राजपथ - जनपथ

 छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सेवा सत्कार का फायदा
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सेवा सत्कार का फायदा
Date : 10-Feb-2020

सेवा सत्कार का फायदा

पूर्व मंत्री राजेश मूणत सहित कई पूर्व भाजपा विधायकों की सुरक्षा वापस ले ली गई है। मगर पूर्व विधायक लाभचंद बाफना की न सिर्फ सुरक्षा बरकरार है बल्कि एक अतिरिक्त सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराया गया है। बाफना के प्रति सरकार की दरियादिली की भाजपा के अंदरखाने में जमकर चर्चा हो रही है। पिछली सरकार में विशेषकर दुर्ग जिले में रेत खनन में बाफना परिवार का एकाधिकार रहा है। बाफना विधायक बनने से पहले पार्टी और सरकार के प्रभावशाली लोगों की खूब सेवा करते थे। दुर्ग जिले के अपने फार्महाऊस से ताजी सब्जियां लेकर आते थे और उनके घर पहुंचाते थे। 

विधायक बनने के बाद भी उनका यह क्रम जारी रहा। मगर इसी के आड़ में उनका अपना कारोबार काफी फैल गया। उनके भाई और परिवार के लोगों के खिलाफ कई गंभीर शिकायतें भी हुई, लेकिन बाफना की सेवा से प्रभावित भाजपा और सरकार के लोगों ने ध्यान नहीं दिया। इसी के चलते विधानसभा चुनाव में न सिर्फ बाफना की बुरी हार हुई, बल्कि पूरे जिले में भाजपा का सफाया हो गया। 

अब सरकार जाने के बाद भी बाफना की हैसियत में ज्यादा कोई कमी नहीं आई है। सुनते हैं कि बाफना ने दुर्ग जिले के कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेताओं को साध लिया है। कांग्रेस नेताओं ने उनकी सुरक्षा बहाल रखने में मदद की है। जिन भाजपा नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई है, उनमें से कुछ अब बाफना का अनुशरण करने की कोशिश कर रहे हैं। 

निशक्तजन संस्थान में गदर

निशक्तजन संस्थान में गड़बड़ी की सीबीआई जांच से शासन-प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। वैसे तो संस्थान में गड़बड़ी की अलग-अलग स्तरों पर शिकायत हुई थी तब मामूली जांच-पड़ताल के बाद ज्यादा कुछ नहीं हुआ। समाज कल्याण विभाग के आला अफसरों ने इसको गंभीरता से नहीं लिया। इसकी वजह भी थी कि शिकायतकर्ता को कदाचरण के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। ऐसे में शिकायतकर्ता की शिकायतों को नौकरी से निकालने की सामान्य प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया। 

कोर्ट में भी ज्यादा कुछ मजबूती से पक्ष नहीं रखा गया। अब जब सीबीआई जांच हो रही है, तो प्रकरण से जुड़े कई तथ्य सामने आ रहे हैं। सुनते हैं कि शिकायतकर्ता के ससुरजी समाज कल्याण विभाग के ही कर्मचारी थे। दामाद को नौकरी से निकाला गया, तो ससुर का गुस्सा स्वाभाविक था। विभाग के अफसर भी दो खेमे में बंटे हुए थे। 

विभाग की अंदरूनी जानकारी छनकर बाहर निकलने लगी और मामला कोर्ट कचहरी तक पहुंच गया। शिकायतकर्ता की ज्यादा कोई चाह तो थी नहीं, नौकरी में वापसी की चाहत थी। मगर दूसरा खेमा इसके लिए तैयार नहीं था। अब प्रकरण हाईकोर्ट पहुंचा, तो भी विभाग गंभीर नहीं था। फिर सरकार बदलने के बाद कुछ अदृश्य शक्तियों का भी साथ मिल गया। फिर जो हो रहा है, वह धीरे-धीरे अब सबके सामने आ रहा है। कई बार किसी प्रकरण को हल्के में लेने का नतीजा अच्छा नहीं रहता है। 

नान घोटाला प्रकरण में भी कुछ इसी तरह का हुआ था। मैडम सीएम-सीएम सर लिखे, डायरी के पन्ने योजनाबद्ध तरीके से लीक किए गए। शुरूआत में तो पिछली सरकार और प्रकरण की जांच कर रही एजेंसी ईओडब्ल्यू-एसीबी ने इसको हल्के में लिया। बाद में यह मामला राजनीतिक रंग ले लिया, तो ईओडब्ल्यू-एसीबी से जुड़े लोगों को सफाई देने के लिए आगे आना पड़ गया। हाल यह है कि पांच साल बाद भी जांच एजेंसी डायरी में लिखे नामों को लेकर माथापच्ची कर रही है। यह प्रकरण अब तक सुलझा नहीं है।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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