संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 अप्रैल : और तीन हफ्तों के लॉकडाउन के पहले और बाद की बात...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 अप्रैल : और तीन हफ्तों के लॉकडाउन के पहले और बाद की बात...
14-Apr-2020

जैसी कि उम्मीद थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर में  लॉकडाऊन और 3 हफ्तों के लिए बढ़ा दिया है। आधा दर्जन राज्य पहले से ऐसा कर चुके थे, और शायद ही कोई राज्य इसके खिलाफ थे। इसलिए मोदी के लिए यह सहूलियत की बात थी। इस अभूतपूर्व मुसीबत के वक्त उन्होंने अपने पहले लॉकडाऊन के अन्दाज़ से परे जाकर भूतपूर्व राष्ट्रपतियों, भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों, तकरीबन सभी पार्टियों के मुखियाओं से बात भी कर ली थी, मुख्यमंत्रियों से भी बात कर ली थी। राष्ट्रीय सहमति की इस कवायद के बाद मोदी ने अब देश में बंदिशों को 3 हफ्तों के लिए बढ़ा दिया है। ट्रेन और प्लेन बंद रखने की बात घोषित हो चुकी है, बाकी बंदिशें, और उनमें छूट कल तक सामने आ जायेंगी। 

जिस वक्त यह लिखा जा रहा है, उस वक्त दिल्ली में सौ-दो सौ मीडिया कर्मचारी नौकरी के बाहर कर दिए गए हैं जिनमें देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह के लोग भी हैं। कई टीवी चैनल लोगों को निकाल चुके हैं, बहुत से बड़े-बड़े मीडिया-कारोबारियों ने लोगों से खुद होकर अपने वेतन में कटौती करने को कहा है। कुछ प्रकाशनों ने छपाई बंद कर दी है, और महज इलेक्ट्रॉनिक संस्करण निकाल रहे हैं। यह तो महज मीडिया की बात है, बाकी काम-धंधों का हाल अभी तक सामने आया नहीं है। सरकार ने अपनी ओर से लोगों से अपील की है कि कोई भी उद्योग-धंधे न तो लोगों को निकालें, ना उनकी तनख्वाह रोकें, न कटौती करें। यह बात एक दार्शनिक नसीहत से अधिक कुछ नहीं है क्योंकि एम्प्लायर और एम्प्लॉयी के बीच लेन-देन कानूनी शर्तों के आधार होता है, जिसके लिए सरकार या कानून ना तो कोई सब्सिडी देते और ना ही कोई दूसरी मदद करते। देश में कोरोना का दाखिला होने के पहले से अर्थव्यवस्था का जो हाल था, उसके चलते आज नहीं तो कल ऐसा होना ही था, कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था की बर्बादी की तोहमत का घड़ा फोडऩे के लिए कोरोना का रंगबिरंगा एक सर मिल गया है। मोदी सरकार कोरोना के आने के पहले भी देश को इस कगार पर ले आई थी, अब अधिक दिन नहीं हैं कि  बेकारी-मौतें कोरोना-मौतों से आगे निकलने लगेंगी। 

वक्त बहुत ही खराब है। हम इसी जगह पर लगातार लिख रहे हैं कि लोगों को कितनी बुरी हालत के लिए तैयार रहना चाहिए। अब हर दिन बर्बादी की नई और दहलाने वाली कहानियां लेकर आने वाले हैं। दो दिन पहले बिहार की सड़कों पर बीमार बच्चे को लेकर दौड़ती एक गरीब माँ की तस्वीर हमने छापी थी, जिसे न एम्बुलेंस मिल पाई, ना इलाज मिल पाया और वह बच्चा/बच्ची चल बसा/बसी। तकरीबन वही हाल अधिकतर लोगों का होने वाला है, काम के लिए, रोटी के लिए, दवा और इलाज के लिए। मजदूरी, नौकरियां, और कारोबार, सब कुछ तेजी से ख़त्म होने जा रहे हैं, और फिलहाल तो मोदी की भावनात्मक अपील के अलावा देश की जनता को देश की सरकार से कुछ मिला नहीं है। जनधन खातों में आए कुछ रुपयों से अगले तीन हफ्ते भी जिंदगी चल जाये तो बहुत है। देश को अब कोरोना से बचने की सावधानी, और जिंदा रह जाने की हालत में आगे जिंदा रहने की तरकीबें सोचनी चाहिए। 

आजाद हिंदुस्तान अपना सबसे खराब वक्त शुरू कर रहा है। कोरोना के बाद के दौर के बारे में समझने की जरूरत है। इस जानलेवा बीमारी और उसके बाद लोगों को जिंदा रखने की जिम्मेदारी देश-प्रदेश की हर सरकार की अगले पांच बरस की चुनौती है। सरकारों, पार्टियों, और नेताओं सबके लिए। सबसे अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए, जिन्होंने अब तक कोरोना का इस्तेमाल अपनी शोहरत और अपने असर को परखने के लिए कर लिया है। अमरीकी राष्ट्रपति ने तो बेवकूफी में मीडिया के सामने कोरोना मौतों और लाशों के ढेर के बीच अपनी लोकप्रियता बढऩे, अपनी रेटिंग बढऩे की बात कहकर अपने देश को अपने लिए आलोचना का सामान दे दिया। लेकिन मोदी ने समझदारी से कोरोना-संकट की सारी जिम्मेदारी को देश के हर नागरिक के हिस्से बाँट दिया है। उन्होंने इस जिम्मेदारी तो राष्ट्रीय एकता, रौशनी लेकर अँधेरे से लड़ते 130 करोड़ हिन्दुस्तानियों की एकता, किस्म की देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बातों से जोड़ दिया है। उनकी यह गजब की क्षमता है कि वे किसी भी मुसीबत की जिम्मेदारी ढोने के लिए देश की अधिकतर जनता को, और अपने प्रशंसकों को प्रचार के लिए तैयार कर लेते हैं। अगले तीन हफ्ते गुजरते हुए सोशल मीडिया पर अतिसक्रिय उनके समर्थक इसे एटीएम के सामने की कतार जैसी जरूरी देशभक्ति बताने लगेंगे। 

फिलहाल मोदी, और राज्यों की सरकारों के साथ हमारी हमदर्दी है कि उनके सामने यह विकराल चुनौती है, और हम भी हर दिन इसी पर लिखकर अपनी सोच भी सामने रखते चलेंगे। इन सभी को अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा काम करना है, तभी हिंदुस्तानी जिंदा रह पायेगा। हिन्दुस्तान नाम का धरती का हिस्सा तो बिना हिन्दुस्तानियों के भी नक्शे  पर दर्ज रहेगा, लेकिन हिन्दुस्तानियों को भी उस पर बनाये रखने के लिए सबको मेहनत करनी है। 

-सुनील कुमार

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