संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जनता का पैसा बेदर्दी से कबाड़ में तब्दील करने की मिसालें चारों तरफ
08-May-2021 5:51 PM (236)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जनता का पैसा बेदर्दी से कबाड़ में तब्दील करने की मिसालें चारों तरफ

बिहार में वहां के एक बाहुबली नेता पप्पू यादव ने अभी एक भंडाफोड़ किया कि आज जब कोरोना मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए और लाशों को वापस लाने के लिए कहीं एंबुलेंस नहीं मिल रही है, लोगों को बहुत मोटी रकम देनी पड़ रही है, वैसे में छपरा के किसी अहाते में 30 एंबुलेंस गाडिय़ां खड़ी हुई हैं, जिन्हें ढंककर रख दिया गया है और इन्हें भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूड़ी की सांसद निधि से लिया गया था ऐसा उन पर लिखा हुआ भी है। अब कल जब यह वीडियो चारों तरफ फैला और पप्पू यादव ने यह सवाल किया कि एंबुलेंस की जरूरत के समय एंबुलेंस ढंक कर रख दी गई हैं, और उनका कहना है कि ऐसी 100 गाडिय़ां हैं जिन्हें सांसद निधि से खरीदा गया जो कि जाहिर तौर पर जनता का ही पैसा होता है और वे एंबुलेंस इधर-उधर कर दी गई हैं, वे चल नहीं रही है। दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री रहे हुए आज के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूड़ी का यह कहना है कि एंबुलेंस के लिए ड्राइवर नहीं मिले इसलिए इन्हें ढंककर रखा गया है। इस पर पप्पू यादव ने दिलचस्प जवाब दिया है कि 2016 में छपरा में केंद्रीय मंत्री की हैसियत से रूड़ी ने नितिन गडकरी और सुशील मोदी की मौजूदगी में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत ड्राइविंग प्रशिक्षण संस्था का उद्घाटन करवाया था। ऐसी संस्था जिस लोकसभा क्षेत्र में शुरू की गई, वहां पर आज सरकारी एंबुलेंस के लिए भी ड्राइवर नसीब नहीं हो रहे, इस पर अफसोस करते हुए पप्पू यादव ने अपनी तरफ से दर्जनों ड्राइवर खड़े कर दिए और कहा कि ये एंबुलेंस चलाएंगे।

यह बात जाहिर है कि पिछले एक महीने से अधिक वक्त हो चुका है जब देश में कोरोना उफान पर है, और चारों तरफ यह चर्चा पहले से चली आ रही थी कि दूसरी लहर पहले से अधिक खतरनाक रहने वाली है। ऐसे में केंद्र और बहुत से राज्यों की सरकारों ने जिस तरह लापरवाही दिखाई और कोई तैयारी नहीं की, यह उसकी एक मिसाल है। राजीव प्रताप रूड़ी केंद्र सरकार में वजन रखने वाले भाजपा सांसद हैं और बिहार में उनकी पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन में हैं। ऐसे में अगर जनता के पैसों से खरीदी गई एंबुलेंस चलाने के लिए ड्राइवर नसीब नहीं हो रहे हैं तो पप्पू यादव का यह सवाल तो जायज है कि ऐसे ड्राइविंग प्रशिक्षण संस्थान का क्या फायदा हुआ अगर बिहार जैसे बेरोजगारी से भरे हुए राज्य में कुछ ड्राइवर भी तैयार नहीं हो सके। लेकिन यह हाल अलग-अलग सरकारों में अलग-अलग प्रदेशों में कई जगह देखने मिल रहा है कि जब तक सिर पर से पानी निकल नहीं जाता तब तक सरकारें जागती नहीं हैं। 

इस देश में लंबे समय से प्रधानमंत्री राहत कोष नाम से एक फंड चले आ रहा था जिसका ऑडिट सीएजी करता था जो पूरी तरह से पारदर्शी था, लेकिन पिछले बरस के कोरोना और लॉक डाउन के वक्त से एक नया फंड बनाया गया जिसे पीएम केयर्स फंड का नाम दिया गया और जिसे सीएजी के ऑडिट से बाहर रखा गया। इस फंड को मिलने वाले दान पर टैक्स की छूट तो वैसी ही रखी गई है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी फंड की होती है, लेकिन इसे सीएजी की नजरों से बाहर रखने का रहस्य आज तक लोगों के समझ नहीं आया है, और ना ही इस फंड से क्या खर्च हो रहा है यह लोगों के सामने रखा गया है। इसलिए आज जब यह बात उठती है कि देशभर में इस फंड से ऑक्सीजन प्लांट मंजूर किए गए थे लेकिन वे लगे नहीं हैं, उनमें से बहुत गिने-चुने लगे हैं, तो सवाल यह उठता है कि एक पारदर्शी फंड रहता जिससे जुड़ी हुई तमाम बातें इसकी वेबसाइट पर मौजूद रहतीं तो लोग पहले से इसे लेकर सवाल करते कि इसके तहत दी गई मंजूरी से क्या काम हुआ है, कितनी रकम किस चीज पर खर्च हुई है। लेकिन लोकतंत्र में जहां किसी चीज को ढँककर रखा जाता है वहां उसमें सड़ांध आने लगती है। 

लेकिन आज का हमारा मकसद पीएम केयर्स फंड को लेकर अधिक चर्चा करने का नहीं है, चर्चा की बात यह है कि इस फंड से देश भर में जहां-जहां वेंटिलेटर भेजे गए उनमें बड़ी संख्या में वेंटिलेटर खराब निकले, डॉक्टरों ने जगह-जगह उसके इस्तेमाल से मना कर दिया कि उससे मरीजों की जान को खतरा हो सकता है क्योंकि वह चलते चलते कभी भी रुक जाते हैं। आज सरकारी ढांचा इस किस्म का है कि खर्च करने की हड़बड़ी रहती है, उस खर्च से आए हुए सामान के रखरखाव की हड़बड़ी नहीं रहती, उसे चलाने के लिए कर्मचारियों को रखने की हड़बड़ी नहीं रहती। बिहार में जिस तरह एंबुलेंस खाली खड़ी हुई है, उसी तरह छत्तीसगढ़ सहित दूसरे बहुत से प्रदेशों में वेंटिलेटर जैसी जीवन रक्षक मशीनें खाली रखी हुई हैं और उन्हें चलाने का प्रशिक्षण किसी को नहीं दिया गया है। हजारों कर्मचारियों का सरकारी अमला है लेकिन ऐसी महंगी और जान बचाने वाली मशीनों को चलाने की ट्रेनिंग उन्हें नहीं दी गई। इसके पहले भी पिछली भाजपा सरकार के समय छत्तीसगढ़ में एक बहुत ही बदनाम स्वास्थ्य सचिव के रहते हुए सोनोग्राफी की ऐसी नकली मशीनें खरीद ली गई थीं जो कि किसी काम की नहीं थीं, और मंत्रालय में बैठे अफसरों ने सप्लायर के साथ मिलकर उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक भिजवा भी दिया गया था जहां पर उन मशीनों को चलाने वाले कोई कर्मचारी नहीं थे। वे मशीनें चलने लायक नहीं थीं, उसकी रिपोर्ट को समझने वाले डॉक्टर वहां नहीं थे। सरकारी खरीदी में भारी गड़बड़ी की जाती है जैसे कि बिहार की इन एंबुलेंस की खरीदी में की गई होगी, लेकिन बाद में उनका इस्तेमाल हो रहा है या नहीं यह कैसी हालत में है इसकी फिक्र तो आज उस मुसीबत के समय भी नहीं की जा रही जब जब चारों तरफ तबाही फैली हुई है। 

आज ही आंध्र के श्रीकाकुलम जिले का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें कोरोना से मरी हुई मां को मोटरसाइकिल पर बीच में बिठाकर दो भाई शहर के अस्पताल से गांव ले जा रहे हैं। इनमें से कोई भी पीपीई सूट पहने हुए नहीं है क्योंकि शायद इन्हें नसीब भी नहीं रहा होगा, इन्हें एंबुलेंस नहीं मिली, इसलिए यह अपनी जान खतरे में डालकर माँ की लाश बीच में बिठाकर इस तरह से जा रहे हैं। और ऐसे वक्त पर बिहार में दर्जनों दर्जनों एंबुलेंस इस तरह से ढंककर रख दी गई हैं। लोकतंत्र में यह बात बिल्कुल साफ समझ लेनी चाहिए कि सरकारी खर्च की कोई भी जवाबदेही तभी हो सकती है जब सरकारी तंत्र खुद होकर इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से अपने खर्चों को डाले। उन्हें देखकर ही मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ता सवाल कर सकते हैं और ऐसे सवालों से ही सरकारी भ्रष्टाचार थम सकता है। हमने यहां पर राजीव प्रताप रूड़ी की लोकसभा सीट का यह एक हाल महज नमूने के तौर पर पेश किया है देशभर में जगह-जगह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ऐसी बर्बादी बिखरी हुई होगी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनकी पड़ताल करके उन्हें उठाना चाहिए। दूसरी तरफ इस देश में सरकार द्वारा इकट्ठा किया गया कोई भी पैसा, सरकार द्वारा टैक्स पर छूट दिया गया कोई भी दान, जनता की नजरों से परे नहीं रहना चाहिए, सरकारी ऑडिट से परे नहीं रहना चाहिए। वह प्रधानमंत्री के स्तर पर हो या किसी और स्तर पर, वह बिना संदेह के नहीं रहता और लोकतंत्र में सरकार के तमाम काम संदेह से परे रहने चाहिए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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