संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 जुलाई : बाप-भाई से खतरा देखते  हुए अदालत से हिफाजत  मांगने में भला गलत क्या है?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 जुलाई : बाप-भाई से खतरा देखते हुए अदालत से हिफाजत मांगने में भला गलत क्या है?
Date : 15-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के एक ब्राम्हण भाजपा विधायक की बेटी ने मर्जी से एक दलित लड़के से शादी की, और उसके बाद एक वीडियो बयान जारी किया कि अपने विधायक पिता से उसे और उसके पति को जान का खतरा है। विधायक ने इसका खंडन किया, और कहा कि उनसे किसी को खतरा नहीं है। लेकिन सुरक्षा मांगते हुए जब यह नवविवाहित जोड़ा हाईकोर्ट पहुंचा, तो आज वहां हाईकोर्ट के अहाते में ही उनसे मारपीट हुई। इस पर हाईकोर्ट ने विधायक को चेतावनी भी जारी की है, और पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहा है। सोशल मीडिया इस पर दो खेमों में बंट गया है, एक खेमा यह मानता है कि जिस पिता ने लड़की को बड़ा किया, उसके खिलाफ ऐसी बदनामी करना बेटी की एक नाजायज हरकत थी। दूसरा खेमा यह मानता है कि इस लड़की को अपने लिए खतरे को समझने और उससे हिफाजत मांगने का पूरा हक है। चूंकि ऐसे कई मामले हाल के दिनों में सामने आए हैं, और कल ही छत्तीसगढ़ में एक पेड़ से टंगा हुआ एक जोड़ा मिला भी है जिसकी शिनाख्त नहीं हो पाई है, इसलिए इस मुद्दे पर लिखना जरूरी है। 

देश भर मेें कई जगहों पर ऐसे जोड़ों के साथ हिंसा होती है, जगह-जगह हत्याएं हो रही हैं, और बहुत से परिवार ऐसा कत्ल करके फख्र भी हासिल करते हैं, इसलिए अगर किसी ने सोशल मीडिया पर खतरे की आशंका जाहिर करते हुए अदालत से हिफाजत मांगी है, तो वह एक कारगर तरीका दिख रहा है। और भी जोड़े इस तरह का काम कर सकते हैं कि अपने बयान के साथ अदालत से हिफाजत मांगें, और फिर उन पर हिंसक हमले का इरादा रखने वाले लोगों के हौसले कुछ पस्त हों। यह सिलसिला बहुत जल्द खत्म इसलिए नहीं होने वाला है कि भारत की कट्टर जाति व्यवस्था के बीच अपनी बेटी किसी दलित के घर जाते हुए देखने के बजाय बहुत से सवर्ण मां-बाप उसे मार डालना बेहतर समझते हैं, या ऐसे लड़कों को मार डालना बेहतर समझते हैं जो कि उनकी लड़की से शादी की हिम्मत करते हैं। एक तरफ तो देश का कानून यह कहता है कि अनुसूचित जाति या जनजाति में इन जातियों से बाहर के लोग अगर शादी करते हैं, तो उन्हें सरकार की तरफ से नगद सहायता भी मिलती है। दूसरी तरफ इनकी हिफाजत मुश्किल हो चली है। 

जिस तरह बहुत सी सामाजिक कट्टरता को खत्म करने के लिए कानून की जरूरत पड़ते आई है, उसी तरह आज अंतरजातीय, या विधर्मी विवाह के लिए, प्रेम-विवाह के लिए बालिगों को एक अलग से हिफाजत देने का कानून न सही, सुप्रीम कोर्ट का आदेश जरूरी है जिसे मानना देश भर की पुलिस के लिए एक बाध्यता होगी। एक ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे ऐसे जोड़े जिले के कलेक्टर या एसपी को एक हलफनामा दें, और उसके बाद उनकी खतरे की आशंका को दर्ज किया जाए, वे जिनसे खतरा बता रहे हैं उन्हें बुलाकर सावधान कर दिया जाए कि किसी हमले के होने पर वे खतरे में फंसेंगे। आज देश में ऐसी हिंसा की घटनाएं तो कम होती हैं, लेकिन मर्जी से शादी न होने पर आत्महत्याएं खासी अधिक होती हैं, और नौजवान पीढ़ी का एक हिस्सा कुंठा में जीता है। आज जब 21वीं सदी में सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में लोगों के लिए बच्चे पैदा करने के लिए भी शादी की बंदिश नहीं रह गई है, जहां जाति और धर्म मायने नहीं रखते हैं, जहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली हुई है, वहां आजादी की पौन सदी गुजर जाने पर भी हिन्दुस्तान एक खाप पंचायत की तरह बर्ताव कर रहा है। यह एक अच्छी बात है कि यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा है, और इसे लेकर एक कानूनी व्यवस्था लागू होनी चाहिए जो कि लोगों को हिफाजत दे सके, और बालिगों को मर्जी से शादी का मौका दे सके। 
-सुनील कुमार

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