संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 21 अक्टूबर : सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी अहमियत की सुनवाई...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 21 अक्टूबर : सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी अहमियत की सुनवाई...
Date : 21-Oct-2019

सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण तरीका संविधान पीठ होता है, और दो दिन बाद वहां इस मुद्दे पर जजों की बड़ी बेंच बैठकर विचार करेगी कि क्या बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों पर मंत्री और अफसर बयानबाजी कर सकते हैं? अदालत के सामने यह मुद्दा कुछ बरस पहले तब सामने आया था जब उत्तरप्रदेश में एक बलात्कार पर वहां के नेता आजम खां ने उसे राजनीति प्रेरित साजिश कहा था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी इस लड़की के पिता की शिकायत पर जब सुप्रीम कोर्ट ने आजम खां को कटघरे में खड़ा किया था, तो उसके पहले ही हम आजम खां का बयान आते ही यह सुझा चुके थे कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर ऐसे बयानों पर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए, और बकवासी नेताओं को सजा देनी चाहिए। बाद में आजम खां से बहुत बुरी तरह माफी मंगवाकर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें छोड़ तो दिया था, लेकिन इस मामले पर सैद्धांतिक और संवैधानिक सवालों पर विचार करना रह गया था जिसके लिए उस वक्त संविधान पीठ बनी थी, और वह अब सुनवाई शुरू करने वाली है। 

लोगों को याद होगा कि जब-जब नेता या अफसर ऐसे बयान देते हैं, हम कई बार उनके खिलाफ लिखते आए हैं। एक वक्त जब आसाराम को एक नाबालिग शिष्या के साथ बलात्कार की तोहमत का सामना करना पड़ा, तो देश में बहुत से भाजपा नेताओं ने इसे एक हिन्दू संत के खिलाफ राजनीतिक साजिश करार दिया था। उस वक्त भी हमने खुलकर ऐसे बयानों के खिलाफ लिखा था और सुझाया था कि प्रदेशों और देश के महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल अधिकार परिषद में बैठे लोग चूंकि सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से मनोनीत होते हैं, इसलिए वे ऐसे गंदे बयानों और बकवास पर भी कोई नोटिस जारी नहीं करते, तब तक जब तक कि ऐसे बयानों के पीछे कोई विपक्षी नेता न हो। यह समझने की जरूरत है कि जब सत्ता पर काबिज लोग ऐसे गंदे और हिंसक बयान देते हैं जो कि जांच भी शुरू होने के पहले फैसला देने के बराबर होते हैं, तो ऐसे बयान जांच एजेंसियों पर एक बड़ा भारी दबाव रहते हैं कि उन्हें सत्ता की मर्जी से ही जांच का नतीजा निकालना है। 

यह एक अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट बरसों बाद जाकर वही काम कर रहा है जिसके लिए हम हमेशा से उसे उकसाते आए हैं कि शिकायतकर्ता का इंतजार किए बिना सुप्रीम कोर्ट को ऐसे बयानों को खुद होकर एक जनहित याचिका दर्ज करके बकवासी नेताओं को कटघरे में खींचना चाहिए। यह एक तकलीफदेह नौबत है कि ऐसे बयान आते और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को शर्मनाक बनाते हुए आधी सदी गुजर गई है, और उसके बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट को यह सूझ रहा है कि सत्ता और राजनीतिक ताकत की ऐसी हिंसा पर काबू पाना चाहिए, और उसे शायद सजा भी देना चाहिए। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में एक ऐसी मिसाल कायम करनी चाहिए कि गैरजिम्मेदारी से बयान देने वाले, शिकायतकर्ता पर आरोप लगाने वाले, उसके चरित्र पर लांछन लगाने वाले, और जांच एजेंसियों को प्रभावित करने वाले नेताओं और अफसरों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि ये लोग जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, और ताकतवरों की हिंसा की शिकार जनता के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए उनका चरित्र भी दागदार साबित करने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए कि देश की संसद में ऐसे बकवासी लोग भरे हुए हैं जो बलात्कार की शिकार बच्चियों को भी राजनीतिक साजिश बताते हैं, जो अपने बयानों से साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश करते हैं, जो इस देश के सद्भाव के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में लगे रहते हैं। संसद के भीतर कही ऐसी बातें तो अदालत की बांहों से परे की रहती हैं, लेकिन जब-जब संसद के बाहर, विधानसभा के बाहर ऐसी गंदी और हिंसक बातें कही जाती हैं, तो उन पर कैद से कम किसी सजा का इंतजाम नहीं रहना चाहिए। ऐसा अगर होता है तो बरसों से हमारे उठाए गए मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट का समर्थन साबित होगा। देश के कमजोर तबकों को, आम लोगों को इस फैसले का इंतजार रहेगा ताकि खास लोग उनके साथ अलोकतांत्रिक हिंसा करके शान से घूमते न रहें।
-सुनील कुमार

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