राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इधर कुआं, उधर खाई
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इधर कुआं, उधर खाई
Date : 11-Jun-2019

इधर कुआं, उधर खाई

गर्मी बढ़ी, और जंगली जानवरों के शिकार की घटनाएं अक्सर जंगल से लगे गांवों में देखने-सुनने को आने लगती हंै। वन विभाग की पकड़ में आ गए तो जेल जाने का डर। वन विभाग की कार्रवाई से बचने जो न करें सो थोड़ा। झूठ बोलकर वन विभाग की कार्रवाई से बचकर निकले तो बिरादरी की पकड़ में आ गए और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। भोज देना पड़ गया। ऐसा ही एक मामला पिथौरा के सुखीपाली जंगल से लगे गांव का है। यहां के कुछ लोगों ने जंगली सुअर का शिकार कर गोश्त खाया। गोश्त बनाते समय जंगली सुअर के एक-दो पैर किसी कुत्ते ने झटक लिए और दूसरे दिन अधखाया यह पैर वन विभाग के किसी कर्मचारी के हाथ लग गया। बस विभाग ने तहकीकात शुरू कर दी। लिहाजा पता लगाया कि गांव में किसके घर क्या पका, और बच्चे मन के सच्चे निकले। गोश्तखोरों से पूछताछ शुरू हुई तो एकमत से बताया गया कि वह जंगली सुअर नहीं था, पाला गया सुअर था। सुअर पालने वाले को गवाह बनाकर पेश कर दिया। वन विभाग के कर्मी मनमसोसकर रह गए। हाथ कुछ नहीं आया।

अब बारी जात बिरादरी वालों की थी, इन गोश्तखोरों को पकड़ पंचायत बैठी कि तुमने पालतू सुअर का गोश्त खाया है , शुद्धिकरण होना होगा,जुर्माना भी भरना होगा, तब तक अछूत, जात-बिरादरी से बाहर। पौनी पसारी बंद। मरता क्या न करे..अगर कहें कि जंगली सुअर का मांस खाया तो जेल। लिहाजा शुद्धिकरण होना बचने की आसान राह थी। पूरे कुनबे के साथ शुद्धिकरण के बाद बिरादरी को बकरा-भात खिलाया। पंच-परमेश्वरों ने भी भोज खाकर मामला गांव में सुलटा लिया।

अच्छे दिन आने वाले हैं-1
एपीसीसीएफ अतुल शुक्ला और राजेश गोवर्धन की पदोन्नति में समय लग सकता है। वजह यह है कि सरकार ने अभी तक केन्द्र को प्रस्ताव नहीं भेजे हैं। वनमंत्री की दखल के बाद जल्द ही प्रस्ताव भेजे जाने की तैयारी चल रही है। पदोन्नति में देरी को देखते हुए सरकार दोनों अफसरों को पीसीसीएफ स्तर के रिक्त पदों पर बिठा सकती है। यानी एक को वाइल्ड लाइफ और दूसरे को लघुवनोपज संघ के एमडी का प्रभार दिया जा सकता है। अभी तक पीसीसीएफ (मुख्यालय) राकेश चतुर्वेदी के पास ही दोनों प्रभार हैं। सुनते हैं कि राकेश चतुर्वेदी ने खुद होकर दोनों अफसरों को एक-एक विभाग का प्रमुख बनाने का प्रस्ताव दिया है। अब प्रमुख पीसीसीएफ अपना बोझ हल्का करना चाहते हैं, तो सरकार को भला क्या दिक्कत हो सकती है। 

अच्छे दिन आने वाले हैं-2
फॉरेस्ट में एक बड़े फेरबदल की तैयारी है। चर्चा है कि बरसों से लूप लाइन में रहे छोटे-बड़े अफसरों को मुख्य धारा में आने का मौका मिल सकता है। रमन सरकार में ज्यादातर समय वन विभाग का प्रभार आदिवासी  मंत्रियों के पास रहा है, लेकिन ट्रांसफर-पोस्टिंग में सीएम हाऊस की दखल रहती थी। मगर, अब परिस्थितियां बदल गई है। भूपेश सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं वन विभाग से जुड़ी हंै। ऐसे में वनमंत्री मोहम्मद अकबर योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी तरह की लापरवाही नहीं चाहते हैं। उन्होंने संकेत दे दिए हैं कि साफ-सुथरी छवि और मेहनती अफसरों को पूरा महत्व दिया जाएगा और काम की पूरी छूट रहेगी। यानी साफ है कि पिछले सालों में जुगाड़ न होने के कारण किनारे बैठे अफसरों को बिना किसी सिफारिश के उनकी साख देखकर काम करने का बेहतर अवसर मिल सकता है। 

एक छत्तीसगढ़ी की यादें
अमरीका में बसे हुए एक प्रमुख कारोबारी, छत्तीसगढ़ी वेंकटेश शुक्ला ने गिरीश कर्नाड के गुजरने पर उनके साथ की अपनी एक मुलाकात ताजा की है। उन्होंने लिखा है कि पिछली दिसंबर में बेंगलुरु में एक दोस्त के घर उनसे मुलाकात हुई थी। सांस लेने में दिक्कत की वजह से उनका चलना-फिरना कम था, लेकिन उनका पैना दिमाग और हास्यबोध, दोनों बरकरार थे। वे इस बात को मजे से बता रहे थे कि सलमान खान की फिल्म, टाईगर जिंदा है, में अपने एक किरदार की वजह से वे देश भर में पहचाना हुआ चेहरा बन गए थे, जबकि आलोचकों द्वारा तारीफ पाने वाली कई फिल्मों ने मिलकर भी उन्हें यह दर्जा नहीं दिलाया था। उन्होंने यह भी बताया था कि एक वक्त, 1960-70 के दशक में किसी वक्त हेमा मालिनी की मां उनकी शादी गिरीश कर्नाड से करवाना चाहती थीं। वेंकटेश ने उनसे पूछा कि फिर यह शादी क्यों नहीं हुई? तो उन्होंने बताया कि वे किसी और से प्रेम करते थे, और हेमा मालिनी के दिमाग में भी गरम-धरम थे जिनसे कि आखिर में उन्होंने शादी की। वेंकटेश ने लिखा है कि इतनी शोहरत के बावजूद गिरीश कर्नाड एक बहुत आम इंसान की तरह थे, कला, संस्कृति, राजनीति, या साहित्य, किसी भी विषय पर बहस में शामिल होने के लिए एक पैर पर खड़े हुए। वे पार्टी से जाने वाले आखिरी लोगों में से थे, वह भी तब जब उनकी बेटी उन्हें आराम करने के लिए घसीट ले गई। उनके साथ गुजारे कुछ घंटे यादों की एक धरोहर हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)

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