संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 जुलाई : महज सत्ता की पसंद से बड़े ओहदों पर मनोनयन से जुड़े हैं बहुत खतरे...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 जुलाई : महज सत्ता की पसंद से बड़े ओहदों पर मनोनयन से जुड़े हैं बहुत खतरे...
Date : 19-Jul-2019

कानूनी मुद्दों का अध्ययन करने वाले देश के एक गैरसरकारी संगठन, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी, ने एक अध्ययन में यह पाया है कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले पिछले सौ जजों में से 70 ऐसे हैं जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद केन्द्र या राज्य सरकारों के मनोनीत पद संभाले हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो सामने आई है वह यह है कि इन पदों में से आधे से अधिक ऐसे हैं जिनमें संवैधानिक जरूरत ही सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की है। ऐसी शर्त की वजह से ही रिटायर्ड जज ही इन पदों पर रखे जा सकते हैं, हालांकि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को राज्यपाल भी बनाया जो कि उस कुर्सी की कोई शर्त नहीं थी। 

ये आंकड़े कुछ चौंकाने वाले हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के बाद कई बरस तक उसी दर्जे की सहूलियतें, और मोटी तनख्वाह मिलने की एक गुंजाइश रहती है, तो जाहिर है कि जज की कुर्सी पर बने रहते वक्त यह संभावना अनदेखी तो नहीं रहती होगी, और जैसा कि आम मानवीय स्वभाव रहता है, हो सकता है कि जजों के कुछ फैसले सरकार में बैठे हुए लोगों की पसंद और प्राथमिकता को देखते हुए भी प्रभावित होते हों, क्योंकि रिटायर्ड जजों में से किसे किसी कुर्सी पर बिठाना है, या किसे बस बिदा ही कर देना है, यह फैसला तो सरकार में बैठे लोग ही लेते हैं। और यह बात महज जजों के साथ नहीं है, और महज केन्द्र सरकार के साथ नहीं है, राज्यों में भी ऐसा होता है, और रिटायर्ड अफसरों की नजरें राज्य की कई संवैधानिक, और दूसरी महत्वपूर्ण-ताकतवर कुर्सियों पर पहले से लग जाती हैं, और उनके फैसले उन सत्तारूढ़ लोगों को खुश रखने के हिसाब से होने लगते हैं जिन्हें इन ओहदों पर चेहरे बिठाने होते हैं। हम इसी जगह बहुत बरसों से लिखते आ रहे हैं कि राज्य के भीतर रिटायर होने वाले जजों और अफसरों को उसी राज्य में किसी कुर्सी पर रिटायरमेंट के बाद नहीं बिठाना चाहिए। अगर कोई संवैधानिक जरूरत है, या राज्य के हित में किसी अनुभवी की जरूरत है, तो उसके लिए राज्य के बाहर से अर्जियां बुलवानी चाहिए, और राज्य का न होना एक अनिवार्य शर्त रखनी चाहिए। 

जहां कहीं भी इंसाफ की बात होती है, एक पैमाना सबसे पहले लागू किया जाता है, हितों के टकराव का। किसी अदालत में कोई जज ऐसा कोई मामला नहीं सुन सकते जिससे वे बीते हुए कल या आज किसी भी तरह से जुड़े हुए हों। ठीक इसी तरह सरकार में कोई फैसला लेने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि उनसे संबंधित लोगों के मामले हों, तो वे अपने को फैसले से अलग कर लें। ऐसा ही हाल सरकार के मनोनीत लोगों का रहता है चाहे वे जज हों, चाहे अफसर हों। अगर वे रिटायर होने के बाद लाभ और सहूलियत का कोई पद लेते हैं, तो जाहिर है कि पहले उनके कामकाज से खुश सरकार ही ऐसा फैसला लेगी, और सरकार की यह खुशी आमतौर पर सरकार में बैठे लोगों की निजी खुशी होती है, न कि जनहित की खुशी। 

अगर कोई ऐसी जनहित याचिका लेकर अदालत भी जाए, तो भी उसकी सुनवाई में हमें शक है क्योंकि सुनने वाले जजों को भी रिटायर होने के बाद पुनर्वास की संभावना अच्छी ही लगती है, वे भला ऐसे नियम क्यों लागू करना चाहेंगे जिससे उनकी अपनी संभावनाएं खत्म हो जाएं। केन्द्र सरकार के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के जजों की अनिवार्यता वाले पदों का कोई आसान हल अभी हमें नहीं सूझ रहा है, लेकिन राज्यों के मामले में तो यह तुरंत लागू हो सकता है, और होना चाहिए, कि किसी राज्य में काम कर चुके जज और अफसर उस राज्य में कहीं मनोनीत न हो सकें। तंग दायरे में पसंद करने से बेहतर यही होगा कि राज्य सरकारें देश भर से काबिल लोगों की अर्जियां बुलवाएं, और लोगों को नियुक्त करें। दूसरी बात केन्द्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति को भी केन्द्र सरकार के एकाधिकार से बाहर निकालना चाहिए, और ऐसी नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों, बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, जैसे लोगों को शामिल करना चाहिए।

इनके अलावा एक दूसरी प्रक्रिया लोगों को जज बनाते हुए, या रिटायर्ड जजों को किसी पद पर बिठाते हुए अपनाने की वकालत हम पहले भी कर चुके हैं। अमरीका में किसी भी बड़े संवैधानिक पद पर किसी की नियुक्ति के पहले संसद की कमेटी के सामने उसकी खुली सुनवाई होती है, और कई-कई दिन तक ऐसे लोगों से बहुत से सवाल किए जाते हैं जो कि विचारधारा, प्रतिबद्धता, पसंद-नापसंद से लेकर उनकी निजी जिंदगी के विवादास्पद मुद्दों तक पर पूछे जाते हैं। हिन्दुस्तान में भी ऐसी प्रक्रिया बहुत से मनोनयन के पहले अपनानी चाहिए, और इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता आएगी, जवाबदेही बढ़ेगी। जब कोई पसंद महज सत्ता पर छोड़ दी जाती है, तो उसके अच्छे होने की संभावना घट जाती है। 
-सुनील कुमार

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