राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : असम में विकास, मोदी का नहीं, कांग्रेस का..
25-Feb-2021 6:06 PM 266
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : असम में विकास, मोदी का नहीं, कांग्रेस का..

असम में विकास, मोदी का नहीं, कांग्रेस का..

असम में विकास उपाध्याय का डंका बज रहा है। तीन महीने पहले ही उन्हें कांग्रेस हाईकमान ने असम प्रदेश कांग्रेस का सह प्रभारी बनाया था। इन तीन महीनों में विकास और उनकी टीम ने खूब मेहनत की है, और इसका प्रतिफल यह रहा कि सभी बूथ कमेटियां चार्ज हो गई, और   तकरीबन हरेक विधानसभा में कार्यकर्ताओं का अच्छा खासा नेटवर्क तैयार हो गया है। सीएम भूपेश बघेल को चुनाव प्रभारी बनाया गया है, और उनके कार्यक्रम में अच्छी खासी भीड़ उमड़ी है।

कुल मिलाकर विकास और उनकी टीम  के कार्यों की पार्टी बड़े नेता भी तारीफ कर रहे हैं। हाल यह है कि असम में पार्टी के कार्यक्रम में विकास हो या न हो, उनकी तस्वीर जरूर होती है। विकास कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं, लेकिन यदि असम में चुनाव नतीजे अनुकूल आए, तो विकास का कद बढऩा निश्चित है। हालांकि यह आसान भी नहीं दिख रहा है। पार्टी के नेता मानते हैं कि पार्टी संगठन को छह महीना पहले ही सक्रिय होना चाहिए था। खैर, पार्टी को अभी भी असम में काफी उम्मीदें हैं। 

अमितेश उत्तेजित क्यों

अमितेश शुक्ल विधानसभा के बजट सत्र में काफी सक्रिय दिख रहे हैं। वे मौके-बेमौके पर खड़े होकर भाजपा को खूब कोसते नजर आ रहे हैं। सत्ता और विपक्षी सदस्य उनके तेवर का खूब लुफ्त भी उठा रहे हैं। बुधवार को अमितेश खड़े हुए, और शराब बिक्री से जुड़े नारायण चंदेल के सवाल-जवाब के बीच कूद पड़े, और भाजपा पर हमला बोलने लगे। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमितेश उत्तेजित क्यों है? उन्होंने उत्तेजना का कारण पूछ लिया? इस पर रविन्द्र चौबे ने कहा कि अमितेश उत्तेजित क्यों हैं, ये तो वे ही बता पाएंगे। इस पर अजय चंद्राकर ने कहा कि अमितेश जी आपको (रविन्द्र चौबे) को हटाने के लिए मेहनत कर रहे हैं। इस पर सदन में जमकर ठहाका लगा।

22.5 करोड़ का एक इंजेक्शन!

कोरबा के एक एसईसीएल कर्मचारी सतीश कुमार की 14 माह की शिशु सृष्टि की जान बचाने के लिये भरसक कोशिश हो रही है। सृष्टि स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी टाइप-1 बीमारी से पीडि़त है। उसका पूरा शरीर लगभग पैरालाइज है और वह कृत्रिम सांसों के सहारे जी रही है। इसका इंजेक्शन ‘जोलजेन्समा’ भारत में नहीं मिलता। इसे स्विट्जरलैंड नोवार्टिस कम्पनी से मंगाना होगा और इसे भारत लाने की टैक्स सहित कीमत होगी 22.5 करोड़ रुपये। महाराष्ट्र की पांच माह की तीरा को भी यही बीमारी है। वहां पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस की कोशिश के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से 6.5 करोड़ आयात शुक्ल माफ करने की घोषणा की गई है, जिसके चलते अब 16 करोड़ रुपये में यह दवा मिल जायेगी। सृष्टि के लिये भी यदि आयात शुल्क माफ कर दिया जाता है तब भी 16 करोड़ की व्यवस्था कैसे हो? यह इतनी बड़ी रकम है कि किसी आम आदमी के पास होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अमीरों को भी हाथ फैलाने के लिये मजबूर कर सकती है। कोयला कर्मचारियों के एक यूनियन ने कहा है कि यदि एक दिन का वेतन सभी कर्मचारी मिलकर दे दें तो इतनी बड़ी रकम इक_ी हो सकती है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने भी प्रधानमंत्री मोदी तथा कोयला मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि कोल इंडिया सृष्टि के इलाज का खर्च उठायें।

यह जिज्ञासा लोगों में है कि इस इंजेक्शन में ऐसा क्या है कि कीमत 16 करोड़ रुपये है? एक अख़बार में नोवार्टिस के भारत में प्रतिनिधि सीईओ नरसिम्हन का बयान है कि यह दवा मेडिकल थैरिपी की एक बड़ी खोज है। यह अत्यन्त दुर्लभ बीमारी है, साथ ही जैनेटिक भी है। यानि किसी एक को हुआ है तो उसकी बाद वाली पीढ़ी को भी हो सकती है। यह इंजेक्शन न केवल मरीज को ठीक करता है बल्कि आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिये जीन को रिप्लेस कर देता है। रिसर्च पर होने वाले खर्च और दवाओं की मांग के आधार पर कीमत तय होती है। तीसरे चरण के ट्रायल के बाद कम्पनी ने  इसकी लागत के आधार पर कीमत 16 करोड़ रुपये तय की है। दवा की कीमत मांग बढऩे पर कम होगी। शुक्र है, कोरबा की सृष्टि और महाराष्ट्र की तीरा की उम्र दो साल से कम है। इसलिये उन्हें सिर्फ एक डोज देना होगा। यदि दो साल से ज्यादा उम्र की होती तो उन्हें चार टीके लगाने पड़ सकते थे।

बहरहाल, जब तक सांस, तब तक आस की स्थिति चल रही है और हर किसी को लग रहा है कि किसी तरह सृष्टि को नया जीवन मिल जायेगा। सृष्टि के पिता, उनके दोस्त, परिवार के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी है। उम्मीद है कि वे किसी तरह सृष्टि को नया जीवन दे पायेंगे।

अब रेलवे किराया घटाने वाली नहीं

कोरोना संक्रमण के बाद लॉकडाउन लगाने के बाद बिलासपुर रेलवे जोन से चलने वाली अधिकांश एक्सप्रेस ट्रेनों को अधिक किराये पर स्पेशल ट्रेनों के नाम से चलाया जा रहा था। इसके बाद दबाव बढ़ा तो लोकल पैसेंजर ट्रेनों को भी शुरू किया गया। पर किराया स्पेशल के नाम पर अधिक ही रखा गया। अब चूंकि यातायात के बाकी साधनों का सामान्य परिचालन शुरू हो चुका है, रेलवे के सामने भी सवाल है कि आखिर सामान्य टाइम टेबल, पुरानी रूट और स्टापेज रखते हुए आखिर कितने दिनों तक किसी ट्रेन को स्पेशल के नाम पर चलायें? धीरे-धीरे स्पेशल ट्रेनों को सामान्य करना ही होगा। पर, सवाल यह है कि स्पेशल ट्रेनों के नाम पर जो अतिरिक्त किराया मिल रहा है उसका क्या होगा। इसके चलते अब रेलवे ने घोषणा कर दी है कि लोकल ट्रेनों में न्यूनतम किराया 30 रुपये तय कर दिया गया है। रेलवे की ओर से लगभग साफ कर दिया गया है कि ट्रेनों को जब स्पेशल की जगह सामान्य ट्रेनों की तरह चलाया जायेगा तब भी इस किराये में कोई कमी नहीं की जायेगी। रेलवे ने इसकी वजह पहले ही की तरह भीड़ को कम बनाये रखने की बताई है। दरअसल, लम्बी दूरी के यात्रियों का किराया इस अनुपात में नहीं बढ़ाने की वजह है कि इसके विकल्प के रूप में लोग शेयर टैक्सी या हवाई जहाज का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर कम दूरी की यात्रा अकेले करनी हो तो ट्रेन ही उनके लिये आसान साधन रहा है। हजारों नौकरीपेशा और छोटे मोटे रोजगार धंधा करने वालों के लिये अब अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा रेलवे टिकटों पर खर्च करना होगा। जो लोग रोजाना सफर करते हैं उनके लिये यह परेशानी भरा है क्योंकि अब तक मासिक सीजन टिकटों का बनना शुरू नहीं हुआ है। हो सकता है बाद में मासिक टिकटें शुरू की जायें पर कोरोना काल के पहले की तरह रियायत मिलेगी, इसकी उम्मीद कम ही है।

करोड़पति हुए कोटवार

मालगुजारी के जमाने से कोटवारों को सेवायें देने के लिये खेती की जमीन बांट दी जाती थी, जिसे वे बेच नहीं सकते पर पीढिय़ों तक हस्तांतरित होती रहती है। इक्के-दुक्के ऐसे मामले आते रहते हैं जिसमें कोटवारी जमीन को अवैध तरीके से पटवारी और राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर मालिकाना हक वाली बता दी गई। बाद में इसे बेच दिया गया। पर गरियाबंद जिले में तो एक साथ इतने मामले पकड़ में आये हैं कि प्रशासन भी हैरान है। अकेले देवभोग तहसील में 50 कोटवारों ने 219 लोगों को अपनी सेवा भूमि बेच दी। यह खेल 2016 से हो रहा है। बस्तियों के विस्तार के साथ-साथ नई सडक़ें बनीं, राज्य मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग बने, जिसके बाद कोटवारी जमीन खेती की जगह कमर्शियल इस्तेमाल के लायक हो गई। कोटवारों को गुजर-बसर के लिये 5 एकड़ से लेकर 30 एकड़ तक जमीन आबंटित की जाती है। अब इस जमीन के मालिक वे नहीं, कई बड़े-बड़े कारोबारी हैं। देवभोग के अलावा जिले के दूसरे हिस्सों से भी ऐसे ही मामले सामने आये हैं। अब इन भूखंडों पर बड़ी-बड़ी इमारत भी खड़ी हो चुकी है। प्रशासन का कहना है कि पहले वे यह खरीद-बिक्री अवैध घोषित करेंगे फिर बेदखल। लेकिन जमीन जिसने खरीद ली, कब्जा कर लिया उसे हटाना, बेदखल करना कितना मुश्किल है यह किसी भी तहसील या एसडीएम ऑफिस में लम्बित मुकदमों का आंकड़ा निकालकर समझा जा सकता है।

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