संपादकीय

Date : 11-Aug-2019

कांग्रेस पार्टी ने कल सुबह से शाम तक मशक्कत करके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी एक बार फिर सोनिया गांधी पर डाली है जो कि कार्यकारी अध्यक्ष रहेंगी, और हो सकता है कि पार्टी सचमुच ही एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की तलाश करे, और न भी करे तो भी कम से कम सोनिया को महज कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। बहुत से लोगों को यह बात एक नाटक लग सकती है, और कांग्रेस के आलोचकों को इस पर मजाक उड़ाने का एक अच्छा मौका मिल गया है। सोनिया गांधी 19 बरस तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, और यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि राजीव गांधी के जाने के बाद उन्होंने अपने को और अपने बच्चों को राजनीति से अलग ही कर लिया था, और पी.वी. नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ दबी-छुपी हरकतें की भी थीं। विद्याचरण शुक्ल के मार्फत राव ने बोफोर्स को लेकर कई ऐसी अफवाहों को जिंदा करने की कोशिश की थी जिनसे सोनिया गांधी के लिए एक दिक्कत खड़ी हो। लेकिन बेअसर रहकर ऐसी बातें वक्त के साथ दम तोड़ गईं, और नरसिंहराव के बाद एक वक्त ऐसा आया जब कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व के लिए एक बार फिर सोनिया गांधी की मोहताज हुई, लौटकर उनके दरवाजे पहुंची। सोनिया ने पार्टी की अगुवाई करते हुए उसे सत्ता का वापिस पहुंचाया, और यूपीए ने दो-दो कार्यकाल पूरे किए। इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि विदेशी मूल की सोनिया गांधी भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की महज बहू थीं, और अनचाहे हालातों के चलते वे राजनीति में आने को मजबूर हुई थीं। और शायद जिस वक्त उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल के फैसले की घोषणा हो जाने के बाद भी दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र की प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया, वह दुनिया का शायद सबसे बड़ा इंकार था। उन्होंने पूरे दिल से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, जो कि तमाम पैमानों पर उन हालातों में उस पार्टी के भीतर की सबसे अच्छी पसंद थे। उनके पहले कार्यकाल के बाद सोनिया ने पार्टी और गठबंधन की अगुवाई करते हुए यूपीए को दूसरी बार सत्ता पर पहुंचाया था, और उस वक्त भी वे खुद किसी सरकारी ओहदे पर आने, या राजनीति में आ चुके अपने बेटे को मंत्री बनाने या किसी और सरकारी ओहदे पर बिठाने के मोह से पूरी तरह अछूती और बची रहीं। इन तमाम बातों को देखते हुए सोनिया गांधी का मूल्यांकन आज के संदर्भ में किया जाना चाहिए जब भारत की चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने भारतीय संसदीय ढांचे को ठीक उसी तरह एकध्रुवीय बना दिया है जिस तरह दुनिया मेें अमरीका एकध्रुवीय व्यवस्था बन चुका है। 

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता पर वापिसी न होने को लेकर उसकी बड़ी आलोचना हुई, और खासकर उसके अध्यक्ष राहुल गांधी की। यह इसलिए हुआ कि कांग्रेस के चाहे या अनचाहे, देश के मीडिया में मोदी के मुकाबले राहुल तस्वीर पेश की गई थी, और जब चुनावी नतीजे निकले तो मोदी के मुकाबले राहुल कहीं नहीं टिके, राहुल की पार्टी कहीं नहीं टिकी, राहुल का यूपीए गठबंधन कहीं नहीं टिका। लेकिन इसके साथ-साथ पिछले लोकसभा चुनाव में यह बात भी साफ हुई कि राहुल से बिल्कुल परे का अखिलेश-मायावती गठबंधन भी मोदी के मुकाबले कहीं नहीं टिका, राहुल से परे की एक पार्टी, लालू की आरजेडी कहीं नहीं टिकी, पश्चिम बंगाल में ममता ने गहरी शिकस्त झेली, दक्षिण भारत में कांग्रेस से परे की पार्टियां भी मोदी से हारीं। लेकिन मीडिया के मार्फत जिस तरह की जनधारणा मोदी और राहुल के मुकाबले की बनाई गई थी, उसके मुताबिक शिकस्त केवल राहुल के नाम दर्ज की गई। हमने उस वक्त भी आंकड़े गिनाते हुए लिखा था कि कांग्रेस ने पांच बरस पहले के लोकसभा चुनाव के पहले के मुकाबले अपनी हालत सुधारी थी, और राहुल गांधी के लिए इस्तीफा देने की बात नहीं की। राहुल गांधी को ऐसे नाजुक मौके पर इस्तीफा नहीं देना चाहिए था। लेकिन देश में समय-समय पर पार्टियों और सरकारों में बहुत से नेताओं ने किसी हादसे या हार की जिम्मेदारी लेते हुए कभी रेलमंत्री की कुर्सी छोड़ी, तो कभी पार्टी की। ऐसा कम ही होता है कि पार्टी के नेता हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष का पद छोड़ दें, लेकिन राहुल गांधी ने वैसा किया था, उस पर अड़े रहे, और नया अध्यक्ष चुनने से कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने को अलग भी कर लिया।

ऐसे हालात में कांग्रेस ने काफी मशक्कत करके नया अध्यक्ष चुनने की कोशिश की, और शायद ऐसी सर्वसम्मति नहीं जुट पाई कि वे किसी एक नाम को कल शाम घोषित कर पाते। ऐसे में उन्होंने खासे अर्से से बीमार चल रहीं सोनिया गांधी पर एक बार फिर पार्टी की अगुवाई करने का जिम्मा डाला है, जो कि बहुत बुरा फैसला भी नहीं है। कोई भी पार्टी अध्यक्ष अपने भीतर से ही चुन सकती है, और कांग्रेस पार्टी एक कामयाब अमित शाह को तो अपना अध्यक्ष बना नहीं सकती, इसलिए उसने अपने भीतर से ही अध्यक्ष चुना, चाहे वह पूर्णकालिका हो, चाहे कार्यकारी। यह समझने की जरूरत है कि राजनीतिक दलों के बीच नेहरू-गांधी परिवार को जिस कुनबापरस्ती के लिए कोसा जाता है, वह तो भारतीय राजनीति के डीएनए में शुमार एक खूबी या खामी है जिससे बहुत सी पार्टियां कभी नहीं उबर पातीं। कांग्रेस में चाहे दिखावे के लिए ही सही, बीच-बीच में बहुत से दूसरे अध्यक्ष रहे। लेकिन शिवसेना को देखें, बसपा को देखें, तेलुगुदेशम को देखें, एडीएमके को देखें, डीएमके को देखें, नेशनल कांफ्रेंस को देखें, पीडीपी को देखें, अकाली दल को देखें, सपा को देखें, आरजेडी को देखें, टीएमसी को देखें, या आन्ध्र-तेलंगाना की दूसरी पार्टियों को देखें, एक कुनबा, एक नेता, पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत से परे क्या दिखता है? पार्टी अध्यक्ष के पद को छोड़ दें, तो पूरी की पूरी भाजपा केन्द्रीय राजनीति से लेकर हर राज्य तक दूसरी, तीसरी, और चौथी पीढ़ी के नेताओं से भरी हुई हैं, उन्हीं कुनबों के लोग पार्टी संगठन में, संसद में या विधानसभाओं में पहुंचते हैं, और भाजपा के भीतर महज अध्यक्ष का ही एक पद तो है जो कि कुनबापरस्ती का नहीं है, बाकी तो तमाम टिकटें, तमाम पद कुनबापरस्ती के डीएनए से ग्रस्त हैं ही। इसलिए नेहरू-गांधी परिवार की कुनबापरस्ती अब फिजूल की बात हो गई है, पूरी भारतीय राजनीति ही कुनबापरस्त है, व्यक्तिवादी है, एक व्यक्ति पर केन्द्रित है, और उसे अलोकतांत्रिक हद तक जाकर नेता बनाए रखने वाली है। 

अब सोनिया गांधी की चर्चा करें, तो वे इंदिरा के बाद और मोदी के पहले के पूरे दौर में सबसे कामयाब पार्टी अध्यक्ष रही हैं। मोदी को कोई पैमाना मानकर सोनिया या कांग्रेस या राहुल की उनसे तुलना जायज नहीं है क्योंकि मोदी अभूतपूर्व हैं, और उन्होंने भारतीय राजनीति के खेल के सारे नियम-कायदे, सारे बैट-बल्ले सब कुछ बदलकर रख दिए हैं, और वे अपनी तरकीबों के साथ अतुलनीय हैं, बेमिसाल हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लोकतंत्र में दूसरी पार्टियां शटर गिराकर घर बैठ जाएं। कांग्रेस का कल का फैसला उसकी सीमाओं और संभावनाओं को देखते हुए उसका सबसे अच्छा फैसला है। न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के भीतर, बल्कि कांग्रेस पार्टी के बाहर, और उसकी अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन में भी सोनिया सबसे अधिक स्वीकार्य नेता हैं, सबसे अधिक धीर-गंभीर नेता हैं, और सबसे अधिक कामयाब साबित नेता भी हैं। एक पार्टी अपने कार्यकारी अध्यक्ष को कब तक बनाए रखे यह उसकी अपनी प्राथमिकता है। ऐसे में सोनिया की शक्ल में इस देश की राजनीति को विपक्ष की एक मजबूत अगुवाई मिली है जो कि यूपीए को भी एक नई ताकत देंगी, और जो यूपीए के बाहर की पार्टियों से भी एक बेहतर तालमेल की संभावना रखती हैं। 

सोनिया के इस जिम्मेदारी को सम्हालने के साथ ही सोशल मीडिया पर उनका मखौल उड़ाने की भी एक नई और बहुत बड़ी संभावना खड़ी हुई है, और लोकतंत्र में लोग उसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है, और लोकतंत्र का मतलब ही आलोचना, कटु आलोचना, और नाजायज आलोचना तक की छूट रहता है, और आज हो सकता है कि लोगों को महज सोनिया गांधी एक ऐसा सुरक्षित निशाना दिख रही हैं जहां से उन पर कोई कानून या गैरकानूनी वार होने का खतरा न हो। अच्छा है लोगों को आज किसी के तो खिलाफ खुलकर लिखने का मौका मिले, और सोनिया गांधी ने पिछले दशकों में कई किस्म के वार झेले हैं, और उनके सामने यह मिसाल भी है कि किस तरह नेहरू उनके खिलाफ बने हुए सबसे कड़वे और सबसे अन्यायपूर्ण कार्टूनों की भी तारीफ करते थे। आने वाले दिन देश की राजनीति में, लोकतंत्र में सोनिया गांधी की एक महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करेंगे।  
-सुनील कुमार


Date : 10-Aug-2019

अभी जब कश्मीर को केन्द्र सरकार ने केन्द्र शासित प्रदेश बनाया है, और देश भर के गैरकश्मीरी लोगों में से एक बड़े तबके के लोग इस पर सोशल मीडिया में गंदी बातें लिख रहे हैं, तो कुछ लोगों ने यह बात भी लिखी है कि किस तरह देश के मीडिया के नामी-गिरामी चेहरे इन बातों को अनदेखा कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे ही चर्चित टीवी-सितारों के नाम गिनाए हैं कि जब आजम खान ने लोकसभा में एक महिला सांसद के बारे में आपत्तिजनक बात कही, तो ये तमाम नाम उन पर टूट पड़े थे, और उन्होंने आजम के खिलाफ क्या-क्या लिखा था। इसी तरह आज जब कश्मीर की लड़कियों को सामान की तरह बाकी देश में लाने की खुली चर्चा चल रही है, और इसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तक शामिल हो गए हैं, तब नामी-गिरामी टीवी चेहरों की यह टोली उसे अनदेखा करते हुए खामोश है। 

दरअसल इस देश में मीडिया के लोगों के बीच खेमेबंदी इतनी मजबूत हो गई है कि बहुत से पत्रकारों को कायदे से तो अपने पसंदीदा राजनीतिक दल में चले जाना चाहिए। ऐसा करके वे अधिक ईमानदार हो सकेंगे, और उनकी टीवी-पत्रकारिता की साख भी बढ़ सकेगी। मीडिया के लोगों का राजनीतिक रूझान कोई गलत बात नहीं है, अगर वह खुलकर मंजूर किया जाए। बहुत से नामी-गिरामी अखबारों के संपादक भी राजनीतिक दलों, राजनीतिक विचारधारा, या किसी सांस्कृतिक खेमे से जुड़े रहते हैं, और जब वे इस बात को खुलकर मंजूर कर लेते हैं, तो कोई दिक्कत नहीं बचती। मीडिया को कहीं से भी निष्पक्ष या तटस्थ रहने की जरूरत नहीं रहती, और उसे अपनी प्रतिबद्धता, अपनी पसंद या नापसंद खुलकर बताते हुए उसके बाद लिखना या बोलना चाहिए जिससे उसकी कही बातों को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में लिया जा सके। खतरा वहीं रहता है जहां लोग तटस्थ बने रहने का अभिनय करते हैं, और बेशर्मी के साथ किसी नेता या किसी पार्टी के चापलूस बने हुए काम करते हैं। 

भारत में कई राजनीतिक दलों के अपने अखबार हैं। दक्षिण भारत में पार्टियों या नेताओं के अपने टीवी चैनल भी हैं। यह एक अधिक ईमानदार व्यवस्था है जिसमें पार्टी के मुखपत्र, या ऑर्गन कहे जाने वाले अखबारों को उनकी संबद्धता के साथ ही देखा जाता है। वामपंथी पार्टियों, शिवसेना, भाजपा या कांग्रेस पार्टी के अपने अखबार हैं जिनसे कभी भी तटस्थ होने की उम्मीद नहीं की जाती। लेकिन जब देश के प्रमुख समाचार चैनल या कई अखबार चुनाव के वक्त या फिर पांचों बरस बारहमासी तटस्थता की खाल ओढ़े हुए बेईमानी का प्रचार करने में लगे रहते हैं, तो उनकी वजह से पूरे मीडिया की साख खत्म होती है। आज हिन्दुस्तान में टीवी चैनलों पर समाचार देखते हुए लोगों को यह समझ नहीं पड़ता कि विचारों के सैलाब में से समाचार कैसे निकाले जाएं, और उनके किन हिस्सों पर भरोसा किया जाए। टीवी की खबरों में जितने तथ्य रहते हैं, उससे अधिक विशेषण रहते हैं, और लोग चारण या भाट की तरह, या मुखौटे पहनकर फुटपाथ पर प्रचार करने वालों की तरह लगे रहते हैं, और वे अपने आपके पत्रकार होने का दावा भी करते हैं। 

भेडि़ए को भेडि़ए की तरह रहना चाहिए, उसमें कोई बुराई नहीं है, उसकी अपनी एक नस्ल है, और फिर वह हिंसक हो, या मांसाहारी हो, वह उसका चरित्र है, उसकी कुदरती जरूरत है। दिक्कत तब है जब भेडिय़ा गाय की खाल ओढ़कर आए, और फिर लोगों को धोखा देकर खाए। देश के टीवी चैनलों में से एक-दो चैनल खुलकर साम्प्रदायिक, और हिंसक हैं, भड़काऊ हैं, और धर्मान्धता बढ़ाते चलते हैं। ऐसे में उनको पहचानना बड़ा आसान रहता है, और बाकी चैनलों को, कुछ अखबारों को भी अपने दर्शकों और पाठकों के लिए ऐसी सहूलियत का इंतजाम करना चाहिए। टीवी समाचार चैनल अपने चैनल के निशान के साथ-साथ पसंदीदा पार्टी का निशान भी लगा सकते हैं, और उससे वे एकदम से बेईमान से हटकर ईमानदार हो जाएंगे। भारत में पुरातत्व के जानकार पत्थरों पर लिखे हुए को पढ़कर बताते हैं कि सैकड़ों बरस पहले भी किस तरह चारण और भाट रहते थे जिन्हें राजा के गुणगान करने की तनख्वाह मिलती थी। आज भी अगर लोग अपनी यह शिनाख्त उजागर करके यह काम करेंगे तो उनका अधिक सम्मान होगा, वरना आज वे बिके हुए मीडिया के नाम से जाने जाते हैं। लोगों को जो काम करना हो, ईमानदारी से और पारदर्शी तरीके से करना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 09-Aug-2019

आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर दुनिया के बहुत से देशों में आदिवासियों द्वारा, और उनके लिए तरह-तरह के जलसे किए जा रहे हैं, लेकिन उनके बुनियादी मुद्दे अमेजान के जंगलों से लेकर बस्तर तक, और हिंदुस्तान की सुप्रीम कोर्ट से लेकर हॉलीवुड की फिल्म अवतार तक खतरे में हैं। आज भारतीय सुप्रीम कोर्ट देश के दस लाख से अधिक आदिवासियों को बेदखल करने के एक मामले में लगा हुआ है, और इससे पूरे देश में आदिवासी-गैरआदिवासी तबकों के बीच एक गहरी खाई और चौड़ी होने जा रही है। इससे परे चारों तरफ आदिवासी इलाकों में जंगल और खदान को लेकर धरती के इन मूलनिवासियों के बीच भारी बेचैनी फैली हुई है क्योंकि हजारों बरस से इस जमीन पर इन पेड़ों के बीच रहते चले आ रहे ये समाज आज सब कुछ खो देने का खतरा झेल रहे हैं।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की बात करें तो यहां पर सबसे घने आदिवासी इलाके बस्तर में नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच बेकसूर आदिवासियों का लहू बहते चौथाई सदी से अधिक हो चुका है, और शहरी समाज के लिए ये मौतें महज आंकड़ा हैं। एक बरस से दूसरे बरस ये आंकड़े कुछ कम हो जाते हैं, तो बड़ी-बड़ी वर्दियां उन्हें ही अपनी कामयाबी मान लेती हैं। लेकिन मौतों का यह सिलसिला आदिवासियों के शोषण की जमीन पर पनपा था, और अब फल-फूल रहा है। आज के दिन देश के तमाम नक्सल प्रभावित राज्यों को चार कदम आगे बढ़कर इसके शांतिपूर्ण निपटारे की लोकतांत्रिक पहल करनी चाहिए, और नक्सल हिंसा में झुलसे हुए आदिवासी इलाकों के लिए वही एक बड़े हक की बात हो सकती है। दूसरी बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में उन अरबपति-खरबपति कारखानेदारों की है जिन्होंने साजिश और जालसाजी से आदिवासी जमीन खरीदी है, और जिनके मामले सामने आ जाने के बाद भी सरकारी नरमी का मजा पाते हुए ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि आदिवासियों को धोखा देकर खरीदी गई जमीन पर कारखाने खड़े करने वालों को जेल भेजे ताकि वह बाकी लोगों के लिए एक मिसाल बन सके। छत्तीसगढ़ और हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में जहां-जहां खदानें हैं, वहीं-वहीं जंगल भी हैं, और वहीं-वहीं आदिवासी भी हैं। खनिजों के लिए आदिवासियों को किस तरह बेदखल किया जाता है, यह हिंसानियत धरती से लेकर अवतार फिल्म के दूसरे ग्रह तक दिखाई पड़ती है, और  हर प्रदेश को ऐसी हिंसा खत्म करने के लिए हर कोशिश करनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ में टाटा को जमीन दिलवाने के लिए बस्तर के आदिवासी इलाकों के बीच पिछली सरकार ने एक ऐसे कलेक्टर को तैनात किया था जिसने फर्जी ग्रामसभाएं करवाकर आदिवासी जमीनों की लूट की सरकारी सुपारी उठाई थी, और अब वह फर्जीवाड़ा उजागर हो चुका है। आज सही समय है जब राज्य सरकार ऐसे तमाम जुर्म की सजा तय करे, ताकि प्रदेश में दूसरे कोई कलेक्टर ऐसे जुर्म का हौसला न कर सकें। आदिवासियों से जुड़े हुए मुद्दे बहुत साफ हैं, और तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनसे अच्छी तरह से वाकिफ हैं। लेकिन हमने बस्तर जैसे इलाकों में यह देखा है कि किस तरह वहां के आदिवासी नेता अपने समाज के व्यापक हितों को कारोबारियों के हाथ बेच देने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं। यह सिलसिला उजागर होना चाहिए, इसका भांडाफोड़ होना चाहिए। हम सामाजिक हकीकत से परे एक राजनीतिक हकीकत की बात करें, तो भी आदिवासी समाज और इलाकों की अब तक चली आ रही अनदेखी किसी पार्टी को सत्ता में आने से रोक सकती है, यह पिछले चुनावों के नतीजों से साफ हो चुका है। इसलिए किसी और वजह से न भी हो, तो भी अपने खुद के राजनीतिक अस्तित्व के लिए नेताओं और पार्टियों को आदिवासी मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। यह केवल जरा से मुद्दे हैं, आदिवासियों से जुड़े और भी कई मुद्दे हैं जिन्हें उठाना चाहिए और महज साल का एक दिन इन पर चर्चा के लिए काफी नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 08-Aug-2019

कश्मीर में मोदी सरकार ने जिस रफ्तार से जो कुछ किया है, वह सबके सामने है। अब उसके हो जाने के बाद अलग-अलग तबके अपने-अपने हिसाब से उसे देख रहे हैं। देश की दूसरी सबसे प्रमुख पार्टी, कांग्रेस में नेताओं में मतभेद दिख रहा है कि मोदी सरकार के 370 पर फैसले का कितना विरोध किया जाए, और कितना नहीं। दूसरी तरफ कश्मीर के भीतर आज संगीनों के साए में एक सन्नाटा दिख रहा है, और जाहिर है कि वहां के लोगों को अभी तो घरों के भीतर रखा गया है, बिना फोन और इंटरनेट के रखा गया है, इसलिए उनकी तुरंत कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है। सरकार ने अपनी तरफ से जनधारणा बदलने और बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को कश्मीर भेजा है जो वहां आधा दर्जन चुनिंदा लोगों के साथ खड़े होकर कुछ खाते-पीते दिख रहे हैं, जिससे सरकार लोगों के बीच भरोसा कायम करते दिख रही है।

लेकिन इस बीच लिखने की एक वजह आज यह आन पड़ी है कि देश के तमाम कट्टर हिंदूवादी, आक्रामक राष्ट्रवादी, मुस्लिम-विरोधी, और पाकिस्तान-विरोधी जैसी ताकतें मोदी सरकार के फैसले पर खुशियां मनाने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर जिस जुबान में कश्मीरियों के बारे में लिख रही हैं, उससे नफरत की खाई गहरी और चौड़ी होने के सिवाय और कुछ नहीं हो रहा है। जो धर्मांध और साम्प्रदायिक लोग मुस्लिम डिलीवरी बॉय के हाथ से आया हुआ डिब्बाबंद खाना भी लेने से मना करें, वे लोग भी आज कश्मीरी मुस्लिम लड़कियों से शादी की हसरतें निकाल रहे हैं, और कश्मीर में जमीन खरीदकर मकान बनाकर बसने की बातें कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला इस कदर हिंसक और अश्लील है कि मानो मोदी की फौज ने कोई दुश्मन देश जीत लिया हो, और फौज के हर सिपाही का अब यह हक है कि वह जीते हुए देश की लड़कियों पर कब्जा कर लें। आदमी की एक हिंसक सोच खुलकर सामने आ रही है कि कैसे दूसरे की जमीन और उनकी लड़कियों पर कब्जा किया जाए। यह लग ही नहीं रहा है कि ये लोग इसी कश्मीर को पाकिस्तान को देने के बजाय उसे चीर देने की बातें कर रहे थे। ऐसा लगता है कि इनके लिए कश्मीर महज जमीन का एक टुकड़ा है, और वहां के इंसानों में से उन्हें महज जवान लड़कियों की देह पसंद है।

ऐसी हमलावर सोच, और ऐसी हिंसक जुबान की नुमाइश इस देश को एक घटिया समाज से भरा हुआ साबित कर रही हैं, और इसके बारे में देश के बड़े-बड़े नेता, खासकर वे नेता जो कि कश्मीर का यह फैसला लेकर उस पर अमल कर रहे हैं, वे तमाम लोग चुप हैं। वे जब तक कुछ बोलते नहीं, तब तक इस देश में दंगाई सोच रखने वाले नफरतजीवी लोग हवा में इतना जहर घोल चुके रहेंगे कि बाद में उस कश्मीर में जाकर बसने वाले कश्मीरी पंडितों को उसका हिसाब चुकता करना होगा। आज कश्मीरी पंडितों में से जो लोग कश्मीर लौटकर वहां बसने की संभावना देखते हैं, वे लोग शांत हैं। लेकिन जिन लोगों को वहां कभी नहीं जाना है, वे कश्मीर को एक जमीन और एक देह की तरह देखकर अपनी हिंसा का लावा चारों तरफ फैला रहे हैं। यह वक्त है कि देश के बड़े नेता मुंह खोले, और ऐसे बकवासी मुंहों को बंद रखने की चेतावनी दें।
-सुनील कुमार


Date : 07-Aug-2019

एक पखवाड़े के भीतर दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की दो बड़ी महिला नेताओं का गुजर जाना दिल्ली की आंखों को गीला कर गया है। शीला दीक्षित के बाद सुषमा स्वराज। दोनों की सोच एकदम अलग, दोनों की पार्टियां एकदम अलग, लेकिन दोनों के व्यक्तित्व की कुछ बातें ऐसी रहीं कि जिन्हें लेकर पार्टियों के आर-पार, खेमों के आर-पार, राजनीति से बाहर के लोगों के बीच भी एक दुख दिखा, उनके लिए तारीफ दिखी, और लोग अच्छी बातें कहते दिखे। इन दोनों की सज्जनता से परे, काबिलीयत से परे, और कामयाब राजनीतिक करियर से परे इनके बीच बहुत सी और बातें एक सी नहीं रहीं, लेकिन दोनों की भलमनसाहत को लोग जिस तरह याद कर रहे हैं, उससे एक बात उभरकर आती है कि भले लोगों के बीच भलमनसाहत की थोड़ी सी कदर अभी बाकी है। और राजनीति महज ओछेपन का खेल नहीं रह गई है, और लोग अच्छी बातों का अब तक सम्मान करते हैं। 

यह बात कहना आज जरूरी इसलिए हो गया है कि राजनीति मुजरिमों से लद चुकी है, ओछापन एक लुभावना औजार हो गया है, नैतिकता की कोई जगह नहीं रह गई है, और ऐसे में कम संख्या में रह गए, अल्पसंख्यक बिरादरी की तरह एक बिरादरी बन गए भले लोगों को भी अच्छी तरह याद करना जरूरी है। चूंकि सत्ता से जुड़ा हुआ बहुत लंबा राजनीतिक जीवन आमतौर पर कुछ विवादों से घिर ही जाता है, इसलिए शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज दोनों के साथ कुछ अप्रिय बातें जुड़ी रहीं जिनकी चर्चा के बिना उनके व्यक्तित्व पर चर्चा अधूरी रहेगी। शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में कुछ भ्रष्टाचार हुआ था, जिसकी सीधी जवाबदेही उन पर नहीं थी, लेकिन वह उनके कार्यकाल में जरूर हुआ था। इसी तरह सुषमा स्वराज के लंबे सत्ताकाल में कर्नाटक में खदानों के मालिक रेड्डी बंधुओं के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते उनकी तस्वीर से वे कभी नहीं उबर पाईं, और जैसे-जैसे रेड्डी बंधु जुर्म की दुनिया में शोहरत पाते रहे, सुषमा स्वराज तोहमत पाती रहीं। इसके अलावा एक और बात के लिए सुषमा स्वराज को याद किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। जब देश में कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री चुना था, उसके ठीक पहले संसद में सुषमा स्वराज ने अपने खुद के स्तर से खासे नीचे जाकर कहा था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी, जमीन पर सोने लगेंगी, और एक भिक्षुणी की जिंदगी गुजारेंगी। उनके यह कहने के बाद भी सोनिया को नेता चुना गया था, यह अलग बात है कि उन्होंने खुद यह फैसला लिया कि मनमोहन सिंह उनके मुकाबले बेहतर प्रधानमंत्री होंगे, और वे यह ओहदा मंजूर नहीं करेंगी। इसलिए सुषमा की बात पूरी होने का मौका नहीं आया। 

लेकिन इससे परे यह याद रखने की जरूरत है कि संसद के भीतर, संसद के बाहर, संयुक्त राष्ट्र संघ में, या दूसरे सार्वजनिक मंचों पर सुषमा स्वराज ने अपनी पार्टी की नीतियों पर चलते हुए अपने खुद के संघ के बुनियादी मूल्यों पर चलते हुए एक राजनीतिक और संसदीय शिष्टाचार कायम रखा, और उस बात के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। वे बहुत शानदार बोलने वाली थीं, संसद में भाजपा की अगुवाई करने में वे एक बहुत मजबूत नेता साबित हुईं, और जब तक मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना आसमान पर छा नहीं गई थी, ऐसा मानने वाले लोग कम नहीं थे कि एक दिन वे भाजपा की प्रधानमंत्री बन सकती हैं। मोदी एक अभूतपूर्व कद और विशाल अस्तित्व लेकर भाजपा की केन्द्रीय राजनीति में पहुंचे, और भाजपा के तब तक के तमाम राष्ट्रीय नेता एक-एक कर, धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए जिनमें सुषमा स्वराज भी शामिल थीं। पिछली मोदी सरकार के पांच बरस के कार्यकाल में वे अपने तमाम राजनीतिक जीवन के सबसे कमजोर दौर से गुजरीं, जब प्रधानमंत्री ही सारी विदेश नीति को तय कर रहे थे, उस पर अमल कर रहे थे, और सुषमा महज उनके एक सहायक के रूप में विदेश मंत्री के ओहदे पर बैठी हुई भर थीं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मोदी ने एक धूमकेतू की तरह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी, और उनके आभामंडल में किसी और की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाद में अपनी सेहत के चलते वे खुद ही मोदी सरकार के दूसरे, और मौजूदा कार्यकाल में किनारे हो गई थीं, और सत्ता से रिटायर होने के बाद एक बरस भी वे नहीं गुजार पाईं, और सेहत उनका साथ छोड़ गई। एक वक्त था जब देश की भाजपा की राजनीति में सुषमा स्वराज बहुत बड़ा नाम बन चुकी थीं, और तब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात से बाहर निकले भी नहीं थे। लेकिन राजनीति महज बरसों की गिनती नहीं होती है, वह किसी वक्त पर सत्ता पर काबिज रहने की सबसे अधिक काबिलीयत रखने का नाम भी होती है, और उसमें मोदी के मुकाबले और कोई भी नेता दूर-दूर तक नहीं टिक पाए थे, लेकिन फिर भी सुषमा ने एक सहायक की भूमिका में भी पांच बरस गुजारते हुए दुनिया भर के हिन्दुस्तानियों की मदद करने, भारत आकर इलाज करवाने के लिए पाकिस्तान सहित बाकी पड़ोसी देशों के मरीजों की मदद करने का जो काम किया है, उसे लोग हमेशा याद रखेंगे। शीला दीक्षित को भी डेढ़ दशक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए उसे एक बेहतर ढांचा देने के लिए याद रखा जाएगा, और राजनीति में ऊंचे आदर्शों पर चलने, भलमनसाहत कायम रखने के लिए भी याद रखा जाएगा। 

एकाएक दिल्ली में बसी हुई इन दो बड़ी नेताओं का जाना भारतीय राजनीति के केन्द्र में भलमनसाहत के घनत्व को एकाएक कम कर गया है। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Aug-2019

जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के फैसले पर कल जब इसी जगह हमने लिखा, दोपहर के उस वक्त संसद में इस फैसले पर बहस चल ही रही थी। उसके बाद रात तक अलग-अलग बहुत से तबकों ने कुछ जानकारियां सामने रखीं, कुछ सोच बताई, और कश्मीर से आने वाली जमीनी खबरों ने वहां का एक सन्नाटा बयां किया। वह सन्नाटा जो पिछले दशकों में आए दिन सड़कों पर सुरक्षा बलों पर पथराव की शक्ल में सामने आता था, लेकिन कल के कश्मीर में उन पत्थरों को हाथ नहीं मिले, हाथों को किसी वर्दी का निशाना नहीं मिला, या इनमें से किसी को भी कोई हौसला नहीं मिला। इस फैसले की मुनादी के साथ वहां पर जिस बवाल की आशंका थी, उसे देखते हुए मोदी सरकार ने वहां केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बड़ी मौजूदगी पहले ही तय कर दी थी, और दो तरह के आंकड़े हवा में हैं, जिनमें से एक में कहा जा रहा है कि कश्मीर में सुरक्षा बल हर इक्कीस कश्मीरियों पर एक है, और दूसरे में कहा जा रहा है कि हर पांच कश्मीरियों पर एक बंदूकबाज सुरक्षा बल तैनात है। इनमें से जो भी बात सही हो, इस ताजा तैनाती के पहले भी, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के भी पहले, कश्मीर दुनिया में सबसे बड़ी फौजी तैनाती बनी हुई थी, जो कि पिछले पांच बरस में और बढ़ी ही है। 

फिलहाल केन्द्र सरकार के कश्मीर को विभाजित करने, केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले के खिलाफ वहां कोई पत्थर उठते नहीं दिख रहा है, और देश के अधिकतर राजनीतिक दलों के बीच इस फैसले के खिलाफ कोई बुनियादी असहमति नहीं दिख रही है। कुछ पार्टियां इसके खिलाफ हैं, लेकिन वे जनता के बीच वैसे भी हाशिए पर जा चुकी हैं, और उनकी असहमति एक लोकतांत्रिक मुद्दा जरूर है, लेकिन उसका बहुसंख्यक आबादी के वोट से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में आज कुछ बातें उठ रही हैं जिन्हें मोदी के संसदीय बाहुबल तले भी सुनने और समझने की जरूरत है। लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत नहीं होता, अल्पमत की असहमति उसका एक अविभाज्य हिस्सा होता है, और उसे ध्यान में रखते हुए आज इतिहास में दर्ज हो रहे तथ्यों और तर्कों को भी सुनना चाहिए। 

मोदी सरकार ने कल जिस फैसले की घोषणा की है, उसके पीछे जो संवैधानिक बुनियाद बताई है, उस पर देश के एक बड़े संविधानवेत्ता सोली सोराबजी का कहना है कि कश्मीर की संविधान सभा की अनुमति से ही कल का यह फैसला किया जा सकता था, उसके बिना नहीं। और अभी तो कश्मीर की विधानसभा भी अस्तित्व में नहीं है, इसलिए महज राज्यपाल की सहमति को राज्य की संविधानसभा या विधानसभा की सहमति नहीं माना जा सकता। इसके अलावा एक दूसरा तर्क कल रात की एक बहस में उभरकर यह आया है कि इसके बाद क्या केन्द्र की कोई भी सरकार धारा 356 के तहत किसी भी राज्य में विधानसभा को भंग करके, उसके बाद उस राज्य के विभाजन का फैसला महज इस बिना पर ले लेगी कि राज्यपाल ने उसके लिए सहमति दी है? क्या राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले का ऐसा बेजा इस्तेमाल करने से किसी सरकार को रोका जा सकेगा जिसके बाद उस राज्य को विभाजित करने का फैसला ले लिया जाए? और यहां तो कश्मीर को न सिर्फ विभाजित किया गया है, बल्कि उसे केन्द्र प्रशासित प्रदेश भी बना दिया गया है जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के मातहत ही काम करेगा। अगर भारत के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करके, या उनका हवाला देकर ऐसा किया जाए, तो क्या केन्द्र की कोई सरकार उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर उसकी जगह पांच केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने से रोकी जा सकेगी? कुछ वकीलों ने कल यह राय भी रखी है कि ऐसी बहुत सी संवैधानिक शर्तों की अनदेखी करके यह फैसला लिया गया है, और इसके खिलाफ जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में भी अपील की जा सकती है, और सुप्रीम कोर्ट में भी। अगर, और यह तय भी लगता है कि, इसके खिलाफ अदालत में जो तर्क दिए जाएंगे उनमें भारत में कश्मीर के शामिल होने के वक्त किए गए लिखित वायदे भी उठाए जाएंगे जिनके बारे में लोग अलग-अलग तथ्य और तर्क सामने रख रहे हैं। 

आज भारत के राजनीतिक दलों में एक बड़ा असमंजस है कि देश के इस सबसे अधिक लोकप्रिय साबित हो रहे मुद्दे का कैसे विरोध करें, किस हद तक विरोध करें, और कितना विरोध करें? अभी जब यह बात लिखी जा रही है उस वक्त लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह कांग्रेस से यह सवाल भी कर रहे हैं कि वे इस मुद्दे पर अपना रूख साफ करे। वे संसद की सर्वोच्चता की बात भी कह रहे हैं, और आज के माहौल में उनकी कही बातों से असहमति जाहिर करने वाले लोग एक बड़ा जनाधार खोने का खतरा भी रख रहे हैं। 

लेकिन आज इस मुहाने पर हम कुछ और बातों को भी उठाना चाहते हैं। अगर किसी अदालती रोकटोक के बिना कश्मीर का दर्जा केन्द्र प्रशासित प्रदेश का हो जाता है, और वहां पर आबादी और सरकार को मिले हुए विशेष अधिकार खत्म हो जाते हैं, तो वैसी नौबत में आम और गरीब कश्मीरी की जमीन-जायदाद को बाकी हिन्दुस्तान के भूमाफिया से बचाने के लिए क्या किया जा सकता है? उनकी जिंदगी भर की अकेली दौलत को बचाने के लिए क्या हो सकता है। पौन सदी से अलग नियम-कायदों से हिफाजत में रखे गए कश्मीरियों पर अब जब देश-विदेश के बाजार का एकाएक हमला होगा, तो उससे गरीब कश्मीरियों के बचाव के बारे में तुरंत फिक्र करनी चाहिए, वरना लोग वहां उनसे तरह-तरह के सौदे लिखवाकर उनका सबकुछ लूट लेंगे। 
-सुनील कुमार 


Date : 05-Aug-2019

कश्मीर पर इतिहास का सबसे बड़ा फैसला, कोई विशेष कानून नहीं

कश्मीर को लेकर भारत सरकार कोई बड़ा फैसला लेने जा रही थी, यह तो हफ्ते भर से जाहिर था ही, और यह फैसला क्या हो सकता है, इसे लेकर भी अटकलें इसलिए आसान थीं कि भारतीय जनता पार्टी ने जनसंघ के जमाने से कश्मीर को लेकर जो नारा लगाया हुआ था, या अधिक सही यह कहना होगा कि जो नारे लगाए हुए थे, उनसे परे कुछ करना उसके लिए पीछे हटने सरीखा होता, इसलिए मोदी सरकार ने आज कश्मीर से धारा 370 खत्म करते हुए दो कदम और आगे का काम किया है। संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने इसके साथ-साथ घोषणा की कि जम्मू-कश्मीर को केन्द्र प्रशासित राज्य का दर्जा दिया जा रहा है। कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया है, और वह एक किस्म से केन्द्र सरकार के मातहत राज्य हो गया है जिसकी विधानसभा तो रहेगी, लेकिन वहां कोई भी विशेष कानून नहीं बच जाएगा। इस फैसले में लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाया है। 

किसी भी केन्द्र सरकार के फैसले के स्तर पर यह एक बड़ा फैसला है, और इससे कश्मीर के भविष्य पर एक अभूतपूर्व और बड़ा असर होने जा रहा है। यह फैसला एक ऐसे समय आया है जब एक तरफ तो अफगानिस्तान से अमरीकी फौजों की वापिसी को लेकर, उसमें अमरीका को पाकिस्तान की जरूरत है। दूसरी तरफ यह फैसला ऐसे वक्त भी आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान लगातार अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता करने की अपील कर रहे हैं, और अमरीकी राष्ट्रपति भी इस दुस्साहसी न्यौते का मजा लेते दिख रहे हैं। ऐसे वक्त पर इस फैसले का कुछ अंतरराष्ट्रीय असर भी, कम से कम भारत और पाकिस्तान के बीच तो होगा ही। कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष की कुछ पार्टियां भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है कि कश्मीर के खास हालात को अनदेखा करते हुए, भारत के नक्शे में कश्मीर की एक सरहदी जगह को अनदेखा करते हुए यह फैसला लिया गया है। कश्मीर में प्रदेश के बाहर के लोगों के जमीन-जायदाद खरीदने, वहां कारोबार करने पर जो भी रोक अब तक लगी हुई थी, वह इस फैसले के साथ खत्म हो जाएगी, और इससे कश्मीर में लोगों की मिल्कियत पर भी बड़ा असर पड़ेगा, और बाकी देश के साथ कश्मीर के रिश्ते पर भी। आज विपक्षी पार्टियां इसे भाजपा और एनडीए के संसदीय बाहुबल से लिया गया एक मनमाना फैसला कह रही हैं, और कश्मीर के स्थानीय नेताओं का यह भी कहना है कि यह फैसला देश के संविधान के खिलाफ है जिसे सरकार ले ही नहीं सकती थी। दूसरी ओर सरकार के इस फैसले के हिमायती लोगों का कहना है कि आज का सारा फेरबदल आधी सदी के पहले राष्ट्रपति के एक आदेश को बदलकर, आज राष्ट्रपति के जारी किए गए एक नए आदेश का है, और इसमें कोई संवैधानिक दिक्कत नहीं है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी जरूर दी जाएगी, और कुछ लोगों का यह मानना है कि वह चुनौती अधिक खड़ी नहीं रह पाएगी। 

इस फैसले से जम्मू-कश्मीर की स्थानीय राजनीति में भाजपा या एनडीए, कांग्रेस या कश्मीरी पार्टियों के चुनावी भविष्य पर जो असर पड़ेगा, वह तो अलग ही रहा, लेकिन इस फैसले से बाकी हिन्दुस्तान में भाजपा-एनडीए को एक हौसलामंद पार्टी-गठबंधन की साख मिलते दिख रही है जो कि जो कहती है वह करती है। भाजपा जनसंघ के जमाने से जो नारे लगाते आ रही थी, उन नारों को आज जमीन पर उतारकर उसने अपने पुराने वायदे को ही पूरा किया है। देश में एक तबके का यह मानना है कि भारतीय गणराज्य में शामिल होते समय कश्मीर ने जो शर्तें रखी थीं, उन शर्तों को आज तोड़ दिया गया है। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के एक बड़े पूर्व केन्द्रीय मंत्री, और एक बड़े वकील अरूण जेटली में यह ट्वीट किया है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में एकीकरण 1947 में हुआ। अनुच्छेद 370 इसके बरसों बाद 1952 में लागू हुआ, और अनुच्छेदद 35-ए 1954 में लागू हुआ। इसका साफ मतलब है कि ये दोनों अनुच्छेद भारत में विलय की शर्त थे ही नहीं। 

आज भाजपा और मोदी के कटु आलोचक दल और नेताओं में से कई केन्द्र के इस फैसले साथ हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसका समर्थन किया है, और मायावती की बसपा ने भी। एनडीए के बाहर की कुछ और पार्टियां भी इस फैसले के साथ हैं। और यह फैसला कश्मीर की पिछली आधी सदी की पृष्ठभूमि में लिया गया फैसला है जो कि बताता है कि कश्मीर में लगातार चल रही राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा, और वहां के अलगाववाद के चलते भारत का एक बड़ा हिस्सा यह मानता था कि कश्मीर में भारत विरोधी, आजादी के हिमायती, या पाकिस्तान परस्त लोगों को काबू में रखने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। कश्मीर के बाहर के हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा, या आबादी का एक बड़ा तबका केन्द्र के इस फैसले के साथ रहेगा ऐसा माहौल दिख रहा है। लोगों का यह भी मानना है कि बहुत सी पार्टियों और गठबंधनों वाली केन्द्र और कश्मीर सरकारों ने अलग-अलग किस्म की नीति-रणनीति इस्तेमाल करके देख ली थीं, लेकिन उनमें से किसी ने कोई सकारात्मक नतीजे नहीं दिए थे। ऐसे में आज का मोदी सरकार का फैसला एक अकेले विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है, और कुछ लोगों ने यह कहा भी है कि यह कश्मीर को देश से काटने के लिए नहीं, देश से जोडऩे के लिए लिया गया फैसला है। यह बात खटकने वाली जरूर है कि आधी सदी से अधिक पुरानी कश्मीर-समस्या का यह समाधान संसद में बिना किसी बहस के इस तरह लागू किया जा रहा है। इसके पहले कश्मीर में जितनी बड़ी चौकसी का इंतजाम किया जा चुका था, उसके बाद संसद में कम से कम कुछ अधिक और काफी बहस की जानी थी, और हो सकता है कि वह बहस मोदी सरकार की हिमायती अधिक साबित होती। कश्मीर की जटिलता के अधिक जानकार और सामरिक-राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले के नतीजों को अधिक बारीकी से सामने रखेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत देखने में हो सकता है कि कुछ दशक लग जाएं।

-सुनील कुमार

 


Date : 04-Aug-2019

आज दोस्ती के जलसे, फ्रेंडशिप डे पर हर बरस की तरह छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में फिर पुलिस तैनात हो गई। हर दिन नौजवान लड़के-लड़कियां तालाब किनारे, बगीचे में, मॉल में, या नया रायपुर की खाली सड़कों के किनारे मिलते हैं, और कुछ वक्त साथ में गुजारते हैं। जिन लोगों की खर्च करने की क्षमता है, उनके लिए पब, रेस्त्रां, और डिस्को थैक भी मौजूद हैं। लेकिन साल में दो दिन, एक तो दोस्ती के दिन फ्रेंडशिप डे पर, और दूसरे प्रेम के प्रतीक वेलेंटाईन डे पर पुलिस तैनात रहती है क्योंकि कुछ हिंदू धर्मांध और कट्टर संगठन कभी-कभी सार्वजनिक जगहों पर मिलने वाले लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं। अब राज्य में कांग्रेस सरकार आने के बाद ऐसे संगठनों की आक्रामकता कुछ कम हुई है, और अभी ऐसी चेतावनी जारी नहीं की गई है, फिर भी पुलिस चौकन्नी थी। वेलेंटाईन डे पर तो पिछले बरसों में पुलिस का हाल यह था कि सार्वजनिक जगहों पर कहीं गेट बंद करके तो कहीं बाहर से ही लोगों को भगाकर बवाल का खतरा खत्म कर दिया जाता था। 

यह देश नौजवान पीढ़ी की हसरतों को कुचलने में इतना माहिर हो गया है कि जब तक नौजवान जोड़े आत्महत्या न कर लें, या जब तक मानसिक बीमारियों के शिकार न हो जाएं, जब तक उनके सपनों को कुचलने के लिए लठैत भी जुटा लेता है, और परिवार के लोग भी कत्ल करने पर आमादा रहते हैं। और कत्ल तो फिर भी नजरों में आ जाता है, कत्ल से कम की हिंसा तो कई बार खबरों में नहीं आती, पुलिस तक नहीं जाती। यह देश जो कि अनंत काल से श्रृंगार रस से भरा हुआ था, जहां कृष्ण के गोपियों संग रास-रंग को पूजा घर में भी रखा जाता है, उस देश में पिछले कुछ दशकों में प्रेम को पूरी तरह अवांछित मान लिया गया है और सांप और प्रेम दोनों एक साथ दिख जाएं तो हिंदुस्तानी समाज पहले प्रेम को कुलचने में जुट जाता है।

हिंदुस्तानी समाज के ऐसे बड़े हिस्से ने दुनिया के सभ्य देशों को देखा नहीं है, वहां के बारे में जाना नहीं है। इसलिए आम हिंदुस्तानियों को यह मालूम नहीं है कि नौजवान पीढ़ी को उसकी हसरतों से अलग करके उसकी क्षमताओं और संभावनाओं को किस तरह कुचलना हो जाता है। नौजवान अपनी मर्जी के लड़के-लड़कियों के साथ उठ-बैठ नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, साथ रह नहीं सकते, मां-बाप की मर्जी के बिना शादी नहीं कर सकते, ऐसे में उनका मनोबल टूट जाता है, और समाज में उनकी जो उत्पादकता मिलनी चाहिए, वह संभावना खत्म हो जाती है। हिंदुस्तान में महानगरों का कुछ हिस्सा ऐसी बंदिशों से उबरा है, बाकी शहरों में भी थोड़े से तबके को थोड़ी सी आजादी मिली है, लेकिन यह सब भी मां-बाप की नजरों से बचते हुए करने की बेबसी अधिकतर लोगों के सामने रहती है। 

इस देश की बुनियादी संस्कृति में तो पौराणिक कथाओं से लेकर संस्कृत के कालिदास तक चारों तरफ पे्रम और श्रृंगार रस की मजबूत परंपरा रही है। बाद में पता नहीं किस वजह से हिंदुस्तानी मां-बाप एक दहशत में आ गए, और प्रेम एक वर्जित शब्द हो गया। यह सिलसिला धर्म और जाति के बंधनों से और आगे बढ़ते चले गया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा खाप पंचायत की तरह सोचने लगे, तो वह देश आगे नहीं बढ़ सकता। हिंदुस्तान को इस पाखंड से उबरना होगा कि उसकी नौजवान पीढ़ी हमेशा ही बच्चे बनी रहेगी और मां-बाप की मर्जी से ही प्रेम और शादी करेगी।

-सुनील कुमार


Date : 03-Aug-2019

कश्मीर आज एक सन्नाटे में जी रहा है और वहां की किसी नेता को, इंसान को यह नहीं मालूम है कि उनके साथ क्या होने जा रहा है। यह बात महज अलगाववादियों की नहीं है, कश्मीर की तीन प्रमुख पार्टियों, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, और कांग्रेस के नेता भी हक्का-बक्का और हैरान हैं कि केन्द्र सरकार वहां क्या करने जा रही है। पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कश्मीर होकर लौटे, और आते ही उन्होंने 10 हजार अतिरिक्त सैनिक-सिपाही वहां रवाना किए। अब खबर है कि इसके बाद 28 हजार और सैनिक-सिपाही वहां भेजे गए हैं। केन्द्र सरकार ने कल एक अभूतपूर्व चेतावनी जारी की है और कश्मीर गए हुए तमाम गैरकश्मीरी लोगों को तुरंत राज्य छोड़कर निकल जाने को कहा है। अमरनाथ यात्रा बीच में रद्द कर दी गई है और सारे तीर्थयात्रियों को लौटने कह दिया गया है, जिससे एक भारी भगदड़ मची हुई है। कश्मीर गए हुए सैलानियों की वापिसी को लेकर भी बदहवासी फैली हुई है, लेकिन वहां काम कर रहे कई राज्यों के लाखों मजदूरों का क्या होगा इसकी कोई खबर नहीं है। लेकिन बड़ी बात यह है कि ऐसी कार्रवाई क्यों की जा रही है, ऐसी चेतावनी क्यों दी गई है, इतनी फोर्स क्यों भेजी गई है, इसका कोई जवाब केन्द्र सरकार ने या कश्मीर चला रहे राज्यपाल ने किसी को नहीं दिया है। कश्मीर के प्रमुख नेताओं ने कल जाकर राज्यपाल से मुलाकात की है और पूछा है कि क्या हो रहा है उन्हें भी बताया जाए। यह सब तब हो रहा है जब संसद का सत्र चल रहा है, और संसद की छुट्टी के दिन अचानक यह कार्रवाई की जा रही है। लोग अधिक हैरान और हक्का-बक्का इसलिए हैं कि कई दशकों में कभी भी अमरनाथ यात्रा को रद्द नहीं किया गया था, और तब भी नहीं किया गया था जब उस पर सीधा आतंकी हमला हुआ था, और मौतें हुई थीं। आज पूरे के पूरे राज्य में केन्द्रीय सुरक्षा बल और हिन्दुस्तानी फौज चप्पे-चप्पे पर क्यों इस तरह तैनात हो रहे हैं, यह लोगों की समझ से परे है, और कश्मीर की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा रखने वाले, चुनाव लड़कर कई बार वहां की सत्ता सम्हालने वाले नेता और भी विचलित हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के इस दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर को लेकर एक कड़ा रूख संसद में दिखाया था, और कश्मीर राज्य के लिए संविधान में की गई विशेष व्यवस्था के तहत धारा 35-ए, और धारा 370 को हटाने की चर्चा चल रही है, ऐसा लग रहा है कि सरकार इस बात की घोषणा होने पर राज्य में होने वाली बेचैनी और उपद्रव की आशंका से केन्द्रीय सुरक्षा बलों की ऐसी तैनाती कर रही है। कश्मीर को लेकर केन्द्र सरकार की नीति आज जितनी कड़ी दिखाई पड़ रही है, ऐसी पहले कभी नहीं थी, और कश्मीरी लोगों में इतनी आशंका भी पहले कभी नहीं थी। 

संसद में बहुमत अगर इतना बड़ा हो कि एनडीए के भीतर भी महज भाजपा बहुमत की सरकार बनाने की ताकत अकेले रखती हो, तो वैसे में वह कई किस्म की कार्रवाई इस ताकत और संविधान में मिले अधिकारों के तहत कर सकती है। लेकिन लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत का नाम नहीं होता, वह तालमेल और विचार-विमर्श के बाद किसी सर्वमान्य समाधान तक पहुंचने की एक कोशिश का नाम भी होता है, और वैसी बातचीत आज दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक होते दिख नहीं रही है। लोकतंत्र में यह कहीं नहीं लिखा है कि संसद के हर सत्र के पहले प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी सर्वदलीय बैठक बुलाए, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएं और संसदीय शिष्टाचार के तकाजे से ऐसा हमेशा ही किया जाता है। जब राजीव गांधी इससे भी बड़े संसदीय बाहुबल के साथ प्रधानमंत्री थे, तब भी यह परंपरा नहीं टूटी थी, और आज भी यह परंपरा जारी है। लेकिन संसद सत्र के चलते ऐसी गोपनीय कार्रवाई इस पैमाने पर की जा रही है और संसद को उससे अलग रखा जा रहा है, यह रूख लोकतांत्रिक नहीं है। इसके अलावा कश्मीर की जो पार्टियां लोकतंत्र पर भरोसा रखती हैं, जो समय-समय पर केन्द्र में, और कश्मीर में भी एनडीए की भागीदार रही हैं, उन पार्टियों से भी कोई बात किए बिना अगर इतनी बड़ी कोई कार्रवाई हो रही है, तो उस पर कश्मीरी जनमत के साथ होने की संभावना इससे कम हो जाती है। 
-सुनील कुमार


Date : 02-Aug-2019

कुछ बातें कभी-कभी महज दिमागी जुगाली के लिए भी करना चाहिए ताकि दिमाग का काम करना एकदम बंद न हो जाए, उस पर चर्बी न चढ़ जाए। दूसरी बात अंग्रेजी में कही गई एक लोकप्रिय बात है कि लोगों को कभी-कभी आऊट ऑफ बॉक्स भी सोचना-विचारना चाहिए। इसका मतलब होता है कि बंधी-बंधाई लीक से हटकर भी कुछ सोचना आना चाहिए। दुनिया का इतिहास और कुदरत भी इस बात के हिमायती हैं क्योंकि अगर हर कोई पहले से रौंदी जा चुकी सड़क पर चलते होते, तो फिर नई पगडंडियां तो कभी बनी ही नहीं होतीं। इसलिए कभी-कभी बंधी-बंधाई बातों से परे भी कुछ सोचना चाहिए, और ऐसा एक मौका अभी सामने आया है। 

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कुछ दिनों से ठंडे पड़े हुए एक विवाद के बाद आज फिर एक दूसरा पत्थर मधुमक्खी के छत्ते पर मारा है, और कहा है कि भारत और पाकिस्तान दोनों अगर चाहेंगे तो वे उनके बीच मध्यस्थता करने को तैयार हैं। पिछले दिनों जब उन्होंने यह कह दिया था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों एक मुलाकात में उनसे कहा था कि वे कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करें। यह बात भारत की विदेश नीति की पुरानी स्थापित बात से एकदम अलग थी, और इसे लेकर भारत में संसद के भीतर और बाहर बवाल भी हुआ था कि अमरीका यह साफ करे कि मोदी ने ऐसा कब कहा। भारत सरकार ने पूरी तरह से इस बात का खंडन किया था कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ कहा था। लेकिन अब ट्रंप ने बिना मोदी का नाम लिए उसी बात को दुहराकर अपनी तरफ से एक पहल की है, एक प्रस्ताव रखा है, और सभ्य दुनिया में पुराने फैसलों से परे ऐसे नए प्रस्ताव कई बार आते हैं, और कई मौकों पर पुरानी बातों से परे कुछ नए कदम बढ़ते हैं। 

हिन्दुस्तान में अगर देखें तो इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच 1972 में दस्तखत हुए एक समझौते में यह तय किया गया था कि ये दोनों देश अपने सारे मतभेद विपक्षी शांतिपूर्ण बातचीत से हल करेंगे। और भारत लगातार किसी समझौते का हवाला देते हुए पाकिस्तान के साथ किसी संभावित बातचीत में किसी तीसरे की भागीदारी या मध्यस्थता के खिलाफ रहा है। लेकिन पाकिस्तान में इस लगभग आधी सदी में कुछ ऐसे मौके आए हैं जब वहां के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने किसी तीसरे पक्ष की जरूरत बताई है। आज हिन्दुस्तान में भी, और हिन्दुस्तान को भी ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि क्या 1972 के शिमला समझौते को एक धार्मिक किताब की तरह अनंतकाल तक पवित्र विदेश नीति मानकर चलने से उसे कुछ हासिल हो रहा है, या किसी मध्यस्थता से कुछ बेहतर हो सकता है? आज इन दोनों देशों के बीच सरहद पर शक की बर्फ इतनी मोटी जमी हुई है कि उस पर बैठकर कोई बातचीत करने की गुंजाइश नहीं दिखती है। दोनों देशों के बीच इस पूरे दौर में परमाणु हथियारों का मुकाबला चलते रहा, जंग भी हो गई, एक-दूसरे पर आतंकी हमलों की तोहमतें भी लगती रहीं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही अचानक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर बिना बुलाए जाकर भारत की विदेश नीति में एक तूफान खड़ा कर दिया था, और जब यह थमा तो सरहद पर लाशों से परे और कुछ नहीं दिखा। 

ऐसे में भारत को दुनिया के कुछ दूसरे मामलों से भी सबक लेकर कम से कम अपने घर के भीतर सोचना-विचारना चाहिए। दूसरे देशों की मध्यस्थता हमेशा बुरी ही रहती हो ऐसा भी जरूरी नहीं है। और हर बार ऐसी मध्यस्थता कामयाब होती हो, ऐसा तो बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच खुद होकर तो कामयाबी के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। ऐसे में एक मिसाल याद पड़ती है कि ग्रेट ब्रिटेन का एक हिस्सा रहे उत्तरी आयरलैंड के साथ लंदन की ब्रिटिश हुकूमत का हथियारबंद टकराव चलते रहता था। इसका बहुत पुराना इतिहास रहा है जिसकी अधिक चर्चा यहां जरूरी नहीं है। लेकिन इस मामले को इसलिए छेड़ा जा रहा है कि ऐसे तनाव के चलते हुए इस सदी की शुरुआत में ही उस वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने लंदन और उत्तरी आयरलैंड के बीच मध्यस्थ का काम किया था, और एक देश के भीतर ही राष्ट्रीय सरकार और प्रादेशिक सरकार, प्रादेशिक हथियारबंद आंदोलन के बीच एक समझौता करवाया था, हथियार डलवाए थे, और अमन कायम करवाया था। यह एक मिसाल यह सोचने का हौसला देती है कि क्या भारत और पाकिस्तान को परस्पर सहमति के आधार पर किसी मध्यस्थ के साथ बैठकर अपनी विवाद निपटाने की एक कोशिश करनी चाहिए? ऐसी कोशिश बिना किसी शर्त के हो सकती है, और हो सकता है कि उससे संबंधों में जमी हुई यह बर्फ पिघलने में मदद मिल सके। इतिहास की परस्पर थोपी गई एक बंदिश क्या आज एक संभावना की राह में रोड़ा बनकर नहीं खड़ी है? क्या शिमला समझौते से आगे भी निकलने की, बढऩे की, सोचने की जरूरत है? कम से कम सोचने-विचारने के स्तर पर इस बहस में क्या बुरा है कि क्या भारत शिमला समझौते को एक धार्मिक ग्रंथ की कट्टरता से मानने के बजाय तब से अब तक बदल चुकी अंतरराष्ट्रीय हकीकत को सोचते हुए दोनों देशों की भलाई के लिए एक नई संभावना पर भी सोचे, बिना कुछ दांव में लगाए हुए। ऐतिहासिक दस्तावेजों का ऐतिहासिक महत्व तो ठीक है, लेकिन उन्हें वर्तमान की राह में ऐसा रोड़ा भी नहीं बनने देना चाहिए कि उससे भविष्य की संभावना खत्म हो जाए। हम अगर अपनी खुद की सोच कहें, तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच किसी मध्यस्थ पर आपसी सहमति स्थापित करके बात शुरू करने की है, और दूसरे लोगों को भी इस सैद्धांतिक बात पर सोचना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Aug-2019

उत्तरप्रदेश से खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि किस तरह सावन में मंदिर जाते कांवरियों के पांव धुलाने में आस्थावान पुलिस लगी हुई है, कहीं जिले के एसपी कांवरियों का बदन दबा रहे हैं, कहीं और बड़े अफसर हेलीकॉप्टर से कांवरियों पर फूल बरसा रहे हैं। खुद राज्य सरकार ने एक आदेश निकालकर कांवरियों को यह छूट दी है कि पेट्रोल पंप पर दुपहियों पर पेट्रोल डलाते हुए उन्हें हेलमेट लगाना जरूरी नहीं है। लेकिन ऐसी खबरों के दौरान ही उत्तरप्रदेश से जगह-जगह से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि कहीं किसी मुस्लिम को जयश्रीराम कहने के लिए मजबूर करते हुए पीटा जा रहा है, तो कहीं और कोई साम्प्रदायिक तनाव खड़ा किया जा रहा है। 

किसी भी राज्य में पुलिस और प्रशासन इन दोनों का धर्मनिरपेक्ष, सम्प्रदायनिरपेक्ष होना जरूरी होता है। भारत के संविधान के मुताबिक यह कानूनी रूप से भी जरूरी है क्योंकि अगर वे अपनी आस्था के चलते हुए जनता के कामों में भेदभाव करने लगेंगे, तो सरकार का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा। उत्तर भारत की पुलिस के बीच हिन्दू धर्म की आस्था का बोलबाला पहले से था, और उत्तर भारत के अधिकतर थानों में या तो बजरंग बली के छोटे मंदिर बना दिए गए थे, या फिर थाने के भीतर दीवारों पर हिन्दू देवी-देवता सजे हुए थे। नतीजा यह था कि पुलिस की सोच पहले से हिन्दू चली आ रही थी, और हाल के बरसों में जब योगी आदित्यनाथ जैसे आक्रामक और साम्प्रदायिक सोच वाले मुख्यमंत्री बने, तो पुलिस के भीतर की यह आस्था सिर चढ़कर बोलने लगी। लेकिन बात सिर्फ उत्तरप्रदेश की नहीं है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार के चलते अफसर इसी तरह का काम करने में लग गए थे। मंडला की एक मुस्लिम महिला कलेक्टर सूफिया फारूकी ने शंकराचार्य की चरणपादुका को सिर पर उठाकर सार्वजनिक रूप से सड़कों पर ले जाने का काम किया था, और कई दूसरे अफसरों ने भी आस्था का, या अपने आस्था से बाहर जाकर इसी तरह का काम किया था। 

आज जब सड़कों पर नमाज पढऩे से लेकर हज यात्रा पर सरकारी सब्सिडी तक पर सवाल उठ रहे हैं, जब सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक जगहों पर धर्मस्थलों के अवैध निर्माण गिराने को लेकर अड़ा हुआ है, तब सार्वजनिक जीवन, और खासकर सरकारी नौकरियों से, अदालत और संसद-विधानसभा से धर्म को हटाना जरूरी है। सत्तारूढ़ पार्टी या नेता की सोच के मुताबिक जब सरकारी कामकाज पर धर्म को हावी किया जाएगा, तो उसका नतीजा एक न सिर्फ साम्प्रदायिक, बल्कि धर्मान्ध और अराजक पुलिस की शक्ल में देखने मिलेगा, उत्तरप्रदेश में देखने मिल रहा है, मध्यप्रदेश में देखने मिल चुका है जहां पर दलितों को कुचलना सवर्णों की धार्मिक आस्था के तहत आता है। लोगों को याद होगा कि किस तरह उमा भारती ने मुख्यमंत्री बनने पर सरकारी मुख्यमंत्री-निवास में एक मंदिर बनवा दिया था, मुख्यमंत्री-दफ्तर की मेज पर मूर्तियां रखकर एक छोटा पूजा घर जैसा सजवा दिया था। अब अगर वहां कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री-आवास में एक मस्जिद बनवा दे, कोई ईसाई मुख्यमंत्री चर्च बनवा दे, कोई सिक्ख मुख्यमंत्री गुरूद्वारा बनवा दे, तो मुख्यमंत्री निवास का क्या हाल रह जाएगा? 

भारत में धर्म का जो आक्रामक रूप आज सार्वजनिक जीवन में, सार्वजनिक जगहों पर हावी हो चुका है, उसे थामने की जरूरत है। यह आक्रामकता बढ़ती चल रही है, और धीरे-धीरे यह बहुसंख्यक तबके, और सत्ता पर बहुमत रखने वाली पार्टी का बुनियादी हक मान लिया गया है। लोकतंत्र एक जनमतसंग्रह नहीं होता जहां सबसे अधिक वोट पाने वाले लोग सब कुछ अपने मन का कर सकें। किसी धर्म से जुड़ी पार्टी का बहुमत पाकर सत्ता पर आना, उसे संविधान की धर्मनिरपेक्षता की शर्त से आजादी पाने की आजादी नहीं देता। देश वैसे भी धर्म के नाम पर बर्बाद हो रहा है, अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है, लोगों की जागरूकता और उनकी तर्कशक्ति धर्म के नाम पर एक साजिश के तहत खत्म की जा चुकी है, लोगों की वैज्ञानिक सोच खत्म की जा चुकी है, इसलिए यह सिलसिला रोकने की जरूरत है। अब सवाल यह उठता है कि जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ब्राम्हणों को दूसरी जातियों से बेहतर बताते हुए यह साबित करता है कि ब्राम्हण दो बार जन्म लेते हैं, गैरब्राम्हण एक बार, जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज सतीप्रथा का समर्थन करता है, उस देश में सरकारी अमले के धार्मिककरण, और उसकी साम्प्रदायिकता को कौन रोकेंगे? सुप्रीम कोर्ट ?


Date : 31-Jul-2019

मध्यप्रदेश में एक बड़े सीनियर आईएएस अफसर का नाम एक महिला के साथ सेक्स-वीडियो में जुड़ा जो कि पिछले दिनों से चारों तरफ फैल रहा था, तो उस अफसर को एक महत्वपूर्ण विभाग से हटाकर आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान का संचालक बनाया गया है। जाहिर है कि बिना पूरी जांच के, बिना कोई तोहमत साबित हुए सरकार किसी को सजा दे सकती है, तो वह तबादले की किसी किस्म की सजा रहती है जिसे दुनिया सजा मानती है, जो कि हकीकत में सजा रहती है, लेकिन ऐसे तबादले के खिलाफ अफसर किसी अदालत नहीं जा सकते क्योंकि तबादला करना सरकार का विशेषाधिकार रहता है।

अब सोचने की बात यही है कि किसी अफसर का चाल-चलन ऐसा निकला कि उसे सजा देना है, या किनारे करना है, या कम महत्व की जगह पर भेजना है, तो उसे आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान भेज दिया गया। यह देश की सरकारों की मौजूदा सोच का एक सुबूत है कि आदिवासियों से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां सजायाफ्ता अफसरों के लायक मानी जाती हैं। यह सिर्फ मध्यप्रदेश में नहीं है, यह छत्तीसगढ़ में भी आए दिन सुनाई पड़ता है जब पिछली सरकार के नेता-अफसर, और मौजूदा सरकार के नेता-अफसर अपने मातहतों को जुबानी धमकी देते हुए यह कहते हैं कि उनका बस्तर तबादला किया जाएगा, तब उन्हें अक्ल आएगी। बस्तर जो कि जाहिर तौर पर सबसे बेबस और सबसे बेजुबान आदिवासियों का इलाका है, जो कि प्रामाणिक तौर पर सबसे पिछड़ा इलाका है, उसे सजायाफ्ता अफसरों और कर्मचारियों के लायक माना जाता है। आजाद हिन्दुस्तान में यह सोच अंग्रेजों की विरासत है जिसमें देश के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से जिनको सबसे कड़ी और बड़ी सजा के लायक माना जाता था, उन्हें कालेपानी की सजा में अंडमान भेजा जाता था जो कि देश में सबसे प्राचीन और सबसे अछूते आदिवासियों का इलाका था, और है। छत्तीसगढ़ में भी बात-बात में नाखुश सीनियर जूनियरों को मानो कालेपानी की सजा पर बस्तर भेजने की बात करते हैं, और हकीकत में भेजते भी हैं, और लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार के एक कार्यकाल के सलाहकार केपीएस गिल ने काम पूरा करने के बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस कर्मचारियों को बड़े अफसरों को लाखों की रिश्वत देनी पड़ती है। 

आदिवासियों के लिए यह नजरिया पूरी दुनिया में शहरी इलाकों में तकरीबन एक सरीखा है। ऑस्ट्रेलिया हो, या अमरीका, या फिर लैटिन अमरीकी देशों के पूरे-पूरे आदिवासी देश, इन सब जगहों को लेकर बाकी शहरी और संपन्न दुनिया का नजरिया ऐसा ही रहता है। आदिवासियों को सजा का हकदार मान लिया जाता है कि उनके इलाकों में सबसे दुष्ट, सबसे भ्रष्ट, सबसे नालायक, सबसे बदनाम, सबसे बदचलन लोगों को भेजा जाएगा। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर सरीखे आदिवासी इलाकों में अफसरों ने आजादी के बाद से जो खुली लूटपाट की है, उसी का नतीजा है कि वहां पर नक्सलियों को एक उपजाऊ जमीन हाथ लगी। सरकारों के बीच आदिवासी मुद्दों को लेकर किसी किस्म की संवेदना नहीं दिखती है। और तो और सुप्रीम कोर्ट भी आदिवासियों को लाखों की संख्या में जंगल की उनकी जमीन से बेदखल करने की एक मुहिम सी चला रहा है। सरकार हो, संसद हो, या अदालत हो, जहां कहीं आदिवासी पहुंचते भी हैं, वे सत्ता के असर में अपना आदिवासी डीएनए इस रफ्तार खो बैठते हैं कि मानो वे कभी आदिवासी थे ही नहीं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम एक दूसरी बात भी देखते आए हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक किसी भी राज्यपाल ने संविधान में आदिवासी इलाकों और आदिवासियों की रक्षा के लिए उन्हें दिए गए विशेष अधिकारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सत्ता का रूख दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए जुबानी जमाखर्च से परे कुछ भी नहीं रहता। 

जब तक आदिवासी इलाकों को, आदिवासी संस्थानों को, अंडमान की कालेपानी की सजा माना जाता रहेगा, तब तक आदिवासी इलाकों में नक्सली कायम रहेंगे, और आम जनता का भरोसा लोकतंत्र पर नहीं रहेगा। हमारा तो यह साफ मानना है कि आदिवासी इलाकों वाले राज्यों में राज्य सरकारों को आदिवासी समाज और मुद्दों की समझ रखने वाले समाजशास्त्रियों की अनिवार्य रूप से सलाहकार के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए, और उनकी काबिलीयत का इस्तेमाल आदिवासी इलाकों के लिए अफसर तय करने में भी होना चाहिए, और वहां पर सरकार के कामकाज पर नजर रखने में भी होना चाहिए। आज की सरकारें शहरी, शिक्षित, संपन्न, और सवर्ण सोच से भरी हुई सरकारें रहती हैं, आदिवासी मुद्दों से बिल्कुल ही नासमझ। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आदिवासी इलाकों के लिए अलग से समर्पित अफसर और कर्मचारी तय होने चाहिए, और किसी भी सेवा में लोगों की नियुक्ति के पहले ऐसे इलाकों के लिए समझ और संवेदनशीलता रखने वालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मध्यप्रदेश में यह ताजा फैसला शर्मनाक इसलिए है कि आदिवासी मुद्दों से जुड़े संस्थान को सजायाफ्ता के लायक माना गया। 
-सुनील कुमार


Date : 30-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को दो बरस पहले   भाजपा की राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया था, उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी की ऐसे कथित पोस्ट को लेकर रमन-सरकार की काफी फजीहत हुई थी।

इस निलंबन के बाद रमन-सरकार आलोचना के कटघरे में आई थी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया था। उस वक्त कांगे्रस पार्टी ने भी इस मामले को उठाया था। कल भूपेश सरकार ने इस महिला अधिकारी का निलंबन खत्म करके उसे बहाल कर दिया है। इन दो बरसों में यह बात खबरों में कहीं नहीं आई कि क्या इस अफसर की फेसबुक पोस्ट पर जांच का कोई नतीजा निकला? अब जब बहाली हो गई है तो एक बात पर कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इस महिला अधिकारी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाकर, और सरकारी सेवा शर्तों को तोड़कर अपने विभाग और जेल के भीतर की बातों को सरकार के सामने रखने के बजाय जनता के सामने रखा था। उसने तो दो बरस निलंबन झेल लिया, लेकिन उसके उठाए हुए मुद्दों का क्या हुआ? और वे मुद्दे छोटे नहीं थे। वर्षा डोंगरे ने आदिवासियों के हक सरकार और कारोबार द्वारा हड़पने और कुचलने के खिलाफ लिखा था और लिखा था कि जिस तरह देश के रक्षक ही आदिवासियों की बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, फर्जी केसों में चार दीवारी में सडऩे भेज रहे हैं, वे इंसाफ के लिए कहां जाएं? वर्षा ने लिखा था कि उन्होंने खुद बस्तर में चौदह से सोलह बरस की आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर करके पूरा नंगा करके प्रताडि़त किया गया था, उनकी कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था जिन्हें वर्षा ने खुद ने देखा था।

अब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार खुद होकर भी आदिवासियों के खिलाफ दर्ज फर्जी मामलों की जांच ऊंचे स्तर पर करवा रही है। ऐसे में वर्षा डोंगरे की शक्ल में सरकार को एक ऐसी गवाह मिलती है जिसने सरकार जुल्म और बेइंसाफी को उठाते हुए निलंबन झेला था। सरकार को चाहिए कि इस नौजवान अफसर को ऐसी जांच में गवाह बनाकर तमाम शिकायतों के सुबूत ढूंढे। ऐसे कम ही सरकारी अफसर मिलते हैं जो सरकारी जुल्म के खिलाफ बोलने को तैयार होते हों।
-सुनील कुमार


Date : 29-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के उन्नाव के भाजपा विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक युवती कल अपनी मां और अपने वकील के साथ जेल में बंद अपने चाचा से मिलने जा रही थी कि उनकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मारी जिसमें चाची, मौसी और ड्राईवर मर गए, और यह युवती और उसके वकील बुरी तरह जख्मी होकर अस्पताल में हैं। खबरें बताती हैं कि रेप की रिपोर्ट लिखाने के बाद उसके चाचा पर आनन-फानन आधा दर्जन फर्जी मुकदमे दर्ज कर लिए गए थे। इसके पहले रिपोर्ट लिखाने के बाद इसके पिता को पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर मार डाला गया था, मामले के एक या  अधिक गवाह मार डाले गए थे। भाजपा विधायक जेल में है जिससे मिलकर भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने चुनाव में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया था। पूरे देश का मीडिया और सोशल मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि एक ताकतवर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने वाला परिवार किस तरह कुचल दिया गया है। पुलिस ने माना है कि इस परिवार की हिफाजत के लिए तैनात पुलिस सुरक्षा कर्मचारी इस वक्त उनके साथ नहीं थे, और क्यों नहीं थे इसकी जांच की जा रही है। खबर बताती है कि टक्कर मारने वाली ट्रक के आगे और पीछे, दोनों नंबर प्लेट पर कालिख पोती गई थी ताकि नंबर देखा न जा सके। 

लोगों को कुछ इसी किस्म का सिलसिला एक दूसरे मामले में भी याद होगा, बापू कहा जाने वाला आसाराम जब बलात्कार के मामले में गिरफ्तार हुआ, और अदालती सुनवाई चल रही थी, तब इस मामले के गवाह एक-एक कर मार डाले गए थे। ऐसे ही एक और मामले को याद रखने की जरूरत है कि मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले में, उसमें शामिल, और उसके गवाह लोगों की मौतों का सिलसिला ऐसा चला कि शायद 40 से अधिक लोग सुनवाई के दौरान ही बेमौत मारे गए। 

यह पूरा सिलसिला देखें तो अभी पौन सदी पहले तक अमरीका में जब संगठित माफिया के खिलाफ कोई गवाह रहते थे, तो वे इसी तरह एक-एक कर मार डाले जाते थे। कुछ ऐसा ही इटली में सिसिली के माफिया के खिलाफ सिर उठाने वाले लोगों के साथ होता था। हिन्दुस्तान में अधिक मामलों में ऐसा याद नहीं पड़ता, लेकिन यह तो तय है कि गवाहों की हत्या या शिकायतकर्ता के परिवार के लोगें की हत्या से कुछ कम दर्जे का दबाव अनगिनत मामलों में बनता होगा जब गवाहों को एक-एक कर खरीद लिया जाता है, या सुबूतों को एक-एक कर तबाह किया जाता है, अदालतों में सरकारी वकीलों को प्रभावित किया जाता है, और कई मामलों में जजों को रिश्वत देने की चर्चा रहती है। कुल मिलाकर लगता यह है कि अदालत से सजा पाने वाले लोग वे ही रहते हैं जो शिकायतकर्ता को खत्म नहीं कर पाते, उसके परिवार को, गवाहों को, वकीलों को खत्म नहीं कर पाते, और न्यायप्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों को खरीद या बर्बाद नहीं कर पाते। आज ही एक दूसरी खबर है कि पंजाब के जालंधर कें जिस ईसाई बिशप पर बलात्कार का मामला केरल में चल रहा था, उसमें पुलिस ने जब अदालत में डीवीडी सरीखे डिजिटल सुबूतों को पेश किया, तो उनकी फोरेंसिक जांच रिपोर्ट बताती है कि उनके साथ छेडख़ानी की गई है। बलात्कार की शिकार एक नन के साथ ईसाई समुदाय की हजारों नन्स खड़ी हैं, महिला अधिकार और मानव अधिकार के लिए लडऩे वाले खड़े हैं, लेकिन ऐसा शक है कि चर्च के दबाव में, चर्च को बचाने के लिए सरकार इस मामले को शुरू से कुचल रही है। 

ताकतवर लोगों के खिलाफ हिन्दुस्तान का कानून किस तरह लुंजपुंज हो जाता है, वह देखने लायक है। गरीबों को बेदखल करना हो, उन्हें कैद काट लेने के बाद भी जेल में सड़ते पड़े रहने देना हो, उन्हें संभावित सजा से अधिक वक्त तक विचाराधीन कैदी बनाकर जेल में पड़े रहने देना हो, इन सब मामलों में हिन्दुस्तानी अदालतें एक पेशेवर मुजरिम के अंदाज में काम करती हैं, और इंसाफ की किसी भी संभावना को कुचलती जाती हैं। दो और मामले इसी से जुड़े हुए गिनाना ठीक होगा, राजस्थान हाईकोर्ट से अभी कुछ कश्मीरी आदमियों को बेकसूर करार देकर रिहा किया गया है, उन पर आतंकी हमले में शामिल होने का मामला 24 बरस से चल रहा था, वे जब जेल में डाले गए थे तब छोकरे थे, और अब अधेड़ हो चुके हैं, उससे अधिक उम्र के हो चुके हैं, और अब वे बाहर निकलकर क्या करेंगे, यह उन्हें खुद ही नहीं मालूम है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट में अभी कुछ दिन पहले जिला सहकारी बैंक के एक मर चुके कर्मचारी को बेकसूर मानते हुए बैंक को हुक्म दिया है कि वह उसके सारे बकाया भुगतान करे। दिक्कत यही है कि इस भुगतान को लेने के लिए वह जिंदा नहीं है। यह मामला 28 बरस तक चला, और इस बीच ही वह कबका मर-खप गया, और  अब उसे शायद ही यह पता चले कि वह जीत गया है। 

ऐसे कई मामलों को देखें तो हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था को लेकर एक घोर निराशा होती है। हिन्दुस्तान में कानून के राज को देखकर घोर निराशा होती है, और ताकतवर तबके की हिंसक ताकत को देखकर एक दहशत होती है। शायद कुछ लोगों को अब तक इस बात पर हैरानी होना जाहिर हो कि किस तरह इस भाजपा विधायक पर लगे बलात्कार के आरोपों से लेकर, उसकी गिरफ्तारी तक, और उसके खिलाफ शिकायत करने वाली लड़की के पूरे कुनबे की हत्या तक, वकील की हत्या तक पर किसी बड़े नेता को कुछ भी नहीं कहना है, न राज्य की सरकार को, न केन्द्र की सरकार को, न उस विधायक की भाजपा को। 
-सुनील कुमार


Date : 28-Jul-2019

छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग की सेहत कुछ ठीक नहीं चल रही है। पिछली रमन सरकार के वक्त इस विभाग के जितने घोटाले सामने आए, उससे अधिक अभी तक दबे हुए हैं। लेकिन उन घोटालों की जांच की सुर्खियों के बीच भूपेश बघेल सरकार ने स्वास्थ्य विभाग में जो चल रहा है, उसमें फिर नया घोटाला होते दिख रहा है। वैसे तो स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव बड़े जानकार और तजुर्बेकार माने जाते हैं, और उनकी साख भी ठीक बताई जाती है, लेकिन विभाग में एक अदना से अफसर को लेकर जो खींचतान चल रही है, वह हक्का-बक्का करने वाली है। 

खुद कांग्रेस पार्टी के एक बड़े कार्यकर्ता और कांग्रेस के चिकित्सा प्रकोष्ठ के नेता डॉ. राकेश गुप्ता रमन सरकार के वक्त से पिछले बरसों में स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार को लेकर सड़क से लेकर मीडिया तक लड़ाई लड़ रहे थे। कांग्रेस पार्टी ने भी अपने मंच से उस लड़ाई को आगे बढ़ाया था। उस वक्त स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर काम कर रहे एक अफसर पर सैकड़ों करोड़ के स्वास्थ्य बीमा में भयानक भ्रष्टाचार का आरोप डॉक्टरों के संघ ने भी लगाया था, नर्सिंग होम एसोसिएशन ने भी लगाया था, और अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संविदा-अफसर के भ्रष्टाचार की बात उठाई थी। अभी कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इस अफसर को दुबारा संविदा पर रखने के खिलाफ हाईकोर्ट तक गए हैं, और स्वास्थ्य विभाग के भीतर मंत्री और आईएएस अफसरों के बीच इस संविदा अफसर को आगे जारी रखने के मुद्दे पर ऐसी भयानक लड़ाई छिड़ी है कि उसे बचाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री विभाग की एक आईएएस अफसर के खिलाफ कई तरह की जांच शुरू करवा चुके हैं। 

अभी तक जो कागजात हमारे सामने आए हैं, उनसे एक बात साफ है कि इस संविदा अफसर की रमन सरकार में नियुक्ति ही गलत हुई थी, और वर्तमान सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सिंहदेव एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उस विवादास्पद अफसर को जारी रखने के लिए किसी भी हद तक जाते हुए दिख रहे हैं। यह बात हैरान करने वाली है क्योंकि टी.एस. सिंहदेव को भ्रष्टाचार के आरोपों वाले लोगों को इतना खुलकर आगे बढ़ाते लोगों ने देखा नहीं था, और उनसे उम्मीद भी नहीं थी। अभी इस सरकार को आए एक बरस भी पूरा नहीं हुआ है, और सबसे अधिक आरोपों से घिरे एक संविदा-अफसर को लेकर यह सरकार हाईकोर्ट के कटघरे में खड़ी कर दी गई है। हाईकोर्ट ने पहली नजर में इस अफसर के खिलाफ आरोपों में कुछ दम देखते हुए उसके काम सम्हालने पर रोक लगाई है, हालांकि सरकार इससे भी सम्हलते दिख नहीं रही है। 

स्वास्थ्य विभाग छत्तीसगढ़ बनने से अब तक प्रदेश सरकार का सबसे भ्रष्ट विभाग रहा है। खुद कांग्रेस पार्टी के एक प्रमुख कार्यकर्ता डॉ. राकेश गुप्ता लगातार जिस भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ करते रहे हैं, उसी भ्रष्टाचार को इतना खुलकर आगे बढ़ाना राज्य सरकार की साख को चौपट कर रहा है। इस मामले के कागज यह भी बताते हैं कि किस तरह एक परिपक्व और वरिष्ठ मंत्री खुद एक विवाद में फंसते जा रहा है, और यह शायद इस सरकार को बड़ी बदनामी दिलाने वाला पहला स्कैंडल है जिसमें रमन सरकार के एक सबसे भ्रष्ट माने जाने वाले अफसर को भूपेश सरकार में इज्जत का मुद्दा बना लिया गया है। इस सरकार से जिन लोगों को बेहतर काम की उम्मीद थी, वे लोग कम से कम इस एक मामले को लेकर सरकार के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। बेहतर यही होगा कि यह सरकार समय रहते सम्हल जाए। 
-सुनील कुमार


Date : 27-Jul-2019

कर्नाटक में कल शाम भाजपा के मुख्यमंत्री ने शपथ ले ली, और कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार का अधूरा कार्यकाल खत्म हो गया। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस छोडऩे वाले विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर फैसला अब तक विधानसभा अध्यक्ष ने लिया नहीं है, और ऐसा लगता है कि उस फैसले से अब नई सरकार की सेहत पर कोई फर्क पडऩा भी नहीं है। कर्नाटक में पिछली कई सरकारों ने कार्यकाल पूरे नहीं किए, और ऐसा महज विपक्ष की वजह से नहीं हुआ है, खुद भाजपा सरकार में भाजपा के विधायकों ने भी सरकार के खिलाफ खुली बगावत दर्ज की हुई है। इस पूरे सिलसिले में जिस बड़े दाम पर विधायकों की खरीद-फरोख्त की तोहमतें हवा में तैर रही हैं, वे भयानक हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव जीतना एक बड़ा पूंजीनिवेश है, एक महंगी कैशक्रॉप बोना है, जिसे सही समय आने पर काटकर नगदीकरण किया जा सके। 

भारत में लोकतंत्र में जब-जब, जहां-जहां विधायकों या सांसदों की मंडी में खरीद-फरोख्त होती है, तब-तब बिकती जनता है। वह जनता जिसे यह झांसा दिया जाता है कि उसके वोट से सरकार बनती है, और जिसे अब तो चुनाव आयोग भी लुभावने इश्तहार जारी करके वोट देने के लिए बुलाता है, वह जनता इस खुशफहमी में रहती है कि वह पांच बरस के लिए विधायक और सांसद चुनती है। जनता आज की तारीख में हिन्दुस्तान में सामान चुनती है जो कि मंडियों में जरूरत के वक्त असंभव से लगने वाले दाम पर बिकते हैं। बिकाऊ माल चुनने को कुछ लोग लोकतांत्रिक अधिकार मान लेते हैं, कुछ लोग पांच बरस में एक बार आने वाला जलसा मान लेते हैं, और फिर इसी खुशफहमी में मगरूर घूमते हैं, फिर वे चाहे भूखे पेट हों। 

भारतीय लोकतंत्र में जिस रफ्तार से, जिस बड़े पैमाने पर दौलत और बेईमानी का खेल चल रहा है, उससे अब यह लगता है कि दलबदल कानून के तहत अगर हुए बाकी कार्यकाल के लिए सदन की सदस्यता खत्म नहीं होगी, तो मौजूदा कानून तो थोक में खरीदी को बढ़ावा देने वाला एक बाजारू फॉर्मूला होकर रह गया है। आज किसी विधायक दल या सांसद दल के एक तिहाई सदस्य दलबदल करते हैं, तो वह दलबदल नहीं, दलविभाजन कहलाता है। आज की राजनीति में अरबपति उम्मीदवारों की बढ़ती गिनती, दलबदल में पूरी तरह स्थापित हो चुकी बेशर्मी, और पार्टियों के पीछे खरबपतियों की दौलत की ताकत, इन सबने मिलकर लोगों की शर्म और झिझक खत्म कर दी है, लोगों के नीति-सिद्धांत खत्म कर दिए हैं, और मोटे तौर पर लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। आज इस देश में ऐसे लतीफे बनने लगे हैं कि पिछले चुनाव तक तो यह कहा जाता था कि किसी भी निशान पर वोट दो, वह जाएगा तो एक खास निशान पर ही, और अब तस्वीर बदल गई है कि किसी भी उम्मीदवार को वोट दो, वह उम्मीदवार तो जाएगा एक खास पार्टी में ही। 

अभी कुछ पार्टियों ने इस बात की वकालत शुरू की है कि जब देश के कुल राजनीतिक चंदे का तीन चौथाई से अधिक हिस्सा महज भाजपा में जा रहा है, तो फिर देश में चुनाव में बराबरी बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी खर्च पर चुनाव हों। एक दूसरी रिपोर्ट यह भी थी कि अभी-अभी हुए आम चुनाव दुनिया के सबसे महंगे चुनाव थे, हिन्दुस्तान के इतिहास के तो सबसे महंगे चुनाव थे ही। अब कर्नाटक या किसी दूसरे प्रदेश में किसी एक पार्टी या किसी दूसरी पार्टी की खरीद-फरोख्त देखकर लगता है कि चुनाव के बाद भी हिन्दुस्तान का लोकतंत्र सबसे महंगा लोकतंत्र साबित हो रहा है जहां विधायकों के इतने दाम लगने की चर्चा खुले रहस्य की तरह होती है। यह सिलसिला उन लोगों को निराश करता है जो संविधान की बात करते हैं, जो लोग लोकतंत्र पर भरोसा करते हैं, या जो लोग अपने वोट की ताकत पर एक बेबुनियाद आत्मविश्वास रखते हैं। इस मंडी को लोकतंत्र समझ लेने की खुशफहमी महज हिन्दुस्तानी कर सकते हैं। 


Date : 26-Jul-2019

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश की इस सर्वोच्च अदालत में मामलों को रजिस्टर करने वाले अपने दफ्तर के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि वहां बुनियादी रूप से कुछ गड़बड़ी है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि हाईकोर्ट में एक हफ्ते में करीब 6 हजार नए मामले दायर होते हैं, और सभी दर्ज हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक हफ्ते में करीब हजार मामले दायर होते हैं, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री इनका निपटारा नहीं कर पाती है, इन्हें दर्ज नहीं कर पाती है। उन्होंने इस हाल पर तकलीफभरी नाराजगी जाहिर की है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ समय पहले ही अंबानी से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट जजों के आदेश के उल्टे एक आदेश नीचे के बाबुओं ने टाईप करके जारी कर दिया था। इस मामले में कुछ लोगों पर कार्रवाई भी हुई थी। 

यह तो अच्छा है कि देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश की सबसे बड़ी अदालत के हाल पर शर्मिंदगी जाहिर की है, वरना देश की जनता तो पीढिय़ों से निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक में जो तकलीफ झेलते आ रही है, उसके चलते उसका भरोसा ही न्यायपालिका पर से खत्म हो चुका है। यह भी एक वजह है कि कहीं भीड़ हत्या कर रही है, कहीं लोग सुपारी देकर कत्ल का ठेका दे रहे हैं, और कहीं खुद आमने-सामने एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं। कई जगहों पर जाति पंचायतों से लेकर इलाके के मवाली तक अपने अंदाज में इंसाफ कर रहे हैं, और कई जगहों पर मुजरिमों की ज्यादती के खिलाफ लोग अदालत तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाते हैं। यह सब कुछ इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि अदालतों में इंसाफ आसान नहीं रह गया है, वक्त पर नहीं मिल पा रहा है, बहुत महंगा हो गया है, और बहुत खतरनाक भी हो गया है क्योंकि इस देश ने पिछले बरसों में शिकायतकर्ताओं का कत्ल, सड़कों पर गवाहों का कत्ल, और जजों की संदिग्ध मौत तक देखी है, और जैसा कि आए दिन चर्चा में रहता है, जजों को राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार के तहत फैसले लेते भी देखा जाता है। 

जिन आम लोगों को जिले की अदालतों तक काम पड़ता है, वे जानते हैं कि अदालत में तकरीबन हर मुजरिम से हर पेशी पर रिश्वत ली जाती है, और साथ-साथ शिकायतकर्ता से भी ऐसा ही सुलूक होता है, और हर पेशी पर उसे जज के ठीक सामने बैठे बाबू को टेबिल के ऊपर ही नगदी थमानी पड़ती है, तभी उसकी बारी आती है, तभी उसका दस्तखत करवाकर उसे उस दिन की छुट्टी मिलती है, और तभी उसे अगली तारीख मिलती है। अदालतों का हाल देखें तो आम लोगों का यह तजुर्बा और कहना है कि सरकार का कोई भी विभाग इतना भ्रष्ट नहीं रहता जितनी कि निचली अदालतें रहती हैं। इससे परे हाईकोर्ट की बात करें तो वहां भी तारीखों को जुटाने, या टलवाने के काम में नगदी काम आती है, और अधिकतर हाईकोर्ट के बारे में यह चर्चा रहती है कि वहां बहुत से, और कौन-कौन से, जज नगदी लेकर फैसले देते हैं। 

लोगों को याद होगा कि देश के कानून मंत्री रहे हुए एक बड़े वकील शांतिभूषण, और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह खुला आरोप लगाया था कि वहां के एक दर्जन जज भ्रष्ट रहे हैं। इस पर अदालत ने उनके खिलाफ अवमानना का मुकदमा भी चलाया था, उनसे माफी मांगने के लिए जोर के साथ कहा भी गया था, लेकिन वे जेल जाने को तैयार थे, माफी मांगने को नहीं। उसके बाद से शायद यह मामला सबकी सहूलियत के लिए ताक पर धर दिया गया है। अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद कोई पुनर्वास पाने के लिए सत्ता की मर्जी के फैसले देने के संदेह से घिरे रहते हैं। हमने यह भी सलाह दी थी कि राज्यों में उसी राज्य के हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों का कोई मनोनयन नहीं होना चाहिए, और इसके लिए दूसरे राज्यों से ही संवैधानिक जरूरत पूरी करनी चाहिए। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की ही संवैधानिक जरूरत वाली कुर्सियों पर मनोनयन करने के लिए सरकार के एकाधिकार को खत्म करना चाहिए, और ऐसे चयन-मनोनयन के लिए बड़ी संख्या में तटस्थ लोगों की एक कमेटी बनानी चाहिए, और उसमें जजों से खुली बातचीत करके, उनके बारे में खड़े हुए संदेहों पर जवाब मांगकर ही उनका चयन करना चाहिए। 

आज की बात शुरू तो हुई थी सुप्रीम कोर्ट के दफ्तर की गड़बडिय़ों को लेकर जो कि खुद मुख्य न्यायाधीश ने उठाई हैं, लेकिन लगे हाथों न्यायपालिका की दूसरी गड़बडिय़ों पर भी यह चर्चा जरूरी थी क्योंकि जनता का विश्वास सरकार की ईमानदारी पर से एक सीमा तक खत्म हो गया है, संसद की ईमानदारी या उसके असर पर खत्म हो गया है, और अगर अदालत पर से भी जनता का विश्वास उठ जाएगा, जो कि आज भी काफी हद तक उठ चुका है, तो फिर जुर्म के राज को कैसे टाला जा सकेगा?
-सुनील कुमार


Date : 25-Jul-2019

मध्यप्रदेश के भोपाल से दिग्विजय सिंह को लाखों वोटों से हराकर सांसद बनने वाली गोडसेवादी साध्वी प्रज्ञा एक बार फिर खबर और आलोचना के घेरे में है। उन्होंने लोगों के बीच और कैमरों के सामने यह कहा कि वे नाली साफ करने के लिए सांसद नहीं बनी हैं, झाड़ू लगाने के लिए सांसद नहीं बनी हैं, वे जिस काम के लिए सांसद बनी हैं उस काम को वे ठीक से करेंगी। देश के अमन-पसंद और समझदार लोगों के बीच पहले से नफरत के लायक मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के बीच भी, या चुनाव प्रचार के बीच ही, गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति सार्वजनिक तौर पर कही थी। यह अलग बात है कि उसके कुछ समय बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी बात से असहमति जाहिर करते हुए कुछ कड़े शब्द कहे थे, जिस पर कोई अमल होते दिखा नहीं है। फिर वे खबरों में आईं कि वे खुलकर चुनाव प्रचार कर रही हैं, दौड़-भाग कर रही हैं, महिलाओं की किसी जलसे में कुछ नाचते भी दिख रही हैं, लेकिन वे आतंकी हिंसा के मामले में अदालत से इलाज के नाम पर जमानत पर जेल के बाहर हैं, और अदालत की पेशी पर जा नहीं रही हैं, संसद जा रही हैं। 

साध्वी प्रज्ञा की कही यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की बात से मेल नहीं खाती है जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में जमीन पर और नालियों में पड़ी गंदगी को साफ करने को एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी ठहराने की कोशिश की है। यह एक अलग बात है कि उनकी यह कोशिश महज जमीन और नालियों की भौतिक गंदगी तक सीमित रही है, और सोच और बोली की गंदगी के बारे में वे मौन हैं। साध्वी प्रज्ञा ने एक तरफ तो जमीन और नालियों की गंदगी को साफ करने से साफ मना भी कर दिया है, और दूसरी तरफ सोच और बोली की परले दर्जे की गंदगी को फैलाना उन्होंने अपनी जिम्मेदारी मान लिया है। ऐसे में उनकी कही इस ताजा बात के बारे में कहा जा रहा है कि भाजपा की तरफ से नाराजगी जाहिर करते हुए उन्हें समझाईश दी गई है कि वे ऐसी बात न करें। 

लेकिन हम बात पर आते हैं, उसके पीछे के मुंह पर नहीं जाते, तो इसमें अटपटा तो कुछ भी नहीं लगता। लोग अगर सांसद से सड़क और नालियों की गंदगी साफ करने की उम्मीद करते हैं, तो पंचायत-सदस्यों से लेकर शहरी वार्ड मेम्बरों तक की जिम्मेदारी क्या होगी? क्या वे संसद में जाकर देश के व्यापक महत्व के मुद्दों पर चर्चा करके राष्ट्रीय स्तर के कानून बनाने का काम करेंगे? इस बात को ठीक से समझने की जरूरत है कि भारत का निर्वाचित लोकतंत्र तीन सतहों में बंटा हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर संसद है, राज्य के स्तर पर विधानसभा है, और शहर-गांव के स्तर पर म्युनिसिपल-पंचायत हैं। ऐसी व्यवस्था में इन तीनों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, और ठीक से तय भी की हुई हैं। सांसद तो दूर, एक विधायक की जिम्मेदारी भी जमीन और नाली की सफाई की नहीं है। इसका अधिकार और इसकी जिम्मेदारी दोनों ही स्थानीय संस्थाओं की है, और इन्हीं के लिए वार्ड मेम्बर चुने जाते हैं, म्युनिसिपिल-अध्यक्ष चुने जाते हैं, और पंच-सरपंच चुने जाते हैं। 

लोकतंत्र में अगर सारी जिम्मेदारियों को सब पर लाद दिया जाएगा, तो उसका एक असर यह भी होगा कि कोई जिम्मेदारी किसी की नहीं होगी। देश की संसद के सामने जो मुद्दे हैं, जो मुद्दे रहते आए हैं, और जो आगे रहेंगे, उनके बारे में पल भर को सोचें, तो यह साफ होता है कि निर्वाचित सांसदों को अपनी जमीनी-समझ के अलावा भी बहुत सी पढ़ाई-लिखाई करनी है, बहुत सी बातों को समझना है, अपने इलाके के लोगों से लेकर विशेषज्ञ-जानकारों तक से सीखना है, और उसके बाद संसद में चर्चा में, बहस में हिस्सेदारी करनी है। अगर कोई सांसद इस जिम्मेदारी को ठीक से निभाए, तो उनके लिए पांच साल का पूरा कार्यकाल भी काफी नहीं होता है। वे हर दिन लोगों से मिलकर, लोगों की दिक्कतों को समझें, उनमें से संसद में चर्चा के लायक बातों को वहां पर उठाएं, वहां आने वाले विधेयकों की जटिलता को समझकर संविधान संशोधन करें, या नए कानून बनाएं, या मौजूदा कानून सुधारें, यह काम ही किसी सांसद के लिए भारी-भरकम होता है। ऐसे में अगर साध्वी प्रज्ञा ने कहा है कि वे झाड़ू लगाने या नाली साफ करने के लिए नहीं चुनी गई हैं, तो यह बात भाजपा के लिए एक राजनीतिक असुविधा की तो हो सकती है, लेकिन इस बात में गलत कुछ भी नहीं है, जरा सा भी नहीं है। इस बात को पढ़कर साध्वी प्रज्ञा के आलोचकों को निराशा हो सकती है कि उनकी किसी बात को सही करार देने की हमारी क्या बेबसी है। लेकिन जब उनके बयान के दो दिन बाद भी किसी भी पार्टी के किसी सांसद ने उस बात के मतलब पर कुछ नहीं कहा, तो यह चर्चा जरूरी है। 

लोगों को यह अच्छा लगता है कि उनकी छोटी-छोटी बातों के लिए वे अपने सांसद से लेकर विधायक तक, या मुख्यमंत्री की चौपाल तक को शामिल कर लें, और हर जगह से दिक्कत का इलाज पाने की कोशिश करें। लेकिन यह अच्छी नौबत नहीं है क्योंकि इससे लोगों की बुनियादी जिम्मेदारी किनारे रह जाती है, और वे जनता के बीच लुभावने लगने वाले कामों में लग जाते हैं जिनसे वोट प्रभावित हो सकते हैं। ऐसा लुभावनापन अच्छा नहीं रहता है, चाहे वह बहुत सुहावना क्यों न लगे। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ क्यों न हो, हकीकत यह है कि सफाई की बुनियादी जिम्मेदारी में स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं की रहती है, और उस जिम्मेदारी को देश के बाकी लोग अपने कंधों पर उठाकर खुद तो तस्वीरें खिंचवा सकते हैं, स्थानीय संस्थाओं को जिम्मेदारी का अहसास नहीं करा सकते। लोकतंत्र में जिम्मेदारियों के बंटवारे की हकीकत को किनारे करके शोहरत की हसरत से काम करना अच्छी बात नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 24-Jul-2019

केन्द्र सरकार ने सूचना के अधिकार कानून में कई संशोधन किए, और सत्तारूढ़ एनडीए का जिस तरह का विशाल बहुमत लोकसभा में है, उसके चलते उसे वहां से पास भी करवा लिया। विपक्ष न तो इससे सहमत था, और न ही उसकी आवाज का कोई वजन लोकसभा में रह गया है। लेकिन देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संशोधन का बड़ा विरोध किया है जिसके बाद सूचना का अधिकार बहुत ही कमजोर हो गया है, और अब सरकारों सहित जो भी संस्थाएं इसके दायरे में आती हैं, वे अपने-अपने भ्रष्टाचार को छुपाने में कामयाब रहेंगी। 

यूपीए सरकार के वक्त जब सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों ने उन्हें सहमत कराकर सूचना का अधिकार बनवाया,और लागू करवाया, तब भी किसी राजनीतिक दल के लोग इससे सहमत नहीं थे। क्योंकि बारी-बारी से हर पार्टी की कभी न कभी, कहीं न कहीं सरकार बनती है, और वैसे में उनकी जानकारियां बाहर निकलने पर उनके भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होता है। आरटीआई लागू होने के बाद से लगातार यह बात सामने आई कि मीडिया या सामाजिक आंदोलनों में सरकार के, दूसरी संस्थाओं के जो भ्रष्टाचार उजागर हुए, वे आरटीआई के बिना नहीं हुए होते। इसे एक क्रांतिकारी-लोकतांत्रिक अधिकार और औजार माना गया, लेकिन राजनीतिक ताकतों ने हमेशा इसे एक हथियार की तरह देखा, जिसका हमला उन पर होता है। अभी कल हुए इस ताजा संशोधन के बिना भी राज्य सरकारों ने और केन्द्र सरकार ने अपने-अपने स्तर पर इस अधिकार को कुचलने की खूब कोशिश की। सरकारी दफ्तरों में जनसूचना अधिकारी की बड़ी जिम्मेदारी यही बना दी गई थी कि वे किस तरह के तकनीकी बहाने ढूंढकर सूचना देने से बचें, या उसमें देरी करते जाएं। ऐसी देरी के खिलाफ जब लोग राज्य के सूचना आयोग तक पहुंचते हैं, तो वहां पर प्रदेश के वही पुराने घुटे हुए रिटायर्ड नौकरशाह बैठे रहते हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सरकार की फाईलों की जानकारी को छुपाते हुए गुजारी है, और जिनकी भरसक कोशिश रहते आई है कि विधानसभा और संसद से भी जानकारी को जितना मुमकिन हो सके छुपाया जाए। ऐसे लोगों को सूचना आयोग में अपील सुनने के जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर रखने का एक मतलब यह भी होता है कि इन्हें मनोनीत करके सत्ता अपनी हिफाजत की गारंटी खरीदती है। 

और तो और इस देश की सबसे बड़ी अदालत के जज भी सूचना के अधिकार को कुचलने में अपने जूतों को भी शामिल कर लेते हैं, और जब किसी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति की जानकारी मांगी, तो जजों ने एकमुश्त उस मांग को खारिज किया। यह देश की न्यायपालिका के लिए एक शर्मनाक नौबत थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अपील पर यह फैसला दिया था कि आरटीआई के तहत जनता को सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति जानने का हक है, और जज उससे बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह फैसला हाईकोर्ट ने दिया था जिससे यह उजागर हुआ था कि अपने निजी हितों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज भी कानून की गलत व्याख्या कर रहे थे। अभी हमारे सामने इसी बरस की 15 फरवरी की एक खबर है जिससे पता लगता है कि जजों की संपत्ति जानने के लिए आरटीआई की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में 2010 से चली आ रही है, और 2016 में इसे तीन जजों की बेंच से पांच जजों की बेंच को भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज अपने आपको जनता की निगाहों से बचाने के लिए राष्ट्रीय सूचना आयोग के आदेश भी खारिज कर रहे हैं। 

जब हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कानून बनकर सामने आया, उसमें आम जनता को बहुत ही मजबूत लोकतांत्रिक अधिकार दिए, तो यह जाहिर ही था कि सत्ता पर बैठे लोग उसके खिलाफ रहते। ऐसे में एनडीए सरकार ने लोकसभा में इस कानून को कमजोर करके देश भर की अपनी सरकारों के कामकाज को भी जनता की नजरों से दूर और छुपाए रखने का इंतजाम कर लिया है। इससे लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, अगर लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है।
-सुनील कुमार


Date : 23-Jul-2019

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के एक बयान को लेकर कल से हिंदुस्तानी मीडिया में लोग बौखलाए हुए हैं, और आज सुबह जब संसद शुरू हुई तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे लेकर बवाल हुआ। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ कल अमरीकी राष्ट्रपति भवन में बैठक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में ट्रंप ने बड़े साफ-साफ शब्दों में कहा था कि दो हफ्ते पहले ओसाका की एक बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद पर उनसे (ट्रंप से) मध्यस्थता की अपील थी और ट्रंप ने उसे मंजूर करते हुए कहा कि दोनों पक्ष ऐसा चाहेंगे तो वे मध्यस्थता के लिए तैयार हैं। ट्रंप के पूरे शब्द समाचार में छप रहे हैं इसलिए उनकी पूरी बात को यहां देने का कोई उपयोग नहीं है, लेकिन भारत सरकार ने इस बात का पूरी तरह खंडन किया है कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कोई आग्रह किया हो। दूसरी तरफ एक अमरीकी सांसद ने टं्रप के ऐसे बयान को लेकर भारत के अमरीका में मौजूद राजदूत से माफी मांगी है और कहा है कि ट्रंप का बयान बचकाना, भ्रामक, और शर्मनाक है। इधर भारत में संसद के भीतर और संसद के बाहर लोग टं्रप को कोस रहे हैं।

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत पहले इंदिरा गांधी के वक्त से इस बात पर सहमति बनी हुई है कि इन दोनों देशों के बीच के परस्पर विवाद आपसी बातचीत से ही निपटाए जाएंगे, और ऐसी द्विपक्षीय बातचीत में किसी तीसरे की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। यह ठोस नीति लगातार जारी है, और मोदी का कोई खंडन आए बिना भी कांगे्रस-यूपीए के विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर ने मानो मोदी का बचाव करते हुए कल ही यह बयान दिया है कि यह असंभव है कि मोदी ऐसी कोई बात कहें। जिस तरह ट्रंप ने एक निहायत अटपटी बात कही, तकरीबन वैसी ही अटपटी बात शशि थरूर की है जो कि कांगे्रस के नेता हैं, और जो आज इस मामले में मोदी के कुछ कहने के पहले ही मोदी की तरफ से सफाई देते से दिख रहे हैं। भारत सरकार के पास, मोदी के पास, और मोदी की पार्टी भाजपा के पास बहुत से प्रवक्ता हैं, और वे ट्रंप की बात का खंडन करने की क्षमता रखते हैं, और मोदी का पक्ष रखने का मौका भी जिन्हें हासिल है, लेकिन उन सबसे पहले अगर शशि थरूर ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, तो यह कांगे्रस के लिए शर्मिंदगी की एक बेतुकी बात है।

जहां तक ट्रंप का सवाल है, तो वॉशिंगटन पोस्ट ने आज ही अपनी एक लिस्ट को अपडेट किया है कि ट्रंप अब तक 10 हजार और कितने-कितने झूठ बोल चुके हैं। ट्रंप के साथ दिक्कत यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति रहते हुए वे परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी के साथ बकवास करते हैं, और ट्विटर जैसे सार्वजनिक मीडिया पर खुलकर बकवास लिखते हैं। लोगों को याद नहीं पड़ रहा है कि ऐसा बुरा बोलने और लिखने वाला अमरीकी राष्ट्रपति उन्होंने पहले कब देखा था। लेकिन इन सब बातों से परे अगर अमरीकी राष्ट्रपति भवन की ओर से जो स्पष्टीकरण जारी हुआ है, उसमें ट्रंप की कही गई बात का खंडन नहीं किया गया है, और महज इतना कहा गया है कि अमरीका भारत के इस रूख का समर्थन करता है कि आतंकवाद खत्म होने के बाद ही बातचीत संभव है, और यह कि कश्मीर भारत-पाक का द्विपक्षीय मामला है। इस स्पष्टीकरण में ट्रंप की कही बात के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। 

चूंकि ट्रंप आदतन झूठे, और अकसर बकवास करने वाले नेता हैं, इसलिए लोग पहली नजर में उनकी कही बात को झूठ मान रहे हैं, और मोदी के कुछ कहे बिना ही यह मान रहे हैं कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ नहीं कहा था। फिलहाल संसद में आज नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ-साफ कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्रंप से ऐसी कोई अपील नहीं की है। इसके साथ ही यह विवाद खत्म हो सकता है, लेकिन यह पूरा सिलसिला एक परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी से उपजा हुआ है, और इसने वॉशिंगटन पोस्ट के काऊंटर को एक और गिनती दे दी है। हम भी फिलहाल भारतीय विदेश मंत्री के बयान को सही मानकर बात यहां खत्म कर रहे हैं।
-सुनील कुमार