संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  6 अगस्त : कश्मीर पर कुछ और पहलू,  कुछ और बातें सावधानी की
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 अगस्त : कश्मीर पर कुछ और पहलू, कुछ और बातें सावधानी की
Date : 06-Aug-2019

जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के फैसले पर कल जब इसी जगह हमने लिखा, दोपहर के उस वक्त संसद में इस फैसले पर बहस चल ही रही थी। उसके बाद रात तक अलग-अलग बहुत से तबकों ने कुछ जानकारियां सामने रखीं, कुछ सोच बताई, और कश्मीर से आने वाली जमीनी खबरों ने वहां का एक सन्नाटा बयां किया। वह सन्नाटा जो पिछले दशकों में आए दिन सड़कों पर सुरक्षा बलों पर पथराव की शक्ल में सामने आता था, लेकिन कल के कश्मीर में उन पत्थरों को हाथ नहीं मिले, हाथों को किसी वर्दी का निशाना नहीं मिला, या इनमें से किसी को भी कोई हौसला नहीं मिला। इस फैसले की मुनादी के साथ वहां पर जिस बवाल की आशंका थी, उसे देखते हुए मोदी सरकार ने वहां केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बड़ी मौजूदगी पहले ही तय कर दी थी, और दो तरह के आंकड़े हवा में हैं, जिनमें से एक में कहा जा रहा है कि कश्मीर में सुरक्षा बल हर इक्कीस कश्मीरियों पर एक है, और दूसरे में कहा जा रहा है कि हर पांच कश्मीरियों पर एक बंदूकबाज सुरक्षा बल तैनात है। इनमें से जो भी बात सही हो, इस ताजा तैनाती के पहले भी, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के भी पहले, कश्मीर दुनिया में सबसे बड़ी फौजी तैनाती बनी हुई थी, जो कि पिछले पांच बरस में और बढ़ी ही है। 

फिलहाल केन्द्र सरकार के कश्मीर को विभाजित करने, केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले के खिलाफ वहां कोई पत्थर उठते नहीं दिख रहा है, और देश के अधिकतर राजनीतिक दलों के बीच इस फैसले के खिलाफ कोई बुनियादी असहमति नहीं दिख रही है। कुछ पार्टियां इसके खिलाफ हैं, लेकिन वे जनता के बीच वैसे भी हाशिए पर जा चुकी हैं, और उनकी असहमति एक लोकतांत्रिक मुद्दा जरूर है, लेकिन उसका बहुसंख्यक आबादी के वोट से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में आज कुछ बातें उठ रही हैं जिन्हें मोदी के संसदीय बाहुबल तले भी सुनने और समझने की जरूरत है। लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत नहीं होता, अल्पमत की असहमति उसका एक अविभाज्य हिस्सा होता है, और उसे ध्यान में रखते हुए आज इतिहास में दर्ज हो रहे तथ्यों और तर्कों को भी सुनना चाहिए। 

मोदी सरकार ने कल जिस फैसले की घोषणा की है, उसके पीछे जो संवैधानिक बुनियाद बताई है, उस पर देश के एक बड़े संविधानवेत्ता सोली सोराबजी का कहना है कि कश्मीर की संविधान सभा की अनुमति से ही कल का यह फैसला किया जा सकता था, उसके बिना नहीं। और अभी तो कश्मीर की विधानसभा भी अस्तित्व में नहीं है, इसलिए महज राज्यपाल की सहमति को राज्य की संविधानसभा या विधानसभा की सहमति नहीं माना जा सकता। इसके अलावा एक दूसरा तर्क कल रात की एक बहस में उभरकर यह आया है कि इसके बाद क्या केन्द्र की कोई भी सरकार धारा 356 के तहत किसी भी राज्य में विधानसभा को भंग करके, उसके बाद उस राज्य के विभाजन का फैसला महज इस बिना पर ले लेगी कि राज्यपाल ने उसके लिए सहमति दी है? क्या राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले का ऐसा बेजा इस्तेमाल करने से किसी सरकार को रोका जा सकेगा जिसके बाद उस राज्य को विभाजित करने का फैसला ले लिया जाए? और यहां तो कश्मीर को न सिर्फ विभाजित किया गया है, बल्कि उसे केन्द्र प्रशासित प्रदेश भी बना दिया गया है जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के मातहत ही काम करेगा। अगर भारत के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करके, या उनका हवाला देकर ऐसा किया जाए, तो क्या केन्द्र की कोई सरकार उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर उसकी जगह पांच केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने से रोकी जा सकेगी? कुछ वकीलों ने कल यह राय भी रखी है कि ऐसी बहुत सी संवैधानिक शर्तों की अनदेखी करके यह फैसला लिया गया है, और इसके खिलाफ जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में भी अपील की जा सकती है, और सुप्रीम कोर्ट में भी। अगर, और यह तय भी लगता है कि, इसके खिलाफ अदालत में जो तर्क दिए जाएंगे उनमें भारत में कश्मीर के शामिल होने के वक्त किए गए लिखित वायदे भी उठाए जाएंगे जिनके बारे में लोग अलग-अलग तथ्य और तर्क सामने रख रहे हैं। 

आज भारत के राजनीतिक दलों में एक बड़ा असमंजस है कि देश के इस सबसे अधिक लोकप्रिय साबित हो रहे मुद्दे का कैसे विरोध करें, किस हद तक विरोध करें, और कितना विरोध करें? अभी जब यह बात लिखी जा रही है उस वक्त लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह कांग्रेस से यह सवाल भी कर रहे हैं कि वे इस मुद्दे पर अपना रूख साफ करे। वे संसद की सर्वोच्चता की बात भी कह रहे हैं, और आज के माहौल में उनकी कही बातों से असहमति जाहिर करने वाले लोग एक बड़ा जनाधार खोने का खतरा भी रख रहे हैं। 

लेकिन आज इस मुहाने पर हम कुछ और बातों को भी उठाना चाहते हैं। अगर किसी अदालती रोकटोक के बिना कश्मीर का दर्जा केन्द्र प्रशासित प्रदेश का हो जाता है, और वहां पर आबादी और सरकार को मिले हुए विशेष अधिकार खत्म हो जाते हैं, तो वैसी नौबत में आम और गरीब कश्मीरी की जमीन-जायदाद को बाकी हिन्दुस्तान के भूमाफिया से बचाने के लिए क्या किया जा सकता है? उनकी जिंदगी भर की अकेली दौलत को बचाने के लिए क्या हो सकता है। पौन सदी से अलग नियम-कायदों से हिफाजत में रखे गए कश्मीरियों पर अब जब देश-विदेश के बाजार का एकाएक हमला होगा, तो उससे गरीब कश्मीरियों के बचाव के बारे में तुरंत फिक्र करनी चाहिए, वरना लोग वहां उनसे तरह-तरह के सौदे लिखवाकर उनका सबकुछ लूट लेंगे। 
-सुनील कुमार 

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