संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अब फिर लगातार हाथियों की मौतें, जिम्मेदार कौन?
18-Oct-2020 2:59 PM 189
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अब फिर लगातार हाथियों की मौतें, जिम्मेदार कौन?

कुछ महीने पहले जब प्रदेश में एक के बाद एक हाथी मरने लगे तो प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख, राज्य के सबसे सीनियर आधा दर्जन आईएफएस में से एक अतुल शुक्ला की बलि चढ़ाई गई। वे इस कुर्सी पर रहते हुए जंगली जानवरों के मरने पर पूरे प्रदेश में दौड़-भाग कर रहे थे, ईमानदारी से मेहनत कर रहे थे, लेकिन हाथियों ने एक के बाद एक मरकर, और इंसानों ने उन्हें मारकर अतुल शुक्ला को कुर्सी से बेदखल कर ही दिया। अब पिछले चार दिनों में तीन हाथियों की मौत हो गई है जिनमें एक हथिनी है, और दो छोटे बच्चे हैं। अब लगातार हो रही मौतों की वजह से क्या फिर वन्य जीवन प्रमुख को हटाया जाएगा, या इस बार बारी और जिम्मेदारी उसके ऊपर किसी तक जाएगी? 

जिम्मेदारी तय करते हुए सरकारें अपनी इमेज बचाने के लिए इस तरह के कई काम करती हैं। प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख को हटाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वनमंत्री मो. अकबर ने जिम्मेदारी पीसीसीएफ वाइल्ड लाईफ अतुल शुक्ला पर तय कर दी थी। अब किस पर तय होगी? इस कुर्सी पर बैठे नरसिंह राव पर, या मंत्री पर? 

लोगों को याद होगा कि जब के.एम. सेठ राज्यपाल थे, और आर.पी. बगई मुख्य सचिव थे, तब पीएससी में गड़बड़ी की खबरें आईं, और राजभवन के सामने प्रदर्शन हुआ। सडक़ पर लग रहे नारे भीतर तक पहुंचे। ये दोनों लोग रिटायर्ड फौजी थे, और रोज शाम की राजभवन की महफिल के संगवारी भी थे। शाम के सुरूर में तय किया गया कि पीएससी चेयरमेन अशोक दरबारी को हटाकर यह दिखा दिया जाए कि पीएससी में गड़बड़ी के जिम्मेदार दरबारी थे। जबकि हकीकत यह थी कि उनके बहुत मातहत लोगों ने अपने नीचे के स्तर पर गलत काम किया था जिसकी कोई जिम्मेदारी दरबारी की नहीं थी। अब नैतिक आधार पर अगर संस्था के प्रमुख को जिम्मेदार ठहराना है तो हर बात के लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराना बेहतर होगा ताकि हर विधायक को एक बार मुख्यमंत्री बनने मिले, और हर सांसद को एक बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल जाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह का वह पहला कार्यकाल था, और इन दो फौजी लोगों के दबाव में आकर उन्होंने दरबारी को हटा दिया। उस वक्त भी इस अखबार में जमकर लिखा गया था कि सरकार यह गलत काम कर रही है, और उसे मुंह की खानी पड़ेगी। दरबारी सुप्रीम कोर्ट तक गए, और सुप्रीम कोर्ट से जीतकर आए। लेकिन उस फैसले के पीछे के न सेठ यहां हैं, न बगई, और रमन सिंह भी, बाकी अच्छे-बुरे मुद्दों से इतने घिरे रहे कि छत्तीसगढ़ के बाहर बसे अशोक दरबारी उनके लिए स्थाई अपमान नहीं खड़ा कर पाए।
 
जब किसी की जिम्मेदारी कहीं तय करनी होती है, तो हर बात की एक सीमा होनी चाहिए। वरना एक थानेदार की तैनाती भी वैसे तो सरकार राज्यपाल के नाम से करती है, तो क्या थानेदार बलात्कार में पकड़ा जाए तो जिम्मेदारी राज्यपाल तक जाएगी? मैदानी इलाकों में जब अवैध बिजली चारों तरफ फैलाकर रखी जाती है, ताकि जंगली जानवर फसल खराब न कर सकें, तो राजधानी में बिठाए गए प्रदेश स्तर के अफसर को क्या उसके लिए जिम्मेदार ठहराकर सजा दी जा सकती है? जब जिम्मेदारी तय करने की एक जायज सीमा तय नहीं होती, तो ऐसे ही नाजायज काम होते हैं। अब कल एक दिन में ही दो अलग-अलग जगह मारे गए हाथी-शिशुओं के लिए क्या फिर से वन्य जीवन प्रमुख को बेदखल किया जाएगा? सरकार में बैठे लोगों को गलत मिसालें कायम करने से बचना चाहिए। पूरे प्रदेश में अगर बिजली का करंट फैलाकर जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखा जा रहा है, तो यह पहली जिम्मेदारी तो बिजली विभाग की है, दूसरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की है, और वन विभाग की जिम्मेदारी तो इतने हिस्से में कहीं आती नहीं है। 

जब नाजायज तरीके से किसी बड़े सिर की बलि देने की नीयत से ऐसी कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे ईमानदार और मेहनती, जिम्मेदार और काबिल अफसरों का मनोबल टूटता है, गलत मिसालें कायम होती हैं, और असली जिम्मेदार बच निकलते हैं। चूंकि मरने वाले जंगली जानवर थे, इसलिए बाकी विभागों को जिम्मेदारी से परे करके केवल जंगली जानवरों के लिए तैनात अफसरों को बलि चढ़ाना एक गलत सिलसिला था। आज तो सारे अफसर बदल दिए गए हैं, और सरकार ने जो इलाज किया था, उसके बाद भी हाथियों की लगातार मौतों की यह बीमारी बनी हुई है।
 
फैसला लेने वाले नेताओं के आसपास ऐसे अफसर भी रहने चाहिए जो कि नेताओं की गलत मर्जी या फैसले की चूक के खिलाफ मुंह खोल सकें। लेकिन आज दिक्कत यह है कि बड़े-बड़े अफसर सत्तारूढ़ नेताओं के पांव छूने को ऐसे लपकते हैं कि वे नेता की गलती पर उसका हाथ थामकर उसे भला क्या रोक पाएंगे। समझदार नेता वे होते हैं जो कि पांव छूने वालों के बजाय हाथ पकडऩे वालों को करीब रखते हैं। यह एक अलग बात है कि सत्ता या राजनीति में नेताओं के पैरों को हर कुछ देर में कोई न कोई उंगलियां छूते रहना चाहिए, वरना पैर बेचैन होने लगते हैं। ऐसे बेचैन पैर ही गलत फैसले लेते हैं।   

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