संपादकीय

07-May-2020

अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें 
मजदूर कानून स्थगित रखने 
की तैयारी कर रही हैं ?

आन्ध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में एक केमिकल-कारखाने से मुंहअंधेरे जहरीली गैस रिसी, और आठ लोगों की मौत की खबर है, और हजारों इससे प्रभावित हुए हैं। दुनिया के सबसे बुरे औद्योगिक हादसे, भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने की याद ऐसे मौके पर आती ही है जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, और लाखों की जिंदगी तबाह हो गई थी। चौथाई सदी गुजर जाने पर भी भोपाल उसके जख्मों से उबर नहीं पाया है। वह गैस हादसा भी इसी तरह स्टोर की गई गैस में हुआ था, और इसी तरह सुबह के मुंहअंधेरे हुआ था। 

कल से लेकर आज तक देश के मजदूरों और कारखानों की ही चर्चा हो रही है, और कल इसी जगह हमने देश के कई उद्योगपतियों, और कई उद्योग संगठनों की बात भी लिखी थी जो कि यह सोचते हैं कि लॉकडाऊन के इस दौर में खाली बैठे मजदूर अपने गांव भी न जाएं, और कारखाने-काम शुरू होने का इंतजार करें। दूसरी तरफ मालिकों से किसी तरह की मदद न मिलने पर, जान पर खतरा, जेब खाली, सिर पर अनिश्चितता के चलते मजदूर राह में मरते हुए भी पैदल आगे बढ़ते जा रहे हैं, बचे हुए जिंदा मजदूर। ऐसे में मजदूरों के हक, काम की उनकी गारंटी की बात भी करना जरूरी है। एक खबर यह आ रही है कि भारत के कुछ राज्य मजदूर कानूनों में अगले तीन साल के लिए ढील देने जा रहे हैं ताकि कारखानों के बंद होने की नौबत न आए, और नए कारखाने शुरू करने में लोगों की दिलचस्पी रहे। यह बात कई देशों के सिलसिले में पहले भी हुई है कि किस तरह चीन में मजदूर कानूनों को खत्म करके वहां पर उत्पादन बढ़ाया गया है, और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। हिन्दुस्तान में अभी दो-चार दिन पहले ही देश के एक सबसे अच्छे समझे जाने वाले उद्योगपति, नारायण मूर्ति का यह बयान सामने आया था कि लोगों को दस घंटे रोज काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस बात के लिए मजदूरों के बहुत से हिमायती लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना भी की थी, और कल से अब तक कर्नाटक के भवन निर्माताओं की आलोचना चल ही रही है कि उन्होंने किस तरह राज्य सरकार पर दबाव डालकर मजदूरों की वापिसी की रेलगाडिय़ां रद्द करवाईं ताकि लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होने पर निर्माण मजदूर उपलब्ध रहें। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि उत्तरप्रदेश मंत्रिमंडल ने अगले तीन बरस के लिए बहुत से मजदूर कानून स्थगित कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी अधिक पुख्ता जानकारी आई नहीं है कि यह खबर सच है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश को लेकर एक पुख्ता अखबार की जानकारी है कि वहां ऐसी तैयारी चल रही है कि औद्योगिक मजदूरों को लेकर बहुत से कानूनों को स्थगित किया जा सकता है ताकि नए उद्योग वहां आएं। बिहार को लेकर यह बात चल रही है कि आज वहां पर जितनी जनता काम के उम्र की है, उसे भी काम नसीब नहीं है, और इसीलिए लोग बाहर जाते हैं। अब बिहार के सामने यह दिक्कत है कि वहां से बाहर गए 17 लाख मजदूर लौटते हैं, तो वे इस पहले से बेरोजगार चल रहे राज्य में काम क्या करेंगे? और दूसरे प्रदेशों में काम करते हुए वे घर पर जो मजदूरी भेजते थे, उसके बंद होने से बिहार का क्या होगा?

कोरोना के आने के पहले से ही बाजार की मंदी भयानक थी। हिन्दुस्तानी कारखानों और कारोबारों में से शायद ही कोई चैन से दिन गुजार रहे थे। ऐसे में कोरोना इन दो महीनों का धंधा तो खत्म कर ही चुका है, यह बात तय है कि आज ही कोरोना चल बसे, तो भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में चार-छह महीने और लगेंगे ही। आज तो हाल यह दिखता है कि हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था की पटरी भी लोग बेचकर खा चुके हैं, और पटरी भी फिर से बिछानी पड़ेगी। लेकिन यह हालत सिर्फ सरकारों की हो ऐसा भी नहीं है। यह हालत हर कारोबार की भी है। देश के जाने कितने ही टीवी चैनल अपने लोगों को निकाल चुके हैं, बहुत से अखबारों ने छपना बंद कर दिया है, और सिर्फ डिजिटल संस्करण पर आ गए हैं। कल सुबह का टाईम्स ऑफ इंडिया कुल 8 पेज का था, जबकि साल में बहुत से दिन इस अखबार के आठ पेज पलटने के बाद तो इश्तहार खत्म होते थे। यह हाल सभी का है। केन्द्र सरकार की तरफ से यह आदेश जरूर निकाल दिया गया कि कोई मालिक तनख्वाह न काटे, राज्य सरकारों ने आदेश निकाल दिया कि कोई स्कूल फीस न मांगे। अब सवाल यह है कि फीस न लें, तो शिक्षकों को तनख्वाह कहां से दें? इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि मजदूर कानून, और नौकरी की सेवा शर्तों से परे जाकर केन्द्र सरकार का फतवा कोई मायने नहीं रखता है, और सरकार किसी को जबर्दस्ती तनख्वाह नहीं दिला सकती। 

अब देश में ऐसे हाल में जब उद्योग-धंधों का एक बड़ा हिस्सा शुरू नहीं होने जा रहा है, उस वक्त कोई सरकार अगर यह सोच रही है कि मजदूर कानूनों को निलंबित रखकर किसी तरह काम-धंधों को शुरू होने दिया जाए, तो एक सरकार के रूप में उसका यह सोचना हमें नाजायज नहीं लगता है। हिन्दुस्तान में एक सदी लड़ते-लड़ते मजदूरों को हक मिले थे, लेकिन ये तमाम हक तभी तक मायने रखते हैं, जब तक उनके साथ-साथ मजदूरी या तनख्वाह भी मिलते रहे। नौकरी ही छूट जाए, काम ही बंद हो जाए, तो मजदूर कानूनों से पेट भरने वाला नहीं है। हमारी यह बात मजदूर विरोधी लग सकती है, लेकिन अगर आज कड़ाई से मजदूर कानूनों को लागू करवाया जाए तो बहुत ही कम काम-धंधे शुरू हो पाएंगे। देश में कई किस्म के काम के लिए केन्द्र सरकार द्वारा तय किए गए वेतनमान आज भी मालिक के हिसाब से व्यवहारिक नहीं हैं, और वे जमीन पर अधिकतर संस्थानों में लागू भी नहीं होते हैं, जिनमें अखबारों को लेकर बनाया गया वेतनमान भी शामिल है। इसी तरह दूसरे कारोबार भी देश की अर्थव्यवस्था के चलते मजदूर कानूनों का बोझ उठाना मुश्किल पा रहे हैं। ऐसे में सरकार में बैठा तबका जरूर यह सोच सकता है कि काम-धंधे चलें तो ही मजदूर-कामगार को काम मिलेगा, और सरकार को टैक्स मिलेगा। आज कोरोना के पहले की बदहाली में कोरोना के बाद की बर्बादी ने जुड़कर हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे फटेहाल में पहुंचा दिया है कि मजदूर कानून और रोजगार के बीच आपस में एक टकराव दिखने लगा है। यह नौबत मजदूरों के हित के खिलाफ है, लेकिन यह नौबत मालिकों के काबू के बाहर की भी है। अब आने वाला वक्त कौन से कानून, कौन से अधिकार, और कौन से रोजगार की जगह लेकर आता है, यह बताना अभी मुश्किल है क्योंकि अभी कोरोना का खतरा पूरी तरह से सामने आना भी बाकी है। अभी हो सकता है कि आने वाले महीने सरकार और कारोबार दोनों के लिए इससे भी अधिक चुनौती के रहेंगे, और सब कुछ इन दोनों के काबू के बाहर भी रहेगा। 

हमने मजदूरों-कामगारों, और हुनरमंद स्वरोजगारियों, सभी के लिए पिछले दिनों यह लिखा था कि लॉकडाऊन के दौरान उनको अपने हुनर को बेहतर बनाना चाहिए, कोई बेहतर हुनर सीखना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त किसी भी धंधे का मैनेजमेंट एक कसाई की तरह यह देखेगा कि किस कर्मचारी से उसका कितना काम निकलता है। जिंदा रहने के लिए हर किसी को अपने आज से बेहतर होकर चलना होगा, अधिक मेहनत करनी होगी, वरना गुजारा बहुत ही मुश्किल रहेगा। जिस तरह लोगों को अपने घर के भीतर के खर्च भी घटाने होंगे, सीमित साधन-सुविधाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना होगा, कुछ वैसा ही कारोबार का मैनेजमेंट भी करने पर मजबूर होगा। सारे कानून धरे रह जाएंगे अगर मैनेजमेंट अपने कमजोर कर्मचारियों को हटाने पर उतारू हो जाएगा। हिन्दुस्तान में करोड़ों कर्मचारी बिना किसी औपचारिक कागजात के काम करते हैं जिनको कभी भी हटा दिया जाता है, कभी भी हटाया जा सकता है। ऐसे में मजदूर-अदालतें सरकारी अधिकारी ही चलाते हैं, और सरकार का रूख किसी भी तरह धंधे को जारी रखने का होगा। जब तक कर्मचारी संगठन अदालतों तक जाकर मजदूर कानूनों पर कड़ी अमल के आदेश लाकर उन पर अमल करवाएं, तब तक करोड़ों लोगों के भूखे मरने की नौबत आ सकती है। इसलिए आने वाले महीनों के लिए ही तमाम कामगार-कर्मचारी अपने आपको महत्वपूर्ण साबित करने के लिए तैयारी करें, क्योंकि आने वाला वक्त कम संख्या में अधिक काम करने वाले लोगों का रहेगा, वैसे ही लोगों को काम मिलेगा, वैसे ही लोग अपने स्तर पर जिंदा रह पाएंगे। यह वक्त तमाम गैरसरकारी वेतनभोगियों के लिए बहुत ही खतरे का है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होगा, नौकरियां जाने लगेंगी। सभी लोग कमर कसकर तैयार रहें। 
-सुनील कुमार


06-May-2020

मजदूरों की गांव वापिसी न हो 
सके, क्या यह साजिश थी?

देश के कुछ प्रदेशों से उद्योग संगठनों की यह खुली मांग सार्वजनिक मंचों पर सामने आ रही है कि अगर औद्योगिक क्षेत्रों और महानगरों को छोड़कर मजदूर अपने गांव लौट जाएंगे तो कारखाने शुरू नहीं हो पाएंगे। यह बात महीने भर से हवा में तैर रही थी कि जब लॉकडाऊन किया गया तो दूसरे प्रदेशों में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों और कामगारों के लौटने का बहुत आसान-मुमकिन इंतजाम इसीलिए रोक दिया गया था कि जल्द ही लॉकडाऊन उठने की नौबत आ जाएगी तो कारखाने और कारोबार मजदूर और कामगार कहां से लाएंगे। कुछ लोगों का तो यह भी मानना रहा कि लॉकडाऊन की घोषणा के चार घंटे के भीतर देश भर की ट्रेन-बस, और बाकी तमाम गाडिय़ों को इसीलिए बंद कर दिया गया था कि मजदूर वापिस न जा सकें, और धंधे शुरू होने पर मालिकों को हासिल रहें। हमने ऐसी आशंका पर पहले इसलिए नहीं लिखा था कि उसका कोई सुबूत नहीं था। लेकिन अब जब एक-एक करके कई उद्योगपति या औद्योगिक संगठन यह फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और इस हद तक ट्वीट भी कर रहे हैं कि मानो मजदूर नमकहराम थे, और जब तक काम रहा किया, और फिर निकल गए। ऐसे में यह बात सोचने को हम मजबूर होते हैं कि क्या लॉकडाऊन के फैसले के चार दिन पहले पूरे देश की रेलगाडिय़ों और बसों को मजदूरों को उनके प्रदेश वापिस पहुंचाने में झोंका नहीं जा सकता था? और क्यों नहीं झोंका जा सकता था? आज जब एक-एक मजदूर-स्पेशल ट्रेन के लिए तमाम इंतजाम करने पड़ रहे हैं, तो लॉकडाऊन के पहले के चार दिनों में जब हिन्दुस्तानी रेलगाडिय़ां हर दिन ढाई करोड़ से अधिक मुसाफिरों को हर दिन ढो रही थीं, तो चार दिनों में हर मजदूर अपने घर पहुंच गए होते, बजाय महीने भर से अधिक के पैदल सफर के, और सड़क पर जान देने के। 

कल ही कर्नाटक की यह खबर आई थी कि वहां बिल्डर्स की मांग पर कर्नाटक सरकार ने मजदूरों के वापिस जाने के लिए तय की गई रेलगाडिय़ां रद्द कर दीं ताकि काम शुरू होने पर भवन निर्माताओं को मजदूर हासिल रहें। जो उद्योगपति आज मजदूरों को कोस रहे हैं, उन्हें अपने दिल से पूछना चाहिए कि अगर ऐसी मुसीबत के बीच उन्होंने अपने बड़े-बड़े अहातों में, इमारतों में, या आसपास की किसी और जगह पर अपने मजदूरों को ठहराकर उनका साथ दिया होता, तो क्या वे सचमुच ही महीने भर के पैदल सफर पर निकले होते? जब मालिक या रोजगारदाता साथ छोड़ देते हैं, तभी मजदूर और कामगार जिंदगी और मौत के बीच के ऐसे मुश्किल सफर पर निकलने को बेबस होते हैं। उनके बदन पर मालिकों की तरह अतिरिक्त चर्बी नहीं होती कि जिसे छांटने को उन्हें इस तरह पैदल चलना पड़े। और उन्हें धोखेबाज करार देने के पहले मालिकों को यह सोचना चाहिए कि जिन मजदूरों के चलते उनके कारखाने और कारोबार चल रहे थे, उनको ऐसा भूखा और बेबस बनाकर क्यों निकाल दिया था? क्या वे यह उम्मीद करते थे कि मजदूर चालीस दिनों के लॉकआऊट को बिना खाना खाए निकाल देंगे? आज उनकी यह फिक्र जायज है कि मजदूर अगर गांव पहुंच गए तो शायद वे जल्द वापिस शहरी कारखानों तक नहीं लौटेंगे। और लौटेंगे भी क्यों? आने वाले खेती के महीनों में उन्हें कुछ तो रोजगार खेतों में मिल जाएगा, और कुछ तो छत्तीसगढ़ जैसे कामयाब राज्य मनरेगा जैसी रोजगार योजना में रिकॉर्ड रोजगार देकर उन्हें उनका हक दे रहे हैं। कारखानेदार थोड़े समझदार तो थे जो उन्होंने सोचा था कि मजदूरों की गांव वापिसी को रोक दिया जाए, तो वे वहीं बेसहारा पड़े हुए जैसे ही काम शुरू होगा, काम पर आ ही जाएंगे। अगर इस नीयत से भी ट्रेन और सड़क की तमाम गाडिय़ों को बंद किया गया था, तो भी हिन्दुस्तानी गरीब ने, मेहनतकश मजदूर ने यह साबित कर दिखाया कि उसके पैरों में इतना दम है, इरादों में ऐसे पंख लगे हैं कि वह जान भी गंवाते हुए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल जा सकते हैं, अपने घर के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को उठाकर भी ले जा सकते हैं। पसीने ने पूंजी की तमाम साजिशों को नाकामयाब करके दिखा दिया। आज अगर कोई यह सोचे कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मजदूरों को कारखाने लौटना चाहिए, तो उनकी मुसीबत के वक्त दगाबाज साबित हो चुके पूंजीवाद पर अहसान करने के लिए उनके पास और पसीना भी बाकी नहीं है। हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था मजदूर को पुर्जे की तरह आखिरी दम तक इस्तेमाल करके उसे फेंक देने की सोच के साथ अगर चल रही है, तो उसे पुर्जों से किसी वफादारी की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। पुर्जे तो पुर्जे ही होते हैं, वे क्या वफादार होंगे, और वे क्या बेईमान होंगे। यह लिखते हुए हमें पिछले दिनों छापे हुए एक कार्टून की याद आती है जिसमें शतरंज की एक बिसात मुड़कर एक छत की तरह बारिश को रोक रही है, और महज प्यादों को खुली बारिश में छोड़ दिया गया है, तमाम राजा-रानी-वजीर उस छत के नीचे महफूज हैं। इस बार का लॉकडाऊन कुछ वैसा ही था और राजा-रानी-वजीर के पास तो चालीस दिन जिंदा रहने का इंतजाम था, प्यादों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। अब प्यादों को वफादारी का तकाजा गिनाया जा रहा है। पिछले बरसों में गरीबों और मजदूरों ने यह देखा है कि उनके खाते में अगर कुछ रकम थी, तो भी वह नोटबंदी के दौरान अपने इलाज के काम भी नहीं आ सकती थी। उनके पास पुराने नोट अगर कहीं दबे हुए थे, तो उनकी वह मेहनत भी मानो दफन हो गई थी। इस बार उन्होंने लॉकडाऊन की बेरहमी देखी है, और जाहिर है कि अगर मालिकों ने ही उनका साथ दिया होता तो वे चिलचिलाती धूप में जलती सड़कों पर दुधमुंहे बच्चों से लेकर चलने में अशक्त बुजुर्गों तक को ढोकर ऐसे अंतहीन सफर पर क्यों निकले होते? 

हिन्दुस्तानी मजदूर के सामने एक बात साफ है, मुसीबत के वक्त मालिक और सरकार के मुकाबले हो सकता है कि कोरोना उसके काम आ जाए। ऐसे तजुर्बे वाले मजदूर से देश की अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए खुद मर जाने की उम्मीद करना एक ज्यादती भी होगी, और उसकी समझ को कम आंकना भी होगा। हो सकता है कि हिन्दुस्तान की आज की तथाकथित अर्थव्यवस्था आने वाले वक्त में एक नई शक्ल ले जब गांव लौटे हुए मजदूर गांव में ही रोजगार की सोचें, वहीं पर कोई काम करने की सोचें। यह गांव की गांव की तरफ वापिसी का एक वक्त भी हो सकता है, और कोई भी समझदार राज्य सरकार इस मौके को इस्तेमाल भी कर सकती है। शहरों से हुनरमंद मजदूर और कारीगर लौट रहे हैं, और गांवों में कुटीर उद्योग लगाने और बढ़ाने का यह एक बड़ा मौका साबित हो सकता है। 

फिलहाल कारखानेदार और उनके संगठन आज जब मजदूरों को बिना शब्दों के इस्तेमाल के दगाबाज और नमकहराम साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो वे मजदूरों के साथ अपने संबंधों की हकीकत को सामने रख रहे हैं, और साबित कर रहे हैं कि वे कितने बुरे मालिक थे। ऐसी जुबानी कड़वाहट से परे रहते लोगों को वक्त रहते अपने मजदूरों का साथ देना था, जो कि उन्होंने नहीं दिया। 
-सुनील कुमार


05-May-2020

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, 
और योगी से कम्युनिस्ट तक, 
जाम टकराने में सब शामिल

केन्द्र सरकार ने लॉकडाऊन खोलने के लिए तमाम प्रदेशों को जो गाईडलाईन दी उसके मुताबिक हर प्रदेश में शराब बिकना शुरू हो गई। जिन राज्यों में पहले से शराबबंदी है, वहां जरूर इसकी बिक्री शुरू नहीं हुई हो, लेकिन बाकी राज्य मानो एक पैर पर खड़े हुए थे कि कब और कैसे बिक्री शुरू की जाए। जब केन्द्र सरकार ने ही रास्ता खोल दिया, तो एक नंबर और दो नंबर, दोनों किस्म की कमाई का एक बड़ा जरिया कौन सी राज्य सरकार छोड़ सकती थी? और आज तो तमाम किस्म के कारोबार बंद पड़े हुए हैं, कोरोना से मुकाबले के लिए खर्च से लेकर मजदूरों पर हो रहे खर्च तक, सारे अभूतपूर्व खर्च हो रहे हैं। ऐसे में सरकारें सरकारी कमाई के लिए, सत्तारूढ़ संगठन के लिए, और सत्तारूढ़ नेता-अफसर-दारू कारखानेदार सबकी कमाई के लिए इस धंधे को शुरू करने पर आमादा थीं। जिन लोगों को छत्तीसगढ़ में यह धंधा खटक रहा है, उनको यह देख लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान में किस राज्य ने सबसे पहले शराब कारखानों को लॉकडाऊन के बीच भी उत्पादन शुरू करने का आदेश दिया था। उत्तरप्रदेश के एक योगी मुख्यमंत्री ने सबसे पहले लॉकडाऊन के बीच ही शराब उत्पादन शुरू कराया, और लॉकडाऊन में ढील के पहले घंटे से ही शराब बेचना शुरू भी कर दिया। भगवान राम के जन्मस्थली वाले, और अनगिनत तीर्थों वाले उत्तरप्रदेश में देवी-देवताओं को पता नहीं ऐसी शराबी बेसब्री का कितना बुरा लग रहा होगा। 

हमारा ख्याल है कि दारू के धंधे से होने वाली कई किस्म की वैध और अवैध कमाई से देश के तमाम प्रदेश इस तरह परिचित हैं कि यह भ्रष्टाचार आरटीओ की तरह का एक खुला भ्रष्टाचार है, और देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो जिसे अपनी सरकार के चलते ऐसी कमाई से परहेज रहता हो। इसलिए उत्तरप्रदेश हो, या छत्तीसगढ़, या ममता का बंगाल, कल दारू की पहली बोतल बिकने के भी पहले के जो नजारे सामने आए, उन्होंने एक बात साफ कर दी कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है, और हमारी अनेकता में एकता दारू में ही सबसे अधिक है। इसने यह बात भी साफ कर दी कि चालीस दिनों का सूखा भी लोगों की हसरत को जरा भी कम नहीं कर पाया था, और एकाएक शराबबंदी से होने वाले मनोवैज्ञानिक नुकसान को भी हिन्दुस्तानी दारूखोरों ने बड़े अच्छे से झेल लिया और अपने आपको पहली बिक्री की कतार के लिए तैयार रखा। लेकिन पूरे देश में ही इन चालीस दिनों में गैरकानूनी या अघोषित शराब उसी तरह बिकती रही जिस तरह गुजरात में हमेशा से चली आ रही स्थाई शराबबंदी के दौरान शराब बिकती है, जिस तरह बिहार में नीतीश बाबू के सुशासन में शराब बिकती ही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी शराबबंदी के चुनावी वायदे के साथ सत्ता पर आई थी, लेकिन किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी की तरह अब इस वायदे के लिए भी उसका रूख यही है कि इसे सोच-समझकर किया जाएगा, और वायदे पांच साल में पूरे करने के होते हैं जिसके करीब चार साल अभी बाकी हैं। 

लेकिन सरकार और राजनीतिक दलों के दारूप्रेम को छोड़ दें, और आज कोरोना के खतरे के बीच दारू से जुड़ गए अतिरिक्त खतरों को देखें तो भयानक नजारा सामने आ रहा है। छत्तीसगढ़ से कई गुना अधिक धक्का-मुक्की के कुछ ऐसे वीडियो बंगाल और दक्षिण भारत के सामने आए हैं कि जिन्हें देखकर लगता है कि कल कोरोना ने कोई काम नहीं किया होगा, और महीनों के बाद पूरी तरह छुट्टी मनाई होगी क्योंकि कल उसके हिस्से का काम दारू कर रही थी। पिछले चालीस दिनों में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक ने, और फिल्मी कलाकारों से लेकर खिलाडिय़ों तक ने लोगों को शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए जितना कुछ कहा था, वह कल दारू की पहली धार ने बहा दिया, और नशेड़ी-नशेड़ी भाई-भाई का स्थगित चला आ रहा रिश्ता फिर से मजबूती से कायम कर लिया। पूरे देश ने कल जिस तरह कमजोर शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता वाले शराबियों की जो धक्का-मुक्की देखी है, वह अभूतपूर्व रही, और इस देश में गांधी-नेहरू, या इंदिरा-राजीव के अंतिम संस्कार के बाद शायद ही कभी ऐसी धक्का-मुक्की देखी हो। नतीजा यह हुआ कि चालीस दिनों से देश जिस सावधानी पर चल रहा था, वह कुछ घंटों में ही चल बसी, और कल हिन्दुस्तानियों ने दस-बीस करोड़ तक लोगों को एक-दूसरे का कई किस्म का संक्रमण लिया-दिया होगा, और उसमें कोरोना कितना रहा होगा यह पता नहीं। पूरे देश में कम से कम दस अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों की राज्य सरकारें हैं, लेकिन एक भी सरकार दारू की घोषित या अघोषित कमाई के खिलाफ नहीं है, और न ही गठबंधनों वाली  केन्द्र सरकार ही इसके खिलाफ है। जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी एक मर्जी के देश पर तमाम किस्म की बंदिशें पल भर की सूचना पर लाद देते हैं, जहां पर वे चाहते तो दारू की बिक्री शुरू करने की बात न लिखवाते, और कम से कम कोरोना के फैलने की रफ्तार कुछ धीमी हुई होती। लेकिन केन्द्र सरकार ने जब दारू शुरू करने की बात लिख दी, जब एकदम खालिस भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके पहले से ही औपचारिक तैयारी शुरू कर दी थी, तो फिर बाकी राज्य भला क्यों पीछे रहते। 

लॉकडाऊन खुलने से देश के कारोबार को आगे बढऩे का, फिर से शुरू होने का एक मौका मिलता, और मरे पड़े धंधे कामों पर उठ खड़े होने की शुरूआत करते। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने बिना किसी मतभेद के, सर्वसम्मति से अगर कोई धंधा देश में सबसे पहले शुरू होने दिया, सबसे पहले शुरू किया तो वह सबसे बड़ी काली कमाई वाला दारू का सरकारी धंधा ही था। अभी सड़क किनारे पंक्चर बनाने वाले का कारोबार भी शुरू नहीं हुआ था कि देश की सरकारों ने हरेक ने एक दिन में करोड़ों-अरबों का काम कर लिया। भूखे बेरोजगार कारोबार यह देख ही रहा है कि सरकार सबसे चतुर और एकाधिकारवादी कारोबारी है, और सबसे पहले जनता को लूटने का धंधा उसने भारी उत्साह के साथ शुरू कर दिया है। अब जब दारू बिकना एक हकीकत हो ही गई है, तो नशे में लोगों के नाली में छह-छह फीट की दूरी पर गिरने का नियम तो लागू नहीं किया जा सकता, दारू दुकानों पर से भीड़ घटाने के लिए उन्हें अधिक घंटे खोला जाना चाहिए, अधिक दुकानें खोल देनी चाहिए, और जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने दारू पर 70 फीसदी कोरोना-टैक्स लगाया है, बाकी राज्यों को भी शराब को ऐसा ही महंगा कर देना चाहिए, ताकि जो दारू पर खर्च से अपना सत्यानाश कर रहे हैं, वे हिन्दुस्तानी मुहावरे के मुताबिक सवा सत्यानाश करें। जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश। और इस अतिरिक्त कमाई को सरकार केजरीवाल की तरह कोरोना से लडऩे के लिए इस्तेमाल करे। हमारा साफ मानना है कि दारू से सरकार को जितनी कमाई होती है, उससे कहीं अधिक उसको जनता की दवा पर खर्च करना पड़ता है, उन दवाओं पर जो कि दारू से जुड़ी होती है। लेकिन जब हिन्दुस्तान के देवताओं को सोमरस पसंद है, जब बहुत से देवताओं को दारू चढ़ती है, तो दारूखोरों और सरकारों के दिमाग से हम दारू कैसे उतार सकते हैं? इस मौके पर साफ-साफ यह न लिखना जिम्मेदारी से मुंह चुराना होगा कि कोरोना से तो यह देश एक बार बच भी जाता, लेकिन अकेली दारू ने देश के तमाम डॉक्टरों और नर्सों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। शराब की वजह से कोरोना के फैलने का खतरा इतना बढ़ गया है जितना कि मजदूरों की घरवापिसी की वजह से भी नहीं बढ़ा है। सरकारों को अधिक लिहाज नहीं करना चाहिए, और जब उन्होंने दारू बेचना तय कर ही लिया है, तो सौ दुकानों की जगह दो सौ दुकानें शुरू कर देना चाहिए, और किसी भी सभ्य कारोबार की तरह इस धंधे सभ्यता से करना चाहिए। किसी धंधे को गंदगी के साथ, जुर्म के अंदाज में करने का कोई मतलब नहीं है। जो प्रदेश शराब को पहले भी गैरजरूरी और नाजायज नियमों से बांधकर नहीं चलते थे, वहां पर शराब के धंधे में भ्रष्टाचार भी कम था, और पैसे बर्बाद करने पर आमादा शराबियों को पसंद की बेहतर शराब भी मिलती थी। राज्य सरकारों को इस धंधे को अपने नाजायज काबू में कैद करके रखने की चाहत छोडऩी चाहिए, और दुनिया से सभ्य देशों की तरह लोगों को ढंग से पीने देना चाहिए, और हो सकता है कि वैसे में उसका पीना घटे। फिलहाल कल की रिपोर्ट यह है कि बिना किसी मेहनत के अपनी एक दिन कामयाबी पर कोरोना खुशी में छककर दारू पी रहा है। 
-सुनील कुमार


04-May-2020

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,
4 मई 2020


जिसे आधी सदी बाद भी हिन्दुस्तानी
बहू मानने से इंकार, उसी ने की
सबसे बेबस हिन्दुस्तानी की फिक्र


पिछले चार-पांच दिनों में केन्द्र सरकार ने अपनी जो दुर्गति करवाई है, उसने लॉकडाऊन के बाद से अपनी नाकामयाबी को भी पीछे छोड़कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। अचानक एक सुबह देश को पता लगा कि तेलंगाना से झारखंड के लिए एक मजदूर-ट्रेन रवाना हुई है। फिर दोपहर शाम तक खबर आई कि कुछ और राज्यों के लिए भी श्रमिक-स्पेशल नाम की गाडिय़ां चलने वाली हैं। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने प्रदेश के लोगों के वापिस आने के लिए ऐसी गाडिय़ों की मांग भी की थी, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने तो प्रदेश के बाहर अपने एक-सवा लाख मजदूरों के रिकॉर्ड देखते हुए 28 गाडिय़ों की मांग की है जिस पर अभी तक कोई जवाब मिला नहीं है। लेकिन इस बीच रेलवे ने लिखित आदेश में यह साफ किया कि अपने मजदूरों के लिए ट्रेन मांगने वाले राज्य को ही ट्रेन का भुगतान करना होगा। फिर दिन गुजरा नहीं था कि ऐसी खबरें आईं कि रेलवे मजदूरों से ही किराया धरवा रहा है, और वह आम रेल टिकट से अधिक भी है। इन दोनों बातों को लेकर देश में खूब बवाल हुआ, सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल किए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोरोना फंड, पीएम केयर्स, का इस्तेमाल अगर इन मजदूरों को इनके प्रदेश तक छोडऩे के लिए नहीं हो रहा, तो फिर वह आखिर बना किस काम के लिए है? बहुत से लोगों ने यह सवाल भी किए कि जिन मजदूरों के पास सवा महीने से बिना काम बाहर बैठे खाने तक का पैसा नहीं है, उन्हें रेलवे स्टेशनों से टिकट न होने पर लौटाया जा रहा है, तो यह कहां की इंसानियत है? देश पर अचानक लाद दिए गए लॉकडाऊन के फैसले के बाद इस तरह से भाड़ा वसूली का सिलसिला लोग भूल नहीं पाएंगे।  

हैरानी इस बात की है कि मोदी सरकार प्रधानमंत्री के कड़े कामकाज के लिए जानी जाती है। जब लॉकडाऊन हुआ, तो अब उजागर हो रहा है कि उस वक्त कोई तैयारी नहीं थी, कोई योजना नहीं थी, राज्यों की कोई भागीदारी नहीं थी। जब लॉकडाऊन का पहला दौर निकल गया, तब दूसरे दौर के पहले मुख्यमंत्रियों से और विपक्षी दलों से कुछ चर्चा की गई। लेकिन रेलवे को केन्द्र सरकार का अपना विभाग है, और अभी तो सवा महीने से रेलवे बंद ही है, इसलिए मंत्री से लेकर अफसरों तक तो किसी भी योजना के लिए वक्त ही वक्त था। फिर रेलवे को किसी न किसी दिन शुरू होना ही था, हर कुछ दिनों में रेलवे कभी रिजर्वेशन शुरू कर देता था, तो कभी बंद कर देता था, मतलब यह कि रेलवे जिंदा था, और रेलवे एयर इंडिया की तरह अपने बिकने का इंतजार भी नहीं कर रहा है। ऐसे में क्या रेलवे को यह नहीं मालूम था कि जिस दिन मजदूरों को राज्य वापिस भेजने की नौबत आएगी, उस दिन भाड़ा वसूलने या न वसूलने का सवाल भी खड़ा होगा। आज पूरे देश में रेलवे बिना काम है, कर्मचारियों की तनख्वाह का मीटर घूम रहा है, उसका पूरा ढांचा बिना इस्तेमाल पड़ा है। ऐसे खाली पड़े हुए अमले और ढांचे को अगर हजार-पांच सौ रेलगाडिय़ां चलाकर मजदूरों को उनके प्रदेश पहुंचाना ही है, तो भी इसमें रेलवे को कोई बड़ा खर्च तो आ नहीं रहा था। देश की किसी भी राष्ट्रीय आपदा में इतिहास की हर केन्द्र सरकार राज्य को आर्थिक सहयोग करते आई है। हम सोच-समझकर मदद शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं क्योंकि देश के संघीय ढांचे में यह राज्य का हक है कि अपनी मुसीबत के वक्त वह केन्द्र से अतिरिक्त आबंटन पाए। कहीं सूखा हो, कहीं बाढ़ हो, कहीं ओले बरसे हों, केन्द्र सरकार राज्यों को अतिरिक्त बजट देती ही है। फिर यह लॉकडाऊन तो पूरे की पूरी केन्द्र सरकार की लादी हुई मानव निर्मित विपदा है, और इसमें तो बिन मांगे, बिन बोले कोई भी समझदार केन्द्र सरकार लोगों को ट्रेन से, बस से उनके प्रदेश तक पहुंचाती और अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाती। लेकिन जिस तरह एक भीड़ का बर्ताव होता है, जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार हर दिन इन मजदूरों की टिकट-वसूली के लिए अलग-अलग किस्म की बात कर रही है, और अभी सुनाई पड़ रहा है कि केन्द्र सरकार टिकट का 15 फीसदी राज्य सरकारों से लेगी, और 85 फीसदी खर्च खुद उठाएगी। यह बात कुछ वैसी लग रही है कि कहीं पर आग लगी हुई हो, और दमकलकर्मी मौके पर हिसाब गिनाए कि कितना पानी खर्च होने पर कितना भुगतान करना पड़ेगा। यह सिलसिला जरा भी समझदार केन्द्र सरकार के रहते शुरू ही नहीं हुआ रहता। एक तरफ तो रेलवे स्टेशनों पर टिकट का पैसा न होने पर मजदूरों को भगा देने की खबरें आ रही हैं, दूसरी तरफ एयरफोर्स के विमान गैरजरूरी उड़ान भरकर अस्पतालों पर फूल बरसा रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह हिसाब लगाने में भी लगे हैं कि ऐसी गैरजरूरी उड़ानों का खर्च कितने हजार करोड़ रूपए आया होगा, और उस खर्च से कितने वेंटिलेटर खरीदे जा सकते थे, डॉक्टरों के लिए नामौजूद मास्क और पोशाक कितने आ सकते थे। यह पूरा सिलसिला देश को भावनाओं के एक सैलाब में भिगाकर रख देने का है, और सरकार की सोच और उसके कामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास साफ दिख रहा है। डॉक्टरों की हिफाजत के लिए जरूरी सामान नहीं हैं, करोड़ों मजदूर देश भर में बेघर हैं, सड़कों पर हैं, तेलंगाना से मजदूरी करके लौटती हुई बारह बरस की एक मजदूर बच्ची तीन दिन पैदल चलने के बाद दम तोड़ देती है, तो कुछ फूलों पर तो उसका भी हक बनता था।

खैर, आज सुबह एक अच्छी खबर लेकर आई जब कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह घोषणा की कि पूरे देश से मजदूरों की घरवापिसी की ट्रेन का भाड़ा कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को देगी। कांग्रेस आज अच्छी हालत से नहीं गुजर रही है, फिर भी कल कर्नाटक कांग्रेस ने वहां की भाजपा सरकार को एक करोड़ रूपए का चेक दिया था ताकि राज्य की सरकारी बसों में घर लौटते मजदूरों से टिकट न वसूली जाए। आज सोनिया गांधी की यह घोषणा देश के करोड़ों लोगों के लिए राहत की बात तो है ही, भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में पिछले कई हफ्तों में यह अकेली बात सबसे अधिक इंसानियत की बात भी है। जो नेता रात-दिन सोनिया गांधी को इटली की करार देते हैं, और दशकों पहले की भारतीय बन चुकी एक बहू को इंसान भी मानने से इंकार करते हैं, उस महिला का यह फैसला मोदी सरकार पर बहुत भारी पड़ा है जो कि एक सूदखोर साहूकार के अंदाज में बेघर मजदूरों की देह टटोलकर उस पर गोश्त का अंदाज लगा रही थी, कि उससे कितनी टिकट वसूली जा सकती है।

भारतीय राजनीति में भावनाओं की अपनी एक जगह है, लेकिन वे भावनाएं कब खोखली होती हैं, और कब ठोस होती हैं, यह जनता को समझ आ जाता है। थाली-ताली, दीया-मोमबत्ती, और अस्पतालों पर फूलों की बारिश, इन सबको मिला लें, इन तमाम प्रतीकों को गूंथ लें, तो भी एक मजदूर के लिए एक रोटी भी नहीं बन सकती। राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी ने अगर अब तक की सबसे बड़ी घोषणा की है, तो वह सोनिया गांधी ने की है, और यह बात तो जाहिर है ही कि इस पार्टी के पास भाजपा के मुकाबले दस फीसदी भी पैसा नहीं है। ऐसे में बिना रकम भरे दस्तखत करके दिए गए कांग्रेस पार्टी के ऐसे चेक की बात लोग भूलेंगे नहीं। दूसरी बात यह कि मोदी सरकार को वैसे तो दुनिया में किसी सलाहकार की जरूरत है नहीं, फिर भी आने वाले कई महीने उसके लिए कई ऐसे नाजुक फैसलों के होंगे जिनसे जनता का हित जुड़ा रहेगा, इसलिए उसे यह भी देखना चाहिए कि रेलगाडिय़ों की ऐसी इंसानियत से परे की गफलत हुई कैसे? क्या पूरी सरकार में एक भी समझ ऐसी नहीं है कि सवा महीने की बेरोजगारी-बेकारी के बाद जब लोग सड़क पर बांटे जा रहे खाने को खाकर जिंदा हैं, तब उन्हें घर पहुंचाने के लिए टिकट वसूली का मोलभाव करना एक जुर्म से कम नहीं है? समझ की यह कमी इतिहास में एक बड़ी नाकामयाबी, और एक बड़े बेरहम फैसले के रूप में दर्ज हो रही है। लेकिन हम मोदी सरकार के इतिहास और भविष्य से परे आज करोड़ों भूखे हिन्दुस्तानियों की भूख को लेकर, उनकी जिंदगी पर छाए हुए खतरे को लेकर, उनकी अनिश्चितता को लेकर फिक्रमंद हैं, और महज इसी वजह से मोदी सरकार को आत्मविश्लेषण की एक निहायत गैरजरूरी और बिनमांगी सलाह दे रहे हैं। साथ ही हम सोनिया गांधी को उनकी संवेदनशीलता और उनकी दरियादिली के लिए देश के करोड़ों भूखे, बेघर, बेबस, बेजुबान, बेरोजगार मजदूरों की तरफ से शुक्रिया भी कह रहे हैं।
-सुनील कुमार


03-May-2020

स्मार्ट सिटी के अतिमहत्वोन्मादी

अहंकार से निकलकर स्लम खत्म

करने की जरूरत है कोरोनायुग में

बुरा वक्त बहुत अच्छी नसीहतें, और बहुत अच्छे सबक दे जाता है। आज कोरोना का जो खतरा आया है, और उससे जो तबाही हुई है, उससे न सिर्फ सेहत के मामले में, बल्कि कारोबार के मामले में, शहरी जिंदगी के मामले में, बसाहट और आवाजाही के मामले में, सूचना तंत्र के ढांचे के बारे में बहुत कुछ सीखने मिल रहा है। यह सिलसिला अभी जारी ही है, और अगले कई महीने चलते ही रहेगा। एक किसी बड़े कारोबारी ने अभी यह सुझाया है कि देश की निर्माण-कंपनियां अपने लोगों को दो टीमों में बांट लें, जिनमें से एक टीम अभी तुरंत कोरोनाग्रस्त अर्थव्यवस्था से उबरने के बारे में सोचे और दूसरी टीम दो बरस बाद को लेकर योजना बनाए।

कारोबार तो ठीक है क्योंकि वह मोटेतौर पर एक सीमित दायरे का होता है, और जिसकी कमाई का एक हिस्सा जनता से परे भी जाता है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं, और सार्वजनिक उपक्रमों की तो पूरी ही कमाई जनता की होती है, और जब कभी देश पर कोई मुसीबत आती है तो उससे जूझने की पहली जिम्मेदारी भी इन्हीं पर रहती है। इसलिए कोरोना से सबक लेकर इन सभी को ऐसी योजना बनानी चाहिए जो कि लॉकडाऊन-2 और लॉकडाऊन-3 की तरह अगर या जब कोरोना-2 और कोरोना-3 सामने आए तो उससे जूझने के लिए सरकारें बेहतर तैयार रहें। आज हिन्दुस्तान में कोरोना को विदेशों से आने वाले, और लौटने वाले लोग लेकर आए हैं, लेकिन इससे सबसे बड़ी तबाही सबसे कमजोर तबके की हुई है जो कि पूरे का पूरा बेघर-बेरोजगार हो चुका है। इसलिए आगे की तैयारी इस तबके को ध्यान में रखकर भी करनी चाहिए जो कि देश की कम से कम आधी आबादी तो है ही।

यह समझने की बात है कि इस बार का यह वायरस-संक्रमण मोटे तौर पर हवा में सफर नहीं कर रहा है। इसके मरीजों वाले अस्पताल के कमरों में एयरकंडीशंड हवा में कहीं-कहीं यह वायरस हवा में चला है, लेकिन खुले में इसकी ताकत हवा में उडऩे की नहीं है। अब हिन्दुस्तान को एक ऐसे वायरस की कल्पना करके तैयारी करनी चाहिए जो कि हवा में भी सफर करता हो, तब लोगों का क्या होगा? जब इस देश के मुम्बई जैसे महानगरों में धारावी जैसी एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी हो, जहां हर घर दूसरे कई घरों से चिपका हुआ हो, जहां एक-एक पखाने पर सैकड़ों आबादी मोहताज हो, वहां पर कोरोना से अधिक उड़ान भरने वाले किसी वायरस के आने पर क्या होगा? यह भी समझने की बात है कि पिछले पांच बरस में हिन्दुस्तान में चुनिंदा सौ-दो सौ शहरों को हजार-हजार करोड़ रूपए सालाना के अधिक की फिजूलखर्ची से स्मार्ट बनाने की केन्द्र सरकार की जो अतिमहत्वोन्मादी योजना चल रही है, उसने हिन्दुस्तान हांकने वालों को एक अजीब किस्म के झूठे गौरव से भर दिया है कि वे देश को स्मार्ट बना रहे हैं। हकीकत यह है कि केन्द्र ने अपनी इस योजना के लिए प्रदेशों में एक झूठा उत्साह बो दिया, और उन्हें एक अंधी दौड़ में लगा दिया कि कौन सी स्मार्ट सिटी दूसरों से आगे है। नतीजा यह निकला कि केन्द्र से आए सौ-दो सौ करोड़ के साथ राज्य को उससे कई गुना अधिक रकम अपनी जेब से लगानी पड़ी, और केन्द्र सरकार के पैमानों और शर्तों के मुताबिक उसे खर्च करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि केन्द्र के एनडीए गठबंधन के विरोध वाली राज्य सरकारों ने भी यह दिमाग नहीं लगाया कि स्मार्ट सिटी की पूरी योजना स्थानीय म्युनिसिपल के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अलग रखकर ही बनाई गई है, और इस हिसाब से वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। लेकिन अभी हम उस बुनियादी बात को अधिक कुरेदना नहीं चाहते क्योंकि उससे आज की जरूरी बात धरी रह जाएगी।

आज की बात यह है कि क्या हिन्दुस्तान गंदगी का एक ऐसा समंदर बने रह सकता है जिसमें तमाम लोगों के हक के पैसे लगाकर अतिसंपन्नता और अति सुविधा की योजनाओं वाली स्मार्ट सिटी नाम के सौ-दो सौ टापू रहें? कोरोना के पहले तक तो यह फिर भी ठीक था क्योंकि भारत जैसे लोकतंत्र में गैरबराबरी तो एक आम बात है लेकिन अब कोरोना यह सिखा रहा है कि कुछ लोगों को स्लम की घनघोर गरीबी और गंदगी में रखकर महंगे बंगलों के लोग भी महफूज नहीं रह सकते। आज हिन्दुस्तान को स्मार्ट सिटी और स्लम के बीच का एक रास्ता ढूंढना होगा जिसमें बेतहाशा फिजूलखर्ची वाली स्मार्ट सिटी न बनाकर देश को स्लममुक्त पहले बनाया जाए और फिर सभी को एक साथ स्मार्ट होने की एक बहुत दूर की मंजिल की तरफ ले जाया जाए। स्मार्ट सिटी की योजना मोदी सरकार के वक्त ही शुरू हुई, और राज्य सरकारों को ऐसा लगा कि बाकी प्रदेश स्मार्ट हो जाएंगे, और वे भोंदू ही बने रह जाएंगे। इसलिए उन्होंने दौड़-दौडक़र अपने शहरों को केन्द्र सरकार की योजना में जुड़वाया, और राज्य का अनुपातहीन अतिरिक्त पैसा गिने-चुने शहरों पर झोंक दिया। नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में गंदी बस्तियों की जो बेहतरी होनी थी, उसकी रकम चाहे केन्द्र की जेब से, चाहे राज्य की जेब से, स्मार्ट सिटी पर लगती चली गई।

आज दुनिया के कई समझदार देशों में शहरीकरण और बसाहट के विशेषज्ञ अपनी अब तक की तमाम समझ को किनारे रखकर एक क्लीन स्लेट को लेकर बैठे हैं कि कोरोना को देखते हुए अब आगे की बसाहट कैसी होनी चाहिए। किसी बसाहट या शहर की योजना 25-50 साल के हिसाब से बनती है, इसलिए यह भी याद रखना चाहिए कि किसी अलग किस्म का कोई वायरस आकर जो खतरा पैदा कर सकता है, क्या उससे भी बचाव के तरीकों को नई बसाहट के वक्त सोचा जा सकता है? आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक तरफ तो कोरोना से लडऩे के लिए सरकार की पूरी ही ताकत लग जा रही है, तो दूसरी ओर इस शहर में पिछले 25-50 बरस से चली आ रही पानी की पाईप लाईनें नालियों के भीतर डूबकर, सडक़र, नाली की गंदगी लोगों के बदन तक पहुंचा रही हैं, और इसी शहर पर पिछले बरसों में केन्द्र का थोड़ा, राज्य का पूरा, हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं। क्या सचमुच ही ऐसी स्मार्ट सिटी को जनता के पैसों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करके आलीशान गौरवपथ बनाने का हक है जहां पर शहर की गरीब आबादी का एक बड़ा हिस्सा म्युनिसिपल के पीने के पानी के पाईप से नाली की गंदगी पा रहा है, और पीलिया में पड़ा हुआ है, पीलिया-मौतें हो रही हैं।  क्या ऐसा शहर अपने को स्मार्ट साबित करने के एक भोंदू-अहंकारी नशे को छोड़ सकता है? या फिर ऐसी बड़ी और योजनाबद्ध लागत वाली योजनाओं की कमाई सबको सुहाती है?

इस देश को, खासकर इसके प्रदेशों को देश के संघीय ढांचे में अपनी आजाद सोच के हक का इस्तेमाल करते हुए स्मार्ट नाम के झांसे से बाहर आना चाहिए। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ गैरबराबरी का है, बल्कि यह अलोकतांत्रिक भी है। कोरोना से भी अगर यह देश नहीं सीखेगा कि अपने सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोगों को ध्यान में रखते हुए अपनी बसाहट, अपने रोजगार, अपनी आवाजाही, अपने इलाज के ढांचे को बनाना जरूरी है, तो वह गैरगरीब और गैरकमजोर पर से खतरे को कभी नहीं हटा सकेगा। कोरोना से लोगों को सबक लेना चाहिए कि आज अगर पासपोर्ट वालों ने राशन कार्ड वालों को यह जानलेवा-तोहफा दिया है, तो कल राशन कार्ड वाले भी कोई रिटर्न-गिफ्ट पासपोर्ट वालों को दे सकते हैं। इसलिए आज सही वक्त है कि देश स्मार्ट बनने के अपने अतिमहत्वोन्मादी नशे से बाहर आए, और स्लम खत्म करे, शहरों में और कारखानों के इलाकों में मजदूरों की बसाहट के बारे में सोचे, और संसद भवन के इर्द-गिर्द 20 हजार करोड़ रूपए बर्बादी की अपनी मौजूदा योजना को छोड़े। जब देश भुखमरी की कगार पर खड़ा हुआ है, जब कोरोना की मार और देशों के मुकाबले अब तक पांच फीसदी भी नहीं हुई है, और प्रदेशों के साल भर के इलाज के बजट महीने भर में ही चुक गए हैं, तब सरकार दिल्ली के कुछ किलोमीटर पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करके हैवानियत से हॅंसी पा सकती है, इंसानियत तो उस पर रो ही सकती है। इस दुनिया के इतिहास में, आज के हिन्दुस्तान में 20 हजार करोड़ रूपए का यह खर्च काले अक्षरों से लिखा जाएगा, और सैकड़ों बरस पहले हिन्दुस्तानी राजा अकाल के वक्त भी जिस तरह नाच-गानों में डूबे रहते थे, वही मिसाल इससे याद आएगी। किसी दिन समझदार सरकार को अपने इतिहास में इतना काला पन्ना छोडक़र नहीं जाना चाहिए। आज देश को आम गंदगी से आजादी की जरूरत है, और वही स्मार्ट-लोकतंत्र होगा।

-सुनील कुमार 


02-May-2020

मजदूरों की घरवापिसी से जुड़े मुद्दे, और तैयारियां...

केन्द्र सरकार का लॉकडाऊन-3 शुरू होने को है, और इसी बीच रेलगाडिय़ां शुरू हो गई हैं जो कि मजदूरों को उनके अपने प्रदेश पहुंचाएंगी जहां वे घर पर रहकर आसपास कुछ काम कर सकेंगे, या फिर कोरोना के मरने और अर्थव्यवस्था के जिंदा होने का इंतजार कर सकेंगे। इन मजदूरों को उनके काम के प्रदेशों ने इस बुरी तरह निराश किया है कि जहां वे कारखानों और धंधों में काम करते थे, उनमें शायद ही किसी को उनके कानूनी हक मिल पाए, उनका बकाया मिल पाया, और चार घंटे के नोटिस वाले लॉकडाऊन के बाद उनको सिर छुपाने की जगह तो उन राज्यों ने, वहां के कारखानेदारों और कारोबारियों ने, वहां की सरकारों ने बिल्कुल ही नहीं दी, जबकि ऐसे हर कारोबारी शहर और प्रदेश में आज हजारों अधूरी बनी इमारतें पड़ी हैं जहां कोई काबिल सरकार आसानी से मजदूरों को वहां रूकने का एक विकल्प दे सकती थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि प्रवासी मजदूर किसी राज्य में वहां के स्थाई वोटर नहीं होते हैं, और उनकी कोई राजनीतिक उपयोगिता नहीं होती है। ऐसे करोड़ों मजदूर पैदल चलकर भी चार-पांच हफ्तों में अपने इलाके में पहुंच रहे हैं, रास्ते में दम तोड़ रहे हैं, और राह में सामाजिक मदद से मिलने वाले खाने के मोहताज होकर उन्होंने कल का मजदूर दिवस भी निकाल दिया।

अब जब रेलगाड़ी से लौटना एक हकीकत हो गई है, कल से अब तक कुछ रेलगाडिय़ां रवाना हुई हैं, तो हर राज्य अपने दसियों हजार मजदूर पाने जा रहा है। छत्तीसगढ़ शायद ऐसे लाख से अधिक मजदूर देखे जो कि बाहर बुरे हाल में हैं, और अब अगले कुछ हफ्तों में जो लौट सकते हैं, और जब बाहर किसी काम-धंधे का कोई ठिकाना नहीं, कोरोना का जानलेवा खतरा सामने खड़ा हुआ है, तो फिर उन्हें लौटना भी चाहिए। अपने गांव में कांधा देने वाले चार लोग तो नसीब होंगे। लेकिन यह नौबत राज्य सरकार पर एक अभूतपूर्व दबाव डालने वाली है। किसी एक प्रदेश में ट्रेन और बसों से अगर चारों तरफ की सरहदों पर हजारों लोग रोज पहुंचने लगेंगे, और आज वे शायद लुके-छिपे, अघोषित रूप से आ ही रहे हैं, तो ऐसी घोषित वापिसी की हालत में मजदूरों को जांच के बाद जरूरत रहने पर सरकारी इंतजाम में क्वॉरंटीन करना होगा, या फिर जैसा कि कल झारखंड ने किया है, बिना लक्षणों वाले मजदूरों को उनके घर भेजना होगा। सरकार के इंतजाम की अपनी सीमाएं हैं, और बिना लक्षण किसी को भर्ती रखने का एक मतलब यह भी होता है कि उसे मजदूरी कमाने के हक से दूर रखना। हमारी सलाह तो यह है कि जितने गरीब मजदूरों को सरकार को क्वॉरंटीन या आइसोलेशन में रखना पड़े, उन्हें उतने दिन की न्यूनतम मजदूरी भी देनी चाहिए ताकि उनका परिवार बाहर जिंदा रह सके। यह इंतजाम केन्द्र सरकार को अपनी किसी रोजगार योजना के तहत करना चाहिए। मनरेगा जैसी किसी योजना में क्वॉरंटीन के एक पखवाड़े की रोजी देना बाकी समाज की सेहत के मुकाबले कोई महंगी बात नहीं होगी। जिस तरह की आदर्श स्थिति घर के भीतर क्वॉरंटीन करने के लिए चाहिए, वह एक फीसदी मजदूरों को भी नसीब नहीं है, शायद किसी भी प्रवासी मजदूर के पास घर में ऐसा अलग कमरा नहीं होगा जैसा कि केन्द्र सरकार के होम-क्वॉरंटीन की शर्तों में कहा गया है। इसलिए प्रवासी मजदूरों की वापिसी या तो सरकार को कुछ खर्च देगी, या फिर समाज को कुछ खतरा देगी। हमारी सलाह एक पखवाड़े की मजदूरी देकर क्वॉरंटीन करने की है, लेकिन सरकारों की अपनी सीमाएं हैं। केन्द्र सरकार ने मोटेतौर पर कोरोना से निपटने का खर्च राज्यों पर डाल दिया है। यह बात बिल्कुल भी ठीक नहीं है, यह एक राष्ट्रीय आपदा है, घोषित महामारी है, और इसकी सारी लागत केन्द्र सरकार को उठानी चाहिए। हुआ तो यह है कि केन्द्र सरकार वाहवाही पाने के अंदाज में विदेशों से हिन्दुस्तानियों को तो अपने खर्च पर लेकर आई, और फिर अपने खर्च पर क्वॉरंटीन में भी रखा। लेकिन देश के भीतर के गरीब मजदूरों का पूरा बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया गया, और आज तो यह शर्मनाक खबर है कि केन्द्र सरकार मजदूरों का रेलभाड़ा राज्यों से वसूलने जा रही। हवाई जहाज से लोगों को लाते हुए क्या राज्यों से यह पूछा गया था कि उनके लोगों को विदेशों से लाने का खर्च वे उठाएंगे? सरकार को तुरंत ही यह शर्मनाक बात वापिस लेनी चाहिए, और इसके साथ-साथ राज्यों को उदारता से कोरोना की वजह से आया हुआ सारा खर्च देना चाहिए। लेकिन हुआ तो यह है कि प्रधानमंत्री के स्थाई राहत कोष से अलग एक ऐसा नया पीएम-केयर्स नाम का फंड बनाया गया है जिसमें दान देने के लिए कंपनियों को सीएसआर का पैसा देने की छूट दी गई है। लेकिन कंपनियां अपने राज्य में अपने मुख्यमंत्री राहत कोष में इस फंड का पैसा नहीं दे सकतीं। केन्द्र का यह फैसला बहुत ही अन्यायपूर्ण है, और पीएम-केयर्स एक ऐसा फंड है जो कि बिना पारदर्शिता का है, और जिसका ऑडिट सीएजी नहीं कर सकता। यह बहुत ही अटपटी और अनैतिक बात है, और इसे खत्म करना चाहिए। केन्द्र सरकार का अब तक का रूख दस-दस पन्नों की गाईडलाईन जारी करने का है जिसमें ऐसी तमाम बातें भी लिखी गई हैं जो कि राज्य के अधिकार क्षेत्र की हैं, राज्य की जिम्मेदारी हैं। ख्रैर, इससे परे राज्यों को भी तैयार रहना होगा कि बुरी हालत में रहकर लौटे हुए ये मजदूर अगर अपने साथ बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लेकर आते हैं, तो क्या होगा? हमारा ख्याल है कि अधिकांश राज्यों पर हर पांच-दस हजार मजदूरों पर कुछ दर्जन कोरोना पॉजिटिव निकलने का एक खतरा आ सकता है, और इसके लिए राज्य के जांच और इलाज के ढांचे को पुख्ता करके रखना ठीक रहेगा।

- सुनील कुमार 


01-May-2020

वक्त कितना ही बुरा आए, 
जूझने की सबसे अधिक 
ताकत मजदूर की ही होगी

पूरी एक सदी के बाद दुनिया में ऐसा मजदूर दिवस आया है जब अधिकतर देशों में मजदूर बेरोजगार बैठे हैं, और अगर वे बहुत खुदकिस्मत हैं तो ही वे अपने घर पर बैठे हैं, वरना हिन्दुस्तान जैसे देश में तो मजदूर सड़कों पर इतना लंबा पैदल सफर कर रहे हैं जितना कि उन्होंने 1947 में भारत-पाक विभाजन के दौर में भी नहीं किया था, और न ही 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से भारत में शरण लेने के बाद किया था। दोनोंं ही मौकों पर सरहद के बाद जल्द ही लोगों को रेलगाडिय़ां मिल गई थीं, या सड़क से चलने वाली किसी गाड़ी पर जगह मिल गई थी। आज ये दोनों ही हासिल नहीं हैं। आज सुबह तेलंगाना से झारखंड के बारह सौ मजदूरों को लेकर पहली ट्रेन निकली है, लेकिन यह ट्रेनों की शुरुआत शायद नहीं है, एक प्रयोग है। फिर भी मजदूर दिवस पर यह मजदूरों को एक तोहफा है कि उनमें तो बारह सौ को अपने प्रदेश जाने मिल रहा है, आगे का सफर अभी शुरू भी नहीं हुआ है।

20 मार्च को हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कफ्र्यू की घोषणा की थी, और 24 मार्च की रात पूरे देश में लॉकडाउन करके तमाम ट्रेनों को रद्द कर दिया गया था। इस वक्त देश में करोड़ों मजदूर दूसरे प्रदेशों में मजदूरी के लिए गए हुए थे, छोटे कारीगर और कारखाने-कारोबार के हुनरमंद मजदूर एकाएक रात 8 बजे बेरोजगार हो गए क्योंकि लाखों मालिक और ठेकेदार ऐसे थे जिन्होंने मजदूरों को बकाया पैसा भी नहीं दिया। न खाने को, न रहने को, न घर लौटने को। ऐसे में गिनती के बचे-खुचे पैसे लेकर, बच्चों को कंधे पर लाद, सामान को घरवाली को पकड़ाकर हिन्दुस्तानी मजदूर हजार-हजार किलोमीटर तक के पैदल सफर पर निकल गए थे जो कि आज 30-35 दिन बाद भी जारी है। अखबारों के दफ्तर उन खबरों और तस्वीरों से पट गए हैं जो कि देश भर में पैदल चल रहे मजदूरों की हैं, और पूरे देश में फंसे हुए मजदूरों की हैं, जो कि इतना लंबा पैदल सफर नहीं कर पा रहे हैं। कुल मिलाकर 20 मार्च से 24 मार्च तक का वक्त इतना था कि घरों से सफर शुरू करने वाले लोगों को रोक दिया जा सकता था, और दूसरे प्रदेशों में फंसने जा रहे मजदूरों को अपने प्रदेश रवाना किया जा सकता था। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और अगर आज उसकी तकलीफ पर बात भी न हो, तो फिर मजदूर दिवस कैसा? जिन मजदूरों की देह से पसीने की शक्ल में नमक बहता है, उनकी बाकी देह के साथ-साथ उनके पांवों के फफोलों के फूटने से भी नमक बहने लगा था। 

लेकिन बात महज दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे मजदूरों की नहीं थी। खुद अपने प्रदेश में काम करने वाले मजदूर घर बैठे भी खासे वक्त से बेरोजगारी झेल ही रहे थे, अब उन्हें रोजगार मिलने की गुंजाइश लॉकडाउन के साथ पूरी तरह खत्म हो गई। आज मजदूर दिवस पर तमाम मजदूरों के बारे में सोचना है जो कि इतने बरसों में मिट्टी खोदने से अधिक कुछ सीख चुके थे, उन सबका हुनर आज धरा रह गया है। अलग-अलग प्रदेशों में मशीनों पर और कारोबारों में काम करने का उनका तजुर्बा धरा रह गया है, और मेहनत की खाने वाले करोड़ों लोग आज राहत में मिलने वाले अनाज की कतार में खड़े हो गए हैं। कोरोना को लेकर यह नौबत कुछ हद तक तो आनी थी, लेकिन जिस तरह मजदूरों को बेघर, बेबस, बेरोजगार, और बेसहारा करके एकाएक छोड़ दिया गया था, यह पूरा पांच हफ्तों का वक्त उनके आत्मविश्वास को भी तोड़ देने वाला रहा, उनके आत्मसम्मान को भी चकनाचूर करने वाला था। 

आज मजदूर दिवस पर अगर देश के इस सबसे बड़े, दसियों करोड़ गिनती वाले तक के सदमे, उसके फफोलों, और उसकी जिंदगी पर छाए खतरे की भी बात न की जाएगी, तो फिर क्या किया जाएगा? मजदूरों का यह पूरा सिलसिला बहुत ही अनिश्चितता से भरा हुआ है। हम यह तो नहीं कहते कि कोरोना जैसे खतरे और इतनी बड़ी समस्या का किसी को पूर्वाभास रहा होगा, लेकिन यह बात तो तय है कि कम से कम कुछ हफ्ते पहले से इसका अहसास हो चुका था, और उसके बाद जिस तरह एक झटके में रेलगाडिय़ां बंद की गईं, और आज पांच हफ्ते बाद इस तरह प्रायोगिक तौर पर फिर चलाई गई है, इन दोनों के बीच का यह अरसा भारत के मजदूर इतिहास का अब तक का सबसे ही खराब दौर रहा है, और अगर भारत सरकार की कोई बेहतर योजना होती, या कि जैसा कि कई अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री कह रहे हैं, भारत की कोई योजना होती, तो बर्बादी इतनी अधिक नहीं होती, तकलीफ इतनी अधिक नहीं होती, और करोड़ों मजदूरों को इंसानों की तरह रहने का मौका मिला होता। 

हम इस पूरे मुसीबत के दौर में भी इन बातों को करना जरूरी इसलिए समझते हैं कि मुसीबत अभी कई और महीने चलने वाली है, और अगर आगे भी कोई योजना नहीं बनेगी, केन्द्र राज्यों को साथ लेकर काम नहीं करेगा, तो हो सकता है कि हिन्दुस्तानी मजदूरों को आज तक की सबसे बुरी त्रासदी अपनी पहले नंबर की जगह खो बैठे, और इससे और बुरी त्रासदी हिन्दुस्तान में दर्ज हो। आज का वक्त इतिहास से सबक लेने का नहीं है, आज का वक्त अपने बीते हुए हफ्ते और महीने से भी सबक लेने का है, और हिन्दुस्तान को इसकी जरूरत बहुत अधिक है, इसके प्रदेशों को इसकी जरूरत बहुत अधिक है। मजदूर दिवस पर हम बस इतना ही कह सकते हैं कि वक्त चाहे कितना ही बुरा आए, उससे जूझने की सबसे अधिक ताकत मजदूर की ही होगी। दुनिया के मजदूरों को लाल सलाम। 
-सुनील कुमार


29-Apr-2020

तैयार हो जाइये कोरोनोत्तर 

युग की दुनिया के लिए...!

दुनिया के अलग-अलग देश, अलग-अलग दर्जे के लॉकडाउन झेल रहे हैं, कहीं-अधिक, कहीं कम। हिंदुस्तान भी जबरदस्त लॉकडाउन देख रहा है। बच्चों ने इतने लम्बे वक्त तक माँ-बाप को सर पर सवार देखा नहीं होगा, माँ-बाप बच्चों को इतने वक्त, ऐसी नौबत में पहली बार ही देख रहे होंगे। छोटे या बड़े, किसी भी आकार के परिवार ने पहली बार सबको इतना झेला होगा। लोग खुलकर इस बारे में अधिक बोलेंगे नहीं, कि लॉकडाउन के बीच जान बचाने कहाँ जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि अब इंसान बहुत अधिक समय तक सिर्फ परिवार के लोगों के साथ उस तरह रहने के आदी नहीं रह गए हैं, जिस तरह गुफा में रहने वाले इंसान रहा करते थे। और उस वक्त के इंसान को तो गुफा के भीतर न वाई-फाई हासिल था, न गुफाबैठे वे सोशल मीडिया के दोस्तों से जुड़े रहते थे। अब तो इंसान को घरवालों के बीच रहते हुए भी बाहर की दुनिया में जीने का एक बड़ा मौका हासिल है, लेकिन इस दसियों हजार बरस में इंसान ने धीरे-धीरे अपना मिजाज बदल लिया है। अब घर बैठे लोग बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं। सबको यह समझ आ गया है कि छुट्टी नाम की अच्छी चीज भी बहुत अधिक मिलने पर जी उसी तरह अघा जाता है जिस तरह रईस बारात में बाराती को जबरदस्ती खानी पड़ रही दसवीं रसमलाई भारी पड़ती है। 

अब लोगों को काम करने की जरूरत भी समझ आ रही होगी, बाहर निकलने की भी, और लोगों से सशरीर मिलने की भी। कोरोना ने जिंदगी में अहमियत रखने वाली बहुत सी चीजों की समझ विकसित कर दी है। लोगों की पहचान करा दी है, और हम पहले भी लिखते आए थे कि बुरा वक्त अच्छे-अच्छे लोगों की पहचान करा देता है। वह हो भी रहा है, लेकिन इससे भी अधिक अभी होगा। आने वाले महीनों में लोग ऐसा बोलते मिलेंगे कि फलां को पहचानने में बड़ी देर हो गई। वक्त बहुत खराब आने वाला है, और घर के भीतर, घर के बाहर रिश्ते, बहुत खराब भी होने जा रहे हैं। 

लेकिन ये तमाम बातें तो उन लोगों के बारे में हैं, जो लोग घरों में बैठे हैं, जिनके अधिक संबंध हैं, अधिक दोस्त हैं। हिंदुस्तान जैसे देश में दसियों करोड़ लोग ऐसे हैं जहां लोग घरों से बाहर हैं, या मजदूरी के लिए फिर जिन्हें बाहर निकलना होगा। जिनके अधिक रिश्ते भी नहीं होंगे। जिन्होंने आज बेरोजगारी, फटेहाली देखी होगी, भुखमरी के कगार पर पहुँच गए होंगे। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों ने ऐसे बुरे वक्त अपने बच्चों का एक नया बर्ताव देखा होगा, छोटे बच्चों ने अपने माँ-बाप को सैकड़ों मील पैदल चलते देखा होगा, जिंदगी की एक अलग दर्जे की लड़ाई लड़ते देखा होगा। उनके मन में अपने माँ-बाप की ऐसी योद्धा सरीखी तस्वीर बनने का और तो कोई मौका आना नहीं था। इसलिए यह नई पीढ़ी जिंदगी की लड़ाई की एक नई समझ भी लेकर बड़ी होगी, अपने जुझारू माँ-बाप से यह पीढ़ी बहुत कुछ सीखकर भी बड़ी होगी। 

दुनिया में आज इस बात को कहने वाले लोग कम नहीं हैं कि कोरोना के बाद दुनिया अलग ही हो जाएगी। कुछ लोगों ने बिफोर क्राइस्ट और आफ्टर क्राइस्ट की तरह बिफोर कोरोना और ऑफ्टर कोरोना के लिए बीसी और एसी भी लिखना शुरू भी कर दिया है। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक, एंथ्रोपोलॉजिस्ट और अर्थशास्त्रियों के पास कोरोनोत्तर दुनिया के बारे में लिखने को और भी बहुत कुछ होगा। फिलहाल सौ बरस पहले की महामारी के बाद की इस महामारी के बाद के लिए अपने-आपको तैयार करते चलिए।  
-सुनील कुमार


28-Apr-2020

यह तो अच्छा हुआ कि 
उसका नाम मुरारी था... 

उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर से बुरी खबर आई है कि दो साधुओं को एक मंदिर में सोते हुए किसी ने धारदार हथियार से मार डाला। मौत तो बहुत बुरी थी, लेकिन उस बीच भी गनीमत यह है कि मारने वाला एक हिन्दू गिरफ्तार हुआ है जिससे दो दिन पहले साधुओं का सार्वजनिक झगड़ा हुआ था, और वह उन्हें धमकी देते हुए गया था। अभी-अभी महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं को उनके ड्राइवर सहित पीट-पीटकर मार डाला गया, देश के एक नफरतजीवी तबके ने दिल्ली में अपने अपने बड़े-बड़े नेताओं की अगुवाई में, और बाकी नफरतजीवियों ने अर्नब गोस्वामी नाम के टीवी-दंगाई की अगुवाई में उन साधुओं की हत्या की तोहमत पहले दिन मुस्लिमों की तरफ मोडऩे की कोशिश की, लेकिन पता चला कि मारने वाले तमाम लोग हिन्दू आदिवासी थे। आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते लेकिन जिस हिन्दू-हिस्से की बात हो रही है, वह उनको हिन्दू गिनता है। तो मुस्लिम उस भीड़त्या की तोहमत से बाहर हो गए, लेकिन आदिवासियों की नाम के साथ ईसाई जोडऩा आसान रहता है, इसलिए यह जोड़ा गया कि मारने वाले ईसाई हैं, और उनको बचाने में सोनिया गाँधी के करीबी लोग जुट गए हैं। फिर यह झूठ भी चौबीस घंटों से अधिक खड़े नहीं रह पाया, तो फिर अर्नब गोस्वामी का वीडियो खूब काम आया कि किस तरह सोनिया गाँधी ने अपनी सरकार के राज में हिन्दू साधुओं की ह्त्या के बाद खुशी से भरकर रोम रिपोर्ट भेजी है कि किस तरह हिन्दू साधू मारे गए। यह नफरत शायद देश में दंगा करवाने में बड़ी काम आती, लेकिन अब हिंदुस्तान में मुस्लिम, हिन्दू अर्थी उठाने में लगे हैं, अंतिम संस्कार कर रहे हैं, हिन्दू, मुस्लिमों को अपने घर में रख रहे हैं, उनकी जान बचा रहे हैं, खाना खिला रहे है, मुस्लिम कॉरोनामुक्त होने के बाद अपने खून का प्लाज़्मा दे रहे हैं। कुल-मिलाकर अभी दंगे के लायक माहौल अर्नब, और बेचेहरा नफरती, मिलकर भी नहीं बना पा रहे। इसलिए देश का सबसे संवेदनशील प्रदेश, उत्तर प्रदेश भी तनाव से बच गया, और साधुओं का हिन्दू हत्यारा पकड़ा गया। 

देश में धर्म को सर पर चढ़ा लिया गया है। और महज त्योहारों के लिए नहीं, नफरत, राजनीति, और डूबते हुए मीडिया-कारोबार को चलाने के लिए धार्मिक नफरत को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक प्रेम किसी को आसानी से नहीं जोड़ पाता लेकिन धार्मिक नफरत तुरंत ही इस देश के अर्नबों को एक कर देती है। देश की सबसे बड़ी अदालत का मिजाज हैरान करता है कि नफरत की आग की लपटें उगलते ड्रैगन पर सवार अर्नब गोस्वामी रात में सुप्रीम कोर्ट पहुँचता है, और अगले दिन राहत हासिल कर लेता है। नफरत की इन लपटों से देश में अगर दंगे हो गए होते तो? इस बहुत ही हकीकत के खतरे को भी देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है! अर्नब की बुनियाद ही नफरत से बनी है, जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने हैरतअंगेज अंदाज से अनदेखा कर दिया है। ऐसे में देश में नफरत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय भावना बन गयी है, और धार्मिक सद्भावना को जिंदा रखना आम लोगों की जिम्मेदारी हो गयी है। 

यह तो अच्छा हुआ कि साधुओं का चिमटा किसी हिन्दू ने ही चुरा लिया था, खुला झगड़ा भी हुआ था, धमकी भी हुई थी, और मुरारी नाम का वह नशेड़ी पकड़ा भी गया। नहीं तो जाने क्या होता। देश को एक बारूद के ढेर पर बिठाने की कोशिश हो रही है, कब तक वह उससे बच पायेगा यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है। आज कोरोना की दहशत से लोगों के मन में जो श्मशान वैराग्य आया है, उससे लोग नफरत से छुटकारा पा सकेंगे यह भी ठीक से समझ नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह तय है कि तब्लीगियों के मज़हब से लेकर अर्नब के हिंदुत्व तक, धर्म ने लोगों को पागल कर रखा है। जब किसी लोकतंत्र पर, सरकार पर, अदालत पर, धर्म हावी हो जाता है, तो उसका क्या होता है इसकी एक उम्दा मिसाल बगल का पाकिस्तान है। जिंदगी पर, राजनीति पर, निजी मामलों से लेकर सड़कों तक, जब धर्म का इतना बोलबाला हो जाता है, तो फिर लोकतंत्र धार्मिक आतंक होकर रह जाता है। हिंदुस्तान को हिन्दू पाकिस्तान बनाने के लिए रात-दिन ओवरटाइम मेहनत करने वाले अरनबों की तालिबानियत इस देश की जम्हूरियत को खत्म तो शायद न कर पाए, लेकिन बर्बाद जरूर कर दे रही है। 
-सुनील कुमार


27-Apr-2020

पंजाब डीजीपी को सलाम

पंजाब पुलिस के 80 हजार लोगों में से हर कोई आज हरजीत सिंह है। एएसआई हरजीत सिंह ने कुछ दिन पहले पटियाला में सड़क पर कफ्र्यूू पास पूछा तो एक निहंग ने तलवार से उनके दोनों हाथ काट दिए थे। चंडीगढ़ में पीजीआई के डॉक्टरों में बड़ी मेहनत और हुनर की सर्जरी से उनके दोनों हाथ जोड़ दिए। ऐसे बहादुर पुलिस अफसर का सम्मान करने के लिए, आज पंजाब में डीजीपी से लेकर सिपाही तक, हर किसी ने वर्दी पर अपनी नेमप्लेट पर हरजीत सिंह का नाम लगाया और उसे सम्मान दिया। डीजीपी दिनकर गुप्ता की यह पहल देश में याद रखी जाएगी, और इससे पंजाब पुलिस का सीना अपने मुखिया के नाम पर फख्र से तन जाएगा। 

न सिर्फ वर्दी वाली फोर्स में, बल्कि किसी भी जगह मुखिया अपने लोगों के साथ किस हद तक खड़े रहते हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहाँ नक्सल मोर्चे पर साल भर में 100 -200 जवान भी मारे जाते हैं, वहां हमको याद नहीं पड़ता कि पुलिस के मुखिया कभी किसी शहीद के घर गए हों। इतने शहीदों के अंतिम संस्कार में जा पाना तो किसी अफसर के लिए मुमकिन नहीं हो सकता, लेकिन किसी दौरे के वक्त भी कोई डीजीपी किसी शहीद के घर गए हों, ऐसा खबरों में तो कभी आया नहीं। प्रदेश के मंत्री-मुख्यमंत्री, और वर्दी वाले अफसर, इन सबका काम शहीद के शव को उसके घर रवाना करने के पहले सलामी देने के साथ ख़त्म हो जाता है। 

पंजाब पुलिस के मुखिया के लिए भी यह काफी हुआ होता कि वे एक बार हरजीत सिंह को अस्पताल में देख लेते, इनाम की घोषणा कर देते। लेकिन उन्होंने जो किया उससे पंजाब पुलिस के छोटे बड़े सभी लोगों के मन में एक नया हौसला आया होगा। मुखिया को इस नजरिये से सोचना चाहिए। एक बक्से के बाहर सोचना बहुत से लोगों को आता नहीं है। राजीव गाँधी जब प्रधान मंत्री थे तो वे अपने सुरक्षा कर्मचारियों-अधिकारीयों से दोस्ताना सम्बन्ध रखते थे। लोगों को याद होगा कि जब इंदिरा गाँधी को खुफिया एजेंसियों ने चौकन्ना किया था कि स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई की वजह से कोई सिख सुरक्षा कर्मचारी उनके लिए खतरा बन सकता है, तो उन्होंने किसी भी सिख को हटाने की बजाय जान दे देना बेहतर माना था। अपने साथ के लोगों को बचाने के लिए बहुत से बड़े नेता भी उनका ख़तरा अपने ऊपर लेने के लिए जाने जाते हैं, और अदालतों तक खड़े रहते हैं। कोई मुखिया अपने लोगों के साथ खड़े रहकर ही मुखिया रहने के हकदार हो सकते हैं, उनको मुसीबत में धकेलकर खुद बचकर नहीं। पुलिस हो, फौज हो, या कोई और संगठन, बड़प्पन वाले मुखिया का नाम ही इतिहास में दर्ज होता है। आज हम सरकार में बहुत से ऐसे आला अफसर देखते हैं जो मातहत को मुसीबत में छोड़कर खुद बच निकलने में महारत हासिल कर चुके हैं। ऐसे में पंजाब डीजीपी को सलाम।
-सुनील कुमार


26-Apr-2020

दलित-आदिवासी आरक्षण से 
क्रीमी लेयर तुरंत खत्म हो 

दलित-आदिवासी आरक्षण हिंदुस्तान में अलग-अलग वजहों से तनाव का कारण बने ही रहता है, फिर हाल के बरसों में सुप्रीम कोर्ट के बड़े साफ-साफ रूख की वजह से एक नयी बेचैनी खड़ी हुई है। बात दलित-आदिवासी आरक्षण कम करने की नहीं है, बल्कि इन तबक़ों के भीतर मलाईदार तबक़ों को कम करने की है। हम बरसों से इस बात को लिखते आ रहे हैं, कि इन तबक़ों से क्रीमी लेयर को हटाने की जरूरत है क्योंकि अपनी बेहतर सामाजिक, आर्थिक स्थिति की वजह से इन समुदायों का यह हिस्सा ही सारे फायदों पर एकाधिकार जमा बैठता है, ओर इन्हीं तबकों के गरीब वंचित ही रह जाते हैं। 

अब चार दिन पहले, 22 अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) में संविधान पीठ की ये टिप्पणी कि सरकार एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करे, सरकार के लिए एक बार फिर से दिक्कत बन गई है। साल 2018 में सप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा जरनैल सिंह केस में की गईं टिप्पणियां अभी फैसले से हटी नहीं हैं कि अब दूसरी संविधान पीठ ने यही टिप्पणियां फिर से कर दी हैं। अदालत ने इस बार कहा है-एससी-एसटी वर्ग के जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर धनी हो चुके हैं, उन्हें शाश्वत रूप से आरक्षण देना जारी नहीं रखा जा सकता है। कल्याण के उपायों की समीक्षा करनी चाहिए ताकि बदलते समाज में इसका फायदा सभी को मिल सके। ताजा टिप्पणियां कोर्ट ने आंध्र व तेलंगाना के अनुसूचित क्षेत्रों में एसटी वर्ग को 100त्न आरक्षण देने के आदेश को रद्द करते हुए 22 अप्रैल को की हैं।

इस बारे में एक समाचार का हिस्सा कहता है- वर्ष 2018 में की गई क्रीमी लेयर की टिप्पणियों के दलित वर्ग में कड़े विरोध के बाद केंद्र ने दिसंबर 2019 मे शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर कर टिप्पणियों को फैसले से हटाने का आग्रह किया था। सरकार ने कहा था ये मामला सात जजों की बेंच को भेजा जाए क्योंकि एससी-एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर नहीं लागू की जा सकती। उनका आर्थिक रूप से सशक्त होना भी उनसे दलित होने का दाग नहीं मिटा पा रहा है। सरकार की यह याचिका शीर्ष कोर्ट में लंबित है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उसे सात जजों की बड़ी बेंच को भेजने पर विचार करने की सहमति दी है। अब तक क्रीमी लेयर का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में ही लागू होता है।
केंद्र सरकार 2018 के अदालती फैसले के खिलाफ 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी कि अदालत के पिछले बरस के एक फैसले को एक बड़ी बेंच सुने। सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की बेंच ने अनुसूचित जाति-जनजाति के पदोन्नति में भी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने का फैसला दिया था, और केंद्र सरकार पिछले बरस एक बार फिर अदालत के फैसले को पलटवाने के लिए इस मामले को सात जजों की बेंच को भेजने की अपील की थी। सरकार के वकील ने अदालत को कहा था कि यह एक भावनात्मक मामला है और सरकार चाहती है कि अधिक बड़ी बेंच इसे सुने। सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 2006 में पांच जजों की एक बेंच प्रमोशन से एसटी-एससी के मलाईदार तबके को बाहर कर चुकी थी, और 2018 में भी एक दूसरी बेंच ने ऐसा ही आदेश दिया था।

हमने उस वक्त भी लिखा था- केंद्र सरकार की यह अपील पूरी तरह नाजायज है, और एसटी-एससी तबकों की क्रीमीलेयर को पदोन्नति से बाहर तो रखना ही चाहिए, इसके साथ-साथ देश के आरक्षण कानून में भी इन तबकों के मलाईदार हिस्से को तमाम फायदों से बाहर करना जरूरी है। हम इसके बारे में पहले भी दर्जनभर बार लिख चुके हैं कि इन तबकों को जिस आधार पर आरक्षण दिया गया था, वे आधार आज भी जारी हैं, इसलिए आरक्षण जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह है कि दलित-आदिवासी तबकों के भीतर भी आरक्षण का फायदा पाने वाली पीढ़ी सरकारी नौकरियों से लेकर संसद और विधानसभा तक पहुंच चुकी है, और ऐसी ताकत पाने वाली पीढ़ी की संतानों को अतिरिक्त फायदे की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। ऐसे मलाईदार तबके का बड़ा सहज तर्क यह रहता है कि वे आज भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं, और इसलिए उन्हें आरक्षण का फायदा जारी रहना चाहिए, यह बात कुछ हद तक अगर सही भी है, तो भी इन तबकों के भीतर इनसे कमजोर नौबत वाली एक बहुतायत वाली आबादी है जो कि किसी फायदे तक नहीं पहुंच पाई है। इन तबकों के भीतर ताकतवर हो चुकी पीढ़ी के बच्चे संपन्नता और पढऩे-लिखने की सहूलियत, कोचिंग के चलते हुए इतने ताकतवर हो जाते हैं कि उनके स्वजातीय या स्वधर्मी बच्चे उनके आसपास भी नहीं फटक पाते। ऐसे में इस मलाईदार तबके को इन तबकों के ऊपर से ठीक उसी तरह हटाने की जरूरत है जिस तरह कढ़ाई में खौलते दूध के ऊपर से मलाई को किनारे किया जाता है, तब नीचे का दूध औंट पाता है। इन तबकों के लिए आरक्षित अवसरों और इनकी आबादी के बीच कोई अनुपात नहीं है। ऐसे में आरक्षण के फायदे घूम-फिरकर अगर उन्हीं सीमित लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलते चले जाएंगे, तो वह एक असंतुलित तबका बनने के अलावा और कुछ नहीं होगा। यह सामाजिक हकीकत समझना चाहिए कि क्रीमी लेयर को बाहर किए बिना उसी समाज के सबसे कमजोर लोगों की कोई संभावना नहीं बनती। जिस तरह और जिस तर्क के आधार पर ओबीसी के भीतर क्रीमी लेयर को फायदे से परे किया गया है वह तर्क एसटी-एससी पर भी लागू होता है और इसे अनदेखा करना सत्ता पर काबिज एसटी-एससी लोगों के पारिवारिक हित में जरूर है, लेकिन इन तबकों के बाकी गैरमलाईदार बहुतायत लोगों के हितों के ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी यह व्यापक मुद्दा गया नहीं है, लेकिन इसके बारे में  दलित-आदिवासी तबकों के गरीब-कमजोर लोगों को जाना जरूर चाहिए।

ऊपर की बात हमने पिछले बरस लिखी थी, हम आज भी उसी पर कायम हैं, इसलिए उस बात को यहाँ दुबारा दिया है। सरकारों में फैसले लेने वाले तमाम दलित-आदिवासी लोगों के बच्चे इस फैसले को अमल में लाने से फायदों से बाहर हो जाएँगे, इसलिए अब इसके खिलाफ रास्ता ढूँढा जाएगा, और दलित-आदिवासी वंचित तबका वंचित ही रह जाएगा। 
-सुनील कुमार


25-Apr-2020

नमस्ते ट्रम्प, अपने अहमदाबाद 
में छलांग लगते कोरोना की 
खबर तो आप ले ही रहे होंगे?

कोरोना दुनिया में छलांग लगाकर आगे बढ़ रहा है, जहां घट गया था, उस जापान में समंदर की लहर की तरह वह लौटकर आया, और वहां के प्रधानमंत्री को कहना पड़ा है कि महिलाएं सामान खरीदने सुपरमार्केट ना जाएँ क्योंकि वे अधिक बारीकी से देखकर, तुलना करके खरीदती हैं, आदमियों को भेजें जो कि तेजी से खरीदते हैं। बाजार से भीड़ को घटाने ऐसी तरकीबें सोचनी पड़ रही हैं। जिन लोगों को लग रहा है कि कोरोना खत्म होने को है उन्हें दुनिया के बड़े-बड़े कई विशेषज्ञों की भी सुनना चाहिए कि यह अभी साल-दो साल भी चल सकता है। अभी बहुत फिक्र की खबर है कि हिंदुस्तान के गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में कोरोना देश में सबसे तेज बढ़ रहा है। जब देश में पहला कोरोना मरीज मिल चुका था, उसके तीन हफ्ते बाद इसी शहर में 'नमस्ते ट्रम्प' हुआ था, ऐतिहासिक भीड़ जुटी थी, हजारों अमरीकी लोग भी आये थे, और शायद ही किसी की कोरोना जांच हुई थी। आज की खबर है कि इसी अहमदाबाद में हर 4 दिन में कोरोना पॉजिटिव दो गुने हो रहे हैं, पूरे गुजरात के मुकाबले इसी शहर में सबसे अधिक हैं। और वहां की भाजपा सरकार के म्युनिसिपल कमिश्नर ने कहा है कि अगर इसी रफ्तार से कोरोना पॉजिटिव बढ़े तो मई के आखिर तक अहमदाबाद में 8 लाख लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं। अब तक के करीब पौने 3 हजार कोरोनाग्रस्त में से आज सुबह तक सवा सौ से अधिक मारे जा चुके हैं। क्या अभी यह याद दिलाना गलत होगा कि राहुल गाँधी ने 12 फरवरी को कोरोना के खतरे के बारे में ट्वीट करके मीडिया के एक हिस्से में अपना मखौल बनवा लिया था, मीडिया के कुछ लोग उनकी खिल्ली उड़ाते हुए अतिसक्रिय हो गए थे। अब राहुल की ही बात सही साबित हुई है, और नमस्ते ट्रम्प के बाद के ये खतरनाक नतीजे अहमदाबाद को अमरीका बनाकर छोड़ रहे हैं। 

इस पर चर्चा जरूरी इसलिए है कि आज अलग-अलग हिन्दुस्तानी राज्य अपने-अपने हिसाब से कोरोना से लड़ रहे हैं, जिस उत्तर प्रदेश से सीएम योगी केरल को इलाज सिखा रहे थे, वह केरल देश में कोरोना-मोर्चे पर अव्वल कामयाब साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ ने खूब अच्छी तरह काबू किया है, लेकिन गुजरात अब तक ट्रम्प को ढो रहा है। इसी से सबक मिलता है कि नेता को एक वैज्ञानिक खतरे के वक्त तो अपने राजनीतिक फैसलों को अलग रखकर विशेषज्ञों को अपना काम करने देना चाहिए। नमस्ते ट्रम्प डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव अभियान तो था, लेकिन हिंदुस्तान से नमकीन ढोकला खाकर गए ट्रम्प ने हिंदुस्तान को धमकी देने में वक्त नहीं लगाया था। इसलिए मेडिकल खतरे के वक्त तो इस देश के नेता राजनीति, अपनी जिद, और अपने दम्भ दूर रखें तो ही उनकी आबादी बच पाएगी। 

आने वाले दिन अब तक की चुनौतियों से बहुत अधिक खराब होने के आसार हैं, और ऐसे में अगर लोग अपनी जिद से काम करते रहेंगे, तो डॉक्टर, मेडिकल वर्कर अपनी जान गंवाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगे। कुछ राज्यों ने राजस्थान के कोटा में पढ़ रहे अपने बच्चों को बसें भेजकर वापिस बुलवा लिया है, कुछ और राज्य तैयारी में हैं, छत्तीसगढ़ की बसें रास्ते पर हैं। इन बच्चों के लौटने के साथ ही राज्यों के सामने एक-एक पखवाड़े की चुनौतियां शुरू हो जाएंगी, और फिर यह सामाजिक तनाव तो है ही, कि गरीब मजदूर खुले आसमान तले छोड़ दिए गए हैं और कमरों में बसे संपन्न बच्चे कोचिंग से वापिस लाए जा रहे हैं। ये सारे सामाजिक सवाल राजनीतिक असुविधा बनकर खड़े होने वाले हैं, और दिक्कत यह भी आने वाली है कि प्रदेशों की सरहदों पर रोके गए गरीबों को वहां बियाबान में रोकने का अब क्या न्यायसंगत जवाब है? सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते इस किस्म के और भी बहुत से तनाव सरकारी फैसलों पर पडऩे वाले हैं। कल ही छत्तीसगढ़ में एक गरीब ने चौराहे पर आत्मदाह की कोशिश की जिसे अपनी बची को झारखण्ड से लाने की इजाजत नहीं मिली थी। आज राहुल गाँधी की चेतावनी को अनदेखा करने वाले मोदी सवालों के घेरे में हैं, लेकिन जैसे-जैसे वक़्त गुजरेगा, और भी नेता सवालों के बीच होंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार परेशानी झेल ही रहे हैं, उनकी सरकार में भागीदार भाजपा बिहार के बच्चों को वापिस लाने को लेकर तनाव की मुद्रा में है ही। 

गुजरात की भयानक हालत से बात शुरू हुई थी, इसलिए उसी पर लौटना ठीक है, कोरोना के भयानक खतरे को नेताओं के मनमाने फैसलों पर छोडऩा भयानक होगा। हर नेता के नमस्ते ट्रम्प जैसे गलत फैसले हो सकते हैं, जिनकी कीमत आम जनता जान देकर चुकाएगी, 12 बरस की एक मजदूर बच्ची तेलंगाना से छत्तीसगढ़ के रास्ते दम तोड़ ही चुकी है, वह तानाशाह लॉकडाउन की शहीद रही। आगे नेताओं की मनमानी के चलते जाने क्या होगा, कितने और शहीद होंगे।
-सुनील कुमार


24-Apr-2020

मुसीबत के वक्त कुछ बर्बादी 
तो होगी लेकिन मदद जरूरी 

कुछ भला करने में कई बार हाथ भी जलते हैं। इन दिनों हिंदुस्तान में लॉकडाउन के चलते करोड़ों मजदूर जगह-जगह फंसे हुए हैं, और लोग उनके खाने-पीने के इंतजाम में मदद भी कर रहे हैं। किसी दूसरे शहर में फंसे हुए अपने प्रदेश के मजदूरों के लिए दूर से फोन पर खुद और सरकार की मदद से भी कुछ लोग लगे हुए हैं। उन्होंने मदद करवाई, और फिर यह शिकायत सुनने मिली कि जिन लोगों के नाम मिले हैं, उनमें से बहुत सारे तो बरसों से उन्हीं शहरों के बाशिंदे हो गए हैं, वहीं मजदूरी करते हैं, और मुफ्त में राहत मिलते देख उन्होंने भी अपना नाम लिखा दिया था। सुनकर बुरा भी लगता है, लेकिन हकीकत यही है, इस देश में लोगों को राह चलते किसी त्यौहार के दिन कई भंडारे खुले दिखते हैं, तो मोटरसाइकिल खड़ी करके कई जगह प्रसाद के नाम पर खाना खा लेते हैं। ऐसे में आज मजदूरी बंद है, दुकानें बंद हैं, तो कुछ पुराने बसे लोग भी राशन ले रहे होंगे। 

कितने ऐसे लोग हैं जो मुफ्त लेना नहीं चाहते? अखबार मालिक रियायती जमीन चाहते हैं, पत्रकारों में से बहुत से हैं जो एक  से ज्यादा रियायती जमीन-मकान भी ले लेते हैं, मन्त्री और विधायक अपने मकान के बाद भी सरकारी मकान लेते हैं, फिर रियायती जमीन और रियायती मकान खरीद भी लेते हैं। करोड़पति बुजुर्ग भी रेल टिकट पर रियायत चाहते हैं। बहुत से संपन्न लोग ऐसे भी हैं जो कि बूढ़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मां-बाप को सूटकेस-बैग की तरह लेकर चलते हैं। सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को एक सहायक लेकर चलने की छूट दी है, तो औलाद उन्हें साथ में टांगकर भी चलती है। गरीब मजदूर मुफ्त का राशन पाकर भी कितना दौलतमंद हो जायेगा? हफ्ते भर का राशन नहीं खरीदना पड़ेगा। लेकिन उसका तो काम भी महीनों का छिना हुआ है। इसलिए उसकी नीयत पर अधिक हमला बोलना ठीक नहीं। 

यह तो वह देश है जिसमें आपातकाल में मीसाबंदी रहे लोगों के कुनबे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मीसा-पेंशन बंद होने के खिलाफ अदालत से फैसला लाते हैं, फिर चाहे संपन्न लोगों को उसकी जरूरत ही ना हो। मुफ्त का माल किसको बुरा लगता है? हिंदुस्तान में तो ट्रेन से बर्थ का रैग्जीन काटकर लाकर लोग उसका थैला बना लेते हैं, ट्रेन के पखाने से जंजीर लगा स्टील का मग्गा चुरा लेते हैं, होटलों में रखे सामानों को मुफ्त का मानकर सब कुछ भरकर लाने की फेर में रहते हैं। ऐसे देश में फंसे हुए बेरोजगार मजदूर के सामने यह दिक्कत भी है कि दुकानें खुली नहीं हैं, काम बंद है, मजदूरी बंद है, इसलिए भी कुछ सामान जुटाकर रखने की नीयत  हो सकती है। 
गरीब की नीयत जरूर डोलती होगी, लेकिन पैसेवालों की ना डोलती हो ऐसा भी नहीं। इसलिए आज के इस भयानक संकट के बीच भी लालची गरीबों को अनदेखा करके सभी गरीबों की मदद करनी होगी। और यह मदद कोई बहुत बड़ी नहीं है, यह थोड़े से अनाज की ही है, जो कि देश की सरकारों के लिए गोदामों से बाहर उफनकर एक दिक्कत भी बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में जब राशन कार्ड बन रहे थे, और गरीबी के पैमाने तय नहीं हो पा रहे थे, तब उस वक़्त की भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उसके सलाहकारों के कहे हुए यह मान लिया था जो भी गरीब, जिस भी लिस्ट में गरीबी की रेखा के नीचे आ रहे हों, उन्हें गरीब मानकर राशन दिया जाये। आज की नौबत वही है, जो अपने को भूखा कहे, उसके खाने का इंतजाम करना है। 100 में से चाहे 50 गरीब ना हों, लेकिन उनके चक्कर में बचे 50 भूखे-गरीब ना छूट जाएँ। संकट के वक्त ऐसी बर्बादी होती ही है, कुछ लोग ट्रक भरकर अनाज गायब करते हैं, कुछ लोग बिना जरूरत 5 किलो ले लेते हैं। बर्बादी रोकने के लिए राहत नहीं रोकी जा सकती। 
-सुनील कुमार


23-Apr-2020

लोगों के 3, सरकारों के 
6 महीने पूरे बर्बाद हुए... 

भारत सरकार ने तय किया है कि उसके कर्मचारियों, अधिकारियों को बढ़ा हुआ मंहगाई भत्ता अगले एक बरस नहीं दिया जायेगा। इससे एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों-अधिकारियों को नुकसान होगा, और सरकार को 37 हजार करोड़ से अधिक की बचत। इस कड़े फैसले का असर राज्यों में भी होगा जिनकी कमाई गड्ढे में जा चुकी है और चुनौतियां आसमान जितनी ऊंची हो गई हैं। राज्य सरकारें भी ऐसे में भत्ते देने में कटौती करेंगी। ऐसे में सरकारों को न सिर्फ इस बरस के लिए, बल्कि अगले कम से कम 5 बरस के लिए कमर कस लेनी चाहिए। केंद्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाएं, सभी की जिंदगी बदल जाएगी। आज देश और दुनिया पर जितनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है, उसे देखते हुए बहुत ही कड़े फैसलों का वक्त आया है, जो आज दिल कड़ा नहीं कर पाएंगे, वे कल मिट ही जायेंगे। देश के कई कारोबारों ने अपने लोगों की तनख्वाहों को कंपनी की कमाई से जोड़ दिया है, और वे लोग एक किस्म से कारोबार के नफे-नुकसान में भागीदार बनकर काम कर रहे हैं। पहले सुनाई पड़ता था कि कौन से बड़े फिल्मी सितारे फिल्म निर्माता से कमाई में हिस्से की शक्ल में मेहनताना लेते थे, अब अखबारों के कर्मचारी भी ऐसा कर रहे हैं। सवाल यह है कि कंपनी की ही कमाई नहीं रह जाएगी, तो कर्मचारी क्या पाएंगे, कहाँ से पाएंगे?

पिछले दिनों में हमने कई बार इस बात को इस जगह पर लिखा है कि कारोबारी-मैनेजर अब कर्मचारियों को यह देखकर ही काम पर जारी रखेंगे कि उनके बिना धंधे का काम क्या बिल्कुल ही बंद हो जायेगा? बहुत से बड़े धंधों से लोगों को निकाला गया है, लेकिन वह खबर इसलिए बनी क्योंकि वे धंधे अभी लॉकडाउन के दौरान भी चल रहे थे। टीवी और अखबार से निकाले लोगों की बातों की पहुंच भी अधिक थी इसलिए भी हम तक भी तैरती हुई बात जल्द पहुँच गई। लेकिन देश के 90 फीसदी कारोबार तो अभी बंद ही हैं, उनके शुरू होने पर पता चलेगा कि किसमें किस कर्मचारी की जगह है, ओर किसमें मालिक की जगह बची हुई है। लॉकडाउन पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद पता लगेगा कि क्या बचा है, और क्या कोरोना के साथ ही चल बसा है। 

लोगों को याद होगा कि नोटबंदी के साथ शुरू हुई बर्बादी जीएसटी के शुरू होने के साथ तेज होती गई थी, और कोरोना के आने के पहले ही हिन्दुस्तानी बाजार कराह रहा था। काम-धंधों का बुरा हाल था। और कोरोना की मार तो ऐसी बुरी हुई है कि लोगों की निजी, और छोटे कारोबारियों की 3 महीने की पूरी देनदारी खत्म कर दी जाये, तो ही वे पैरों पर खड़े हो सकेंगे। मजदूरों का सवाल है, तो उनके 3 महीने तो तबाह दिख ही रहे हैं, उनकी बकाया मजदूरी देनेवाले अपने कारोबार में पता नहीं दुबारा नजर आएंगे भी या नहीं। सरकारों के सामने दिक्कत यह है कि उसके खर्च तो बंधे हुए हैं, जिनमें कोरोना से लडऩे के लिए तो कुछ था ही नहीं, किसी राज्य के पास अपने लोगों को जि़ंदा रखने से अधिक के लायक कुछ नहीं रहेगा। केंद्र और राज्यों को नए कर्ज जुटाने होंगे ताकि वे लोगों को तनख्वाह दे सकें, और मजदूरों को रोजी का काम दे सकें। ऐसा लग रहा है कि कोरोना देश-प्रदेश के आधे सालाना-बजट को बर्बाद करके जायेगा, कमाई बंद, और अभूतपूर्व खर्च जारी। 

लोगों को याद होगा कि हम सरकारों के लिए यह लिखते आये हैं कि सरकारों को विपदा के लिए, बुरे वक्त के लिए तैयार रहना चाहिए।न देश, न प्रदेश की सरकारों ने ऐसे किसी वक्त के लिए कुछ सोचा था। फिर आज के हालात बताते हैं कि ये मेडिकल बंदिशें और साल-छह महीने चल सकती हैं। उसका खर्च अभी आना बाकी ही है। ऐसे में सरकारों को अगले 5 बरस के लिए अपनी इमारतों का रंग-रोगन बंद कर देना चाहिए, सारी साज-सज्जा, सौंदर्यीकरण को बंद कर देना चाहिए। नई इमारतें रोक देनी चाहिए, खासकर दिल्ली में संसद के इर्द-गिर्द के इलाके के लिए अभी मंजूर किये गए 20 हजार करोड़ रूपये तो तुरंत ही रद्द कर देने चाहिए। राज्य सरकारों को तो चाहिए कि ऐसे आर्थिक संकट के अधिक जानकार कुछ विशेषज्ञों से सलाह लेकर अगले कुछ साल तय करें। बाकी फिर।
-सुनील कुमार


22-Apr-2020

कितने अच्छे, कितने बुरे ?
कोरोनाग्रस्त हिंदुस्तान में देश भर से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं, कुछ खबरें संघर्ष की हैं, कुछ त्याग की, और कुछ उस हैवानियत की जिसे इंसान अपने से परे मानते हैं, हालाँकि जो है उनके भीतर की ही। बहुत सी जगहों पर हिन्दुओं का अंतिम संस्कार मुस्लिम कर रहे हैं, कहीं घर वाले अंतिम संस्कार को तैयार ना हुए तो एक तहसीलदार ने अंतिम संस्कार किया। कई जगहों पर कोरोना से मरीजों को बचाते हुए मरने वाले डॉक्टरों को उनके धर्म के कब्रिस्तान में दफनाने से समाज के लोग रोक रहे हैं, तो ताबूत को लिए हुए सरकारी कर्मचारी एक से दूसरे कब्रिस्तान भटक रहे हैं। डॉक्टरों, नर्सों, और पायलटों से मकान खाली करवाने के भी बहुत से मामले हो गए हैं, अभी मध्यप्रदेश में 13 सामानों की सरकारी मदद-किट में कुल दो सामान निकल रहे हैं। ऐसे में ही बहुत से भले लोग दूसरों की सेवा करते-करते जान भी दे-दे रहे हैं। रात दिन मदद करने में लगा एक सिक्ख नौजवान इसी दौरान सड़क-हादसे में मारा गया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर में ही सरकारी राहत शिविर में लोगों की सेवा में एक सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत कौर बल अपने दर्जनों साथियों के साथ रात-दिन लगे हुए हैं, और सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकले गरीबों को सड़क से मनाकर राहत शिविर में लाकर ठहरा रही हैं। 

एक ईसाई डॉक्टर के कोरोना-मोर्चे पर लड़ते हुए शहीद हो जाने पर जो ईसाई समुदाय अपने कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दे रहा, वह ईसाई समुदाय कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए जाना जाता था, और मदर टेरेसा जैसे लोग इस समुदाय में हुए थे। कहने को यह धर्म पड़ोसी से प्रेम करने को कहता है, लेकिन आज उसके कब्रिस्तान के दिल में भी समाज के एक हीरो के ताबूत के लिए जगह नहीं बची ! बुरा वक्त अच्छे लोगों की खूबियों और बुरे लोगों की खामियों के उजागर होने का बड़ा अच्छा वक्त होता है, और वही हो भी रहा है। देश, काल, और धरम से परे, सिक्ख सेवा में लगे हैं, तो लगे हैं। ऐसे वक्त उत्तर प्रदेश का एक निजी अस्पताल इश्तहार छपवाकर मुस्लिम मरीजों को आने से मना करता है, और देश में बढ़ाई जा रही सांप्रदायिक नफरत में अब अस्पताल भी अगर इश्तहार छपवाकर पेट्रोल डाल रहे हैं, तो फिर अब बचता क्या है?

देश की बहुत सी सरकारों में यह सोच दिख रही है कि ताकतवर और पैसेवाले तबकों को बचा लिया जाए, और मजदूर तो बिना छत के रहने के आदी ही हैं, इसलिए उन्हें खुले में छोड़ दिया जाए। यह सोच भी सरकारों में तथाकथित इंसानियत की कमी बताती है, और सरकार का अपना कोई दिल-दिमाग तो होता नहीं है, इसलिए यह सरकार चलाने वाले लोगों की संवेदनशून्यता है। देश के पैसे वालों में कितनी हमदर्दी है, यह उनके दिए दान से दिख चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारोबारियों के सीएसआर की रकम को प्रधानमंत्री के नए बनाये कोष में देने की तो छूट दे दी है, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के राहत कोष में उसे नहीं दिया जा सकता। यह बहुत ही बेतुका फैसला है, कोरोना से निपटने की सीधी जिम्मेदारी तो राज्य सरकारों की है, उनका तो अपने राज्य के कारोबार के सीएसआर पर पहला हक होना चाहिए। इस तरह इस बुरे वक्त में सरकार और समाज, दोनों की अच्छी सोच खुलकर सामने आ रही है। फिर यह भी समझ लेने की जरूरत है कि आज हिंदुस्तान पर कोरोना का कहर दुनिया से सबसे बुरे कहर वाले देशों के आस-पास भी नहीं है। अगर यहां भी सड़कों में लाशें गिरती होतीं तो क्या होता? यहाँ भी बुलडोजर से लाशों को कब्रिस्तान में भरना होता तो क्या होता? किसी दिन अगर कोरोना से बचने का टीका बाजार में आएगा और गिना-चुना आएगा तो ताकतवर लोग अपने परिवार के लिए उसे झपटने के लिए क्या करेंगे? क्या लोग एक-दूसरे का गला काटने को तैयार नहीं हो जायेंगे? बहुत सी टुकड़ा-टुकड़ा बातें हैं सोचने के लिए, आज से बहुत अधिक बुरे वक्त की कल्पना करके उसमें अपने-आपको रखकर देखें, कि हम कितने अच्छे, कितने बुरे हो सकते हैं?
-सुनील कुमार


21-Apr-2020

खाली वक्त पर क्या करें,
और क्या ना करें, दोनों... 

अभी कुछ महीने पहले तक किसने सोचा था कि एक ऐसा दिन आएगा कि लोगों के पास 40 दिनों से अधिक का वक्त खाली रहेगा, करने को कुछ नहीं रहेगा, घर बैठे लोग काम पर लौटने को तरस जायेंगे। लेकिन ऐसा दिन न सिर्फ आ चुका है बल्कि आधे से अधिक दिन गुजर चुके हैं। अब अगर लॉकडाउन और भी आगे नहीं बढ़ता है तो भी लोग अपनी जिंदगी का इतना बड़ा वक्त बर्बाद कर चुके हैं कि जितना किसी ने कभी सोचा ना होगा। लेकिन लॉकडाउन के ठीक पहले तक कामयाब लोगों का यही रोना रहता था कि उनके पास वक्त नहीं है। अब जब वक्त ही वक्त है तो क्या कर ले रहे हैं?

अभी भी दस दिन तो बाकी हैं ही, अगर चाहें, तो अपने पास बिना पढ़े रखी किताबें पढ़ सकते हैं, या दोस्त आपस में अपने पास की किताबों के नाम बाँट सकते हैं। एक-दूसरे  से लेकर पढ़ सकते हैं। एक दूसरे को फूहड़ लतीफों और पोर्नो से अलग कुछ अच्छे लेख, इंटरव्यू के लिंक भी भेज सकते हैं। बहुत से लोगों के पास वाईफाई है, वे चुनिन्दा फिल्में देख सकते हैं। इंटरनेट से दुनिया के महान लोगों के व्याख्यान सुन सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि बुजुर्ग कह गए हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर। जो मकान खंडहर हो जाते हैं, वहां मुजरिम अड्डा बना लेते हैं। इसलिए अपने वक्त का अच्छा इस्तेमाल करना मकसद चाहे ना हो, कम से कम उसका बुरा इस्तेमाल ना हो जाये यह ख्याल तो रख लेना चाहिए। जो लोग कुछ लिख पाते हैं, उनको अपनी आत्मकथा लिखना शुरू करना चाहिए, फिर चाहे वह कतरा-कतरा ही क्यों ना हो। छत्तीसगढ़ के एक बुजुर्ग कारोबारी हैं जो फेसबुक पर सक्रिय भी हैं। वे अपनी आत्मकथा के अंश लिखकर पोस्ट करते रहते हैं, लोगों की प्रतिक्रिया भी मिलती रहती है, और लिखने का काम भी निपटते रहता है। कारोबारी फायदा यह है कि अच्छे लिखे के खरीददार भी तैयार होते चल रहे हैं! जब किताब छापेंगे खरीददार इंतजार करते मिलेंगे!

यह वक्त लोगों को पुराने कागजात छांटने के लिए भी अच्छा मिला है, और कागजात में से फिजूल को निकलकर फेंकने का भी। घर के फालतू सामान, बेकार के कपड़े, जूते, बैग निकालने का भी अच्छा मौका है। अपना बोझ कम हो, औरों की जरूरत पूरी हो, और दूसरों की इन सामानों की जरूरत के लिए धरती पर बोझ बढऩे से बचे। जिन किताबों को दुबारा ना पढऩा हो, उन्हें दूसरों को देने के त्याग के बारे में भी सोचना चाहिए ताकि किताब छपने में जिस पेड़ की जिंदगी गई, उसके बलिदान का बेहतर, अधिक, इस्तेमाल भी हो जाये। बच्चे बड़ों का मोह छुड़वाएं, बड़े बच्चों का। लॉकडाउन खत्म होने तक घर का कबाड़ कम हो, बांटने के लिए लॉकडाउन खुले के दिन दूसरों के काम आ सकें इसकी तैयारी करके रखना चाहिए। 

जिंदगी में जब थोपा हुआ खाली वक्त छप्पर फाड़कर आया है, ऐसे में यह सावधानी भी बरतनी चाहिए कि इसका बुरा इस्तेमाल ना हो जाये। ठलहा बैठे लोग किसी ना किसी की बुराई करने में जुट जाते हैं, व्हाट्सएप्प पर किसी के बारे में बुरा भेजने लगते हैं, फेसबुक-ट्विटर पर नफरत, हिंसा, और गंदगी फैलाने लगते हैं। याद रखें कि सोशल मीडिया या मैसेंजर पर एक बार का लिखा हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। कर्नाटक के एक नौजवान भाजपा सांसद ने बरसों पहले खाड़ी के देशों की महिलाओं की सेक्स लाइफ के बारे में गंदी बातें लिखी थीं, वे आज सामने आकर उनका मुंह चिढ़ा रही हैं। आज के खाली वक्त में ऐसा कुछ ना करें कि आपका परिवार बाकी जिंदगी आपकी वजह से शर्मिंदगी झेले, जेल में टिफिन लेकर आये। आज का यह अंतहीन खाली वक्त बहुत अच्छी संभावनाओं और बहुत बुरी आशंकाओं, दोनों को लेकर आया है। जिंदगी में दुबारा शायद इतना टोकरा भरकर वक्त ना मिले, पिछली बार ऐसा वक्त 102 बरस पहले आया था, इसलिए सोच-समझकर इसका अच्छा इस्तेमाल करें, और अच्छा ही इस्तेमाल करें। शुभकामनायें। 
-सुनील कुमार


20-Apr-2020

बोए पेड़ बबूल के तो 
आम कहाँ से होय?

महाराष्ट्र में एक गांव में भीड़ ने वहां से गुजरते हुए तीन लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। कार से जाते हुए इन लोगों पर पहले पत्थरों से हमला भी किया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि उस इलाके में बाहर से आने वाले लोगों को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही थीं। देश के लॉकडाउन के बीच यह कार वहां पहुँची आगे जाने के लिए, लेकिन बच्चा-चोरों के लेकर किडनी-चोरों तक, कई किस्म की अफवाहें थीं। भीड़ ने तीनों कार सवारों को मार डाला। बाद में सामने आया कि इनमें से दो साधू थे। गांव के 100 से अधिक लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। जाहिर है कि हिन्दुओं में से बहुतों की भावनाएं बहुत आहत भी हुई होंगी। सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े हिंदूवादी नेता देश के बाकी लोगों पर हमला बोल रहे हैं कि जो लोग मुस्लिमों की भीड़-हत्या पर विरोध करते थे वे आज चुप क्यों हैं ? उनका सवाल सही है, और उसका एक बड़ा छोटा सा जवाब भी सही है, कि मुस्लिमों की भीड़त्या के पीछे हिन्दू हमलावर थे, और इस बार हिन्दू साधुओं की भीड़त्या के पीछे हिन्दू ही हैं। अब इसमें किसी साम्प्रदायिक हमले की बात तो है नहीं, इसलिए देश के बाकी लोग इस पर बोलें तो क्या बोलें ? बहुत खराब हिंसा हुई है, पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया है, 114 लोगों को। 

आज दिक्कत यह हो गई कि सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने के 'राष्ट्रधर्मÓ में लगे हुए लाखों लोगों को इस भीड़त्या के साथ पहले के मुस्लिमों की भीड़त्या के नाम गिनाकर एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम नफरत भड़काने का धंधा मिल गया है। हिन्दू धर्म पर इसे हमला बताते हुए पोस्ट करते हुए इसकी तुलना मुस्लिमों की भीड़त्या से इस तरह हो रही है कि मानो इस बार मारने वाले मुस्लिम थे। इस बात को बड़ी धूर्तता से छुपा लिया जा रहा है कि मारने वाले भी हिन्दू थे। असत्य बोले बिना खालिस अर्धसत्य से यह धारणा बनाई जा रही है कि इस बार भीड़ ने हिन्दू साधुओं को मारा तो ये लोग चुप हैं जो कि उस वक्त मुस्मिल की भीड़त्या पर इतना बोल रहे थे। यह चालबाजी, यह धूर्तता मासूम नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई भी सांप्रदायिक बात मासूम नहीं होती। ऐसे लोग यह भी मानकर चलते हैं कि उनकी नफरत के ग्राहक परले दर्जे के बेवकूफ हैं जो कि इस जालसाजी को समझ नहीं पाएंगे। 

इस देश में भीड़ को हत्या का हक देने की शुरुआत हाल के बरसों में हुई। दर्जनों जगहों पर कहीं दलितों को मारा गया तो कहीं मुस्लिमों को। लेकिन मारने वाले बिना किसी अपवाद के हिन्दू रहे, और बाद में उनकी हिमायत में बड़े-बड़े बयान भी बड़े बड़े लोगों ने दिए। जम्मू में जिस मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक दस हिन्दू लोगों ने बलात्कार करके उसे मार डाला, उन मुजरिमों को बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर के हिन्दू भाजपाई मंत्री तक सड़कों पर उतरे, तिरंगे झंडे लिए हुए जुलूस निकाले गए। जिस देश में भीड़ के राज का इतना हिंसक सिलसिला शुरू किया गया, बढ़ाया गया, बचाया गया, उसके बारे में हमने बार-बार लिखा था कि मौके पर किया गया भीड़ का इंसाफ तभी तक सुहायेगा जब तक भीड़ के बीच कोई अपना ना फंसा हो। और वह दिन आ ही गया। जब देश में भीड़त्या की परंपरा शुरू कर दी गयी तो फिर एक न एक दिन यह तो होना ही था। आज भी नफरत के सौदागरों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि यह मौका मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का नहीं है। हिन्दू मारे, हिन्दू मरे, इसमें मुस्लिम क्या करे?

आज जो लोग देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों से रोने-पीटने को कह रहे हैं, उनको समझना चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष ताकतें ही इतने बरसों से समझा रही थीं कि नफरत फैलाना बंद करो वरना किसी दिन यह आग दूसरे धर्मों को भी जला देगी, कातिलों के धर्मों को भी जला देगी, और महाराष्ट्र में अभी ठीक वही हुआ। देश में भीड़त्या की संस्कृति को भारतीय संस्कृति का दर्जा दिला देने वालों को अब भी समझ लेना चाहिए, वरना अगली भीड़त्या उनके घरवालों की भी हो सकती है, उन्हीं के धर्म वालों के हाथों।
-सुनील कुमार


19-Apr-2020

कदम-कदम पर मुल्क में हो 
गए हैं दो किस्म के कानून 

सोच छुपती नहीं है। कल ही इसी जगह हमने लिखा था कि किस तरह देश में करोड़ों गरीबों को बेघर, बेसहारा, बेरोजगार छोड़कर भाजपा के बड़े-बड़े नेता अपने राज्यों में ले गए। नरसिम्हा राव नाम के भाजपा के बड़े नेता-सांसद उत्तर भारत में फंसे अपने तीर्थ यात्रियों को अपने आंध्र-तेलंगाना ले गए, उत्तरप्रदेश से योगी अपने प्रदेश के बच्चों को राजस्थान के कोटा से महंगी कोचिंग के बीच से निकलकर ले गए, और सबसे पहले तो उत्तराखंड में फंसे गुजरात के तीर्थयात्रियों को गुजरात भेजा गया था। गरीब और अमीर के बीच एक सरकारी खाई है। दूसरे देशों में बसे संपन्न हिन्दुस्तानियों के लिए मुफ्त का हवाई जहाज, और देश के मेहनतकश मजूरों के लिए सड़कों पर भूखे पेट पर लाठियां !

अब मानो वही काफी नहीं था, देश की छोटी-बड़ी दूकानें लॉकडाउन में बंद ही रहेंगी, लेकिन लोग जरूरी सामानों की ऑनलाइन खरीदी कर सकेंगे। कल तो मोदी सरकार का हुक्म ऑनलाइन सब कुछ खरीदने की छूट वाला था, भारी विरोध के बाद अब ऑनलाइन खरीदी सिर्फ जरूरी चीजों की हो सकेगी। लेकिन मजदूर किसके सामने विरोध करे ? उसके पास तो चैम्बर ऑफ कॉमर्स या कैट जैसी कोई संस्था है नहीं, इसलिए उसे भूख खत्म करने का सामान ऑनलाइन ही बुलाना होगा, शायद रोजगार भी ऑनलाइन आ जायेगा। मजदूर की औकात आज सिर्फ जहर खरीदने जितनी रह गई है। 

देश के भीतर सम्पन्नता के आधार पर भेद-भाव बढ़ते ही चल रहा है। कर्नाटक में भूतपूर्व प्रधानमंत्री और भूतपूर्व मुख्यमंत्री के परिवार की शादी तमाम नियमों को तोड़कर हुई, उसमें भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री भी शरीक हुए, और भीड़ भरी तस्वीरों के बाद भी कह दिया कि इस मुद्दे पर किसी बात की जरूरत नहीं है। उधर गुजरात के एक मंदिर में हुई शादी में पुलिस ने दूल्हा-दुल्हन, परिवार, पंडितों, 14 लोगों को गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि वे मामूली लोग थे। पहले लॉकडाउन की वजह से एक बार शादी आगे बढ़ी थी, फिर लॉकडाउन बढ़ गया तो थककर मंदिर में शादी कर रहे थे। 

उत्तर भारत की एक तस्वीर है कि एक बूढ़ा रिक्शा चला रहा है, और पुलिस के सामने गिड़गिड़ा रहा है कि उसके चक्के की हवा ना खोलें, वह भूख से मर जायेगा। अनगिनत शहरों के वीडियो हैं कि किस तरह पुलिस और बाकी अफसर सब्जी वालों के ठेले पलट रहे हैं, लात मारकर सब्जियां गिरा रहे हैं। दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार की खबर है कि एक कुख्यात खरबपति कारोबारी के कुनबे के 32 लोगों को महाराष्ट्र के एक हिल स्टेशन के अपने रिसोर्ट तक जाने के लिए एक आईपीएस अफसर इजाजत देता है, और खुद सरकार को अफसर के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ती है। इसी महाराष्ट्र में सब्जी वाले पुलिस की लातें खा रहे हैं, सब्जी गँवा रहे हैं। किसी कार वाले को पीटने की एक भी तस्वीर किसी ने देखी है?

इस देश में इसके पहले गरीब की ऐसी मौत थी? 

-सुनील कुमार


18-Apr-2020

जिसको ईश्वर ने ही धिक्कार रखा है,
उस बेघर मजदूर को सरकार भी 
धिक्कारे तो उसमें हैरानी कैसी?
 

पहले गुजरात के तीर्थयात्रियों की खबर आई थी, कि उत्तराखंड के हरिद्वार में फंसे 1800 तीर्थयात्रियों को गुजरात भेजने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री ने राज्य के भाजपा-मुख्यमंत्री को फोन किया, और वहां से आरामदेह बसों में लोगों को वापिस गुजरात भेजा गया। फिर एक खबर आई कि दक्षिण के एक भाजपा संसद की दखल से दक्षिण के हजारों तीर्थयात्रियों को उत्तर भारत से वापिस रवाना किया गया। फिर कल खबर आई कि राजस्थान के कोटा में मंहगी कोचिंग ले रहे उत्तरप्रदेश के 3000  छात्रों को वापिस लेने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बसें भेजी हैं। अब आज की खबर है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र सरकार से इजाजत मांगी है कि इस राज्य के कोटा में पढ़ रहे छात्रों को वापिस लाने की छूट दी जाए। इस बीच खबर आ रही है कि देश के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई है कि देश भर में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों को वापिस उनके गांव पहुंचने का आदेश सरकार  को दिया जाये। 

यह फैसला चाहे किसी राज्य का हो, किसी पार्टी की सरकार का हो, हम इसके सख्त खिलाफ हैं। आज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तो करोड़ों मजदूरों की जिंदगी की जिम्मेदारी से पूरी तरह हाथ झाड़ लिए हैं। एक माफी माँगी प्रधानमंत्री ने, और रास्तों में फंसे करोड़ों मजदूरों ने उसे एक वक्त भूनकर खा लिया, माफी से उनका एक वक्त का पेट भर गया। कुछ की भूख कम रही होगी तो दो वक्त का पेट भी भर गया होगा। लेकिन उसके बाद ? तीन हफ्तों के लॉकडाउन के बाद फिर तीन हफ्तों का अगला लॉकडाउन! एक माफी को कोई कितने दिन तक खाये? और फिर मानो माफी की सब्जी में मिर्च और नमक डालने की जरूरत थी, राज्य अपने-अपने इलाकों के सम्पन्न लोगों को निकालकर ले जा रहे हैं! योगी आदित्यनाथ कोटा में महंगी कोचिंग ले रहे बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, जो कि वहां पर हॉस्टलों में हैं, या किराए के मकानों में हैं, जिनके पास खाने के पैसे हैं, जिनके पास एटीएम कार्ड हैं, फोन हैं, रहने की जगह है! और जो मजदूर राज्यों की नाकामी के चलते दूसरे राज्यों में काम पर जाने को मजबूर होते हैं, उनके लिए क्या? उनके लिए धिक्कार-दुत्कार और खुले आसमान तले भूखी मौत? ऐसी भूखी मौत की बद्दुआ तो जिसको लगनी होगी लगेगी ही, लेकिन मौत से पहले भी पल-पल इनकी बद्दुआ किसी न किसी को लग ही रही होगी। 

हमारा तो मानना है कि सम्पन्नता के पैमानों पर इतने ऊपर के लोगों को सरकारी साधनों, और जांच-इलाज की प्राथमिकता देना एक जुर्म है। जिस मोदी सरकार ने दूसरे देशों में बसे हिन्दुस्तानियों को देश लाने के लिए हवाई जहाज भेजे, उसने देसी मजदूरों को आस-पास के लोगों की भीख पर जि़ंदा रहने को मजबूर करके छोड़ दिया? आज करोड़ों मजदूर देश भर में जगह जगह फंसे हैं, उनके साथ औरत-बच्चे भी हैं, और जरा दूरी पर खड़ी टकटकी लगाए देखती मौत है। खुद छत्तीसगढ़ सरकार के रोज के जारी किए हुए आंकड़े बता रहे हैं कि किस राज्य में कितने हजार लोगों को छत्तीसगढ़ सरकार वहां अनाज दिलवा रही है, मदद कर रही है। ऐसे बेघर गरीब लोगों की गिनती लाखों में होगी। लेकिन जब इनको लाने के कोई इंतजाम नहीं हैं, तो फिर राजस्थान कोटा के कमरों में महफूज़ बच्चों को लाने की मशक्कत क्यों? हैरानी यह है कि जिस प्रशांत भूषण को चुनाव नहीं लडऩा है वह तो गरीबों की बात कर रहे हैं, और जो नेता आम, गरीब जनता के वोटों से चुनाव जीतते हैं, वे संपन्न तीर्थयात्रियों की, महंगी कोचिंग के बच्चों की फिक्र कर रहे हैं। क्या चुनावी-वोटों के लिए भी अब गरीब वोटों की दरकार नहीं रह गई है? क्या कोई प्रवासी मजदूर वोट के दिन भी दूसरे राज्य में ही मजदूरी करते रहते हैं ? 

आज देश में वैसे भी संपन्न और विपन्न, घरवालों और बेघर के बीच सामाजिक दूरी हो चुकी है। कोरोना के पहले भी, और कोरोना के बाद तो और भी अधिक। अब लोग खुद कोरोनाग्रस्त रहते हुए अपने नौकरों को पुलिस के हवाले कर रहे हैं। देश की किसी सरकार को यह हक भी नहीं है कि अपने सीमित साधन-सुविधाओं का इस्तेमाल बेबसों को किनारे धकियाकर सम्पन्नों को बचाने पर लगाए। लोगों को वापिस लाने के बाद उनकी मेडिकल जांच और इलाज की भी तो जिम्मेदारी आएगी, उनको क्वारंटाइन सेंटरों में रखने की बात भी आएगी। क्या सब पर सम्पन्नों का ही हक रहेगा? देश में आरक्षण के विरोधी 'कोटाÓ को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, अब सरकारें एक सम्पन्नता-कोटा लागू कर रही हैं !

जिस उत्तरप्रदेश की 3सौ बसों की कोटा जाने की तस्वीरें कल से तैर रही हैं, उसी उत्तरप्रदेश के बगल के बिहार के एनडीए मुख्यमंत्री, और भाजपा के भागीदार नीतीश कुमार का एक बयान अभी सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा- 'कोटा में पढऩे वाले छात्र संपन्न परिवार के आते हैं अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों के साथ रहते हैं। फिर उन्हें क्या दिक्कत है? जो गरीब अपने परिवार से दूर बिहार के बाहर हैं, फिर तो उन्हें भी बुलाना चाहिए।'
-सुनील कुमार


17-Apr-2020

जरूरी चीजों के बाजारों पर 
गैरजरूरी रोक से पैदा खतरे 

पूरे हिंदुस्तान में लॉकडाउन का अभी आधा वक्त गुजरा है और उन लोगों को भी दिक्कतें होने लगी हैं जिनके सर पर छत है, और घर पर महीने-पखवाड़े का खाना है। इन लोगों के पास अगले कुछ या कई महीनों के लिए जिंदगी की गारंटी भी है। हम उन लोगों के बारे में तो इसी जगह लगातार लिखते आ रहे हैं जो बेघर हैं, भूखे हैं, प्रदेशों की सरहदों पर अटके हुए हैं, सामने अगले खाने की भी कोई गारंटी नहीं है। कल मुंबई के एक कमरे में रह रहे बिहार के दर्जनों मजदूरों का एक वीडियो आया है जिसमें वे बता रहे हैं कि किस तरह बिना खाए हुए वे एक-एक कमरे में 50 -50 लोग जी रहे हैं, और कोरोना जैसे संक्रमण से बचने का शारीरिक दूरी का कोई रास्ता ऐसे में उनके पास नहीं है। लेकिन इनके बारे में कल और आगे फिर से, आज हम उन शहरों के बारे में बात करना चाहते हैं जहां की आबादी के पास खरीदने-खाने को है, और जिनकी भीड़, या लंबी कतारें दुकानों पर लग रही हैं। 

पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ के शहरों में कई किस्म के प्रयोग देखे जा रहे हैं। जिले के अफसर तय करते हैं कि भीड़ लगने से कैसे रोका जाए ताकि कोरोना को शारीरिक संपर्कों से सफर करने ना मिले। इसके लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली तरकीब दुकानों को कुछ ही घंटों के लिए खोलना है। राजधानी रायपुर में अभी तीन दिनों का एक अघोषित कर्फ्यू सा कहा जा रहा है, वह चल रहा है। सड़कों पर रोका जा रहा है, दुकानों, और सुपरबाजारों पर लोग बीते कल टूट पड़े क्योंकि तीन दिन सब बंद रहने की मुनादी की गई थी। आज जिलों में तैनात अफसरों ने कभी किसी महामारी के दौरान इंतजाम देखा नहीं है क्योंकि ऐसी जरूरत वाली महामारी सौ बरस पहले आई थी। अफसर इसे कफ्र्यू की भाषा में देख रहे हैं, और कर्फ्यू की तरह लागू कर रहे हैं। नतीजा यह है कि गिनी-चुनी दुकानों के गिने-चुने घंटों में लोग टूटे पड़ रहे हैं। इस पूरी मशक्कत का पूरा मकसद ही खत्म हो जा रहा है। कर्फ्यू की जरूरत आम तौर पर किसी सांप्रदायिक दंगे के वक्त आती है, जब पुलिस को खतरा लगता है कि लोग घरों के बाहर निकलते ही हिंसा करेंगे। अभी तो ऐसा कोई खतरा है नहीं। अभी तो जरूरी सामानों के सारे बाजारों को एक साथ खोल दिया जाये तो भीड़ ख़त्म हो जाएगी। आज खतरा भीड़ का है जो कि पुलिस दुकानों पर, सब्जी बाजारों पर नहीं रोक पा रही है। शहर में गिने-चुने सब्जी बाजारों को इजाजत देने का मतलब ही भीड़ इकट्ठी होने देना है। शहर के सौ-दो सौ स्कूल-कॉलेज के अहातों में सब्जी बाजार की छूट दे दी जाये तो सारी धक्का-मुक्की खत्म हो जाये। 

दिक्कत यह है कि जिसका जो हुनर होता है, उसे उसी में इलाज दिखता है। पुलिस और प्रशासन को प्रतिबंध, रोक, बलप्रयोग ही समझ पड़ता है, इसलिए वे किसी भी दिक्कत में उसी का इस्तेमाल करते हैं। और विकसित देशों में म्युनिसिपल इन बातों को तय करती है, तो हमारे इधर के राज्यों में अधिकतर शहरों में म्युनिसिपल की दिलचस्पी महज कंस्ट्रक्शन और खरीदी में रहती है। नतीजा यह है कि किसी सांप्रदायिक दंगे वे वक्त के इंतजाम को महामारी की नौबत में लागू किया जा रहा है। पिछले सौ  बरस में कभी किसी महामारी के इंतजाम में रोक-टोक लगी नहीं थी, कम से कम हिंदुस्तान के इस इलाके में। 

अफसरों को कम से कम रोक-टोक से रोज की जिंदगी चलने देनी चाहिए, खासकर जिन बातों के लिए भीड़ लग रही है, उन बातों पर से रोक तुरंत हटा देनी चाहिए। बड़ी अजीब बात है कि लोगों को किराने के लिए जूझना पड़ रहा है, लेकिन सस्ती-महंगी, हर किस्म की शराब आसानी से मिल रही है। बड़ी-बड़ी होटलों के वीडियो हवा में तैर रहे हैं कि किस तरह लोग जा रहे हैं और दारू खरीद रहे हैं। प्रशासन और पुलिस के अफसरों को शहरी बसाहट के जानकार लोगों से राय लेकर बाजार का इंतजाम करना चाहिए, क्योंकि वहीं पर हुई गलती आज बीमारी फैला सकती है। अभी लॉकडाउन पता नहीं और कितने हफ्ते चले, लेकिन जरूरी चीजों के बाजार पर गैरजरूरी रोक से नुकसान छोड़ कुछ नहीं हो रहा। 
-सुनील कुमार