम होता है, वह दिमाग पर एक किस्म से काबू पाने की एक तकनीक भी है। और बाकी सबको भूलकर कुछ वक्त के लिए अपने में जीना, महज अपने साथ जीना, यह भी उतने वक्त के लिए बाकी यादों से परे जीने का काम होता है। जिस तरह कम्प्यूटर की मेमोरी खाली करने पर उसका प्रदर्शन बेहतर होने लगता है, वैसा ही इंसानों के साथ भी होता है, फिर चाहे वे उसे मानें, या न मानें। होता यही है कि यादों में बहुत उलझे हुए लोग, बीती जिंदगी की गलियों में ही भटकते हुए लोग बहुत आगे नहीं बढ़ पाते। 

अपने ही बनाए हुए कम्प्यूटर से सीखने की बहुत सी बातें इंसानों को और भी मिलती हैं। गैरजरूरी पन्नों को बंद करना, गैरजरूरी एप्लीकेशन बंद करना बेहतर कामकाज के लिए कितना जरूरी है, यह भी कम्प्यूटर से सीखने की जरूरत रहती है। लोग मल्टीटास्टिंग करते हुए बहुत सारे काम शुरू कर देते हैं जिन्हें वे साथ-साथ करते चलते हैं, लेकिन कम्प्यूटर की भी ऐसा करने की एक सीमा रहती है। लोग कई बार अपनी सीमाओं को नहीं पहचान पाते, और एक साथ बहुत से काम छेड़ देते हैं, और फिर उनमें से कोई भी काम किसी किनारे नहीं पहुंच पाता। अपनी खुद की क्षमता की सीमाओं को पहचानना, और फिर उसके भीतर-भीतर काम करना, यह कामयाब होने की कई शर्तों में से एक शर्त रहती है। 

जिस तरह इंसान बाकी कुदरत से, जंगलों और पेड़ों से, नदियों के बहाव से, समंदर के फैलाव से, आसमान और पंछियों से बहुत कुछ सीख सकते हैं, उसी तरह अपनी बनाई मशीनों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। अभी किसी ने सोशल मीडिया पर प्रेरणा का एक पोस्टर पोस्ट किया था जिसमें सीढिय़ों के सामने खड़े एक इंसान के सामने पहली सीढ़ी बाकी के मुकाबले चार-छह गुना अधिक ऊंचाई की थी, और लिखा था कि पहला कदम ही सबसे भारी होता है। इस बात को लोगों ने कई अलग-अलग तरह से लिखा है, और कुछ ने हौसला बढ़ाने वाली यह बात भी लिखी है कि हजार मील का सफर भी पहला कदम बढ़ाने के बाद ही शुरू होता है। किसी भी बड़े और कड़े काम की शुरूआत कुछ मुश्किल होती है। जो लोग किसी भी तरह की कार या मोटरसाइकिल चलाते हैं, वे जानते हैं कि खड़ी गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए जो पहला गियर लगता है, वही इंजन की सबसे अधिक ताकत होती है, और फिर जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती है, अगले गियर कम ताकत के रहते हैं। जब गाड़ी पूरी रफ्तार पर आ जाती है, तो टॉप गियर सबसे ही कम ताकत का रहता है। असल जिंदगी में भी इंसान अगर देखे तो किसी भी चुनौती का शुरूआती वक्त सबसे कठिन होता है, और इसके बाद धीरे-धीरे कठिनाई कम होते चलती है, जब लोग मंजिल की तरफ अपने सफर पर कुछ आगे बढ़ निकलते हैं, तो जिंदगी का गियर भी कम ताकत वाला टॉप गियर लगता है।

ये तमाम चीजें बनाई हुई तो इंसानों की हैं, लेकिन इन सबकी जो सीमाएं या खूबियां हैं, उनको देखकर सभी लोग पहले की देखी-भाली बातों को भी एक नए नजरिए से देख सकते हैं, और सीख सकते हैं। यहां पर हम कुल दो-तीन चीजों की मिसाल दे रहे हैं, लेकिन लोग अपने-अपने दायरे में अपने काम आने वाली बाकी मशीनों, बाकी चीजों को याद करके उनसे बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। फिलहाल जिस बात से शुरू किया था, उसी पर लौटें तो वह यह है कि लोगों को गैरजरूरी यादों से छुटकारा पाना सीखना चाहिए। लोगों को सुबह उठने के बाद रात के सपनों के बारे में सोचने के बजाय दिन में क्या-क्या करना है इस बारे में सोचना चाहिए। दुनिया के बहुत से दार्शनिकों ने दुश्मनी को भुला देने, दर्द को भुला देने की नसीहत भी हजारों बरस से दी है। जहां से निकलकर आगे बढ़ चुके हैं उसे भी भुला देने को कहा है। और मशीनें भी कुछ-कुछ वैसा ही सुझाती हैं और हमारे सामने अधिक ठोस तरीके से यह सामने रखती हैं कि ऐसा करने से काम कैसे आसान हो जाता है।   क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

 


19-Dec-2020 2:17 PM 207

दिल्ली के इर्द-गिर्द घेरा-डेरा डाले बैठे किसानों के बीच बुजुर्ग सिक्ख किसानों के चेहरे जैसे जीवट दिखते हैं उनसे किसान तबके के संघर्ष का माद्दा भी दिखता है, और सिक्खों का जुझारूपन भी। अभी पिछले दो-चार दिनों से वहां की तस्वीरों में एक टेबुलाईड अखबार पढ़ते लोग दिख रहे हैं जिसका नाम ट्रॉली-टाईम्स है। देश के स्थापित और बड़े मीडिया में अपने खिलाफ एक मजबूत सत्तासमर्थक पूर्वाग्रह देखते हुए इन आंदोलनकारियों ने अपना अखबार निकालना शुरू किया है ताकि अपने लोगों की खबर हो सके। यह दो भाषाओं में छप रहा है, और इसके दाम रखे गए हैं-पढ़ो और बढ़ाओ। कुछ सिक्ख नौजवानों ने इसे निकालना शुरू किया है, और इसकी छपी हुई कॉपी पर लिए गए क्यूआर कोड से इसे फोन या कम्प्यूटर पर भी पढ़ा जा सकता है।

मूलधारा या मेनस्ट्रीम का कहा जाने वाला मीडिया अपनी स्टीम (भाप की ताकत) खो चुका है। वह सरकार और बड़े कारोबार के दबाव और प्रभाव में कहीं झुका हुआ दिखता है, और कहीं लेटा हुआ। जहां दबाव न भी रहे, वहां भी मीडिया के संगठित और कामयाब कारोबार को हवा में ऐसे दबाव की आशंकाएं दिखने लगती हैं, और उसे झुकने भी नहीं कहा जाता वहां भी वह मौका मिलते ही लेट जाने के फेर में रहता है। ऐसे में जमीनी हकीकत के मुद्दों को लेकर जब कोई आंदोलन लड़ाई लड़ता है, तो उसे इस किस्म की मौलिक कोशिश के लिए तैयार भी रहना चाहिए।

वैसे भी पूरी दुनिया में इंसाफ के लिए लड़ी जा रही लड़ाई को कारोबारी-मीडिया में जगह मुश्किल से मिलती है, या फिर उसे कुचलने के लिए की जा रही कोशिशें ही उस मीडिया में जगह पाती हैं। दुनिया भर में आंदोलनों को अपनी आवाज खुद ही गुंजानी पड़ती है, और आज का सोशल मीडिया इसमें उनके बहुत काम आ रहा है। क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि सोशल मीडिया न होता तो किसानों के आंदोलन के इस अखबार की खबर उस छपे हुए अखबार की पहुंच के बाहर पहुंच पाती? आज भी पूरी दुनिया में आंदोलन और सामाजिक संघर्ष की तस्वीरें कारोबारी फोटो एजेंसियों के रास्ते ही दुनियाभर में फैलती हैं, और इन्हें खरीद पाना उन मीडिया-कारोबार के लिए ही मुमकिन होता है जो इन्हें अमूमन छापना नहीं चाहते। मीडिया जैसे-जैसे एक बड़ा कारोबार बनता है, वह बड़े कारोबार के वर्गहित साझा करने लगता है। और बड़ा कारोबार हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में सरकार के रहमोकरम का मोहताज होता है, और वही चरित्र मीडिया-कारोबार में भी आने लगता है। इसलिए एक समानांतर मीडिया, एक वैकल्पिक मीडिया, एक जनकेन्द्रित मीडिया जरूरी है जो कि मीडिया के बड़े कारोबार से कभी नहीं निकल सकता। इसके लिए छोटे कारोबारी हितों या गैरकारोबारी कोशिशों की जरूरत होती है।

मीडिया में काम करने वाले लोगों से बाहर अधिक लोगों को यह जानकारी नहीं रहती कि किस तरह आज बहुत से लेखक, फोटोग्राफर, वीडियोग्राफर अपने काम को किसी भी तरह के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट पर डालने लगे हैं। क्रियेटिव-कॉमन्स का लेबल लगी हुई सामग्री का मुफ्त में इस्तेमाल किया जा सकता है, और ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि छोटे मीडिया कारोबार कभी भी बड़े फोटो-वीडियो कारोबार का भुगतान करने की हालत में नहीं रह सकते। लेकिन अभी भी यह कोशिश बहुत शुरूआती दौर में है। संघर्ष का दस्तावेजीकरण जहां कहीं भी, जिस तरह से भी हो रहा है, उसे ऑनलाईन जगहों पर अधिक उदारता से डालने की जरूरत है ताकि छोटे मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते बात आगे बढ़ सके।

इसकी एक बड़ी कोशिश 2002 के गुजरात दंगों के बाद हुई थी जब उन दंगों को रिकॉर्ड करने वाले फिल्मकारों, वीडियोग्राफरों, और फोटोग्राफरों ने अपने काम को एक समूह बनाकर उसमें दे दिया था ताकि उसका अधिक से अधिक मुफ्त इस्तेमाल हो सके, और यह ताजा इतिहास दूर-दूर तक पहुंच सके। लेकिन दूसरी तरफ आज अगर हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई, भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी, बांग्लादेश के निर्माण, भोपाल गैस त्रासदी, सिक्ख-विरोधी दंगे, बाबरी-विध्वंस, कश्मीर और उत्तर-पूर्व के आंदोलन, अमरीका के काले लोगों के आंदोलन, दुनिया भर से शरणार्थियों की आवाजाही, अफगानिस्तान, इराक, और सीरिया के युद्ध की तस्वीरें देखें, तो अधिकतर तस्वीरें कारोबारी फोटो एजेंसियों की दिखती हैं। अब इतना भुगतान करके इनका कौन इस्तेमाल कर सकते हैं? इसलिए क्रियेटिव कॉमन्स के तहत मुफ्त इस्तेमाल के लिए लोगों को अपना अधिक काम पोस्ट करना चाहिए ताकि दुनिया भर के छोटे कारोबारी और अधिक सरोकारी लोग उनका इस्तेमाल कर सकें।

यह दौर इतिहास लेखन का एक अजीब सा दौर है। पहले भी इतिहास वही लिखा जाता था जो विजेता के नजरिए का होता था। आज भी इतिहास का बड़ा हिस्सा कामयाब के नजरिए से लिखा जाता है जो कि जिंदगी, दुनिया, और कारोबार की लड़ाई जीते हुए लोग हैं। लेकिन यह अजीब दौर इसलिए है कि आज मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, और ऑनलाईन प्लेटफॉर्म तक इतिहास दर्ज करने की औपचारिक, संगठित, और अनौपचारिक, असंगठित कोशिशें चल रही हैं। ऐसे में गैरकारोबारी वैकल्पिक मीडिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम सरोकारी लोगों को हाथ बंटाना चाहिए। आज संचार तकनीक बहुत मामूली दाम पर सबको हासिल है इसलिए सरोकार की बात तो आगे बढ़ाना भी पहले के मुकाबले कम मुश्किल है। ऐसे में सामग्री की कमी पड़ती है जिसे दूर करने के लिए फोटोग्राफरों, फिल्मकारों, वीडियोग्राफरों, और लेखक-संवाददाताओं को आगे आना चाहिए। मौजूदा व्यवस्था पर तगड़ी मार करते हुए बहुत से कार्टूनिस्ट बहुत ताकतवर काम कर रहे हैं, उनको भी अपने काम का कम से कम एक हिस्सा मुफ्त इस्तेमाल के लिए घोषित करना चाहिए। जिस तरह वकालत के पेशे में जरूरतमंद तबके के कुछ मामलों को मुफ्त लडऩा प्रो-बोनो नाम का एक सम्मानजनक योगदान गिना जाता है, इस तरह बहुत से डॉक्टर अपना कुछ काम जरूरतमंद लोगों के लिए करते हैं, उसी तरह समकालीन दस्तावेजीकरण करने वाले तमाम पेशेवर और शौकीन लोगों को अपने काम का कुछ या अधिक हिस्सा सरोकारी-मीडिया या छोटे मीडिया के लिए समर्पित करना चाहिए ताकि बात आगे बढ़ सके।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


18-Dec-2020 4:56 PM 220

केन्द्र सरकार किसान आंदोलन को लेकर बातचीत का एक सिलसिला तो चलाए हुए हैं लेकिन उससे परे उसका रूख पूरी तरह बेपरवाह भी दिख रहा है। केन्द्र ने ऐसे कई किसान संगठन होने का दावा किया है जो कि केन्द्र सरकार के नए किसान कानूनों के समर्थक हैं। दूसरी तरफ पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, और कुछ दूसरे प्र्रदेशों के जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उनसे जूझने के लिए दिल्ली के इर्द-गिर्द भाजपा की सरकारों की पुलिस है ही। नतीजा यह है कि देश के दर्जन भर से अधिक प्रमुख विपक्षी दलों या किसान संगठनों की बात मीडिया के एक हिस्से से परे कोई मायने नहीं रख रही है क्योंकि केन्द्र सरकार को दुबारा सत्ता में आने के लिए जमीनी और किसानी मुद्दों की अधिक जरूरत नहीं है।

बात दरअसल यह है कि जब देश की देह पर कुछ ऐसी कमजोर नब्जें पता चल जाएं जिनसे बाकी शरीर की हलचल पर काबू होता है, तो फिर बाकी शरीर की अधिक फिक्र जरूरी भी नहीं होती। पिछले छह बरसों में केन्द्र की मोदी सरकार ने कभी नोटबंदी जैसा अप्रिय काम किया, कभी जीएसटी को बहुत खराब तरीके से लागू किया, कभी जेएनयू, जामिया मिलिया जैसे संस्थानों के रास्ते देश भर के छात्रों को नाराज किया, कभी मुस्लिम समुदाय को नाराज किया, तो कभी दलितों को। और कोरोना-लॉकडाऊन में तो देश के करोड़ों प्रवासी मजदूरों को बदहाल ही कर दिया। इसके बाद ऐसा लगता था कि जिस बिहार के प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटे थे, उस बिहार में वे मजदूर भाजपा और नीतीश कुमार से हिसाब चुकता करेंगे, लेकिन ऐसा हुआ कुछ नहीं, और मतदाताओं के बहुमत से ही बिहार में एनडीए की सरकार वापिस सत्ता पर लौटी। देश के बाकी जगहों पर भी चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी को कोई अधिक नुकसान नहीं हुआ, बल्कि फायदा ही फायदा हुआ, और अब तो वह मुस्लिमों के गढ़ हैदराबाद तक में वार्ड चुनाव तक घुसपैठ कर चुकी है।

दरअसल देश के असल मुद्दों का वोटों के साथ तीन तलाक इतना मजबूत हो गया है कि चुनाव आते-जाते रहते हैं, और सरकार अब मतदाताओं की किसी नाराजगी की फिक्र में नहीं है। ऐसा इसलिए है कि भाजपा के हाथ मतदाताओं की तमाम कमजोर नब्ज उसी तरह लग गई हैं जिस तरह कोई नाड़ी वैद्य शरीर का हाल तलाशते हैं, या एक्यूपंक्चर वाले जानते हैं कि किस-किस नब्ज पर सुई चुभानी है, या एक्यूप्रेशर वाले जानते हैं कि किस नस पर दबाना है। आज जब चुनावी विश्लेषणों के पंडित अटकल लगाते हैं कि वोटर किन-किन बातों से नाराज होकर, या नाराज होने की वजह से मोदी की पार्टी के खिलाफ वोट देंगे, तो मतदाता की नब्ज पर इन पंडितों का हाथ नहीं रहता। मतदाता की देह, उसका तन-मन, यह सब कुछ अब कई भावनात्मक मुद्दों के हाथों इस हद तक गिरवी रखे जा चुके हैं कि वे अपने नुकसान, और अपनी नाराजगी, इनसे परे जाकर हर चीज को राष्ट्रप्रेम और मोदी से जोड़ लेते हैं। एटीएम की कतार पर दिन गुजारते उन्हें अपने तकलीफ नहीं दिखती क्योंकि उनके सामने देश की सरहद पर खड़े फौजी को पेश किया गया है कि वह तो बिना शिकायत किए हफ्तों खड़े रहता है। जब राष्ट्रवाद सिर पर सवार होता है तो यह सवाल भी काफूर हो जाता है कि एटीएम का सरहद से क्या लेना-देना, और क्या नोटबंदी के लिए उस सैनिक ने कहा था? जब देश की सरकार और इस देश की सबसे कामयाब पार्टी जिंदगी की तमाम तकलीफों को राष्ट्रवाद से, संस्कृति के कथित इतिहास से ढांक देने में महारथ हासिल कर लेती है, तो फिर उसे चुनाव जीतने के लिए जमीनी मोर्चों पर कामयाबी की जरूरत नहीं रह जाती। आज यह देश मोदी है तो मुमकिन है, नाम की एक लहर पर सवार है, और लोगों का स्वाभिमान एक पेशेवर सर्फर की तरह लहरों पर सर्फिंग कर रहा है। ऐसे में राष्ट्रवादी भावनात्मकता का कोई मुकाबला नहीं हो सकता क्योंकि इसकी मौजूदा आक्रामकता से बढक़र अगर कोई दूसरी राष्ट्रवादिता सामने नहीं आती, तो फिर उसे कैसे शिकस्त दी जा सकती है। लोग अपने तन-मन से बेसुध अब एक ऐसी मानसिक हालत में चले गए हैं कि उन्हें अपने सुख-दुख की न खबर रही, और न ही फिक्र। लोकतंत्र के भीतर, लोकतांत्रिक नियमों को तोड़े बिना लोगों को एक सामूहिक सम्मोहन में इस तरह जकड़ा जा सकता है, यह कुछ बरस पहले तक अकल्पनीय था।

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने इस लोकतंत्र के खेल के तमाम नियम बदल डाले हैं। पुराने नियमों के मुताबिक खेलने वाली टीमें अब अप्रासंगिक हो चुकी हैं। जब आबादी का एक बड़ा हिस्सा उसकी तकलीफ के एहसास से आजाद कराया जा सकता है, तो फिर उस हिस्से से कुछ भी करवाया जा सकता है, कुछ भी करवाया जा रहा है। आज कोई आसार नहीं दिख रहे कि इस देश के लोग इस सामूहिक सम्मोहन से उबर सकेंगे। दरअसल उन्हें उबरने की जरूरत भी नहीं लग रही है, वे उसी में खुश हैं, डूबे हुए हैं। मीडिया का एक हिस्सा मोदी समर्थकों को भक्त लिखता है। ये लोग एक भक्तिभाव में डूबे हुए हैं, और ऐसे किसी को उससे उबरने के लिए कहना उसे जायज नहीं लगेगा, उसे लगेगा कि उसकी कोई पसंदीदा चीज उससे छीनी जा रही है। जो लोग दुनिया के कुछ दूसरे देशों के इतिहास की मिसालें देकर यह कहने की कोशिश करते हैं कि लोग ऐसे भक्तिभाव से उबरते भी हैं, उनकी दिक्कत यह है कि उनका दिमाग इतिहास के बक्से में बंद और उसी आकार का है। वह खुले आसमान के तहत यह नहीं सोच पाता है कि इतिहास की हर मिसाल भविष्य पर लागू नहीं होती। हिन्दुस्तान आज इतिहास की मिसालों से परे जी रहा है। और जिन लोगों का हाथ आज देश के बहुमत के दिल-दिमाग की नब्ज पर है, उन्हें हटाना डॉन को पकडऩे की तरह नामुमकिन न सही मुश्किल तो है। यह देश आज अपनी ही तकलीफ के एहसास से आजाद है, यह एक बहुत अनोखी नौबत है, और विपक्षियों के साथ दिक्कत यह है कि यह इतिहास की उनकी किन्हीं मिसालों के साथ फिट बैठने वाला केस नहीं है। आगे-आगे देखें, होता है क्या...  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


17-Dec-2020 2:12 PM 254

आज जब हिंदुस्तान के कई राज्यों में सरकारों को एक बरस भी पूरा नहीं होने दिया जा रहा है तब छत्तीसगढ़ में एक ही पार्टी की सरकार के एक ही मुख्यमंत्री के दो बरस पूरे होने का मौका सिर्फ इसी वजह से भी खास हो सकता था, लेकिन छत्तीसगढ़ दूसरे कई मायनों मेंं भी दूसरी सालगिरह का जलसा मनाने का हकदार है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने देश के तमाम राज्यों के बीच एक अनोखा एजेंडा सामने रखा है। बीस बरस उम्र के इस नए राज्य में कोई सरकार ग्रामीण और किसानी प्राथमिकताओं को इतना बढ़ा सकती है, यह किसी ने सोचा नहीं था। इस दो बरस की आर्थिक उपलब्धि यह है कि सरकार ने कर्ज लेकर भी प्रदेश की करीब आधी आबादी को प्रत्यक्ष और परोक्ष मदद की है। अठारह लाख किसानों के खेती के कर्ज की माफी से उनके परिवारों के लोग और उनकी खेती से जुड़े हुए दूसरे लोग मिलाकर भी प्रदेश की आधी आबादी  हो जाते हैं। विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष भूपेश बघेल का यह चुनावी वायदा था, और इसे पूरा करने के साथ ही देश में सबसे ऊंचे दाम पर धान खरीदकर मुख्यमंत्री ने सरकार की प्राथमिकता में किसान की जगह साफ कर दी। नतीजा यह हुआ कि गांव-गांव तक पहुंची संपन्नता ने खींचतानकर कोरोना-लॉकडाऊन की मार को भी झेल लिया। लगे हाथों एक दूसरी बात की चर्चा जरूरी है कि ग्रामीण रोजगार के मामले में छत्तीसगढ़ ने लॉकडाऊन के वक्त से ही इतना जोर दिया कि राज्य देश में इस मामले में सबसे आगे रहा। सरकार के पहले ही महीने से गांव-गांव तक नालों को बांधना, पशुओं के लिए रहने-खाने की जगह विकसित करना शुरू हुआ जो कि हजारों करोड़ की लागत से आज भी जारी है। यह पूरा का पूरा खर्च सीधे गांवों में ही हुआ और लॉकडाऊन के बाद जब बाजार में जमकर ग्रामीण-खरीदी हुई तो समझ आया कि यह कर्जमाफी, धान के दाम के साथ-साथ दूसरी ग्रामीण मजदूरी का पैसा भी है।

लेकिन इन आर्थिक मोर्चों के अलावा कुछ सामाजिक मोर्चों पर भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस राज्य को एक अलग पहचान दी है। यह पहला मौका है जब क्षेत्रीय और खालिस छत्तीसगढ़ी रीति-रिवाज, त्यौहार, बोली, और सामाजिक कार्यक्रमों को सीधे मुख्यमंत्री निवास से सीएम ने सपरिवार भागीदारी से एक अलग महत्व दिया, और प्रदेश में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का एक अभूतपूर्व माहौल बना। भूपेश बघेल की यह एक आक्रामक सांस्कृतिक नीति रही, लेकिन यह न तो किसी दूसरी संस्कृति के लोगों के खिलाफ रही, और न यह छत्तीसगढ़ के बाहर से आकर बसे लोगों के खिलाफ किसी रणनीति की तरह रही। स्थानीय बोली से लेकर त्यौहारों तक को दिया गया महत्व किसी और के खिलाफ नहीं रहा। क्षेत्रवाद और संस्कृतिवाद के साथ आमतौर पर ऐसा एक खतरा जुड़ा रहता है, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्थानीयता को बढ़ाते हुए भी उसे किसी के खिलाफ जाने से बचाते भी रहे। आज की सरकार अब तक की इस राज्य की सबसे अधिक छत्तीसगढ़ी सरकार है, और इसने क्षेत्रीय स्वाभिमान को बढ़ाने का काम भी किया है।

विधानसभा का चुनाव जिस अकल्पनीय बहुमत से भूपेश बघेल की अगुवाई में जीता गया था, उसने एक राष्ट्रीय पार्टी, कांग्रेस के भीतर भी भूपेश बघेल को काम और तौर-तरीकों की असाधारण आजादी दी। उनके ऊपर संगठन का कोई बड़ा दबाव नहीं रहा, और नतीजा रहा कि वे तेजी से बड़े फैसले ले पाए।  उनके शुरूआती हफ्तों को देखें तो साफ दिखता है कि मतदान खत्म होने के बाद सरकार बनने तक के हफ्तों में उनकी टीम ने एक बड़ा होमवर्क किया था, और सत्ता संभालते ही तेजी से फैसले इसी वजह से हो पाए।

आज देश में जगह-जगह कांग्रेस की सरकारों को या तो पलट दिया गया है, या पलटना जारी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ पूरे देश में ऐसी अकेली कांगे्रस सरकार वाला राज्य है जिसके आंकड़ों को पलटने का सपना भी कोई नहीं देख रहे हैं। बल्कि जनचर्चा यह रहती है कि कांगे्रस अपने गिने-चुने दो-चार राज्यों में से चुनावी खर्च के लिए छत्तीसगढ़ पर ही सबसे अधिक आश्रित रहती है। अगर यह बात सही है तो भूपेश बघेल का कांगे्रस संगठन के भीतर भी एक अलग महत्व समझ में आता है।

सरकार के दो बरस पूरे होने के मौके पर कल मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने संपादकों को चाय पर बुलाया था। उन्होंने इन दो बरसों में से पहले बरस को संसद और निगम-पंचायत चुनावों को समर्पित बताया, और दूसरी बरस को कोरोना के हाथों खत्म हुआ साल कहा। यह बात सही है कि छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार के कार्यकाल का पहला साल छह-छह महीने में होने वाले दो चुनावों में निकल जाता है, लेकिन यह बरस कोरोना के हाथों पूरी दुनिया में बर्बाद हुआ, जिसकी छत्तीसगढ़ में कम बर्बादी की वजह भी मुख्यमंत्री ने गिनाई हैं।

जहां तक कांग्रेस संगठन का सवाल है, तो उसकी राजनीति में मदद करने के लिए भूपेश बघेल ने अपने चुनाव अभियान से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष रहे अमित शाह के खिलाफ जितना आक्रामक मोर्चा खोल रखा है, और अब तक जारी रखा है, वैसा कांगे्रस के किसी दूसरे मुख्यमंत्री ने नहीं किया है।

लेकिन आने वाले तीन बरस भूपेश बघेल के लिए अधिक चुनौती के होंगे। अपनी जिन मौलिक योजनाओं पर उन्होंने हर बरस हजारों करोड़ रुपये झोंके हैं, उनकी आर्थिक और सामाजिक उत्पादकता को आंकना अभी बाकी है। बाहर की कोई तटस्थ संस्था यह मूल्यांकन कर सकती है कि खेती, गांव, जानवर, भूजल, और गोबर जैसी कई योजनाओं से क्या हासिल हुआ? इससे समाज का कितना भला हुआ, और इसकी आर्थिक उत्पादकता क्या रही? जब जनता तक किसी रियायत या सरकार खरीद का पैसा पहुंचता है तो वाहवाही तो मिलती है लेकिन सरकारी खर्च की भरपाई कैसे हुई यह जानना बाकी रहता है। दो दिन पहले कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने प्रेस कांफे्रंस में कहा कि सरकार अब तक गोबर खरीदी का साठ करोड़ से अधिक भुगतान कर चुकी है, तो यह हिसाब लगना अभी बाकी है कि इस साठ करोड़ से सरकार ने कितनी कमाई की है, या पूरी की पूरी रकम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में चली गई है।

जिस तरह केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में एक अभूतपूर्व बहुमत से सरकार बनी है, और उसके बहुमत की वजह से संसद के भीतर और बाहर उसकी जवाबदेही बहुत कम रह गई है, कमोबेश वैसी ही नौबत छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार के साथ है। इस विशाल बहुमत से यह सरकार विधानसभा में और बाहर भी जैसा चाहे वैसा कर सकती है, और यह खुद सरकार के लिए एक खतरनाक नौबत रहती है। भूपेश बघेल के सामने उन्हें मिला असाधारण बहुमत एक तरफ सरकार के स्थायित्व की एक गारंटी है, तो दूसरी तरफ खुद के लिए चुनौती भी है कि इसके चलते गलतियां न हों। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस संगठन को पन्द्रह बरस बाद सत्ता में आने का मौका मिला है, और इस सरकार ने जनता की आबादी के इतने बड़े हिस्से को सीधे फायदा पहुंचाने का काम किया है जितने मतदाता सरकार बनाने के लिए भी जरूरी नहीं होते। यह एक किस्म से पांच बरस तक चलने वाली, अगले चुनाव की तैयारी भी है, या फिर यह गैरचुनावी निरंतर जनकल्याण की नीति है जिसका आर्थिक भार कहां से पूरा होगा यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल सरकार को दो बरसों का जश्न मनाने का एक बड़ा मौका मिला है और यह मौका कोरोना, लॉकडाऊन से उबरकर आगे बढऩे की शुरूआत का मौका भी है। यह कॉलम इस सरकार के बाकी दर्जनों दूसरे जनकल्याणकारी फैसलों की एकमुश्त चर्चा के लिए छोटा है, उन पर चर्चा आने वाले दिनों में। फिलहाल देश में कांगे्रस पार्टी के सामने अकेला छत्तीसगढ़ है जो कि उसकी इज्जत को बचाकर रखे हुए है। आगे के तीन बरस देखते हैं क्या होता है।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 


16-Dec-2020 5:29 PM 267

अन्ना हज़ारे कुम्भकर्ण को मात देकर नींद से जागे हैं, और उन्होंने मोदी सरकार को चिट्ठी लिखी है कि किसानों की समस्या न सुलझी तो वे अनशन पर बैठेंगे. पिछली बार वे यूपीए सरकार को हटाने छह बरस से सो गए थे. अन्ना हजारे ने भारत के लोकतंत्र के लिए, यहां के संविधान के लिए, यहां की संसद के लिए जो हिकारत दिखाई, लोगों के बीच इस देश के संस्थानों के खिलाफ जो अनास्था बोई और रात-दिन खाद-पानी देकर उस फसल को लहलहाने का भी काम किया, वह सब जनता को थका देने वाला था। उन्होंने ने सुपारी लेकर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जो माहौल बनाया वह भनायक था.

एक वक्त ऐसा था जब एक तबके ने इस देश के लोगों को भड़का कर अयोध्या की तरफ रवाना कर दिया था और बाबरी मस्जिद को गिरवा दिया था। लेकिन दोबारा आज धर्मान्धता को, साम्प्रदायिकता को राजनीतिक मकसद से उस तरह कोई फिर इस्तेमाल कर सके, ऐसी कोई कल्पना भी नहीं करता, खुद मंदिरमार्गी भी नहीं करते। ऐसा ही तजुर्बा इमरजेंसी का रहा, और इस देश में कोई दोबारा वैसे दौर की कल्पना नहीं कर सकता। अन्ना हजारे ने भी देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन के नाम पर जो मनमानी की, नेताओं और अफसरों के सारे तबके को, संसद को जिस तरह से गालियां दीं, उनका एक न एक दिन इस देश की अमनपसंद जनता के बर्दाश्त से बाहर होना ही था, और वह बहुत जल्द हो गया। अन्ना के साथ एक दूसरी दिक्कत यह रही कि वे जिस लोकतंत्र और जनता की बात हर सांस के साथ बोल रहे थे, उसी जनता को उन्होंने तानाशाही के अपने साम्राज्य रालेगान सिद्धी में अपने गुलामों की तरह रखा। वहां उन्होंने पंचायत के चुनाव नहीं होने दिए, शराब पीने वालों को मंदिर में कसम दिलाने और खंभे से बांधकर कोड़े लगाने जैसे कानून बनाकर लागू किए, लोगों का टीवी पर मनोरंजन धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया और महिलाओं के बारे में घोर अपमान की जुबान का इस्तेमाल किया। उनकी जिस ताजा बात को लेकर अभी लोग हक्का-बक्का हैं, उसमें उन्होंने मुंबई के अनशन के माईक से ही कहा है- बांझ औरत प्रसूता की वेदना को क्या समझेगी?

यह बात इस देश में शोषण का शिकार चली आ रहीं महिलाओं के लिए पुरूष प्रधान समाज की आम हिकारत का ही एक सुबूत है। हमने दर्जन भर से अधिक बार इस जगह इस बात को लेकर अन्ना की आलोचना की है कि उन्होंने लोकपाल मसौदा कमेटी में सरकार के न्यौते पर अपने जिन सदस्यों को रखा, उनमें एक भी महिला नहीं थीं। वैसे तो उसमें एक भी दलित नहीं था, एक भी अल्पसंख्यक नहीं था और समाज के या तथाकथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के रूप में पांचों कुर्सियों पर अन्ना की टोली का कब्जा पूरी तरह अलोकतांत्रिक और गांधी विरोधी था। लेकिन हम उस बात पर अभी नहीं जा रहे हमारी तकलीफ बिना संतान वाली किसी महिला पर अन्ना हजारे के ऐसे घटिया बात को लेकर है। एक महिला जिसे प्राकृतिक कारणों से कोई संतान नहीं हुई है, वह परिवार और समाज के बीच वैसे भी लोगों के ताने और उनकी हिकारत का शिकार होती ही है। इस बात को भारत जैसे समाज में हर कोई अच्छी तरह जानता है। और रात-दिन बोलने वाले अन्ना हजारे जितने बुजुर्ग और अनुभवी को तो यह बात अपने बचपन से ही देखने मिली होगी कि बेऔलाद औरत को एक गाली की तरह कैसे भारतीय समाज इस्तेमाल करता है। ऐसी ही अनगिनत बातों का नतीजा यह रहा कि देश की जनता का अन्ना हजारे के प्रति सम्मान कम होते-होते अब इस कदर घट गया कि वह मुंबई जैसे महानगर में कुछ हजार पर टिक गया। लोगों को याद होगा कि किस तरह अन्ना हजारे ने एक विचलित या प्रचारप्रेमी नौजवान द्वारा शरद पवार पर हमला करने पर खुशी जाहिर की थी। मानो उनकी वह वीडियो क्लिप उनके लिए पर्याप्त आत्मघाती नहीं थी, उन्होंने उसके बाद कई बार उस हमले को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की और यहां तक कहा कि शरद पवार और उनके लोग उस थप्पड़ का बुरा क्यों मान रहे हैं? अपने गांव में अपने कद और अपनी शोहरत के आतंक तले तानाशाही चलाने वाले अन्ना हजारे को यह बात ठीक लग सकती है कि सरकार से नाराज या असहमत लोग सरकार को चला रहे लोगों पर हमले करें, लेकिन इस देश की हमारी समझ यह कहती है कि यहां की जनता हिंसक नहीं है और वह अभी भी उकसावे और भड़कावे के दौर में कभी चूक कर देने के अलावा लगभग हमेशा ही शांत रहती है। और कम से कम अन्ना हजारे जैसे महत्वोन्मादी, आत्मकेन्द्रित, तानाशाह और सिद्धांतों को लेकर पूरी तरह बेईमान के भड़कावे में वह बहुत लंबे समय तक नहीं रह सकती थी। इतिहास, और पिछले एक बरस का इतिहास इस बात का गवाह है कि अन्ना हजारे के सारे हमले सिर्फ केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी तक सीमित रहे। अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में कर्नाटक के भाजपा मुख्यमंत्री को हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार से जब जोड़ा गया तब भी अन्ना हजारे का मुंह एक बार भी भाजपा के किसी राज के किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं खुला। इतना ही नहीं देश में दूसरी जगहों पर दूसरी पार्टियों के राज में होती बेईमानी पर भी उन्होंने अपना मुंह बंद रखा। और जिस अंदाज में छोटे बच्चों ने जनमोर्चा के दिनों में गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है, के नारे लगाए थे, उसी अंदाज में अन्ना हजारे लोकपाल विधेयक को लेकर लगातार राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर हमले करते रहे। देश ने यह साफ-साफ देखा कि सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे की बातों को जिस तरह हफ्तों तक घंटों-घंटों सुना, और उसके बाद हर बार अन्ना की टोली बैठक से निकलकर सरकार को गालियां बकती रही, वह भी लोगों को, हमारे हिसाब से, निराश करने वाली बात थी। अन्ना हजारे ने इस विशाल देश की विविधता को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए अपने आंदोलन को, और उसके पहले की भी अपनी पूरी सोच को, पूरी तरह हिन्दूवादी रखा जिसमें कि अल्पसंख्यकों की, दलितों और आदिवासियों की, महिलाओं की कोई जगह नहीं थी। वे बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे घोषित रूप से हिन्दू विचारधारा के ही लिए काम करने वाले लोगों के साथ भागीदारी करते हुए देश भर के नेता बनने में लगे रहे।
 
अन्ना हजारे बरसों तक एक घोषणा को किए चल रहे थे कि आने वाले चुनावों में वे कांग्रेस पार्टी के खिलाफ प्रचार करेंगे। यह उनका लोकतांत्रिक हक है कि वे क्या करेंगे, वे और उनकी टोली के लोग पिछले महीनों में ऐसा कर भी चुके हैं। और ऐसी चुनावी राजनीति में भागीदार होकर, कांग्रेस के खिलाफ एक साजिश चलाकर अन्ना हजारे ने जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी। जिनको राजनीति करना है उन्हें खुलकर राजनीति में आना चाहिए और भाड़े के भोंपुओं की तरह, गांधी टोपी की आड़ लेकर ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए।
 
हम इसे अन्ना का स्थायी अंत नहीं मानते, लेकिन यह आज की तारीख में उनके करिश्मे का फिलहाल अंत दिख रहा है कि  मोदी सरकार के खिलाफ अनशन की उनकी मुनादी पर किसी की प्रतिक्रिया नहीं आयी। बहुत से लोग राख के ढेर से दोबारा उठकर खड़े होते हैं, और कल के दिन अन्ना हजारे भी भीड़ के बादशाह बन जाएं तो हम वैसी अविश्वसनीय लगती संभावना से इंकार नहीं करते। लेकिन आज इस अन्नातंत्री आंदोलन का यह हाल होना इस देश के लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है और भावनात्मक उकसावे से बाहर आकर अब लोग यह सीखने की कोशिश करें कि किसी जननायक को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


15-Dec-2020 3:29 PM 203

कोरोना के चलते अचानक होने वाली बहुत सी मौतों की बात न भी करें, तो भी बीच-बीच में कमउम्र के लोगों की, बिना दुर्घटना की, ऐसी मौतें सामने आती रहती हैं जो हक्का-बक्का कर देती हैं। दारू या सिगरेट न पीने वालों, तंबाकू-गुटखा न चबाने वालों को भी कमउम्र में कैंसर होता है, वे तो चल बसते हैं, बाकी लोगों के सामने लापरवाही के लिए एक मिसाल छोड़ जाते हैं कि सिगरेट न पीने वाले क्या कैंसर से मरते नहीं हैं? यह लापरवाही और बहुत सी मौतों को बढ़ावा देती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अभी कोरोना की वजह से लोगों में सिगरेट-गुटखा कम होने से मौतें घटी भी हैं। बहुत सी मौतों को लेकर दूसरे लोग कुछ देर की फिक्र भी करते हैं, और फिर श्मशान वैराग्य से उबरकर अपनी लापरवाह जिंदगी जीने लगते हैं।

कोरोना ने जिस तरह अचानक बहुत से लोगों को खत्म कर दिया, सोशल मीडिया पर वैसे जवान लोगों की तस्वीरें देख-देखकर अटपटा लगता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर ही बहुत से बुजुर्ग एक दहशत में जीते दिखते हैं क्योंकि उनकी उम्र के लोग अधिक खतरे में हैं, और मरने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा साठ बरस से अधिक के लोगों का है। किसी के गुजर जाने पर उसकी खबरों को देख-देखकर बहुत से लोग अपनी सेहत के बारे में एक तनाव में रहते हैं, इसमें बस तनाव गैरजरूरी है, लेकिन उससे सबक लेकर सावधान रहना उतना ही जरूरी है।

एक महामारी, कोरोना, की वजह से लोगों में आई अतिरिक्त सावधानी कोई बुरी बात नहीं है। इसी सावधानी के चलते लोगों की जिंदगियां भी बचेंगी, और लोगों का घर भी बिकने से बचेगा। आज जो लोग सरकारी इलाज को नाकाफी पाते हैं और बेहतर लगने वाले महंगे निजी इलाज की तरफ जाते हैं, वे एक लंबे खर्च में फंस जाते हैं। अब उस परिवार की सोचें जिसमें पहले कोरोनाग्रस्त को महंगा निजी इलाज दिलवाया गया, और फिर एक-एक करके दो-चार और लोग परिवार में कोरोनाग्रस्त निकल गए। बाद के सदस्यों को क्या कहकर सरकारी अस्पताल ले जाया जा सकता है? अभी छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि किस तरह उनके एक मरीज बच्चे के परिवार में पांच लोग कोरोना पॉजिटिव हो गए जिनमें दो बच्चे भी हैं, और इन्हें सीटी स्कैन की जरूरत भी है। अब बहुत रईस लोगों को छोडक़र और कौन हो सकते हैं जो इस तरह का खर्च उठा सकें?

ऐसे में एक बड़े कामयाब वकील रहे एक संपन्न बुजुर्ग अचानक दहशत में आकर सोशल मीडिया पर अपनी सेहत को लेकर लोगों से तरह-तरह की राय लेने में लग गए हैं। राय लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया इसके लिए सही जगह नहीं है क्योंकि अधकचरी जानकारी वाले लोग भी वहां रायबहादुर बन जाते हैं। दहशत से परे उनकी सावधानी अच्छी चीज है क्योंकि यह सावधानी बाकी जिंदगी बड़े काम आती है। कोरोना ने यह नौबत पैदा की है, और इसके चलते हुए लोगों को न सिर्फ अपनी सेहत के लिए, बल्कि अपनी बाकी तमाम जिम्मेदारियों और अधिकारों के लिए भी सचेत हो जाना चाहिए। जो लेना है उसे लेने की कोशिश करनी चाहिए, जो देना है उसे देने की तैयारी करनी चाहिए। और अपने वारिसों के लिए इस तमाम जानकारी को कानूनी कागजात की शक्ल में छोडऩा भी चाहिए। कोरोना ने जितनी जिंदगियां दुनिया में खत्म की हैं, हो सकता है कि उससे अधिक जिंदगियां उसने बचाई भी हों। लोग जब सावधानी के साथ जीने लगेंगे, साफ-सफाई के लिए फिक्रमंद रहेंगे तब वे मौत को टालने में कामयाब भी होंगे। लोग आज अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जागरूक हुए हैं, और ऐसा होने से उनकी जिंदगी लंबी हो सकती है, सेहतमंद हो सकती है। इसी तरह गैरजरूरी भटकना कम होने से लोग हादसों में कम मर रहे हैं, और बहुत सी जिंदगियां बच रही हैं। लोग तरह-तरह की जांच करवा रहे हैं जिनसे उन्हें ऐसी बीमारियों की खबर लग रही है जिसका उन्हें अंदाज नहीं रहा होगा, और यह बात भी दुनिया में मौतों को घटाने वाली है।

हर आपदा में एक अवसर छुपा होता है यह बात सदियों पहले से चली आ रही है। कोरोना की आपदा भी ऐसे अवसर लेकर आई है जब लोग सेहत के लिए एक नई जागरूकता पा रहे हैं, काम-धंधों को लेकर, रोजगार को लेकर लोग जिस भरोसे में बेफिक्र जी रहे थे, उससे उबरकर वे अब चौकन्ने होकर जिंदा रहने की लड़ाई के लिए बेहतर तैयार हो रहे हैं। कोरोना के इस दौर में जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन लोग बेहतर तैयारी से उससे उबर सकते हैं, हो सकता है कि आने वाले कुछ बरसों में लोग अधिक काबिल हो जाएं, और अगली मुसीबत को झेलने के लिए अधिक तैयार रहें।
 
कतरा-कतरा इन बातों को आज यहां लिखने का मकसद यही है कि कोरोना को रोकना न तो कुदरत के हाथ था, और न ही विज्ञान के। साल गुजरते-गुजरते इससे लडऩे के लिए एक वैक्सीन के आसार दिख रहे हैं, और लोग जिंदगी पर आई मुसीबत से निपटने के लिए कुछ बेहतर तैयार दिख रहे हैं। जो चले गए उनका तो कुछ नहीं हो सकता, लेकिन जो रह गए वे अगर श्मशान वैराग्य जैसी क्षणिक सावधानी के शिकार न रहे, और लंबे समय तक के लिए सावधान रहे तो उनका भला जरूर हो सकता है। दुनिया के तरह-तरह के कारोबार ने भी इस दौरान किफायत के कुछ नए सबक लिए हैं, कामगारों ने भी अपने काम को बेहतर बनाना सीखा है, और लोगों ने नए-नए हुनर भी सीख लिए हैं। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि कोरोना जैसी इस विकराल आपदा में भी एक अवसर है कि लोग आगे की जिंदगी के लिए हर किस्म से बेहतर तैयार हो सकें। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
 


14-Dec-2020 6:46 PM 76

बहुत पहले युवा पीढ़ी के लिए एक पाक्षिक या मासिक पत्रिका आती थी जिसमें नौजवानों के शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक पहलुओं पर उनके पूछे सवाल रहते थे, और उनके लिए सलाह के रूप में जवाब रहते थे। आमतौर पर पश्चिम में अंग्रेजी भाषा में ऐसे कॉलम कोई महिला लिखती है, और उन्हें एगनी आंट कहा जाता है, उलझन सुलझाने वाली आंटी। उस पत्रिका में इस कॉलम का नाम, मैं क्या करूं, था, और उसे लोग दिलचस्पी के साथ पढ़ते थे फिर चाहे वे सवाल गढ़े हुए क्यों न हों, फर्जी नामों से छपे हुए क्यों न हों। कुछ ऐसे ही कॉलम अलग-अलग जगहों पर मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के लिए हुए भी छपते हैं जिनके बारे में कुछ परामर्शदाताओं का यह मानना है कि उनसे पढऩे वालों का नफा कम, नुकसान अधिक होता है क्योंकि वे कई समस्याओं के शिकार न रहते हुए भी उन्हें पढक़र अपने आपको उनसे जोड़ लेते हैं, और एक नामौजूद उलझन में सचमुच ही उलझ जाते हैं।

लेकिन असल जिंदगी में रोजाना ही कोई न कोई ऐसी नौबत आती है, जब लगता है कि कोई बताने वाले रहें कि ‘मैं क्या करूं’? अब जैसे इन दिनों रिहायशी इलाकों में घूम-घूमकर फल-सब्जी, और दूसरे सामान बेचने वाले लोग एकदम से कई दर्जन गुना हो गए हैं। जिनका कोई दूसरा काम छूट गया, वे हजार-दो हजार रूपए की सब्जियां लेकर घूमते हैं, और कुछ न कुछ धंधा शायद हो जाता है। ऐसे लोग जब तक जोरों से आवाज नहीं लगाते तब तक उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता, और ग्राहकी नहीं होती। अब इनसे यह उम्मीद रखना कि वे जोरों की आवाज लगाते हुए भी मास्क लगाए रखेंगे कुछ ज्यादती इसलिए होगी कि उससे तो आवाज दब ही जाएगी। तो ऐसे लोगों को मास्क का ज्ञान देना ठीक होगा या नहीं?

शहरी चौराहों पर बहुत से परिवारों के अलग-अलग कई उम्र के लोग सामान बेचते दिखते हैं। कुछ महिलाएं कुछ महीनों के बच्चों को गोद में टांगे भी रहती हैं। और चौराहों की लालबत्ती पर गाडिय़ों के धुएं का प्रदूषण बहुत अधिक रहता है। अब इन लोगों को ऐसे जहरीले धुएं के बीच अपनी रोजी-रोटी कमाने से रोका जाए, या इनसे कुछ खरीदा जाए, या आगे बढ़ लिया जाए? जब यह नजारा सामने पड़ता है तब मन में सवाल उठता है कि मैं क्या करूं? इन्हीं चौराहों पर कई अपाहिज, कई बूढ़े या बच्चे, जमीन पर घिसटकर चलते कई लोग थमी हुई गाडिय़ों के लोगों से भीख भी मांगते हैं। अब इन्हें भीख देने का मतलब इन जगहों पर उन्हें बढ़ावा देना होगा, या उनकी मदद करना होगा? अक्सर लगता है कि कोई तर्कसंगत या न्यायसंगत सलाह मिल जाए, लेकिन जरूरत के वक्त सलाह मिलती कहां है, यह एक अलग बात है कि बिना जरूरत सलाह देने वाले बेमौसम की बारिश की तरह सलाह बरसाते रहते हैं।

अभी एक सुबह घूमते हुए 8-10 बरस का एक छोटा सा बच्चा छत्तीसगढ़ की इस राजधानी की एक संपन्न बस्ती में बड़ा सा झाड़ू थामे सडक़ साफ कर रहा था। रूककर उससे पूछा गया कि वह किसके लिए काम कर रहा है? आसपास के किसी घरवालों के लिए, म्युनिसिपल के लिए, या किसी और के लिए? उसका कहना था कि मां की तबियत खराब है, इसलिए उसकी जगह वह ड्यूटी करने आ गया है ताकि हाजिरी न कटे। अब यह देखकर यह समझ नहीं पड़ा कि इस बारे में म्युनिसिपल के अफसरों से बात करें, वार्ड के पार्षद से बात करें, या किसी सफाई ठेकेदार से बात करें? या कुछ भी न करें क्योंकि लॉकडाऊन के कारण इस उम्र की बच्चों की स्कूलें बंद चल रही हैं, और बीमार मां की मदद के लिए अगर उसकी जगह यह बच्चा काम कर रहा है, तो उसे रोका तो जा सकता है, लेकिन हो सकता है कि उसकी मां की मजदूरी कट जाए, या उसे काम से हटा दिया जाए। बाल मजदूरी खराब है, लेकिन अगर घर चलाने के लिए वही एक रास्ता बचा है, तो उस रास्ते पर जाने से किसी बच्चे को रोका जाए, या न रोका जाए?

स्कूलें बंद रहने से बच्चे टोलियां बनाकर घूम रहे हैं, और कॉलोनियों की नालियों में झांकते दिखते हैं जहां कीचड़ में जरा भी हलचल हो, तो वे नीचे तक पैर-हाथ डालकर मछलियां टटोलने लगते हैं। अब कोरोना जैसी महामारी के बीच गंदगी भरी नालियों में उतरे हुए इन बच्चों को भगाया जाए, रोका जाए, या उनके लिए कुछ और किया जाए? यह सवाल दिल को कोंचता है, और दिमाग को भी, और इन दोनों से जवाब अलग-अलग निकलते हैं।

शहरी फुटपाथों पर और रेलवे प्लेटफॉर्म पर जीने वाले अनगिनत भिखारी और बेघर बच्चे ऐसे रहते हैं जो इन जगहों पर तो खाने को कुछ पा जाते हैं, लेकिन दूसरी जगहों पर शायद उन्हें पेट भर भीख भी नसीब न हो। अब सार्वजनिक जगहों को साफ रखने के लिए भिखारियों और बेघर लोगों को वहां से भगा दिया जाए, या सार्वजनिक जगहों पर जिंदगी जीने का उनका हक एक बुनियादी हक माना जाए? यह सवाल आसान नहीं रहता, और अलग-अलग वक्त पर एक ही सोचने वाले को अलग-अलग जवाब सूझते हैं। अमरीका के कई शहरों में सार्वजनिक उद्यानों जैसी जगहों पर बेघर कब्जा करके वहां रहने लगते हैं। जिन प्रदेशों में लोगों की सोच अधिक पूंजीवादी रहती है, वहां की स्थानीय सरकार और पुलिस उन्हें भगाती हैं, और कुछ प्रदेशों में जहां की राजनीतिक चेतना अधिक उदारवादी रहती है वहां पर किसी भी सार्वजनिक जगह पर जिंदा रहने के हक को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और उन्हें वहां रहने देने के लिए भी आंदोलन होते हैं।

ऐसे सवाल बहुत सी जगहों पर उठ खड़े होते हैं कि किसी नौबत में क्या किया जाए। किसी उद्यान या सार्वजनिक जगह पर अश्लील गालियां बकते लडक़ों की टोलियों को रोककर, टोककर यह खतरा उठाया जाए कि बाद में आते-जाते वे गाडिय़ों के चक्कों की हवा निकाल जाएं, या फिर उन गालियों को अनदेखा करके चुपचाप आगे बढ़ लिया जाए? यही हाल सार्वजनिक जगहों पर बैठकर सिगरेट या गांजा पीते लोगों को देखकर होता है, या दारू पीते लोगों को देखकर होता है कि उसे अनदेखा किया जाए, या खतरा मोल लेकर उन्हें रोका-टोका जाए?

असल जिंदगी में कोई परामर्शदाता नहीं मिलते जो बताएं कि ऐसी नौबतों में कब क्या करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि लोग अपने आसपास के दो-चार लोगों से चर्चा करें कि ऐसी नौबत में उन्हें क्या करना चाहिए था, या क्या करना चाहिए। कितना अच्छा होता कि असल जिंदगी में भी उलझन सुलझाने वाली ऐसी कोई आंटी मौजूद होती, और वह बेहतर राह सुझाती रहती। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


13-Dec-2020 4:44 PM 186

कोरोना वैक्सीन अभी प्रयोगशाला से निकलकर कुछ देशों में कुछ लोगों को लगने जा रही है, और दुनिया भर के लोग बेफिक्र हो गए हैं कि  कोरोना का खतरा टल गया है। हिन्दुस्तानी लोग चूंकि कई करोड़ देवी-देवताओं और ईश्वरों पर प्रयोगशालाओं से अधिक भरोसा रखते हैं इसलिए वे कुछ अधिक बेफिक्र हो गए हैं। दूसरी तरफ कोरोना के मोर्चे पर अधिकतर काम राज्य सरकारों को करना पड़ा है लेकिन कोरोना से लेकर लॉकडाऊन तक तकरीबन हर प्रतिबंध केन्द्र सरकार के काबू का रहा है। आज भी कोरोना की वैक्सीन किस तरह आएगी, किनको मुफ्त मिलेगी, किनको भुगतान करना होगा, केन्द्र या राज्य उसमें हिस्सा कैसे बटाएंगे, प्राथमिकता किन्हें दी जाएगी, इसकी कालाबाजारी न हो उसे कैसे रोका जाएगा जैसे दर्जनों सवाल खड़े हुए हैं, और केन्द्र सरकार की राज्यों के साथ कोई अधिक मिलीजुली तैयारी दिख नहीं रही है। फिर यह भी है कि क्या राज्य सीधे ही यह वैक्सीन देश के किसी निर्माता से या किसी विदेशी निर्माता से खरीद सकेंगे, और अपने राज्य में उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगे, या वे केन्द्र के नियमों से बंधे रहेंगे यह भी साफ नहीं है। जिस तरह बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार के हर नागरिक को मुफ्त में कोरोना वैक्सीन लगाने की औपचारिक चुनावी घोषणा की थी, वह घोषणा भी सही थी या झूठी थी, यह भी अब तक साफ नहीं है क्योंकि केन्द्र सरकार अब यह कह रही है कि हर नागरिक को वैक्सीन लगेगी भी नहीं। ऐसे में बिहार का यह वायदा क्या कहा जाए? 

आज सुबह की खबर है कि केन्द्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव की वोटर लिस्ट के आधार पर 50 बरस से अधिक उम्र वालों की शिनाख्त की जाएगी, और प्राथमिकता के आधार पर पहले से रजिस्टर होने वाले लोगों को टीका लगाया जाएगा। केन्द्र सरकार से बागी तेवर रखने वाली बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले को गलत ठहराया है और कहा है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं उनका क्या होगा? पार्टी ने मांग की है कि बिना भेदभाव के सभी नागरिकों को वैक्सीन लगाई जाए। अलग-अलग पार्टियों या अलग-अलग राज्यों की सोच अलग-अलग है। लेकिन केन्द्र सरकार ने बीते कई महीनों में अब तक कोई साफ नक्शा सामने नहीं रखा है कि टीके की लागत कौन उठाएंगे? किस आय वर्ग से ऊपर के लोगों को अपने खर्च पर टीका लगवाना होगा? खर्च में केन्द्र और राज्य का क्या हिस्सा रहेगा? बहुत सारी बातें अभी साफ नहीं हैं जबकि बीते कई महीने इस देश को तैयारी के लिए मिल चुके हैं। 

यह बात सही है कि सिर्फ मतदाता सूची को, या सिर्फ नागरिकता के दस्तावेजों को, या आधार कार्ड को बुनियाद बनाकर टीके पाने वाले लोगों की सीमा तय करना गलत होगा। अब तक केन्द्र सरकार को राज्यों से विचार-विमर्श करके यह तय कर लेना था, या राज्यों को तय करने देना था कि वे टीकाकरण कैसे करेंगे। भारत सरकार हर मामले में सबसे अच्छी योजना बनाने वाली हो यह भी जरूरी नहीं है, और दूसरी तरफ राज्यों के चिकित्सा ढांचे एक सरीखे हों यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए राज्यों की प्रतिभाओं का भी इस्तेमाल ऐसे टीकाकरण कार्यक्रम की बारीकियों को तय करने में होना चाहिए। यह बात जाहिर है, और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एक से अधिक बार कही है कि अगले बरस जून-जुलाई तक 20-25 करोड़ वैक्सीन लोगों को लगाने का अनुमान है। अब जैसा कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के साथ हुआ, पहला टीका लगने के एक पखवाड़े बाद वे कोरोना पॉजिटिव हो गए, बाद में डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें दूसरा टीका भी लगना था, जिसकी तारीख नहीं आई थी, इसलिए वे पहले टीके से पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे। अब देश में जिन लोगों ने खुद होकर टेस्ट-वैक्सीन लगवाई है, वे बताते हैं कि किस तरह कई तरह की जांच के बाद वैक्सीन लगाई गई, उसके बाद फिर हफ्ते-हफ्ते जांच हुई, और फिर दूसरा डोज लगाया गया। अब सवाल यह है कि टीका लगवाने में फिर गरीब-मजदूरों की कम से कम दो दिनों की मजदूरी जाएगी, और बहुत से लोगों के लिए तो दी गई तारीख पर दूसरे डोज के लिए पहुंचना मुश्किल भी होगा। अब जबकि ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि टीका कुछ ही महीने दूर है, तब ऐसी बारीक योजना का खुलासा हो जाना चाहिए था ताकि राज्य सरकारें, स्थानीय संस्थाएं, और सामाजिक संगठन इस बड़ी चुनौती के लिए तैयार हो सकते। लेकिन अब तक जमीन पर ऐसी कोई चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है। 

और हिन्दुस्तानी लोग हैं कि वे इस लापरवाही के साथ जी रहे हैं कि मानो लैब में वैक्सीन बन गई है तो वे महफूज हो गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि वैक्सीन हर व्यक्ति तक पहुंचने में साल-दो साल भी लग सकते हैं, और इस बीच कोरोना की दूसरी लहर भी आ सकती है क्योंकि लोग लापरवाह हो चुके हैं, सरकारी प्रतिबंध तकरीबन खत्म हो चुके हैं, और बीमारी का खतरा बना हुआ है। हिन्दुस्तान में जिस गैरजिम्मेदारी के साथ शादी-ब्याह, दूसरे जलसे, और मृत्यु कर्म किए जा रहे हैं, वे बताते हैं कि सावधानी से थके हुए इस देश ने अब गैरजिम्मेदारी को ही जीने का ढर्रा बना लिया है। दिक्कत यह है कि देश और प्रदेशों के प्रमुख नेता, सार्वजनिक जीवन के चर्चित और प्रमुख लोग कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं कर रहे हैं। वे खुद कैमरों के मोह में बिना मास्क चलते हैं, चुनावों में धक्का-मुक्की को बढ़ावा देते हैं, और कोरोना के खतरे को बढ़ाते चल रहे हैं। आम जनता से लेकर खास लोगों तक का, फिक्र की कोई बात नहीं है, अब खतरा नहीं रह गया है जैसी बातें खतरे को बढ़ाते चल रही हैं। यह खतरा अस्पताल तक पहुंचने की नौबत या जान जाने की नौबत तक सीमित नहीं है, यह खतरा कोरोना के बने रहने तक चौपट हो रही अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा भी है जो कि टला नहीं है, और न ही टीकाकरण से वह एकदम से टल जाएगा। लोगों को सावधानी जारी रखना जरूरी है, और सावधानी की चर्चा महज अमिताभ बच्चन की टेलीफोन पर घोषणा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


12-Dec-2020 1:30 PM 247

छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक का एक चौंकाने वाला बयान आया है जिसमें उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ज्यादातर मामलों में लड़कियां पहले से सहमति से संबंध बनाती हैं, लिव-इन में रहती हैं, और बात बिगडऩे पर रेप का केस दर्ज करा देती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे रिश्ते में पडऩे का नतीजा बुरा होता है। कई लड़कियां तो 18 साल की होते ही शादी कर लेती हैं, और बच्चा होने पर आयोग में शिकायत लेकर आती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी लड़कियों को फिल्मी तरीके से किसी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए।

किरणमयी नायक महज कांग्रेस सरकार की मनोनीत आयोग अध्यक्ष नहीं हैं, वे लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रही हैं, और पेशे से एक वकील भी हैं। वे कानून को और लोगों के मुकाबले बेहतर समझती हैं, और इसलिए भी उनका यह बयान हक्का-बक्का करता है। बलात्कार की शिकायतों में भारत में यह कानूनी व्यवस्था लंबे समय से है कि बलात्कार की शिकायत कर रही लडक़ी या महिला की नीयत पर जज भी शक नहीं करेंगे। मोटेतौर पर उसकी शिकायत को तब तक सही ही माना जाएगा जब तक वह गलत या झूठी साबित न हो जाए। जब कानून में ही ऐसी व्यवस्था करके रखी है, तो महिला आयोग की अध्यक्ष का बयान उनकी कानूनी जिम्मेदारी के ठीक उल्टे जा रहा है। महिला आयोग का तो जिम्मा ही यही है कि उसके पास आने वाली लड़कियों और महिलाओं की शिकायतों पर वह गौर करे, जो मामले सार्वजनिक रूप से उसकी नजर में भी आते हैं, उन पर गौर करे। अब अगर आयोग की अध्यक्ष ही महिलाओं की शिकायतों पर शक करते हुए उन्हें झूठी शिकायतें न करने की नसीहत दे रही हैं, तो ऐसा लगता है कि महिला आयोग का नजरिया भी समाज में चली आ रही पुरूषवादी सोच से ही उपजा हुआ है। अगर किसी लडक़ी या महिला की शिकायत झूठी है, तो उस पर आयोग भी जांच करने के बाद उसे खारिज कर सकता है, और अदालत भी। लेकिन शिकायतों को लेकर ऐसा आम बयान तो नाजायज है।

हिन्दुस्तान में दिक्कत यह है कि ताकत की जगह पर बैठने के बाद भी महिलाएं दूसरी महिलाओं के हक के आम मुद्दे को नहीं समझ पाती हैं। कई सांसद और भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री भी किसी आंदोलन के दौरान किसी सरकार को उसकी निष्क्रियता, निकम्मेपन, या गैरजिम्मेदारी के लिए चूडिय़ां भेंट करने चली जाती हैं मानो चूडिय़ां कायरता या कमजोरी का प्रतीक हैं। अभी हमें जितना याद पड़ता है उसके मुताबिक इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन के इस तरीके की आलोचना की थी, और इंदिरा गांधी को गुजरे भी कई दशक हो चुके हैं। तब से अब तक गंगा का पानी और बहुत प्रदूषित हो चुका है, लेकिन लोगों की सोच नहीं बदली है। अभी कुछ महीने पहले ही खबरों में आए एक बड़े विरोध-प्रदर्शन में बड़ी पार्टियों की प्रमुख महिलाएं किसी सरकार को चूडिय़ां भेंट करते दिख रही थीं।

हिन्दुस्तानी समाज में एक तो वैसे भी महिलाओं के साथ सैकड़ों बरस का भेदभाव चले ही आ रहा है। पहले महिलाओं को सती बनाया जाता था, फिर कन्या भ्रूण हत्या लोकप्रिय थी जो कि आज तक दबे-छुबे चली आ रही है, और दहेज-हत्या, बलात्कार, कामकाज की जगह पर यौन शोषण बहुत ही आम बात है। इन सबके साथ-साथ घर में पुरूषों और लडक़ों के खाना खा लेने के बाद ही महिला और लड़कियों की बारी आती है। एक-दो बरस पहले मुंबई के टाईम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट थी कि वहां के टाटा कैंसर हॉस्पिटल में बच्चों में कैंसर की पहचान होने के बाद उन्हें इलाज के लिए वापिस लाए जाने वाले बच्चों में लड़कियां गिनी-चुनी ही रहती हैं, और तमाम लडक़े इलाज के लिए लाए जाते हैं। अब आंकड़ों और तथ्यों पर आधारित एक जिम्मेदार अस्पताल का यह निष्कर्ष एक बड़ा सुबूत है कि हिन्दुस्तान में लडक़ों को बचाने लायक माना जाता है, और लड़कियों को मरने के लिए छोड़ देने के लायक।

इन्हीं तमाम बातों को देखते हुए हिन्दुस्तान के कानून में महिलाओं की यौन शोषण की शिकायतों को गंभीरता से लेने के लिए पहले विशाखा गाईडलाईंस बनाई गईं, और उसे बाद में एक व्यापक कानून की शक्ल दी गई। बलात्कार या यौन शोषण की शिकायतकर्ता महिला की नीयत पर कोई शक न किया जाए यह भी भारत में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तय की गई एक कानूनी व्यवस्था है। इसके बाद भी महिला आयोग की अध्यक्ष का ऐसा व्यापक और आम बयान महिलाओं की आम विश्वसनीयता और साख को खत्म करता है। और इस तरह से यह बयान महिला आयोग के मकसद को ही शिकस्त देता है। हम बहस के लिए अगर पल भर को यह मान भी लें कि उनकी कही बात सही है, और लड़कियां सहमति से संबंध बनाती हैं, और बाद में शिकायत करती हैं। ऐसा होने पर भी उनका शिकायत का हक खत्म नहीं होता है। संबंध बनाने का यह मतलब नहीं रहता कि बाद में कोई शिकायत ही न हो सके।

इसी राज्य छत्तीसगढ़ में कई सरकारी अफसरों द्वारा मातहत कर्मचारियों के यौन शोषण के चर्चित मामले बरसों से चले आ रहे हैं, और उन पर पिछली सरकार के बाद यह सरकार भी कार्रवाई करने से कतरा रही है। छोटे ओहदों की जिन महिलाओं के शोषण के मामलों पर कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार के दौरान सार्वजनिक रूप से आलोचना करती थी, आज सरकार बनकर कांग्रेस उन पर चुप है, और महिलाओं का यौन शोषण करने वाले लोगों को बढ़ावा भी दे रही है। महिला आयोग को ऐसे मामलों को उठाना चाहिए, और पार्टी-पॉलीटिक्स से परे महिलाओं के व्यापक हित और व्यापक हक के लिए काम करना चाहिए। किरणमयी नायक का खुद होकर दिया हुआ यह बयान बहुत ही निराशाजनक है, और इससे एक तबके के रूप में महिलाओं की साख को उन्होंने बहुत नुकसान पहुंचाया है। ऊंचे ओहदे, ऊंची जिम्मेदारियां भी लेकर आते हैं, और उनके साथ ऊंचे दर्जे की सावधानी भी बरती जानी चाहिए। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


11-Dec-2020 4:29 PM 389

भारत के नए संसद भवन का शिलान्यास उस वक्त किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने इसके निर्माण पर रोक लगाकर रखी है। खींचतान कर अदालत से सरकार ने इस भूमिपूजन और शिलान्यस की इजाजत ली थी, और आज देश की बदहाली के बीच हजार करोड़ के बजट वाली यह इमारत बनाने पर सरकार आमादा है। मौजूदा संसद भवन एक सदी पुराना भी नहीं है, और इसे छोटा बताया जा रहा है। देश का मीडिया लिख रहा है कि दुनिया के बहुत से देशों में संसद की इमारतें सदियों पुरानी हैं। हालैंड की संसद की इमारत13वीं सदी में बनी है, अमरीका की संसद भवन सन् 1800 में बनी है, और उसे दो सदी से अधिक हो गए हैं। ब्रिटिश संसद की इमारत 1840 और 1870 में बनी है। इटली की संसद की इमारत 16वीं सदी में बनी है। फ्रांस की संसद 1615 से 1645 के बीच बने भवन में लगती है। भारत का संसद भवन 1927 में बनकर तैयार हुआ था, और अब इसे छोटा बताकर एक नया ही भवन बनाया जा रहा है।

अभी जब सुप्रीम कोर्ट ने इस भवन निर्माण पर रोक लगाई हुई है, तो जाहिर है कि शिलान्यास और भूमिपूजन करके निर्माण करने की कोई हड़बड़ी तो थी नहीं। ऐसे में जब किसान इसी दिल्ली के किनारे सडक़ों पर धरना दिए हुए एक पखवाड़े से खुली ठंड में पड़े हैं, वहां कुछ मौतें भी हो गई हैं। आज देश में राजनीतिक बकवासों से परे सिर्फ एक ही मुद्दे पर चर्चा चल रही है, और वह किसानों का मुद्दा है। इस बीच नए संसद भवन को बनाने के लिए समारोहपूर्वक पूजा का मौका कुछ अटपटा है, और ऐसा लगता है कि किसी भी संवेदनशील लोकतंत्र को आज इससे बचना चाहिए था, क्योंकि निर्माण पर तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई ही है। अब कहने के लिए यह कहा जा सकता है कि संसद भवन के लिए शिलान्यास का फैसला लोकसभा अध्यक्ष का है जो कि संसद परिसर के मुखिया माने जाते हैं, लेकिन उन्हें अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा और उसके प्रधानमंत्री की औपचारिक या अनौपचारिक सहमति के बिना तो ऐसा कोई कार्यक्रम लोकसभा अध्यक्ष ने तय किया नहीं होगा।

भारत का मौजूदा संसद भवन भारी भव्यता वाला है, और यह भी अपने आपमें एक फिजूलखर्ची वाली शाही फितरत की इमारत रही। लेकिन वह वक्त अंग्रेज राज का था जो कि राजसी मिजाज वाला ही था, और जिसने अपने खुद के देश और गुलाम देशों में पश्चिमी वास्तुशिल्पियों से ऐसी ही शाही इमारतें बनवाई थीं। आज अंग्रेजों के वक्त के बनाए गए सडक़ और रेल के पुल तो सौ बरस बाद भी मजबूती के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए संसद भवन की मजबूती को लेकर कोई शक नहीं हो सकता। पिछले कई दशकों में ऐसा भी सुनाई नहीं पड़ा कि संसद भवन का कोई हिस्सा जर्जर होकर गिर गया हो, और वह लोगों के लिए खतरा बन गया हो। इसलिए नए संसद भवन की सोच पहली नजर में हम एक बहुत बड़ी फिजूलखर्ची लगती है। अगर संसद का काम पिछली पौन सदी में बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि उसके दफ्तर के लिए जगह कम पडऩे लगी हैं, तो दफ्तर की कोई इमारत आसपास की लगी हुई जगह पर बनाकर उससे संसद भवन को जोड़ा जाना चाहिए था, न कि संसद के लिए ही नई इमारत बनाना।

हम लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्रवाई टीवी पर देखते हैं, और सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के संयुक्त सत्रों को भी देखते हैं, इनमें से किसी में भी जगह कम नहीं पड़ती। इससे परे लोगों को बीबीसी टीवी पर ब्रिटिश संसद की कार्रवाई देखनी चाहिए जहां भारतीय लोकसभा की तरह निम्न सदन, हाऊस ऑफ कॉमन्स के दरवाजे पर सांसद खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने का इंतजार करते हैं। वहां संसदीय सीटों की संख्या बढ़ गई लेकिन ब्रिटिश संसद ने अपने सदन में सीटें नहीं बढ़ाईं, इसलिए वहां सारे सदस्य एक साथ नहीं बैठ सकते। कुछ न कुछ सांसद दरवाजे पर खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने पर जाकर बैठते हैं। दूसरी तरफ उसी ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर बनी हुई भारतीय संसद में तो अभी 6 बरस पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार पांव धरते हुए वहां माथा टिकाया था, और इन 6 बरसों में ही वह संसद भवन नाकाफी लगने लगा!

हजार करोड़ की लागत से यह नया संसद भवन बनाया जा रहा है। लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की गिनती करें तो प्रति सांसद इस भवन की लागत करीब एक-सवा करोड़ रूपए आएगी। आज जब देश में फटेहाली है, गरीबी और बेरोजगारी है, जब अन्नदाता किसान सडक़ों पर मर रहा है, तब देश की संसद का अपने ऊपर यह निहायत गैरजरूरी और नाजायज है। होना तो यह चाहिए कि सांसद किफायत और सादगी में जीकर अपने विचार-विमर्श, बहस और तर्क-वितर्क बेहतर बनाते, लेकिन वह तो हो नहीं रहा। संसद अप्रासंगिक हो चुकी है, और एक संवैधानिक जरूरत की तरह वहां ध्वनिमत से काम चल रहा है। ऐसी संसद जिसने अपनी बुनियादी भूमिका खो दी है, उस संसद को इतनी फिजूलखर्ची का कौन सा नैतिक हक हो सकता है? और फिर सरकार में खर्च के न्यायोचित रहने का एक सिलसिला होता है। जब कोई भी सरकारी निर्माण अपनी उम्र खो बैठता है, जब वह खतरनाक हो जाता है, तब उसकी जगह नई इमारत बनाई जाती है। आज तो संसद की इमारत का कोई खतरा सुनाई नहीं पड़ा था, और अब जब पूरी दुनिया में कागजों का काम घट रहा है, और वह कम्प्यूटरों पर आ रहा है, तब तो संसद के लिए जगह कम लगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट में नए संसद भवन के खिलाफ यह तर्क भी सामने आया है कि संसद भवन और आसपास की इमारतों का विकल्प तैयार करने के लिए सरकार उस इलाके पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने जा रही है। अभी भूमिपूजन के मौके पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी सूचना में सरकार ने यह कहा है कि नया संसद भवन आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण का एक हिस्सा रहेगा। इसी बयान में बताया गया है कि लोकसभा अपने मौजूदा आकार से तीन गुना बड़ी रहेगी, और राज्यसभा भी पर्याप्त बड़ी रहेगी। यह भी कहा गया है कि सदस्यों के लिए बैठने का और अधिक आरामदेह इंतजाम रहेगा।

अब सवाल यह है कि सांसदों को और कितने आराम की जरूरत है? जब देश में आराम-हराम हो की नौबत है, जब हर हिस्से में तरह-तरह की नकारात्मक बातें हो रही हैं, तो उनकी चर्चा करने के लिए सांसदों को और कितना आराम चाहिए? दिल्ली में जानकार विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर आपत्ति की है कि नया भवन 900 से 1000 लोकसभा सदस्यों का अनुमान लगाकर बनाया जा रहा है जो आज से करीब दोगुने का है। अदालत में यह कहा गया है कि लोकसभा सीटों के पुनर्गठन की अगली बैठक ही 2031 में होनी है, और उसमें आज की 543 सीटों को बढ़ाने पर विचार होगा। उस पुनर्गठन आयोग से परे सीटें बढ़ाने का फैसला और कोई नहीं ले सकते। ऐसे में आज सरकार एक अनुमान लगाकर लोकसभा के आकार को तीन गुना और सीटों को करीब दो गुना करने जा रही है जो कि बेवक्त की बात है।

हमारा बहुत साफ मानना है कि हिन्दुस्तान के सारे राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों से परे हकीकत यह है कि यह एक बहुत गरीब देश है। इसमें एक फीसदी ऐसे रईस हैं जिनके पास देश की 58 फीसदी दौलत है। उनसे परे भी गरीबों और मध्यमवर्गीयों के बीच बहुत बड़ा फासला है। इसलिए इस देश को किफायत की जरूरत है न कि ऐसी आत्मनिर्भरता की जिसका इस्तेमाल अगले सौ-दो सौ बरस भी शायद न हो सके। जब देश की जनता पूरी जिंदगी रेलगाडिय़ों में फर्श पर बैठकर या पखाने में घुसकर सफर करने को मजबूर है, तब लोकसभा में जरूरत पडऩे पर मौजूदा भवन की ही क्षमता कुछ बढ़ाई जा सकती है। गरीब देश की अमीर संसद का यह प्रदर्शन हिंसक और अश्लील है। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


10-Dec-2020 4:31 PM 191

सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या देश के आरक्षित तबकों में, खासकर अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति में किसी तरह की क्रीमीलेयर लागू करनी चाहिए ताकि उन समुदायों के बीच आरक्षण के फायदे उन लोगों तक भी पहुंच सकें जो कि समान अवसरों को पाने की तैयारी में बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं। इनमें से पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए तो क्रीमीलेयर लागू है ताकि उनमें सबसे संपन्न लोग, उन्हीं के बच्चे ओबीसी आरक्षण के फायदों के अकेले हकदार न रह जाएं, और उन समुदायों के कमजोर तबकों के लोगों को इस आरक्षण का अधिक फायदा मिले। दूसरी तरफ जब एसटी-एससी तबकों के लिए आरक्षण की बात आती है, तो इन्हीं तबकों के हिमायती नेता एक बवाल खड़ा करते हैं कि दलितों और आदिवासियों में सामाजिक परिस्थितियां इतनी अलग हैं कि एक पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देकर उसके बाद उसे फायदे से बाहर कर देने से वह सामाजिक बराबरी की नौबत में नहीं पहुंच जाती। एक प्रमुख दलित-आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता का यह मानना है कि आरक्षण का यह फायदा कम से कम तीन पीढ़ी तक जारी रहना चाहिए तब कोई दलित-आदिवासी परिवार सदियों के सामाजिक अन्याय से बाहर आ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाया है उसके 10-20 बरस पहले से मैं दलित-आदिवासी तबकों के भीतर से क्रीमीलेयर को पढ़ाई और नौकरी के आरक्षण से बाहर करने की वकालत करते आया हूं। इसके पीछे सरल और सहज तर्क यह है कि इन दोनों किस्म के आरक्षणों में इन तबकों के एक फीसदी लोगों को भी मिलने जितने मौके नहीं रहते हैं। अगर किसी दलित के लिए एक सीट है, तो शायद कई सौ या कई हजार दलित उम्मीदवार उसके लिए रहते हैं। ऐसे में एक परिवार जिसे एक बार नौकरी का फायदा मिल चुका है, जो एक दर्जे से ऊपर के सार्वजनिक, सरकारी, अदालती, या किसी और किस्म के जनसेवक के ओहदे पर पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण के फायदे से बाहर करना चाहिए। वे ऐसी हालत में पहुंच चुके रहते हैं कि वे अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई और नौकरी के मुकाबलों के लिए बेहतर तैयार कर सकते हैं। अब अगर हम यहां पर तीन पीढ़ी के तर्क को लागू करें, तो क्रीमीलेयर में पहुंच चुके और ताकतवर हो चुके दलित या आदिवासी की अगली दो पीढिय़ां भी आरक्षण का फायदा पाने की हकदार रहेंगी। हकदार रहने के साथ-साथ वे ताकतवर भी होती जाएंगी ताकि वे अपनी बिरादरी के बाकी लोगों के साथ होने वाले मुकाबले में बेहतर तैयार रहें, अधिक मजबूत रहें। करोड़पति हो चुके एक दलित या आदिवासी के बच्चों को आगे भी ऐसे मौके देना उनके साथ तो इंसाफ हो सकता है, लेकिन यह उन्हीं आरक्षित तबकों के तीन चौथाई, या उससे भी अधिक 90 फीसदी कमजोर लोगों के साथ बेइंसाफी ही रहेगी जो कि समान मौकों के मुकाबले के लिए तैयार ही नहीं हो पाते हैं। इस तरह आज आरक्षित तबकों के भीतर संपन्न, ताकतवर, और बेहतर शिक्षित लोगों का एक ऐसा आभिजात्य वर्ग तैयार हो गया है जो कि एक फौलादी मलाई की शक्ल में मौकों और तबके के लोगों के बीच जमकर बिछ गया है। इस फौलादी मलाई को चीरकर नीचे के कमजोर और विपन्न लोग, पहली पीढ़ी के शिक्षित लोग, किसी भी मुकाबले में बराबरी की तैयारी नहीं कर पाते।

जो लोग यह सोचते हैं कि तीन पीढ़ी तक आरक्षण का फायदा मिले बिना किसी परिवार का सामाजिक पिछड़ेपन से, सामाजिक शोषण से उबर पाना मुमकिन नहीं है, वे लोग महज क्रीमीलेयर के लिए फिक्रमंद शहरी, शिक्षित, संपन्न, और ताकतवर लोगों के हिमायती लोग हैं। आरक्षण की पूरी सोच जिस सामाजिक और आर्थिक शोषण से तबकों को उबारने के लिए है, उन तबकों के भीतर ही लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ते चले जाएं, यह सामाजिक न्याय नहीं होगा, यह आर्थिक न्याय नहीं होगा, यह किसी भी किस्म का न्याय होगा।

दिक्कत वहां खड़ी होती है जहां आरक्षित तबकों के बाहर के लोग (जिनमें यह लेखक भी शामिल है) इस बात को उठाते हैं, उस वक्त गैरगंभीर बहस में तो कुछ लोग इसे ऐसा भावनात्मक नारा भी बनाने की कोशिश करते हैं कि मानो आरक्षण को खत्म करने की कोई बात हो रही है। इसलिए इस बहस के बीच भी इस बात का खुलासा जरूरी है कि यह तमाम तर्क आरक्षण को किसी भी तरह से घटाने की बात नहीं कर रहा है, यह महज आरक्षित तबकों के भीतर एक अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत बंटवारे की बात कर रहा है।

आज दिक्कत यह है कि जब कभी संसद में दलित-आदिवासी तबकों में से क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात होगी, संसद में कानून बनाने वाले सांसदों के अपने बच्चे ऐसे किसी प्रतिबंध से फायदे से बाहर हो जाएंगे। जिन अफसरों को सरकार में बैठकर प्रस्ताव तैयार करने होते हैं, उनके बच्चे भी क्रीमीलेयर में गिनाकर फायदे से बाहर हो जाएंगे। इसलिए दलित-आदिवासी तबकों की क्रीमीलेयर के वर्गहित में यह नहीं है कि उस क्रीमीलेयर पर किसी तरह की रोक लगे, उसे आरक्षण के फायदों से किसी तरह बाहर किया जाए। यह सीधे-सीधे हितों के टकराव का एक मामला है जिसमें क्रीमीलेयर यह तर्क देने लगती है कि आरक्षण का फायदा कम से कम तीन पीढ़ी जारी रहना चाहिए।

जिस सामाजिक-आर्थिक अन्याय के खिलाफ आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी, उसी अन्याय को अब आरक्षित तबकों के भीतर बढ़ावा दिया जा रहा है, और समाज के नेता बने हुए लोग, समाज के ताकतवर लोग यह काम कर रहे हैं। अन्याय के शिकार आरक्षित तबकों के तीन चौथाई लोग तो कभी भी ऐसी फौलादी क्रीमीलेयर में छेद करके अवसरों के आसमान तक नहीं पहुंच पाएंगे, वे महज सतह के नीचे रह जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में भी आज जो बहस चल रही है, वह इन आरक्षित तबकों के भीतर के कमजोर वर्गों के बारे में बात कर रही है। लेकिन हम जातियों के आधार पर आरक्षित तबकों के भीतर बंटवारा करने के बजाय आर्थिक और ताकतवर ओहदों के आधार पर अवसरों के बंटवारे की वकालत बेहतर समझते हैं। जाति के आधार पर आरक्षण तो हो चुका है, अब ओबीसी की तरह जाति के भीतर अधिक पिछड़ी जाति जैसी बात दलित और आदिवासी तबकों पर अगर लागू की जाती है, तो वह एक बहुत जटिल चुनौती रहेगी। शायद आरक्षित तबकों के भीतर यह तरीका अकेला मुमकिन और कारगर तरीका रहेगा कि संपन्नता और सरकारी-सार्वजनिक ओहदों को क्रीमीलेयर का पैमाना बनाया जाए, आरक्षण पाई हुई एक पीढ़ी अगर ऐसे ओहदों तक पहुंच गई है, ऐसी संपन्नता तक पहुंच गई है कि वह अपने बच्चों को बेहतर तैयार करने की हालत में हैं, तो उसे नौकरी और पढ़ाई के आरक्षण से बाहर करना चाहिए। तभी एक सामाजिक न्याय की बात हो सकेगी। और अगर, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है, आरक्षित जातियों के भीतर अधिक पिछड़ी और अधिक कमजोर जातियों के आधार पर इन तबकों के आरक्षण-ढांचे में फेरबदल किया जाता है, तो उस फेरबदल के साथ भी क्रीमीलेयर की शर्त जोड़ी जानी चाहिए। हम गिने-चुने परिवारों को बार-बार आरक्षण का फायदा देकर आरक्षित जातियों के भीतर एक अनारक्षित जैसी ताकत के हिमायती नहीं हैं।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

 

 


09-Dec-2020 2:16 PM 224

मोबाइल फोन पर एक गेम खेलते हुए एक छोटे बच्चे की खुदकुशी सामने आई है। यह बात दिल को दहलाने वाली है, और यह हादसा अपने आपमें अकेला नहीं है, हर कुछ हफ्तों में कोई बच्चा इसी तरह कुछ खेलते हुए जान दे रहा है। मोबाइल पर किसी एक गेम पर प्रदेश की सरकारें या देश की सरकार रोक लगाती हैं, और या तो उससे बचकर लोग यह खेलते रहते हैं, या फिर कोई नया कातिल-वीडियो खेल सामने आ जाता है। आज हालत यह है कि मोबाइल फोन के भयानक इस्तेमाल के चलते छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चे भी बड़ों को देख-देखकर उस पर वीडियो देखे बिना खाने-पीने से मना कर देते हैं, और उनको कुछ खिलाने के चक्कर में मां-बाप तुरंत समझौता कर लेते हैं।

अब चौथाई सदी पहले तक हिन्दुस्तान में जो फोन किसी ने देखा-सुना नहीं था, उसने इस भयानक रफ्तार से, और इस भयानक हद तक घुसपैठ कर ली है कि पति-पत्नी में फोन के बुरी तरह इस्तेमाल को लेकर तलाक की नौबत आ रही है, अपनी मर्जी का फोन पाने के लिए जिद करते हुए बच्चे मांग पूरी न होने पर खुदकुशी कर रहे हैं। फोन पर तरह-तरह के एप्लीकेशन के चलते लोग लापरवाही में अपनी फोटो या वीडियो बांट रहे हैं, और उसके फैल जाने पर जान ले रहे हैं, या जान दे रहे हैं। कुल मिलाकर टेक्नालॉजी और उसके इस्तेमाल को लेकर लोगों में समझ की कमी खूनी हुई जा रही है। डिजिटल नशा सिर चढक़र बोल रहा है, और दुनिया के दूसरे कई देशों की तरह इसके नशे से नशामुक्ति करवाने के लिए हिन्दुस्तान में भी अभियान चलाने की जरूरत आ खड़ी हुई है।

दुनिया के बाल मनोचिकित्सकों का मानना है कि छोटे बच्चों के सामने फोन, कम्प्यूटर, या टीवी, किसी भी तरह की स्क्रीन एक दिन में तीस मिनट से अधिक नहीं रहनी चाहिए, वरना उनकी दिमागी सेहत पर, उनकी आंखों पर इसका बुरा असर पड़ता है। लेकिन बच्चों के इर्द-गिर्द रहने पर भी परिवार के बड़े लोग अपनी जरूरत, अपने शौक, या अपनी लत के चलते हुए ऐसे तमाम डिजिटल उपकरणों का घंटों इस्तेमाल करते हैं, और उनके चाहे-अनचाहे छोटे बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। सरकारें तो किसी खूनी खेल पर कानूनी रोक लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं, लेकिन घर के भीतर ऐसे प्रतिबंधित खेलों से परे परिवार के लोग कितनी देर तक किस स्क्रीन पर क्या देखते हैं, इस पर तो न कोई सरकार निगरानी रख सकती, न इसे रोकने का कोई कानून बन सकता। लोगों को खुद ही अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, और अपने न सही, अपने बच्चों के भले के लिए तमाम किस्म के डिजिटल उपकरणों का रोजाना का एक ऐसा कोटा तय करना होगा जिससे कि बच्चों के सामने ये सामान कम से कम शुरू हों।

यह भी समझने की जरूरत है कि बच्चों के दिमाग विकसित होने के जो शुरूआती बरस रहते हैं, उसमें उनके सामने कल्पनाएं अधिक महत्वपूर्ण रहती हैं, बजाय रेडीमेड फिल्मों के, या कि गढ़े हुए संगीत के। जब वे खुद कुछ लकीरें बनाते हैं, या चीजों को ठोक-बजाकर आवाज पैदा करते हैं, तो वही उनके मानसिक विकास के लिए बेहतर होता है, फिर चाहे वह कार्टून फिल्मों की तरह अधिक चटख रंगों वाला न हो, या स्टूडियो में बनाए गए गीत-संगीत जितना मधुर न हो। इसलिए छोटे बच्चों को बड़ा करते हुए आज के वक्त यह सावधानी इसलिए भी अधिक जरूरी है क्योंकि हर आम परिवार में एक से अधिक ऐसे फोन या दूसरे उपकरण हो गए हैं जिन पर लगभग मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट से ऐसी तमाम फिल्में बच्चों को दिखाई जा सकती हैं। ऐसा करना परिवार के बड़े लोगों को अपने दूसरे काम करने के लिए वक्त तो दिला देता है, लेकिन छोटे बच्चों को बहुत बुरी तरह ऐसे वीडियो, और फिर आगे जाकर ऐसे गेम का नशेड़ी भी बना देता है। परिवार के बड़े लोगों के एक सामाजिक-शिक्षण की जरूरत है ताकि वे उपकरणों के बीच रहते हुए भी अपने बच्चों को एक सेहतमंद माहौल में बड़ा कर सकें। इस बात की गंभीरता जिनको नहीं लग रही है, वे कल मोबाइल-गेम खेलते हुए इस तरह खुदकुशी करने वाले बच्चे की खबर कुछ बार जरूर पढ़ लें। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)