राजपथ - जनपथ

Date : 16-Feb-2019

नान घोटाला और अंतागढ़ टेपकांड की एसआईटी जांच चल रही है। ये दोनों प्रकरण ऐसे हैं जिसमें पिछली सरकार के प्रभावशाली लोग लपेटे में आ सकते हैं। अंतागढ़ टेपकांड के चलते पूर्व मंत्री राजेश मूणत को अग्रिम जमानत के लिए आवेदन भी लगाना पड़ा है। इस पर सुनवाई बाकी है। खुद पूर्व सीएम के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के रणनीतिकारों को बड़ी बदनामी का डर सता रहा है। यही वजह है कि जांच को रोकने के लिए पार्टी के रणनीतिकारों से रायशुमारी के बाद  नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट गए हैं। 
सुनते हैं कि सौदान सिंह इस मामले को लेकर पार्टी के सभी नेताओं को एकजुट करने में लगे हैं। पहले सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया गया, लेकिन यह उत्साहवर्धक नहीं था। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर तो मुकेश गुप्ता और अमन सिंह के खिलाफ एसआईटी जांच की मांग कर चुके हैं। इस तरह पार्टी के भीतर एसआईटी जांच को लेकर एक राय नहीं रही है। इस विपरीत स्थिति निकलने के लिए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय को आगे किया गया। 

चर्चा है कि सदन में एसआईटी जांच के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव लाने से एक दिन पहले ही पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के निवास पर कुछ प्रमुख नेताओं की बैठक भी हुई थी, इसमें पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय खास तौर पर मौजूद थे। प्रेमप्रकाश वैसे तो पूर्व सीएम के धुर विरोधी बृजमोहन अग्रवाल के बेहद करीबी माने जाते हैं, लेकिन पूर्व सीएम से भी उनके अच्छे ताल्लुकात हैं। प्रेमप्रकाश के हस्तक्षेप का नतीजा यह रहा कि सदन में एसआईटी जांच के खिलाफ भाजपा सदस्य एकजुट रहे। कुछ भाजपा सदस्य मुकेश गुप्ता और अमन सिंह का बचाव करने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी सदन में एक साथ नजर आए। सदन से परे हाईकोर्ट में बड़े-बड़े वकील लगाए गए हैं। 

बड़े वकील और छोटे वकील
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी कौशिक की पैरवी करने आए थे। अमन सिंह की भी पैरवी करने एक पूर्व अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल आए थे। दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने अमन की पैरवी की। राज्य सरकार का हाल यह रहा कि इस महत्वपूर्ण प्रकरण की पैरवी के लिए एडव्होकेट जनरल  मौजूद नहीं थे। जूनियर वकीलों ने सरकार का पक्ष रखा। कौशिक हो या अमन सिंह की याचिका, किसी एक को राहत मिल जाती है तो मुकेश गुप्ता से लेकर हर किसी की मुश्किलें आसान हो जाएगी। ऐसे में अब सड़क और सदन से परे अदालती लड़ाई ज्यादा दिलचस्प हो गई है। ऐसा बताया जा रहा है कि तेज रफ्तार से चल रही सरकारी जांच के बीच हाईकोर्ट में की जा रही दखल से सरकार के लोगों के माथे पर कुछ बल भी पड़ रहे हैं।

मेले के मजे
पिछली सरकार में कृषि मेले के आयोजन में अनियमितता को लेकर सदन में खूब शोर शराबा हुआ। बहस इस बात को लेकर हो रही थी कि मंडी बोर्ड को कृषि मेले के आयोजन के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था। लेकिन एक भागीदार रोटरी क्लब को एक करोड़ से अधिक भुगतान हो गया। कृषि मंत्री ने माना कि पहली नजर में यह सही नहीं है और उन्होंने जांच कराने की बात भी कह दी। सुनते हैं कि कृषि मेले से किसानों को फायदा हुआ हो या नहीं, लेकिन एक ट्रैवल्स संचालक को खूब फायदा हुआ। ट्रैवल्स संचालक रोटरी पदाधिकारी थे। उन्होंने इस सरकारी आयोजन में खूब फायदा पाया। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Feb-2019

छत्तीसगढ़ के संसदीय इतिहास में संभवत: पहला मौका था जब बुधवार को विभागीय प्रतिवेदन छपकर नहीं आ पाने के कारण पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के बजट प्रस्तावों पर चर्चा नहीं हो पाई। विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया। दरअसल, विभागीय मंत्री टीएस सिंहदेव अपने सीधेपन के कारण धोखा खा गए। वे पहली बार मंत्री बने हैं और कुछ मामलों में उनकी अनुभवहीनता यदा-कदा सामने आ जा रही है। 

सुनते हैं कि एक दिन पहले विधायकों को देर रात विभागीय प्रतिवेदन भेजा गया। सिंहदेव ने इस देरी पर पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर से चर्चा भी की थी। अजय पंचायत विभाग के बजट प्रस्तावों पर चर्चा की शुरूआत करने वाले थे। अजय ने सहृदयता दिखाते हुए खुद विभागीय प्रतिवेदन देरी से मिलने की बात कहकर चर्चा के लिए कोई दूसरी तिथि तय करने का आग्रह करने वाले थे ताकि विभागीय मंत्री को सदन में असहज स्थिति का सामना न करना पड़े, लेकिन वे खड़े हो रहे थे कि इससे पहले ही खुद विभागीय मंत्री सिंहदेव ने हड़बड़ी दिखाते सदन में यह कह गए कि विभाग चर्चा की तैयारी नहीं कर पाया है इसलिए उनके विभाग की चर्चा के समय को आगे बढ़ा दिया जाए। जो बात अजय चंद्राकर को कहनी थी, वो खुद मंत्री ही अपने खिलाफ कह गए। फिर क्या था विपक्षी सदस्य पिल पड़े। सरकार की किरकिरी हो गई। इस वाकये से खुद सीएम खफा बताए जा रहे हैं और इसके लिए जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई भी हो सकती है। 

नए मुख्यमंत्री के नए मिजाज

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल राज्य सरकार के सहयोग से कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में फेक न्यूज से मीडिया को चौकन्ना करने के लिए एक संगोष्ठी हुई जिसमें बाहर से आए प्रमुख वक्ताओं के बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मौजूद थे। वे जब पहुंचे तब एक वक्ता की बात चल ही रही थी, और उन्होंने बिना किसी बाधा के उसे जारी रखवाया, और वे न केवल ध्यान से सुनते रहे, बल्कि बीच में मजाक में भी शामिल हुए। इसके बाद जब मुख्यमंत्री को बोलने के लिए माईक से बुलाया गया, तो उन्होंने एक और वक्ता को पहले बोलने के लिए कहा, ताकि वे सुन सकें। ऐसा कम ही होता है कि मुख्यमंत्री, और खासकर ऐसे व्यस्त दौर के ऐसे मुख्यमंत्री, बैठकर वक्ताओं की लंबी बात सुनें, लेकिन भूपेश बघेल ने ऐसा किया। 
एक तरफ वे अफसरों और नेताओं में से कुछ के खिलाफ आरोपों की कड़ी जांच के आक्रामक बयानों के लिए सुर्खियों में हैं, लेकिन ऐसे तनावों से परे वे बाकी लोगों के साथ सरलता का बर्ताव भी कर रहे हैं। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है कि कोई मुख्यमंत्री इतने लोगों के पांव छूता हो। वे अपने मंत्रिमंडल के भी कुछ साथियों के पांव छूते हैं, और पुराने परिचित लोगों में से भी बहुत से लोगों के साथ उनका वैसा ही सम्मान का रिश्ता जारी है। 

कल ही एक दूसरे कार्यक्रम में इसके तुरंत बाद वे पहुंचे, और वहां मंच पर सम्मानित किए जा रहे छत्तीसगढ़ के प्रमुख शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सांवर अग्रवाल को सम्मानित करते हुए उन्होंने उन्हें गले लगाया, और इस मौके पर कहा कि वे अपने बच्चों को इलाज के लिए मोटरसाइकिल पर लेकर डॉ. सांवर अग्रवाल के पास आते थे। स्टेज पर उनके शब्द थे- सर, मेरे बच्चों को मोटरसाइकिल पर लेकर आता था, आपके पास। 
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Date : 12-Feb-2019

रायपुर की पुरानी पहचान एक-एक करके अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसी कड़ी में कल सोमवार को जवाहर बाजार की उन दुकानों को भी तोड़ दिया गया जहां किसी समय हमेशा रौनक और चहल-पहल रहा करती थी। 70-80 के दशक में साइकिल किराये पर लेने और देने का रिवाज था। तब इसी जवाहर बाजार में एक दुकान परफेक्ट साइकिल स्टोर्स के नाम पर थी। उन दिनों इस दुकान में सर्वाधिक साइकिलें किराये पर दी जाती थीं। उस समय लोगों के पास दुकानदार को विश्वास में लेने के लिए कोई परिचय पत्र नहीं होता था। न मतदाता परिचय पत्र और न ही किसी तरह का फोटोयुक्त व जगह की पहचान कराने वाला कोई प्रमाणपत्र। आधार कार्ड तो अभी-अभी की बात है। बस यहां के किसी स्थानीय व्यक्ति का परिचय बताओ और 25 पैसे घंटे में साइकिल किराये पर ले जाओ। तब पूरे देश में सबसे शांत, सीधा-सादा और सबले बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा की पहचान रखने वाले छत्तीसगढ़ में इस तरह असुरक्षा की भावना भी नहीं थी । बहरहाल साइकिल दुकान के संचालकों के अनुसार यह दुकान 1932 में प्रारंभ की गई थी। उस समय इस बाजार का नाम फिलिप्स मार्केट था जो देश की आजादी के बाद जवाहर बाजार हो गया। इसी तरह इस मार्ग का नाम किसी अंग्रेज के नाम पर बेन्सिल रोड था जिसे स्वतंत्रता के बाद मालवीय रोड कर दिया गया। इसी बाजार से जुड़ी एक और भी रोचक कहानी है। उस समय शास्त्री बाजार बनकर तैयार था। जब इसे शिफ्ट करने की बारी आई तो कोई भी व्यापारी वहां जाने को तैयार नहीं था। उन्हीं दिनों नगर निगम में एक कमिश्नर आए थे। उनका नाम अजयनाथ था। कद-काठी छोटी थी मगर हिम्मत बहुत बड़ी। उन्होंने रात करीब 12 बजे मालवीय रोड को पुलिस छावनी बना दिया और रातों-रात जवाहर बाजार के व्यापारियों का सामान शास्त्री बाजार भिजवा दिया। तब जाकर शास्त्री बाजार शुरू हो पाया। अब नए निर्माण में इस बाजार की पहचान नष्ट न हो इसलिए रायपुर के नागरिकों ने शासन से अनुरोध किया है कि जवाहर बाजार के भव्य और विशाल द्वार को सुरक्षित रखा जाये। नगर निगम इसके लिए तैयार भी हो गया है।
-गोकुल सोनी के फेसबुक पेज से


Date : 11-Feb-2019

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के ठेकों में धमतरी के कुछ चहेते ठेकेदारों से मंत्री के स्तर पर मेहरबानी की जानकारी पूरे विभाग को बनी हुई थी। अब अपने कड़क बर्ताव के लिए चर्चित अफसर आलोक कटियार को इस विभाग में भेजा गया है जहां उन्होंने पहले भी काम करते हुए ठेकों की गड़बड़ी खत्म कर दी थी। काम सम्हालते ही वे धमतरी-कुरूद की सड़कों को देखने निकले, तो जो पत्थर उन्होंने उठाया, उसके नीचे से गड़बड़ी के सुबूत निकलने लगे। लेकिन दिक्कत यह है कि इस विभाग में बरसों से जमे हुए अफसरों की पकड़ जब तक कम नहीं होगी, तब तक बाहर से बीच-बीच में आने वाले अच्छे अफसरों से भी एक सीमा से अधिक काम नहीं हो पाएगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ग्राम सड़कों को मरम्मत की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत विभाग के अफसरों की मरम्मत की भी है। 
दिक्कत यह है कि पंचायत मंत्री टी.एस.सिंहदेव चिकित्सा मंत्री भी हैं, और पंचायत विभाग को एक बड़ी चिकित्सा की जरूरत है। सिंहदेव अभी-अभी चिकित्सा विभाग में एक प्रमाणित गड़बड़ अफसर की तैनाती करके अपने सारे विभागों के सारे अफसरों को एक गलत संदेश दे चुके हैं कि कितने भी बुरे का वे कितना भी भला कर सकते हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि ग्रामीण सड़कों की भारी गड़बड़ी के बीच वे कहीं किसी और बुरे अफसर का भला तो नहीं करने जा रहे हैं? पिछले पंचायत-चिकित्सा मंत्री अजय चंद्राकर के ये दोनों सबसे ही भ्रष्ट विभाग टी.एस. सिंहदेव को विरासत में मिले हैं। सिंहदेव का हाल यह है कि सरकार बनते समय जब उनसे मंत्रालय के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने साफ कहा था कि वे गृहमंत्री बनना नहीं चाहेंगे क्योंकि यह विभाग बहुत भ्रष्ट है। लेकिन उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, और उन्हें पुलिस विभाग से अधिक भ्रष्ट दो विभाग मिल गए हैं, इनकी खोखली बुनियाद को मजबूत करते-करते उनके पांच बरस निकल जाएंगे, और कामयाबी की इमारत खड़ा होना शुरू नहीं हो पाएगा। 

अस्पताल ट्रस्ट भी नजरों में...
मुकेश गुप्ता का बनवाया हुआ एक बड़ा अस्पताल, एमजीएम, शुरू से ही दबाव से दान जुटाकर बनाने की तोहमतें झेल रहा है। इन दिनों वहां पर लंबा-चौड़ा निर्माण और होना था। लेकिन पता लगा है कि विधानसभा चुनाव के दो महीने पहले जब एक बड़े निर्माण की तैयारी हो गई थी तभी अचानक काम रोक दिया गया। करीबी लोगों का कहना है कि यह आसार दिख रहा था कि यही सरकार दुबारा आने वाली नहीं है, और ऐसे में जाहिर था कि उस तरह से दान जुटना मुमकिन नहीं था, इसलिए काम रोक दिया गया था। अब पता लगा है कि सरकार इस अस्पताल ट्रस्ट के दानदाताओं की लिस्ट निकालकर उनसे भी बात करने वाली है कि किस मजबूरी में उन्होंने दान दिया था। ऐसी कुछ जानकारी सरकार के पास पहुंच चुकी है, और एक शासकीय अधिकारी से जुड़े ऐसे ट्रस्ट के लिए दान जुटाने के इन तरीकों के बारे में जांच एजेंसियां कानून खंगाल चुकी हैं। 

इंदिरा बैंक की प्रेतनी भी निकलेगी?
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले एक इंदिरा बैंक घोटाला हुआ था। इसमें शहर के बड़े-बड़े नामी लोगों की पत्नियां डायरेक्टर थीं, और वैसे ही नामी लोगों ने इस बैंक का पैसा खाया भी था। हजारों खातेदारों की रकम इसमें डूबी थी, और जब इस बैंक के घोटालाबाज मैनेजर उमेश सिन्हा का बयान हुआ था, तो नार्को टेस्ट में अपने बयान की रिकॉर्डिंग में उसने मुख्यमंत्री रहे हुए रमन सिंह सहित कुछ बड़े-बड़े मंत्रियों का नाम भी लिया था कि उन्हें बंगलों में जाकर करोड़ों रूपए उसने खुद ने दिए थे। 
इस जांच की सीडी भी बरसों से बाजार में तैर रही थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी, बल्कि जिन लोगों को रिश्वत देना बताया गया था, उनसे पूछताछ भी नहीं हुई थी। अब इस सीडी को लेकर यह भी चर्चा है कि यह मुकेश गुप्ता के पास पूरी की पूरी थी, और उसकी एक कॉपी रायपुर के आईजी रहे जीपी सिंह के पास भी थी। इस सीडी के काटे हुए हिस्से बाजार में घूम रहे थे। अब बदले हुए माहौल में जब तमाम दबे हुए मामलों की जांच हो रही है तो इस सीडी की तलाश भी चल रही है कि पूरे के पूरे बयान की सीडी और इस बैंक घोटाले की फाईल किसके पास है? इन बरसों में ऐसी भी चर्चा रही कि इसी किस्म की कुछ सीडी, और कुछ फाईलों के चलते कुछ लोग ताकतवर बने रहे, और उनका बाल भी बांका नहीं हो पाया था। 

भागने के लिए नहीं, वास्तु-सुधार के लिए
राजधानी बनने के बाद पहली बार पुलिस के डीजी रैंक के अफसर मुकेश गुप्ता के बारे में लोगों का मुंह खुल रहा है, कलम चल रही है, और की-बोर्ड पर उंगलियां चलने की हिम्मत कर रही हैं, तो कई किस्म की गलत बातें भी लिखी जा रही हैं। 
अभी उन्होंने अपने सरकारी मकान के पीछे की दीवार तुड़वाकर एक गेट लगवाया, तो यह हल्ला हो गया कि किसी छापे की नौबत में गिरफ्तारी से बचने के लिए ऐसा किया गया। लेकिन कुछ जानकार लोगों ने बताया कि पूरे घर का नापजोख करके किसी वास्तुशास्त्री ने मुसीबत टालने के लिए पीछे की दिशा में गेट खुलवाने का सुझाव दिया, और उसी मुताबिक यह किया गया है। 
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Date : 10-Feb-2019

प्रदेश के ताकतवर पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के खिलाफ निलंबन और अपराधिक प्रकरण दर्ज की कार्रवाई से हड़कंप मचा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब डीजी स्तर के अफसर गुप्ता के खिलाफ कठोर कार्रवाई की गई। जबकि एसपी स्तर के अफसर पहले भी निलंबित हुए हैं। जीरम मामले में मयंक श्रीवास्तव को निलंबित किया गया था। 

करीब 15 साल पहले हाईप्रोफाईल रामअवतार जग्गी मर्डर केस में सबूत मिटाने और झूठे सबूत गढऩे के आरोप में तीन पुलिस अफसर एएस गिल, वी के पांडेय और राकेश त्रिवेदी के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ था। सीबीआई ने इस प्रकरण की जांच की थी। तीनों जेल में रहे और फिर बाद में नौकरी भी चली गई। ये अलग बात है कि इस घटना के दौरान रायपुर एसपी रहे मुकेश गुप्ता का बाल-बांका भी नहीं हुआ। इस बार प्रकरण सीबीआई ने नहीं, बल्कि ईओडब्ल्यू ने दर्ज किया है, जहां के आरोपी अफसर खुद वहां मुखिया रहे हैं। अब दोनों ही अफसरों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। 

सोशल मीडिया में चल रही एक खबर चर्चा में है, जिसमें यह कहा गया कि डीजी मुकेश गुप्ता ने अपने सरकारी निवास के पीछे की बाउंड्रीवॉल तुड़वाकर नया छोटा दरवाजा तैयार करवाया है। सुनते हैं कि सरकार बदलते ही इस ताकतवर अफसर के घर आने-जाने में कई लोगों को दिक्कत हो रही थी। इनमें एक शराब कारोबारी भी हैं, जिन्हें अक्सर वहां देखा जाता था। खैर, मुश्किलों में घिरे इस अफसर के खैरख्वाहों की कमी नहीं है। अब आने-जाने में दिक्कत न हो, इसलिए छोटा-सा दरवाजा बन गया, तो किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। 

कुछ फंसे, कुछ फंसेंगे, सबको सबक

राज्य पुलिस सेवा से भारतीय पुलिस सेवा में आए रजनेश सिंह की गिनती तेज तर्रार अफसरों में होती रही है। ईओडब्ल्यू में पदस्थापना अवधि के दौरान काफी चर्चित रहे। सुनते हैं कि रजनेश का एक बार रमन सरकार में पावरफुल रहे एक आईएएस अफसर के साथ विवाद हुआ। चर्चा है कि बात बढ़ी तो  रजनेश ने आईएएस अफसर को बुरी तरह लताड़ दिया। अफसर ने तुरंत सीएम सचिवालय के ताकतवर अफसर को घटना की जानकारी दी। इसके  बाद उन्होंने रजनेश और आईएएस अफसर को बिठाकर दोनों के बीच सुलह कराई। तब रजनेश को आईपीएस अवॉर्ड भी नहीं हुआ था। अब बदले हुए हालात में कल की ताकत आज जिस तरह हवा हुई है, उसे देखकर सरकार में बैठे बहुत से लोग बंद कमरे की आपसी चर्चा में यह कहते मिल रहे हैं कि अच्छे वक्त पर बुरे वक्त की आशंका को पूरी तरह अनदेखा न किया होता, तो न ऐसी गलती होती, न ऐसे गलत काम होते। फिलहाल सरकार में बैठे लोग सन्न हैं।
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Date : 09-Feb-2019

भूपेश सरकार के राज्य में सीबीआई को बैन करने के फैसले पर भाजपा के लोग पिल पड़े हैं। पीएम ने शुक्रवार को रायगढ़ की सभा में  यहां तक कह दिया कि छत्तीसगढ़ में सीबीआई को इसलिए आने नहीं देना चाह रहे हैं क्योंकि आने वाले चुनाव में कांग्रेस, छत्तीसगढ़ को एटीएम बनाना चाहती है, यहां से बक्से भर-भरकर माल दिल्ली भेजना है। यदि सीबीआई आई, तो ऐसा नहीं हो पाएगा। कांग्रेस सरकार की आलोचना करते समय पीएम यह भूल गए कि उनकी ही पार्टी की सरकार ने भी छत्तीसगढ़ को वर्ष-2012 में सीबीआई को बैन करने के लिए केन्द्र को पत्र लिखा था। खैर, सीबीआई को बैन करने को लेकर राज्य में तकरार जारी है। 

चर्चा है कि विधानसभा में भी विपक्ष के लोग इसको लेकर भूपेश सरकार पर हमला बोलने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन यह अब भाजपा को ही भारी पड़ता दिख रहा है। सुनते हैं कि भाजपा सरकार ने सीबीआई को बैन करने के लिए केन्द्र को चिट्ठी क्यों लिखी थी, इसका खुलासा भी हो सकता है। चर्चा है कि राज्य के एक आईएएस अफसर सीबीआई के मकडज़ाल में फंसे थे। उन्हें कानूनी मदद मिल जाए, इसलिए तब की भाजपा सरकार ने राज्य में सीबीआई बैन करने के लिए केन्द्र को चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी से अफसर को थोड़ी बहुत मदद मिल भी गई। खैर, यह मामला अब गरमा सकता है।

सैकड़ों रिकॉर्डिंग्स में जजों की भी!
इस प्रदेश में एक वक्त जिस अफसर के नाम से सरकार और राजनीति, मीडिया और कारोबार, सभी के दिल-दिमाग में सिहरन दौड़ जाती थी, वैसे अफसर के निलंबन की खबर अभी आ रही है। राज्य के स्पेशल डीजी मुकेश गुप्ता, और उनके साथी एसपी रहे रजनेश सिंह को एसीबी के उनके कार्यकाल को लेकर अभी निलंबित किया गया है। यह राज्य बनने से लेकर भूपेश-सरकार बनने तक मुकेश गुप्ता की ताकत सरकार के बहुत से फैसलों पर हावी दिखती थी, और अमूमन किसी की हिम्मत इस अफसर के बारे में बोलने या लिखने की नहीं रहती थी। लंबे समय तक राज्य के खुफिया-मुखिया रहते हुए यह माना जाता था कि मुकेश गुप्ता के पास राज्य के हर महत्वपूर्ण व्यक्ति की टेलीफोन रिकॉर्डिंग मौजूद है, और लोग सहमे रहते थे। जोगी के राजधानी-एसपी रहते हुए मुकेश गुप्ता की पुलिस ने भाजपा नेता नंदकुमार साय का पैर तोड़ा था, लेकिन रमन सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही मुकेश गुप्ता को रायपुर का आईजी भी बनाया, और खुफिया-मुखिया भी बनाया। इसके बाद मानो यह भी काफी नहीं था, उन्हें एसीबी और ईओडब्ल्यू का मुखिया भी बनाया गया। भाजपा के ननकीराम कंवर जैसे इकलौते नेता मुकेश गुप्ता के खिलाफ मामला उठाने का हौसला दिखाते रहे, और फिर कांगे्रस के भूपेश बघेल ने मोर्चा खोला था। 
ऐसी ताकत के बाद आज के ऐसे हाल को देखकर भी बहुत से लोग अभी भी मुकेश गुप्ता के बारे में कुछ बोलने से कतराते हैं क्योंकि अधिकतर बड़े लोगों को यह लगता है कि उनकी कॉल रिकॉर्डिंग इस अफसर के पास जरूर होगी। अभी जो बातें एसीबी और ईओडब्ल्यू से छनकर बाहर आ रही हैं, वे बताती हैं कि मुकेश गुप्ता के पूरे कार्यकाल में इंटेलीजेंस और इन दो दफ्तरों ने टेलीफोन सुनने का काम रेखा नायर नाम की जो महिला कर्मचारी करती थी, उसके एक ठिकाने पर मारे गए छापे में सैकड़ों लोगों की बातचीत की रिकॉर्डिंग मिली है जिसमें राजनीति, सरकार, मीडिया, कारोबार, के साथ-साथ जजों की बातचीत भी मिली है। ऐसी चर्चा है कि तीन सौ से अधिक लोगों की टेलीफोन-रिकॉर्डिंग मिली हैं। जब तक ये बातें फाईलों पर दर्ज होकर अदालत नहीं पहुंचतीं तब तक इनके बारे में यह जानना मुश्किल है कि इनमें कितनी सच्चाई है। लेकिन जनधारणा ऐसी तमाम बातों को सच मानने के लिए एकदम तैयार है। 

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Date : 07-Feb-2019

बैतूल की भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में  उलझ गई हैं। मध्यप्रदेश की राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने उनके जाति प्रमाण पत्र पर संदेह जताया है। और एक-दो दिन में समिति इस पर ऑर्डर कर सकती है। मध्यप्रदेश के सांसद की जाति प्रमाण पत्र फर्जी होने की खबर से छत्तीसगढ़ भाजपा में भी हड़कंप मचा हुआ है।  

ज्योति धुर्वे छत्तीसगढ़ की रहने वाली है। और उनका जाति प्रमाण पत्र भी रायपुर में बना था। सुनते हैं कि लोकसभा चुनाव के पहले पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी के निज सचिव चार्टर प्लेन लेकर रायपुर आए थे और वे हाथों-हाथ ज्योति का जाति प्रमाण पत्र बनवाकर गए थे।  चर्चा है कि तहसीलदार ने ज्योति का जाति प्रमाण पत्र बनाने से मना कर दिया था तब प्रदेश सरकार के एक मंत्री को सीधे दखल देना पड़ा, तब कहीं जाकर उनका जाति प्रमाण पत्र बन पाया। अब राज्यस्तरीय छानबीन समिति पर निगाहें टिकी हुई है, इससे सारे तथ्यों का खुलासा होने की उम्मीद है। इससे भाजपा के लोग भी बेचैन हैं। 

छत्तीसगढ़ के शत्रुघ्न सिन्हा
पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर के तेवर से भाजपा के रणनीतिकार परेशान हैं। कंवर ने पहले भूपेश सरकार की कर्जमाफी नीति की तारीफों के पुल बांधे, और फिर पिछली सरकार में पॉवरफुल रहे अफसर मुकेश गुप्ता और अमन सिंह के खिलाफ जांच बिठवाकर पार्टी को मुश्किल में डाल दिया है। सर्वविदित है कि दोनों ही अफसर पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के बेहद करीबी रहे हैं। 

सुनते हैं कि कंवर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। वे विधानसभा के बजट सत्र में भी अपने तेवर दिखा सकते हैं। एक तरफ भाजपा भूपेश सरकार पर बदलापुर की राजनीति का आरोप लगा रही है, ऐसे में कंवर के सुर अलग होने से पार्टी के लोग पशोपेश में हैं। चर्चा है कि कंवर ने अपने करीबी लोगों को यह साफ शब्दों में कह दिया है कि वे अगला विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनकी नेता प्रतिपक्ष बनने की इच्छी थी, लेकिन उन्हें यह दायित्व नहीं सौंपा गया। अब उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रह गई है। 

कंवर अफसरों के बहाने एक तरह से रमन सिंह के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। कहा जा रहा है कि वे इस बात से ज्यादा नाराज हैं कि उन्हें हराने के लिए रमन सिंह के करीबी लोगों ने विरोधियों को साधन-सुविधाएं मुहैया कराए थे। इसमें सच्चाई कितनी है यह साफ नहीं है, लेकिन कंवर के बागी तेवर से पूर्व सीएम रमन सिंह को परेशानी उठानी पड़ सकती है। कंवर को अनुशासनात्मक कार्रवाई की कोई परवाह नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि कंवर को पार्टी के भीतर रमन सिंह के विरोधियों का खूब समर्थन मिल रहा है। ऐसे में भाजपा के अंदरखाने में खींचतान और तेज होने के आसार दिख रहे हैं। कुल मिलाकर ननकीराम कंवर छत्तीसगढ़ में भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा हो गए हैं जो रोज लीडरशिप पर नाम लिए बिना हमला करते हैं, और पार्टी अगले चुनाव में टिकट काटने से परे उनका और कुछ नहीं कर पा रही है। 
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Date : 06-Feb-2019

राज्य शासन को बड़े-बड़े महत्वपूर्ण ओहदों पर बैठे हुए आईएफएस जिस अंदाज में जंगल-दफ्तर वापिस भेजे गए उससे सब हैरान भी थे कि राज्य शासन का ऐसा रूख क्यों है? लोगों को लगा कि इतने महत्व का काम देखे हुए लोग एकमुश्त वन विभाग में लौटा दिए गए। लेकिन इसके बीच एक नियुक्ति ऐसी हुई है जिससे यह समझ पड़ता है कि सरकार का रूख वन अफसरों के खिलाफ नहीं है। आलोक कटियार को पिछली सरकार में तरह-तरह से अपमानित किया गया था। इतने सीनियर अफसर को कभी ग्रामोद्योग का काम दिया गया, तो कभी आरडीए में मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनाया गया जो कि एक अतिरिक्त कलेक्टर दर्जे का काम था। जब उन्होंने इसे अपनी वरिष्ठता के खिलाफ बताया तो महीनों तक उन्हें हाशिए पर बिठा दिया गया था। बड़ी मुश्किल से उन्हें क्रेडा का काम इसलिए दिया गया कि सरकार के पास उस काम को संभालने के लिए उस वक्त कोई दूसरा अफसर नहीं था। लेकिन अब भूपेश सरकार ने के्रडा के साथ-साथ कल आलोक कटियार को पीएमजीएसवाय का अतिरिक्त प्रभार भी दिया है। वे पहले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में रह चुके हैं, और वहां प्रचलित भ्रष्टाचार को उन्होंने कम से कम अपने स्तर पर कुचलकर रख दिया था। टेंडर में होने वाले घपले बंद हो गए थे, और ठेकेदारों के बीच फर्क महसूस किया जा रहा था। बाद में यह विभाग पुराने ढर्रे पर आ गया था। और अब शायद इस विभाग को फिर से सुधारने के लिए आलोक कटियार को लाया गया है। भूपेश सरकार आने के बाद किसी आईएफएस की यह पहली ऐसी पोस्टिंग है जो बताती है कि सरकार का रूख इस सर्विस के खिलाफ नहीं है।

आखिर काम मिला...
आखिरकार प्रशासनिक फेरबदल में महीनेभर से खाली बैठे सौरभ कुमार को काम मिल गया। उन्हें दंतेवाड़ा जिले से हटाए जाने के बाद मंत्रालय में अटैच कर दिया गया था। सुनते हैं कि सौरभ कुमार के खिलाफ कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए थे। सौरभ कुमार पर कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा और उनके पुत्र छबिन्द्र के बीच विवाद पैदा करने का भी आरोप था। देवती कुछ सौ वोटों से हार गईं। सरकार बदलते ही सौरभ कुमार को हटा दिया गया। इसके बाद से वे सफाई देते घूम रहे थे।  

सुकमा कलेक्टर जेपी मौर्य को राजनांदगांव जैसे महत्वपूर्ण जिले की जिम्मेदारी मिली है। उन पर भी कवासी लखमा ने चुनाव के दौरान आरोप लगाए थे, लेकिन बाद में वापस भी ले लिए। मतदाता जागरूकता के लिए उन्होंने जिले में जोरदार अभियान चलाया था। जिसकी वजह से पिछले चुनाव की तुलना में 8 फीसदी अधिक मतदान हुआ। मौर्य की पत्नी रानू साहू को कांकेर कलेक्टर से बालोद कलेक्टर बनाया गया है। रानू गरियाबंद जिले के कांग्रेस नेता के परिवार से ताल्लुक रखती है। खैर, पति-पत्नी को अच्छी पोस्टिंग मिल गई। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Feb-2019

वैसे तो भाजपा के लोग सबका साथ-सबका विकास का राग अलापते हैं, लेकिन यदा-कदा अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया सामने आ ही जाता है। पिछले दिनों पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। इसमें राज्यों के मोर्चे के प्रदेश पदाधिकारियों के साथ-साथ जिलाध्यक्षों को भी आमंत्रित किया गया था। 

प्रदेश से भी करीब 62 पदाधिकारी जाने के लिए तैयार हो गए। इनमें से ज्यादातर पदाधिकारी बेहद सामान्य परिवार से आते हैं। ऐसे में मोर्चे के बड़े पदाधिकारियों ने पार्टी के फंड मैनेजरों से टिकट का खर्चा उठाने का आग्रह किया। कुछ दिन पहले ही महामंत्री (संगठन) पवन साय की पहल पर महिला मोर्चा के पदाधिकारियों के दिल्ली आने-जाने का खर्चा पार्टी ने वहन किया था। 

कुछ इसी तरह का सहयोग अल्पसंख्यक नेता भी चाह रहे थे, लेकिन पवन साय ने साफ कह दिया कि उन्हें अपने ही खर्चे से दिल्ली जाना होगा। अलबत्ता, उनके ठहरने की व्यवस्था केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय ने की थी। साय को प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौंपे जाने की चर्चा चल रही है। खुद विष्णुदेव साय इसके लिए प्रयासरत भी बताए जाते हैं। वे प्रदेश से दिल्ली आने वाले हर पार्टी नेताओं की खातिरदारी के लिए तैयार रहते हैं। अल्पसंख्यक नेताओं की खातिरदारी में भी उन्होंने कोई कमी नहीं की। दिल्ली घूमने के लिए उनकी तरफ से इनोवा उपलब्ध कराई गई। संगठन की बेरूखी से अल्पसंख्यक नेता मायूस थे, लेकिन विष्णुदेव साय की मेहमाननवाजी ने उन्हें खुश कर दिया। 

सरोज पाण्डेय अब दिल्ली की ही...
छत्तीसगढ़ के अल्पसंख्यक नेताओं ने दिल्ली में यह अधिवेशन खत्म होने के बाद प्रदेश के अन्य बड़े नेताओं से मेल-मुलाकात भी की। दुर्ग-भिलाई के कुछ पदाधिकारी सरोज पाण्डेय से मिलने उनके घर गए। सरोज ने सामान्य शिष्टाचार निभाते उन्हें चाय-पानी के लिए पूछ लिया। सुनते हैं कि अल्पसंख्यक नेताओं ने उनसे प्रदेश की राजनीति को लेकर चर्चा छेड़ी, तो वे दो-टूक शब्दों में कह गईं कि उन्हें छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब कोई दिलचस्पी  नहीं रह गई है। वे दिल्ली में ही अपनी भूमिका से खुश हैं। सरोज ने यह भी कह दिया कि छत्तीसगढ़ में पार्टी के नेता सिर्फ साजिश करने में लगे रहते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वे दुर्ग सिर्फ अपनी मां से मिलने के लिए आती हैं। सरोज के तेवर देखकर अल्पसंख्यक नेता चाय खत्म कर उल्टे पांव लौट आए। 

लीडरशिप से ऐसी नाराजगी!
लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों को साधने के लिए भाजपा ने रणनीति तैयार की थी। इसमें मोदी सरकार के द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी अधिवेशन में दी गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अधिवेशन को संबोधित किया। आम बजट की वजह से कार्यक्रम समय से पहले खत्म कर दिया गया। बिहार के पदाधिकारी अपने यहां की संगठन गतिविधियों और गठबंधन सरकार के कामकाज पर चर्चा करना चाह रहे थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। जैसे ही अधिवेशन खत्म करने की घोषणा की गई बिहार के नेता भड़क गए और मोदी-अमित शाह के मुर्दाबाद के नारे लगाए। 

बिहार के नेताओं के तेवर से अधिवेशन में आए बाकी लोग हतप्रभ रह गए। राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल ने उन्हें अनुशासन में रहने की नसीहत दी, लेकिन नाराज नेता नारेबाजी करते रहे। इससे गुस्साए रामलाल ने यह कहा बताते हैं कि अल्पसंख्यक मोर्चा का अस्तित्व रहेगा या नहीं, इस पर पार्टी विचार करेगी। भाजपा नेताओं के लिए राहत की बात यह थी कि मीडियाकर्मी अधिवेशन से दूर रहे, इसलिए यह खबर सुर्खियों में नहीं रही। पर ऐसा पहली बार हुआ जब पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ नारेबाजी की गई। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 04-Feb-2019

शहर जिला भाजपा अध्यक्ष राजीव अग्रवाल अपने ही दल के लोगों के साथ-साथ अब पत्रकारों के भी निशाने पर हैं। राजीव ने हार की समीक्षा बैठक के कवरेज के लिए आए पत्रकारों को जिस तरह बैठक स्थल से बाहर निकाला, उससे प्रदेशभर के पत्रकारों में नाराजगी है और उन पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन भी हो रहा है। उनके अपने दल के लोग भी बैठक स्थल से पराजित प्रत्याशी नंदकुमार साहू को निकाले जाने पर राजीव अग्रवाल के खिलाफ खुले तौर पर नाराजगी जता रहे हैं। 

राजीव के खिलाफ कार्रवाई के मामले को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग राय है। पार्टी का एक खेमा उन्हें तत्काल पद से हटाने की वकालत कर रहा है, तो दूसरा खेमा किसी भी तरह की कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। राजीव अग्रवाल के समर्थकों का मानना है कि नंदकुमार साहू को बैठक से बाहर जाने के लिए कहना गलत नहीं था, क्योंकि वे आमंत्रित ही नहीं थे। उनकी मौजूदगी में खुलकर बात नहीं हो सकती थी। लेकिन राजीव अग्रवाल पत्रकारों से दुव्र्यवहार के मामले में एक नई मुश्किल में फंस सकते हैं। 

इस बैठक में पत्रकारों के साथ सुलूक का वीडियो फैलते ही पत्रकारों का गुस्सा भड़क गया है। वे इस पूरे मामले में नए सिरे से राजीव के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव नजदीक है और पत्रकारों से जुड़ा मामला है। इस वजह से भी कांग्रेस और दूसरे दल के लोग राजीव के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के समर्थन में आगे आ रहे हैं। 
चर्चा है कि प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने इस मसले पर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से चर्चा की और उन्हें पत्रकारों से चर्चा कर प्रकरण को निपटाने के लिए कहा। बृजमोहन के मीडिया से लगभग हमेशा से ही अच्छे संबंध बने रहे हैं। अब बृजमोहन पत्रकारों से चर्चा के लिए आगे तो आए, लेकिन मामला कार्रवाई पर अटक गया। धरमलाल कौशिक ने साफ शब्दों में कह दिया कि कार्रवाई तो दूर, राजीव को नोटिस देने के लिए भी हाईकमान से परमिशन लेनी होगी। राजीव अग्रवाल पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में इस प्रकरण को पार्टी किस तरह निपटाती है, यह देखना है।

प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव एक सरकारी दौरे पर थाईलैंड की स्वास्थ्य सुविधाओं को देखने के लिए क्या गए, प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक ने उन पर इशारे-इशारे में बिना शब्दों के थाईलैंड के सेक्स-पर्यटन के लिए जाने की बात कह दी। वे इस बात को भूल ही गए थे कि रमन सिंह सरकार ने अपने पहले ही बरस में पत्रकारों को सरकारी खर्च पर थाईलैंड ही भेजा था।

कुल मिलाकर भाजपा के दिन कुछ गड़बड़ चल रहे हैं, और उसके नेताओं को फिलहाल मीडिया को अपने कार्यक्रमों में बुलाना बंद भी कर देना चाहिए, क्योंकि उसकी अपनी मानसिक स्थिति अतिथि सत्कार की दिख नहीं रही है। ऐसी बुरी हार के बाद ऐसा होने में कोई हैरानी नहीं है, लेकिन मीडिया के बीच अभी जो बात उठी नहीं है, वह भयानक बात अभी बाकी ही है। पिछली सरकार की तरफ से पत्रकारों के सेक्स-वीडियो बनाने की पहल पर अब तक छत्तीसगढ़ के मीडिया ने कोई चर्चा भी नहीं की है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Feb-2019

सरकार बदलते ही कई विभागों में कामकाज पहले की तुलना में बेहतर दिख रहा है। यह सब मंत्रियों की सक्रियता के चलते फर्क दिख रहा है। प्रदेश में स्वास्थ महकमा भ्रष्टाचार और लापरवाही के लिए कुख्यात रहा है। इसके लिए पिछली सरकार के मंत्री ज्यादा जिम्मेदार रहे हैं। कुछ साल पहले बिलासपुर जिले में नसबंदी ऑपरेशन में लापरवाही के चलते दर्जनभर से अधिक महिलाओं की मौत हुई थी, तो वहां मंत्री अमर अग्रवाल अस्पताल में मुस्कुराते देखे गए। उनकी संवेदनहीनता राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रही। उनके बाद आए अजय चंद्राकर का कामकाज भी अमर से बेहतर नहीं रहा। कुछ महीने पहले दुर्ग जिले में डेंगू से 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई, लेकिन अजय वहां झांकने तक नहीं गए। काफी किरकिरी होने के बाद सीएम के कहने पर महीने भर बाद अजय दुर्ग तो गए, लेकिन प्रभावित इलाकों में जाने के बजाए मुख्यालय में समीक्षा कर लौट आए। 

सरकार बदली तो नए मंत्री अपने विभाग में सुधार की कोशिश करते दिख रहे हैं। इसका असर फील्ड में भी देखने को मिल रहा है। बदनाम स्वास्थ महकमें की जिम्मेदारी लेने के बाद दुर्ग जिले में स्वाईन फ्लू से एक मौत की खबर मिलते ही मंत्री टीएस सिंहदेव तुरंत वहां गए और वहां बीमारी की रोकथाम के लिए हर संभव उपाय करने कहा। यही नहीं, वे विदेश प्रवास से लौटने के बाद सीधे सुपेबेड़ा चले गए जहां किडनी की बीमारी से 70 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। वे पीडि़तों से मिलते रहे और उन्हें अपना फोन नंबर देकर किसी भी तरह की तकलीफ पर तुरंत कॉल करने का आग्रह किया। 

वे हाथ जोड़कर पीडि़तों को रायपुर आने के लिए कहा। ताकि उनकी बीमारी का बेहतर ईलाज किया जा सके। वहां के ग्रामीणों में सरकार के प्रति भरोसा दिखा और पिछली सरकार पर बीमारी को अनदेखा करने पर नाराजगी जताते रहे, लेकिन सिंहदेव ने उन्हें आलोचना करने से रोका और बीती बात भूलकर स्थानीय समस्याओं को हल करने में सरकार का सहयोग करने कहा। सरल स्वभाव के सिंहदेव की बातों पर लोग भरोसा करते भी दिखे। कुछ इसी तरह का काम गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू का भी रहा है। उन्होंने पिछले कुछ दिनों में अपराधिक घटनाओं में वृद्धि पर तत्काल बैठक ली और एक-एक घटनाओं की समीक्षा करते रहे। उन्होंने पुलिस को सूचनातंत्र मजबूत करने के निर्देश दिए। ऐसा बरसों बाद हुआ है जब गृहमंत्री को अपराधिक मामलों पर अफसरों को जवाब तलब करते देखा गया है।  

जल बिन मछली...
भाजपा के हाथ से सत्ता क्या गई कि कांग्रेस से अलग हुए नेताओं में मूल पार्टी में लौटने की तड़प दिखाई दे रही है। जिस तरह पानी से बाहर मछली जैसे कुछ मिनटो में छटपटाने लगती है कुछ इसी तरह का हाल भाजपाई बने पूर्व कांग्रेसियों की हो गई है। राज्यभर से भाजपा में शामिल हुए पुराने कांग्रेसी अब सरकार का हिस्सा बनने ताकत लगा रहे है। दरअसल, रमन राज के तीसरी पारी में कई नेता लालबत्ती में सवारी के लिए अच्छी साख को ताक में रखकर कांग्रेस से अलग हो गए थे। उम्मीद से परे कांग्रेस के सत्तारूढ़ होते ही ऐसे नेता अब अफसोस जाहिर करते माथा पकड़कर भाजपा को कोस रहे है। राजनांदगांव में कुछ ऐसे पुराने कांग्रेस भाजपा से लौटने के लिए पुराने गिले-शिकवे को भूलने तैयार है। लोकसभा चुनाव के दौरान घर वापसी के आसार है।
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Date : 02-Feb-2019

वन मुख्यालय में वापस आए दर्जनभर से अधिक आईएफएस के पास कोई काम नहीं है। दो-तीन के पास तो बैठने के लिए कमरा भी नहीं है। वैसे इनमें से ज्यादातर पहले मलाईदार जगहों पर थे। सरकार बदलते ही एक-दो को छोड़कर बाकी सब वन मुख्यालय भेज दिए गए हैं। सुनते हैं कि हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स मुदित कुमार सिंह इन सबों से काम लेने के लिए लिए कोई प्रस्ताव नहीं कर पाए हैं। सीएस और डीजीपी को हटाए जाने के बाद खुद के भविष्य को लेकर सशंकित बताए जा रहे हैं। वन मुख्यालय में पहले ही कई अफसर खाली बैठे हैं और अब रिटायर्ड अफसर भी नई सरकार में काम चाहते हैं। कुछ ने अलग-अलग संपर्कों के जरिए सीएम और सरकार के रणनीतिकारों तक अपनी सिफारिश भी करवाई है। एक-दो तो कुछ मंत्रियों से भी मिल आए हैं। देखना है कि रिटायर्ड आईएफएस अफसरों की सरकार में कोई भूमिका होती है या नहीं, फिलहाल तो जो नौकरी में हैं, उन्हीं के पास कोई काम नहीं है। 
इस बारे में राज्य सरकार के एक वरिष्ठ व्यक्ति का कहना है कि जंगल के इन अफसरों ने जंगल के बाहर इतने लंबे बरसों तक इतनी पारियां खेलीं कि वे थक गए थे, और उन्हें कुछ अरसा आराम देना जरूरी था। उन्होंने कहा कि विराट कोहली भी लगातार वन-डे खेलने के बाद बीच-बीच में छुट्टी लेकर आराम करता ही है।


कुलपति फिलहाल बेफिक्र
भूपेश सरकार पिछली सरकार के घपलों-घोटालों की जांच में उलझी हुई है। इन सबके बीच विश्वविद्यालयों के कुलपति खुद के भविष्य को लेकर निश्चिंत दिख रहे हैं। इनमें से ज्यादातर आरएसएस से जुड़े हैं। साथ ही प्रदेश से बाहर के हैं। कई के खिलाफ शिकायतें भी हैं। इसी तरह अलग-अलग आयोगों में भी पिछली सरकार से जुड़े लोग काबिज हैं। साथ ही भाजपा से जुड़े भी हैं। सुनते हैं कि इनमें से कुछ ने पूर्व सीएम से मुलाकात भी की थी और अपनी स्थिति को लेकर चर्चा भी की थी। सभी को उनके शुभचिंतकों ने पद से हटाए जाने की स्थिति में अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी है। खैर, अभी तो जांच-पड़ताल ही हो रही है, ऐसे में ये सब लोकसभा चुनाव तक खुद को सुरक्षित मान रहे हैं। 
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Date : 01-Feb-2019

नान घोटाले की जांच में अब ईडी भी कूद गई है। यह सवाल स्वाभाविक है कि पांच साल ईडी कहां थी और जांच के लिए आगे क्यों नहीं आई। इस पूरे प्रकरण पर बारीक नजर रखने वालों को केन्द्रीय एजेंसी के कूदने पर कोई अचरज नहीं हुआ। कांग्रेस के लोगों का मानना है कि एसआईटी पिछले कुछ समय से प्रकरण से जुड़े भाजपा के प्रभावशाली लोगों पर शिकंजा कसने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, ऐसे में केन्द्रीय एजेंसी के जरिए जांच की दिशा बदलने की कोशिश है। 

सर्वविदित है कि प्रकरण का खुलासा होने के बाद कई संगठनों ने सीबीआई अथवा कोर्ट की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। तब पिछली सरकार ने इसका पुरजोर विरोध किया था। चार अलग-अलग याचिकाओं का जवाब देने के लिए सरकार की तरफ से कोर्ट में हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी और रविन्द्र श्रीवास्तव जैसे नामी-गिनामी वकीलों की फौज खड़ी की गई। तब सीबीआई अथवा एसआईटी जांच की मांग स्वीकार नहीं की गई। अब जब एसआईटी जांच हो रही है, तो पिछली सरकार के कर्ता-धर्ता इसकाविरोध कर रहे हैं। हल्ला तो यह भी है कि पिछली सरकार में ताकतवर रहे लोग अपने संपर्कों का उपयोग कर ईडी को भी जांच में झोंकने में सफल रहे हैं। इन सबके पीछे उन दो अफसरों पर  शिकंजा कसने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिन्हें एसआईटी की जांच से थोड़ी -बहुत राहत मिलने की उम्मीद थी, और प्रकरण में बड़े खुलासे का अंदाजा लगाया जा रहा था। अब जांच किस तरह होगी, यह साफ नहीं है क्योंकि जिला अदालत ने एसआईटी के उस आवेदन को खारिज कर दिया है जिसमें नान के एक कर्मचारी को आरोपी बनाने की मांग की गई थी।

भाजपा में अब चंदे का झगड़ा
भाजपा में 11 फरवरी से फंड जुटाने के लिए अभियान शुरू हो रहा है। पिछले साल इसी दिन करीब 20 करोड़ रूपए जुटाए गए थे। जिसको लेकर यह कहा गया कि चुनाव में इसका उपयोग किया जाएगा।  इस बार टारगेट इससे कहीं ज्यादा है, लेकिन टारगेट पूरा होगा इसकी संभावना कम नजर आ रही है। पिछले साल आजीवन सहयोग निधि के रूप में आर्थिक रूप से सक्षम कार्यकर्ताओं से एक-एक लाख रूपए लिए गए थे। तब यह कहा गया था कि उनसे और राशि नहीं ली जाएगी। अब लोकसभा के चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में फिर से चुनाव फंड की मांग की जा रही है। ज्यादातर कार्यकर्ताओं ने हाथ खड़े कर दिए हैं। एक-दो ने तो यहां तक कह दिया है कि पार्टी चाहे तो बाहर निकाल दे, लेकिन अब चुनाव के नाम पर चंदा नहीं देंगे। कुल मिलाकर अभियान की शुरूआत से पहले ही इसको लेकर हंगामे के आसार दिख रहे हैं। 

दूसरी तरफ भाजपा के बहुत से नेताओं के बीच यह चर्चा है कि पिछली सरकार में मंत्री रहे लोगों में से किसने कितनी कमाई की है, उसे उनके विभाग के चपरासी तक जानते हैं, इसलिए पार्टी को सीधे-सीधे ऐसे लोगों से रकम रखवा लेनी चाहिए चाहे वे विधानसभा का चुनाव जीते हों, या हारे हों। भाजपा के कुछ बड़े नेताओं का मानना है कि ऐसे आधा दर्जन भूतपूर्व मंत्री ही लोकसभा चुनाव का पूरा खर्च दे सकते हैं, और उन्हें देना भी चाहिए क्योंकि उन्हीं के कामों से तो पार्टी विधानसभा में हारी है।
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Date : 31-Jan-2019

प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक ने कल स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव को लेकर एक ऐसी ओछी बात कही है जैसी कि शायद ही किसी और नेता ने किसी विरोधी के बारे में इस प्रदेश में कही होगी। सिंहदेव अपने तीन अफसरों को लेकर थाईलैंड गए हैं जहां वे जनता के इलाज की उस देश की एक कामयाब योजना का अध्ययन करना चाहते हैं। पहले से तय और घोषित इस प्रवास में राज्य की एक वरिष्ठ महिला आईएएस भी स्वास्थ्य सचिव की हैसियत से गई हैं, और दूसरे दो अफसर भी गए हैं। इस प्रवास को लेकर धरम कौशिक ने यह बयान दिया है कि सब लोग जानते हैं कि थाईलैंड किस अध्ययन के लिए जाते हैं। 

जाहिर है कि धरम कौशिक का इशारा सेक्स-पर्यटन के लिए कुख्यात थाईलैंड की तरफ है कि मानो वहां तफरीह के अलावा और किसी काम से कोई जा ही नहीं सकते। एक तरफ तो ऐसी खबर है कि सिंहदेव ने अपने प्रवास पर सरकारी खर्च से मना कर दिया है, और अपना खर्च खुद देने की बात अफसरों से कह दी है, अपनी टिकट, होटल का अपना खर्च वे खुद दे रहे हैं। दूसरी तरफ पिछले विधानसभा चुनाव में पूरी पार्टी को गड्ढे डाल देने वाले प्रदेश भाजपाध्यक्ष स्वास्थ्य मंत्री के बारे में एक घटिया इशारा कर रहे हैं। 

बिलासपुर के सरकारी अस्पताल सिम्स में लगी आग में मरने वाले बच्चों को लेकर धरम कौशिक ने कड़ा बयान दिया है कि इधर बच्चे मर रहे हैं, उधर स्वास्थ्य मंत्री थाईलैंड जा रहे हैं। प्रदेश के सरकारी चिकित्सा ढांचे को पिछले पन्द्रह बरस में भाजपा की सरकार, मंत्रियों, और अफसरों ने इस कदर दुह लिया है कि दूध के साथ-साथ लहू भी निकल आया। इसके बाद अब इन पन्द्रह सालों के जिम्मेदार लोग न सिर्फ अपने लंबे भ्रष्टाचार पर जवाब देने के बजाय आरोप लगा रहे हैं, बल्कि किसी के चाल-चलन पर गंदे और घटिया आरोप लगा रहे हैं। प्रदेश के आईएएस अफसरों में कल के कौशिक के बयान को लेकर बेचैनी है, और उनके बीच यह बात चल रही है कि आईएएस एसोसिएशन ऐसे गंदे सार्वजनिक बयान के खिलाफ कार्रवाई क्यों न करे? एक अफसर ने वॉट्सऐप पर यह लिखा है कि पिछले एक स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का बेटा थाईलैंड में ही कमर तुड़वा बैठा था, जिसे लेने के लिए अमर अग्रवाल रायपुर से एक बड़े सर्जन को लेकर थाईलैंड गए थे। भाजपा के भीतर अमर अग्रवाल को घोर विरोधी धरम कौशिक का यह बयान अमर अग्रवाल के बेटे की तरफ भी इशारा करने वाला दिखता है। इसे लेकर बस्तर के एक पत्रकार प्रभात सिंह ने फेसबुक पर आज कुछ लिखा भी है- 

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 30-Jan-2019

छत्तीसगढ़ में बीजेपी को ऐसी करारी हार की उम्मीद तो कतई नहीं थी, लेकिन हार तो गई है और ऐसी स्थिति में हार के कारण निकलने शुरू हो गए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने हार का ठीकरा कार्यकर्ताओं पर क्या फोड़ा, कार्यकर्ताओं और नेताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। उनका गुस्सा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि कार्यकर्ता लगातार उपेक्षित हो रहे थे सो उन्होंने चुनाव में घर बैठना ही मुनासिब समझा। ऐसे में अपने दंग और कमजोरी को सुधारने के बजाए बड़े नेता और रणनीतिकार उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अब जोश-जोश में पार्टी के नेता ने बोल तो दिया, लेकिन जैसे ही वो इसकी प्रतिक्रिया समझ पाते बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि कमान से छूटा तीर और मुंह से निकला शब्द तो कहीं न कहीं जाकर धंसेगा। यह शब्द-बाण भी धंस चुका है। पार्टी नेता परेशान हैं, क्योंकि जल्द ही लोकसभा के चुनाव हैं और कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव में बदला निकालने पर उतारू हो गए तो राज्य में बीजेपी नेताओं का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। अब पार्टी के दूसरे कर्णधार डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं, देखिए कितना डैमेज रोक पाते हैं।

एक पैर पर खड़े हैं जोगी के कई लोग
जोगी पार्टी के विधायक भी दाएं-बाएं हो रहे हैं। एक विधायक ने तो कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की है। चर्चा है कि उन्होंने एक मंत्री के जरिए यह प्रस्ताव भी दिया है और वे इसके लिए विधानसभा की सदस्यता छोडऩे के लिए भी तैयार हैं। हालांकि कांग्रेस के रणनीतिकार विधायक के प्रस्ताव पर मंथन कर रहे हैं। इससे परे जोगी पार्टी के करीब दो सौ छोटे-बड़े पदाधिकारियों के कांग्रेस प्रवेश का आवेदन पहले से ही लंबित है। दर्जनभर पूर्व विधायक और प्रत्याशी जोगी पार्टी छोडऩे का मन बना रहे हैं। इनमें से कईयों ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से सीधे बात भी कर ली है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  सभी सीटें जीतने के लिए रणनीति बना रही है। ऐसे में पार्टी को और मजबूत करने के लिए आने वाले दिनों में जोगी पार्टी के दिग्गज नेताओं को कांग्रेस में शामिल किया जा सकता है।

10-20 हजार करोड़ के काम के बाद...
राजधानी रायपुर में मंत्रियों के बंगलों में नए मंत्रियों का जाना तो हो गया है, लेकिन पिछले लोक निर्माण मंत्री राजेश मूणत अभी तक उसी बंगले में हैं। यह बंगला टीएस सिंहदेव को आबंटित हुआ हैं, लेकिन जब तक मूणत का निजी बंगला जाने के लायक नहीं हो जाता, तब तक इसी सरकारी बंगले में उन्हें रहने के लिए सिंहदेव ने कह दिया है। वे खुद राजकुमार कॉलेज के गेस्ट हाऊस में रहते हैं और उन्होंने कहा है कि मूणत अभी इस बंगले में और रह लें। ऐसे में मौलश्री विहार में डॉ. रमन सिंह के घर के पास अपने निजी बंगले को तैयार करवाते खड़े मूणत बीच-बीच में रमन सिंह से मिलने भी पहुंच जाते हैं। यह दिलचस्प नजारा है कि प्रदेश में 10-20 हजार करोड़ रुपये के निर्माण करवाने वाले मूणत अब निजी मकान में रंग-पेंट करवाते खड़े हैं। जब हाऊसिंग बोर्ड ने विधायकों के लिए कॉलोनी बनाई थी तब 8 वरिष्ठ नेताओं को एयरपोर्ट रोड के दूसरी तरफ बड़े प्लॉट बड़े मकान बनाने के लिए दिए गए थे। इसमें 5 भाजपा के थे और तीन कांगे्रस के। शायद उसके बाद करूणा शुक्ला भाजपा से कांगे्रस में आ गईं। 

गांधी को लेकर हिन्दुस्तान में कुछ उसी तरह की छूट ले ली जाती है जिस तरह गणेश की प्रतिमाओं को लेकर। कहने के लिए तो गांधी की प्रतिमा बनाने के बाद उसका गांधी जैसा दिखना सरकार से प्रमाणित करवाना पड़ता है, लेकिन गली-गली, गांव-गांव ऐसी गांधी प्रतिमाएं लगी हुई हैं कि जिन्हें देखकर खुद गांधी भी न पहचान पाएं कि ये उन्हीं का चेहरा है। छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख फोटोग्राफर, सत्यप्रकाश पांडेय, पहले भी कई जगहों की विचित्र और बेहूदी बनाई गईं गांधी प्रतिमाओं की तस्वीरें ला चुके हैं, और इस बार यह अनमोल रतन वे कोरबा जिला मुख्यालय से लगे ग्राम पंतोरा से लाए हैं। वैसे एक बात यह भी है कि गांधी की गांधी जैसी दिखने वाली प्रतिमा बनाने के लिए तो कोई ठीक-ठाक मूर्तिकार ही लगेंगे जो कि भुगतान भी लेंगे। ये गांधी गरीबों के गांधी दिख रहे हैं जिनके पास मूर्तिकार के लिए पैसे भी शायद न हों। अगर ऐसा है तो फिर कम से कम गांधी तो इसका कोई बुरा नहीं मानेंगे। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 29-Jan-2019

प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से कांग्रेस के आलोचकों ने एक बार फिर वंशवाद और कुनबापरस्ती पर चर्चा छेड़ दी है। लेकिन कौन सा प्रदेश, और वामपंथियों के अलावा कौन सी पार्टी राजनीति में वंशवाद से मुक्त है? छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां राजनीति में वंशवाद रविशंकर शुक्ल से चालू होता है जो कि श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल से होते हुए अमितेष शुक्ल तक तो पहुंच ही चुका है, और अगली पीढ़ी की चर्चा भी है। इनके अलावा कई पार्टियों में बहुत से नेताओं की अगली पीढिय़ां सत्ता में पहुंच चुकी हैं। इतिहास में आगे-पीछे का क्रम देखे बिना अगर लिखें, तो बस्तर के सांसद बलीराम कश्यप के छोटे बेटे केदार कश्यप राज्य में मंत्री रहे हैं, तो पिता की जगह दूसरा बेटा दिनेश कश्यप बाद में सांसद बना। मोतीलाल वोरा के बेटे अरूण वोरा विधायक हैं, और भाई गोविंदलाल वोरा अपने जीवन में कांग्रेस के पदाधिकारी रहे। डॉ. रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह सांसद हैं और स्व. नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश पटेल आज मंत्री हैं। महेन्द्र कर्मा के बाद उनकी पत्नी देवती कर्मा भी विधायक रहीं, और महेन्द्र के भाई लक्ष्मण कर्मा भी विधायक रहे। लखीराम अग्रवाल के बेटे अमर अग्रवाल भाजपा सरकार के पिछले तीन कार्यकाल में मंत्री रहे, और इसके पहले भी वे पार्टी के पदाधिकारी रहे। आपातकाल की विधायक रजनी उपासने के बेटे सच्चिदानंद उपासने बाद में विधानसभा का चुनाव लड़े, पार्टी के बागी भी रहे, और पार्टी में पदाधिकारी भी रहे। आज के एक प्रमुख मंत्री रविन्द्र चौबे के पिता स्व. देवीप्रसाद चौबे विधायक रहे, उनकी मां भी विधायक रहीं, और बड़े भाई प्रदीप चौबे भी विधायक रहे, और बाद में लोकसभा के उम्मीदवार भी रहे। खैरागढ़ के विधायक देवव्रत सिंह की मां रश्मि देवी विधायक थीं, चाचा शिवेन्द्र बहादुर राजीव गांधी के करीबी सांसद थे। शिवेन्द्र बहादुर की पत्नी गीता देवी जोगी सरकार में मंत्री थीं। कवर्धा राजघराने में शशिप्रभा सिंह विधायक थीं, और बाद में उनके बेटे योगीराज सिंह विधायक रहे। उधर सरगुजा में टी.एस. सिंहदेव की मां देवेन्द्रकुमारी सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह मंत्रिमंडल में रहीं, और टी.एस. की बहन आशा कुमारी सिंह हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस विधायक हैं। इसी परिवार से जुड़े रामचन्द्र सिंहदेव मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल में मंत्री रहे, और अब उन्हीं की भतीजी अंबिका सिंहदेव कांग्रेस विधायक हैं। जशपुर के जूदेव परिवार के कई लोग भाजपा की टिकटों पर कई सदनों में रहे। दिलीप सिंह जूदेव लोकसभा के सदस्य रहे, उनके बेटे युद्धवीर सिंह भाजपा विधायक रहे, और दिलीप सिंह के भतीजे रणविजय सिंह अभी भाजपा से ही सांसद हैं। रायपुर के सांसद रमेश बैस के भाई श्याम बैस भी रमन सरकार में निगम अध्यक्ष रहे, और मनोनयन से सत्ता पाने वाले ऐसे बहुत से दूसरे नेताओं के परिवार भी रहे। श्याम बैस विधानसभा का टिकट पाकर चुनाव लड़कर हार भी चुके हैं। बिलासपुर के विधायक ठाकुर बलराम सिंह के बेटे आशीष सिंह विधानसभा का चुनाव कांग्रेस की टिकट पर ही हार चुके थे, और अब उनकी पत्नी रश्मि सिंह कांग्रेस से विधायक बनी हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में शुक्ल परिवार के बाद सबसे अधिक चर्चित जोगी परिवार को देखें, कांग्रेस, बसपा और जोगी कांग्रेस से मिलकर उनके परिवार के चारों सदस्य चुनाव लड़ चुके हैं, तीन लोग लोकसभा-विधानसभा पहुंच चुके हैं, और बहू ऋचा जोगी अभी चुनाव हार चुकी हैं। मप्र में मंत्री रहे मनहरण लाल पांडेय की बेटी हर्षिता पांडेय को अभी भाजपा की टिकट मिली, और वे चुनाव हार गईं। बिलासपुर से ही मंत्री रहे बी.आर. यादव के बेटे भी चुनाव लड़े और हार गए। सतनामी समाज में मिनीमाता सांसद रहीं, उनके पति बाबा अगम दास सांसद रहे, और बाबा अगम दास की दूसरी पत्नी के बेटे मंत्री रहे। विजय गुरू के बेटे रूद्र गुरू आज छत्तीसगढ़ के मंत्री हैं। राजनांदगांव जिले से मंत्री रहे धनेश पाटिला का बेटा बाद में विधानसभा का चुनाव लड़ा। मप्र में विधायक रहे स्व. बिसाहूदास महंत के बेटे चरणदास महंत मंत्री और पार्टी प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए, सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहते हुए अब छत्तीसगढ़ में विधानसभा अध्यक्ष हैं। बस्तर से केन्द्रीय मंत्री रहे अरविंद नेताम के भाई शिव नेताम दिग्विजय मंत्रिमंडल में मंत्री रहे। अरविंद नेताम की पत्नी छबिला नेताम भी सांसद रही। इसके अलावा उनकी पुत्री डॉ. प्रीति नेताम भी विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं। जोगी सरकार में मंत्री रहे मनोज मंडावी के पिता भी विधायक रहे हैं। इसी तरह कांकेर के पूर्व विधायक शंकर ध्रुवा के भाई आत्माराम ध्रुवा भी विधानसभा के सदस्य रहे। सरगुजा के आदिवासी नेता रामविचार नेताम की पत्नी जिला पंचायत की अध्यक्ष रहीं, रामविचार खुद विधायक रहे, और अब राज्यसभा में है। बस्तर में मानकूराम सोढ़ी के बेटे शंकर सोढ़ी मंत्री रहे। दुर्ग के एक ताकतवर विधायक रहे वासुदेव चंद्राकर की बेटी प्रतिमा चंद्राकर बाद में कांग्रेस की विधायक रहीं, और अभी गुजरे चुनाव में भी प्रत्याशी घोषित हो चुकी थीं, बाद में उन्हें बदला गया। वासुदेव चंद्राकर के बेटे लक्ष्मण चंद्राकर साडा के अध्यक्ष रहे। भाजपा के एक विधायक बलराम पुजारी के बेटे डमरूधर पुजारी विधायक रहे। कांग्रेस के एक बड़े आदिवासी नेता झुमुकलाल भेडिय़ा के भतीजे डोमेन्द्र भेडिय़ा विधायक रहे और इसी परिवार की अनिला भेडिय़ा आज राज्य में मंत्री हैं। बसना के वीरेन्द्र बहादुर सिंह कांग्रेस विधायक रहे, उनके भाई महेन्द्र बहादुर सिंह मंत्री रहे, और अब अगली पीढ़ी के देवेन्द्र बहादुर विधायक हैं। पति की जगह पत्नी, या बेटे-बेटी को टिकट की एक मजबूत परंपरा छत्तीसगढ़ में चली आ रही है जो कि सभी पार्टियों में बराबरी से फैली हुई है। एक समाचार रिपोर्ट ने लिखा था कि 90 में से करीब 40 सीटों पर वंशवाद का बोलबाला है। यहां पर की लिस्ट न तो पूरी है न ही सभी परिवारों को छूती है। मजे की बात यह है कि लोकतंत्र आने के पहले से जिन राज परिवारों का छत्तीसगढ़ में बोलबाला था, आज की निर्वाचित लोकतांत्रिक राजनीति में भी उनकी पकड़ कहीं कम नहीं हुई है। करीब एक चौथाई सीटें ऐसी हैं जहां पर राज परिवार के लोग समय-समय पर रहते आए हैं। 
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Date : 27-Jan-2019

पिछली सरकार में बेहद ताकतवर रहे अफसर अमन सिंह मुश्किल में घिर सकते हैं। अमन सिंह के खिलाफ पीएमओ में शिकायत हुई और पीएमओ ने शिकायती पत्र को कार्रवाई के लिए राज्य शासन को भेज दिया है। ऐसा पहले भी हुआ है और तब इस तरह के पत्र को देखने का कोई हौसला नहीं जुटा पाता था। अब जब वे सरकार का हिस्सा नहीं है, तो शिकायती पत्र के आधार पर जांच-पड़ताल होना स्वाभाविक है। पत्र तो 16 तारीख को यहां भेज दिया गया था, लेकिन शिकायतकर्ता को इसकी जानकारी बाद में हुई। इसके बाद सब कुछ सोशल मीडिया में वायरल हो गया। सुनते हैं कि अमन के खिलाफ शिकायत नई नहीं है और न ही शिकायतकर्ता। भाजपा के कई प्रभावशाली लोग लंबे समय से उनके खिलाफ लगे रहे। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर  अमन सिंह और मुकेश गुप्ता की जोड़ी के खिलाफ पीएमओ तक हर स्तर पर शिकायत कर चुके हैं। वे अब भी इस मुहिम में जुटे हैं। मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच शुरू हो चुकी है। अब सरकार इस ताकतवर अफसर के खिलाफ जांच-पड़ताल शुरू कर रही है। जांच में कुछ  निकलेगा भी या नहीं, यह साफ नहीं है लेकिन शिकायती पत्र के आधार पर उन्हें घेरने का मौका तो मिल ही गया है। 
अमन सिंह न सिर्फ राज्य बल्कि केंद्र में भी ताकतवर रहे हैं। केंद्र में अभी भी एनडीए की सरकार है और कई मंत्रियों से उनकी निकटता जग जाहिर है।  राजनाथ सिंह ने उन्हें नक्सल मामलों की केंद्रीय समिति में सदस्य के रूप में रखा है। केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल, जगत प्रकाश नड्डा और धर्मेंद्र प्रधान से भी करीबी रिश्ते हैं। संगठन में भी उनके चाहने वालों की कमी नहीं है। सौदान सिंह तो उनके मुरीद रहे हैं। ऐसे में अपने अपार संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले अमन सिंह के खिलाफ जांच किसी किनारे पहुंच पाती है या नहीं,  देखना है। लेकिन परेशानी शुरू तो हो ही गई है क्योंकि शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से होते हुए पहुंची है, और जांच राज्य सरकार की अपनी पहल पर नहीं हो रही, पीएमओ की चि_ी के आधार पर होने जा रही है।

गौरीशंकर का वजन
प्रदेश भाजपा में अंतर्कलह उजागर हो रही है। असंतुष्ट नेताओं के निशाने पर रमन-धरम कौशिक की जोड़ी ही नहीं बल्कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल भी हैं। सुनते हैं कि पिछले दिनों प्रदेश भाजपा के प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने कुछ प्रमुख नेताओं से अकेले में चर्चा की। एक पूर्व मंत्री ने  चर्चा में गौरीशंकर अग्रवाल की हैसियत पर सवाल खड़े किए। उन्होंने प्रदेश प्रभारी से ही पूछ लिया कि गौरीशंकर को किस हैसियत से मंच पर बिठाया जाता है। वे विधानसभा का चुनाव बुरी तरह हार चुके हैं और संगठन के किसी अहम पद पर नहीं है। जबकि उनसे वरिष्ठ नेताओं को मंच पर नहीं बिठाया जाता है। प्रदेश प्रभारी ने पूर्व मंत्री की आपत्ति को कितनी गंभीरता से लिया है, यह पता नहीं, लेकिन सर्वविदित है कि कोष की देखभाल करने वाले का स्थान  हमेशा ऊपर ही रहता है। गौरीशंकर अग्रवाल के बारे में पार्टी के तमाम लोग जानते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष रहने के पहले भी, और अध्यक्ष रहते हुए भी पार्टी फंड के इंतजाम में उनकी बड़ी भूमिका रहते आई है। इसलिए पार्टी में उनका वजन हार के बाद भी कायम है।(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 24-Jan-2019

भाजपा में विधानसभा चुनाव में करारी हार की समीक्षा का दौर चल रहा है। सालों बाद ऐसा हुआ है जब किसी संगठन मंत्री के खिलाफ नेताओं-कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूटा है। पार्टी नेताओं ने राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह पर भी हार का ठीकरा फोड़ा और उन्हें अहंकारी तक करार दिया। भाजपा में आरएसएस के प्रचारकों को ही संगठन मंत्री बनाया जाता है। उनकी हैसियत प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष से ऊंची रहती है। आमतौर पर संगठन मंत्री निष्पक्ष होते हैं और उनमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता होती है। कुछ नेताओं के मुताबिक सौदान सिंह में भी यही खूबियां रही हैं, लेकिन कुछ और नेता इससे असहमत भी हैं। 

सतना के रहवासी सौदान सिंह वर्ष-2002 में यहां आए। उन्हें विजय शर्मा की जगह प्रदेश में संगठन मंत्री का जिम्मा सौंपा गया। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा में भगदड़ मची हुई थी। दर्जनभर विधायक पार्टी छोड़कर कांग्रेस में जा चुके थे। इन विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने संगठन को संभाला और सभी बड़े नेताओं में समन्वय स्थापित कर प्रदेश में पार्टी को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने में कामयाब रहे। वे अनुशासनप्रिय रहे और उन्हें असंतुष्टों को साधने में महारत हासिल रही है। सौदान सिंह की कार्यशैली का राष्ट्रीय नेतृत्व भी मुरीद रहा। उन पर कुछ नेताओं पर कृपा बरसाने का आरोप भी लगा। पिछड़े वर्ग के ताकतवर नेता दिवंगत ताराचंद साहू और वीरेन्द्र पाण्डेय से उनकी नहीं बनी और दोनों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 
प्रदेश में भाजपा रमन सिंह की छवि और सौदान सिंह की सांगठनिक क्षमता के बूते पर 15 साल राज करती रही। हालांकि पार्टी में अंदरूनी खींचतान पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से शुरू हो गया। सौदान सिंह को राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री बनाया गया, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका मोह नहीं छूटा। उनका आना-जाना लगा रहा। वे कारोबारी किस्म के नेताओं से घिरे रहे। उनकी जगह पहले रामप्रताप सिंह और फिर पवन साय को महामंत्री (संगठन) की जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन दोनों सौदान सिंह के आभामंडल से बाहर नहीं निकल पाए। 
पार्टी के कई लोग सरकार में अफसरशाही के हावी होने तक के लिए सौदान सिंह को जिम्मेदार ठहराते हैं। हल्ला तो यह भी है कि जब एक मंत्री और एक अफसर के बीच विवाद हुआ, तो सौदान सिंह अफसर का ही साथ दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं को उनके तेवर बदले-बदले से लगने लग गए थे। और जब चुनाव के ठीक पहले बस्तर-सरगुजा दौरे पर गए, तो उन्हें कार्यकर्ताओं में नाराजगी का थोड़ा बहुत एहसास हो चुका था। फिर भी वे असंतोष दूर करने में नाकामयाब रहे। पहले चरण के चुनाव में बस्तर में डटे रहे, लेकिन नतीजा ठीक उल्टा हुआ। हाल यह रहा कि चुनाव में कार्यकर्ता बेकाबू हो चुके थे और कई जगहों पर उन्होंने खुलकर पार्टी के खिलाफ काम किया। चुनाव में भीतरघात की शिकायतें इतनी ज्यादा हंै कि पार्टी कार्रवाई का भी हौसला नहीं जुटा पा रही है। और तो और प्रदेश स्तर पर हार की समीक्षा के लिए एक भी बैठक तक नहीं हुई। फिर भी सीनियर विधायक भी अनौपचारिक चर्चा में उनके खिलाफ आग उगलते देखे जा सकते हैं। हाल यह है कि खुले तौर पर पहली बार सौदान सिंह जैसे ताकतवर नेता के खिलाफ आवाजें उठ रही है। नाराज कार्यकर्ता यह कहने से नहीं चूक रहे कि सौदान की वजह से ही पार्टी में गुटबाजी बढ़ी और निष्ठावान उपेक्षित रहे हैं। अब लोकसभा चुनाव के पहले सौदान एक बार फिर सक्रिय दिख रहे हैं। देखना है कि वे असंतुष्टों को साधने के लिए कौन सा तरीका अपनाते हैं। लेकिन पिछले बरसों में अफसरशाही की तानाशाही को अनदेखा करने की तोहमत से वे बच नहीं सकते। 

 

जय-वीरू की जोड़ी फिर एक 
विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव को फिल्म शोले के जय-वीरू की जोड़ी करार दिया जाता था। दोनों के बीच तालमेल गजब का रहा है, लेकिन टिकट वितरण के दौरान दोनों के बीच मतभेद उभर आए। दोनों की जोड़ी अलग हो गई। चुनाव में कांग्रेस को बम्पर सफलता मिली। जय-वीरू, दोनों सीएम पद के दावेदार थे, लेकिन सेहरा वीरू (भूपेश) के सिर बंधा। पहले ताम्रध्वज साहू को सीएम बनाने की तैयारी थी। उन्हें रोकने के लिए दोनों एक हो गए थे। भूपेश के सीएम बनने के बाद भी विभाग बंटवारे को लेकर फिर दोनों के बीच मतभेद उभर आए। सिंहदेव वित्त विभाग चाहते थे, लेकिन भूपेश ने रमन सिंह के सारे विभागों को अपने पास रखने के फैसले के तहत वित्त विभाग अपने पास ही रखा। 
हालांकि भूपेश ने सामूहिक नेतृत्व की भावना को प्रदर्शित भी किया, लेकिन थोड़ी-बहुत खींचतान चल ही रही थी। सुनते हैं कि दोनों ने चर्चा की और छोटे-छोटे विषयों को आपसी समन्वय से निपटाने पर सहमति बनी। पिछले दिनों राहुल गांधी से मिलने दिल्ली जाने वाले थे। दोनों के लिए फ्लाईट में अगल-बगल की सीट बुक कराई गई थी, लेकिन राहुल के दिल्ली में न होने के कारण दौरा टल गया। इसके बाद यह साफ हो चला है कि प्रदेश अध्यक्ष हो या फिर मंत्रिमंडल में एक सदस्य की नियुक्ति, दोनों की एक ही राय होगी।  निगम मंडलों की नियुक्ति में भी दोनों मिल-जुलकर फैसला लेंगे। कुछ देर से ही सही जय-वीरू लोकसभा चुनाव से पहले फिर एक हो गए। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 23-Jan-2019

मुकेश गुप्ता की गिनती तेज-तर्रार पुलिस अफसरों में होती है। जोगी सरकार हो या फिर रमन सरकार, वे पॉवरफुल रहे। महकमे में उनकी हैसियत डीजीपी से भी ऊंची रही है। उनके खिलाफ कई शिकायतें आई है। लोकायुक्त ने कार्रवाई की अनुशंसा भी की, लेकिन उनका बाल-बांका नहीं हुआ। रमन सरकार में गृहमंत्री रहे ननकीराम कंवर उन्हें हाशिए पर डालने की कोशिश करते रहे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। उनकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एमडब्ल्यू अंसारी के रिटायरमेंट के बाद डीजी के रिक्त पद पर संजय पिल्ले की पदोन्नति रूकी रही कि उन्हीं के बैच के मुकेश गुप्ता पदोन्नत नहीं हो पा रहे थे। आखिर में रमन सरकार ने अपने आखिरी कैबिनेट में केन्द्र से किसी तरह अतिरिक्त पद स्वीकृत कराकर पिल्ले के साथ-साथ मुकेश गुप्ता और आरके विज की पदोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। 
खैर, सरकार बदलने के बाद पहली बार यह दबंग अफसर थोड़ी मुश्किल में दिख रहा है। भूपेश सरकार ने पूर्व गृहमंत्री कंवर की शिकायत पर मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच बिठा दी है। जांच का जिम्मा सबसे सीनियर आईपीएस अफसर गिरधारी नायक को दिया गया है। सुनते हैं कि अब नायक, मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच के झंझट में नहीं पडऩा चाहते हैं। वे इस सिलसिले में सीएम से मिलने भी गए और जांच को लेकर दिक्कतें गिनाई। सीएम ने उन्हें लिखित में देने कहा, तो उल्टे पांव लौट आए। एक-दो अफसरों से जांच को लेकर चर्चा भी की है, लेकिन प्रकरण आगे नहीं बढ़ पाया है। नायक को 12 मार्च तक अपनी रिपोर्ट देनी है। उनके रिटायरमेंट में कुछ महीने बाकी हैं। ऐसे में समय-सीमा के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट देंगे, यह मुश्किल दिख रहा है।  मुकेश गुप्ता के खिलाफ फाईल पांच सौ पेज मोटी है, और उसमें समय-समय पर कई एजेंसियों और लोगों द्वारा की गई जांच रिपोर्ट लगी हुई भी है। अब इतना मोटा पोथा-पुराण लेकर जांच करना आसान इसलिए नहीं है कि इसमें अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक दशकों की कई जांच शामिल हैं। 
लेकिन इस मामले से यह भी देखने की जरूरत है कि वक्त कैसे करवट लेता है। गिरधारी नायक को डीजीपी बनने से रोकने के लिए मुकेश गुप्ता, अमन सिंह, और उस वक्त के मुख्य सचिव सुनिल कुमार ने जान लगा दी थी, और उस वक्त ए.एन. उपाध्याय की डीजीपी बनने की पात्रता नहीं थी, तो भी केन्द्र सरकार से किसी तरह खास रियायत लेकर उन्हें डीजीपी बनाया गया था, और उनसे वरिष्ठ गिरधारी नायक देखते रह गए थे। पुलिस महकमे में यह पूरी जानकारी उतनी ही आम है जितनी कि यह जानकारी कि पुलिस की वर्दी खाकी है। 

सबको जोश आया हुआ है...
लोकसभा टिकट के दावेदार कांग्रेस में अभी से उछल-कूद मचा रहे हैं। पिछले दिनों पूर्व विधायक राजकमल सिंघानिया ने अपने फार्महाऊस में छोटी सी पार्टी दी। इसमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर सहित कई बड़े नेताओं ने शिरकत की। सीएम भूपेश बघेल भी कुछ देर के लिए वहां पहुंचे। सुनते हैं कि थरूर ने राजकमल को लोकसभा की तैयारी के लिए कहा। फिर क्या था राजकमल ने भाग-दौड़ शुरू कर दी। राजकमल की सक्रियता देखकर महापौर प्रमोद दुबे ने भी शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। पहले पीएल पुनिया के आगमन के दौरान प्रमोद से जुड़े लोगों ने प्रमोद दुबे के समर्थन में जिंदाबाद के नारे लगाए। सिंधी समाज के कुछ नेता भी पुनिया से मिले और प्रमोद को प्रत्याशी बनाने की मांग की। यह सब देखकर पूर्व महापौर किरणमयी नायक पीछे कहां रहने वाली थी। वे अपनी दावेदारी को पुख्ता करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर सर्वे करा रही हंै। कांग्रेस में यह जुमला चर्चित है कि कांग्रेस की टिकट और मौत का कोई भरोसा नहीं। पता नहीं कब किसे मिल जाए। यह सब जानकार भी दावेदार अपनी ताकत दिखाने में पीछे नहीं दिख रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 22-Jan-2019

रमन सरकार के बेहद करीबी रहे कारोबारी मुश्किल में हैं। पहले उनके रसूख के चलते अफसर उनके संस्थानों में जांच-पड़ताल की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। अब सरकार बदलते ही उन पर शिकंजा कसना शुरू हो गया है। पिछले दिनों राजनांदगांव के एक बड़े कारोबारी के संस्थानों में पर्यावरण नियमों का उल्लंघन की शिकायत पर विभाग ने बिजली काटने में देर नहीं लगाई। कार्रवाई से हड़बड़ाए कारोबारी विभागीय मंत्री के घर पहुंच गए, लेकिन मंत्री ने इस पर कोई भी चर्चा करने से मना कर दिया। 

काफी कोशिशों के बाद कारोबारी रायपुर के एक पार्षद के जरिए सीएम से मुलाकात करने में सफल रहे। उन्होंने बुके देकर भूपेश बघेल को सीएम बनने की बधाई दी, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने कारोबारी दिक्कतों को लेकर चर्चा शुरू की। सीएम ने दूर खड़े पार्टी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल से मिलने कह दिया। रामगोपाल अग्रवाल का कद पार्टी में काफी बढ़ा है। बड़े कारोबारी-उद्योगपति उनके जरिए ही सरकार के लोगों से मिल पा रहे हैं। कुछ इसी तरह दिक्कत से प्रदेश के एक बड़े शराब कारोबारी भी जूझ रहे हैं। पिछली सरकार में बेहद पावरफुल रहे एक शराब कारोबारी का रसूख इतना था कि उनके जन्मदिन पर बधाई देने नेता-अफसरों का तांता लगा रहता था। बीते दिनों शराब कारोबारी का जन्मदिन था और सरकार बदलने का फर्क इतना पड़ा कि कारोबारी को जन्मदिन की बधाई देने कोई अफसर-नेता उनके घर नहीं गए। खुद बुके लेकर डॉ. चरणदास महंत के घर पहुंचे और उनके गृह प्रवेश पर बधाई दी। 

दरअसल भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री मनोनीत होने के ठीक पहले की राजधानियों की चर्चा की कड़वाहट अभी तक किसी के मुंह से खत्म हुई नहीं है। चर्चा में था कि दिल्ली में एक मोटा भुगतान सिर्फ इसलिए हुआ था कि भूपेश बघेल के अलावा और कोई भी मुख्यमंत्री मनोनीत कर दिया जाए। अब बंद कमरों के सौदों और भुगतान का कोई सुबूत तो होता नहीं, लेकिन कई बातें ऐसी हुईं थीं कि यह चर्चा अफवाह से अधिक वजनदार हकीकत लग रही थी।

हटाना आसान नहीं था...

पूर्व सीएम के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता को डीकेएस सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल के अधीक्षक पद से हटा दिया गया। वे अस्पताल के निर्माण से ही जुड़े रहे हैं और एक तरह से उनकी देखरेख में ही अस्पताल तैयार हुआ था। अब उन्हें पद से हटाने को लेकर खबर छनकर आ रही है, उसके मुताबिक उन्हें पद से हटाने का फैसला आसान नहीं था। कांग्रेस के कई बड़े नेता उनके पिता के मरीज हैं। डॉ. पुनीत गुप्ता का अपना भी अच्छा खासा राजनीतिक संपर्क है।

सुनते हंै कि अस्पताल में नियुक्तियों-उपकरणों की खरीदी में अनियमितता की शिकायत कांग्रेस के चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता करते रहे हैं। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद उन्होंने मुहिम और तेज कर दी थी, लेकिन इस पर कुछ नहीं हो रहा था। आखिरकार उन्होंने सीधे प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से इसकी शिकायत कर दी। पुनिया ने स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव से इसको लेकर बात की। और फिर 24 घंटे के भीतर पुनीत गुप्ता को हटा दिया गया।  (rajpathjanpath@gmail.com)