संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : किसानों से भूपेश का वादा पूरा, राजीव न्याय योजना..
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : किसानों से भूपेश का वादा पूरा, राजीव न्याय योजना..
21-May-2020

किसानों से भूपेश का वादा
पूरा, राजीव न्याय योजना..

भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शहादत के दिन छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों से विधानसभा चुनाव में किए अपने वायदे का आखिरी हिस्सा आज न्याय योजना के नाम से पूरा किया। लोगों को प्रधानमंत्री बनने के पहले की राजीव गांधी की छत्तीसगढ़ यात्राएं भी याद हैं। वे इंडियन एयरलाईंस के पायलट की हैसियत से कई बार उड़ान लेकर रायपुर आते थे, और उन्हें लोग इंदिरा गांधी के बेटे की तरह जानते थे। बाद में वे इंदिरा गांधी के रहते हुए ही कांग्रेस की राजनीति में आए और मजदूर दिवस पर भिलाई में उनका एक कार्यक्रम हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव और सोनिया अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट पहुंचे थे। आतंकी हमले में वे वक्त के पहले चले गए, और यह दिन भारत में आतंक के खिलाफ शपथ लेने का दिन माना जाता है। इस मौके पर आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने किसानों के साथ अपने वायदे का यह आखिरी हिस्सा पूरा किया है। विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने किसानों से 25 सौ रूपए क्विंटल पर धान लेने का वायदा किया था, जो कि सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार की आपत्ति की वजह से पूरा नहीं हो पाया था। धान को समर्थन मूल्य से अधिक पर खरीदने पर केन्द्र ने आपत्ति की थी, और यही वजह है कि सरकार अपनी एक दूसरी जेब से निकालकर बकाया पैसा किसानों को दे रही है। इसे राजीव गांधी किसान न्याय योजना नाम दिया गया है, और इसमें धान के बकाया भुगतान से परे भी कई पहलू जोड़े गए हैं। 

धान खरीदी के वक्त का बकाया 57 सौ करोड़ रूपया चार किस्तों में किसानों को मिलेगा, और आज पहली किस्त उनके खातों में चली गई। लेकिन धान के साथ-साथ मक्का और गन्ना के किसानों को भी इस योजना के फायदे में जोड़ा गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 लाख किसानों को इस योजना का फायदा मिलेगा। लोगों को याद होगा कि देश में जब आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने न्याय योजना नाम से गरीबों को सीधे फायदा देने की एक घोषणा की थी, लेकिन वह सरकार में नहीं आ पाई और योजना धरी रह गई। बाद में यह बात सामने आई कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के सुझाव पर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देश के पांच करोड़ परिवारों को 72 हजार रूपए सालाना की न्यूनतम आय सहायता देने का वादा किया था। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उसी योजना के नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ के गरीब किसानों की मदद करना तय किया है। कहने के लिए छत्तीसगढ़ के किसानों में कुछ फीसदी बड़े किसान भी हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर किसान छोटे हैं, और बहुत से तो ऐसे हैं जो दूसरे किसानों की जमीन लेकर उस पर आधी फसल के सौदे से खेती करते हैं। ऐसे अधिया-किसानों को सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि जमीनों के कागज उनके नाम पर नहीं रहते, और फसल के भुगतान से लेकर इस न्याय योजना की रकम तक सीधे भूस्वामी के खाते में पहुंचती है। पता नहीं सरकार की किसी योजना में ऐसे लोगों की जगह बन पाती है या नहीं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ की किसानी में लगे हुए तमाम लोगों की मदद अगर करनी है, तो यह भी समझना होगा कि खेतिहर मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो कि सरकार की किसी भी योजना के दायरे में नहीं आती है, और फायदों से अछूती रह जाती है। आज जब पूरा देश प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को पहली बार इस तरह देख रहा है तो यह भी समझने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के बाहर लाखों मजदूर जाते क्यों हैं? अगर यहीं पर उन्हें सरकारी कामों में पर्याप्त मजदूरी मिल जाती, या किसानी के काम से मजदूरी ठीक मिलती तो शायद ये लोग बाहर नहीं गए होते। खेती के कुछ जानकारों का यह मानना है कि नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ 2003 में जो समर्थन मूल्य दे रहा था, वह अब बढ़कर दोगुने के करीब हो गया है, लेकिन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी उस अनुपात में बिल्कुल नहीं बढ़ी है। चूंकि यह तबका असंगठित हैं, बिखरा हुआ है, इसके कुछ कामों को करने के लिए अब बड़ी-बड़ी मशीनों की शक्ल में विकल्प हैं, इसलिए इसकी जरूरतों को अधिक देखा नहीं जाता है। खेती से जुड़ी हुई कोई भी न्याय योजना खेतिहर मजदूरों के भले के बिना पूरी नहीं हो सकती, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी बिना अधिक जानकारी के इतना कहा जरूर है कि इसमें खेतिहर मजदूरों को जोड़ा जाएगा। 

छत्तीसगढ़ के किसान ही इस राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाते हैं। इनकी खेती को सिर्फ अधिक दाम पर खरीदना काफी नहीं है। उनकी खेती में ऐसे फेरबदल की कोशिश भी करनी चाहिए जिससे कि वह सरकारों की नीतियां बदलने पर भी अपने आपमें जिंदा रहने लायक हो सकें। हमने कुछ दिन पहले भी यहीं पर लिखा था कि बाहर से लौटकर आ रहे मजदूरों में से कुछ जरूर ऐसे होंगे जो कि अब वापिस जाना नहीं चाहेंगे। ये बाहर के अनुभव पाकर भी लौटे हैं, और इनका किसी हुनर का ज्ञान भी है। ऐसे में गांवों के लायक कुटीर उद्योग या फसलों के इस्तेमाल वाले छोटे उद्योग बढ़ाने चाहिए ताकि लोग बेबसी में प्रदेश के बाहर न जाएं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ सरकारी रियायत-मदद की मोहताज न हो। फिलहाल भूपेश सरकार के इस फैसले से किसानों को सही समय पर एक मदद मिल रही है, और फसल के इस मौसम में वह उत्पादक काम आ सकती है। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

अन्य खबरें

Comments