संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट पर आस्था और विश्वास एक नाजायज दुराग्रह, यह महज अंधविश्वास होगा...

Posted Date : 13-Jan-2018



सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने कल जिस तरह भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में जम रही सड़ांध की खुलकर चर्चा की, वह बहुत से पुराने रिटायर्ड जजों, कई दिग्गज वकीलों, और बहुत से नेताओं को नहीं सुहाई, और उनमें से अधिकतर का तर्क यह था कि घर की बात घर में रखनी चाहिए थी, और इस तरह अदालत की बात सार्वजनिक रूप से करने से जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास घटेगा, और आस्था खत्म होगी। यह तर्क नया नहीं है। जब किसी लड़की या महिला से किसी करीबी द्वारा बलात्कार होता है, तो भी ऐसा ही तर्क दिया जाता है कि घर की बात घर में रखी जाए तो बेहतर है, पुलिस में रिपोर्ट करने पर बहुत गंदगी मचेगी, लोगों का परिवार या करीबी लोगों पर से भरोसा उठ जाएगा। हिन्दुस्तान के हिन्दी पढऩे वालों को सुदर्शन की एक पुरानी कहानी याद होगी जिसमें बाबा भारती के घोड़े को अपाहिज बनकर आया खडग़सिंह नाम का एक डकैत लेकर भाग जाता है, और फिर बाबा भारती उसे कहते हैं कि घोड़ा ले जाओ लेकिन यह बात किसी को बताना मत वरना लोगों का भरोसा दीन-दुखियों पर से उठ जाएगा। 
भरोसा उठ जाने का तर्क भी बड़ा ही अजीब है, यह कुछ उसी किस्म का है कि कैंसर के मरीज को यह नहीं बताना चाहिए कि उसे कैंसर है, वरना उसकी उम्मीद टूट जाएगी। लोकतंत्र में पारदर्शिता चारा-पानी की तरह की एक जरूरी चीज है। इसके बिना लोकतंत्र का जिंदा रहना नामुमकिन होता है। यह नहीं हो सकता कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर मुख्य न्यायाधीश की अलमारी में कंकालों का ढेर लगा रहे, और बाहर कोई यह चर्चा भी न कर सके कि ये कंकाल हैं किसके? आस्था किसी संस्थान के प्रति, या किसी व्यक्ति के प्रति रखने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। आस्था तो लोकतंत्र और पारदर्शिता के लिए होनी चाहिए, आस्था तो ईमानदारी और इंसाफ के लिए होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट हो, संसद हो, या विधानसभाएं हों, देश की फौज हो, जहां-जहां पर गोपनीयता के कानून होते हैं, अपनी बातों को भीतर छुपाकर रखने के विशेषाधिकार होते हैं, वहां-वहां पर बेईमानी पनपने लगती है। लोकतंत्र में कोई शपथ किसी गैरजरूरी गोपनीयता की नहीं होनी चाहिए, तमाम शपथ पारदर्शिता की होनी चाहिए, और वही कल सामने आई है। 
सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों को जब यह लगा कि मुख्य न्यायाधीश के स्तर पर गड़बड़ी हो रही है, पक्षपात और भेदभाव हो रहा है, और ताकतवर तबकों के पक्ष में इंसाफ को मोडऩे के लिए कोशिश होते दिख रही है, और मुख्य न्यायाधीश से इस बारे में की गई सीधी बातचीत किसी किनारे नहीं पहुंची, औपचारिक चि_ी का भी असर नहीं हुआ, तो उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से जनता की अदालत में जाना तय किया कि अपनी लिखी चि_ी को बिना किसी और आरोप के जनता के सामने रख दिया। जिन लोगों को यह लगता है कि इस मुद्दे को सार्वजनिक करना गलत था, उनको यह समझना चाहिए कि यह मुद्दा न तो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई गोपनीयता का था, और न ही सरकार के किसी ऐसे कारोबार की गोपनीयता थी जिससे कि देश का आर्थिक नुकसान हुआ रहता। इसलिए अगर नीति और सिद्धांत के, नैतिकता और ईमानदारी के किसी मुद्दे को जनता के सामने रखा गया है, तो यह एक समझदार जज की इंसाफ की समझदार समझ का सुबूत है। इंसाफ सिर्फ अपनी अदालत में पेश किए हुए मामलों में नहीं होता, मामलों से परे भी अपनी जिम्मेदारियों के साथ इंसाफ करना एक बेहतर सोच है, और इन जजों ने वही सोच दिखाई है। 
सुप्रीम कोर्ट अपने आपको जनता की नजरों से, सरकार और संसद के सवाल-जवाब से परे रखकर चलने की कोशिश करता है। यही वजह है कि देश की बड़ी अदालतों में होने वाले बड़े भ्रष्टाचार पर भी खुलकर सवाल नहीं हो पाते हैं। ऐसी गोपनीयता के लिए किसी आस्था या विश्वास को अलोकतांत्रिक बेवकूफी मानना चाहिए। और ऐसे विश्वास को अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं मानना चाहिए कि देश के सैनिकों से सवाल न किए जाएं, देश के जजों से सवाल न किए जाएं, या कि कुछ बड़े नेताओं से सवाल न किए जाएं। लोकतंत्र तो जवाबदेही का ही नाम होता है। जवाबों से परे कोई नहीं होते। इसीलिए देश के सबसे बड़े जजों ने जनता की अदालत में आकर अपने उन सवालों को रखना तय किया है जिन पर उनके ही सहयोगी और साथी मुख्य न्यायाधीश ने जवाब देने से इंकार कर दिया था। कुछ लोग जवाब पाने के लिए जब सरकार के सामने बेबस हो जाते हैं, तो वे अदालत जाते हैं। यह एक बड़ी त्रासदी है कि अदालत के भीतर जब जवाब नहीं मिल रहे, तो इंसाफ को जिंदा रखने के लिए जजों ने जनता के मार्फत जवाब मांगा है। 
इसे जजों की बगावत कहना गलत होगा, इसे जजों की क्रांति कहना बेहतर होगा। यह क्रांति देश की बेहतरी के लिए, लोकतंत्र की सेहत के लिए, और जनता को इंसाफ देने की गारंटी के लिए की गई है, और इन बागियों को चंबल के बागी डकैतों की तरह पेश करने वाले लोग बेवकूफ नहीं बदनीयत हैं। इन्होंने जो काम किया है, वह तारीफ के काबिल है, और महज इसी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ नहीं, किसी भी मुख्य न्यायाधीश या जज के खिलाफ सवाल पूछने का हक लोकतंत्र के पास होना चाहिए। दूसरी बात यह भी है कि जिन लोगों को इन जजों के सार्वजनिक सवाल पूछने और सार्वजनिक आरोप लगाने पर आपत्ति है, वे इन जजों को सार्वजनिक फांसी चढ़ाने की तैयारी तो करते रहें, लेकिन उससे पहले जिस मुख्य न्यायाधीश से सवाल किए गए हैं, जिस पर आरोप लगाए गए हैं, उससे भी इन मुद्दों पर जवाब तो मांग ही लिया जाए। हमने कल भी इसी जगह लिखा था कि ऐसे आरोपों के बाद मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास एक ही लोकतांत्रिक-नैतिक रास्ता बचता है, कुर्सी छोड़कर जाने का। हम कल से अब तक सामने आई तमाम जानकारियों को देखकर, टीवी पर जानकारों की बहस सुनकर भी उसी राय पर कायम हैं कि ऐसे संदेह के घेरे में घिरे हुए मुख्य न्यायाधीश को कुर्सी पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार अब रह नहीं गया है, यह एक अलग बात कि वे अपने आपको बेकसूर बताते हुए, किसी सवाल का जवाब न देते हुए, कटघरे में खड़े अभियुक्त की तरह बचाव के हक का इस्तेमाल करते रहें, और कुर्सी पर बने रहें। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक दुनिया में शायद ही और कहीं किसी मुख्य न्यायाधीश को इतने और ऐसे अविश्वास, और इतने आरोपों-संदेहों का सामना करना पड़ा हो। वे हिन्दुस्तानी न्यायपालिका की सबसे बुरी मिसाल बनकर ही इस कुर्सी पर बाकी के कुछ और महीने काबिज रह सकते हैं।
एक बार फिर यह कहना जरूरी है कि न्यायपालिका के ढांचे, और उसके व्यक्तियों पर आस्था और विश्वास एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं होगा। आस्था और विश्वास तो इंसाफ, ईमानदारी, और पारदर्शिता में होना चाहिए, ढांचे और इंसानों में नहीं।
- सुनील कुमार




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