संपादकीय

Date : 15-Sep-2019

हिंदुस्तान, और बाकी दुनिया में भी बढ़ती आबादी को लेकर, और रोजगार घटने को लेकर बड़ी फिक्र चल रही है। बहुत से जानकारों का यह मानना है कि धरती आबादी का और अधिक बोझ लंबे वक्त तक नहीं झेल सकती, धरती के प्राकृतिक साधन सीमित हैं और वे कुछ सदियों में खत्म हो जाएंगे, उसके बाद पानी भी नसीब नहीं होगा। दूसरी तरफ मशीनों का बढ़ता इस्तेमाल और उसकी वजह से मौजूदा रोजगारों पर मंडराते खतरे से भी बहुत लोग फिक्रमंद हैं। एक तीसरी फिक्र हिन्दुस्तान जैसे देश में यह भी है कि कारोबार की तेजी से बदलती शक्ल की वजह से छोटे कारोबारी खत्म हो रहे हैं, परंपरागत पेशों का काम अब मशीनों से होने लगा है, और इन सब पर मंदी की मार भी भारी पड़ रही है।

इन बातों पर आंकड़ों को देखकर, भविष्य को लेकर विशेषज्ञों के अंदाज को लेकर, और तजुर्बे से, सोचने की जरूरत तो है, लेकिन इन पर एक गांधीवादी नजरिए से सोचने की जरूरत भी है। गांधी का मानना था कि यह धरती जरूरत तो सभी की पूरी कर सकती है लेकिन लालच पूरा नहीं कर सकती। आज जो लोग बढ़ती आबादी की वजह से बढ़ती खपत का हिसाब लगाते हैं, उनको समझना चाहिए कि आबादी का सबसे ऊपर का दस फीसदी हिस्सा ही धरती के नब्बे फीसदी साधनों का इस्तेमाल करता है। सबसे गरीब आबादी का खपत के अनुपात में उत्पादन अधिक होता है। गरीब जितना खाते हैं, उससे कई गुना उगाते हैं, या काम करते हैं। इसलिए धरती के साधनों को अधिक खतरा, या अकेला खतरा, रईसों की हवस का है, गरीबों की भूख और जरूरत का नहीं। इसलिए गांधी की सोच के मुताबिक सादगी और किफायत की राह ही एक रास्ता है।

दूसरी बात यह कि शहरीकरण के साथ आबादी का बढऩा अपने-आप भी घट रहा है, गरीबी घटने के साथ आबादी बढऩा घट रहा है, और शिक्षा से भी परिवार छोटे हो रहे हैं, इसके साथ-साथ इलाज बेहतर होने से जब बच्चों का मरना घटता है तो लोग आशंकाओं में अधिक बच्चे पैदा करना भी बंद करते हैं। इन सबकी वजह से आबादी बढऩा आगे चलकर घटेगा, और आज के अंदाज कुछ गलत साबित होंगे। साथ ही गरीब आबादी की खपत कम ही बनी रहेगी।

जहां तक बदलते कारोबार की वजह से रोजगार घटने की बात है, तो बड़े कारोबार छोटे धंधों में उतरने, या ऑनलाईन कारोबार से, छोटे कारोबार तो घटेंगे, लेकिन रोजगार नहीं। इससे नए किस्म के रोजगार खड़े हो रहे हैं। हिन्दुस्तानी सड़कों पर खाना, और दूसरे सामान पहुंचाने वाले दुपहिया सवार बढ़ते ही चल रहे हैं, लोग कई बार बाहर से खाना बुलाने लगे हैं। रोजगार मंदी की वजह से घट रहे हैं, बदलते कारोबार की वजह से नहीं। यह जरूर है कि छोटे कारोबारों से सीधे मिलने वाले रोजगार अब जगह बदल रहे हैं। ऐसे बहते हुए वक्त में वे देश तो नुकसान पाएंगे जो बाकी दुनिया का रूख और रफ्तार नहीं भांप पाएंगे, लेकिन दूर की सोचकर कमर कसने वालों के पेट खाली नहीं रहेंगे। हकीकत तो यह है कि इस इक्कीसवीं सदी में हिन्दुस्तान में नौजवानों की बड़ी आबादी को हिंदुस्तान की ताकत माना जा रहा है, अगर सरकारें अपने लोगों को दुनिया की आने वाली जरूरतों के मुताबिक तैयार कर सकें। आज अगर हिन्दुस्तान के ऑटो सेक्टर से लाखों नौकरियां गई हैं, तो टैक्सियों की शक्ल में उससे अधिक रोजगार बढ़े हैं, और सड़कों पर निजी गाडिय़ों की भीड़ बढऩा घटा है जो कि कोई बुरी बात नहीं है। एक टैक्सी सड़क पर एक होती है, लेकिन निजी कार के मुकाबले दिन भर में सौ-पचास गुना चलती है और कारों की भीड़ घटाती है। इसलिए जिंदगी के बदलते रूख की वजह से घटते रोजगारों को बढ़ते रोजगारों के साथ मिलाकर भी देखना होगा।

अब एक बात रह जाती है मशीनों की। मशीनों की वजह से घटने वाले रोजगार हो सकता है कि आम लोगों की जिंदगी में नई संभावना भी लेकर आएं। जब स्वेटर बुनने की मशीनें आईं तो लोगों को लगा था कि उनसे हाथ की बुनाई का रोजगार छिनेगा, लेकिन ऐसी घरेलू मशीनों से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की महिलाओं ने घर-घर में इतने स्वेटर बनाए कि बड़े कारखानों का धंधा बिगड़ा। अगर देश-प्रदेश की सरकारें समझदार हैं तो हिन्दुस्तान में रोजगार बदल सकते हैं, खत्म नहीं हो सकते। 

कुल मिलाकर दुनिया की सरकारों को इस बदलते माहौल के लिए तैयार होना पड़ेगा। रोजगार खत्म नहीं हो रहे, वे रेगिस्तान में रातों-रात खिसककर कहीं और उग जाने वाले रेत के टीलों सरीखे हो गए हैं, उनको देखते हुए हर देश को अपनी आबादी को तैयार करना होगा। रही बात बढ़ती आबादी की, तो वह बढ़ते शहरीकरण, बढ़ते रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ खुद ही बढऩा घट जाएगी।
-सुनील कुमार


Date : 14-Sep-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अलग-अलग अफसरों और नेताओं के एक-दूसरे के खिलाफ बयान ज्वालामुखी से निकलकर आसमान तक पहुंचने वाले लावे की तरह चारों तरफ बिखर रहे हैं। हलफनामे, अदालतों में बयान, जेल, अस्पताल, ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग, स्टिंग ऑपरेशन, और पुलिस या दूसरी सरकारी जांच। जिस तरह किसी ज्वालामुखी से निकली हुई राख चारों तरफ धरती और आसमान को ढांक लेती है, उसी तरह छत्तीसगढ़ में सारी खबरें राजनीतिक और आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार और सत्ता के बेजा इस्तेमाल की जानकारी और आरोप से प्रदेश को ढांक चुकी हैं। हर दिन के अखबार कई नई सनसनीखेज बातें लेकर आते हैं, और नेताओं पर से लोगों का भरोसा कुछ और हद तक खत्म हो जाता है, अफसरों को लेकर यह सोच और पुख्ता हो जाती है कि वे ताकत और नेताओं के सामने बिछे रहते हैं। 

ऐसे में कुछ बरस पहले कांग्रेस प्रत्याशी घोषित हो जाने के बाद रहस्यमय तरीके से नाम वापिसी वाले मंतूराम पवार ने उनकी खुद की खरीद-बिक्री को लेकर उस वक्त के भाजपा मंत्री-मुख्यमंत्री, और जोगी पिता-पुत्र पर अदालती बयान देकर आरोप लगाए हैं, और कहा है कि स्टिंग ऑपरेशन की आवाज से मिलाने के लिए वे अपनी आवाज का नमूना देने के लिए तैयार हैं, और अब भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपने दामाद की आवाज का नमूना दिलवाएं जिसे कि स्टिंग ऑपरेशन में एक आवाज माना जा रहा है। हमने मंतूराम पवार की इस मांग के पहले ही इसी जगह लिखा था कि सार्वजनिक जीवन के प्रमुख लोगों को जरूरत पडऩे पर अपनी आवाज का नमूना देने से बचना नहीं चाहिए, और सबको खुलकर जांच और अदालती कार्रवाई का सामना करना चाहिए। लुकाछिपी का खेल पेशेवर मुजरिमों के लिए छोड़ देना चाहिए जो कि अदालत से बचने के लिए आवाज का नमूना देने से कतराते हैं। अब छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद से अब तक के इतने सारे बड़े-बड़े स्कैंडल हो चुके हैं, और उनमें प्रदेश के दर्जनों बड़े नेता और उनके परिवार, उनके कार्यकाल के बड़े अफसर शामिल दिखते हैं कि आज सार्वजनिक रूप से यह मांग होनी चाहिए कि सारे नेता झूठ को पकडऩे वाली जांच के लिए तैयार हों, और नार्को टेस्ट जैसी जांच के लिए भी सहमति दें ताकि उनसे उनके कार्यकाल के तमाम आरोपों पर बात की जा सके। 

जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, जनता के सामने वोट मांगने जाते हैं, संविधान की शपथ लेकर सत्ता पर आते हैं, और लोकतंत्र को हांकते हैं, उन लोगों को ऐसा छोटा सा त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए जिससे कि उन पर लगे सारे आरोपों को धोने का एक मौका भी मिलता हो। राजनीति के लोग जनता की अदालत में घिर जाने पर कानून की अदालत जाने का रास्ता पकड़ते हैं, और कानून की अदालत में माहौल जब उनके खिलाफ दिखता है तो वे जनता की अदालत की बात करते हैं। ऐसे सारे नेताओं को एक साथ, एकमुश्त ऐसी चुनौती मिलनी चाहिए कि वे आरोपों के जवाब में सच का सामना करने को तैयार हों, और उससे सार्वजनिक जीवन की गंदगी खत्म भी हो। मंतूराम पवार कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित हुए थे, और फिर उनकी खरीद-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई थी। दूसरे भी बहुत सारे मामले हैं जिनमें लोगों ने एक-दूसरे के खिलाफ हलफनामे दिए हैं, जांच एजेंसियों ने सुबूत हासिल किए हैं, और जनता को भी बहुत से नेताओं और अफसरों पर शक है। ऐसे में संविधान की शपथ को पूरा करने के लिए, जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने के लिए, और इस देश की अदालतों पर से पुलिस और जांच एजेंसियों पर से गैरजरूरी और नाजायज बोझ घटाने के लिए इस प्रदेश के तमाम आरोपग्रस्त नेताओं को नार्को टेस्ट के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि जो साफ-सुथरे हों, वे चमकदार सफेदी के साथ जनजीवन में लौटें, और जो दागदार हैं, वे जनता के सामने से हट भी जाएं। हमारा ख्याल है कि सत्ता के लिए, या लोकतंत्र में दूसरे संवैधानिक पदों के लिए लोग संविधान की जो शपथ लेते हैं, उसके पालन की जो शपथ लेते हैं, वही शपथ उन्हें ऐसी जांच के लिए मजबूर भी करती है, किसी जनसंगठन को बड़ी अदालत जाकर सारे नेताओं और बड़े अफसरों को उन पर लगे आरोपों को लेकर नार्को टेस्ट का सामना करने का आदेश मांगना चाहिए, और तमाम बड़े लोगों को खुद होकर भी इसके लिए सामने आना चाहिए। यह राज्य बनने के बाद से अब तक जितनी गंदगी हो चुकी है, उस पर पूर्णविराम लगाने का यही एक तरीका हो सकता है। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Sep-2019

भोपाल में एक तालाब में गणेश विसर्जन के दौरान नाव पलटी और दर्जन भर लोगों की डूबकर मौत हो गई। आधा दर्जन लोग बचाए गए, और सरकार ने हर किसी को लाखों रूपए मुआवजा भी दिया। विसर्जन की नावों को आपस में बांट दिया गया था, और किसी ने लाईफ जैकेट नहीं पहना था। खबर बताती है कि यह घटना मध्यप्रदेश आपदा बचाव दल के मुख्यालय के पास हुई है। इधर कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ में जगह-जगह इस बात को लेकर तनाव हुआ कि बहुत से गणेश पंडाल में बिजली चोरी करके रौशनी की जा रही थी, और जब बिजली विभाग कनेक्शन काटने पहुंचा तो उसे घेर लिया गया, तनाव के बीच पुलिस मौजूदगी में चोरी को जारी रखा गया, तब बात आई-गई हुई। राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर एक मंदिर का अवैध निर्माण कई बरस पहले बढ़ते-बढ़ते चार-पांच मंजिल इमारत जितना हो गया, और रेलवे इसके खिलाफ मुकदमा लड़ते-लड़ते जीतकर अब उसे तोडऩे का आदेश पा चुका है, लेकिन वह राज्य सरकार का मुंह देख रहा है कि उससे मदद मिले तो मधुमक्खियों के इस छत्ते में हाथ डाला जाए।

धर्म के सार्वजनिक रूप को देखें, तो वह पूरी तरह, और बुरी तरह हिंसक हो चुका है, अराजक हो चुका है, और जगह-जगह वह जरा से तनाव पर साम्प्रदायिक हो जाने की कोशिश करता है। देश की जाने कितनी ही बड़ी-बड़ी अदालतों ने धार्मिक अवैध निर्माण के खिलाफ आदेश दिए हैं, और उन्हें कड़ाई से तोडऩे को कहा है, लेकिन कोई भी राज्य सरकार ऐसा करके अंधभक्तों को नाराज करना नहीं चाहतीं। नतीजा यह होता है कि सरकारी जमीन पर, सरकारी अहातों में धर्मस्थान बनते चलते हैं, और एक बार बन जाने के बाद उन्हें छूना मुश्किल होने लगता है। धर्म के कोलाहल को काबू में करना कोई अफसर नहीं चाहते, कोई नेता नहीं चाहते, और एक धर्म के शोरगुल करने वाले मिसाल के लिए दूसरे धर्म के लाउडस्पीकर गिनाकर अपना शोर जारी रखते हैं, जो इतना अधिक होता है कि उनके ईश्वर भी शायद प्रतिमा की देह छोड़कर, धर्मस्थल छोड़कर दूर चले जाते होंगे, ताकि चैन से रह सकें। 

भारतीय लोकतंत्र में कानून का राज वहां से शुरू होता है जहां पर धर्म की मनमानी की आगे जरूरत नहीं रहती। धर्म का कारोबार जहां तक बढ़ाना है, वहां तक कानून को पांव रखने नहीं मिलता। दो दिन पहले उत्तरप्रदेश के एक मंत्री ने यह खुला फतवा जारी किया है कि सरकार उनकी है, सुप्रीम कोर्ट उनका है, इसलिए राम मंदिर बनने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात में अनहोनी कुछ नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट का भी इतना हौसला नहीं दिख रहा है कि इसकी चर्चा करते हुए नाराजगी जाहिर करने से अधिक कुछ करे। कायदे की बात तो यह होती कि इस मंत्री को बुलाकर सजा सुनाई जाती ताकि देश में बाकी नेताओं को सबक मिलता, लेकिन अदालतें अब ऐसा हौसला शायद खोती जा रही हैं। धर्म ने हिन्दुस्तान की जिंदगी के एक बहुत बड़े, बिल्कुल ही बेजरूरत हिस्से को, और पूरी तरह नाजायज अंदाज में कब्जा कर लिया है। इस कब्जे के बाद आम लोगों की तो जुबान ही सिल जाती है क्योंकि संगठित धार्मिक गुंडों की अराजकता और हिंसा का विरोध करने की ताकत किसी एक इंसान में कैसे रहे जब बड़े-बड़े नेता, बड़ी-बड़ी अदालतें भी ऐसी मनमानी को अनदेखा करने में ही अपनी हिफाजत मानती हैं। जब ताकतवर तबका अनदेखा करने में भरोसा करता है तो फिर आम जनता को भी आंख और कान बंद करके घर बैठने में ही सुरक्षा है। धर्म का ऐसा आक्रामक रूख आगे चलकर उसी को खत्म करेगा क्योंकि दुनिया के बहुत से सभ्य देशों में धीरे-धीरे नास्तिकों की गिनती बढ़ती जा रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Sep-2019

केन्द्र सरकार का लाया हुआ नया मोटर व्हीकल एक्ट बड़ी बुरी परेशानियों में फंसा दिख रहा है। इसके बहुत से प्रावधान लोगों की जुर्माना पटाने की ताकत से ऊपर दिख रहे हैं, और देश में कम से कम आधा दर्जन राज्य सरकारें इसे लागू करने के खिलाफ हैं, कुछ सरकारें, जिनमें भाजपा की गुजरात सरकार भी है, घटे हुए जुर्माने का अपना अलग नियम बना रही हैं, और छत्तीसगढ़ सहित कई सरकारें इसे लागू नहीं कर रही हैं। आम लोगों की समझ के लिए यह साफ कर देना जरूरी है कि देश की हर अदालत पर यह नया एक्ट लागू हो गया है, और अगर कोई मामला अदालत में जाता है तो वहां से नए जुर्माने ही लगाए जाएंगे, नई सजा ही सुनाई जाएगी। लेकिन राज्य सरकारें सड़कों पर अभी अपनी जनता के साथ रियायत बरत रही हैं, और समझौता शुल्क के एक प्रावधान के तहत कुछ सौ रूपए का जुर्माना लगाकर लोगों को छोड़ रही हैं। इस बारे में राज्यों और केन्द्र के बीच एक टकराव सामने आ गया है क्योंकि केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि राज्यों की सहमति से ही यह नया कानून बनाया गया है और राज्यों को इसमें फेरबदल का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ खुद गडकरी की पार्टी की गुजरात सरकार ने अपनी नई रियायती दरें लागू भी कर दी हैं। 

लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जब आनन-फानन नोटबंदी लागू की, तो महीनों तक देश में अफरा-तफरी और अराजकता का माहौल रहा, अनगिनत लोग एटीएम की कतारों में या बिना इलाज अस्पतालों में मारे गए, और हर दो दिनों में रूपए जमा करने या निकालने के नियम बदले जाते रहे, और आखिर में जाकर यह पता लगा कि कालाधन रोकने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए थे, और दो हजार के नए नोट शुरू किए गए थे, जो कि पूरे मकसद को ही शिकस्त देने वाले थे। न तो नकली नोट बनना बंद हुआ, न ही आतंकी हमले बंद हुए, और न ही किसी भी किस्म का कालाधन सामने आया। सारे के सारे नोट बैंकों में लौट आए और सरकार के मत्थे एक बड़ा खर्च लग गया। आज तक दुनिया के अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत नोटबंदी के वक्त चोट खाई अर्थव्यवस्था को अब तक सुधार नहीं पाया है, और उसकी वजह से जारी मंदी आज भी हिन्दुस्तान का नुकसान कर रही है। 

इसी किस्म से आधी रात की आजादी जैसा जलसा मनाते हुए मोदी ने जीएसटी लागू किया था, जो कि इतना बदहाल था और जिसकी तैयारी इतनी अधूरी थी कि अगले साल भर तक उसके नियमों और प्रावधानों में फेरबदल ही चलते रहा, और देश में उसकी वजह से छोटे-छोटे कारोबार बंद होने की नौबत आ गई, करोड़ों नौकरियों के खत्म होने का एक बड़ा कारण जीएसटी को भी माना गया, और आज तक जीएसटी में फेरबदल जारी है, और यह स्थापित हो चुका है कि बिना तैयारी, पूरी तैयारी से जीएसटी लागू करना देश को गड्ढे में डाल गया।

आम जनता को प्रभावित करने वाला यह तीसरा मामला है जिसमें नए ट्रैफिक जुर्माने और सजा को इस तरह लागू किया गया है कि खुद भाजपा के राज्य उसके खिलाफ हैं। हम ट्रैफिक को लेकर अधिक जुर्माने और सख्ती दोनों के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माने की रकम जब पुरानी गाडिय़ों के दाम को पार कर जा रही है, तो ऐसे जुर्माने के बारे में पहले से सोचा जाना चाहिए था, और राज्यों को भरोसे में लेना चाहिए था। मोदी सरकार का यह आम बर्ताव हो गया है कि लोकसभा में अपने विशाल बहुमत की ताकत को देखते हुए, और देश में अपनी बहुत सी राज्य सरकारों को देखते हुए वह व्यापक असर वाले ऐसे कानूनों को देश पर आनन-फानन, रातोंरात थोप देती है, और उसके बाद महीनों तक, साल भर तक उसमें फेरबदल चलते रहते हैं। इस दौरान लोगों को जो तकलीफ होती है, उसका अंदाज सत्ता पर बैठे हुए लोगों को नहीं है। ट्रैफिक जुर्माने के मामले में राज्य सरकारों की असहमति की वजह से अब तक देश के बड़े हिस्से में इसे लागू नहीं किया गया है, और जहां इसे लागू किया गया है, वहां तो लोग गाडिय़ों को फेंककर चले जाने की नौबत के करीब आ रहे हैं। केन्द्र सरकार को बिना देर किए राज्यों के साथ बैठकर इसके बारे में फिर से सोचना चाहिए, और जुर्माना इतना लगाना चाहिए जिसे लोग बर्दाश्त कर सकें। कानून के कुछ जानकारों कायह भी मानना है कि कई किस्म के एक्ट नए मोटर व्हीकल एक्ट में रखी गई है जो कि नाजायज है, और लोगों ने इसे लेकर लेख भी लिखे हैं। इसलिए उस पहलू पर भी केन्द्र को राज्यों के साथ बातचीत करनी चाहिए। ऐसा लग रहा है कि इस कानून में कुछ फेरबदल की जरूरत है क्योंकि यह देश की जमीनी हकीकत को न समझकर आसमान छूते जुर्माने लगा रहा है। हम सख्त कानूनों और उससे भी सख्त अमल के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माना कितना हो इस बारे में एक बार फिर से बात जरूरी लग रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Sep-2019

हिन्दुस्तान बड़े ही अजीब दौर से गुजर रहा है। उत्तरप्रदेश के उन्नाव में एक सत्तारूढ़-विधायक के बलात्कार की शिकार लड़की ने मुंह खोला, तो उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया गया, और वह मौत से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर दिल्ली के एम्स में भर्ती की गई है, और वहां पर उसका बयान दर्ज करने के लिए एक विशेष अदालत बनाकर आज वहीं पर काम किया जा रहा है। यह खबर महीनों से सुर्खियों में रही है, और एक सत्तारूढ़ विधायक किस हद तक, किस-किस तरीके से कानून के हाथों से बचाया जाता है, इस पर यूपी की योगी सरकार एक किताब लिख सकती है। एक दूसरा मामला लंबे समय से खबरों में है, और अब सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद यूपी की पुलिस उसे दर्ज करके उस पर कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार हुई है, इस मामले में एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद एक लड़की से लंबे समय तक बलात्कार की तोहमत के घेरे में हैं, और अब वह छात्रा वीडियो सुबूतों के साथ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई है। यह सोचने की बात है कि इन दोनों ही मामलों में उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक और सांसद को बलात्कार के साफ-साफ मामले में बचाने के लिए सरकार किस हद तक जा सकती है, और देश की सबसे बड़ी अदालत को इसमें कैसे दखल देना पड़ रहा है। देश भर में हर दिन दर्जनों बलात्कार होते हैं, और उनमें सत्तारूढ़-ताकतवर बलात्कारियों को बचाने के लिए अगर राज्यों की सरकारें इसी तर्ज पर आमादा हो जाएंगी, तो बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के सामने खुदकुशी करने के अलावा और रास्ता क्या बचेगा? देश में औसतन हर महीने एक न एक खुदकुशी ऐसी भी हो रही है, और हो सकता है कि यह गिनती महीने में एक से अधिक भी हो। 

अब जब देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसे कुछ मामलों में दखल दे रही है, और कुछ बरस पहले के देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश में बनाए गए सैकड़ों करोड़ के एक फंड की रकम पड़ी हुई भी है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में सोच-समझकर साजिशन बलात्कारियों को बचाने की कोशिशों पर जिम्मेदार अफसरों को जेल भेजकर एक मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए? आज तकरीबन पूरे देश में पुलिस का रूख बलात्कार की शिकार लड़की या महिला के लिए हिकारत का रहता है, और पुलिस हर जगह परिवार को समझाने से लेकर धमकाने तक में लग जाती है कि रिपोर्ट लिखाने से बदनामी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसी धमकियों से पुलिस यह तो साफ कर ही देती है कि कम से कम इंसाफ तो हासिल नहीं होगा। और ऐसे ही एक मामले में अभी पिछले हफ्ते ही छत्तीसगढ़ में एक नाबालिग लड़की ने बलात्कार के बाद उसे एक सरकारी कार्यक्रम में पेश करने के बाद हताशा में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 

हिन्दुस्तानी समाज बलात्कार को लेकर इस कदर संवेदनाशून्य हो गया है कि अभी पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ की नाबालिग बलात्कार-पीडि़त की इस खुदकुशी पर कोई चर्चा भी नहीं हुई, और एक सड़क हादसे की तरह यह खबर आई और चली गई। यह समाज बलात्कार को अपनी संस्कृति का एक हिस्सा मानकर चल रहा है, और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला बेइंसाफी को ही अपनी नियति मानकर जीते जी मर जाती है या मरकर एक और खबर में एक दिन और जिंदा रह जाती है। हैरानी की बात यह है कि देश भर में बिखरे हुए लाखों पुलिस थानों और दसियों हजार अदालतों के रहते हुए भी देश की सबसे बड़ी अदालत को ऐसे एक-एक मामले में मुंह खोलना पड़ रहा है जिसमें अगर एक थाना अपनी जिम्मेदारी पूरी करता तो बात वहीं से सीधे जेल और अदालत चली गई होती। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे प्रदेशों, ऐसी सरकारों, और ऐसे जिलों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करने की एक पहल करनी चाहिए, और ऐसी साजिश में भागीदारों की वर्दियां उतरनी चाहिए। आज देश का हाल इतना खराब है कि बहुत से लोग यह मनाते हैं कि उनकी बच्चियां न हों, और बहुत से गरीब-मजदूर मां-बाप यह सोचकर भी बाल विवाह कर देते हैं कि घर में बच्ची को कैसे अकेले छोड़कर काम पर जाएं। आज देश की सरकारें अपने पसंदीदा मुजरिमों को बचाने के लिए जिस तरह ओवरटाईम करते दिखती हैं, उसे देखते हुए कम से कम बलात्कार या महिला शोषण के दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट को उसी तरह एक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए जिस तरह हर हिरासत मौत के बाद थाने के पुलिस वाले हटाए जाते हैं, और अनिवार्य रूप से दंडाधिकारीय जांच होती है। बलात्कार की हर रिपोर्ट के बाद ऐसी ही एक प्रक्रिया तय करनी होगी, वरना सत्ता और पुलिस मिलकर एक संगठित अपराधी गिरोह की तरह काम करते रहेंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 10-Sep-2019

देश के बहुत से प्रदेशों में नेताओं और अफसरों के बीच के रिश्ते लोकतंत्र की भावना से खासे दूर के दिखते हैं। उत्तरप्रदेश में बहुत से आईपीएस अफसर मुख्यमंत्री के पैरों पर बैठे दिखते हैं, तो बंगाल में ममता बैनर्जी के साथ उनके कुछ मुंहलगे अफसरों का ऐसा ही हाल दिखता है। और यह हाल छोटे-छोटे ओहदों वाले अफसरों का नहीं है,  अखिल भारतीय सेवा के आईएएस-आईपीएस अफसरों का ऐसा हाल देखकर तरस भी आता है कि जिन्हें केंद्र सरकार की तरफ से जिंदगी भर की एक हिफाजत मिली हुई है, वे भी इस दर्जे की चापलूसी में लग जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जो कि अफसरों से बड़ी बदसलूकी करते हैं, उनके लिए मन में हिकारत रखते हैं, और इन दोनों तबकों के बीच परस्पर सम्मान खत्म कर बैठते हैं।

अभी कल छत्तीसगढ़ के एक बड़े सरल आदिवासी मंत्री, उद्योग और आबकारी विभाग देखने वाले नक्सल-बस्तर के कवासी लखमा का एक वीडियो तैरना शुरू हुआ जिसमें वे बहुत से बड़ों और बच्चों के बीच बैठकर किस्सागोई के अंदाज में एक बच्चे के सवाल का जवाब देते हुए कहते दिखते हैं कि बड़ा नेता बनने के लिए कलेक्टर-एसपी का कॉलर पकडऩा चाहिए। और ऐसा कहते हुए वे घूंसा चलाते हुए भी दिखते हैं जिस तरह कि कॉलर पकडऩे के बाद किसी को मुक्कों से मारा जाता है। अब कहने के लिए यह बात हँसी-मजाक कहकर टाली भी जा सकती है, लेकिन जब बच्चों के बीच यह बात कही जा रही है, तो कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदों के लिए ऐसी हिकारत की बात महज मजाक करार नहीं दी जा सकती। यह सिलसिला ठीक नहीं है। लोगों को याद होगा कि कांगे्रस सरकार बनने के तुरंत बाद एक मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने उनके जिले में कलेक्टर रहे एक अफसर के बारे में कुछ इसी किस्म की हिकारत से बात कही थी, जिसका वीडियो उनके लिए दिक्कत भी बना था।

नेताओं और अफसरों के बीच लोकतंत्र में परस्पर सम्मान और परस्पर विश्वास का एक ऐसा संबंध रहना चाहिए जिसमें अनिवार्य रूप से दूरी भी हो, और दोनों के अधिकार और जिम्मेदारियों के अलग-अलग दायरे भी हों। अगर इन दोनों तबकों के बीच नियम-कायदे और जनहित से परे एक सांठ-गांठ हो जाती है, तो रिश्तों की उतनी मधुरता सरकारी खजाने और जनता के हित, दोनों का ही खासा नुकसान भी करती है। लेकिन इसके ठीक उल्टे अगर इन दोनों के बीच टकराव ही चलते रहता है, तो उसका नुकसान भी हमने छत्तीसगढ़ में हर दौर में देखा है। इसलिए लोकतंत्र में अलग-अलग तबकों के बीच रिश्तों और दूरियों का एक संतुलन बने ही रहना चाहिए। इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की कही एक बात याद आती है जब मीडिया से जुड़े एक कार्यक्रम में संचालक ने कहा कि पटवाजी से मीडिया के बहुत ही मधुर संबंध हैं, तो अपनी बारी आने पर पटवाजी ने इसके जवाब में कहा था कि मीडिया से उनके कामकाज के ही संबंध हैं, कोई मधुर संबंध नहीं हैं, और होने भी नहीं चाहिए क्योंकि हम दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा था कि इन दोनों तबकों के बीच संबंध अगर मधुर हो जाएंगे, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसी तरह अफसरों और नेताओं के बीच संबंध औपचारिक और लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक होना चाहिए, न तो एक-दूसरे के लिए कोई हिकारत होनी चाहिए, और न ही मोहब्बत। कल छत्तीसगढ़ के मंत्री ने चाहे जिस नीयत से अफसरों के बारे में ऐसी बात कही है, उसके लिए उन्हें अफसोस जाहिर करना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 09-Sep-2019

पूरे हिन्दुस्तान में आत्महत्या के औसत आंकड़े लाख लोगों पर 10.6 हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा इससे करीब पौने तीन गुना अधिक, 27.7 प्रति लाख आबादी है। यह आंकड़ा 2015 का है, और भारत सरकार के इकट्ठा किए गए आंकड़े इसके बाद के बरस में प्रकाशित नहीं हुए हैं। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ लंबे समय से किसान आत्महत्या की खबरों से चर्चा में रहता है, और हाल के बरसों में तो सरकार ने आत्महत्या के मामलों को राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकॉर्ड में दर्ज करते हुए छत्तीसगढ़ की किसान-आत्महत्याओं को महज आत्महत्या लिखना शुरू कर दिया था, ताकि किसानों को दिक्कतें अधिक न दिखें, और सरकार को राजनीतिक असुविधा न हो।

10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस माना जाता है, और इस दिक्कत की तरफ ध्यान खींचने के लिए तरह-तरह से कोशिश की जाती है। हम हर बरस दो-चार बार आत्महत्याओं के खतरों पर लिखते ही हैं, और आज फिर लोगों को इस पर सोचने के लिए कुछ मुद्दे उठा रहे हैं। पूरे देश की अगर बात करें तो हिन्दुस्तान में इम्तिहान या पढ़ाई में नाकामयाबी की वजह से स्कूल-कॉलेज के बच्चों की आत्महत्या खबरों में बनी रहती है, प्रेम में असफल होने के बाद, या प्रेम के बाद शादी की इजाजत न मिलने की वजह से, किसी दूसरी जाति या धर्म में प्रेम हो जाने की वजह से भी हिन्दुस्तान में बहुत सी आत्महत्याएं हो रही हैं। यह तो गनीमत है कि इस देश के एक बड़े हिस्से में अब तक संयुक्त परिवार व्यवस्था चल रही है, और इस वजह से बेरोजगार रहते हुए भी नौजवान मां-बाप पर बोझ बनकर भी रह लेते हैं, और आमतौर पर खुदकुशी की कगार तक नहीं पहुंचते। लेकिन आत्महत्याओं से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर निराश और हताश लोगों के सोचने के साथ-साथ परिवार और समाज के आसपास के लोगों को भी सोचना चाहिए, और ऐसे लोगों का हौसला बढ़ाना चाहिए। 

जानकार लोगों का यह मानना है कि निराश और हताश लोग शुरू में तो अपने आसपास मदद ढूंढते हैं, लेकिन उन्हें सलाह नहीं मिलती तब वे कोई खतरनाक कदम उठाते हैं। इसलिए ऐसे में स्कूल-कॉलेज, परिवार, समाज, या दफ्तर में, दोस्तों के दायरे में अगर हौसला बंधाने वाले लोग मिल जाएं, तो आत्महत्याओं में कमी आ सकती है। यह भी समझने की जरूरत है कि आसपास के लोग हर बार कारगर नहीं हो सकते क्योंकि कुछ लोगों की हताशा इतनी अधिक हो सकती है कि उन्हें पेशेवर परामर्श, या मनोचिकित्सा की जरूरत हो, जिसकी कि हिन्दुस्तान में बहुत ही कमी है। अब धीरे-धीरे सरकार और कुछ गैरसरकारी संगठन इस तरफ जागरूक हो रहे हैं, और परामर्श केन्द्र खुल रहे हैं जिससे लोगों को मदद मिल सके। लेकिन इनकी जानकारी कम है, लोग पेशेवर मदद के लिए कहां जाएं, यह बताने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए सरकार और समाज के ढांचे में ऐसी जानकारी आसानी से उपलब्ध करानी चाहिए। 

आत्महत्याओं के पीछे एक वजह मीडिया में ऐसी तकलीफदेह खबरों का अधिक प्रमुखता पाना भी है। इस मोर्चे पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मीडिया में काम करने वाले लोग आत्महत्याओं को महज समाचार के महत्व से प्रकाशित करते हैं, और ऐसा करते हुए वे नहीं सोच पाते कि इन खबरों और ऐसी तस्वीरों या वीडियो से उन लोगों पर क्या असर पड़ता है जो अपनी तकलीफों के चलते खुदकुशी की कगार पर पहुंचे हुए हैं। ऐसी कोई भी खबर निराश-हताश लोगों के मन में इकट्ठा बारूद के लिए चिंगारी का काम करती है। इसलिए मीडिया में फैसले लेने वाले लोग यह भी सोच सकते हैं कि आत्महत्या की हर खबर के साथ क्या उस शहर या प्रदेश में उपलब्ध परामर्श के पते और फोन नंबर जैसी जानकारी भी दी जाए ताकि उन खबरों से प्रभावित होने वाले लोग खबर के साथ-साथ यह जानकारी भी पा सकें, और उन नंबरों या पतों पर संपर्क कर सकें, मदद पा सकें। आज एक बड़ी जरूरत मीडिया में काम करने वाले लोगों को संवेदनशील बनाने की भी है, और यहां पर सामाजिक संगठन मीडिया संस्थानों-संगठनों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, साथ ही मीडिया की कक्षाओं में छात्र-छात्राओं को अभी से ऐसे मुद्दों पर संवेदनशील बनाना चाहिए ताकि आगे जाकर वे जब काम करें, तो संवेदनशीलता के साथ करें।

कोई भी आत्महत्या उस व्यक्ति के पूरे दायरे की एक नाकामयाबी होती है। दाम्पत्य जीवन के झगड़ों को घटाने में पड़ोसी और परिवार, दोस्त और रिश्तेदार मदद कर सकते हैं, निराश छात्र-छात्राओं की मदद स्कूल-कॉलेज के शिक्षक कर सकते हैं, और प्रेम-संबंधों में निराश लोगों की मदद के लिए समाज के सकारात्मक लोग पहल कर सकते हैं। लोगों की एक सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है, और उसके तहत हर किसी को अपने आसपास की निराशा को घटाने का काम करना चाहिए। जहां तक किसानों की आत्महत्या की बात है, तो यह मामला मोटेतौर पर सरकार की कृषि नीति से जुड़ा हुआ रहता है, और सरकार पर इस बात का दबाव डालने में सबको मेहनत करनी चाहिए कि किसान को भी जिंदा रहने लायक फसल के दाम दिए जाएं। आत्महत्याओं को घटाने के लिए यह सालाना दिन महज कैलेंडर पर आकर गुजर नहीं जाना चाहिए, और हर किसी को अपनी पारिवारिक और सामाजिक, संस्थागत और मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए किसी भी निराश को देखने पर उसकी मदद करनी चाहिए, उससे बात करनी चाहिए, और उसे परामर्श केन्द्र या परामर्शदाता तक पहुंचाने की जहमत उठानी चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को यह सोचना चाहिए कि 2015 के ये आंकड़े बाकी देश से पौने तीन गुना क्यों हैं? और हो सकता है कि इस बरस कर्जमाफी और फसल के अधिक दाम की वजह से जब कुछ बरस बाद 2019 के आंकड़े आएंगे, तो वे इतने डरावने नहीं रहेंगे। एक आखिरी बात यह कि समाज को नौजवान पीढ़ी के प्रेम और विवाह को लेकर अपनी दकियानूसी सोच खत्म करनी चाहिए जिसके बिना सरकार आत्महत्याओं को घटा नहीं सकेगी।
-सुनील कुमार

 


Date : 08-Sep-2019

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा बवंडर आया हुआ है जो कि अमरीका में रिकॉर्ड किए गए कुछ वीडियो में ही अब तक देखने में आता था, जो कि अपने दायरे में आने वाली कारों तक को उड़ा ले जाता है, मकानों को तबाह कर देता है। पिछले कुछ समय से, या यूं कहें कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद से, जितने किस्म की जांच शुरू हुई है, और पहले से चल रही जांच जिस तरह आगे बढ़ी है, उसने हर कुछ दिनों में राज्य के लोगों को हक्का-बक्का कर दिया है। पिछली रमन सरकार के वक्त के कुछ ताकतवर लोगों ने सत्ता के इस्तेमाल से जो मनमाने काम किए थे उनकी शुरूआती जांच से ही गड़बडिय़ां तो सामने आ रही हैं, लेकिन गड़बड़ी करने वाले तमाम लोग दिग्गज वकीलों के साथ अदालत पहुंचकर वक्ती राहत भी पाते जा रहे हैं। खैर, जिनकी ताकत रहती है वे अदालत का काफी दूर तक ऐसा मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन जो शुरूआती जानकारी लोगों की नजरों में आ रही है, उससे सभी को यह समझ आ रहा है कि किसी को भी अपनी सत्ता अंतहीन नहीं माननी चाहिए, और सरकारी मशीनरी के पुर्जों को किसी भी वक्त अपने ऊपर के लोगों के तहत गलत काम नहीं करना चाहिए वरना आगे-पीछे कोर्ट-कचहरी और जेल तय है। 

अब कल ही अंतागढ़ में खरीदे या बेचे जाने वाले कांग्रेस विधानसभा उम्मीदवार मंतूराम पवार ने अदालत में एक हलफिया बयान दर्ज कराकर खलबली मचा दी है कि पिछली भाजपा सरकार के मंत्री-मुख्यमंत्री और जोगी पिता-पुत्र ने कुछ दलालों के साथ मिलकर उन्हें बेच डाला था, और साढ़े सात करोड़ के ऐसे सौदे में से उनके हाथ कोई रकम नहीं आई थी। पिछले बरसों में जब इस खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, तो आवाजों से प्रदेश के हर किसी को यह पक्का मालूम हो गया था कि ये कौन लोग हैं, और क्या धंधा कर रहे हैं। लेकिन अदालती तिकड़मों से हिन्दुस्तान में लंबा समय खरीदा जा सकता है, और अभी वही दौर जारी है कि इस रिकॉर्डिंग की सभी आवाजें अपने आपको बचाकर चल रही हैं, और अदालत में आवाज देने से इंकार कर रही हैं। कैसी दिलचस्प बात है कि जो लोग अपने आपको जनता की आवाज कहते हैं, जो अपने फैसलों को अंतरात्मा की आवाज कहते हैं, उनके गले से अदालती कटघरे में आवाज ही नहीं निकल रही है। आवाज का नमूना देने से बचते हुए बड़े-बड़े नेता कल के मंतूराम पवार को अदालती-बयान से एक नई परेशानी में आ गए हैं, लेकिन बड़े-बड़े वकील बड़ी-बड़ी परेशानियों को टालने या खत्म करने के लिए ही तो बड़ी-बड़ी फीस लेते हैं। 

इधर एक दूसरे मोर्चे पर जोगी पिता-पुत्र जाति प्रमाणपत्र के मामले में फंस गए हैं, और उनका आदिवासी होना फिलहाल खतरे में पड़ गया है, बल्कि रद्द हो गया है। इसके बाद पुलिस में रिपोर्ट, जेल, जमानत, अस्पताल, यही दौर चल रहा है, और यह नौबत राज्य की राजनीति के बवंडर में एक और धूल भरा अंधड़ जोड़ रही है। लोग इस बात पर भी हैरान हैं कि जोगी पिता-पुत्र की कितने अदालती मामलों से जिंदगी भर जूझने की ताकत है। राजनीति में दिलचस्पी लेने वाली मौजूदा नौजवान पीढ़ी ने तो जन्म से ही जोगी परिवार को अदालती कटघरों में ही देखा है, और ऐसे मौके पर लोगों को 2003 का वह चुनाव याद पड़ता है जब भाजपा विधायकों को तोड़कर, खरीदकर, भाजपा सरकार बनने से रोकते हुए उस वक्त के कार्यकारी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बस्तर के तत्कालीन भाजपा सांसद बलीराम कश्यप से मोलभाव किया था, और उस कथित बातचीत की रिकॉर्डिंग हाल ही में गुजरे अरूण जेटली ने रायपुर की प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह भी बस्तर के सांसद से मोलभाव की रिकॉर्डिंग थी, और अभी ताजा रिकॉर्डिंग भी बस्तर के एक नेता से मोलभाव की रिकॉर्डिंग है। 

किसी भी एक खास मामले की चर्चा किए बिना हम सैद्धांतिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि जो लोग मंच और माईक से अपनी बुलंद आवाज लोगों तक पहुंचाते हैं, जो लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दर्जन-दर्जन भर माईक के सामने दहाड़ते हैं, ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपनी आवाज का नमूना देने से पीछे नहीं हटना चाहिए, अदालत में बचने की तिकड़मों को पेशेवर मुजरिमों के इस्तेमाल के लिए छोडऩा चाहिए। छत्तीसगढ़ में आज भांडाफोड़ हो रहे, या किसी नतीजे पर पहुंच रहे अधिकतर मामले पिछली भाजपा सरकार के वक्त के हैं, और इनमें से कई मामले जोगी परिवार से जुड़े हुए हैं। अदालतों से परे भी नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। वैसे तो हर इंसान को, और हर मुजरिम को अपने बचाव के लिए कानून को तोड़-मरोड़कर अधिक से अधिक समय तक बेअसर रखने का पूरा लोकतांत्रिक हक रहता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन के नेताओं को अपने कामकाज के बारे में जनता के प्रति सीधे जवाबदेह भी रहना चाहिए, और यह रूख छोडऩा चाहिए कि जब जनता की अदालत में हारें, तो कानून की अदालत का सहारा लें, और जब कानून के कमजोर हाथ चाहे-अनचाहे उन तक पहुंच ही जाएं, तो वे जनता की अदालत का सहारा लें। लोगों में इतनी गैरत बाकी रहनी चाहिए कि वे जनता के बीच जवाब दें। आज जिस तरह की लुकाछिपी चलती है उससे किसी की लिखी यह लाईन याद पड़ती है- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। सार्वजनिक जीवन के लोगों को अदालतों से परे भी जवाबदेह रहना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Sep-2019

राजस्थान के सबसे चर्चित सती-प्रकरण, रूपकुंवर के मामले की सुनवाई 32 बरस तक चलते-चलते अब जयपुर की विशेष अदालत में आखिरी दौर में दिख रही है। अगले हफ्ते इस पर सुनवाई आगे बढ़ेगी, इस बीच उसे सती बनाने के लिए आरोपी ठहराए गए गिरफ्तार 45 लोगों में से 25 लोग रिहा हो गए हैं, 6 लोग मर गए हैं, और 6 लोग लापता हैं। बाकी लोगों का भी पता नहीं फैसले तक क्या होगा। कुल मिलाकर रूपकुंवर के सती होने के बाद डेढ़ पीढ़ी गुजर चुकी है, और इस अदालत के फैसले के बाद हो सकता है कि एक-डेढ़ पीढ़ी और लग जाए तब जाकर सुप्रीम कोर्ट से कोई आखिरी फैसला हो। लेकिन इस एक मामले पर लिखना आज का मकसद नहीं है, एक दूसरा मामला और आया है जिसकी वजह से इस पर लिखने की जरूरत लग रही है। अभी राजस्थान मानवाधिकार आयोग राज्य सरकार के लिए एक आदेश जारी किया है और कहा है कि वह लिव इन रिलेशनशिप पर रोक लगाए। आयोग का कहना है कि ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाएं रखैल जैसी होती हैं। 

रूपकुंवर को सती किए गए 30 बरस से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन राजस्थान में मर्दाना सोच का वही हाल है जो कि 30 बरस पहले था। पति के मर जाने के बाद पत्नी को साथ में जिंदा जला देना, और यह जाहिर करना कि उसने अपनी मर्जी से जान दी है, और फिर उस तथाकथित त्याग को महिमामंडित करना, यह पूरे देश में राजस्थान के ही बस का है। इसके साथ-साथ इस प्रदेश में जो मानवाधिकार आयोग बनाया गया है वह सुप्रीम कोर्ट के हाल ही के बरसों के कई फैसलों के खिलाफ जाकर बात कर रहा है, और साथ रहते गैरशादीशुदा जोड़ों में से लड़की या औरत को रखैल जैसी गाली देना किसी भी मानवाधिकार आयोग के लिए तो शर्मनाक बात है ही, किसी भी सभ्य समाज में भी ऐसी भाषा मंजूर नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने साथ रहने वाले जोड़ों के हक पूरी तरह से कानूनी माने हैं, और इसके लिए शादी की बंदिश पूरी तरह गैरजरूरी करार दी है। देश का कोई भी कानून बालिग लोगों को साथ रहने से नहीं रोकता, और देश के महानगरों में यह एक आम बात है। ऐसे में इक्कीसवीं सदी का कोई मानवाधिकार आयोग ऐसी ओछी और घटिया बात न सिर्फ कहे, बल्कि सरकार को ऐसा आदेश जारी करे, यह बात अपने आपमें इस आयोग को भंग कर देने के लिए पर्याप्त आधार है। सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इसका संज्ञान लेना चाहिए, और इस आयोग को तुरंत भंग करना चाहिए, वैसे तो राजस्थान की कांग्रेस सरकार खुद भी यह काम कर सकती है, फिर चाहे इसके लिए जो वैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़े। 

हिन्दुस्तान के बहुत से हिस्से में महिला के लिए ऐसी ही हिकारत की जुबान इस्तेमाल होती है। रखैल शब्द की बुनियाद रखने से जुड़ी हुई है। जिस तरह कोई मर्द अपने पास किसी सामान को रख सकता है, उसी तरह औरत-मर्द के रिश्तों में यह मान लिया जाता है कि मर्द ने औरत को रख लिया है। यह समझने की जरूरत है कि इस भाषा में रखैला जैसा कोई शब्द क्यों नहीं है जबकि कई मामलों में कोई महिला अधिक संपन्न हो सकती है, और वह अपने साथी मर्द का खर्च उठा सकती है। ऐसा होने पर भी गाली जैसा शब्द महज औरत के लिए ही गढ़ा जाता है, और गढ़े जाने के सैकड़ों बरस बाद वह औरत के खिलाफ 21वीं सदी में भी प्रचलित रहता है। 

राजस्थान मानवाधिकार आयोग को देश भर में खूब धिक्कारा जाना चाहिए, और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील करनी चाहिए कि वह इस आयोग को बर्खास्त करे। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Sep-2019

देश में लागू हो चुके नए ट्रैफिक कानून का असर अभी अदालतों में देखने मिल रहा है जहां पहुंचने वाले मामलों पर नए जुर्माने के हिसाब से लंबा-चौड़ा भुगतान करना पड़ रहा है। देश के कई राज्यों में सड़कों पर भी इसी को लागू कर लिया है, और जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किसी दुपहिया पर 23 हजार, और किसी ट्रैक्टर पर पौन लाख का जुर्माना लगाया गया है। छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं जहां राज्य सरकारें सड़कों पर जुर्माने के नए रेट लागू करने के बजाय समझौता शुल्क किस्म की पुराने रेट की वसूली कर रही है, और लोग अभी तक सस्ते में छूट रहे हैं। नए कानून के हिसाब से भारी-भरकम हजारों का जुर्माना तो दूर रहा, छत्तीसगढ़ में पुलिस पुराने कानून के हिसाब से भी पूरा जुर्माना नहीं कर रही है, और मामूली सौ-दो सौ का समझौता शुल्क लेकर छोड़ रही है। सरकार का यह रूख लोगों को अच्छा लग सकता है क्योंकि नया जुर्माना चुकाना सबके बस का नहीं है। 

लेकिन यहां पर एक बात को समझने की जरूरत है कि कागजात लेकर चलने, नंबर प्लेट सही रखने, बीमा करवाकर चलने, हेलमेट या सीट बेल्ट लगाकर चलने, और गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात न करने की बंदिशों में क्या गलत है? सरकारें अगर अपनी जनता को लुभाने के लिए ऐसी मामूली बातों पर अमल से भी लोगों को छूट देना चाहती हैं, तो वह निहायत ही गलत बात है। ये जुर्माने ऐसे नहीं हैं कि जो सावधान लोगों पर भी कभी लगें। ये ऐसे ही हैं जो कि अपनी मर्जी से कानून तोडऩे वाले लोगों पर ही लग सकते हैं। अब अगर पूरे देश का मिजाज यही बनाकर रखना है कि वे कानून तोड़ें, खुद लापरवाही बरतें, और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालें, तो हमारा ख्याल है कि ऐसी छूट देने का कोई हक किसी सरकार को भी नहीं मिलना चाहिए कि सोच-समझकर अपनी मर्जी से नियम तोडऩे वालों पर भी जुर्माना न लगे। यह सिलसिला लोगों को न सिर्फ सड़क पर ट्रैफिक के मामले में, बल्कि बहुत से दूसरे मामलों में भी नियमों को तोडऩे के लिए हौसला देता है जिससे देश में एक अराजकता की नौबत आती है। 

हम आम लोगों के बीच नियमों की हिकारत के बहुत से खतरे देख रहे हैं। अब लोग इलाज करने वाले उस डॉक्टर को ही मार डाल रहे हैं जिसने कि उस बीमार के लिए अपना खून भी दिया था। भीड़ जगह-जगह लोगों को किसी भी शक में, कोई भी आरोप लगाकर मार रही है, और ऐसी हत्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे देश में लोगों के मिजाज को रियायतें देकर अराजक बनाने के खतरे दूर तक जाएंगे, और आने वाली पीढ़ी को भी खतरे में डालेंगे। इसलिए जुर्माने की रकम कम या अधिक हो, इतने पर ही बहस होनी चाहिए, जुर्माना न हो, या महज प्रतीकात्मक जुर्माना हो, यह नहीं होना चाहिए। नियम-कायदे को मानकर चलने वाले लोगों को एक सुरक्षित सड़क का पूरा हक है, और नियम तोडऩे वाले लोग अपने साथ-साथ दूसरों की मौत की नौबत भी लाते हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार में या ऐसे दूसरे प्रदेशों की सरकारों में बैठे हुए लोगों को अधिक रियायत के बारे में नहीं सोचना चाहिए। दुनिया के जिन देशों में बड़ा जुर्माना और कड़ी सजा लागू है, वहां पर लोग ट्रैफिक नियम तोडऩे के पहले कई बार सोचते भी हैं। हो सकता है कि नए कानून में लगाए गए जुर्माने के हिसाब से लोग जिम्मेदार नहीं हो पाए हैं, लेकिन इन्हें कुछ हफ्ते का समय देकर राज्य सरकारों को कानून लागू होने देना चाहिए जो कि आज अदालतों तक सीमित रखा गया है। सड़क पर खतरे खड़े करना सोशल मीडिया पर ही मजाक की बात हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में इससे बेकसूर मौतें होती हैं। बड़ी-बड़ी महफूज गाडिय़ों में चलने वाली सत्ता को सड़क के गरीबों की मौतों का सामान जुटाने का कोई हक नहीं हो सकता, और राज्य सरकारों को जनता को लुभाने के बजाय जनता को जिम्मेदार बनाना चाहिए। शुरुआती जुर्माने से कुछ लोगों का दीवाला भी निकल सकता है, लेकिन एक बात तय है कि लोग मामूली बातों पर अमल करके चलेंगे, तो उन्हें कभी बड़ा जुर्माना नहीं होगा। छत्तीसगढ़ की अदालत में दस-दस हजार रूपए जुर्माना लगा दिया है, और ऐसे कुछ शुरुआती लोगों की बलि के बाद हो सकता है कि आगे बाकी लोगों को ज्ञान प्राप्त हो।
-सुनील कुमार


Date : 05-Sep-2019

फेसबुक पर दूसरे देशों के लोगों से ताजा-ताजा दोस्ती और मोहब्बत के नाम पर हिन्दुस्तान में आदमी तो कम लुट रहे हैं, औरतें अधिक लुट रही हैं। अपने आसपास के प्रदेशों को देखें, तो अधेड़ उम्र की, शादीशुदा, पढ़ी-लिखी, सरकारी नौकरी वाली, या संपन्न परिवारों की महिलाएं दसियों लाख रूपए गंवा दे रही हैं, और उसके बाद जाने किस तरह की और कितनी झिझक के साथ पुलिस में जाकर यह पूरा बखान कर रही हैं। यह सिलसिला नाइजीरिया के या किसी और देश के ठगों के बारे में सोचने का नहीं है, हिन्दुस्तानी समाज में शादीशुदा-अधेड़ महिलाओं के इस हैरतअंगेज रूख का है जिसकी कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आमतौर पर हिन्दुस्तानी शादीशुदा महिला को अधिक जिम्मेदार माना जाता है, और शादीशुदा मर्द तो फिर भी किसी सस्ते विदेशी सफर पर जाकर मालिश-पॉलिश करवाकर आ जाने की चर्चा में रहते हैं, लेकिन महिलाओं से समाज अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करता है। अभी जो हाल सामने आ रहा है वह गिनती में भले कम हो, लेकिन नौजवान बच्चों की माताएं भी जिस तरह से ऐसे प्रेमजाल में फंस रही हैं, और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ शर्मिंदगी भी झेल रही हैं, पूरे का पूरा परिवार तनाव में पड़ रहा है, और शायद टूटने का खतरा भी झेल रहा है, उसे देखते हुए इस पर समाजशास्त्रीय नजरिए से गौर करना चाहिए। 

किसी अनदेखे मर्द के मोह में इस हद तक पड़ जाना इन महिलाओं की जिंदगी में एक बड़े से शून्य का सुबूत दिखता है कि वे अपनी पारिवारिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है, और उन्हें बाहर एक महत्व, एक मोहब्बत की तलाश की जरूरत लग रही है। जिन परिवारों में ऐसे हादसे हो गए हैं, उन परिवारों से परे भी बाकी लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि परिवार के भीतर एक-दूसरे का ऐसा ध्यान कैसे रखा जाए कि लोग ऐसे जाल में न फंसें। वैवाहिक जीवन में भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि से लेकर परस्पर सामाजिक सम्मान जैसी बहुत सी बातें हैं जो कि पति-पत्नी को एक-दूसरे के बारे में सोचनी चाहिए, और परिवार के बाकी लोगों को भी घर की छत के नीचे परस्पर सम्मान का एक वातावरण रखना चाहिए। भारतीय समाज के खासे बड़े हिस्से में शादीशुदा महिला को एक-दो बच्चों के बाद घर चलाने वाली मान लिया जाता है, जो कि सही नौबत नहीं है। आज फिल्म, टीवी, अखबार, और सोशल मीडिया के चलते हर किसी को दुनिया भर में बिखरे हुए सपनों को देखना तो नसीब है ही, और ऐसे में जब अपने जीवन-साथी से कोई निराशा हो, दाम्पत्य जीवन में कोई बड़ी कमी हो, और बाहर किसी अनजाने से बहुत सा महत्व मिल रहा हो, तो लोग राह से इस तरह भटक भी जाते हैं, और खतरों में पड़ जाते हैं, बड़ा नुकसान पा जाते हैं। 

परिवार के सभी पीढिय़ों के लोगों को मिलकर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि परिवार के हर सदस्य को भावनात्मक सहयोग और समर्थन मिलता रहे, आपसी सम्मान और महत्व मिलता रहे, और एक-दूसरे की उम्मीदों को जहां तक मुमकिन हो वहां तक पूरा करने की कोशिश की जाए, या कम से कम इस बात की चर्चा भी की जाए कि क्या-क्या मुमकिन नहीं है। जीवन में अगर शारीरिक या मानसिक प्यास बनी हुई है, तो उसे अनदेखा करके किसी को यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे ब्रम्हचारी साधु-साध्वियों की तरह अपने आप पर काबू रखें। लोगों को इस तरह के काबू की न तो आदत होती है, और न ही किताबों से परे ऐसी कोई काबू हो सकते हैं। हर कुछ महीनों में तो किसी न किसी धर्म के, किसी आध्यात्मिक सम्प्रदाय के ऐसे ब्रम्हचारी के किस्से सामने आते ही हैं जो बताते हैं कि सांसारिक जीवन को छोड़कर ईश्वर की राह पर बढ़ते हुए भी कैसे नजर हटी, दुर्घटना घटी जैसी नौबत आती ही रहती है। और सामने आने वाले हर किस्से से सौ-सौ गुना अधिक किस्से ऐसे रहते होंगे जो कि सामने नहीं आते हैं। ठीक इसी तरह फेसबुक पर अनजानी चाह के पीछे दौड़ पडऩे वाले लोगों के जो मामले सामने आते हैं उससे हजारों गुना अधिक मामले ऐसे रहते होंगे, और इन खतरों को टालने का तरीका परिवार के भीतर ही ढूंढा जा सकता है, बाहर नहीं। 
-सुनील कुमार


Date : 04-Sep-2019

भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रह चुके अब्दुल बासित ने कल ट्विटर पर एक चूक कर दी, उन्होंने कश्मीर में भारतीय सैनिकों की पैलेटगन से घायल एक नौजवान की तस्वीर बताते हुए जो तस्वीर पोस्ट की, वह एक गैरघायल नौजवान की थी जो कि पश्चिम का पोर्न फिल्मों का लोकप्रिय कलाकार है। जॉनी सिंस नाम के इस कलाकार ने इसका मजा लेते हुए अब्दुल बासित को धन्यवाद दिया है कि उनकी पोस्ट से उसके फॉलोअर्स बढ़ गए। अब्दुल बासित ने यह लिख दिया था कि पैलेटगन से इस नौजवान की आंखें खत्म हो गई हैं। 

पाकिस्तान के लिए देश के बाहर जिस उच्चायुक्त का सबसे अधिक महत्व है, वह भारत की पोस्ट ही है। ऐसी नाजुक जगह पर रह चुका एक राजनयिक जब ऐसी चूक करता है, तो वह इस खतरे से अनजान भी नहीं रहता कि इस किस्म की चूक आनन-फानन पकड़ में आ ही जाती है, और इन दिनों तो इंटरनेट पर बहुत सी ऐसी वेबसाईटें हैं जिनका महज एक ही काम है, वेब पर अफवाहों को पकड़कर, उनके झूठ के सुबूत ढूंढकर उनका भांडाफोड़ करना। भारत में ऐसी कई वेबसाईटें सोशल मीडिया के साथ-साथ मीडिया का झूठ भी उजागर कर रही हैं। अखबारों या टीवी चैनलों का एक हिस्सा हिन्दुस्तान में बहुत खुलकर एक घोषित मकसद के साथ झूठ के कारोबार में लगा हुआ है। ऐसे मीडिया में काम करने वाले पत्रकार या मीडियाकर्मी भी लगातार झूठ को बढ़ाते हैं, और न कोई हिचक है, न कोई डर। देश का आईटी कानून कहने के लिए तो बहुत कड़ा है, लेकिन उसके तहत जुर्म दर्ज करने का जिम्मा राज्य की पुलिस पर रहता है, और वह पुलिस छांट-छांटकर लोगों पर जुर्म दर्ज करती है, इसलिए सत्ता से मेहरबानी पाए हुए लोग बेधड़क झूठ और अफवाहें गढ़ते हैं, फैलाते हैं, और जनधारणा को बर्बाद करने का काम करते हैं। ऐसे काम में बहुत से मंत्री, बहुत से अफसर, और बहुत से राजनेता भी जुट जाते हैं। इस देश का सूचना तकनीक कानून कहने के लिए तो बहुत कड़ा है, लेकिन उसके तहत किसी को सजा होते देखा नहीं जाता। इसीलिए लोग अपनी बदनीयत को पहले तो महज सोशल मीडिया पर इस्तेमाल करते थे, लेकिन हाल के बरसों में टीवी और अखबारों के लोग, महज झूठ पर चलने वाली वेबसाईटों पर काम करने वाले लोग लगातार अफवाहें फैलाते हैं, और बेधड़क सत्तासमर्थन पाते हैं। 

लेकिन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सोशल मीडिया जैसी जगहों पर एक बार कही या लिखी गई बात हमेशा के लिए कहीं न कहीं दर्ज हो जाती है, और कई बरस बाद जाकर भी वह दिक्कत खड़ी कर सकती है। बहुत से लोगों को सूचना तकनीक कानून का यह खतरा भी नहीं मालूम है कि उन्हें वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर पर बच्चों से जुड़ी हुई कोई पोर्नों सामग्री भी अगर वे फोन पर सम्हालकर रखते हैं, तो बिना आगे बढ़ाए हुए भी वे एक कड़ी सजा के हकदार रहते हैं। बच्चों की अश्लील तस्वीरें या उनके वीडियो को लेकर कानून बहुत कड़ा है जिसमें अपने फोन या कम्प्यूटर पर ऐसी तस्वीरों को रखना भी शामिल है। इसलिए आज के माहौल में अगर लोग गैरजिम्मेदारी से या साजिश के तहत गलत बातों को आगे बढ़ा रहे हैं, तो वे जान लें कि सरकारें बदलती रहती हैं, सरकार साथ न दे तो भी लोग अदालत तक जाकर रिपोर्ट लिखवा सकते हैं, और मुकदमा चल सकता है। ऐसे मामलों में गवाहों की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि डिजिटल सुबूत सबसे बड़े गवाह रहते हैं। फिर कानून से परे भी एक यह बात समझने की जरूरत है कि जो समझदार लोग आपके नाम के साथ किसी झूठ को देखते हैं, उनकी नजरों में तो आप वैसे भी गिर जाते हैं। इन सब बातों को देखते हुए लोग झूठ और अफवाह से दूर रहें तो ही वे इज्जतदार रहेंगे, और जेल के बाहर रहेंगे।
-सुनील कुमार


Date : 03-Sep-2019

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भीतर बड़ी खींचतान चल रही है, मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, और प्रदेश के एक और बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच जैसे झगड़े की खबरें आ रही हैं, उनसे भाजपा बड़ी खुश है। अभी सोशल मीडिया पर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य की साथ जाते एक तस्वीर पर किसी भाजपा नेता ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कमलनाथ को विसर्जन के लिए ले जाते हुए ज्योतिरादित्य।

अब तनातनी के बीच यह बात तो सचमुच मजेदार है लेकिन दोनों पार्टियों के बीच कटुता इतनी है कि कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि इस अपमानजनक टिप्पणी पर भाजपा नेता के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाएगी। अब एक ट्वीट में मजे की बात पर अगर एफआईआर हो गई है, तो यह नौबत लोकतंत्र के भीतर सार्वजनिक जीवन में जहर घुलने का एक सुबूत है। यह बात महज मध्यप्रदेश में नहीं है छत्तीसगढ़ में भी बात-बात पर कांगे्रस और भाजपा के लोग एक-दूसरे के खिलाफ रिपोर्ट लिखा रहे हैं, और चूंकि कांग्रेस सत्ता पर है, उसकी रिपोर्ट अधिक आसानी से लिख ली जा रही है। यह सिलसिला सार्वजनिक जीवन और राजनीति से दरियादिली और बड़प्पन, शिष्टाचार और हास्यबोध सबके खत्म हो जाने का है। और यह कुछ अधिक ही रफ्तार से हुआ है। लोग भ्रष्टाचार या चरित्रहनन के गंभीर आरोपों को लेकर तो एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत करते, रिपोर्ट लिखाते, मानहानि का मुकदमा करते आए हैं, लेकिन हँसी-मजाक भी अगर अदालतों तक पहुंच जाएगी, तो फिर लोग वकीलों के मार्फत ही एक-दूसरे से बात करेंगे।

देश की हवा में पिछले बरसों में लगातार घटियापन बढ़ा है और नफरत फैलाने की कोशिशें कामयाब हुई हैं। लोगों का बर्दाश्त खत्म हो गया है और अभिव्यक्ति की आजादी पर लोगों का भरोसा महज उस सीमा तक रह गया है कि वह उनकी अपनी अभिव्यक्ति हो। दूसरों के बोलने को लेकर लोगों का बर्दाश्त नहीं रह गया है। ऐसे में पश्चिम के कुछ विकसित लोकतंत्र दिखते हैं जहां पर पैनी से पैनी बात दिल को चीरते हुए उतार दी जाती है, लेकिन लोग उसका जवाब शब्दों से ही देते हैं, घटियापन से नहीं। आज हिंदुस्तान में संसद से लेकर कई विधानसभाओं तक जुबान का स्तर गिरते चले जा रहा है, सोच भी गिरते चली जा रही है, सदनों के बाहर तो बहस का स्तर और भी गिरते चले जा रहा है, और लोग खुलकर बेइंसाफी की बातें करने लगे हैं। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन के लोगों के बीच बातचीत का रिश्ता ही न बचे यह ठीक नहीं है।

लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष के बीच बंटी हुई खेमेबाजी का नाम नहीं होता, बल्कि इन दोनों के बीच निरंतर अंतरसंबंधों का नाम होता है जो कि जनहित के लिए जरूरी भी होते हैं। आज की यह बात जुबान पर कुछ काबू रखने की नसीहत देने के लिए है, और कुछ अपना बर्दाश्त बढ़ाने के लिए भी है। रास्ता इन दोनों के बीच ही निकलेगा, निकलना चाहिए, और यह रास्ता अदालत तक जाने वाला नहीं होना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 02-Sep-2019

बहुत पुरानी बात है, चौथाई सदी से भी पहले हिन्दुस्तान में समाचार-विचार की एक इज्जतदार साप्ताहिक पत्रिका थी, दिनमान। उसमें देश-विदेश के ताजा मुद्दों पर रिपोर्ट रहती थीं, विचार भी रहते थे, और पढ़ेलिखे-समझदार लोगों के बीच उसका चलन भी था। उसमें तीस-पैंतीस साल पहले बाजार में ताजा आए स्टीरियो म्यूजिक प्लेयर के बारे में एक रिपोर्ट छपी थी कि वह संगीत के अलग-अलग वाद्ययंत्रों की आवाज और गायक या गायिका की आवाज को अलग-अलग स्पीकरों में बांटकर किस खूबी के साथ बजाएगा-सुनाएगा। उस रिपोर्ट की सुर्खी भुलाए नहीं भूलती, संगीत को लेकर इतने किस्म की तकनीक पर हैडिंग थी- कान तो दो ही हैं। 

आज हिन्दुस्तान की हालत देखें, तो जनता को देखकर यही लगता है कि उसके कान तो दो ही हैं। चारों तरफ से जितनी भी बातें उसके कानों में पड़ रही हैं, उनमें से कौन सी बात किस बात को पछाड़कर उसके सीने पर चढ़ बैठेगी, यह अंदाज लगाना खासा मुश्किल है। और फिर यह वक्त महज रेडियो या भाषण सुनने का नहीं है, यह वक्त टीवी पर खबरें देखने का भी है जिन्हें देखते हुए सुना भी जाता है, और आंखें तो दो ही हैं, इसलिए उन आंखों से अखबारों को, अलग-अलग समाचार चैनलों को, सड़क किनारे लगे राजनीतिक इश्तहारों को, और आमसभाओं में बोलते नेताओं को देखने के लिए बस दो ही आंखें हैं। और फिर इन चारों को जोड़कर इनका देखा, और इनका सुना मिलाकर समझने के लिए दिमाग तो एक ही है। यह समझना भी कुछ बुनियादी समझ होने के बाद ही शुरू हो सकता है, वरना देखना और सुनना यह सब दिमाग में दर्ज भर हो सकता है, उसका कोई विश्लेषण जरूरी नहीं है कि दिमाग में हो ही जाए। यह भी समझने की जरूरत है कि देखे हुए और सुने हुए के विश्लेषण के लिए बुनियादी समझ के साथ-साथ कुछ मेहनत भी लगती है, इसलिए हिन्दुस्तान में आज बहुत से लोग महज सुन लेते हैं, महज देख लेते हैं, और फिर उसे सोशल मीडिया पर, अपने फोन पर आगे बढ़ा देते हैं, बिना दिमाग पर बोझ डाले। 

जो चतुर लोग हैं, वे जानते हैं कि जिस तरह लोगों का बदन किसी व्यायामशाला में कसरत की बदनतोड़ मेहनत करने के नाम से ही कतराता है, उसी तरह दिमाग भी अधिक विश्लेषण से, सही-गलत का फर्क करने से, और अगर फर्क तक पहुंच भी गए तो उस फर्क पर कुछ करने से पूरी तरह बचता और कतराता है। इसलिए चतुर लोग उस वक्त जब कुछ जमीनी और बुनियादी हकीकत को देखने, समझने, और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से कुछ करने की नौबत रहती है, तब वे आंखों और कानों के सामने बड़ा चटपटा और जायकेदार चारा परोसते रहते हैं, और सरोकारमुक्त दिमाग उसके चटकारे लेते रहता है। जब कभी कुछ जलती-सुलगती दिक्कतें खड़ी होकर अपनी तरफ ध्यान खींचने की कोशिश करती हैं, उसी पल देश में जगह-जगह कुछ लोग सोची-समझी साजिश के तहत मेहनत से तैयार की गई अनायास और अनर्गल बातें कहने लगते हैं, और समाचार चैनलों वाला मीडिया पहले उस पर टूट पड़ता है, फिर सोशल मीडिया नाम का अमूमन बेदिमाग माध्यम उस झंडे को लेकर आगे दौड़ पड़ता है, और किसी रिलेरेस की तरह मैसेंजर इस्तेमाल करने वाले लोग इन अनायास दिखती अनर्गल बातों को और आगे बढ़ा देते हैं। सूचनाओं का एक ऐसा ओवरलोड खड़ा कर दिया जाता है कि जरूरी बातें कचरे के ढेर तले दब जाती हैं, दम तोड़ देती हैं। जमीनी हकीकत और बुनियादी जरूरत की जरूरी बातें वैसे भी दिमाग पर जोर डालने वाली रहती हैं, और दिमाग भी तो आखिर इंसान का ही है, वह भी इस चक्कर में रहता है कि चौराहों पर लालबत्ती के वक्त पहुंचे भूखे-बीमार भिखारियों को देखने से बचने के लिए फोन में झांकने वाले लोगों की तरह वह भी जलती-सुलगती बातों को अनदेखा करके किसी नेता की बकवास, या अपनी देह में हुई सर्जरी को लेकर राखी सावंत जैसी किसी अभिनेत्री के बयान के वीडियो को देखे। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि आज देश में तकरीबन मुफ्त मिल रहा इंटरनेट डेटा जिंदगी के असल मुद्दों को दबा देने के लिए चकाचौंध, सनसनीखेज, और अश्लील मुद्दों का सैलाब लोगों तक पहुंचा रहा है। और जिस तरह एक वक्त दिनमान ने लिखा था कि कान तो दो ही हैं, तो आज की हकीकत यह है कि दिमाग तो एक ही है। और इस एक दिमाग को इतने गैरजरूरी अलग-अलग चीजों में उलझा दिया जाए कि वह जिंदगी की दिक्कतों को सुलझाने के बारे में सोच भी न सके। इस माहौल को साजिश की तरह कम ही लोग देख पाते हैं, लेकिन समझ और जिम्मेदारी शायद कम ही लोगों में होती है, आज वह अभिनंदन के विमान उड़ाने के नजारे को देख रहा है। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Sep-2019

देश में आज से नया ट्रैफिक कानून लागू हो गया है जिसमें अब तक महज जुर्माना देकर बच जाने वाले मामले भी कैद दिलवा सकते हैं। कानून कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा कड़ा लग सकता है लेकिन हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोगों को दूसरों की जान की कीमत पर भी जिस तरह और जिस हद तक ट्रैफिक तोडऩा सुहाता है, उसके चलते यह बात साफ है कि कड़े कानूनों बिना लोगों में नर्म कानूनों की कोई इज्जत नहीं रहती है। सड़क पर नियम तोडऩे के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि तोडऩे वाले की जिंदगी खतरे में पड़े या न पड़े, सड़क पर के दूसरे लोगों की जिंदगी जरूर खतरे में पड़ जाती है। अभी बहुत से लोगों को यह अंदाज नहीं है कि आज से उनके सिर पर किस तरह का खतरा मंडरा रहा है अगर उन्होंने नए ट्रैफिक नियमों को तोड़ा। 

आज से अगर कोई व्यक्ति परिवार के किसी नाबालिग को अपना कोई वाहन देकर कहीं भेजते हैं, या अपनी जानकारी में जाने देते हैं, या किसी नाबालिग की चलाई गाड़ी में खुद बैठकर जाते हैं, तो इसका चालान अब सिर्फ जुर्माने से पूरा नहीं होगा। अगर यह स्थापित हो जाता है कि उनकी जानकारी और उनकी सहमति से, या उनकी मौजूदगी में कोई नाबालिग वाहन चला रहा था, तो वाहन के मालिक को भी 25 हजार रूपए तक जुर्माना हो सकता है, और तीन बरस तक की कैद भी हो सकती है। ऐसे नाबालिग बच्चों के पालकों को भी यही सजा हो सकती है अगर उनकी जानकारी में वाहन का ऐसा इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा ऐसे नाबालिग बच्चों को 25 वर्ष की उम्र तक लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। आज हमारे आसपास ऐसे नाबालिग बच्चे हजारों की गिनती में दिखते हैं, लेकिन आज अगर उनमें से किसी का भी मामला बनता है, तो वह मामला लोगों के डरावने सपनों से भी अधिक नुकसानदेह और खतरनाक साबित होगा। इस नए कानून के मुताबिक साबित हो जाने पर जज को कैद तो सुनाना ही होगा, जुर्माने के साथ-साथ। इसके अलावा भी कई दूसरे किस्म के नियम तोडऩे पर पहले के मुकाबले अधिक बड़े जुर्माने और अधिक कड़ी कैद रखी गई है, जो कि पूरी तरह जायज है। 

नए ट्रैफिक नियमों में एक बात को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है कि मोबाइल फोन के कैसे इस्तेमाल को फोन माना जाएगा, और कैसे इस्तेमाल को रास्ता दिखाने वाला उपकरण। आज देश भर में टैक्सी चलाने वाले तमाम लोग मोबाइल फोन पर रास्ता देखते हुए चलते हैं, और पते पर पहुंचते हैं। टैक्सी वालों से परे भी लोग फोन को नेविगेशनल उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं, और रास्ता ढूंढते हैं। ऐसे में फोन के कैसे-कैसे इस्तेमाल को नियम तोडऩा माना जाएगा, यह अभी साफ नहीं है। फोन पर बात करने के तरीके भी अब बदल गए हैं। लोग फोन को कान से लगाए बिना ब्लूटूथ से बात कर लेते हैं। बहुत से लोग फोन से ही ब्लूटूथ से संगीत भी सुनते रहते हैं। यह एक मामला ट्रैफिक पुलिस के लिए भी एक झंझट खड़ी कर सकता है क्योंकि एक ही मोबाइल फोन के कई तरह के उपयोग होते हैं, और उनमें से कुछ किसी नियम को नहीं तोड़ते हैं। 

फिलहाल कड़े नियमों को लागू करने के लिए अगर ट्रैफिक पुलिस का पर्याप्त इंतजाम नहीं होगा तो वैसे नियम किसी काम के नहीं होंगे। आज नर्म नियम भी लागू नहीं हो पा रहे हैं, कल कड़े नियमों का वही हाल होगा। कड़े नियमों में बस में क्षमता से अधिक मुसाफिर ले जाने पर ड्राइवर-कंडक्टर के लिए कैद का इंतजाम है, लेकिन बसों और ट्रकों का नियम तोडऩा परिवहन और ट्रैफिक अफसरों के साथ एक संगठित भ्रष्टाचार के तहत होता है, ऐसे में नियमों को लागू न करने के लिए हफ्ता या महीना बंधा होता है, कड़ा कानून बड़ा हफ्ता करवा देगा, लेकिन क्या उस पर कोई अमल भी हो पाएगा? हमारा ख्याल है कि बढ़ती हुई गाडिय़ों, बढ़ते हुए ट्रैफिक, और नई बनती सड़कों पर तेज होती रफ्तार को देखते हुए सरकार को एक तरकीब इस्तेमाल करनी चाहिए। जब गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन होता है, तो उसका ही कुछ हिस्सा ट्रैफिक पुलिस बढ़ाने के लिए सीधे ही एक मद में चले जाना चाहिए, और निजी गाडिय़ां जिस रफ्तार से बढ़ती हैं, उस रफ्तार से अपने आप ट्रैफिक पुलिस भी बढ़ जानी चाहिए, या निगरानी कैमरे और रफ्तार पकडऩे वाले राडार बढ़ जाने चाहिए। गाडिय़ां आज बढ़ जाएं और ट्रैफिक पुलिस कई बरस बाद बढ़े, तो वैसा इंतजाम बरसों पीछे घिसटता ही रहेगा। इससे पार पाने के लिए रजिस्ट्रेशन के दिन ही फीस का एक हिस्सा ट्रैफिक पुलिस के लिए चले जाना चाहिए।

सड़कों को बाप की जागीर मानकर चलने वाले लोगों पर नए बढ़े हुए जुर्मानों की तगड़ी मार शुरू होनी चाहिए, और ट्रैफिक पुलिस को रोज मीडिया के मार्फत यह उजागर भी करना चाहिए कि कितने लोगों पर कितना जुर्माना हुआ है। जुर्माने से परे ड्राइविंग लाइसेंस जब्त करने, गाड़ी जब्त करने, और जेल भेजने वाली धाराओं में अदालत भेजने का काम भी होना चाहिए। कुछ शुरुआती बलि से हो सकता है आगे चलकर हालात सुधरें, और सड़कों पर बेकसूर मौतें न हों। 
-सुनील कुमार


Date : 31-Aug-2019

छत्तीसगढ़ का जो आदिवासी इलाका बस्तर लगातार नक्सल हिंसा की वजह से खबरों में रहता है, या वहां की बाकी खबरें सुरक्षाबलों के हाथों नक्सलियों के मारे जाने की रहती हैं, उस बस्तर में देश और दुनिया के बाकी हिस्सों के लोग आने से भी कतराते हैं, और अपनी बच्चों को भेजने से भी कतराते हैं कि धमाकों में इतनी मौतों वाले इलाके में क्यों जाया जाए। यह एक अलग बात है कि खुद बस्तर के जो पर्यटन केंद्र हैं, उनको नक्सली हाथ भी नहीं लगाते हैं, और तमाम सैलानी महफूज रहते आए हैं। लेकिन बस्तर के नक्सल हिंसाग्रस्त इलाकों में बसे हुए लोगों का हाल बहुत अलग है, और आज जब वहां की दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर उपचुनाव का मौका आ खड़ा हुआ है, तो कांगे्रस और भाजपा दोनों की तरफ से दो ऐसी महिलाओं के बीच चुनाव होना तकरीबन तय माना जा रहा है जिन्होंने नक्सल हिंसा में ही अपने-अपने पति खोए हैं। नक्सलियों के खिलाफ बस्तर में सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई लडऩे वाले कांगे्रस के बड़े नेता महेंद्र कर्मा को बस्तर के झीरम घाटी हमले में नक्सलियों ने छांटकर, तलाशकर, नाम पूछकर मारा था, और कुछ महीने पहले ही वहां से भाजपा विधायक बने भीमा मंडावी पुलिस चेतावनी के बावजूद बस्तर में सफर करते हुए नक्सली धमाके में मारे गए थे। ऐसे दोनों परिवारों से इन दोनों की पत्नियां चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं, और इस मौके पर इनका यह रूख देखते हुए यह लगता है कि नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र और कब्जे वाले इलाके में रहते हुए ये महिलाएं इतना हौसला दिखा रही हैं, बावजूद इसके कि वे कभी भी नक्सली निशाने पर आ सकती हैं, जान खो सकती हैं। लोगों को याद होगा कि महेंद्र कर्मा राज्य बनने के बाद से लगातार नक्सलियों के निशाने पर थे, और अपने घर में भी वे संगीनों के साए में ही सो पाते थे।

इस तरह का हौसला उन परिवारों में भी देखने मिलता है जिनके कोई सदस्य पुलिस या किसी दूसरे सुरक्षाबल में रहते हुए नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए हैं, और परिवार के दूसरे सदस्य इसके बाद भी वर्दी वाली ऐसी खतरनाक नौकरी करने जाते हैं, और फिर नक्सल मोर्चे पर पहुंच जाते हैं। ऐसी कहानियां फौज में शहीद हुए लोगों की भी सुनाई पड़ती हैं जहां एक शहादत के बाद भी मां-बाप दूसरे बच्चों को फौज में भेजते हैं। अभी-अभी तो एक शहीद फौजी की पत्नी की कहानी अखबारों में आई है कि किस तरह वह एक सौंदर्य स्पर्धा जीतने के करीब थी, और पति की शहादत के बाद उसने इस ब्यूटी कान्टेस्ट से बाहर निकलकर फौज में जाने का इम्तिहान दिया, और फौज में नौकरी भी पा ली।

इस किस्म की बातों को सुनकर लगता है कि इसी देश की आबादी के बीच चाहे गिनती में कम हों, लेकिन ऐसे लोग हैं जो कि लगातार हौसला दिखाते हैं, और जान की जोखिम उठाते हुए भी दिखाते हैं। यह उस देश में है जहां पर लोग ट्रैफिक के चालान से बचने के लिए सड़कों पर गाडिय़ां दौड़ाते भाग निकलते हैं, जहां पर लोग अपनी लाश को जल जाने देते हैं, लेकिन जीते-जी नेत्रदान का फॉर्म भी भरने की जहमत नहीं उठाते। लोग अस्पताल में भर्ती अपने रिश्तेदार को भी खून देने को तैयार नहीं होते, सड़क पर जख्मी को अस्पताल पहुंचाने भी तैयार नहीं होते, और ऐसे लोगों को लालच देने के लिए अभी पुदुचेरी राज्य में यह योजना बनाई है कि किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाने वाले को पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।

आज का हिंदुस्तान कहने के लिए तो एक बहुत ही आक्रामक राष्ट्रवाद के रास्ते पर चल रहा है जिस सड़क को बनाने के लिए पड़ोसी देश को भी एक दुश्मन के पुतले की तरह पेश किया गया, और देश के भीतर भी कुछ तबकों को दुश्मन की तख्ती लगाकर निशाने पर खड़ा किया गया है। आक्रामक राष्ट्रवाद के चलते जो लोग भीतर और बाहर के ऐसे दुश्मन करार दिए गए लोगों की भीड़त्या पर उतारू रहते हैं, उन लोगों का राष्ट्रवाद भी देश के भीतर उन्हें कोई भला काम करने की तरफ नहीं ले जाता, कोई चुनौती मंजूर करने की तरफ नहीं ले जाता। ऐसे माहौल में हम उन महिलाओं को सलाम करते हैं जो कि जान के खतरे के बीच भी लोकतंत्र पर खड़े रहकर या तो विधानसभा और संसद पहुंचने की चुनौती मंजूर करती हैं, या जो परिवार की शहादत के बाद भी पुलिस, सुरक्षाबल, या फौज पहुंचकर फिर जोखिम उठाती हैं, या फिर अपने बेटे-बेटियों या भाई-बहनों को ऐसे खतरों के बीच लोकतंत्र या देश की सेवा के लिए भेजती हैं। ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम।
-सुनील कुमार

 


Date : 30-Aug-2019

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों से तबादलों को लेकर भारी गहमागहमी चल रही है। सरकारी विभागों में हजारों तबादले हुए हैं, और तकरीबन ऐसा ही किसी भी सरकार के रहते हुए होते आया है। इस बार कुछ विधायक अपनी नाराजगी के साथ स्कूल शिक्षा मंत्री पर पिल पड़े इसलिए खबरें कुछ अधिक बनी, वरना स्कूल शिक्षा विभाग सरकार का सबसे बड़ा विभाग है, और उसमें सबसे अधिक संख्या में तबादले होते ही हैं। लेकिन हर विपक्ष सत्ता पर तबादला उद्योग का आरोप लगाता है, और ये शब्द अब धीरे-धीरे अपना असर खो बैठे हैं। इसलिए आरोपों से परे यह सोचने की जरूरत है कि किसी सरकार की तबादला नीति और उस पर अमल में कौन सी बातों का ख्याल रखना चाहिए, ताकि सरकार का कामकाज बेहतर चल सके, और अधिकारी-कर्मचारी भी अपने परिवार का ख्याल रख सकें। 

छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है जहां जाकर कम ही लोग ऐसे हैं जो कि अधिक समय तक रूकना चाहते हैं। अधिकतर अफसर-कर्मचारी नक्सल-हिंसा वाले, पिछड़े हुए बस्तर जाने से बचने के लिए मोटा खर्च करने के लिए भी तैयार रहते हैं, और पिछली रमन सरकार के सुरक्षा सलाहकार देश के सबसे चर्चित पुलिस अफसर केपीएस गिल ने एक औपचारिक इंटरव्यू में कहा भी था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस के छोटे कर्मचारी भी बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देते हैं। गिल उस समय छत्तीसगढ़ सरकार के सुरक्षा सलाहकार रह चुके थे, और उन्होंने खास बस्तर पर राय देने के लिए ही मेहनताने पर रखा गया था। आज भी ऐसी चर्चाएं आम रहती हैं। ऐसे में राज्य शासन को यह सोचना चाहिए कि क्या वह बस्तर और सरगुजा को मिलाकर आदिवासी क्षेत्र का एक ऐसा अमला बांट सकती है जो कि अधिक वेतन-भत्ते पाकर इन्हीं इलाकों में आखिरी तक काम करने के लिए तैयार हो? तबादले पर लोग वहां न जाएं, या जाते ही छुट्टी लेकर बैठ जाएं, या लौटने की फिराक में खर्च पर उतारू रहें, तो ऐसे लोगों से जनता की किसी सेवा की उम्मीद की नहीं जा सकती। प्रदेश में सबसे भ्रष्ट और कमाऊ माने जाने वाले आरटीओ दफ्तर के दुर्ग जिले के अफसर को बस्तर भेजा गया, तो उसने आनन-फानन नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसलिए बस्तर जैसे इलाके के लिए सरकार को परंपरागत तौर-तरीकों से अलग एक ऐसा काडर बनाना चाहिए जो कि अपनी मर्जी से वहां काम करने वाला हो। राज्य शासन के भीतर राजधानी में मंत्रालय की एक इमारत में काम करने के लिए कर्मचारियों का एक अलग काडर बना हुआ है, और वे कर्मचारी वहां से बाहर कहीं और नहीं भेजे जा सकते। इसलिए बस्तर-सरगुजा के लिए, या अकेले बस्तर के लिए एक काडर बनाना चाहिए ताकि सरकार हर बरस इसी बात से न जूझती रहे कि बरसों से बस्तर में फंसे लोगों को कैसे मैदानी इलाकों में तैनाती दी जाए, क्योंकि आज तो जब तक कोई एवजी वहां पहुंच न जाए, तब तक वहां तैनात अफसर-कर्मचारी को तबादले पर भी निकलने की इजाजत नहीं रहती। इस मुद्दे पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि बस्तर के धुर नक्सल इलाके में जंगल के बीच गांवों में एक ऐसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता 11 बरस से लगातार काम कर रही है जो खुद कैंसर से जूझ भी रही है, इलाज के लिए शहर जाना भी पड़ता है, लेकिन वह वहां डटी हुई है। 

दूसरी बात यह कि स्कूल-कॉलेज में दाखिलों का वक्त मई-जून में निकल चुका है। अब किसी के तबादले से उसका परिवार महीनों तक परेशान रहता है, या फीस और यूनिफॉर्म के नुकसान में रहता है, पढ़ाई का नुकसान झेलता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। सरकारी अमला इंसान है, और उसका परिवार भी है जिसके बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए शैक्षणिक सत्र शुरू होने के महीने-दो महीने पहले ट्रांसफर का काम खत्म हो चुका रहना चाहिए ताकि लोग नई जगहों पर जाकर वहां अपने बच्चों का दाखिला करवा सकें। तबादलों को महज राजनीतिक नाराजगी निकालने के लिए, या किसी को उपकृत करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले दुर्ग में कितनी स्कूलें सैकड़ों बच्चों के रहते हुए एक-एक शिक्षक की रह गई हैं, बाकी का या तो तबादला हो गया है, या उनकी तैनाती ही नहीं हुई है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए, और इसके लिए सरकार पारदर्शी तरीके से इंटरनेट पर यह डाल सकती है कि किस स्कूल-कॉलेज में कितने पद हैं, कितने भरे हुए हैं, और खाली पद कब से खाली हैं। यह बहुत आसान सा काम है, और इससे एक नजर में लोगों को पूरे प्रदेश का हाल दिख जाएगा। 
-सुनील कुमार


Date : 29-Aug-2019

2018 में पुणे के भीमा कोरेगांव सालगिरह के मौके पर हुई हिंसा के बाद उसे भड़काने के आरोप में या उस सिलसिले में देश में कई जगहों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनमें छत्तीसगढ़ की एक वकील और एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज भी शामिल थीं। इस मामले में आंदोलनकारियों के पीछे नक्सलियों-माओवादियों के होने का आरोप भी लगाया गया था। गिरफ्तार लोगों में से एक वर्नन गोंजाल्वेज की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कल बाम्बे हाईकोर्ट के एक जज ने उनसे सवाल किया कि उन्होंने वॉर एंड पीस नाम का लियो ताल्सतॉय का उपन्यास घर पर क्यों रखा था जो कि किसी दूसरे देश के युद्ध से संबंधित है। यह विश्व विख्यात उपन्यास पूरी दुनिया में बड़े सम्मान से देखा जाता है, और साहित्य की दुनिया की कोई भी लाइब्रेरी इसके बिना पूरी नहीं हो सकती। इसके नाम को लेकर मुकदमा दर्ज करने वाली पुलिस की बेवकूफी तो एक बार अनदेखी की जा सकती है कि वह साहित्य की समझ नहीं रखती, लेकिन सरकारी वकील से तो कम से कम साक्षर होने की उम्मीद की जाती है। और इन सबसे ऊपर हाईकोर्ट के जज की भारी ताकतवर कुर्सी पर बैठने वाले से ऐसी समझ की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह ताल्सतॉय के इस महान उपन्यास को राज्य के खिलाफ बगावत के मुकदमे में जब्त आपत्तिजनक सामग्री मानकर आरोपी से यह पूछेगा कि उसने यह किताब क्यों रखी थी? इसका एक सीधा सा जवाब अदालत के बाहर की दुनिया दे सकती है कि यह आदमी पढ़ा-लिखा था, उसे साहित्य की समझ थी, और अपने दिमाग का इस्तेमाल वह सोचने-समझने के लिए करता था, इसलिए विश्व के महान साहित्य को पढऩे का यह खतरनाक जुर्म कर बैठा था। दुनिया के इतिहास का यह पहला मौका होगा कि एक उपन्यास को रखने का जुर्म लोकतंत्र में राजद्रोह मान लिया जाए, और जज भी पुलिस की समझ को आगे बढ़ाते हुए साहित्य को रखने के जुर्म की वजह पूछने लगे। 

हिन्दुस्तान में वक्त कुछ अधिक ही खराब आ गया है। कल की एक खबर है कि पटना हाईकोर्ट के एक जज ने अपने एक फैसले में उसी हाईकोर्ट के जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिखा है, और अभी खबर आ रही है कि उस जज से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने काम छीनकर कमरे में बिठा दिया है। एक दूसरी खबर तीन दिनों से हवा में थी, और देश की राजधानी दिल्ली के पत्रकार उसके लिए आंदोलन भी कर रहे थे कि देश में मीडिया की आजादी और मीडिया से जनता की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए बनाई गई प्रेस काऊंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन, सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज ने कश्मीर में केन्द्र सरकार द्वारा मीडिया पर लगाई गई पाबंदी की हिमायत की है। देश के पत्रकारों और विचारकों ने जब इसके खिलाफ जमकर आवाज उठाई, तो प्रेस काऊंसिल ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दखल-याचिका में अपना रूख बदला। इसी दौरान कल ही सुप्रीम कोर्ट में जब कश्मीर पर बहुत सी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई चल रही थी, तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की अपील पर अदालत ने उन्हें अपनी पार्टी के एक भूतपूर्व विधायक और प्रमुख नेता की सेहत पूछने के लिए कश्मीर जाने की इजाजत दी, लेकिन साथ-साथ कहा कि वे वहां और कोई काम नहीं करेंगे। हैरानी इस बात की है कि जिस सुप्रीम कोर्ट को आज सरकार से यह जवाब-तलब करना था कि वह कश्मीर में ऐसी अंतहीन पाबंदियां क्यों लगा रही है, कब तक लगाए रखेगी? लेकिन अदालत मानो अपनी ओर से ही सरकार की लगाई बंदिशों को न्यायोचित मानते हुए देश के एक बहुत ही जिम्मेदार वामपंथी नेता को एक व्यक्ति से मिलने के अलावा बाकी कुछ भी करने के लिए मना कर रही है, मानो वह कश्मीर के राजभवन का एक विभाग हो। 

देश भर में जगह-जगह बहुत सी अदालतों में साम्प्रदायिक बयान सामने आ रहे हैं, तमिलनाडू के एक हाईकोर्ट जज ने ईसाई शैक्षणिक संस्थाओं के खिलाफ भयानक साम्प्रदायिक बयान अदालत में या फैसले में दिया है, और कहीं पर हिन्दू धर्म को स्थापित करने वाला फैसला उत्तर-पूर्व का एक हाईकोर्ट जज दे रहा है, तो कहीं कुछ और। यह देश के जागरूक और दिमागदार लोगों को सोचना है कि क्या इस देश की ऊंची अदालतें सरकार या सरकारों के विभागों की तरह काम करेंगी? एक प्रदेश में हाईकोर्ट का हाल ऐसा था कि सरकार की मर्जी के खिलाफ कोई फैसला नहीं होता था, और लोग व्यंग्य में उसे शासकीय उच्च न्यायालय कहने लगे थे। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले ही यह लिखा था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अपने रिटायरमेंट के बाद सरकारी पुनर्वास पाने के लिए सत्ता को सुहाते फैसले न दें, इसके लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि जज जिस-जिस राज्य में काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें कोई वृद्धावस्था पुनर्वास न दिया जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो सत्ता की मेहरबानी पाने के लिए देश के बहुत से जज अपनी अदालतों को शासकीय उच्च न्यायालय, या शासकीय सर्वोच्च न्यायालय साबित करने के लायक संदेह खड़े करते रहेंगे। फिलहाल पिछले दो-चार दिनों के भीतर के ये तमाम अदालती रूख देश के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बता रहे हैं कि विश्व का एक महानतम उपन्यास रखना लोकतंत्र में राजद्रोह समझा जा रहा है, और जज भी वैसा ही मानते हुए सवाल कर रहा है!
-सुनील कुमार


Date : 28-Aug-2019

स्वीडन की एक रिपोर्ट है कि वहां के नेताओं को सरकार की तरफ से न तो सरकारी कारें मिलतीं, न ही ड्राइवर मिलते, न ही उनके दफ्तर बहुत बड़े होते। हजार फीट से छोटे दफ्तर में वे काम करते हैं, और बस या ट्राम में सफर करते हैं। सिर्फ प्रधानमंत्री को एक कार मिलती है और वहां के नेताओं को आम नागरिकों की तरह ही मुकदमों का सामना करना पड़ता है उनके बचाव के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। स्वीडन प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 12वें नंबर पर है। इसका अंदाज लगाने के लिए यह भी समझ लेना ठीक है कि हिन्दुस्तान इस लिस्ट में 145वें नंबर है, बांग्लादेश से महज चार नंबर ऊपर। एक औसत हिन्दुस्तानी के मुकाबले एक स्वीडिश नागरिक की आय 25 गुना अधिक है। और ऐसे गरीब हिन्दुस्तान में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए नेता भी मानो दबी-कुचली जनता को पूरी तरह निचोड़कर अपने लिए ऐशोआराम जुटा लेना चाहते हैं। 

लेकिन स्वीडन अकेला ऐसा देश नहीं है जहां नेता सादगी से जीते हैं, और आम नागरिकों की तरह रहते हैं। हिन्दुस्तान के पड़ोस के भूटान को देखें तो प्रधानमंत्री साइकिल पर घूमते दिखते हैं, और योरप के बहुत से देशों में प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्री साइकिलों पर आते-जाते हैं। जिन अंग्रेजों की गुलामी से उबरकर हिन्दुस्तानियों ने आजादी पाई थी, उन अंग्रेज सांसदों और मंत्रियों को भी ऐसी शानोशौकत नहीं मिलती जैसी कि आज हिन्दुस्तानी नेता पाते हैं। नेता तो नेता हिन्दुस्तान में सत्ता पर बैठे हुए अफसर भी अधिक से अधिक सुविधा जुटा लेने को अपनी पहली जिम्मेदारी मानते हैं, और उसके बाद अगर वक्त बच जाए तो फिर सरकारी काम करते हैं। सरकार के तमाम नियम रहते हुए एक-एक अफसर के पास कई-कई सरकारी गाडिय़ां रहती हैं, और उनके बंगलों पर काफिला सा खड़ा दिखता है। नेता और अफसर एक-दूसरे की ऐसी निजी हसरतों की हिफाजत करते चलते हैं क्योंकि इसके लिए दोनों को एक-दूसरे के दस्तखतों की, इजाजत की, या कम से कम अनदेखी की जरूरत पड़ती है। लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार में गृहमंत्री के बंगले का एक बदनाम अदना सा अफसर टैक्सी का ऐसा इस्तेमाल करके उसका भुगतान कर रहा था जिसमें एक दिन में वह गाड़ी हजारों किलोमीटर चलना बताई गई थी। यह बात अपने आपमें जाहिर है कि जो लोग ऐसा बेजा इस्तेमाल करते हैं, वे बुनियादी रूप से भ्रष्ट भी रहते हैं, और जनता के पैसों का नुकसान तो होता ही है, सरकार की कमाई को घटाकर भी ये अपनी कमाई बढ़ाने की साजिश करते रहते हैं। 

पिछली रमन सरकार के वक्त जब नया रायपुर में बहुत बड़े-बड़े दफ्तर बनाए जा रहे थे, बहुत बड़े-बड़े बंगलों की योजना बनाई जा रही थी तब भी हमने इस बात को लिखा था कि इस सरकार के हाथ में यह अनोखा मौका है कि वह किफायत बरतकर हमेशा के लिए प्रदेश का खर्च घटाए। हमने यह सुझाव भी दिया था कि मंत्रालय जैसे बड़े मंत्रियों-अफसरों के दफ्तरों की जगह पर सबके कमरे छोटे बनाए जाएं, और हर मंजिल पर कई तरह के मीटिंग-कमरे बना दिए जाएं जिन्हें कि अधिक लोगों से मिलने के लिए खोला जा सके, इससे निर्माण की लागत भी घटेगी, और बाद में बिजली का भारी-भरकम खर्च भी घटेगा। लेकिन सरकार की सोच ऐसी रहती है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से पूरा करने के बजाय अपने घर-दफ्तर को बेहतर बनाने को प्रदेश का सम्मान मान लेती है, प्रदेश की जनता का सम्मान भी मान लेती है जिसका पेट काटकर यह शान-शौकत होती है। 

पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में जिस तरह सरकारी अफसरों ने कहीं सरकारी बंगले में स्वीमिंग पूल बनवाया, तो कहीं राजधानी के अपने दफ्तर में लाखों का झूला लगवा लिया, दस-दस, बीस-बीस लाख रूपए के सोफा लगवा लिए, और बंगलों पर करोड़ों रूपए अघोषित खर्च करवा लिया, उस पर एक बड़ी जांच होनी चाहिए, और उसकी भरपाई ऐसे नेताओं और अफसरों से होनी चाहिए। कहने के लिए तो यह ऐसा गरीब प्रदेश है जिसमें करीब आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और जो रियायती चावल की वजह से दो वक्त खा पाती है। दूसरी तरफ ऐसी गरीब आबादी के बीच सामंती और राजसी ऐशोआराम के टापू बनाकर नेता और अफसर रहते हैं, जो कि पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, पूरी तरह गैरकानूनी भी है। 
-सुनील कुमार


Date : 27-Aug-2019

देश के पहले योगीराज में जुर्म उसी रफ्तार से रिकॉर्ड तोड़ रहा है जिस रफ्तार से विराट कोहली। अब तक किसी और राज्य में कोई योगी मुख्यमंत्री हुआ नहीं था, और उत्तरप्रदेश से तो सीएम ने केरल को नसीहत दी थी कि वह राज चलाने का तरीका यहां सीखकर जाए। ऐसे उत्तरप्रदेश में ताजा भीड़-हिंसा बच्चा चुराने की अफवाह को लेकर है जो कि जगह-जगह हो रही है। यह अफवाह झारखंड और बिहार से होते हुए अब उत्तरप्रदेश में पूरी रफ्तार से पहुंची है। पिछले राज्यों में इस अफवाह के चलते गरीबों और अल्पसंख्यकों को, विक्षिप्त या मानसिक विचलित लोगों को, कमजोर और बेसहारा लोगों को मारा गया था। भीड़-हिंसा अकसर कमजोर लोगों के साथ ही होती है और अमूमन भीड़ के हत्यारे अदालतों से बच निकलते हैं। ऐसे में जाहिर है कि देश की सोच अगर अंधविश्वास पर टिकी हुई हो, तो भीड़ का विश्वास जुटाना बड़ा आसान हो जाता है। 

दो घटनाओं का अगर जाहिर तौर पर एक-दूसरे से रिश्ता दिखता नहीं, तो उनका रिश्ता न हो ऐेसा भी नहीं रहता। अब हिंदुस्तान में इंसानों की जातियों के पीछे की बुनियाद में कौन सा देशी या विदेशी डीएनए है इसकी बात अगर खुलासे से की जाए, तो देश में दंगा होने से रोका नहीं जा सकेगा। जब लोग झूठ और अंधविश्वास पर भरोसा करने को देशप्रेम और देशभक्ति से जोड़ लेते हैं, और जब तर्कसंगत या न्यायपूर्ण बात देश के साथ गद्दारी मान ली जाए, तो ऐसी उपजाऊ जमीन पर अंधविश्वास-आधारित हिंसा की फसल लहलहाने लगती है। आज देश में सोचे-समझे तरीके से एक साजिश के तहत जनता की वैज्ञानिक सोच को खत्म किया जा रहा है ताकि वे कई सदी पहले के, या कई हजार बरस पहले के एक नामौजूद इतिहास पर भरोसा कर सकें, उस पर गर्व कर सकें। ऐसे माहौल में गोबर और गोमूत्र को लेकर अंधविश्वास फैलाया जा रहा है, और दुनिया के हर विज्ञान की खोज हिंदुस्तान के पौराणिक काल में होने का भरोसा लोगों को दिलाया जा रहा है। जब वैज्ञानिक सोच की इस अंदाज में भीड़त्या की जा रही है, तो उसके मालिक लहूलुहान इंसान भला क्या खाकर, कब तक अंधविश्वासों और अफवाहों के गुलाम होने से बच सकेंगे? नतीजा यह है कि हजारों बरस पहले हिंदुस्तानी समाज में जो गरीब, विकलांग, महिलाएं, बूढ़े और बीमार, विक्षिप्त और विचलित तिरस्कार के लायक माने जाते थे, वे आज मारे जा रहे हैं। भीड़ ने इनमें आज के माहौल में कमजोर हो चुके अल्पसंख्यकों को भी जोड़ लिया है, और दलित-आदिवासी तो हमेशा से ही कमजोर रहे ही हैं। ऐसे में चाहे बच्चा चोरी की अफवाह हो, चाहे किसी धर्म में पवित्र या अपवित्र माने जाने वाले जानवर को मारकर किसी जगह पर फेंकने की बात हो, या गाय को कसाईखाने ले जाने की बात हो, गोमांस रखने की बात हो, इनमें से किसी भी किस्म की अफवाह को छांटकर या गढ़कर, उसे वॉट्सऐप जैसे नए भोंपुओं से चारों तरफ फैलाकर किसी भी किस्म की हिंसा फैलाई जा सकती है, फैलाई जा रही है।

जब देश की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर सत्तारूढ़ पार्टी की सांसद साध्वी प्रज्ञा अपनी पार्टी के लंबे समय से बीमार चल रहे नेताओं के गुजरने पर उन मौतों की तोहमत विपक्ष पर लगाती हैं कि मारक शक्ति का प्रयोग करके भाजपा नेताओं को मारा जा रहा है, तो जाहिर है कि देश में अंधविश्वास तो बढ़ेगा ही। लोगों को याद होगा कि इन्हीं साध्वी प्रज्ञा ने पाकिस्तानी आतंकी हमलावरों का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले पुलिस अफसर के लिए कहा था- ''मैंने हेमंत करकरे से कहा था कि तुमने मुझे इतनी यातनाएं दीं कि तेरा सर्वनाश होगा। गिरफ्तारी के ठीक सवा महीने बाद आतंकियों ने उनका अंत कर दिया। मैंने कहा तेरा सर्वनाश होगा। ठीक सवा महीने में सूतक लगता है। जब किसी के यहां मृत्यु होती है या जन्म होता है। जिस दिन मैं गई थी उस दिन इसके सूतक लग गया था। ठीक सवा महीने में जिस दिन इसको आतंकवादियों ने मारा उस दिन सूतक का अंत हो गया।''

इस देश में इसके बाद ज्ञान और विज्ञान की क्या जरूरत है? हिंदुस्तानी फौजों को भी मारक मंत्र सीखना चाहिए ताकि चीन-पाकिस्तान को उसी से मार सकें, और हथियारों पर मोटा खर्च बंद हो। ऐसा हो जाने पर अभी हिंदुस्तानी सरकारी हथियार कारखानों में चली हड़ताल तुड़वाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, और सरकार का खासा खर्च बचेगा।
-सुनील कुमार