संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बस्तर को बंदूकों से परे एक संवेदनशील प्रशासन की भी जरूरत है...
06-Apr-2021 5:31 PM 274
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बस्तर को बंदूकों से परे एक संवेदनशील प्रशासन की भी जरूरत है...

बस्तर में हुए ताजा नक्सल हमले में 22 जवानों की शहादत पर राज्य और केंद्र सरकारें हिली हुई हैं। इन सरकारों ने न तो मुआवजा देने में कोई कमी की है, और न ही नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई छेडऩे की घोषणा करने में कोई देर की है। ऐसा हमला हो जाने के बाद ये दोनों सरकारें जो-जो कर सकती थीं, उन्होंने तकरीबन तमाम काम किए हैं। अब महज यह बाकी रह गया है कि बस्तर जिस बुरी तरह नक्सल प्रभावित है, उस प्रभाव के पीछे की वजहों को देखा जाए, और उन्हें दूर किया जाए। 

यह कुछ मुश्किल काम भी है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से, तीन दशक से भी अधिक हो चुके हैं कि बस्तर में नक्सलियों का डेरा है, और वहां पिछले बीस बरस में तो हर बरस औसतन सौ से अधिक नक्सल-मौतें होती ही हैं। ये तीन दशक भोपाल और रायपुर की राजधानियों के भी रहे हैं, और कांगे्रस और भाजपा की सरकारों के भी। लेकिन आदिवासियों के जिस अंतहीन शोषण, और उन पर राज करने वाले शासन-प्रशासन, राजनीतिक ताकतों, और तरह-तरह के माफिया की वजह से नक्सलियों को बस्तर में दाखिला मिला था, और जमीन मिली थी, वह सब कुछ तो अब भी जारी है। इस बुनियादी नाकामयाबी और खतरे की बात भी किए बिना सिर्फ बंदूकें बढ़ाकर बस्तर से नक्सलियों को खत्म करने की बात एक हसरत अधिक हो सकती है, हकीकत नहीं। जब किसी पेड़ की जड़ों में ही कोई बीमारी लगी हो, तो उसके पत्तों और फलों पर दवा छिडक़कर भला क्या हासिल किया जा सकता है? 

बस्तर में सरकारी मशीनरी और सरकारी कामकाज में जो परंपरागत भ्रष्टाचार लंबे समय से बैठा हुआ है, गरीब आदिवासियों के नाम पर निकली रकम का जो बेजा इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है वह भी बुनियादी दिक्कत का एक हिस्सा है। दिक्कत का दूसरा, अधिक खतरनाक हिस्सा आदिवासियों का शोषण है। पिछले बरसों में, खासकर भाजपा के निरंतर 15 बरस के राज में बस्तर के आम आदिवासियों के न्यूनतम मानवाधिकारों को भी जिस तरह कुचलकर रख दिया गया था, और मुजरिमों से भी बदतर पुलिस अफसरों ने वहां आतंक के नंगे नाच के कई बरस पेश किए थे, उसने बस्तर के आदिवासियों के बीच नक्सलियों के एजेंडा की विश्वसनीयता बढ़ाने का ही काम किया था। जिस तरह गांव के गांव पुलिस जला रही थी, बेकसूरों को गोली मार रही थी, आदिवासी महिलाओं से बलात्कार हो रहे थे, ये बातें उस वक्त के विपक्ष की कांगे्रस पार्टी की तोहमतें ही नहीं थीं, ये बातें सुप्रीम कोर्ट तक जाकर खड़ी रहीं हैं। लेकिन मजाल है कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र ऐसे अंतहीन और धारावाहिक जुर्म और जुल्म के जिम्मेदार लोगों को छू भी ले! इसी का नतीजा है कि अभी जब नक्सलियों ने 22 जवानों को मारा, तो उसके दो दिन पहले ही बस्तर पुलिस के एक छोटे अफसर ने अपने दोस्तों सहित एक नाबालिग आदिवासी लडक़ी से बलात्कार किया था। यह शहरी, संपन्न, शिक्षित, और सुरक्षित लोगों के लिए तो सिर्फ पुलिस रिपोर्ट की बात हो सकती है, लेकिन बस्तर में जुल्म के ऐसे सिलसिले से निपटने के लिए नक्सली भी मौजूद हैं। जिन आदिवासियों ने पुलिस जुल्म के, और सरकारी-अनदेखी के कई दशक देखे हैं, उनके सामने एक अलग किस्म के, लोकतंत्र से परे के, इंसाफ का जरिया भी आसपास मौजूद है नक्सलियों की शक्ल में। इसलिए अगर राज्य या केंद्र की सरकार, या आधा दर्जन और नक्सल प्रभावित प्रदेशों की सरकारों को नक्सल हिंसा खत्म करनी है तो वर्दीधारी-सरकारी जुल्म और जुर्म के सिलसिले को पहले खत्म करना होगा। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर के इस ताजा नक्सल हमले को लेकर एक यही बात सूझती है जिसे न राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा है, और न ही केंद्र से आए हुए गृहमंत्री ने। हो सकता है कि इस हमले के बाद के ताबूतों के बीच इस किस्म की कोई बात कहना बेमौके की बात होती, लेकिन अब जब बस्तर में शासन-प्रशासन दूसरे काम में भी लगेंगे, और राजनीतिक ताकतें भी तरह-तरह के कानूनी और गैरकानूनी धंधों में लगेंगी, तो राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि बस्तर में सरकार की साख कैसे बनाई जाए? यह काम राज्य सरकार के मौजूदा ढांचे के बस का नहीं है क्योंकि वह बस्तर में आदतन शोषण को ही प्रशासन मानते आया है। आदिवासी इलाकों के लिए उनकी संस्कृति और परंपराओं की समझ रखने वाले गैरसरकारी जानकार लोगों को लाकर बस्तर में शासन-प्रशासन की खामियों की शिनाख्त करवानी चाहिए। वैसे भी संविधान में बस्तर को लेकर या दूसरे अधिसूचित इलाकों को लेकर शासन की एक अलग व्यवस्था और प्रणाली साफ-साफ लिखी गई है। इन सबको ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को बहुत ईमानदार नीयत से एक संवेदनशील प्रशासन कायम करने की कोशिश करनी चाहिए। देश और दुनिया के बहुत से ऐसे समाजशास्त्री हैं जो कि छत्तीसगढ़ सरकार को एक संवेदनशील व्यवस्था सुझा सकते हैं, और ऐसा किए बिना संवेदनाशून्य नेता-अफसर बस्तर के प्रशासन को बेहतर नहीं बना सकते, वहां से नक्सलियों को खत्म नहीं कर सकते। इतना जरूर है कि हिंदुस्तान की सरकार की ताकत बहुत बड़ी है, और वह 25-50 हजार सुरक्षाकर्मी भेजकर बस्तर को और बुरी तरह रौंद सकती है, लेकिन क्या उससे बस्तर के लोगों का दिल भी जीता जा सकेगा? फिर आज छत्तीसगढ़ की कांगे्रस सरकार पर एक नैतिक जिम्मेदारी भी है कि पिछली भाजपा सरकार के वक्त का जुल्म का बरसों का सिलसिला खत्म किया जाए जो कि उस वक्त कांगे्रस ही उठाती थी। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि कांगे्रस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी छत्तीसगढ़ के बस्तर की चर्चा होने पर बार-बार यह पूछते हैं कि वह बदनाम अफसर कहां है, उसे कोई काम तो नहीं दिया है? जाहिर है कि कांगे्रस हाईकमान के दिमाग में भी बस्तर के जुल्म के इतिहास की बात दर्ज है। ऐसे में राज्य सरकार को राज्य और सरकार से परे के जानकार और आदिवासियों के लिए हमदर्दी रखने वाले लोग लाकर बस्तर के एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था बनवानी चाहिए। और अधिक सुरक्षाकर्मी भेजना सरकार के हाथ में तो है, लेकिन कल देश भर में दर्जन भर जगहों पर ताबूत पहुंचने पर जैसा हाहाकार मचा है, वैसी मानवीय त्रासदी की कीमत पर ही सरकार की हथियारबंद कार्रवाई जारी रह सकती है। सरकार को एक संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता भी दिखानी चाहिए और बस्तर को शोषण और भ्रष्टाचार से मुक्त प्रशासन देने की एक मौलिक कोशिश करनी चाहिए जो कि नक्सल-विरोधी हथियारबंद-मुहिम के मुकाबले बहुत अधिक कठिन भी होगी।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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