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बोझ आबादी नहीं, सत्ता पर बैठे लोग हैं
12-Dec-2021 4:05 PM (255)
बोझ आबादी नहीं, सत्ता पर बैठे लोग हैं

जो चीन दशकों से एक बच्चे की नीति पर चल रहा था और वहां के शादीशुदा जोड़ों को दूसरा बच्चा पैदा करने की इजाजत नहीं थी, उसने अभी 2016 में ही दूसरे बच्चे की इजाजत दी थी और 5 बरस के भीतर आज नौबत यह आ गई है कि वहां के सरकारी मीडिया ने एक सम्पादकीय लिखा है कि सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को तीसरा बच्चा पैदा करना ही होगा, और एक या दो बच्चे रखने का कोई बहाना नहीं चलेगा। सरकार ने अभी-अभी वहां पर आबादी बढ़ाने के लिए तीसरे बच्चे पर कई तरह की टैक्स छूट और सब्सिडी की घोषणा भी की है। लोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है कि वे कम से कम 3 बच्चे तो पैदा करें। जिस चीन में कई दशक से सरकार एक बच्चे की नीति को पूरी ताकत से लागू किए हुए थी, वह अब तीन बच्चों के लिए बढ़ावा देने की नौबत में आ गई है क्योंकि वहां की अर्थव्यवस्था में, वहां की आबादी बड़ा योगदान दे रही है, और सरकार को यह लगता है कि अगर आबादी गिरती चली जाएगी तो चीन की अर्थव्यवस्था को संभालना भी मुश्किल होगा। आज वहां पर लोगों की दिलचस्पी अधिक बच्चे पैदा करने में नहीं रह गई है, और दुनिया भर के जनसंख्या विशेषज्ञों में यह माना जाता है कि एक जोड़े के दो बच्चे अगर होते चलें तो ही देश की आबादी उतनी बनी रह सकती है।

दूसरी तरफ हिंदुस्तान में आबादी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। इस देश में सत्ता और राजनीति से जुड़े हुए, अर्थव्यवस्था जुड़े हुए बहुत से लोग यह मानते हैं कि हिंदुस्तान की आबादी बहुत बड़ी समस्या है, और आबादी घटाए बिना यहां का काम नहीं चलेगा। इस जगह हमने बरसों से यह बात बार-बार लिखी है कि आबादी किसी देश के लिए बोझ तभी बनती है जब वहां की सत्ता उस आबादी के उत्पादक उपयोग की योजनाएं नहीं बना पाती। वरना एक इंसान, और खासकर मजदूर दर्जे के गरीब इंसान जितनी खपत करते हैं, उससे अधिक पैदा करते हैं। उन्हें जमीन पर खेती करने मिल जाए तो भी वह साल भर में जितना खाते हैं, उससे अधिक उगाते हैं। वे शहरों में, कारखानों में, कंस्ट्रक्शन में, मेहनत करते हैं तो भी वे अपने खाने से अधिक उत्पादकता देश की अर्थव्यवस्था में जोड़ते हैं। इसलिए आबादी को जो लोग बोझ मानते हैं वे इस बात को अनदेखा करते हैं कि वहां देश प्रदेश की सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, और ऐसी योजनाएं नहीं बनाई हैं कि लोगों को रोजगार मिले, लोग काम कर सकें, और उनकी उत्पादकता राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में जुड़ सके।

मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ में लोग गोबर बेचकर भी कुछ कमा रहे हैं, और गोबर का खाद बनाकर भी। लेकिन देशभर में जो काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए वह ग्रामीण रोजगार और स्वरोजगार का है जिसके तहत तरह-तरह के पशु-पक्षी पालना, शहद और रेशम का काम करना, लाख की खेती करना, मशरूम उगाना, खेतों की उपज को मशीनों से प्रोसेस करके उन्हें बड़े शहरों के कारखानों तक भेजना, कपड़े बुनना, दोना-पत्तल बनाना, जैसे कई हजार किस्म के काम हो सकते हैं जो अलग-अलग इलाकों में वहां के जंगलों, खेतों और वहां की तरह-तरह की उपज के आधार पर तय हो सकते हैं। ऐसे कोई भी काम करने वाले लोग किसी भी तरह से उस देश पर बोझ नहीं हो सकते। देश पर बोझ तो दरअसल सत्ता पर बैठे हुए वे लोग हैं जो कि लोगों को स्वरोजगार देने की योजना बनाने की क्षमता नहीं रखते, लेकिन सत्ता पर आ जाते हैं, और वहां बने रहते हैं।

भारत और बांग्लादेश अभी पौन सदी पहले तक एक ही देश थे। फिर वह हिस्सा पाकिस्तान बना, और बाद में भारत के बनवाए हुए बांग्लादेश बना। उसने राजनीतिक अस्थिरता, फौजी हुकूमत, और हिंसा का बहुत लंबा दौर देखा। बाढ़ का बहुत बड़ा नुकसान झेला। उसका विकास हिंदुस्तान के मुकाबले बहुत पीछे होना चाहिए था। लेकिन गरीबी, धार्मिक कट्टरता, अशिक्षा, और राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद बांग्लादेश आज सकल राष्ट्रीय उत्पादन में भारत के आगे निकल गया है। दुनिया के खेल-कूद और फैशन के कोई ऐसे बड़े ब्रांड नहीं हैं, जिनके कपड़े और जूते, फुटबॉल और दूसरे सामान बांग्लादेश में ना बनते हों। वहां की आम आबादी ने बड़ी-बड़ी महंगी और आयातित मशीनों पर तरह-तरह की सिलाई करना सीख लिया है और बांग्लादेश पूरी दुनिया के लिए एक दर्जी की तरह काम कर रहा है। उसने अपनी अर्थव्यवस्था को भारत की प्रति व्यक्ति की अर्थव्यवस्था के भी ऊपर पहुंचा दिया है। अब इस बात में, इस काम में ऐसी कौन सी चीज है जिसे हिंदुस्तानी नहीं कर सकते थे? यह देश तो बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थानों का देश है, आईआईटी और आईआईएम का देश है जहां से निकले हुए लोग दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां हांक रहे हैं। ऐसे लोग तैयार करने वाला यह देश अपने मामूली मजदूरों को सिलाई का वह काम भी नहीं सिखा पाया जिसके चलते बांग्लादेश विदेशी मुद्रा कमाने वाला छोटा सा, लेकिन बड़ा देश हो गया है। अब यह तो देशों की सरकारों पर रहता है कि वे अपने लोगों को कितना उत्पादक बना सकती हैं। बांग्लादेश की तरह अपने लोगों को हुनर सिखाकर, उनके लिए रोजगार जुटाकर, उनके लिए मशीनें लगाकर, दुनिया भर का कारोबार लाकर जो सरकार इस ट्रेन को पटरी पर दौड़ा सकती है, उसे फिर आगे फिक्र करने की जरूरत नहीं रहती कि उसकी आबादी बढ़ रही है। बांग्लादेश में इस तरह का रोजगार करने वाले लोग हिंदुस्तान के आम लोगों के मुकाबले बहुत अधिक कमाई कर रहे हैं और उनके हुनर में ऐसी कोई बात नहीं है जिसे हिंदुस्तानी नहीं सीख सकते थे। हिंदुस्तानी बाजार में बिक रहे सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांड देखें, तो उनके भीतर लेबल लगा दिखता है, बांग्लादेश, वियतनाम और दूसरे छोटे-छोटे देशों में उनके बनने का। यह काम हिंदुस्तान में क्यों नहीं हो सकता था?

इसलिए जिस तरह आज चीन अपनी आबादी बढ़ाने पर आमादा है और वहां के लोग अधिक बच्चों का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं, लेकिन देश की सरकार लगी हुई है कि लोग कम से कम 3 बच्चे तो पैदा करें ही। आज हिंदुस्तान में बच्चे कम पैदा करने की जो मुहिम चल रही है और हर बात के लिए जिस तरह अधिक आबादी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है उस सोच को सुधारने की जरूरत है। आबादी को हुनर सिखाकर, काम से लगाकर, इस देश की अर्थव्यवस्था को आसमान पर पहुंचाया जा सकता है। लेकिन जब सरकारों की दिलचस्पी बड़े-बड़े कारखानों तक सीमित रह जाती है और आम जनता को स्वरोजगार के काम मुहैया कराने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती, तो वैसे ही देश में आबादी बोझ हो सकती है। चीन में आज इतना काम है, और बाकी दुनिया से जुटाया हुआ इतना काम है कि एक-एक कारखाना कामगार को ओवरटाइम करना पड़ता है, उन्हें कोई छुट्टी नहीं मिल पाती है। हम उनके काम के हालात या उनके मानवाधिकार की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनके पास काम कितना है इसकी बात कर रहे हैं, जिसकी वजह से वहां के कारखानेदार, और वहां की सरकार, इन दोनों को वहां के कामगार से ओवरटाइम करवाना पड़ रहा है। दूसरी तरफ हिंदुस्तान महज सपना देखते बैठा है कि वह चीन से बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगा और इस सपने को पूरा करने के लिए उसके पास जमीन पर कोई कोशिश नहीं है। जब तक किसी देश की राष्ट्रीय उत्पादकता गिनी-चुनी कंपनियों तक सीमित रहेगी और आम जनता की उत्पादकता का उसमें योगदान बढ़ाने की फिक्र नहीं की जाएगी तब तक ही आबादी बोझ बनी रहेगी। वरना कुदरत ने इंसानों को ऐसा बनाया है कि वे अपनी जरूरत से बहुत अधिक पैदा करने के लायक हैं। हिंदुस्तान और चीन के मॉडल सामने रखकर समझने की जरूरत है, और हिंदुस्तान और बांग्लादेश की तुलना करके भी हिंदुस्तान कुछ सीख सकता है। आबादी अधिक होने से देश पर पडऩे वाले बोझ का रोना फिजूल की बात है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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