राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : तीनों बार चुनाव में हारे हैं....
26-Oct-2021 6:18 PM (261)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : तीनों बार चुनाव में हारे हैं....

तीनों बार चुनाव में हारे हैं....

भाजपा में कई ऐसे नेता हैं जिन्हें सत्ता, और संगठन में लगातार महत्व मिला है। चुनावी राजनीति में सफल न होने के बाद भी ऐसे नेताओं को पद देने की शिकायत भी हुई है। सुनते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) शिवप्रकाश भी इससे हैरान हैं। शिवप्रकाश बीते सोमवार को जशपुर पहुंचे, और उन्होंने संभाग की बैठक लेकर स्थानीय नेताओं का परिचय लिया।

प्रदेश प्रवक्ता अनुराग सिंहदेव ने अपना परिचय कुछ अलग अंदाज में दिया कि वो अंबिकापुर सीट से विधानसभा का चुनाव लड़े हैं। शिवप्रकाश ने पूछा कि क्या वो विधायक हैं? अनुराग ने कहा-नहीं। विधानसभा का चुनाव हार गए थे। फिर शिवप्रकाश ने पूछा कि कितनी बार चुनाव लड़े हैं? अनुराग ने कहा कि वो तीन बार चुनाव लड़े थे। इस पर शिवप्रकाश ने लगभग झल्लाते हुए कहा कि आप पूरा परिचय दें कि तीन बार चुनाव लड़े थे, और तीनों बार चुनाव में हारे हैं।

चुनाव में हार के बाद अनुराग भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष रहे। इसके बाद प्रदेश मंत्री बने, और अभी प्रदेश प्रवक्ता हैं। कुछ इसी तरह कृष्णा राय सत्ता, और संगठन में हमेशा महत्वपूर्ण बने रहे हैं। रमन सरकार के तीनों कार्यकाल में निगम-मंडल के चेयरमैन रहे। प्रदेश के महामंत्री रहे, और प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हैं। शिवप्रकाश को आश्चर्य हुआ कि चुनाव लड़े बिना कई नेताओं को लगातार सत्ता, और संगठन में महत्व मिलते रहा है।

प्रिंटर को इस साल निराशा

पिछले दो दशक से विशेषकर भाजपा नेताओं का दीवाली-नववर्ष का बधाई संदेश छापने वाले एक प्रिंटर को इस साल निराशा हाथ लगी है। वजह यह है कि ज्यादातर नेताओं ने दीवाली की बधाई का संदेश कार्ड छपवाने से मना कर दिया है। नेताओं ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया है कि इस बार कार्ड भेजने के बजाए वाट्सएप मैसेज से बधाई देंगे। प्रिंटर को सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल का ऑर्डर मिला है। भाजपा के भीतर बृजमोहन को उदार नेता माना जाता है। वो तीज-त्योहार के मौके पर अपने शुभचिंतकों, और कार्यकर्ताओं का पूरा ख्याल रखते हैं। उन्हें कम से कम शुभकामना संदेश जरूर भेजते हैं।

आदिवासियों की कष्टदायक पदयात्रा

हसदेव अरण्य क्षेत्र को कोयला उत्खनन से बचाने के लिए 11 दिन की 330 किलोमीटर लंबी यात्रा कर सरगुजा और कोरबा जिले के आदिवासी राजधानी पहुंचे थे। जितने धक्के धूल खाए, पसीने बहाए, राजधानी पहुंचने पर वैसा उनका स्वागत नहीं हुआ। जिनके पास अपनी बात रखने में आए थे उनसे मिलने में भी काफी मुश्किलें आई और नतीजा भी नहीं निकला। जैसे ही यात्रा खत्म हुई, कोल ब्लॉक के नए आवंटन की अधिसूचना जारी कर दी गई। दूसरी ओर अंतागढ़ से यात्रा निकली थी कि उन्हें नगर पंचायत नहीं चाहिए, ग्राम पंचायत की व्यवस्था में ही रहने दिया जाए। उनकी भी बात सुनी तो गई, पर आश्वासन ठोस नहीं मिला। अब 4 दिन पहले एक और यात्रा कांकेर जिले से निकली है, जो 13 ग्राम पंचायतों को नारायणपुर जिले में शामिल कराना चाहते हैं। इन्होंने जिला स्तर पर प्रदर्शन किए, ज्ञापन दिए। बात नहीं बनी तो पैदल राजभवन के लिए निकल चुके हैं। इसमें करीब डेढ़ हजार महिलाएं और पुरुष शामिल हैं। संख्या के लिहाज से ज्यादा बड़ी यात्रा। जब धमतरी से ये गुजर रहे थे, तब वहां के कलेक्टर की संवेदनशीलता दिखी। उन्होंने आग्रह किया कि राजधानी दूर है, पैदल चलने की जरूरत नहीं है। उनकी बात में सरकार तक पहुंचाएंगे। पर यात्रियों ने इससे मना कर दिया। उन्हें फिर ठगे जाने का डर लग रहा होगा। यह अच्छा रहा कि प्रशासन ने उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था की। इसके पहले की यात्राओं में तो पूरे रास्ते उनकी कोई सुध नहीं ली गई यहां तक की राजधानी पहुंचने के बाद भी।

एक महीने से भी कम समय में यह आदिवासियों की तीसरी लंबी कष्टदायक पदयात्रा है। देखें इन्हें अपनी मांगों को मनवाने का मौका मिलता है या नहीं। संयोग है कि इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव की राजधानी में देखने को मिलेगा, लेकिन पैरों में छाले होने के कारण शायद यह उनका साथ नहीं दे पाएंगे।

स्कूल का राशन ढोकर लाते शिक्षक

कुपोषण से मुक्ति के लिए सरकार बलरामपुर जैसे सर्वाधिक प्रभावित जिले में कुछ कर रही होगी तो इसकी खबर तो कम मिलती है। मगर एक दृश्य जरूर ध्यान खींच सकती है। यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता का भी नमूना है। इस तस्वीर में बलरामपुर जिले के 2 शिक्षक कंधे पर राशन ढोकर 8 किलोमीटर दूर स्कूल जा रहे हैं। यह शिक्षक खडिय़ा डामर ग्राम पंचायत में पढ़ाते हैं। जब-जब राशन की जरूरत पड़ती है, वे इसी तरह से बोरियों को कंधे पर लादकर ले जाते हैं क्योंकि सडक़ इतनी खराब है कि वहां कोई भी गाड़ी नहीं चल सकती। इन शिक्षकों के इस प्रयास को सैल्यूट तो करना ही चाहिए। जितना जरूरी बच्चों का दाखिला है उतना ही जरूरी पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें स्कूल में भोजन देना भी जरूरी है।

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