संपादकीय

 दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 जुलाई : आजाद भारत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक हक पर हमला
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 जुलाई : आजाद भारत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक हक पर हमला
Date : 24-Jul-2019

केन्द्र सरकार ने सूचना के अधिकार कानून में कई संशोधन किए, और सत्तारूढ़ एनडीए का जिस तरह का विशाल बहुमत लोकसभा में है, उसके चलते उसे वहां से पास भी करवा लिया। विपक्ष न तो इससे सहमत था, और न ही उसकी आवाज का कोई वजन लोकसभा में रह गया है। लेकिन देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संशोधन का बड़ा विरोध किया है जिसके बाद सूचना का अधिकार बहुत ही कमजोर हो गया है, और अब सरकारों सहित जो भी संस्थाएं इसके दायरे में आती हैं, वे अपने-अपने भ्रष्टाचार को छुपाने में कामयाब रहेंगी। 

यूपीए सरकार के वक्त जब सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों ने उन्हें सहमत कराकर सूचना का अधिकार बनवाया,और लागू करवाया, तब भी किसी राजनीतिक दल के लोग इससे सहमत नहीं थे। क्योंकि बारी-बारी से हर पार्टी की कभी न कभी, कहीं न कहीं सरकार बनती है, और वैसे में उनकी जानकारियां बाहर निकलने पर उनके भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होता है। आरटीआई लागू होने के बाद से लगातार यह बात सामने आई कि मीडिया या सामाजिक आंदोलनों में सरकार के, दूसरी संस्थाओं के जो भ्रष्टाचार उजागर हुए, वे आरटीआई के बिना नहीं हुए होते। इसे एक क्रांतिकारी-लोकतांत्रिक अधिकार और औजार माना गया, लेकिन राजनीतिक ताकतों ने हमेशा इसे एक हथियार की तरह देखा, जिसका हमला उन पर होता है। अभी कल हुए इस ताजा संशोधन के बिना भी राज्य सरकारों ने और केन्द्र सरकार ने अपने-अपने स्तर पर इस अधिकार को कुचलने की खूब कोशिश की। सरकारी दफ्तरों में जनसूचना अधिकारी की बड़ी जिम्मेदारी यही बना दी गई थी कि वे किस तरह के तकनीकी बहाने ढूंढकर सूचना देने से बचें, या उसमें देरी करते जाएं। ऐसी देरी के खिलाफ जब लोग राज्य के सूचना आयोग तक पहुंचते हैं, तो वहां पर प्रदेश के वही पुराने घुटे हुए रिटायर्ड नौकरशाह बैठे रहते हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सरकार की फाईलों की जानकारी को छुपाते हुए गुजारी है, और जिनकी भरसक कोशिश रहते आई है कि विधानसभा और संसद से भी जानकारी को जितना मुमकिन हो सके छुपाया जाए। ऐसे लोगों को सूचना आयोग में अपील सुनने के जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर रखने का एक मतलब यह भी होता है कि इन्हें मनोनीत करके सत्ता अपनी हिफाजत की गारंटी खरीदती है। 

और तो और इस देश की सबसे बड़ी अदालत के जज भी सूचना के अधिकार को कुचलने में अपने जूतों को भी शामिल कर लेते हैं, और जब किसी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति की जानकारी मांगी, तो जजों ने एकमुश्त उस मांग को खारिज किया। यह देश की न्यायपालिका के लिए एक शर्मनाक नौबत थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अपील पर यह फैसला दिया था कि आरटीआई के तहत जनता को सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति जानने का हक है, और जज उससे बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह फैसला हाईकोर्ट ने दिया था जिससे यह उजागर हुआ था कि अपने निजी हितों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज भी कानून की गलत व्याख्या कर रहे थे। अभी हमारे सामने इसी बरस की 15 फरवरी की एक खबर है जिससे पता लगता है कि जजों की संपत्ति जानने के लिए आरटीआई की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में 2010 से चली आ रही है, और 2016 में इसे तीन जजों की बेंच से पांच जजों की बेंच को भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज अपने आपको जनता की निगाहों से बचाने के लिए राष्ट्रीय सूचना आयोग के आदेश भी खारिज कर रहे हैं। 

जब हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कानून बनकर सामने आया, उसमें आम जनता को बहुत ही मजबूत लोकतांत्रिक अधिकार दिए, तो यह जाहिर ही था कि सत्ता पर बैठे लोग उसके खिलाफ रहते। ऐसे में एनडीए सरकार ने लोकसभा में इस कानून को कमजोर करके देश भर की अपनी सरकारों के कामकाज को भी जनता की नजरों से दूर और छुपाए रखने का इंतजाम कर लिया है। इससे लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, अगर लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है।
-सुनील कुमार

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