संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सिर्फ भ्रष्टाचार पर क्यों, निकम्मेपन पर भी जानी चाहिए सरकारी नौकरी..
02-Sep-2020 6:37 PM 10
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सिर्फ भ्रष्टाचार पर क्यों, निकम्मेपन पर भी जानी चाहिए सरकारी नौकरी..

केन्द्र सरकार ने अपने कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए मौजूदा नियमों के हवाले से ही एक बार यह साफ किया है कि उन्हें 30 बरस की नौकरी या 50-55 बरस की उम्र पूरी हो जाने पर कभी भी नौकरी से अलग किया जा सकता है। सरकार ने कहा कि अब तक चले आ रहे नियमों में ही इसका स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन अगर किसी बात को लेकर लोगों को गलतफहमी होती है, तो उसे दूर करने के लिए यह बात साफ की जा रही है। सरकार का कहना है कि जनहित में केन्द्रीय कर्मचारियों को समय से पहले रिटायर किया जा सकता है। यह खुलासा ऐसी खबरों के बीच आया है कि केन्द्र सरकार ने 50 बरस से अधिक के अपने सभी कर्मचारियों का रजिस्टर तैयार करने कहा है कि अगर उनका काम संतोषजनक नहीं पाया जाता है तो उन्हें समय से पहले रिटायर किया जा सके। 

यह बात कर्मचारी संगठनों या अधिकारियों की एसोसिएशन को खराब लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि इस देश में केन्द्र सरकार, और राज्य सरकारों के अधिकारी-कर्मचारी एक बार अगर सरकारी नौकरी में आज जाते हैं, तो उसके बाद उन्हें इस नौकरी की सुरक्षा बड़ी तेजी से निकम्मा बना देती है। बहुत से लोग तो हैरानी की हद तक निकम्मा हो जाते हैं, और आम मेहनतकश लोग जब सरकारी दफ्तरों में जाते हैं, तो उन्हें यह भी लगता है कि वे लोग दिन भर ठीक से काम किए बिना रात को किस तरह तसल्ली के साथ सो सकते होंगे? जिस तरह पड़े हुए लोहे पर तेजी से जंग पकड़ लेता है, उसी तरह सरकारी विभागों में लोगों के तन-मन पर जंग लगा दिखता है। 

जैसा कि केन्द्र सरकार ने कहा है, यह व्यवस्था पहले से है कि 30 साल की नौकरी, या 50-55 बरस की उम्र हो जाने पर काम अच्छा न रहने पर किसी की नौकरी खत्म की जा सकती है। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसा होता नहीं है। अपवाद के रूप में इक्का-दुक्का लोगों की नौकरी खत्म भी की जाती है, तो वह भयानक भ्रष्टाचार के भयानक मामले उनके खिलाफ इक_ा हो जाने पर की जाने वाली कार्रवाई रहती है। निकम्मेपन से किसी की नौकरी गई हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। 

लेकिन जैसा कि निजी कारोबार और निजी दफ्तरों में होता है, लोगों का काम अच्छा न रहने पर या तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है, या फिर ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं कि ऐसे लोग नौकरी छोड़ दें। ऐसा कई बार कर्मचारियों के शोषण के लिए भी किया जाता है, लेकिन निजी संस्थानों में निकम्मेपन के एक इलाज के रूप में भी इसे इस्तेमाल करते हैं। हम मजदूर कानूनों की आड़ में निकम्मेपन को बढ़ावा देने के खिलाफ हैं, फिर चाहे कर्मचारी संघ ही उसे क्यों न कर रहे हों। हिन्दुस्तान वैसे भी काम की संस्कृति के मामले में दुनिया के तमाम विकसित देशों से कोसों पीछे है। इसके बाद देश-प्रदेश की सरकारों का हाल इतना खराब रहता है कि सरकारी-काम शब्द किसी गाली की तरह हो गए हैं। सरकार तो सरकार, सरकार के जो सार्वजनिक उपक्रम हैं, उनका भी हाल बहुत खराब रहता है, और स्टेट बैंक जैसे देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक में लोगों के काम न करने को लेकर अनगिनत लतीफे और कार्टून चलते ही रहते हैं। ऐसे कर्मचारी न सिर्फ जनता के पैसों से मिलने वाली तनख्वाह बर्बाद करते हैं, बल्कि अपनी नालायकी, निकम्मेपन, और अपने भ्रष्टाचार से देश के आगे बढऩे की संभावनाओं को भी खत्म करते हैं। एक कल्पना करें कि किसी कार में लंबा सफर करना है, और उसके हर चक्के हर दिन ग्रीस मांगने लगें, उसकी स्टेयरिंग कुछ पाए बिना घूमने से इंकार कर दे, एक्सीलरेटर बिना हाथ गर्म किए दबने से इंकार कर दे, हॉर्न बजने के लिए बख्शीश मांगने लगे, तो वह गाड़ी कितना सफर कर पाएगी? हिन्दुस्तान में सरकारी ढांचा इस कार सरीखा ही है जिसके हर पुर्जे, हर हिस्से कुछ न कुछ उम्मीद करत हैं। 

केन्द्र सरकार को यह तय कर लेना चाहिए कि 30 बरस पूरे होने पर, या 50 बरस की उम्र, जो भी जल्दी आए, उस वक्त अपने एक चौथाई अमले से छुटकारा पा ले। इस वक्त तक लोग इतनी तनख्वाह पा चुके रहते हैं, पेंशन के हकदार हो चुके रहते हैं कि उनकी जगह नए लोगों को नियुक्त करके उन्हें नीचे से ऊपर लाना शुरू करना चाहिए। इसके बाद 55 बरस की उम्र होने पर एक बार फिर नालायक लोगों को नौकरी से निकालना चाहिए। यह कुछ उसी किस्म का होगा जैसा कि किसी फूलदार पौधे की कटिंग की जाती है, उसकी डालें छांटी जाती हैं, तब वह पौधा पनप पाता है। नौकरी से हटाने का यह सिलसिला अमानवीय लग सकता है, लेकिन जनता के पैसों पर मिली नौकरी को जागीर की तरह हमेशा की दौलत मानकर चलने वालों के हाथ-पांव इससे हिलने लगेंगे। 

राज्य सरकारों और म्युनिसिपलों को भी यह काम करना चाहिए, इससे सरकारी अमले में काम का उत्साह बने रहेगा। जब ऊपर के लोग छंटेंगे, तो नीचे के लोगों को समय से पहले प्रमोशन भी मिल सकेगा। सरकारी नौकरी की निश्चिंतता खत्म होनी चाहिए, उसे सुधार का मौका तो देना चाहिए, लेकिन उससे अधिक देना देश की जनता के साथ अन्याय होगा। अब यह बात रह जाती है कि सरकार के हाथ अगर लोगों को निकालना रहेगा, तो अपने को नापसंद लोगों को वह निकालती जाएगी। इस काम के लिए केन्द्र और राज्य के लोक सेवा आयोगों को जिम्मा देना चाहिए जो कि नौकरी देने वाले संगठन भी हैं। ये संस्थाएं संवैधानिक अधिकारों के साथ सरकारों के बाहर भी कुछ स्वायत्तता से तो काम करती हैं, उन्हें इस छंटनी का अधिकार देना चाहिए। इस देश को एक बेहतर सरकारी ढांचे की जरूरत है, और सरकारी नौकरी की निहायत गैरजरूरी असीमित सुरक्षा सबके बदन पर तेजी से स्थायी चर्बी चढ़ा देती है। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। नौकरी से निकालने के लिए महज भ्रष्टाचार के मामलों का इंतजार नहीं करना चाहिए, नालायकी को भी पैमाना मानना चाहिए।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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