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1999 के लोकसभा चुनाव
20-Apr-2021 12:35 PM (34)
1999 के लोकसभा चुनाव

13वीं लोकसभा में भी किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला लेकिन ये चुनाव ऐतिहासिक था क्योंकि पहली बार कई पार्टियों की मिलीजुली सरकार केंद्र में पांच साल पूरे करने में कामयाब रही। नरसिम्हा राव सरकार के बाद देश तीन लोकसभा चुनावों से गुजर चुका था और इसके बाद एक स्थिर सरकार लोगों के लिए सुकून लाने वाली थी। लेकिन वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए की इस स्थिरता को बनाए रखना इतना आसान न था। इसके लिए बीजेपी ने अक्लमंदी से काम लिया। भारतीय जनता पार्टी अकेले चुनाव में नहीं गई। उसके साथ 20 पार्टियों का गठबंधन था। कई दूसरी पार्टियां जो एनडीए का हिस्सा नहीं थीं उन्होंने भी चुनाव बाद समर्थन देने का वायदा किया।
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में चुनाव में उतरी। पर एनडीए के मुकाबले कांग्रेस के साथ बहुत कम पार्टियां थीं। कांग्रेस का गठबंधन एनडीए के मुकाबले कमजोर था। उधर लेफ्ट का थर्ड फ्रंट भी मौजूद था लेकिन ये गठजोड़ भी मजबूत नहीं था। यही नहीं करीब एक हजार ऐसे उम्मीदवार भी मैदान में थे जो किसी पार्टी से नहीं जुड़े थे और निर्दलीय के तौर पर चुनाव मैदान में थे।13वें लोकसभा चुनाव के कई मुख्य मुद्दे थे लेकिन उस वक्त का सबसे हॉट मुद्दा था सोनिया गांधी का भारतीय राजनीति में पूरी तरह से दाखिल होना। सोनिया कांग्रेस और राजनीति दोनों के लिए अभी नौसिखिया ही थीं लेकिन सोनिया गांधी से जुड़ा एक और मुद्दा था जिसे ना सिर्फ एनडीए ने जमकर भुनाया बल्कि कांग्रेस पार्टी में भी बगावत के सुर उठने लगे। ये था सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा।
महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता शरद पवार, उत्तर-पूर्व के नेता पी ए संगमा और बिहार के तारिक अनवर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस से अलग हो गए। इन्होंने मिलकर नई पार्टी का गठन किया जिसका नाम रखा गया नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी। सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे और कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को विरोधी पार्टियों ने चुनाव में खूब भुनाया। खासतौर से बीजेपी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी सोनिया गांधी बनाम स्वदेशी वाजपेयी के मुद्दे को हवा दी। दूसरा मुद्दा जिस पर बीजेपी को लोगों का समर्थन मिल रहा था वो था चुनाव के कुछ ही महीने पहले खत्म हुआ कारगिल युद्ध। अटल बिहारी वाजपेयी ने कारगिल युद्ध में जिस तरह की नीति अपनाई उससे कश्मीर मुद्दे पर भारत की स्थिति काफी मजबूत हुई। साथ ही वाजपेयी की छवि काफी अच्छी बन गई थी।
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन तेलुगू देशम पार्टी के साथ लोकसभा में बहुमत हासिल करने में कामयाब हुआ लेकिन जिस तरह से कांग्रेस और लेफ्ट की करारी हार हुई उससे सबके होश फाख्ता हो गए। एनडीए के खाते में 269 सीटें गईं जबकि तेलुगुदेशम की 29 सीटों के समर्थन के बाद वाजपेयी सरकार के पास आसानी से पूर्ण बहुमत हासिल हो गया।   कांग्रेस ने 453 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और महज 114 उम्मीदवार ही संसद का सफर तय कर पाए। जबकि इसकी सहयोगी पार्टियों का तो और बुरा हाल था। लेफ्ट का पतन भी जारी रहा। सीपीआई ने तो अपनी राष्ट्रीय पार्टी का स्टेटस ही गंवा दिया। सीपीआई को महज चार सीटें मिलीं। इस चुनाव में पहली बार एक गैर कांग्रेसी सरकार को स्थायित्व मिला। इससे पहले 1977, 1989 और 1996 में भी गैर कांग्रेसी सरकार बनाने की कोशिश की गई लेकिन कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरी नहीं कर सकी। पहली बार वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में एनडीए ने पांच साल पूरे किए।
इस प्रकार 1999 के चुनाव में कुल 543 सीटों में से  भारतीय जनता पार्टी 182, इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 114 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया(मार्क्सवादी)ने 33 सीटें हासिल की थीं। 
 

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