संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 फरवरी : दिल्ली पर कल के बाद आज फिर लिखने की जरूरत आई
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 फरवरी : दिल्ली पर कल के बाद आज फिर लिखने की जरूरत आई
Date : 26-Feb-2020

दिल्ली पर कल के बाद आज फिर लिखने की जरूरत आई

दिल्ली में चल रही हिंसा को लेकर कल ही इसी जगह लिखने के बाद क्या आज फिर लिखने की जरूरत पडऩी चाहिए थी? यह सवाल किसी भी अखबार के संपादक को परेशान कर सकता है क्योंकि गंभीर विचारों को पढऩे वाले बहुत सीमित लोग होते हैं, और उन पर एक ही मुद्दे का वजन लगातार कितनी बार डाला जा सकता है? लेकिन सवाल यह है कि कल से अब तक जब लाशें और बहुत सी गिर चुकी हैं, एक से अधिक मस्जिदों को जलाया जा चुका है, जब एक-एक करके बहुत से ऐसे वीडियो सही साबित किए जा चुके हैं जिनमें दिल्ली पुलिस दंगाईयों के एक तबके के साथ मिलकर हिंसा कर रही है, नागरिकता-संशोधन विरोधियों को पीट-पीटकर जख्मी करने के बाद जमीन पर पड़े लोगों को लाठियों से पीटते हुए उनसे राष्ट्रगान गवाया जा रहा है, और पुलिस में से ही एक उसका वीडियो बना रहा है, तो फिर आज और किस मुद्दे पर लिखा जा सकता है? कुछ ईमानदार-पेशेवर समाचार वेबसाईटों के रिपोर्टरों ने अपनी आंखों देखी लिखी है कि किस तरह मस्जिद को जलाकर उस पर बजरंग बली का झंडा फहराया गया है, तो फिर क्या इस साम्प्रदायिक तनाव को अनदेखा करना जायज होगा? और क्या साम्प्रदायिकता के इस कैंसर को इस देश की देह में और बड़ी गठान बनने देना ठीक होगा? इसके साथ इस बात को भी देखने की जरूरत है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तुरंत दंगाग्रस्त इलाकों में कफ्र्यू लगाने के साथ-साथ दिल्ली में आर्मी बुलाने की मांग केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से की है, क्या 1984 के दंगों के बाद दिल्ली में पहले ऐसा कभी हुआ है? केजरीवाल ने कहा है कि पुलिस हालात नहीं सम्हाल पा रही है, और तुरंत सेना बुलाई जाए, तैनात की जाए।

दिल्ली में आज जो हिंसा चल रही है, उसमें 20 से अधिक लोगों की मौतों की बात कई लोगों ने पोस्ट की है जो कि गंभीर पत्रकार हैं, और अभी जलते इलाकों की रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ये आंकड़े कम हो सकते हैं, अधिक भी, लेकिन जितने इलाकों में जितने बड़े पैमाने पर पुलिस की मौजूदगी में दंगे हो रहे हैं, और आगजनी हो रही है, वह मामूली बात नहीं है। दिल्ली पुलिस पर राज करने वाली केन्द्र सरकार के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की कोई अपील भी अब तक सामने नहीं आई है। और दिल्ली भाजपा के नेता कपिल मिश्रा लगातार घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कह रहे हैं और ट्वीट कर रहे हैं। यह सब तब चल रहा है जब उनकी पार्टी के भीतर दिल्ली में दोफाड़ दिख रहा है कि कपिल मिश्रा को रोका जाए, या इसी तरह ढील देकर रखा जाए? यह सब तब चल रहा है जब आधी रात दिल्ली की एक अदालत को दिल्ली पुलिस को यह हुक्म देना पड़ता है कि फंसे हुए जख्मी मुस्लिमों को उनके इलाकों से अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित रास्ता मुहैया कराया जाए। इसलिए आज दिल्ली के बारे में जो कुछ लिखा जाए, कहा जाए, और समझा जाए, उसे इन तमाम जानकारियों के साथ जोडक़र ही किया जाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि किस तरह दिल्ली में सबसे अधिक साख वाले अखबारों से जुड़े अनगिनत हिन्दू रिपोर्टरों ने अपना दिल दहलाने वाला साबका लिखा है कि दंगाईयों की भीड़ ने उनके कागजात जांचे कि वे हिन्दू हैं या नहीं, इसके बाद उनके फोन से सब कुछ मिटा दिया गया, उन्हें चेतावनी दी गई, यह तक कहा गया कि हिन्दू हो इसलिए बच गए, एक महिला संवाददाता की काली बिंदी पर आपत्ति की गई कि हिन्दू हो तो सिर्फ लाल बिंदी लगानी चाहिए। कुछ संवाददाताओं ने आंखों देखा हाल लिखा है कि किस तरह पुलिस की मौजूदगी में, पुलिस के संरक्षण में लोगों ने घरों और दुकानों में आग लगाई, सुरक्षा-कैमरे तोड़े, और सलाखें लेकर हिंसा करते रहे। एक संवाददाता ने यह तक लिखा है कि दंगाईयों ने एक मुस्लिम घर पर आंसू गैस का गोला फेंका ताकि लोगों को बाहर निकाला जा सके। उसने यह सवाल भी उठाया है कि ये गोले तो सिर्फ पुलिस के पास होते हैं, और दंगाई इनका इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं? एक संवाददाता ने लिखा कि उसके गले की रूद्राक्ष माला ने उसकी जिंदगी बचाई क्योंकि दंगाईयों को इसी से भरोसा हुआ कि वह हिन्दू है। एडिटर्स गिल ऑफ इंडिया ने मीडिया पर इस तरह के साम्प्रदायिक हमले के खिलाफ तुरंत कार्रवाई के लिए कहा है, और प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया अपने हाल के बरसों के मुर्दा-रूख के मुताबिक आरामदेह दफ्तर में चैन की बंशी बजाते हुए बैठा है। कुछ भडक़ाऊ समाचार चैनल अभी भी पूरी ताकत से झूठी तस्वीरों और झूठे वीडियो के साथ गलत जानकारी दिखाते हुए हकीकत को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं जो कि कुछ घंटों के भीतर ही सत्यशोधक वेबसाईटें भांडाफोड़ भी कर रही हैं। देश की राजधानी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दो दिन के भारत प्रवास से मुक्त हुई है, और मानो इन दो दिनों तक केन्द्र सरकार को जलती दिल्ली को न देखने का एक बहाना मिला हुआ था, अब ट्रंप-वापिसी के बाद देखा जाएगा कि केन्द्र सरकार क्या करती है। इस बीच दिल्ली हिंसा और दिल्ली पुलिस के मुद्दे को लेकर इस वक्त देश के कुछ प्रमुख वकील दिल्ली हाईकोर्ट में खड़े हैं, और इस पन्ने के छपने तक हो सकता है कि अदालत का कुछ रूख सामने आए, और हो सकता है कि न भी आए, और हाईकोर्ट देश के सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक रूख पर जमा रहे कि जेएनयू-जामिया की हिंसा जब थम जाएगी, तभी अदालत उस पर सुनवाई करेगी। देश के डॉक्टर जजों के इस रूख से कुछ सीखकर जख्मी मरीजों को भगाना शुरू न कर दें कि जब जख्म भर जाएंगे तभी वे इलाज करेंगे। फिलहाल तो गुरू तेग बहादुर हॉस्पिटल के अधीक्षक ने कहा है कि वहां लाए गए लोगों में से 189 जख्मी हैं, और 20 मरे हुए हैं।

-सुनील कुमार

 

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