संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अफगानिस्तान से जिस रफ़्तार से लोग निकल रहे हैं, उसी रफ़्तार से दुनिया के लिए सबक भी निकल रहे
22-Aug-2021 7:25 PM (254)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  अफगानिस्तान से जिस रफ़्तार से लोग निकल रहे हैं, उसी रफ़्तार से दुनिया के लिए सबक भी निकल रहे

अफगानिस्तान लगातार खबरों में बना हुआ है, तकरीबन हर दिन वहां से हिंदुस्तानी लौट भी रहे हैं, और सैकड़ों हिंदुस्तानी वहां अभी भी बाकी है जिन्हें लाने की तैयारी चल रही है। इन बातों को देखें और अफगानिस्तान पर कुछ लिखने के पहले वहां के बारे में पढ़ें तो ऐसा लगता है कि अफग़़ानिस्तान का इतिहास उन इलाकों से परे भी दूसरे देशों को, दूसरे समुदायों को बहुत सी चीजें सिखा सकता है। अफगानिस्तान में एक वक्त, आज ऐसे करीब आज से करीब डेढ़ सौ बरस पहले, हिंदुस्तान पर काबिज अंग्रेज सरकार और कम्युनिस्ट सोवियत संघ के बीच अफगानिस्तान पर कब्जे की कोशिशें चलीं, और उसके बाद अभी इक्कीसवीं सदी में वहां अमेरिका ने यही काम किया। लेकिन अफगानिस्तान की स्थानीय जीवन शैली को समझे बिना जिस तरह इन विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों ने वहां पर कब्जा करने की लंबी कोशिशें की और लंबी मुंह की खाई, उससे पूरी दुनिया को एक सबक लेना चाहिए कि जिस जगह जाकर कोई बड़ा काम करने का इरादा हो, उस जगह को पहले समझ लेना बेहतर होता है।

आज दुनिया के इतिहासकार और विश्लेषक लगातार इस बात को लिख रहे हैं कि अलग-अलग वक्त पर दुनिया की इन तीन बड़ी ताकतों ने अफग़़ानिस्तान पर कब्जे का सपना देखा, कोशिश की, और दशकों तक फौजी ताकत का इस्तेमाल किया, उनकी सबसे बड़ी चूक यह हुई कि वह वे वहां पर कब्जा करने के लिए आमादा तो हो गए लेकिन वहां से निकलना नहीं जाना। उन्हें यह समझ ही नहीं आया था कि कभी उन्हें अफगानिस्तान छोडक़र निकलना भी पड़ेगा। यह नौबत इन तीनों महाशक्तियों की शिकस्त की सबसे बड़ी वजह रही कि उन्होंने अफगानिस्तान जाने की योजना या साजिश तो बना ली थी। लेकिन वहां से निकलने के बारे में कुछ नहीं सोचा था। इसलिए आज अमेरिका के सबसे करीबी साथी भी अमेरिका को इस बात के लिए धिक्कार रहे हैं कि उसने न केवल अफगानिस्तान को मंझधार में छोडक़र चले जाना तय किया बल्कि अफगानिस्तान में मौजूद लाखों मददगारों और सहयोगियों को वहां छोडक़र अमेरिका निकल आया है और अब किसी तरह उनमें से कुछ लोगों को खतरे में निकालने की कोशिश कर रहा है।

हिंदुस्तान में देखें तो पौराणिक कहानियों में एक ऐसा जिक्र आता है कि महाभारत में अभिमन्यु ने युद्ध के घेरे में घुसना तो सीखा हुआ था मां के पेट से ही, लेकिन निकलना नहीं सीखा था और इसलिए वह चक्रव्यूह में फंस गया। अफगानिस्तान दुनिया की इन तीनों महाशक्तियों के लिए चक्रव्यूह ही साबित हुई जिसमें से कोई जिंदा या कामयाब बाहर नहीं निकल पाया। अफगानिस्तान के दसियों लाख लोगों को इन डेढ़ सौ बरसों में इन फौजी ताकतों ने मारा और खुद अपने भी लाखों सैनिक खोए। यह सिलसिला दुनिया को एक सबक दे जाता है। लेकिन अफगानिस्तान से दुनिया के लिए और भी बहुत से सबक निकल रहे हैं कि किस तरह वहां पर कट्टर, धर्मांध, और हिंसक तालिबान की बनाई हुई शरिया अदालतें पूरे अफगानिस्तान के लोगों के बीच लोकप्रिय थीं क्योंकि तथाकथित शहरी लोकतंत्र की बनाई हुई औपचारिक आधुनिक लोकतांत्रिक अदालतें इस कदर भ्रष्ट हो चुकी थी कि लोगों का उन पर से भरोसा उठ गया था, और किसी कमजोर और गरीब के लिए वहां इंसाफ पाना मुमकिन नहीं था। नतीजा यह था अफगान लोग शरिया अदालतों में जाने लगे थे वहां के इंसाफ पर उन्हें भरोसा भी था और उससे परे, वे अदालत ने भ्रष्टाचार से भी दूर थी।

अब आज दुनिया में तालिबान को जिस तरह से देखा जा रहा है, कौन इस बात को आसानी से मान सकते हैं कि उनकी बनाई हुई अदालतें शहरी लोकतंत्रों की अदालतों के मुकाबले बहुत अधिक ईमानदार थीं और भ्रष्टाचार से मुक्त थीं। अब यह बात हिंदुस्तान जैसे किसी देश के संदर्भ में सोचें तो जहां पर अदालतों को आमतौर पर भ्रष्ट मान लिया गया है, और लोगों को अदालतों पर कोई भरोसा नहीं है, तो लोकतंत्र की ऐसी असफलता क्या किसी किस्म के धार्मिक फतवों को बढ़ावा दे सकती है? क्या ऐसी नौबत आ सकती है जिसमें लोगों को अपने बाहुबल पर अधिक भरोसा हो या लोग मुंबई में किसी माफिया के पास, या उत्तर प्रदेश बिहार में किसी बड़े गुंडे के पास जाने लगें, कि वहां उनके झगड़ों का आसानी से ईमानदार निपटारा हो जाए? ऐसी तमाम बातें अफगानिस्तान से आज बाकी दुनिया के लिए सबक के रूप में निकल रही हैं।

अफगानिस्तान में 1980 के पहले जिस तरह से वहां स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टी के जुल्म भरे राज को जारी रखने के लिए रूस ने दसियों हजार सैनिकों को वहां झोंक दिया था और अंधाधुंध कत्लेआम शुरू कर दिया था, वह भी एक वजह थी कि अफगान जनता कम्युनिज्म से नफरत करने लगी थी, फिर चाहे वह बराबरी के आर्थिक अधिकारों की बात करता था और महिलाओं के लिए बराबरी के अधिकार की बात भी करता था। लेकिन उसने जिस हद तक लोगों पर जुल्म ढहाना शुरू किया था उसी का नतीजा था कि कम्युनिस्टों को आखिर में जाकर अपने रूसी आकाओं के साथ सत्ता छोडऩी पड़ी थी, और रूस के आखिरी फौजी को भी अफगानिस्तान से जाना पड़ा था। लेकिन दूसरी तरफ बाहर से लाकर पश्चिमी अंदाज का लोकतंत्र लादने की अमेरिका की गुंडागर्दी की कोशिश ने जिस तरह के जुल्म किए थे और अमेरिकी सरगनाई में जिस तरह पश्चिमी फौजियों ने अफगान जनता पर जुल्म किए थे, उन्हीं का नतीजा था कि इन 20 वर्षों में धीरे-धीरे तालिबान को एक बार फिर जगह मिली और आज अमेरिका की वापिसी को तालिबान की जीत के जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। फिर चाहे अमेरिका कहने के लिए एक संविधान से बंधा हुआ लोकतंत्र क्यों ना हो, उसने अफगानिस्तान में जितने जुल्म किये हैं, उन्हीं का नतीजा रहा कि तालिबान एक बार फिर लोगों की हमदर्दी पाकर सत्ता पर आ चुके हैं। हम ऐसी किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते लेकिन मोटे तौर पर वहां की नौबत को समझाने के लिए इन बातों को कर रहे हैं कि किस तरह किसी के गलत काम दूसरे गलत लोगों के लिए एक जगह पैदा कर देते हैं। जैसे हिंदुस्तान में देश की सरकार हो या बिहार की सरकार हो, जब इन सरकारों ने खूब भ्रष्टाचार किया, तो इनकी धर्मनिरपेक्षता किनारे धरी रह गई और देश के सबसे सांप्रदायिक लोगों को भी जनता ने इनके ऊपर चुन लिया क्योंकि जनता भ्रष्टाचार से थक गई, और जनता शायद कुनबापरस्ती से भी थक गई थी। ऐसे में लोगों को लगा कि सांप्रदायिक होना इतनी बड़ी बुराई नहीं है जितनी बड़ी बुराई भ्रष्ट होना और कुनबापरस्त होना है।

अफगानिस्तान को आज देखें तो वहां 1840 के आसपास से अंग्रेजी फौजियों की जो दखल शुरू हुई थी वह 100 बरस बाद जाकर रूसी फौजियों की शक्ल में बदल गई और उसकी चौथाई सदी बाद वह अमेरिकी फौजों की शक्ल में बदल गई। इस दौरान अफगानिस्तान के भीतर स्थानीय तबकों में भी लोग अलग-अलग समय पर अलग-अलग किस्म की ताकतों को खारिज करते रहे, और अलग-अलग किस्म की ताकतों का साथ देते रहे। अफगानिस्तान का पूरा ताजा इतिहास बड़ा दिलचस्प है और यह बाकी दुनिया के लिए एक बड़ा सबक बन कर भी आया है कि सरकारों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए देश के भीतर राज्य करने की हसरत रखने वाले राजनीतिक दलों और समुदायों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। फिर अफगानिस्तान इस बात का भी एक बहुत बड़ा सबूत है कि लोकतंत्र को अपने आपको इस हद तक नाकामयाब नहीं करना चाहिए कि कट्टरता और धर्मांधता भी बेहतर लगने लगे। हिंदुस्तान सहित बाकी दुनिया के लोकतंत्रों को भी अफगानिस्तान के बारे में पढक़र अपने खुद के बारे में भी सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि धर्मांधता और कट्टरता जब वह बढऩा शुरू होती हैं, तो वे इस हद तक बढ़ जाती हैं कि अमेरिका और तमाम पश्चिमी देशों के फौजी गठबंधन को भी नाकामयाब कर देती हैं। यह भी सोचना चाहिए कि जब देशों की सरकारें किसी एक धर्म की धर्मांधता को बढ़ावा देती हैं, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देश तालिबान को किस ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं, उसे कितनी ताकत दे सकते हैं। अफगानिस्तान का यह पूरा तजुर्बा दुनिया को बहुत कुछ सीखने का मौका दे रहा है और लोगों को अफगानिस्तान की फिक्र करने के बजाए अपने देश और अपने समाज की फिक्र करनी चाहिए, अपने धर्म की खामियों की फिक्र करनी चाहिए, हिंसा और कट्टरता की फिक्र करनी चाहिए और यह सोचना चाहिए कि कैसे-कैसे उनके साथ यह नौबत ना आए।
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