राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अनुचित परीक्षा से थके हुए...
02-Oct-2020 4:30 PM 23
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अनुचित परीक्षा से थके हुए...

अनुचित परीक्षा से थके हुए... 

आखिरकार पॉवर कंपनी के सीनियर अफसर अजय दुबे ने रिटायरमेंट के चार साल पहले ही नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कंपनी के चेयरमैन को विधिवत आवेदन दे दिया, जिसकी मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है। दुबे पॉवर होल्डिंग कंपनी में डायरेक्टर रहे, और कुछ महीने पहले उन्हें पदावनत कर ईडी बना दिया  गया था। जिस पर वे पहले तकरीबन 11 साल से अधिक समय तक थे। वे सभी कंपनियों में काम कर चुके हैं। 

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दुबे के साथ काम कर चुके पॉवर कंपनी के तकरीबन सभी पुराने चेयरमैन उन्हें ईमानदार और मेहनती अफसर मानते रहे हैं,  मगर वे पिछले वर्षों में एमडी पद पर अजय दुबे की स्वाभाविक दावेदारी पर कुछ न कर सके। दुबे करीब ढाई साल तक होल्डिंग कंपनी के डायरेक्टर रहे। 

अपने से जूनियर अफसरों को संविदा नियुक्ति देकर एमडी बनाने के फैसले से आहत होकर सरकार को वीआरएस का आवेदन दे दिया। उन्होंने फेसबुक पर अपना दर्द जाहिर किया, और लिखा कि एक लंबे अर्से से अनुचित परीक्षा देते-देते थक सा गया था...। वरिष्ठ होकर सर्वोत्तम कार्य-मूल्यांकन उपार्जित कर भी मुझे अपने से कनिष्ठ, वरिष्ठ पदों में मुझसे कम अनुभवी संविदा युक्त एमडी के अधीन कार्य करने बाध्य किया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है। ऐसा जैसे अन्याय से अकेले ही लड़ता हूं...मैं लड़ा भी, लेकिन कब तक...उम्र, स्वास्थ्य और शांति पाने नमस्ते करना उचित समझा। 

ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस अफसर को एमडी का दायित्व सौंपने पर विचार नहीं किया। जब भी एमडी के चयन के लिए समिति बैठती थी, अजय दुबे के नाम पर विचार होता था। पिछली सरकार में ट्रेडिंग कंपनी का एमडी का पद एक सीनियर आईएएस अफसर ने बरसों तक अपने पास सिर्फ इसलिए  रखा कि वे कंपनी से मिलने वाली सुविधाओं को भोग सके। अफसर के लिए 16 लाख की गाड़ी किराए पर ली गई थी। जबकि सुविधाभोगी अफसर के पास मंत्रालय में एक से अधिक विभागों का प्रभार था। स्वाभाविक था कि दमदार आईएएस के रहते अजय दुबे जैसों को एमडी नहीं बनाया जा सकता था। कुछ इसी तरह होल्डिंग कंपनी में भी एके गर्ग को  रिटायरमेंट के बाद दो बार संविदा नियुक्ति दे दी गई, जिस पर अजय दुबे की नियुक्ति होते-होते रह गई। 

पिछली सरकार में तो एक बार एमडी पद के लिए अजय दुबे की दावेदारी को सिर्फ इसलिए खारिज की गई, कि पॉवर कंपनी की एक निजी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर कंपनी का एमडी बनाए जाने के बाद भी छुट्टी पर चले गए। हकीकत यह थी कि सरकार ने खुद उन्हें एमबीए करने के लिए विशेष अध्ययन अवकाश मंजूर किया था। मौजूदा सरकार का हाल यह रहा कि ट्रेडिंग कंपनी के जिस राजेश वर्मा को एमडी बनाया गया, वे चीफ इंजीनियर पद से रिटायर होने के बाद जनरेशन कंपनी के एमडी बनाए गए थे। बाद में उन्हें हटाया गया और फिर ट्रेडिंग कंपनी की जिम्मेदारी दे दी गई। यह भी संयोग है कि अजय दुबे, आईएफएस अफसर एसएस बजाज के इंजीनियरिंग कॉलेज के सहपाठी हैं। कुछ इसी तरह की परिस्थितियों से बजाज भी गुजर चुके हैं। सरकारें चाहे कोई भी हो, व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लडऩा आसान नहीं होता। अधिकारी संगठन भी अपना दायित्व नहीं निभा पाते हैं। दूसरे अफसर अपनी जगह बना लेते हैं, अजय दुबे जैसे लोग थक हारकर हाथ जोड़ लेते हैं। 

निजी ख्वाहिशों को पूरा किया 

राज्य सरकार ने दो आईपीएस केएल ध्रुव और शलभ सिन्हा को उनके मौजूदा जिले से एक-दूसरे की जगह पदस्थ कर निजी ख्वाहिशों को पूरा किया है। दोनों अफसर को हटाने की वजहों को लेकर पुलिस महकमे में फुसफुसाहट चल रही है। दरअसल कवर्धा  पोस्टिंग से पहले  केएल ध्रुव को सुकमा भेजने की सरकार की तैयारी थी। मार्च में डीआरजी के 17 जवानों की शहादत की घटना के चलते  शलभ सिन्हा को वहां बनाए रखना सरकार की मजबूरी हो गई थी। वारदात के बीच एसपी को हटाए जाने से सरकार को अपनी छवि खराब होने का डर था। वैसे केएल ध्रुव भी व्यक्तिगत रूप से सुकमा में ही काम करने की इच्छा सरकार के करीबियों के समक्ष जाहिर कर चुके थे। प्रदेश सरकार के मंत्री कवासी लखमा भी अपने जिले में एक प्रमोटी आईपीएस की तैनाती की कोशिश में थे। लखमा का सीधी भर्ती के आईपीएस से कभी अच्छा रिश्ता नहीं  रहा। सरकार भी अपने मंत्री की पंसद के खिलाफ जाना नहीं चाहती थी। 

सुनते है कि नक्सल मामलों में केएल ध्रुव की समझ बेहतर मानी जाती है। बीजापुर जिले में वह सर्वाधिक तीन साल तक पदस्थ रहने वाले इकलौते एसपी हैं । बीजापुर और सुकमा में लगातार हो रही हिंसक वारदातों पर काबू पाने के लिए सरकार अनुभवी अफसर की तलाश में थी। सुकमा से सीधे कवर्धा पहुंचे शलभ सिन्हा को बाहर निकालने के लिए सरकार लंबे समय से विकल्प ढूंढ रही थी। एक दूसरी बात यह भी है कि बीजापुर के मौजूदा एसपी कमलोचन कश्यप को भी सरकार ने नक्सल अनुभव के चलते ही बस्तर वापस भेजा। ध्रुव भी थोड़े महीने मैदानी जिले में तैनाती के बाद वापस बस्तर भेजे गए।

दूसरे नशे के धंधे भी मिले... 

मुंबई की तरह छत्तीसगढ़ में भी ड्रग्स के कारोबार का खुलासा हुआ है। दो युवक को पुलिस ने गिरफ्तार किया, तो कुछ जानकारी निकलकर आ भी गई। एक आरोपी युवक तो कांग्रेस के एक भूतपूर्व पदाधिकारी का बेटा है। मगर ड्रग्स रैकेट से जुड़े लोगों के पूरे नाम सामने आ पाएंगे, इसकी उम्मीद बेहद कम है। 

सुनते हैं कि नव धनाढ्य युवक भी ड्रग्स रैकेट से जुड़ गए हैं।  बकायदा इन लोगों का ग्रुप है, जिनमें से सिर्फ दो को ही पकड़ा गया है। ये न सिर्फ ड्रग्स बल्कि ऑनलाइन जुआ भी खिलाते रहे हैं। ड्रग्स रैकेट में एक पूर्व मंत्री के बेटे का नाम भी चर्चा में है। देखना है कि पुलिस पूरे ड्रग्स रैकेट का खुलासा कर पाती है, या नहीं। आम चर्चा यह रहती है कि पुलिस की आम तौर पर इन धंधों के चलते रहने में दिलचस्पी रहती है, वह तो भला हो दारू के कारोबारियों का जो अपने नशे के मुकाबले सर उठाने वाले किसी भी दूसरे नशे पर नजऱ रखते हैं ताकि अपनी बिक्री काम न हो. उन्हीं की खबर से दूसरे नशे पकड़ाते हैं। 

और ये बलरामपुर, बेलगहना की बेटियां?

उत्तरप्रदेश के हाथरस में जुल्म की शिकार हुई बेटी की बलात्कार और हत्या और उसके बाद संदिग्ध तरीके से पुलिस द्वारा आधी रात को शव जलाने के मामले ने पूरे देश को झकझोरा। इसी हफ्ते छत्तीसगढ़  में इसी तरह की दो घटनायें हुईं। एक घटना छत्तीसगढ़ के उत्तरी छोर के बलरामपुर जिले में जहां लड़की से मारपीट कर, नशा देकर, उसके साथ सामूहिक -बलात्कार किया गया। पीडि़ता और उसके मां-बाप लोक लाज के डर से मेडिकल परीक्षण कराने के लिये भी राजी नहीं थे। पुलिस ने बार-बार समझाया तब एमएलसी रिपोर्ट बनी और बलात्कार की पुष्टि हुई। बलरामपुर पुलिस की बात मानें तो आरोपी गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इसी तरह की एक वारदात बेलगहना में हुई जहां रिश्ते का भाई एक मूक नाबालिग से रेप करता रहा। जब वह गर्भवती हुई तो आरोपी के मां-बाप ने गांव के प्रमुख, व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जानकारी में, उसका अवैध गर्भपात कराया। बेलगहना के मामले में पुलिस का रवैया आरोपियों के प्रति झुकाव का रहा। उसने आरोपी, उसके मां-बाप और दादा को तो जेल भिजवाया पर गांव के प्रमुख लोग जो इस घटना को दबा रहे थे उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। बलरामपुर और बेलगहना दोनों ही जगहों पर पीडि़ता की माताओं ने घटना को पुलिस तक ले जाने की हिम्मत जुटाई। उन्हें भी धमकाया गया पर उनकी हिम्मत नहीं टूटी। जहां सामाजिक संस्थायें नहीं पहुंची, कानूनी साक्षरता के कैम्प नहीं लग पाते, कानून और न्याय व्यवस्था क्या है इसे बताने वाले नहीं पहुंचते, वहां पीडि़त के माता-पिता हिम्मत दिखा पाये तो ठीक, वरना दबाव तो बहुत पड़ता है,क्योंकि ज्यादातर मामलों में प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं। ऐसे में सरकार, मीडिया, जागरूकता, कानूनी सहायता वाली संस्थाओं का इन तक पहुंचना ज्यादा जरूरी है, जो ऐसी वारदातों को होने से पहले ही रोकें और हो जायें तो पीडि़त को हरसंभव न्याय मिले। महिला अत्याचार, रेप के मामलों में अपने प्रदेश का ग्राफ वैसे भी बहुत अच्छा नहीं है।

कोरोना की चुनावी गाइडलाइन

कोरोना काल में छत्तीसगढ़ में पहला चुनाव मरवाही में होने जा रहा है। बिहार विधानससभा चुनाव, मध्यप्रदेश का मिनी चुनाव भी साथ-साथ होने जा रहा है। कोविड के संक्रमण से बचाने के लिये कई दिलचस्प उपाय किये गये हैं। मसलन, 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को डाक मतदान की सुविधा दी गई है। दिव्यांग और कोरोना संक्रमित और आइसोलेशन में रह रहे मतदाता भी मतदान के लिये डाक का इस्तेमाल कर सकेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने के लिये मतदाता को हैंड ग्लब्स दिया जायेगा। मतदाता पंजी में दस्तखत के लिये भी हैंड ग्लब्स का इस्तेमाल करना होगा। मगर नजर इस पर रखनी होगी कि प्रचार के लिये जो गाइडलाइन राजनैतिक दलों को दिया गया है, उसका कितना पालन हो पायेगा। मसलन, काफिले में पांच से ज्यादा गाडिय़ाँ नहीं होंगी, रोड शो भी निकालने की अनुमति होगी लेकिन उसमें भी सोशल डिस्टेंस का पालन करना होगा। घर-घर सम्पर्क में भी पांच से अधिक लोग एक साथ नहीं जा सकेंगे। मरवाही में चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी भले ही हुआ हो पर चुनाव का माहौल दो माह से बन चुका है। यहां सभी दलों के राजनैतिक कार्यक्रम हो रहे हैं। ऊपर बताये गये किसी भी नियम का इसमें पालन नहीं हो रहा है। क्या चुनाव अभियान के दौरान इन बंदिशों को नेता कार्यकर्ता लागू कर पायेंगे? और हां, कोरोना संक्रमितों को भी वोट डालने का अधिकार दिया गया है। उन्हें आखिरी एक घंटे में मौका मिलेगा। 

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