संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 सितंबर : दिमाग तो एक ही है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 सितंबर : दिमाग तो एक ही है...
Date : 02-Sep-2019

बहुत पुरानी बात है, चौथाई सदी से भी पहले हिन्दुस्तान में समाचार-विचार की एक इज्जतदार साप्ताहिक पत्रिका थी, दिनमान। उसमें देश-विदेश के ताजा मुद्दों पर रिपोर्ट रहती थीं, विचार भी रहते थे, और पढ़ेलिखे-समझदार लोगों के बीच उसका चलन भी था। उसमें तीस-पैंतीस साल पहले बाजार में ताजा आए स्टीरियो म्यूजिक प्लेयर के बारे में एक रिपोर्ट छपी थी कि वह संगीत के अलग-अलग वाद्ययंत्रों की आवाज और गायक या गायिका की आवाज को अलग-अलग स्पीकरों में बांटकर किस खूबी के साथ बजाएगा-सुनाएगा। उस रिपोर्ट की सुर्खी भुलाए नहीं भूलती, संगीत को लेकर इतने किस्म की तकनीक पर हैडिंग थी- कान तो दो ही हैं। 

आज हिन्दुस्तान की हालत देखें, तो जनता को देखकर यही लगता है कि उसके कान तो दो ही हैं। चारों तरफ से जितनी भी बातें उसके कानों में पड़ रही हैं, उनमें से कौन सी बात किस बात को पछाड़कर उसके सीने पर चढ़ बैठेगी, यह अंदाज लगाना खासा मुश्किल है। और फिर यह वक्त महज रेडियो या भाषण सुनने का नहीं है, यह वक्त टीवी पर खबरें देखने का भी है जिन्हें देखते हुए सुना भी जाता है, और आंखें तो दो ही हैं, इसलिए उन आंखों से अखबारों को, अलग-अलग समाचार चैनलों को, सड़क किनारे लगे राजनीतिक इश्तहारों को, और आमसभाओं में बोलते नेताओं को देखने के लिए बस दो ही आंखें हैं। और फिर इन चारों को जोड़कर इनका देखा, और इनका सुना मिलाकर समझने के लिए दिमाग तो एक ही है। यह समझना भी कुछ बुनियादी समझ होने के बाद ही शुरू हो सकता है, वरना देखना और सुनना यह सब दिमाग में दर्ज भर हो सकता है, उसका कोई विश्लेषण जरूरी नहीं है कि दिमाग में हो ही जाए। यह भी समझने की जरूरत है कि देखे हुए और सुने हुए के विश्लेषण के लिए बुनियादी समझ के साथ-साथ कुछ मेहनत भी लगती है, इसलिए हिन्दुस्तान में आज बहुत से लोग महज सुन लेते हैं, महज देख लेते हैं, और फिर उसे सोशल मीडिया पर, अपने फोन पर आगे बढ़ा देते हैं, बिना दिमाग पर बोझ डाले। 

जो चतुर लोग हैं, वे जानते हैं कि जिस तरह लोगों का बदन किसी व्यायामशाला में कसरत की बदनतोड़ मेहनत करने के नाम से ही कतराता है, उसी तरह दिमाग भी अधिक विश्लेषण से, सही-गलत का फर्क करने से, और अगर फर्क तक पहुंच भी गए तो उस फर्क पर कुछ करने से पूरी तरह बचता और कतराता है। इसलिए चतुर लोग उस वक्त जब कुछ जमीनी और बुनियादी हकीकत को देखने, समझने, और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से कुछ करने की नौबत रहती है, तब वे आंखों और कानों के सामने बड़ा चटपटा और जायकेदार चारा परोसते रहते हैं, और सरोकारमुक्त दिमाग उसके चटकारे लेते रहता है। जब कभी कुछ जलती-सुलगती दिक्कतें खड़ी होकर अपनी तरफ ध्यान खींचने की कोशिश करती हैं, उसी पल देश में जगह-जगह कुछ लोग सोची-समझी साजिश के तहत मेहनत से तैयार की गई अनायास और अनर्गल बातें कहने लगते हैं, और समाचार चैनलों वाला मीडिया पहले उस पर टूट पड़ता है, फिर सोशल मीडिया नाम का अमूमन बेदिमाग माध्यम उस झंडे को लेकर आगे दौड़ पड़ता है, और किसी रिलेरेस की तरह मैसेंजर इस्तेमाल करने वाले लोग इन अनायास दिखती अनर्गल बातों को और आगे बढ़ा देते हैं। सूचनाओं का एक ऐसा ओवरलोड खड़ा कर दिया जाता है कि जरूरी बातें कचरे के ढेर तले दब जाती हैं, दम तोड़ देती हैं। जमीनी हकीकत और बुनियादी जरूरत की जरूरी बातें वैसे भी दिमाग पर जोर डालने वाली रहती हैं, और दिमाग भी तो आखिर इंसान का ही है, वह भी इस चक्कर में रहता है कि चौराहों पर लालबत्ती के वक्त पहुंचे भूखे-बीमार भिखारियों को देखने से बचने के लिए फोन में झांकने वाले लोगों की तरह वह भी जलती-सुलगती बातों को अनदेखा करके किसी नेता की बकवास, या अपनी देह में हुई सर्जरी को लेकर राखी सावंत जैसी किसी अभिनेत्री के बयान के वीडियो को देखे। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि आज देश में तकरीबन मुफ्त मिल रहा इंटरनेट डेटा जिंदगी के असल मुद्दों को दबा देने के लिए चकाचौंध, सनसनीखेज, और अश्लील मुद्दों का सैलाब लोगों तक पहुंचा रहा है। और जिस तरह एक वक्त दिनमान ने लिखा था कि कान तो दो ही हैं, तो आज की हकीकत यह है कि दिमाग तो एक ही है। और इस एक दिमाग को इतने गैरजरूरी अलग-अलग चीजों में उलझा दिया जाए कि वह जिंदगी की दिक्कतों को सुलझाने के बारे में सोच भी न सके। इस माहौल को साजिश की तरह कम ही लोग देख पाते हैं, लेकिन समझ और जिम्मेदारी शायद कम ही लोगों में होती है, आज वह अभिनंदन के विमान उड़ाने के नजारे को देख रहा है। 
-सुनील कुमार

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