संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  23 अप्रैल : लोगों के 3, सरकारों के  6 महीने पूरे बर्बाद हुए...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 23 अप्रैल : लोगों के 3, सरकारों के 6 महीने पूरे बर्बाद हुए...
23-Apr-2020

लोगों के 3, सरकारों के 
6 महीने पूरे बर्बाद हुए... 

भारत सरकार ने तय किया है कि उसके कर्मचारियों, अधिकारियों को बढ़ा हुआ मंहगाई भत्ता अगले एक बरस नहीं दिया जायेगा। इससे एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों-अधिकारियों को नुकसान होगा, और सरकार को 37 हजार करोड़ से अधिक की बचत। इस कड़े फैसले का असर राज्यों में भी होगा जिनकी कमाई गड्ढे में जा चुकी है और चुनौतियां आसमान जितनी ऊंची हो गई हैं। राज्य सरकारें भी ऐसे में भत्ते देने में कटौती करेंगी। ऐसे में सरकारों को न सिर्फ इस बरस के लिए, बल्कि अगले कम से कम 5 बरस के लिए कमर कस लेनी चाहिए। केंद्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाएं, सभी की जिंदगी बदल जाएगी। आज देश और दुनिया पर जितनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है, उसे देखते हुए बहुत ही कड़े फैसलों का वक्त आया है, जो आज दिल कड़ा नहीं कर पाएंगे, वे कल मिट ही जायेंगे। देश के कई कारोबारों ने अपने लोगों की तनख्वाहों को कंपनी की कमाई से जोड़ दिया है, और वे लोग एक किस्म से कारोबार के नफे-नुकसान में भागीदार बनकर काम कर रहे हैं। पहले सुनाई पड़ता था कि कौन से बड़े फिल्मी सितारे फिल्म निर्माता से कमाई में हिस्से की शक्ल में मेहनताना लेते थे, अब अखबारों के कर्मचारी भी ऐसा कर रहे हैं। सवाल यह है कि कंपनी की ही कमाई नहीं रह जाएगी, तो कर्मचारी क्या पाएंगे, कहाँ से पाएंगे?

पिछले दिनों में हमने कई बार इस बात को इस जगह पर लिखा है कि कारोबारी-मैनेजर अब कर्मचारियों को यह देखकर ही काम पर जारी रखेंगे कि उनके बिना धंधे का काम क्या बिल्कुल ही बंद हो जायेगा? बहुत से बड़े धंधों से लोगों को निकाला गया है, लेकिन वह खबर इसलिए बनी क्योंकि वे धंधे अभी लॉकडाउन के दौरान भी चल रहे थे। टीवी और अखबार से निकाले लोगों की बातों की पहुंच भी अधिक थी इसलिए भी हम तक भी तैरती हुई बात जल्द पहुँच गई। लेकिन देश के 90 फीसदी कारोबार तो अभी बंद ही हैं, उनके शुरू होने पर पता चलेगा कि किसमें किस कर्मचारी की जगह है, ओर किसमें मालिक की जगह बची हुई है। लॉकडाउन पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद पता लगेगा कि क्या बचा है, और क्या कोरोना के साथ ही चल बसा है। 

लोगों को याद होगा कि नोटबंदी के साथ शुरू हुई बर्बादी जीएसटी के शुरू होने के साथ तेज होती गई थी, और कोरोना के आने के पहले ही हिन्दुस्तानी बाजार कराह रहा था। काम-धंधों का बुरा हाल था। और कोरोना की मार तो ऐसी बुरी हुई है कि लोगों की निजी, और छोटे कारोबारियों की 3 महीने की पूरी देनदारी खत्म कर दी जाये, तो ही वे पैरों पर खड़े हो सकेंगे। मजदूरों का सवाल है, तो उनके 3 महीने तो तबाह दिख ही रहे हैं, उनकी बकाया मजदूरी देनेवाले अपने कारोबार में पता नहीं दुबारा नजर आएंगे भी या नहीं। सरकारों के सामने दिक्कत यह है कि उसके खर्च तो बंधे हुए हैं, जिनमें कोरोना से लडऩे के लिए तो कुछ था ही नहीं, किसी राज्य के पास अपने लोगों को जि़ंदा रखने से अधिक के लायक कुछ नहीं रहेगा। केंद्र और राज्यों को नए कर्ज जुटाने होंगे ताकि वे लोगों को तनख्वाह दे सकें, और मजदूरों को रोजी का काम दे सकें। ऐसा लग रहा है कि कोरोना देश-प्रदेश के आधे सालाना-बजट को बर्बाद करके जायेगा, कमाई बंद, और अभूतपूर्व खर्च जारी। 

लोगों को याद होगा कि हम सरकारों के लिए यह लिखते आये हैं कि सरकारों को विपदा के लिए, बुरे वक्त के लिए तैयार रहना चाहिए।न देश, न प्रदेश की सरकारों ने ऐसे किसी वक्त के लिए कुछ सोचा था। फिर आज के हालात बताते हैं कि ये मेडिकल बंदिशें और साल-छह महीने चल सकती हैं। उसका खर्च अभी आना बाकी ही है। ऐसे में सरकारों को अगले 5 बरस के लिए अपनी इमारतों का रंग-रोगन बंद कर देना चाहिए, सारी साज-सज्जा, सौंदर्यीकरण को बंद कर देना चाहिए। नई इमारतें रोक देनी चाहिए, खासकर दिल्ली में संसद के इर्द-गिर्द के इलाके के लिए अभी मंजूर किये गए 20 हजार करोड़ रूपये तो तुरंत ही रद्द कर देने चाहिए। राज्य सरकारों को तो चाहिए कि ऐसे आर्थिक संकट के अधिक जानकार कुछ विशेषज्ञों से सलाह लेकर अगले कुछ साल तय करें। बाकी फिर।
-सुनील कुमार

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