संपादकीय

25-May-2020

खेती की रियायत और मदद
से बड़े किसान बाहर हों...

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग चल रही है कि किस-किस नेता को धान की फसल पर सरकार द्वारा पहले घोषित दाम का बकाया अब कितना-कितना मिल रहा है। भाजपा के कई बड़े नेताओं के नाम खबरों में हैं कि उन्हें कितने-कितने लाख रूपए मिले हैं। कांग्रेस नेताओं ने अनौपचारिक रूप से ये नाम जारी किए हैं। और अब यह बात उठ रही है कि सिर्फ भाजपा नेताओं के नाम क्यों सामने आए, कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम सरकारी बहीखाते से निकलकर जनता में क्यों नहीं पहुंचे। राज्य सरकार ने सरकार बनते ही किसानों को धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने की घोषणा की थी, लेकिन केन्द्र सरकार की आपत्ति के बाद वह भुगतान नहीं किया जा सका, और आज उसी बकाया को राज्य सरकार ने किस्तों में देना शुरू किया है। 

छत्तीसगढ़ में किसानों को मदद एक बड़ा मुद्दा है। चाहे धान का बोनस हो, चाहे रियायती बिजली हो, चाहे कुछ और हो। और इस राज्य में धान अपनी जरूरत से अधिक उगने लगा है, केन्द्र सरकार भी एफसीआई में उतने धान का चावल लेती नहीं है। राज्य ने केन्द्र से इजाजत मांगी है कि उसे अपने अतिरिक्त धान से एथेनाल बनाने की मंजूरी दी जाए। कुल मिलाकर मतलब यह कि यह राज्य धान-सरप्लस प्रदेश है, जरूरत से अधिक धान, सरकार की खरीदने की ताकत से अधिक धान, और देश की राष्ट्रीय जरूरत के नजरिए से भी छत्तीसगढ़ का धान अतिरिक्त है। अब ऐसी अतिरिक्त फसल को कोई बढ़ावा या प्रोत्साहन देने का तो कोई तर्क नहीं हो सकता, जरूरतमंद किसानों की मदद का एक तर्क है जो कि किसी भी जनकल्याणकारी राज्य में की जाती है, और वह जरूरत के हिसाब से ही की जाती है। छत्तीसगढ़ में छोटे किसानों, कम ऊपज वाले किसानों, अधिया किसानों या खेतिहर मजदूरों को मदद तो समझ आती है, लेकिन रईस और बड़े किसानों को कोई मदद न्यायसंगत कैसे हो सकती है? जिस प्रदेश में तकरीबन आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक रूपए किलो चावल की वजह से जिसका पेट भरता है, उस प्रदेश का पैसा उन बड़े किसानों को कैसे दिया जा सकता है जो कि मदद के जरूरतमंद नहीं हैं? ये किसान जरूर हैं, लेकिन ये इतने बड़े हैं कि इनकी खेती अपने आपमें फायदेमंद होती है। राज्य सरकार इनकी ऊपज को केन्द्र के समर्थन मूल्य पर ले ले वहां तक तो ठीक है, लेकिन उसके बाद का जो बकाया भुगतान अभी किया जा रहा है, वह कुछ अटपटा लगता है। 

धान इतना ज्यादा हो रहा है कि यह छत्तीसगढ़ के पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है, और यहां के भूजल को भी। ऐसे में इस राज्य को अधिक फसल की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि छोटे किसानों की खेती पर निर्भरता आर्थिक रूप से सक्षम हो, बस उतनी ही जरूरत है। आज होना यह चाहिए कि बड़े किसानों को एक क्रीमीलेयर की तरह इस अतिरिक्त फायदे से बाहर करना चाहिए। आज सरकार ने एक एकड़ के किसान के इस बकाया-भुगतान की अधिकतम सीमा दस हजार रूपए तय कर दी है। लेकिन जो बड़े किसान हैं उनकी खेती की जमीन को लेकर कोई सीमा नहीं है। जब जनता के खजाने का पैसा किसी रियायत या मदद के रूप में दिया जाता है, तो वह दो वजहों से ही दिया जाना चाहिए, उस काम की जरूरत हो, और उस ऊपज या उत्पादन की भी जरूरत हो। छत्तीसगढ़ में धान के बड़े किसानों को सरकारी रियायत या मदद से एक सीमा के बाद बाहर कर देना चाहिए। हमारा ख्याल है कि दस एकड़ से अधिक के किसान ऐसी रियायत के पात्र नहीं माने जाने चाहिए। 

कांग्रेस और भाजपा के बीच की बयानबाजी के चलते इस पहलू की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हो सकता है कि हमारी इस सोच में कोई व्यवहारिक कमी भी हो, अगर है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। लेकिन खेती के और कृषि अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों से बात करने पर पता लगता है कि सरकार की आज की रियायत सिर्फ तीन फसलों तक सीमित है जिसमें धान-गन्ना-मक्का है। हालांकि मुख्यमंत्री ने दलहन और तिलहन, कोदो-कुटकी को भी शामिल करने की बात कही है, लेकिन जो सबसे कमजोर, आदिवासी किसान हैं उनके उगाए हुए कोदो-कुटकी की तो कोई सरकारी खरीदी भी नहीं होती है, इसलिए उनको आगे सरकार की इस न्याय योजना में कैसे लाया जाएगा यह भी देखना बाकी है। जानकार लोगों का मानना है कि राज्य में अधिया जैसी व्यवस्था के तहत काम करने वाले लाखों किसान हैं, जिन्हें इससे कोई फायदा नहीं होना है, बल्कि वे अगर धान बेचते समय सोसायटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं, तो भूस्वामी को भी कोई फायदा नहीं होना है। इसके अलावा आज बड़ा नुकसान झेल रहे सब्जी उत्पादकों, फल उत्पादकों की भी अभी तक सरकार की इस न्याय योजना में जगह नहीं दिख रही है। 

यह बात सही है कि किसी भी योजना में सारे लोग नहीं लाए जा सकते, और न ही पहले दिन से ही सारे लोग किसी योजना में आ सकते हैं। आज की भूपेश बघेल सरकार का रूख अब तक की सरकारों के मुकाबले अधिक ग्रामीण और अधिक कृषक है। इसलिए जब सरकार हजारों करोड़ का कर्ज लेकर भी किसानों से अपना वायदा पूरा कर रही है, तो इस योजना पर खर्च पूरी तरह न्यायसंगत होना चाहिए। हम आखिर में एक बार फिर इस बात पर जोर डालेंगे कि खेती को मिलने वाली रियायतों और मदद से क्रीमीलेयर को बाहर करना चाहिए, और ऐसे तमाम फायदों को आमतौर पर 10 एकड़ तक के किसानों तक सीमित रखना चाहिए। अगर सरकार के पास खेती को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक क्षमता और हौसला है, तो वह लघु और मध्यम किसानों तक ही सीमित रखना चाहिए।  लेकिन मुद्दे की बात यह है कि दोनों ही पार्टियों के बड़े किसान और बड़े नेता इस पर तो चर्चा नहीं कर रहे, क्योंकि बड़े नेता या तो शुरू से बड़े किसान रहते हैं, या फिर राजनीति में आने के बाद बड़े किसान बन जाते हैं, और इन दोनों बड़ी पार्टियों के लोग किसानों के भीतर किसी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने के खिलाफ होंगे। लेकिन गरीब प्रदेश में इसे एक मुद्दा बनाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


24-May-2020

मुफ्तखोर से हरामखोर
के दायरे में तो नहीं ?

दिल्ली के फुटपाथ से हिन्दुस्तानियों की बेशर्मी का एक दमदार वीडियो सामने आया जिसमें एक आम बेचने वाले के सारे आम लोग लूट-लूटकर ले गए। कई दिनों के लॉकडाऊन के बाद कहीं से 30 हजार रूपए जुटाकर उसने आम खरीदे थे, और आसपास के संपन्न लोग दिनदहाड़े खुली रौशनी में हाथों में भर-भरकर आम लूटकर चले गए। अभी कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ का एक वीडियो आया था जिसमें मुर्गियों से भरी हुई एक ट्रक पलट गई थी, और लोग मुर्गियां लूटकर ले गए, भीड़ के सामने ड्राइवर भी कुछ नहीं कर पाया। ऐसा कई मौकों पर होता है, खासकर जब फल-सब्जी, या दारू की बोतलों से भरी कोई ट्रक पलट जाए, तो हिन्दुस्तानी उसमें कुछ बाकी नहीं छोड़ते। कई बरस पहले के ये समाचार याद हैं जिनमें किसी रेल हादसे के बाद आसपास के गांवों के लोगों ने आकर घायलों और लाशों के बदन से घडिय़ां और गहने भी उतार लिए थे। हराम का मिले, तो हिन्दुस्तानी दौड़ में अव्वल रहते हैं। लेकिन यह बात हर हिन्दुस्तानी पर लागू होती हो ऐसा भी नहीं है। अभी जब करोड़ों मजदूरों की घरवापिसी हो रही है, तो उनकी मदद के लिए सड़कों पर सामान लेकर खड़े हुए लोगों का तजुर्बा यह है कि अपनी जरूरत से अधिक पानी की बोतल या खाने का सामान लोग नहीं ले रहे। जबकि सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर बाकी है, और रास्ते में खाने-पीने का कोई ठिकाना भी नहीं है, लेकिन लोग कुछ घंटों की जरूरत से ज्यादा सामान नहीं बटोर रहे। यह फर्क क्यों है इसे बंद कमरे से लिखना तो ठीक नहीं है, लेकिन अंदाज हमारा यह है कि अधिक मेहनत करने वाले हरामखोरी कम करते हैं, या नहीं करते हैं। 

हिन्दुस्तानी शहरों को देखें तो जब किसी त्यौहार पर सड़क किनारे कई जगह भंडारे लगते हैं, और लोगों को दोना-पत्तल में प्रसाद या खाना मिलता है, तो अच्छी-खासी लाख-पचास हजार रूपए की मोटरसाइकिल किनारे रोक-रोककर लोग टूट पड़ते हैं, और अधिक से अधिक खाकर फिर अगले भंडारे तक जाते हैं, और वहां भी खाना खत्म करने के अभियान में लग जाते हैं। यह मुफ्तखोरी निहायत गैरजरूरी होती है, और भूखे मजदूरों की मजबूरी से बिल्कुल अलग भी होती है जो कि तीन-तीन, चार-चार दिन के ट्रेन सफर में खाने का कोई भी इंतजाम न रहने पर दो-चार जगहों पर खाना लूटते भी देखे गए हैं। भूख की बुरी हालत में पेट भरने के लिए किया गया कोई भी जुर्म हम जुर्म नहीं मानते, महज खाने तक सीमित जुर्म कोई जुर्म नहीं है। फर्क यही है कि भूखे और बेबस, अनिश्चितता के शिकार मजदूर अपवाद के रूप में कहीं लूट रहे हैं, तो भरे पेट वाले लोग अपने इलाके में पलटी किसी ट्रक को लूटने में इस हद तक जुट जाते हैं, कि पेट्रोल टैंकर से बिखरे पेट्रोल को बटोरने के चक्कर में आग लगने से भी बहुत से लोग मारे जाते हैं। 

दिल्ली में आम की लूट बहुत ही परले दर्जे की हरामखोरी रही, और इस पर मामूली लूट से सौ गुना बड़ी सजा होनी चाहिए, क्योंकि गाडिय़ां रोक-रोककर लोग एक गरीब दुकानदार के आम लूट रहे थे। और इन तमाम लुटेरों के घर भरे हुए थे, और वे स्वाद के लिए जुर्म कर रहे थे, पेट भरने के लिए नहीं, वे अपने से गरीब के खिलाफ जुर्म कर रहे थे, किसी बड़े के खिलाफ नहीं। यह तो वीडियो सुबूत होने की वजह से इनमें से चार लोग गिरफ्तार हुए हैं, और कुछ और लोग भी हो सकते हैं। इस खबर के साथ एनडीटीवी ने इस फुटपाथी फलवाले से बातचीत प्रसारित की थी, और उसका बैंक खाता नंबर भी लिखा था क्योंकि लॉॅकडाऊन से बुरे हाल में आए हुए इस फलवाले के पास कुछ नहीं बचा था। एक जिम्मेदार मीडिया की अपील पर उसके खाते में आठ लाख रूपए आ गए क्योंकि हिन्दुस्तान में कुछ लोग जिम्मेदार भी हैं। अब अदालत को ऐसे संपन्न आम लुटेरों से मोटा जुर्माना लेकर इस फलवाले को दिलवाना चाहिए। 

हिन्दुस्तानी मिजाज में मुफ्तखोरी का कोई अंत नहीं है। लोग ट्रेनों में मिलने वाले कंबल और टॉवेल से जूते पोछे बिना ट्रेन से नहीं उतरते, और उस वक्त वे यह भी फिक्र नहीं करते कि अगली बार उन्हें जो चादर-कंबल मिलेगा वह अगर किसी और के जूते साफ किया हुआ होगा तो क्या होगा? यह तो अच्छा हुआ कि अब कोरोना की दहशत में हिन्दुस्तान में मुफ्तखोरी, हरामखोरी, और चीजों का बेजा इस्तेमाल कुछ घटेगा क्योंकि लोगों को अपनी नीयत और अपने हाथ अपने काबू में रखना मजबूरी लगेगा। जो सबसे बेबस नहीं हैं, वे ही लूटपाट कर रहे हैं, वरना मजदूरों की भीड़ जिन रास्तों से गुजर रही थी, वहां अगर वे अपनी जरूरत के मुताबिक सामान लूट भी लेते, तो भी कोई ज्यादती नहीं होती। 

धार्मिक और सामाजिक संगठनों को, दानदाताओं को भी एक बात सोचना चाहिए कि प्रसाद या भंडारे के नाम पर वे लोगों को मुफ्तखोर न बनाएं। आस्था के लिए तो बहुत थोड़ा सा प्रसाद भी दिया जा सकता है, और वह इतना कम हो कि मोटरसाइकिलें रोकने वालों का उत्साह न रहे तो बेहतर है। मुफ्त का खाना पाने के लिए बड़े अस्पतालों के बाहर रोज बंटने वाले खाने की कतार में बहुत से लोग लग जाते हैं जिनका अस्पताल से कुछ लेना-देना नहीं है, या जो गरीब भी नहीं हैं। जो लोग खरीदकर खा सकते हैं वे भी मुफ्त का मिलने पर कतार में लग जाते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में एक होटल के बंद होने से उसके पौने दो सौ कर्मचारी दो महीने से वहीं डटे हुए हैं। होटल मालिक ने उनके खाने का पूरा इंतजाम किया है। इन कर्मचारियों में से कुछ दर्जन पास के एक गांव में किराए के मकानों में रहते हैं। अभी लॉकडाऊन की वजह से जब सरकार मुफ्त राशन बांटने लगी, तो गांव के बाकी लोगों के साथ-साथ ये दर्जनों लोग भी कतार में लगकर राशन ले चुके थे। बाद में प्रशासन को पता लगा तो उन्होंने होटल मालिक को बताया, जो दो महीनों से इन कर्मचारियों को मुफ्त में तीन वक्त खिलाते आया है। इसके बाद इन कर्मचारियों की लिस्ट लेकर उनको मिले अनाज की भरपाई होटल मालिक ने प्रशासन को की। कर्मचारियों का जवाब था कि मुफ्त में मिल रहा था तो वो कतार में लग गए थे। 

हिन्दुस्तानी अपनी नीयत को तौलें कि वे कहीं मुफ्तखोर से हरामखोर के बीच तो नहीं आते हैं, इस दायरे से बाहर रहना ही ठीक है। 

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23-May-2020

और अब कोरोना लाने की
तोहमत भी मजदूरों पर ! 

अब एक-एक कर हर प्रदेश में यह माहौल बन रहा है कि लौट रहे प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना फैल रहा है। जो आंकड़े आ रहे हैं ये तो यही बता रहे हैं, और पहली नजर में यह तोहमत एकदम खरी लगती है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोग मुसीबत के हर मौके पर एक पसंदीदा निशाना तलाश लेते हैं। जब कोरोना दिल्ली से आगे बढऩा शुरू हुआ तो उस वक्त मानो तश्तरी पर पेश किया हुआ एकदम तर्क मिला कि दिल्ली में तब्लीगी जमात में गए हुए लोगों की वापिसी से कोरोना फैल रहा है, और वे सबके पसंदीदा निशाना बन गए। बात सही थी कि, धर्म के नाम पर ऐसी बेवकूफी करने वाले, विज्ञान को हिकारत से देखकर ऐसी भीड़ लगाने वाले लोगों को तोहमत तो मिलनी ही चाहिए। इसके पहले विदेश से लौटे हुए लोगों की बारी भी आई कि कोरोना तो इम्पोर्टेड बीमारी है, भारत में तो वह पहले थी नहीं, और पासपोर्ट वाले इसे बाहर से लेकर आए, और लाकर राशन कार्ड वालों को तोहफा दे दिया जिसे गरीब बीमारी और बेकारी, दोनों ही शक्लों में भुगत रहे हैं। 

अब मजदूर हैं निशाने पर कि मजदूरों के आने से कोरोना लौट रहा है, कोरोना आ रहा है, कोरोना छा रहा है। यह बात भी सच तो है ही क्योंकि अभी जो कोरोना पॉजीटिव मिल रहे हैं वे तकरीबन सारे के सारे लौटे हुए प्रवासी मजदूर ही हैं, इसलिए तोहमत तो उन्हीं पर आएगी। यहीं पर यह समझने की जरूरत है कि क्या मजदूर तब्लीगी जमात के लोगों सरीखे हैं? या क्या वे अपनी पसंद और मर्जी से विदेश जाने वाले लोगों सरीखे हैं? या उनका मामला कुछ अलग है? हिन्दुस्तानी मजदूर काम-धंधे से लगे हुए थे, और देश के हर विकसित, संपन्न, औद्योगिक, और कारोबारी प्रदेश में गरीब प्रदेशों से गए हुए करोड़ों मजदूर बदहाली में जीते हुए भी परिवार सहित पड़े हुए थे, कहीं गंदी बस्तियों में, तो कहीं कारखानों की कच्ची खोलियों में पड़े रहते थे। मजदूरी के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं था लेकिन बहुतों के साथ बीबी-बच्चे रह पाते थे, जो साथ रख नहीं पाते थे वे भी साल में एक बार घर लौटकर आते थे, बचत छोड़ जाते थे, और फिर से शहर लौटकर काम पर लग जाते थे। 

ऐसे मजदूरों के सिर पर ठीक आज ही के दिन दो महीने पहले बिजली गिरी, जब एक दिन का जनता कफ्र्यू लगा, और इसके तुरंत बाद लॉकडाऊन कर दिया गया। कारखाने बंद, धंधा बंद, किसी भी तरह का कारोबार बंद, इमारतों और घरों में कामवालों का जाना बंद, जाहिर है कि तनख्वाह या मजदूरी, या ठेके का हिसाब, ये सब भी साथ-साथ बंद हो गए, बकाया मिलना थम गया, महज भूख जारी रही, और दहशत बढ़ती चली गई, एक अनसुनी बीमारी की भी, और बेकारी की भी। इस देश में यह सवाल पूछना देश के साथ गद्दारी हो गया, आज भी है, कि आज करोड़ों मजदूरों के सैकड़ों मील के पैदल सफर से गांव पहुंच जाने के बाद भी करोड़ों मजदूर अभी गांव लौटने की कतार में क्यों लगे हैं? जो रेलगाडिय़ां डेढ़ महीना निकल जाने के बाद भी शुरू की गईं, वे रेलगाडिय़ां लॉकडाऊन के शुरूआत में ही क्यों शुरू नहीं की गईं, और क्यों मजदूरों को इस बदहाली से गुजरते हुए कोरोना का शिकार होने दिया गया? भूखों मरने दिया गया, लोकतंत्र पर से उनका विश्वास खत्म किया गया? इसके पीछे क्या वजह थी, इसका क्या फायदा था? सिवाय उन कारखानेदारों और कारोबारियों के, जिन्हें पहले दो हफ्ते का लॉकडाऊन खुलने के तुरंत बाद मजदूरों की जरूरत पडऩी थी, और मजदूरों के बिना जिनका धंधा चल नहीं  सकता था। ऐसे कारखानेदारों और कारोबारियों के अलावा मजदूरों को शहरों में बेबस बंदी बनाकर रख लेने में और किसका फायदा था? लेकिन यह सवाल भी पूछना आज देश के साथ गद्दारी करार दी जाएगी क्योंकि लोगों के पास अटकलों के ऐसे आंकड़े हैं कि अगर लॉकडाऊन उस वक्त नहीं किया जाता, तो देश कोरोना में डूब गया रहता। इन आंकड़ों पर कोई बात भी नहीं कर रहे हैं कि देश में कितने मजदूरों को कितने महीनों का काम खोकर, कितने महीनों की मजदूरी छोड़कर, कितने हफ्तों का पैदल सफर करके घर लौटना पड़ा, और उनके लिए अब वर्तमान क्या है, और भविष्य क्या है? देश के एक प्रमुख पत्रकार शेखर गुप्ता ने कुछ दिन पहले ट्वीट किया कि मजदूरों की तबाही और त्रासदी के इस दौर में क्या किसी को याद है कि इस देश का श्रम मंत्री कौन हैं? क्या श्रम मंत्री का कोई बयान आया? किसी फैसले में श्रम मंत्री का नाम भी आया? यह जिज्ञासा सही है क्योंकि आज यह लिखते हुए भी हमें खुद होकर यह याद नहीं पड़ रहा है कि देश का श्रम मंत्री कौन हैं? गूगल पर पल भर में पता चल जाएगा, लेकिन दो महीनों में मजदूरों पर दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी गुजर रही है, और देश का श्रम मंत्री नजरों से ओझल है, खबरों से ओझल है, अस्तित्वहीन है। 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रोज कमाने-खाने वाले, हर हफ्ते चुकारा पाने वाले मजदूरों को कोरोना पसंद था? आज अगर जो लौटकर गांव आ रहे हैं, और उनमें से कुछ कोरोना पॉजीटिव निकल रहे हैं, तो क्या इसके लिए वे जिम्मेदार हैं? या देश-प्रदेश की वे सरकारें जिम्मेदार हैं जो कि स्टेशनों और बस अड्डों पर, प्रदेश की सरहदों पर लाखों मजदूरों की भीड़ लगने दे रही हैं, क्योंकि उनके पास मजदूरों की घरवापिसी का कोई रास्ता नहीं है, और उनके रोजगार के शहरों में उनके जिंदा रहने का कोई इंतजाम भी न सरकारों के पास है, न शहरों के पास है। जिस केन्द्र सरकार ने अचानक यह लॉकडाऊन किया था, उसे मानो दस करोड़ से अधिक ऐसे मजदूरों के अस्तित्व का ही एहसास नहीं था। जैसे-जैसे लॉकडाऊन आगे बढ़ा, वैसे-वैसे सरकारों को दिखा कि अरे इस देश में मजदूर ही हैं। और फिर ऐसे मजदूरों को एक-एक कोठरी में पच्चीस-पचास लोगों के सोने पर मजबूर होना पड़ रहा था, कहीं दूध के टैंकर में एक पर एक लदकर, तो कहीं सीमेंट कांक्रीट मिक्सर में सीमेंट के घोल की तरह भरकर सफर करना पड़ा। एक-एक ट्रक पर सौ-सौ लोगों को एक-दूसरे पर चढ़े हुए सफर करना पड़ा, रास्ते में एक-एक सरहद की चेकपोस्ट पर हजारों को भीड़ की शक्ल में कतार में लगना पड़ा, राशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, पानी के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, वापिसी की ट्रेन के रजिस्ट्रेशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी। क्या यह सब कुछ मजदूरों की पसंद का था? जिन मालिकों ने इन मजदूरों को रखा था, वे चाहे कारोबारी हों, चाहे घरेलू हों, अगर वे इनको गुजारे के लायक मदद करते तो क्या ये मजदूर पूरे के पूरे ऐसी दहशत में गांव लौटते? जाहिर तौर पर सरकार, कारोबार, और परिवार, किसी ने भी अपने मजदूरों, कामगारों, और नौकरों का साथ नहीं दिया। उन्हें लौटने से रोकने के लिए मारा, सड़कों पर नाकाबंदी की ताकि उन्हें उनके ही प्रदेश में घुसने न मिले, नतीजा यह हुआ कि पटरियों पर कटते हुए भी ये मजदूर पटरी-पटरी गांव लौटे। क्या इसके लिए भी वे खुद जिम्मेदार थे? जो रेलागाडिय़ों आज दो महीने बाद चलाई जा रही हैं, क्या वे लॉकडाऊन के पहले के जनता कर्फ्यू के और पहले से नहीं चलाई जा सकती थीं? उस वक्त तो मजदूर बिना कोरोना लिए हुए भी लौट सकते थे क्योंकि कोरोना मोटेतौर पर विदेशों से लौटने वाले लोगों, उनके शहरों, और उनके प्रदेशों तक सीमित था। लेकिन लॉकडाऊन को दुनिया के इतिहास की सबसे कड़ी नागरिक-कार्रवाई साबित करने के लिए, ऐसा एक रिकॉर्ड बनाने के लिए उसे इस तरह थोपा गया कि छत वालों की तो छतों ने बोझ ले लिया, लेकिन बिना छत वाले या कच्ची छत वाले मजदूरों के कंधों और कमर को इस बोझ ने तोड़ दिया। ऐसे में जानवरों से बदतर हालत में ये इंसान जब घर लौट रहे हैं, तो शहरी-संपन्न मीडिया को वे कोरोना लेकर आते हुए दिख रहे हैं। कल तक जो मजदूर थे, मेहनतकश थे, वे आज मुजरिम भी ठहराए जा रहे हैं कि मानो वे अपनी पीठ पर अपने मां-बाप, विकलांग बच्चों, या गर्भवती पत्नी को ढोकर नहीं लाए, कोरोना ढोकर लाए हैं। 

ऑस्ट्रेलिया में अभी कुछ बरस पहले जब सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ कई दशक पहले तो अपने एक ऐतिहासिक जुर्म को कुबूल किया, तो वहां की संसद में आदिवासियों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित करके पूरी संसद ने खड़े होकर आदिवासियों से माफी मांगी थी। कायदे की बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की संसद में अगर धेले भर की भी शर्म हो, तो मजदूरों को संसद में आमंत्रित करके पूरी संसद को पूरे गैरमजदूर देश की तरफ से, खासकर देश-प्रदेश की सरकारों की तरफ से माफी मांगनी चाहिए कि इस आजाद हिन्दुस्तान में इन मजदूरों को नागरिक तो छोड़ इंसान भी नहीं माना गया था, और इसलिए यह लोकतंत्र चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहता है, और इसलिए देश के प्रतिनिधि के रूप में यह संसद सिर झुकाकर हाथ जोड़कर माफी मांगती है। 

जितने जानवरों का एक गाड़ी में लादकर ले जाना पशु प्रताडऩा कानून के तहत कैद का हकदार बनाता है, उससे कई गुना ज्यादा इंसानों को अपने सामान बेचकर भी ट्रकों में इस तरह लदकर जाना पड़ा, कि मानो वे हिन्दुस्तानी नागरिक न हों, किसी और देश से तस्करी से लाया गया नशा हों। धिक्कार के हकदार ऐसे लोकतंत्र में आज लौटे हुए मजदूरों को कोरोना लाने का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, ऐसा बेईमान, और ऐसा बेशर्म देश, खासकर इसका गैरमजदूर-तबका किसी अधिकार का हकदार नहीं है, धिक्कार का हकदार है। 

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22-May-2020

यह साफ है कि कोरोना
पूरी तरह मार्क्सवादी है...

बुरा वक्त बहुत सी अच्छी नसीहतें लेकर आता है, और बहुत सी नई संभावनाएं भी। इस बात को हमने इसी जगह कई मुद्दों को लेकर बार-बार लिखा है, और एक बार फिर इस पर लिखने का मौका आया है। आज कोरोना के खतरे को देखते हुए दुनिया के बहुत से देशों ने कुछ देशों की पहले शुरू की गई एक पहल को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है कि अपनी सबसे गरीब आबादी को एक न्यूनतम वेतन या भत्ता दिया जाए ताकि उसका जीवन स्तर सुधरे। एक-एक करके समझदार देश आगे बढ़ते जा रहे हैं, और यह बात सबको समझ में आ रही है कि देश के एक तबके को बहुत गरीबी में रखने का एक मतलब यह भी होता है कि उसे बीमारियों के खतरे में छोड़ देना, और फिर ऐसा नहीं है कि देश की गरीब आबादी किसी टापू पर रहती है, और उसकी बीमारी से बाकी लोगों को खतरा नहीं होगा। बाकियों को भी ऐसे गरीब और बीमार से खतरा रहेगा, और कोरोना जैसी अदृश्य बीमारी का खतरा तो कहीं नजर आता भी नहीं है, जब किसी के बदन में कोरोना घुस जाता है, संक्रमित कर चुका रहता है, तभी जाकर उसका पता लगता है। इसलिए यह बात साफ है कि जब तक दुनिया में आबादी का एक हिस्सा, जो कि हिन्दुस्तान में तकरीबन आधी आबादी है, वह खतरे में रहेगा तो बाकी आधी आबादी भी खतरे में रहेगी। हमने कुछ अरसा पहले इसी संदर्भ में पाकिस्तान के एक सबसे मशहूर शायर जॉन एलिया की लाईनें लिखी थीं- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..। 

यह बात अब सब पर लागू हो रही है, और बहस के लिए तो यह कहा जा सकता है कि गरीब तबका तो अमीर तबके के बिना जिंदा रह लेगा, लेकिन अमीर तबका गरीब नौकर-चाकर मिले बिना, कामगार मिले बिना जिंदा नहीं रहेगा। गरीबों ने तो पिछले दो महीनों में हिन्दुस्तान की सड़कों पर एक अंतहीन पैदल सफर करके दिखा दिया है कि वे तो जिंदगी की आंच में तपकर फौलाद बने हुए लोग हैं, यह अलग बात है कि अपने आलीशान घरों में बैठे संपन्न लोगों की जिंदगी मुश्किल हुई है। और फिर जिस तरह आज दुनिया के सबसे संपन्न और सबसे विकसित देशों में, न्यूयार्क जैसे सबसे अधिक चिकित्सा सुविधा वाले शहर में एक अकेले कोरोना के गिराए दिन भर में सैकड़ों लाशें गिरी हैं, उनको देखते हुए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह तो विज्ञान या कुदरत का एक नमूना है, ऐसे और भी नमूने आ सकते हैं, और सबसे संपन्न चिकित्सा सुविधा वाले देशों के रईस भी मारे जा सकते हैं। इसलिए आगे का रास्ता कुल एक है, धरती पर सहूलियतों की एक न्यूनतम बराबरी की गारंटी। 

ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स का मार्क्सवाद पूरी दुनिया में गिनी-चुनी जगहों पर कामयाब हुआ, और बचा हुआ है। बाकी जगहें या तो पूंजीवाद की गिरफ्त में हैं, या फिर पूंजीवाद को मर्जी से अपनाया हुआ है। ऐसे तमाम लोगों को इस एक कोरोना से यह बात समझ तो आ चुकी है कि जब तक पूरी आबादी खतरे के बाहर नहीं रहेगी कोई भी महफूज नहीं रहेंगे। अब देखना यह है कि यह ताजा-ताजा समझ कोरोना के रहते हुए जनकल्याण के फैसलों में तब्दील होती है, या फिर यह श्मशान वैराग्य की तरह तेरहवीं के पहले चल बसेगी, और एक बार फिर गरीब अपने हाल पर जीने, और मरने के लिए छोड़ दिए जाएंगे? ऐसा लगता है कि दुनिया के संपन्न, पूंजीवादी, और मार्क्सवाद-विरोधी तबकों के बीच भी उस बात को लेकर एक खलबली तो मची हुई है कि एयरकंडीशंड कमरों में अगर चैन से सोना है, तो गरीबों की झोपड़पट्टियों को भी कम से कम इंसानों के जीने लायक रिहायशी इलाकों में तब्दील करना होगा। अब यह बात सोची-विचारी तो जा रही है कि क्या हर गरीब को इलाज का एक हक देना तय नहीं किया गया, तो फिर दुनिया का कोई इलाज अमीरों को बचा भी नहीं सकेगा। अब यह बात सत्ता के बंद कमरों के टेबिलों पर तो है कि हर किसी को एक न्यूनतम आय दी जाए ताकि वे ठीक से जिंदा रह सकें, और वे कोरोना या अगली किसी बीमारी का डेरा न बनें।

लोगों को याद होगा कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उस वक्त नोबल पुरस्कार न पाए हुए अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी की सलाह पर चुनावी घोषणापत्र में एक न्याय योजना की घोषणा की थी जिसमें न्यूनतम आय योजना के अक्षरों से न्याय योजना नारा बनाया गया था, और पांच करोड़ परिवारों को साल में 72 हजार रूपए देने का वायदा किया गया था। यह देश की सबसे गरीब 20 फीसदी परिवार होते हैं, और कांग्रेस ने अभिजीत बैनर्जी की राय पर यह कार्यक्रम घोषणापत्र में जोड़ा था। कांग्रेस सत्ता में नहीं आई, और इस योजना की नौबत नहीं आई, इसलिए इसका नफा-नुकसान अभी गिन पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस साल भर में बाकी दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में बहुत से देशों ने न्यूनतम आय की ऐसी योजनाएं चालू की हैं, और समाज में उनका फायदा भी देखा है। 

एक दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के गरीब लोगों की तरफ तो नजरें गई ही हैं, उनसे भी अधिक बेजुबान जो जानवर हैं, उनकी तरफ भी नजर गई है। इंसान की नस्ल पैदा होने के बाद से पिछले दो महीने शायद पहले ऐसे रहे होंगे जब पशु-पक्षियों को, मछलियों को इतना कम खाया गया है। अब एक बात यह भी उठ रही है कि कुछ जानवरों से कोरोना और ऐसी दूसरी बड़ी बीमारियां शुरू हुई हैं तो क्या मांस खाना बंद कर दिया जाए, या कम कर दिया जाए? बेबस इंसानों की फिक्र के साथ-साथ अब खाए जाने वाले प्राणियों की भी एक फिक्र हो रही है कि किसी चमगादड़ की आह से अगर कोरोना शुरू हो सकता है तो इस नौबत से कैसे बचा जाए?

कोरोना ने पूंजीवाद, तानाशाह, और बाहुबली लोकतंत्र को उनकी औकात दिखा दी है। कोरोना जॉन एलिया के शेर को पढ़कर आया है, और उसी पर अमल करते हुए उसने यह नौबत खड़ी कर दी है कि सबको सबसे खतरा है। बड़े-बड़े घरों में काम न करने की आदी सेठानियों को बर्तन मांजने की नौबत इसी कोरोना ने ला दी है। इसी कोरोना ने कफन-दफन से लेकर अंतिम संस्कार, कपालक्रिया, और अस्थि विसर्जन जैसी सदियों की परंपराओं को तहस-नहस कर दिया है। आल-औलाद अपने मां-बाप का अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे हैं। श्मशान में एक के ऊपर एक इतने अंतिम संस्कारों की अस्थियां जमा हो रही हैं कि उनके बीच कोई चाहकर भी अपने पुरखे की अस्थियां छांट न सके। ऐसी दुनिया में आज रास्ता एक ही है कि सबसे कमजोर, सबसे बेबस, और सबसे वंचित इंसान को न्यूनतम आय और बराबरी की चिकित्सा दोनों मुहैया कराई जाए। अगर कोरोना दुनिया को इस तरफ आगे बढऩे के लिए मजबूर कर सकता है, तो हमारा ख्याल है कि कोरोना मार्क्सवादी है, और वह चीन की किसी प्रयोगशाला में न भी बना हो, वह एक वामपंथी विचारधारा लेकर आया है, और दुनिया में एक अभूतपूर्व बराबरी की संभावना भी लेकर आया है। एक वाक्य में कहें तो यूबीआई और यूएचएस की नौबत आ गई है। हमने इस भाषा में इसलिए लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ऐसी भाषा सुहाती है, वरना आम लोगों के समझने के लिए यह बताना जरूरी है कि यूनिवर्सल बेसिक इन्कम, और यूनिवर्सल हेल्थ सर्विस आज की जरूरत है, और जो अंग्रेजी के इतने शब्दों से सबक न ले सकें, उनके लिए तो जॉन एलिया ने लिखा ही था- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..। 

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21-May-2020

किसानों से भूपेश का वादा
पूरा, राजीव न्याय योजना..

भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शहादत के दिन छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों से विधानसभा चुनाव में किए अपने वायदे का आखिरी हिस्सा आज न्याय योजना के नाम से पूरा किया। लोगों को प्रधानमंत्री बनने के पहले की राजीव गांधी की छत्तीसगढ़ यात्राएं भी याद हैं। वे इंडियन एयरलाईंस के पायलट की हैसियत से कई बार उड़ान लेकर रायपुर आते थे, और उन्हें लोग इंदिरा गांधी के बेटे की तरह जानते थे। बाद में वे इंदिरा गांधी के रहते हुए ही कांग्रेस की राजनीति में आए और मजदूर दिवस पर भिलाई में उनका एक कार्यक्रम हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव और सोनिया अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट पहुंचे थे। आतंकी हमले में वे वक्त के पहले चले गए, और यह दिन भारत में आतंक के खिलाफ शपथ लेने का दिन माना जाता है। इस मौके पर आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने किसानों के साथ अपने वायदे का यह आखिरी हिस्सा पूरा किया है। विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने किसानों से 25 सौ रूपए क्विंटल पर धान लेने का वायदा किया था, जो कि सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार की आपत्ति की वजह से पूरा नहीं हो पाया था। धान को समर्थन मूल्य से अधिक पर खरीदने पर केन्द्र ने आपत्ति की थी, और यही वजह है कि सरकार अपनी एक दूसरी जेब से निकालकर बकाया पैसा किसानों को दे रही है। इसे राजीव गांधी किसान न्याय योजना नाम दिया गया है, और इसमें धान के बकाया भुगतान से परे भी कई पहलू जोड़े गए हैं। 

धान खरीदी के वक्त का बकाया 57 सौ करोड़ रूपया चार किस्तों में किसानों को मिलेगा, और आज पहली किस्त उनके खातों में चली गई। लेकिन धान के साथ-साथ मक्का और गन्ना के किसानों को भी इस योजना के फायदे में जोड़ा गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 लाख किसानों को इस योजना का फायदा मिलेगा। लोगों को याद होगा कि देश में जब आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने न्याय योजना नाम से गरीबों को सीधे फायदा देने की एक घोषणा की थी, लेकिन वह सरकार में नहीं आ पाई और योजना धरी रह गई। बाद में यह बात सामने आई कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के सुझाव पर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देश के पांच करोड़ परिवारों को 72 हजार रूपए सालाना की न्यूनतम आय सहायता देने का वादा किया था। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उसी योजना के नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ के गरीब किसानों की मदद करना तय किया है। कहने के लिए छत्तीसगढ़ के किसानों में कुछ फीसदी बड़े किसान भी हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर किसान छोटे हैं, और बहुत से तो ऐसे हैं जो दूसरे किसानों की जमीन लेकर उस पर आधी फसल के सौदे से खेती करते हैं। ऐसे अधिया-किसानों को सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि जमीनों के कागज उनके नाम पर नहीं रहते, और फसल के भुगतान से लेकर इस न्याय योजना की रकम तक सीधे भूस्वामी के खाते में पहुंचती है। पता नहीं सरकार की किसी योजना में ऐसे लोगों की जगह बन पाती है या नहीं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ की किसानी में लगे हुए तमाम लोगों की मदद अगर करनी है, तो यह भी समझना होगा कि खेतिहर मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो कि सरकार की किसी भी योजना के दायरे में नहीं आती है, और फायदों से अछूती रह जाती है। आज जब पूरा देश प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को पहली बार इस तरह देख रहा है तो यह भी समझने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के बाहर लाखों मजदूर जाते क्यों हैं? अगर यहीं पर उन्हें सरकारी कामों में पर्याप्त मजदूरी मिल जाती, या किसानी के काम से मजदूरी ठीक मिलती तो शायद ये लोग बाहर नहीं गए होते। खेती के कुछ जानकारों का यह मानना है कि नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ 2003 में जो समर्थन मूल्य दे रहा था, वह अब बढ़कर दोगुने के करीब हो गया है, लेकिन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी उस अनुपात में बिल्कुल नहीं बढ़ी है। चूंकि यह तबका असंगठित हैं, बिखरा हुआ है, इसके कुछ कामों को करने के लिए अब बड़ी-बड़ी मशीनों की शक्ल में विकल्प हैं, इसलिए इसकी जरूरतों को अधिक देखा नहीं जाता है। खेती से जुड़ी हुई कोई भी न्याय योजना खेतिहर मजदूरों के भले के बिना पूरी नहीं हो सकती, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी बिना अधिक जानकारी के इतना कहा जरूर है कि इसमें खेतिहर मजदूरों को जोड़ा जाएगा। 

छत्तीसगढ़ के किसान ही इस राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाते हैं। इनकी खेती को सिर्फ अधिक दाम पर खरीदना काफी नहीं है। उनकी खेती में ऐसे फेरबदल की कोशिश भी करनी चाहिए जिससे कि वह सरकारों की नीतियां बदलने पर भी अपने आपमें जिंदा रहने लायक हो सकें। हमने कुछ दिन पहले भी यहीं पर लिखा था कि बाहर से लौटकर आ रहे मजदूरों में से कुछ जरूर ऐसे होंगे जो कि अब वापिस जाना नहीं चाहेंगे। ये बाहर के अनुभव पाकर भी लौटे हैं, और इनका किसी हुनर का ज्ञान भी है। ऐसे में गांवों के लायक कुटीर उद्योग या फसलों के इस्तेमाल वाले छोटे उद्योग बढ़ाने चाहिए ताकि लोग बेबसी में प्रदेश के बाहर न जाएं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ सरकारी रियायत-मदद की मोहताज न हो। फिलहाल भूपेश सरकार के इस फैसले से किसानों को सही समय पर एक मदद मिल रही है, और फसल के इस मौसम में वह उत्पादक काम आ सकती है। 

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21-May-2020

किसानों से भूपेश का वादा
पूरा, राजीव न्याय योजना..

भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शहादत के दिन छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों से विधानसभा चुनाव में किए अपने वायदे का आखिरी हिस्सा आज न्याय योजना के नाम से पूरा किया। लोगों को प्रधानमंत्री बनने के पहले की राजीव गांधी की छत्तीसगढ़ यात्राएं भी याद हैं। वे इंडियन एयरलाईंस के पायलट की हैसियत से कई बार उड़ान लेकर रायपुर आते थे, और उन्हें लोग इंदिरा गांधी के बेटे की तरह जानते थे। बाद में वे इंदिरा गांधी के रहते हुए ही कांग्रेस की राजनीति में आए और मजदूर दिवस पर भिलाई में उनका एक कार्यक्रम हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव और सोनिया अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट पहुंचे थे। आतंकी हमले में वे वक्त के पहले चले गए, और यह दिन भारत में आतंक के खिलाफ शपथ लेने का दिन माना जाता है। इस मौके पर आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने किसानों के साथ अपने वायदे का यह आखिरी हिस्सा पूरा किया है। विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने किसानों से 25 सौ रूपए क्विंटल पर धान लेने का वायदा किया था, जो कि सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार की आपत्ति की वजह से पूरा नहीं हो पाया था। धान को समर्थन मूल्य से अधिक पर खरीदने पर केन्द्र ने आपत्ति की थी, और यही वजह है कि सरकार अपनी एक दूसरी जेब से निकालकर बकाया पैसा किसानों को दे रही है। इसे राजीव गांधी किसान न्याय योजना नाम दिया गया है, और इसमें धान के बकाया भुगतान से परे भी कई पहलू जोड़े गए हैं। 

धान खरीदी के वक्त का बकाया 57 सौ करोड़ रूपया चार किस्तों में किसानों को मिलेगा, और आज पहली किस्त उनके खातों में चली गई। लेकिन धान के साथ-साथ मक्का और गन्ना के किसानों को भी इस योजना के फायदे में जोड़ा गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 लाख किसानों को इस योजना का फायदा मिलेगा। लोगों को याद होगा कि देश में जब आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने न्याय योजना नाम से गरीबों को सीधे फायदा देने की एक घोषणा की थी, लेकिन वह सरकार में नहीं आ पाई और योजना धरी रह गई। बाद में यह बात सामने आई कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के सुझाव पर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देश के पांच करोड़ परिवारों को 72 हजार रूपए सालाना की न्यूनतम आय सहायता देने का वादा किया था। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उसी योजना के नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ के गरीब किसानों की मदद करना तय किया है। कहने के लिए छत्तीसगढ़ के किसानों में कुछ फीसदी बड़े किसान भी हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर किसान छोटे हैं, और बहुत से तो ऐसे हैं जो दूसरे किसानों की जमीन लेकर उस पर आधी फसल के सौदे से खेती करते हैं। ऐसे अधिया-किसानों को सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि जमीनों के कागज उनके नाम पर नहीं रहते, और फसल के भुगतान से लेकर इस न्याय योजना की रकम तक सीधे भूस्वामी के खाते में पहुंचती है। पता नहीं सरकार की किसी योजना में ऐसे लोगों की जगह बन पाती है या नहीं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ की किसानी में लगे हुए तमाम लोगों की मदद अगर करनी है, तो यह भी समझना होगा कि खेतिहर मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो कि सरकार की किसी भी योजना के दायरे में नहीं आती है, और फायदों से अछूती रह जाती है। आज जब पूरा देश प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को पहली बार इस तरह देख रहा है तो यह भी समझने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के बाहर लाखों मजदूर जाते क्यों हैं? अगर यहीं पर उन्हें सरकारी कामों में पर्याप्त मजदूरी मिल जाती, या किसानी के काम से मजदूरी ठीक मिलती तो शायद ये लोग बाहर नहीं गए होते। खेती के कुछ जानकारों का यह मानना है कि नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ 2003 में जो समर्थन मूल्य दे रहा था, वह अब बढ़कर दोगुने के करीब हो गया है, लेकिन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी उस अनुपात में बिल्कुल नहीं बढ़ी है। चूंकि यह तबका असंगठित हैं, बिखरा हुआ है, इसके कुछ कामों को करने के लिए अब बड़ी-बड़ी मशीनों की शक्ल में विकल्प हैं, इसलिए इसकी जरूरतों को अधिक देखा नहीं जाता है। खेती से जुड़ी हुई कोई भी न्याय योजना खेतिहर मजदूरों के भले के बिना पूरी नहीं हो सकती, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी बिना अधिक जानकारी के इतना कहा जरूर है कि इसमें खेतिहर मजदूरों को जोड़ा जाएगा। 

छत्तीसगढ़ के किसान ही इस राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाते हैं। इनकी खेती को सिर्फ अधिक दाम पर खरीदना काफी नहीं है। उनकी खेती में ऐसे फेरबदल की कोशिश भी करनी चाहिए जिससे कि वह सरकारों की नीतियां बदलने पर भी अपने आपमें जिंदा रहने लायक हो सकें। हमने कुछ दिन पहले भी यहीं पर लिखा था कि बाहर से लौटकर आ रहे मजदूरों में से कुछ जरूर ऐसे होंगे जो कि अब वापिस जाना नहीं चाहेंगे। ये बाहर के अनुभव पाकर भी लौटे हैं, और इनका किसी हुनर का ज्ञान भी है। ऐसे में गांवों के लायक कुटीर उद्योग या फसलों के इस्तेमाल वाले छोटे उद्योग बढ़ाने चाहिए ताकि लोग बेबसी में प्रदेश के बाहर न जाएं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ सरकारी रियायत-मदद की मोहताज न हो। फिलहाल भूपेश सरकार के इस फैसले से किसानों को सही समय पर एक मदद मिल रही है, और फसल के इस मौसम में वह उत्पादक काम आ सकती है। 

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20-May-2020

एक कतरा सच, सच तो है, 
पर वह पूरा सच न भी हो..

जब कोई बड़ी त्रासदी होती है, तो उसके बहुत से शिकार होते हैं जिनमें से एक मीडिया भी होता है। भोपाल गैस त्रासदी हो, 1984 के दंगे हों, 2002 के गुजरात दंगे हों, या अभी लॉकडाऊन हो, ऐसी व्यापक त्रासदी पर लिखना आसान नहीं होता। किसी किताब के लेखक के लिए तो इनमें से किसी पर भी लिखना बहुत मुश्किल नहीं होता है क्योंकि इनकी रिपोर्टिंग के गट्ठे मौजूद रहते हैं, जिन्हें पढ़कर रिसर्च किया जा सकता है, और लिखा जा सकता है। लेकिन जब ये घटनाएं होती हैं, खासकर व्यापक त्रासदी से भरी ऐसी घटनाएं जिनमें लाखों लोग प्रभावित हैं, और किसी भी मीडियाकर्मी के लिए उनमें से बस कुछ गिने-चुने लोगों से बातचीत मुमकिन रहती है। ऐसी रिपोर्टिंग अगर महज तथ्यों पर आधारित एक सीमित रिपोर्टिंग है, तब तो ठीक है, लेकिन ऐसे सीमित तथ्यों पर आधारित किसी विश्लेषण से पत्रकारिता का कोई निष्कर्ष भी निकाला जा रहा है तो खतरा वहां से शुरू होता है। 

अंग्रेजी में ऐसे संदर्भ में एक लाईन कही जा सकती है, एनेकडोटल रिपोर्टिंग, या एनेकडोटल विचार-लेखन। इसका मतलब कुछ चुनिंदा मामलों को लेकर एक व्यापक निष्कर्ष निकालने जैसा काम। होता यह है कि ऐसी विशाल, विकराल, और बड़े पैमाने की त्रासदी के कुछ कतरे जब लोगों के सामने आते हैं तो लोग उन्हीं को सब कुछ मान बैठते हैं। अब जैसे आज के लॉकडाऊन को ही लें, तो किसी एक शहर से मानो रोज सौ बसों में लोगों को भेजा जा रहा है, सौ-दो सौ ट्रकों पर भी चढ़ाया जा रहा है जो कि बहुत कानूनी बात तो नहीं है, लेकिन लोगों को जल्द से जल्द उनके गृह प्रदेश, और उनके गांव तक पहुंचाने की नीयत से, या फिर अपने प्रदेश से बला टालने की नीयत से, जो भी बात हो, लोगों को आज देश भर में ट्रकों पर भी चढ़ाकर भेजा जा रहा है, और जो प्रदेश जितनी दिलचस्पी ले रहे हैं, जिसकी जितनी क्षमता है, उतनी बसों में भी भेजा जा रहा है। ऐसे में किसी भी वक्त वहां पहुंचने वाले रिपोर्टर-फोटोग्राफर को, सामाजिक कार्यकर्ता को, या कि आम लोगों को कई तरह के नतीजे निकालने का मौका मिल सकता है। बसों में जा चुके 4 हजार लोग तो नजरों से दूर जा चुके हैं, लेकिन जो 4 सौ लोग बाकी हैं, उन 4 सौ में से 40 लोगों का रोना, और सचमुच की तकलीफ से रोना, सामने मौजूद रह जाता है। इसलिए मीडिया में भी ऐसी ही कहानियां अधिक आती हैं, और चूंकि चौबीसों घंटे ये घटनाएं चल रही हैं इसलिए यह समझ पाना कुछ मुश्किल रहता है कि अनुपात क्या है। तस्वीर अनुपातहीन ढंग से अधिक नकारात्मक, या अनुपातहीन अधिक सकारात्मक दिख सकती है। जब तस्वीर ऐसी दिखेगी तो उस पर आधारित नतीजे भी उससे प्रभावित होंगे। 

हम आज हिन्दुस्तान को एक देश मानकर कम से कम दो दर्जन राज्यों में बिखरी दुख-तकलीफ की हजारों कहानियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाल रहे हैं वह निर्विवाद रूप से घनघोर सरकारी नाकामयाबी का, और अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी का है। लेकिन यह नतीजा निकालना कम कहानियों के आधार पर नहीं हो सकता था, न ही कुछ सीमित प्रदेशों की ऐसी हालत को एक राष्ट्रीय त्रासदी कहा जा सकता था। आज जब निर्विवाद रूप से यह नौबत दिखाई पड़ रही है कि देश में बेदखली से तकलीफ ही तकलीफ है, और देश की तैयारी करोड़ों लोगों को तकलीफ में डालने के पहले शून्य थी, इस बेदखली का या तो अंदाज नहीं था, और या अंदाज था तो उसके मुताबिक तैयारी शून्य थी। लेकिन ऐसे नतीजे पूरी तरह से एकतरफा त्रासदी के नजारों से आसान हो जाते हैं। अगर यह तस्वीर मिलीजुली होती, तो यह आसान नहीं होता। इसलिए जब किसी प्रदेश में, किसी शहर में, किसी एक क्वारंटीन सेंटर में हो रही घटनाओं को व्यापक तस्वीर का एक छोटा हिस्सा मानने के बजाय व्यापक तस्वीर मानकर उसे ही सब कुछ गिन लिया जाता है, तो निष्कर्ष बहुत गलत साबित होते हैं। 

दिक्कत यह है कि अखबारनवीसी में जितने शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है, उससे गुजरे बिना भी अखबारों में लिखने का हक मिल जाने भर से लोग विश्लेषक भी हो जाते हैं, और विचार लेखक भी। उनके निष्कर्षों की बुनियाद न गहरी होती है, न ही पर्याप्त चौड़ी होती है। ऐसे में वह उथली जमीन पर खड़ा हुआ एक ऐसा निष्कर्ष रहता है जो कि विपरीत तथ्यों से पल भर में धड़ाम हो सकता है, हो जाता है। अब बात जब अखबारों से बढ़कर टीवी और ऑनलाईन मीडिया तक आती है, तब तो बुनियाद इतनी भी गहरी नहीं बचती, इतनी भी चौड़ी नहीं बचती। कई बार तो इन नए मीडिया में निष्कर्ष जमीन पर ही टिके हुए नहीं होते, हवा में तैरते होते हैं। ऐसे में जब इनको कुछ बिखरी हुई खुशियां दिख जाती हैं, या कुछ बिखरे हुए दुख दिख जाते हैं, तो उन्हें ही सब कुछ मान लेने, और सब कुछ को वैसा ही मान लेने का एक बड़ा खतरा हाल के बरसों में मीडिया में हो गया है। 

अपने देखे को सच मान लेने तक तो ठीक है, क्योंकि इससे बड़ा सच और क्या हो सकता है, लेकिन आज बहुत से लोग ऐसे व्यापक और जटिल मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हुए अच्छी या बुरी नीयत से, जैसा भी हो, एक यह बड़ी चूक कर रहे हैं कि वे अपने देखे हुए को ही संपूर्ण सत्य मान रहे हैं। उनकी बात में बार-बार अपने देखे का दंभ एक आत्मविश्वास और एक सुबूत की तरह सामने आता है। उनका देखा सच है, लेकिन हर सच सम्पूर्ण सत्य नहीं होता। सच का एक कतरा किसी संदर्भ से परे उठाकर दुनिया के महानतम व्यक्ति को निष्कृष्टतम साबित करने का हथियार बन सकता है। किसी बहुत ही अप्रत्याशित और जटिल खतरे के बीच बड़े से बड़ा इंतजाम भी बड़ी आसानी से नाकाफी साबित किया जा सकता है, और कुछ छोटी-छोटी मिसालों को देकर, लोगों के कहे हुए सच को एक सम्पूर्ण सत्य की तरह पेश करके उन्हें काफी और कामयाब भी साबित किया जा सकता है। एनेकडोटल रिपोर्टिंग ऐसी ही होती है जिनमें लोग किसी एक मामले, अपनी देखी हुई किसी एक घटना, अपने को सुनाई पड़े किसी एक बयान पर आधारित एक व्यापक निष्कर्ष निकाल लेते हैं। 

अखबारनवीसी आसान काम नहीं है। एक तो इसकी शुरूआत में ही एक शब्द से बड़ी गलतफहमी पैदा होती है। पब्लिक इंटरेस्ट। इन शब्दों के दो मायने होते हैं, जनहित में क्या है, और जनरूचि का क्या है। अब इन दोनों के बीच फासले को समझना तो आसान है, लेकिन जब न समझना नीयत हो, तो इन दोनों में घालमेल उससे भी ज्यादा आसान है। किसी बात को जनरूचि का बनाने के लिए उसे जनहित का साबित करना जरा भी मुश्किल नहीं रहता। और खासकर ऐसे वक्त जब एक कतरा सच का सहारा भी मिला हुआ हो, जो कि व्यापक सच बिल्कुल भी न हो, लेकिन एक कतरा सच जरूर हो। आज मीडिया में अखबारनवीसी के दौर की गंभीरता और ईमानदारी दोनों ही चल बसे हैं। फिर भी अखबारों से परे की मीडिया की एक मौजूदगी एक हकीकत है जिसे अनदेखा करना मुमकिन नहीं है। लेकिन ऐसे में यह भी याद रखना चाहिए कि जो मीडिया हर पल की हड़बड़ी में हो, उसके पास चौबीस घंटों में एक बार छपने वाले अखबारों जितना न सब्र हो सकता, न ही चीजों को कुछ घंटों के व्यापक कैनवास पर देखने जितनी समझ ही हो सकती। यह वक्त जिस किस्म की आपाधापी का है, जिस किस्म से न्यूजब्रेक करने का है, जिस किस्म से सिर्फ और सिर्फ सबसे पहले रहने के दुराग्रह का है, उस वक्त में विश्लेषक और विचार-लेखक भी धैर्य खो चुके हैं। अब साप्ताहिक कॉलम जैसी कोई बात किसी को नहीं सुहाती। आमतौर पर तो जब घटना घटती रहती है, तो उसे टीवी पर तैरते देखकर, या इंटरनेट पर उसकी पल-पल जानकारी पाकर उस पर विचार लिखना भी शुरू हो जाता है। कई बार हम भी ऐसा करते हैं, और उसके खतरों को झेलते भी हैं। तैरती हुई घटनाओं पर निष्कर्ष और विचार लिखते हुए साल में एकाध मौका ऐसा भी आता है कि वे तथ्य जो कि लिखते वक्त तथ्य थे, वे बाद में जाकर गलत साबित होते हैं। इसलिए आज जब सदी की एक सबसे महान त्रासदी पर लिखने की बात आती है, तो दो चेहरों की मुस्कुराहट, और चार चेहरों पर आंसू को आधार बनाना ठीक नहीं है। कोई निष्कर्ष निकालने के पहले ठीक उसी तरह पूरी तस्वीर को कुछ दूर हटकर, कुछ ऊपर जाकर एक व्यापक नजर से देखना चाहिए जिस तरह शवासन करने वालों को सिखाया जाता है कि ऐसी कल्पना करें कि वे ऊपर से अपने खुद के शरीर को देख रहे हैं। जो मीडिया में हड़बड़ी में ताजा घटनाओं को दर्ज कर रहे हैं, वे जब तक शवासन की तरह ऊपर उठकर व्यापक नजरिए से देख न सकें, तब तक उन्हें अपने देखे हुए को सच मानने के बजाय सच का एक कतरा मानना चाहिए, अपना देखा हुआ। और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि सच के ऐसे और भी बहुत से कतरे हो सकते हैं जो कि उनके अनदेखे हों, और जो नतीजों को पूरी तरह बदलने की ताकत रखते हों। क्या ऐसे व्यापक नजरिए की मेहनत करने के लिए मीडिया के लोग तैयार हैं? या क्या ऐसी मेहनत की पाठक, दर्शक, श्रोता में कोई कद्र है?

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19-May-2020

बड़ा कड़ा वक्त कल्पनाओं को
बड़ा भी कर जाता है, सोचें..

चूंकि कोरोना को कुछ खाना-पीना नहीं पड़ता है, और उसके दूसरे खर्च भी नहीं हैं, इसलिए वह तो आसानी से जिंदा है, लेकिन इंसानों को उसके साथ जिंदा रहना पड़ रहा है, और उसके साथ जिंदा रहना खासा भारी भी पड़ रहा है। रोजगार चले गए हैं और खर्च तकरीबन वैसे ही कायम हंै। ऐसे में कमाई के नए रास्ते ढूंढना जरूरी है, और खर्च में खासी कटौती करना भी जरूरी है। कंपनियां और छोटे मालिक सभी लोग तनख्वाह घटाते चल रहे हैं, और नौकरियां भी, इसलिए लोगों को जिंदा रहने के नए रास्ते ढूंढने होंगे। 

अभी कुछ दिन पहले एक कंपनी ने ऐसे मास्क बाजार में उतारे हैं जिनमें तरह-तरह के दिलचस्प वाक्य लिखे हुए हैं। अभी एक अलग तस्वीर देखने में आई जिसमें बिहार के लोक कलाकार फेस मास्क पर कलाकारी दिखा रहे हैं, और एक साधारण सा अटपटा लगने वाला मास्क भी खूबसूरत हुए जा रहा है। हमें अधिक वक्त नहीं दिखता कि हाथ के बुने हुए, हाथ के छपे हुए कपड़ों से पोशाकें बनाने वाली देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाकी कपड़ों के साथ-साथ मैचिंग-मास्क मुफ्त देने लगें, या कपड़ों की कतरनों से अलग से भी मास्क बनाने लगेंं। यह संकट एक अवसर लेकर भी आया है कि हर राज्य अपने हस्तशिल्पियों, बुनकरों को लगाकर अब नई जरूरतों के मुताबिक हस्तकला की संभावनाएं देखें। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ की गुदना कला (टैटू) को हाल के बरसों में बदन से उतरकर कपड़ों में भी आते देखा गया है, और अब लोक कलाकार बिल्कुल बदन के टैटू की तरह कपड़ों पर वैसी ही पक्की काली स्याही से टैटू जैसी कलाकृतियां बनाने लगे हैं। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है, और ऐसे में हस्तशिल्प एक सबसे ही गैरजरूरी सामान हैं जिसे कि लोग महज शौक के लिए लेते हैं। ऐसे में अगर फेस मास्क को लोककला से जोड़ा जाए, तो एक नई संभावना निकलती है। 

इसी तरह डिजाइनरों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या कमर में बांधे जाने वाले ऐसे कुछ पट्टे फैशन में आ सकते हैं जिनमें मोबाइल भी रखा जा सके, और जिनमें लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर की जगह भी हो? आमतौर पर विदेशी सैलानी कमर में ऐसे बेल्ट लगाए रहते हैं जिनमें चेन के भीतर ऐसी छोटी-मोटी चीजें रखी जाती हैं। ऐसे बेल्ट अगर लोक कलाकारों से स्थानीय कलाकृतियों के साथ बनवाए जा सकें, तो आने वाला वक्त उनका ग्राहक हो सकता है। अपने सामानों को संक्रमण से बचाने के लिए, और सफाई की जरूरी छोटी बोतलें रखने के लिए ऐसे बेल्ट का फैशन आ सकता है, या लाया जाना चाहिए क्योंकि अब मोबाइल फोन को भी हर जगह मेज पर रखना खतरनाक ही कहलाएगा। देश-प्रदेश के कारोबारियों, सरकार के संबंधित अधिकारियों, और डिजाइनिंग के छात्र-छात्राओं को ऐसे प्रयोग करने चाहिए। 

यह मौका ऐसी कल्पनाओं के चैरिटी में भी इस्तेमाल करने का है। आज जब देश के धर्मस्थलों में भी तनख्वाह देने लायक कमाई नहीं बची है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारों से लेकर क्रिकेट खिलाडिय़ों तक, सब खाली बैठे हैं, तो ऐसे समाजसेवी संगठन जिनको दान की जरूरत है, वे मशहूर लोगों से संपर्क कर सकते हैं, और अमिताभ बच्चन के दस्तखत वाले फेस मास्क, या सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली के ऑटोग्राफ वाले फेस मास्क लाखों रूपए कमा सकते हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब किसी पहाड़ी पर कोई विमान गिर जाता है, और कई दिनों तक कोई बचाव दल नहीं रहता, तो लोग उन पहाडिय़ों पर ही किसी तरह जिंदा रहना सीखने लगते हैं, और जिंदा रहने की चाह उन्हें बहुत कल्पनाशील बना देती है। वे पेड़ों के पत्तों पर जमीं ओस की बूंदों से पीने के लिए पानी जुटा लेते हैं, वे चकमक पत्थरों से आग सुलगा लेते हैं, और कुछ फिल्में ऐसी भी आई हैं जिनमें किसी टापू पर अकेले फंस गए इंसान के जिंदा रहने के संघर्ष की कहानी है। आज तमाम लोगों को ऐसा कल्पनाशील होना पड़ेगा। 

आज जब देश भर में स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई बुरी तरह पिछड़ गई है, बहुत से छोटे स्कूल-कॉलेज बंद भी होने की नौबत आ गई है, तो उस वक्त एक नई संभावना यह निकलती है कि संपन्न मां-बाप अपने बच्चों की पिछड़ गई पढ़ाई की भरपाई के लिए उनकी ट्यूशन लगवाएं, और बहुत से नौजवानों को, शिक्षकों को ऐसा रोजगार मिल सकता है। आज कोरोना जैसा खतरा अगर लंबा जारी रहा, स्कूल-कॉलेज बंद रहे, तो मां-बाप बच्चों को किसी कोचिंग क्लास भेजने के बजाय अपनी संपन्नता के मुताबिक बच्चों के लिए घर पर ही ट्यूशन लगवा सकते हैं। लोगों को काम की ऐसी संभावना के बारे में जरूर सोचना चाहिए, और अपनी शैक्षणिक योग्यता, अपने तजुर्बे के आधार पर अपना बायोडेटा बनाकर तैयार रखना चाहिए, एक प्रभावशाली संदेश बनाकर सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर भेजना भी चाहिए कि वे किस तरह के काम के लिए उपलब्ध हैं। हमारा अंदाज है कि छात्र-छात्राओं वाले हर संपन्न परिवार में किसी न किसी शिक्षक या ट्यूटर की कई महीनों की संभावना निकल सकती है। और लोगों को यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि जब ऐसा कोई काम बहुत अच्छे से किया जाता है तो लोग उन सेवाओं को लंबे समय तक जारी रखते हैं। 

कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए कई किस्म के कलाकार, या दूसरे किस्म के प्रशिक्षक भी अपने-अपने हुनर की वीडियो क्लास ले सकते हैं, और रायपुर में ही एक पेशेवर शिक्षिका स्कूल जाने से पहले की उम्र वाले बच्चों के लिए ऐसी वीडियो क्लास लेना ने शुरू भी कर दिया है। कहते हैं कि ऊपर वाला एक दरवाजा बंद करता है, तो दूसरा खोल देता है। फिलहाल तो कोरोना से डरे-सहमे उस ऊपर वाले का तो पता-ठिकाना नहीं लगता है, लेकिन लोग खुद अपने लिए नई संभावनाएं तलाश सकते हैं। आज का वक्त ऐसा है जब बहुत सारे संपन्न लोग डिप्रेशन से भी गुजर रहे हैं, और ऐसे में उन्हें पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। मनोविज्ञान के जानकार और प्रशिक्षक ऐसा नया काम पा सकते हैं। सरकारों को चाहिए कि वे मौलिक सूझबूझ वाले जानकार और कल्पनाशील लोगों को लगाकर ऐसी संभावनाओं पर एक पर्चा तैयार करवाए, और इन नई संभावनाओं को स्किल डेवलपमेंट जैसी योजना से जोड़े ताकि समाज की एक नई जरूरत पूरी हो सके। 

आज भी लोगों के घरों में जाकर दीमक का इलाज और दीमक से बचाव करने वाले लोगों का एक बड़ा कारोबार है। अब तक कई होशियार लोग घरों को वायरस और बैक्टीरिया से मुक्त कराने के कारोबार की योजना बना चुके होंगे, वह एक नई संभावना है, और उसमें कारोबार के अलावा प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत भी होगी, और लोगों को ऐसे नए कारोबार की भी सोचना चाहिए। जिस तरह आज हर चौराहे पर मोबाइल फोन के कवर, या नए सिमकार्ड बेचने वाले लोग छाता लगाकर बैठे रहते हैं, उस तरह से लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर बेचने वाले लोग भी रह सकते हैं, और ऐसे फुटपाथी हैंडवॉश करवाने वाले लोग भी रह सकते हैं जो लिक्विड सोप और सेनेटाइजर से आपके हाथ साफ करवाकर एक-दो रूपए ले सकें। ऐसे नए कारोबार, ऐसे नए पोर्टेबल सिंक के बारे में भी जरूर सोचना चाहिए क्योंकि कई किस्म की भीड़ भरी जगहों से धक्का खाकर निकलने के बाद हो सकता है कि लोग एक रूपए में हाथ साफ करवाना चाहें। चूंकि लोगों के मुंह अब आमतौर पर ढके रहेंगे, इसलिए वे ऐसे टी-शर्ट भी पहन सकते हैं जो आगे-पीछे पूरे इश्तहार छपे हुए हों, और उन्हें मुफ्त में मिल जाएं, या साथ में कुछ पैसे भी मिल जाएं। 

हमने यहां पर सिर्फ कुछ मिसालें सामने रखी हैं। सरकार में स्किल डेवलपमेंट से जुड़े लोग, बाजार में व्यापारियों के संगठन, और जनता के बीच तरह-तरह के सामाजिक संगठन आने वाली अर्थव्यवस्था में लोगों के जिंदा रहने के लिए ऐसी तरकीबें सोच सकते हैं, उनकी बुनियाद पर योजनाएं बना सकते हैं। खुद बेरोजगारों को आपस में ऐसी वीडियो चैट करनी चाहिए, या डिस्कशन-ग्रुप बनाकर ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए। वक्त जब अधिक कड़ा होता है तो वह कल्पनाओं को अधिक बड़ा भी कर जाता है। हम तो अखबार के एक कमरे में कैद रहकर, बिना बेरोजगारी के कुछ कल्पनाएं कर पा रहे हैं, लेकिन असल जिंदगी में संघर्ष करते लोग, असल जिंदगी में कारोबार खोते हुए लोग अधिक दूर तक कल्पना कर सकते हैं। अगर आप इसमें लेट होंगे, तो आपके ही इलाके की लोककला छपा हुआ फेस मास्क चीन से आकर आपके गांव-मोहल्ले में बिकने लगेगा, फिर उसके बहिष्कार की बात से कुछ हासिल नहीं होगा।  

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18-May-2020

ये तस्वीर देखकर भी सरकारें नहीं लजाएंगी जानता हूँ। ये दो गरीब बच्चे नंगे पांव गरीब भूखों को खाना बांट रहे हैं। उचेहरा (मध्यप्रदेश) रेलवे क्रॉसिंग पर रूकी गाडिय़ों व पैदल जाते प्रवासी मजदूरों को भोजन के पैकेट बांटते ये दो बच्चे भूखे राहगीरों से कुछ यूं पूछते हैं- खाना चाहिए जी? कुछ खा लीजिए, पैसे नहीं लगेंगे!
-तस्वीर और टिप्पणी सुशील मानव ने फेसबुक पर पेश की

कम से कम उन्हें देखकर ही 
और लोग कुछ सीख जाएं

हमारे आसपास और दूसरी जगहों पर लोगों की मदद करने के लिए बाहर निकले हुए लोगों की तारीफ में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं। लेकिन मुसीबत और खतरे की ऐसी घड़ी में अगर तारीफ के लायक कुछ बातों का दुबारा भी जिक्र हो जाए तो क्या हर्ज है? आज सुबह छत्तीसगढ़ के रायपुर में मंजीत कौर बल नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि जिन कॉलोनियों या इमारतों में लोगों के पास पानी की खाली बोतलें हों वे 20 बोतलों में पानी भरकर इन नंबरों पर फोन करें, तो बोतलें ले जाकर शहर के सिरे पर मजदूरों के जमघट को दे दी जाएंगी ताकि आगे के सफर में उनके पास पानी रहे, और बोतल रहे। पानी की खाली बोतलें हर संपन्न परिवार में एक बोझ होती हैं, लेकिन खाते-पीते परिवारों के कई नौजवान, कई आदमी, कई महिलाएं, और कई बुजुर्ग रात-दिन मजबूर-मजदूरों के लिए इस कदर लगे हुए हैं कि मानो उनके अपने घर में आग लगी है। भोपाल में एक अधेड़ या बुजुर्ग दिखतीं लेखिका तेजी ग्रोवर रात-दिन छत्तीसगढ़ के मजदूरों के लिए लगी हुई हैं कि उन्हें खाना पहुंच जाए, अनाज पहुंच जाए, वे पैदल छत्तीसगढ़ रवाना न हों, वे पागलों की तरह सोशल मीडिया पर मदद की अपील करती हैं, मदद जुटाती हैं, और अपने परिचितों को लेकर हर किस्म के इंतजाम में लगी हुई हैं। इस मुद्दे पर आज लिखना दो बातों से सूझा है जिसमें से एक 20 मिनट पहले तेजी ग्रोवर का फेसबुक पोस्ट है कि गाजियाबाद के दोस्तों तुरंत संपर्क करो, हम लोग छत्तीसगढ़ के मजदूरों के एक समूह को वहां रोकने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पैदल रवाना न हों, उनके लिए गाड़ी का इंतजाम कर रहे हैं। उसके पहले उन्होंने अपने किसी परिचित का नाम लेकर लिखा कि तुरंत संपर्क करो, छत्तीसगढ़ के मजदूर विजय नगर चौराहे पर हैं, और उन्हें पैदल वापिस नहीं आने देना है, उनके लिए इंतजाम कर रहे हैं। लेकिन इससे इन कोशिशों से कुछ अधिक विचलित करने वाली एक तस्वीर मध्यप्रदेश की है जिसमें ऊचेहरा नाम की जगह पर दो गरीब बच्चे नंगे पांव सड़क के बीच खड़े हैं और आते-जाते मजदूरों को पूछ-पूछकर खाने के पैकेट बांट रहे हैं, और बता भी रहे हैं कि पैसे नहीं लगेंगे। 

एक तरफ रायपुर में एक महिला शाम सात से रात दो तक मजदूरों के जमघट के बीच इंतजाम में लगी है, अपने तमाम परिचितों को झोंककर रखा है, विचलित होकर कभी सरकार के खिलाफ लिख रही है, तो कभी सरकार के अच्छे काम की तारीफ में लग जाती है। कुल मिलाकर वह पल-पल इन मजदूरों की मदद करने में लगी है जिनकी मदद इस देश की सरकारें ठीक से नहीं कर पा रहीं, लोकतंत्र बिल्कुल नहीं कर पा रहा है। ऐसी कहानियां जगह-जगह है। कृष्ण कांत नाम के एक पत्रकार ने दो-तीन दिन पहले की एक तस्वीर पर दर्द के साथ लिखा है कि किस तरह सूरत से उत्तरप्रदेश रवाना हुए दो कपड़ा-मजदूर रास्ते में एक की तबियत बिगडऩे पर एक साथ उतर गए। बाकी मजदूरों ने साथ नहीं दिया, और वे ट्रक में आगे बढ़ गए। दोस्त की मदद करते हुए अस्पताल ले जाकर तमाम कोशिशों के बावजूद जब वह मर गया, तो उस हिन्दू नौजवान के साथ सिर्फ उसका वह मुस्लिम दोस्त मौजूद था। 

यह सब जिस वक्त हो रहा है उस वक्त उत्तरप्रदेश में थानेदार नोटिस जारी करके सड़क के किनारे के घरवालों को लिख रहा है- एक नोटिस जारी कर रही है सड़क किनारे के कई घरवालों को लिखा गया है- प्राय: देखने में आ रहा है कि आपके द्वारा पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों को अपने आवास के सामने रोक लिया जाता है। इस आशय की गोपनीय जानकारी प्राप्त हुई है कि आपके द्वारा रास्ते में मजदूरों को अपने आवास पर खाने-पीने की वस्तुओं की लालच देकर बुलाया जाता है। इससे कोविड-19 के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। आप सचेत हों, भविष्य में आपके द्वारा इस प्रकार करने पर महामारी अधिनियम के अनुसार आपके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाएगी। 

अब सवाल यह है कि राह चलते मजदूरों को कोई क्या लालच देकर अपने घर बुला लेंगे, और उन्हें खिला-पिलाकर उनसे क्या हासिल कर लेंगे? उनके पास मेहनत से कमाया हुआ टूटा-फूटा, फटा-पुराना जो कुछ था, वह सब तो पूंजीवाद, लोकतंत्र और सरकार ने मिलकर पूरी तरह लूटा हुआ है, उनके पास से लूटने के लिए अब और क्या निकल सकता है? अगर हजार मील के सफर पर चलते मजदूर परिवारों कोई रोककर खाना खिला रहे हैं, कुछ पल बैठने की जगह दे रहे हैं, तो उस पर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार की पुलिस का यह रूख है! यह हाल तब है जब सरकारों ने अधिकतर जगहों पर लोगों को ठीक उसी तरह बेसहारा छोड़ दिया है जिस तरह आमतौर पर गाय-बकरियों के मालिक उन्हें घूरों पर खाने के लिए छोड़ देते हैं। इन मजदूरों की ऐसी हालत के बीच भी अगर आम लोगों के बीच से निकलकर महान लोग सामने आ रहे हैं, और अपनी महानता की कोई तस्वीर छपवाने नहीं आ रहे, तो उस बीच सरकारों में जो संवेदनशीलता होनी चाहिए, वह कम से कम उत्तरप्रदेश सरकार के इस नोटिस में तो नहीं है।

लेकिन आज देश भर में जगह-जगह जिस तरह बिना किसी प्रचार के लालच के लोग खतरे में पड़कर भी लोगों की मदद करने में रात-दिन लगे हैं, कहीं एक कोई मुस्लिम आदमी है जो लावारिस छोड़ दी गई हिन्दू, मुस्लिम तमाम किस्म की लाशों को उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक निपटा रहा है, बहुत सी जगहों पर लोग अपने धर्मस्थान दूसरे धर्म के लोगों के लिए खोलकर, खाना खिलाने के लिए बैठे हैं, इन सब बातों से हिन्दुस्तान के बेहतर इंसानों का पता लगता है, और यह भी पता लगता है कि सरकारों में बैठे बहुत से लोग, बहुत सी सरकारें ऐसी बेहतर बातों से ठीक उतनी ही दूर हैं जितनी दूर मजदूर अपने घरों से हैं। लोगों के समर्पण, लोगों के हौसले, लोगों के नि:स्वार्थ त्याग, और लोगों के सरोकार, इन सब पर भी बार-बार चर्चा होनी चाहिए क्योंकि लोगों में भलमनसाहत के बारे में जिस तरह से भरोसा खत्म हो चुका है, उस भरोसे का वापिस आना, और कायम होना भी जरूरी है। यह दुनिया अब तक चाहे जिस किसी झांसे में जी रही थी, कोरोना ने हिन्दुस्तान में यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, या देश की सरकार सबसे गरीब के सबसे नाजुक वक्त में उससे हजार मील दूर बैठी हुई है, और दिल्ली में अपने ऐशोआराम की खूबसूरती बढ़ाने के लिए 20 हजार करोड़ रूपए मंजूर करके बैठी है, उसे खर्च करने पर आमादा है। देश के गरीबों को यह समझ आ गया है कि उनकी जगह सरकारों के लिए पांच बरस में एक बार पोलिंग बूथ के बाहर तो है, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं है। ऐसे में कुछ राज्य सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, और यह बात भी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगी। फिलहाल हम यह चाहते हैं कि जो लोग तरह-तरह के गढ़े हुए झूठ फैलाकर नफरत बढ़ाना चाहते हैं, उनके बीच कम से कम कुछ जिम्मेदार लोग तो बेहतर और महान इंसानों के त्याग के बारे में बाकी लोगों को बताएं, हो सकता है कि बाकियों में से कुछ को इससे प्रेरणा मिले, और हो सकता है कि बाकी में से कुछ ऐसे में घर बैठे शर्म खाकर चुल्लू भर पानी में डूब मरें। ऐसे लोगों के मरने से भी धरती पर से बोझ ही कम होगा। 

आज सोशल मीडिया गिनती में चाहे कम हो, लेकिन भले और सरोकारी लोगों की वजह से मानवता कही जाने वाली इस खूबी की कहानियां देख रहा है। इनसे सीखकर लोगों को खुश तो करना चाहिए। और कुछ नहीं तो सूखे बिस्किट और पानी की घर में भरी हुई साफ बोतलों को लेकर राह पर निकल पड़ें, और जहां जो दिखे उससे पूछते चलें, उसे देते चलें। ऐसे अनगिनत वीडियो सामने आए हैं जिसमें मजदूर सैकड़ों किलोमीटर बाकी सफर के लिए भी जरूरत से अधिक बिस्किट-पानी लेने से मना कर रहे हैं। कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं। 

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17-May-2020

मजदूर के मुकाबले कहां 
टिकेगा ईश्वर, साफ नहीं

देश के कुछ प्रमुख धर्मस्थानों की खबरें आ रही हैं कि वहां कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए बैंकों में जमा एफडी तुड़वानी पड़ रही है। धर्मस्थलों के कपाट बंद हो गए हैं, वहां होने वाले जलसे, रस्म-रिवाज सब बंद हो गए हैं, वहां रोज पूजा-पाठ करने वाले गिने-चुने लोग रस्म अदायगी कर रहे हैं, बाकी धर्म का धंधा मंदा है। लोगों को याद होगा कि कई हफ्ते पहले जब दिल्ली में तब्दीली जमात के लोगों के बीच बड़ी संख्या में कोरोना पॉजीटिव मिलने लगे तो उसी वक्त मुस्लिमों के कुछ प्रमुख नेता होने का दावा करने वाले चेहरे टीवी के स्टूडियो पर और दूसरे वीडियो में बढ़-चढ़कर धार्मिक फतवे जारी करते दिख रहे थे कि मरने के लिए मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, और कई धर्म के लोगों का यह कहना था कि जीना-मरना तो ईश्वर की हाथ की बात होती है। लेकिन धीरे-धीरे जब कोरोना ने अपनी पकड़ फैलाई, तो ये सारे धार्मिक दावे बंद हो गए, और अब टीवी चैनलों का पेट भरने के लिए भी ऐसा कोई दावा अब नहीं हो रहा है। कुल मिलाकर यह समझ पड़ रहा है कि जब सचमुच में बचाने की नौबत आती है, तो ईश्वरों के कपाट बंद हो जाते हैं, महज अस्पताल काम आते हैं, आग बुझाने को दमकल काम आती है, सड़क हादसे से जख्मियों को अस्पताल ले जाने एम्बुलेंस काम आती है, और आज देश में चलते हुए दसियों लाख गरीब-भूखे मजदूरों को खाना खिलाने के लिए मोटेतौर पर समाज काम आता है। जिन ईश्वरों ने जिंदगी भर लोगों से दान हासिल किया, जिनके मंदिरों में जमा सोने को गिनने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तमाम धर्मों के ऐसे तमाम उपासना केन्द्र आज की मुसीबत में किसी काम के नहीं रह गए हैं। होनी वही जो राम रखि राखा से लेकर जाको राखे सांईंयां, मार सके नहिं कोय जैसी कई बातें इंसान की समझ विकसित करने के बाद से बढ़ती चली गई हैं। ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, उसने जितनी सांसें दी हैं उससे एक अधिक सांस मिल नहीं सकती, इस तरह की भी कई बातें प्रचलित हैं। लेकिन सवाल यह है कि न दिखने वाले, और आकार में नापे न जा सकने वाले कोरोना के चलते ईश्वर की धारणा से जुड़े कोई भी दावे काम नहीं आ रहे। 

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि कोरोना के बाद गरीब-मजदूर की हालत चाहे जो हो, देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था चाहे जो हो, ईश्वर की धारणा का क्या होगा, उसकी अपनी अर्थव्यवस्था का क्या होगा? क्योंकि आज बाजार के मंदी के बीच भी शेयर बाजार में कंपनियों के शेयरों के कुछ तो दाम है। लेकिन ईश्वर का तो पूरा कारोबार ही बंद हो गया है। अब यह भक्तों पर है कि वे इस हकीकत को समझते हुए भी मान पाते हैं, या फिर एक खुशफहमी में जिंदा रहना चाहते हैं कि हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन...। 

क्या यह ऐसा वक्त आने वाला है जिसमें बहुत से लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया को मानो एक पिछली तारीख पर ले जाकर सेट किया जा सकेगा। कम्प्यूटरों को चलाने वाले सॉफ्टवेयर में ऐसा इंतजाम रहता है कि आप नए फेरबदल से खुश नहीं हैं, तो आप किसी एक पिछली तारीख पर इस सॉफ्टवेयर को ले जा सकते हैं, और आपका कम्प्यूटर उस तारीख सरीखा हो जाता है। क्या ईश्वर को लेकर समाज की धारणा में कोई ऐसा बुनियादी फेरबदल आ सकेगा? या फिर लोग और अधिक अंधविश्वासी होकर, भक्तिभाव और अधिक डूबकर ईश्वर की शरण में कुछ और हद तक चले जाएंगे कि कोरोना से हुए नुकसान से उबार दे ईश्वर? अभी यह बात साफ नहीं है क्योंकि इंसान का मिजाज समझना आसान नहीं है, और फिर यह बात भी है कि पिछले दो महीने में इंसान जिस दौर से गुजरे हैं, आज भी गुजर रहे हैं, और अगले कुछ महीने गुजरने वाले हैं, उससे यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि हिन्दुस्तान के दसियों करोड़ मजदूर ईश्वर की हकीकत को समझ जाएंगे या अपनी हकीकत को बदलने के लिए ईश्वर के चरणों में जाएंगे। 

वैसे तो अब समय आ गया है जब लोग यह जान लें कि ईश्वर के बड़े-बड़े दरबारों वाली दिल्ली और मुम्बई में भूखे मजदूरों को ईश्वर के दिए महज भूख और बेदखली की सजा मिली, हासिल कुछ नहीं हुआ, एक वक्त का खाना भी नहीं मिला। जो मजदूर सैकड़ों मील चलकर, अपने कुनबे को ढोकर भी जिंदा हैं, उनको यह हकीकत समझ आना जरूरी है कि वे अपने दम पर जिंदा हैं, किसी ईश्वर की वजह से नहीं, किसी लोकतंत्र की वजह से नहीं, किसी सरकार की वजह से नहीं। बल्कि सच तो यह है कि वे ईश्वर के बावजूद जिंदा हैं, लोकतंत्र के  बावजूद जिंदा हैं, और सरकारों के बावजूद जिंदा हैं। यह बात समझ में आना जरूरी है क्योंकि इसी मजदूर तबके को धार्मिक प्रवचनों से लेकर कारखानों में बने छोटे-छोटे मंदिरों तक कई प्रतीकों से ठगा और लूटा जाता है। ये मजदूर अगर आज भी राजा और व्यापारी का साथ देने वाले धर्म का सच नहीं समझ पाएंगे तो ये बाकी जिंदगी ऐसी ही गुलामी करते रहेंगे जैसी गुलामी उन्हें धर्मगुरुओं से लेकर कथावाचकों तक के हाथों दी जाती है। 

पिछली कई पीढिय़ों के बाद, या कि एक सदी बाद हिन्दुस्तान में ईश्वर और धर्म पहली बार इस हद तक अप्रासंगिक हो गए हैं, इस हद तक हाशिए पर चले गए हैं कि देखते ही बनता है। एक सदी हम इसलिए कह रहे हैं कि पिछली महामारी 102 बरस पहले आई थी, और उसक वक्त कोई ऐसा सामाजिक अध्ययन अभी हमें याद नहीं पड़ रहा है कि 1918 के पहले या 1929 के बाद ईश्वर की धारणा में कोई फेरबदल आया था या नहीं। आज तो कायदे की बात यह है कि दुनिया के जो सबसे विकसित और सबसे सभ्य देश हैं, उनमें ईश्वर का धंधा कोरोना के पहले भी मंदा चल रहा था। लोग आस्था खो बैठे थे, धर्म को मानना बंद कर चुके थे, और नास्तिक हो गए थे। योरप के कुछ एक देशों में धर्म एकदम ही महत्वहीन हो चुका है। लेकिन यह अजीब बात है कि जो सबसे संपन्न लोग हैं, वे तो धर्म से दूर होते दिख रहे हैं लेकिन जो महज अपने खून-पसीने पर जिंदा हैं, और जिन्होंने अभी-अभी हिन्दुस्तान में अपनी ताकत को ईश्वर की ताकत के ऊपर साबित किया है, वे लोग अभी भी ईश्वर की तरफ जाएंगे या ईश्वर से दूर जाएंगे, यह अभी साफ नहीं है। 

खैर, यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि ईश्वर नाम की एक कल्पना दुनिया पर फिर से अपना बेमिसाल राज कायम कर सकेगी, या नहीं कर सकेगी? 
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16-May-2020

मजदूर के पसीने से धरती 
का घड़ा भर सकता है... 

देश भर से गांवों में लौटने वाले मजदूरों के लिए अब बस एक ही किस्म के काम की गारंटी हो सकती है, सरकारी मनरेगा में मजदूरी। अभी एक-डेढ़ महीने के बाद खेती-किसानी में कुछ मौसमी काम निकल सकता है, लेकिन वह भी कुछ महीने ही चलेगा, और फसल के साथ ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में दशकों पहले केन्द्र सरकार ने नरेगा और मनरेगा नाम से जो योजना चल रही है उसमें देश में रोज करोड़ों लोगों को मजदूरी मिल रही है, और यह मजदूरी ठीक-ठाक रोजी की रहती है। कोरोना के माहौल में जब बहुत सावधानी के साथ काम करने की एक मजबूरी है, उस दौर में भी छत्तीसगढ़ ने मनरेगा में मिलने वाले काम की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर बताई जा रही है, फिर चाहे वह पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से बहुत ही कम ही क्यों न हो। पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से हिन्दुस्तान में आज एक ही चीज अधिक है, और वह है पैदल सफर। इतना पैदल सफर न विभाजन के वक्त हुआ था, और न ही पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को इतना सफर करना पड़ा था क्योंकि इन दोनों ही वक्त पर रेलगाड़ी और सड़क की गाडिय़ां भी हासिल थीं। 

आज जब मनरेगा में रिकॉर्ड संख्या में लोगों को रोजगार मिलना है, और उसका अधिकांश हिस्सा तालाबों की खुदाई किस्म के पूरी तरह मजदूरी देने वाले काम रहेंगे, तो यह एक समस्या के साथ-साथ आया हुआ एक अवसर भी है। अवसर जिस हिसाब से बारिश के पहले-पहले सैकड़ों करोड़, या हो सकता है हजारों करोड़ भी मजदूरी में लगाए जाएं। ऐसे में इस पैसे का एक फायदा भी उठाया जा सकता है। अगर पूरे प्रदेश में बारिश के अतिरिक्त पानी को नदियों में जाकर बाढ़ बनने से रोकना है, तो नदियों के कैचमेन्ट एरिया में ऐसे बड़े-बड़े तालाब बनाने चाहिए जो कि अनिवार्य रूप से चाहे किसी आबादी के काम न भी आ सके। आबादी के लिए तालाबों का गहरीकरण एक बात है, और बारिश के अतिरिक्त पानी को बाढ़ में बर्बाद हो जाने से रोकना एक दूसरी किस्म का काम है। जहां से पानी नदियों में जाता है वहां पर उनको तालाब बनाकर रोकने का काम करना चाहिए। इसे आबादी के सीधे काम का न मानकर भूजल भंडारण बढ़ाने के काम का मानना चाहिए जिससे कि सारी जनता को बारिश के बाद के महीनों में पानी पाने में आसानी हो। 

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने आने के साथ ही नालों को बांधकर उनमें पानी रोकने का एक काम किया है जो कि बहुत बड़े पैमाने पर हुआ है। सरकार के डेढ़ साल में कम से कम एक साल ऐसे नाले बांधे गए हैं। अब सरकार को जमीन के भीतर पानी बढ़ाने के लिए अपना फोकस एक दूसरी तरफ मोडऩा चाहिए, और जिन इलाकों से बड़े पैमाने पर बारिश का पानी नदियों में जाता है, उन इलाकों में बड़े-बड़े तालाब बनवाने चाहिए, जिनमें मजदूरों के साथ-साथ अगर जरूरत पड़े तो मशीनों का इस्तेमाल करके भी बारिश के पानी का बड़े से बड़ा भंडार बनाना चाहिए। हमारी यह सलाह रोजगार को बढ़ाने के लिए तो है ही, लेकिन साथ-साथ धरती के भीतर घटते हुए पानी की भरपाई के लिए भी है। इस पानी की भरपाई किसी कर्ज के चुकारे के लिए नहीं है, बल्कि यह धरती के घड़े को भरकर रखने जैसा काम है ताकि जब गर्मी में तपकर इंसान घर लौटें तो उस घड़े का पानी पी सकें। इसके साथ-साथ योजना बनाने वालों की एक बड़ी खूबी यह भी हो सकती है कि वह महानगरों और शहरों से गांव लौट रहे देश भर के पांच-दस करोड़ मजदूरों और कामगारों के लिए गांवों में कुटीर उद्योग या किसी और तरह के स्वरोजगार की भी सोचे। खेती-किसानी, पशुपालन, मछलीपालन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, बकरी पालन, रेशम, ऐसे दर्जनों काम हैं जिनमें गांवों में अधिक पानी की जरूरत पड़ेगी, और आज अगर मनरेगा के तहत यह इंतजाम किया जा सकता है, तो हो सकता है कि बहुत से मजदूरों को शहर लौटना ही न पड़े। 

जमीन के भीतर के पानी को खींचकर निकालने का काम छत्तीसगढ़ में खूब होता है। सरकार तकरीबन मुफ्त या अधिकतम रियायत वाली बिजली देती है, सोलर पंप लगाकर देती है, और धान का अधिकांश हिस्सा बाजार भाव से बहुत अधिक पर खरीद भी लेती है। नतीजा यह होता है कि छत्तीसगढ़ी किसान धान से परे अधिक नहीं सोच पाते। देश के दूसरे हिस्सों में तरह-तरह की फसलें ली जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में शायद नब्बे फीसदी से अधिक फसल सिर्फ धान की होती है। धान का मिजाज राजस्थानी ऊंट सरीखा होता है, और वह खूब पानी पीता है, महज पानी मांगता है, और फिर महीनों तक किसी और देखभाल की जरूरत नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि मुफ्त की बिजली, मुफ्त का भूजल, और फसल बिक जाने की गारंटी के चलते किसान धरती की एक-एक बूंद खींच लेने में जुट जाते हैं। ऐसे में धरती के भीतर जो नुकसान हो रहा है, उसका अंदाज अभी नहीं लग रहा है। लेकिन सिर्फ बहस के लिए एक बुरी कल्पना करके देखें, अगर धरती के भीतर भूकंप जैसी किसी नौबत से कोई प्लेट खिसक गई, और पानी एकदम से गिर गया तो क्या होगा? तो पंप किस काम आएंगे, और धान की सरकारी खरीदी लोगों की क्या मदद कर सकेगी? अगर पानी हजार फीट नीचे चले गया, तो कितने इलाकों में फसल हो पाएगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो दो बातों के बारे में सोचने को कहते हैं। पहली बात तो यह कि धरती के भीतर बारिश के पानी को बचाने के लिए हर किसी की कोशिश होनी चाहिए। इस सरकार की नीति के हिसाब से नाले भी बांधने चाहिए, और री-चार्ज तालाब भी बनाए जाने चाहिए जिससे नदियों की बाढ़ भी घटेगी, और ऐसे तालाबों का गर्मी के महीनों तक इस्तेमाल भी हो सकेगा। आज मनरेगा में मजदूरी देने के लिए सबसे आसान काम तालाबों का गहरीकरण है, और नए तालाब बनाना है। आज से एक-डेढ़ महीने तक ही यह काम चलने वाला है, और प्रदेश सरकारों को मजदूरी से जमीनी पानी को जोडऩे का एक अभियान चलाना चाहिए जो कि देश भर के मजदूरों के पसीने से धरती का घड़ा भर देगा। 
-सुनील कुमार


15-May-2020

इन मुस्कुराहटों को जो समझ
नहीं पाएंगे, वे एक पूरा युग
समझना चूक जाएंगे...

आज जब तप रही सड़कों पर करोड़ों मजदूर नंगे पैर या टूटी-फूटी चप्पलों के साथ एक अंतहीन सफर पर हैं, तब बीच रास्ते उन्हें करीब से देखना एक ऐसा तजुर्बा है जिसे फोटोग्राफर, रिपोर्टर, और मौके पर तैनात सरकारी कर्मचारी, या समाजसेवी लोग कभी भूल नहीं पाएंगे। आज जो लोग अपने एयरकंडीशंड घरों में बैठे इस बात का रोना रो रहे हैं कि उनका बाहर निकलना नहीं हो पा रहा है, अधिक संपन्न लोग इस बात का रोना रो रहे हैं कि वे कहीं जा नहीं पा रहे हैं, कुछ खरीद नहीं पा रहे हैं, और घर में रहते हुए उब गए हैं, पता नहीं रेस्त्रां और सिनेमा कब शुरू होंगे। देश में इससे अधिक विरोधाभास वाला कोई माहौल शायद इतिहास में कभी नहीं रहा कि घर बैठे लोग बाहर निकलने को झींक रहे हैं, और बाहर के लोग अपने घर पहुंचने के लिए मौत का एक सफर तय कर रहे हैं। ऐसे में हम सड़कों पर लोगों को देखने की बात इसलिए भी कर रहे हैं कि जगह-जगह सड़कों पर लोग जिन छोटी-छोटी बातों से खुश होते दिख रहे हैं, वह हैरतअंगेज है। लोगों को याद होगा कि लॉकडाऊन के कुछ दिनों के भीतर ही इस अखबार में हमने दिल्ली की एक रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के लिए पैदल रवाना हुए एक परिवार और उसके दो बच्चे सामान लेकर चल रहे थे, और एक मददगार युवती ने जब उन्हें रोककर खाने-पीने का सामान देना चाहा, तो परिवार का जवाब था कि साथ में सामान है, और हैरान करने वाले एक संतोष के साथ परिवार आगे बढ़ा। आज जब करोड़पति इंसान में अरबपति बनने के लिए, अरबपति में खरबपति बनने के लिए एक हवस सवार रहती है, तब हजार किलोमीटर के ऐसे पैदल परिवार का संतोष देखने लायक लगता है। 

इस महीने भर में गंगा में बहुत पानी बह चुका है, दसियों लाख मजदूर अपने गांव पहुंच चुके हैं, तब भी आज फिर इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझ रही है कि सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल चुके लोग अगर आगे के सफर के लिए तपते हुए लोहे से लदी हुई ट्रक पर भी बैठने की जगह पा रहे हैं, तो उनके चेहरे खुशी से खिल जा रहे हैं। ऐसे ही लंबे सफर के बाद किसी बस में परिवार को आगे के लिए जगह मिल गई, तो छोटे बच्चों से लेकर उनकी मां तक के चेहरे हॅंसी से जगमगाते दिख रहे हैं। जिंदगी कैसी हो गई है कि जिंदा रहना भी एक तसल्ली दे रहा है, ट्रक पर जगह मिल जाना भी सब कुछ हासिल हो जाने सरीखा साबित हो रहा है। जो लोग अपने घरों में आराम से बैठे हैं, जिनके पास टीवी और इंटरनेट पर सैकड़ों चैनल का मनोरंजन देखने की सहूलियत है, वैसे लोग क्या इस एक महीने में ऐसी महिला, ऐसी बच्ची जैसी खुशी पा सके हैं? 

आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखना इसलिए सूझ रहा है कि दुख और तकलीफ का ऐसा दौर हमने पहले कभी देखा नहीं, और शायद आगे की बाकी जिंदगी में ऐसा देखना न हो। इसलिए सैकड़ों किलोमीटर जले हुए तलुओं के ऊपर की देह पर के चेहरे पर जो हॅंसी और खुशी देखने मिल रही है, उसे देखने का मौका किसी को चूकना नहीं चाहिए। हम यह तो नहीं कहते कि यह खुशी सचमुच ही खुश करने वाली है, क्योंकि इस खुशी की एक वजह वह यातना भी है जिससे गुजरने के बाद की थोड़ी सी राहत के चलते यह खुशी मिल रही है। इस पूरे नजारे को देखें, इस पूरी नौबत को समझें तो यह समझ आता है कि सुख और दुख ये सब कुछ तुलनात्मक रूप से होते हैं, ये अपने आपमें कुछ भी नहीं होते। किसी एक की खुशी दूसरे के लिए बिल्कुल भी बेमायने हो सकती है। एक परिवार में जिस उम्र की छोटे बच्चे मोबाइल और टीवी की स्क्रीन पर कार्टून फिल्म देखकर भी खुश नहीं होते, जिन्हें खिलाना मां-बाप के लिए एक मशक्कत होता है, उसी उम्र के मजदूर-परिवारों के बच्चे सड़कों पर जिस तरह एक पैकेट बिस्किट पाकर खुश हैं, उससे समझ पड़ता है कि खुशी और गम हरेक के लिए बिल्कुल ही अलग-अलग पैमानों पर शुरू होते हैं, और अलग-अलग घटते-बढ़ते हैं। 

लेकिन इसके साथ-साथ एक बात जो समझने की है, वह यह है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के भीतर मेहनतकश गरीब आबादी का यह क्या हाल हो गया है कि सफर के आखिरी हिस्से के लिए मिली कुछ राहत भी उसे शुरू की सारी तकलीफ भूल जाने में मदद कर रही है। लोकतंत्र में यह कैसी नौबत आई हुई है कि अच्छी खासी बड़ी तकलीफ भी उसके पहले की पहाड़ से बड़ी तकलीफ का दर्द भुला देती है, और चेहरे पर मुस्कुराहट ले आती है। क्या यह सचमुच ही लोकतंत्र है, या लोकतंत्र की एक ऐसी कागजी शक्ल है जिसके भीतर सब कुछ खोखला है? जब आबादी का आधा हिस्सा कम तकलीफ को ही आराम मानने लगता है, तो यह समझ पड़ता है कि लोकतंत्र में आम लोगों की हालत आम की ऐसी चूसी हुई गुठली की तरह हो गई है, जिसे पाकर घूरे पर जिंदा गाय खुश हो जाती है। 

क्या यह सचमुच ही एक लोकतंत्र का नजारा है? क्या यह सचमुच ही इंसानियत का नजारा है? क्या सचमुच ही पांच ट्रिलियन डॉलर की तरफ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है? क्या यह लोकतंत्र लोगों के अपने पैरों पर सैकड़ों मील के सफर के बाद उनको कुछ भरोसा दिलाने वाला रह गया है? नोटबंदी के बाद एक वक्त का, एक लंबा दौर था जब लोगों की अपने खाते में पड़ी हुई रकम भी उनके काम की नहीं रह गई थी। आज हिन्दुस्तानी जनता के पास, उनकी देह के भीतर ताकत का पॉवरहाऊस भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, उनका हुनर भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, किसी जगह बरसों काम करने का तजुर्बा भी उनके काम का नहीं रह गया है, किसी कारोबारी महानगरी की झोपड़पट्टी में जुटाया गया टूटा-फूटा सामान भी उनके काम का नहीं रह गया है। कल ही सोशल मीडिया पर किसी ने यह सवाल उठाया है कि जिंदा रहने के लिए जिन सामानों की जरूरत पड़ती है, उन फटे-पुराने सामानों को लोग महानगरों के खाली किए हुए मकानों के बाहर न तो ढोकर ला पाए होंगे, और न ही उनके बिना आगे उनका काम चलेगा। 

ऐसी नौबत के लोग भी पल भर के लिए अगर मुस्कुरा सकते हैं, मुस्कुरा रहे हैं तो यह कम से कम हमको बहुत बुरी तरह हैरान करने वाली बात है कि देह का इतना दर्द, मन का इतना विचलन, और दिमाग का दहशत से भरा होना भी उन्हें जिंदगी के लिए उम्मीद से रोक नहीं पा रहा है। ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं जिनके पास सबसे बड़ी ताकत अपनी देह की ताकत है, जिसे कि हजार मील का सफर भी छीन नहीं पाया है। जो लोग त्रासदी के इस दौर में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे ऐसे योद्धाओं के चेहरों को देखकर इन बातों को सोच-समझ नहीं पाएंगे, उनके लिए एक पूरा युग बिना कुछ समझे निकल जाएगा। 
-सुनील कुमार


14-May-2020

मजदूर तो जिंदा रह लेंगे, पर 
बाकी डायनासॉर न हो जाएं

चारों तरफ से दुख-तकलीफ की खबरों के बीच एक अच्छी खबर यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एयरपोर्ट वाला गांव अपनी महिला सरपंच की अगुवाई में बाहर से लौटे मजदूरों को तुरंत ही सरकारी काम में मजदूरी दे रहा है, और लोग आते ही काम पर लग गए, सरकारी रेट पर रोजी मिलने लगी। आज जब कोरोना ने पूरी दुनिया को उथल-पुथल कर दिया है, धरती से लेकर समंदर की गहराई तक, और उधर अंतरिक्ष में ओजोनलेयर के पार तक कोरोना की वजह से जिंदगी में आई तब्दीली दिख रही है, तब बहुत से लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आगे की जिंदगी कैसी होगी। यह समझना सचमुच ही कुछ मुश्किल इसलिए हैं कि लोगों ने ऐसा कभी देखा नहीं था, और 102 बरस पहले की भारत की महामारी के बारे में सुनाने वाले बाप-दादा अब बचे हुए नहीं होंगे। इसलिए लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि लॉकडाऊन खत्म होने के बाद, धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने के बाद भी वह जिंदगी आज तक की जिंदगी जैसी नहीं रहेगी। वह एक अलग अर्थव्यवस्था रहेगी, अलग कारोबार और रोजगार रहेंगे, जिंदगी का रोज का तौर-तरीका बिल्कुल अलग रहेगा, और यह कुछ महीनों के लॉकडाऊन के बाद फिर से पुरानी जिंदगी बिल्कुल नहीं रहेगी। ऐसे में दो लोगों के बचने की संभावना सबसे अधिक रहेगी, एक तो मजदूर की, जो कि महीने भर पैदल चलकर आए, और अगले ही दिन कुदाली-फावड़ा लेकर मनरेगा में रोजी कमाने में लग गए। जो लोग इस रफ्तार से नई जगह, नए काम, नए हौसले पर नहीं पहुंच पाएंगे, वे पिछड़ जाएंगे। 

हमारी किस्म के लोग जो दफ्तर में, मेज पर, कम्प्यूटर पर, एक खास किस्म का काम अब तक करते आए हैं, और यह उम्मीद करेंगे कि कुछ महीने के फासले के बाद अब फिर वही पुराना काम करने लगेंगे, वे निराश होंगे, और नाकामयाब भी होंगे। अब दुनिया पहले सरीखी नहीं रह जाने वाली है, और लोगों को धर्म से लेकर आध्यात्म तक, अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर कामकाज तक, दांतों को कुरेदकर पान-सुपारी निकालने की आदत छोड़कर, नाक-कान कुरेदने की आदत छोड़कर एक सावधानी बरतनी होगी, वरना दांत, नाक, कान वाला बदन ही नहीं बचेगा। लेकिन जो लोग नहीं बचेंगे वो तो फिर भी दिक्कत से दूर हो जाएंगे, दिक्कत उनको अधिक होगी जो जिंदा रहेंगे, लेकिन काम का ढर्रा नहीं बदलेंगे। आज हिन्दुस्तान के कई राज्यों ने मजदूर कानूनों को बुलडोजर के नीचे कुचलकर चूर-चूर कर दिया है। अब 9 घंटे की शिफ्ट 12 घंटे हो गई, ओवरटाईम कहीं बाकी रहा, कहीं खत्म कर दिया गया, मजदूर विवादों का निपटारा अब संस्थान के भीतर कर दिया गया ताकि कोई लेबर कोर्ट न जा सके। पता नहीं ये सारे कानून, या ये तमाम फेरबदल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर कायम रहेंगे या खारिज कर दिए जाएंगे, इन कानूनों से परे भी आज देश और दुनिया का कारोबारी माहौल यही रहने वाला है। हम पिछले दो-तीन महीनों में दो-तीन बार इस बारे में यहां लिख चुके हैं, और आज बाहर से आए मजदूरों के अगले ही दिन काम पा जाने, काम में जुट जाने की खबर देखकर इस मुद्दे पर एक बार और लिखने का दिल किया है। 

बाजार के हिसाब से अभी बुरा वक्त आया ही नहीं है जो कुछ बुरा होना है वह तकरीबन पूरे का पूरा बचा हुआ है और आगे आएगा। ऐसे वक्त में कारोबारियों को अपने धंधे के बारे में सोचना चाहिए कि वे सच में चलाने लायक हैं, या बंद कर देने के लायक हैं। उनमें काम करने वाले कर्मचारियों को यह सोचने की जरूरत है कि क्या वे सचमुच ही अपने संस्थान के लिए इतने अधिक उपयोगी हैं कि उनके बिना काम नहीं चल सकेगा, या उन्हें हटा देने से संस्थान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आज  मालिक से लेकर नौकर तक, स्वरोजगारी से लेकर मजदूर तक, हर किसी को अपने आपको बेहतर बनाने, अधिक उत्पादक बनाने, और भविष्य का थोड़ा अंदाज लगा लेने की जरूरत है। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे वे महाराष्ट्र में पटरी पर सोए हुए मजदूरों की तरह रहेंगे जिनके ऊपर से वक्त की ट्रेन धड़धड़ाते हुए निकल जाएगी, और उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि वे कब खत्म हो गए।
 
ऐसे माहौल में जो मजदूर देह की जमकर मेहनत करने के लिए तैयार रहेंगे, उन्हीं के बचने का आसार सबसे अधिक रहेगा। इंसानों में मजदूर, और बाकी प्राणियों में तिलचट्टा। तिलचट्टे के बारे में कहा जाता है कि वह किसी भी स्थिति में, कुछ भी खाकर जिंदा रह लेते हैं, यहां तक कि सीमेंट खाकर भी जिंदा रह लेते हैं। यह बात वैज्ञानिक सच है या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन यह बात तय है कि हालात के मुताबिक अपने आपको ढाल लेना जरूरी है, और आज हर किसी को अपने हुनर को बेहतर बनाने के साथ-साथ हालात के मुताबिक अपने को ढाल भी लेना चाहिए क्योंकि बीते कल से कोई तुलना अब किसी काम नहीं आने वाली है। यहां तक कि सरकार की अपनी ताकत भी इन दो महीनों में ही बुरी तरह चुक चुकी है। छत्तीसगढ़ ने अपने बजट को सीधा 30 फीसदी काट दिया है, और सरकारी विभागों को कहा है कि वे 70 फीसदी से अधिक का उपयोग नहीं कर पाएंगे। बजट में तीन फीसदी बढ़वाने के लिए मंत्री और अफसरों को जान लगा देनी पड़ती है, और अब बजट  एकमुश्त 20 फीसदी कट गया। 

देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह घटा दी है, कल ही एक दर्दनाक कार्टून कहीं छपा है कि घरेलू नौकर-नौकरानी मालिक की इमारत के सामने खड़े होकर खाली कटोरे बजा रहे हैं कि उनकी तनख्वाह दी जाए। अभी तक देश में कारोबार का एक बड़ा हिस्सा बंद है, इसलिए अभी मजदूर विवाद सामने नहीं आ पा रहे हैं, और आगे जाकर बहुत से राज्योंं में मजदूर कानून ऐसे होने वाले हैं कि विवाद सामने आ भी नहीं सकेंगे। कोरोना की मार ने जितना इंसानों को मारा है, उससे कहीं अधिक कारोबार मारे हैं, मजदूर कानून मारे हैं। इस बदले हुए हालात को समझना इसलिए जरूरी है कि धरती पर एक वक्त चट्टान जैसी मजबूती और पहाड़ जैसे आकार वाले डायनासॉर हुआ करते थे। उनके बारे में यह धारणा प्रचलित है कि वे वक्त के साथ अपने को नहीं बदल पाए, इसलिए खत्म हो गए। आज छोटे-बड़े तमाम लोगों को डायनासॉर बनने से बचना चाहिए। महज मजदूर ही ऐसे रहेंगे जो किसी भी नौबत में जिंदा रह लेंगे। 
-सुनील कुमार


13-May-2020

राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी
आखिरी बस पकडऩे से चूके

बीती रात वही अमूमन 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर देश से मुखातिब हुए। उन्होंने इस देश के सदियों के गौरव को गिनाया, अपने कार्यकाल के कुछ योगदान गिनाए। शुरू के चौदह मिनट लोगों को यह समझ नहीं आया कि वे किस मौके पर क्या बोल रहे हैं, क्या बोलना चाहते हैं, उनके दर्शक-श्रोता कौन हैं, और हिन्दुस्तान की जो जनता इस ऐतिहासिक त्रासदी के मौके पर अपने प्रधानमंत्री को जो सुनना चाहती थी वह कहां है? एक तरफ जीवंत प्रसारण चल रहा था, दूसरी तरफ उसे सुनते हुए लोग ट्विटर पर लगातार लिख भी रहे थे कि प्रधानमंत्री बोलना क्या चाह रहे हैं, वे मुद्दे की बात कब शुरू करेंगे, और अधिक कटुआलोचक या अधिक कट्टर भक्त लोगों की बातों का जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। 

प्रधानमंत्री करीब आधा घंटा बोले होंगे, और इसमें उन्होंने देश का और जनता का विशाल गौरवगान किया, पिछली कई सदियों की गौरवगाथा गिनाई, और अपने कार्यकाल को भी गिनाया, यह अलग बात है कि इसके बीच के आधी सदी से अधिक के कांग्रेस के कार्यकाल का कोई जिक्र उन्होंने नहीं किया, और न ही लोग उनसे उसकी उम्मीद ही कर रहे थे। हमें इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इतना तो सुनने मिला कि 20 लाख करोड़ का एक आर्थिक पैकेज देश को दिया जा रहा है, उसे लेकर भी उन्होंने मुसीबत से उबरने की बातें नहीं कीं, उत्कृष्टता और बेहतरी की बातें अधिक कीं। आधे घंटे सुनने वाले लोग कई मुद्दों पर, कई वजहों से बुरी तरह निराश होकर उठे कि आज जब मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चों के पांवों के तलुए सड़क पर जलकर लोहा हुए जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तानी गरीब मजदूर मां-बाप और गर्भवती बीबी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर चलने के ओलंपिक से भी बड़े रिकॉर्ड बना रहे हैं क्योंकि वहां तो या तो भार उठाने का रिकॉर्ड रहता है, या लंबी दूरी तय करने का। ये मजदूर तो ये दोनों ही काम कर रहे हैं। दुनिया के इतिहास में, खासकर किसी जिम्मेदार लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा बहुत कम होता है कि घर लौटते मजदूर थोक में गाजर-मूली की तरह कतार से कट जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में इसका कोई जिक्र नहीं था। दरअसल उनके आधे घंटे में एक भी मौत का जिक्र नहीं था, एक भी मानवीय त्रासदी का जिक्र नहीं था, आत्मनिर्भरता का गौरवगान था, और विश्व का मुखिया बनने का एक दावा कहें तो दावा था, भरोसा कहें तो भरोसा था। 

प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर हमें थोड़ी सी नहीं, ज्यादा हैरानी हुई है। जब उनके पास सुनने वाले प्रशंसकों और आलोचकों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी मौजूद है, और हिन्दुस्तान के इतिहास का आजादी के बाद का यह सबसे अधिक त्रासदी भरा हुआ मौका उनको अपना दिल-दिमाग देश के सामने रखने का मौका हासिल था, तब वे यह मौका चूक गए। अभी हम और बातों को गिनाना नहीं चाहते कि वे और क्या-क्या चूके।  लेकिन इतना जरूर गिनाना चाहते हैं कि अपनी ऐतिहासिक चूक को, अपनी ऐतिहासिक गलतियों को कुबूल करके, उनसे आगे बढऩे का जो मौका उनके हाथ था, वह मौका वे चूक गए। जो कि अब भविष्य में कभी वे इस बात पर अपनी गलती, अपनी चूक, अपनी नाकामयाबी कुबूल भी करना चाहेंगे, तो उस रास्ते की आखिरी बस कल रात 8 बजे निकल गई। हर व्यक्ति की जिंदगी में एक ऐसा मौका आता है जब वे अपनी पिछली गलतियों, या गलत कामों के लिए माफी मांगकर अपने रिकॉर्ड को कुछ हद तक दुरूस्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बीती रात वह मौका बुरी तरह चूक गए। सड़कों और पटरियों पर हो रही दर्जनों मौतों को लेकर भी उनके पास कहने को कुछ नहीं था। उन्होंने आधे घंटे में शायद एक या दो बार मजदूर शब्द का जिक्र किया हो, लेकिन उससे परे उनकी पूरी की पूरी बात प्रसंगहीन, और एक किस्म से बेरहम की। आज जब देश विभाजन के बाद की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है तब हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को लेकर एक ऐसा भाषण जो कि पूंजीपतियों को संबोधित दिख तो रहा हो, हालांकि शायद ही कोई पूंजीपति उससे प्रभावित हुआ हो। ऐसी शाम जब लोग अपने जख्मों को लिए हजार मील के सफर पर कहीं रूककर टीवी देख रहे होंगे कि उसमें से मरहम आएगा, और उसमें से देश के इतिहास के गौरवगान, और भविष्य को लेकर विश्व का मुखिया बनने की उम्मीदें पता नहीं किसमें भरोसा जगा पाएंगे। जब जिंदगी की हकीकत इस कदर जलती-सुलगती हो कि तलुओं की आग को बुझाना किसी देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, और खासकर प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए, तब उन तलुओं के ऊपर के देह तक की चर्चा न हो, तो क्या राष्ट्र के नाम ऐसे संदेश का न होना बेहतर नहीं होता, दुख और तकलीफ के बीच जो लोग इस नौबत के जिम्मेदार हैं, इसके लिए जवाबदेह जिन्हें रहना चाहिए वे लोग अगर मिलें, आधे घंटे बात करें, और इस दुख-दर्द की चर्चा भी न करें, तो वह लोगों के जख्मों पर बिना नमक के नमक डालने सरीखा हो जाता है। अगर प्रधानमंत्री को बीती रात मुद्दे की इतनी ही बात करनी थी कि 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की जानकारी कल आएगी, तो यह बात तो दर्द के इस मौके को गंवाए बिना कोई सरकारी प्रवक्ता भी कर सकता था, या जैसा कि आजकल अधिक आम हो चला, वित्तमंत्री ऐसा ट्वीट कर सकती थीं, कि कल वे किस वक्त यह घोषणा करेंगी। 

प्रधानमंत्री की आलोचना करना आज यहां मकसद नहीं है, लेकिन हम अपनी तकलीफ, अपनी निराशा, और अपना सदमा अगर नहीं लिखेंगे, तो हम भी इसे जाहिर करने का यह मौका चूक जाएंगे। प्रधानमंत्री की कल की बात कर आज न लिखा जाए, तो बाद में फिर कभी लिखना तो एक जिक्र भर रह जाएगा। लोकतंत्र महज सरकारी फैसलों का नाम नहीं है, लोकतंत्र जनता के बीच भरोसा जगाने का नाम भी है। जो लोग आज मरने की कगार पर हैं, जो लोग अपने बूढ़े मां-बाप को जीते जी मुर्दों की तरह ढोकर चल रहे हैं, इस पल भी किसी सफर में हैं, उनके लिए राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का मतलब शायद मोदी की कही आत्मनिर्भरता से कुछ अलग है। उनके लिए आत्मनिर्भरता यही है कि सरकारों की मदद के बिना, लोकतंत्र की मदद के बिना, समाज के संपन्न तबके की मदद के बिना, निजी गाडिय़ों के दर्जनों हार्सपॉवर की ताकत के बिना वह अपने मां-बाप के जीते जी उन्हें जिंदा लाश की तरह ढोकर एक अंतहीन सफर पर निकले। इस मौके पर अगर भारतीय लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के पास आधे घंटे के भाषण में उसके लिए महज एक ऐसी संख्या है, जिस 20 लाख करोड़ का वह मतलब भी नहीं समझता, तो हमारे हिसाब से यह भाषण जमीन को छू भी नहीं रहा था। नरेन्द्र मोदी और उनके भाषण लेखक या तो वक्त की नब्ज को टटोल नहीं पा रहे, या फिर नब्ज से आती हुई आवाज पर कुछ कहने का वे साहस नहीं जुटा पाए। 
-सुनील कुमार


12-May-2020

कोरोना के पहले नहीं सीखा तो
कम से कम अब सबक ले लें

हिन्दुस्तान में चल रहे लॉकडाऊन के बीच आज डेढ़ महीने बाद भी जिस तरह से राज्यों के ऊपर जिम्मेदारी आई हुई है, उससे जूझना देश के किसी भी राज्य के लिए आसान नहीं लग रहा है। सरकारों से बात करें तो लगता है कि यह उनके लिए मुमकिन नहीं है, मजदूरों से बात करें तो लगता है कि उनके लिए इस मुल्क में कोई लोकतंत्र नहीं है। यह तो देखने का नजरिया रहता है जो केन्द्र सरकार से शुरू होता है जिसे लॉकडाऊन करते वक्त यह लगा कि राष्ट्र के नाम एक संदेश देश में पूरा इंतजाम करने के लिए काफी है। राज्य सरकारों को लगा कि उनके प्रदेशों से गए हुए मजदूर जहां हैं, वहां जिंदा रह लेंगे, यह राज्य सरकारों का नजरिया था। यह अपनी खुद की समझ के खिलाफ की भावना थी क्योंकि यह राज्यों के लिए सबसे आसान बात दिख रही थी कि न उन्हें मजदूरों को लाना पड़े, न ही कोरोना जैसी महामारी उनके प्रदेश में बेकाबू हो, न ही सरकार पर आर्थिक बोझ आए। उद्योगपतियों का नजरिया था कि जब तक धंधे-कारखाने बंद हैं, तब तक मजदूर अपने हाल पर किसी तरह जी लें, ताकि काम-धंधा शुरू होने पर मजदूर और कारीगर मौजूद रहें, मालिक तो हासिल रहेंगे। एक ही नौबत, एक ही तस्वीर, लेकिन देखने के नजरिये कितने अलग-अलग थे, अलग-अलग हैं, और अलग-अलग रहेंगे। इस देश में देवी की पूजा की महिमा के राजनीतिक गीत गाने वाले नेता, उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें, ये सबके सब यह नजारा देखकर भी एकदम चुप हैं कि गर्भवती औरतें हजार-हजार किलोमीटर पैदल चल रही हैं, सड़क किनारे बच्चे जन रही हैं, और उन बच्चों को थामे फिर सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकल जा रही हैं। जिन वामपंथियों के हाथ आज केरल की सरकार है, और जो देश में सबसे अच्छा काम कर रही है, उसकी बात को अगर छोड़ दें, तो देश के बाकी पार्टियों में से किसी ने भी क्या महिलाओं की ऐसी हालत पर अपनी पार्टी के लाखों-करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए यह फतवा जारी किया कि वे गाडिय़ां लेकर निकलें, और जितने मजदूरों को जितनी दूर तक छोड़कर आ सकें, उतनी दूर तक छोड़कर आएं। जो नेता और पार्टियां अपने करोड़ों कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं, क्या वे नमूने के लिए भी, सुबूत के तौर पर भी एक भी ऐसी अपील दिखा सकती हैं कि उन्होंने अपने सारे कार्यकर्ताओं को सड़क पर लोगों की मदद करने, उन्हें उनके प्रदेश की सरहद तक छोड़कर आने को कहा हो? 

राज्य सरकारों की आज की नौबत ठीक वैसी ही है जैसी कि उत्तराखंड में भूस्खलन होने के बाद उस तबाह प्रदेश की हुई थी। यह अलग बात है कि आज चट्टानों ने गांवों को कुचला नहीं है, आज हिन्दुस्तानी मेहनतकश मजदूर हजारों किलोमीटर का सफर करते हुए भी मोटेतौर पर जिंदा हैं। लोकतंत्र ने उनको मार डालने में कोई कसर नहीं रखी थी, लेकिन मेहनत की आंच से तपे हुए उनके बदन, और जिंदा रहने का उनका पक्का इरादा, बेमुद्दत हौसला उनको चलाए जा रहा है। हमारे पुराने और नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने हर किसी किस्म की आपदा के लिए राज्य शासन को तैयारी करने का सुझाव दिया था। उस वक्त ऐसी महामारी का तो अंदाज नहीं था, लेकिन मानव निर्मित या किसी प्राकृतिक विपदा से निपटने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए, प्रदेश के नक्शे पर हर अस्पताल, हर रक्तदाता, हर समाजसेवी संगठन के नाम-नंबर किस तरह दर्ज करके रखने चाहिए ऐसी बहुत सी बारीक बातें भी हमने आपदा प्रबंधन की तैयारी के लिए सुझाई थी। लेकिन सरकार का आपदा प्रबंधन का नजरिया अपने एक विभाग के तहत एक फाईल तक सीमित रहता है, और छत्तीसगढ़ भी उससे कोई अछूता नहीं है। इस राज्य में भी ऐसी किसी मुसीबत की कल्पना करके भी यह तैयारी नहीं थी कि समाज के कौन से लोग मुसीबत के वक्त अपनी गाडिय़ां लेकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में लाखों खिलाड़ी हैं, और कसरत करने वाले, एनसीसी में जाने वाले लाखों नौजवान हैं जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, और जो आज काम आ सकते थे। लेकिन सरकार की तरफ से कोई ऐसी संगठित और व्यवस्थित योजना इन डेढ़ महीनों में भी नहीं दिखी है जिसमें समाज के लोगों की इस अतिरिक्त और उत्साही क्षमता का इस्तेमाल हो सके। और यह राज्य कोई अपवाद नहीं है, पूरे देश का यही हाल है, कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं दिखता जहां सरकारों ने अपने बजट, अपने अफसर, और अपने जिले या नीचे के स्तर तक के सरकारी ढांचे से परे जनता की कोई योजना बनाकर रखी हो। आज भी जहां-जहां सामाजिक भवन लोगों को ठहराने के लिए मिल रहे हैं, वे सबके सब आग लगने पर खोदे गए कुएं हैं। जो सामाजिक संगठन लोगों को खाना पहुंचा रहे हैं, वे सरकारी योजना के बिना अपनी मर्जी से कर रहे हैं, या उन्हें प्रशासन ने आखिरी में जोड़ा है। जो राजनीतिक दल खुद होकर लोगों के लिए कुछ इंतजाम कर रहे हैं, वे भी अपनी मर्जी से कर रहे हैं, सरकार की किसी आपदा प्रबंधन योजना के तहत नहीं। आज भी सरकारों को चाहिए कि अपने प्रदेश में चलने वाले आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों से कहे कि वे मौजूदा समस्याओं, और मौजूदा आपात तैयारियों को देखते हुए आगे के लिए समाज का, संचार का, सरकार का, आवागमन का, खानपान का, इलाज और ठहरने का एक ऐसा खाका तैयार किया जाए जो कि किसी भी वक्त की मुसीबत में बस कम्प्यूटर की एक बटन जितनी दूरी पर रहे।
 
जैसा कि किसी गंभीर बीमार के इलाज के मामले में होता है, ऐसा ही एक गोल्डन अवर, सुनहरा घंटा) हर मुसीबत के वक्त होता है। आग लगे तब फायर ब्रिगेड का नंबर ढूंढने में वक्त बर्बाद करने वाले सब कुछ जल जाने देने के लिए जिम्मेदार रहते हैं। और हो सकता है कि राज्य सरकारों की कोई दिलचस्पी ऐसी कोई योजना में न हो, क्योंकि कई बार बदइंतजामी सरकारी अमले को सुहाती है, ऐसे में आईआईएम जैसे संस्थानों को खुद होकर आपदा प्रबंधन के ऐसे मैप बनाने चाहिए जो कि किसी प्रदेश के हर किलोमीटर पर उपलब्ध संसाधनों को नाम और नंबर सहित दर्ज करके रखे। हम आदतन हर बरस एकाध बार सरकारों के लिए ऐसी नसीहत लिखते हैं जिसे सरकार में शायद ही कोई पढ़ते हों, लेकिन आम जनता को भी यह समझ में आना चाहिए कि सरकारी कामकाज में अगर कोई कमी-कसर है, तो वक्त पडऩे पर उसके बारे में सवाल किए जा सकें।
 
दो लाईनों में अगर हम अपनी सोच को अगर फिर से दोहराएं, और पुरानी सलाह के साथ कोरोना-बदइंतजामी का नया तजुर्बा जोड़कर कहें, तो पहली बात यह कि सरकार को अपने ढांचे से बाहर समाज की ताकत का नक्शा बनाकर रखना चाहिए जो कि सरकारी अमले से हजार गुना अधिक बड़ा है, और ताकतवर है। जिस तरह कई संस्थाएं रक्तदाताओं के नाम और नंबर का रजिस्टर रखती हैं, उसी तरह सरकार को समाज और लोगों की हर उत्साही क्षमता का नक्शा बनाकर रखना चाहिए, उसका ऐसा दस्तावेजीकरण और कम्प्यूटरीकरण करना चाहिए कि वह मुसीबत के वक्त तुरंत ही इतनी बड़ी ताकत का इस्तेमाल किया जा सके। आज अगर इस देश में ऐसे उत्साही लोगों की एक लिस्ट हर राज्य के पास होती, तो किसी मजदूर को एक मील भी पैदल नहीं चलना पड़ता, और लोग अगले शहर तक उन्हें छोड़कर आने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज जो सबसे मेहरबान लोग हैं, उनकी ताकत को भी सरकार ने महज खाने और पानी तक सीमित रखा है। इस लोकतंत्र में आज यह साबित हो चुका है कि सरकार तंत्र इस देश का पूरा फ्लाप शो है। जैसा कि हम कुछ दिन पहले यहां लिख चुके हैं यह देश संचितों और वंचितों के बीच बंटी हुई आबादी का एक खंडित देश है। यह देश केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बुरी तरह टकराव और भेदभाव वाला एक खंडित संघ है। यह देश अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के बीच अनबोले सरीखे रिश्तों वाला एक देश है जिसमें कोई भी सरकार अपनी जमीन से अपने निवासियों के अलावा बाकी सबको किसी भी तरह धकेलकर दूसरे प्रदेश में दाखिल करा देने में दिलचस्पी रखती है। यह पूरा सिलसिला बताता है कि कोई राज्य केन्द्र पर निर्भर नहीं रह सकते, कोई स्थानीय संस्थाएं राज्य पर निर्भर नहीं रह सकतीं, और मजदूर तो अपने खून-पसीने के अलावा और किसी पर निर्भर नहीं रह सकते। ऐसे में हिन्दुस्तानी समाज की सामूहिक चेतना, उसकी सामूहिक क्षमता का एक नक्शा बनाना जरूरी है ताकि मुसीबत के वक्त मदद की ताकत रखने वाले लोग मदद की जरूरत वाले लोगों के सीधे भी काम आ सकें। लेकिन चूंकि ऐसी व्यापक योजना बनाना जनता के बस का नहीं है, इसलिए इसमें सरकार और आईआईएम जैसे संस्थानों की भागीदारी जरूरी है। कोरोना से अगर हम इतना भी नहीं सीख पाए, तो इस ठोकर से नुकसान तो हो ही चुका है, अगली ठोकर से भी नुकसान इससे बड़ा भी हो सकता है। 
-सुनील कुमार


11-May-2020

आज की हिन्दुस्तानी त्रासदी समकालीन इतिहास लेखन

का एक ऐतिहासिक मौका, ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी..

आज पूरे हिन्दुस्तान के गांव-गांव से लॉकडाऊन की वजह से जनता की त्रासदी की जो खबरें आ रही हैं, उनके लिए मीडिया में जगह नहीं बची है। ईश्तहारों के बिना अखबारों की हालत अकाल और भुखमरी से जूझ रहे किसी देश के इंसानों सरीखी हो गई है। पन्ने घटते चले गए हैं, खबरें बढ़ती चली गई हैं। नतीजा यह हुआ है कि मीडिया का जो बड़ा सा हिस्सा गैरखबरों को खबर बनाकर जगह बर्बाद करता था, वह घट गया है। मीडिया की अपनी कंगाली और किफायत ने मिलकर वह कर दिखाया है जो कि संपादक नहीं कर पा रहे थे, अब अखबारों में खबरें काम की रह गई हैं, और अखबार रद्दी वाले का सपना नहीं रह गया है। कमोबेश ऐसा ही हाल कुछ बेईमान और घटिया टीवी चैनलों का भी हुआ है जो कि नफरत की आग उगलने वाले, अलग-अलग धर्मों का चेहरा बने हुए, धरती के सबसे घटिया और कमीने इंसानों को अपने स्टूडियो में बिठाकर देश में नफरत का लावा फैलाने में लगे रहते हैं। अब उनके दर्शक या तो घटते चले गए हैं, या लोगों को यह समझ आ रहा है कि खून न हिन्दू होता है न मुस्लिम, और भूख का अकेला धर्म खाना होता है, उससे परे कुछ नहीं। अब हार मानकर सबसे घटिया समाचार चैनलों को भी कम से कम कुछ समय असल जिंदगी की असल त्रासदी को देना पड़ रहा है, इससे उनके जुर्म घटते चल रहे हैं। 

 

लेकिन आज दो बातों को समझने की जरूरत है। एक तो यह कि हिन्दुस्तान में करीब पौन सदी बाद इस किस्म की त्रासदी आई है, छाई है, और जारी है जिसे पिछली बार भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त देखा गया था। विभाजन का इतिहास तो बहुत लिखा हुआ है, लेकिन आज वक्त है भारत के समकालीन इतिहास को अच्छी तरह दर्ज करने का जो कि इतिहास की किताबों को देखकर नहीं लिखा जा सकेगा जिनके लिए आज सड़कों पर जो मजदूर हैं, जो बेघर हैं, उनसे बात करके, उनकी बातचीत को रिकॉर्ड करके, उनके सफर को रिकॉर्ड करके ही किया जा सकता है। एक भूतपूर्व पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापरी ने अभी मजदूरों के एक जत्थे के साथ दिल्ली से लेकर बिहार के सहरसा तक 1232 किलोमीटर का साइकिल सफर किया, और अब वे इसी नाम से एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। आज देश में हजारों ऐसे छोटे-बड़े पत्रकार हैं जो लगातार प्रवासी मजदूर कहे जाने वाले जिंदगी के योद्धाओं से बातचीत रिकॉर्ड कर रहे हैं, और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। ऐसे वीडियो, ऐसे ऑडियो, नाम-पते और नंबर सहित ऐसी तस्वीरें उस तरह छा गई हैं जिस तरह आम के पेड़ों पर बौर छा जाते हैं, या गर्मी में गुलमोहर के सुर्ख लाल फूल छा जाते हैं। 

 

आज जरूरत इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज विज्ञान, पत्रकारिता, और लोक प्रशासन के प्राध्यापकों और छात्रों की है जो कि ऐसी तमाम कहानियों का दस्तावेजीकरण कर सकें, उन्हें संदर्भ और जानकारी सहित लिख सकें, फोटो, वीडियो, और ऑडियो को सम्हालकर रख सकें क्योंकि सोशल मीडिया की चीजें वक्त के साथ गुम होने लगती हैं। देश भर में जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनसंगठनों, और स्वयंसेवियों के जत्थे अलग-अलग स्तर पर लोगों की मदद कर रहे हैं, और उनसे बातचीत दर्ज भी कर रहे हैं। जगह-जगह मौतें दर्ज हो रही हैं, सड़क किनारे बच्चों के जन्म दर्ज हो रहे हैं, और खुद मरियल सी कद-काठी वाले गरीब-मजदूर कहीं गर्भवती पत्नी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर जा रहे हैं, तो कहीं बूढ़े मां-बाप को। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए एक बुरे सपने की तरह है, लेकिन एक कड़वी हकीकत भी है। हिन्दुस्तान के छात्र-छात्राओं और उनके प्राध्यापकों के लिए सोवियत संघ के विघटन के इतिहास से लेकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास तक को पढऩे के लिए अगले हजार-पांच सौ साल का वक्त रहेगा। लेकिन आज हिन्दुस्तान के भीतर इतने बड़े पैमाने पर ऐसी बेरहम और अलोकतांत्रिक बेदखली जो हुई है, उसके अध्ययन का वक्त यही है। आज हिन्दुस्तान में कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं होगा जहां पर बाहर से लौटकर आए हुए मजदूर न पहुंचे हों, जहां से न गुजरे हों, या जहां से मजदूर छोड़कर न आए हों। ऐसे तमाम छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों के लिए यह जिंदगी का सबसे तकलीफदेह और सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन भी हो सकता है कि वे समकालीन इतिहास दर्ज करते हुए, दर्ज करने के लिए ऐसे तमाम लोगों से मिलें, बात करें, उनके इंटरव्यू रिकॉर्ड करें। 

 

दुनिया में वे ही देश पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़ते हैं जो कि अपने कभी न हुए अतीत पर एक झूठा गौरव करते हुए, उसका झूठा दंभ न भरते हुए विषय की ईमानदारी पर मेहनत करते हैं, ईमानदार शोध करते हैं, ईमानदार दस्तावेजीकरण करते हैं। आज इस देश में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं। अगले कई हफ्ते या कुछ महीने बंद रह सकते हैं। अगर इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, भारतीय मजदूरों का अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, ऐसे विषयों के जानकार अपने आसपास के बड़े स्कूली बच्चों, या कॉलेज के बच्चों, या समाज के बेरोजगारों को मजदूर-त्रासदी की ऐसी कहानियां दर्ज करने में लगा सकें, तो वह इस देश की एक तकलीफदेह हकीकत का दस्तावेजीकरण होगा। और यह मौका अगर एक बार निकल जाएगा, तो दुबारा फिर आएगा भी नहीं। 

इसी तरह सोशल मीडिया, और डिजिटल मीडिया के जानकार लोगों के एक समर्पित समूह को देश भर के मीडिया से इस दौर की कहानियों को इक_ा करना चाहिए, सोशल मीडिया से जानकारी दर्ज करनी चाहिए, मजदूरों के जितने नंबर सरकारों के पास आ रहे हैं उनको इक_ा करना चाहिए ताकि आगे-पीछे उनसे फोन से बात करके भी उनके तजुर्बे को लिखा जा सके। इस देश में पढ़ाई-लिखाई वाला तबका अगर जिम्मेदार होगा, तो आज की इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराएगा। आज हिन्दुस्तान के पिछले दो सौ बरस के, या उससे भी अधिक के, गजेटियर मौजूद हैं, तो अंग्रेजों के वक्त मेहनत से किए गए दस्तावेजीकरण की वजह से हैं। आज भी इस देश में प्रशासनिक प्रशिक्षण के नाम पर छांटे गए बड़े अफसरों का जो प्रशिक्षण होता है, उसमें कमरों के भीतर के काम से हटाकर उन तमाम लोगों को सड़कों पर झोंक देना चाहिए ताकि वे कम से कम इतना तो देख और सीख सकें कि शासन-प्रशासन कैसा नहीं होना चाहिए। जो लोग इस दौर में सीखना नहीं चाहते, समकालीन इतिहास दर्ज करना नहीं चाहते, उनका सारा शिक्षण-प्रशिक्षण बकवास से अधिक कुछ नहीं रहेगा। किसी भी देश-प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सामाजिक जिम्मेदारी और सरोकार से परे नहीं होनी चाहिए, वरना विज्ञान एक बम बनाना जानता है, उसे हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराकर तबाही करने के नुकसान नहीं जानता। आज भारतीय लोकतंत्र की विफलता को लेकर एक व्यापक अध्ययन की जरूरत है। किसी भी समस्या के समाधान की पहली सीढ़ी यह होती है कि समस्या को समस्या माना जाए। उसे मानने के बाद ही उसका विश्लेषण करके जवाबदेही देखकर, उसका समाधान ढूंढा जा सकता है, भविष्य में उससे बचने का रास्ता ढूंढा जा सकता है। 

 

हिन्दुस्तान आज जिस दौर से गुजर रहा है, अगर लोकतंत्र कामयाब रहेगा, तो दुबारा ऐसी नौबत नहीं आएगी। लेकिन लोकतंत्र कामयाब तभी रहेगा जब उसकी आज की नाकामयाबी का अच्छी तरह अध्ययन करके आगे का रास्ता तय किया जाएगा। जो लोग सरकारिया कमीशन के पहले से भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्यों के संबंधों को लेकर फिक्र में दुबले होते आए हैं, उनके लिए केन्द्र-राज्य संबंधों के अध्ययन का इससे बड़ा कोई मौका आजाद भारत में तो नहीं आया था, और लोकतंत्र दुबारा ऐसा मौका आने भी न दें। जिन सैकड़ों लोगों ने केन्द्र-राज्य संबंधों को लेकर फर्जी और कागजी शोध किए हुए हैं, उन सबको रद्दी की टोकरी में डालते हुए आज ईमानदार शोधकर्ताओं को इस लॉकडाऊन को लेकर केन्द्र-राज्य के संबंधों, जिम्मेदारियों और अधिकारों पर नया अध्ययन करना चाहिए, और जिनकी दिलचस्पी इस या ऐसे विषय में हो, उनको भी मेहनत करने के लिए जुट जाना चाहिए। 

कुल मिलाकर बात को खत्म करते हुए हम अगर कुछ लिखें तो वह यह है कि समकालीन भारतीय इतिहास का ईमानदार और गंभीर दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है, लोगों के बयान, उनकी त्रासदी की असल जिंदगी की कहानियां दर्ज करने की जरूरत है, आदमियों से परे औरतों से भी अलग से बात करके उसे रिकॉर्ड करने की जरूरत है क्योंकि भारतीय समाज में एक त्रासदी का आदमी पर असर अलग होता है, और औरत पर असर अलग होता है। ऐसी गरीब, मजदूर, ग्रामीण, और मजबूर महिलाओं से बात करने के लिए महिला कार्यकर्ताओं और छात्राओं के भी बहुत बड़े-बड़े जत्थों की जरूरत पड़ेगी। इस देश की सरकारों में इतिहास लेखन के लिए जो संस्थाएं हैं, जो लोग हैं, वे कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई समकालीन इतिहास लेखन हो, लेकिन लोकतंत्र का तकाजा है कि यह हो। 

-सुनील कुमार


10-May-2020

बच्चे पैदा करने की सोचने
के पहले दुनिया पर सालभर
छाए रहने वाले खतरे भी सोचें

हमने कई दिन पहले इसी जगह बहुत गंभीरता से यह बात लिखी थी कि लोगों को इस बरस बच्चे पैदा करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। इसकी कोई वैज्ञानिक वजह हमारे पास नहीं थी, हमने सिर्फ कोरोना के मेडिकल खतरे को देखते हुए, और आने वाले वक्त देश और दुनिया की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सलाह यहां भी लिखी थी, और कुछ अधिक तल्ख शब्दों में सोशल मीडिया पर भी। अब इसका एक वैज्ञानिक आधार भी सामने आया है। जिस चीन से कोरोना शुरू हुआ है, उसी चीन ने वहां के पुरूष मरीजों के शुक्राणु की जांच करके यह पाया है कि उसमें भी कोरोना पहुंच रहा है। अब कितने नमूनों में से कितनों तक पहुंच रहा है हम इस पर जाना नहीं चाहते क्योंकि आंकड़े लोगों को झूठा दिलासा भी दिला देते हैं। लेकिन यह बात समझने की है कि जिस शुक्राणु से अगली पीढ़ी का जन्म शुरू होता है, उस शुक्राणु में अगर कोरोना वायरस पहुंच रहा है, तो यह एक वैज्ञानिक खतरे की बात भी है। 

आज इस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत इसलिए भी है कि डब्ल्यूएचओ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, समेत कई संगठनों का यह अंदाज है कि लॉकडाऊन के समय घरों में लंबे समय तक कैद जोड़ों के बच्चे इसी बरस में एक सैलाब की तरह आने वाले हैं। रोजगार जाने वाले हैं, जिंदगी जीने के साधन जाने वाले हैं, और बच्चे आने वाले हैं! फिर ये बच्चे एक ऐसी दुनिया में आएंगे जिसका इलाज का पूरा ढांचा कोरोना केन्द्रित हो चुका रहेगा, मतलब यह कि बाकी तमाम किस्म की बीमारियों के इलाज और चिकित्सा की जरूरत उपेक्षित रहेगी। लोगों के पास खाने को नहीं होगा, नौकरी और रोजगार नहीं रहेगा, लेकिन उनके हाथों में नए जन्मे बच्चे रहेंगे। अब यह पूरा सिलसिला इतना खतरनाक है कि यह सिलसिला भारी गैरजिम्मेदारी का भी रहेगा। अगर जिम्मेदारी के साथ एक नए बच्चे को बड़ा किया जाता है, तो उसका खर्च किसी भी मायने में एक बड़े से कम नहीं होता है। ऐसे में पहले से अधिक आबादी वाले हिन्दुस्तान जैसे गरीब देश में और बच्चे बढ़ाना एक भयानक खतरे की बात होगी, दुनिया के दूसरे देशों में भी। 

अगली पीढ़ी को दुनिया में लाना एक बड़ी तैयारी से गंभीर योजना के साथ किया हुआ काम रहना चाहिए। आने वाला वक्त बच्चों की बढ़ी हुई जरूरतों और बढ़ी हुई उम्मीदों का भी रहेगा। ऐसे में न तो दुनिया के अस्पताल बच्चों के सैलाब के लिए तैयार रहेंगे, और न ही अधिकतर परिवारों की आर्थिक स्थिति इस लायक रहेगी। हिन्दुस्तान जैसे देश में तो करोड़ों लोग आज जिस बेदखली के शिकार हुए हैं, उससे वे अगले सालभर के भीतर उबरकर पता नहीं किस शहर में रहेंगे, किस गांव में रहेंगे, या किस हाल में रहेंगे। ऐसे में अगर मजदूर काम पर लौटते हैं, तो दूसरे शहरों में जहां आज उन्हें सिर छुपाने की जगह नहीं मिली, दो वक्त का खाना नहीं मिला, वहां पर उनके नए बच्चे के जन्म की सुविधा मिल जाएगी, उसे पोषण आहार और इलाज मिल जाएगा, यह सपना फिजूल का है। लोगों को महज बच्चों की चाह, या सेक्स के चलते अनचाहे बच्चों से इस दौर में बचना चाहिए। कोरोना के पूरे खतरे तो अभी तक सामने भी नहीं आए हैं, आने वाले महीनों में हो सकता है कि कोरोना के बाद के कई और खतरे चिकित्सा विज्ञान स्थापित करे, और वे अगर सबसे गरीब आबादी के कम संख्या के लोगों को प्रभावित करने वाले होंगे तो उसके लिए टीका या दवाईयां भी विकसित करने का काम इस रफ्तार से नहीं होगा जिस रफ्तार से आज कोरोना के लिए टीका तलाशा जा रहा है। इसलिए इस धरती को भी थोड़ी सी राहत देनी चाहिए, बढ़ती हुई आबादी से, उस आबादी की बढ़ती हुई खपत से, और धरती की तबाही से। हम यह बात भारत जैसे गरीब देशों के संदर्भ में नहीं लिख रहे क्योंकि हिन्दुस्तानी आबादी अधिक होने के बावजूद प्रति व्यक्ति खपत की बात करें तो हिन्दुस्तानी लोग बहुत पीछे हैं, उनकी जरूरतें बहुत सीमित है। दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले हिन्दुस्तान के औसत बच्चे दस फीसदी भी खपत नहीं करते, पांच फीसदी भी खपत नहीं करते। लेकिन कम खपत के बावजूद हिन्दुस्तानी बच्चों के साथ एक दिक्कत यह है कि यह देश दुनिया में सबसे कम स्वास्थ्य सुविधाओं वाला देश है, अपने से बहुत से गरीब देशों के मुकाबले भी हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य सुविधाएं कम हैं, और जो हैं उनमें भी अमीर और गरीब आबादी के बीच इनका बंटवारा बहुत अधिक अनुपातहीन है। ऐसे में कोरोना के तुरंत बाद पैदा होने वाली पीढ़ी अगर कोई गंभीर तकलीफ लेकर आएगी तो उसका क्या होगा? दुनिया में जगह-जगह ऐसा हुआ है कि किसी दवा के साईड इफेक्ट से, या किसी वायरस की वजह से बच्चे बहुत ही गंभीर शारीरिक दिक्कतों को लेकर पैदा हुए। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले ही जीका वायरस के चलते हुए ब्राजील जैसे कई देशों में जो बच्चे पैदा हुए वे बहुत भयानक तकलीफों को झेल रहे थे। उन तस्वीरों को देखना भी डरावना हो सकता है लेकिन फिर भी हम खतरे से लोगों को आगाह करना चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला मां-बाप के लिए अपने पर काबू करने का है, परिवार के बुजुर्गों को भी अपनी उन हसरतों पर काबू पाना चाहिए कि वे जाने के पहले अगली पीढ़ी का चेहरा देख लें। ऐसे तमाम लोग यह सोचें कि अगली पीढ़ी का चेहरा अगर इस किस्म का होगा, जैसा कि जीका वायरस की वजह से हुआ है, तो क्या वैसा चेहरा भी उन्हें खुश करेगा? 

आज का वक्त बहुत खराब होने के बावजूद दवा दुकानों के खुले रहने का है। अगले एक बरस के लिए लोगों को अपने मनपसंद गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करके अगले बच्चों से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे खतरे और इतनी अनिश्चितता के बीच बच्चों के बारे में सोचना सिवाय आपराधिक गैरजिम्मेदारी के और कुछ नहीं होगा। 
-सुनील कुमार


09-May-2020

आज भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि

आज एक अजीब सी खबर सामने आई है, जब पूरे देश से करोड़ों मजदूर अपने गृहप्रदेश लौटने के लिए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल चल रहे हैं, तब बिहार के मजदूरों की ट्रेन सरकारी मंजूरी के साथ तेलंगाना रवाना हुई है, क्योंकि वहां मिल मालिकों ने उन्हें काम पर बुलाया है, और सरकारी औपचारिकताएं पूरी करके वे काम पर जा रहे हैं। हिन्दुस्तान अलग-अलग प्रदेशों में खंडित देश कभी नहीं रहा है। जब यह अंग्रेजों का गुलाम रहा उस वक्त तो पूरा का पूरा पाकिस्तान, इधर बांग्लादेश सहित कई और देशों तक इस देश का नक्शा, या अंग्रेजीराज का नक्शा फैले रहा। यह तो हाल के बरसों में केन्द्र और राज्यों के बीच एक अभूतपूर्व टकराव खड़ा हुआ है जिसकी वजह से बार-बार देश के संघीय ढांचे की बात उठ रही है। पहले शायद यह बात इसलिए भी अधिक नहीं उठती थी कि देश का अधिकतर हिस्सा अकेली कांग्रेस पार्टी के कब्जे में था, और केन्द्र तथा अधिकतर राज्य एक ही रीति-नीति पर, एक ही लीडरशिप पर चलते थे। आज जब अलग-अलग प्रदेशों से निकलकर मजदूर अपने गांव लौट जाना चाह रहे हैं, ताकि बिना काम के भी वे अपनी झोपड़ी में जिंदा रह सकें, तो यह बात भी उठ रही है कि दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करने वालों की ऐसी वापिसी से इन उद्योग-व्यापार का क्या होगा, और अपने प्रदेश जाकर वे क्या करेंगे, उनके लिए रोजगार पहले ही नहीं था तभी तो वे दूसरे प्रदेश पहुंचे थे। अब लौटकर वे अपने गरीब प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या एक नया अतिरिक्त बोझ नहीं बन जाएंगे? 

आज हिन्दुस्तान के सभी प्रदेशों के सामने दो किस्म की दिक्कतें चल रही हैं। धंधा बंद है जिससे कि सभी परेशान हैं, जनता से लेकर सरकार तक का जीना मुश्किल हो रखा है। दूसरी बात जम्मू-कश्मीर राज्य के वक्त से वहां जिस तरह का लॉकडाऊन शुरू हुआ, वह राज्य के टुकड़े हो जाने के बाद भी जारी है, और लोगों का जीना कैसे हो रहा होगा, यह बाकी हिन्दुस्तान ने कभी सोचा ही नहीं। आज बाकी हिन्दुस्तान की हालत कमोबेश उसी किस्म की हो रही है जिस तरह कश्मीर की हालत आधा साल पहले से चली आ रही थी। आवाजाही बंद, धंधा बंद, स्कूल-कॉलेज बंद, और धरती की इस जन्नत को बाकी हिन्दुस्तान के मुकाबले एक और अतिरिक्त रोक मिली थी, फोन और इंटरनेट बंद होने की। आज बाकी हिन्दुस्तान कम से कम फोन और इंटरनेट की कमी तो नहीं झेल रहा है। आज देश के बाकी तमाम प्रदेश मंदी से परे एक दूसरी दिक्कत झेल रहे हैं, कुछ के पास कारखाने हैं, कंस्ट्रक्शन के काम हैं, लेकिन मजदूर लौट चुके हैं, या बचे-खुचे लौटने के लिए स्टेशनों पर पहुंचे हुए हैं, या पटरियों पर कटे पड़े हैं। दूसरी तरफ जिन राज्यों में उनके मजदूर लौट रहे हैं, उन राज्यों के पास स्टेशनों पर, या राज्य की सरहद पर मेडिकल जांच की चुनौती है, तमाम मजदूरों की जानकारी दर्ज करने, उन्हें ठहराने, जरूरत पर उनका इलाज करने के लिए दाखिला करने, और फिर उन्हें गांव तक पहुंचाने की चुनौती तो है ही। इससे परे एक और बहुत बड़ी चुनौती यह है कि लाखों से लेकर दसियों लाख तक लोग अलग-अलग राज्यों में लौट रहे हैं, उन्हें कैसे काम से लगाया जाएगा? दूसरे प्रदेशों में मजदूरी या दूसरे काम करके वे लोग जो कमाई घर भेजते थे, अब उसका क्या होगा? घरवालों का क्या होगा? कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर बेकारी और बेरोजगारी के जो-जो बुरे असर हो सकते हैं, उन सबसे राज्य कैसे निपटेंगे? 

बोलचाल की मजाक की जुबान में कहा जाता है कि एक तरफ पीपल के पेड़ को भूत नहीं मिल रहा है, तो दूसरी तरफ भूतों को पीपल नहीं मिल रहा है। आज प्रदेशों की हालत यही है। कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे बहुत सारे संपन्न, विकसित, और रोजगार की गारंटी वाले राज्य हैं, जो कि अपनी स्थानीय आबादी से अधिक बाहरी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं। स्थानीय आबादी खेती में खप जाती है, और दूसरे बहुत से कारोबार दूसरे प्रदेशों के मजदूरों पर टिके रहते हैं। ऐसे लोगों में से बहुत से लोग तो आज भी रोजगार की जगह को छोड़कर अपने गांव लौटने के पहले चार बार सोच रहे हैं कि गांव लौटकर आखिर करेंगे क्या? यहां पर एक बार फिर केन्द्र और राज्य सरकारें की जिम्मेदारी और नाकामयाबी दोनों की चर्चा जरूरी हो जाती है। राज्यों के पास न तो अपने राज्य से बाहर गए हुए मजदूरों, कारीगरों, और दूसरे हुनरमंदों की पुख्ता और पूरी जानकारी है, न ही विकसित राज्यों के पास वहां आए हुए दूसरे प्रदेशों के मजदूरों  की जानकारी है। हालत यह है कि जिन राज्यों के लोग बाहर जाते हैं वहां की सरकार, वहां के नेता, वहां का समाज उसे मजदूरों का पलायन कहता है। हम लगातार हमेशा से इस पलायन शब्द को अन्यायपूर्ण मानते हुए यह लिखते आए हैं कि मजदूर अपनी किसी जिम्मेदारी को छोड़कर बाहर नहीं भागते हैं, जब उनके अपने प्रदेश की सरकारें उन्हें रोजगार नहीं दे पातीं, उन्हें जायज मजदूरी नहीं मिल पाती, तो ही वे काम की तलाश में, बेहतर मजदूरी की तलाश में बाहर जाते हैं। इसी तरह आज जब रोजगार देने वाले प्रदेश इस बात का रोना रो रहे हैं कि जब काम शुरू होने के आसार हैं तो मजदूर उन्हें छोड़कर चले जा रहे हैं, और इसे उल्टा-पलायन कह रहे हैं, तो हम एक बार फिर इस शब्द को भी अन्यायपूर्ण पाते हैं। हमारा मानना है कि रोजगार वाले प्रदेश अगर प्रवासी मजदूरों का ठीक से ख्याल रखते, तो हजार-हजार किलोमीटर के सफर पर मरने के लिए ये गरीब मजदूर निकले ही नहीं होते। इन रोजगारी प्रदेशों ने भी बाहर से आए मजदूरों को मानो स्थानीय कारोबारियों और कारखानेदारों का बंधुआ मजदूर बनाकर आसानी से भुला दिया था क्योंकि ये उन राज्यों के वोटर तो थे ही नहीं। 

अब जब केन्द्र सरकार ने करीब डेढ़ महीने पहले लॉकडाऊन किया, तो उसने इनमें से किसी भी किस्म के प्रदेश से चर्चा नहीं की, जहां मजदूर थे उनसे चर्चा नहीं की कि सबसे आसान काम, उन्हें उसी प्रदेश में जिंदा रहने में मदद करता, कैसे किया जाएगा। दूसरी तरफ जिन प्रदेशों में ऐसे करोड़ों मजदूर लौट सकते थे, उनसे भी बात नहीं की कि इनके वापिस आने का क्या इंतजाम होगा, लौटकर वे कहां रहेंगे, क्या करेंगे, और क्या कमाएंगे-खाएंगे। नतीजा यह हुआ कि आज हर राज्य एक किस्म से अनाथ हो गया है और उसे अपने धंधों की, या अपने बंदों की फिक्र सारी की सारी खुद करनी पड़ रही है। नतीजा यह हुआ है कि भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए एक समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि जिम्मेदारी आकर प्रदेश की सरहद पर खत्म हो रही है, या वहां से शुरू हो रही है। जब कभी राष्ट्रीय स्तर की कोई समस्या होती है, विपदा होती है, या राष्ट्रीय स्तर का कोई समाधान ढूंढना होता है, तो भारत के संघीय ढांचे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी, और शायद अकेली जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर ही आती है, जो कि राज्यों को भरोसे में लेकर, उनमें तालमेल बिठाकर, जरूरत के मुताबिक उनकी मदद करके विपदा से पार पाती है। लेकिन आज केन्द्र सरकार मोटे तौर पर एकतरफा बंदिशें लागू करने वाली एक तमाशबीन की तरह दिख रही है जो कि राज्यों के बीच किसी भी किस्म के तालमेल से बिल्कुल ही हाथ झाड़ बैठी है। यह नौबत भारतीय लोकतंत्र और उसकी शासन व्यवस्था को बनाने वाले लोगों ने शायद सोची भी नहीं होगी कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की सबसे भयानक विपदा के वक्त केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी, और प्रदेशों के बीच अपने-अपने अस्तित्व का संकट उन्हें आत्मकेन्द्रित और आत्मरक्षा के फैसले लेने पर मजबूर करेगा। आज हालत यह है कि कुछ प्रदेश बिना किसी इंतजाम के बेबस मजदूरों को बेबसी में रोके रखना चाहते हैं, ठीक बंधुआ मजदूरों की तरह। कई प्रदेश यह बिल्कुल भी नहीं चाहते हैं कि कोरोना-संक्रमण के इस भयानक दौर में उनके प्रदेश के मूल निवासी मजदूर दूसरे प्रदेशों से वापिस लौटें, और सरकार की मुसीबत को कई गुना बढ़ा दें। और जिन प्रदेशों से होकर मजदूर गुजर रहे हैं, वे सारे ही प्रदेश यह चाहते हैं कि यह बला जल्द से जल्द उनकी जमीन से पार हो जाए, और अगले प्रदेश में चले जाए। कड़वा सच यह भी है कि प्रदेशों के भीतर भी मजदूरों की राह में पडऩे वाले जिलों के अफसर भी इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि वे अपने जिलों में दाखिल होने वाले मजदूरों को जल्द से जल्द अगले जिले में दाखिल करवा देना चाहते हैं, ताकि उनके जिले पर से बला टले। 

केन्द्र सरकार के एक गलत, और बिना तैयारी, बेमौके के लॉकडाऊन के एकतरफा फैसले ने राज्यों को केन्द्र से अलग कर दिया है, और राज्यों के भीतर एक जिले ने उसको दूसरे जिले से अलग कर दिया है। अखंड भारत की सोच रखने वाले लोगों को यह खंड-खंड भारत, और उसके खंड-खंड जिले आसानी से समझ नहीं आएंगे क्योंकि भावनाओं की पट्टी आंखों के साथ-साथ दिमाग को भी ढांक लेती है। फिलहाल यह बरस निकल जाए, तो उसके बाद लोकतंत्र के शोधकर्ताओं को भारत के संघीय ढांचे पर कोरोना की चुनौती नाम का एक दिलचस्प मुद्दा शोध करने के लिए मिलेगा। 
-सुनील कुमार


08-May-2020

घर लौटते थोक में कटते मजदूर 
कोरोना और पूंजीवाद ही नहीं, 
लोकतंत्र की भी मार झेल रहे हैं

महाराष्ट्र में आज सुबह-सुबह रेलपटरियों पर थककर निढाल होकर सोए हुए प्रवासी मजदूरों पर से मालगाड़ी धड़धड़ाते हुए निकल गई, और करीब डेढ़ दर्जन मजदूर कटकर मर गए। वे जालना के एक कारखाने में काम करते थे, और उन्हें भुसावल से मध्यप्रदेश वापिसी की ट्रेन मिलने की उम्मीद या खबर थी। पूरी रात पटरियों पर चलकर थककर वे सो गए थे क्योंकि उनकी जानकारी के हिसाब से देश भर में रेलगाडिय़ां बंद थीं। थकान इतनी रही होगी कि आती मालगाड़ी की आवाज भी, पटरियों की कंपकपी ने भी उनकी नींद तोड़ी नहीं होगी, और सब गाजा-मूली की तरह कट गए। ये मध्यप्रदेश के शहडोल इलाके से गए हुए मजदूर बताए जा रहे हैं, इस इलाके के आदिवासी मजदूर हमेशा से काम की तलाश में देश के दूसरे हिस्सों में जाते रहे हैं। इसके साथ-साथ उमरिया जिले के मजदूर भी थे जिन्हें अपना प्रदेश देखना नसीब नहीं हो पाया। लॉकडाऊन के पैंतालीस दिनों के बाद भी आज देश भर में घरवापिसी करते मजदूरों का यही हाल है। अब तक दर्जनों और मजदूर सड़कों पर गिरकर मर चुके हैं जिनमें बस्तर की बारह बरस की एक बच्ची भी शामिल है जो तेलंगाना के मिर्च के खेतों से मजदूरी करके लौटते हुए तीन दिन पैदल चलने के बाद मर गई। इस देश में लौटते हुए मजदूरों में से अधिकतर बदन में पानी की कमी से मर रहे हैं, थोक में ऐसी मौतों का आज सुबह यह पहला मामला रहा, जो हो सकता है कि देश में कुछ लोगों का दिल हिला भी सके। 

न चाहते हुए भी लॉकडाऊन के नतीजों और असर पर घूम-फिरकर लिखना पड़ रहा है क्योंकि उसके बिना लिखने की जिम्मेदारी पूरी हो नहीं सकती। आज यह बात समझ में आ रही है कि केन्द्र सरकार के लादे गए इस लॉकडाऊन के लिए राज्य बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। न तो राज्यों की ऐसी कोई विशेषज्ञता थी कि करोड़ों लोगों की आवाजाही को सेहत की जांच के साथ जोड़कर वे काबू में रख सकें, उनका इंतजाम कर सकें। न ही करोड़ों लोगों की जांच का इंतजाम राज्यों के पास था, न ही इलाज का। लेकिन इन सबसे बढ़कर करोड़ों मजदूरों के रहने-खाने, और जिंदा रहने की बाकी जरूरी बुनियादी बातों के इंतजाम का तो उनके पास कुछ भी नहीं था। न हुनर था, न ताकत थी, और न ही केन्द्र सरकार ने राज्यों को इस फैसले में किसी भी तरह शामिल किया था। नतीजा यह हुआ कि चार घंटे के नोटिस पर देश भर में रेल-बस सबको बंद कर दिया गया, और लोग फंसे रह गए। राज्यों के ऊपर एक ऐसी जिम्मेदारी आ गई जिससे निपटना उन्हें सीखना भी पड़ रहा है, और युद्ध स्तर पर उसे करना भी पड़ रहा है। जिस राज्य की जितनी क्षमता है, राजनीतिक इच्छा-शक्ति है,  उतना काम हो पा रहा है, और पूरे देश भर से एक बात समझ आ रही है कि हर राज्य अपनी जमीन पर से तो दूसरे राज्य के लोगों को जल्द से जल्द सरहद पार करा देना चाह रहा है, और अपने लोगों को लौटाकर लाने के काम को या तो चाह नहीं रहा है, या फिर प्रतीकात्मक रूप से, अनमने ढंग से कर रहा है ताकि प्रदेश पर न तो अंधाधुंध आर्थिक बोझ आए, और न ही प्रदेश की इलाज की क्षमता चुक जाए। यह सिलसिला इसलिए भी खड़ा हुआ है कि न तो केन्द्र सरकार ने राज्यों को इस फैसले में शामिल किया, न तैयारी में शामिल किया, और न ही इसकी अभूतपूर्व लागत में हिस्सा बंटाया। नतीजा यह है कि आज राज्य अपने सीमित साधनों को देखते हुए जो कर पा रहे हैं, और उस सीमा के भीतर जो सचमुच ही करना चाह रहे हैं, वही कर रहे हैं।

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नतीजा यह है कि लॉकडाऊन के करीब डेढ़ महीने बाद मजदूर अब तक घर जाने के रास्ते पर हैं, हम छत्तीसगढ़ में ही रोजाना ट्रकों पर सामानों के ऊपर लदे हुए मजदूरों को देख रहे हैं, और आम लोगों के लिए भी यह सोच पाना आसान नहीं होगा कि तपती दुपहरी में लोहे के गैस सिलेंडरों से लदी ट्रक के ऊपर उन सिलेंडरों पर बैठे हुए मजदूर अगर पूरे-पूरे दिन का सफर कर रहे हैं, और उसे पैदल सफर के मुकाबले एक राहत मान और पा रहे हैं, तो यह इस लोकतंत्र के इतिहास में एक काला दिन है जब लोग घरों में बंद एयरकंडीशंड आराम में शिकायत कर रहे हैं, और करोड़ों लोग इस तरह सफर कर रहे हैं। यह उन पर महज कोरोना की मार नहीं है, उनसे कहीं अधिक यह लोकतंत्र की मार है जिसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के पसंदीदा तीर्थयात्री एक अलग दर्जे के हिन्दुस्तानी हैं जिनको ले जाने के लिए एयरकंडीशंड बसें हैं, अलग-अलग राज्य सरकारों की बसें हैं जो कोटा में लाखों रूपए सालाना खर्च करके कोचिंग पा रहे बच्चों को वापिस ला रही हैं, लेकिन तपती गर्मी में गर्भवती महिलाओं, दुधमुंहे बच्चों, और बुजुर्गों को लेकर सफर करते लोगों के लिए सामाजिक संगठनों द्वारा कहीं-कहीं मिल जा रहे खाने के पैकेट हैं। आज राज्य सरकारें भी मोटेतौर पर इन मजदूरों को कहीं-कहीं पर रोक रही हैं, तो वह मजदूरों को राहत देने के लिए कम, और अपने राज्य को बीमारी से बचाने के लिए ज्यादा है। ऐसे में मजदूरों का जत्था, घरवापिसी के लिए पटरियों पर चलते-चलते, पूरी रात चलते जब थककर वहीं सो गया, तो इस लोकतंत्र ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। 

यहां लिखी कई बातों पर हम पिछले दिनों में कई बार लिख चुके हैं, लेकिन रोज ही ऐसी मौतें सामने आ रही हैं, रोज ही नेताओं के श्रद्धांजलि नाम के पूरी तरह खोखले शब्द हवा में गूंज रहे हैं, जो कि जिम्मेदारी की जगह श्रद्धांजलि का काम कर रहे हैं। यह देश पिछले दो महीनों में लोकतंत्र को जितने हिंसक और वीभत्स रूप में देख चुका है, उससे यह बात साफ है कि जब देश-प्रदेश की सत्ता हांकने वाले लोग करोड़पतियों से बढ़कर अरबपति और खरबपति हो जाते हैं, जब उनके दोस्त केवल खरबपति रह जाते हैं, तब भूख, प्यास, धूप, फफोले, बच्चों का दूध जैसे शब्दों के मायने वे भूल जाते हैं। यह लोकतंत्र इतना खतरनाक हो गया है कि यह बहुमत का तय किया हुआ हिंसातंत्र हो गया है, यह लोकतंत्र सत्ता की आंखों में जनता की अनदेखी का तंत्र हो गया है। यह लोकतंत्र अब दो अलग-अलग तबकों का हो गया है, एक वह जिसके पास लॉकडाऊन के लिए आरामदेह घर है, और दूसरा वह तबका जिसके पास अपने घर पहुंच जाने की दहशत में मौत तक का सफर है। 

हमको इस मौके पर एक और बात पर हॅंसी आती है, इस देश के तमाम ईश्वर अपने-अपने घरों में कपाट बंद करके बैठ गए हैं, और हो सकता है कि भीतर वे मास्क भी लगाकर बैठे हों। और जिस देश की अमूमन आस्थावान जनता ईश्वर के नाम पर धोखा खाते आई है, वह आज भी उसी ईश्वर का नाम लेते हुए यह सफर कर रही होगी, जबकि यह बात जाहिर है कि किसी धर्म के किसी ईश्वर ने भी ऐसा मुश्किल सफर कभी नहीं किया होगा। इस देश के आज के नेताओं में से भी किसी ने न कभी ऐसा मुश्किल सफर किया होगा, न अपने मां-बाप और बच्चों को इस तरह मरते देखा होगा, न ही उनमें से किसी की संतानें ऐसे में सड़क किनारे पैदा हुई होंगी, और जिनके दिमाग से महाराष्ट्र की आज की डेढ़ दर्जन लाशें भी शायद शाम तक हट चुकी होंगी। ऐसे लोकतंत्र में आज हिन्दुस्तानी गरीब मजदूर, और उसके कुनबे महज कोरोना से नहीं लड़ रहे, वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लड़ रहे हैं, और सरकारों की अनदेखी से भी लड़ रहे हैं, खासकर केन्द्र सरकार की।
-सुनील कुमार 


07-May-2020

अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें 
मजदूर कानून स्थगित रखने 
की तैयारी कर रही हैं ?

आन्ध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में एक केमिकल-कारखाने से मुंहअंधेरे जहरीली गैस रिसी, और आठ लोगों की मौत की खबर है, और हजारों इससे प्रभावित हुए हैं। दुनिया के सबसे बुरे औद्योगिक हादसे, भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने की याद ऐसे मौके पर आती ही है जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, और लाखों की जिंदगी तबाह हो गई थी। चौथाई सदी गुजर जाने पर भी भोपाल उसके जख्मों से उबर नहीं पाया है। वह गैस हादसा भी इसी तरह स्टोर की गई गैस में हुआ था, और इसी तरह सुबह के मुंहअंधेरे हुआ था। 

कल से लेकर आज तक देश के मजदूरों और कारखानों की ही चर्चा हो रही है, और कल इसी जगह हमने देश के कई उद्योगपतियों, और कई उद्योग संगठनों की बात भी लिखी थी जो कि यह सोचते हैं कि लॉकडाऊन के इस दौर में खाली बैठे मजदूर अपने गांव भी न जाएं, और कारखाने-काम शुरू होने का इंतजार करें। दूसरी तरफ मालिकों से किसी तरह की मदद न मिलने पर, जान पर खतरा, जेब खाली, सिर पर अनिश्चितता के चलते मजदूर राह में मरते हुए भी पैदल आगे बढ़ते जा रहे हैं, बचे हुए जिंदा मजदूर। ऐसे में मजदूरों के हक, काम की उनकी गारंटी की बात भी करना जरूरी है। एक खबर यह आ रही है कि भारत के कुछ राज्य मजदूर कानूनों में अगले तीन साल के लिए ढील देने जा रहे हैं ताकि कारखानों के बंद होने की नौबत न आए, और नए कारखाने शुरू करने में लोगों की दिलचस्पी रहे। यह बात कई देशों के सिलसिले में पहले भी हुई है कि किस तरह चीन में मजदूर कानूनों को खत्म करके वहां पर उत्पादन बढ़ाया गया है, और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। हिन्दुस्तान में अभी दो-चार दिन पहले ही देश के एक सबसे अच्छे समझे जाने वाले उद्योगपति, नारायण मूर्ति का यह बयान सामने आया था कि लोगों को दस घंटे रोज काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस बात के लिए मजदूरों के बहुत से हिमायती लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना भी की थी, और कल से अब तक कर्नाटक के भवन निर्माताओं की आलोचना चल ही रही है कि उन्होंने किस तरह राज्य सरकार पर दबाव डालकर मजदूरों की वापिसी की रेलगाडिय़ां रद्द करवाईं ताकि लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होने पर निर्माण मजदूर उपलब्ध रहें। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि उत्तरप्रदेश मंत्रिमंडल ने अगले तीन बरस के लिए बहुत से मजदूर कानून स्थगित कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी अधिक पुख्ता जानकारी आई नहीं है कि यह खबर सच है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश को लेकर एक पुख्ता अखबार की जानकारी है कि वहां ऐसी तैयारी चल रही है कि औद्योगिक मजदूरों को लेकर बहुत से कानूनों को स्थगित किया जा सकता है ताकि नए उद्योग वहां आएं। बिहार को लेकर यह बात चल रही है कि आज वहां पर जितनी जनता काम के उम्र की है, उसे भी काम नसीब नहीं है, और इसीलिए लोग बाहर जाते हैं। अब बिहार के सामने यह दिक्कत है कि वहां से बाहर गए 17 लाख मजदूर लौटते हैं, तो वे इस पहले से बेरोजगार चल रहे राज्य में काम क्या करेंगे? और दूसरे प्रदेशों में काम करते हुए वे घर पर जो मजदूरी भेजते थे, उसके बंद होने से बिहार का क्या होगा?

कोरोना के आने के पहले से ही बाजार की मंदी भयानक थी। हिन्दुस्तानी कारखानों और कारोबारों में से शायद ही कोई चैन से दिन गुजार रहे थे। ऐसे में कोरोना इन दो महीनों का धंधा तो खत्म कर ही चुका है, यह बात तय है कि आज ही कोरोना चल बसे, तो भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में चार-छह महीने और लगेंगे ही। आज तो हाल यह दिखता है कि हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था की पटरी भी लोग बेचकर खा चुके हैं, और पटरी भी फिर से बिछानी पड़ेगी। लेकिन यह हालत सिर्फ सरकारों की हो ऐसा भी नहीं है। यह हालत हर कारोबार की भी है। देश के जाने कितने ही टीवी चैनल अपने लोगों को निकाल चुके हैं, बहुत से अखबारों ने छपना बंद कर दिया है, और सिर्फ डिजिटल संस्करण पर आ गए हैं। कल सुबह का टाईम्स ऑफ इंडिया कुल 8 पेज का था, जबकि साल में बहुत से दिन इस अखबार के आठ पेज पलटने के बाद तो इश्तहार खत्म होते थे। यह हाल सभी का है। केन्द्र सरकार की तरफ से यह आदेश जरूर निकाल दिया गया कि कोई मालिक तनख्वाह न काटे, राज्य सरकारों ने आदेश निकाल दिया कि कोई स्कूल फीस न मांगे। अब सवाल यह है कि फीस न लें, तो शिक्षकों को तनख्वाह कहां से दें? इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि मजदूर कानून, और नौकरी की सेवा शर्तों से परे जाकर केन्द्र सरकार का फतवा कोई मायने नहीं रखता है, और सरकार किसी को जबर्दस्ती तनख्वाह नहीं दिला सकती। 

अब देश में ऐसे हाल में जब उद्योग-धंधों का एक बड़ा हिस्सा शुरू नहीं होने जा रहा है, उस वक्त कोई सरकार अगर यह सोच रही है कि मजदूर कानूनों को निलंबित रखकर किसी तरह काम-धंधों को शुरू होने दिया जाए, तो एक सरकार के रूप में उसका यह सोचना हमें नाजायज नहीं लगता है। हिन्दुस्तान में एक सदी लड़ते-लड़ते मजदूरों को हक मिले थे, लेकिन ये तमाम हक तभी तक मायने रखते हैं, जब तक उनके साथ-साथ मजदूरी या तनख्वाह भी मिलते रहे। नौकरी ही छूट जाए, काम ही बंद हो जाए, तो मजदूर कानूनों से पेट भरने वाला नहीं है। हमारी यह बात मजदूर विरोधी लग सकती है, लेकिन अगर आज कड़ाई से मजदूर कानूनों को लागू करवाया जाए तो बहुत ही कम काम-धंधे शुरू हो पाएंगे। देश में कई किस्म के काम के लिए केन्द्र सरकार द्वारा तय किए गए वेतनमान आज भी मालिक के हिसाब से व्यवहारिक नहीं हैं, और वे जमीन पर अधिकतर संस्थानों में लागू भी नहीं होते हैं, जिनमें अखबारों को लेकर बनाया गया वेतनमान भी शामिल है। इसी तरह दूसरे कारोबार भी देश की अर्थव्यवस्था के चलते मजदूर कानूनों का बोझ उठाना मुश्किल पा रहे हैं। ऐसे में सरकार में बैठा तबका जरूर यह सोच सकता है कि काम-धंधे चलें तो ही मजदूर-कामगार को काम मिलेगा, और सरकार को टैक्स मिलेगा। आज कोरोना के पहले की बदहाली में कोरोना के बाद की बर्बादी ने जुड़कर हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे फटेहाल में पहुंचा दिया है कि मजदूर कानून और रोजगार के बीच आपस में एक टकराव दिखने लगा है। यह नौबत मजदूरों के हित के खिलाफ है, लेकिन यह नौबत मालिकों के काबू के बाहर की भी है। अब आने वाला वक्त कौन से कानून, कौन से अधिकार, और कौन से रोजगार की जगह लेकर आता है, यह बताना अभी मुश्किल है क्योंकि अभी कोरोना का खतरा पूरी तरह से सामने आना भी बाकी है। अभी हो सकता है कि आने वाले महीने सरकार और कारोबार दोनों के लिए इससे भी अधिक चुनौती के रहेंगे, और सब कुछ इन दोनों के काबू के बाहर भी रहेगा। 

हमने मजदूरों-कामगारों, और हुनरमंद स्वरोजगारियों, सभी के लिए पिछले दिनों यह लिखा था कि लॉकडाऊन के दौरान उनको अपने हुनर को बेहतर बनाना चाहिए, कोई बेहतर हुनर सीखना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त किसी भी धंधे का मैनेजमेंट एक कसाई की तरह यह देखेगा कि किस कर्मचारी से उसका कितना काम निकलता है। जिंदा रहने के लिए हर किसी को अपने आज से बेहतर होकर चलना होगा, अधिक मेहनत करनी होगी, वरना गुजारा बहुत ही मुश्किल रहेगा। जिस तरह लोगों को अपने घर के भीतर के खर्च भी घटाने होंगे, सीमित साधन-सुविधाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना होगा, कुछ वैसा ही कारोबार का मैनेजमेंट भी करने पर मजबूर होगा। सारे कानून धरे रह जाएंगे अगर मैनेजमेंट अपने कमजोर कर्मचारियों को हटाने पर उतारू हो जाएगा। हिन्दुस्तान में करोड़ों कर्मचारी बिना किसी औपचारिक कागजात के काम करते हैं जिनको कभी भी हटा दिया जाता है, कभी भी हटाया जा सकता है। ऐसे में मजदूर-अदालतें सरकारी अधिकारी ही चलाते हैं, और सरकार का रूख किसी भी तरह धंधे को जारी रखने का होगा। जब तक कर्मचारी संगठन अदालतों तक जाकर मजदूर कानूनों पर कड़ी अमल के आदेश लाकर उन पर अमल करवाएं, तब तक करोड़ों लोगों के भूखे मरने की नौबत आ सकती है। इसलिए आने वाले महीनों के लिए ही तमाम कामगार-कर्मचारी अपने आपको महत्वपूर्ण साबित करने के लिए तैयारी करें, क्योंकि आने वाला वक्त कम संख्या में अधिक काम करने वाले लोगों का रहेगा, वैसे ही लोगों को काम मिलेगा, वैसे ही लोग अपने स्तर पर जिंदा रह पाएंगे। यह वक्त तमाम गैरसरकारी वेतनभोगियों के लिए बहुत ही खतरे का है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होगा, नौकरियां जाने लगेंगी। सभी लोग कमर कसकर तैयार रहें। 
-सुनील कुमार