संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का विशेष संपादकीय, 20 अगस्त : ऐसे दानवाकार सपनों पर जनता के पैसों से अमल सचमुच लोकतांत्रिक है?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का विशेष संपादकीय, 20 अगस्त : ऐसे दानवाकार सपनों पर जनता के पैसों से अमल सचमुच लोकतांत्रिक है?
Date : 20-Aug-2019

-सुनील कुमार
सन् 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तो तीन बरस के लिए राज्य और सरकार चलाने का मौका उस वक्त के एक गैरविधायक सोनियापसंद अजीत जोगी को मिला, और उसी दौरान छत्तीसगढ़ की नई राजधानी की जगह छांटी गई, और उसकी बुनियाद रखी गई। सोनिया गांधी के हाथों रखी गई विशाल शिला इन दिनों एक विवाद की वजह भी बन गई है कि उसका रखरखाव ठीक नहीं हुआ, और वह जगह आईआईएम को दे दी गई, इसलिए एक सीनियर अफसर को अभी निलंबित भी कर दिया गया है। लेकिन वह आज की चर्चा का मुद्दा नहीं है। आज इस पर बात करने का मौका है कि जोगी सरकार के दौरान रखी गई बुनियाद पर रमन सिंह सरकार ने ऐसी राजधानी क्यों सोची और क्यों बनाई जो कि उसके कार्यकाल में किसी तर्कसंगत किनारे नहीं लग पाई? और यह कार्यकाल पांच बरस का एक निर्धारित कार्यकाल नहीं था, यह पांच के बाद अगले पांच बरस का, और उसके बाद पांच बरस के एक तीसरे कार्यकाल वाला डेढ़ दशक का कार्यकाल था जिसमें भी राजधानी न तो अपने पांवों पर खड़ी हो सकी, और न ही जिसका कोई भविष्य ही आज रह गया दिखता है। इससे परे एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि सैकड़ों बरस पुरानी राजधानी रायपुर के साथ सरकार-निर्मित नई राजधानी का कोई रिश्ता अब तक कायम नहीं हो पाया। इसके लिए पिछली सरकार के दूसरे कार्यकाल में नया रायपुर के प्रशासनिक मुखिया, और भूतपूर्व मुख्य सचिव जॉय ओमेन ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला भी की थी जिसमें दर्जन भर देशों के विशेषज्ञों ने आकर नए और पुराने शहर के बीच तालमेल की कई किस्म की योजनाएं बनाई थीं, और आज भी यह जाहिर है कि किसी किस्म की सोच या योजना इन शहरों को जोड़ नहीं पाई। पन्द्रह बरसों की कसरत के बाद भी नया रायपुर जाना पुराने रायपुर के लोगों के लिए एक बदमजा काम रहता है क्योंकि शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर बसाए गए मंत्रालय तक पहुंचने के पचास मिनट हर किसी पर भारी पड़ते हैं, और लोग इस योजना के इस पहलू के पीछे के दिमाग पर तरस खाते हुए, उसे कोसते हुए आते-जाते हैं। लेकिन इससे परे भी एक बात है कि भरी दोपहर में भी इस सफर का अधिकतर हिस्सा ऐसे मरघटी सन्नाटे वाले रास्ते से तय होता है जिसके बारे में छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है कि मरे रोवइया न मिले। फिर यह भी है कि हजारों एकड़ का यह ढांचा और उसकी सैकड़ों किलोमीटर सड़कें, दुगुने फुटपाथ उसी जनता के पैसों से बनाए गए जिस जनता की रोज दो वक्त खाने की औकात तभी हो पाई थी जब उसे एक रुपये किलो चावल मिलने लगा था। ऐसी गरीब जनता के पैसों से एक राज्य में निहायत गैरजरूरी ऐसा ढांचा एक विश्व रिकॉर्ड बनाने की नीयत से खड़ा किया गया जो कि महज नेता-अफसर-ठेकेदार का सपना होता है। यह बात इस संपादक ने रमन सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के जूरी की हैसियत से उस वक्त भी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच काफी खुलासे से रखी थी, और विकराल खर्च पर आपत्ति जाहिर की थी। इसे एक बिछा हुआ ताजमहल बताते हुए यह शक जाहिर किया था कि निकट भविष्य में इसके बसने के आसार नहीं रहेंगे। और आज उस बात के कई बरस बाद भी वही नौबत बनी हुई है।

आज इस पर चर्चा की जरूरत इसलिए है कि राज्य की नई कांगे्रस सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि इस विकराल राजधानी का क्या करे? कैसे इसे बसाए, कैसे इसका रखरखाव करे, कहां से इसके लिए पैसे लाए, और इसकी किस-किस गड़बड़ी की जांच करे। यह नौबत कुछ उस किस्म की है कि पांच बरस के लिए किराए पर लिया गया मकान छोड़कर जाते हुए किराएदार अगले किराएदार के लिए तीन बरस का एक कुत्ता छोड़ जाए जिसे पालन भी मुश्किल हो, जिसका रखरखाव भी मुश्किल हो। किसी भी सरकार को अपने कार्यकाल से इतने अधिक लंबे समय तक चलने वाली विकराल योजना को कभी भी पूरे का पूरा शुरू नहीं करना चाहिए। और छत्तीसगढ़ में तो रमन सरकार को तीन-तीन कार्यकाल मिले, जिसके बाद आज तक अगर नया रायपुर एक महंगी पहेली बना हुआ खड़ा है, तो इस योजना की ऐसी विकरालता शुरू से ही सही नहीं थी।

आज इस बात को लिखने का मौका इसलिए भी है क्योंकि आंध्रप्रदेश में पिछले मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने अमरावती नाम की जगह पर जो नई राजधानी बनाना शुरू किया था, वह चंद्राबाबू की सरकार के डूबते ही बिना पानी डूब गई है। नए मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी विपक्ष में रहते हुए भी इस राजधानी के सख्त खिलाफ थे, और नई सरकार आते ही विश्व बैंक ने इस राजधानी के लिए मंजूर कर्ज देने से हाथ खींच लिया है, और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक भी पीछे हट गया है। चंद्राबाबू के सपनों का यह उपग्रह आंध्र की छाती पर धूमकेतु की तरह आकर गिरा है। इन खबरों को देखते हुए लगता है कि पांच बरस के अपने कार्यकाल में चंद्राबाबू ने धरती की एक सबसे बड़ी राजधानी बनाने का जो महंगा सपना पाला था, उसका हक किसी एक सरकार को नहीं हो सकता। सरकारों को पांच बरस के ही सपने देखने चाहिए, तब तक जब तक कि वे किसी बांध, पुल, सड़क, बिजलीघर जैसे बुनियादी ढांचे के काम न हों। और राजधानियों जैसे सपने तो किसी सरकार को कागज पर चाहे देखना जायज हो, जमीन पर उसके उतने ही हिस्से को उतारना चाहिए जिसे कि अगली सरकार पाल सके, बढ़ा सके, या रोक भी सके। छत्तीसगढ़ का नया रायपुर इस बात की एक उम्दा मिसाल है कि किसी सरकार को कैसी-कैसी दीर्घकालीन योजना क्यों नहीं बनानी चाहिए, या कागजों पर बन भी जाए, तो भी उस पर जनता के पैसे खर्च करके ऐसा अमल नहीं करना चाहिए कि जिसे बाद में मिटाया भी न जा सके। छत्तीसगढ़ के इस नया रायपुर के और भी कई पहलुओं पर लिखने को बहुत कुछ है, और ताजा इतिहास के दस्तावेजीकरण के लिए वैसा लिखना जरूरी भी है, लेकिन इस कॉलम की सीमा इतनी ही है, और बाकी बातें फिर कभी।
 

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