संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान मवाली हैं, तो फिर ऐसे मवालियों का उगाया न खाएं !
23-Jul-2021 4:28 PM (198)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान मवाली हैं, तो फिर ऐसे मवालियों का उगाया न खाएं !

केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी कल भाजपा कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसानों के प्रदर्शन पर एक सवाल का जवाब दे रही थीं, और उन्होंने काफी आक्रामक तरीके से कहा- फिर किसान आप उन लोगों को बोल रहे हैं, मवाली हैं वो। इसका वीडियो मौजूद है जो उनके शब्दों को बड़ा साफ-साफ बतला रहा है। लेकिन जैसा कि बाद में होता है, उन्होंने एक और बयान में कहा कि उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, फिर भी अगर उनके शब्दों से कोई किसान आहत हुआ है, तो वह उन्हें वापस लेती हैं। इन दोनों बातों के वीडियो हमने देखे हैं और इन दोनों बातों में कहीं गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं है।

मीनाक्षी लेखी केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के पहले सुप्रीम कोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में वकालत कर चुकी हैं, और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुकी हैं। वे हिंदी भाषी इलाके से हैं इसलिए किसी गैर हिंदी भाषी प्रवक्ता या नेता के मुंह से निकले अटपटे शब्दों के लिए उन्हें संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश भी मीनाक्षी लेखी के साथ नहीं है। वे लंबे समय से भाजपा के कई पदों पर दिल्ली में ही काम करती रही हैं जो कि मोटे तौर पर हिंदी भाषी प्रदेश है और वह खुद भी वकील रहते हुए वे मवाली शब्द का मतलब न समझें ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए अपने शब्दों के बचाव में बाद में उनका चाहे जो बयान नुकसान को घटाने के लिए आया हो, किसानों की जो बेइज्जती होनी थी, वह तो हो ही चुकी है। राजनीति में सत्ता पर रहते हुए बहुत से लोग इस तरह बड़े हमलावर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वह अगर ज्यादा आक्रामक रहते हैं तो वह पूरे के पूरे वाक्यों और मिसालों को बहुत ही हमलावर बनाकर बोलते हैं, गाड़ी के नीचे आ जाने वाले पिल्ले जैसी मिसाल । यह जानते हुए भी बोलते हैं कि इन दिनों किसी शहर स्तर के नेता की कही हुई बात को भी कई कई कैमरे रिकॉर्ड करते ही रहते हैं. इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि कौन सी बात किसके मुंह से चूक से निकली है, और कौन सी बात सोच-समझकर किसी हथियार की तरह चलाई गई है। फिर भी किसानों के व्यापक तबके के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में उन्हें मवाली करना कुछ अधिक ही हमलावर और अपमानजनक बात है इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिना वक्त गवाएं तुरंत ही मीनाक्षी लेखी के इस्तीफे की मांग की है, और उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि दिल्ली की सरहद पर आंदोलन शुरू होने के बाद से किसानों के खिलाफ कई भाजपा नेताओं ने समय-समय पर अपमानजनक बातें कही हैं, उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की है।

यह बात बहुत हद तक सही है क्योंकि केंद्र सरकार सहित हरियाणा के भी कई भाजपा नेताओं, और मंत्रियों ने किसानों के बारे में समय-समय पर बहुत ओछी बातें कही हैं। और हैरानी यह होती है कि किसानों पर ऐसे हमलों के बीच ही असम, बंगाल, और केरल जैसे चुनाव भी निपट गए, अब तो उस पंजाब का चुनाव सामने खड़ा हुआ है जहां से इस आंदोलन में शुरू से किसान आए हुए हैं, इससे जुड़े हुए हैं। देश में कोई एक प्रदेश किसानों के मुद्दों से सबसे अधिक जुड़ा हुआ है तो वह पंजाब है. आज देश में जितने किस्म के अलग-अलग पेशेवर तबके हैं उनमें शायद किसान ही अकेले ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार से सबसे कम जुड़े हुए हैं, जो कोई भी गुंडागर्दी नहीं करते हैं, और जो कुदरत और सरकार इन दोनों के रहमो करम पर जीते हुए मेहनत करते हैं, और राजनीतिक दलों और सरकारों के किए हुए वायदों के पूरे होने की उम्मीद रखे हुए जिंदगी गुजार लेते हैं। किसानों ने अपने आंदोलन में कभी किसी को मारा नहीं है, देश का इतिहास गवाह है कि हर बरस हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी साल नहीं है जब किसानों ने कुछ दर्जन भी हत्याएं की हों। और एक तबके के रूप में तो किसानों ने कभी भी कोई हिंसा नहीं की है। दिल्ली में भी स्वतंत्रता दिवस के दौरान जिन लोगों ने वहां आकर हिंसा की वे लोग भाजपा से जुड़े हुए थे, चर्चित और नामी-गिरामी थे जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत भी मिले और मुकदमे भी चल रहे हैं. लेकिन किसानों ने एक तबके के रूप में, एक आंदोलन के रूप में कोई हिंसा नहीं की।

इसलिए हमारा ख्याल है कि किसानों को मवाली कहना न सिर्फ किसानों का अपमान है, बल्कि इस देश के हर उस इंसान का अपमान है जिसका पेट किसानों के उगाए हुए अनाज से भरता है. और किसानों से परे भी लोगों को ऐसी जुबान का विरोध करना चाहिए और भाजपा के लिए बेहतर यह होगा कि एक मंत्री की कही हुई बात और फिर वापस लिए गए शब्दों से ऊपर जाकर, वह एक पार्टी के रूप में किसानों से माफी मांगे, और अपनी पार्टी के बाकी नेताओं के लिए भी यह चेतावनी जारी करे कि किसानों के बारे में अभद्र और अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने से बाज आएं. ऐसा नहीं है कि बंगाल और केरल के चुनावों में भाजपा के नेताओं का किसानों के खिलाफ कहा हुआ कमल छाप के खिलाफ न गया हो। देश के हर प्रदेश में किसान हैं और कम से कम आम नागरिकों में तो बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि किसानों से हमदर्दी रखते हैं, किसानों के लिए सम्मान रखते हैं. इसलिए भाजपा को पंजाब चुनाव में इस मवाली-शब्दावली का नुकसान हो उसके पहले उसे खुले दिल से, और साफ शब्दों में, बिना किंतु परंतु किए हुए किसानों से माफी मांगनी चाहिए।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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