संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हंस का किस्सा सही मानें, और मोती चुनना सीखें...
05-Dec-2020 4:42 PM 121
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हंस का किस्सा सही मानें,  और मोती चुनना सीखें...

हिन्दुस्तान में जो लोग मीडिया पर अपना खासा समय लगाते हैं, वे उसमें से खासा समय गंवाते भी हैं। ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर पहली खबर से लेकर अखबारों के गंभीरता ओढ़े हुए संपादकीय पेज तक दर्शक और पाठक को जो हासिल होता है, वह वक्त के अनुपात में खासा कम होता है। टीवी के घंटे भर के समाचार-बुलेटिन में जितनी जानकारी रहती है उसे अखबार के पन्ने पर पांच मिनट में पढ़ा जा सकता है, और वह भी अगर काम का न रहे, तो एक खबर से दूसरी खबर पर मेंढक की तरह कूदा जा सकता है, जो कि टीवी पर किसी एक चैनल में मुमकिन नहीं रहता क्योंकि वहां खबरें रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह कतार में लगी रहती हैं। यह जरूर होता है कि एक चैनल से दूसरे चैनल पर कूदा जा सकता है, लेकिन फिर भी मनचाही खबर तक नहीं पहुंचा जा सकता। डिजिटल मीडिया ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यह दिक्कत भी दूर कर दी है, और लोग इंटरनेट पर सीधे अपने मतलब की बात तक पहुंच सकते हैं।

अब सवाल यह है कि अखबारनवीसी का गंभीर हिस्सा जो गिने-चुने लोग गंभीरता से लेते हैं, गंभीरता से पढ़ते हैं, वे बहुत सा गैरजरूरी पाते हैं। हमारे इस अखबार के इस कॉलम सहित, जिसे कि हम बहुत गंभीरता से लेते हैं, तमाम विचार-लेखन अमूमन अलाल किस्म के दिमाग लिखते हैं। दुनिया में मुद्दे रोज नए नहीं रहते, उनमें से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो पहले सामने आ चुके किसी मुद्दे की तरह के रहते हैं। नतीजा यह रहता है कि समकालीन और सामयिक मुद्दों पर विचार लिखने वाले लोगों को घटनाएं नई होने के बावजूद मिलते-जुलते मुद्दों पर ही लिखना होता है, जो पहले लिखा जा चुका है उसमें किसी ताजा घटना का जिक्र करके पूरे का पूरा बाकी हिस्सा फिर से दिया जा सकता है। नतीजा यह होता है कि लिखने वाले लोग अलाल होने लगते हैं। लेकिन इससे भी परे एक और दिलचस्प बात होती है। लोग अपने कुछ पसंदीदा निशाने बना लेते हैं, और वक्त-बेवक्त उन पर लिखते रहते हैं। इससे एक बड़ी सहूलियत यह होती है कि नई जानकारी कम पढऩी होती है, नया विश्लेषण बहुत कम करना पड़ता है, और नए तर्क तो गढऩे ही नहीं पड़ते क्योंकि बार-बार उन्हीं मुद्दों पर लिखते हुए दिमाग की ताजा याददाश्त में उनसे जुड़े जुमले बैठ जाते हैं। खुद का लिखा हुआ तुरंत याद आ जाता है, पुराना विश्लेषण, पुराने तर्क, पुराने जुमले, और इनके इस्तेमाल से एक बार फिर लिख देना। यह कुछ उसी किस्म का आत्मविश्वास देने वाला काम रहता है जैसा कि पहले से पढ़े हुए पसंदीदा उपन्यास को दुबारा पढ़ लेना जिससे कि कोई निराशा होने का खतरा न हो।

इन बातों को नतीजा यह निकलता है कि न सिर्फ विचार-लेखन, बल्कि समाचार-लेखन में लगे हुए लोग भी हर बरस-दो बरस में अपनी ही किसी पुरानी रिपोर्ट को ताजा आंकड़ों के साथ अपडेट करके नई रिपोर्ट बना लेते हैं, और दिमाग को अधिक कसरत करने से बचाते हैं। कम लोग ऐसे होते हैं जो कि नए-नए विषय सोचते हैं, नए-नए मुद्दों पर नए तर्क सोचते हैं, और एक ताजा विश्लेषण करके लिखते हैं। आमतौर पर तो यह होता है कि लिखने वाले लोग अपने विषय से जुड़े हुए दूसरों के लिखे हुए को भी बहुत कम पढ़ते हैं। क्योंकि दूसरों का लिखा हुआ पढऩे से अपने पूर्वस्थापित और जमे हुए तर्कों का फौलादी ढांचा चरमराने लगता है, लोगों को यह लगता है कि दूसरों के लिखे तर्क, उनके विचार एक चुनौती दे रहे हैं, और फिर अपना अब तक का सोचा हुआ तो अधिक काम का रह नहीं जा रहा, अपने पुराने और पसंदीदा जुमले काम नहीं आ रहे। यह सिलसिला अपनी मान्यताओं और अपने जुमलों को झकझोरने वाला रहता है, यह जिम में जाकर चर्बी को चुनौती देने वाली कसरतों सरीखा रहता है, लोग उसके बजाय अपने दीवानखाने में आरामदेह सोफा पर लदे, पसंदीदा खाते हुए ऐसा पसंदीदा टीवी चैनल देखते हैं जो कि दिल-दिमाग को कोई चुनौती नहीं देता, उस पर कोई बोझ नहीं बनता।

अब अलाल लोगों के लिखे गए समाचार-विचार देखने, सुनने, और पढऩे वालों को कितना झकझोर सकते हैं? और एक सवाल यह भी उठता है कि लोग क्या सचमुच झकझोरा जाना पसंद भी करते हैं? या फिर अपनी पसंदीदा यथास्थिति की ठंडी छांह में लेटना बेहतर समझते हैं? अब वक्त छपे अखबार के एकाधिकार से आगे बढ़ गया है जिसे पढऩे वाले लोगों का अंदाज मुश्किल रहता था, और फिर पढऩे वालों में भी उस अखबार के किस समाचार या किस विचार को कितने लोग पढ़ रहे हैं, इसका अंदाज नहीं लगता था। अखबारों की बिक्री के आंकड़े, किसी अखबार की एकप्रति को पढऩे वाले लोगों की औसत गिनती के तमाम आंकड़े फर्जी रहते आए हैं, और यह फर्जीवाड़ा प्रिंट मीडिया का एक बड़ा कारोबार था, और है। दूसरी तरफ हाल के महीनों में हिन्दुस्तान के सबसे अधिक बड़बोले और बकवासी टीवी समाचार-चैनल ने दर्शकसंख्या का टीआरपी जुटाने के लिए जिस तरह का फर्जीवाड़ा किया था, वह अभी पुलिस की जांच और गिरफ्तारी के साथ आगे बढ़ रहा है। कमोबेश ऐसा ही हाल इंटरनेट पर डिजिटल मीडिया में फर्जी हिट्स और फर्जी लाईक्स के सहारे चल रहा है, और हकीकत में किसके कितने दर्शक हैं, किसके कितने पाठक हैं, यह खरीदे गए झूठ पर उसी तरह टिका है जिस तरह किसी चुनाव में वोटरों को दारू और नगदी देकर उनसे बहुमत पाने का मामला रहता है।

जिस तरह दुनिया में एक पुरानी पहेली चली आ रही है कि पहले मुर्गी आई, या पहले अंडा आया? कुछ उसी किस्म का मामला मीडिया के दर्शक-पाठक का भी है कि मीडिया ने उसके टेस्ट को पहले बिगाड़ा, या उसने मीडिया को मजबूर किया कि वह अधिक सनसनीखेज, अधिक गैरजिम्मेदार समाचार-विचार परोसे? लेकिन नतीजा यह है कि आज मीडिया के पूरे हिन्दुस्तानी कारोबार में गंभीर और ईमानदार समाचार-विचार का बाजार खत्म सा हो चला है। जो गंभीर और ईमानदार हैं वे भूखे हैं, और इस धंधे से तकरीबन बाहर हैं। जो देह परोस सकते हैं, जो सनसनी परोस सकते हैं, जो ईमानदारी छोडक़र बेईमानी और बदनीयत से किसी कोलड्रिंक की बोतल की तरह झागदार सनसनी पेश कर सकते हैं, वही जिंदा हैं, और उनमें से जो इस काम में अव्वल हैं, वे कामयाब हैं।

अनंतकाल से चली आ रही पहली मुर्गी या पहले अंडे वाली बहस धरती के रहने तक चल सकती है, और इसी तरह मीडिया की गैरजिम्मेदारी या पाठक की गैरजिम्मेदारी की बहस भी। आज का यह लिखना उन लोगों के लिए है जो मीडिया को गंभीरता से लेते हैं। उन लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपना जितना वक्त जिन लोगों के लिखे, और कहे पर लगाते हैं, वे कितने ईमानदार हैं, या कितने जुमलेबाज हैं। लोगों को अगर सचमुच ही अपने वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना है, तो उन्हें एक प्रचलित मुहावरे की तरह का हॅंस बनना पड़ेगा जो कि मोती-मोती चुनकर खा लेता है। हालांकि हकीकत यह है कि हॅंस और मोती का शायद कोई रिश्ता नहीं होता, लेकिन लिखने वाले लोगों को एक बात साबित करने के लिए यह जुमला आसान पड़ता है और सुहाता है, इसलिए यह किस्सा भी कामयाब हो गया है। फिलहाल लोगों को अगर अपनी जिंदगी में कामयाब होना है तो उन्हें जुमलों से परे बेहतर पढऩा चाहिए, बेहतर देखना और सुनना चाहिए। जिंदगी में रोजाना का बाकी वक्त तो बहुत से रोज के कामों में लगता ही है जिनमें कोई फर्क नहीं किया जा सकता, बस मीडिया को देखना, सुनना, और पढऩा ही ऐसा है जिसमें पसंद काम कर सकती है। हॅंस के किस्से को सही मानें, और मोती चुनना सीखें। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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