संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 6 जुलाई :  धर्म, आध्यात्म, योग, और खानपान की सत्तारूढ़ सोच स्कूली बच्चों पर थोपना !
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 6 जुलाई : धर्म, आध्यात्म, योग, और खानपान की सत्तारूढ़ सोच स्कूली बच्चों पर थोपना !
Date : 06-Jul-2019

भाजपा सरकार ने हरियाणा में सरकारी स्कूलों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है जिसके तहत बच्चे हर दिन कान पकड़कर उठक-बैठक करेंगे। इसे सरकार ने वैज्ञानिक रूप से साबित 'सुपर ब्रेन योग' करार दिया है, और कहा है कि इससे दिमाग का काम करना बढ़ता है। सरकार की इस घोषणा के पीछे फिलीपींस के एक आध्यात्मिक गुरू की एक किताब बताई जा रही है। वे योग और आध्यात्म पर काम करते हैं, और एक कामयाब कारोबारी हैं। उन्होंने अपनी वेबसाईट पर लिखा है कि ऐसी उठक-बैठक एक प्राचीन भारतीय तकनीक है जिससे शरीर की ऊर्जा को दिमाग की शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 

कान पकड़कर ऐसी उठक-बैठक आमतौर पर स्कूलों में सजा के लिए ही दी जाती है जिस पर कानूनी रोक लग चुकी है। लेकिन कानून सिर्फ सजा के तौर पर कुछ करवाने को लेकर है, इस तरह के प्रयोग के खिलाफ कोई कानून नहीं है। यह एक अलग बात है कि देश के कई हाईकोर्ट ऐसे आदेश दे चुके हैं कि मंत्रियों के स्वागत में, या किसी और कार्यक्रम में स्कूल के बच्चों को न भेजा जाए, न स्वागत में खड़ा किया जाए। फिलहाल हरियाणा सरकार का यह फैसला किसी कानून को तोड़ते हुए तो नहीं है, लेकिन अक्ल के खिलाफ जरूर है। जिस अक्ल को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक कही जा रही ऐसी तकनीक का दावा किया जा रहा है, वह एक विदेशी कारोबारी के दावे की तकनीक है, और हिन्दुस्तान में जहां योग सैकड़ों-हजारों बरस से चल रहा है, उसमें कभी ऐसी तकनीक का सुना नहीं गया था। और तो और योग के नाम पर हजार किस्म के कारोबार शुरू करने वाले बाबा रामदेव ने भी अगर ऐसे किसी योग के बारे में सुना होता, तो अब तक पतंजलि उसका पेटेंट करवा चुका होता, और इस तकनीक की किताबें रामदेव की दुकानों में बिकती रहतीं। फिर एक बात यह भी है कि धर्म और आध्यात्म, रहस्यमय योग, मंत्र और वैदिक गणित जैसी बातों को बढ़ावा देकर, और विज्ञान को कुचलकर बच्चों को जिस तरह अक्ल से दूर किया जा रहा है, वैसे में उनके भीतर अक्ल को बढ़ाने की जरूरत रह भी क्या गई है? अब तो इम्तिहान में उत्तर पुस्तिका पर जयश्रीराम लिखने से पत्थरबुद्धि बच्चे भी तैरते हुए अगली क्लास तक पहुंच जाने चाहिए, ऐसे में उनकी अक्ल को बढ़ाने की बात कुछ अटपटी है। 

स्कूलों को राजनीतिक दल, और उनसे जुड़े हुए अमूमन बेदिमाग संगठन तरह-तरह के प्रयोगों की जगह मानकर चलते हैं, और यह सिलसिला पाठ्य पुस्तकों से लेकर नैतिक कही जाने वाली शिक्षा तक फैल चुका है। सरकार बदलती है तो कोर्स बदल जाता है, कुछ विवादास्पद लोग वीर हो जाते हैं, या उनकी वीरता गलत करार दे दी जाती है। विज्ञान को मिटाकर, इतिहास को नया गढ़कर जिस तरह बच्चों के सामने भ्रम की एक धुंध खड़ी की जाती है, वह सिलसिला अपने आपमें काफी नुकसानदेह है, और उस बीच बच्चों को मानो उठक-बैठक की ऐसी सजा देकर साबित किया जा रहा है कि वे कोई गलती करते हैं जिसे रोज सुधारना जरूरी है। 

अगर किसी भी राज्य में स्कूली बच्चों के  दिमाग तेज ही करने हैं, तो उन्हें धर्मान्धता से ढांकना बंद करना चाहिए, उन पर झूठे इतिहास को थोपकर एक झूठा गौरव देना भी बंद करना चाहिए। एक वैज्ञानिक पद्धति के तहत उन्हें सवाल पूछने के लिए उकसाना चाहिए, और  उन सवालों के जवाब देते हुए शिक्षकों को, स्कूल के बाहर के बड़े लोगों को अपना भी ज्ञान बढ़ाना चाहिए, अपनी तर्कशक्ति भी बढ़ानी चाहिए। सवालों को कुचलकर अगर कोई यह सोचे कि उठक-बैठक से दिमाग तेज होगा, तो यह एक परले दर्जे की बेवकूफी की बात है। आज पूरे देश में छोटे और बड़े तमाम लोगों के सवाल पूछने को देश के साथ गद्दारी मान लिया जाता है, देश की संस्कृति के खिलाफ मान लिया जाता है। गढ़े हुए झूठे इतिहास पर किसी कीर्तन की तरह भरोसा करके रात भर सिर हिलाने को देशप्रेम मान लिया जाता है। यह सिलसिला पूरी नौजवान पीढ़ी के लिए बहुत खतरनाक है। ऐसे ही सिलसिले के चलते छत्तीसगढ़ सहित देश की कई सरकारी स्कूलों में दोपहर के खाने के पहले किसी एक धर्म की प्रार्थना करवाई जा रही है, देश भर के बच्चों को एक धर्म के एक हिस्से की सोच के मुताबिक खाना दिया जा रहा है, और प्याज-लहसुन से लेकर अंडे तक पर रोक लगाई जा रही है। देश के आदिवासी इलाकों में भी स्कूलों में बच्चों को इन चीजों को दोपहर के भोजन में नहीं दिया जा रहा है, जबकि उन बच्चों की घरेलू जिंदगी में भी वे इन चीजों को खाते हैं। अपनी धार्मिक आस्था को दूसरे बच्चों पर थोपना, खासकर सरकारी खर्च पर थोपना निहायत ही नाजायज है। इसी तरह सुपर ब्रेन योग नाम की यह अनजानी तकनीक बच्चों पर थोपना निहायत गलत है। हरियाणा की भाजपा सरकार कम से कम देश के राजकीय योग गुरू रामदेव से तो इस बारे में सलाह ले सकती थी, बजाय एक फिलीपीन कारोबारी की सोच बच्चों पर थोपने के। 
-सुनील कुमार

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