संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 5 जुलाई : रिटायरमेंट दस बरस बढ़ाने की सोच, और उसके खतरे
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 5 जुलाई : रिटायरमेंट दस बरस बढ़ाने की सोच, और उसके खतरे
Date : 05-Jul-2019

भारत की वित्तमंत्री ने कल संसद में देश की आर्थिक स्थिति पर सरकार की समीक्षा पेश करते हुए यह संभावना जताई है कि देश में लोगों की बढ़ती हुई औसत उम्र को देखते हुए उन्हें रिटायर करने की उम्र बढ़ाकर 70 बरस तक की जा सकती है। यह बात अगर संसद में सरकार की तरफ से कही हुई नहीं होती तो यह अविश्वसनीय और अटपटी लग सकती थी, लेकिन अब इसे सरकार की सोच, और एक संंभावना मानकर इस पर कुछ चर्चा की जरूरत है। 

यह बात मोटे तौर पर सरकारी सेवाओं के लिए ही है जिनमें आज अधिकतर जगहों पर 60 बरस की उम्र में लोगों को रिटायर किया जाता है। पहले यह 58 बरस थी, और अब इस सीमा को बढ़ा दिया गया है। आम सरकारी अमले से परे कुछ ऐसे तबके हैं जिनमें यह उम्रसीमा पहले से बढ़ी हुई है। प्राध्यापक 65 बरस की उम्र तक पढ़ाते हैं, और सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी शायद 65 बरस तक सेवा में रहते हैं। अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री को एक चि_ी लिखकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का सुझाव दिया है क्योंकि देश की अदालतों में इतनी बड़ी संख्या में जजों की कुर्सियां खाली हैं, और लोग अपने मामले-मुकदमे लेकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इस राज्य के बनने के समय से अब तक डॉक्टरों की सैकड़ों कुर्सियां खाली ही हैं, उनके लिए लोग मिल नहीं रहे हैं, और देश भर में जगह-जगह ऐसी कई और सेवाएं हो सकती हैं जहां पर लोगों की कमी को देखते हुए मौजूदा लोगों की नौकरी कुछ और लंबी की जानी चाहिए। 

लेकिन यह सोच एक तरफ तात्कालिक जरूरत को पूरी करने वाली जरूर दिखती है, लेकिन दूसरी तरफ इसके कई खतरनाक पहलू भी हैं जिनके बारे में सोचना चाहिए। अभी-अभी देश के बेरोजगारी के आंकड़े सामने आए हैं जो बताते हैं कि पिछले 45 बरस में इतनी बेरोजगारी कभी नहीं रही। ये तो मौटे तौर पर सरकार की निगाह में आने वाले आंकड़े हैं, लेकिन इनसे परे देश भर में आर्थिक मंदी के चलते हुए बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है, निजी कारोबार नीचे जा रहे हैं, और नई नौकरियां कहीं निकल नहीं रही हैं। देश में मजदूरों के बेहतर अधिकारों के लिए जो कानून बन रहे हैं, वे भी सरकार और कारोबार दोनों पर खर्च बढ़ा रहे हैं, और दोनों ही जगहों पर यह तय हो रहा है कि नए लोगों को काम पर न रखा जाए। बीएसएनएल में आधा-एक लाख लोगों की छंटनी की खबर है, एयर इंडिया भयानक घाटे में है, और दर्जनों पब्लिक सेक्टर बिकने के करीब हैं। ऐसे में निजी हाथों में जाने के बाद इन सबमें और बुरी छंटनी होगी, और आज जिस तरह जेट एयरवेज बंद होने के बाद उसके कर्मचारी फुटपाथ पर पड़े हैं, वैसी नौबत और बहुत से लोगों की आने वाली है। केन्द्र सरकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या घटा रही है, और बैंक एक-दूसरे में मिलकर कर्मचारियों की जरूरत को कम करेंगे, नई नियुक्तियां नहीं होंगी। 

बेरोजगारी की ऐसी भयानक नौबत को देखते हुए यह समझ से परे है कि केन्द्र सरकार रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाने की कैसे सोच सकती है? अगर कुर्सियां और दस बरस तक खाली नहीं होंगी, तो उसका यह मतलब भी तो रहेगा कि दस बरस उन कुर्सियों के लिए कोई नई नियुक्ति नहीं होगी। बेरोजगार ऐसी संभावनाओं को खो बैठेंगे। यह बात भी समझने की जरूरत है कि आज 60 बरस की उम्र में रिटायर होने के बाद भी सरकार के अधिकतर कर्मचारियों के पास पेंशन, पीएफ जैसा कोई न कोई सहारा रहता है। लेकिन बेरोजगारों के पास आज तो जिंदा रहने के लिए कोई बेरोजगारी भत्ता तक नहीं है, उनके पास सिर्फ निराशा और कुंठा है। फिर यह भी है कि नए लोग कुछ बरसों में उन्हीं कामों के लिए जितनी तनख्वाह पाते हुए तैयार हो जाते हैं, रिटायर होने वाले लोगों को उन्हीं पदों और उन्हीं कामों के लिए सरकार को काफी अधिक तनख्वाह देनी पड़ती है। इनसे परे एक दूसरी बड़ी बात यह है कि उम्र और सेहत के चलते न सही, सरकारी नौकरी में सुरक्षा की भावना के चलते हुए बहुत से लोगों की काम में दिलचस्पी एकदम खत्म होने लगती है, और वे सरकार और जनता के लिए उत्पादक नहीं रह जाते। 

अब इस मामले के एक और पहलू को समझने की जरूरत है। सरकारी नौकरी में बहुत से लोग जिस हद तक भ्रष्ट हो जाते हैं, जिनको रिश्वत लेते पकड़ा जाता है, जिनके खिलाफ आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हो जाते हैं, जो अनुपातहीन संपत्तिके साथ पकड़े जाते हैं, ऐसे लोग भी कुछ महीनों के बाद फिर उन्हीं विभागों की कमाऊ कुर्सियों पर इस तर्क के साथ बिठा दिए जाते हैं कि उनकी जगह काम करने वाले दूसरे लोग नहीं हैं। उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी पांच-पांच, दस-दस बार संविदा नियुक्ति दी जाती है, और जो जितने भ्रष्ट रहते हैं, उनके लिए यह संभावना उतनी ही अधिक रहती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी ढांचा, वह केन्द्र का हो, या राज्यों का, वह ऐसे भ्रष्ट लोगों को और लंबा ढो सकता है? आज तो एक जरूरत यह भी महसूस की जा रही है कि 50 बरस की उम्र या 20-25 बरस की सेवा के बाद लोगों का आंकलन करना चाहिए कि उनका काम कैसा है, और उसके बाद ही उन्हें नौकरी पर जारी रखना चाहिए। आज जब एक-एक सरकारी कुर्सी के लिए दसियों हजार लोग कतार में लगते हैं, तो जाहिर है कि लोग उपलब्ध हैं। यह सरकारों की अपनी कमजोरी है कि वह वक्त रहते लोगों को नियुक्त करके अपने ढांचे को ठीक से नहीं रख पातीं। ऐसे में होना तो यह चाहिए कि नौकरी 50 बरस की उम्र तक की ही होनी चाहिए, और उसके बाद हर पांच बरस में ऐसा सेवा-विस्तार होना चाहिए जो कि उनकी ईमानदारी की साख, मेहनत, क्षमता, और सेहत को देखते हुए हो। हो सकता है कि इन पैमानों पर खरे उतरने के बाद कुछ लोग 70 बरस तक काम करने के लायक मिलें, लेकिन कुछ लोग 50 बरस की उम्र में ही हटाने के लायक भी मिलें। इस तरह कुल मिलाकर बेरोजगारों का हक छीने बिना उतनी ही कुर्सियों पर कुछ को 50, कुछ को 60, और कुछ को 65-70 बरस तक भी जारी रखा जा सकेगा। जब तक नाकाबिल और भ्रष्ट लोगों को हटाने का अभियान नहीं चलेगा, तब तक महज बढ़ती औसत उम्र को देखते हुए रिटायर होने की उम्र बढ़ाना ठीक नहीं होगा। सरकार की तमाम नौकरियां जनता के पैसों से चलती हैं, और जिस तरह निजी कारोबार में मालिक बेहतर काम करने की उम्मीद रखते हैं, निगरानी रखते हैं, सरकार को भी अपने अमले की उत्पादकता पर नजर रखनी चाहिए, और भ्रष्ट और निष्क्रिय लोगों को हटाने का काम लगातार करना चाहिए। रिटायरमेंट की उम्र 60 से 70 करने के बजाय उसे 50 बरस करना चाहिए, और उसके बाद पांच-पांच बरस के चार सेवा-विस्तार की व्यवस्था करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार

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