संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जून : प्लास्टिक पर रोक का छत्तीसगढ़ राज्य  का अपना एक ऐतिहासिक फैसला...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जून : प्लास्टिक पर रोक का छत्तीसगढ़ राज्य का अपना एक ऐतिहासिक फैसला...
Date : 18-Jun-2019

दो दिन पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश में प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण, खरीद और बिक्री पर रोक लगा दी है। यह भी फैसला लिया गया अब किसी भी सरकारी कार्यक्रम में प्लास्टिक से बने बर्तनों कप, प्लेट, चम्मच या कटोरी का इस्तेमाल नहीं होगा। यहां तक कि विज्ञापनों में और कैरी बैग के रूप में भी उपयोग नहीं किया जा सकेगा।   व्यापारी,  दुकानदारों को 100 रुपए के स्टांप पेपर पर इसके उपयोग नहीं करने का शपथ पत्र देना होगा। जो भी प्लास्टिक के उत्पाद बनेंगे, उस पर निर्माता का नाम, पंजीकरण नंबर और प्लास्टिक का प्रकार लिखना अनिवार्य होगा। राज्य सरकार इन सबकी जांच और निगरानी के लिए प्रदेश स्तर पर एक समिति का गठन करेगी। यह फैसला प्रदेश में सैकड़ों करोड़ के कारोबार और हजारों लोगों के रोजगार को तो प्रभावित करेगा, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि इससे इस धरती के बर्बाद होने की रफ्तार कम भी हो सकती है।

आज तो बाकी हिन्दुस्तान की तरह छत्तीसगढ़ में भी हालत यह है कि एक-दो दिनों तक टंगने वाले जन्मदिन, या स्वागत के बैनर, बोर्ड, और होर्डिंग उसके बाद घूरों से होते हुए कचरे में बाकी पूरी जिंदगी के लिए हमेशा के लिए बोझ बन जाते हैं। इसी तरह आज छोटे-बड़े किसी भी कार्यक्रम के बाहर हजारों कप-प्लेट, गिलास का प्लास्टिक का कचरा इक_ा हो जाता है, और जो कि कभी सड़ता नहीं, हजारों, शायद दसियों हजार बरस के लिए वह धरती की छाती पर बोझ बना हुआ पड़े रहता है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह एक अलोकप्रिय और साहसी फैसला है कि प्रदूषण पर एक साथ इतनी बड़ी और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अगर बाकी देश में इसी तरह कार्रवाई की जाती है तो धरती पर स्थायी प्रदूषण बहुत हद तक घट सकता है।

आज मशीनों से बनने वाले प्लास्टिक के सामान और मशीनों से होने वाली फ्लैक्स की छपाई का नतीजा यह हो गया है कि लोग इनका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। जो कार्यक्रम कुछ घंटों के रहते हैं, उनका मंच भी फ्लैक्स से सजा दिया जाता है जिसका कोई उपयोग उसके बाद नहीं रहता है। एक समय ऐसा था जब कपड़े पर कलाकार हाथ से ऐसी ही लिखावट और सजावट करते थे, जिससे रोजगार भी मिलता था, और उस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल भी हो जाता था। लेकिन मशीनों ने यह पूरा सिलसिला खत्म कर दिया था, और अब मिनटों के भीतर फ्लैक्स पर छपाई होकर पोस्टर और होर्डिंग बना दिए जाते हैं। इसी तरह अब गिलासों को धोकर इस्तेमाल करना, प्लेट को धोकर इस्तेमाल करना, यह सब खत्म हो गया, और अब अमीरों से लेकर धार्मिक कार्यक्रमों तक सब जगह यूज एंड थ्रो सामानों ने जगह बना ली है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल एक बहुत ही बड़ा फैसला है, और अगर इसमें कोई अदालती दखल न आए, सरकार किसी दबाव में अपना फैसला न बदले, तो यह पर्यावरण के हित में एक ऐतिहासिक फैसला रहेगा।
-सुनील कुमार

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