संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 सितंबर : तू इधर-उधर की बात न कर,  ये बता कि काफिला क्यों लुटा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 सितंबर : तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...
Date : 08-Sep-2019

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा बवंडर आया हुआ है जो कि अमरीका में रिकॉर्ड किए गए कुछ वीडियो में ही अब तक देखने में आता था, जो कि अपने दायरे में आने वाली कारों तक को उड़ा ले जाता है, मकानों को तबाह कर देता है। पिछले कुछ समय से, या यूं कहें कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद से, जितने किस्म की जांच शुरू हुई है, और पहले से चल रही जांच जिस तरह आगे बढ़ी है, उसने हर कुछ दिनों में राज्य के लोगों को हक्का-बक्का कर दिया है। पिछली रमन सरकार के वक्त के कुछ ताकतवर लोगों ने सत्ता के इस्तेमाल से जो मनमाने काम किए थे उनकी शुरूआती जांच से ही गड़बडिय़ां तो सामने आ रही हैं, लेकिन गड़बड़ी करने वाले तमाम लोग दिग्गज वकीलों के साथ अदालत पहुंचकर वक्ती राहत भी पाते जा रहे हैं। खैर, जिनकी ताकत रहती है वे अदालत का काफी दूर तक ऐसा मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन जो शुरूआती जानकारी लोगों की नजरों में आ रही है, उससे सभी को यह समझ आ रहा है कि किसी को भी अपनी सत्ता अंतहीन नहीं माननी चाहिए, और सरकारी मशीनरी के पुर्जों को किसी भी वक्त अपने ऊपर के लोगों के तहत गलत काम नहीं करना चाहिए वरना आगे-पीछे कोर्ट-कचहरी और जेल तय है। 

अब कल ही अंतागढ़ में खरीदे या बेचे जाने वाले कांग्रेस विधानसभा उम्मीदवार मंतूराम पवार ने अदालत में एक हलफिया बयान दर्ज कराकर खलबली मचा दी है कि पिछली भाजपा सरकार के मंत्री-मुख्यमंत्री और जोगी पिता-पुत्र ने कुछ दलालों के साथ मिलकर उन्हें बेच डाला था, और साढ़े सात करोड़ के ऐसे सौदे में से उनके हाथ कोई रकम नहीं आई थी। पिछले बरसों में जब इस खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, तो आवाजों से प्रदेश के हर किसी को यह पक्का मालूम हो गया था कि ये कौन लोग हैं, और क्या धंधा कर रहे हैं। लेकिन अदालती तिकड़मों से हिन्दुस्तान में लंबा समय खरीदा जा सकता है, और अभी वही दौर जारी है कि इस रिकॉर्डिंग की सभी आवाजें अपने आपको बचाकर चल रही हैं, और अदालत में आवाज देने से इंकार कर रही हैं। कैसी दिलचस्प बात है कि जो लोग अपने आपको जनता की आवाज कहते हैं, जो अपने फैसलों को अंतरात्मा की आवाज कहते हैं, उनके गले से अदालती कटघरे में आवाज ही नहीं निकल रही है। आवाज का नमूना देने से बचते हुए बड़े-बड़े नेता कल के मंतूराम पवार को अदालती-बयान से एक नई परेशानी में आ गए हैं, लेकिन बड़े-बड़े वकील बड़ी-बड़ी परेशानियों को टालने या खत्म करने के लिए ही तो बड़ी-बड़ी फीस लेते हैं। 

इधर एक दूसरे मोर्चे पर जोगी पिता-पुत्र जाति प्रमाणपत्र के मामले में फंस गए हैं, और उनका आदिवासी होना फिलहाल खतरे में पड़ गया है, बल्कि रद्द हो गया है। इसके बाद पुलिस में रिपोर्ट, जेल, जमानत, अस्पताल, यही दौर चल रहा है, और यह नौबत राज्य की राजनीति के बवंडर में एक और धूल भरा अंधड़ जोड़ रही है। लोग इस बात पर भी हैरान हैं कि जोगी पिता-पुत्र की कितने अदालती मामलों से जिंदगी भर जूझने की ताकत है। राजनीति में दिलचस्पी लेने वाली मौजूदा नौजवान पीढ़ी ने तो जन्म से ही जोगी परिवार को अदालती कटघरों में ही देखा है, और ऐसे मौके पर लोगों को 2003 का वह चुनाव याद पड़ता है जब भाजपा विधायकों को तोड़कर, खरीदकर, भाजपा सरकार बनने से रोकते हुए उस वक्त के कार्यकारी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बस्तर के तत्कालीन भाजपा सांसद बलीराम कश्यप से मोलभाव किया था, और उस कथित बातचीत की रिकॉर्डिंग हाल ही में गुजरे अरूण जेटली ने रायपुर की प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह भी बस्तर के सांसद से मोलभाव की रिकॉर्डिंग थी, और अभी ताजा रिकॉर्डिंग भी बस्तर के एक नेता से मोलभाव की रिकॉर्डिंग है। 

किसी भी एक खास मामले की चर्चा किए बिना हम सैद्धांतिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि जो लोग मंच और माईक से अपनी बुलंद आवाज लोगों तक पहुंचाते हैं, जो लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दर्जन-दर्जन भर माईक के सामने दहाड़ते हैं, ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपनी आवाज का नमूना देने से पीछे नहीं हटना चाहिए, अदालत में बचने की तिकड़मों को पेशेवर मुजरिमों के इस्तेमाल के लिए छोडऩा चाहिए। छत्तीसगढ़ में आज भांडाफोड़ हो रहे, या किसी नतीजे पर पहुंच रहे अधिकतर मामले पिछली भाजपा सरकार के वक्त के हैं, और इनमें से कई मामले जोगी परिवार से जुड़े हुए हैं। अदालतों से परे भी नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। वैसे तो हर इंसान को, और हर मुजरिम को अपने बचाव के लिए कानून को तोड़-मरोड़कर अधिक से अधिक समय तक बेअसर रखने का पूरा लोकतांत्रिक हक रहता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन के नेताओं को अपने कामकाज के बारे में जनता के प्रति सीधे जवाबदेह भी रहना चाहिए, और यह रूख छोडऩा चाहिए कि जब जनता की अदालत में हारें, तो कानून की अदालत का सहारा लें, और जब कानून के कमजोर हाथ चाहे-अनचाहे उन तक पहुंच ही जाएं, तो वे जनता की अदालत का सहारा लें। लोगों में इतनी गैरत बाकी रहनी चाहिए कि वे जनता के बीच जवाब दें। आज जिस तरह की लुकाछिपी चलती है उससे किसी की लिखी यह लाईन याद पड़ती है- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। सार्वजनिक जीवन के लोगों को अदालतों से परे भी जवाबदेह रहना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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