संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 नवंबर : गांधी-नेहरू की जगह  सरकारी दफ्तरों में लालू, चौटाला की तस्वीरें टंगें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 नवंबर : गांधी-नेहरू की जगह सरकारी दफ्तरों में लालू, चौटाला की तस्वीरें टंगें
Date : 29-Nov-2019

बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की जेल जारी है। चारा घोटाले में उन्हें कुछ मामलों में सजा हो चुकी है, कुछ की सुनवाई जारी है, और लोग अब इन मामलों की गिनती भी भूल गए हैं, और सच कहा जाए तो लालू यादव को भी भूल गए हैं कि क्या वे अब जेल से बाहर आ भी पाएंगे? बीमारी के चलते उन्हें कभी-कभी जमानत भी मिली है, और अस्पताल में रहते हुए भी वे मोटे तौर पर खबरों से परे से हो गए हैं। उनके बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि हिन्दुस्तान में केन्द्र और राज्य सरकारें मिलाकर करीब तीस सरकारें होती होंगी, और अब स्थानीय संस्थाओं में, म्युनिसिपल और पंचायतों में, गिनें तो देश भर में कुछ हजार स्थानीय सरकारें भी हो जाएंगी। इन सबमें सत्ता पर काबिज लोगों के सामने अच्छा काम करके एक मिसाल छोड़ जाने, और भ्रष्टाचार करके सुबूत छोड़ जाने की संभावनाएं हैं, और लालू यादव एक ऐसी मिसाल हैं जिनका यह हाल देखकर बाकी देश के उन लोगों को एक नसीहत लेनी चाहिए जो कि आज भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं। 

सरकार में भ्रष्टाचार बिना सुबूत छूटे कम ही हो पाता है। लोग रिश्वत या कमीशन लेते हैं, तो उसके भी ऑडियो-वीडियो सुबूत सामने आ ही जाते हैं, सरकारी फाईलों पर भी कुछ न कुछ गड़बड़ी रह जाती है। जो लालू यादव एक वक्त बिहार के मालिक सरीखे थे, और जो इतनी ताकत रखते थे कि अपनी घरेलू पत्नी को भी पल भर में उन्होंने अपनी वारिस बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया था, जो देश में साम्प्रदायिकता-विरोधी मोर्चे के इतने बड़े नेता थे कि वामपंथियों और कांग्रेसियों समेत अधिकतर लोग उनके साथ एकजुट होते थे, जो इतने दमदार नेता थे कि उन्होंने देश भर में एक भड़काऊ और दंगाई रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी को बिहार में कदम रखते ही गिरफ्तार करवा दिया था, उस लालू यादव का आज यह हश्र क्यों हुआ है? लालू यादव का कुनबा सत्ता की अलग-अलग डालियों पर बैठा हुआ था, और आज भी बैठा हुआ है। यह ठीक से याद भी नहीं है कि उनकी पत्नी और बच्चों में से कौन बिहार में विधायक हैं, और कौन लोकसभा या राज्यसभा में हैं, लेकिन इनमें से कोई भी ऐसे नहीं हैं जो कि अनुपातहीन संपत्ति के गंभीर मुकदमे न झेल रहे हों। बिहार का बेताज बादशाह रहा यह समाजवादी नेता साम्प्रदायिकता-विरोध की अपनी कामयाबी के बावजूद आज भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में परिवार को ऐसी गहरी दलदल में छोड़कर जेल में पड़ा हुआ है कि उसकी हालत पर महज तरस आ सकता है। 

राजनीति या सरकार, या सार्वजनिक जीवन में भी जिन लोगों के हाथों में किसी किस्म की ताकत होती है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि कानून तोडऩे या मनमानी करने का सिलसिला किसी भी दिन इस तरह जेल में डाल सकता है कि वहां से निकलना मुश्किल हो। हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि वे इतने होशियार हैं कि सरकारी भ्रष्टाचार करके, या किसी का कत्ल करवाकर भी बच सकते हैं, और ऐसी कुछ मिसालें तो सामने रहती भी हैं जिनमें लोग इस तरह बचे हुए दिखते हैं, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि इन बचे लोगों के मुकाबले कई लोग सजायाफ्ता भी रहते हैं। अब लालू यादव के बेटी-दामाद के नाम की सैकड़ों करोड़ की दौलत सरकारी जांच एजेंसियां जब्त कर चुकी हैं, हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और देश के एक सबसे बड़े नेता देवीलाल के बेटे रहे, हरियाणा के पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार में कैद भुगत रहे हैं। अब ऐसे में सवाल यह है कि इंसान की अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए भी कितनी कमाई की जरूरत रहती है? और किन खतरों को उठाकर ऐसी कमाई करनी चाहिए? 

लेकिन सत्ता का नशा ऐसा रहता है कि अतिआत्मविश्वास लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगता है। नेता तो नेता, अफसरों में भी यह देखने में मिलता है, और पड़ोसी मध्यप्रदेश के एक आईएएस जोड़े के पास जिस तरह सैकड़ों करोड़ की संपत्ति मिली थी, और जिस तरह की सजा का खतरा ऐसे लोगों पर रहता है, वह भी भ्रष्ट लोगों को नजर आना चाहिए। हमारा ख्याल तो यह है कि सरकारी दफ्तरों में गांधी-नेहरू, प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री-राज्यपाल की तस्वीरें लगाने के बजाय इन दफ्तरों में लालू यादव और चौटाला जैसों की तस्वीरें लगानी चाहिए ताकि वे भ्रष्टाचार करते हुए लोगों को अगर थोड़ी सी समझदारी दे सकें तो दे दें। जिस तरह कई शहरों में पुलिस लोगों की जागरूकता के लिए एक्सीडेंट में कुचल गईं, तहस-नहस गाडिय़ां चौराहों पर सजा देती है, ठीक उसी तरह तहस-नहस जिंदगी वाले लोगों की तस्वीरें सरकारी दफ्तरों में लगाना चाहिए। जिस तरह पहाड़ी रास्तों पर घुमावदार मोड़ पर चेतावनी के नोटिस लगते हैं, उसी तरह सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों के सामने लगातार जेल के सीखचों का कोई प्रतीक चिन्ह रहना चाहिए। अभी लोगों की मेज पर तिरंगे झंडे को सजा देखा जा सकता है, उसकी जगह जेल की सलाखों का एक छोटा मॉडल रखना चाहिए, शायद उसका कुछ अधिक असर हो। 

-सुनील कुमार

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