संपादकीय

Date : 19-Feb-2020

जजों की पांच-पांच बरस से 
खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं 
सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट!

हिन्दुस्तान के किसी भी मामूली खाते-पीते आम घर में रसोई का सामान खत्म होने के हफ्ता-दस दिन पहले सामान लाकर रख दिया जाता है। उस घर को बहुत ही बुरे इंतजाम का शिकार माना जाता है जहां शक्कर, नमक, चायपत्ती, अदरक जैसे सामान खत्म हो जाते हों। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर भारत सरकार का वकील अदालत को कहता है कि देश की अदालतों में सैकड़ों पद इसलिए खाली पड़े हैं कि अदालतें समय पर भावी जजों के नाम केन्द्र सरकार को नहीं सुझाती हैं। अदालतों के खाली पदों को लेकर चल रही एक बहस में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि उच्च न्यायालयों में जजों के 36 फीसदी पद खाली होने के लिए न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। उन्होंने गिनाया कि अभी उच्च न्यायालयों के 396 खाली पदों में से 199 के लिए केन्द्र सरकार को कोई नाम भेजे ही नहीं गए हैं। उन्होंने कहा कि कई मामले तो ऐसे हैं जिनमें हाईकोर्ट कॉलेजियम पद खाली होने के पांच बरस बाद भी उसके लिए नाम नहीं सुझा रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में अदालत के चक्कर में फंसने वाले लोगों की लोकतंत्र और न्यायपालिका पर आस्था पूरी ही खत्म हो जाती है। कई मामलों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े रहते हैं, कई मामलों में फैसला सामने आने तक दोनों ही पार्टियां कंगाल हो जाती हैं, और हिन्दी के एक मशहूर उपन्यास में वर्णन के मुताबिक, जीतने वाले से अदालत के बाबू उसकी लंगोट भी उतरवा लेते हैं। ऐसे में जो एक सबसे बड़ी वजह इंसाफ में लेट-लतीफी की है, वह जजों की खाली कुर्सियां हैं। एक तिहाई से अधिक कुर्सियां खाली हैं, तो जाहिर तौर पर हर मामला एक तिहाई अधिक वक्त लंबा खिंच ही जाएगा। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति में सरकार को औसतन 127 दिन लगे हैं क्योंकि उसे प्रस्तावित नामों के बारे में खुफिया रिपोर्ट भी बुलानी पड़ती है। लेकिन दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कॉलेजिमय में ही नाम बढ़ाने में 119 दिन लगाए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मिलाकर 18 दिनों में ही फाईल क्लीयर कर दी। उन्होंने अदालती बहस के दौरान यह सुझाया कि चूंकि जज नियुक्त करने में अदालत और सरकार-राष्ट्रपति को एक साल लग जाता है, इसलिए जज रिटायर होने के एक साल पहले से नए जज के लिए नाम तय कर लिए जाने चाहिए ताकि कुर्सी खाली न रहे। पटना और राजस्थान हाईकोर्ट में तो जजों की 50 फीसदी से अधिक कुर्सियां खाली हैं। 

अब देश भर में इतनी सारी लॉ यूनिवर्सिटी खुली हुई हैं, अदालतों में लाखों वकील प्रैक्टिस कर रहे हैं, निचली अदालतों में दसियों हजार, या लाखों जज काम करते हैं, ऐसे में हाईकोर्ट जज बनाने के लिए लोगों के नाम की कमी तो होनी नहीं चाहिए। कुर्सियां खाली रहें, और मामलों के ढेर शहरी कचरे के ढेरों से ऊंचाई का मुकाबला करते रहें, तो लोकतंत्र तो गटर में ही चले गया मान लेना चाहिए। जब गरीब और बेबस लोग इंसाफ की उम्मीद में अदालती फैसला पाने के लिए पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और उसके बाद भी जरूरी नहीं है कि उन्हें इंसाफ मिले, हो सकता है कि उन्हें सिर्फ फैसला मिले, तो वैसे में रसोई के नमक-शक्कर की तरह अदालतों में जजों का इंतजाम समय रहते क्यों नहीं किया जा सकता? यह सिलसिला बहुत ही निराश करने वाला है। जो अदालत देश के हर व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाती है, उसके खुद के घर का हाल गड़बड़ है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज समय रहते अदालती रसोई के लिए अदरक-चायपत्ती का इंतजाम नहीं करते तो यह छोटी बात नहीं है। 

जून 2019 में केन्द्रीय कानून मंत्री ने संसद को बताया था कि देश के 25 हाईकोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 8 लाख से अधिक एक दशक से अधिक पुराने हैं। उस दिन सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ लाख से अधिक मामले चल रहे थे। इसके एक बरस पहले का एक और आंकड़ा है, जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि भारतीय अदालतों में तीन करोड़ तीस लाख मामले लंबित हैं। इनमें 16.58 लाख मामले अकेले बिहार में लंबित थे, जहां के हाईकोर्ट में जजों की आधी कुर्सियां खाली पड़ी हैं।

एक तरफ तो देश में आए दिन अलग-अलग किस्म के जुर्म के लिए अलग-अलग फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने की बात होती है, पूरे देश में चुनाव याचिकाओं की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनी हुई हैं ताकि सांसद या विधायक का कार्यकाल खत्म हो जाने के पहले उनकी पात्रता-अपात्रता पर फैसला हो सके। अदालतों के बड़े-बड़े जज अपने बीच के वकीलों या छोटे जजों के नामों में से अगर हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के लिए नाम तय नहीं कर सकते, तो यह हैरान करने वाली तकलीफदेह बात इसलिए भी है कि कुर्सी खाली होने के पहले ही उस कुर्सी के काबिल दावेदार-हकदार सामने रहते हैं, और जिस तरह लोक अदालतें लगाकर मामलों का बोझ खत्म करने की कोशिश होती है, अदालतों को अपने कॉलेजियम को भी लोक अदालत की तरह बिठाना चाहिए, हर खाली कुर्सी को भरने का काम भी करना चाहिए। कायदे की बात तो यह होगी कि किसी जज के रिटायर होने के पहले ही उसकी जगह नियुक्त होने वाले वकील और छोटे जज छांट लिए जाने चाहिए जिन्हें यह पता हो कि किस तारीख से उन्हें कहां काम सम्हालना है। हम जजों के नाम छांटकर सरकार को सुझाने की हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की प्रक्रिया को कम नहीं आंक रहे, उसका अतिसरलीकरण नहीं कर रहे, लेकिन उसे वक्त पर करने की जरूरत जरूर बता रहे हैं। आज हिन्दुस्तानी अदालतें जब अपनी खुद की खाली कुर्सियों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे, वे किसी दूसरे के साथ क्या इंसाफ करेंगी?
-सुनील कुमार


Date : 18-Feb-2020

मां को कुतिया कहने वाले
भगवों से भरा हिंदुस्तान...

पहले गाय को बचाने के नाम पर मरे जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को निशाना बनाया गया, और गुजरात के उना की वे तस्वीरें भूलती नहीं हैं जिनमें दलितों की नंगी पीठ पर दिनदहाड़े खुली सड़क पर बेल्ट से कोड़े लगाए गए। इसके बाद देश के आदिवासियों के खानपान पर हमला हुआ, दलितों और अल्पसंख्यकों के खानपान पर हमला हुआ, मांसाहारियों पर हमले हुए, और हिंदू धर्म के अलावा बाकी किसी भी धर्म को मानने वाले पर जुबान से और हथियारों से हमले हुए। इस हद तक हुए कि जब आरएसएस ने सिखों को हिंदू करार दिया, तो अकाली दल से लेकर अकालतख्त तक ने इसका विरोध किया। हिंदू धर्म के भीतर एक सनातनी व्यवस्था को न मानने वाले तमाम लोगों को गद्दार कहा गया, जो जय श्रीराम न कहे उसे पाकिस्तान जाने कहा गया, और जो मोदी की जरा भी आलोचना करे उसे देशद्रोही कहकर देशनिकाले के फतवे दिए गए। लेकिन नफरत और हिंसा के मुंह खून लग जाता है, और वे रूकने से मना कर देते हैं। जंगल के जानवरों के बारे में मानवभक्षी हो जाने की बात कही जाती है कि उनके मुंह इंसानों का खून लग जाए तो वे इंसानों को मारने लग जाते हैं, जानवरों का तो पता नहीं, लेकिन धर्म के नाम पर, एक आक्रामक राष्ट्रीयता के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों के मिजाज में हिंसा घर कर जाती है, और वे हिंसा करने के लिए नए निशाने ढूंढने लगते हैं। पिछले तीन दिनों में एक ऐसा निशाना सामने आया हैै जिसने पूरे के पूरे हिंदू-समुदाय को जन्म दिया है, हिंदू महिला।

गुजरात में वहां के एक प्रमुख हिंदू समुदाय, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जाने वाले एक कन्या कॉलेज से खबर आई कि वहां माहवारी की किसी लड़की का एक पैड खुले में पड़े मिला तो पूरे कॉलेज की लड़कियों के कपड़े उतरवाकर जांच की गई कि किस-किस की माहवारी चल रही है। अब उस धार्मिक कॉलेज की बाकी खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह वहां लड़कियों को माहवारी के दिनों में तलघर में अलग रखा जाता था। फिर मानो यह भी काफी नहीं था, तो इस कॉलेज ट्रस्ट के एक भगवा स्वामी, स्वामी कृष्णस्वरूप दासजी का यह बयान आया कि अगर कोई महिला माहवारी के दिनों में खाना पकाती है, तो वह अगले जन्म में कुतिया बनती है। जिन लोगों को न मालूम हो वे यह जान लें कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी को महिलाओं से इस हद तक परहेज रहता है कि वे जिस सभा भवन में बैठते हैं, उसके बाहरी दरवाजों के सामने से भी किसी महिला के गुजरने पर रोक रहती है ताकि स्वामी की नजरें किसी महिला पर न पड़ें। 

दूसरी तरफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अपनी घिसीपिटी दकियानूसी बातों को फिर दुहराया है कि शिक्षित घरों में तलाक के अधिक मामले होते हैं। वे एक किस्म से शिक्षा को खतरनाक बता रहे हैं, और इसके पहले वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि महिला को घर संभालना चाहिए, और परिवार चलाने के लिए कमाई का जिम्मा आदमी पर छोडऩा चाहिए। अलग-अलग समय पर दिए गए उनके इन बयानों को देखें तो यह समझ आता है कि उन्हें पढ़े-लिखे परिवारों में महिला की पढ़ाई-लिखाई ही खतरनाक दिख रही है। महिलाओं के खिलाफ दकियानूसी बातें कहते हुए उनके भाषण आते ही रहते हैं, और पिछले चार दिनों में आई इन दोनों बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि हिंदू समाज के दो अलग-अलग किस्म के स्वघोषित नेता अब अपना निशाना अल्पसंख्यकों के बाद हिंदू महिलाओं की तरफ मोड़ चुके हैं। 

यह नौबत एक दिन आनी ही थी क्योंकि हिंसा करने और धार्मिक भेदभाव करने के आदी लोग हमेशा से महिलाओं को एक पसंदीदा-निशाना मानते आए हैं, और अब फिर थोड़े समय तक गाय, गोबर, गोमूत्र, हिंदुत्व, मंदिर के मुद्दे इस्तेमाल कर लेने के बाद अब वे फिर महिलाओं को कुतिया बनाने के अपने पसंदीदा शगल में लग गए हैं। ऐसी बकवास करते हुए लोगों को यह भी नहीं दिख रहा कि वे एक औरत की माहवारी की वजह से, उसके माहवारी के खून के बीच नौ महीने गुजारने के बाद ही पैदा हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान जिस तरह बलात्कारी आसाराम के भक्तों से भरपूर है, मां को कुतिया कहने वाले के भक्तों की भी यहां कमी नहीं रहेगी, इनके खिलाफ अदालत तक जाने की जरूरत है।
-सुनील कुमार


Date : 17-Feb-2020

एक ट्रेन में भगवान बैठे, 
देश की बाकी रेलगाडिय़ों 
में भी तब्दीली की जरूरत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस से काशी महाकाल नाम की एक मुसाफिर ट्रेन शुरू हुई है जो कि इंदौर तक जाएगी। स्थानीय सांसद होने के नाते मोदी ने इसे झंडी दिखाई, और भीतर एसी-3 के एक डिब्बे में एक बर्थ स्थाई रूप से भगवान शंकर को अलॉट करके वहां मंदिर बना दिया गया है, और ट्रेन में धार्मिक संगीत बजेगा, उसकी सजावट धर्म के हिसाब से होगी। अब यह एक नया सिलसिला सरकार ने एक फैसले के तहत लिया है जो कि मुम्बई जैसे शहर में लोकल ट्रेन में मुसाफिरों की बहुतायत पहले से बलपूर्वक लागू करते आई है। वहां लोकल में गणेशोत्सव के समय रोज के मुसाफिर एक डिब्बे में गणेश प्रतिमा बिठाते हैं, पूजा-आरती करते हैं, और ढोल-मंजीरे संग संगीत भी करते हैं। अब इस ट्रेन के साथ यह काम सरकारी स्तर पर शुरू कर दिया गया है, जिसका अंत पता नहीं कहां जाकर होगा। 

अब केन्द्र की मोदी सरकार के सबसे मजबूत भागीदार, अकाली दल के सामने यह चुनौती होगी कि अमृतसर तक जाने वाली मुसाफिर रेलगाडिय़ों में वह स्वर्ण मंदिर के तीर्थयात्रियों के हिसाब से कैसी सजावट करवाए, और कैसा संगीत बजवाए। हिन्दुस्तान में अकेले अमृतसर में शुरू से ही आकाशवाणी से स्वर्ण मंदिर की सुबह की  गुरूवाणी का जीवंत प्रसारण होते आया है। इसके बाद नीतीश कुमार भी एनडीए के एक बड़े भागीदार हैं, और बिहार में इसी बरस चुनाव भी है, ऐसे में नीतीश कुमार की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि उनके राज्य के बोधगया के हिसाब से उन्हें कुछ रेलगाडिय़ों को बुद्ध को समर्पित करवाना चाहिए, और आसपास से निकलने वाली ट्रेनों में एसी-3 नहीं, बल्कि एसी-1 में बुद्ध को बर्थ दिलवानी चाहिए, और बौद्ध संगीत भी बजना चाहिए। इसके बाद कई बार भाजपा की सरकार बनवाने वाले राजस्थान के अजमेर जाने वाली ट्रेन में वहां की दरगाह के हिसाब से साज-सज्जा होनी चाहिए, और पूरे रास्ते उसमें ख्वाजा की कव्वाली भी बजनी चाहिए। इससे कम में राजस्थान का सम्मान नहीं होगा, और प्रधानमंत्री मोदी के लोग बार-बार देश को याद दिलाते हैं कि वे केवल भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वे पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए अब मौका है कि देश भर के लोग अपने-अपने तीर्थस्थानों के हिसाब से रेलगाडिय़ां बनवा लें। कोलकाता जाने वाली गाडिय़ों में काली मंदिर बनाए जा सकते हैं, और प्रधानमंत्री की निजी आस्था के हिसाब से बेलूर मठ की साज-सज्जा वाली कुछ गाडिय़ां भी बनाई जानी चाहिए। तिरूपति जाने वाली गाडिय़ों की साज-सज्जा कैसी होगी यह एकदम साफ है, और उस ट्रेन में खाने की जगह तिरूपति के प्रसाद के विख्यात लड्डू मिलने चाहिए। मुम्बई की कुछ गाडिय़ां हाजी अली के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां पारसियों के अग्नि-मंदिरों के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां सिद्धि विनायक के गणेश की साज-सज्जा की होनी चाहिए। शिरडी के सांई बाबा के हिसाब से भी पास के स्टेशन से गुजरने वाली गाड़ी बननी चाहिए, और असम में भाजपा की सरकार है, वहां की कामाख्या के हिसाब से भी गाडिय़ां सजनी चाहिए। 

फिर जब इतनी धार्मिक भावना से सब कुछ हो रहा है, तो इन ट्रेनों में जैमर लगाकर मोबाइल-इंटरनेट बंद करवाने चाहिए, क्योंकि जो ईश्वर की ट्रेन में बैठे हैं, उन्हें इधर-उधर की बात करने, नेट-सर्फिंग करने के बजाय केवल कीर्तन पर ध्यान देना चाहिए। यह भी याद रखना होगा कि जिस ट्रेन में खुद ईश्वर को बर्थ अलॉट की गई है, उसमें से शौचालयों को तो हटाना ही होगा क्योंकि ईश्वर के आसपास ऐसा रहना ठीक नहीं है। बल्कि बेहतर तो यह होगा कि जिन पटरियों से यह ट्रेन गुजरेगी, वहां पूरे रास्ते लोगों को पखाने से रोकना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह आज गुजरात के अहमदाबाद में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरों से झोपडिय़ों को रोकने के लिए ऊंची दीवार बनाई जा रही है। अभी तक तो ईश्वर मंदिर-मस्जिद या चर्च-गुरूद्वारे में रहते थे, इसलिए केवल उन जगहों को शौचालय-मुक्त कर देना काफी रहता था, लेकिन अब महाकाल काशी से इंदौर जाएंगे, और उनके गुजरते हुए पटरियों के किनारे शौच से धार्मिक भावनाएं बहुत बुरी तरह आहत होंगी। इसलिए पटरियों से पांच सौ मीटर दूर ही ऐसे गंदे काम की इजाजत देनी चाहिए जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे से पांच सौ मीटर दूर शराबखानों को इजाजत दी थी। 

भारत चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और यहां पर सर्वधर्म समभाव की बात कही जाती है, इसलिए देश की बाकी ट्रेनों को भी उनकी मंजिलों के तीर्थस्थानों के हिसाब से ढालने की जरूरत है, क्योंकि आज देश के बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि इस देश का अब भगवान ही मालिक है। लेकिन चूंकि देश धर्मनिरपेक्ष है और भगवान शब्द केवल हिन्दुओं के हिसाब से रहता है, इसलिए बाकी धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देते हुए इस नौबत को बदलना चाहिए, ताकि लोगों को लगे कि इस देश का अब ईश्वर ही मालिक है, ईश्वर शब्द में सभी धर्म आ जाते हैं। रेलगाडिय़ां पूरे भारत की एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है, और उसे ही सभी लोगों की भावनाओं का, खासकर धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने में जोता जा सकता है, इसलिए देश के बाकी तीर्थस्थानों के लिए भी गाडिय़ों को चलाया जाए, वर्तमान गाडिय़ों को बदला जाए, और देश में आस्था के एक नए युग को शुरू किया जाए। ईश्वर के आशीर्वाद से ही यह देश पटरी पर लौट सकता है, और लौटेगा। देश की मोबाइल कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वैसे भी दुकानें बंद कर सकती हैं, ऐसे में लंबे-लंबे सफर में कीर्तन, कव्वाली, और दूसरे धर्मों की आराधना का बड़ा सहारा रहेगा। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Feb-2020

अखबार निचोड़ेंगे 
तो लहू टपकेगा...

आज एक हिन्दी अखबार की दो-तीन पन्नों पर छाई हुई सुर्खियां देखना भी भयानक है, उनके भीतर की जानकारी पढऩा तो और अधिक भयानक होगा ही। खबरों की हैडिंग्स हैं- शराबी पति ने इतना पीटा कि मौत, बेटे-बेटी के सामने बीवी को मौत के घाट उतारा, चरित्र पर संदेह हुआ तो मार डाला पत्नी को, बेटी करती थी मोबाइल पर ज्यादा बात, दूसरी जात में शादी के डर से बाप ने कर दी हत्या, अवैध संबंध के शक में बीवी को मार डाला (ऊपर की खबर से अलग, दूसरे शहर की खबर)। छत्तीसगढ़ में एक दिन में एक अखबार के एक संस्करण की इन खबरों से परे दूसरे इलाकों तक सीमित संस्करणों में और भी ऐसी खबरें हो सकती हैं। लेकिन इसमें एक अजीब और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे जुर्म, ये तमाम हिंसा, अपने ही परिवार के लोगों के खिलाफ है। मतलब यह कि परिवार में एक की मौत, और दूसरे को जेल। ऐसे में घर पर अगर बच्चे ही बच गए, तो उनकी जिंदगी जीते जी ही खत्म सरीखी, और समाज की हिंसा को न्यौता देती हुई रह जाएगी। 

पारिवारिक हिंसा के बारे में अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा भी था जब एक आदमी ने अपनी बीवी की हत्या कर दी, जेल चले गया, और दो, चार, और छह बरस की तीन बेटियों को कचरा बीनने वाले रिश्तेदारों के साथ रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। इसी अखबार में इन बच्चियों की खबर छपने के बाद ऐसे बेसहारा बच्चों के लिए चलने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के स्थानीय केन्द्र के लोग इन बच्चियों की मदद को पहुंचे, लेकिन गरीब परिवार ने उन्हें इस सुविधाजनक केन्द्र में भेजने से भी मना कर दिया। परिवार के भीतर हिंसा से नुकसान दोहरा होता है, एक या अधिक की मौत, और एक या अधिक को कैद। फिर हिन्दुस्तान में जिस तरह अदालतों का हाल है, परिवार के बचे हुए लोग उनमें तबाह हो जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि परिवार के भीतर होने वाली ऐसी हिंसा को पुलिस भी कैसे रोक सकती है, अगर पहले से उसके पास पारिवारिक तनाव या हिंसा की शिकायत न आई हो, और पहली बार में ही इतनी बड़ी हिंसा हो जाए, तो पुलिस के करने का कुछ नहीं रहता। 

लेकिन समाज में हिंसा पर काबू तो लगना ही चाहिए, इसलिए यह सोचने की जरूरत है कि इसे कम कैसे किया जा सकता है। सबसे पहले तो परिवार के भीतर ही दूसरे लोग इस तनातनी को घटा सकते हैं, और बीच-बचाव कर सकते हैं। अगर परिवार के भीतर ऐसी क्षमता नहीं है, तो अड़ोस-पड़ोस के लोग या साथ में काम करने वाले लोग, लोगों की हिंसक सोच को रोक सकते हैं। लेकिन जो एक बात ऐसी तमाम हिंसा के पीछे हावी दिखती है वह नशे की है। ऐसे अधिकतर मामले नशे में होते हैं, और गरीबों के बीच अपनी तमाम गरीबी के बावजूद अधिक नशा करने का चलन अधिक दिख रहा है। अब किसी की नशे की लत तो रातों-रात लगती नहीं है, इसलिए घर-परिवार, सहकर्मी और पड़ोस के लोग, लोगों को नशे से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। इन दिनों समाज में बहुत सारे संगठन तरह-तरह से लोगों की मदद करते दिखते हैं, और ऐसे लोग भी अलग-अलग बस्तियों में जाकर, या शराब दुकानों पर जाकर लोगों को नशे के नुकसान समझा सकते हैं, हो सकता है कि कुछ लोग धीरे-धीरे समझ की तरफ लौटें। 

समाज और सरकार की यह मिलीजुली जिम्मेदारी रहनी चाहिए कि परिवार के भीतर नौबत हिंसा तक पहुंचने, या नशे की लत खतरनाक हद तक पहुंचने के खिलाफ परामर्श की सहूलियत उपलब्ध कराई जाए। आज तो देश में मनोचिकित्सक, परामर्शदाता इतने कम हैं कि वे अपने चैंबरों में मोटी फीस देने वाले लोगों को भी मुश्किल से नसीब हैं। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे सामाजिक-पारिवारिक, या वैवाहिक परामर्श के कुछ छोटे कोर्स भी चलाए जिन्हें पूरा करने वाले लोग चाहे उससे कमा-खा न सकें, आसपास कुछ लोगों की मदद तो कर सकें। एक बात यह भी लगती है कि आज हिन्दुस्तान की हवा में जितने किस्म की हिंसा फैलाई जा रही है, फिर चाहे वह किसी धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ क्यों न हों, उस हिंसक सोच का असर लोगों की दिमागी हालत पर होता है, और जब मारने को दूसरे धर्म के लोग न मिलें, तो हो सकता है कि लोग घर पर भी अपनी हिंसक सोच को पूरा करते हों। सजा पाने लायक हिंसा करने वाले लोगों के दिल-दिमाग पर सजा का खतरा कम दिखता है, और उनकी हिंसक भावना अधिक हावी दिखती है। आज समाज के जिम्मेदार लोगों को आसपास के ऐसे पारिवारिक तनाव में दखल देकर बीच-बचाव की कोशिश करनी चाहिए। आज की यह बात बहुत विचारोत्तेजक नहीं है, लेकिन यह गंभीर बात करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बारे में अखबारी सुर्खियों से परे सोचना शुरू हो, कुछ करना शुरू हो। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Feb-2020

अपने ही पौराणिक इतिहास को 
नकारता आज का हिन्दुस्तान...

हिन्दुस्तान की 21वीं सदी 18वीं सदी से भी अधिक पाखंड से भरी हुई है। देश के पौराणिक इतिहास को देखें तो सदियां शुरू होने के पहले की कहानियां बताती हैं कि किस तरह कृष्ण और राधा का प्रेम था जो कि विवाह से परे का था, किस तरह कृष्ण गोपियों के साथ श्रंगार रस में डूबी रासलीलाएं करते थे, और किस तरह हर पौराणिक काल में प्रेम की कहानियां भरी हुई थीं। आज झंडा-डंडा गिरोह प्रेम के पर्व, वेलेंटाइन डे पर जिस तरह हिंसा करते घूमता है, वही गिरोह इस देश में स्टेशनों के नाम संस्कृत में लिखने की मांग करता है, उर्दू में लिखे गए नाम हटाने की मांग करता है, और इस बात को अनदेखा करता है कि हिन्दुस्तान का संस्कृत-साहित्य किस तरह प्रेम और देह के श्रंगार रस से भरा हुआ रहा है। 

प्रेम की देसी कहानियों से भरे हुए इस देश में आज प्रेम किसी कुंवारी लड़की की अवैध कही जाने वाली, और अवांछित समझी जाने वाली संतान की तरह का अनचाहा काम हो गया है। आज नफरत का बोलबाला है, और प्रेम को देशनिकाला है। ऐसे देश में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में कल प्रेमपर्व वेलेंटाइन-डे पर एक कॉलेज में छात्राओं को इक_ा करके उनको सार्वजनिक रूप से यह शपथ दिलवाई कि वे कभी प्रेम नहीं करेंगी, और प्रेम-विवाह भी नहीं करेंगी, वे माता-पिता की मर्जी से ही शादी करेंगी। कॉलेज का यह फैसला और उसकी हरकत देश के आज के माहौल में बड़ी तारीफ की हकदार है क्योंकि यह माहौल कट्टरता और नफरत से भरा हुआ है, और इसमें प्रेम की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं गई है। यह एक अलग बात है कि केन्द्र सरकार के बनाए हुए कानून देश में सवर्णों के दलित-आदिवासियों से शादी पर लाखों का नगद पुरस्कार देते हैं, और समाज यह सोचता है कि ऐसी शादियां बिना प्रेम के ही हो जाएंगी। यह पूरा पाखंड सिर्फ धिक्कार के लायक है, और नौजवान पीढ़ी में ऐसी अवैज्ञानिक सोच भरने वालों के खिलाफ देश-प्रदेश के मानवाधिकार आयोगों को, महिला आयोगों को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे कॉलेजों की मान्यता खत्म करनी चाहिए।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसा दुराग्रह महज हिन्दुस्तान में हो। इस देश के लोगों की नजरों में जो असली पश्चिम है, उस अमरीका में भी ऐसा देखने मिलता है, और वहां ईसाई बिरादरी के बड़े-बड़े जलसे किए जाते हैं जिनमें किशोरियां अपने माता-पिता की मौजूदगी में ऐसी कसमें खाती हैं कि शादी के पहले तक वे अपना कौमार्य बनाए रखेंगी, और उनके पिता उनकी हिफाजत करेंगे, वे अपने पिता के प्रति जवाबदेह रहेंगी। यह सोच खुद अमरीका के भीतर एक बहुत ही छोटे तबके की सोच है, और वहां के आज के सामाजिक वातावरण के भीतर इसे एक बीमार सोच भी माना जाता है, लेकिन यह सोच वहां है तो सही।  यह सोच किसी लड़के को ऐसी कसम नहीं दिलाती, न अमरावती में, न अमरीका में। कौमार्य का सारे का सारा बोझ महज लड़कियों पर है, और लड़के तो मानो अंगूठी में लगे हुए हीरे की तरह हैं जिनका कि कुछ नहीं बिगड़ सकता। हिन्दुस्तानी समाज की यही सोच बलात्कार की शिकार लड़की के बारे में लिखती है कि उसकी इज्जत लुट गई। समाज यह नहीं कहता कि जुर्म करने वाले बलात्कारी की इज्जत लुटी है जो कि सजा पाएगा, जेल जाएगा, और अपने परिवार को मुसीबत में छोड़ जाएगा, एक बेकसूर लड़की या महिला के साथ ऐसी हिंसा कर चुका है। बलात्कारी की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार की शिकार लड़की की इज्जत लुटना कहा जाता है! ऐसी ही मर्दाना सोच लड़कियों को प्रेम करने से रोक रही है, प्रेम विवाह करने से रोक रही है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले अपने आपको बापू कहने वाला आसाराम छत्तीसगढ़ आया था, और उस वक्त वह बड़ा इज्जतदार माना जाता था। उस वक्त उसने रमन सिंह की भाजपा सरकार पर असर डालकर वेलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस में बदलवा दिया था, और सरकारी स्कूल-कॉलेज में भी यह नया त्यौहार मनाया जाने लगा था। यह एक अलग बात है कि बाद में यही बलात्कारी बापू अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लड़की से बलात्कार के बाद कैद भुगत रहा है, और वैसा ही जुर्म उसके बलात्कारी बेटे ने भी किया, और जेल गया। नौजवान पीढ़ी की प्राकृतिक भावनात्मक और देह की जरूरतों को कुचलकर इस किस्म की एक पाखंडी नैतिकता को थोपकर लोगों को लगता है कि वे हिन्दुस्तान का भला कर रहे हैं। वे दरअसल सड़कों पर हिंसा बढ़ा रहे हैं, नौजवान पीढ़ी को अपनी मर्जी की जिंदगी जीने से रोक रहे हैं। ऐसे बीमार दिमागवाले कॉलेज संचालकों के खिलाफ अदालतों में केस चलना चाहिए कि उन्होंने संविधान के किस प्रावधान के तहत ऐसी शपथ दिलवाई है। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Feb-2020

दिल्ली-स्कूलों के ब्लैकबोर्ड और
गांधी, नेहरू, पटेल नाम के डस्टर

हिन्दुस्तान इन दिनों बड़ी दिलचस्प बहसों से गुजर रहा है। गांधी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिए कोशिशें नहीं की थीं, क्या किया था, क्या नहीं किया था। एक और बहस चल रही है कि  नेहरू सरदार पटेल को अपने मंत्रिमंडल में लेना नहीं चाहते थे। केन्द्र की मोदी सरकार के विदेश मंत्री, और सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार पिछले दो दिनों में इन बहसों को आगे बढ़ाते दिखे हैं, और इतिहास के दूसरे बेहतर जानकार लोग ऐसे निष्कर्षों को खारिज करते हुए इन्हें बदनीयत का बता रहे हैं, और इतिहास की बेहतर किताबों को पढऩे की सलाह दे रहे हैं। लेकिन मीडिया का कुछ समय, और पन्नों पर कुछ जगह तो इन पर खर्च हो ही रही है, और मोदी सरकार-भाजपा को इससे एक फायदा यह हो रहा है कि दिल्ली के चुनावी नतीजों का सदमा भूलने में मदद मिल रही है, और चर्चा केजरीवाली-कामयाबी से हटकर गांधी और नेहरू की नाकामयाबी या बदनीयत पर आकर टिक गई है। 

आज हिन्दुस्तान में जलते-सुलगते इतने मुद्दे हैं कि वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। और तो और भाजपा के एक सबसे पुराने सहयोगी, अकाली दल के मुखिया ने कल ही मोदी-सरकार को धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाई है, और सभी अल्पसंख्यकों को साथ रखने की नसीहत दी है। देश में बेरोजगारी, गरीबी से लोगों का बहुत बुरा हाल है। देश के बड़े-बड़े तबके अपने को खानपान के मुद्दे पर, नागरिकता के मुद्दे पर, धर्म और जाति के मुद्दे पर खतरे में पा रहे हैं, और हिन्दुस्तान के इतिहास में यह पहला मौका है कि जनगणना के आंकड़े जुटाने जा रहे लोगों में से कुछ पर कहीं-कहीं हमले भी हुए हैं। पिछले दो बरस में जितने राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से सात राज्यों में भाजपा हार चुकी है, और दिल्ली की इतनी बड़ी हार उसके सामने है जिसके बारे में कल गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि गोली मारो सालों को जैसे नफरती नारों से भाजपा को नुकसान हुआ दिखता है। लेकिन जगह-जगह भाजपा के नेताओं के तेवर उसी किस्म के दिख रहे हैं, और योगीराज में उत्तरप्रदेश के एक सरकारी डॉक्टर, डॉ. कफील की रिहाई के ठीक पहले उन पर एनएसए लगा दिया गया है। उधर कश्मीर में दो-दो भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों की रिहाई के ठीक पहले उन पर जनसुरक्षा कानून लगाने के लिए बहुत ही फूहड़ किस्म के आरोप लगाए गए हैं, बहुत ही अलोकतांत्रिक किस्म से अधकचरी-कानूनी कार्रवाई की गई है। 

ऐसे माहौल में जब देश में आज के असल मुद्दे हर मोड़ पर पोस्टर लेकर खड़े हैं, तब गांधी और नेहरू को लेकर बहस छेड़कर उन पर तोहमतें लगाना मोदी सरकार को किसी किनारे नहीं पहुंचा रहा है। हिन्दुस्तान की जनता अच्छी तरह जानती है कि गांधी का अल्पसंख्यकों की हिफाजत के बारे में क्या सोचना था, सरदार पटेल का आरएसएस के बारे में क्या सोचना था, और नेहरू और पटेल इतने बड़े नेता थे कि उनकी सोच में कई जगह मतभेद होना बहुत जायज और जरूरी था, लेकिन दोनों के बीच परस्पर सम्मान इतना था कि तीन हजार करोड़ की प्रतिमा बनाकर भी उतना सम्मान नहीं दिखाया जा सकता। जब दो नेता आजादी के लिए लडऩे वाले, जेल जाने वाले, कुर्बानी देने वाले, और महान सोच वाले होते हैं, तो उनके बीच मतभेद तो होगा ही, मतभेद कभी औसत दर्जे के, चापलूस-पसंद नेताओं के बीच तो हो भी नहीं सकता। लेकिन आज हिन्दुस्तान के तमाम मोर्चों पर गांधी, नेहरू, और पटेल की सोच के ठीक खिलाफ काम करते हुए बात-बात पर संदर्भों से परे उनका हवाला देना, उनको स्वर्ग में आपस में लड़वाना, एक बहुत ही नाजायज हरकत है, और देश की अधिक आबादी इस झांसे में नहीं आएगी। दिल्ली चुनाव के नतीजों को खबरों से और नजरों से दूर कर देना भाजपा के लिए एक मजबूरी हो सकती है, लेकिन दिल्ली की स्कूलों के ब्लैकबोर्ड पर इतने बड़े-बड़े अक्षरों से लिखे गए जनमत को मिटा देने के लिए गांधी, नेहरू, सरदार को डस्टर की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। 

आज देश में एक तबका हफ्ते दस दिन तक बिना खाए-पिए महज नफरत पर जिंदा रह सकता है। ऐसा तबका ऐसे काल्पनिक इतिहास के ऐसे टकराव को सोशल मीडिया पर बढ़ावा देने का काम करे, वह तो समझ आता है, लेकिन जेएनयू में पढ़े हुए मोदी सरकार के विदेश मंत्री जयशंकर भी इतिहास को लेकर पसंदीदा कल्पनाएं लिखने में लग जाएं, यह बात बड़ी शर्मिंदगी की है। हो सकता है कि मीडिया में कुछ घंटे, और कुछ पन्ने ऐसी कहानियों से रंग दिए जाएं, लेकिन बीते कल के नाम पर गढ़ी गईं ये कहानियां आज की हकीकत को हाशिए पर धकेलने में कोई मदद नहीं कर पाएंगी।
-सुनील कुमार


Date : 13-Feb-2020

राजनीति से मुजरिमों को बाहर 
करने के सुप्रीम कोर्ट के 
फैसले से कोई उम्मीद नहीं

राजनीति के अपराधीकरण पर दायर की गई जनहित याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आज एक फैसला दिया है कि राजनीतिक दल जुर्म के इतिहास वाले उम्मीदवारों को चुनने के दो दिन के भीतर उनके बारे में आयोग को जानकारी दें, पार्टी की वेबसाईट पर इनके जुर्म की जानकारी डालें, और अखबारों में उस जानकारी को प्रकाशित भी करें। साथ ही यह भी आदेश जारी किया कि क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को वो टिकट क्यों दे रहे हैं, इसकी वजह बतानी होगी और जानकारी वेबसाइट पर देनी होगी।

फैसले के कुछ घंटे बाद तक प्रमुख समाचार वेबसाईटों पर जो जानकारी आई है वह जानकारी चुनाव आयोग की आज की व्यवस्था से बहुत अलग नहीं लग रही है। आज भी उम्मीदवारों को खुद ही नामांकन के समय अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे के साथ लिखकर देनी होती है, और ऐसी जानकारी विज्ञापन के रूप में अखबारों में छपवानी भी पड़ती है। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश में महज एक बात अब तक नई दिखी है कि पार्टी ऐसे लोगों को टिकट क्यों दे रही है उसकी जानकारी उसे देनी होगी। यह बात बहुत अमूर्त और अस्पष्ट है। जिस तरह सार्वजनिक जीवन में हर डकैत को संत बनने का एक मौका देने की बात रहती है, तो राजनीतिक दल कह सकते हैं कि उनका जुर्मों से जुड़ा रहा नेता अब प्रायश्चित करके समाजसेवा करना चाहता है। इस रेडीमेड जवाब में कुछ झूठ भी नहीं रहेगा, और इससे राजनीति के आपराधीकरण में कोई कमी भी नहीं आएगी। राजनीतिक दल या उम्मीदवार तिकड़मों और तरकीबों से लबालब रहते हैं, और ऐसा मसीहाई-फैसला उनकी सेहत पर, उनकी मोटी चमड़ी पर, उनकी बेशर्मी पर कोई फर्क नहीं डालने वाला है। 

सुप्रीम कोर्ट की नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन महज अच्छी नीयत से दिया गया फैसला अमल के लायक भी हो, यह जरूरी भी नहीं है। यह फैसला वैसा स्पीकिंग-आदेश नहीं है जिस पर अमल करवाना चुनाव आयोग या अफसरों के लिए मुमकिन हो। राजनीतिक दलों को वजह ईजाद करने से कौन रोक सकता है, और कम से कम यह आदेश तो बिल्कुल ही नहीं रोक सकता। आज का यह आदेश आने के पहले तक तो फिर भी लोगों को शायद यह लग रहा होगा कि चुनाव से, संसद और विधानसभाओं से, मुजरिमों को बाहर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई अच्छा दमदार फैसला देगा, लेकिन इस फैसले के आने के बाद वह उम्मीद भी खत्म हो गई है। जिस तरह चुनाव आयोग अपने आपको बिना दांत और नाखून का ढकोसला साबित करते रहता है, कुछ वैसा ही सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भी है जिसमें मौजूदा नियमों से परे बस एक बात नई है कि राजनीतिक दलों को अपने चहेते जुर्म-इतिहासी लोगों को टिकट देने की वजह बतानी होगी। अब यह वजह तर्कसंगत और न्यायसंगत है या नहीं, इसका फैसला हर मामले में एक नया केस बनाकर सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग बाद में पता नहीं किस तरह तय करेंगे। कुल मिलाकर यह फैसला हासिल आया शून्य किस्म का है जिससे रही-सही उम्मीदें और खत्म हो गई हैं। 

लेकिन हम जुर्म के इतिहास वाले लोगों को कानून बनाकर रोकने को भी बहुत व्यवहारिक और लोकतांत्रिक विकल्प नहीं मानते हैं। ऐसे में किसी भी नेता की चुनावी जिंदगी खत्म करने के लिए उसके खिलाफ दस किस्म के झूठे मामले खड़े किए जा सकते हैं, और संसद से, विधानसभाओं से भले लोगों को भी बाहर रखा जा सकता है। यह समझने की जरूरत है कि देश का कोई भी कानून, अदालत का कोई भी फैसला कागजों पर अच्छा हो सकता है, लेकिन साथ-साथ यह भी हो सकता है कि उस पर अमल मुमकिन न हो। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि अगर चुनाव आयोग के औने-पौने, जैसे भी हों, नियमों को अलग रख दिया जाए, सुप्रीम कोर्ट में न लड़ा जाए, तो भी राजनीतिक दलों से नौबत को सुधारने की उम्मीद बिल्कुल ही फिजूल होगी। भारतीय लोकतंत्र आज महज हार-हार की एक नौबत को झेल रहा है जिसमें राजनीतिक दलों की नैतिकता गटर की गहराईयों को चीरते हुए किसी ट्यूबवेल की तरह पाताल तक चली गई है, और उनसे किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग अपनी दूसरी दर्जनों खामियों और कमजोरियों, बेबसी और पक्षपात के अलावा भी इस कदर बेअसर है कि वह बिना दिमाग और ईमान के महज एक मशीन की तरह काम कर पा रहा है, उससे अधिक कुछ नहीं। भारतीय चुनावों से, संसद और लोकसभा से मुजरिमों को बाहर रखना तो अधिकतर राजनीतिक दलों की सोच में भी नहीं है क्योंकि कई पार्टियों के मंच से, माईक से बलात्कार में गिरफ्तार लोगों के स्वागत होते हैं, और बड़े-बड़े केन्द्रीय मंत्री उन्हें मालाएं पहनाते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह निराश करने वाला है, और इस फैसले के बाद जरा से भी सुधार की कोई उम्मीद नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Feb-2020

शानदार केजरीवाल,
लेकिन यह कोई
राष्ट्रीय विकल्प नहीं...

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस बार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का मुकाबला छठवें बरस के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और भाजपा के इतिहास के सबसे ताकतवर नेता अमित शाह से था। मैदान में कहीं भी कांग्रेस पार्टी नहीं थी, और न ही भाजपा थी। एक तरफ केजरीवाल और उनके मुद्दे, और दूसरी तरफ मोदी-शाह, और उनके मुद्दे। नतीजा लोगों के सामने है और सिर चढ़कर बोलता हुआ सा नतीजा है। अब यह कैसे हुआ, क्यों हुआ, जितने मुंह उतनी बातें। पर यह समझना भी जरूरी है कि शानदार स्कूल, शानदार इलाज, बेहतर सरकार, मुफ्त और रियायती बिजली-पानी को भयानक आक्रामक राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण, देश से गद्दारी की तोहमतें, नफरत, और मोदी को एक बार और जिताने के नारे मिलकर भी क्यों नहीं हरा पाए?

यह समझना आसान भी है और मुश्किल भी। केजरीवाल ने भाजपा के तमाम धारदार हथियारों का सामना करने से भी इंकार कर दिया था। वे दिल्ली में रहते हुए भी न जेएनयू के साथ थे, न जामिया के साथ थे, न शाहीन बाग के साथ थे। जब देश भर के भाजपा विरोधी दिल्ली पहुंचकर इन मुद्दों का साथ दे रहे थे, तब केजरीवाल इनसे परे बैठे हुए थे। नतीजा यह हुआ कि अरबन नक्सल, आतंकवादी, देश के गद्दार, बिरयानी परोसने वाले, जैसे कोई भी लेबल उन पर चिपक नहीं पाए। देश की सामाजिक बेचैनी से करवट बदल रहे माहौल से केजरीवाल अछूते रहे और वे दिल्ली के महज म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह काम करते रहे, ईमानदार, काबिल, मेहनतकश, और कल्पनाशील म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह। इसलिए यह एक राजनीतिक पार्टी की दूसरी राजनीतिक पार्टी पर जीत नहीं रही, यह जनकल्याणकारी सुशासन की नफरत पर जीत रही। इस जीत में आसान बात यह रही कि केन्द्र सरकार की अगुवाई में भाजपा ने नफरत के अपने निशाने एक-एक करके इतने बढ़ा लिए थे, कि वोटरों के बड़े तबके उसके खिलाफ गए। अब इस बारे में इतना अधिक लिखा जा चुका है कि जीत-हार के बाकी पहलुओं के बारे में भी सोच लिया जाना चाहिए।

केजरीवाल सरकार ने मेहनत करके जिस तरह दिल्ली की सरकारी स्कूलों को देश में सबसे अच्छा बनाया, जिस तरह उन्होंने केन्द्रीय बोर्ड के इम्तिहानों में इन स्कूलों को सबसे काबिल साबित किया, जिस तरह इस सरकार ने मुफ्त और रियायती, सस्ते बिजली-पानी का इंतजाम किया, प्रदूषण से लड़ाई लड़ी, उसे भी दिल्ली के लोगों ने देखा। इसके बाद केजरीवाल का आखिरी मास्टरस्ट्रोक था पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर। दिल्ली की आधी वोटरों में से शायद नब्बे फीसदी की जिंदगी में इससे बड़ी राहत मिली। उन महिलाओं को भी जो शाहीनबाग में धरने पर बैठी हैं, और उन महिलाओं को भी जो बजरंग बली के मंदिर जाने के लिए मेट्रो का सफर करती हैं। ऐसा लगता है कि दिल्ली मेट्रो के किनारे खड़े बजरंग बली की आसमान छूती प्रतिमा को भी मेट्रो में मुफ्त चलती महिलाओं की राहत दिखी होगी और उन्होंने केजरीवाल को आशीर्वाद दिया। 

दूसरे राजनीतिक विश्लेषकों की जरूरी कुछ बातें भी गौर करनी चाहिए। केजरीवाल ने सीधे मोदी पर हमला नहीं किया और इस तरह मोदी प्रशंसकों की नाराजगी से बचे। दिल्ली में लोगों ने केजरीवाल को शहर चलाने फिर चुना है, लेकिन आज ही लोकसभा चुनाव हो जाए तो लोग फिर मोदी को चुनेंगे। कांग्रेस ने सोच-समझकर वोटों की कोशिश नहीं की, और भाजपा को हराने का पूरा मौका अकेले केजरीवाल को दिया। ऐसी कई बातें राजनीतिक विश्लेषकों ने लिखी है जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए। यह बात तो तकरीबन सभी ने लिखी है कि दिल्ली में विकास जीत गया और नफरत हार गई?

लेकिन आगे क्या? यह समझने की जरूरत है कि दिल्ली एक सीमित राज्य है, पूर्ण राज्य नहीं। और केजरीवाल पर न जमीन का जिम्मा है, न पुलिस का जिम्मा है, न अधिकार। ऐसे में देश के जलते-सुलगते मुद्दों से परे रहकर वे सिर्फ शहरी सरकार के सफल प्रशासक रहे हैं, और यह प्रयोग, इसकी कामयाबी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली के साथ ही खत्म हो जाते हैं। केजरीवाल-प्रयोग की दिल्ली से बाहर आज कोई संभावना नहीं दिखती। जो लोग केजरीवाल की शक्ल में देश में एक वैकल्पिक राजनीति देख रहे हैं, वे लोग कांच के मछलीघर में एक मछली की सफलता का समंदर तक विस्तार देख रहे हैं। केजरीवाल अगले संसदीय चुनाव में किसी मोदी-विरोधी गठबंधन का एक हिस्सा हो सकते हैं क्योंकि दिल्ली में सात लोकसभा सीटें हैं, आसपास के कुछ राज्यों में उनके कुछ वोट है, वे देश का एक सबसे चर्चित चेहरा हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर एक वैकल्पिक राजनीति नहीं दे रहे क्योंकि वे एक पूरी सरकार नहीं चला रहे थे। यह जरूर है कि केजरीवाल ने सरकार के जरूरी मुद्दों में ईमानदारी, जनकल्याण, विकास, कल्पनाशीलता, जवाबदेही को अनिवार्य साबित किया है जिन्हें नई सरकारें अवांछित बातें मानती हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि योगी आदित्यनाथ दिल्ली से कुछ सीखकर गए होंगे। बाकी फिर...।
-सुनील कुमार


Date : 11-Feb-2020

कारों को सड़क चाहिए
तो बस-मेट्रो को सस्ता
करने के लिए टैक्स दें

देश की सबसे बड़ी पर्यावरण संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरमेंट, सीएसई, के एक कार्यक्रम में अभी एक विशेषज्ञ ने आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह पेश किया कि आने वाले बरसों में हिंदुस्तान में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल घटने वाला है और अधिक से अधिक लोग निजी गाडिय़ों से चलेंगे। अब इसके लिए शहरों में सड़कें कहां से आएंगी? लेकिन इसके पीछे की वजह अधिक फिक्र की है। देश के महानगरों में मजदूर तबके के लोगों की कमाई का पन्द्रह फीसदी तक हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर खर्च हो जाता है। दिल्ली के एक अध्ययन का नतीजा यह है कि कम दूरी पर जाने वाले बहुत से मजदूरों और दूसरे लोगों को बस-मेट्रो के मुकाबले निजी वाहन सस्ते पड़ते हैं। यह दिल्ली आज सड़कों पर थमी हुई गाडिय़ों से भरी दिखती है, कब, कहां पता नहीं कितना जाम लग जाए? 

लेकिन महंगी टिकटों के साथ भी शहरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट फायदे में नहीं चलते। तो आखिर रास्ता क्या निकले? एक रास्ता यह सुझाया गया है कि सड़कों पर कारों को जगह लगती है, इसलिए कार वालों पर टैक्स लगातार निजी गाडिय़ों को बढऩे से रोका जाए और इस टैक्स से बस-मेट्रो को शुरू किया जाए। अधिक लोग बसों से चलेंगे तो कार वालों को सड़क पर जाम कम मिलेगा। यह राय तर्कसंगत है लेकिन इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में एक हौसले की जरूरत पड़ेगी। कार वालों पर और टैक्स कैसे लगाया जाए? बस-मेट्रो को और घाटे में कैसे चलाया जाए? जहां मंत्रियों और अफसरों की समझ सालाना बजट को पार नहीं कर पाती वह शहर की पांच-दस बरस की कैसे सोच पाएगी? फिर यह भी है कि औसत राज्य सरकारों में पांच बरस के अपने कार्यकाल के बाद का कहां से सोचेंगी? शहरी विकास और पर्यावरण के दूर के फैसलों पर आज पूंजी निवेश क्यों किया जाए?

कुल मिलाकर तस्वीर भयानक है, हिंदुस्तान के सभी शहरों में बस-ट्रेन बहुत से लोगों को निजी गाडिय़ों से महंगे पड़ रहे हैं। अधिकतर शहरों में बस-मेट्रो का ढांचा अधूरा है और लोगों को आखिरी मील सफर का कोई दूसरी तरीका निकालना ही पड़ता है। ऐसे में भी लोग निजी दुपहियों, निजी चौपहियों पर निर्भर होने को मजबूर होते हैं। आज तो अधिकतर शहर बहुमंजिला पार्किंग बना-बनाकर अधिक से अधिक कारों की संभावना बढ़ाते चल रहे हैं। यह संभावना नहीं आशंका है। शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विशेषज्ञों का मानना है कि पार्किंग की फीस इतनी बढ़ानी चाहिए कि लोग निजी गाड़ी के बजाय बस-मेट्रो पर निर्भर करें। लेकिन ऐसा फैसला भी वोट-केन्द्रित सरकारों को अलोकप्रिय लगेंगे और उनका हौसला नहीं होगा। 

हिंदुस्तान जैसे देश के मौजूदा अव्यवस्थित शहरों के लिए शहरी विकास और विस्तार की नई सोच आसान नहीं है लेकिन रियायती पब्लिक ट्रांसपोर्ट किसी भी शहर के लिए दस-बीस बरस बाद के हिसाब से एक समझदारी का पूंजी निवेश होगा। अमीरों की गाडिय़ों के खाली सड़कें मिलेंगी, उनका वक्त और पेट्रोल बचेगा, और गरीबों को दूर तक जाकर भी मजदूरी, काम करने का मौका मिलेगा। इस चर्चा के बीच दिल्ली की केजरीवाल सरकार के इस फैसले को अनदेखा नहीं करना चाहिए जिसमें उसने महिलाओं के लिए सारा सफर मुफ्त कर दिया है। इससे भी निजी गाडिय़ां कम होंगी और साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, बढ़ चुकी है। बाकी प्रदेशों को भी शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट बहुत अधिक सस्ता करना ही चाहिए, सुलभ भी। 
-सुनील कुमार


Date : 10-Feb-2020

जनता पर असर रखना
जनसुरक्षा पर खतरा?!

कश्मीर में दो भूतपूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की छह महीने की हिरासत खत्म होने के कुछ घंटे पहले इन दोनों पर जनसुरक्षा कानून लगाकर उन्हें अगले छह महीने बंद रखने का इंतजाम कर दिया गया। इस बारे में सरकारी कागजात के हवाले से कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला का राज्य की जनता पर बड़ा असर है और वे अलगाववादियों द्वारा दिए गए चुनाव-बहिष्कार के फतवों के बीच भी वोटरों को मतदान केन्द्र तक लाने में कामयाब रहे। दूसरी तरफ महबूबा मुफ्ती को अलगाववादियों का समर्थक लिखा गया है। जिस कश्मीर में अपनी फौलादी पकड़ के बीच केन्द्र सरकार हालात सामान्य होने के दावे करती आ रही है, उस कश्मीर में कल की यह कार्रवाई सरकारी दावे को कमजोर या खोखला साबित करती है। उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्ला, दोनों भूतपूर्व मुख्यमंत्री, एक वक्त भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के साथ रह चुके हैं। 

दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती दोनों ही एनडीए के साथ रह चुके हैं। अभी राष्ट्रपति शासन के पहले तक भाजपा महबूबा के साथ राज्य की गठबंधन सरकार में थी। अब भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के राष्ट्रपति शासन को महबूबा की पार्टी का झंडा हरा होना भी उनके खिलाफ कार्रवाई की एक वजह बताई गई है। इस पर महबूबा की बेटी ने लिखा है कि 2014 में गठबंधन सरकार बनाते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महबूबा की तारीफ की थी। और हरा झंडा तो उस वक्त भी था। उन्होंने यह भी सवाल किया है कि एनडीए की भागीदार नीतीश कुमार की जेडीयू का झंडा भी हरा है। भारतीय फौज की पार्टी भी हरी है। 

कश्मीर प्रशासन की कार्रवाई बदनीयत भी है, अधकचरी भी है और सबसे ऊपर वह बुरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। जम्मू-कश्मीर के इस तरह टुकड़े कर दिए गए कि उसमें स्थानीय जनता की कोई राय ही नहीं ली गई, और उसके निर्वाचित नेताओं को ऐसे खोखले और मजाकिया आरोपों पर लगातार हिरासत में रखकर कश्मीर के सामान्य होने का दावा किया जा रहा है। एक निलंबित और स्थगित लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं होता। केन्द्र सरकार कश्मीर में जनप्रतिक्रिया, जनभावना को कानून की ताकत से अंतहीन दबाते चल रही है, और इसी के लिए राज्य के लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले नेताओं को अंतहीन हिरासत में रखा जा रहा है। सरकारी कार्रवाई के लिए दिए गए तर्क और उसकी भाषा लोकतंत्र की भावना को खारिज करने वाले हैं। किसी नेता की लोकप्रियता को जनसुरक्षा के लिए खतरा कहा जा सकता है? कश्मीर प्रशासन के पास केस तैयार करने के लिए पूरे छह महीने थे लेकिन उसने एक अलोकतांत्रिक और मखौल सरीखा दस्तावेज तैयार किया है। आने वाले दिन अदालत में इस पर बहस के होंगे।
-सुनील कुमार


Date : 09-Feb-2020

केजरीवाल की वापिसी के
आसार और कुछ बातें...

दिल्ली विधानसभा चुनाव के वोट गिर जाने के बाद किए गए एक्जिट पोल के नतीजे बहुत चौंका तो नहीं रहे हैं लेकिन हर किसी के लिए यह सोचने को मजबूर करने वाले जरूर हैं, अगर ये सही उतरते हैं। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सत्ता पर वापिसी के आसार या गारंटी, सभी सर्वे एजेंसियों ने बताए हैं। अगर किसी टीवी चैनल या सर्वे एजेंसी का पूर्वाग्रह उसके एक्जिट पोल पर हावी भी होगा, तो भी घोर साम्प्रदायिक और मोदीभक्त हिंदी और अंग्रेजी चैनल भी भाजपा की शिकस्त और आम आदमी पार्टी की वापिसी बता रहे हैं। ऐसे में इन एक्जिट पोल नतीजों के सामने रहते हुए क्या आज किसी और मुद्दे पर लिखा जा सकता है?

दिल्ली विधानसभा के ये चुनाव केजरीवाल सरकार के कामयाब पांच बरसों की समाप्ति पर और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बरस में हो रहे हैं। मोदी देश भर में कामयाब रहे हैं, लेकिन केजरीवाल पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी से अधिक कामयाब थे। उन्होंने दिल्ली से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था और भाजपा को हाशिए पर धकेल दिया था। इस बार केजरीवाल दिल्ली की जनता को अपनी दी गई नेमतों को लेकर सामने थे। सस्ती बिजली सस्ता पानी, बहुत अच्छे स्कूल अस्पताल, महिलाओं को मुफ्त सफर जैसी नेमतें। इसके अलावा केजरीवाल जमीन से जुड़े जनसेवक भी रहे।

दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने दिल्ली का चुनाव प्रधानमंत्री के चेहरे पर लडऩा शुरू किया, और फिर जैसे-जैसे मतदान करीब आया भाजपा केजरीवाल को अरबन नक्सली, आतंकवादी, पाकिस्तान से समर्थन प्राप्त, शाहीनबागी साबित करने में लग गई। केजरीवाल को गद्दार साबित करने के लिए भाजपा उन्हें शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को बिरयानी खिलाने वाला भी साबित करती रही। इन दोनों पार्टियों के बीच कांग्रेस के नेता संसदसे सड़क तक ऐसी प्रसंगहीन, बेतुकी, नाजायज, और अवांछित बातें करते रहे जिनसे मोदी के हाथ मजबूत होते गए और दिल्ली में धार्मिक ध्रुवीकरण शायद दिल्ली के इतिहास में सबसे अधिक हुआ।

लेकिन केजरीवाल की वापिसी महज इतने से नहीं हुई। दिल्ली देश भर से आकर पढऩे वाले छात्र-छात्राओं का महानगर भी है। इनको अमित शाह की मातहत दिल्ली पुलिस ने मवालियों के अंदाज में मारा, पीटा, पिटवाया और जेल में भी डाला। इनमें से दसियों हजार नौजवानों के परिवार भी दिल्ली के वोटर हैं। हमारा पुख्ता मानना है कि छात्रों से दुश्मनी निकालने, छात्राओं को पीटने में शाह की पुलिस ऐसी जुटी कि वह वोटर भी भाजपा से दूर भागती चली गई। एक्जिट पोल में भाजपा की सीटें बढ़ती दिख रही हैं लेकिन वे पाकिस्तान, मुस्लिम, अरबन नक्सल टुकड़े-टुकड़े गैंग, आतंकवादियों को बिरयानी जैसे आरोपों से हुए ध्रुवीकरण के कारण बढ़ी लगती हैं। एक और बात भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली देश की कारोबारी राजनीति भी है। व्यापारियों को नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक आर्थिक मंदी से लेकर निराशाजनक बजट से लेकर खराब बैंकिंग तक से घोर निराशा रही है। लोकसभा चुनाव में तो वोटरों के सामने मोदी के मुकाबले कोई विकल्प नहीं था, लेकिन विधानसभा में तो केजरीवाल बिना कुछ गलत किए महज अच्छा करने वाले विकल्प थे, इसलिए वोटरों ने मोदी-शाह को बेहतर नहीं माना।

अब एक आखिरी बात यह रह गई है कि केजरीवाल से पूछने को जी चाहता है कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? देश में जलते-सुलगते मुद्दों के प्रतीक दिल्ली में केन्द्रित हैं। जेएनयू से जामिया तक, और शाहीन बाग से सुप्रीम कोर्ट तक यह देश लोकतांत्रिक आंदोलनों पर अलोकतांत्रिक सरकारी जुल्म का इतिहास लिख रहा है। लेकिन केजरीवाल और उनकी पार्टी एक सरकारी विभाग की तरह काम कर रहे हैं जो कि किसी भी राजनीति से दूर हैं। देश की राजधानी चलाते हुए केजरीवाल एक गैरराजनीतिक अफसर की तरह काम कर रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक म्युनिसिपल चलाते अधिक लग रहे हैं। लेकिन सीमित अधिकारों वाली यह राज्य सरकार शायद केन्द्र सरकार के काबू वाली एक बड़ी म्युनिसिपल ही है।

दो दिन बाद नतीजे सामने आएंगे, तब कुछ और पहलुओं पर...।
-सुनील कुमार


Date : 08-Feb-2020

पड़ोसी देशों के लिए भारत का सही रूख

कुछ दिन पहले जब सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यह सलाह दी कि हिंदुस्तान वायरसग्रस्त चीन से अपने छात्रों और बाकी नागरिकों को निकलने के साथ-साथ पाकिस्तान के छात्रों को भी निकालने में मदद करे तो भारत में कई लोग उबल पड़े। दुश्मन करार दिए गए देश के लोगों की मदद क्यों की जाए? फिर खुद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने वायरस के खतरे के बाद भी चीन से एकजुटता दिखाने के लिए पाकिस्तानी छात्रों को वहां से वापिस लाने से इंकार कर दिया। जान के खतरे से घिरे पाकिस्तानी छात्र इस पर अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिख भी रहे हैं। 

ऐसे में भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान मायने रखता है कि भारत सरकार अपने पड़ोसी तमाम देशों के छात्रों को वायरसग्रस्त चीनी प्रांत वुहान से निकालने और भारत लाने के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों में से खासकर पाकिस्तान के साथ भारत के जैसे बुरे रिश्ते चल रहे हैं, उसके बीच भारत का यह प्रस्ताव मायने रखता है। फिर चाहे इसके पीछे उसकी मंशा पाक नागरिकों के बीच इमरान खान को लेकर छवि प्रभावित करने की भी क्यों न हो। अगर ऐसा होता है तो पाक छात्रों को निकालकर हिफाजत से हिंदुस्तान लाना और उन्हें अस्पतालों में रखना पूरी दुनिया में नोटिस किया जाएगा।

आज जाहिर तौर पर हिंदुस्तान अपने तमाम पड़ोसी देशों में चीन के तुरंत बाद का सबसे बड़ा देश है। और ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति उसकी बड़ी जवाबदेही भी बनती है। नेहरू के वक्त से हिंदुस्तान बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण सामुदायिक जवाबदेही निभाते भी आया है और भारत को असाधारण अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिलते रहा है। आज नेहरू चाहे इस देश के मौजूदा इतिहास पुनर्लेखन में अवांछित खलनायक करार दिए जा रहे हों, लेकिन सैकड़ों बरस बाद भी यह देश नेहरू की दरियादिली और महानता को भूल नहीं सकेगा।

इसलिए आज भारत सरकार का प्रस्ताव, अपनी किसी भी घोषित या अघोषित नीयत से परे, नेहरू की नीति के अनुकूल है। आज चाहे बांग्लादेश आर्थिक पैमानों पर भारत से ऊपर दिख रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि बांग्लादेश भारत की ऐसी क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकता। यह भी याद रखने की जरूरत है कि पिछली विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने किस तरह पाकिस्तान के मरीजों के भारत में इलाज में मदद की थी। जरा-जरा सी ट्वीट पर भी वे ऐसे इंतजाम करती थीं।

किसी देश में आम जनता की सद्भावना पाने का सबसे अच्छा जरिया होता है वहां के मुसीबतजदा लोगों की मदद करना। भारत का ऐसा करने का एक लंबा इतिहास रहा है। नेहरू के वक्त से पड़ोसी देशों के लोगों को स्थायी शरण दी जाती रही है और 1971 में तो इंदिरा गांधी ने शायद विश्व इतिहास की सबसे बड़ी शरण दी थी जब पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों लोगों को उन्होंने बसाया। भारत को पड़ोसियों, और बाकी लोगों की मदद का सिलसिला जारी रखना चाहिए। 

-सुनील कुमार


Date : 07-Feb-2020

दूसरों की मुसीबत देख 
अपनी तैयारी टटोल लें

चीन में फैले, और वहां से बाकी कई देशों तक पहुंचे कोरोना वायरस के खतरे को सबसे पहले सामने रखने वाले चीनी डॉक्टर को पुलिस ने धमकी देकर चुप कराया था। लेकिन उसी की बात कुछ हफ्तों के भीतर सही निकली, और इस बीमारी का इलाज करते-करते वह डॉक्टर भी कल मर गया। अब तक की चीनी खबरों के मुताबिक सैकड़ों लोग इस वायरस से मारे जा चुके हैं, लेकिन चीन में खबरों में सरकार की जैसी फौलादी पकड़ रहती है, उससे लगता है कि यह गिनती कितनी भी हो सकती है। न भी हो तो भी चीन की अर्थव्यवस्था को इससे एक बड़ा झटका लगा है, और दुनिया के कई दूसरे देशों में जहां पर चीन से आए हुए पुर्जों और दूसरे सामानों से उद्योग-व्यापार चलते हैं, उन सबको भी एक झटका लगा है जो कि अभी तक तो थमा भी नहीं है। अभी कोई आसार नहीं दिख रहे कि चीन और बाकी देशों में इस वायरस का कहर कब तक थमेगा, कब तक सरकारों पर अचानक आया हुआ एक बड़ा आर्थिक बोझ हटेगा, और कब कारोबार पटरी पर लौटेगा। यह सब कुछ अभी बहुत अनिश्चित है, और यह अनिश्चितता बाकी दुनिया को ऐसे किसी बड़े खतरे की तरफ से आगाह करने वाली होनी चाहिए। 

हिन्दुस्तान आज ऐसी बुरी मंदी का शिकार है कि विश्व बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री का यह कहना है कि आज की वैश्विक मंदी के पीछे हिन्दुस्तान की मंदी एक बड़ा कारण है। यह बात हिन्दुस्तान के महत्व को बताने वाली तो है, लेकिन किसी खुशी की बात नहीं है। ऐसी मंदी के बीच चीन से कारोबार बहुत बुरी तरह खराब हुआ है क्योंकि लोगों की आवाजाही ही रूक गई है। हिन्दुस्तान से परे भी दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां पर चीन से कारोबार न हो, और शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिससे हिन्दुस्तान का कारोबार न हो। इसलिए कोरोना वायरस का जितना असर इंसानी सेहत पर पड़ा है, उससे अधिक असर कारोबार की सेहत पर भी पड़ा है, और इन दोनों वजहों से दुनिया भर में एक बड़ा आर्थिक बोझ भी पड़ा है। अब बाकी देशों को भी, और हिन्दुस्तान को भी यह सोचना चाहिए कि इस किस्म की प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा के आने पर उसके खतरे, और उससे नुकसान, क्या इसके लिए देश तैयार है? 

लोगों को याद होगा कि 25 बरस पहले भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से गैस रिसी थी, हजारों लोग आनन-फानन मारे गए थे, और लाखों लोगों के बदन का इतना नुकसान हुआ था कि न सिर्फ वे अपनी पूरी जिंदगी इस जहर का शिकार रहे, बल्कि उस वक्त कोख में पल रहे बच्चों की जिंदगी भी बर्बाद हो गई। चौथाई सदी गुजर गई लेकिन दुनिया के इस सबसे बड़े औद्योगिक हादसे से भोपाल की जिंदगी अब तक उबर नहीं पाई, और उसका नुकसान कई पीढिय़ों तक जारी रहेगा। अब यह वायरस एक और चेतावनी है कि चीन जैसा विकसित देश भी इस वायरस से बचाव के लिए जरूरत के लायक मास्क नहीं बना पाया, और लोग तरह-तरह की चीजों से मुंह ढंककर काम कर रहे हैं। भारत जैसा देश तो किसी भी बड़ी त्रासदी या आपदा के लिए तैयार नहीं रहता, और यहां पर ऐसा कुछ हो जाए, तो गरीबी के बीच, अभाव और बेबसी के बीच यहां के लोग किस तरह मुसीबत से जूझ पाएंगे? चीन को लेकर तो आज अनगिनत तस्वीरें और वीडियो चारों तरफ फैल रहे हैं कि वहां की सरकार ने किस तरह दो-चार दिनों में ही बहुत बड़ा अस्पताल खड़ा कर लिया, लेकिन हिन्दुस्तान में तो राज्य सरकारों के अस्पतालों में जान बचाने वाली मशीनों में से तीन चौथाई से अधिक खराब रहती हैं, और उनकी खरीदी में भयानक भ्रष्टाचार के चलते नकली मशीनें खरीद ली जाती हैं, खराब दवाएं खरीदी जाती हैं। 

हिन्दुस्तान जैसे देश, और इसके प्रदेश को किसी भी मुसीबत से बचने के लिए पैसों की भी जरूरत होगी, तैयारियों की भी जरूरत होगी, सरकार में तेजी से काम करने की क्षमता भी लगेगी, और जनता के बीच जागरूकता का एक बेहतर हाल भी लगेगा। आज पूरी तरह से गंदा, लापरवाह, असंगठित, अनियोजित यह देश रोज की जिंदगी से भी जूझने के लायक नहीं है, किसी अकल्पनीय मुसीबत से जूझने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन आग लगने के पहले ही बुझाने की मशीनें लाकर रखनी होती हैं, आज कम से कम हिन्दुस्तानी प्रदेश की सरकारें अपने अस्पतालों का हाल तो टटोल लें। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Feb-2020

...तो फिर वह महज ऐसे 
ही लोकतंत्र की हकदार है

हिन्दुस्तान इन दिनों कई किस्म के भाषणों से गुजर रहा है। संसद का शायद ही कोई ऐसा सत्र होता हो जिसमें लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी पूरी तरह से अवांछित और नाजायज बात न बोलते हों। कई बार तो पार्टी ने उनके बयान से अपने को अलग किया, कई बार उन्हें खुद अफसोस जताना पड़ा, लेकिन फिर भी वे अगले संसद सत्र का इंतजार करते हैं, और इसी दर्जे की कोई बात बोलने का भी। नतीजा यह होता है कि विपक्ष को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने के जितने मजबूत मुद्दे रहते हैं, वे अधीर रंजन चौधरी के पाकिस्तान, या मुस्लिम, या कश्मीर के बारे में कही गई बातों, या उनके विशेषणों और उनकी पौराणिक उपमाओंतले कुचलकर दम तोड़ देते हैं। यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। यह एक किस्म का भाषण हुआ। दूसरी तरफ संसद के बाहर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से लेकर केरल के भाजपा सांसद अनंत हेगड़े तक गांधी की स्मृति पर थूकने सरीखे बयान देने वाले बहुत सारे लोग हैं। इसके बाद नागरिकता को लेकर चल रहे आंदोलन पर लोगों को गद्दार कहने वाले, पाकिस्तानी कहने वाले नेताओं की भरमार है, और वे इतनी बड़ी तादाद में हिन्दुस्तानियों को पाकिस्तान भेजना चाहते हैं कि दिल्ली का पाकिस्तानी दूतावास उतनी वीजा अर्जियों पर फैसले भी नहीं ले पाएगा। फिर कुछ लोग गद्दारों को गोली मारना चाहते हैं, कुछ लोग शाहीन बाग की महिला आंदोलनकारियों को आत्मघाती-दस्ता बता रहे हैं। लेकिन ऐसी तमाम बयानबाजी के बीच हर कुछ हफ्तों में कांग्रेस के घोषित-अघोषित मुखिया राहुल गांधी भी कोई न कोई ऐसी बात कह बैठते हैं जिससे देश में असल मुद्दों पर बहस धरी रह जाती है, और लोग संसद के भीतर-बाहर इस पर उलझ पड़ते हैं कि क्या लोग सचमुच ही राहुल के कहे मुताबिक मोदी को लाठियां मारेंगे? 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आज यह समझना मुश्किल हो रहा है कि लोग अनर्गल कही जाने वाली बातें कर क्यों रहे हैं? महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने चाहे-अनचाहे एक साथ बैठने वाले कांग्रेस, एनसीपी, और शिवसेना के नेता बिना किसी वजह के कभी सावरकर का मुद्दा छेड़कर एक-दूसरे का जीना हराम करने लगते हैं, तो कभी इंदिरा गांधी के तस्करों से मेलजोल को बहस का मुद्दा बना रहे हैं। यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि भाजपा के इस सबसे पुराने एक सहयोगी दल शिवसेना को उससे अलग करके जब उसकी अगुवाई में यह सरकार बनानी ही थी, तो इसके बनते ही इस तरह की बातें क्यों छेडऩी चाहिए जिससे कि विवाद खड़ा होना तय हो। यह काम महाराष्ट्र में भाजपा करती तब तो ठीक था क्योंकि विपक्ष में बैठे हुए उसके पास सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार खड़ी करने की जिम्मेदारी है, और इसकी संभावना भी है। लेकिन गठबंधन की तीनों पार्टियां एक-दूसरे के साथ बंद कमरे में बात करना सीख नहीं पा रही हैं, और कहीं दिल्ली से किसी बखेड़े का बयान शुरू होता है, तो कहीं मुम्बई से। 

मीडिया का तकरीबन पूरा हिस्सा गैरजरूरी मुद्दों में उलझकर रह गया है, और सबसे अधिक हिंसक, सबसे अधिक अलोकतांत्रिक, और सबसे अधिक अश्लील बातों को सबसे अधिक जगह भी मिल रही है। कोई हैरानी नहीं है कि लोगों ने टीवी पर खबरें देखना कम कर दिया है जो कि मोटेतौर पर इसी किस्म के बयानों पर जिंदा समाचार-माध्यम है। अब जब लोगों को कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान मिलता है कि देशभक्ति का नशा मोदी जितना भी नहीं होना चाहिए कि वे इस चक्कर में शादी ही न करें, तो बिना बात के बहुत सारे बयान वायरस की तरह पैदा होने लगते हैं, और आगे बढऩे लगते हैं। यह सिलसिला थका देने वाला है। मीडिया का गैरजिम्मेदार हिस्सा इसी पर जिंदा है, और इसी से अपना पेट भर रहा है। जिन नेताओं को कहने के लिए कोई गंभीर बात नहीं होती, जिनके पास कोई तर्क नहीं होता, वे इसी किस्म की बातों से खबरों में बने हुए हैं, और बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि सत्ता के सामने जब बहुत से असुविधाजनक सवाल खड़े हो जाते हैं, तो वह सोच-समझकर ऐसे बखेड़े खड़े करवा देती है जिनमें दो-तीन दिन देश उलझकर रह जाता है, और असुविधा टल जाती है। अब देश की जनता अगर ऐसी बकवास को ही खबर मानकर चलती रहेगी, तो फिर वह महज ऐसे ही लोकतंत्र की हकदार है। 
-सुनील कुमार