संपादकीय

Date : 13-Jun-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछली भाजपा सरकार के वक्त शहर के सबसे व्यस्त इलाके में बनाए गए एक बहुत महंगे पैदलपुल को लेकर नई कांगे्रस सरकार बड़े असमंजस में है कि उसका क्या किया जाए? करीब 50 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, बरसों तक शहर का एक बड़ा हिस्सा सड़क के बीच निर्माण की दिक्कत झेल चुका है, और इस पर अभी शायद 25 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी भी है। कांगे्रस पार्टी विपक्ष में रहते हुए लगातार इस स्काईवॉक का विरोध करते आई है, और अब भी पार्टी से लेकर मुख्यमंत्री तक का रुख इसे तोडऩे का है। सवाल यह उठता है कि इसे तोडऩे का मतलब पूरे का पूरा नुकसान है, और आगे पूरा करने का मतलब एक और बड़ा खर्च है, जिसके बाद भी यह अंदाज नहीं है कि वह किसी काम का रहेगा या नहीं। शहर के बड़े अस्पतालों, कोर्ट-कचहरी, कलेक्ट्रेट-सभागृह, जेल और सार्वजनिक पार्किंग जैसी जगहों को जोडऩे वाला यह पैदलपुल शुरू से कुछ विवादों में घिरा रहा कि इसका फैसला बिना विशेषज्ञ राय के लिया गया और इसकी योजना बहुत सोच-समझकर नहीं बनाई गई।

अब जितने मुंह, उतनी बातें। बहुत से लोगों को लग रहा है कि इसे तोड़ देना चाहिए, क्योंकि इसकी वजह से शहर के इस हिस्से की सड़कों के ऊपर गाडिय़ों के लिए फ्लाईओवर बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इसे एक बाजार बना देना चाहिए। लोगों की तकनीकी जानकारी कम रहती है, इसलिए एक सुझाव ऐसा भी आया है कि इसी स्काईवॉक पर बाद में मेट्रो ट्रेन भी चलाई जा सकती है। सरकारी विभाग और सत्तारूढ़ पार्टी सड़क पर लोगों से राय जान रहे हंै, और इनका पहले से घोषित रुख देखकर जाहिर है कि लोग उनकी मर्जी की ही राय अधिक दे रहे हैं।

खैर इस पैदलपुल का चाहे जो हो, इससे शहर को और प्रदेश को एक सबक तो लेना चाहिए कि बिना तकनीकी विशेषज्ञों की राय के सिर्फ सत्तारूढ़ नेताओं की व्यक्तिगत पसंद से जो बड़ी योजनाएं बनती हैं, वे बड़ी बर्बादी की वजह भी बनती हैं। इसी स्काईवॉक को लें तो इसे बनाने के पहले न तो म्युनिसिपल से इसकी इजाजत ली गई, और न ही टाऊनप्लानिंग से। नतीजा यह हुआ कि शहर में छोटे से छोटे निर्माण के लिए जिन विभागों से इजाजत लेनी होती है, उनसे कई किलोमीटर में फैले ऐसे फौलादी एनाकोंडा के लिए भी इजाजत नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि सरकार के जिन जानकार विभागों को इस पर कुछ कहना था, उनके होंठ सिले हुए थे, और जिस विभाग को यह बड़ा ठेका देना था, वह विभाग बड़े उत्साह में था।

आज छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी में सरकारी जमीन पर दूसरी ऐसी कई बड़ी योजनाएं हैं जिनको बनाने के लिए म्युनिसिपल और विकास प्राधिकरण के बीच गलाकाट मुकाबला चल रहा है क्योंकि सैकड़ों करोड़ की योजनाओं से जुड़ा घोषित और अघोषित मुनाफा सबको मालूम है। शहर के सबसे घने एक इलाके में भैंसथान में एक कारोबारी इमारत, और पुरानी मंडी की जगह पर एक और कारोबारी केंद्र बनाने की बड़ी-बड़ी योजनाएं तैयार हैं, और इन दोनों के इर्दगिर्द चारों तरफ आज भी इनकी भीड़ के बिना भी सड़कें पूरी तरह, पूरे वक्त जाम रहती हैं। इसके बावजूद बरसों से स्थानीय नेता और अफसर पागलों की तरह इन योजनाओं के पीछे लगे हैं, और वे इसे शहर का विकास मान रहे हैं। इस शहर की बदनसीबी यह है कि यहां के निर्वाचित और मनोनीत नेता बरसों से इसे एक दुधारू गाय की तरह इस हद तक दुह रहे हैं कि दूध तो कब का निकला चुका है, अब गाय के थन से लहू निकल रहा है।

राज्य की कांगे्रस सरकार को शहरी विकास योजनाओं को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि शहर के बीच की खुली जगह एक बार खत्म हुई, तो मानो शहर के फेंफड़े का एक हिस्सा निकालकर फेंक दिया गया जो कि कभी वापिस नहीं लौटेगा। हमारे हिसाब से इस शहर को लेकर राज्य सरकार को एक लाईन का यह फैसला लेना चाहिए कि म्युनिसिपल सीमा के भीतर एक इंच का भी सरकारी निर्माण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक सुविधा के लिए वह जरूरी न हो। और अस्पताल या शौचालय किस्म के ऐसे निर्माणों के लिए भी सरकार को यह कड़ा फैसला लेना चाहिए कि पहले सरकार उतना हिस्सा किसी पुरानी इमारत को तोड़कर खाली करेगी, तभी वह किसी दूसरी जगह उतना निर्माण करेगी। जिस तरह पेड़ों की कटाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह नीति बनाई है कि मुआवजा-वृक्षारोपण किया जाए, और उसी शर्त पर जरूरी होने पर पेड़ काटे जाएं, इसी तरह राज्य सरकार को चाहिए कि घुटते दम वाले इस शहर में पहले कोई जर्जर सरकारी इमारत हटाए, और उसके बाद ही उतना ही निर्माण एम्बुलेंस, दमकल, या शौचालय जैसे इस्तेमाल के लिए करे। अपने खुद के दफ्तर या स्थानीय संस्थाओं की कारोबारी नीयत के लिए किसी भी किस्म का निर्माण अगर पूरी तरह बंद नहीं कर दिया गया, तो सरकार में बैठे लोग तो आज रिश्वत पा जाएंगे, लेकिन शहर हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा। इस शहर में बसे हुए इंजीनियरों, और आर्किटेक्ट में से कुछ जागरूक लोगों को आगे आकर सरकार की गलत और खराब योजनाओं का खुलकर विरोध करना चाहिए, तभी जाकर यह शहर, या कोई भी और शहर बचेगा।
-सुनील कुमार


Date : 12-Jun-2019

केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तेजी से काम करने के लिए मशहूर हैं। महाराष्ट्र में मंत्री-मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने ऐसा कर दिखाया था और उस वक्त, उसके बाद, भाजपा के कुछ राज्यों में उन्हें निर्माण विभागों के मार्गदर्शन के लिए भी बुलाया जाता रहा है। अभी उनका एक शानदार बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि सरकार देश के बेरोजगार नौजवानों को काम देने के लिए देश भर के एक लाख किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ दो सौ करोड़ पेड़ लगाने जा रही है। उन्होंने कहा कि वे अफसरों से इसकी योजना बनाकर लेकर आने के लिए कह चुके हैं, इससे एक तरफ तो लाखों को रोजगार मिलेगा, और दूसरी तरफ पर्यावरण भी बचेगा। 

नितिन गडकरी ने दिल्ली में अभी इस बारे में कहा कि ऐसी ही एक योजना मनरेगा के तहत ग्रामीण और जिला सड़कों, और प्रादेशिक मार्गों के किनारे लागू की जा सकती है जिसमें हर बरस तीस लाख लोगों को रोजगार देने की क्षमता रहेगी। गडकरी ने कहा कि इसके लिए ग्राम पंचायतों को भी भरोसे में लिया जाएगा, और हर बेरोजगार नौजवान को पचास पेड़ों का जिम्मा दिया जाएगा जिनकी उपज से उनकी जिंदगी भी चलेगी। उन्होंने नदियों पर किए गए एक कार्यक्रम में बोलते हुए इस बात पर जोर दिया कि आज बारिश का जो साठ फीसदी पानी समंदर में चले जाता है, उसका एक चौथाई भी अगर भूजल री-चार्ज किया जा सके, तो उससे जल संकट दूर होगा, और लोगों को सिंचाई के अलावा घरेलू काम के लिए भी पानी दिया जा सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार बायोईंधन को बढ़ावा देकर पेट्रोल, डीजल, और गैस का आयात घटाने जा रही है जिससे छह लाख करोड़ रूपए सालाना बचेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनका विभाग दूसरे विभागों के साथ तालमेल करके गंगा-यमुना की सफाई की योजना बना रहा है। 

इस पूरे समाचार को पढ़कर जब इसे छापने की तैयारी की जा रही थी, तब एक छोटे से तथ्य पर जानकारी गई कि यह जून 2014 में छपा हुआ है, और न कि जून 2019 में। 

इस बयान को आज पूरे पांच बरस हो चुके हैं, और राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे कहीं पेड़ लगे हों ऐसा तो देखने में नहीं आया है। रोजगार गिरकर पिछले 45 बरसों में बेरोजगारी को सबसे ऊपर ले गए हैं। बेरोजगार नौजवानों को 50-50 पेड़ नहीं मिल पाए हैं, ठीक उनके खातों में 15-15 लाख रूपए की तरह। और गंगा-यमुना की सफाई पिछले पांच बरस में और घट चुकी है, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठन ताजा बदहाली पर फिक्र ही जाहिर कर रहे हैं। अभी तक कम से कम छत्तीसगढ़ में तो राज्य सरकार के स्तर पर ऐसी कोई भी चर्चा पिछले पांच बरस में सामने नहीं आई कि राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के किनारे मनरेगा से वृक्षारोपण करके उन्हें बेरोजगारों को सौंपा जाएगा, और 2014 से लेकर अब तक चार बरस तक इस राज्य में भाजपा की ही सरकार थी। 

जैसा कि हमने शुरू में ही लिखा है कि नितिन गडकरी तेजी से काम करने वाले मंत्री माने जाते हैं, और उनके कई ऐसे वीडियो तैरते रहते हैं जिनमें वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी योजनाओं और घोषणाओं पर सौ फीसदी अमल की बात कहते दिखते हैं। ऐसे में यह बात कुछ हैरान भी करती है कि एक लाख किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ वृक्षारोपण क्यों शुरू भी नहीं हो पाया, और यह बात तो जाहिर है ही कि ऐसा नहीं हो पाया इसलिए पर्यावरण को सम्हालने पर भी कोई काम नहीं हो पाया। पिछले लोकसभा चुनाव के समय लोग इस बात को उठा भी रहे थे कि भाजपा या एनडीए के पिछले पांच बरसों के वायदों पर भी कुछ सवाल-जवाब हो जाएं कि उनका क्या हुआ है, लेकिन ये बातें हिन्दुस्तानी बॉम्बर विमानों की गडग़ड़ाहट में दबकर रह गई थीं, यह तो भला हो अंग्रेजी अखबार द हिन्दू की इस पुरानी कतरन का जिसने ठीक पांच बरस पहले आज ही के दिन गडकरी की कही इन बातों को याद दिला दिया। गडकरी की इतनी शानदार घोषणा के साथ बस यही एक दिक्कत है कि वह पांच बरस पहले की है। 
-सुनील कुमार

 


Date : 11-Jun-2019

उत्तरप्रदेश में एक पत्रकार की ट्वीट को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अपमानजनक करार देते हुए यूपी की पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था, और आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्य को फटकार लगाते हुए उसे तुरंत रिहा करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस ट्वीट को पसंद नहीं किया है, लेकिन इस पर कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि उसे गिरफ्तार क्यों किया गया? किन धाराओं के तहत गिरफ्तारी हुई? अदालत ने पूछा कि इसमें शरारत क्या है? उल्लेखनीय है कि योगी के दफ्तर के बाहर एक महिला ने टीवी कैमरों के सामने खुलकर यह कहा था कि पिछले एक बरस से योगी से उनकी फोन पर बात हो रही है, जिसमें पे्रम की बात भी शामिल है, और अब वह योगी के साथ रहना चाहती है। इसके वीडियो को दिखाने वाले टीवी चैनल के पत्रकारों को भी यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, और इसे ट्विटर पर पोस्ट करने वाले प्रशांत कनौजिया नाम के इस पत्रकार को भी। इस पत्रकार की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, और उस पर दो जजों की बेंच ने यह आदेश दिया है।

लोगों को याद होगा कि इसके पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की एक गढ़ी गई मजाकिया तस्वीर को पोस्ट करने पर बंगाल की एक भाजपा नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, और उस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत उसकी रिहाई का आदेश दिया था। और भी कुछ राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया की वजह से पत्रकार भी अपने पेशेवर माध्यम से बाहर आकर भी लिखते हैं, पोस्ट करते हैं। दूसरी तरफ बहुत से स्वतंत्र पत्रकार भी सिर्फ सोशल मीडिया पर, या किसी वेबसाईट पर लिखते हैं। इन दोनों तबकों से परे अनगिनत लोग जो कि गैरपत्रकार हैं वे भी पत्रकारों से बेहतर भी लिखते हंै, और सोशल मीडिया पर अधिक मशहूर भी रहते हैं। कुल मिलाकर इंटरनेट और कम्प्यूटर ने मिलकर सोचने-समझने वाले भले और बुरे सभी किस्म के लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक नई ऊंचाई दे दी है, और इसके चलते सत्ता पर बैठे लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं रह गया है कि वे एक-दो दर्जन मीडिया घरानों को प्रभावित करके तमाम आलोचनाओं से बच जाएं। ऐसे में सोशल मीडिया पर सक्रिय बहुत से गैरपत्रकारों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है, और एक खबर के मुताबिक पिछले दो-चार दिनों में ही उत्तरप्रदेश में ऐसी कई गिरफ्तारियां हुई हैं।

दरअसल सत्ता का एक साईड इफेक्ट यह होता है कि उसका बर्दाश्त खत्म हो जाता है। ऐसे में अनगिनत लोगों को दबाव में लाने के लिए भी सत्ता के लोग कानूनों का इस्तेमाल करके ऐसे खोखले केस गढ़वाते हैं जो कि अदालत में जरा भी न टिकने वाले रहते हैं, लेकिन उनका मकसद अदालत में कुछ साबित करना नहीं रहता है, एक कानूनी-आतंक कायम करना रहता है। सुप्रीम कोर्ट का यह रूख देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वालों के लिए हौसला लेकर आया है, और यह राज्य सरकारों या केंद्र सरकार के लिए एक चेतावनी भी लेकर आया है कि थानों के बेदिमाग और बददिमाग डंडों को चलाकर वे अपनी आलोचना के खिलाफ एक आतंक पैदा नहीं कर सकते। सभी राज्य सरकारों को इसे एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए। खुद राहुल गांधी ने इस पर जो कहा है उसे भी देखना चाहिए- 'अगर मेरे खिलाफ झूठी या मनगढ़ंत रिपोर्ट लिखने वाले या आरएसएस/बीजेपी प्रायोजित प्रोपैगंडा चलाने वाले पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाए तो अधिकतर अखबार/न्यूज चैनलों को स्टाफ की गंभीर कमी का सामना करना पड़ सकता है। यूपी के सीएम का व्यवहार मूर्खतापूर्वक हैं और गिरफ्तार पत्रकारों को रिहा करने की जरूरत है।'

-सुनील कुमार


Date : 10-Jun-2019

अपने आसपास पिछले दो दिनों में दो बच्चों की आत्महत्याएं देखने मिलीं। एक गरीब मां-बाप की बेटी मोपेड पाने के लिए जिद कर रही थी, और पिता कोई इंतजाम नहीं कर पाया, तो उसने खुदकुशी कर ली। एक दूसरे परिवार में दुपहिया था, और कम उम्र लड़का उसे लेकर जाना चाहता था, मां-बाप ने उसे दुपहिया ले जाने की इजाजत नहीं दी, और उसने आत्महत्या कर ली। इन दोनों खबरों को देखकर दिल दहलता है कि बच्चों का क्या किया जाए? जो मां-बाप अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई में जबर्दस्ती धकेलना चाहते हैं, और उसके दाखिले के इम्तिहान की तैयारी के लिए बच्चों को राजस्थान के कोटा जैसे कोचिंग-कारखाने में झोंक देते हैं, और वे बच्चे वहां आत्महत्या कर लेते हैं, उसमें तो मां-बाप की जिम्मेदारी समझ आती है। लेकिन आए दिन कहीं न कहीं से खबर आती है कि मां-बाप ने अधिक वक्त फोन पर गुजारने से मना किया, तो किसी बच्चे ने आत्महत्या कर ली, कहीं पसंद का मोबाइल खरीदकर मां-बाप नहीं दे पाए तो बच्चों ने आत्महत्या कर ली। 

समाज में आत्महत्या की खबरें जब आसपास बहुत अधिक तैरती हैं, तो बच्चों को वह एक विकल्प की तरह दिखने लगता है। इसलिए मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता अखबारों को भी यह सुझाते हैं कि आत्महत्या की खबरों को इतना अधिक या इतना बड़ा न छापा जाए कि वे दूसरे लोगों को अपनी समस्या का एक समाधान लगने लगें। लेकिन मीडिया के साथ अपनी दिक्कत है, खुद उसके लोग इतने सीखे हुए नहीं हैं कि वे खबरों के साथ ऐसा न्याय कर सकें, और समाज का इतना ख्याल रख सकें, इसलिए आत्महत्या की खबरें खासे खुलासे के साथ छपती हैं, बहुत से मामलों में तस्वीरों के साथ भी। लेकिन आत्महत्या की अधिक खबरें छात्रों से परे भी प्रेमी-जोड़ों की आती हैं, और उनके बारे में भी इस देश को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

बहुत सी आत्महत्याएं तो ऐसी रहती हैं जिनमें परिवार के लोगों ने प्रेमी-जोड़े को शादी की इजाजत नहीं दी, और दोनों ने एक साथ जहर खाकर, एक साथ पटरी पर कटकर, या पेड़ से एक साथ टंगकर खुदकुशी कर ली। ये आत्महत्याएं पूरी तरह रोकने लायक हैं क्योंकि समाज और परिवार को अपने पुराने दकियानूसी नजरिए को बदलने की जरूरत है, बालिग नौजवानों को मर्जी से प्रेम-संबंध की इजाजत देने की जरूरत है, और ये खत्म हो जाएंगी। ये आत्महत्याएं रोकने लायक हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान के बहुत से समाज आज अपने परिवार की लड़की को मर्जी से प्रेम करते देखकर उसका कत्ल करके फख्र महसूस करते हैं, ऐसे परिवार किस तरह प्रेम या शादी की इजाजत देंगे? और ऐसे में जाहिर है कि हिन्दुस्तान में अगले कई दशक तक ये आत्महत्याएं बंद होने वाली नहीं हैं।

लेकिन बच्चों से लेकर बड़ों तक, और नौजवान प्रेमियों के बूढ़े मां-बाप तक, इन सभी को सामाजिक परामर्श की जरूरत है। देश में इतने मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता हैं नहीं कि पूरी आबादी की सोच सुधार सकें, इसलिए समाज के भीतर के दूसरे लोगों को ही आगे आकर सार्वजनिक मंचों से लोगों की सोच को बदलना होगा। दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान में धर्म और जाति के संगठन किसी भी सोच के संगठनों के मुकाबले हजार गुना अधिक मजबूत हैं, और धर्म-जाति की एकता उदारता पर नहीं टिकी रहती, कट्टरता पर टिकी रहती है। कट्टरता ही किसी धर्म या जाति के भीतर लोगों को बांधकर रखती है। इसलिए धर्म और जाति के मुखिया कट्टरता को कायम रखने और बढ़ाते चलने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में इन संगठनों से परे के लोगों को ही प्रेम और विवाह को लेकर समाज की सोच बदलनी होगी।

दूसरी तरफ बच्चे अधिक संगठित रूप से स्कूल और कॉलेज आते-जाते हैं, वहां पर शिक्षकों के लिए यह आसान रहता है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करे, और उन्हें किफायत से जीना भी सिखाएं। इसके लिए हो सकता है कि स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों को पेशेवर परामर्शदाता की तरह कुछ प्रशिक्षण देना भी जरूरी हो, लेकिन वह संस्थागत ढांचे में अधिक आसानी से हो सकता है, और किया जाना चाहिए। आज जब समाज में असमानता बढ़ते जा रही है, महंगे सामानों का छोटे-छोटे बच्चों में भी इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है तो बच्चों की हसरतें मां-बाप की क्षमता के बाहर जाकर सिर चढ़कर बोलना स्वाभाविक है, और उन पर काबू सिखाने की उतनी ही अधिक जरूरत भी है। 

आत्महत्याओं में एक और पहलू लिखने का रह गया है जो कि शादीशुदा जोड़ों में से किसी एक या दोनों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेत्तर संबंधों का है। इस तरह के संबंध बड़ी संख्या में हत्या और आत्महत्या की वजह बन रहे हैं। इसके लिए भी सामाजिक स्तर पर समझ विकसित करने की जरूरत है, और साथ-साथ शादीशुदा जोड़ों के बीच संबंध ठीक रखने के लिए पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। आत्महत्या का यह आखिरी पहलू बहुत सी हत्याएं लेकर भी आता है, और इसलिए यह सबसे अधिक नुकसानदेह और खतरनाक है। इन सब बातों पर इस जगह पर लिखने की एक सीमा है, लेकिन समाज के जागरूक लोगों को इन मुद्दों पर अपने-अपने संगठनों, अपनी-अपनी संस्थाओं के मंच पर चर्चा करवानी चाहिए, और धीरे-धीरे ही समाज की सोच बदली जा सकती है, लोगों की सोच बदली जा सकती है, रातों-रात नहीं।
-सुनील कुमार


Date : 09-Jun-2019

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि सरकारी अस्पतालों का मैनेजमेंट सम्हालने के लिए अलग से मैनेजर या सीपीओ रखे जाएंगे। अभी सभी किस्म के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों का गैरमेडिकल मैनेजमेंट भी डॉक्टर ही देखते हैं, और उनकी डॉक्टरी धरी रह जाती है। इतना ही नहीं बहुत से दूसरे दफ्तरों में भी फाईलों का काम निपटाने के लिए डॉक्टरों को जिम्मा दिया जाता है जिसमें उनका मेडिकल हुनर किसी काम का नहीं रहता। इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं, और अस्पतालों के साथ-साथ सरकारी कॉलेजों का यही हाल है जिनमें वरिष्ठ प्राध्यापक को प्राचार्य बनाने की परंपरा है, और कॉलेज का गैरशिक्षकीय मैनेजमेंट उन्हें देखना पड़ता है। पुलिस के छोटे-बड़े कई किस्म के कर्मचारियों-अधिकारियों को भी गैरपुलिसिया काम में लगाया जाता है, और यह सिलसिला तुरंत खत्म भी होना चाहिए। 

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल, राजधानी रायपुर के मेकाहारा में हर दिन हजारों मरीज पहुंचते हैं, और यह प्रदेश का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल भी है। कैंसर के बड़े नामी-गिरामी वरिष्ठ चिकित्सक इस अस्पताल के अधीक्षक भी हैं, और उनके सिर पर लिफ्ट बनवाने से लेकर एसी सुधरवाने तक, धोबी और गार्ड का ठेका देने से लेकर दवा खरीदने तक, रंग-पेंट करवाने से लेकर पार्किंग के झगड़े निपटाने तक सौ किस्म के काम रहते हैं। हर महीने दसियों करोड़ रूपए के खर्च और बजट वाला यह अस्पताल चलाना प्रदेश के सबसे बड़े कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर पर एक अतिरिक्त बोझ है। जहां कैंसर मरीजों के लिए डॉक्टर ही काफी नहीं हैं, और मरीजों को लंबी कतार में लगकर इलाज और मौत दोनों का साथ-साथ इंतजार करना पड़ता है, वहां पर उनका विशेषज्ञ डॉक्टर एक ऐसे मैनेजमेंट में लगे रहता है जो कि कोई दूसरा प्रशासकीय अफसर बेहतर तरीके से कर सकता है, और किसी एक अफसर के लिए वह एक फुलटाईम काम से भी अधिक काम रहेगा। 

प्रदेश के तमाम बड़े अस्पतालों और जिला अस्पतालों के लिए अलग से एक प्रशासनिक ढांचा रहना चाहिए। आज सरकारी चिकित्सा सेवा में गांव-गांव तक डॉक्टरों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और जगह-जगह डॉक्टर गैरडॉक्टरी केकाम में लगे हैं। उसी तरह बड़े सरकारी कॉलेजों के लिए प्राध्यापकों से परे का एक मैनेजमेंट होना चाहिए। अगर कोई प्राध्यापक शिक्षा-मैनेजमेंट में जाना चाहते हैं, तो उन्हें आईआईएम जैसे किसी संस्थान से साल-छह महीने का कोई कोर्स करवाना चाहिए, और उसके बाद फिर उन्हें शिक्षा से अलग करके सिर्फ मैनेजमेंट में डालना चाहिए। छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने के बाद हालत यह थी कि सरकारी कॉलेजों में जिन विषयों को पढ़ाने वाले बहुत सीमित थे, उनको भी उठाकर मंत्रालय या शिक्षा संचालनालय में रख दिया गया था। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। 

आज कोई मुख्यमंत्री के बंगले पर पहुंचे, तो वहां रजिस्टर में मुलाकातियों का नाम लिखने का काम भी वर्दीधारी पुलिस करती है। जबकि इस काम में पुलिस का कोई इस्तेमाल नहीं है, और कोई साधारण टाइपिस्ट इस काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं। आन्ध्र में आज से दस-पन्द्रह बरस पहले बड़े शहरों के थानों में कम्प्यूटर पर पुलिस-रिपोर्ट लिखने के लिए पुलिस सेवा से बाहर के टाइपिस्ट रखे गए थे, जो अधिक तेजी से, बेहतर तरीके से कम्प्यूटर पर टाईप कर सकते थे। जिस काम में पुलिस के प्रशिक्षण की जरूरत न हो, वहां पर दूसरे हुनर के लोगों को रखा गया था। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि पुलिस अफसरों के घर-दफ्तर में चाय पिलाने का काम भी सिपाही करते हैं, दूसरी सौ किस्म की बेगारी भी सिपाही करते हैं। इनमें से किसी भी काम के लिए पुलिस के प्रशिक्षण, और इतनी तनख्वाह वाले कर्मचारियों की जरूरत नहीं रहती है। आम अर्दली जिस काम को कर सकते हैं, उसका पद शायद न रहने पर  उस काम में प्रशिक्षित पुलिस को झोंक दिया जाता है जो कि सरकारी साधन और क्षमता का निहायत बेजा इस्तेमाल है। 

भारत के अधिकतर राज्यों में सरकारी कामकाज पुराने ढर्रे पर चले आ रहा है, और लोग लीक से हटकर नए फैसले लेने की सोचते भी नहीं हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए और सरकार में ऊपर से नीचे तक तमाम कामों के बारे में देखना चाहिए कि लोग अपने बुनियादी काम, अपने बुनियादी हुनर से परे के किसी काम में अगर लगाए गए हैं, किसी काम में अगर उनकी लगातार तैनाती हो रही है, तो उसके लिए तुरंत एक बेहतर ढांचा तैयार करना चाहिए। एक तरफ तो प्रदेश के मरीज इलाज नहीं पा रहे, दूसरी तरफ डॉक्टरों से बाबूगिरी करवाई जा रही है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Jun-2019

मध्यप्रदेश के देवास के जंगलों में एक दर्जन से ज्यादा बंदरों की लाश मिली है। वहां गांव के लोगों ने वन विभाग को बताया तो अफसरों को पता लगा। अब अंदाज है कि जंगलों में पानी न रह जाने की वजह से बंदरों के बीच आपस में लड़ाई हुई होगी, और उसी में जख्मी होकर मरने वाले बंदरों की लाशें बिखरी मिली हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जगह-जगह प्यासे हिरण जंगलों से निकलकर गांवों में पहुंच रहे हैं, और कहीं गांव वाले उन्हें मार रहे हैं, तो कहीं गांव के कुत्ते घेरकर हिरणों को मार रहे हैं। इनमें से बहुत कम खबरें पुलिस या वन विभाग तक पहुंचती हैं, क्योंकि गांव को लगता है कि कड़े नियम-कायदों के चलते लोगों की गिरफ्तारी हो जाएगी। जहां तक मुमकिन होता है, जंगलों के किनारे बसे हुए गांव ऐसे मामलों को दफन करने की पूरी कोशिश करते हैं, क्योंकि न तो जंगल अफसरों पर उनका भरोसा है, और न ही पुलिस पर। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों से खबर आती है कि पानी की तलाश में, या खाने की तलाश में भालू गांव में घुस जा रहे हैं, कुएं में गिर जा रहे हैं, या पेड़ पर चढ़कर लोगों से अपनी जान बचा रहे हैं। भूख और प्यास से बेहाल जानवर जंगलों में जगह-जगह इंसानों से सामना होने पर अपनी जान बचाने की दहशत में उन पर हमले कर रहे हैं, और बहुत से लोग मारे जा रहे हैं। इन सबके अलावा इन दिनों छत्तीसगढ़ के जंगलों में जो सबसे बड़ा खतरा घूम रहा है, वह धरती के सबसे बड़े प्राणी हाथी का है। हाथी आए दिन कहीं न कहीं किसी को कुचल रहे हैं, किसी घर को तोड़ रहे हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में आज दर्जन भर हिरणों की लाश मिली है। जंगल में इनके पीने के पानी के गड्ढों में यूरिया घोलकर शिकारियों ने उसे जहरीला बनाया, और जंगल अफसरों का मानना है कि इसी पानी को पीकर हिरणों की मौत हुई है। 

छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में हाथियों के आतंक को देखें तो एक बात बड़ी साफ समझ आती है कि सरगुजा और कोरबा जैसे इलाकों में हाथियों ने जगह-जगह इंसानों को मारा है। लेकिन महासमुंद और उसके आसपास के इलाकों में हाथियों ने डेरा जरूर डाला है, लेकिन आमतौर पर उन्होंने इंसानों को नहीं मारा है, या ऐसी घटनाएं बहुत कम हुई हैं। इन दोनों इलाकों के बीच जानकार लोग एक फर्क बताते हैं कि जहां हाथियों के खाने के लिए पेड़ों के पत्ते और चारा पर्याप्त हैं, वहां वे आक्रामक नहीं हो रहे हैं। लेकिन जहां पर उन्हें खाने-पीने नहीं मिलता, वहां वे भूख-प्यास के चलते आक्रामक और हिंसक हुए जा रहे हैं। यह एक बड़ा साफ-साफ फर्क बताता है कि जंगली जानवरों के खाने-पीने के साधनों को भी, उनके लिए हरियाली या शिकार करने के इलाकों को भी जब इंसान बर्बाद कर रहे हैं, जंगलों की अवैध कटाई कर रहे हैं, तो जानवर आबादी की तरफ बढ़ रहे हैं, मकान और फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं, और सामने पडऩे पर इंसानों की जिंदगी भी जा रही है। 

छत्तीसगढ़ जंगलों से भरा हुआ एक राज्य था, और सत्ता पर बैठे हुए लोगों की करवाई हुई अवैध कटाई, या लकड़ी के कारोबारियों के साथ अफसरों की मिलीभगत के चलते जंगल घटते चले गए। ना जाने कौन से उपग्रह फोटो दिखाकर यह साबित किया जाता है कि छत्तीसगढ़ में जंगल बढ़े हैं, जबकि चारों तरफ हकीकत यह है कि जंगल घट गए हैं, और जंगली जानवर बेघर हो गए हैं। वन विभाग को जंगली जानवरों की रखरखाव के लिए, उनके लिए पानी का इंतजाम करने के लिए जो बड़ा बजट केन्द्र और राज्य से मिलता है, वह वन विभाग के आम और व्यापक भ्रष्टाचार में बंट जाता है, और जंगली जानवर अफसरों का मुंह ताकते रह जाते हैं। राज्य सरकार को अपने इस एक सबसे ही भ्रष्ट विभाग को सम्हालना चाहिए, और वन्य प्राणी संरक्षण का जिम्मा किसी ऐसे अफसर को देना चाहिए जिसमें ईमानदारी कुछ बाकी हो, और जो संवेदनशील भी हो। आज जैसी हालत है, उसके चलते जंगल तो रातों-रात खड़े नहीं होंगे, जंगली जानवर जरूर अपनी भूख-प्यास को लिए हुए गांव-कस्बे और शहर तक आकर खड़े हो जाएंगे। पूरे प्रदेश में जगह-जगह पशुप्रेमी लोग वन विभाग के भ्रष्टाचार को लेकर सरकार और हाईकोर्ट में खड़े ही रहते हैं, लेकिन यह विभाग अब आरोपों के प्रति संवेदना खो चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह वह जंगलों के लिए, पेड़ों के लिए, और जंगली जानवरों के लिए संवेदना खो चुका है। यही वजह है कि इस विभाग में अभी पिछली रमन सरकार के चलते हुए एक-एक वन संरक्षक की पोस्टिंग के लिए एक-एक करोड़ रूपए का लेन-देन होने की चर्चा रहती थी, और नीचे के अफसरों में भी उसी अनुपात में कम लेन-देन से उन्हें कमाने वाली कुर्सियां मिलती थीं। ऐसे भ्रष्ट विभाग को कम भ्रष्ट बनाना भी मौजूदा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। और आज की सरकार इस बात को भी ठीक से समझ ले कि भ्रष्टाचार केवल पिछली सरकार का खबरों में नहीं आता था, आज की सरकार भी अगर उसी रास्ते चलेगी, तो लोगों की नजरें आज भी सरकार पर हैं, और यह भी मानकर चलना चाहिए कि भूखे-प्यासे जंगली जानवरों की बद्दुआ भी कम असर नहीं रखती।
-सुनील कुमार


Date : 07-Jun-2019

हिन्दुस्तानी सड़कों पर हादसों में हर बरस लाखों मौतें होती हैं। डेढ़ लाख से अधिक मौतें 1915 में दर्ज हुई थीं, और वे तुरंत होने वाली मौतें थीं। दुर्घटना के जख्मों से कुछ समय बाद मरने वालों के आंकड़े इसमें शामिल नहीं थे। अपने आसपास हम देखें तो एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जब सड़क-मौतों की खबरें न आएं। अभी तीन दिन पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर में देर रात ढाबे पर आते-जाते एक मोटरसाइकिल पर सवार चार नौजवानों को कुचलते हुए कोई बड़ी गाड़ी भाग गई। अभी जब यह बात लिखी ही जा रही है, तो छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके से खबर आ रही है कि वहां एक दुपहिए पर सवार चार लोगों को एक मुसाफिर बस की टक्कर लगी, और चारों लोग मारे गए। अब जब एक दुपहिए पर चार बड़े लोग सवार होकर जा रहे हैं, तो गलती सिर्फ बड़ी गाड़ी की हो यह सोचना भी गलत है। लेकिन प्रदेश सड़क हादसों से कुछ सीख रहा हो ऐसा पिछले कई दशकों में नहीं लगा है। 

हिन्दुस्तानी सड़क हादसों के पीछे कुछ बहुत जाहिर सी वजहें हैं, और ये सारी की सारी टाली जा सकती हैं अगर सरकार और जनता दोनों के बीच अपनी जिम्मेदारी का अहसास थोड़ा सा बढ़ जाए। पिछले दो दशकों में भारत में गाडिय़ों की रफ्तार लगातार बढ़ती चली गई है क्योंकि दुनिया भर की कंपनियां यहां आईं, और तेज रफ्तार मॉडल लेकर आईं। दूसरी तरफ देश की औसत संपन्नता बढऩे से लोगों के बीच दारू पीना भी बढ़ा है। तीसरी बात यह कि सड़कें चौड़ी हुई हैं, पुल बने हैं, और लोगों को रफ्तार बढ़ाने का मौका भी मिल रहा है। इन सबसे ऊपर की बात यह है कि ट्रैफिक नियम लागू करने से जुड़े दो विभाग, आरटीओ, और ट्रैफिक पुलिस, तकरीबन सारे हिन्दुस्तान में बाकी विभागों के मुकाबले बहुत अधिक भ्रष्ट हैं। मध्यप्रदेश के आरटीओ के बारे में तो केन्द्रीय मंत्री नितीन गडकरी ने कुछ समय पहले कहा था कि ये चंबल के डाकुओं से बड़े लुटेरे हैं। और अपने आसपास जब हम देखते हैं तो यहां भी आरटीओ का हाल इससे जरा भी बेहतर नहीं दिखता है। 

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में आज से 25-30 बरस पहले सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस का जितना काबू रहता था, उसका एक हिस्सा भी आज नहीं दिखता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल, कैमरे लगाने जैसे खर्च हो रहे हैं, सड़कों पर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च हो रहे हैं, लेकिन या तो ट्रैफिक पुलिस जरूरत जितनी नहीं है, या वह बेकाबू है, और बेअसर है। पहले के मुकाबले अभी ट्रैफिक नियम तोडऩे वाले अधिक दुस्साहसी दिखते हैं, और पुलिस महज उन्हें देखते हुए दिखती है। पूरे प्रदेश में शराब के नशे में गाडिय़ां चलाना बढ़ते चले जा रहा है, ट्रक और बस जैसे कारोबारी वाहन अंधाधुंध मनमानी कर रहे हैं, और जब कारोबारी गाडिय़ां कानून तोड़ती हैं, तो वह पुलिस और आरटीओ के साथ एक संगठित भ्रष्टाचार का सतह पर तैरता हुआ सुबूत होता है। 

सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी करे, तो मौतें बहुत हद तक थम सकती हैं, और सरकार की कमाई भी बढ़ सकती है। दूसरी तरफ लोगों के बीच जागरूकता न बढऩे से लोग हेलमेट-सीट बेल्ट के बिना चलते हैं, पिए हुए चलाते हैं, और रफ्तार को बेकाबू भी रखते हैं। यह पूरा सिलसिला सुधारने की जरूरत है। गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से सरकार को होने वाली कमाई का एक अनुपात सीधे-सीधे ट्रैफिक पुलिस पर खर्च करना चाहिए। और पर्याप्त ट्रैफिक पुलिस तैनात करके नियम तोडऩे वालों की गाडिय़ां जब्त करने, और उनके ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने का काम भी बड़ी कड़ाई से करना चाहिए। किसी को भी ऐसी रियायत देने का सरकार को भी हक नहीं है जिससे वे लोग सड़क पर दूसरे पाबंद लोगों के लिए भी खतरा बनते हों। सड़कों पर नियम तोडऩे वाले महज खुद नहीं मरते हैं, औरों को भी मारते हैं, इसलिए इस मामले में उन पर दूसरों की जिंदगी खतरे में डालने के कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। जो मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों को गाडिय़ां देते हैं, उन्हें भी तगड़े जुर्माने के साथ-साथ कुछ दिनों के लिए कैद भी होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि कुछ-कुछ दिनों के लिए अगर लोगों का जेल जाना होने लगेगा, तो उनके आसपास के सैकड़ों लोग सहम भी जाएंगे, और सुधर भी जाएंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Jun-2019

आए दिन किसी न किसी प्रदेश से किसी विधायक, मंत्री, या सांसद का वीडियो तैरने लगता है जिसमें वे लोगों को धमकाते दिखते हैं, कहीं किसी को लात मारते दिखते हैं, साम्प्रदायिकता की नफरत फैलाते दिखते हैं, और महिलाओं के लिए अपमान की हिंसक बातें करना तो मानो सबसे ही लोकप्रिय काम नेताओं के बीच है। ऐसे में कहीं-कहीं पुलिस में केस दर्ज होता है जो कि ताकतवर के खिलाफ तो एक पूरी पीढ़ी निकल जाने तक नहीं निपट पाता, और कहीं-कहीं पार्टी अपने नेताओं को मामूली सी झिड़की देकर अपने हाथ झाड़ लेती है। लेकिन इससे परे एक संस्था और ऐसी है जिसे अपना घर सुधारने की जरूरत है। 

संसद और विधानसभाओं के सदस्य छोटी-छोटी बात पर कहीं किसी अफसर के खिलाफ विशेषाधिकार भंग का मामला ले आते हैं कि उन्हें सुविधा नहीं मिली, कहीं वे किसी अखबार के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला सदन में पेश कर देते हैं कि उसमें छपी हुई कोई बात उनका अपमान करती है, या सदन का अपमान करती है। लेकिन क्या कभी संसद और विधानसभाओं जैसे सदन इस बात पर सोचते हैं कि उनके सदस्यों की हरकतें आम जनता का कितना अपमान करती हैं, और इस तरह खुद सदन का कितना अपमान करती हैं? सदन के बाहर के लोगों को नोटिस देकर उनसे माफी मंगवाना तो आसान बात है क्योंकि संसद और विधानसभा को ऐसे विशेषाधिकार मिले हुए हैं कि वे किसी को कैद भी सुना सकते हैं। लेकिन इस तरह बांह मरोड़कर माफी मंगवाने से परे क्या कभी संसद और विधानसभा यह सोचते हैं कि उसके सदस्यों के आचरण से उसकी इज्जत कैसे मिट्टी में मिलती है? 

सांसद और विधायक अक्सर ही गाडिय़ों के नंबर प्लेट के नियम तोड़ते हुए, बिना इजाजत सायरन लगाकर उसे बिना जरूरत बजाते हुए दिखते हैं। छोटे पुलिस कर्मचारियों को आतंकित करने के लिए सांसद या विधायक की बड़ी-बड़ी सी तख्तियां लगा दी जाती हैं। और ऐसी तमाम गाडिय़ां संसद और विधानसभाओं के अहातों में पहुंचती भी हैं। हमारा सोचना है कि जिस सदन को भी अपने आपको सम्माननीय बनाकर रखना है, उसे अपने सदस्यों के चाल-चलन, उनके आचरण, और उनके बर्ताव को लेकर जागरूक रहना चाहिए। जब कोई सांसद या विधायक अलोकतांत्रिक या अशोभनीय बर्ताव करते हैं, तो वे सदन का इतना बड़ा अपमान करते हैं जितना कि कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकते। हर सदन को ऐसी शिकायत कमेटी भी बनाना चाहिए जिसके सामने आम जनता शिकायत रख सके कि सदन के सदस्यों ने उनके साथ क्या गलत किया है, और उसके सुबूत पेश कर सकें। संसद और विधानसभा अगर अपने आपको विशेषाधिकारों से घिरा हुआ टापू बनाकर बने रहना चाहते हैं, तो उनका सम्मान नहीं हो सकता। वे कड़े कानून बनाकर अपने को सम्मान दिलाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन जनता के मन से ऐसे लोगों के प्रति सम्मान नहीं निकल सकता जो कि आम लोगों को धकेलते हुए, सायरन बजाते हुए सड़कों से निकलते हैं। 

लोकतंत्र में संसद हो, सरकार हो, या न्यायपालिका हो, इन सभी संस्थाओं का दर्जा आम जनता के बुनियादी हक से नीचे ही रहेगा। जनता ही नहीं रहेगी तो लोकतंत्र की ये संस्थाएं क्या खाकर काम करेंगी? ऐसे में अपने आपको जनता की पहुंच से परे रखना, जनता से संवाद न रखना ठीक नहीं है। यह याद रखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर करने का स्पष्ट प्रावधान है, और देश के बहुत से ऐतिहासिक फैसले जनहित याचिकाओं पर ही हुए हैं। ऐसे में संसद और विधानसभाओं को भी अपने आपको जनहित याचिकाओं के लिए खोलना चाहिए। बहुत से ऐसे मामले हो सकते हैं जिनमें बड़े कारोबारी हित जुड़े हों, और संसद या विधानसभा के सभी या अधिकतर दल उस मामले को न उठाएं। ऐसा राज्य की विधानसभा में अधिक मुमकिन रहता है जहां कम पार्टियां रहती हैं, और कारोबारी दोनों-तीनों पार्टियों को साध लेते हैं। ऐसे में बंधक रखा गए लोकतंत्र को आजाद करने के लिए जनता को भी अपनी आवाज सदन तक पहुंचाने का एक रास्ता खुला रहना चाहिए। यह एक पारदर्शी व्यवस्था रहनी चाहिए जिसे बाकी जनता भी देख सके। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडेय ने ऐसी एक सोच सामने रखी थी, और फिर बाद में उसका पता नहीं क्या हुआ। छत्तीसगढ़ के मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरण दास महंत को इस बारे में पक्ष-विपक्ष से चर्चा करके जनता को एक हक देना चाहिए। ऐसी भागीदारी से विधानसभा का सम्मान बढ़ेगा, और किसी विधायक का बर्ताव सही न रहने पर उसके बारे में विधानसभा तक शिकायत करने का भी एक रास्ता निकलेगा। जनता को अपने मुद्दे सदनों में उठाने का एक मौका जरूर मिलना चाहिए, और सदन की कोई समिति ऐसी जनहित याचिकाओं पर विचार करने के लिए बनाई जा सकती है। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Jun-2019

आज विश्व पर्यावरण दिवस पर सोशल मीडिया लोगों की पोस्ट से भरा हुआ है, और सरकारों की ओर से भी जगह-जगह कुछ आयोजन होंगे, कुछ भाषण होंगे। यह एक दिन आ चुका है, और कुछ घंटों के बाद चला भी जाएगा, लेकिन जिन मुद्दों पर ध्यान जाना चाहिए, वे नारों में जगह पाकर ही चल बसते हैं। छत्तीसगढ़ के अखबार ऐसी तस्वीरों और खबरों से भरे पड़े हैं कि पेड़ लगाने के नाम पर सरकार और स्थानीय संस्थाओं ने पैसों की जो बर्बादी की है, उसके सुबूत सड़कों के बीच और सड़कों के किनारे सूखकर खड़े हुए हैं। यह तो बात शहरों के बीच की हुई, लेकिन दूसरी तरफ जहां घने जंगल रहते हैं, जहां से पेड़ काटे जाते हैं, जिनकी जगह पेड़ और जंगल लगाने की कानूनी बंदिश सुप्रीम कोर्ट ने लादी है, उसका भी बुरा हाल है। कहने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पेड़ कटाई के लिए वसूला गया मुआवजा खर्च किया जाता है ताकि कई गुना पेड़ लग सकें, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पिछले बरसों में आए ऐसे सैकड़ों करोड़ रूपए का कैम्पा नाम का फंड सरकार ने अपने जेब खर्च की तरह इस्तेमाल किया, और मंत्री-मुख्यमंत्री, बड़े अफसरों ने पेड़ लगाने के बजाय इस मद से तमाम दूसरे किस्म के खर्च किए। जांच को बड़ी अहमियत देने वाली छत्तीसगढ़ की मौजूदा कांग्रेस सरकार को चाहिए कि पिछले बरसों के कैम्पा फंड के खर्च की जांच करा ले, तो नतीजों से सुप्रीम कोर्ट भी हक्का-बक्का रह जाएगा कि वह पेड़ कटाई की जगह किस तरह के कामों पर खर्च के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए दे रहा है। 

लेकिन पर्यावरण अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, और समाज के लोगों को भी इसके बारे में सोचना चाहिए। आज ही किसी ने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि एक जोड़ी कपड़े प्रेस करने के लिए कितनी बिजली खर्च होती है। और बिजली तो पर्यावरण को सीधे-सीधे नुकसान पहुंचाकर ही बनती है। इसलिए लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि बिल पटाने की ताकत रहते हुए भी किस तरह बिजली इस्तेमाल में किफायत बरती जा सकती है, गाडिय़ों के इस्तेमाल में किफायत बरती जा सकती है। लोग यह भी सोच सकते हैं कि रोज के इस्तेमाल के साबुन-शैम्पू, टूथपेस्ट या दूसरे रसायन के इस्तेमाल में कैसे थोड़ी-थोड़ी सी कटौती हो सकती है जो कि कुल मिलाकर धरती को बचा सके। आम और खास लोगों के सोचने की एक बात यह भी हो सकती है कि प्रकृति से भिड़ते हुए कुछ खास किस्म के पेड़-पौधे और घास लगाना क्या सचमुच समझदारी है? लोग घास सींचने के लिए भारी पानी खर्च करते हैं, और उससे धरती को, पर्यावरण को कुछ भी हासिल नहीं होता। लोग छतों पर पौधे लगाते हैं, और उन्हें बचाने के लिए भारी संघर्ष करते हैं, और उससे पर्यावरण को कुछ नहीं मिलता। दूसरी तरफ निजी और सार्वजनिक सभी किस्म की जगहों पर स्थानीय मिजाज के देशी पेड़ों को लगाकर शुरू के कुछ बरस बचा दिया जाए, तो वे सौ-पचास बरस तक पर्यावरण का ख्याल रखते हैं, और इंसान की जिंदगी आरामदेह बनाते हैं। 

सरकार में पर्यावरण दिवस मनाने का हक महज उन्हें रहना चाहिए जो कि जनता के पैसों से अंधाधुंध बड़े घर-दफ्तर का इस्तेमाल न करके, बिजली और बाकी सामानों की बचत करते हैं। आज भी छत्तीसगढ़ की राजधानी में सैकड़ों करोड़ रूपए की लागत से मंत्रियों के बंगले बनने जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस सरकार ने पिछली सरकार के किए गए फिजूलखर्ची के इस फैसले पर दुबारा नहीं सोचा है कि कैसे किफायत से छोटे मकान बनाए जाएं, और उस जनता पर बोझ न डाला जाए जो कि रियायती चावल की वजह से दो वक्त का खा पा रही है। ऐसे बड़े मकान पहले तो बनने में भी पर्यावरण बर्बाद करते हैं, और फिर रख-रखाव में भारी बिजली-पानी खर्च होता है जो कि कुल मिलाकर जनता की जेब से ही जाता है। मौजूदा सरकार इस प्रदेश की जिंदगी में शायद आखिरी सरकार होगी जो कि आज डिजाइन के स्तर पर ही इस फिजूलखर्ची को रोक सके। गांधी की कही जाने वाली इस पार्टी को सरकारी शान-शौकत खत्म करने के इस मौके को नहीं छोडऩा चाहिए। 

लगे हाथों एक और पहलू पर एक बात हो जाए, शहरी म्युनिसिपल जहां-जहां हैं, उनके पास कचरे को संगठित रूप से घरों से ही अलग करवाकर इक_ा करने, और फिर पूरे कचरे के निपटारे की एक संभावना है। इसी देश में दक्षिण के कुछ शहरों ने बड़ी कामयाबी से ऐसा कर दिखाया है, और शहरी कचरे से कमाई भी की है। खुद छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर जिला मुख्यालय में बड़ी कामयाबी से महिलाओं को जोड़कर कचरे का ऐसा निपटारा साबित कर दिखाया गया है जिससे धरती पर बोझ नहीं बढ़ रहा। इस प्रदेश और बाकी देश के म्युनिसिपलों को कचरे के महंगे निपटारे का सिलसिला खत्म करना चाहिए, हालांकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश वाला यह काम खत्म करना नेताओं और अफसरों को पसंद नहीं आएगा। लोगों को कचरे के निपटारे की जिम्मेदारी इस हद तक मुक्त नहीं कर देना चाहिए कि शहर सैकड़ों करोड़ रूपए साल खर्च करने और बोझ बढ़ाने का काम करें। जनभागीदारी से कचरे की घर पर ही छंटाई, और उसके पूरी तरह निपटारे के कामयाब मॉडल इसी देश में मौजूद हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहरों की म्युनिसिपल की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। 

शहरीकरण, बिजली, पंप, और सहूलियत की वजह से इंसानों में पानी की खपत इतनी बढ़ती जा रही है कि धरती के भीतर का पानी खत्म होने की कगार पर है। हम बरसों से इसी जगह यह सलाह देते आए हैं कि बारिश में नदियों तक पहुंचने वाले पानी को जगह-जगह रोककर धरती के भीतर पानी की री-चार्जिंग को तेजी से बढ़ाना चाहिए जिससे बाढ़ भी रूकेगी, समंदर का जलस्तर भी बढऩे से रूकेगा, और धरती के भीतर गिरता हुआ जलस्तर सम्हलेगा। आज दिक्कत यह है कि सरकार जब भी कोई तालाब खुदवाने की बात करती है, तो उसके सामने गांव के इंसानों और जानवरों की निस्तारी की जरूरत रहना जरूरी रहता है, और दूसरी तरफ ऐसी खुदाई से इंसानों को रोजगार मिलना भी जरूरी रहता है। इन दोनों प्राथमिकताओं के चलते धरती कहीं भी प्राथमिकता में नहीं रह गई है। होना तो यह चाहिए कि तेजी से खुदाई करने वाली मशीनों से ऐसी जगहों पर भी तालाब खोदे जाएं जो चाहे आबादी से दूर हों, इंसानों के काम के न हों, लेकिन जो नदियों तक जाने वाले बारिश के अतिरिक्त-पानी से भरे जा सकें, और जिससे धरती के जलभंडार भर सकें। धरती की जरूरत को आज इसलिए अनदेखा किया जाता है कि धरती वोटर नहीं है, और इंसान वोटर हैं। बड़े पैमाने पर भूजल बढ़ाने के लिए रोजगार से परे बड़ी मशीनों से बड़े-बड़े तालाब अगर नहीं बनाए जाएंगे, तो बाढ़ में जाने वाले पानी को बचाना नहीं हो पाएगा। 

पर्यावरण को बचाना एक फर्जी नारा है, इंसान पर्यावरण नहीं बचाते, पर्यावरण इंसानों को बचाता है। इसलिए लोगों को अपनी आत्मरक्षा के लिए अपने इर्द-गिर्द किफायत, सुधार, और बेहतरी की कोशिश करनी चाहिए, और लापरवाह सरकारों, लापरवाह म्युनिसिपलों से सार्वजनिक मंचों पर सवाल करने चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 04-Jun-2019

दिल्ली के नौजवान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कल दिल्ली की बसों और मेट्रो में महिलाओं का सफर मुफ्त करने की घोषणा की है। मेट्रो और बसों को होने वाले नुकसान की भरपाई दिल्ली सरकार करेगी। बहुत से लोग इसे लोकसभा चुनाव में हर सीट गंवा चुकी आम आदमी पार्टी की अगली चुनावी तैयारी मान रही है कि इससे केजरीवाल दिल्ली के विधानसभा चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन इससे परे भी यह सोचने की जरूरत है कि क्या सार्वजनिक परिवहन को समाज के किसी तबके के लिए मुफ्त करने के कुछ फायदे होते हैं? 

दुनिया के कुछ ऐसे ही विकसित और लोकतांत्रिक देश हैं जहां समाज के भीतर सभ्यता अधिक संवेदनशील है, और वहां पर किसी देश में लोगों को एक न्यूनतम आय की गारंटी दी जाती है, और देश में कोई भी एक सीमा से नीचे की गरीबी नहीं झेलते। कुछ ऐसे देश हैं जहां पर अलग-अलग शहरों में स्थानीय आवाजाही को मुफ्त कर दिया है, और बस, ट्राम या मेट्रो को बिल्कुल मुफ्त करके उन्होंने सडक़ों पर से निजी वाहनों की आवाजाही को घटाने में कामयाबी पाई है। इससे शहरों पर बोझ घटने से प्रदूषण कम हुआ है, और लोग डीजल-पेट्रोल के धरती पर सीमित भंडार तेजी से खत्म करने से भी बच रहे हैं। 
दिल्ली में केजरीवाल सरकार का यह फैसला उन महिलाओं को बहुत फायदा नहीं देने वाला है जो बिना कारों के चल ही नहीं सकतीं। इससे उन्हीं को फायदा मिलेगा जो आज टैक्सी या ऑटो से चलती हैं, अपने दुपहिए पर चलती हैं, या कुछ दूरी पैदल भी तय करती हैं।  दिल्ली सरकार ने पिछले बरसों में लगातार जिस तरह आम जनता के लिए मोहल्ला क्लीनिक खोले हैं, सरकारी स्कूलों की शक्ल बदलकर रख दी है, उसने पूरी दुनिया में वाहवाही पाई है। ये एक अलग बात है कि मोदी नाम की सुनामी में दिल्ली में लोगों ने सांसद तो भाजपा के चुने, लेकिन केजरीवाल सरकार को पढ़ाई और इलाज इन दो चीजों के लिए बड़ी तारीफ भी मिली है। अब यह एक तीसरा ऐसा फैसला है जो आम जनता की आधी आबादी को सीधे प्रभावित करेगा, महिलाओं मुफ्त सफर से उनकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, वे मामूली तनख्वाह का काम करने के लिए भी कुछ दूर तक का सफर कर सकेंगी जो कि कम तनख्वाह में मुमकिन नहीं हो सकता था। इस तरह केजरीवाल सरकार का यह फैसला महिलाओं की आत्मनिर्भरता को बढ़ाने वाला होगा, और उनकी सुरक्षा को भी इस तरह बढ़ाएगा कि जिस जगह भीड़ में महिलाओं का अनुपात अधिक रहता है, वहां पर वे अधिक सुरक्षित भी रहती हैं। 

कुछ लोगों को यह भी आशंका है कि इससे केन्द्र और राज्य सरकार के बीच टकराव का एक नया मोर्चा खुल सकता है, अगर केजरीवाल को नापसंद करने वाली केन्द्र की मोदी सरकार दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर से इसमें रोड़ा लगवाए। लेकिन एक दूसरी बात यह भी हो सकती है कि दिल्ली की आधी आबादी को मुफ्त सफर का नतीजा देखकर हो सकता है कि केन्द्र सरकार बाकी आधी आबादी को अपनी तरफ से मुफ्त सफर देने का सोचे। यह बात समझनी चाहिए कि शहरों में बस, ट्राम, या मेट्रो को चलाने में होने वाला नुकसान दरअसल एक साफ-सुथरे और सभ्य भविष्य के लिए एक पूंजीनिवेश होता है। अगर मजबूत सार्वजनिक परिवहन न रहे, तो लोग धीरे-धीरे निजी दुपहियों या निजी चौपहियों के लिए बेबस होने लगते हैं, और सडक़ों पर निजी गाडिय़ों की भीड़ भी बढ़ती चलती है, और पार्किंग के लिए भी कांक्रीट के आसमान छूते जंगल बनने लगते हैं। यह सब कुछ धरती पर एक बहुत बड़ा बोझ होता है। इसलिए आबादी के एक बड़े हिस्से को रियायती या मुफ्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट देना धरती को बर्बादी से बचाना भी है। 

दिल्ली के अलग-अलग कुछ विशेषज्ञों ने इसके बारे में यह माना है कि यह सरकार का एक लुभावना फैसला है जिस पर जनता के खजाने का पैसा खर्च होगा, और इससे कोई फायदा नहीं होगा। जो लोग रियायतों के खिलाफ रहते हैं वे भी इसे बुरा मान रहे हैं। कुछ लोगों को यह भी आशंका है कि इसका चुनावी नुकसान भी हो सकता है क्योंकि दिल्ली में छात्र लंबे समय से रियायती सफर की मांग कर रहे थे, और उन्हें छोडक़र हर तबके की महिलाओं को ऐसी रियायत देने से एक नाराजगी भी फैल सकती है। लेकिन ऐसे तमाम तर्कों से परे एक बात यह जरूरी है कि अगर शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को निजी गाडिय़ों का विकल्प बनाना है, तो निजी गाड़ी से चलने वाले लोगों को भी रियायती बस-मेट्रो देनी होगी, और इस रियायत को केजरीवाल सरकार महिलाओं के लिए मुफ्त सीमा तक ले गई है। अब यह एक सरकार की अपनी सामाजिक सोच है कि दिल्ली की सडक़ों पर बोझ संपन्न तबके में से महिलाओं का कुछ हिस्सा अगर मुफ्त-मेट्रो की ओर मुड़ता है, तो उससे सडक़ें सचमुच ही कुछ बेहतर हाल हो सकती हैं। 

शहरों को अपनी कमाई के दूसरे जरिये ढूंढकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को अधिक से अधिक रियायती बनाना चाहिए, और इनकी सहूलियतें भी बढ़ाना चाहिए। यह एक साफ-सुथरे भविष्य के लिए किसी शहर का सबसे जरूरी पूंजीनिवेश होता है, और इसके आज के नगदी नफे-नुकसान से इसका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। साथ-साथ यह फैसला दिल्ली में लाखों महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी लेकर आएगा। डिलिवरी बॉय की तरह डिलिवरी गर्ल का काम भी बढ़ सकता है क्योंकि इनको सफर मुफ्त हासिल होगा। 


Date : 03-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी शराबबंदी का वायदा करके सत्ता में आई, लेकिन सरकार में आते ही उसने यह कहना शुरू कर दिया कि यह वायदा पांच बरस में पूरा करना है और ऐसे बड़े किसी फैसले पर रातों-रात अमल नहीं हो सकता। कुल मिलाकर जो सिलसिला रमन सरकार में चल रहा था, वही जारी है, शराब की तमाम खरीदी और तमाम बिक्री का जो सरकारीकरण रमन सरकार ने आखिरी दो बरस में किया था, वह जारी है। प्रदेश के तमाम अखबार इन खबरों से भरे पड़े हैं कि सरकारी शराब दुकानों से किस कदर अधिक वसूली करके ही शराब बेची जा रही है, किस कदर कुछ चुनिंदा ब्रांड ही दुकानों में रखे जा रहे हैं। मतलब यह कि शराब के कारोबार में जो भयानक भ्रष्टाचार रमन सरकार में चल रहा था, वह अभी भी जारी है। 

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को देखें तो यहां शराब या बीयर बनाने के लिए कारखाने का लायसेंस सरकार देती है। किसी भी दूसरे कारखाने को शुरू करने का ऐसा कोई लायसेंस नहीं लगता, लेकिन शराब पर राजनीति और सरकार का मजबूत शिकंजा नेताओं और अफसरों को माकूल बैठता है क्योंकि उससे मोटी उगाही की गुंजाइश रहती है। चूंकि शराब पीने वाले समाज में बुरी नजरों से देखे जाते हैं, इसलिए उनकी किसी तकलीफ या उनके किसी नुकसान पर किसी चर्चा की जरूरत भी नहीं समझी जाती। शराब न पीने वाले लोग यह मानकर खुश हो लेते हैं कि दारू महंगी होगी तो लोगों का पीना कम होगा, और समाज में गंदगी कम होगी। लेकिन ऐसा होता नहीं है जिसे जितनी शराब पीनी रहती है वे अपने घर की दूसरी कटौतियां करके भी उतनी शराब पी ही लेते हैं। ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि शराब के धंधे में ऐसी क्या खूबी है कि सरकार उसके किसी भी पहलू को अपने शिकंजे से जरा भी फिसलने देना नहीं चाहती? 

प्रदेश में खाने-पीने के सामान बनाने वाले बहुत से कारखाने हैं, दूध की डेयरियां हैं, आईस्क्रीम बनाने के कारखाने हैं, लेकिन किसी को भी सरकार इस तरह बांधकर नहीं रखती जिस तरह शराब कारखानों को कब्जे में रखती है। रमन सरकार के पिछले पन्द्रह बरसों में भी लगातार यह बात सामने आई कि सरकार के पसंदीदा दारू कारखानेदार कौन से हैं जिन्हें तमाम किस्म की छूट मिलती हैं, और सरकार के निशाने पर कौन हैं जिनके सबसे अच्छे दारू कारखानों को भी बार-बार बंद करवा दिया जाता था। और यह बात किसी रहस्य की तरह नहीं थी, राजनीति और मीडिया, सरकार और कारोबार के तमाम लोगों को यह पता होता था कि सरकार के चहेते दारूवाले कौन से हैं। तकरीबन वही सिलसिला इस सरकार में भी जारी है, और चेहरे जरूर बदल गए हैं, लेकिन सरकार से नफा या नुकसान होना उसी तरह जारी है।

इसके बाद सरकार ने पूरे प्रदेश के लिए दारू की खरीदी अपने हाथ में ले ली है। यह सिलसिला रमन सरकार के समय चला, और यह एक बहुत बड़े संगठित भ्रष्टाचार का जरिया बन गया। लोगों को यह मालूम है कि शराब कंपनियां सरकार के ब्रेवरेजेस कॉर्पोरेशन में अपने ब्रांड रजिस्टर करवाने से लेकर दुकानों में अपने ब्रांड पहुंचाने तक किस तरह रिश्वत देकर ही काम करवा सकते हैं। रमन सरकार के कार्यकाल में ब्रेवरेजेस कॉर्पोरेशन सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपए साल के भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका था, और वह अब भी जारी है। शराब परोसने वाले बार को लेकर सरकार ने नियमों का ऐसा जाल बिछा रखा है कि जब जिस बार मालिक से नाराजगी हो, उसका टेंटुआ दबाया जा सकता है, और जिसे छूट देनी हो, उसे भरपूर कमाई का मौका भी दिया जा सकता है। अब रमन सरकार ने आखिरी के दो बरस में शराब की चिल्हर बिक्री का सरकारीकरण कर दिया, तो सरकार एक संगठित अपराधी की तरह इस धंधे के हर हिस्से पर पूरी तरह काबिज हो गई, और लोग आज अपनी मर्जी का कोई ब्रांड पाने का हक भी नहीं रखते क्योंकि किस कंपनी से कितना माल खरीदना है, इसे सरकार अपनी रहस्यमय मर्जी से तय करती है। इस पूरे भ्रष्टाचार का एक भी पहलू ऐसा नहीं है जो कि मौजूदा कांग्रेस सरकार ने शुरू किया हो, यह सारा संगठित भ्रष्टाचार रमन सरकार के दौरान शोषण के एक फौलादी ढांचे की तरह कायम हो चुका था, और वह पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन की तरह अभी भी चले आ रहा है।

दुनिया के किसी भी सभ्य लोकतंत्र में शराब को कानूनों से ऐसे बांधकर नहीं रखा जाता जो कि सिर्फ भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं। आज पूरे प्रदेश में लोग साधारण तरीके से शराब की दुकानें खोल लें, जिस तरह साबुन-तेल के ब्रांड दुकानदार ग्राहक की मर्जी से रखते हैं, उसी तरह शराब ग्राहक की मर्जी से रखें, आज दुकानों पर सारे वक्त जिस तरह मारपीट की नौबत रहती है, जिस तरह अतिरिक्त दाम वसूल करके ही शराब बेची जाती है, वह सारा सिलसिला पल भर में खत्म किया जा सकता है। सरकार घोषित रूप से शराब के धंधे से जितना टैक्स वसूल करती है, वह पूरा का पूरा शराब की बिक्री पर लादा जा सकता है, और घोषित टैक्स तो उतने का उतना वसूल किया जा सकता है, अघोषित टैक्स खत्म हो जाएगा, और शराब के दाम भी शायद आधे रह जाएंगे, या टैक्स दुगुना वसूल हो सकेगा। राजनीतिक दल भारी बदनामी झेलते हुए भी जिस तरह शराब की काली कमाई का मोह छोड़ नहीं पाते वह बहुत तकलीफदेह बात है। लोकतंत्र में ऐसे संगठित भ्रष्टाचार को खत्म करना जरूरी है। देश में ही कई ऐसे राज्य हैं जहां पर शराब को लेकर राज्य सरकार की नीति और नियम आसान हैं, और वहां ग्राहकों को इस तरह लूटा नहीं जाता, सड़कों पर ऐसी बदअमनी नहीं दिखती। छत्तीसगढ़ सरकार को शराबबंदी लागू होने तक, या न करना हो तो अपने वायदे को भूलकर भी, शराब के कारोबार से संगठित भ्रष्टाचार खत्म करना चाहिए, उससे सरकार का टैक्स बढ़ेगा, लोगों को मर्जी की शराब पाने का बुनियादी हक मिलेगा, और दाम घटेंगे। इतना बड़ा संगठित राजनीतिक भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं है। पिछली रमन सरकार में भी यही बात सामने आई थी, और उसके लगभग पूरे कार्यकाल में जो अफसर इस पूरी आपराधिक साजिश पर अमल करवा रहा था, वह आज भी इस नई सरकार की जांच एजेंसियों से फरार है। अगर दारू के धंधे में पिछली सरकार के ही सारे के सारे तौर-तरीके अभी भी जारी हैं, तो फर्क क्या हुआ? 
-सुनील कुमार


Date : 02-Jun-2019

जो लोग पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के वीडियो देखते हैं, वे इस बात पर हैरान होते हैं कि उन्हें इतना गुस्सा आखिर आता किस बात का है? पहले वे कांग्रेस में थीं, और वहां से छोड़कर निकलीं, नई पार्टी बनाई, तो कांग्रेस से एक वक्त उनका गुस्सा जायज था, और उसके बाद तो वे कांग्रेस से आमने-सामने चुनावी मैदान में रहती हैं। फिर पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में उनका मुकाबला वामपंथियों से था, और विधानसभा चुनाव में वामपंथ की 33 बरस चली सरकार को हराकर वे सत्ता में आईं, और तब से अब तक 9 बरस से मुख्यमंत्री हैं। इसके बाद उनका मुकाबला भाजपा से शुरू हुआ जो कि बड़ी उम्मीदों के साथ बंगाल के लोकसभा चुनाव में उतरी, और खासी सीटें छीनकर ले गई। ममता का झगड़ा सुप्रीम कोर्ट से भी चलता है, हाईकोर्ट से भी, और सीबीआई से भी। उनका झगड़ा अब बढ़ते-बढ़ते सार्वजनिक जगहों पर उन्हें चिढ़ाने के लिए जयश्रीराम के नारे लगाने वालों से भी शुरू हो गया है, और उनकी कमजोरी अच्छी तरह जान-समझकर लोग उन्हें भड़काते और उकसाते हैं, और वे ठीक उसी तरह नाराजगी में लात मारने लगती हैं, जिस तरह एक वक्त प्रणब मुखर्जी ने बंगाल के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मारी थीं, और तस्वीरों में कैद भी हुए थे। 

बंगाल में भाजपा को उम्मीद से अधिक लोकसभा सीटें मिलने के पीछे ममता का मिजाज भी एक वजह रहा, और बिना मोदी के प्रशंसक हुए भी ममता का बदमिजाज देखकर लोगों ने मोदी को वोट दिया। लेकिन दूसरे भी अलग-अलग राज्य हैं, जहां भाजपा, नरेन्द्र मोदी, या एनडीए से हारने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों को यह सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ, जो कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के कांग्रेसी-पंजाब में नहीं हुआ? हर राज्य की अलग-अलग बातें रहीं, और न सिर्फ कांग्रेस को बल्कि एनडीए-विरोधी तमाम बाकी पार्टियों, और क्षेत्रीय दलों को भी यह सोचने की जरूरत है कि क्या मोदी को कोसने से उनका कुछ भला होने जा रहा है, या फिर वे अपनी कमजोरियों को भी देखने का हौसला जुटा पाएंगे? बिहार को देखें, तो कांग्रेस और लालू की पार्टी राजद के बीच वहां एक मजबूत गठबंधन था। कांग्रेस को तो पूरे देश में कहीं भी अधिक समर्थन नहीं मिला, लेकिन नीतीश-सरकार के खिलाफ बिहार में लगातार अभियान चलाने वाले तेजस्वी यादव को जनता का साथ क्यों नहीं मिला? भ्रष्टाचार की कैद काट रहे लालू यादव को कायदे से तो जनता की हमदर्दी मिलनी चाहिए थी कि बुढ़ापे में और खराब सेहत में वे जेल में हैं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्या तेजस्वी को यह भी सोचना चाहिए कि भाईयों के बीच का झगड़ा जिस तरह सतह पर कचरे की तरह तैरते रहा, क्या उससे भी कोई नुकसान हुआ? या टिकटें देने में गलत फैसले हुए? ऐसी कई बातें उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा को भी सोचनी चाहिए, और कांग्रेस को भी जिसने कि वहां इस गठबंधन से कोई भी तालमेल नहीं रखा। कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर तो आत्ममंथन करना ही है, आत्मविश्लेषण करना ही है, अलग-अलग राज्यों में उसे यह भी सोचना चाहिए कि स्थानीय समीकरणों में कहां क्या गड़बड़ी रह गई, या हो गई? जिन तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने के बाद इस रफ्तार से अलोकप्रिय हुई कि छत्तीसगढ़ में वह तकरीबन पिछले लोकसभा नतीजों तक पहुंच गई, मध्यप्रदेश में पिछले से बुरी हालत में आ गई, और राजस्थान में वह शून्य की शून्य रही। क्या कांग्रेस को इन तीनों राज्यों में खास गौर करने की जरूरत नहीं है? या फिर नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए चूंकि राहुल गांधी ने अपना सिर पेश कर दिया है, इसलिए इन तीनों राज्यों की कांग्रेस जवाबदेही से अपने को परे मान ले? 

ऐसी हालत बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों की बहुत से राज्यों में है। आन्ध्र में चन्द्राबाबू नायडू जिस अंदाज में पूरे देश में गैरएनडीए, गैरकांग्रेस सरकार बनाने की एक महत्वाकांक्षी मुहिम चला रहे थे, वह अंदाज धरे का धरा रह गया, और वे राज्य के चुनाव को भी खो बैठे, सरकार से चले गए, और दिल्ली में सरकार बनाने के लिए उनकी पहल की कोई जरूरत भी नहीं पड़ी। उनको भी बहुत बारीकी से अपनी असफलता की वजहें ढूंढनी चाहिए। और ऐसा महज एनडीए-विरोधियों के लिए जरूरी नहीं है, पंजाब में एनडीए के लिए भी जरूरी है कि मोदी नाम की सुनामी पंजाब की सरहदों पर पहुंचकर सहम क्यों गई? जो लोग राष्ट्रवादी उन्माद और मोदी के राष्ट्रपतीय चुनावी अंदाज को तोहमत देकर अपने आपको नाकामयाबी के दाग से बचाने में लगे हैं, उनको अगले चुनाव में भी कोई नहीं बचा सकेगा।
-सुनील कुमार


Date : 01-Jun-2019

उत्तरप्रदेश के बरेली में एक धर्मस्थल के पास कुछ मजदूरों पर कुछ लोगों ने हमला किया, और उनका यह आरोप था कि वे मांस खा रहे थे। उनको बुरी तरह पीटा गया, और इस पिटाई का वीडियो भी चारों तरफ फैल गया है। मजदूरों का कहना है कि वे शाकाहारी खाना खा रहे थे। ये मजदूर धर्मस्थल से परे दूसरी जगह जुड़ाई का काम कर रहे थे। ऐसी घटनाएं पिछले दिनों लगातार हुई हैं जब किसी मुस्लिम पति-पत्नी को बुरी तरह मारा गया क्योंकि कुछ तथाकथित गौरक्षकों को यह शक था कि वे गो-मांस लेकर जा रहे हैं। अभी-अभी कई समाचार चैनलों पर उत्तरप्रदेश का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें भाजपा की अलीगढ़ शहर की महापौर खुलेआम यह फतवा देते दिख रही है कि जो लोग खुला मांस लेकर जाते हैं, उनकी हड्डियां तोड़ दी जाएं। उसने रमजान के इस महीने को लेकर भी यह तंज कसा है कि एक तरफ ये लोग रोजा रखते हैं, दूसरी तरफ मांस खाते हैं। 

ऐसी बिखरी हुई घटनाओं से परे की बात देखें, तो उत्तरप्रदेश में चमड़े को पकाने के जो कारखाने हैं, वे तकरीबन बंद हो गए हैं, और एक लाख से अधिक लोग रोजगार खो बैठे हैं। इंडिया स्पेंड नाम की एक भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ने आंकड़े सामने रखे हैं कि भारत में पशु व्यापार वाले दूसरे सबसे बड़े राज्य राजस्थान के एक प्रमुख पशु मेले में गाय का व्यापार पिछले छह बरसों में घटकर पांच फीसदी ही रह गया है। यह पूरा कारोबार राज्य की पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में तबाह हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2011 में राजस्थान के बाडमेर के राज्य के सबसे बड़े पशु मेले में करीब साढ़े सात हजार गायों की खरीद-बिक्री हुई थी, जो 2017 में घटकर 342 रह गई थीं। 2018 में राज्य के सारे पशु मेलों में कारोबार कुल एक चौथाई रह गया। इस कारोबार के गिरने से राजस्थान की गाय की एक दुर्लभ रेगिस्तानी नस्ल, थारपारकर, के खत्म होने की नौबत आ रही है। यह रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान के सरहदी इलाकों में कोई उद्योग धंधे न होने से पशुपालन हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के लिए एक परंपरागत पेशा था, लेकिन गो-हत्या या तस्करी का आरोप लगाकर होने वाले हमलों की वजह से यह कारोबार खत्म हो गया है। इन सरहदी इलाकों में तथाकथित गौरक्षकों की धमकियों की वजह से 95 फीसदी लोगों ने गाय का कोई भी कारोबार बंद कर दिया है। 

मोदी सरकार को अपने इस दूसरे कार्यकाल में यह सोचना होगा कि लोगों के खानपान की आजादी को कैसे बचाकर रखा जा सकता है, क्योंकि आज हमलावर भीड़ झंडे-डंडे लेकर किसी को भी घेरकर मार रही है, और उस दहशत में बाकी बहुत से लोग पशुओं से जुड़े हुए किसी भी कारोबार को बंद करते जा रहे हैं। अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों के खानपान के अलग-अलग तौर-तरीके हैं, और भारत का संविधान उनको इसकी आजादी भी देता है। लेकिन देश में आज मोदी सरकार जिस विशाल बहुमत के साथ जीतकर आई है, उसे धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों में से बहुत से लोग उनकी हिंसा के पक्ष में जनमत का सुबूत मानने लगे हैं। यह सिलसिला देश के भीतर लोगों को अलग-अलग तबकों में बांट देगा, और देश का एक विशाल हिस्सा, आबादी का एक बड़ा हिस्सा मांसाहारी है, और उसे मांस खाने पर भी अब खतरा झेलना पड़ रहा है। अभी मुस्लिमों का साल का सबसे बड़ा त्योहार रमजान चल रहा है, और इस बीच हरियाणा में भाजपा सरकार के चलते हुए ऐसे बयान सामने आए कि हर मुस्लिम परिवार में पकने वाले मांस की जांच की जाए कि कहीं गो-मांस तो नहीं पक रहा है। यह सिलसिला बहुत नाजायज है, और बहुत खतरनाक भी है। मोदी सरकार को मिला विशाल बहुमत बहुत सी वजहों से मुमकिन हुआ है, लेकिन उसे किसी साम्प्रदायिकता का समर्थन, किसी हिंसा का समर्थन मानना खुद सरकार और भाजपा के लिए खतरनाक होगा। 
-सुनील कुमार


Date : 31-May-2019

मीडिया के हिस्से में कांग्रेस की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि उसने एक महीने तक टीवी चैनलों की बहस में अपने पार्टी प्रवक्ताओं के जाने पर रोक लगा दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के लोगों को बिठाकर बहस छेडऩा समाचार चैनलों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ मामला है, और ऐसे में मानो थाली से एक सब्जी ही हटा दी गई है, तो ऐसे में चैनलों की शिकायत जायज है। दूसरी तरफ यह समझने की जरूरत है कि कांग्रेस ने ऐसा किया क्यों है।

अभी जब चार दिन पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक चल रही थी, और उस बीच ही मीडिया में तेजी से ये खबरें आईं कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, तो कार्यसमिति चलते-चलते ही कांग्रेस के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने जोर-शोर के साथ इसका खंडन किया, और इसे गलत बताया। लेकिन घंटे दो घंटे के भीतर ही यही प्रवक्ता उतने ही जोर-शोर से यह कहते हुए मीडिया के सामने आए कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, और उसे वापिस लेने से इंकार भी कर दिया है। तब से लेकर अब तक राहुल के इस्तीफे की गंभीरता और कांग्रेस अध्यक्ष पद का भविष्य तरह-तरह की अटकलों के सामान बने हुए हैं, और ऐसे में कांग्रेस के कोई प्रवक्ता कह भी क्या सकते हैं? किसी भी टीवी बहस पर कांग्रेस से पहला सवाल तो पार्टी के अध्यक्ष पर ही होगा, और इस पर अगर आज सोनिया और प्रियंका भी कुछ नहीं बोल पा रहे हैं, तो बाकी और किसी की हस्ती ही क्या है कि इस पर कुछ बोले? 

लेकिन इसके अलावा भी कुछ बातें और हैं जिनकी वजह से कांग्रेस महीने भर के लिए टीवी की बहस से दूर रहना तय कर चुकी है। एक तो यह कि जो चुनावी हार अब आंकड़ों का इतिहास बन चुकी है, उसे कुरेद-कुरेदकर टीवी चैनल और दूसरी पार्टियों के प्रवक्ता उसे वर्तमान बनाना जारी रखेंगे, और उसे ही भविष्य साबित करना भी। अभी तो कांग्रेस खुद ही अपनी हार का विश्लेषण नहीं कर पाई है, और यह भी नहीं तय कर पाई है कि कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी से कौन विश्लेषण करेंगे, इसलिए भी तब तक टीवी से दूर रहना ठीक है। लेकिन इससे भी परे एक बात और है जिसकी वजह से कांग्रेस टीवी चैनलों से दूर जा रही है। न सिर्फ पिछले महीनों के चुनाव प्रचार के दौरान, बल्कि उसके पहले के एक-दो बरस में भी समाचार के कई चैनलों का हाल ऐसा खराब था कि कांग्रेस के अलावा भी कई विपक्षी पार्टियां उन्हें गोदी-मीडिया कहने लगी थीं, यानी मोदी की गोदी में बैठा हुआ मीडिया। लोगों को याद होगा कि जब हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार रूपए के नोट शुरू किए गए, तो देश का नंबर वन चैनल होने का दावा करने वाले एक हिन्दी चैनल की स्टार-एंकर बड़े जोर-शोर से समाचार बुलेटिनों में यह साबित करते दिखी कि दो हजार के नोट में एक ऐसा माइक्रोचिप फिट किया गया है कि वह जमीन के बहुत नीचे भी दबाया जाएगा, तो भी भारतीय उपग्रह उसे पकड़ लेंगे। मीडिया के नाम पर एक बहुत ही बदमजा लतीफे की तरह यह वीडियो आज भी इंटरनेट पर मौजूद है, और समय-समय पर लोग मीडिया का मखौल बनाने के लिए उसका इस्तेमाल भी करते हैं। इस किस्म के सैकड़ों ऐसे टीवी पत्रकार और चैनल रहे जो कि प्रचारक की तरह काम करते रहे, और देश के अखबारनवीसों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अविश्वसनीयता को लेकर काफी कुछ लिखा भी। एक ऐसी जनधारणा बनी रही, और आज भी है कि टीवी चैनलों का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोदी की टीम की तरह काम करता रहा। इसलिए पार्टियों के बीच पहले भी यह बात होती रही है कि कुछ अधिक बड़े प्रचारक-चैनलों का बहिष्कार किया जाए। 

कांग्रेस के पास अगले एक महीने में खोने के लिए कुछ भी नहीं हैं। लेकिन वह इत्मीनान से अपना घर सम्हालकर उसके बाद फिर मीडिया के सामने आ सकती है जिसमें टीवी मीडिया भी शामिल होगा। लोकतंत्र में ऐसे कोई भी बहिष्कार अंतहीन नहीं होते। कई बार राजनीति के लोग जब मीडिया से बदसलूकी करते हैं, तो मीडिया भी कुछ पार्टियों का, या कुछ नेताओं का बहिष्कार करता है, और एक वक्त गुजर जाने के बाद दोनों फिर साथ काम करने लगते हैं। ऐसे बहिष्कार लोगों को सोचने, समझने, और सम्हलने का मौका भी देते हैं। यह मौका यहां पिछले चुनाव को लेकर कांग्रेस के सोचने, समझने, और सम्हलने का है, वहीं पर यह मौका इलेक्ट्रॉनिक मीडियाके लिए भी यही सब कुछ करने का भी है। एक वक्त था जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी, और महज अखबार ही प्रेस कहलाते थे। उस वक्त श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मजबूत था और वह पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों की फिक्र करने वाला देश का अकेला संगठन भी था। जैसे-जैसे वह संगठन खत्म हुआ, वैसे-वैसे पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र भी खत्म होती गई। आज मीडिया में काम करने वाले तब के मुकाबले शायद सौ गुना बढ़ चुके हैं, लेकिन सिद्धांतों की फिक्र  एक फीसदी भी नहीं बची है। ऐसे में सबको अपने-अपने हाल पर एक बार सोचना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 30-May-2019

गुजरात का सूरत अभी-अभी एक कोचिंग सेंटर में लगी आग से करीब 25 छात्र-छात्राओं की मौत को लेकर खबरों में था। और अभी कल एक दूसरी खबर इस शहर को खबरों में लाई, यहां की एक बारह बरस की जैन परिवार की छात्रा ने सांसारिकता छोड़कर दीक्षा ली, और साध्वी हो गई। इस मौके पर संपन्न जैन समाज की धार्मिक परंपराओं के अनुसार बहुत बड़ा जलसा हुआ जिसमें शहर के और आसपास के समाज के लोग शामिल हुए, बहुत बड़ी शोभायात्रा निकली, और समाज के साधु-संत जुटे। परिवार में माता-पिता ने भी इस बात पर खुशी जाहिर की कि उनकी बेटी संन्यास की राह अपनाकर परिवार का गौरव बढ़ा रही है, और कहा कि यह पूर्वजन्म के संस्कारों का नतीजा है। 

ऐसा पहले भी कई बार हुआ है जब कम उम्र के बच्चे संन्यास लेकर जैन साधु या साध्वी बनें, और समाज में यह बहस हो कि क्या बालिग हुए बिना, दुनिया को और देखे बिना क्या इतना बड़ा फैसला किसी बच्चे को लेने देना चाहिए? अभी जब यह खबर आई तो एक बार फिर मीडिया और सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि जिस उम्र में शादी की इजाजत नहीं है, वोट देने का हक नहीं है, अपनी जिंदगी के बाकी फैसले लेने का हक नहीं है, तब जिंदगी का इतना बड़ा और कठिन फैसला लेने का हक किसी बच्चे को कैसे दिया जाना चाहिए? यह बात न तो जैन धर्म के खिलाफ है, और न ही धर्म के तहत संन्यास लेने के खिलाफ है, यह बात महज उन बच्चों के हक में है जो कि उम्र और समझ के हिसाब से, परिपक्वता और शारीरिक जरूरतों के हिसाब से इतने बड़े नहीं हुए हैं कि बाकी पूरी जिंदगी के लिए शायद जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे कड़ा फैसला ले सकें। 

बहुत से धर्मों में, या कि अधिकतर धर्मों में धर्म के संगठन की अपनी व्यवस्था के लिए संन्यास का प्रावधान रहता है। कहीं लोग पादरी बनते हैं, कहीं नन बनती हैं, और कहीं बौद्धभिक्षु। लेकिन बारह बरस की उम्र में किसी बच्ची को बाकी पूरी जिंदगी के लिए संन्यास की कठिन राह का पूरा अहसास हो सकता हो, ऐसा लगता नहीं है। इंसान के तन-मन की परिपक्वता का एक सिलसिला रहता है, और दुनिया के अधिकतर देशों में 18 बरस के आसपास की उम्र को स्वतंत्र फैसले लेने के लिए सही माना गया है। गाड़ी चलाने का लाइसेंस हो, वोट डालने का हक हो, या मर्जी से शादी करने का  मामला हो, हिन्दुस्तान में भी लड़कियों के लिए 18 बरस, और लड़कों के लिए कुछ मामलों में 18 बरस, और कुछ में 21 बरस की न्यूनतम उम्र तय की गई है। अब सूरत की इस बच्ची की खबर को अगर बारीकी से देखें, तो उसके मां-बाप इसे अपनी बेटी का पक्का इरादा बताते हुए उसकी इच्छा पूरी करने की बात कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्ची बचपन से ही संन्यास देखते आई है, और साध्वियों के साथ उसने लंबा पैदल सफर भी किया है। इसलिए वह इस कड़ी जिंदगी से वाकिफ है। लेकिन दूसरी तरफ जब खुशी नाम की इस बच्ची का इंटरव्यू देखें तो वह साफ-साफ कहती दिखाई पड़ती है कि जब वह तीन माह की थी तब उसके परिवार में चार दीक्षाएं हो चुकी हैं, और तब से उसकी आत्मा में यह बीज रोपा जा चुका है, और बाद में माता-पिता ने, महाराज साहब ने इस बीज को अच्छे से उगाया, और अच्छे से खिलाया। वह यह भी कहती है कि वह चार बरस लेट हो चुकी है, महाराज साहब ने कहा था कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा लेनी चाहिए। इससे जाहिर है कि बच्ची के मन में परिवार और धर्म प्रमुखों ने ऐसी बात डाली है कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा ले लेनी चाहिए थी। 

जैन समाज को अपने बच्चों के भले के लिए, और धर्म के लिए भी इस बात पर सोचना चाहिए कि क्या इतनी कम उम्र में किसी को संन्यास दिलाना चाहिए? जिन सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को त्याग करके संन्यास लेने की भावना ऐसे बच्चों में रहती है, क्या उन बच्चों ने अब तक तमाम सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को देखा भी है? जो देखा ही नहीं, पाया ही नहीं, भोगा ही नहीं, उसे त्याग करना क्या एक अपरिपक्व फैसला नहीं है? क्या धर्म को खुद ही ऐसा नियम लागू नहीं करना चाहिए कि बच्चे बालिग होने के बाद ही इस बारे में कोई फैसला लें? आज भारत का कानून बच्चों को बालिग होने के पहले तमाम किस्म के बड़े फैसले लेने से रोकता है, और उनके मां-बाप ही उनके लिए फैसले ले सकते हैं। ऐसे में क्या यह फैसला मां-बाप का लिया हुआ नहीं माना जाएगा, या नहीं होना चाहिए? बारह बरस की उम्र की एक बच्ची को ऐसी कड़ी और कठोर बाकी तमाम जिंदगी तय करने का फैसला उस बच्ची के ही हित में नहीं लगता है। इस बारे में जैन समाज के भीतर ही गंभीर सोच-विचार होना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 29-May-2019

देश के सबसे बड़े महानगर मुम्बई के एक अस्पताल में काम कऱ रही एक आदिवासी डॉक्टर छात्रा को उसकी जाति को लेकर इतना प्रताडि़त किया गया कि उसने आत्महत्या कर ली। अब जांच के बाद पुलिस ने तीन सवर्ण सहकर्मियों को गिरफ्तार किया है जिन पर प्रताडि़त करने, और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगे हैं। आज हिन्दुस्तान में जब लाखों लोग मेडिकल कॉलेज में दाखिले का इम्तिहान देते हैं, तो उनमें से कुछ हजार लोगों को ही इस पढ़ाई का मौका मिलता है। एक वंचित आदिवासी तबके से आई हुई लड़की अगर पढ़ाई पूरी करने के बाद अस्पताल में काम कर रही है, तो उसने इस पूरे दौर में भी अपने गरीब परिवार के साथ कई किस्म की दिक्कतें झेली होंगी। इसके बाद अगर उसे उसकी जाति को लेकर, आरक्षण के फायदे को लेकर इस तरह प्रताडि़त किया गया, तो उसमें हिन्दुस्तान में आज कुछ भी अटपटा नहीं है, और यह एक आम बात हो चुकी है, यह आम बात रहते आई है, और शायद आगे भी रहेगी। 

देश में आज आरक्षण का फायदा पाने वाले लोगों के बारे में बाकी लोगों के बीच बैठकर जरा सी चर्चा करें, तो लोगों के बीच का जातिवाद एक हिंसक तरीके से सामने आता है। पढ़ाई और नौकरी के एक हिस्से पर हजारों बरस के अन्याय के शिकार लोगों को दिया गया हक बाकी लोगों पर भारी गुजरता है, और उनमें से बहुत से लोग अपनी नफरत निकालने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन दलितों और आदिवासियों को खासकर यह भेदभाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे समाज के सबसे निचले आय वर्ग से आते हैं। एक अन्य आरक्षित तबका, ओबीसी, ऐसा है जो कि बेहतर आर्थिक स्थिति वाला है, और उसे तकलीफ इतनी नहीं झेलनी पड़ती, उसे अछूत नहीं माना जाता, उसे जानवर नहीं माना जाता। रामायण की कहानी से लेकर आज तक आदिवासियों को इंसान का दर्जा देने से भी परहेज करने वाले लोग महज हिन्दुस्तान में ही नहीं हैं, बल्कि पश्चिम के गोरों के बीच भी यह हिंसक बेइंसाफी सिर चढ़कर बोलती है, और बहुत से ऐसे देश रहे जहां पहुंचे हुए हमलावर गोरों ने स्थानीय आदिवासियों या मूल निवासियों को गुलाम बनाकर उन्हें जानवरों से भी बदतर हालत में रखा है। 

एक दूसरी दिक्कत यह होती है कि इन आरक्षित तबकों से जो लोग राजनीति की बड़ी कुर्सियों पर या बड़ी सरकारी नौकरियों में आते हैं, वे अपनी इस नई ताकत का इस्तेमाल महज अपने बच्चों के लिए करते हैं, और उनकी बिरादरी बिना किसी फायदे के रह जाती है। आरक्षण का फायदा पाकर ऊपर आए हुए लोग लगातार उस फायदे को इस्तेमाल अपनी अगली पीढ़ी को दिलाने के लिए कभी भी मलाईदार तबके पर रोक का कानून बनने नहीं देते, और सबसे कमजोर तबका अपने आरक्षित तबके के भीतर भी कमजोर बने ही रहता है। देश भर में जगह-जगह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से जाति के आधार पर भेदभाव के मामले सामने आते हैं, और आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, लेकिन भारतीय समाज जातिवादी हिंसा से आजाद होने का नाम नहीं ले रहा है। देश में दलित-आदिवासी तबकों को सुरक्षा देने के लिए कानून तो कड़े बना दिए हैं, लेकिन उनको लागू करने वाली पुलिस जैसी एजेंसियों के भीतर सामाजिक हकीकत को लेकर समझ बहुत कमजोर है, और सरकार के भीतर भी संवेदनशीलता शून्य है। ऐसे में मुम्बई का यह मामला एक बार फिर एक नई बहस शुरू कर सकता है जिसकी कि देश को बहुत जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 28-May-2019

एक वक्त फिल्मों और व्यंग्य लेखों के लिए पति-पत्नी और वो, ऐसे प्रेम त्रिकोण की कहानी सोची जाती थी, और खाए गोरी का यार, बलम तरसे मन बरसे जैसे गाने शूट किए जाते थे। अब असल जिंदगी में यह प्रेम त्रिकोण सीधे-सीधे सेक्स त्रिकोण में बदल गया है और इसके नतीजे अखबारों में खबरों के पन्नों पर भरे पड़े हैं। रोजाना कई खबरें ऐसी आ रही हैं कि शादीशुदा जिंदगी में एक या दोनों भागीदार शादी से बाहर के प्रेम या महज सेक्स संबंधों में ऐसे उलझते हैं कि जिनका नतीजा हत्या और आत्महत्या में दिखता है। बहुत से ऐसे सेक्स-जुर्म सामने आ रहे हैं जिनमें दो लोगों के बीच प्रेम या सेक्स संबंध चलते हुए तस्वीरें ली गईं, वीडियो रिकॉर्डिंग की गईं, और फिर रिश्ते अच्छे न रहने पर उनकी बिना पर ब्लैकमेलिंग की गई, और कुछ मामलों में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थककर भूतपूर्व प्रेमी ने भूतपूर्व प्रेमिका की हत्या कर दी, या इसका उल्टा भी देखने में आ रहा है।

जुर्म की ऐसी बहुत सी खबरों को पढ़कर जो कुछ बातें दिमाग में आती हैं उनकी शुरूआत करें तो पहली बात यह है कि प्रेम या सेक्स संबंधों के चलते लापरवाही से ऐसे सुबूत तैयार करते न चलें जो कि किसी तीसरे के हाथ लगकर ब्लैकमेलिंग का सामान बनें, या किसी चूक की वजह से सोशल मीडिया पर फैलकर खुदकुशी को मजबूर करें। दूसरी बात यह कि प्रेम संबंधों को सेक्स की उस हद तक ले जाने के पहले याद रखें कि शादी के पहले किसी भी जोड़ीदार का इरादा बदल सकता है, और उस दिन यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि शादी का वायदा करके, झांसा देकर रेप किया। अब कुछ बड़ी अदालतों ने भी ऐसे फैसलों में यह मानना शुरू किया है कि ऐसे सेक्स संबंधों को बलात्कार करार देना जायज नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि आपसी रिश्तों में बेवफाई करके बाहर जब कोई त्रिकोण खड़ा किया जाता है, तो वह जिंदगी के लिए एक किस्म का बरमूडा त्रिकोण भी बन जाता है जिसमें जिंदगी के जहाज का डूबना महज वक्त की बात होती है, आशंका की नहीं। 

जिंदगी में थोड़ा सा आगे बढ़ें तो यह समझने की जरूरत है कि इंसानी चूक प्रेम या सेक्स में हो गई, तो हो सकता है कि बिना बड़े नुकसान के उससे उबरना भी हो जाए। लेकिन दूसरी तरफ अगर ऐसी चूक फोन, ईमेल, कम्प्यूटर, फोन जैसे किसी सुबूत को पैदा कर जाती है, तो देश में कानून बड़ा कड़ा है, और उससे बाकी जिंदगी के बर्बाद होने का एक बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है। फिर अगर ऐसे सुबूतों की वजह से या उनके बिना भी अगर लोग सीधे-सीधे किसी किस्म का हिंसक जुर्म कर बैठते हैं, तो आज के वक्त डिजिटल सुबूतों की वजह से तकरीबन सभी मुजरिम पकड़ा जाते हैं, और ऐसे नौसिखिए मुजरिमों के पकड़े जाने की तो गारंटी सी होती है। रोज की खबरों को ही देख लें तो ऐसे अधिकतर मुजरिम दो-चार दिनों के भीतर ही गिरफ्तार होते हैं।

इसलिए प्रेम और सेक्स के त्रिकोण में, या ब्लैकमेलिंग के खतरे में फंसने के पहले, और फंसाने के पहले ऐसे जुर्म के अंत के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए जिसमें शिकार को सामाजिक बदनामी मिलती है, रिश्ते खत्म होते हैं, कई मामलों में मौत भी मिलती है, और मुजरिम को लगभग शर्तिया सजा और कैद मिलती ही है। इसलिए ऐसे संबंधों के तमाम पहलुओं पर उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले ही जरूर सोचकर रखें, क्योंकि उत्तेजना के पलों में बदन का दिमाग वाला हिस्सा काम नहीं करता है, पे्रम की उत्तेजना, सेक्स की उत्तेजना, या हिंसा की उत्तेजना, जिसका भी पल हो।
-सुनील कुमार


Date : 27-May-2019

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव आए दिन किसी न किसी सरकारी अस्पताल का दौरा कर रहे हैं, बदहाली देख रहे हैं, और हालत सुधारने का बीड़ा भी उठा रहे हैं। दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं है जिसमें पिछली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार की कोई न कोई खबर न छपी हो। और ये तमाम खबरें राज्य के स्तर पर, या राजधानी के एक बड़े सरकारी अस्पताल को लेकर ही हैं, न कि गांव-गांव तक बिखरे हुए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बारे में। ऊपर से नीचे तक स्वास्थ्य विभाग का ढांचा राज्य बनने से लेकर अब तक जिस तरह भयानक भ्रष्टाचार का शिकार रहा है, और इसमें जिस तरह मंत्री से लेकर सचिव स्तर तक के बड़े-बड़े अफसरों का शामिल होना पहली नजर में ही दिखता है, वह बहुत भयानक है। टी.एस. सिंहदेव को यह बहुत ही बिगड़ा हुआ विभाग मिला है, और यह चुनौती भरा भी है, और संभावना भरा भी। 

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ही हर किसी के लिए चिकित्सा सुविधा का वायदा किया था, और स्वास्थ्य मंत्री ने वैसा ही रूख दिखाया भी है। लेकिन अभी यह बात समझ से परे है कि राज्य का सरकारी चिकित्सा का ढांचा क्या ऐसी किसी योजना का बोझ उठाने के लायक है, या इसमें बुनियादी फेरबदल करके इसका बहुत विस्तार करना होगा, और एक अलग ही ढांचा खड़ा करना होगा? इसके साथ-साथ यह भी देखने-समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार की बीमा योजना से क्या इस राज्य को कुछ हासिल हो सकता है, या वह इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि राज्य के निजी अस्पताल बीते बरसों में बिना जरूरत नौजवान महिलाओं के गर्भाशय निकालकर बिल बनाते रहे, और अभी भी दांतों के अस्पताल या क्लीनिक बच्चों के दांतों की गैरजरूरी वायरिंग करके झूठे बिल बना रहे हैं। ये तमाम बातें प्रदेश कांग्रेस के ही एक सक्रिय डॉक्टर सदस्य, डॉ. राकेश गुप्ता, लगातार उठाते रहे हैं, और आज भी इस सरकार में भ्रष्ट अफसरों की बड़ी मौजूदगी और उनकी बड़ी ताकत की बात वे उठाते ही हैं। लेकिन सरकार में भ्रष्ट लोगों का कम से कम इतना तो बोलबाला आज भी दिख ही रहा है कि ऐसे लोग नई सरकार में भी कुर्सियों पर बने हुए हैं, और कमाऊ कुर्सियों पर बने हुए हैं। दूसरी तरफ पिछले बरसों के हजारों करोड़ के जो भ्रष्टाचार खरीदी में सामने आ रहे हैं, उसके जिम्मेदार अफसर अब तक खुले घूम रहे हैं, और मेडिकल-खरीदी के खुले अपराध का कोई असर उन पर दिख नहीं रहा है। 

ऐसे में कांग्रेस सरकार प्रदेश के चिकित्सा विभाग को कैसे सुधारेगी, कैसे वह हर गरीब या हर नागरिक को इलाज दे पाएगी। भ्रष्टाचार से परे भी डॉक्टरों की सैकड़ों कुर्सियां खाली हैं। सरकार के आज के वेतनमान पर कोई काबिल डॉक्टर काम करने को तैयार नहीं हैं, कोई डॉक्टर गांवों में जाकर काम करने को भी तैयार नहीं हंै। करोड़ों की ऐसी मशीनें खरीद ली गई हैं जिनको चलाने के लिए न तो तकनीशियन हैं, और न ही उनकी जांच का मतलब निकालने वाले डॉक्टर। जो सरकारी डॉक्टर हैं, वे निजी प्रैक्टिस की शर्तों वाली सीमित प्रैक्टिस के बजाय बड़े-बड़़े अस्पताल चला रहे हैं, और सरकार उसे अनदेखा करते आई है, और आज भी कर रही है। ऐसे में नए डॉक्टरों को लाने के लिए राज्य सरकार को बाजार में डिमांड और सप्लाई का संतुलन देखना होगा। अगर कम तनख्वाह पर डॉक्टर नहीं आ रहे, तो बाजार व्यवस्था के मुताबिक उनके लिए अलग तनख्वाह तय करनी होगी। गरीबों का इलाज, गांव-गांव तक इलाज, और भ्रष्टाचारमुक्त इलाज खासा मुश्किल काम है, और इसे कामयाबी से करने में हो सकता है कि इस सरकार का बचा कार्यकाल भी कम पड़े। 

टी.एस. सिंहदेव जिस तरह दिलचस्पी से मेहनत कर रहे हैं, हो सकता है कि वे कामयाब हो जाएं, लेकिन हर दिन दसियों हजार मरीज आज भी कमजोर चिकित्सा पा रहे हैं, या चिकित्सा नहीं पा रहे हैं। इसलिए इस एक विभाग को पांच साल के कार्यकाल के हिसाब से सुधारने की धीमी रफ्तार कुछ ज्यादती होगी, और इसे युद्ध स्तर पर सुधारना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 26-May-2019

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में दिग्विजय सिंह के लिए यज्ञ करने वाले एक किसी बाबा ने साढ़े पांच क्विंटल मिर्च जलाकर यज्ञ किया था, और फिर यह मुनादी भी की थी कि अगर दिग्विजय नहीं जीतेंगे तो वे यज्ञ की जगह पर ही समाधि ले लेंगे। अब सोशल मीडिया पर एक टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग तैर रही है जिसमें कोई आदमी इस बाबा से फोन पर बात कर रहा है, और पूछ रहा है कि समाधि कब ले रहे हैं, देर क्यों कर रहे हैं, और बाबा है कि झल्लाए जा रहा है। एक दूसरा कॉर्टून एक विख्यात कॉर्टूनिस्ट सुधीर दर ने पोस्ट किया है जिसमें किसी भविष्यवक्ता के दरवाजे पर एक नेता चप्पल लेकर पहुंचा हुआ है। देश भर में ऐसी कई और घोषणाएं हुई थीं जिनमें कई भविष्यवक्ताओं ने अलग-अलग नेताओं और पार्टियों की जीत बताई थी, जो कि एक-दूसरे से अलग भी थीं, और नतीजों के पहले भी यह तो जाहिर था ही कि उनमें से कोई एक तो गलत होगी ही। 

चूंकि हिन्दुस्तान में हर पांच बरस में आम चुनाव होते हैं, और हर कुछ महीनों में कुछ प्रदेशों के चुनाव होते हैं, या उपचुनाव होते हैं। ऐसे में लोकतंत्र के लिए यह जरूरी हो गया है कि भविष्यवाणी करने वाले सभी पेशेवर ज्योतिषियों की कतरनों को सम्हालकर रखा जाए, और नतीजे आने के बाद नतीजों के साथ मिलाकर उनका भांडाफोड़ किया जाए। ऐसा जरूरी इसलिए भी है कि इनमें से कई ज्योतिषी नतीजे आने के बाद कम्प्यूटर और फोटोशॉप की मेहरबानी से पिछली तारीखों की कतरनें गढ़वा लेते हैं जिनमें उनकी भविष्यवाणी आए हुए नतीजों से मेल खाते दिखती हैं, और वे इसे दिखाकर लोगों को आगे बेवकूफ बनाना जारी रखते हैं। लोगों को ऐसे पाखंड से बचाने के लिए समझदार लोगों की यह सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है कि अंधविश्वास का पर्दाफाश किया जाए। 

चुनावी नतीजे हिन्दुस्तान में किसी भी दूसरे नतीजे के मुकाबले अधिक बड़े सट्टे का सामान रहते हैं। शेयर बाजार भी चुनावी नतीजों पर नजर रखता है, और उनसे प्रभावित होता है। फिर देश में अंधविश्वास में डूबी हुई आबादी का अनुपात खासा बड़ा है, इसलिए उन पर भी ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की बातों पर असर होता है, और किसी नेता या पार्टी के वोट घटते हैं, किसी दूसरे नेता या पार्टी के वोट बढ़ते हैं। लोकतंत्र में जनता के फैसले को अंधविश्वास से प्रभावित करने की ऐसी हरकत को भी उजागर करना चाहिए। आज जब इक्कीसवीं सदी में भी बहुत से अखबारों में रोजाना का भविष्यफल छापा जाता है, और जिस दिन ज्योतिषी के पास मैटर नहीं आता, अखबार का कोई सबएडिटर ही राशियों और लाईनों की अदला-बदली करके भविष्यवाणी तैयार कर लेता है, तो ऐसे में आज देश में एक वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति को फिर से जिंदा करने की जरूरत है। अभी पिछले दो महीनों में ही देश के हर बड़े भविष्यवक्ता ने चुनावी भविष्यवाणी की हैं, और इनका एक विश्लेषण कई झूठ उजागर कर सकता है। 

इससे परे जो नेता या उनके समर्थक बड़े-बड़े दावे करते हैं, उनके सिर, उनकी मूंछें मुंडवाने पर भी जोर डालना चाहिए, और उनकी कतरनों को अगले चुनाव के लिए भी सम्हालकर रखना चाहिए। जागरूक मतदाता कैसा कर सकते हैं इसकी एक वीडियो मिसाल कुछ हफ्ते पहले चंडीगढ़ से आई थी। वहां भाजपा प्रत्याशी किरण खेर के प्रचार के लिए पहुंचे उनके पति अनुपम खेर जब बाजार में एक दुकान पर पहुंचे तो दुकानदार ने पांच बरस पहले के भाजपा के चुनावी घोषणापत्र को दिखाते हुए पूछा कि इन पुराने वायदों का क्या हुआ? बेजवाब अनुपम खेर तुरंत वहां से निकलकर आगे बढ़ लिए। ऐसा कई जगहों पर कई पार्टियों और कई नेताओं के साथ हुआ होगा, और अगर वोटर ऐसे ही चौकन्ने हो जाएं, तो नेताओं के वायदे, उनकी भविष्यवाणियां, इन सब पर लगाम लग जाएगी। 

ठीक ऐसा ही टीवी और अखबारों के एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल के साथ होना चाहिए, और उन्हें करने वाली एजेंसियों के साथ भी। जिस तरह आज भारत में एडीआर नाम का एक एनजीओ उम्मीदवारों की दौलत, उनके जुर्म, और उनकी बाकी बातों का विश्लेषण करके लगातार जनता के सामने रखता है, ठीक उसी तरह चुनाव नतीजों के बाद कोई ऐसा संगठन रहना चाहिए जो कि किसी भी किस्म की, या हर किस्म की भविष्यवाणी, वायदे, चुनौती को लेकर बैठे, और नतीजों के साथ उनका मिलान करके जनता के सामने रखे। वोटों और सीटों को लेकर पार्टियों और नेताओं के दावों को नतीजों के बाद उजागर करना भी जरूरी है, और जब अगले किसी चुनाव में वे यही काम फिर से करें, तो उन्हें उनका इतिहास याद दिलाना भी जरूरी है। चूंकि आम जनता अपनी समझदारी के इस्तेमाल के लिए बहुत गंभीर नहीं रहती, इसलिए उसके सामने ऐसे विश्लेषण को पकाकर तश्तरी में पेश करना जरूरी है, और कुछ लोगों को यह काम करना चाहिए। आज समाचारों की कुछ वेबसाइटें ऐसी हैं जो कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर झूठ और फेक का पर्दाफाश करने के एक जिम्मेदार काम में लगी हुई हैं, इसलिए इसी तरह का काम भविष्यवाणियों और दावों के साथ भी होना चाहिए, अधूरे वायदों के साथ भी होना चाहिए।

-सुनील कुमार


Date : 25-May-2019

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमेटी की बैठक अभी चल रही है, और उससे यह खबर छनकर आ रही है कि अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर इस्तीफे की पेशकश की, कांग्रेस कार्यसमिति ने खारिज कर दिया। ऐसी चर्चा पिछले दो दिनों से चली आ रही थी, और इसमें अटपटा कुछ नहीं था क्योंकि किसी भी पार्टी के मुखिया को एक बहुत बड़ी शिकस्त की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अब सवाल यह उठता है कि यह कितनी बड़ी शिकस्त है? 

राहुल गांधी 2014 के आम चुनावों के बाद पार्टी के अध्यक्ष बने, और यह उनका पहला आम चुनाव रहा। वे खुद पहले संसद का चुनाव जीतते आए हैं, और इस बार भी दो में से एक सीट पर उनकी जीत बरकरार है। वे परिवार की पुरानी परंपरागत सीट अमेठी को खो बैठे हैं, और इसे भी लीडरशिप से इस्तीफे की एक बड़ी वजह करार दिया जा रहा है। लेकिन आंकड़ों को देखकर यह समझने की जरूरत है कि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने क्या पाया है, और क्या खोया है। पिछले आम चुनाव, 2014 में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी रह गए थे, और भाजपा के वोट 31.34 फीसदी थे जिससे नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी थी। इसके बाद अभी के ताजा नतीजों में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी बरकरार हैं, और भाजपा के वोट बढ़कर 37.4 फीसदी हो गए हैं। 2014 में कांग्रेस ने 44 सीटें पाई थीं, और उसकी अगुवाई वाली यूपीए गठबंधन को 90 सीटें मिली थीं। अभी 2019 में कांग्रेस की सीटें 10 फीसदी से अधिक बढ़कर 52 हो गई हैं, और यूपीए गठबंधन की सीटें 92 हो गई हैं। देश भर में एनडीए और नरेन्द्र मोदी की जैसी लहर दिखाई पड़ रही है, और नतीजों में उन्हें जितनी अधिक सीटें मिली हैं, उन्हें देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यह यूपीए और राहुल गांधी की बहुत बुरी शिकस्त है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूपीए और कांग्रेस इन दोनों को पिछले आम चुनाव से अधिक सीटें मिली हैं, और उनका वोट जरा भी कम नहीं हुआ है। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि भाजपा एक वक्त लोकसभा में महज दो सदस्यों की पार्टी थी, और वहां से बढ़ते हुए वह तीन सौ से अधिक तक पहुंची है। इसलिए आंकड़ों की संभावनाएं हर किसी के सामने रहती हैं। 

वे तमाम लोग जो कि पिछले पांच बरस या उसके भी पहले से राहुल गांधी को पप्पू साबित करने पर उतारू थे, उनका यह हक बनता है कि वे राहुल गांधी से इस्तीफे की मांग करें, और कांग्रेस पार्टी को खत्म करने की भी मांग करें। लोकतंत्र में लोग एक-दूसरे पर इतना हमला तो करेंगे ही करेंगे। लेकिन जहां तक यूपीए, कांग्रेस, और राहुल का सवाल है, तो ये राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की ऐसी सुनामी के बीच भी अपने पैरों पर पांच बरस पहले की जगह पर अगर टिके हुए हैं, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह बहुत बुरी शिकस्त है? लोगों के अपने-अपने पैमाने रहते हैं, और मीडिया ने मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को पेश करके खबरों के लिए जो नाटकीयता खड़ी की थी, वह उसकी अपनी रोजी-रोटी की मजबूरी थी। इस आम चुनाव में इन दोनों गठबंधनों के अलावा इतनी बड़ी संख्या में क्षेत्रीय पार्टियां गठबंधन के बाहर भी थीं, और चुनावी नतीजे भी बताते हैं कि इन दोनों से परे के सांसदों की गिनती यूपीए के सांसदों से अधिक है। किसी राज्य में तीन उम्मीदवार मैदान में थे, तो कहीं चार। ऐसे में यह जाहिर है कि कुछ दशक पहले जिस तरह कांग्रेस के मुकाबले बाकी तमाम पार्टियों में वोट बंटते थे, उसी तरह इन दो आम चुनावों में भाजपा के मुकाबले बाकी पार्टियों में वोट बंटे हैं। नतीजा यह है कि मोदी और एनडीए ने सरकार बनाने की जरूरत से बहुत अधिक सीटें हासिल कीं। लेकिन एक और बात जो याद रखने की है वह यह कि कुछ महीने पहले ही राहुल गांधी की ही अगुवाई में उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी ने मोदी की भाजपा की सरकारों को तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान से बेदखल किया था। उस जीत के वक्त भी कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी ही थे जो कि लोकसभा चुनाव में भी थे। 

अब राहुल के खिलाफ एक और बात जो रह जाती है वह वंशवाद की है। आज बहुत से लोग इस बात को कह और मान रहे हैं कि कांग्रेस जब तक एक परिवार के कब्जे में रहेगी, वह आगे नहीं बढ़ पाएगी, जिंदा भी नहीं रह पाएगी। लोकतंत्र में वंशवाद जाहिर तौर पर बुरी बात है। और इस बुरी बात के बारे में थोड़ा सा सोचें तो ठाकरे वंश के कब्जे की शिवसेना याद पड़ती है, बादल वंश के कब्जे का अकाली दल याद पड़ता है, एक वक्त एनडीए के साथ रहे चन्द्राबाबू नायडू का परिवार याद पड़ता है, अभी कल तक भाजपा की भागीदार रही मेहबूबा की पीडीपी याद पड़ती है, एनडीए की पिछली पारी में उसके साथ रहे कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी याद पड़ती है, और यह फेहरिस्त काफी लंबी हो सकती हैं। इसलिए वंशवाद पर पहला पत्थर चलाने का हक उस गठबंधन को ही हो सकता है जिसमें वंशवादी नेता और पार्टियां न हों। अभी कल तक चुनावी नतीजों के जो विश्लेषण आ रहे थे, उनमें भाजपा नेताओं की भी दूसरी पीढ़ी के ढेरों नाम आ रहे थे। ऐसे में कांग्रेस पार्टी अपना मुखिया किसे रखती है, यह पार्टी के भीतर तय होना है, और अगर उस पार्टी को लगता है कि देशभर में बिखरे उसके महत्वाकांक्षी नेताओं के बीच शक्ति संतुलन बनाकर रखने और उन्हें एक साथ बांधकर रखने के लिए सोनिया परिवार का कोई जरूरी है, तो यह उस पार्टी की अपनी जरूरत और अपनी सोच है। हम इसी जगह पर कुनबापरस्ती के खिलाफ दर्जनों बार लिखते आए हैं, लेकिन यह हमला छांट-छांटकर कुछ पार्टियों और कुछ नेताओं पर करना जायज नहीं है। गुड़ खाने वाले गुलगुलों को कोसें, यह कुछ नाजायज बात है।

फिर भी कांग्रेस पार्टी के सामने एक लंबा भविष्य है, और जब 15 बरस पहले देश सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री मान चुका था, कांग्रेस संसदीय दल उन्हें औपचारिक रूप से नेता चुन चुका था, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति भवन में सोनिया गांधी के नाम की चि_ी शपथ ग्रहण के लिए टाईप हो चुकी थी, तब सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, और राष्ट्रपति को चि_ी दुबारा टाईप करवानी पड़ी थी, यह बात डॉ. कलाम ने खुद अपनी किताब में लिखी है। इसलिए यह परिवार आज अध्यक्ष की कुर्सी किसी और को देता है तो भी वह अटपटी बात नहीं होगी, और नहीं भी देता है, तो भी वह इस कुनबापरस्त देश की बाकी पार्टियों के बीच अटपटी बात नहीं होगी। किसी एक हार से, और जैसा कि हमने शुरू में गिनाया है, यह कांग्रेस की आंकड़ों की हार नहीं है, सीटों की हार नहीं हैं, और राजनीति में लोकतांत्रिक मुद्दों की, नैतिकता की हार भी नहीं है, ऐसे में उसके नेता के इस्तीफे की कोई जरूरत भी नहीं है। इस बहुत ही चुनौतीपूर्ण चुनाव में भी कांग्रेस और यूपीए अगर मोटेतौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर बने रहे, तो यह आंकड़ों के मुकाबले लोकतंत्र की अधिक बड़ी जीत है। और जैसा कि कल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने ट्वीट किया है- लोकतंत्र में किसी हारे हुए का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसा करने वाले विजेता को आगे इसका खासा दाम चुकाना पड़ता है। इस देश में पहले इससे बड़ी चुनावी जीत भी देखी है लेकिन अहंकार आगे चलकर शिकस्त दिलाता है। इसलिए मखौल उड़ाने वाले सावधान रहें।
-सुनील कुमार