राजपथ - जनपथ

 छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : नंदकुमार साय फिर उम्मीद से
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : नंदकुमार साय फिर उम्मीद से
Date : 21-Mar-2020

नंदकुमार साय फिर उम्मीद से
अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंदकुमार साय का कार्यकाल खत्म हो गया है। साय की जगह लेने के लिए कई आदिवासी नेता लगे हुए हैं। सुनते हैं कि नंदकुमार साय की दोबारा नियुक्ति के लिए कोशिश भी हो रही है। केंद्रीय जनजाति मंत्री अर्जुन मुण्डा ने साय की दोबारा नियुक्ति के लिए फाइल प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी है, लेकिन इस पर निर्णय नहीं हो पाया है। इससे परे पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय भी अजजा आयोग के अध्यक्ष बनने के इच्छुक बताए जाते हैं। 

वैसे तो विष्णुदेव साय का नाम प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में है, लेकिन उनकी रूचि जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद को लेकर ज्यादा है। छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, झारखंड व मध्यप्रदेश के भाजपा के आदिवासी  नेता, आयोग के अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत हैं। अजजा आयोग के अध्यक्ष को केंद्रीय मंत्री का दर्जा है और अधिकार संपन्न भी हैं। ऐसे में आयोग के अध्यक्ष पद पर कई भाजपा नेताओं की निगाहें टिकी हुई है। चर्चा है कि कोरोना क्राइसिस के कारण नियुक्ति नहीं हो पा रही है। माना जा रहा है कि इसमें महीने भर का समय लग सकता है। देखना है कि नंदकुमार साय को दोबारा मौका मिल पाता है अथवा नहीं। 

शहरी-संपन्न लोग ला रहे हैं...
कोरोना को लेकर केंद्र और राज्य सरकार गंभीर हैं, लेकिन शहरी और अभिजात्य तबके के लोग इससे बेपरवाह हैं। विदेश से आने वाले लोगों को कोरोना की जांच कराना अनिवार्य कर दिया गया है। मगर पढ़ा-लिखा तबका इससे बचने की हर संभव कोशिश कर रहा है। एयरपोर्ट पर उनकी जांच की व्यवस्था भी की गई है। बड़ी संख्या में कारोबारी-अफसरों के बच्चे और नजदीकी रिश्तेदार विदेशों में रहते हैं और वे वहां कोरोना फैलने के बाद लौट रहे हैं, लेकिन वे यहां जांच कराने से बच रहे हैं। 

चर्चा है कि कुछ तो एयरपोर्ट में जांच न हो पाए, इसलिए सड़क मार्ग से रायपुर आ गए हैं। शासन-प्रशासन ने जांच को लेकर सख्ती दिखाई है और आम लोगों से आग्रह किया है कि किसी के भी विदेश से लौटने की सूचना मिले, तो टोल फ्री 104 नंबर पर सूचित करे। राजीव नगर में स्वास्थ्य विभाग के अमले ने एक व्यक्ति की इसी तरह जांच कराई। वॉलफोर्ट सिटी में 3 युवतियां लंदन से लौटी थीं, लेकिन उनकी भी जांच नहीं हो पाई थी। अब आसपास के लोगों की सूचना पर तीनों की कोरोना टेस्ट करा होम आइसोलेशन पर रखा गया है। खास बात यह है कि पढ़ा-लिखा और संपन्न तबका इस तरह की लापरवाही कर आम लोगों के जीवन को खतरे में डाल रहा है। 

आज किसी ने इस अखबार को फोन करके बताया कि भिलाई की सबस संपन्न नेहरू नगर बस्ती के एक परिवार के तीन लोग अभी विदेश से लौटे हैं, उनकी तबीयत भी कुछ गड़बड़ दिख रही है, लेकिन सरकारी नंबरों पर शिकायत करने पर कोई जांच नहीं हो रही। यह जानकारी सही भी हो सकती है, और गलत भी। 

अफसर महफूज हैं क्योंकि...
केन्द्र सरकार ने आदेश निकाला है कि आधे अधिकारी-कर्मचारी घर से काम करें ताकि दफ्तरों से भीड़ घटे। लेकिन ग्रुप ए के, वरिष्ठ, अफसरों को रोज आना जरूरी किया गया है। इसके बारे में कुछ कल्पनाशील अफसरों ने अटकल लगाई, तो उन्हें कई वजहें समझ आई हैं। 

समझ आया है कि आला अफसरों को रोज आने की शर्त इसलिए रखी गई है कि वे अपने खुद के आइवरी टॉवर्स में रहते हैं, और लोग उनसे बिना अपाइंटमेंट मिल नहीं सकते, इसलिए कोरोना न उन तक पहुंच पाएगा, न उनसे मिलने का समय पा सकेगा। 

आला अफसर न सिर्फ आम जनता से, बल्कि अपने दफ्तर के भी छोटे कर्मचारियों से फासले से मिला करते हैं, इसलिए भी उन्हें कोई खतरा नहीं है। 

वे जिम्मेदारी में फंसाने वाले हर काम से हाथ धो लेने के आदी रहते हैं, इसलिए भी उनके हाथों तक कोरोना पहुंच नहीं सकता।

आला अफसरों की चमड़ी आमतौर पर मोटी होती है, इसलिए उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता आमतौर पर अधिक होती है। 

बड़े अफसर कोई भी काम छूते नहीं हैं, इसलिए संक्रमण उन तक पहुंचने का खतरा नहीं रहता। 

वे अपने से बड़े सरकारी बॉस या राजनीतिक मंत्री के चरणों में रहते हैं, इसलिए हाथ मिलाने का न कोई रिश्ता रहता, न कोई खतरा। 

वैसे भी मातहत स्टाफ न रहे, तो वे कुछ करने की हालत में नहीं रहते, और न काम करेंगे, न खतरा रहेगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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