संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 फरवरी  : राजनीति से मुजरिमों को बाहर  करने के सुप्रीम कोर्ट के  फैसले से कोई उम्मीद नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 फरवरी : राजनीति से मुजरिमों को बाहर करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई उम्मीद नहीं
Date : 13-Feb-2020

राजनीति से मुजरिमों को बाहर 
करने के सुप्रीम कोर्ट के 
फैसले से कोई उम्मीद नहीं

राजनीति के अपराधीकरण पर दायर की गई जनहित याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आज एक फैसला दिया है कि राजनीतिक दल जुर्म के इतिहास वाले उम्मीदवारों को चुनने के दो दिन के भीतर उनके बारे में आयोग को जानकारी दें, पार्टी की वेबसाईट पर इनके जुर्म की जानकारी डालें, और अखबारों में उस जानकारी को प्रकाशित भी करें। साथ ही यह भी आदेश जारी किया कि क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को वो टिकट क्यों दे रहे हैं, इसकी वजह बतानी होगी और जानकारी वेबसाइट पर देनी होगी।

फैसले के कुछ घंटे बाद तक प्रमुख समाचार वेबसाईटों पर जो जानकारी आई है वह जानकारी चुनाव आयोग की आज की व्यवस्था से बहुत अलग नहीं लग रही है। आज भी उम्मीदवारों को खुद ही नामांकन के समय अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे के साथ लिखकर देनी होती है, और ऐसी जानकारी विज्ञापन के रूप में अखबारों में छपवानी भी पड़ती है। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश में महज एक बात अब तक नई दिखी है कि पार्टी ऐसे लोगों को टिकट क्यों दे रही है उसकी जानकारी उसे देनी होगी। यह बात बहुत अमूर्त और अस्पष्ट है। जिस तरह सार्वजनिक जीवन में हर डकैत को संत बनने का एक मौका देने की बात रहती है, तो राजनीतिक दल कह सकते हैं कि उनका जुर्मों से जुड़ा रहा नेता अब प्रायश्चित करके समाजसेवा करना चाहता है। इस रेडीमेड जवाब में कुछ झूठ भी नहीं रहेगा, और इससे राजनीति के आपराधीकरण में कोई कमी भी नहीं आएगी। राजनीतिक दल या उम्मीदवार तिकड़मों और तरकीबों से लबालब रहते हैं, और ऐसा मसीहाई-फैसला उनकी सेहत पर, उनकी मोटी चमड़ी पर, उनकी बेशर्मी पर कोई फर्क नहीं डालने वाला है। 

सुप्रीम कोर्ट की नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन महज अच्छी नीयत से दिया गया फैसला अमल के लायक भी हो, यह जरूरी भी नहीं है। यह फैसला वैसा स्पीकिंग-आदेश नहीं है जिस पर अमल करवाना चुनाव आयोग या अफसरों के लिए मुमकिन हो। राजनीतिक दलों को वजह ईजाद करने से कौन रोक सकता है, और कम से कम यह आदेश तो बिल्कुल ही नहीं रोक सकता। आज का यह आदेश आने के पहले तक तो फिर भी लोगों को शायद यह लग रहा होगा कि चुनाव से, संसद और विधानसभाओं से, मुजरिमों को बाहर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई अच्छा दमदार फैसला देगा, लेकिन इस फैसले के आने के बाद वह उम्मीद भी खत्म हो गई है। जिस तरह चुनाव आयोग अपने आपको बिना दांत और नाखून का ढकोसला साबित करते रहता है, कुछ वैसा ही सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भी है जिसमें मौजूदा नियमों से परे बस एक बात नई है कि राजनीतिक दलों को अपने चहेते जुर्म-इतिहासी लोगों को टिकट देने की वजह बतानी होगी। अब यह वजह तर्कसंगत और न्यायसंगत है या नहीं, इसका फैसला हर मामले में एक नया केस बनाकर सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग बाद में पता नहीं किस तरह तय करेंगे। कुल मिलाकर यह फैसला हासिल आया शून्य किस्म का है जिससे रही-सही उम्मीदें और खत्म हो गई हैं। 

लेकिन हम जुर्म के इतिहास वाले लोगों को कानून बनाकर रोकने को भी बहुत व्यवहारिक और लोकतांत्रिक विकल्प नहीं मानते हैं। ऐसे में किसी भी नेता की चुनावी जिंदगी खत्म करने के लिए उसके खिलाफ दस किस्म के झूठे मामले खड़े किए जा सकते हैं, और संसद से, विधानसभाओं से भले लोगों को भी बाहर रखा जा सकता है। यह समझने की जरूरत है कि देश का कोई भी कानून, अदालत का कोई भी फैसला कागजों पर अच्छा हो सकता है, लेकिन साथ-साथ यह भी हो सकता है कि उस पर अमल मुमकिन न हो। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि अगर चुनाव आयोग के औने-पौने, जैसे भी हों, नियमों को अलग रख दिया जाए, सुप्रीम कोर्ट में न लड़ा जाए, तो भी राजनीतिक दलों से नौबत को सुधारने की उम्मीद बिल्कुल ही फिजूल होगी। भारतीय लोकतंत्र आज महज हार-हार की एक नौबत को झेल रहा है जिसमें राजनीतिक दलों की नैतिकता गटर की गहराईयों को चीरते हुए किसी ट्यूबवेल की तरह पाताल तक चली गई है, और उनसे किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग अपनी दूसरी दर्जनों खामियों और कमजोरियों, बेबसी और पक्षपात के अलावा भी इस कदर बेअसर है कि वह बिना दिमाग और ईमान के महज एक मशीन की तरह काम कर पा रहा है, उससे अधिक कुछ नहीं। भारतीय चुनावों से, संसद और लोकसभा से मुजरिमों को बाहर रखना तो अधिकतर राजनीतिक दलों की सोच में भी नहीं है क्योंकि कई पार्टियों के मंच से, माईक से बलात्कार में गिरफ्तार लोगों के स्वागत होते हैं, और बड़े-बड़े केन्द्रीय मंत्री उन्हें मालाएं पहनाते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह निराश करने वाला है, और इस फैसले के बाद जरा से भी सुधार की कोई उम्मीद नहीं है। 
-सुनील कुमार

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