संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भूपेश सरकार के दो बरस, कामयाबी और चुनौतियां...
17-Dec-2020 2:12 PM 254
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भूपेश सरकार के दो बरस,  कामयाबी और चुनौतियां...

आज जब हिंदुस्तान के कई राज्यों में सरकारों को एक बरस भी पूरा नहीं होने दिया जा रहा है तब छत्तीसगढ़ में एक ही पार्टी की सरकार के एक ही मुख्यमंत्री के दो बरस पूरे होने का मौका सिर्फ इसी वजह से भी खास हो सकता था, लेकिन छत्तीसगढ़ दूसरे कई मायनों मेंं भी दूसरी सालगिरह का जलसा मनाने का हकदार है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने देश के तमाम राज्यों के बीच एक अनोखा एजेंडा सामने रखा है। बीस बरस उम्र के इस नए राज्य में कोई सरकार ग्रामीण और किसानी प्राथमिकताओं को इतना बढ़ा सकती है, यह किसी ने सोचा नहीं था। इस दो बरस की आर्थिक उपलब्धि यह है कि सरकार ने कर्ज लेकर भी प्रदेश की करीब आधी आबादी को प्रत्यक्ष और परोक्ष मदद की है। अठारह लाख किसानों के खेती के कर्ज की माफी से उनके परिवारों के लोग और उनकी खेती से जुड़े हुए दूसरे लोग मिलाकर भी प्रदेश की आधी आबादी  हो जाते हैं। विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष भूपेश बघेल का यह चुनावी वायदा था, और इसे पूरा करने के साथ ही देश में सबसे ऊंचे दाम पर धान खरीदकर मुख्यमंत्री ने सरकार की प्राथमिकता में किसान की जगह साफ कर दी। नतीजा यह हुआ कि गांव-गांव तक पहुंची संपन्नता ने खींचतानकर कोरोना-लॉकडाऊन की मार को भी झेल लिया। लगे हाथों एक दूसरी बात की चर्चा जरूरी है कि ग्रामीण रोजगार के मामले में छत्तीसगढ़ ने लॉकडाऊन के वक्त से ही इतना जोर दिया कि राज्य देश में इस मामले में सबसे आगे रहा। सरकार के पहले ही महीने से गांव-गांव तक नालों को बांधना, पशुओं के लिए रहने-खाने की जगह विकसित करना शुरू हुआ जो कि हजारों करोड़ की लागत से आज भी जारी है। यह पूरा का पूरा खर्च सीधे गांवों में ही हुआ और लॉकडाऊन के बाद जब बाजार में जमकर ग्रामीण-खरीदी हुई तो समझ आया कि यह कर्जमाफी, धान के दाम के साथ-साथ दूसरी ग्रामीण मजदूरी का पैसा भी है।

लेकिन इन आर्थिक मोर्चों के अलावा कुछ सामाजिक मोर्चों पर भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस राज्य को एक अलग पहचान दी है। यह पहला मौका है जब क्षेत्रीय और खालिस छत्तीसगढ़ी रीति-रिवाज, त्यौहार, बोली, और सामाजिक कार्यक्रमों को सीधे मुख्यमंत्री निवास से सीएम ने सपरिवार भागीदारी से एक अलग महत्व दिया, और प्रदेश में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का एक अभूतपूर्व माहौल बना। भूपेश बघेल की यह एक आक्रामक सांस्कृतिक नीति रही, लेकिन यह न तो किसी दूसरी संस्कृति के लोगों के खिलाफ रही, और न यह छत्तीसगढ़ के बाहर से आकर बसे लोगों के खिलाफ किसी रणनीति की तरह रही। स्थानीय बोली से लेकर त्यौहारों तक को दिया गया महत्व किसी और के खिलाफ नहीं रहा। क्षेत्रवाद और संस्कृतिवाद के साथ आमतौर पर ऐसा एक खतरा जुड़ा रहता है, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्थानीयता को बढ़ाते हुए भी उसे किसी के खिलाफ जाने से बचाते भी रहे। आज की सरकार अब तक की इस राज्य की सबसे अधिक छत्तीसगढ़ी सरकार है, और इसने क्षेत्रीय स्वाभिमान को बढ़ाने का काम भी किया है।

विधानसभा का चुनाव जिस अकल्पनीय बहुमत से भूपेश बघेल की अगुवाई में जीता गया था, उसने एक राष्ट्रीय पार्टी, कांग्रेस के भीतर भी भूपेश बघेल को काम और तौर-तरीकों की असाधारण आजादी दी। उनके ऊपर संगठन का कोई बड़ा दबाव नहीं रहा, और नतीजा रहा कि वे तेजी से बड़े फैसले ले पाए।  उनके शुरूआती हफ्तों को देखें तो साफ दिखता है कि मतदान खत्म होने के बाद सरकार बनने तक के हफ्तों में उनकी टीम ने एक बड़ा होमवर्क किया था, और सत्ता संभालते ही तेजी से फैसले इसी वजह से हो पाए।

आज देश में जगह-जगह कांग्रेस की सरकारों को या तो पलट दिया गया है, या पलटना जारी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ पूरे देश में ऐसी अकेली कांगे्रस सरकार वाला राज्य है जिसके आंकड़ों को पलटने का सपना भी कोई नहीं देख रहे हैं। बल्कि जनचर्चा यह रहती है कि कांगे्रस अपने गिने-चुने दो-चार राज्यों में से चुनावी खर्च के लिए छत्तीसगढ़ पर ही सबसे अधिक आश्रित रहती है। अगर यह बात सही है तो भूपेश बघेल का कांगे्रस संगठन के भीतर भी एक अलग महत्व समझ में आता है।

सरकार के दो बरस पूरे होने के मौके पर कल मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने संपादकों को चाय पर बुलाया था। उन्होंने इन दो बरसों में से पहले बरस को संसद और निगम-पंचायत चुनावों को समर्पित बताया, और दूसरी बरस को कोरोना के हाथों खत्म हुआ साल कहा। यह बात सही है कि छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार के कार्यकाल का पहला साल छह-छह महीने में होने वाले दो चुनावों में निकल जाता है, लेकिन यह बरस कोरोना के हाथों पूरी दुनिया में बर्बाद हुआ, जिसकी छत्तीसगढ़ में कम बर्बादी की वजह भी मुख्यमंत्री ने गिनाई हैं।

जहां तक कांग्रेस संगठन का सवाल है, तो उसकी राजनीति में मदद करने के लिए भूपेश बघेल ने अपने चुनाव अभियान से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष रहे अमित शाह के खिलाफ जितना आक्रामक मोर्चा खोल रखा है, और अब तक जारी रखा है, वैसा कांगे्रस के किसी दूसरे मुख्यमंत्री ने नहीं किया है।

लेकिन आने वाले तीन बरस भूपेश बघेल के लिए अधिक चुनौती के होंगे। अपनी जिन मौलिक योजनाओं पर उन्होंने हर बरस हजारों करोड़ रुपये झोंके हैं, उनकी आर्थिक और सामाजिक उत्पादकता को आंकना अभी बाकी है। बाहर की कोई तटस्थ संस्था यह मूल्यांकन कर सकती है कि खेती, गांव, जानवर, भूजल, और गोबर जैसी कई योजनाओं से क्या हासिल हुआ? इससे समाज का कितना भला हुआ, और इसकी आर्थिक उत्पादकता क्या रही? जब जनता तक किसी रियायत या सरकार खरीद का पैसा पहुंचता है तो वाहवाही तो मिलती है लेकिन सरकारी खर्च की भरपाई कैसे हुई यह जानना बाकी रहता है। दो दिन पहले कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने प्रेस कांफे्रंस में कहा कि सरकार अब तक गोबर खरीदी का साठ करोड़ से अधिक भुगतान कर चुकी है, तो यह हिसाब लगना अभी बाकी है कि इस साठ करोड़ से सरकार ने कितनी कमाई की है, या पूरी की पूरी रकम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में चली गई है।

जिस तरह केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में एक अभूतपूर्व बहुमत से सरकार बनी है, और उसके बहुमत की वजह से संसद के भीतर और बाहर उसकी जवाबदेही बहुत कम रह गई है, कमोबेश वैसी ही नौबत छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार के साथ है। इस विशाल बहुमत से यह सरकार विधानसभा में और बाहर भी जैसा चाहे वैसा कर सकती है, और यह खुद सरकार के लिए एक खतरनाक नौबत रहती है। भूपेश बघेल के सामने उन्हें मिला असाधारण बहुमत एक तरफ सरकार के स्थायित्व की एक गारंटी है, तो दूसरी तरफ खुद के लिए चुनौती भी है कि इसके चलते गलतियां न हों। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस संगठन को पन्द्रह बरस बाद सत्ता में आने का मौका मिला है, और इस सरकार ने जनता की आबादी के इतने बड़े हिस्से को सीधे फायदा पहुंचाने का काम किया है जितने मतदाता सरकार बनाने के लिए भी जरूरी नहीं होते। यह एक किस्म से पांच बरस तक चलने वाली, अगले चुनाव की तैयारी भी है, या फिर यह गैरचुनावी निरंतर जनकल्याण की नीति है जिसका आर्थिक भार कहां से पूरा होगा यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल सरकार को दो बरसों का जश्न मनाने का एक बड़ा मौका मिला है और यह मौका कोरोना, लॉकडाऊन से उबरकर आगे बढऩे की शुरूआत का मौका भी है। यह कॉलम इस सरकार के बाकी दर्जनों दूसरे जनकल्याणकारी फैसलों की एकमुश्त चर्चा के लिए छोटा है, उन पर चर्चा आने वाले दिनों में। फिलहाल देश में कांगे्रस पार्टी के सामने अकेला छत्तीसगढ़ है जो कि उसकी इज्जत को बचाकर रखे हुए है। आगे के तीन बरस देखते हैं क्या होता है।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

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