संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जुलाई : लोकतंत्र के औजार का ऐसा साम्प्रदायिक हथियार सरीखा इस्तेमाल पूरी तरह नाजायज
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जुलाई : लोकतंत्र के औजार का ऐसा साम्प्रदायिक हथियार सरीखा इस्तेमाल पूरी तरह नाजायज
Date : 13-Jul-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जमीन के एक झगड़े में आमने-सामने हुए कुछ हिन्दू और कुछ मुस्लिम लोगों के तनाव को साम्प्रदायिक रंग देने में पेशेवर दंगाई जुट गए हैं। एक टीवी चैनल जो कि पूरे ही वक्त इस देश में साम्प्रदायिकता की बात करता है, उसने इस तनाव को धर्म के रंगों में रंगकर साम्प्रदायिकता भड़काने की पूरी कोशिश की, लेकिन छत्तीसगढ़ का मिजाज कुछ ऐसा है कि यहां ऐसे दंगे भड़कते नहीं हैं। लोगों को आमतौर पर याद भी नहीं पड़ता कि उन्होंने पिछला कफ्र्यू कब देखा था, या कब कोई साम्प्रदायिक टकराव हुआ था। ऐसे में खुलकर तनाव को भड़काना किसी किस्म से मीडिया का काम नहीं है, यह एक अलग बात है कि टेक्नालॉजी की मेहरबानी से एक मशीन हो तो अखबार छापा जा सकता है, और उससे अधिक पूंजीनिवेश हो तो कोई टीवी चैनल शुरू करके उस पर मनचाही खबरें फैलाई जा सकती हैं। देश का कानून कहने के लिए तो इस मामले में खासा कड़ा है कि टीवी चैनल के लिए लाइसेंस या इजाजत लेने में लोगों को बरसों लग जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बड़े-बड़े दुष्ट और भ्रष्ट लोग अपने जाने-पहचाने कारोबार के बाद भी टीवी चैनल शुरू कर लेते हैं, साम्प्रदायिकता भड़काने के लिए झूठी खबरें दिखाकर पकड़ में आने वाले लोगों के चैनल भी जारी रहते हैं, और कमोबेश ऐसा ही हाल प्रिंट मीडिया के मालिकों का रहता है जिनके किसी भी किस्म के काम में मीडिया से जुड़े कानून आड़े नहीं आते, और उनका कारोबार जारी रहता है। 

लेकिन बाकी कारोबारी मामलों से परे जब देश की साम्प्रदायिकता एकता की बात आती है तो उसे सोच-समझकर बिगाडऩे में लगे हुए लोगों को किसी मीडिया की आड़ लेकर यह काम नहीं करना चाहिए। दंगाई अगर सीधे-सीधे पहचान में आते हैं तो उन पर कार्रवाई आसान होती है, लेकिन जब किसी धर्म, किसी आध्यात्मिक संगठन, किसी मीडिया का चोला पहनकर यह काम करते हैं, तो उन पर कार्रवाई कुछ मुश्किल रहती है। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को साम्प्रदायिकता बनाने की कोशिश मीडिया का काम नहीं कही जा सकती, फिर चाहे इसके लिए मीडिया के नाम के मालिकाना हक का इस्तेमाल हो, या मीडिया के लिए प्रचलित औजार का इस्तेमाल हो। मीडिया के औजार अगर साम्प्रदायिकता या हिंसा के हथियार बना लिए जाएं, तो उस पर सरकारी कार्रवाई में मीडिया के नाम पर किसी रियायत की न तो उम्मीद करनी चाहिए, और न ही वकालत। 

इस देश में कुछ दशक पहले तक श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था जो कि पत्रकारों के हक की लड़ाई तो लड़ता ही था, वह पत्रकारिता के सिद्धांतों को लेकर भी लड़ता था और जिसके मंच पर इस पेशे के सिद्धांत, उसकी ईमानदारी की बात भी होती थी। वह दौर खत्म हो गया, और अब एक बिल्कुल ही अलग चाल, चरित्र, और जरूरत वाली संस्था, प्रेस क्लब, देश के अलग-अलग शहरों में चलन में हैं। दिल्ली से लेकर रायपुर तक अब मीडिया के मुद्दे प्रेस क्लब के बैनरतले उठने लगे हैं क्योंकि श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मरकर गहरे दफन हो चुका है। लेकिन प्रेस क्लब को अपने नाम के क्लब वाले हिस्से को अपने पर हावी नहीं होने देना चाहिए, और अगर वह मीडिया से जुड़े मुद्दों को उठाना चाहता है, तो उसे लोकतंत्र में मीडिया की बुनियादी जिम्मेदारी को समझते हुए मीडिया के सिद्धांतों पर भी चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को सोच-समझकर साम्प्रदायिकता का रंग देने की कोशिश लोकतंत्र का मीडिया-औजार नहीं है, यह लोकतंत्र के खिलाफ एक हथियार है। और ऐसी कोशिशों का साथ देने के पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी के प्रेस क्लब को यह भी समझना चाहिए कि अपने बीच के गलत लोगों को बचाकर कोई संस्था न तो इज्जत पा सकती, और न आगे चलकर किसी सही को बचाने के लिए उसकी ताकत काम आएगी। 

छत्तीसगढ़ एक शांतिप्रिय राज्य रहा है, और यहां पर घोर साम्प्रदायिक संगठन भी दुबके हुए ही चलते हैं। साम्प्रदायिक आक्रामकता की इस राज्य में कोई जगह नहीं है, और मीडिया के जो गिने-चुने लोग साम्प्रदायिकता फैलाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी भी छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में कोई जगह नहीं है। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments